लाइसेंस

रोहित तुरंत मिस्टर सूद के केबिन में पहुंच गया. सूद साहब कुछ परेशान लग रहे थे. रोहित भांप गया कि कोई गंभीर बात है.

‘‘बैठो,’’ कुरसी की तरफ इशारा करते हुए सूद साहब ने रोहित से कहा.

‘‘मिस्टर रोहित, मेरी पोजीशन बहुत खराब हो रही है,’’ सूद साहब ने धीमी और कांपती आवाज में कहना शुरू किया, ‘‘पहली तारीख को बोर्ड आफ डाइरेक्टर्स की मीटिंग है. फैक्टरी तैयार हो चुकी है, ट्रायल उत्पादन कल से शुरू होना है, लेकिन फैक्टरी शुरू करने का लाइसेंस अभी तक नहीं मिला है. अभीअभी दत्ता से खबर मिली है कि विस्फोटक विभाग में हमारी फाइल अटक गई है और वहां से कारण बताओ नोटिस जारी होने वाला है.’’

एक पल रुक कर सूद साहब ने फिर कहना शुरू किया, ‘‘रोहित, यदि लाइसेंस मिलने में देर हो गई तो हम किसी को अपना मुंह नहीं दिखा सकते हैं. बोर्ड आफ डाइरेक्टर्स द्वारा मीटिंग के फौरन बाद प्रेस कान्फ्रेंस में फैक्टरी में उत्पादन शुरू होने की घोषणा की जानी है और बिना लाइसेंस के उत्पादन शुरू नहीं कर सकते. जबकि उत्पादन हमें हर हालत में शुरू करना है, क्योंकि अगले महीने हमारा प्रतिद्वंद्वी अपना उत्पादन शुरू कर के बाजार पर कब्जा करना चाहता है.

‘‘दत्ता ने खबर दी है कि उन्होंने हमारी कंपनी के खिलाफ लिखित शिकायत दर्ज की है ताकि कंपनी को वर्क लाइसेंस मिलने में देर हो जाए और बाजी वह मार ले. मैं ऐसा किसी भी कीमत पर नहीं होने दूंगा. यदि हमारा उत्पादन शुरू नहीं हुआ तो कंपनी के शेयर डूब सकते हैं और हम कहीं के नहीं रहेंगे,’’ कह कर सूद साहब चुप हो गए.

‘‘यह सब अचानक कैसे हो गया, सर?’’ रोहित ने पूछा.

‘‘यह सबकुछ मुझे विपिन का कियाधरा लगता है. बहुत ही शातिर निकला. मुझ से एक सप्ताह की छुट्टी ले कर गया था कि लखनऊ शादी में जाना है और आज सुबह ईमेल से इस्तीफा भेज दिया. वह लखनऊ गया ही नहीं बल्कि उस ने दूसरी कंपनी ज्वाइन कर ली है और यहां की तमाम गोपनीय बातें दूसरी कंपनी को बता कर हमारी सारी मेहनत पर पानी फेर दिया.’’

‘‘मैं उसे किसी भी कीमत पर नहीं छोड़ूंगा.’’

‘‘दूसरी कंपनी ने हमारी कंपनी के खिलाफ शिकायत की है, जिस के आधार पर लाइसेंस रोक लिया गया है. दत्ता को मैं ने नवयुग सिटी में रोक रखा है. तुम फौरन वहां चले जाओ. दत्ता अकेले काम संभाल नहीं पा रहा है. उस के साथ मिल कर तुम्हें किसी भी कीमत पर लाइसेंस लेना है. साम, दाम, दंड, भेद किसी भी नीति से मुझे फैक्टरी शुरू करने का लाइसेंस चाहिए. पैसा पानी की तरह बहता है तो बहा दो पर बिना लाइसेंस के आफिस में मत घुसना. मेरे कहने का मतलब तुम अच्छी तरह से समझ गए होगे…अब तुम जा सकते हो.’’

मिस्टर सूद की बात सुन कर रोहित परेशान हो गया. खासतौर पर आखिरी शब्द तीर की तरह उस के सीने के पार चले गए कि किसी भी कीमत पर लाइसेंस लेना है और बिना लाइसेंस के आफिस में मत घुसना.

सूद के आदेश के अनुसार उसे फौरन नवयुग सिटी के लिए रवाना होना था, इसीलिए वह फटाफट ब्रीफकेस उठा कर घर चला गया.

घर आ कर रोहित ने अपने कपडे़ सूटकेस में डालते हुए पत्नी श्वेता को चाय बनाने को कहा.

‘‘क्या बात है, आफिस से जल्दी आ कर सूटकेस तैयार कर रहे हो?’’ श्वेता ने चाय बनाते हुए पूछा.

‘‘आफिस के काम से आज और अभी नवयुग सिटी जाना है. काम इतना जरूरी है कि वहां 2-3 दिन भी लग सकते हैं,’’

‘‘रोहित, तुम जहां जा रहे हो उस के पास ही न्यू समरहिल है. एक दिन के लिए वहां चले चलो,’’ श्वेता बोली.

‘‘मुश्किल है,’’ रोहित बोला.

‘‘काम खत्म होने पर एक दिन की छुट्टी ले लेना. काम के साथ आराम और मौजमस्ती भी हो जाएगी,’’ कहतेकहते श्वेता चाय के साथ कमरे में आ गई.

‘‘श्वेता, यदि काम हो गया तो एक दिन क्या एक सप्ताह न्यू समरहिल के नाम,’’ रोहित ने चाय की चुस्की लेते हुए कहा.

चाय पी कर रोहित ने सूटकेस उठाया और नवयुग सिटी के लिए रवाना हो गया.

रोहित पिछले 5 सालों से सूद की कंपनी में जरनल मैनेजर है और अपने 20 साल के कैरियर में उस ने कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा. सफलता की जिन ऊंचाइयों को आज रोहित छू रहा है उस की एक वजह यह भी है कि उस ने कभी असफलता का स्वाद नहीं चखा था.

नवयुग सिटी, जहां विस्फोटक विभाग का मुख्यालय है, रात के 9 बजे रोहित ब्रिस्टल होटल में पहुंचा तो दत्ता ने उस का जोरदार स्वागत इन शब्दों से किया, ‘‘आइए, रोहित साहब, आप को देख कर तो इस मुरदे में भी जान आ गई है.’’

रोहित अपना सूटकेस एक तरफ रख कर बाथरूम में घुस गया.

नहाने के बाद अपने को तरोताजा महसूस करता रोहित कुरसी खींचते हुए दत्ता से बोला, ‘‘यहां नवयुग सिटी में अकेले खूब मौज मना रहे हो.’’

‘‘प्यारे रोहित,’’ दत्ता मायूस हो कर बोला, ‘‘मैं कितना मौज मना रहा हूं यह मेरे दिल से पूछो.’’

‘‘पूछ तो रहा हूं दत्ता साहब कि वह ऐसा कौन सा गम है जिसे आप शराब के हर घूंट के साथ पीए जा रहे हैं.’’

‘‘वही लाइसेंस का गम. क्योंकि लाइसेंस तो मिलना नहीं फिर तो नौकरी के हाथ से निकलने का गम,’’ दत्ता की आवाज में गंभीरता थी.

‘‘मजाक छोड़ कर सीरियस बात करो, दत्ता,’’ रोहित ने गंभीरता से कहा.

‘‘रोहित, आज दोपहर को मिस्टर सूद से मैं ने बात की थी कि लाइसेंस नहीं मिल रहा है. यह सुन कर उन्होंने तो यहां तक कह दिया कि अगर लाइसेंस नहीं मिला तो आफिस मत आना. मैं ने सारे पापड़ बेल कर देख लिए, रोहित, कल फाइल पर साइन हो जाएंगे. सहायक कंट्रोलर मोहन तो आज ही हमारी कंपनी की फाइल पर साइन कर के आवेदनपत्र को निरस्त कर रहे थे, बहुत मिन्नतों के बाद एक दिन के लिए फाइल को पेंडिंग किया है. तभी तो मिस्टर सूद ने आप को यहां भेजा है,’’ दत्ता कहतेकहते रुक गया.

‘‘सूद साहब ने खुला आफर दिया है कि जितना पैसा खर्च हो, लाइसेंस हर हालत में चाहिए,’’ रोहित ने दत्ता से कहा, ‘‘मेरी पूरी अटैची नोटों से भरी हुई है.’’

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‘‘देखो रोहित, हमारी कंपनी की फाइल असिस्टेंट कंट्रोलर मोहन के पास है और वह रिश्वत नहीं लेता है.’’

‘‘दत्ता, मैं यह मानने को तैयार नहीं हूं कि आज के समय में कोई रिश्वत नहीं लेता है,’’ रोहित ने आश्चर्य से कहा.

‘‘सच यही है कि आज के इस भ्रष्ट दौर में मोहन जैसा ईमानदार व्यक्ति भी है.’’

‘‘उस की कोई तो कमजोरी होगी, जिस का हम फायदा उठा सकते हैं,’’ रोहित ने समय की नजाकत को भांपते हुए पूछा.

‘‘शरीफ आदमी की कोई कमजोरी नहीं होती है. शराफत ही उस की कमजोरी समझो या ताकत, मुझे मालूम नहीं, लेकिन एक बात साफ है कि उस का भ्रष्ट न होना हमें भारी मुसीबत में डाल सकता है. मुझे पता है कि तुम ने जिंदगी में कभी असफलता का मुंह नहीं देखा है, लेकिन इस बार सावधान रहना.’’

‘‘दत्ता, मोहन तो असिस्टेंट कंट्रोलर है, हम चीफ कंट्रोलर से मिल सकते हैं.’’

‘‘रोहित, कोई फायदा नहीं होने वाला है. फाइल पर मोहन की लिखी टिप्पणी को चीफ कंट्रोलर भी नजरअंदाज नहीं कर सकता है.’’

‘‘मगर क्यों?’’

‘‘लगता है मिस्टर सूद ने तुम्हें पूरी बात बताई नहीं है, तभी तुम ज्यादा उत्साहित लग रहे हो,’’ दत्ता ने बात आगे बढ़ाते हुए कहा, ‘‘रोहित, विस्फोटक नियमों के अनुसार हमें कंपनी में जितना खुला क्षेत्र रखना था उस का आधा भी नहीं रखा है, जिस की लिखित शिकायत हमारी प्रतिद्वंद्वी कंपनी ने की है, जिस के आधार पर अब हमारी फैक्टरी को ‘शो काज’ नोटिस दिया जाएगा और हम बिना लाइसेंस के प्रोडक्शन शुरू नहीं कर सकते. नियमों का पालन करने का मतलब है, फैक्टरी में तोड़फोड़ और पैसे व समय की बरबादी, जिसे सूद साहब बरदाश्त नहीं कर सकते हैं.’’

‘‘क्या हमें नियम मालूम नहीं थे?’’

‘‘मालूम थे, लेकिन एक तो सूद साहब का लालच और दूसरे कुछ लोगों की गलत राय. फैक्टरी पहले नियमों के अनुसार बन रही थी, खुला क्षेत्र भी नियमों के अनुसार ही छोड़ा जा रहा था लेकिन बाद में नक्शे में परिवर्तन कर के खुला क्षेत्र कम कर दिया गया.’’

‘‘लेकिन क्यों?’’

‘‘ज्यादा प्रोडक्शन के लिए और अधिक मशीनें लगाई गई हैं.’’

दत्ता ने बात को आगे बढ़ाते हुए कहा, ‘‘तुम्हें शायद विपिन की कहानी का पता नहीं है. दरअसल, विपिन ने मिस्टर सूद को सलाह दी थी कि लाइसेंस लेने के बाद ओपन एरिया कवर करना चाहिए, लेकिन कुछ दूसरे लोगों के कहने पर और पैसे के घमंड में सूद साहब ने खुलेआम सभी के सामने विपिन को डांट लगाई और उस की खिल्ली उड़ाई. विपिन अपने इस अपमान को सहन नहीं कर सका और उस ने नौकरी छोड़ दी.

‘‘शायद अपने अपमान का बदला लेने के लिए ही विपिन ने प्रतिद्वंद्वी कंपनी ज्वाइन की है और उस की लिखित शिकायत पर विस्फोटक विभाग भी चुप नहीं बैठा. चूंकि वह जांच में भरपूर मदद कर रहा है, इसलिए हमें लाइसेंस नहीं मिल रहा है.’’

‘‘चलो, सुबह देखते हैं,’’ कह कर रोहित बिस्तर पर लेट गया, लेकिन काफी देर तक उस की आंखों में नींद नहीं आई. आंखें बंद कर सोचता रहा कि कैसे इस मसले को हल किया जाए.

सुबह 10 बजे रोहित और दत्ता विस्फोटक विभाग के मुख्यालय पहुंच गए और मोहन के केबिन के बाहर बैठ कर इंतजार करने लगे. मोहन जैसे ही दफ्तर आया, अपने केबिन के आगे रोहित को बैठा देख कर वह रुक गया.

‘‘रोहित, तुम और यहां…अरे, यह कैसा सुखद आश्चर्य है,’’ मोहन खुशी से हंसते हुए बोला.

‘‘मोहन, आज हम सालों बाद एकदूसरे से मिल रहे हैं तो साबित होता है कि दुनिया गोल है.’’

‘‘रोहित, चलो, केबिन मेें बैठ कर आराम से बात करते हैं.’’

मोहन और रोहित दोनों बचपन के दोस्त थे. स्कूल और कालिज में एकसाथ पढ़ते थे. दोनों के परिवार पुरानी दिल्ली के कूचा घासीराम में रहते थे. हमउम्र और एक ही गली में रहने के कारण दोनों का समय एकसाथ बीतता था. वे सिर्फ रात को सोने के लिए एकदूसरे से अलग होते थे. स्कूल और कालिज में एकसाथ पढ़ाई की. बी.काम. करने के बाद रोहित एमबीए करने अमेरिका चला गया और मोहन ने नौकरी कर ली.

