सपना चौधरी बनीं आइटम गर्ल, वायरल हुआ Video

हरयाणवी डांसर सपाना चौधरी एक बार फिर सुर्खियों में है, और वजह है उनका नया गाना. 25 जून को उनका एक गाना “आंख था निशाना” रिलीज हुआ है जो उनका दूसरा पंजाबी सौंग है. इस सोंग के रिलीज के पहले से ही सपना इसे अपने सोशल मीडिया अकाउंट्स पर काफी प्रमोट कर रही थी. YouTube पर अब ये सौंग आ गया है जिसे अब तक 7 लाख से भी ज्यादा लोगों ने देख चुका है.

पंजाबी फिल्म ‘देव’ के इस गाने को फिवाइट हिल्स म्यूजिक ने तैयार किया है. सपना के इस आइटम सौंग में मानव विज नजर आ रहे है जो एक सौफे में बैठ कर सपना के डांस को एनजौय कर रहे हैं.

सपना के जलवे

ये बात सभी को पता है की सपना की फैन फौलोविंग काफी है सोशल मीडिया अकाउंट हो या फिर उनके पब्लिक इवेंट सपना के फैंस हर जगह उनको चेयर्स करने आ जाते है. बिग बौस के बाद से सपना सोशल मीडिया पर काफी एक्टिव रहने लगी हैं. एक्टिवनेस के चलते ही लोग अब उनसे काफी कनेक्ट फील करते है.

 

View this post on Instagram

 

The word impossible is not in my dictionary. #desiqueen #positivevibes #positivevibes #workholic #life #thankgod #black

A post shared by Sapna Choudhary (@itssapnachoudhary) on

सपना के सौंग

ये बात तो साफ है की सपना जब भी किसी नए सौंग के साथ आए फैंस ने काफी पसंद किया है. “तेरी अंख्या को यो काजल हो” या फिर “आंख था निशाना” फैंस को सपना के डांसिंग सौंग काफी पसंद आते है. 

सूरत अग्निकांड  ‘मौत का घर’ बनती इमारतें

आग में फंसे छात्रछात्राओं को बचाने के बजाय उन के वीडियो बनाने वालों को पानी पीपी कर शर्मिंदा किया गया. प्रशासन और सरकार की लापरवाही की खूब खिल्ली उड़ाई गई.

इतना ही नहीं, गुजरात और केंद्र सरकार को इस बात पर आड़े हाथ लिया गया कि जब राज्य में लोगों की हिफाजत के लिए आप कोई कड़े कदम नहीं उठा सकते हैं तो फिर अरबों रुपए की सरदार वल्लभभाई पटेल की मूर्ति बनवाने के क्या माने हुए?

बात कुछ हद तक सही भी थी कि जब लोग ऐसे हादसों में सरकार और प्रशासन की ढील और भ्रष्टाचार की वजह से समय से पहले मौत के मुंह में चले जाते हैं तो फिर किसी भी तरह की तरक्की दिखावटी और बेमानी है.

24 मई, 2019 को नरेंद्र मोदी के गृह राज्य गुजरात के सूरत शहर में एक चारमंजिला इमारत में आग क्या लगी, वहां बने एक कोचिंग सैंटर में पढ़ने गए बच्चे मौत की लपटों में स्वाहा हो गए. आग और धुएं का इतना जबरदस्त कहर था कि डरेसहमे बच्चे चौथी मंजिल से बाहर आने की हड़बड़ाहट में खिड़कियों से नीचे कूदने लगे, पर यह कोशिश जानलेवा साबित हुई.

तक्षशिला आर्केड नाम के कमर्शियल कौंप्लैक्स में दोपहर के साढ़े 3 बजे आग लगी थी जिस की खबर मिलने के बाद वहां आग बुझाने की 19 गाडि़यों को भेजा गया. उन्होंने 2 हाइड्रोलिक प्लेटफार्म भी बनाए लेकिन वे इमारत की ऊपरी मंजिल तक नहीं पहुंच पाए.

जानकारी के मुताबिक, यह आग बिजली में हुए शौर्ट सर्किट की वजह से लगी थी. कोचिंग सैंटर में पहुंचने के लिए बनी सीढि़यां लकड़ी की बनी थीं इसलिए आग बड़ी तेजी से फैली. यही वजह थी कि ऊपर फंसे छात्र सीढि़यों से नीचे नहीं जा पाए और उन्होंने खिड़की से कई फुट नीचे कूदना ही मुनासिब समझा.

ये भी पढ़ें- अश्लीलता: मोबाइल बना जरिया

इस पूरे अग्निकांड में सब से दुखद पहलू यह रहा कि सड़क पर जमा भीड़ ने उन छात्रों को बचाने के बजाय अपने मोबाइल फोन से उन के वीडियो बनाना ज्यादा जरूरी समझा. हां, सूरत के ही एक दिलेर नौजवान केतन जोरवाडि़या ने अपनी जान की बाजी लगाते हुए अकेले ही कई छात्रों को बचाया, जो तारीफ के काबिल था.

23 छात्रों की ऐसी दर्दनाक मौत के बाद सूरत प्रशासन ने कड़े कदम उठाए और उस कोचिंग सैंटर के मालिक भार्गव भूटानी को गिरफ्तार कर लिया, पर लाख टके का सवाल यह है कि आगे से ऐसा कोई हादसा न हो, इस के लिए सरकार क्या फैसले लेगी?

सूरत ही नहीं, देश के तमाम बड़े शहरों में बनी इमारतों का कमोबेश यही हाल है. दिल्ली को ही ले लीजिए. एक खबर के मुताबिक, वहां की

80 फीसदी इमारतें सुरक्षित नहीं हैं.

कितने दुख और हैरानी की बात है कि दिल्ली की ज्यादातर इमारतों पर फायर सेफ्टी के तौरतरीके लागू ही नहीं होते हैं. दिल्ली में यह कानून साल 1983 में आया था जिस में 15 मीटर से ऊंची इमारतों के लिए यह कानून बनाया गया था, पर लोग भी सयाने निकले. वे 15 मीटर से कम ऊंचाई की इमारतें बनाने लगे ताकि इस कानून की लपेट में ही न आएं.

ये भी पढ़ें- हम जनता के सेवक हैं

जब बात नहीं बनी तो साल 2010 में एक और कानून लाया गया जिस में 15 मीटर से कम ऊंची इमारतों को भी फायर सेफ्टी कानून के दायरे में लाया गया.

यहां एक और चौंकाने वाली जानकारी मिलती है कि दिल्ली की गैरकानूनी कालोनियों और लाल डोरा वाले इलाकों पर भी फायर सेफ्टी के तौरतरीके लागू नहीं होने की वजह से वहां जिस तरह की इमारतें बन रही हैं, उन में फायर सेफ्टी के तौरतरीकों को अपनाने की कैसे अनदेखी की जा रही है, वह जगजाहिर है.

50 गज के छोटे से टुकड़े पर 5-6 मंजिला डब्बेनुमा घर बना दिए जाते हैं जहां धड़ल्ले से ऐसे लोगों को भी किराए पर मकान दे दिया जाता है जो वहां ऐसे कारोबार करते हैं जो लगी आग में घी डालने का काम करते हैं.

गैरकानूनी कालोनियों की बात तो छोडि़ए, दिल्ली के करोलबाग इलाके का ही एक उदाहरण देखिए. इसी साल के फरवरी महीने में वहां के एक होटल ‘अर्पित पैलेस’ में लगी भीषण आग में 17 लोग जल कर मर गए थे.

दिल्ली पुलिस ने अपनी छानबीन में उस होटल को ‘मौत का घर’ कहा था जिस में होटल संचालकों और प्रशासनिक अफसरों ने फायर सेफ्टी नियमों की पूरी तरह से अनदेखी की थी. होटल में कई गैरकानूनी निर्माण किए गए थे.

सवाल उठता है कि उस के बाद ऐसे बने तमाम होटलों पर क्या कार्यवाही की गई? नहीं की गई होगी वरना आज भी दिल्ली की 80 फीसदी इमारतों के ये हालात नहीं होते.

ये भी पढ़ें- एक सवाल-‘घरेलू हिंसा के कारण’

हम अपनेअपने इलाकों को टोकियो और पैरिस बनाने के दावे तो खूब करते हैं, पर जब बेतरतीब बनी बस्तियों के हालात का जायजा लिया जाता है तो डर के मारे रोंगटे खड़े हो जाते हैं. इमारत बनाने के नियमों को कोई विरला ही मानता है, वरना मौका मिला नहीं और कर दिया गैरकानूनी निर्माण. आग बुझाने की गाड़ी पूरे तामझाम के साथ चलती है, पर जब उसे संकरे रास्तों पर ट्रैफिक की भीड़ में तेजी से निकलने का रास्ता नहीं मिलेगा तो वह समय पर हादसे की जगह पर नहीं पहुंच पाएगी. जहां वह पहुंच भी जाती है वहां जमा भीड़ ही उस के काम में सब से बड़ा रोड़ा साबित होती है.

जब से मोबाइल फोन से वीडियो बनाने का चसका लोगों को लगा है तब से हालात और ज्यादा भयावह होने लगे हैं. सूरत का अग्निकांड इस बात का जीताजागता सुबूत है.                  द्य

न घबराएं, करें उपाय

* भगदड़ न मचाएं. अपने पूरे होश में रहें.

