ब्रायलर की उन्नत नस्लों से अच्छा मुनाफा

लेखक-भानु प्रकाश राणा

इस प्रजाति के मुरगे (चूजे) व मुरगी अंडे से निकलने के बाद तकरीबन 40 ग्राम वजन के होते हैं जिन की सही प्रकार से देखरेख की जाए और उन्हें सही समय पर दानापानी दिया जाए तो वे 6 हफ्ते में तकरीबन 1.5 से 2 किलोग्राम वजन तक के हो जाते हैं.

ब्रायलरपालन करने से पहले इस के बारे में तकनीकी जानकारी जरूर ले लें और ब्रायलर की सही प्रजाति का चयन करें.

सीएआरआई द्वारा विकसित की गई ब्रायलर प्रजातियां

कैरी विशाल (सफेद ब्रायलर) : यह सफेद रंग की एक ऐसी ब्रायलर मुरगी प्रजाति है जो मांस गुणवत्ता के?क्षेत्र में अच्छी नस्ल साबित हो रही है.

इसे उष्णकटिबंधीय जलवायु के मुताबिक अच्छी खूबियों के साथसाथ रंगीन नस्ल वाली मुरगी के रूप में भी विकसित किया गया है. यह नस्ल भारतीय जलवायु और प्रबंधन स्थितियों के अनुरूप है और बेहतर बढ़ोतरी दर और रोग प्रतिरोधक क्षमता वाली नस्ल है.

उत्पादन की खासीयतें

* एक दिन के चूजे का वजन 43 ग्राम.

* 6 हफ्ते पर शरीर का?वजन 1650 से 1700 ग्राम तक.

* 7 हफ्ते पर शरीर का वजन 2100 से 2150 ग्राम तक.

कैरी धनराज (रंगीन ब्रायलर) : चमकदार, रंगीन एकल कलगी कैरी धनराज की खूबी है. अधिक वजनदार, अच्छी शारीरिक बनावट और उम्दा आहार इस की खास विशेषताएं?हैं. इस का मांस स्वादिष्ठ और अच्छी गुणवत्ता वाला है. अनेक रंगों में होने के कारण इन पक्षियों की मांग बाजार में बहुत ज्यादा है. इस से मुनाफा भी अच्छा मिलता है.

उत्पादन की खासीयतें

* एक दिन के चूजे का वजन 46 ग्राम.

* 6 हफ्ते पर शरीर का वजन

1500 से 1700 ग्राम.

* 7 हफ्ते पर शरीर का वजन

2000 से 2125 ग्राम.

इन नस्लों की अधिक जानकारी के लिए आप भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, केंद्रीय पक्षी अनुसंधान संस्थान, इज्जतनगर, उत्तर प्रदेश के इन फोन नंबरों 91-581-2300204, 2301220, 2303223 पर संपर्क कर सकते हैं.

गन्ना रस का कारोबार किसानों को मिले फायदा

लेखक- बृहस्पति कुमार पांडेय

गन्ने के रस को बेच कर इस कारोबार को करने वाले अच्छाखासा मुनाफा कमा रहे हैं. गन्ने के रस का कारोबार गरमियों में काफी मुनाफा देने वाला होता है क्योंकि गरमी से बेहाल व्यक्ति गन्ने के रस से न केवल अपनी प्यास बुझाना चाहता है, बल्कि यह सेहत के लिहाज से भी काफी अच्छा होता है.

ऐसे करें शुरुआत

अगर आप गन्ना किसान हैं और चीनी मिलों द्वारा भुगतान न किए जाने से परेशान हैं तो गन्ने के रस का कारोबार आप के लिए फायदेमंद साबित होगा. साथ ही, चीनी मिलों की अपेक्षा आप को ज्यादा मुनाफा भी मिलेगा.

अगर आप के पास खेती की जमीन नहीं?है या आप गन्ने की खेती नहीं करते हैं तब भी इस कारोबार को अपना सकते?हैं. इस के लिए या तो आप किराए की जमीन ले कर गन्ने की खेती कर सकते हैं या गन्ना किसानों से सीधे गन्ना खरीद कर गन्ने के रस का कामधंधा शुरू कर सकते हैं.

गन्ने के रस का काम शुरू करने के लिए जिन चीजों की जरूरत होती है, उन में छोटा इंजन, गन्ना पेराई के लिए छोटी गन्ना पेराई मशीन, कुछ बरतन, चाकू सहित अन्य छोटेमोटे सामान शामिल हैं.

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बस्ती जिले के गांव सबदेईया कला के बाशिंदे सुक्खू ने बताया कि गन्ने रस का कारोबार शुरू करने के लिए 50,000 रुपए से ले कर 1 लाख रुपए तक में सभी जरूरी चीजें आ जाती?हैं. लखनऊ और बाराबंकी जैसे शहरों में जुगाड़ वाहन सहित पूरी तरह से तैयार गन्ने का रस तैयार करने वाली मशीनें मिलती हैं.

 इसे हम दूसरे वाहनों की तरह चला

कर एक जगह से दूसरी जगह तक न केवल आसानी से ले जा सकते हैं, बल्कि मशीन को भी बारबार फिट करने की परेशानी से नजात मिल जाती है. गन्ने से रस निकालने वाली ये मशीनें औनलाइन भी खरीदी जा सकती हैं.

सुक्खू ने आगे बताया कि गन्ने की मशीन के अलावा जिन चीजों की हमें रोज जरूरत होती है, उन में गन्ने के रस की मांग के मुताबिक गन्ना, काला नमक, नीबू, पुदीना, बर्फ के?टुकड़े, कांच, प्लास्टिक व कागज के गिलास शामिल हैं.

गन्ने के रस को मशीन से निकालते समय नीबू और पुदीना की पेराई भी कर ली जाती है, जिस से रस का स्वाद बढ़ जाता है.

क्वालिटी का रखेंगे खयाल तो हो सकते हैं मालामाल

खानेपीने की किसी भी चीज की साफसफाई व बेहतर क्वालिटी न केवल मांग बढ़ाती है, बल्कि ग्राहक अच्छी कीमत देने से भी नहीं हिचकता है इसलिए गन्ने का रस निकालते समय उस की क्वालिटी का खयाल जरूर रखें.

इस के लिए सब से पहले गन्ने से शुरुआत करनी होगी, जब आप खेत से गन्ने की कटाई कर लें तो गन्ने के?ऊपरी हिस्से को खूब अच्छी तरह से छील दें और साफ पानी में अच्छी तरह से धो लें.

यह भी कोशिश करें कि गन्ना खेत से ताजा काटा गया हो या जितनी मात्रा में गन्ने की जरूरत हो उतनी ही गन्ने की कटाई करें, क्योंकि कई दिनों के कटे गए गन्ने का?स्वाद खराब होने लगता है.

जहां पर आप अपने गन्ने की दुकान या ठेला लगाते हैं, वहां की साफसफाई का भी खयाल रखें. गन्ने की पेराई के दौरान मीठे की वजह से अकसर मक्खियां जमा होने लगती हैं ऐसे में इन की रोकथाम के लिए धूपबत्ती वगैरह का धुआं भी कर सकते हैं.

जब आप गन्ने का रस निकाल रहे हों तो आप अपने हाथों को साफसुथरा रखें. अगर हो सके तो प्लास्टिक की पन्नी के दस्ताने पहन लें. आप जिन गिलासों का इस्तेमाल कर रहे हैं, उन्हें हमेशा साफ रखें, क्योंकि गंदगी देख कर ग्राहक दूर?भागने लगते हैं.