इतने में चपरासी चाय ले आया. चाय की चुस्कियों में मोहन ने रोहित से पूछा, ‘‘आजकल रिहाइश कहां रखी है? लगभग 10 साल पहले मैं दिल्ली गया था. तुम ने मकान बेच दिया था. बहुत कोशिशों के बाद भी मुझे तुम्हारे नए मकान का पता नहीं चला. तब मैं ने देखा था कि आसपास सभी जगह आफिस बन गए थे और जिस बिल्ंिडग में मैं रहता था वहां बैंक खुल गया था.’’

‘‘हार्वर्ड यूनिवर्सिटी से एमबीए करने के बाद जब मैं दिल्ली वापस आया तब तुम मकान छोड़ कर जा चुके थे. 2-3 साल बाद मेरे घर वालों ने भी मकान बेच कर ग्रेटर कैलाश में कोठी बनवा ली. तभी से परिवार के साथ वहीं रह रहा हूं.’’

‘‘अच्छा, यह बताओ, इस आफिस में तुम्हारा कैसे आना  हुआ?’’ मोहन ने पूछा.

‘‘मोहन, मैं सूद एंड कंपनी में जनरल मैनेजर हूं और यहां लाइसेंस के सिलसिले में आया हूं.’’

कुछ पल की खामोशी के बाद मोहन ने कहा, ‘‘बचपन के दोस्त हो और लगभग 20 सालों के बाद मिले भी तो किन हालात में, यह इत्तफाक भी अजीब सा है.’’

रोहित भी कुछ बोल न सका. बचपन के साथी से लाइसेंस की कोई बात न कर सका.

चुप्पी तोड़ते हुए मोहन ने कहा, ‘‘रोहित, तुम्हारे आने का मकसद मैं समझ सकता हूं लेकिन मैं तुम्हारी मदद नहीं कर सकता हूं. तुम्हारी कंपनी के खिलाफ शिकायत की मैं ने जांच करवाई है, मेरे कुछ सिद्धांत हैं. मैं रिश्वत नहीं लेता हूं और निरीक्षण के दौरान जो अनियमितताएं पाई गई हैं उन के आधार पर लाइसेंस के लिए मैं अनुमति नहीं दे सकता हूं.’’

‘‘मोहन, इस बारे में अब मैं क्या बोलूं. फिर भी तुम से दिल की बात कह सकता हूं, क्योंकि तुम बचपन के दोस्त हो. जीवन में कभी मैं ने असफलता का सामना नहीं किया. अगर लाइसेंस नहीं मिला तो मुझे नौकरी छोड़नी पड़ेगी और पहली बार असफलता का कारण दोस्ती बनेगी. मुझे अपनी इस असफलता पर तुम से कोई शिकायत भी नहीं होगी, लेकिन मोहन, कुछ रास्ता निकालो. हर समस्या का कोई न कोई समाधान तो होता है न. इस भ्रष्ट समाज में तुम जैसे ईमानदार आदमी को देख कर मुझे खुशी है. और सब से अधिक खुशी इस बात की है कि वह ईमानदार आदमी मेरा बचपन का सखा है.’’

रोहित की बात सुन कर मोहन ने कहा, ‘‘रोहित, मैं जानता हूं कि यहां मुझे छोड़ कर हर कोई भ्रष्ट है, मैं समाज से भ्रष्टाचार समाप्त नहीं कर सकता. हां, तरीके तो बहुत हैं, मुझे सोचने के लिए वक्त दो. कल सुबह बात करते हैं.’’

‘‘तुम बुरा तो नहीं मानोगे,’’ झिझकते हुए रोहित ने मोहन से पूछा, ‘‘क्या शाम को मैं तुम्हारे घर आ सकता हूं?’’

‘‘तुम्हारा ही घर है, बेझिझक आ सकते हो,’’ कहते हुए मोहन ने एक कागज पर अपने घर का पता लिख कर रोहित को पकड़ा दिया.

रोहित और दत्ता होटल आ गए.

शाम को रोहित और दत्ता मोहन के घर रूप नगर के लिए चले. रास्ते में एक मिठाई की दुकान पर रुक कर रोहित ने मिठाई खरीदी.

‘‘कुछ गिफ्ट ले चलते हैं,’’ दत्ता ने कहा.

‘‘नहीं, दोस्ती को मैं पैसे में नहीं तोलना चाहता हूं. ऐसे दोस्त बहुत तकदीर से मिलते हैं. अगर आज पहली बार असफलता भी मिले तो कोई गम नहीं, क्योंकि मैं अपने दोस्त को खोना नहीं चाहता हूं. सोच लिया है कि अगर लाइसेंस नहीं मिला तो नौकरी छोड़ दूंगा.’’

इतने में मोहन का घर आ गया. 200 मीटर के प्लाट पर सिर्फ 2 कमरों का सेट बना था और सारा प्लाट खाली. घर के बाहर और अंदर दीवार के साथ फलदार पेड़ और पौधे घर की खूबसूरती में चार चांद लगा रहे थे.

मोहन ने रोहित और दत्ता का स्वागत किया. घर के अंदर बैठक में मोहन की पत्नी नीलम ने नाश्ते का इंतजाम कर रखा था. रोहित ने नीलम को मिठाई का डब्बा पकड़ाते हुए धीरे से हेलो कहा.

चाय पीने के बाद मोहन ने रोहित को अपना घर दिखाया, ‘‘यह बैठक कम हमारा बेडरूम है, दूसरा बच्चों का बेडरूम, रसोई, बाथरूम और पीछे लान, जहां नीबू के झाड़ के साथ पपीते और अमरूद के पेड़ हैं.

‘‘एक छोटा सा साफसुथरा घर, जहां जरूरत की हर चीज बड़े करीने से मौजूद थी, लेकिन कोई भी विलासिता का सामान नजर नहीं आया.

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‘‘यार, मोहन, तुम ने खाली प्लाट छोड़ रखा है, 1-2 कमरे और बनवा लो.’’

‘‘उस के लिए रकम चाहिए और तुम तो जानते हो कि रिश्वत मैं लेता नहीं और तनख्वाह में यह मुश्किल है, क्योंकि बच्चे बड़े हो रहे हैं, उन की पढ़ाई और कुछ भविष्य के लिए भी बचत करनी है.’’

‘‘बच्चे नजर नहीं आ रहे हैं,’’ रोहित ने उत्सुकता से पूछा.

‘‘भई, तुम्हारे लाइसेंस के चक्कर में बच्चों का जिक्र तो रह ही गया. एक लड़का और एक लड़की हैं. दोनों कालिज में पढ़ते हैं और छुट्टियां मनाने वे न्यू समरहिल गए हैं. मैं भी पत्नी के साथ कल सुबह 10 दिन के लिए, बच्चों के पास जा रहा हूं. शाम को छुट्टी मंजूर करवाई है.’’

छुट्टी का नाम सुनते ही रोहित हक्काबक्का रह गया.

मोहन इस बात को भांप गया था. चेहरे पर मुसकराहट लाते हुए बोला, ‘‘मेरे दोस्त, तुम इस बात को नहीं समझ सकते पर आफिस में मेरी मौजूदगी में तुम्हें लाइसेंस मिल नहीं सकता है क्योंकि ऐसे काम मेरी गैरमौजूदगी में होते हैं. सारी दुनिया के गलत काम होते हैं, एक और सही, दोस्ती की खातिर, इसीलिए मैं ने चीफ साहब से बात कर ली है. मैं 10 दिन की छुट्टी जा रहा हूं, तुम्हारा काम हो जाएगा.’’

रोहित को अपनी काबिलीयत और पैसे पर घमंड था. वह हमेशा समझता था कि पैसे के बलबूते सबकुछ संभव है, लेकिन आज यहां बाजी पलट गई. पैसे पर बचपन की दोस्ती हावी हो गई. पैसा हार गया और दोस्ती जीत गई. रोहित, मोहन की बात चुपचाप सुनता रहा.

‘‘रोहित, जब भी मेरे द्वारा आब्जेक्शन फाइल को पास करना होता है तो मुझे छुट्टी पर भेज दिया जाता है, ताकि कोई दूसरा अफसर उसे पास कर सके, आज मैं ने खुद छुट्टी मांगी है ताकि तुम्हारा काम हो सके. चलो, छोड़ो इस विषय को, रात काफी हो चुकी है, डिनर करते हैं.’’

खाना खाते हुए दत्ता पहली बार बोला, ‘‘मोहनजी, मैं आप के सिद्धांतों की कद्र करता हूं, क्या मैं आप का दोस्त बन सकता हूं?’’

‘‘बेशक, हर सच्चा आदमी मेरा दोस्त बन सकता है.’’

‘‘मैं आप की कसौटी पर खरा उतरने की भरपूर कोशिश करूंगा.’’

डिनर के बाद रोहित और दत्ता होटल वापस आ गए पर रोहित खामोश ही बना रहा. दत्ता ने चुप्पी तोड़ते हुए कहा, ‘‘रोहित, तुम्हें अपने दोस्त पर गर्व होना चाहिए, जिस ने दोस्ती पर सिद्धांतों की बलि दे दी. जिस काम को पैसे नहीं कर सके उसे दोस्ती ने कर दिखाया.’’

‘‘लेकिन पैसे तो फिर भी लगेंगे,’’ रोहित ने कहा.

‘‘आज पहली बार असफल हुए हो रोहित, पर मेरी बात मानो, इस दोस्ती को कभी मत छोड़ना,’’ दत्ता बेहद भावुक हो गया था.

अगली सुबह मोहन आफिस में नहीं था. उस के सहयोगी सोहन के पास फाइल भेज दी गई. फाइल में से आपत्तिजनक कागजों को निकाल कर दूसरे कागज लगा दिए गए. आफिस में बैठ कर फैक्टरी का निरीक्षण भी हो गया और संतोषजनक रिपोर्ट लगा कर 3 दिन में लाइसेंस जारी कर दिया गया. कल तक जो काम असंभव लग रहा था पैसों के बोझ में दब कर संभव हो गया. लाइसेंस हाथ में आते ही रोहित खुशी से उछल पड़ा, झट से सूद साहब को फोन किया.

‘‘गुड न्यूज, सर, लाइसेंस मिल गया.’’

‘‘वैल डन रोहित, मैं जानता था कि तुम यह काम कर लोगे, इसीलिए मैं ने तुम्हें यह काम सौंपा था,’’ सूद साहब की आवाज में एक नई ताकत नजर आ रही थी.

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‘‘रोहित, तुम मानो या न मानो, पर तुम ने बाजी जीत कर हारी है और मोहन ने दोस्ती के नाम पर अपने सिद्धांतों की बलि दे कर बाजी जीत ली है,’’ इतना कह कर दत्ता मंदमंद मुसकरा रहा था और रोहित अवाक् हो उस को देखता रह गया.

Ex-गर्लफ्रेंड की बर्थडे पार्टी में यूलिया के साथ पहुंचे सलमान, फोटोज वायरल

बौलीवुड के भाईजान अक्सर ही अपने जलवों से लोगों को इम्प्रेस करने में कोई कसर नहीं छोड़ते. हाल ही में 9 जुलाई को सलमान खान की एक्स गर्लफ्रेंड संगीता बिजलानी का 54वां बर्थडे था. दिलचस्प बात ये है कि इस बर्थडे पार्टी में सलमान यूलिया वंतूर के साथ पहुंचे थे, जिन्हें उनकी रयूमर्ड गर्लफ्रेंड कहा जाता है. इस पार्टी की कुछ फोटोज तेजी से वायरल हो रही हैं.

एक ही छत के नीचे एक्स और करंट गर्लफ्रेंड…

सलमान खान अपनी एक्स गर्लफ्रेंड संगीता के बर्थडे पार्टी में प्रेजेंट गर्लफ्रेंड यूलिया के साथ पहुंचे. देखा जाए तो एक ही छत के नीचे सलमान खान अपनी गर्लफ्रेंड और एक्स गर्लफ्रेंड के साथ थे. इस पार्टी में सलमान खान खूब मस्ती करते नजर आए. यहां तक की सलमान ने प्रभुदेवा के फेमस सौंग उर्वशी पर ठुमके लगाए. डांस करते समय सलमान का साथ खुद प्रभुदेवा, साजिद नाडियाडवाला और साउथ फिल्मों के सुपरस्टार सुदीप ने भी दिया.

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संगीता बिजलानी के बर्थडे पार्टी में सलमान खान, यूलिया सहित और भी बौलीवुड सलैब्स नजर आए जैसे की- साजिद नाडियाडवाला, प्रभुदेवा, डेजी शाह और मोहनीश बहल.

बतो दें, संगीता बिजलानी अपनी बर्थडे पार्टी में ब्लैक आउट-फिट पहनीं नजर आईं. वो बेहद खूबसूरत दिख रही थीं शायद इसी वजह से वे कैमरे के सामने अलग अलग पोज देती नजर आईं.

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फैशन के मामले में बौलीवुड हीरोज को भी मात देते हैं ‘नागिन’ के ‘माहिर’

कलर्स टी.वी. के पौपुलर शो ‘नागिन-3’ में ‘माहिर’ का रोल करने वाले छोटे पर्दे के मशहूर एक्टर पर्ल वी. पुरी अपने लुक्स को लेकर अपने फैंस के बीच काफी पौपुलर हैं. सीरीयल “बेपनाह प्यार” में पर्ल द्वारा निभाए जाने वाला ‘रघबीर मल्होत्रा’ का किरदार फैंस को बेहद पसंद आ रहा है. पर्ल बेहतरीन एक्टर होने के साथ-साथ एक मौडल भी रह चुके हैं. पर्ल अक्सर अपने औफिशियल इंस्टाग्राम अकाउंट पर अपने नए-नए लुक्स शेयर करते रहते हैं. तो अगर आप भी पर्ल की तरह डैशिंग दिखना चाहते है तो अपनाएं उनके कुछ चुनिंदा लुक्स.

पर्ल वी. पुरी का स्पोर्टी लुक…

पर्ल वी. पुरी अपने इस स्पोर्टी लुक में बहुत ही कूल नजर आ रहे हैं. पर्ल ने इस लुक में ब्लैक कलर की राउंड नैक टी-शर्ट के साथ ब्लैक कलर के ही शोर्ट्स पहने हुए हैं. इस स्पोर्टी आउट-फिट के साथ पर्ल ने स्पोर्टस शूज भी पहने हुए हैं. आप भी पर्ल का ये लुक अपने जिम या फिटनेस क्लब में ट्राय कर सकते हैं.