* अगर धुआं बहुत ज्यादा है तो नाक पर गीला रूमाल या गीला कपड़ा बांधें और फर्श पर लेट जाएं, क्योंकि धुआं ऊपर की ओर उठता है.

* अगर आप किसी कमरे में बंद हों तो उस के खिड़कीदरवाजे बंद कर दें और उन के नीचे या ऊपर या कहीं से भी धुआं आने का डर हो तो उस जगह को भी गीले कपड़े से सील कर दें.

* अगर आग भीषण है तो उस से दूर रहने की कोशिश करें. जल्दबाजी में अपनी जान जोखिम में न डालें. किसी महफूज जगह पर बने रहें और अग्निशमन वालों का इंतजार करें.

अंधविश्वास: भगवान का दूत कहने वाले

ऐसे इश्तिहार देने वाले बाबाओं का दावा होता है कि वे किसी की भी बड़ी से बड़ी परेशानी को चुटकी बजाते ही हल कर सकते हैं. वे खुद को तंत्र विद्या में माहिर तांत्रिक बताते हैं. इश्तिहारों के जरीए वे घर बैठे लोगों तक आसानी से पहुंच जाते हैं.

हैरानी की बात तो यह है कि लोग इन के इस छलावे में आ भी जाते हैं. वे इन्हें फोन करते हैं, अपनी परेशानियां सुनाते हैं, कई बार तो ये ढोंगी बाबा

उन्हें फोन पर ही ऊलजुलूल सुझाव देते हैं या अपने शिविर या कहें दफ्तर में बुलाते हैं.

इन बाबाओं के पास अकसर लोग औलाद पाने की आस में ही जाते हैं और इस परेशानी से बचने के लिए या तो बाबा औरत को बहलाफुसला कर सैक्स करते हैं या फिर उसे बेहोश कर के बलात्कार.

महाराष्ट्र की एक वारदात है. खुद को ‘भगवान का दूत’ कहने वाले 45 साल के ऐसे ही एक ढोंगी के पास एक औरत पहुंची. उस औरत ने जब बाबा को अपनी परेशानी बताई तो वह उसे एक कमरे में ले गया. वहां औरत के ऊपर गंगाजल छिड़का गया और उसे नींद की दवा दी गई.

दवा का असर होने लगा तो बाबा और उस के एक नंगधड़ंग साथी ने उस औरत को यहांवहां छूना शुरू कर दिया और बाद में ढोंगी बाबा ने उस का बलात्कार किया.

इस मामले पर वकील रंजना का मानना है कि पीडि़त औरतों द्वारा ऐसे ढोंगियों के खिलाफ किसी तरह की कोई कार्यवाही की मांग नहीं की जाती है क्योंकि उन्हें समाज का डर तो होता ही है, साथ ही इस बात का भी डर होता है कि कहीं उन के पति उन्हें छोड़ न दें.

औलाद के नाम पर बलात्कार ही केवल एक अपराध नहीं है जो ये ढोंगी करते हैं, बल्कि पूजापाठ और कष्टों को मिटाने के नाम पर लोगों को लूटना, बलि चढ़वाना और टोनाटोटका करना भी इन का पेशा है.

ऐसे ही 2 बाबाओं में मोहम्मद आसिफ और मोहम्मद ताहिर के नाम भी शुमार हैं. हैदराबाद के इन 2 ढोंगियों ने लिबर्टी प्लाजा नाम की इमारत में अपना औफिस खोल कर लोगों को ठगने का बड़ा ही अच्छा इंतजाम कर रखा था.

ज्योति नाम की एक औरत इन के पास अपनी पारिवारिक समस्या के हल के लिए आई. इन दोनों ने उस से कहा कि उस के घरपरिवार पर बुरी ताकतों का साया है, साथ ही यह भरोसा भी दिया कि उन के द्वारा किए गए टोनेटोटके से यह साया पूरी तरह से हट जाएगा.

ये भी पढ़ें- इलाज का बहाना, दैहिक शोषण जारी

नासमझी के चलते ज्योति ने अपने गहने और 50,000 रुपए इन ढोंगियों की झोली में ला कर रख दिए. पैसे और जेवर ले कर ये ढोंगी वहां से खिसक लिए, जबकि ज्योति अपना माथा पीटती रह गई.

मौडर्न बाबा

इन तांत्रिकों और वशीकरण करने वाले बाबाओं ने अपना लैवल बहुत ज्यादा बढ़ा लिया है, अब केवल अखबार, पत्रिकाएं व पोस्टर ही ऐसा जरीया नहीं हैं जिन के द्वारा ये अपना कारोबार फैला रहे हैं, बल्कि अब इन की वैबसाइट भी बनने लगी हैं.

ऐसी ही एक वैबसाइट पर लिखा हुआ था, ‘कहीं न हो काम, हम से पाएं समाधान, लवमैरिज, सौतन, दुश्मन से छुटकारा, निराश प्रेमी संपर्क करें…’

इस वाक्य को पढ़ कर जो पहला सवाल जेहन में आता है, वह यह है कि क्या सचमुच इन बेतुकी बातों पर लोग यकीन करते होंगे?

इस सवाल का जवाब पाने में ज्यादा देर नहीं लगी. नालासोपारा इलाके में फेक बाबा, सांईं के भेष में बलात्कारी और

2 भाइयों ने बलि चढ़ाया परिवार जैसी घटनाएं पढ़ कर तो यकीन हो गया है कि भारत में अंधविश्वासियों की कमी नहीं है.

मुद्दा यह नहीं है कि ये पाखंडी बाबा बन कर ये सब अपराध क्यों कर रहे हैं, बल्कि मुद्दा यह है कि लोग इन्हें ये अपराध करने ही क्यों दे रहे हैं?

ढोंगियों से बचें

इन ढोंगियों पर उंगली उठाने से पहले इन के पास जाने वाले लोगों की गलती को बड़ा मानना ज्यादा बेहतर होगा. आखिर ये वही लोग हैं जो निर्मल बाबा के ‘लाल चटनी से समोसा खाने के बजाय हरी चटनी से खाइए, सभी परेशानियां ठीक हो जाएंगी’ जैसे उपदेशों पर यकीन करते हैं.

बात वहीं आ जाती है कि बचाव क्या है? तो बचाव यही है इन ढोंगियों के चंगुल से दूर रहना. घर में, दफ्तर में या आपसी रिश्तों में जो कष्ट हैं, उन का हल आप को अपनी खुद की समझदारी से मिलेगा, किसी के टोनेटोटके से नहीं. औलाद न होने की कई वजहें हो सकती हैं और विज्ञान में उन के उपाय भी हैं. इन बाबाओं के पास जा कर कोई भभूत खा कर या बलात्कार का शिकार हो कर बच्चा पाना कोई समाधान नहीं है.     द्य

कानून है आप के साथ

द्य आईपीसी की धारा 416 : धोखाधड़ी करने पर किसी भी शख्स को एक साल तक की जेल या जुर्माना भरना पड़ सकता है

या दोनों.

द्य आईपीसी की धारा 420 : इस कानून के तहत अगर कोई आदमी किसी की निजी जायदाद से जुड़ी कोई धोखाधड़ी करता है तो उसे 7 साल तक की जेल व जुर्माना भरना पड़ सकता है.

ये भी पढ़ें- सिरकटी लाश ने पुलिस को कर दिया हैरान

द्य इस के अलावा धोखाधड़ी और ठगी के लिए धारा 420, 508 और साधारण कानून के आधार पर इन पाखंडियों को जेल पहुंचाया जा सकता है.

द्य पाखंडियों द्वारा बलात्कार या कत्ल जैसी वारदातों को अंजाम दिया जाता है तो उसी के मुताबिक आईपीसी की धाराएं लागू होंगी.

आइए एडमिशन का मौसम है

लेखक-  शरद उपाध्याय

हमारे देश में प्रतिदिन हजारों बच्चों का जन्म होता है. बच्चे धीरेधीरे बड़े होते हैं व एक दिन उस अवस्था को प्राप्त करते हैं जहां पर उन्हें स्कूल भेजने का संस्कार संपन्न कराना पड़ता है.

बच्चों को स्कूल में डालना, देखने में जितना सरल प्रतीत होता है उतना सरल वास्तव में है नहीं. वे दिन गए जब बच्चों को सरलता से स्कूल में एडमिशन मिल जाया करता था. बच्चा थोड़ा सा ठीकठाक हुआ, उलटीसीधी गिनती बताने लगता था तो भी वे मात्र इस आधार पर कि बच्चे को पर्याप्त दिशाज्ञान है, स्कूल में भर्ती कर लेते थे.

पर आज ऐसा कुछ भी नहीं है. वर्तमान में एडमिशन एक दुर्लभ प्रक्रिया हो गई है. बच्चे के जन्म के साथ ही यह चिंता और बहस का विषय हो जाता है. जैसे ही बच्चा जन्मता है, मांबाप उस के भविष्य की चिंता प्रारंभ कर देते हैं. उन्हें घबराहट होती है कि बस, 3 या 4 साल बाद वे ‘स्कूल एडमिशन’ के पीड़ादायक दौर से गुजरने वाले हैं. उन्हें भूख कम लगने लगती है तथा ब्लडप्रेशर में उतारचढ़ाव अधिक महसूस होता है.