गन्ने के रस को पैक करने की सामग्री भी हमेशा अपनी ठेली में साथ रखें. आप की यह सावधानी ग्राहकों को आप की दुकान की ओर आकर्षित करने में बेहद मददगार साबित हो सकती है जिस से आप को रोज का मुनाफा भी ज्यादा हो सकता है. आप के गन्ने की रस की क्वालिटी आप के नियमित ग्राहकों की तादाद में इजाफा करने के लिए काफी है.

चीनी मिलों के बंद होने पर किसानों को मिला सहारा

वैसे भी लोगों की जिंदगी में मिठास घोलने वाले देश में कई हिस्सों के गन्ना किसानों की हालत किसी से छिपी नहीं है. किसान चीनी मिलों को अपना गन्ना बेच कर खुद के फसल के?भुगतान के लिए धरनाप्रदर्शन कर रहे हैं, पुलिस की लाठियां खा रहे हैं और सरकार किसानों की सुनने के बजाय मिल मालिकों को संरक्षण देने में लगी है. ऐसे में किसान या तो गन्ने की खेती छोड़ दूसरी फसलों की तरफ मुड़ रहे हैं या गन्ने से जुड़े व्यवसाय का दूसरा विकल्प खोज रहे हैं.

चूंकि गन्ने की फसल नकदी फसलों में गिनी जाती?है, ऐसे में जो किसान गन्ने की फसल लेते रहे हैं, उन्हीं में से कुछ किसानों ने चीनी मीलों के ऊपर निर्भरता को कम कर खुद का काम शुरू करने की ठानी है, जो बेहद कामयाब रहे हैं.

उत्तर प्रदेश का बस्ती जिला गन्ने की खेती का मुख्य केंद्र है. यहां पर कुल 5 चीनी मिलें थीं, जिस में से एकएक कर 3 मिलें बंद होती गईं. इस से यहां के किसानों के बेचे गए गन्ने का?भुगतान भी फंस गया.

ऐसे में कई किसानों ने तो गन्ने की खेती से तोबा कर ली. लेकिन कुछ किसान ऐसे भी थे, जिन्होंने हार नहीं मानी और न ही गन्ने की खेती से मुंह मोड़ा बल्कि इन किसानों ने बोए गए गन्ने से खुद के व्यवसाय शुरू किए जाने का निर्णय लिया और हाटबाजारों के साथ मुख्य रास्तों पर गन्ने के रस की ठेली लगाना शुरू किया. इस का नतीजा यह रहा कि इन किसानों को चीनी मिलों की अपेक्षा तिगुनाचौगुना ज्यादा मुनाफा मिलने लगा.

ऐसे ही किसानों में शुमार बस्ती जिले के बाशिंदे गणेश बाहर रह कर नौकरी करते थे. लेकिन चीनी मिलों के बंद होने पर उन के परिवार में गन्ने की फसल नष्ट किए जाने की नौबत आ गई. ऐसे में वे बाहर से अपने गांव पापस आ गए और उन्होंने मजदूरी से बचाए गए पैसे से गन्ने का रस निकालने वाली एक ठेली और मशीन खरीदी. यह ठेली उन्हें लखनऊ से मिली जो जुगाड़ वाहन पर सैट थी. इसे एक जगह से दूसरी जगह ले जाना भी आसान हो गया.

गणेश ने पहली बार बस्तीगोरखपुर राष्ट्रीय राजमार्ग के किनारे पेड़ों के नीचे अपनी ठेली लगानी शुरू की. देखते ही देखते दुकान चल निकली और उन्हें एक दिन में 1,500 से 2,000 रुपए की आमदनी होने लगी.

गणेश पिछले 3 सालों से?ठेली लगा रहे हैं. अब उन की 4 दुकानें एक ही जगह पर लगती हैं जिस में उन के परिवार के बाकी सदस्यों के साथ ही दूसरे लोगों को भी रोजगार मिला है.

गांव सबदेईया कला के सुक्खू अपने बेटे भीम के साथ मिल कर गन्ना रस का कारोबार कर रहे हैं. उन्होंने बताया कि वे?ठेली पर गन्ना पेरने की मशीन को छोटे इंजन के साथ फिट करा कर यह काम कर रहे?हैं. इस पर तकरीबन 50,000 रुपए का खर्चा आया था. एक दिन में वे बड़ी आसानी से 1,000 रुपए तक मुनाफा कमा लेते हैं.

बस्ती जिले के महसिन गांव के बृजभूषण मौर्या ने बताया कि वह पिछले 2 सालों से गन्ने के रस की ठेली लगा रहे हैं. मशीनें उन्होंने लखनऊ से खरीदी थीं जो उन्हें जुगाड़ वाहन पर सैट कर के मिली थीं.

सुक्खू ने बताया कि वे खुद खेतों के अलावा किराए पर भी खेत ले कर गन्ने की खेती करते हैं जिस से उन्हें हर समय ताजा गन्ना मिलता?है. साथ ही, लागत में भी कमी आ जाती?है.

कई लोग गन्ने का रस कोल्ड ड्रिंक की अपेक्षा ज्यादा पसंद करने लगे हैं. लेकिन साल के कुछ ही महीने यानी सर्दियों में इस?व्यवसाय को बंद रखना पड़ता है. इस दौरान वे अपने गन्ने के खेत की देखभाल करते हैं, जिस से उत्पादन अच्छा मिले.

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बस्ती जिले के दसैती गांव के राम अधीन पिछले 4 साल से गन्ने के रस का कारोबार कर रहे?हैं. जब चीनी मिलों ने किसानों से मुंह मोड़ लिया, ऐसे में उन्होंने गन्ने की खेती छोड़ने

के बजाय गन्ने के रस की?ठेली लगाना शुरू कर दिया. उन्होंने तब 80,000 रुपए से इस?व्यवसाय को शुरू किया था.

राम अधीन ने बताया कि आप जब भी गन्ने के रस का व्यवसाय शुरू करें, तो इस के लिए सब से पहले ऐसी जगह को चुनें जहां ज्यादा भीड़ होती हो या जिन रास्तों से लोगों का आनाजाना ज्यादा होता हो. आप इस के लिए स्कूल, कालेज, सरकारी दफ्तरों के नजदीक भी अपनी दुकान लगा सकते हैं क्योंकि ऐसी जगहों पर आप को ग्राहक अच्छी तादाद में मिल जाते हैं.

गन्ने के रस के व्यवसाय का ही कमाल था कि किसानों के परिवारों के जो नौजवान खेती से मुंह मोड़ कर रोजगार की तलाश में दूसरे शहरों में जा चुके थे, वही नौजवान वर्तमान में अपने परिवार के साथ गन्ने की खेती के साथसाथ गन्ने के रस के?व्यवसाय में हाथ बंटा रहे?हैं. इन में भीम, बृजभूषण मौर्या, गणेश कोल्हुआ, चंद्रेश जैसे तमाम नाम शामिल हैं.

रोजगार देने में मददगार

अगर आप गन्ने के रस का व्यवसाय करते हैं तो इस से आप को ही नहीं, बल्कि दूसरे लोगों के लिए भी रोजगार का रास्ता खोल सकता है क्योंकि गन्ने की कटाई, सफाई के साथ ही अगर आप ठेली या दुकान लगाते?हैं तो वहां भी आप को किसी मददगार की जरूरत पड़ती है.

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ये लोग आप के परिवार के लोग भी हो सकते हैं या गांव के बेरोजगार या अन्य कोई. अगर आप के पास गन्ने के रस का?व्यवसाय शुरू करने के लिए शुरुआती पूंजी नहीं है तो आप किराए पर भी ठेली ले सकते?हैं. ऐसे तमाम लोग?हैं जो गन्ने का रस निकालने वाली मशीनों को किराए पर उठाते?हैं. इन मशीनों का आप को हर रोज का बंधा किराया देना होता है.