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ट्राय करें पर्ल वी. पुरी का कैज़ुअल लुक…

 

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पर्ल वी. पुरी इस कैज़ुअल लुक में ब्लैक कलर की राउंड नैक टी-शर्ट के साथ ब्लू कलर की जींस पहने दिखाई दे रहे हैं. आप भी पर्ल का ये लुक अपनी डेली-रूटीन और कौलेज में ट्राय कर सकते हैं.

पर्ल वी. पुरी का डीसेंट लुक…

 

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How was the episode guys? Mind blowing kapde by : @anusoru 🤗❤️ #mahir #life #love #naagin3 #pvp #potd #ootd

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पर्ल वी. पुरी अपने इस लुक में बेहद डीसेंट नजर आ रहे हैं. इस लुक में पर्ल ने ब्लैक कलर का कुर्ता–पयजामा पहन रखा है. पर्ल ने इस कुर्ते–पयजामे के साथ प्रिंटेड मफलर भी ले रखा है जो कि इस आउटफिट पर चार चांद लगा रहा है. आप भी पर्ल का ये लुक अपने फैमिली फंक्शन्स में ट्राय कर सबसे अलग लग सकते हैं.

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ट्राय करें पर्ल वी. पुरी का पार्टी लुक…

 

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It is in your moments of decision that your destiny is shaped. . . #life #pvp #pearlvpuri #mahir #love #naagin3 #goodheart

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पर्ल वी. पुरी अपने इस पार्टी लुक में बहुत ही हैंडसम लग रहे हैं. इस लुक में पर्ल ने ब्लैक प्रिंटेड शर्ट के ऊपर महरून कलर का वेलवेट ब्लेजर, और साथ में ब्लैक कलर का ही ट्राउजर पहना हुआ है. अगर आप भी अपनी कौलेज पार्टीज और किसी भी फंक्शन में अपने लुक्स से सबको इम्प्रैस करना चाहते हैं तो जरूर ट्राय करें पर्ल वी. पुरी को ये लुक.

बता दें, पर्ल वी. पुरी ने कई सीरियल्स में काम किया है जैसे कि- ‘मेरी सासू मां’, ‘फिर भी ना माने… बद्तमीज दिल’ ‘दिल की नजर से खूबसूरत’ आदि. पर्ल इस समय ‘बेपनाह प्यार’ शो में रघबीर मल्होत्रा का रोल निभा रहे हैं.

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1 करोड़ की फिरौती ना देने पर ले ली प्रौपर्टी डीलर की जान

लेखक- कपूर चंद

पिछले एक दशक से देखने में आ रहा है कि कई जघन्य वारदातों में नाबालिगों के नाम शामिल होते हैं. इस की वजह मामूली पढ़ाई-लिखाई, बेरोजगारी तो है ही, लेकिन उस से भी बड़ी वजह ये है कि नाबालिगों के मुकदमे बाल न्यायालय में चलते हैं और उन्हें कम सजा दी जाती है, जो 2-3 साल से ज्यादा नहीं होती.

दिसंबर, 2012 में दिल्ली में हुए देश के सब से चर्चित सामूहिक बलात्कार और हत्या के दोषियों में एक नाबालिग भी था. उसी ने निर्भया के साथ सब से ज्यादा बर्बरता, सच कहें तो इंतहा की आखिरी हद तक दरिंदगी की थी. लेकिन नाबालिग होने की वजह से वह मामूली सजा भोग कर जेल से बाहर आ गया और हालफिलहाल नाम बदल कर दक्षिण भारत में कुक की नौकरी कर रहा है.

5 साल पहले मेरठ में भी एक नाबालिग ने पारिवारिक रंजिश के चलते एक व्यक्ति को दिनदहाड़े गोलियों से भून दिया था, जो अब छूट चुका है. ऐसे और भी तमाम मामले हैं. 13 जून, 2019 को दिल्ली के रोहिणी में हुई प्रौपर्टी डीलर अमित कोचर की हत्या में भी एक आरोपी नाबालिग है, जिसे शार्पशूटर बताया जा रहा है. पुलिस के अनुसार अमित कोचर से एक करोड़ रुपए की सुपारी मांगी गई थी, जो उन्होंने नहीं दी. इसी के फलस्वरूप उन की हत्या कर दी गई.

विकासपुरी में रहने वाले अमित कोचर ने कई साल तक बीपीओ (कालसेंटर) चलाया था. इस के बाद वह प्रौपर्टी डीलिंग का काम करने लगे थे. उन की पत्नी एनसीआर के एक कालसेंटर में कार्यरत थीं. 13 जून बृहस्पतिवार को अमित ने अपने दोस्तों को खाने पर बुलाया था. अमित ने औनलाइन खाना और्डर कर दिया था. 11 बजे डोरबैल बजी तो अमित ने सोचा, डिलिवरी बौय आया होगा. उन्होंने दरवाजा खोल दिया. दरवाजे पर खड़े बदमाशों ने अमित को बिना कोई मौका दिए बाहर खींच लिया.

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बदमाश उन्हें घसीट कर घर के बाहर ले गए और उन्हें उन की ही गाड़ी में बैठा कर उन की हत्या कर दी. उन्हें 9 गोलियां मारी गई थीं. जब अमित के दोस्तों ने गोली की आवाज सुनी तो वे बाहर आए. बदमाशों ने उन पर पिस्तौल तान दी और अपनी कार में बैठ कर भाग निकले. घटना के बाद लोग एकत्र हुए तो सब को लगा कि यह घटना संभवत: कार पार्किंग के विवाद को ले कर हुई है.

अमित कोचर के दोस्त उन्हें दीनदयाल उपाध्याय अस्पताल ले गए. लेकिन डाक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया. पुलिस ने जब इस मामले की जांच शुरू की तो सीसीटीवी फुटेज के आधार पर पता चला कि बदमाश क्रेटा कार से भागे थे.

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कार के नंबर के आधार पर पता लगाया गया तो जानकारी मिली कि क्रेटा कार भिवाड़ी, राजस्थान से लूटी गई थी. बदमाशों ने एक मौल के बाहर से क्रेटा कार के मालिक को कार सहित अपहृत कर लिया था. बाद में उसे रास्ते में उतार दिया गया. केवल इतना ही नहीं, बल्कि उन्होंने उसे किराए के लिए एक हजार रुपए भी दिए थे.

रोहिणी मामले में पुलिस ने अपने मुखबिरों की मदद ली तो पता चला कि अमित कोचर की हत्या गैंगस्टर मंजीत महाल के भांजे लोकेश उर्फ सूर्या के गैंग के लोगों ने की थी. 15 जून की सुबह 4 बजे मुखबिरों से ही पता चला कि जिस गैंग ने अमित कोचर की हत्या की है, उस गैंग के बदमाश सुबह 4 बजे रोहिणी के सेक्टर-25 में हेलीपैड के पास मौजूद हैं.

पुलिस टीम वहां पहुंची तो हत्या की वारदात में इस्तेमाल की गई क्रेटा कार खड़ी दिखाई दी. कार के बाहर नाबालिग शार्पशूटर खड़ा था, जो शायद किसी का इंतजार कर रहा था. पुलिस को देख वह कार की ओट में छिप गया. पुलिस ने उसे समर्पण करने को कहा तो वह भागने लगा. पुलिस टीम उसे पकड़ने के लिए दौड़ी तो उस ने गोली चला दी. गनीमत यह रही कि गोली किसी पुलिस वाले को नहीं लगी. पुलिस ने उसे पकड़ लिया. उस से कार और पिस्तौल बरामद कर ली गई.

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पूछताछ में नाबालिग ने बताया कि प्रौपर्टी डीलर अमित कोचर बुकी भी थे. यानी वह सट्टा खेलाते थे. गैंग ने उन से एक करोड़ की रंगदारी मांगी थी, पैसा न देने की वजह से ही उन की हत्या की गई थी. पिछले साल दिसंबर में इस गैंग के लोगों ने बिंदापुर के एक डाक्टर से एक करोड़ की रंगदारी मांगी थी. इस मामले में पुलिस ने इस गैंग के बदमाश जितेंद्र को नजफगढ़ से गिरफ्तार किया था. इस गिरोह ने अपने प्रतिद्वंदी गिरोह के बदमाश हरिओम को गोलियों से भून दिया था, लेकिन उस की जान बच गई थी.

इस मामले में नाबालिग के अलावा नजफगढ़ का रहने वाला लोकेश उर्फ सूर्या, प्रदीप, सोनीपत निवासी नीरज और रोहतक का रहने वाला रोहित भी शामिल था. इस गिरोह ने 29 अप्रैल, 2019 को जनकपुरी के एक डिपार्टमेंटल स्टोर से 15 लाख रुपए लूटे थे. इस मामले में थाना जनकपुरी में केस दर्ज हुआ था. बाद में बदमाशों ने डिपार्टमेंटल स्टोर के मालिक को केस वापस लेने के लिए धमकाया भी था.

न्यूयौर्क में नौकरी छोड़कर ‘द औफिस’ पहुंचे ‘चड्डा जी’, जाने क्यूं

शुरू से ही थिएटर में रूचि होने के बावजूद न्यूयौर्क में ‘‘लेहमेन ब्रदर्स’’ कंपनी में रिसर्च एनालिस्ट की नौकरी करते हुए न्यूयार्क में थिएटर करते रहे मुकुल चड्डा के अपने वतन के प्रति प्यार ने अंततः उन्हें भारत वापस आने पर मजबूर कर दिया. मुंबई वापस आने के मुकुल चड्डा पिछले दस वर्षों से इम्प्रा थिएटर के साथ ही फिल्मों में अभिनय करते आ रहे हैं. अब मुकुल चड्डा वेब सीरीज ‘‘द आफिस’’ में गौहर खान के साथ जगदीप चड्डा के किरदार में नजर आ रहे हैं. जो कि अमरीकन सीरीज ‘‘द आफिस’’ का भारतीय संस्करण है. ज्ञातव्य है कि यह अमरीकन सीरीज बहुत लोकप्रिय है और भारत में उसका यह दसवां अंतरराष्ट्रीयकरण है. अमरीकन वेब सीरीज ‘‘द आफिस’’ में माइकल स्कौट के किरदार को गोल्डन ग्लोब अवार्ड विजेता अमरीकन अभिनेता स्टीव कैरेल ने निभाया था.

थिएटर की तरफ रूझान होते हुए भी एमबीए कर न्यूयार्क में नौकरी करने के पीछे क्या सोच थी?

थिएटर का शौक तो स्कूल दिनों से ही था. स्कूल में भी मैंने नाटक किए, पर मुझे लगता है कि उन दिनों एक्टिंग को करियर औप्शन के रूप में बच्चे नहीं देखते थे. स्कूल कौलेज में लोग शौकिया नाटक किया करते थे, तो मैं भी नाटकों में अभिनय कर रहा था. पर मैं पढ़ाई में तेज था. पढ़ाई पर ही ज्यादा ध्यान था. शौक के चलते मैंने स्कूल व कौलेज में जमकर नाटक किया. वैसे मुझे मैथ्स पढ़ने का भी बहुत शौक था. फायनेंस में दिलचस्पी थी, तो उसी में एमबीए कर लिया. हां! जब मैं न्यूयौर्क में नौकरी कर रहा था, तो कुछ दिनों के बाद उस नौकरी में मजा नहीं आ रहा था. इसके अलावा मैं भारत वापस आना चाह रहा था. न्यूयार्क में रहते हुए हमने नौकरी के साथ साथ शनिवार व रविवार नाटक करना शुरू कर दिया. हमने अपने कुछ सहकर्मियों के साथ मिलकर एक ग्रुप बनाया और पहला नाटक किया ‘हाय वदन’, जिसमें मैंने देवदत्त का किरदार निभाया था. हम हर साल एक नाटक किया करते थे. फिर जब नौकरी में यात्राएं बढ़ गयी, तो नाटक करना संभव नहीं हो पा रहा था. फिर मैंने न्यूयौर्क के एक एक्टिंग स्कूल में एक्टिंग की क्लास लेना शुरू कर दिया. फिर वहां मन उब गया, तो भारत आ गया. उस वक्त तक मैंने सोचा नहीं था कि यहां आकर क्या करना है. तो मैंने सोचा कि एक दो साल कुछ लिखता हूं, नाटकों में अभिनय करता हूं. फिर सोचूगा कि कहां नौकरी की जाए. मैंने कई लघु कहानियां लिख रखी हैं. कुछ कहानियां अभी अधूरी पड़ी हुई हैं. जब मैं अमरीका में रह रहा था, तो उस वक्त भी मैं कौफी शौप वगैरह में बैठकर कहानी लिखा करता था. कई बार तो ऐसा हुआ कि लिखने का मौका नही मिल रहा था, तो फ्रस्टेशन भी आया. मुंबई आने के बाद लगातार दो साल तक नाटकों में अभिनय करता रहा. नाटकों में अभिनय करते हुए मजा आ रहा था. थिएटर करते करते ही मुझे 2006 में एड करने के मौके मिल गए. वास्तव में मैंने एक अंग्रेजी नाटक का हिंदी अनुवाद किया था, जिसे देखने के लिए रोहन सिप्पी आए थे. वह उन दिनों अंडे पर एक एड फिल्म बना रहे थे. यह महज इत्तेफाक है कि मेरी वेब सीरीज‘‘द औफिस’’ के 6 एपीसोड उन्होंने निर्देशित किए हैं. मैने रोहन सिप्पी को याद भी दिलाया कि आपने ही मुझे पहला ब्रेक दिलाया था. उसके बाद मैने कई एड फिल्में की.

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2006 के बाद आपका करियर कैसे आगे बढ़ा?

एड फिल्मों की वजह से फिल्मों में छोटे छोटे किरदार मिलने लगे. पर मेरा थिएटर चलता रहा. 2009 में इम्प्रा थिएटर करना शुरू किया.

इम्प्रा थिएटर की प्रेरणा कहां से मिली?