पहले जहां इस प्रक्रिया में अध्ययन केवल बच्चे को करना पड़ता था आजकल मांबाप को अधिक मेहनत करनी पड़ती है. वर्षों पूर्व की गई पढ़ाई की यादें ताजा हो जाती हैं तथा मांबाप  के हाथ में पत्रपत्रिकाओं के स्थान पर कोर्स की किताबें नजर आने लगती हैं.

बच्चे के जन्म के साथ ही मातापिता का नगरीय भौगोलिक ज्ञान बढ़ जाता है. शहर के वे सभी स्कूल, जहां वे बच्चे का एडमिशन कराना चाहते हैं, उन के आकर्षण का केंद्र बन जाते हैं. वे जब कभी भी उधर निकलते हैं, उन स्कूलों को देख कर ठंडी आहें भरते हैं.

ये भी पढ़ें- बताएं कि हम बताएं क्या

बच्चा थोड़ा बड़ा होता है तो मांबाप के चिंताग्राफ में वृद्धि हो जाती है. वे तथाकथित स्कूलों के अध्यापक- अध्यापिकाओं से संबंध बढ़ाने लगते हैं. जानपहचान न होने के बावजूद उन्हें नमस्ते करते हैं. यहां वे गुरुजनों के प्रोत्साहन के अभाव को दार्शनिक अंदाज में लेते हैं. वे सोचते हैं, कोई बात नहीं, आज नहीं तो कल ईश्वर उन की प्रार्थना को अवश्य सुनेगा.

थोड़ा सा परिचय होने के बाद वे गुरुजनों को घर पर चाय के लिए आमंत्रित करते हैं एवं उन के न आने पर स्वयं उन के घर जा धमकते हैं. इन नाना प्रकार के मौकों पर मिली उपेक्षा को वे भविष्यरूपी निवेश समझ कर पी जाते हैं.

लेकिन उन के प्रयास केवल बाहरी नहीं होते, उन का घर भी एक बाल अध्ययन केंद्र बन जाता है. पहले वे स्वयं रटरट कर याद करते हैं, उस के बाद बच्चे के साथ अत्याचार जारी रखते हैं. जिन सब्जियों को पहले वे मात्र हिंदी में ही पका कर खाते थे. अब उन के अंगरेजी अर्थ के लिए किताबों का सहारा लेते हैं. पहले उन के घर में जहां रोज पूजा के मंत्र गूंजते थे, अब पालतू जानवरों व पक्षियों के नाम तैरते रहते हैं. उन का घर, घर न लग कर चिडि़याघर प्रतीत होता है.

व्यक्ति घर से निकलने वाले सभी रास्ते भूल जाता है. वह घर से दफ्तर जाता है व दफ्तर से लौट कर सीधे घर आता है. घर आते ही वह किताबें उठा कर सीधे ट्यूशन पढ़ने चला जाता है. आखिरकार आजकल बच्चों के साथसाथ मांबाप का भी इंटरव्यू लिया जाता है. कहीं किसी मौके पर बच्चा तो होशियारी का परिचय दे जाए, किंतु मांबाप फिसड्डी साबित हों, इस डर से वह निरंतर अध्ययन में लगा रहता है.

आजकल बड़ेबड़े स्कूलों में फीस का स्तर भी बड़ाबड़ा ही होता है. अत: वह निर्धारित समय पर आवश्यक संसाधन जुटाने के लिए विभिन्न ऋण योजनाओं का दामन पकड़ते हैं. जिस खर्चे में उन की कालिज स्तर की पढ़ाई संपन्न हो गई थी, आजकल उस में तो बच्चा नर्सरी भी पास नहीं कर सकता.

जैसे ही उन का नालायक बच्चा लायक बनता है उन की तैयारियां युद्ध स्तर पर प्रारंभ हो जाती हैं. पति व पत्नी  अपनी बेकाबू काया पर काबू पाने के लिए सघन अभियान प्रारंभ कर देते हैं. पति जहां रोज सुबहसुबह दौड़ लगाता है वहीं पत्नी रस्सी कूद कर शरीर छरहरा करने का असफल प्रयास करती है. आखिरकार इंटरव्यू में मांबाप फिट नहीं दिखे तो बच्चे के अनफिट होने की आशंका बढ़ जाती है.

पत्नी जो विभिन्न मौकों पर अंगरेजी की टांग तोड़ती रहती है, अब थोड़ा संभलसंभल कर बोलने लगती है.

शहर के विभिन्न स्कूल एडमिशन के इस पावन पर्व पर अपने फार्म जारी करते हैं जिस पर व्यक्ति सैकड़ों रुपए इनवेस्ट कर आधुनिक शिक्षा को बढ़ावा देता है.

फिर आता है इंटरव्यू का दौर. उस से पूर्व मातापिता का जहां खाना हराम हो जाता है वहीं बच्चों की डाइट बढ़ जाती है. अच्छे प्रदर्शन का वचन देने के बदले वह नाना प्रकार की स्वादिष्ठ वस्तुएं अनवरत पाता रहता है. इस से जहां बच्चे का स्वास्थ्य सुधरता है वहीं चिंतित मातापिता का स्वास्थ्य व बजट, दोनों बिगड़ जाता है.

इंटरव्यू के दौरान विभिन्न स्कूलों के अलगअलग चयनकर्ताओं के सामने प्रदर्शन करता है. जब तक रिजल्ट नहीं आता तब तक मांबाप, आपस में बैठ कर तीनों के प्रदर्शन की समीक्षा करते रहते हैं. वे विभिन्न देवीदेवताओं के समक्ष मनौती मानते हैं.

ये भी पढ़ें- टूटता विश्वास

किंतु होनी को कौन टाल सकता है. चंद भाग्यवानों के अतिरिक्त सभी का विश्वास भगवान से उठ जाता है. वे धर्मनिरपेक्ष हो जाते हैं. बच्चे का जीवन स्तर, जोकि अच्छे प्रदर्शन के वचन के कारण ऊपर उठ गया था, पुन: गरीबी की रेखा के नीचे आ जाता है.

फिर वे भारतीय खिलाडि़यों के अच्छे प्रदर्शन न कर पाने की तरह, एकदूसरे पर दोषारोपण करते रहते हैं. और अंत में थकहार कर समझौतावादी हो जाते हैं. परिणाम में वे नालायक बेटे को किसी लायक स्कूल के स्थान पर अन्य स्कूल में प्रवेश दिला देते हैं और इसे नियति मान कर स्वीकार कर लेते हैं. द्य

बरसात में इन 4 चीजों से बचें

बरसात के मौसम में घर के बाहर पैर रखते ही कीचड़, नालों का गंदा पानी, कूड़े के ढेर से उठती सड़ांध से दिमाग खराब हो जाता है. बारिश की बूंदों से गरमी से राहत मिलती है लेकिन इस मौसम में पनपने वाली कई बीमारियों से बचना बेहद जरूरी है. आइए, जानते हैं दिल्ली के वरिष्ठ फिजिशियन व कार्डियोलौजिस्ट डा. के के अग्रवाल से कि इन बीमारियों से कैसे बचें.

1. लेप्टोस्पायरोसिस

इस बीमारी में बुखार आता है और आंखों में सूजन आती है. यह बीमारी जानवरों के मलमूत्र से फैलने वाले लेप्टोस्पाइश नामक बैक्टीरिया के कारण होती है. खासकर यह चूहों से होती है. चूहे जब पानी में या अन्य जगह पेशाब करते हैं तो आप के पैरों के माध्यम से, विशेषकर यदि आप के पैरों में घाव हैं तो, उस पेशाब के कीटाणु जिस्म में घुस जाते हैं. इस मौसम में जलभराव व बहते पानी के कारण यह संक्रमण पानी में मिल कर उसे दूषित कर देता है. इस वजह से इस बीमारी की आशंका अधिक रहती है.

बारिश के मौसम में नंगेपैर चलना ठीक नहीं रहता, हमेशा जूते, चप्पल, दस्ताने, चश्मा, मास्क आदि लगाएं. तालाबों, पूलों व नदियों आदि के  पास जाने, मृत जानवरों को छूने से बचें. घावों की नियमित साफसफाई करते रहें.

ये भी पढ़ें- जिस ‘बीमारी’ से परेशान थे आयुष्मान, क्या आपको पता है उसके बारे में ?

2. मलेरिया

बारिश की वजह से जगहजगह सड़कों व नालों में पानी जमा हो जाता है और गंदे पानी में मच्छर पनपने शुरू हो जाते हैं, जिन में से कुछ मलेरिया के भी मच्छर होते हैं. इस मौसम में दिल्ली में डेंगू व चिकनगुनिया, गुजरात में जिका और पूर्वोत्तर में मलेरिया का जबरदस्त आतंक रहता है.

मच्छर को घर में या बाहर पनपने न दें. छोटे व बड़े बरतन में पानी को ढक कर रखें. पानी की टंकी को बराबर साफ करते रहें. मांसपेशियों में दर्द और कंपकंपी के साथ बुखार आना मलेरिया के लक्षण हो सकते हैं.

3. डायरिया, टायफायड व जौंडिस

ये तीनों बीमारियां दूषित पानी पीने से होती हैं. इस मौसम में उबला पानी पिएं. अच्छी तरह पका हुआ खाना खाएं. सब्जी को छील कर या अच्छी तरह धो कर पकाएं और ठंडा खाना हमेशा गरम कर के ही खाएं.

सर्दीजुकाम, गले में खराश या बुखार हो तो टायफायड के लक्षण हो सकते हैं. उलटी, कमजोरी या फिर आंखों व हाथ के नाखूनों में पीलापन आना जौडिंस के लक्षण हैं.