ट्रेंड में हैं लड़कों की ये कलरफुल शर्ट्स

टीवी के जानेमाने एक्टर रवि दुबे अपनी इंटेंस एक्टिंग से सभी के पसंदीदा है. आए दिन सोशल मीडिया पर अपनी फोटोज शेयर करने वाले रवि की फैन फौलोविंग काफी है. ना सिर्फ लड़कियां बल्की लड़के भी उनको काफी फौलो करते है. रवि एक्टिंग, डांसिंग और फिटनेस के कारण तो फैंस का दिल जीतते ही है पर उनकी एक क्वालिटी ऐसी है जो उनके बाकी एक्टर्स से अलग करती है  और वो है दोस्ती. जी हां रवि, करन वाही और रित्विक धनजानी की दोस्ती को फैंस खासा पसंद करते है, इस दोस्ती की एक झलक हम रोहित शेट्टी के शो खतरों के खिलाड़ी में देख चुके है. उनकी पत्नी सरगुन मेहता भी उनकी इस क्वालिटी पर फिदा है. रवि काफी स्टाइलिंश भी है जिसके चलते वो जब भी अपनी फोटोज शेयर करते है तो फैंस फोटोज पर लाइक्स और कमेंट्स की बारिश कर देते है. चलिए देखने है रवि दुबे के कुछ खास स्टाइलिश लुक्स को…

ट्राय करें कलरफुल शर्ट्स

अगर आप भी कलर्स को काफी पसंद करते है तो रवि के इस लुक को जरुर ट्राय करें. रवि की इस रेडिश पीच कलर शर्ट और वाइट पेंट काफी अच्छी लग रही है. इस शर्ट का प्रिंट ऐसा है की इसको आप किसी भी वेकेशन ट्रिप पर ट्राय कर सकते है साथ में रेड शूज इस पुरे लुक को एक अलग ही कौम्प्लिमेंट दे रहा है.

वाइट पेंट के साथ ट्राय करें कलरफुल शर्ट्स

रवि के इस लुक की बात करें तो वाइट पेंट के साथ कलरफुल शर्ट काफी अच्छी लग रही है. वाइट बर्नआउट पेंट के साथ आप अगर कलरफुल शर्ट ट्राय करते है तो वो काफी एट्रेक्टिव लगती है.

कलरफुल जैकेट भी है ट्रेंड में

अगर आपको जैकेट का शौक है और आप कुछ अलग ट्राय करना चाहते है तो रवि का ये लुक परफेक्ट है. रेड कलर की इस जैकेट में वो किसी रोबिन हुड से कम नहीं लग रहे है.

 

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Styled by @anusoru Hair @arun5779 Make up @shyamyadav12366

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पठानी के साथ ट्राय करें फ्लावरी कोटी

अगर आप कुछ इंडियन लुक ट्राय करना चाहते है और उसमे कुछ अलग ट्राय करना चाहते है तो रवि का ये लुक परफेक्ट है. इस लुक में पूरा ध्यान इस कोटी ने खीच लिए है. येलो कुर्ते के साथ पीच कलर की कोटी काफी अच्छी लग रही है इस लुक को आप किसी भी फंक्शन पर ट्राय कर सकते है. ये कोम्बिनेशन किसी भी शेड कलर के लिए परफेक्ट है.

अंधविश्वास से अपराध : वह डायन नहीं थी

अफवाहें बेलगाम होती हैं. उन की कोई सरहद नहीं होती. लेकिन ये जब हदों को लांघ जाती हैं, तो लोगों और समाज के लिए बहुत बड़ा खतरा बन जाती हैं. ऐसी ही अफवाह ने एक 65 साला गरीब दलित औरत की जान ले ली.

दरअसल, उत्तर प्रदेश के आगरा जिले के मुटनई गांव की रहने वाली दलित मान जाटव के लिए 2 अगस्त, 2017 जिंदगी की आखिरी तारीख बन गई. मान जाटव तड़के शौच के लिए खेतों में गई थीं. उन्हें कम दिखाई देता था. अंधेरे की वजह से वे रास्ता भटक कर बघेल समाज की बस्ती में निहाल सिंह के घर के बाहर पहुंच गईं.

इसी बीच एक लड़की ने उन्हें देख कर शोर मचा दिया, जिस के बाद लोग जाग गए और पहली ही नजर में मान जाटव को चोटी काटने वाली ‘डायन’ करार दे दिया गया.

इस के बाद मान जाटव के साथ रूह कंपा देने वाली हैवानियत हुई. निहाल सिंह के बेटे मनीष व सोनू समेत दूसरे लोगों ने उन्हें लाठीडंडों से पीटना शुरू कर दिया. वे चिल्ला रहे थे कि चोटी काटने वाली ‘डायन’ पकड़ी गई है, जबकि मान जाटव बचने की हरमुमकिन कोशिश कर रही थीं और उन्हें बता रही थीं कि वे ‘डायन’ नहीं हैं, बल्कि उन्हीं के गांव की हैं.

गुस्से के गुबार में मान जाटव की कोई भी सुनने को तैयार नहीं था. अंधविश्वास के चश्मे ने लोगों को एक बेकुसूर औरत को बेरहमी से पीटने वाला मर्द बना दिया था.

पीटने वाले लोग अंधविश्वास में बुरी तरह अंधे थे. इस का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वे मान जाटव को यह कह कर पीपल के पेड़ के पास ले गए कि वहां पीटने से पीपल पर रहने वाले भूतप्रेत भी कभी किसी को परेशान नहीं करेंगे.

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उन्होंने मान जाटव को अधमरा कर के उन्हें दूसरी जगह ले जा कर पटक दिया. शोरशराबा होने पर मान जाटव के परिवार वालों को पता चला, तो वे वहां पहुंचे और उन्हें अस्पताल ले गए, लेकिन चोटें इतनी गंभीर थीं कि उन की मौत हो गई.

अंधविश्वास की इस भेंट से गांव में तनाव पैदा हो गया. पुलिस पहुंची, तो आरोपी अपने घरों से फरार हो गए.

जांच में पता चला कि इलाके में औरतों व लड़कियों की चोटी काटने वाले कथित साए की अफवाह व दहशत थी. आरोपी परिवार की एक औरत की चोटी एक दिन पहले कट गई थी. इसी से उन्हें लगा कि ‘डायन’ चोटी काटने आई है.

अंधविश्वास ने मान जाटव को हमेशाहमेशा के लिए उन के परिवार से दूर कर दिया. उन का बेटा गुलाब कहता है, ‘पीटने वालों ने यह भी नहीं सोचा कि मेरी मां बुजुर्ग हैं. ऐसे तो कोई भी किसी को ‘डायन’ बता कर मार डालेगा.’

वैसे, इस बात में कोई दोराय नहीं है कि अगर मान जाटव का ताल्लुक किसी दबंग परिवार या ऊंची जाति से होता, तो शायद ही उन पर हमला होता. जब सामने वाले से ईंट का जवाब पत्थर से मिलने का डर हो, तो सारा गुरूर हवा हो जाता है.

यह वारदात कानून व्यवस्था पर भी सवाल खड़ा कर गई. अगर कानून का डर होता, तो शायद ऐसा करने से लोग डरते.

एसएसपी दिनेश चंद्र दुबे कहते हैं, ‘घटना के कुसूरवार बख्शे नहीं जाएंगे. लोगों को समझना चाहिए कि चुड़ैल, डायन या भूतप्रेत जैसा कुछ नहीं होता है. अफवाह फैलाने वालों की सूचना पुलिस को देनी चाहिए.’