जब मैं अमरीका में रह रहा था, तो वहां शिकागो में एक मशहूर इम्प्रा थिएटर ग्रुप है. इसी ग्रुप ने वहां कि टीवी पर एक शो किया था, उससे मुझे प्रेरणा मिली. मैं छह माह नौकरी के सिलसिले में शिकागो में भी रहा. तब मैने वहां पर भी इम्प्रा थिएटर की क्लासेस की थी. वहां हर शनिवार को मैं वर्कषाप में जाया करता था. तो मेरे मन में था कि जब मैं भारत जाउंगा, तो वहां भी इम्प्रा थिएटर करूंगा. इम्प्रा थिएटर आप अकेले नही कर सकते, उसके लिए एक ग्रुप चाहिए. 2009 में हमने एक ग्रुप बनाया और अब पिछले 10 वर्षो से मैं इम्प्रा थिएटर करता आ रहा हूं.  देखिए,आप शायद जानते होंगे कि इम्प्रा थिएटर में स्क्रिप्ट की जरूरत नहीं होती. हर दिन आप उसमें कलाकार भी बदले सकते हैं. तो पिछले दस साल में हमने हजारों प्ले कर लिए. पिछले साल मैं फिल्म और टीवी में बहुत व्यस्त था तो इम्प्रा थिएटर नही कर पाया. पर ग्रुप के दूसरे लोग करते रहें एक वक्त ऐसा था, जब हम हर हफ्ते स्टेज पर जाकर इम्प्रा थिएटर किया करते थे, हमारे इम्प्रा थिएटर ग्रुप में 15 से 20 लोग है. इसलिए समस्या नही आती है. इम्प्रा में यह सहूलियत है कि जो कलाकार फ्री हो वे कर लेगा जो नही हैं वे नही करेगा. जबकि दूसरे नाटकों में आप किरदार के साथ जुड गए तो आपको करना ही पड़ता है.

इम्प्रा थिएटर से जुड़ने के पीछे आपकी कोई खास सोच रही हैं?

इम्प्रा थिएटर में मैंने ज्यादा काम किया. क्योंकि यहां स्वतंत्रता थी. पर मैंने रेगुलर थिएटर भी किया है. मैं रेगुलर शो कर रहा हूं. अभी मार्च में मैंने ‘लीला’ नाटक किया था. मैंने ‘‘गुड़गांव’’ सहित कुछ फिल्में की हैं.

भारत में इम्प्रा थिएटर बहुत कम लोकप्रिय है, इसकी वजहें क्या हैं?

पता नहीं. मगर मैं चाहता हूं कि ये पौपुलर हो. हां यहां फिल्मों का जो आकर्शण हैं, वह लोगों में ज्यादा है. थिएटर में कई तरह की बंदिशें होती हैं. एक साथ बहुत सीमित दर्शक शो देख सकते हैं. उसका दूसरा शो करना हो तो फिर से सभी कलाकारों को इकट्ठा करने की समस्या आती है, जबकि फिल्म एक बार बन गयी तो 50 साल तक कभी भी किसी भी सिनेमाघर में उसे लगाकर लोगों को दिखाया जा सकता है. आर्थिक दृष्टिकोण से फिल्म सेलेबल है, नाटक सेलेबल नहीं होता.

मगर हिंदी की बनिस्बत गुजराती व मराठी थिएटर ज्यादा लोकप्रिय हैं?

ऐसा है. मगर लोग गुजराती व मराठी नाटक की बनिस्बत कई गुना ज्यादा फिल्में देखते हैं. अब ओटीटी प्लेटफार्म आने से लोग घर के अंदर बैठकर वेबसीरीज व वेब फिल्में देख रहे हैं. ओटीटी प्लेटफार्म आने के बाद घर से बाहर निकलने व टिकट खरीदने का कोई झंझट नही रहा.

‘‘गुड़गांव’’ की असफलता के बाद आपने क्या महसूस किया था?

देखिए, हमारा काम अपनी तरफ से मेहनत करके इमानदारी से अपने काम को अंजाम देना है. उसके बाद सब कुछ दर्शकों के हाथ में होता है. हम कुछ चाहकर भी नहीं कर सकते. दूसरी बात हम फिल्म पूरी होने के बाद दूसरी फिल्म के साथ जुड़ चुके होते हैं, तो पहली फिल्म के साथ उतना जुड़ाव नहीं रह जाता. हम अपनी तरफ से हर बार बेहतर काम करने का प्रयास करते रहते हैं. मैंने अपना प्रयास जारी रखा और आज वेब सीरीज ‘द आफिस’ कर रहा हं.

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जब आपको वेब सीरीज द आफिसका औफर मिला, तो आपकी पहली प्रतिक्रिया क्या थी?

मैं बहुत खुश था. यह एसी इंटरनेशनल सीरीज है, जिसे करीबन दस देशों में एडौप्ट किया जा चुका है. बहुत ही लोकप्रिय सीरीज है. जब भारत में इसका एडाप्ट किया जाने लगा, तो मुझे औडीशन देने के लिए बुलाया गया. औडीशन प्रोसेस बहुत लंबा चला और शायद इसकी वजह यह थी कि इसके निर्माता निर्देषक एक ही किरदार के लिए कई दूसरे कलाकारों से भी बात कर रहे होंगे. औडीशन देने के पहले तक मैंने इस सीरीज को देखा भी नही था. जब इसके लिए मुझे औडिशन देने के लिए बुलाया गया, तो कहा गया कि मैं पहले इसे देख लूं, तो समझ आएगा कि सीरीज किस तरह की है, इसमें अलग तरह की कौमेडी है. जब मैंने अमरीकन शो ‘औफिस’ देखा, तो मुझे बहुत पसंद आया. मुझे किरदार भी बहुत अलग लगा. यह ऐसा किरदार है, जिसे हर कलाकार जरूर निभाना चाहेगा. पहला औडीशन देते हुए मैंने बहुत एंजौय किया और मैं सोचने लगा कि मुझे यह वेब सीरीज मिल जाए. पूरे दो माह बाद मुझे दूसरी बार औडीसन के लिए बुलाया गया और जब यह वेब सीरीज मुझे मिली तो मैं बहुत खुस था.

इस अमरीकन वेब सीरीज का भारतीयकरण करते हुए किस तरह के बदलाव किए गए?

देखिए, इसकी कहानी की आत्मा वही है. किरदार भी वही हैं, लेकिन उनका भारतीय करण किया गया है. प्लौट में या उसके स्ट्रक्चर में कोई बदलाव नही किया गया है. जैसे जगदीप चड्ढा अपने आपको एंटरटेनर मानता है, तो वह है. अमरीकन सीरीज में माइकल स्टांग अपने आपको एंटरटेनर मानता हैं, पर इसमें उन समस्याओं को उठाया गया है, जो भारत में आम हैं. कुछ इशू अमरीका में हैं, पर वह भारत में नही हैं. दोनों देशों की सोच का जो अंतर है, उसे भी मद्दे नजर रखा गया है. अमरीका में रिश्ते अलग हैं, भारत में रिश्ते अलग हैं, त्यौहार भी अलग है. इसके अलावा यहां औफिस में कुछ टिपिकल लोग रहते हैं, उनके किरदार जोड़े गए हैं. फिर शूटिंग के दौरान हम कलाकारों ने अपनी तरफ से कुछ ऐसा डाला है, जिससे यह पूरी तरह से भारतीय शो लग रहा है.

आप अपने किरदार को लेकर क्या कहेंगे?

जगदीप चड्डा यह एक नेक बच्चा है. बच्चे की तरह बिना सोचे जो मन में आता है, बोल देता है. उसको रोना है, तो रोएगा, हॅंसना है तो हंसेगा. उसका संवाद है-‘‘सोचकर कौन बोलता है. ’’वह स्पौंटेनियस है. पर समस्या यह है कि यह आफिस में बौस भी है. इसलिए कुछ करने के बाद उसे अहसास होता है कि मुझे यह नहीं करना चाहिए, मैं यहां बौस हूं. तो उसी में कौमेडी है.

वेब सीरीज एक बेहतरीन प्लेटफार्म है?

जी हां! इससे कंटेंट अधिक बन रहा है. ज्यादा से ज्यादा प्रतिभाओं को काम करने का अवसर मिल रहा है. यह सुखद बदलाव है. दर्शकों को भी कुछ बेहतर देखने का अवसर मिल रहा है.

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वेब सीरीज के नाम पर जो सेक्स व गंदगी परोसी जा रही है, उसको लेकर क्या कहना चाहेंगे?

मैंने इस तरह की वेब सीरीज देखी नहीं है. मैने सुना है कि वेब सीरीज पर सेंसरशिप नही है, इसलिए कुछ भी परोसा जा रहा है. पर कुछ शो में उसकी कहानी के अनुसार जरुरी है, तो रखा जाना चाहिए.

इसके अलावा क्या कर रहे हैं?

मैने एक प्रयोगात्मक फिल्म की है- ‘‘फेरी फोक’’. इसे करने का अनुभव काफी मजेदार रहा. इसके लिए हमने लंबे लंबे दृष्य एक साथ फिल्माए. हमने एक बार 25 मिनट का दृष्य फिल्माया. वह कलाकार को पूरी छूट देते थे. हर सीन की कहानी बता देते थे, संवाद नहीं देते थे. फिर कलाकार पर सब कुछ छोड़ देते थे. कलाकार को उस किरदार में जो सही लगे, करे. एक तरीके से यह हमारे ‘इम्प्रा थिएटर’ से जुड़ा हुआ है. तो हमने काफी एंजौय किया.

इसका सब्जेक्ट क्या है?

एक पति पत्नी है, जो कि मुंबई में रहते हैं. उनके साथ कुछ अजीबो गरीब घटनाएं हो रही हैं, जिन्हे आप सुपर नेच्युरल भी कह सकते हैं. उसका उनके रिश्तों पर क्या असर पड़ता है. उसकी कहानी है.

किस तरह की फिल्में या किरदार करना चाहते हैं?

मैं अच्छी स्क्रिप्ट व अच्छे किरदारों को प्राथमिकता देता हूं. मैं उस किरदार को करना चाहता हूं, जो कि मुकुल यानी कि मुझसे काफी अलग हो. बायोपिक फिल्मों के बारे में सोचा नही.

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विदाई

भाग-1

विदाई की रस्म पूरी हो रही थी. नीता का रोरो कर बुरा हाल था. आंसुओं की झड़ी के बीच वह बारबार नजरें उठा कर बेटी को देखती तो उस का कलेजा मुंह को आ जाता.

सारी औपचारिकताएं खत्म हो चुकी थीं. टीना धीरेधीरे गाड़ी की ओर बढ़ रही थी. बड़ी बूआ भीगी पलकों के साथ ढेर सारी नसीहतें दे रही थीं, ‘‘टीना, अब तेरे लिए ससुराल ही तेरा अपना घर है. वहां सब का खयाल रखना. सासससुर की सेवा करना…’’ कहतेकहते उन की रुलाई फूट पड़ी.

नीता बड़ी मुश्किल से इतना भर कह पाई, ‘‘अपना खयाल रखना टीना,’’ आगे मां की जबान साथ न दे पाई और वह बड़ी जीजी के कंधे का सहारा ले कर जोरजोर से रोने लगीं.

टीना और नरेश गाड़ी में बैठ गए. दुलहन के लिबास में लिपटी टीना की हालत पर नरेश भावुक हो उठा. उस ने धीरे से टीना का हाथ पकड़ कर उसे ढांढस बंधाने का प्रयास किया. पति का स्पर्श पा कर टीना को कुछ राहत मिली, वरना उसे लग रहा था कि उस के सारे परिचित पीछे छूट गए हैं.

1 घंटे में टीना अपनी ससुराल की दहलीज पर खड़ी थी. नरेश का परिवार उस के लिए अपरिचित न था. दूर की रिश्तेदारी के कारण अकसर उन की मुलाकातें हो जाया करती थीं. ऐसे ही एक विवाह समारोह में नरेश की मां सुधा ने टीना को देखा था. उस का चुलबुलापन उन्हें बहुत अच्छा लगा. बिना समय गंवाए उन्होंने बात चलाई और 6 महीने के अंदर टीना उन की बहू बन कर उन के घर आ गई.

2 दिन तक विवाह की रम्में पूरी होती रहीं. तीसरे दिन नरेश व टीना हनीमून के लिए शिमला आ गए. दोनों बहुत खुश थे. नरेश के प्यार में खो कर टीना, मम्मी से बिछुड़ने का गम भूल  सी गई.

हनीमून के 2 दिन बहुत ही सुखद बीते. तीसरे दिन टीना को सर्दीबुखार ने घेर लिया. नरेश चिंतित था, ‘‘टीना, तुम आराम करो, लगता है यहां के मौसम में आए बदलाव के चलते तुम्हें सर्दी लग गई है.’’

‘‘मेरा बदन बहुत दुख रहा है नरेश.’’

‘‘तुम चिंता न करो, मैं डाक्टर को ले कर आता हूं.’’

‘‘डाक्टर की जरूरत नहीं है. एंटी कोल्ड दवाई से ही बुखार ठीक हो जाएगा, क्योंकि जब मुझे सर्दीबुखार होता था तो मम्मी मुझे यही दिया करती थीं.’’

‘‘मम्मी की बहुत याद आ रही है,’’ टीना को बांहों में भर कर नरेश बोला तो उस ने सिर हिला दिया.

‘‘तो इस में कीमती आंसू बहाने की क्या जरूरत है. अभी मम्मी से बात कर लो,’’ टीना की ओर मोबाइल बढ़ाते हुए नरेश बोला.

‘‘मुझे मम्मी से ढेर सारी बातें करनी हैं, अभी घर पर बहुत सारे मेहमान होंगे.’’

‘‘पगली, बाकी बातें बाद में कर लेना, अभी तो अपना हालचाल बता दो उन्हें.’’

‘‘प्लीज, उन्हें मेरी तबीयत के बारे में कुछ न बताना, वरना वे मुझे देखने यहीं आ जाएंगी. मैं मम्मी को जानती हूं,’’ टीना चहक कर बोली.

मम्मी के बारे में बात कर वह अपना दुखदर्द भूल गई. नरेश ने महसूस किया कि टीना सब से ज्यादा खुश मम्मी की बातों से होती है. अब टीना का दिल बहलाने के लिए वह बहुत देर तक मम्मी के बारे में बात करता रहा.