ये भी पढ़ें- अंडरवियर भी हो सकती है सेहत के लिए खतरनाक…

4. स्नेक पौयजनिंग

बरसात में बिलों में पानी घुसने से अकसर सांप बाहर निकल आते हैं. यदि सांप काट ले तो तुरंत अस्पताल जाएं नजदीकी डाक्टर को दिखाएं. फिल्मों में जो दिखाया जाता है कि सांप काटने से मुंह से जहर खींच लेते हैं, ऐसा कतई न करें.

Edited by – Neelesh Singh Sisodia

रामकथा हादसा : आस्था पर कुठाराघात

सैकड़ों लोग आंखें बंद किए इस कथा का आनंद ले रहे थे और अपनी तकलीफों के समाधान का अहसास कर रहे थे.
बीती बातों को याद कर बुजुर्गों की आंखों से आंसू निकल रहे थे और वे कथा का रसास्वादन कर रहे थे. तभी आंधीतूफान ने दस्तक दी. अपलक मौसम को निहारते कथावाचक भी धोतीकुरता संभालते दौड़ते नजर आए.

यह वाकिआ राजस्थान के बाड़मेर के एक गांव जसोल में हुआ. दिन रविवार, 23 जून, 2019 की दोपहर के साढ़े 3 बजे आंधीतूफान ने अपना रंग दिखाया. तेज हवाएं चलने लगीं. तेज हवा से पंडाल उखड़ गया. वहां भगदड़ मच गई. कई लोग तो संभल भी नहीं पाए थे कि जोरदार बारिश आ गई. आंधीतूफान का कहर ही लोगों की धार्मिक आस्था पर चोट कर गया. इस हादसे में 15 से ज्यादा लोग मर गए और कई घायल हो गए. घायलों को नाहटा अस्पताल में भरती कराया गया.

ये भी पढ़ें- अश्लीलता: मोबाइल बना जरिया

कथावाचक मुरलीधर मनोहर ने कथा बीच में ही छोड़ दी और घर चले जाने को कहा.

मौसम के साथसाथ माहौल बिगड़ता देख उन्होंने लोगों से पंडाल खाली करने की अपील की. स्टेज छोडऩे से पहले उन्होंने कहा कि हवा काफी तेज है इसलिए कथा को रोकना पड़ेगा. तेज हवा से पंडाल उखड़ रहा है. निकलिए बाहर सभी. खाली कर दीजिए पंडाल. इस के बाद पंडाल उखड़ता देख वे भी स्टेज छोड़ कर चले गए.

कथावाचक ने तो जैसेतैसे भीड़ से बचबचा कर अपनी जान बचाई, पर जो कथा में मगन थे, भगदड़ से अनजान थे, वे ही इस हादसे का शिकार हो गए. कथा सुनने वाले ज्यादातर बुजुर्ग थे जो भाग नहीं सकते थे. उस समय उन्हें अपनी लाचारी भारी पड़ी. अगर वे भी जवान होते तो अपनी जान बचा सकते थे. यानी भाग सकते थे.

पंडाल काफी बड़े एरिया में लगाया गया था, जिस में 2000 से 3000 लोग समा सकें. पर पंडाल इतना भी मजबूत नहीं था कि भगदड़ होने पर हजारों की तादाद को झेल पाता. आंधीतूफान ने पलभर मेें ही ऐसा कोहराम मचा दिया कि 15 तो यों ही चल बसे.

ये भी पढ़ें- एक सवाल-‘घरेलू हिंसा के कारण’

तकरीबन70-80 लोग घायल हुए, वे भी अस्पताल में बैठेबैठे राम लला को ही कोस रहे होंगे कि काश, हम वहां न जाते तो बच सकते थे. पर होनी को कौन टाल सकता है.

जिला कलक्टर हिमांशु गुप्ता ने बताया कि तकरीबन हजार लोग जसोल गांव में राम कथा सुनने के लिए पहुंचे थे. दोपहर साढ़े 3 बजे तूफान आया और हादसे में तबदील हो गया.

मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने ट्वीट किया कि जसोल, बाड़मेर में राम कथा के दौरान पंडाल गिरने से हुए हादसे में बड़ी तादाद में लोगों की जानें जाने की जानकारी बहुत ही दुखद और दुर्भाग्यपूर्ण है. उन्होंने हादसे में मारे गए लोगों के परिवारों को 5 लाख व घायलों को 2 लाख रुपए देने का ऐलान किया, वहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बाड़मेर में पंडाल गिरना दुर्भाग्यपूर्ण बताया.

मुख्यमंत्री रह चुकी वसुंधरा राजे ने ट्वीट किया कि बाड़मेर के जसोल गांव में राम कथा के दौरान तेज आंधी से गिरे पंडाल हादसे में 15 से अधिक लोगों की मौत की खबर सुन कर बेहद दुख हुआ.

ये भी पढ़ें- हम जनता के सेवक हैं

बाड़मेर के सांसद कैलाश चौधरी ने नाहटा अस्पताल का दौरा किया, घायलों का हालचाल जाना और कहा कि यह घटना काफी दर्दनाक है.

“श्रीदेवी बंगलो” में सुपरस्टार बनेंगे सलमान खान के भाई

रातोंरात “विंक गर्ल” के नाम से मशहूर हुईं साउथ एक्ट्रेस प्रिया प्रकाश वारियर बहुचर्चित फिल्म “श्रीदेवी बंगलो” में मुख्य भूमिका में हैं. फ़िलहाल नई ख़बर है कि इस फिल्म से अलग-अलग फिल्म इंडस्ट्रीज़ के दिग्गज कलाकार जुड़ने वाले हैं. बौलीवुड के साथ-साथ साउथ इंडस्ट्री (तमिल, तेलुगू, मलयालम, कन्नड़) के भी बड़े कलाकार इस फिल्म में सुपरस्टार की भूमिका में नजर आएंगे. बौलीवुड इंडस्ट्री से सुपरस्टार की भूमिका अरबाज खान निभाएंगे. इस फिल्म के लिए अरबाज ख़ान को साइन भी कर लिया गया है.

अरबाज खान को साइन किया…

निर्देशक प्रशांथ ममबुली ने हमें ये भी बताया कि, अरबाज खान सोशल मीडिया में “श्रीदेवी बंगलो” फिल्म की चर्चा और टीज़र देखकर फिल्म से जुड़ने के लिए तैयार हो गए. इस फिल्म के टीज़र को अब तक लाखों लोग देख चुके हैं और कुछ विवादों के चलते ये फिल्म लगातार सुर्ख़ियों में है.

“श्रीदेवी बंगलो” फिल्म से जुड़ने वाले साउथ इंडस्ट्री के सितारों के नाम पूछने पर निर्देशक प्रशांथ ममबुली ने बताया कि, ‘साउथ इंडस्ट्री से मलयालम फ़िल्मों का दिग्गज कलाकार जल्द ही इस फिल्म से जोड़ा जायेगा.. अभी बातचीत चल रही है उस बड़े नाम के खुलासे के लिए थोड़ा इंतज़ार करना होगा.’

कन्नड़ सुपरस्टार के बारे में पूछने पर प्रशांथ ममबुली ने बताया, ‘इस फिल्म के लिए हम साउथ इंडस्ट्री से हर भाषा के बड़े सितारों को “श्रीदेवी बंगलो” में मुख्य भूमिका के लिए जोड़ेंगे.’

ये भी पढ़ें- आखिर क्यों इस एक्ट्रेस को लंदन से अपने भाई को बुलाना पड़ा

ARBAAJ

पांच भाषाओं में बनेगी फिल्म…

इस फिल्म के निर्माता चंद्रशेखर सुधीरकुमार, रोमन गिल्बर्ट, जेरोम जोसेफ़ और मनीष नायर हैं. फिल्म के निर्देशक “प्रशांथ ममबुली” इस फिल्म को एकसाथ पांच भाषाओं हिंदी, मलयालम, तमिल, तेलुगू और कन्नड़ में बनायेंगे.

ये भी पढ़ें- शूटिंग के दौरान घायल हुए अर्जुन, क्या होगा मलाइका का रिएक्शन

तेजी से हो रही है शूटिंग…

फिल्म के अधिकतर हिस्से की शूटिंग लंदन की ख़ूबसूरत वादियों में की गयी है. फिल्म 80 प्रतिशत से अधिक शूट की जा चुकी है. बाकी की शूटिंग जुलाई के पहले हफ़्ते से शुरू हो जाएगी. फिल्म के निर्देशक प्रशांथ ने बताया कि मुंबई के अलग-अलग हिस्सों में इस फिल्म की शूटिंग पूरी तेज़ रफ़्तार से बीस दिन तक चलेगी.

 

View this post on Instagram

 

Hustle & heart will set you apart 🧚🏻‍♀️

A post shared by Priya Prakash Varrier (@priya.p.varrier) on

फिल्म की कहानी…

इस फिल्म की कहानी के बारे में पूछने पर निर्देशक प्रशांथ ममबुली ने बताया, ‘मेरी फिल्म ‘श्रीदेवी बंगलो’ एक सुपरस्टार की कहानी है, जो बेहद दिलचस्प, लोगों के रोंगटे खड़े कर देने वाली है. इस चमक-धमक की दुनिया में एक इंसान कैसी परिस्थितियों को देखता है, अच्छे और बुरे समय में उसे किन चीज़ों से गुज़ारना पड़ता है, इस फिल्म की कहानी का ये मुख्य भाग है और ये फिल्म आपको बांध के रखेंगी. जब मुझे लगा कि अब ये कहानी दमदार बन गयी है, उसके बाद ही मैंने इस पर फिल्म बनाने का फ़ैसला लिया. मैं अभी इससे ज़्यादा इस फिल्म के बारे में कुछ नहीं बता सकता. आपको ये फिल्म देखने के लिए थिएटर में जाना होगा. तब तक इंतज़ार कीजिये क्योंकि ‘श्रीदेवी बंगलो’ में आपके लिए बहुत कुछ है.’