दरअसल, ‘चोटीकटवा’ की यह अफवाह नए किरदार के रूप में आई. इस से पहले साल 2001 में ‘मंकी मैन’ ने भी खूब दहशत फैलाई थी. इस के बाद ‘मुंहनोचवा’ आ गया था. कभी ‘काली बिल्ली’, कभी ‘बच्चा चोर’, तो कभी लोगों के घरों में आग लगने के किस्से सुने जाते रहे थे.

हैरानी की बात यह है कि किसी का भी कभी ठोस नतीजा सामने नहीं आया. समय के साथ ऐसी घटनाएं और किस्से थम जाते हैं. ऐसी अफवाहों को वैज्ञानिक अंधविश्वास और मनोचिकित्सक ‘आईडैंटिटी डिसऔर्डर’ नामक बीमारी का नाम देते हैं.

अफवाहें और अंधविश्वास जिस तेजी से अपना काम करते हैं, वे कानून व्यवस्था के लिए खतरा बन जाते हैं. इस के चक्कर में कभी किसी बेकुसूर को पीटा जाता है, तो कभी किसी की हत्या कर दी जाती है.

मान जाटव भी इसी का शिकार हुईं. ऐसी अफवाहों से जादूटोना व तंत्रमंत्र करने वालों की दुकानें जरूर चालू हो जाती हैं, क्योंकि समाज में ऐसे लोगों की कमी नहीं है, जो अंधविश्वास का शिकार हो कर हर मर्ज का इलाज ऐसी जगहों पर खोजते हैं. अंधविश्वास का फायदा उठा कर उन्हें जम कर लूटा

जाता है.

डायन या चुड़ैल जैसी कोई चीज दुनिया में नहीं होती, लेकिन ज्यादातर मामलों में अपढ़ व दलित औरतें ही इस का शिकार होती हैं.

नैशनल क्राइम रिकौर्ड ब्यूरो के ताजा आंकड़ों के मुताबिक, देश के झारखंड, छत्तीसगढ़, हरियाणा, कर्नाटक, असम, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, बिहार, मध्य प्रदेश, ओडिशा जैसे राज्यों में यह बुराई फैली हुई है.

साल 2000 से साल 2012 के बीच ही जादूटोना करने के आरोप में देशभर में 2 हजार से ज्यादा लोगों की हत्याएं हुईं. इन में ज्यादातर औरतें ही थीं. बांझ, कुंआरी या विधवा औरतों को शिकार बनाना आसान होता है. ऊंची जाति वाले व दबंग लोग गरीब व आदिवासियों को डायन के रूप में बदनाम कर देते हैं.

संपत्ति का अधिकार छीनने, तंत्रमंत्र के काम को आबाद करने व भेदभाव के चलते भी ऐसी वारदातें होती हैं. यह लोगों की ओछी सोच को दिखाती है कि वे भूतप्रेत, डायन या चुड़ैल के नाम पर किसी की हत्या तक कर देते हैं.

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एक साल पहले झारखंड राज्य के रांची के मांडर गांव में डायन बता कर अलगअलग परिवार की 5 औरतों की हत्या कर दी गई थी. इस राज्य में हत्याओं का आंकड़ा 12 सौ के पार है.

बिहार के भागलपुर जिले में भी एक महिला को ‘डायन’ बता कर मार डाला गया. दरभंगा जिले के पीपरा में तो दबंगों ने एक दलित औरत को डायन बता कर न सिर्फ उस के साथ मारपीट की, बल्कि मूत्र पिलाने की कोशिश भी की.

दहशत में परिवार ने गांव ही छोड़ दिया. इस राज्य की 418 औरतें चंद सालों में ऐसे ही अंधविश्वास की भेंट चढ़ गईं.

असम में ‘डायन’ बता कर एक औरत का सिर काट दिया गया. समाज की ऐसी हैवानियत यह बताने के लिए काफी है कि अंधविश्वास का आईना कितना खौफनाक है.

इस बात में कोई दोराय नहीं है

कि अंधविश्वास से होने वाली घटनाएं सभ्य समाज को कलंकित करती हैं. लोगों को इस से बाहर निकलना चाहिए. अंधविश्वास और अफवाहें न फैलें,

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इस के उपाय सरकार को भी करने होंगे, ताकि फिर कोई मान जाटव अंधविश्वासों के गुस्से का शिकार न हो.

बौलीवुड ने नहीं अपनाया, पर्ल पंजाबी ने मौत को गले लगाया

उनकी लाश मुंबई के लोखंडवाला इलाके में उस के अपार्टमेंट के बाहर पाई गई. वहां के सिक्योरिटी गार्ड ने सूचना दे कर पुलिस को बुलाया था. घायल पर्ल पंजाबी को तुरंत नजदीकी अस्पताल में ले जाया गया जहां डाक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया.

पर्ल पंजाबी एक प्रौडक्शन हाउस में वीडियो एडिटर का काम कर रही थी लेकिन वह बौलीवुड में हीरोइन बनना चाहती थी. फिलहाल वह अपनी मां के साथ लोखंडवाला इलाके के एक अपार्टमेंट में रह रही थी.

ऐसा पहली बार नहीं हुआ है जब किसी स्ट्रगलिंग कलाकार ने यों मायूस हो कर अपनी जान गंवाई है. इसी साल जनवरी महीने में संघर्ष कर रहे कलाकार राहुल दीक्षित ने खुदकुशी कर ली थी.

जानकारी के मुताबिक, राहुल दीक्षित एक किराए के मकान में रहता था. इस मौके पर उस के साथ उस की लिव इन पार्टनर प्रिया भी थी. प्रिया जब सुबह 4 बजे नींद से उठी तो उस ने राहुल दीक्षित को पंखे से लटकते पाया, जिस के बाद प्रिय ने उसी फ्लैट में रह रहे दूसरे दोस्तों को जगाया.

इस मामले में पुलिस का कहना था कि ऐसा लगता है कि राहुल ने प्रिया के साथ उस की शराब पीने की लत को ले कर हुई बहस के बाद यह कदम उठाया था.

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हिंदी ही नहीं, बल्कि देश की दूसरी भाषाओँ में बनने वाली फिल्मों के कलाकार भी मानसिक तनाव से जूझते हुए मौत को गले लगा रहे हैं. साल 2018 में गुजराती फिल्मों के जूनियर कलाकार और एक नई फिल्म बना रहे हितेश परमार ने भी खुदकुशी कर ली थी. मरने से पहले लिखे गए उस के सुसाइड नोट में हितेश परमार ने यह बताया था कि उस ने एक निवेशक से कर्ज लिया था जिस के बदले में वह बहुत ज्यादा ब्याज वसूल रहा था तथा पिछले 2 साल से पैसा लौटाने के लिए तंग कर रहा था. पुलिस के मुताबिक, हितेश परमार ने धनियावी गांव में अपने घर पर खुद को कथित तौर पर फंदे से लटका लिया था.

इसी तरह भोजपुरी फिल्मों और टीवी सीरियलों में काम करने वाली कलाकार अंजली श्रीवास्तव ने जुलाई 2017 में मुंबई के पश्चिमी उपनगर अंधेरी में बने अपने घर में फांसी लगा कर खुदकुशी कर ली थी.