हनीमून के दौरान पूरे 7 दिनों में टीना ने एक बार भी अपनी ससुराल के बारे में कुछ नहीं पूछा. वह बस, अपनी मम्मी की और सहेलियों की बातें करती रही. हनीमून से वापस लौटते हुए टीना बोली, ‘‘नरेश, मुझे लखनऊ कितने दिन रुकना होगा.’’

‘‘तुम यह सब क्यों पूछ रही हो? अभी हमारी शादी को 8-10 दिन ही हुए हैं. जिस में हम घर पर 3 दिन ही रहे हैं. कम से कम 2 हफ्ते तो रुक ही जाना.’’

‘‘2 हफ्ते तक घर में बहू बन कर रहना मेरे बस की बात नहीं है.’’

‘‘मेरी मम्मी तुम्हें बहू नहीं बेटी की तरह रखेंगी. तुम खुद देख लेना. बहुत अच्छी मां हैं वह.’’

‘‘तुम्हारी बहन को देख कर मुझे अंदाजा लग गया है कि वह बेटी को किस तरह रखती हैं,’’ मुंह बना कर टीना बोली.

‘‘हम यहां से चल कर 2 दिन लखनऊ रुकेंगे. उस के बाद दिल्ली चलेंगे तुम्हारे मम्मीपापा के पास. वहां से जब तुम चाहोगी तब ही वापस आएंगे,’’ न चाहते हुए भी मजबूरी में टीना ने नरेश की यह बात मान ली.

लखनऊ में नरेश के परिवार वालों ने टीना की खूब खातिरदारी की. नरेश को लगा वह टीना को कुछ दिन और यहां रोक लेगा पर दूसरे दिन ही टीना ने अपने मन की बात कह डाली.

‘‘नरेश, हम कल दिल्ली चल रहे हैं न. मैं ने मम्मी को फोन से बता दिया है,’’ टीना बोली तो नरेश चुप हो गया. उस ने यह बात अभी तक अपने मम्मीपापा से नहीं कही थी. वह तुरंत पानी पीने के बहाने वहां से हट कर किचन में आ गया और धीरे से मम्मी से बोला, ‘‘मम्मी, टीना कल अपने मायके जाना चाहती है. आप की इजाजत हो तो…’’

‘‘ठीक ही तो कह रही है बहू. इतने दिन हो गए हैं उसे ससुराल आए हुए. इकलौती बेटी है वह अपने मां बाप की. घर की याद आनी तो स्वाभाविक है बेटा,’’ बेटे की दुविधा दूर करते हुए सुधा बोलीं.

कमरे में नरेश पहुंचा तो टीना बोली, ‘‘आप मेरी बात अधूरी छोड़ कर कहां चले गए थे?’’

‘‘पानी पीने चला गया था. तुम पैकिंग में व्यस्त थीं सो मैं खुद ही चला गया किचन तक.’’

‘‘कल का प्रोग्राम पक्का है न?’’

‘‘बिलकुल पक्का,’’ नरेश चहक कर बोला तो टीना ने राहत की सांस ली.

मायके पहुंच कर टीना मम्मी से लिपट कर खूब रोई. नीता, टीना को बड़ी देर तक सहलाती रही.

‘‘कितनी दुबली हो गई हैं मम्मी आप,’’ टीना बोली.

नरेश, मांबेटी को छोड़ कर अपने ससुर के पास आ गया.

‘‘पापा, बेटी के बिना घर खालीखाली लग रहा होगा आप को.’’

‘‘बेटी का असली घर तो उस की ससुराल ही होता है बेटा, यह बात हमेशा याद रखनी चाहिए. टीना अपनी मां के लाड़प्यार के कारण थोड़ी लापरवाह है. उस की नादानियों को नजरअंदाज कर दिया करना.’’

‘‘आप चिंता न करें पापाजी, धीरेधीरे टीना मेरे परिवार के साथ घुलमिल जाएगी.’’

एक ही दिन में नरेश समझ गया कि इस घर में टीना के पापा की उपस्थिति केवल नाम लेने भर की है. घर में सारे फैसले नीता के कहे अनुसार ही होते हैं.

एक हफ्ता बीत गया. टीना का मन लखनऊ जाने का न था, वह तो नरेश के साथ सीधे मुंबई जाना चाहती थी पर नरेश से कहने का वह साहस न जुटा सकी.

बेटी को विदा करते हुए नीता ने ढेरों हिदायतें दे डालीं. नरेश साथ खड़ा सबकुछ सुन रहा था पर बोला कुछ नहीं. उसे ताज्जुब हो रहा था कि उस की सास ने एक बार भी टीना को अपने सासससुर की सेवा से संबंधित नसीहत न दी. चलते वक्त वह नरेश से बोलीं, ‘‘बेटा, टीना का खयाल रखना, मैं ने जिंदगी की अमानत तुम्हें सौंप दी है.’’

शादी के 3 हफ्तों में ही नरेश को सबकुछ समझ में आने लगा था कि मम्मी के लाड़प्यार के कारण टीना की परवरिश एक आम लड़की की तरह नहीं हुई थी. घूमनाफिरना, मौजमस्ती करना और गप्पबाजी उस के खास शौक थे. घर के किसी काम में उस की रुचि न थी. सामान्य शिष्टाचार में उस का विश्वास न था.

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छुट्टियां खत्म हुईं तो नरेश के साथ टीना भी मुंबई आ गई.

नरेश, टीना से जितना सामंजस्य बिठाता, टीना अपनी हद आगे सरका देती.

टीना की गुडमार्निंग मम्मी को फोन से होती, और फिर तो बातों में टीना यह भी भूल जाती कि उस के पति को दफ्तर जाना है, महीने का टेलीफोन का बिल हजारों में आया तो नरेश बोला, ‘‘टीना, मेरी आमदनी इतनी नहीं है कि मैं 5 हजार रुपए महीना टेलीफोन के बिल पर खर्च कर सकूं. हमें अपनी जरूरतें सीमित करनी होंगी.’’

‘‘नरेश, आप के पास रुपए की कमी है तो मैं मम्मी से मांग लेती हूं. मेरे एक फोन पर वह तुरंत रुपए आप के खाते में ट्रांसफर करवा देंगी.’’

‘‘शादी के बाद बेटी को मां पर नहीं पति पर आश्रित रहना चाहिए.’’

‘‘मैं अपनी मम्मीपापा की इकलौती संतान हूं,’’ टीना बोली, ‘‘उन का सबकुछ मेरा ही तो है. पता नहीं किस जमाने की बात कर रहे हो तुम.’’

‘‘छोटीछोटी चीजों के लिए दूसरों पर निर्भर रहना ठीक नहीं होता.’’

‘‘मम्मी, दूसरी नहीं मेरी अपनी हैं.’’

‘‘यही बातें तुम्हें मेरे लिए भी सोचनी चाहिए. मेरे मांबाप का मुझ पर कुछ हक है और हमारा उन के प्रति कुछ फर्ज भी है,’’ पहली बार अपने परिवार की पैरवी की नरेश ने.

दूसरे दिन नरेश के आफिस जाते ही टीना ने सारी बातें अपनी मम्मी को बताईं तो वह बोलीं, ‘‘ठीक किया तू ने टीना. तुम्हारी ससुराल में जरा सी भी दिलचस्पी नरेश को उन की ओर मोड़ देगी. तुम्हें अपना भला देखना है कि ससुराल का.’’

शादी के बाद पहली होली पर नरेश ने टीना से घर चलने का आग्रह किया तो वह तुनक गई.

‘‘होली का त्योहार मुझे अच्छा नहीं लगता. रंगों से मुझे एलर्जी होती है.’’

‘‘बड़ों की भावनाओं का सम्मान करना जरूरी होता है टीना, मेरी खातिर तुम लखनऊ चलो न, वहां सब तुम्हारा इंतजार कर रहे हैं.’’ नरेश दुविधा में था कि क्या करे, क्योंकि टीना ससुराल जाने के लिए तैयार न थी. तभी नरेश के दिमाग में एक आइडिया आया और वह बोला, ‘‘टीना, चलो दिल्ली चलते हैं.’’ दिल्ली का नाम सुनते ही टीना तैयार हो गई.

होली से 2 दिन पहले वे दिल्ली पहुंच गए. नीता बेटीदामाद को देख कर फू ली न समाई. बेटी को होली पर मायके देख कर टीना के पापा पहली बार बोले, ‘‘टीना, इस समय तुम्हें मायके के बजाय अपनी ससुराल में होना चाहिए था. यह तुम्हारी ससुराल की पहली होली है.’’

‘‘क्या फर्क पड़ता है? टीना यहां रहे या ससुराल में.’’

‘‘फर्क हमें नहीं हमारे समधीजी को पड़ेगा, जिन का बेटा होली के दिन अपनी ससुराल में पत्नी के साथ…’’

‘‘बसबस, रहने दो. तुम्हें कुछ पता है रिश्तेनातों के बारे में. मैं न होती तो…’’

‘‘आप दोनों हमें ले कर आपस में क्यों उलझ रहे हैं. टीना यहां रह लेगी और चूंकि मेरा यहां रुकना ठीक नहीं है इसलिए मैं लखनऊ चला जाता हूं.’’

टीना के सामने अब कोई रास्ता न था. मजबूर हो कर उसे भी नरेश के साथ लखनऊ आना पड़ा. होली पर गुलाल के रंग टीना के सुंदर चेहरे पर बहुत फब रहे थे पर खुशी का असली रंग उस के चेहरे से नदारद था.

सुधा से बहू की उदासी और उकताहट छिपी न थी. वह सबकुछ देख कर भी चुप थी. इस अवसर पर उसे कोई नसीहत देना उस के दुख को क्रोध में बदलना था. बस, एक बार सुधा ने कहा, ‘‘टीना, कितना अच्छा लगता है जब तुम और नरेश यहां होते हो.’’

सुधा की बात सुन कर टीना चुप रही. रात को नरेश ने पूछा, ‘‘टीना, तुम्हारा मन कुछ दिन ससुराल में रहने को हो तो मैं अपनी छुट्टी आगे बढ़ा लेता हूं.’’

सुधा के शब्दों की खीज वह नरेश पर उतारते हुए बोली, ‘‘3 दिन में आप का मन नहीं भरा अपने लोगों के साथ रह कर.’’

‘‘अपनापन तो मन में होता है, टीना. मुझे तो तुम से जुड़े सभी लोग अपने लगते हैं.’’

‘‘मुझे तुम्हारी फिलोसफी नहीं सुननी, और यहां रुकना मेरे बस की बात नहीं.’’

टीना का दो टूक जवाब सुन कर भी नरेश हंस दिया और बोला, ‘‘सौरी डार्लिंग, हम कल सुबह ही यहां से चल पड़ेंगे.’’

मुंबई वापस लौट कर टीना ने राहत की सांस ली और ससुराल में घटी सब बातोें की जानकारी अपनी मम्मी को दे दी.

अकसर टीना और नरेश शाम को घर से बाहर ही खाना खाते क्योंकि टीना को खाना पकाना नहीं आता था और वह सीखने का प्रयास भी नहीं करती. कभी वह जिद कर के टीना से कुछ बनाने को कहता तो गैस के चूल्हे जलने के साथ टीना का मोबाइल कान से लग जाता.

हां, मम्मी, बताओ कढ़ी बनाने के लिए सब से पहले क्या करना है? इस तरह मम्मी से पूरी रेसिपी सुन कर जितना फोन का बिल बढ़ता उस से कम पैसे में होटल से लजीज खाना मंगाया जा सकता था. सो नरेश ने फरमाइश करनी ही छोड़ दी.

इधर नरेश ने महसूस किया कि टीना उस से उलझने का कोई न कोई बहाना ढूंढ़ती रहती है. कल की ही बात है, टीना को शोरूम में एक घड़ी बहुत पसंद आई. उस ने नरेश से घड़ी लेने का आग्रह किया, ‘‘नरेश देखो, कितनी सुंदर घड़ी है.’’

‘‘टीना, तुम्हारे पास पहले ही कई घडि़या हैं. उन में से कुछ तो तुम ने आज तक पहनी भी नहीं हैं और घड़ी ले कर क्या करोगी?’’

‘‘वे घडि़यां मुझे पसंद नहीं. मुझे तो यही चाहिए,’’ टीना जिद करते हुए  बोली.

इतनी देर में नरेश काउंटर से हट कर अलग खड़ा हो गया. टीना नरेश की ओर बढ़ी तो वह दुकान से बाहर आ गया. गुस्से से भरी टीना, नरेश के साथ घर तो आ गई पर घर में घुसते ही वह फट पड़ी, ‘‘तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई, दुकान में मेरी बेइज्जती करने की.’’

‘‘मेरा ऐसा कोई इरादा न था. मैं तो बस, दुकान में उपहास का पात्र नहीं बनना चाहता था.’’

‘‘आज तक मेरी मम्मी ने कभी मेरी किसी इच्छा से इनकार नहीं किया. मैं जैसे चाहूं रहूं, खाऊंपीऊं, खरीदारी करूं या घूमू फिरूं.’’

‘‘मैं तुम्हारा दिल नहीं दुखाना चाहता था. टीना, प्लीज, मुझे माफ कर दो. मेरी जेब में उस वक्त उतने रुपए नहीं थे.’’

‘‘के्रडिट कार्ड तो था. पहली बार मैं ने तुम्हारे सामने अपनी इच्छा रखी और तुम ने मेरी बेइज्जती की.’’

‘‘मुझे माफ कर दो प्लीज.’’

‘‘तुम्हारा मेरे प्रति यही नजरिया रहा तो देख लेना मैं यहीं इसी घर में आत्महत्या कर लूंगी.’’

‘‘आत्महत्या तुम्हें नहीं मुझे करनी चाहिए जिस ने अपनी इतनी प्यारी पत्नी का दिल दुखाया. चलो, मैं अभी तुम्हारे लिए घड़ी ले आता हूं.’’

‘‘अब मुझे घड़ी नहीं चाहिए, जिस चीज के लिए एक बार ना हो जाए उसे मैं कभी हाथ नहीं लगाती,’’ कहते हुए टीना मुंह फुला कर सो गई. उस ने खाना भी नहीं खाया तो नरेश को भी भूखा सोना पड़ा.