ये भी पढ़ें- ब्लैक बिकिनी में दिशा को देख फैंस ने किए ऐसे रिएक्शन

इसलिए हुआ था विवाद…

आपको बता दें कि फिल्म का नाम “श्रीदेवी बंगलो”, दिवंगत मशहूर अदाकारा श्रीदेवी के नाम से मिलता-जुलता है.श्रीदेवी के पति/निर्माता बोनी कपूर ने “श्रीदेवी बंगलो” के निर्माताओं को कानूनी नोटिस भेजा था, जिससे फिल्म काफ़ी सुर्ख़ियों में आ गयी थी. बहरहाल, इन सबके बावजूद “श्रीदेवी बंगलो” फिल्म की शूटिंग का काम तेज़ी से चल रहा है. अगले साल तक ये इस फिल्म के रिलीज़ होने की उम्मीद है.

एडिट बाय- निशा राय…

चौकलेटी बौय के साथ-साथ स्टाइलिश भी है करण वाही

सीरियल ‘दिल मिल गए’ से लेकर आज तक करण वाही करोड़ो लड़कियों की जान है. अपने चौकलेटी बौय वाली इमेज के साथ उनकी क्यूट स्माइल पर छोटे से लेकर बड़े पर्दे की सभी एक्ट्रेसस कायल हैं. करण ने अपने कैरियर की शुरुआत छोटे पर्दे से की, फिर साल 2014 में आई फिल्म ‘दावते इश्क’ से उन्होंने अपनी बौलीवुड की जरनी स्टार्ट की. इस फिल्म में उनका रोल इतना नोटिस नही किया गया. पर 2018 में आइ फिल्म ‘हैट स्टौरी 4’ में उनकी एक्टिंग को सभी पसंद किया. एक्टिंग के साथ-साथ करण अपनी सेहत का भी खास ध्यान रखते है इसलिए उनको 2011,2013 और 2018 में भी गोल्डन अवार्ड मौस्ट फिट एक्टर से सम्मानित किया गया. एक्टिंग और फिटनेस के साथ ही करण स्टाइल आइकन भी है. इसलिए आज हम आपके लिए करण के कुछ स्टाइलिश लुक लेकर आए हैं. जिसे आप ट्राय कर सकते हैं.

करण का औपन शर्ट लुक

करण काफी स्टाइलिश तो है ही साथ ही साथ उनका कलर चूज करने का तरीका काफी अच्छा है. करण के इस लुक को ही ले लीजिए वाइट शर्ट के साथ सेक शर्ट काफी स्टाइलिंश लग रही हैं. इस लुक को आप कौलेज या केजुअल मिटिंग के लिए ट्राय कर सकते है.

 

View this post on Instagram

 

#karanwahi @imkaranwahi

A post shared by 💝Karan Wahi (@karanwahi09) on

इंडियन लुक में करण

करण की बात करें तो वो किसी भी लुक में अच्छें लगते है पर इंडियन लुक मे उनकी बात ही अलग है. सोलिड ब्लू कलर के कुर्ते पजामें के साथ डिजाइनर कोटी, इस लुक को आप किसी भी इंडियन फंक्शन में ट्राय कर सकते है.

 

View this post on Instagram

 

#karanwahi @imkaranwahi

A post shared by 💝Karan Wahi (@karanwahi09) on

लाइट कलर को भी दे जगह अपनी स्टाइलिंग में

ये बात तो सच है की लाइट कलर के कपड़ो का अपना अलग ही मजा होता हैं. अब करण के इस लुक को ही ले लिजिए, लाइट कलर की शर्ट के साथ लाइट कलर की शर्ट वाला ये कौम्बिनेशन काफी अच्छा लग रहा है  जिसे आप रेगुलर भी ट्राय कर सकते है.

 

View this post on Instagram

 

Love this pic… ❤🙈😘😍 #karanwahi @imkaranwahi

A post shared by 💝Karan Wahi (@karanwahi09) on

फेस्टिवल के लिए परफेक्ट

फेस्टिवल  की शुरुआत होने ही वाली हैं ऐसे क्या पहना जाए ये सबसे बड़ा सवाल होता है ऐसे अगर आप कुछ न्यू लुक ट्राय करना चाहते है तो करण के इस ड्रेस को ट्राय कर सकते हैं. नीचे धोती और ऊपर लाइनिंग कुर्ता काफी अच्छा लग रहा हैं.

 

View this post on Instagram

 

#karanwahi @imkaranwahi

A post shared by 💝Karan Wahi (@karanwahi09) on

तो ये है करण के वो चार लुक जिसे आप ट्राय करके आपनी स्टाइल और भी इंप्रूव कर सकते हैं.

मीडिया को मिटाने की चाह

सच लिखा, क्योंकि सत्ता से गलबहियां करना तो मीडिया का काम नहीं है. एक राजनीतिक पत्रकार की भूमिका, जनता की तरफ से सिर्फ जरूरी सवाल करना ही नहीं होता, बल्कि अगर राजनेता सवाल से बचने की कोशिश कर रहा है या तथ्यों को तोड़मरोड़ कर पेश कर रहा है, तो उसको दृढ़तापूर्वक चुनौती देना भी होता है. मीडिया का काम है शक करना और सवाल पूछना. सरकार के काम का विश्लेषण करना और जनता को सच से रूबरू कराना. इसीलिए इसे लोकतंत्र का चौथा खम्भा कहा जाता है, मगर आज  मीडिया खुद सवालों में घिरा हुआ है. सत्ता ने डराओ, धमकाओ, मारो और राज करो, की नीति के तहत मीडिया की कमर तोड़ दी है. उसकी स्वतंत्रता हर ली है. जो बिका उसे खरीद लिया, जो नहीं बिका उसका दम निकाल दिया. ऐसे में तानाशाही फरमानों से डरे हुए देश में सच की आवाज कौन उठा सकता है? सत्ता से सवाल पूछने की हिम्मत कौन कर सकता है? सरकार के कामों का विश्लेषण करने की हिम्मत किसकी है? सरकार की ओर उंगली उठाने की गुस्ताखी कौन कर सकता है? जिसने की उसे नेस्तनाबूद कर दिया गया. उखाड़ फेंका गया. सलाखों में जकड़ दिया गया. मौत के घाट उतार दिया गया. जी हां, हम उस लोकतांत्रिक देश की बात कर रहे हैं, जहां जनता द्वारा चुनी हुई सरकार से जनता को सवाल पूछने की मनाही है.

आपको जज बी.एच.लोया याद हैं? जज प्रकाश थोंबरे और वकील श्रीकांत खंडेलकर याद हैं? पत्रकार गौरी लंकेश याद हैं? नरेन्द्र दाभोलकर याद हैं? गोविंद पानसरे और एमएम कलबुर्गी याद हैं? गुजरात दंगे की हकीकत खोलने वाले आईपीएस संजीव भट्ट का क्या हाल हुआ, देखा आपने? इन्होंने सच की राह पर चलने का जोखिम उठाया और सत्ता द्वारा खेत दिये गये. इनके साथ क्या – क्या हुआ वह सच्चाइयां कभी सामने नहीं आईं. सत्ता के डर से सच दफ़ना दिया गया, हमेशा के लिए. सत्ता के स्याह और डरावने सच की अनगिनत कहानियां हैं. मगर इन कहानियों को कौन कहे? जिनको कहना चाहिए वे बिक गये, मारे डर के सत्ता के भोंपू हो गये. जो नहीं बिके, उनका गला घोंट दिया गया. मीडिया यानी लोकतन्त्र का चौथा खम्भा अब पूरी तरह जर्जर हो चुका है. कब ढह जाये कहा नहीं जा सकता.

भारत से लेकर दुनिया का बाप कहलाने वाले देश अमरीका तक में मीडिया पर सत्ता के हंटर बरस रहे हैं. अमरीका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अपने देश के स्थापित अखबारों पर प्रहार कर रहे हैं तो यहां मीडिया की स्वतंत्रता लगभग खत्म हो चुकी है. सत्ताधारियों के डर और दबाव में मीडिया-मालिकों और पत्रकारों के पास बस एक काम बचा है – चाटुकारिता. आज ज्यादातर अखबारों-पत्रिकाओं में जो कुछ छप रहा है या टीवी चैनलों पर जो कुछ दिखाया जा रहा है, वह सरकार की ‘गौरव-गाथा’ के सिवा कुछ नहीं है. अरबों-खरबों के विज्ञापनों की खैरात बांट कर सत्ता मीडिया से अपने तलुए चटवा रही है, अपनी वाहवाही करवा रही है और लालची, लोलुप मीडिया-मालिक इसे अपना ‘अहो भाग्य’ कह रहे हैं. भारतीय मीडिया का एक धड़ा, जिसे झोली भर-भर कर बख्शीशों से नवाजा गया है, सरकारी भोंपू बना हुआ है. और सख्त कलमों की नोंकें तुड़वा दी गयी हैं. जो तोड़ने पर राजी नहीं हुए उन्हें उनकी कलम के साथ उठा कर संस्थानों से बाहर फेंक दिया गया है.