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पुलिस के मुताबिक, 29 साल की अंजली को उस के एक संबंधी ने फांसी पर लटके देखा तो वह उसे नीचे उतार कर अस्पताल ले गया, लेकिन डाक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया

टीम की चिंता या फिर तेंदुलकर जैसी विदाई की चाहत रखते हैं धोनी

लंबे बालों के साथ जब वो पहली बार क्रीज पर आया तो सभी ने उस खिलाड़ी की हेयर स्टाइल की तारीफ की लेकिन उसके बाद केवल भारत ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया ही उनकी मुरीद हो गई. शायद आप समझ गए होंगे हम किसकी बात कर रहे हैं. हम बात कर रहे हैं महेंद्र सिंह धोनी की. वो धोनी जितने भारत को क्रिकेट विश्व कप भी जिताया, टी-20 विश्व कप भी जिताया, एशिया कप भी जिताया और चैंपियन ट्रॉफी भी हम जीतकर आए. लेकिन समय के साथ सबके खेल में बदलाव आता है. ये हमने पहले भी कई खिलाड़ियों के साथ देखा है. क्रिकेट के भगवान कहे जाने वाले सचिन तेंदुलकर भी आखिरी समय स्ट्रगल कर रहे थे. उनके भी संन्यास की बातें उठने लगीं थीं. लेकिन उस खिलाड़ी के जैसे हर किसी के नसीब पर वैसी विदाई नसीब नहीं होती.

विश्व कप 2019 में लोगों ने अनुमान लगाया था कि लॉर्ड्स के ऐतिहासिक मैदान पर टीम इंडिया विश्व कप उठाएगी और एम एस धोनी की विदाई भी उसी तरह होगी जैसे 2011 में मुंबई के वानखेड़े मैदान पर सचिन तेंदुलकर की हुई थी. लेकिन ऐसा नहीं हो पाया. भारत की आकांक्षाओं को न्यूजीलैंड से मुकम्मल नहीं होने दिया और भारत को सेमीफाइनल में ही हार कर टूर्नामेंट से बाहर का रास्ता देखना पड़ा. विश्व कप के दौरान पूरी टीम अस्त-व्यस्त दिखी. धोनी को लेकर सवाल उठते रहे. कहा जाने लगा कि धोनी को अब मैनेजमेंट ढो रहा है, सच यो ये था कि धोनी को टीम में जगह उनके खेल को लेकर नहीं था बल्कि मैदान में उनके अनुभवों को लेकर था. इंग्लैंड के साथ मैच हारने के बाद भी धोनी के ऊपर सवाल उठे. सवाल तभी भी उठे जब न्यूजीलैंड के खिलाफ धोनी का रन बनाने के औसत 50 से भी कम का होने लगा. ऐसा लगने लगा था कि हेलीकॉप्टर शॉट्स खेलने वाला ये बल्लेबाज आज एक-एक रन में स्ट्रगल कर रहा है. धोनी क्रीज पर जम तो जाते थे लेकिन वो बड़े शॉट्स नहीं खेल पा रहे थे. सेमीफाइऩल में न्यूजीलैंड के खिलाफ मुकाबले में रवींद्र जडेजा की पारी जब तक चल रही थी जब तक धोनी की बल्लेबाजी पर कोई ज्यादा गौर नहीं कर रहा था लेकिन उसके बाद धोनी का खेल वाकई जीत वाला नहीं था.

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धोनी को संन्यास लेना चाहिए या नहीं ये उऩका निजी फैसला है लेकिन टीम मैनेंजमेंट को ये सोचना चाहिए कि धोनी से रिटायरमेंट की बात करें और उनसे पूछें कि उनका क्या प्लान है. भारत के विस्फोटक बल्लेबाज वीरेंद्र सहवाग ने भी खुलासा किया था कि चयनकर्ताओं ने उनसे कोई भी बात नहीं कि और सीधे टीम से निकाल दिया गया. ऐसा ही गौतम गंभीर के साथ भी हुआ.

भारतीय टीम वेस्टइंडीज के दौरे पर है जहां पर टीम दो टेस्ट, दो टी20 और तीन वनडे खेलने है. दौरा पूरा भी हो गया है. केवल एक टेस्ट मैच खेला जा रहा है. यहां पर भी धोनी का चयन नहीं किया गया. बाद में चयनकर्ताओं की तरफ से ये कहा गया कि धोनी ने इस दौरे के लिए अपने आपको अनुप्लब्ध बताया था. लेकिन सच्चाई यही है कि धोनी को टीम मे जगह ही नहीं दी गई थी. धोनी पैरा-कमांडो की ट्रेनिंग के लिए कश्मीर चले गए. वहां वो आर्मी के साथ ट्रेनिंग करते रहे और सोशल मीडिया में कई वीडियो उनके आते रहे जिसमें वो वॉलीबॉल खेलते दिखे कहीं पर वो एक्सरसाइज करते दिखे.

वेस्टइंडीज दौरे के बाद भारतीय क्रिकेट टीम का चयन दक्षित अफ्रीका के खिलाफ होने वाले टी-20 के लिए किया गया. उसमे भी धोनी का चयन नहीं किया गया. यहां भी चयनकर्ताओं का वहीं घिसा पिटा बयान आया कि धोनी उपलब्ध नहीं है. जबकि यहां भी सच्चाई छिपाई गई. अब धोनी को लेकर कहा जा रहा है कि उनको टीम की चिंता है इसलिए वो संन्यास नहीं ले रहे. मतलब कि धोनी को लगता है कि अभी तक उनके जगह पर कोई परफेक्ट खिलाड़ी नहीं आया इसलिए वो संन्यास नहीं आया. लेकिन धोनी को और टीम दोनों को एक दूसरे के बगैर रहने की आदत डालती होगी. इस बात में कोई शक नहीं है कि धोनी महान खिलाड़ी है लेकिन मुझे याद सुनील गावस्कर की एक बात याद आती है उन्होंने कहा था कि आपको तब संन्यास ले लेना चाहिए जब लोग ये कहने लगें कि ये संन्यास कब लेगा. मसलन की धोनी को अब खुद संन्यास की घोषणा कर देनी चाहिए.

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धोनी के मन में क्या है ये तो महज धोनी ही जानते हैं लेकिन मेरे अनुसार धोनी टी-20 विश्व कप के बाद संन्यास की घोषणा जरुर करेंगे. धोनी हमेशा से चौंकाने वाले फैसले लेते रहे हैं. जब उन्होंने कप्तानी छोड़ी थी तभी भी चौंका दिया था उसके बाद क्रिकेट के मैदान पर भी उनके कई निर्णय चौंकाने वाले होते हैं. फिलहाल वक्त यही कह रहा है कि धोनी को संन्यास ने लेना चाहिए.

सीरियल ‘बिदाई’ की ‘मालती’ ने गोवा में दिखाया हौट अवतार, फोटोज Viral

टीवी एक्ट्रेस और सीरियल ‘सपना बाबुल का बिदाई’ से पौपुलर हुई मालती यानी अशिता धवन हाल ही सोशल मीडिया पर काफी हौट फोटोज शेयर करने से काफी सुर्खियों में आ गई है. वैसे तो अशिता सोशल मीडिया पर का काफी एक्टिव रहती है फोटोज  और वीडियों शेयर करता रहती है पर वो इस समय अपने पति Sailesh Gulabani के साथ गोवा मे छुट्टियां बीता रही है. उनकी इस वेकेशन ट्रिप की फोटोज और वीडियोंज काफी वायरल हो रही है.