अगले दिन नरेश के आफिस जाते ही टीना ने मम्मी को कल की पूरी घटना सुना दी. सुन कर नीता को बड़ा गुस्सा आया और वह बोलीं, ‘‘यह तो नरेश ने अच्छा नहीं किया टीना, उस की हिम्मत तो देखो कि अपनी पत्नी की छोटी सी इच्छा पूरी न कर सका.’’

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‘‘मुझे इस बात का बड़ा दुख हुआ मम्मी.’’

‘‘ऐसे मौकों पर तुम कमजोर न पड़ना. आखिर वह इतनी तनख्वाह का करता क्या है? कहीं सारे रुपए घर तो नहीं भेज देता?’’

‘‘मैं ने कभी पूछा नहीं मम्मी.’’

‘‘नरेश की हर हरकत पर नजर रखना. तुम अभी कमजोर पड़ गईं तो फिर कभी पति पर राज नहीं कर सकोगी.’’

मम्मी के कहे अनुसार टीना ने नरेश की गतिविधियों पर नजर रखनी शुरू कर दी पर ऐसा कुछ हाथ न लगा जिसे ले कर नरेश पर हावी हुआ जा सके.

-क्रमश:

 डा. के रानी

उजाले की किरण

पूर्व कथा

स्वर्णिमा अपनी देवरानी मालविका को पिकनिक पर जाने के लिए कहती है पर जब मालविका स्वर्णिमा से पिकनिक जाने के बारे में पूछती है तो वह इनकार कर देती है. मालविका के जिद करने पर वह जाने के लिए तैयार हो जाती है. वहां पर दोनों की मुलाकात मृणाल से होती है. स्वर्णिमा को सफेद साड़ी में देख कर मृणाल चौंक पड़ता है. स्वर्णिमा उस का परिचय मालविका से कराती इस से पहले ही उस का अतीत उस के सामने साकार हो उठता.

स्वर्णिमा और मृणाल एक ही कालिज में पढ़ते थे. उन की दोस्ती प्यार में बदल जाती है. कालिज की पढ़ाई पूरी करते ही मृणाल को बैंक में नौकरी मिल जाती है. एक दिन मृणाल अपनी मां के साथ शादी की बात करने स्वर्णिमा के घर पहुंचता है लेकिन स्वर्णिमा के पिताजी इस शादी से साफ इनकार कर देते हैं और उस की शादी सेठ रामनारायण के बेटे आलोक से कर देते हैं.

आलोक को शराब की बुरी आदत थी. इसी लत के कारण एक दुर्घटना में उस की मौत हो जाती है और स्वर्णिमा पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ता है. मालविका स्वर्णिमा का बहुत खयाल रखती है. उस के साथ घूमनेफिरने और खरीदारी करने जाती है. और एक दिन रास्ते में उन दोनों की मुलाकात मृणाल से होती है. अब आगे…

गतांक से आगे…

अंतिम भाग

‘‘कैसे हो, मृणाल?’’ उसे देख स्वर्णिमा ने पूछा.

‘‘मैं ठीक हूं. तुम कैसी हो?’’ जवाब देने के बाद उस ने पूछा.

‘‘कैसी हो सकती हूं मैं? ठीक ही हूं,’’  स्वर्णिमा ने उदास लहजे में कहा.

‘‘चलिए न, कहीं बैठ कर बातें की जाएं,’’ मालविका ने कहा तो तीनों एक रेस्तरां में जा कर बैठ गए.

कुछ देर इधरउधर की बातों के बाद मालविका ने पूछा, ‘‘मृणालजी, आप के घर में कौनकौन हैं?’’

‘‘बस, मैं और मेरी मां. बड़ी बहन की शादी हो गई. वह अपनी ससुराल में है और छोटी बहन नागपुर में मेडिकल कालिज में पढ़ाई कर रही है.’’

‘‘क्या अभी तक तुम ने शादी नहीं की?’’ स्वर्णिमा ने पूछा.

‘‘स्वर्णिमा, मां तो हमेशा शादी के लिए कहती रहती हैं पर मैं ही टाल जाता हूं,’’ मृणाल ने स्वर्णिमा के चेहरे की तरफ देखते हुए कहा तो उस ने पलकें झुका लीं.

माहौल गंभीर हो रहा था. यह भांप कर मालविका बोली, ‘‘दीदी, देर हो रही है…अब घर चलते हैं.’’

एक दिन मालविका को बातों ही बातों में पता चला कि स्वर्णिमा का जन्मदिन 15 तारीख को है. बस, फिर क्या था. उस ने मन ही मन प्लान बना डाला और 15 तारीख को मानमनुहार कर के स्वर्णिमा को तैयार कर एक रेस्टोरेंट में ले आई और फोन कर के मृणाल को भी वहीं बुला लिया.

‘‘मालविका, तुम्हें मृणाल को यहां नहीं बुलाना चाहिए था,’’ स्वर्णिमा बोली.

‘‘दीदी, वह आप के साथ पढ़ते थे. आप के दोस्त भी थे. आप के जन्मदिन पर उन्हें तो आना ही चाहिए,’’ मालविका बोली.

‘‘मालविकाजी, आप ने मुझे अचानक यहां क्यों बुलाया? क्या कोई जरूरी काम था?’’ मृणाल ने आते ही पूछा तो वह तपाक से बोली, ‘‘आप कैसे मित्र हैं? आप को अपनी फै्रंड का बर्थडे भी याद नहीं रहता?’’

‘‘ओह, यह बात तो सचमुच मुझे याद नहीं रही वरना पहले तो हम एकदूसरे के साथ अपनाअपना जन्मदिन मनाते थे,’’ मृणाल ने बीती यादों में खोते हुए कहा.

‘‘मृणाल, एकदूसरे का जन्मदिन क्या सिर्फ आप दोनों ही मनाते थे, कोई और नहीं आता था?’’ कुछ सोचते हुए मालविका ने पूछा.

‘‘वह क्या है कि हमें भीड़भाड़ पसंद नहीं थी इसीलिए हम किसी और को नहीं बुलाते थे,’’ स्वर्णिमा ने अचकचा कर जवाब दिया.

इस के बाद मालविका ने और कुछ नहीं पूछा. वेटर को बुला कर खाने का आर्डर दिया और तीनों खापी कर उठ गए.

‘‘दीदी, आप से एक बात पूछूं,’’ लौटते समय रास्ते में मालविका ने अपनी जेठानी स्वर्णिमा से पूछा, ‘‘मुझे अपनी छोटी बहन या सहेली समझ कर उत्तर दीजिएगा. क्या आप और मृणाल सिर्फ अच्छे दोस्त भर थे या…’’

‘‘मालविका, यह कैसा प्रश्न है?’’ स्वर्णिमा इस सवाल से अचकचा सी गई. लेकिन मालविका ने जब अपनी कसम दी तो स्वर्णिमा बोली, ‘‘मालविका, आज तक यह बात मैं ने किसी से नहीं कही पर तुम से कहती हूं. मृणाल और मैं पहले अच्छे दोस्त थे, फिर बाद में एकदूसरे को चाहने लगे थे. मृणाल व उस की मां मेरे घर मम्मीडैडी से मेरा हाथ मांगने भी आए थे पर डैडी ने रिश्ते के लिए मना कर दिया था.’’

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‘‘वह क्यों, दीदी?’’ मालविका ने प्रश्न किया.

‘‘क्योंकि डैडी उन्हें अपनी बराबरी का नहीं समझते थे. वह मेरा रिश्ता अपने बराबर की हैसियत वाले घर में ही करना चाहते थे.’’

‘‘लगता है, मृणालजी अब तक आप को भूल नहीं पाए हैं,’’ मालविका बोली, ‘‘तभी तो अपनी मां के कहने के बाद भी वह शादी नहीं कर रहे हैं.’’

‘‘जानती हो, आज जब तुम पेमेंट के लिए काउंटर पर गई थीं तो मृणालजी ने मुझ से कहा था, स्वर्णिमा, अगर तुम चाहो तो मैं तुम से शादी करने को तैयार हूं्.’’

‘‘तो आप ने क्या जवाब दिया, दीदी?’’ मालविका ने पूछा.

‘‘मैं ने उसे समझाया कि यह असंभव है और वह किसी और लड़की से विवाह कर घर बसा ले,’’ स्वर्णिमा ने बताया.

‘‘दीदी, आप ने उन की बात मान क्यों नहीं ली?’’

‘‘मालविका, मैं किसी की विधवा हूं और मैं नहीं चाहती कि यह पाप मुझ से हो,’’ स्वर्णिमा ने कहा.

‘‘दीदी, रोतेबिलखते हुए जीना अपनी इच्छाओंआकांक्षाओं की हत्या कर स्वयं पर जुल्म करना क्या पाप नहीं? दीदी, आप उन्हें समझने की कोशिश कीजिए. यों कब तक अकेले घुटघुट कर दिन काटेंगी? अभी तो आप के सामने इतना लंबा जीवन पड़ा है,’’ मालविका ने कहा.

‘‘मालविका, मेरे जीवन में जितना दुख लिखा है उतना तो मुझे भोगना ही पडे़गा न,’’ स्वर्णिमा ने कहा.

मालविका अब अकसर स्वर्णिमा व मृणाल को किसी न किसी बहाने मिलवाने लगी थी. स्वर्णिमा भी अब पहले की तरह हर समय कमरे में बंद न रहती. मालविका के साथ बातें करती. हंसती व खुश रहती. मालविका भी खुश होती कि उस के प्रयासों से एक विधवा के होंठों पर हंसी आ जाती है.

मालविका ने एक बेटे को जन्म दिया तो घर में खुशियां छा गईं. सब बच्चे के जन्मोत्सव पर बड़ा आयोजन करने की तैयारी करने लगे कि नवजात शिशु की तबीयत खराब हो गई. उसे फौरन अस्पताल ले जाया गया पर डाक्टर तमाम कोशिशों के बाद भी बच्चे को बचा न सके.

यह घटना किसी सदमे से कम न थी. मालविका विक्षिप्त सी हो उठी. बेटे को जन्म दे कर उस ने क्याक्या कल्पनाएं कर डाली थीं पर एक पल में ही सबकुछ खत्म हो गया था. नवजात बेटे की मृत्यु के गम ने उस के होंठों की मुसकान छीन ली थी. उस के दिल पर लगा जख्म भर नहीं पा रहा था.

इस घटना को महीनों गुजर गए. धीरेधीरे परिवार के लोग भी सामान्य हो गए थे. एक दिन सब के जाने के बाद मालविका अपने कमरे से निकल कर बरामदे में रखी कुरसी पर बैठ गई. नजर अनायास ही स्वर्णिमा के कमरे की तरफ चली गई.

मालविका कुछ सोचते हुए उठी और आहिस्ता से जेठानी के कमरे का दरवाजा खोला और धीरे से पुकारा, ‘‘दीदी.’’

आज महीनों बाद कानों में यह संबोधन पड़ा तो स्वर्णिमा ने चौंक कर सिर उठाया. देखा, सामने मालविका खड़ी थी.

‘‘आओ, मालविका,’’ उस ने सस्नेह कहा तो वह अंदर चली आई.

‘‘दीदी, आप सही कहती हैं… जितना दुख तकदीर में लिखा है उतना इनसान को भोगना ही पड़ता है,’’ मालविका ने कहा.

‘‘मालविका, कुछ दिनों बाद दोबारा तुम्हारी गोद में नन्हामुन्ना आ जाएगा तो तुम सब भूल जाओगी. लेकिन मेरी बहन, मेरे सामने तो आशा की कोई किरण भी नहीं है. देखो, तुम ऐसे अच्छी नहीं लगती हो. अत: अब उदासी व दुख का दामन छोड़ दो,’’ स्वर्णिमा ने देवरानी को समझाते हुए कहा.

‘मैं अब आप को और दुखी नहीं रहने दूंगी.’ मन ही मन सोचा मालविका ने फिर बोली, ‘‘दीदी, आज शाम मैं मृणालजी से मिलने जाऊंगी. मुझे उन से कुछ काम है.’’

स्वर्णिमा के बारबार पूछने पर भी मालविका ने यह नहीं बताया कि उसे मृणाल से क्या काम है. कुछ देर इधरउधर की बातें करने के बाद वह अपने कमरे में लौट आई.

दूसरे दिन मालविका सुबह ही स्वर्णिमा के कमरे में आई तो बड़ी खुश थी. चहकते हुए बोली, ‘‘दीदी, मेरा काम हो गया.’’

‘‘कौन सा काम?’’ स्वर्णिमा ने पूछा.

‘‘कल मैं मृणालजी से मिलने गई थी,’’ मालविका बोली, ‘‘मैं ने उन से सारी बातें कर ली हैं.’’

‘‘कौन सा काम, कौन सी बात?’’ स्वर्णिमा ने पूछा, ‘‘मेरी तो समझ में नहीं आ रहा है, मालविका कि तुम क्या कह रही हो.’’

‘‘दीदी, आप की शादी की बात मैं ने मृणालजी से कर ली है और वह तैयार भी हो गए हैं,’’ मालविका ने बताया तो स्वर्णिमा स्तब्ध रह गई.

‘‘नहीं, मालविका, मैं ऐसा हरगिज नहीं कर सकती,’’ स्वर्णिमा ने कहा, ‘‘मेरी आत्मा मुझे धिक्कारेगी तो मैं अपनी ही नजर में गिर जाऊंगी. फिर घर वाले मेरे बारे में क्या सोचेंगे? प्लीज, तुम ऐसा कुछ मत करना जिस से मेरा मजाक बन जाए.’’

‘‘दीदी, आप अंधेरे में रहतेरहते उस की इतनी अभ्यस्त हो गई हैं कि आप को उजाले की किरण नजर ही नहीं आती. जरा दुखों का आवरण हटा कर देखिए, खुशियां आप की प्रतीक्षा कर रही हैं. उठ कर उन्हें गले क्यों नहीं लगा लेतीं? आप घर वालों की चिंता न करें, उन्हें मैं समझा लूंगी और अपने जीवन में खुशियां लाने से कोई अपनी नजर में नहीं गिरता. आप कोई अनैतिक काम करने नहीं जा रही हैं,’’ मालविका ने जेठानी को समझाया और उस का हाथ पकड़ कर उसे उठाया. फिर लाल साड़ी पहना कर उस का शृंगार करने लगी. तैयार होने के बाद स्वर्णिमा ने जब शीशे में अपने को देखा तो शरमा गई. वह बहुत खूबसूरत लग रही थी.