ये भी पढ़ें- मोदी का योग: भूपेश बघेल का बायकाट

आवाज दबाने का अनोखा अंदाज

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल के दिनों में ‘फेक न्यूज अवार्ड्स’ की घोषणा की. अपने खिलाफ अमेरिकी अखबारों में छपने वाली खबरों को झूठी और भ्रामक बताना शुरू कर दिया. अमेरिकी मीडिया की धज्जियां उड़ाने के लिए बकायदा ‘अवॉर्ड्स’ घोषित कर दिये. अपने गुनाह छिपाने के लिए ट्रंप ने ‘सबसे भ्रष्ट और बेईमान’ कवरेज के लिए अमेरिका के प्रतिष्ठित अखबार ‘न्यूयॉर्क टाइम्स’ को विजेता घोषित किया. एबीसी न्यूज, सीएनएन, टाइम और वाशिंगटन पोस्ट को भी इन अनोखे अवार्ड में जगह दी और यह साबित करने की कोशिश की कि यह तमाम मीडिया हाउस सरकार के बारे में सिर्फ गलत ही लिखते-छापते हैं. उन्होंने ‘विजेताओं’ की सूची बकायदा रिपब्लिकन नेशनल कमेटी की वेबसाइट पर भी जारी की. जनता की आवाज दबाने का कितना शर्मनाक तरीका है यह. मीडिया पर इस तरह का हमला आश्चर्यजनक है.

गौरतलब है कि ट्रंप हमेशा से अपने ट्वीट्स और बड़बोलेपन को लेकर चर्चित रहे हैं. वे हमेशा से मीडिया विरोधी हैं. अपने चुनाव अभियान के दौरान भी उन्होंने जम कर ‘फेक न्यूज’ शब्द का इस्तेमाल किया था. राष्ट्रपति बनने के बाद से वे लगातार मीडिया हाउसों और उनके मालिकों-सम्पादकों पर निशाना साधते रहे हैं. आजकल वे अमेरिका के प्रतिष्ठित अखबार ‘न्यूयॉर्क टाइम्स’ के सम्पादक  ए.जी. सल्जबर्जर के पीछे पड़े हुए हैं और प्रिंट मीडिया और जर्नलिज्म पर ताबड़तोड़ हमले कर रहे हैं. वह मीडिया की विश्वसनीयता पर सवाल उठाते हैं और उसे एक मरता हुआ उद्योग करार देते हैं. ट्रंप वाशिंगटन पोस्ट और न्यूयॉर्क टाइम्स पर आरोप लगाते हैं और कहते हैं कि मेरी सरकार अच्छा काम कर रही है, लेकिन यह दोनों अखबार सरकार के अच्छे कामों को भी नकारात्मक तरीके से पेश करते हैं. वह इन अखबारों द्वारा किये गये खुलासों और आरोपों से खुद को बचाने की कोशिश में मीडिया को ‘लोगों का दुश्मन’ करार देते हैं. वे उन सवालों के जवाब नहीं देना चाहते जो सवाल ये अखबार उठा रहे हैं. दरअसल ट्रंप अपने हमेशा सकारात्मक न्यूज कवरेज चाहते हैं और अपने विरोधियों के लिए आलोचनात्मक खबरें. ‘फेक न्यूज’, ‘लोगों का दुश्मन’ जैसे वाक्यों से मीडिया को लगातार कोसना उनका इस लक्ष्य तक पहुंचने का रास्ता है. जो अखबार उनके इस उद्देश्य में बाधा बनते हैं, वह उनके पीछे पड़ जाते हैं. राजनीति के पिच पर ट्रंप रेफरी को हर हाल में अपने पाले में करना चाहते हैं. वह रेफरी के फैसलों को अपने पक्ष में नहीं करना चाहते, बल्कि उनका उद्देश्य रेफरी की विश्वसनीयता को पूरी तरह खत्म कर देना है. और उनकी यह रणनीति काम भी कर रही है, कम से कम ट्रंप के सबसे वफादार समर्थकों के बीच में तो जरूर.

‘न्यूयॉर्क टाइम्स’ के पीछे ट्रंप इसलिए पड़े हुए हैं क्योंकि इस अखबार ने उनकी नाजायज सम्पत्ति और कर चोरी का खुलासा किया था. अखबार ने लिखा था कि ट्रंप ने अपनी मेहनत से कोई सम्पत्ति अर्जित नहीं की, जैसा प्रचार उन्होंने अपने चुनाव के वक्त किया था. ट्रंप और उनके भाई-बहनों को उनके बिल्डर पिता से अथाह सम्पत्ति हासिल हुई है. यह सम्पत्ति नाजायज तरीके से बनायी गयी थी. अखबार कहता है कि  ट्रंप और उनके भाई-बहनों ने अपने पिता से तोहफे में मिली अरबों डॉलर की सम्पत्ति छिपाने के लिए कई फर्जी कम्पनियां बनायीं. यही नहीं ट्रंप ने लाखों रुपये के कर को छिपाने में भी अपने पिता की मदद की थी. जबकि राष्ट्रपति चुनाव के दौरान ट्रंप ने दावा किया था कि उनके पास जो सम्पत्ति है वह उन्होंने अपने दम पर बनायी है और उनके पिता फ्रेड ट्रंप से उन्हें कोई वित्तीय मदद नहीं मिली है. जो गोपनीय दस्तावेज, टैक्स रिटर्न के पेपर्स और अन्य वित्तीय रिकॉर्ड्स न्यूयार्क टाइम्स के पास हैं, उनके मुताबिक ट्रंप को अपने पिता के रियल एस्टेट के साम्राज्य से आज के हिसाब से कम से कम 41.3 करोड़ डॉलर मिले थे और इतनी बड़ी धनराशि उन्हें इसलिए मिली थी क्योंकि ट्रंप ने कर अदा करने से बचने में पिता की मदद की थी. यही नहीं,  ट्रंप ने अपने माता-पिता की रियल एस्टेट की सम्पत्तियों की कम कीमत आंकने की रणनीति बनाने में भी मदद की थी, जिससे जब ये सम्पत्तियां उन्हें तथा उनके भाई-बहनों को हस्तांतरित की गयीं तो काफी हद तक कर कम हो गया. ट्रंप ने पिता से तोहफे में मिली अरबों डॉलर की सम्पत्ति छिपाने के लिए फर्जी कम्पनियां बनायीं और इस तरह सारा ब्लैक मनी वाइट किया गया.

ये भी पढ़ें-  भूपेश सरकार का ढोल…!

एक के बाद एक तीन शादियां करने वाले ट्रंप के महिलाओं के साथ भी नाजायज रिश्ते, अश्लील हरकतें और फब्तियां भी किसी से छिपी नहीं हैं. उनकी अश्लील हरकतों की कई कहानियां समय-समय पर अखबारों में उजागर होती रही हैं. डोनाल्ड ट्रंप का एक ऑडियो भी सामने आ चुका है, जिसमें वो महिलाओं के बारे में अभद्र बातें करते सुने गये हैं. ये ऑडियो एक टीवी शो की शूटिंग के दौरान का है. वहीं गैर-धर्म के प्रति उनकी नफरत भी जगजाहिर है. मुसलमानों के प्रति ट्रंप की नफरत उस वक्त जाहिर हुई थी, जब 7 दिसंबर 2015 को डोनाल्ड ट्रंप ने सबसे विवादित बयान दिया. उन्होंने साउथ कैरोलिना में एक चुनावी रैली में कहा था कि मुसलमानों के लिए अमरीका के दरवाजे पूरी तरह बंद कर दिए जाने चाहिए. साथ ही उन्होंने कहा था कि अमेरिका में रहने वाले मुसलमानों के बारे में भी पूरी जांच पड़ताल होनी चाहिए. उन्होंने अपने इस सख्त प्रस्ताव से सिर्फ लंदन के मेयर सादिक खान को ही छूट दी थी. इस पर काफी हंगामा मचा था. आज भी बहुत से लोगों को लगता है कि ट्रंप की मुस्लिम विरोधी छवि पूरी दुनिया के लिए खतरनाक है.

उग्र राष्ट्रवाद के प्रणेता

भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप दोनों मीडिया विरोधी हैं. दोनों के बीच कई मामलों में काफी समानता है. दोनों के बीच पटती भी खूब है. ट्रंप मोदी को अपना दोस्त बताते नहीं थकते. अमेरिका आने पर उनका शानदार स्वागत-सत्कार करते हैं. उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लोकसभा चुनाव 2019 की प्रचंड जीत पर बकायदा टेलीफोन करके बधाईयां दीं. तू मेरी खुजा, मैं तेरी खुजाता हूं, वाली दोस्ती है दोनों के बीच. वही अमेरिका, जिसने कभी मोदी को वीजा देने से इन्कार कर दिया था, आज मोदी की राह में पलक-पांवड़े बिछाये हुए है. क्यों? क्योंकि सत्ताशीर्ष पर बैठे दोनों धुरंधरों के मिजाज़ मिलते हैं, व्यवहार मिलते हैं, कर्म मिलते हैं, सोच मिलती है, रवैय्या मिलता है. दोनों अपने आगे पूरी दुनिया को बौना समझते हैं. दोनों अपने मन के मालिक हैं. दोनों सवाल पूछने वालों से नफरत करते हैं. दोनों सच से परहेज करते हैं. दोनों मीडिया को अपने अंगूठे के नीचे रखना चाहते हैं.