औन स्क्रीन से औफ स्क्रीन तक

अशिता को आपने टीवी स्क्रीन्स पर काफी सीधी साधी बहू के रुप में ही देखा होगा लेकिन असल जिंदगी में तो वह काफी स्टाइलिश है. अशिता ने स्वीमिंग पूल के किनारे ही अपने पति शैलेष गुलबानी को किस किया और इस दौरान बनाए गए एक वीडियो को उन्होंने अपने इंस्टाग्राम पर शेयर किया है. इस वीडियों के बेकग्राउड में ‘केसरी’ फिल्म का पौपुलर सोंग ‘वे माही’ चल रहा है जो इस लव मेकिंग सीन को और भी ज्यादा रोमांटिक बना रहा है.

पानी में दिखा हौट अवतार

अशिता अपने गोवा ट्रिप को खूब इन्जौय कर रही है और उनकी फोटोज इस बात का सबूत है. अपनी इस वेकेशल को अशिता टाइम टू टाइम फैंस के साथ शेयर करने से भी पीछे नहीं है. उन्होंने अपने इंस्टाग्राम पर एक वीडियों शेयर की है जिसमें वो पानी में डुबकी मारते नजर आईं. जिसमें वो काफी हौट नजर आ रही है.

पिंक बिकिनी में बिखेरा जलवा

अशिता ने अपने पिंक बिकिनी के ऊपर एक खूबसूरत सी ड्रेस पहनी हुई है, जिसमें उनकी खूबसूरती तो देखते ही बन रही है. अशिता लगातार अपने वेकेशन की फोटोज को सोशल मीडिया पर शेयर कर रही है और उनकी हर एक फोटोज को फैंस खूब पसंद कर रहे है. अशिता को इस रुप में देखकर तो उनके कई फैंस चौंक गए.

बिदाई से मिली पहचान  

अशिता टीवी की उन एक्ट्रेस में से एक है जिन्होंने अपने कैरियर की शुरुआती सीरियल से ही काफी पौपुलेरिटी हासिल कर ली थी. सीरियल ‘बिदाई’ में उनके रोल ‘मालती’ तो सभी ने काफी पसंद किया. इस रोल में उनके पोजिटिव और नेगेटिव दोनों रोल को काफी पसंद किया गया.

‘बिग बौस 12’ की इस कंटेस्टेंट का दिखा बोल्ड अवतार, फोटोज हुईं वायरल

टीवी एक्ट्रेस और ‘बिग बौस 12’ की एक्स कंटेस्टेंट सृष्टि रोड़े वैसे तो टीवी में काफी सीरियल्स में देखा जा चुका है लेकिन जब वो बीते साल  बिग बौस में आई तो सभी की ध्यान अपनी और खीचने में काफी कामियाब हुई. सृष्टि टीवी के साथ-साथ सोशल मीडिया पर भी काफी एक्टिव रहती है जिसके कारण वो फैंस के बीच मे अपनी अलग पहचान रखती है. हाल ही में सृष्टि ने अपनी बोल्ड फोटोज शेयर कि है. जिसे देख फैंस उनकी खूबसूरती पर फीदा हो चुके है. सृष्टि ने टीवी की उन एक्ट्रेस में से एक है जो टीवी के साथ-साथ सोशल मीडिया में भी काफी पौपुलर है. उनके अकेले इंस्टाग्राम पर 914 हजार फौलोवर्स है.

समुंदर के पानी से खेलती सृष्टी

सृष्टि ने हाल ही में इस फोटो को शेयर किया है और इसे वायरल होने में जरा भी देरी नहीं लगी. उनके इस हौट अवतार के सभी दिवाने हो गए है. उनको हमेशा टीवी पर सीधी साधी बहू के रुप में देखा गया है इसलिए फैंस को ये फोटो काफी पसंद आ रही है. वैसे तो उन्होंने सोशल मीडिया पर काफी फोटोज को शेयर किया है पर उनकी कुछ फोटोज पर हजारों लाइक्स और कमेंट्स है जैसे एक फोटो में सृष्टि अपने बालों को कुछ इस अंदाज में संवारती नजर आ रही है कि इसे देखकर तो ना जाने कितने दिलों पर छुरियां चल जाएंगी. सृष्टि वौटर बेबी कहना गलत नहीं होगा है और उनकी फोटो इस बात का सबूत है की वह समुंदर किनारे पहुंचती है तो वह बच्ची बन जाती है.

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Smell the sea and feel the sky Let your soul and spirits fly 💓

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Life is cool by the pool 💕

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कहां से की शुरुआत

सृष्टी ने अपने कैरियर की शुरुआत साल 2007 में आए सीरियल ‘कुछ इस तरह’ से की जिसमें उन्होंने कैमियों रोल किया था. इसके बाद साल 2010 में आए सीरियल ‘ये इश्क हाए’ फिर छोटी बहू, सौभा सोमनाथ की, पूर्ण विवहा, सरस्वतिचंद्र और इश्कबाज जैसे पौपुलर सीरियल्स में काम करके उन्होंने घर घर में एक खास जगह बनी ली.

सोशल मीडिया पर उड़ा रानू मंडल का मजाक, वायरल हो रही है वीडियोज

जी हां यहां बात हो रही है रानू मंडल की जो कभी रेलवे स्टेशन पर गाने गाकर अपना पेट पालती थीं लेकिन जब सिंगर हिमेश रेशमिया की नज़र रानू मंडल की आवाज पर पड़ी तो उन्हें अपने फिल्म में गाना गाने का ऑफर दिया और इस का छोटा सा वीडियो सोशल मीडिया पर पोस्ट भी किया.रानू मंडल की आवाज लता मंगेशकर से कंपेयर की जा रही है उनकी आवाज में लोगों को वही जादू नज़र आ रहा है जो लता मंगेशकर जी की आवाज में है। भले ही रानू मंडल को सफलता देर से मिली लेकिन मिली तो और पहचान मिलते ही वो सोशल मीडिया पर सबसे ज्यादा सर्च की जाने वाली महिला हैं इस वक्त…इस वक्त लाखों लोगों ने उनके वीडियो को लाइक किया है और उनके आवाज की तारीफ भी कर रहें हैं। अभी हाल ही में रानू मंडल जी के एक और गाने का छोटा सा वीडियो सोशल मीडिया पर आया है.

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सिंगर हिमेश रेशमिया ने रानू मंडल के लिए जो किया,उनको अपने फिल्म में गाने का मौका दिया उनके इस नेकी के काम की सोशल मीडिया पर खूब सराहना हो रही है…लेकिन शायद कुछ लोगों को दूसरों का मज़ाक बनाने में बड़ा मजा आता है. सोशल मीडिया पर कुछ मीम्स बन कर पोस्ट हो रहें तो कोई टिकटॉक बनाकर पोस्ट कर रहा है जिसमें कोई रानू मंडल बना है तो कोई हिमेश रेशमिया. उनका इस तरह से मज़ाक बनाया जा रहा है जैसे खुद तो बहुत नेकी का काम किया है.ऐसे मीम्स बनाकर पोस्ट करके सिंगर हिमेश रेशमिया का तो मज़ाक बनाया ही है साथ रानू मंडल जी की गरिमा को भी ठेस पहुंचाने का काम किया है.

अगर आप खुद कुछ नहीं कर सकतें तो आपको किसने हक दिया है कि आप किसी का मज़ाक बनाओ…..और कोई भी हो सोशल मीडिया एक ऐसी जगह है जहां पर किसी का मज़ाक बनते देर नहीं लगती है और अगर इस तरह के वीडियो हों तो लोग रिएक्ट करने में भी देरी नहीं लगाते.रानू मंडल ने भला किसी का क्या बिगाड़ा है जो लोग इस तरह की वाहियात हरकत करने पर उतर आए.क्या गाना गाना इतना बड़ा गुनाह है या फिर वो कोई बड़ी सिंगर नहीं है इसलिए मज़ाक बनाया या फिर वो गरीब हैं इसलिए मज़ाक बनाया गया….

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आप खुद सोचिए भला ऐसे लोगों को क्या कहा जाए जो इस तरह की नीच हरकत करने पर बाज़ नहीं आते….रानू मंडल जैसे ऐसे हजारों लोग होंगे, लेकिन इस दुनिया में ऐसे भी कई लोग हैं जो किसी की मेहनत और उसकी शोहरत का मज़ाक बनाकर दुनिया के सामने रखते हैं..ऐसे लोगों को सद्बुद्धी कब आएगी भगवान ही जाने…लेकिन ऐसे लोगों को सबक सिखाने की बहुत ही जरूरी हैं ताकि फिर आगे किसी और का इस तरह से मज़ाक न बना सकें क्योंकि किसी का मज़ाक बनाना आसान है लेकिन जब खुद पर बीतती है तब समझ में आता है…..रानू मंडल को आज हर कोई जानता है और उनकी आवाज किसी वरदान से कम नहीं है….

पदचिन्ह भाग -2

समीर के कहे इन शब्दों ने मुझ में एक नई चेतना, नई स्फूर्ति भर दी. सचमुच रजत और नेहा का आना मुझे उजली धूप सा खिला गया. आते ही रजत ने अपनी बांहें मेरे गले में डालते हुए कहा, ‘‘यह क्या हाल बना लिया मम्मी, कितनी कमजोर हो गई हो? खैर कोई बात नहीं. अब मैं आ गया हूं, सब ठीक हो जाएगा.’’

एक बार फिर से इन शब्दों की भूलभुलैया में मैं विचरने लगी. एक नई आशा, नए विश्वास की नन्हीनन्ही कोंपलें मन में अंकुरित होने लगीं. व्यर्थ ही मैं चिंता कर रही थी, कल से न जाने क्याक्या सोचे जा रही थी, हंसी आ रही थी अब मुझे अपनी सोच पर. जिस बेटे को 9 महीने अपनी कोख में रखा, ममता की छांव में पालपोस कर बड़ा किया, वह भला अपने मांबाप की ओर से आंखें कैसे मूंद सकता है? मेरा रजत ऐसा कभी नहीं कर सकता.

नर्सिंग होम से मैं घर वापस आई तो समीर और बेटेबहू क्या घर की दीवारें तक जैसे मेरे स्वागत में पलकें बिछा रही थीं. घर में चहलपहल हो गई थी. धु्रव की प्यारीप्यारी बातों ने मेरी आधी बीमारी को दूर कर दिया था. रजत अपने हाथों से दवा पिलाता, नेहा गरम खाना बना कर आग्रहपूर्वक खिलाती. 6-7 दिन में ही मैं स्वस्थ नजर आने लगी थी.

एक दिन शाम की चाय पीते समय रजत ने कहा, ‘‘पापा, मुझे आए 10 दिन हो चुके हैं. आप तो जानते हैं, प्राइवेट नौकरी है. अधिक छुट्टी लेना ठीक नहीं है.’’

‘‘तुम ठीक कह रहे हो. कब जाना चाहते हो?’’ समीर ने पूछा.

‘‘कल ही हमें निकल जाना चाहिए, किंतु आप दोनों चिंता मत करना, जल्दी ही मैं फिर आऊंगा.’’

अपनी ओर से आश्वासन दे कर रजत और नेहा अपने कमरे में चले गए. एक बार फिर से निराशा के बादल मेरे मन के आकाश पर छाने लगे. हताश स्वर में मैं समीर से बोली, ‘‘जीवन की इस सांध्य बेला में अकेलेपन की त्रासदी झेलना ही क्या हमारी नियति है? इन हाथ की लकीरों में क्या बच्चों का साथ नहीं लिखा है?’’

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‘‘पूजा, इतनी भावुकता दिखाना ठीक नहीं. जिंदगी की हकीकत को समझो. रजत की प्राइवेट नौकरी है. वह अधिक दिन यहां कैसे रुक सकता है?’’ समीर ने मुझे समझाना चाहा.

मेरी आंखों में आंसू आ गए. रुंधे कंठ से मैं बोली, ‘‘यहां नहीं रुक सकता किंतु हमें अपने साथ दिल्ली चलने को तो कह सकता है या इस में भी उस की कोई विवशता है. अपनी नौकरी, अपनी पत्नी, अपना बच्चा बस, यही उस की दुनिया है. बूढ़े होते मांबाप के प्रति उस का कोई कर्तव्य नहीं. पालपोस कर क्या इसीलिए बड़ा किया था कि एक दिन वह हमें यों बेसहारा छोड़ कर चला जाएगा.’’

‘‘शांत हो जाओ, पूजा,’’ समीर बोले, ‘‘तुम्हारी सेहत के लिए क्रोध करना ठीक नहीं. ब्लडप्रेशर बढ़ जाएगा, रजत अभी उतना बड़ा नहीं है जितना तुम उसे समझ रही हो. हम ने आज तक उसे कोई दायित्व सौंपा ही कहां है? पूजा, अकसर हम अपनों से अपेक्षा रखते हैं कि हमारे बिना कुछ कहे ही वे हमारे मन की बात समझ जाएं, वही बोलें जो हम उन से सुनना चाहते हैं और ऐसा न होने पर दुखी होते हैं. रजत पर क्रोध करने से बेहतर है, तुम उस से अपने मन की बात कहो. देखना, यह सुन कर कि हम उस के साथ दिल्ली जाना चाहते हैं, वह बहुत प्रसन्न होगा.’’

कुछ देर खामोश बैठी मैं समीर की बातों पर विचार करती रही और आखिर रजत से बात करने का मन बना बैठी. मैं उस की मां हूं, मेरा उस पर अधिकार है. इस भावना ने मेरे फैसले को बल दिया और कुछ समय के लिए नेहा की उपस्थिति से उपजा एक अदृश्य भय और संकोच मन से जाता रहा.

मैं कुरसी से उठी. तभी दूसरे कमरे में परदे के पीछे से नेहा के पांव नजर आए. मैं समझ गई परदे के पीछे खड़ी वह हम दोनों की बातें सुन रही थी. मेरा निश्चय कुछ डगमगाया किंतु अधिकार की बात याद आते ही पुन: कदमों में दृढ़ता आ गई. रजत के कमरे के बाहर नेहा के शब्द मेरे कानों में पड़े, ‘मम्मी ने स्वयं तो जीवनभर आजाद पंछी बन कर ऐश की और मुझे अभी से दायित्वों के बंधन में बांधना चाहती हैं. नहीं रजत, मैं साथ नहीं रहूंगी.’

नेहा से मुझे कुछ ऐसी ही नासमझी की उम्मीद थी. अत: मैं ने ऐसा दिखाया मानो कुछ सुना ही न हो. तभी मेरे कदमों की आहट सुन कर रजत ने मुड़ कर देखा, बोला, ‘‘अरे, मम्मी, तुम ने आने की तकलीफ क्यों की? मुझे बुला लिया होता.’’

‘‘रजत बेटा, मैं तुम से कुछ कहना चाहती हूं,’’ कहतेकहते मैं हांफने लगी.

रजत ने मुझे पलंग पर बैठाया फिर स्वयं मेरे नजदीक बैठ मेरा हाथ सहलाते हुए बोला, ‘‘हां, अब बताओ मम्मी, क्या कह रही हो?’’

‘‘बेटा, अब मेरा और तुम्हारे पापा का अकेले यहां रहना बहुत कठिन है. हम दोनों तुम्हारे पास दिल्ली रहना चाहते हैं. अकेले मन भी नहीं लगता.’इस से पहले कि रजत कुछ कहता, समीर भी धु्रव को गोद में उठाए कमरे में चले आए. बात का सूत्र हाथ में लेते हुए बोले, ‘‘रजत, तुम तो देख ही रहे हो अपनी मम्मी की हालत. इन्हें अकेले संभालना अब मेरे बस की बात नहीं है. इस उम्र में हमें तुम्हारे सहारे की आवश्यकता है.’’

‘‘पापा, आप दोनों का कहना अपनी जगह ठीक है किंतु यह भी तो सोचिए, लखनऊ का इतना बड़ा घर छोड़ कर आप दोनों दिल्ली के हमारे 2 कमरों के फ्लैट में कैसे एडजस्ट हो पाएंगे? जहां तक मन लगने की बात है, आप दोनों अपना रुटीन चेंज कीजिए. सुबहशाम घूमने जाइए. कोई क्लब अथवा संस्था ज्वाइन कीजिए. जब आप का यहां मन नहीं लगता है तो दिल्ली में कैसे लग सकता है? वहां तो अगलबगल रहने वाले आपस में बात तक नहीं करते हैं.’’

‘‘मन लगाने के लिए हमें पड़ोसियों का नहीं, अपने बच्चों का साथ चाहिए. तुम और नेहा जौब पर जाते हो, इस कारण धु्रव को कै्रच में छोड़ना पड़ता है. हम दोनों वहां रहेंगे तो धु्रव को क्रैच में नहीं भेजना पड़ेगा. हमारा भी मन लगा रहेगा और धु्रव की परवरिश भी ठीक से हो सकेगी.’’

‘‘क्रैच में बच्चों को छोड़ना आजकल कोई समस्या नहीं है पापा. बल्कि क्रैच में दूसरे बच्चों का साथ पा कर बच्चा हर बात जल्दी सीख जाता है, जो घर में रह कर नहीं सीख पाता.’’

‘‘इस का मतलब तुम नहीं चाहते कि हम दोनों तुम्हारे साथ दिल्ली में रहें,’’ समीर कुछ उत्तेजित हो उठे थे.

‘‘कैसी बातें करते हैं पापा? चाहता मैं भी हूं कि हम लोग एकसाथ रहें किंतु प्रैक्टिकली यह संभव नहीं है.’’

तभी नेहा बोल उठी, ‘‘इस से बेहतर विकल्प यह होगा पापा कि हम लोग यहां आते रहें बल्कि आप दोनों भी कुछ दिनों के लिए आइए. हमें अच्छा लगेगा.’’

‘कुछ’ शब्द पर उस ने विशेष जोर दिया था. उन की बात का उत्तर दिए बिना मैं और समीर अपने कमरे में चले आए थे.

शाम का अंधेरा गहराता जा रहा था. मेरे भीतर भी कुछ गहरा होता जा रहा था. कुछ टूट रहा था, बिखर रहा था. हताश सी मैं पलंग पर लेट कर छत को निहारने लगी. वर्तमान से छिटक कर मन अतीत के गलियारे में विचरने लगा था.

आगरा में मेरे सासससुर उन दिनों बीमार रहने लगे थे. समीर अकसर बूढ़े मांबाप को ले कर चिंतित हो उठते थे. रात के अंधेरे में अकसर उन्हें फर्ज और कर्तव्य जैसे शब्द याद आते, खून जोश मारता, बूढ़े मांबाप को साथ रखने को जी चाहता किंतु सुबह होतेहोते भावुकता व्यावहारिकता में बदल जाती. काम की व्यस्तता और मेरी इच्छा को सर्वोपरि मानते हुए वह जल्दी ही मांबाप को साथ रखने की बात भूल जाते.

एक बार मैं और समीर दीवाली पर आगरा गए थे. उस समय मेरी सास ने कहा था, ‘समीर बेटे, मेरी और तुम्हारे बाबूजी की तबीयत अब ठीक नहीं रहती. अकेले पड़ेपड़े दिल घबराता है. काम भी नहीं होता. यह मकान बेच कर तुम्हारे साथ लखनऊ रहना चाहते हैं.’

इस से पहले कि समीर कुछ कहें मैं उपेक्षापूर्ण स्वर में बोल उठी थी, ‘अम्मां मकान बेचने की भला क्या जरूरत है? आप की लखनऊ आने की इच्छा है तो कुछ दिनों के लिए आ जाइए.’ ‘कुछ’ शब्द पर मैं ने भी विशेष जोर दिया था. इस बात से अम्मां और बाबूजी बेहद आहत हो उठे थे. उन के चेहरे पर न जाने कहां की वेदना और लाचारी सिमट आई थी. फिर कभी उन्होंने लखनऊ रहने की बात नहीं उठाई थी. काश, वक्त रहते अम्मां की आंखों के सूनेपन में मुझे अपना भविष्य दिखाई दे जाता.

तो क्या इतिहास स्वयं को दोहरा रहा है? जैसा मैं ने किया वही मेरे साथ भी.. मन में एक हूक सी उठी. तभी एक दीर्घ नि:श्वास ले कर समीर बोले, ‘‘मैं सोच भी नहीं सकता था पूजा कि हमारा रजत इतना व्यावहारिक हो सकता है. किस खूबसूरती से उस ने अपने फर्ज, अपने दायित्व यहां तक कि अपने मांबाप से भी किनारा कर लिया.’’

‘‘इस में उस का कोई दोष नहीं, समीर. सच पूछो तो मैं ने उसे ऐसे संस्कार ही कहां दिए जो वह अपने मांबाप के प्रति अपने कर्तव्य का निर्वाह करे. उन की सेवा करे. मैं ने हमेशा रजत से यही कहा कि मांबाप की सेवा से बड़ा कोई धर्म नहीं है. इस बात को मैं भूल ही गई कि बच्चों के ऊपर मांबाप के उपदेशों का नहीं बल्कि उन के कार्यों का प्रभाव पड़ता है.’’

‘‘चुप हो जाओ पूजा, तुम्हारी तबीयत खराब हो जाएगी.’’

‘‘नहीं, आज मुझे कह लेने दो, समीर. रजत और नेहा तो फिर भी अच्छे हैं. बीमारी में ही सही कम से कम इन दिनों मेरा खयाल तो रखा. मैं ने तो कभी अम्मां और बाबूजी से अपनत्व के दो शब्द नहीं बोले. कभी नहीं चाहा कि वे दोनों हमारे साथ रहें, यही नहीं तुम्हें भी सदैव तुम्हारा फर्ज पूरा करने से रोका. जब पेड़ ही बबूल का बोया हो तो आम के फल की आशा रखना व्यर्थ है.’’

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समीर ने मेरे दुर्बल हाथ को अपनी हथेलियों के बीच ले कर कहा, ‘‘इस में दोष अकेले तुम्हारा नहीं, मेरा भी है लेकिन अब अफसोस करने से क्या फायदा? दिल छोटा मत करो पूजा. बस, यही कामना करो, हम दोनों का साथ हमेशा बना रहे.’’

मैं ने भावविह्वल हो कर समीर का हाथ कस कर थाम लिया, हृदय की संपूर्ण वेदना चेहरे पर सिमट आई, आंखों की कोरों से आंसू बह निकले, जो चेहरे की लकीरों में ही विलीन हो गए. आज मुझे समझ में आ रहा था कि समय की रेत पर हम जो पदचिह्न छोड़ जाते हैं, आने वाली पीढ़ी उन्हीं पदचिह्नों का अनुसरण कर के आगे बढ़ती है.

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