देवरानीजेठानी जब दोनों कमरे से बाहर निकलीं तो उन्हें देख सब आश्चर्यचकित रह गए.

लाल साड़ी में सास ने स्वर्णिमा को देखा तो क्रोध से चीख पड़ीं.

‘‘मांजी, आप गुस्सा न हों,’’ मालविका बोली, ‘‘आज स्वर्णिमा दीदी शादी करने जा रही हैं. इन के होने वाले पति का नाम मृणाल है और हां, यदि आप लोग भी दीदी को आशीर्वाद देना चाहें तो हमारे साथ अदालत चल सकते हैं.’’

‘‘छोटी बहू, तुम मेरी दी गई छूट का नाजायज फायदा उठा रही हो. इस खानदान की इज्जत व मानमर्यादा का भी तुम ने खयाल नहीं रखा है,’’ मांजी पहली बार मालविका से इतने कड़े शब्दों में बात कर रही थीं. फिर स्वर्णिमा की ओर मुड़ कर कहने लगीं, ‘‘और इस की तो मति ही मारी गई है जो विधवा हो कर भी विवाह रचाने चली है.’’

‘‘मांजी, यह कोई गलत काम नहीं है. यदि यह किसी भी तरह से गलत होता तो कानून विधवा पुनर्विवाह की अनुमति नहीं देता,’’ मालविका ने कहा.

‘‘अच्छा, तो तुम मुझे कानून पढ़ाओगी,’’ मांजी और भड़क उठीं, ‘‘बहू, अगर तुम दोनों ने कुछ भी उलटासीधा किया तो इस घर के दरवाजे हमेशाहमेशा के लिए तुम्हारे लिए बंद हो जाएंगे.’’

‘‘मां, मालविका जो कुछ कर रही है वह ठीक है,’’ राहुल ने अपनी पत्नी की तरफदारी लेते हुए कहा, ‘‘इन्हें जाने दें. हमें किसी की खुशियां छीनने का कोई अधिकार नहीं. सभी को अपनी मरजी के मुताबिक स्वतंत्रतापूर्वक जीने का पूरा हक है. मानमर्यादा व इज्जत के नाम पर हम किसी के पैरों में बेडि़यां डाल उसे घुटघुट कर जीने के लिए मजबूर नहीं कर सकते हैं.’’

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मांजी ने आश्चर्य से बेटे की तरफ देखते हुए कहा, ‘‘राहुल, तुम भी…’’

‘‘हां मां, भाभी को दोबारा घर बसाने का पूरा अधिकार है. उन्हें रोकिए मत, जाने दीजिए. मालविका, चलो मैं भी तुम्हारे साथ चलता हूं,’’ राहुल ने कहा और आगे बढ़ गया.

मांजी ने बिलखते हुए कहा, ‘‘अब मैं लोगों को क्या मुंह दिखाऊंगी.’’

पास में खड़े राहुल के पापा ने अपनी पत्नी को समझाते हुए कहा, ‘‘देखो सुधा, जब तुम खुद बहू को आशीर्वाद दोगी तो कोई उस पर उंगली नहीं उठा सकेगा बल्कि लोग तुम्हें ही अच्छा कहेंगे.’’

राहुल, मालविका, मृणाल का एक दोस्त और उस की पत्नी की मौजूदगी में स्वर्णिमा व मृणाल विवाहसूत्र में बंध गए. सब ने उन्हें बधाई दी व उन के सुखमय जीवन की कामना की.

‘‘दीदी, मैं ने कहा था न कि उजाले की स्वर्णिम किरणें भी हैं. देखिए, आज वे आप का स्वागत करने को आतुर हैं,’’ मालविका बोली. आज उस के चेहरे पर अपूर्व संतुष्टि व खुशी थी. स्वर्णिमा को उस की खुशियां लौटा कर वह अपना गम भूल गई थी.

राहुल को भी अपनी पत्नी पर गर्व हुआ जिस ने किसी के बुझे चेहरे पर फिर से चमक ला दी थी. वे बाहर निकले तो मांजी के साथ घर के सारे सदस्य वहां खड़े थे. स्वर्णिमा के मम्मीडैडी भी आ गए थे.

‘‘बहू, मुझे क्षमा कर दो. क्रोध में मैं ने तुम्हें जाने क्याक्या कह दिया,’’ मांजी ने स्वर्णिमा से कहा तो मालविका अचरज से उन का मुंह देखने लगी.

‘‘मांजी, क्षमा मांग कर आप मुझे शर्मिंदा न करें. आप तो बस, मुझ पर अपना स्नेह बनाए रखें,’’ स्वर्णिमा सास के चरणों में झुकते हुए बोली.

स्वर्णिमा को गले लगाते हुए मांजी बोलीं, ‘‘बेटी, मेरा स्नेह व आशीर्वाद सदा तुम्हारे साथ है.’’

‘‘मृणाल, तुम ने मेरी बेटी के उजड़े जीवन में फिर से बहार ला दी है. मैं तुम्हारा यह एहसान कभी न भूल सकूंगा,’’ स्वर्णिमा के डैडी भानुप्रताप ने कहा.

‘‘डैडी, इस में एहसान की कौन सी बात है,’’ मृणाल ने दोनों हाथ जोड़ कर कहा, ‘‘आप प्लीज, ऐसी बातें न कीजिए, बस, अपना आशीर्वाद दीजिए हमें.’’

‘‘जीते रहो, बेटा, सदा सुखी रहो. ईश्वर सब को तुम्हारे जैसा ही बेटा दे,’’ भानुप्रतापजी बोले.

बेटी का घर दोबारा बसते देख स्वर्णिमा की मम्मी की आंखों में भी संतुष्टि के भाव उभर आए थे.

स्वर्णिमा ने सब से विदा ली व मृणाल के साथ चली गई, एक नए जीवन की ओर जहां उजाले की स्वर्णिम किरणें उन की प्रतीक्षा कर रही थीं वहीं खुशियां उस के आंचल में खेलने को आतुर थीं.

शुचिता श्रीवास्तव

45 की उम्र में राम कपूर ने घटाया 30kg वजन, पत्नी ने किया ये कमेंट

छोटे पर्दे के सबसे चहेते एक्टरों में से एक राम कपूर अपनी अदाकारी से अक्सर ही सबको इम्प्रैस करने में लगे रहते हैं. राम ने कई सीरियल्स और फिल्मों में काम किया है. हाल ही में राम एकता कपूर की वेब सीरीज ‘कर ले तू भी मुहब्बत’ में भी नजर आए थे. जिसमें उनके किरदार को काफी पसंद किया गया था. लेकिन इन दिनों राम कपूर अपने नए लुक की वजह से चर्चा में हैं. जी हां, 45 की उम्र में उन्होंने अपना ट्रांसफोर्मेशन कर लिया है. वो भी 30 किलो वजन घटाकर.

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वायरल हुईं फोटोज…

हाल ही में राम कपूर ने अपने औफिशियल इंस्टाग्राम अकाउंट पर अपनी कुछ फोटोज शेयर की थी जिसमें उन्हे पहचान पाना बहुत ही मुश्किल हो रहा था. इन फोटोज में राम का लुक काफी बदला नज़र आया. 45 साल के राम कपूर ने इस उम्र में गजब का ट्रान्सफोर्मेशन किया है. इन फोटोज को देखने के बाद ये कहना बिल्कुल गलत नहीं होगा की राम ने अपने आपको फैट से बदलकर बिल्कुल फिट कर लिया है.

 

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पत्नी ने की तारीफ…

इन फोटोज पर फैंस ने राम कपूर के ट्रान्सफोर्मेशन की जमकर तारीफ की और यहां तक की राम की पत्नी नें भी इन फोटोज पर ‘HOTTTTIE’ लिख कमेंट कर उनके इस लुक की सराहना की.

बता दें, राम कपूर ने ‘मेरे डैड की मारूती’, ‘एजेंट विनोद’, ‘हम्शकल्स’, ‘लवयात्री’ जैसी कई हिट फिल्मों में बहतरीन अभिनय किया है और तो और राम ने कई रिएलिटी शोज़ में भी हिस्सा लिया है जैसे कि- ‘राखी का स्वयंवर’ ‘झलक दिखला जा’ आदि.

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राम कपूर का सीरियल ‘कसम से’ में ‘जय वालिया’ का किरदार दर्शकों द्वारा बेहद पसंद किया गया था. राम ‘बड़े अच्छे लगते हैं’, ‘क्यूंकि सास भी कभी बहू थी’ जैसे कई सफल सीरियल्स में काम कर सबके फेवरेट बन चुके हैं.

एडिट बाय- करण

टीवी एक्टर करणवीर बोहरा के ये लुक्स ट्राय कर बनें सबके फेवरेट

छोटे पर्दे के सबसे चहेते एक्टरों में से एक करणवीर बोहरा अपने लुक्स से अक्सर ही सबको इम्प्रैस करने में लगे रहते हैं. ना केवल लड़कियां बल्कि लड़के भी इनके लुक्स के दीवाने हैं. करणवीर कई सीरियल्स और फिल्मों में काम कर सबके फेवरेट बन चुके हैं. हाल ही में उनहोनें ‘बिग-बौस सीज़न 12’ में पार्टीसिपेट भी किया था. करणवीर ने “कसौटी ज़िंदगी की”, “नागिन-2”, “कुबूल है” और “दिल से दी दुआ… सौभाग्यवती भवा” जैसे कई सफल सीरियल्स में काम किया है. करणवीर एक्टर होने के साथ-साथ एक बेहतरीन मौडल और फैशन डिज़ाइनर भी हैं, शायद यही कारण है कि वे अपने लुक्स को लेकर अपने फैंस के बीच काफी पौपुलर रहते हैं तो अगर आप भी करणवीर की तरह स्मार्ट और डैशिंग दिखना चाहते है तो ट्राय कर सकते हैं उनके कुछ एसे लुक्स.

ट्राय करें करणवीर बोहरा का ये कूल लुक…

करणवीर बोहरा ने अपना एक लुक फैंस के साथ शेयर किया है जिसमें वे बेहद कूल में नज़र आ रहे हैं. करणवीर ने इस फोटो में रैड कलर की फुल-स्लीव्स टी-शर्ट के साथ ब्लू कलर की जींस पहन रखी है. आप भी कूल दिखने के लिए करणवीर के इस लुक को अपनी डेली-रूटीन या कौलेज में ट्राई कर सकते हैं.

करणवीर बोहरा का पार्टी लुक…

फैमिली फंक्शन्स में सबसे अलग और डैशिंग दिखने के लिए ट्राय कर सकते है करणवीर बोहरा का ये पार्टी लुक. इस आउट-फिट में करणवीर ने एक प्रिंटेड शर्ट के साथ ब्लू कलर का थ्री-पीस सूट पहना हुआ है जिसमें वे बेहद ही डीसेंट और डैशिंग लग रहे हैं.

ट्राय करें करणवीर बोहरा का मौडल लुक…

हाई-प्रोफाइल फंक्शन्स में अगर आप भी अपने लुक्स से सबको जैलस करना चाहते हैं तो ज़रूर ट्राय करें करणवीर का ये मौडल लुक. इस लुक में करणवीर ने ब्लू शाईनिंग ईंडो-वेस्टर्न के साथ क्रीम कलर का ‘rugged’ ट्राउजर पहना हुआ है. ये कहना बिल्कुल गलत नहीं होगा की कोई भी इस आउट-फिट में किसी मौडल से कम नहीं लगेगा.

बता दें, करणवीर बोहरा ने सीरियल्स के अलावा कई फिल्मों में भी काम किया है. करणवीर ने “किस्मत कन्नैक्शन”, “मुंबई 125 की.मी.” जैसी फिल्मों में बेहतरीन किरदार निभाए हैं. करणवीर बोहरा की नई फिल्म “हमें तुमसे प्यार कितना” बड़े पर्दे पर 4 जुलाई 2019 को रिलीज़ हो चुकी है. इस फिल्म में करणवीर के साथ लीड एक्ट्रैस का रोल निभाती ‘प्रिया बनर्जी’ दिखाई देंगी.

नाश्ता मंत्री का गरीब के घर

मंत्री महोदय की भावना को जान कर सचिव ने तुरंत संवाददाता सम्मेलन बुलाया. अगले ही दिन यह समाचार सुर्खियों में आ गया कि आगामी दौरे में मंत्रीजी किसी गरीब के घर भोजन करेंगे.

मंत्रीजी का सचिव काफी समझदार जीव था. साहब के मन की बात भांप कर, उन के लिए दौरे का मौका तलाशने लगा और बहुत जल्द ही एक मौका मिल गया.

वह खुशनसीब कसबा मेरा था, जहां विद्युत एवं उद्योग मंत्री का पदार्पण तय हुआ. सेठ मुरारीलाल की नई चावल मिल का उद्घाटन जो होना था. फिर कसबे में तलाश हुई एक समझदार गरीब की और वह लाटरी खुली जयराम के हक में. तय था कि मंत्री महोदय भोजन वहीं करेंगे, हर हालत में. तभी एक बात आड़े आ गई.

सेठ मुरारीलाल का प्रबल आग्रह आया कि मंत्री महोदय का भोजन उस की कुटिया पर हो. बात खजूर में अटकने जैसी हो गई थी. दरहकीकत, सेठ मुरारीलाल हर साल पार्टी को खासा तगड़ा चंदा दिया करते थे. भला ऐसे दानवीर को निराश कैसे किया जाता.

उस विषम परिस्थिति को सुलझाया जनाब सचिव महोदय ने. फौरन एक प्रेस नोट अखबारों को भेजा गया, ‘‘चूंकि मंत्री महोदय पहली दफा किसी गरीब के यहां भोजन करेंगे अतएव आमाशय पर बुरा असर पड़ने की आशंका को देखते हुए, फिलहाल मंत्रीजी गरीब के घर सिर्फ नाश्ता करेंगे.’’

प्रेस नोट छपने के बाद कूच की तैयारी होने लगी.