ट्रंप मोदी के बड़े फैन हैं. वे कई मौकों पर प्रधानमंत्री मोदी और भारत की तारीफ भी कर चुके हैं. दोनों गे्रट शो-मैन हैं, अच्छे वक्ता हैं, उन्हें पता है भीड़ को कैसे खुश करना है और विरोधियों को कैसे नीचा दिखाना है. मोदी और ट्रंप- दोनों ही ‘नार्सिसिस्ट’ हैं. नार्सिसिस्ट यानी ऐसे शख्स जो खुद से बेहद प्यार करते हैं. जो अपनी वाक्-प्रतिभा के चलते अपनी कमजोरियों को छिपा सकते हैं. अपनी अलग आदतों के चलते आकर्षक लगते हैं और जनता को आकर्षित कर लेते हैं, मगर उनका मोह मानसिक और शारीरिक रूप से हानि पहुंचाता है. ऐसे लोगों को लगता है कि वे बेहद प्रतिभाशाली हैं और जनता की दिक्कतें दूर करने के लिए ऊपर वाले ने उन्हें धरती पर भेजा है.

ये भी पढ़ें- मौत का तांडव और नीतीश का मजाक

कुछ यही हाल ट्रंप और मोदी का है. अपने चुनाव प्रचार के दौरान ट्रंप ने भारतीय मूल के वोटरों का दिल जीतने के लिए नरेंद्र मोदी के मशहूर नारे ‘अबकी बार, मोदी सरकार’ की नकल कर अपना नारा बनाया, ‘अबकी बार, ट्रंप सरकार’. मोदी ने आम चुनाव में जनता को ‘अच्छे दिन’ का सपना दिखाया था. ट्रंप ने इसी तर्ज पर अमेरिका को फिर से महान बनाने की अपील जनता से की. ट्रंप और मोदी दोनों पर ही अल्पसंख्यकों के प्रति दोहरा रवैया अपनाने का आरोप लगता रहा है. मोदी ने कोलकाता में अपने एक भाषण के दौरान बांग्लादेशी प्रवासियों पर पाबंदी लगाये जाने की धमकी दी थी. हालांकि उन्होंने एक बार यह भी कहा था कि बांग्लादेशी हिन्दू प्रवासियों का भारत में स्वागत है. दूसरी तरफ ट्रंप के दिल में मुसलमानों और मेक्सिको के प्रवासियों के प्रति नफरत भरी हुई है. चुनाव प्रचार के दौरान ट्रंप ने मुसलमानों को अमेरिका में घुसने से रोकने और मेक्सिको के प्रवासियों को अमेरिका में घुसने से रोकने के लिए बड़ी दीवार बनाये जाने की बात कही थी. इस तरह दोनों पर ही ‘उग्र राष्ट्रवाद’ हावी है. और इस उग्र राष्ट्रवाद की राह में सबसे बड़ा रोड़ा है मीडिया, जिसको खत्म करना दोनों की प्राथमिकता है.

जवाबदेही तय करने की जरूरत

अब अमेरिकी मीडिया जहां हार मानने को तैयार नहीं है और जिसने एकजुट होकर ट्रंप की जवाबदेही तय करने का फैसला किया है, वहीं भारतीय मीडिया का एक धड़ा, जिसे खूब बख्शीश और मुआवजों से लाद दिया गया है, मोदी का भोंपू बनकर उभरा है. ये अब मोदी की सेना की तरह काम कर रहा है. खूब शोर मचा रहा है और जनता से जुड़े हर मुद्दे, हर सवाल को पीछे ढकेल देता है. यह प्रधानमंत्री के लिए प्रधानमंत्री के कहे अनुसार मनमाफिक इन्टरव्यू प्लैन करता है. उनके मनमाफिक सवाल-जवाब तैयार करता है और उसका खूब प्रचार-प्रसार करता है. वह देशहित से जुड़ा, जनता की समस्याओं से जुड़ा प्रधानमंत्री को असहज करने वाला कोई सवाल नहीं पूछता. कितनी हैरत की बात है कि 26 मई 2014 को कुर्सी पर बैठने के बाद पूरे पांच साल तक मोदी ने एक भी प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं की. जबकि किसी लोकतंत्र के प्रधानमंत्री द्वारा प्रेस कांफ्रेंस करना स्वतंत्र मीडिया पर (जिसे वर्तमान सरकार सिकुलर्स और प्रेसिट्यूट्स कहकर पुकारती है) किया जाने वाला एहसान नहीं है, बल्कि यह सरकार की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है. सत्ता से सवाल पूछना स्वतंत्र प्रेस का अधिकार है. मगर प्रधानमंत्री मोदी ने इस अधिकार से मीडिया को वंचित रखा. सोशल मीडिया के जरिए मोदी का सम्मानित बुजुर्ग जैसा इकतरफा संवाद और रेडियो पर प्रसारित होने वाला उनका निजी एकालाप, वास्तव में लोकतंत्र और एक स्वतंत्र प्रेस की भूमिका के प्रति निकृष्ट अवमानना के भाव को प्रकट करता है. इसे सवालों से बचने की रणनीति कहा जाता है. जबकि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी, मुख्यधारा के मीडिया के प्रति जिनकी नफरत के बारे में सबको पता है, व्हाइट हाउस (अमेरिकी राष्ट्रपति निवास) में नियमित प्रेस कांफ्रेंस की परम्परा को अभी समाप्त नहीं किया है.

लोकतांत्रिक दुनिया में मोदी एकमात्र ऐसे नेता हैं, जिन्होंने आधिकारिक तौर पर सवाल पूछे जाने की प्रथा को अंगूठा दिखा दिया है. उन्होंने प्रधानमंत्री कार्यालय में प्रेस सलाहकार तक की नियुक्ति नहीं की है, जबकि इसका रिवाज-सा रहा है. भाजपा के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने भी इसका पालन किया था. इस पद पर किसी को बैठाये जाने से प्रेस को प्रधानमंत्री  के उनके अनेक वादों के बारे में सवाल पूछने में आसानी होती, मगर जब वादे पूरे ही नहीं करने हैं तो सवाल कैसे पूछने देते?

विदेशी दौरों के वक्त प्रधानमंत्री के हवाई जहाज में पत्रकारों को साथ ले जाने की परंपरा को भी खत्म कर दिया है. जबकि प्रधानमंत्री के सहयात्री होने से संवाददाताओं और संपादकों को प्रधानमंत्री से सवाल पूछने का मौका मिलता था.

गौरतलब है कि मोदी के पूर्ववर्ती मनमोहन सिंह, जिनका ‘मौनमोहन सिंह’ कहकर मोदी मजाक उड़ाया करते थे, यात्रा के दौरान हवाई जहाज में पत्रकारों के साथ प्रेस कांफ्रेंस किया करते थे. इसमें वे पत्रकारों के तमाम सवालों का जवाब दिया करते थे और ये सवाल पहले से तय या चुने हुए नहीं होते थे. मनमोहन सिंह ने कार्यालय में रहते हुए कम से कम तीन बड़ी प्रेस कांफ्रेंस कीं (2004, 2006, 2010), जिसमें कोई भी शिरकत कर सकता था. जिसमें पत्रकार राष्ट्रीय हित के मसलों पर प्रधानमंत्री से सीधे अहम सवाल पूछ सकते थे.

अमेरिकी राष्ट्रपति भी विदेश दौरों के दौरान अपने साथ मीडिया के दल को लेकर जाते हैं और जरूरी सवाल पूछने के इस मौके को पत्रकारों के लिहाज से काफी सामान्य सी चीज माना जाता है. मगर मोदी को आजाद प्रेस बिल्कुल नहीं सुहाता है. और उनका यह स्वभाव आज का नहीं है. इसका इतिहास 2002 के गुजरात दंगों से ही शुरू होता है. अपनी बात कहने के लिए सोशल मीडिया का इस्तेमाल करके उन्होंने संवाद के परम्परागत माध्यमों को दरगुजर करने की कोशिश की है.

ये भी पढ़ें-  आखिर क्यों छत्तीसगढ़ के इस समुदाय के बीच खिला 

ऐसे में अब मीडिया घरानों, पत्रकारों और देश के बुद्धिजीवियों को तय करना होगा कि जो बात गुजरात के मुख्यमंत्री रहते चल गयी, और मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद पांच साल तक चलती रही, वह क्या आगे भी चलेगी या इस पर कोई कड़ा फैसला लेने की जरूरत है. मीडिया को नहीं भूलना चाहिए कि उसका काम सवाल पूछना है, उसका अस्तित्व ही सवाल पूछने पर टिका हुआ है. लोकतंत्र के चौथे खम्भे को आज पहले खुद से यह सवाल पूछना है कि उसे सत्ता से गलबहियां करनी है या जनता की आवाज बनना है. एकजुट होकर अपनी अपनी स्वतंत्रता को फिर हासिल करना है या टुकड़े-टुकड़े होकर अपना अस्तित्व मिटा देना है. किसी भी लोकतांत्रिक राष्ट्र में सत्ता पर काबिज सरकार के कामों का मूल्यांकन तभी हो सकता है, जब उस राष्ट्र कर मीडिया स्वतंत्र हो और जिसमें सत्ता से सवाल करने की क्षमता व ताकत हो. अगर मीडिया स्वतंत्र और ताकतवर नहीं है तो आप किन सूचनाओं के आधार पर सरकार का मूल्यांकन कर पाएंगे? मीडिया का अस्तित्व ही सवाल पूछने और सत्ता में बैठे लोगों की जवाबदेही तय करने के लिए है. पत्रकारिता में इसके अलावा बाकी जो कुछ होता है वह जनसम्पर्क की कवायत भर है. सरकार अपनी उपलब्धियों का ढिंढोरा पीटने के लिए पूरे पन्ने का विज्ञापन देने के लिए आजाद है. बगैर सूचना और सवाल के न मीडिया का कोई अस्तित्व है और न जनता लोकतंत्र की नागरिक कहलाने लायक है.