मेरे कसबे का गरीब जयराम, जिस ने बैंक से ऋण ले कर हाल ही में फोटो स्टेट एवं टाइपिंग सेंटर खोला था, मंत्रीजी की मेजबानी के सपने देखते हुए हलाल होने वाले बकरे की तरह फूला न समा रहा था. उसे जो भी मिलता, जहां भी मिलता, सगर्व टोक कर कहता, ‘‘सुना आप ने? मंत्रीजी नाश्ता मेरे यहां करेंगे और भोजन, सेठ मुरारीलाल की कोठी पर.’’

इधर मंत्री का कसबे में आना तय हुआ, उधर प्रशासन में मानो भूचाल आ गया. जयराम के घरदुकान को जाने वाली हर गलीसड़क पर यातायात बढ़ गया. सरकारी जीपें, कारें, स्कूटर उस के घरदुकान के सामने आ कर रुकने लगे. सब को गरीब का स्तर ऊंचा उठाने की फिक्र जो थी और यह भय भी था कि क्या जयराम मंत्रीजी को नाश्ता दे सकेगा?

लिहाजा, प्रदेश की राजधानी से एक पर्यवेक्षक आया और पार्टी के कुछ स्थानीय कार्यकर्ताओं को संग ले कर जयराम के खंडहरनुमा मकान तक पहुंचा. कुछ सरकारी पुछल्ले भी साथ लग लिए थे.

पार्टी पर्यवेक्षक ने जयराम से दरियाफ्त की, ‘‘मंत्री महोदय को नाश्ते में क्या खिलाओगे?’’

‘‘ज…जी…जी…’’ जयराम हकला गया. दरअसल, इस मुद्दे पर उस ने अभी तक सोचा ही न था.

उसे इस कदर घबराया हुआ देख, एक पंजाबी सरकारी अफसर ने उत्साह से पूछा, ‘‘ओय, तू नाश्ते दा मीणू की बणाया ए?’’

‘‘नाश्ते का मीनू,’’ कह कर जयराम सोचविचार में पड़ गया.

जयराम को सोच में पड़ा देख कर एक और सियासती ओहदेदार उचका, ‘‘इतना क्या सोच रहे हो, यार? तुम नाश्ता नहीं किया करते…’’

‘‘साहब,’’ बीच में बात काट कर हाथ जोड़ जयराम गिड़गिड़ाया, ‘‘हमें नाश्ता कहां नसीब, साब. किसी तरह दो वक्त की रोटी का जुगाड़ बैठ जाता है, बस,’’ उस का जवाब सुन कर पार्टी कार्यकर्ता और अधिकारी एकदूसरे का मुंह ताकने लगे.

‘‘मगर मैं मंत्रीजी को दूधजलेबी का नाश्ता दे दूंगा,’’ पूरे अभिमान के साथ जयराम ने घोषणा कर दी. हालांकि वह जानता था, ऐसा नाश्ता उस के बूते का न था. उस की घोषणा सुन कर राजधानी पर्यवेक्षक ने आंखें तरेरीं, ‘‘दूधजलेबी,’’ एकएक शब्द पर जोर दे कर वह बोला.

जयराम नहीं समझा कि वह क्या गलत बोल गया लेकिन कुछेक पुछल्लों ने फौरन पर्यवेक्षक का अभिप्राय समझ लिया.

एक स्थानीय कार्यकर्ता बोला, ‘‘जयराम, तुझे शरम आनी चाहिए. अरे, क्यों हमारी नाक कटवाने पर तुला है? नहीं जानता, मंत्री लोग नाश्ता कैसा करते हैं?’’

‘‘अरे, हम जानते हैं,’’ अपना सामान्य ज्ञान व्यक्त करते एक दूसरे कार्यकर्ता ने बखान करना शुरू कर दिया, ‘‘अहा…हा…, खालिस देसी घी में तले नमकीन काजू, मिठाइयां, कचौरी, सेब, नारंगी, क्रैकजैक बिस्कुट…’’

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बीच में ही उसे अर्द्धविराम बाध्य होना पड़ा. मुंह में आई लार को घोंट पुन: गले में गटका, फिर शुरू हुआ ही था कि जयराम रोंआसा हो कर बोला, ‘‘इतनी सारी चीजें मंत्रीजी बस, नाश्ते में ही खा जाएंगे?’’

‘‘धत,’’ पर्यवेक्षक ने माथा थाम लिया हाथों में, ‘‘अरे भाई, इतनी चीजें इसलिए रखनी पड़ती हैं कि मंत्री महोदय को न जाने क्या भा जाए?’’

‘‘एक व्यक्ति के लिए मैं किसी तरह इंतजाम कर लूंगा,’’ दबी जबान में जयराम बोला.

‘‘पागल हो क्या?’’ पर्यवेक्षक बोला, ‘‘मंत्री लोग कभी अकेले नाश्ता लिया करते हैं? अरे, पार्टी के कार्यकर्ता, मंत्री के सचिव, सरकारी अधिकारी, कारजीपों के ड्राइवर, पत्रकार और छायाकार ये सब अपने घरों से नाश्ता बांध कर लाएंगे क्या?’’

‘‘तकरीबन, 50-60 लोग हो ही जाएंगे,’’ एक अधिकारी अनुमान लगा कर बोला. वह पहले सांख्यिकी विभाग में था, ‘‘ऐसे वक्त पर कुछ गैरजरूरी लोग भी तो हाथ मार जाते हैं.’’

‘‘इंतजाम 100 आदमियों का रखना पड़ेगा,’’ एक चमचा खड़क उठा.

‘‘नहीं, साहब,’’ जयराम एकाएक पटरी से उतर गया, ‘‘इतने से तो मेरी बहन की शादी हो जाएगी.’’

सब के चेहरे उतर गए. बकरा हलाल हुए बगैर निकल भागने की कोशिश में था. तुरंत ही पकड़ मजबूत की गई.

अब एक गुंडा किस्म का कार्यकर्ता गुर्राया, ‘‘कोई बहाना नहीं चलेगा बे. पहले पूरे कसबे में कहता डोल रहा था, मंत्रीजी नाश्ता मेरे यहां करेंगे, अब मुकर कर ज्यादा होशियार बनना चाहता है?’’

‘‘नहीं, फजलू दादा, ऐसी बात नहीं है. मेरे घर में बहुत तंगहाली है. पिताजी ने तो बरसों से खाट पकड़ रखी है. मैं ने बीच में पढ़ाई छोड़ कर टाइपिंग सेंटर इसीलिए खोला है. धंधा अभी जमा नहीं. आधी कमाई दुकान का किराया और बैंक की किस्त चुकाने में चली जाती है. किसी तरह 10 जनों का पेट भर रहा हूं.’’

फजलू उसे लाल आंखों से घूरता रहा. नजर नीची कर फंसे गले से जयराम फिर बोला, ‘‘मंत्रीजी को नाश्ता कराने से मुझे क्या फायदा होगा? क्या बैंक ऋण माफ हो जाएगा? उलटे ज्यादा कर्ज में फंस जाऊंगा मैं.’’

‘‘जयराम बेटे, पैसा हाथ का मैल है,’’ रुद्राक्षधारी एक बुजुर्ग नेता ने उस के कंधे को थपथपाया, ‘‘यहां सवाल मान का है, प्रतिष्ठा का है. द्वापर में सुदामा श्रीकृष्ण के घर गए थे और कलयुग में तो स्वयं कृष्ण पधार रहे हैं सुदामा के घर. अरे, तुम्हें जो शोहरत और प्रतिष्ठा मिलेगी वह कम बात है क्या? तुम पढ़ेलिखे हो, सोचो, थोड़ा गहराई से सोचो.’’

जयराम बेबस हो गया. उस प्रभावशाली व्यक्तित्व और वक्तव्य के आगे उस की गति सांपछछूंदर की सी हो गई. उस का युवा अंतर्मन कहीं से पिघल कर आंखों में उतर कर बहने का यत्न करने लगा लेकिन उसे जज्ब कर गया वह.

तभी विद्युत विभाग के सहायक अभियंता ने नम्रतापूर्वक कहा, ‘‘जयराम, कितना अजीब है यह, विद्युत मंत्री घर पधारें और यहां बिजली नहीं. फिटिंग फटाफट करवा लो, मैं तुरंत बिजली देने का आदेश कर देता हूं.’’

और 3 दिन बीत गए. क्या न हुआ उन 3 दिनों में. जयराम के घर का कायापलट हो गया. सबकुछ खुदबखुद वैसे हो रहा था जैसे ‘जयसंतोषी मां’ फिल्म में होता है. जयराम महज मूकदर्शक था.

सर्वप्रथम, मकान की मरम्मत करने कारीगर आए और टूटफूट सुधार गए. फिर आया बिजली फिटिंग वाला मिस्त्री, तत्पश्चात पुताई करने वाले मजदूर आए और इमारत को चमका गए. शाम तक बिजली लग गई. उस के घर के सामने वाले मैदान को साफ कर दिया गया. गड्ढे पाट दिए गए. मैदान में सुनहरी बालू सब जगह बिखेर दी गई. यह नगर पालिका की मेहरबानी थी.

तीसरे दिन सुबह ही टैंट हाउस वाले खुदबखुद चले आए. मैदान में कनातें, चांदनी, मेजकुरसियां लगा दी गईं. कोई मनचला कहीं से माइक और रेकार्डप्लेयर लाया और उस पर बजने लगा, ‘आज मेरे यार की शादी है…’

नाश्ते का पूरा सामान, वैवाहिक भोज की व्यवस्था करने वाला एक दलाल ले आया. इस तरह जयराम को कतई भागदौड़ नहीं करनी पड़ी.

यह सब हो रहा था स्थानीय नेताओं के आदेश पर, जो नहीं चाहते थे कि मंत्रीजी के स्वागत में कोई खामी रहे. यह सही था, खद्दरधारी नेताओं ने जयराम को बागी न होने दिया क्योंकि वे तो बागियों को आत्मसमर्पण करवाने में माहिर थे. फिर जयराम से उन्हें खटका भी पूरा था. अब वे निश्चिंत थे.

बहरहाल, निश्चित समय से कुछ ही घंटों बाद मंत्री महोदय पूरे लवाजमे सहित पधारे. हालांकि वक्त भोजन का हो गया था किंतु इस महत्त्वपूर्ण कार्यक्रम को संपन्न करना अत्यावश्यक समझा गया.

मंत्रीजी और अन्य लोग कुरसियों पर बैठ गए. जिन्हें जगह न मिली वे खड़े रहे. परोसने वाले, बरसातकीट- पतंगों की तरह  प्रकट हो गए. दनादन सामग्री परोसी जाने लगी. धड़ाधड़ प्लेटें साफ होने लगीं. बहुतों ने बहती गंगा में हाथ धो लिए.

मंत्रीजी की प्लेट पूरी भरी थी. उन के हाथ में अधखाया नमकीन काजू का टुकड़ा था. उन्हें लोगों की बात सुनने और मुसकराने से कुछ फुरसत मिलती तो खा पाते. फोटोग्राफर उस मुद्रा को कैमरे में कैद करने में मशगूल थे. जो लोग मंत्री महोदय के नजदीकी थे उन्होंने मंत्रीजी की प्लेट भी साफ कर दी.

ऊंची नजर किए हुए ही मंत्री महोदय ने प्लेट में हाथ मारा और खाली महसूस कर चौंकते हुए नीचे देखा. बेवजह मुसकराए और तपाक से खड़े हो गए.

उस भीड़ में जयराम नजर न आ रहा था. उस का वजूद मंत्रीजी के सामने अति नगण्य था और थी किसे फुरसत जो जयराम को याद रखे. पूरा माहौल मंत्रीमय था. मंत्रीजी कार में बैठे. कारें, जीपें, स्कूटर वगैरह घरघरा कर चालू हुए और काफिला उड़ चला. जो पैरों पर सवार थे वे पैदल ही दौड़ लिए. सेठ मुरारीलाल की कोठी बगल में ही थी.

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दुलहन सरीखी कोठी से बाहर आ कर सेठजी ने मंत्री महोदय को माल्यार्पण किया. छायाकारों ने वह चित्र खींचने के लिए दनादन फ्लैश चमकाए. भोजन के दौरान सेठ मुरारीलाल ने एक ऐसा लाइसेंस स्वीकृत करा लिया जिसे हासिल करने के लिए उद्योगपतियों में तगड़ी होड़ लगी थी. तत्पश्चात मिल का भव्य उद्घाटन हुआ, जिस में मंत्री महोदय ने मिल उद्योग के लिए एकाध रियायतों की घोषणा की.

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उधर एकदम अकेला जयराम, कारवां गुजर जाने के बाद गुबार को देख रहा था. सीधीउलटी कुरसियां, साबुत- टूटी प्लेटें, गिलास और हाथ धोने के पानी से फिर पैदा हुआ कीचड़.

दूसरे दिन समाचारपत्रों की सुर्खियां इस तरह थीं : ‘मंत्री महोदय का अनूठा कदम, गरीब के घर नाश्ता’ समाचार खासा लंबा था, किंतु जयराम का कहीं उल्लेख नहीं था. सेठ मुरारीलाल की मिल का उद्घाटन करते हुए मंत्री महोदय द्वारा कुछेक रियायतों की घोषणा. यह समाचार सचित्र था, जिस में मंत्रीजी का स्वागत सेठजी कर रहे थे.

उसी रोज जयराम के घरदुकान पर हर घंटे कोई न कोई आता रहा. सभी भुगतान का तकाजा ले कर आए थे. मकान मरम्मत करने वाले कारीगर, बिजली फिटिंग का कार्य करने वाला मिस्त्री, पुताई मजदूर, टैंट हाउस वाला, नाश्ते की सामग्री की व्यवस्था करने वाला दलाल वगैरह.

तभी एक झलकी और दिखी. बिजली विभाग का लाइनमैन खंभे पर चढ़ा और खटाक से जयराम के घर का विद्युत संपर्क काट दिया गया. आखिरकार वह संपर्क अस्थायी ही तो था. उसी के बाजू में सेठ मुरारीलाल की नई चावल मिल धड़धड़ करती चल पड़ी थी.

प्रभाशंकर उपाध्याय ‘प्रभा’     

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