Edited By- Neelesh Singh Sisodia

मोदी का योग: भूपेश बघेल का बायकाट

प्रदेश में मुख्यमंत्री भूपेश बघेल केंद्र सरकार विशेषत: नरेंद्र दामोदरदास मोदी के साथ दो-दो हाथ करने की कवायद में लग गए हैं. जिसका प्रत्यक्षीकरण 21 जून संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा घोषित अंतरराष्ट्रीय योग दिवस को प्रदेश की राजधानी रायपुर से लेकर अंबिकापुर, बिलासपुर, कोरबा में स्पष्ट दिखाई दिया. ‘योग’ के प्रति जैसा रवैया भूपेश बघेल सरकार ने दिखाया उससे स्पष्ट हो जाता है कि भूपेश सरकार नरेंद्र मोदी की किसी भी योजना को बढ़ा चढ़ाकर आवाम के बीच नहीं ले जाएगी और न ही छत्तीसगढ़ में उस योजना को हाथों-हाथ लिया जाएगा.

भूपेश बघेल स्वयं रायपुर में नहीं थे. जबकि के प्रोटोकाल के हिसाब से राजधानी रायपुर के मुख्य कार्यक्रम में पदेन मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को शिरकत करनी थी मगर वे दिल्ली चले वित्त मंत्रियों की बैठक में वकालत करने चले गए.  इधर छत्तीसगढ़ के प्रमुखतम नेता चरणदास महंत, टी. एस.सिंहदेव, ताम्रध्वज साहू ने भी ‘योगा’ को कोई तवज्जो नहीं दी और प्रदेश मे अंतरराष्ट्रीय योग सिर्फ औपचारिकता बनकर रह गया.  इसका सीधा संकेत यह है कि छत्तीसगढ़ में भूपेश बघेल सरकार नरेंद्र मोदी के किसी भी प्रोजेक्ट को तरजीह नहीं देने वाली है.

ये भी पढ़ें- भूपेश सरकार का ढोल…!

60 लाख लोगों ने किया योगाभ्यास

कहने को छत्तीसगढ़ में 21 जून को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस पर 60 लाख लोगों ने एक विश्व रिकार्ड बनाया है.  आपको हंसी आ सकती है आजकल रिकार्ड बनाने का सबको शगल हो चला है मगर इससे गंभीरता कितनी है यह भी दिखाई देनी चाहिए.

पांचवें अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के अवसर पर राजधानी रायपुर में मुख्य समारोह हुआ सरदार बलबीर सिंह जुनेजा इनडोर स्टेडियम में 600 स्कूली बच्चे जनप्रतिनिधि गण वरिष्ठ अधिकारियों ने योगाभ्यास किया. और सबसे बड़ी बात यह कि मुख्य अतिथि थे महापौर प्रमोद दुबे व अन्य अतिथि बतौर बृजमोहन अग्रवाल पूर्व मंत्री डा. रमन सरकार.

प्रदेश के इस वृहद कार्यक्रम में मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को होना चाहिए था या फिर नंबर दो प्रदेश के गृह मंत्री ताम्रध्वज साहू को. मगर वह भी नदारद रहे, कोई मंत्री या कांग्रेस का विधायक होना चाहिए था मगर सब नदारद रहे. क्योंकि छत्तीसगढ़ के मुखिया भूपेश बघेल ने अधिकारिक रूप से नरेंद्र मोदी के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है. और मोदी के किसी भी आयोजन को एक तरह से तरजीह नहीं देने की लक्ष्मण रेखा खींच दी गई है.  यही कारण है कि देश भर में आयोजित होने वाले योग कार्यक्रम छत्तीसगढ़ मैं फिसड्डी हो गया क्योंकि इसके साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नाम जुड़ा है. जहां तक विश्व रिकार्ड की बात है तो गोल्डन बुकऔफ वर्ल्ड रिकार्ड का क्या अधिकारिक प्रभाव है यह कोई बताने की शै नहीं है समझने की बात है.

मुख्यमंत्री   भूपेश बघेल का यह स्वभाव है !

डा रमन सिंह पूर्व मुख्यमंत्री छत्तीसगढ़ और वर्तमान मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के स्वभाव में भारी अंतर है. जहां रमन सिंह अपने धुर विरोधियों को भी सम्मान, अपनत्व और विशाल हृदय के साथ तरजीह दिया करते थे वही भूपेश बघेल खुल्लम खेल फारूकाबादी स्वभाव के राजनेता हैं हा तो हा और ना तो ना.  जो ठान लेते हैं करके दिखा देते हैं चाहे परिणाम कुछ भी निकले.

यही कारण है कि छत्तीसगढ़ में अंतर्राष्ट्रीय योग जो संयुक्त राष्ट्र संघ की धरोहर है 177 देशों में योग दिवस बड़े ही उत्साह के साथ मनाया गया छत्तीसगढ़ में आ कर मोदी के इस अश्वमेघ के घोड़े की रास भूपेश बघेल सरकार ने पकड़ ली और योग को मोदी सरकार का सिंबल मान कर प्रदेश में केंद्रीय जन सूचना के बावजूद मात्र औपचारिक बना दिया गया.

ये भी पढ़ें-मौत का तांडव और नीतीश का मजाक

छत्तीसगढ़ के लिए भूपेश बघेल की सरकार के लिए और शायद प्रदेश की आवाम के लिए यह अच्छा संकेत नहीं कहा जा सकता .

भूपेश बघेल ने किया योगा !

सरकार के जनसंपर्क विभाग ने मुख्यमंत्री भूपेश बघेल का योगा करते हुए वीडियो जारी किया है. दरअसल  मुख्यमंत्री छत्तीसगढ़ में नहीं थे उन्होंने दिल्ली स्थित छत्तीसगढ़ भवन में अपने कक्ष में   कुछ योग स्वयं किए और प्रदेश की जनता को योग का सुखद संदेश देते हुए कहा कि स्वास्थ्य के लिए योग अनिवार्य है.

भूपेश बघेल गुरुवार को दिल्ली में थे और केंद्रीय बजट पूर्व राज्यों के वित्त मंत्री के साथ केंद्रीय मंत्री निर्मला सीतारमण की बैठक में अपने सुझाव व मांगे रखी.

यह सच है कि भूपेश बघेल चाहते तो इस बैठक में राज्य का कोई वरिष्ठ मंत्री शिरकत करने भेजा जा सकता था जैसे दिल्ली के उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने शिरकत की या फिर राजधानी रायपुर से अपना प्रतिनिधि भेज सकते थे. मगर ताम्रध्वज साहू ग्रहमंत्री भी व्यस्त हो गए और अन्य कबीना मंत्री भी यह बात पचने वाली नहीं है.  संपूर्ण कयावाद का सीधा सा अभिप्राय है भूपेश बघेल ने योगा का बाय काट किया है.

प्रदेशभर में बायकाट

ऊर्जा नगरी कोरबा में विधानसभा अध्यक्ष डा.चरणदास महंत को योग के प्रमुख कार्यक्रम की बागडोर सौंपी गई थी.  इधर अन्य जिले में मैं भी प्रमुख नेताओं को मुख्य अतिथि बतोर पहुंचना था मगर ऐसा नहीं हुआ.

डा चरणदास महंत अगर योगा कार्यक्रम में पहुंचे कार्यक्रम की गरिमा में वृद्धि होती मगर यहां कार्यक्रम को कोरबा महापौर रेणु अग्रवाल को सौंप दिया गया.

बिलासपुर में विधायक शैलेश पांडे ने मुख्य कार्यक्रम में शिरकत की जबकि वहां प्रभारी जिला मंत्री को सरकार भेज सकती थी.  गृहमंत्री को रविशंकर शुक्ल स्टेडियम कार्यक्रम पहुंचना था मगर वे कहां पहुंचे यह खोज का विषय है.

ये भी पढ़ें- आखिर क्यों छत्तीसगढ़ के इस समुदाय के बीच खिला 

इस तरह योग की कवायद में छत्तीसगढ़ में केंद्र और राज्य सरकार के संबंधों पर प्रश्नचिन्ह लगा दिया है यह योग एक संकेत बन कर प्रदेश की राजनीति में मंडरा रहा है और कह रहा है यही हालात रहे तो आने वाले दिनों में भूपेश बघेल शीर्षासन करते केंद्र की सरकार को गरियाते देखे जाएंगे और केंद्र की मोदी सरकार हास्यासन करते हुए संदेश को अनदेखा करेगी और यहां की आवाम अपना सर पीटते हुए दिखेगी.

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें