आसरा: भाग 1

लेखिका- मीनू सिंह

धूप का एक उदास सा टुकड़ा खिड़की पर आ कर ठिठक गया था, मानो अपने दम तोड़ते अस्तित्व को बचाने के लिए आसरा तलाश रहा हो. खिड़की के पीछे घुटनों पर सिर टिकाए बैठी जया की निगाह धूप के उस टुकड़े पर पड़ी, तो उस के होंठों पर एक सर्द आह उभरी. बस, यही एक टुकड़ा भर धूप और सीलन भरे अंधेरे कमरे का एक कोना ही अब उस की नियति बन कर रह गया है. अपनी इस दशा को जया ने खुद चुना था. इस के लिए वह किसे दोष दे? कसूर उस का अपना ही था, जो उस ने बिना सोचेसमझे एक झटके में जिंदगी का फैसला कर डाला.

उस वक्त उस के दिलोदिमाग पर प्यार का नशा इस कदर हावी था कि वह भूल गई कि जिंदगी पानी की लहरों पर लिखी इबारत नहीं, जो हवा के एक झोंके से मिट भी सकती है और फिर मनचाही आकृति में ढाली भी जा सकती है. जिंदगी तो पत्थर पर उकेरे उन अक्षरों की तरह होती है कि एक बार नक्श हो गए तो हो गए. उसे न तो बदला जा सकता है और न मिटाया जा सकता है. अपनी भूल का शिद्दत से एहसास हुआ तो जया की आंखें डबडबा आईं. घुटनों पर सिर टिकाए वह न जाने कब तक रोती रही और उस की आंखों से बहने वाले आंसुओं में उस का अतीत भी टुकड़ेटुकड़े हो कर टूटताबिखरता रहा. जया अपने छोटे से परिवार में तब कितनी खुश थी.

ये भी पढ़ें- हिजाब भाग-3

छोटी बहन अनुपमा और नटखट सोमू दीदीदीदी कहते उस के चारों ओर घूमा करते थे. बड़ी होने की वजह से जया उन दोनों का आदर्श भी थी, तो उन की छोटी से छोटी समस्या का समाधान भी. मां आशा और पिता किशन के लाड़दुलार और भाईबहन के संगसाथ में जया के दिन उन्मुक्त आकाश में उड़ते पंछी से चहकते गुजर रहे थे. इंटर तक जया के आतेआते उस के भविष्य को ले कर मातापिता के मन में न जाने कितने अरमान जाग उठे थे. अपनी मेधावी बेटी को वह खूब पढ़ाना चाहते थे.

आशा का सपना था कि चाहे जैसे भी हो वह जया को डाक्टर बनाएगी जबकि किशन की तमन्ना उसे अफसर बनाने की थी. जया उन दोनों की चाहतों से वाकिफ थी और उन के प्रयासों से भी. वह अच्छी तरह जानती थी कि पिता की सीमित आय के बावजूद वह दोनों उसे हर सुविधा उपलब्ध कराने से पीछे नहीं हटेंगे. जया चाहती थी कि अच्छी पढ़ाई कर वह अपने मांबाप के सपनों में हकीकत का रंग भरेगी. इस के लिए वह भरपूर प्रयास भी कर रही थी. उस के सारे प्रयास और आशा तथा किशन के सारे अरमान तब धरे के धरे रह गए जब जया की आंखों में करन के प्यार का नूर आ समाया.

करन एक बहार के झोंके की तरह उस की जिंदगी में आया और देखतेदेखते उस के अस्तित्व पर छा गया. वह दिन जया कैसे भूल सकती है जिस दिन उस की करन से पहली मुलाकात हुई थी, क्योंकि उसी दिन तो उस की जिंदगी एक ऐसी राह पर मुड़ चली थी जिस की मंजिल नारी निकेतन के सीलन भरे अंधेरे कमरे का वह कोना थी, जहां बैठी जया अपनी भूलों पर जारजार आंसू बहा रही थी. लेकिन उन आंसुओं को समेटने के लिए न तो वहां मां का ममतामयी आंचल था और न सिर पर प्यार भरा स्पर्श दे कर सांत्वना देने वाले पिता के हाथ. वहां थी तो केवल केयरटेकर की कर्कश आवाज या फिर पछतावे की आंच में सुलगती उस की अपनी तन्हाइयां, जो उस के वजूद को जला कर राख कर देने पर आमादा थीं. इन्हीं की तपन से घबरा कर जया ने अपनी आंखें बंद कर लीं.

ये भी पढ़ें- सौतेली भाग-3

आंखों पर पलकों का आवरण पड़ते ही अतीत की लडि़यां फिर टूटटूट कर बिखरने लगीं. जया के घर से उस का स्कूल ज्यादा दूर नहीं था. मुश्किल से 10-12 मिनट का रास्ता रहा होगा. कभी कोई लड़की मिल जाती तो स्कूल तक का साथ हो जाता, वरना जया अकेले ही चली जाया करती थी. उस ने स्कूल जाते समय करन को कई बार अपना पीछा करते देखा था.

शुरूशुरू में उसे डर भी लगा और उस ने अपने पापा को इस बारे में बताना भी चाहा, लेकिन जब करन ने उस से कभी कुछ नहीं कहा तो उस का डर दूर हो गया. करन एक निश्चित मोड़ तक उस के पीछेपीछे आता था और फिर अपना रास्ता बदल लेता था. जब कई बार लगातार ऐसा हुआ तो जया ने इसे अपने मन का वहम समझ कर दिमाग से निकाल दिया और इस के ठीक दूसरे ही दिन करन ने जया के साथसाथ चलते हुए उस से कहा, ‘प्लीज, मैं आप से कुछ कहना चाहता हूं.’

जया ने चौंक कर उस की ओर देखा और रूखे स्वर में बोली, ‘कहिए.’ ‘आप नाराज तो नहीं हो जाएंगी?’ करन ने पूछा, तो जया ने उपेक्षा से कहा, ‘मेरे पास इन फालतू बातों के लिए समय नहीं है. जो कहना है, सीधे कहो.’

‘मैं करन हूं. आप मुझे बहुत अच्छी लगती हैं.’ करन ने कुछ झिझकते और डरते हुए कहा. अपनी बात कहने के बाद करन जया की प्रतिक्रिया जानने के लिए पल भर भी नहीं रुका और वापस मुड़ कर तेजी से विपरीत दिशा की ओर चला गया.

ये भी पढ़ें- सोने की चिड़िया: भाग-2

दूसरे भाग में पढ़िए क्या हुआ करन और जया के रिश्ते का?

खून में डूबे कस्में वादे: भाग 2

पहला भाग पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें- खून में डूबे कस्में वादे: भाग 1

22 वर्षीय तुषार अमरावती जिले के तालुका भातकुली गांव मलकापुर का रहने वाला था. उस के पिता का नाम किरण मसकरे था. वह गांव के एक गरीब किसान थे. उन का और उन के परिवार का गुजारा गांव के संपन्न किसानों के खेतों में मेहनतमजदूरी कर के होता था.  परिवार की आर्थिक स्थिति ठीक न होने के कारण तुषार ने इंटरमीडिएट के बाद पढ़ाई छोड़ दी थी. परिवार में उस के मातापिता के अलावा एक बड़ा भाई और एक छोटी बहन थी.

सुंदर और महत्त्वाकांक्षी अर्पिता तुषार के पड़ोसी गांव कठवा वहान की रहने वाली थी. उस के पिता का नाम दत्ता साहेब ठाकरे था. ठाकरे गांव के प्रतिष्ठित और संपन्न किसान थे. उन के परिवार में अर्पिता के अलावा उस की मां और एक बड़ा भाई था. अर्पिता पढ़ाई लिखाई में तो तेज थी ही, व्यवहारकुशल भी थी. तुषार मसकरे उस की खूबसूरती और व्यवहार का कायल था.

गांव में उच्चशिक्षा की व्यवस्था नहीं थी. अर्पिता दत्ता ठाकरे की लाडली बेटी थी. वह उसे उच्चशिक्षा दिलाना चाहते थे. इसलिए उन्होंने अर्पिता को पूरी आजादी दे रखी थी. लेकिन यह जरूरी नहीं कि आदमी जो सोचे वह हो ही जाए. दत्ता ठाकरे की भी यह चाहत पूरी नहीं हो सकी.

18 वर्षीय अर्पिता और तुषार की लव स्टोरी सन 2017 में तब शुरू हुई थी, जब दोनों ने गांव के हाईस्कूल से निकल कर तालुका के भातकुली केशरभाई लाहोटी इंटर कालेज में दाखिला लिया. दोनों एक ही क्लास में थे, दोनों के गांव भी आसपास थे. जल्दी ही दोनों के बीच नजदीकियां बढ़ने लगीं.

कालेज में कई युवकयुवतियों ने अर्पिता से दोस्ती के लिए हाथ बढ़ाए, लेकिन अर्पिता ने उन्हें महत्त्व नहीं दिया. वह मन ही मन तुषार से प्रभावित थी. अर्पिता को जितना भी समय मिलता, तुषार के साथ बिताती थी. तुषार भी अर्पिता जैसी दोस्त पा कर खुश था.

कालेज आनेजाने के लिए अर्पिता के पास स्कूटी थी. तुषार का घर अर्पिता के रास्ते में पड़ता था, इसलिए वह तुषार को अकसर अपनी स्कूटी पर उस के घर तक छोड़ देती थी. इस के चलते दोनों कब एकदूसरे के करीब आ गए, उन्हें पता ही नहीं चला. पहले दोनों में दोस्ती हुई, फिर प्यार हो गया. इस बात का दोनों को तब पता चला जब उन के दिलों की बेचैनी बढ़ने लगी.

ये भी पढ़ें- खुद का कत्ल, खुद ही कातिल: भाग 2

इंटरमीडिएट करतेकरते उन की चाहत इतनी बढ़ गई कि दोनों ने अपने प्यार का इजहार कर लिया. इस के साथ ही दोनों ने साथसाथ जीनेमरने की कसमें भी खा लीं. इतना ही नहीं, दोनों ने सालवर्डी जा कर एक मंदिर में विवाह भी कर लिया. इस विवाह का वीडियो भी बनाया गया था.

जब तक दोनों एक ही कालेज में पढ़ते रहे, उन के प्यार और शादी की किसी को भनक तक नहीं लगी. लेकिन जब अर्पिता ग्रैजुएशन के लिए दूसरे कालेज में गई और तुषार ने पढ़ाई छोड़ दी तो उन के बीच दूरी आ गई.

इसी बीच उन के प्यार और प्रेम विवाह की खबर उन के घर वालों के कानों तक भी पहुंच गई. अर्पिता के पिता ने बेटी के अच्छे भविष्य के लिए उस का दाखिला अमरावती के मधोल पेठ स्थित महात्मा फूले विश्वविद्यालय में करा दिया था. उस ने बीकौम फर्स्ट ईयर में एडमिशन लिया था.

दोनों के परिवार रह गए सन्न

तुषार की पारिवारिक स्थिति ऐसी नहीं थी कि वह आगे की पढ़ाई कर पाता. आर्थिक स्थिति कमजोर होने की वजह से वह गांव वालों के खेतों में किराए का ट्रैक्टर चला कर अपने परिवार की आर्थिक मदद करने लगा.

अर्पिता से दूरियां बढ़ जाने के कारण तुषार का एकएक दिन बेचैनी में गुजरता था. जल्दी ही उस का धैर्य जवाब देने लगा. जब उसे लगने लगा कि अब वह अर्पिता के बिना नहीं रह सकता तो वह फोन पर बात कर के या गांव आतेजाते अर्पिता पर दबाव बनाने लगा कि वह अपनी पढ़ाई छोड़ कर उस के पास आ जाए.

इस बात की खबर जब दोनों परिवारों तक पहुंची तो उन के होश उड़ गए. इस हकीकत जान कर तुषार के परिवार वाले सन्न रह गए तो अर्पिता के घर वालों के पैरों के नीचे से जैसे जमीन खिसक गई. उन्होंने सपने में भी नहीं सोचा था कि जिस बेटी के भविष्य के लिए वह उसे उच्चशिक्षा दिलाना चाहते हैं, वह ऐसा कर बैठेगी.

मामला काफी नाजुक था. फिर भी उन्होंने अर्पिता को आड़े हाथों लिया. उसे उस के भविष्य, मानसम्मान और समाज के बारे में काफी समझायाबुझाया. साथ ही तुषार से दूर रहने की सलाह भी दी.

अर्पिता ने जब अपने परिवार की बातों पर गहराई से सोचविचार किया तो उसे अपनी भूल पर पछतावा हुआ. तुषार के साथ वह उज्ज्वल भविष्य की कल्पना नहीं कर सकती थी, न ही तुषार उस के काबिल था. सोचविचार कर अर्पिता ने तुषार से दूरी बना ली.

अर्पिता की दूरियां तुषार से बरदाश्त नहीं हुई. एक दिन वह बिना किसी डर के अर्पिता का हाथ मांगने उस के घर चला गया. उस ने उस के परिवार को धमकी देते हुए कहा कि अगर आप लोग अर्पिता का हाथ मेरे हाथ में नहीं देंगे तो वह उसे जबरन ले जाएगा. क्योंकि वह अर्पिता के साथ मंदिर में शादी कर चुका है. उस के पास शादी का वीडियो भी है. तुषार ने यह भी कहा कि अगर उस की बात नहीं मानी गई तो वह वीडियो को सोशल मीडिया पर वायरल कर देगा.

ये भी पढ़ें- खुद का कत्ल, खुद ही कातिल: भाग 1

बात मानसम्मान की थी. उस की इस धमकी से अर्पिता का परिवार काफी डर गया. बात उन की इज्जत की थी. उन्होंने इस की शिकायत पुलिस में कर दी. पुलिस की काररवाई से तुषार को बहुत गुस्सा आया. वह अर्पिता और उस के परिवार के प्रति रंजिश रखने लगा. उस ने अर्पिता को कई बार फोन किया लेकिन उस ने फोन नहीं उठाया.

फलस्वरूप उसे अर्पिता से सख्त नफरत हो गई. अंतत: प्रेमाग्नि में जलते तुषार ने एक खतरनाक योजना बना ली. उस ने फैसला कर लिया कि अगर अर्पिता ने उस के मनमुताबिक उत्तर नहीं दिया तो वह उसे किसी भी कीमत पर नहीं छोड़ेगा. अर्पिता उस की पत्नी है और उस की ही रहेगी.

अपनी योजना को फलीभूत करने के लिए तुषार अपने एक दोस्त से मिला और उस से एक तेजधार वाले लंबे फल के चाकू की मांग की. उस का कहना था कि गांव के आसपास उस के बहुत सारे दुश्मन हो गए हैं, जिन से वह डरता है. दोस्त ने उस की बातों पर विश्वास कर के उस के लिए चाइना मेड एक चाकू का बंदोबस्त कर दिया.

चाकू का इंतजाम हो जाने के बाद तुषार घटना के दिन सुबहसुबह मधोल पेठ पहुंच कर अर्पिता का इंतजार करने लगा. बाद में जब उसे मौका मिला तो उस ने अर्पिता और उस की फ्रेंड पर हमला बोल दिया. इस हमले में अर्पिता की जान चली गई और उस की फ्रैंड अपर्णा बुरी तरह घायल हुई. इस के पहले कि वह भाग पाता, लोगों ने उसे दौड़ा कर पकड़ लिया.

ये भी पढ़ें- पैसो का चक्कर, किन्नर की हत्या, किन्नर के हाथ!

इस घटना के कुछ घंटों बाद इस वारदात को ले कर पूरा अमरावती शहर एक हो गया. राजनीतिक पार्टियां और सामाजिक संगठन एकजुट हो कर पुलिस प्रशासन के खिलाफ नारे लगाने लगे.

वे अभियुक्त तुषार मसकरे को कड़ी से कड़ी सजा देने की मांग कर रहे थे. बहरहाल, तुषार मसकरे ने अपना गुनाह स्वीकार कर लिया था. पूछताछ के बाद उसे अदालत पर पेश कर के जेल भेज दिया गया.

कहानी सौजन्य – मनोहर कहानियां

आधी अधूरी प्रेम कहानी: भाग 2

पहला भाग पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें- आधी अधूरी प्रेम कहानी: भाग 1

केस का खुलासा होने पर एसएसपी एटा स्वप्निल ममगाई ने प्रैसवार्ता आयोजित की. पुलिस पूछताछ और पत्रकारों के सामने निशा के मातापिता ने आमिर की हत्या और अपनी बेटी निशा की हत्या की कोशिश करने की जो कहानी बताई, इस प्रकार थी—

25 वर्षीय आमिर 7 भाइयों में दूसरे नंबर का था. उस का बड़ा भाई सलमान पिता अकील के साथ बिजली के काम में हाथ बंटाता था. जबकि आमिर टाइल्स लगाने का काम करता था. इसी दौरान उस की मुलाकात निशा के पिता अफरोज से हुई.

अफरोज राजमिस्त्री का काम करता था. इसी के चलते आमिर का निशा के घर आनाजाना शुरू हो गया. सुंदर और चंचल निशा को देखते ही आमिर उस की ओर आकर्षित हो गया. निशा की नजरें जब आमिर से टकरातीं तो वह मुसकरा देता. यह देख निशा नजरें झुका लेती थी.

आंखों ही आंखों में दोनों एकदूसरे को दिल दे बैठे. जब भी आमिर निशा के पिता को काम पर चलने के लिए बुलाने आता, उस दौरान उस की मुलाकात निशा से हो जाती. धीरेधीरे दोनों बातचीत करने लगे. दोनों ने एकदूसरे को मोबाइल नंबर भी दे दिए. दोनों की अकसर बातें होती रहतीं.

बेटी के प्रेम संबंधों की जानकारी होने के बाद अफरोज आमिर से नाराज और दूर रहने लगा था. इतना ही नहीं, वह निशा के साथ भी मारपीट कर चुका था. लेकिन प्रेमी युगल दुनिया से बेखबर अपनी ही दुनिया में मस्त रहते थे.

निशा उम्र के ऐसे मोड़ पर थी, जहां उस के कदम बहक सकते थे. इस के चलते अब घर वाले 24 घंटे उस पर नजर रखने लगे थे. बंदिशों के चलते प्रेमी युगल ने रात के समय घर पर ही मिलने की गुप्त योजना बनाई थी.

ये भी पढ़ें- चाचा के प्यार में फंसी भतीजी, क्या हुआ अंजाम?: भाग 3

6 जुलाई, 2019 की रात अलीगढ़ में अफरोज के परिवार के सभी लोग छत पर सो रहे थे. लेकिन 20 वर्षीय निशा की आंखों की नींद तो उस के 25 वर्षीय प्रेमी आमिर ने चुरा ली थी. परिजनों की सख्ती के चलते आमिर का अफरोज के घर आना बंद हो गया था. इसलिए निशा ने चोरीछिपे आमिर को फोन कर के रात में घर आने के लिए कहा.

आमिर भी अपनी प्रेमिका के दीदार को तरस रहा था. निशा का फोन सुनने के बाद वह उस से मिलने के लिए उस के घर पहुंच गया. निशा ने उस के लिए घर का दरवाजा पहले ही खुला छोड़ दिया था.

निशा और आमिर कमरे में बैठ कर बातें करने लगे. इसी दौरान निशा के मामा हफीज उर्फ इशहाक को टौयलेट लगी तो वह छत से उठ कर नीचे जाने लगा. मगर सीढि़यों का दरवाजा बंद था. दरवाजा खटखटाने पर निशा ने काफी देर बाद दरवाजा खोला. पूछने पर निशा ने बताया कि वह भी पानी लेने छत से नीचे आई थी.

शक होने पर मामा ने आसपास की तलाशी ली तो कमरे में छिपा हुआ आमिर मिल गया. इस के बाद उस ने उसी समय अपने जीजा अफरोज, बहन नूरजहां और 14 वर्षीय नाबालिग भांजे को आवाज दे कर छत से बुला लिया. गुस्से में चारों ने लाठीडंडों से आमिर की पिटाई शुरू कर दी. फिर गला दबा कर उस की हत्या कर दी.

प्रेमी के साथ मारपीट करने का निशा ने विरोध भी किया था. लेकिन हत्यारों के आगे उस की एक नहीं चली. निशा के सामने ही घर वालों ने उस के प्रेमी की हत्या कर दी थी, जिस का निशा को बहुत दुख हुआ.

अफरोज व हफीज ने शव को बोरी में बंद किया और उसे मोटरसाइकिल पर रख कर रात में ही ले गए. वे लोग भमोला रेलवे ट्रैक पर आमिर के शव को बोरी से निकाल कर फेंक आए.

पूरा घटनाक्रम निशा की आंखों के सामने घटित हुआ था. घर वालों ने सोचा कि कुछ दिन निशा यहां से बाहर रहेगी तो इस घटना को भूल जाएगी. मामला शांत होने पर उसे वापस ले आएंगे. यह सोच कर उसी रात मांबाप व मामा निशा को ले कर एटा के गांव बारथर के लिए मोटरसाइकिलों से रवाना हो गए.

बारथर में निशा गुमसुम सी रहती थी. उस की आंखों के सामने प्रेमी की पिटाई और हत्या का दृश्य घूमता रहता था. घर वाले उस से कुछ पूछते तो उस की आंखों से आंसू बहने लगते थे.

ये भी पढ़ें- चाचा के प्यार में फंसी भतीजी, क्या हुआ अंजाम?:

समझाने से नहीं मानी निशा

सभी लोग उसे 2 दिनों तक समझाते रहे और किसी को कुछ न बताने का दबाव डालते रहे. लेकिन निशा के बगावती तेवर देख कर वे लोग घबरा गए. उन्होंने सोचा कि यदि निशा जिंदा रही तो आमिर की हत्या के मामले में फंसा देगी. घर वालों की बात न मानने पर मांबाप व मामा ने निशा को भी ठिकाने लगाने का फैसला कर लिया. इस के लिए फूलप्रूफ योजना बनाई गई. उस की हत्या करने से पहले 3 दिन तक वह लाश ठिकाने लगाने के लिए जगह ढूंढते रहे.

9 जुलाई, 2019 की रात 8 बजे हफीज उर्फ इशहाक व मांबाप 2 मोटरसाइकिलों पर यह कह कर निकले कि सभी लोग अलीगढ़ जा रहे हैं. निशा उन के साथ थी. एक मोटरसाइकिल पर निशा और उस की मां नूरजहां बैठी, जिसे पिता अफरोज चला रहा था. दूसरी पर निशा का 14 वर्षीय भाई बैठा, जिसे मामा हफीज चला रहा था.

गांव से करीब 15 किलोमीटर दूर निकलने के बाद बहादुरपुर गांव में प्रवेश करते ही दोनों मोटरसाइकिलों ने रास्ता बदल दिया. मोटरसाइकिलों के नहर की पटरी की तरफ मुड़ने पर निशा ने कहा, ‘‘ये तो अलीगढ़ का रास्ता नहीं है अब्बू्. आप कहां जा रहे हैं?’’

लेकिन कोई कुछ नहीं बोला. निशा को शक हुआ लेकिन वह बेबस थी. अफरोज व मामा ने आगे जा कर एक जगह मोटरसाइकिलें रोक दीं. तब तक रात के 9 बज चुके थे.

नहर की पटरी पर पहुंचते ही निशा को मोटरसाइकिल से उतार लिया गया और पकड़ कर एक ओर ले जाने लगे. निशा को समझते देर नहीं लगी कि आज उस के साथ कुछ गलत होने वाला है. वह चिल्लाई, लेकिन रात का समय था और दूरदूर तक वहां कोई नहीं था.

पिता और मां ने निशा के हाथ पकड़ लिए. मामा ने तमंचे की नाल उस की गरदन पर सटा कर गोली चला दी. गोली लगते ही तीखी चीख के साथ वह वहीं गिर गई. उस के गिरते ही उसे झाडि़यों में फेंक कर सभी लोग वहां से चले गए.

हत्यारोपियों ने सोचा था कि बेटी को मार कर अलीगढ़ से दूर फेंक दिया है. उस की शिनाख्त नहीं हो सकेगी और पुलिस लावारिस मान कर लाश का अंतिम संस्कार कर देगी. आमिर और निशा दोनों की हत्या राज ही बनी रहेगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ. गले में गोली लगने के बाद भी निशा बच गई और  पुलिस को सच्चाई बता दी. अन्यथा औनर किलिंग की यह घटना हादसा बन कर रह जाती.

आमिर का परिवार निशा के साथ उस के रिश्ते से बेखबर था. आमिर के पिता अकील के मुताबिक आमिर ने कभी निशा के साथ रिश्ते को ले कर घर में जिक्र नहीं किया था. आमिर का रिश्ता अगलास थाना क्षेत्र की एक युवती के साथ तय हो गया था. घर वाले उस की शादी की तैयारियों में मशगूल थे. आमिर की मौत से परिवार गम में डूब गया.

ये भी पढ़ें- दोस्त दोस्त ना रहा!

निकाह तय होने के बाद आमिर घर वालों से खफा रहने लगा था. वह अलीगढ़ से दूर जा कर निशा के साथ अपनी अलग दुनिया बसाना चाहता था. आमिर और निशा ने इस की तैयारी भी कर ली थी. लेकिन इन का सपना पूरा होने से पहले ही टूट गया.

उधर अलीगढ़ पुलिस ने आमिर की मौत को हादसा समझ कर मुकदमा दर्ज कर लिया था. हालांकि पुलिस इस की जांच कर रही थी, लेकिन निशा के जिंदा मिलने पर पूरी घटना साफ हो गई.

इस जानकारी के बाद अलीगढ़ पुलिस ने इस मामले को हत्या में दर्ज करने के साथ ही निशा के मामा हफीज व नाबालिग भाई को क्वासी के शहंशाहबाद इलाके वाले घर से गिरफ्तार कर लिया.

गिरफ्तार करने वाली पुलिस टीम में इंसपेक्टर अमित कुमार एसएसआई योगेश चंद्र गौतम, एसआई चमन सिंह, नितिन राठी, कांस्टेबल पंकज कुमार, जनक सिंह और ऋषिपाल सिंह यादव शामिल थे.

अलीगढ़ के एसएसपी आकाश कुलहरि ने प्रैसवार्ता में बताया कि आरोपी चालाकी कर के बचना चाहते थे. बेटी के प्रेमी की हत्या अलीगढ़ में और बेटी की हत्या एटा जिले में कर के उन्होंने पुलिस को गुमराह करने का प्रयास किया था. लेकिन उन की योजना निशा के बच जाने से धरी की धरी रह गई.

बहरहाल, हफीज, अफरोज व नूरजहां को आमिर के कत्ल व निशा की हत्या के प्रयास में जेल और नाबालिग को बालसुधार गृह भेज दिया गया. इस तरह एक प्रेमकहानी पूरी होने से पहले ही खत्म हो गई.

ये भी पढ़ें- शर्मनाक: रिमांड होम अय्याशी के अड्डे

कहानी सौजन्य-मनोहर कहानियां

मजदूरों का दर्द : अब शहर लौट कर कभी नहीं जाऊंगा

बिहार से दिल्ली आते समय मदन की मां ने बङे प्यार से बेटे को ठेकुआ बना कर देते हुए कहा था कि परदेश जा रहे हो, भूख लगे तो खा लेना. रास्ते के लिए मां ने चूङा का भूजा भी बना कर दिया था. आंखों में हसरत लिए जब वह दिल्ली आया तो अपने एक गांव के दोस्त के कमरे पर रहने लगा. दोस्त ने ही उसे एक ठेकेदार के यहां काम पर लगाया था. मदन की जिंदगी पटरी पर चलने लगी थी. वह हर महीने वह मां को पैसे भी भेजने लगा था. उस ने सोचा था कि इस दीवाली को वह गांव जाएगा. मगर मार्च महीने में सब गङबङ हो गया. कोरोना वायरस की वजह से पूरे देश में लौकडाउन लगा तो सभी घरों में कैद हो गए. खाने तक को पैसे कम पङ गए तो उस ने एक दोस्त से मदद मांगी. लेकिन उस की हालत भी पतली थी.

जब आंसू बन जाए जिंदगी

मदन बतातेबताते रो पङा,”साहेब, बहुत परेशान हैं. एक भी रूपया नहीं है जेब में. ठेकेदार भी हाथ खङे कर चुका है. ऊपर से कोरोना से डर लगता है. मांबाबूजी फोन पर कह रहे हैं घर आ जाओ. मगर कैसे जाएं? तिलतिल कर जीने को मजबूर हैं. दिल्ली बङा ही बेदर्द शहर है. यहां कोई किसी का नहीं होता. अब गांव जा कर ही रहूंगा और वहीं कुछ काम कर के पेट पालूंगा.”

ये भी पढ़ें- कोरोना ने किया आइसक्रीम बिजनेस का कबाड़ा

रहनाखाना नहीं अपनों का साथ चाहिए

उधर सरकार ने श्रमिकों के लिए ट्रेनें चलाईं तो चंदन किसी तरह गांव पहुंच गया. वह 6 महीने पहले ही कानपुर काम करने आया था.

उस ने फोन पर बताया,”शहरों में बिना पैसा किसी को कोई पहचानता तक नहीं. अब कभी लौट कर शहर नहीं जाऊंगा. गांव तो थोङा खुलाखुला है पर जहां रहता था वहां दम घुटता था. अब कभी लौट कर शहर नहीं जाऊंगा.”

ट्रेन नहीं तो पैदल ही चल दिए

दिल्ली के गांधी नगर में एक गारमैंट फैक्टरी में काम करने वाला शिव कुमार पैदल ही गांव जाने को बेताब है, तो वहीं रोहिला 12-13 दिन पहले कुछ लोगों के साथ गांव की ओर निकल चुका था मगर अभी तक गांव पहुंच नहीं पाया है.

दिल्ली में 35-40 लाख के करीब प्रवासी मजदूर हैं जो गांव लौट जाना चाहते हैं. ये नहीं चाहते कि दोबारा यहां लौट कर आएं और इन के कभी न लौटने की कसम एक्सपर्ट्स को डराने लगा है.

परदेश में कोई अपना कहां

यों इन के रहनेखाने का इंतजाम दिल्ली सरकार ने कर रखा है बावजूद प्रवासी मजदूर हर हाल में गांव लौट जाना चाहते हैं.

उत्तर प्रदेश से दिल्ली आए मनोज की हालत भी कुछ ऐसा ही कुछ है. वह पहले ₹8-9 हजार महीना कमा लेता था.

ये भी पढ़ें- औरतें, शराब और कोरोना

वह बताता है,”इस बात का कोई मतलब नहीं कि मैं ने यहां रह कर कितना कमाया, अब तो बस यही है कि जल्द से जल्द घर पहुंच जाऊं. मैं पिछले महीने भी गांव जाने के लिए पैदल ही निकल गया था मगर पुलिस ने पकङ कर शैल्टर होम में डाल दिया. यहां रहनाखाना तो हो रहा पर कोरोना वायरस से बहुत डर लग रहा है. कम से कम गांव तो यहां से सुरक्षित है न.”

अब गांव में ही रहूंगा

बिहार में सहरसा का रहने वाला सूरज गांव पहुंच चुका है. उस ने फोन पर बताया,”हरियाणा से गांव वापस आना आसान नहीं रहा. बहुत पापङ बेले. वहां प्लंबर का काम करता था. कमाई भी ठीकठाक हो जा रही थी. अब गांव छोडूंगा भी या नहीं कुछ कह नहीं सकते. घर के लोग अब जाने देना नहीं चाहते. मेरे दादाजी बारबार कहते हैं कि उधर की हवा ठीक नहीं. कोरोना के बाद डेंगू और फिर प्रदूषण में जीना बहुत मुश्किल हो जाएगा. सोच रहा हूं यहीं कुछ काम कर के कमाऊं.”

मनरेगा से कितनों का पेट भरेगा

पिंटू भी गांव लौट चुका है और फिर वापस दिल्लीमुंबई नहीं जाना चाहता. उस की बीवी रेखा गांव में ही मनरेगा से कमाई कर लेती है.

वैसे भी गांव में बङी संख्या में मजदूर मनरेगा से जुङे हैं पर समय पर भुगतान नहीं मिलने के कारण परेशान हो जाते हैं.

हालांकि महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी कानून (मनरेगा) के तहत वृद्धि 1अप्रैल से सरकार ने कर दी है और इस के तहत मनरेगा के लिए राष्ट्रीय औसत मजदूरी ₹182 से बढ़ कर प्रतिदिन ₹ 202 हो जाएगी.

मनरेगा के तहत अभी 13.62 करोङ जौब कार्डधारक हैं और योजना के जरीए ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों को प्रतिदिन की मजदूरी और साल में 100 दिन रोजगार की गारंटी दी जाती है. अब जब लाखों की तादाद में शहरों में रहने वाले प्रवासी मजदूर अपनेअपने गांव लौटेंगे तो जाहिर है इस से रोजगार की स्थिति भयावह ही होगी. मजदूरों को काम मिलना आसान नहीं होगा.

बिहार की स्थिति और भी भयावह

इस में बिहार की स्थिति तो और भी भयावह है. बिहार सरकार ने साल 2017-18 में ₹ 168 मनरेगा के लिए मजदूरी तय की थी. इस के 3 साल में सरकार ने महज ₹3 ही बढ़ाए जो अब 2019-20 में ₹171 ही तय की गई है. ऐसे में एक मजदूर खुद और परिवार का पेट कैसे पालेगा, यह सोचने वाली बात है.

ये भी पढ़ें- कोरोना के नाम पर भ्रम फैलाता अंधविश्वास

उधर, इस महामारी के बीच सरकारी राहत फिसड्डी ही साबित हुई है तिस पर केंद्र और राज्य सरकारों ने पैट्रोल व डीजल के दामों में भी बढ़ोतरी कर दी है. जाहिर है, इस से महंगाई भी बढ़ेगी ही.

मगर फिलहाल तो देश कोरोना वायरस की जद में है और आम लोगों की तरह देश के तमाम राज्यों के मजदूर यही चाहते हैं कि जान बच जाए बस. अभी तो उन का गांव और अपनों का साथ मिलना ही काफी है.

आसरा: भाग-2

पहला भाग पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें- आसरा

लेखिका- मीनू सिंह

करन के कहे शब्द देर तक जया के कानों में गूंजते और मधुर रस घोलते रहे. उस की निगाह अब भी उधर ही जमी थी, जिधर करन गया था. अचानक सामने से आती बाइक का हार्न सुन कर उसे स्थिति का एहसास हुआ तो वह अपने रास्ते पर आगे बढ़ गई. अगले दिन स्कूल जाते समय जया की नजरें करन को ढूंढ़ती रहीं, लेकिन वह कहीं नजर नहीं आया.

3 दिन लगातार जब वह जया को दिखाई नहीं दिया तो उस का मन उदास हो गया. उसे लगा कि करन ने शायद ऐसे ही कह दिया होगा और वह उसे सच मान बैठी, लेकिन चौथे दिन जब करन नियत स्थान पर खड़ा मिला तो उसे देखते ही जया के मन की कली खिल उठी. उस दिन जया के पीछेपीछे चलते हुए करन ने आहिस्ता से पूछा, ‘आप मुझ से नाराज तो नहीं हैं?’

‘नहीं,’ जया ने धड़कते दिल से जवाब दिया, तब करन ने उत्साहित होते हुए बात आगे बढ़ाई, ‘क्या मैं आप का नाम जान सकता हूं?’

‘जया,’ उस का छोटा सा उत्तर था. ‘आप बहुत अच्छी हैं, जयाजी.’ अपनी बात कहने के बाद करन थोड़ी दूर तक जया के साथ चला, फिर उसे ‘बाय’ कर के अपने रास्ते चला गया.

उस दिन के बाद वह दोनों एक निश्चित जगह पर मिलते, वहां से करन थोड़ी दूर जया के साथ चलता, दो बातें करता और फिर दूसरे रास्ते पर मुड़ जाता. इन पल दो पल की मुलाकातों और छोटीछोटी बातों का जया पर ऐसा असर हुआ कि वह हर समय करन के ही खयालों में डूबी रहने लगी. नादान उम्र की स्वप्निल भावनाओं को करन का आधार मिला तो चाहत के फूल खुद ब खुद खिल उठे. यही हाल करन का भी था.

एक दिन हिम्मत कर के उस ने अपने मन की बात जया से कह ही दी, ‘आई लव यू जया,’ मैं तुम से बहुत प्यार करता हूं. तुम्हारे बगैर जिंदगी अधूरीअधूरी सी लगती है. करन के मन की बात उस के होंठों पर आई तो जया के दिल की धड़कनें बेकाबू हो गईं. उस ने नजर भर करन को देखा और फिर पलकें झुका लीं. उस की उस एक नजर में प्यार का इजहार भी था और स्वीकारोक्ति भी.

ये भी पढ़ें- लैटर बौक्स: प्यार और यौवन का खत

एक बार संकोच की सीमाएं टूटीं, तो जया और करन के बीच नजदीकियां बढ़ने लगीं. ज्योंज्यों दूरियां कम होती गईं, दोनों एकदूसरे के रंग में रंगते गए. फिर उन्होंने सब की नजरों से छिप कर मिलना शुरू कर दिया. जब भी मौका मिलता, दोनों प्रेमी किसी एकांत स्थल पर मिलते और अपने सपनों की दुनिया रचतेगढ़ते. उस वक्त जया और करन को इस बात का जरा भी एहसास नहीं था कि पागल मन की उड़ान का कोई वजूद नहीं होता. किशोरवय का प्यार एक पागलपन के सिवा और क्या है.

बिलकुल उस बरसाती नदी की तरह जो वर्षाकाल में अपने पूरे आवेग पर होती है, लेकिन उस के प्रवाह में गंभीरता और गहराई नहीं रहती. इसीलिए वर्षा समाप्त होते ही उस का अस्तित्व भी मिट जाता है. अब जया की हर सोच करन से शुरू हो कर उसी पर खत्म होने लगी थी. अब उसे न कैरियर की चिंता रह गई थी और न मातापिता के सपनों को पूरा करने की उत्कंठा. बेटी में आए इस परिवर्तन को आशा की अनुभवी आंखों ने महसूस किया तो एक मां का दायित्व निभाते हुए उन्होंने जया से पूछा, ‘क्या बात है जया, इधर कुछ दिन से मैं महसूस कर रही हूं कि तू कुछ बदलीबदली सी लग रही है? आजकल तेरी सहेलियां भी कुछ ज्यादा ही हो गई हैं.

तू उन के घर जाती रहती है, लेकिन उन्हें कभी नहीं बुलाती?’ मां द्वारा अचानक की गई पूछताछ से जया एकदम घबरा गई. जल्दी में उसे कुछ सुझाई नहीं दिया, तो उस ने बात खत्म करने के लिए कह दिया, ‘ठीक है मम्मी, आप मिलना चाहती हैं तो मैं उन्हें बुला लूंगी.’ कई दिन इंतजार करने के बाद भी जब जया की कोई सहेली नहीं आई और उस ने भी जाना बंद नहीं किया तो मजबूरी में आशा ने जया को चेतावनी देते हुए कहा, ‘अब तू कहीं नहीं जाएगी. जिस से मिलना हो घर बुला कर मिल.’ घर से निकलने पर पाबंदी लगी तो जया करन से मिलने के लिए बेचैन रहने लगी. आशा ने भी उस की व्याकुलता को महसूस किया, लेकिन उस से कहा कुछ नहीं. धीरेधीरे 4-5 दिन सरक गए तो एक दिन जया ने आशा को अच्छे मूड में देख कर उन से थोड़ी देर के लिए बाहर जाने की इजाजत चाही, जया की बात सुनते ही आशा का पारा चढ़ गया. उन्होंने नाराजगी भरे स्वर में जया को जोर से डांटते हुए कहा, ‘इतनी बार मना किया, समझ में नहीं आया?’ ‘‘इतनी बार मना कर चुका हूं, सुनाई नहीं देता क्या?’’

नारी निकेतन के केयरटेकर का कर्कश स्वर गूंजा तो जया की विचारधारा में व्यवधान पड़ा. उस ने चौंक कर इधरउधर देखा, लेकिन वहां पसरे सन्नाटे के अलावा उसे कुछ नहीं मिला. जया को मां की याद आई तो वह फूटफूट कर रो पड़ी. जया अपनी नादानी पर पश्चाताप करती रही और बिलखबिलख कर रोती रही. इन आंसुओं का सौदा उस ने स्वयं ही तो किया था, तो यही उस के हिस्से में आने थे. इस मारक यंत्रणा के बीच वह अपने अतीत की यादों से ही चंद कतरे सुख पाना चाहती थी, तो वहां भी उस के जख्मों पर नमक छिड़कता करन आ खड़ा होता था.

उस दिन मां के डांटने के बाद जया समझ गई कि अब उस का घर से निकल पाना किसी कीमत पर संभव नहीं है. बस, यही एक गनीमत थी कि उसे स्कूल जाने से नहीं रोका गया था और स्कूल के रास्ते में उसे करन से मुलाकात के दोचार मिनट मिल जाते थे. आशा ने बेटी के गुमराह होते पैरों को रोकने का भरसक प्रयास किया, लेकिन जया ने उन की एक नहीं मानी. एक दिन आशा को अचानक किसी रिश्तेदारी में जाना पड़ा. जाना भी बहुत जरूरी था, क्योंकि वहां किसी की मृत्यु हो गई थी.

ये भी पढ़ें- लाली भाग 1

जल्दबाजी में आशा छोटे बेटे सोमू को साथ ले कर चली गई. जया पर प्यार का नशा ऐसा चढ़ा था कि ऐसे अवसर का लाभ उठाने से भी वह नहीं चूकी. उस ने छोटी बहन अनुपमा को चाकलेट का लालच दिया और करन से मिलने चली गई. जया ने फोन कर के करन को बुलाया और उस के सामने अपनी मजबूरी जाहिर की. जब करन कोई रास्ता नहीं निकाल पाया तो जया ने बेबाक हो कर कहा, ‘अब मैं तुम्हारे बिना नहीं जी सकती, करन. हमारे सामने मिलने का कोई रास्ता नहीं बचा है.’ जया की बात सुनने के बाद करन ने उस से पूछा, ‘मेरे साथ चल सकती हो जया?’

‘कहां?’ जया ने रोंआसी आवाज में कहा, तो करन बेताबी से बोला, ‘कहीं भी. इतनी बड़ी दुनिया है, कहीं तो पनाह मिलेगी.’ …और उसी पल जया ने एक ऐसा निर्णय कर डाला जिस ने उस के जीवन की दिशा ही पलट कर रख दी. इस के ठीक 5-6 दिन बाद जया ने सब अपनों को अलविदा कह कर एक अपरिचित राह पर कदम रख दिया. उस वक्त उस ने कुछ नहीं सोचा. अपने इस विद्रोही कदम पर वह खूब खुश थी क्योंकि करन उस के साथ था. करन जया को ले कर नैनीताल चला गया और वहां गेस्टहाउस में एक कमरा ले कर ठहर गया. करन का दिनरात का संगसाथ पा कर जया इतनी खुश थी कि उस ने एक बार भी यह नहीं सोचा कि उस के इस तरह बिना बताए घर से चले जाने पर उस के मातापिता पर क्या गुजर रही होगी. काश, उसे इस बात का तनिक भी आभास हो पाता.

जया दोपहर को उस वक्त घर से निकली थी जब आशा रसोई में काम कर रही थीं. काम कर के बाहर आने के बाद जब उन्हें जया दिखाई नहीं दी तो उन्होंने अनुपमा से उस के बारे में पूछा. उस ने बताया कि दीदी बाहर गई हैं. यह जान कर आशा को जया पर बहुत गुस्सा आया. वह बेताबी से उस के लौटने की प्रतीक्षा करती रहीं.

जब शाम ढलने तक जया घर नहीं लौटी तो उन का गुस्सा चिंता और परेशानी में बदल गया. 8 बजतेबजते किशन भी घर आ गए थे, लेकिन जया का कुछ पता नहीं था. बात हद से गुजरती देख आशा ने किशन को जया के बारे में बताया तो वह भी घबरा गए. उन दोनों ने जया को लगभग 3-4 घंटे पागलों की तरह ढूंढ़ा और फिर थकहार कर बैठ गए. वह पूरी रात उन्होंने जागते और रोते ही गुजारी. सुबह होने तक भी जया घर नहीं लौटी तो मजबूरी में किशन ने थाने जा कर उस की गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज करा दी.

ये भी पढ़ें- तृष्णा: भाग-1

त्रिया चरित्र भाग-1

रात के 10 बज रहे थे. जेल में चारों ओर सन्नाटा पसरा हुआ था. कैदियों को उन के बैरकों में भेज दिया गया था और अब तक उन में से ज्यादातर सो गए थे, तो कुछ सोने की तैयारी कर रहे थे. जेल में गश्ती दल के सिपाही गश्त पर निकल गए थे.

इन्हीं सिपाहियों में आशा भी एक थी. जब वह पहरेदारी करते हुए एक बैरक से हो कर गुजरने लगी तो एक कैदी ने उसे धीमी आवाज में पुकारा.

आवाज सुन कर आशा के पैर ठिठके और वह बैरक के लोहे के दरवाजे पर आ खड़ी हुई. लोहे के दरवाजे के उस पार उसे पुकारने वाला कैदी खड़ा था.

‘‘क्या है रमेश, तुम ने मुझे क्यों पुकारा?’’ आशा धीमी आवाज में बोली.

यह पूछते हुए आशा की निगाहें कैदी के दोहरे बदन पर फिसल रही थीं और आंखों में तारीफ के भाव उभरे हुए थे.

‘‘सुन, मुझे बाहर एक संदेश पहुंचाना है,’’ रमेश यादव बोला.

‘‘लगता है, किसी दिन तुम मुझे  फंसवा दोगे. तुम नहीं जानते, अगर किसी को इस बात का पता चल गया कि मैं तुम्हारे साथियों को बाहर तुम्हारा संदेशा पहुंचाती हूं तो मेरी अच्छीखासी नौकरी पर बन आएगी.’’

‘‘तुम्हारे साथ ऐसा कुछ नहीं होगा…’’ रमेश यादव बोला, ‘‘फिर मैं तुम्हें इस की कीमत भी तो देता हूं.’’

‘‘तुम क्या समझते हो कि मैं इस कीमत के लालच में तुम्हारा काम करती हूं,’’ आशा ने कहा.

‘‘फिर किसलिए करती हो?’’ कहते हुए रमेश यादव के होंठों पर एक हलकी सी मुसकान उभरी.

‘‘तुम्हारा यह कसरती बदन और खूबसूरत थोबड़ा मुझे पसंद आ गया है इसलिए,’’ कहते हुए आशा मुसकराई.

‘‘तू भी कुछ कम खूबसूरत और मादक नहीं है,’’ रमेश यादव ने उस के हसीन चेहरे और गदराए बदन पर एक नजर डाली.

‘‘मतलब, मैं तुम्हें पसंद हूं?’’

‘‘बहुत…’’ रमेश यादव बोला, ‘‘मैं खुद तुम्हें पाने को बेचैन हूं. पर तू फिक्र न कर. मेरे साथी जल्द ही मुझे यहां से निकाल लेंगे. फिर तो हम खुल कर एकदूसरे से मिल सकेंगे.’’

‘‘न जाने वह दिन कब आएगा,’’ आशा एक सर्द आह भर कर बोली.

‘‘जल्द आएगा…’’ रमेश यादव बोला, ‘‘खैर, मेरा यह संदेश का पुरजा इस पर लिखे पते पर पहुंचा देना.’’

आशा ने एक सतर्क निगाह चारों तरफ डाली, फिर हाथ बढ़ा कर पुरजा थाम लिया और तेजी से आगे बढ़ गई. आगे एक सुनसान जगह पर पहुंच कर उस ने पुरजा खोला तो उस में 100 रुपए का एक नोट रखा था. उस ने नोट अपनी कमीज की जेब के हवाले किया, फिर उस पुरजे को अंदर की जेब में रख कर जेल का चक्कर काटने लगी.

आशा 35 साला गदराए बदन और खूबसूरत चेहरे की थी. 10 सालों से वह पुलिस में थी और 6 महीने पहले रमेश यादव इस जेल में आया था. दोहरे बदन, मोहक चेहरेमोहरे के इस अपराधी ने जब शुरूशुरू में उस से जानपहचान करने की कोशिश की तो आशा थोड़ी हिचकी थी, फिर न जाने ऐसा क्या हुआ कि वह उस से जानपहचान करती चली गई.

शायद कसरती बदन और सलोना चेहरा उसे भा गया था या फिर अपने साथियों को संदेश पहुंचाने के एवज में वह उसे पैसे जो देता था.

रमेश यादव अपने क्षेत्र का एक बदनाम अपराधी था और दुकानदारों और कारोबारियों से रंगदारी वसूलता था. उस के साथी जान से मारने या जख्मी करने से नहीं हिचकते थे.

रमेश यादव का जेल में आनाजाना लगा रहता था. पर, चाहे वह जेल के बाहर रहता या अंदर, हर हाल में उस का धंधा चलता रहता. उस के जेल में रहने की हालत में उस के साथी उस की चिट्ठी ले कर उस के बताए दुकानदार और कारोबारी के पास पहुंचते और उस के डर से दुकानदार या कारोबारी उस के द्वारा मांगी गई रकम उस के साथी को दे देते.

रमेश यादव की ऐसी ही चिट्ठियां आशा उस के साथियों तक पहुंचाने लगी. लेनदेन में दोनों शारीरिक रूप से भी एकदूसरे की ओर खिंचते चले गए थे.

जहां आशा को रमेश का दोहरा बदन ललचाता था, वहीं रमेश आशा के गदराए मादक बदन को अपनी बांहों में समेटने का ख्वाब देखता था.

कुछ सप्ताह बाद आशा का फोन बजा, ‘हैलो.’

‘‘कौन?’’

‘मैं रमेश यादव बोल रहा हूं.’

‘‘अब याद आई है मेरी…’’ आशा अपनी आवाज में नाराजगी घोलते हुए बोली, ‘‘जबकि तुम 10 दिन पहले ही जेल से बाहर आ चुके हो.’’

‘नाराज मत हो यार…’ उधर से रमेश यादव की मनुहार भरी आवाज सुनाई पड़ी, ‘जेल जाने के कारण बहुत सारा काम पैंडिंग पड़ा था, उन्हें निबटाने में उलझ गया था. इन से जैसे ही फुरसत मिली, तुम्हें फोन किया.’

‘‘फोन कैसे किया?’’

‘अरे यार, तुझ से मिलने के लिए मन बेचैन है.’

‘‘बेचैन तो मैं भी हूं.’’

‘फिर तो ऐसा कर, आज शाम

मुझ से मिल. हम दोनों मिल कर अपनीअपनी बेचैनी मिटाएंगे,’ कह कर रमेश यादव हंसा.

‘‘कहां…?’’

‘तू किसी जानीपहचानी जगह पर तो मुझ से मिल नहीं सकती.’

‘‘फिर…?’’

‘मेरे फार्महाउस पर चली आ.’

‘‘पता बोल.’’

रमेश यादव ने पता बतलाया.

‘‘ठीक है, मैं शाम को साढ़े 5 बजे तक वहां पहुंच जाऊंगी.’’

‘अच्छी बात है.’ रमेश यादव बोला.

अपने वादे के अनुसार आशा साढ़े 5 बजे रमेश यादव के फार्महाउस पर पहुंच गई. दरवाजे पर खड़े दरबान ने उसे रमेश यादव के कमरे में पहुंचाया.

आशा को देखते ही रमेश यादव खुशदिली से बोला, ‘‘आओ आशा, मैं तुम्हारा ही इंतजार कर रहा था.’’

आशा सधे हुए कदमों से आगे बढ़ी और आ कर उस बिछावन पर बैठ गई जिस पर रमेश यादव शराब की बोतल खोले बैठा था.

‘‘यकीन करो आशा, तुम्हारे इंतजार में शराब पीने का मजा ही नहीं आ रहा था. अब तुम आ गई हो तो पीने का असली मजा आएगा.’’

‘‘जरूर…’’ आशा उसे कातिल नजरों से देखती हुई बोली, ‘‘मैं तुम्हें अपने हाथों से पिलाऊंगी,’’ कहते हुए आशा ने वहां पड़े शीशे के गिलास में शराब डाली, फिर उसे रमेश यादव की ओर बढ़ाया.

‘‘ऐसे नहीं.’’

‘‘फिर?’’

‘‘पहले तुम अपने होंठों का रस इस में घोलो. यकीन मानो, शराब का नशा दोगुना हो जाएगा.’’

आशा ने गिलास से एक घूंट भरा, फिर गिलास रमेश यादव के होंठों से लगा दिया. एक ही सांस में रमेश यादव ने गिलास खाली किया, फिर वह हसरतभरी नजरों से आशा के गदराए बदन को देखने लगा. ऐसे में जब आशा ने दोबारा गिलास भरा तो वह बोला, ‘‘ऐसे दूरदूर से मत पिला. जरा मेरे करीब आ जा.’’

बदले में आशा अपनी टांगें फैला कर उस की गोद में आ बैठी, फिर गिलास उस के होंठों से लगाया. अब की बार रमेश यादव ने जरा भी जल्दीबाजी नहीं की बल्कि घूंटघूंट शराब चुसकने लगा.

दूसरी ओर रमेश यादव के हाथ आशा के बदन की ऊंचाइयांगहराइयां नाप रहे थे. अपने बदन पर रमेश यादव के बेताब हाथों की छुअन पा कर आशा बेहाल होने लगी. ऐसे में उस ने अपने हाथ का गिलास फर्श पर टिकाया, फिर रमेश यादव को बिछावन पर लिटा कर उस को बेताबी से चूमने लगी.

आशा की इस हरकत से रमेश यादव के तनबदन में वासना के शोले भड़कने लगे और उस ने अपने ऊपर सवार आशा की कमर के इर्दगिर्द अपनी बांहें कस दीं.

इस के बाद तो आशा अकसर रमेश यादव से मिलने लगी. रमेश यादव न सिर्फ भरपूर जिस्मानी सुख देता था, बल्कि उस पर दोनों हाथों से पैसे भी लुटाता था.

आशा तो पहले ही अपने पति से खुश नहीं थी, रमेश यादव जैसा प्रेमी पा कर उस की ओर से आशा और भी लापरवाह हो गई. जेल की नौकरी में पैसा और रिश्वत दोनों मिलते थे, पर इतने नहीं.

अगले भाग में पढ़िए- क्या हुआ आशा और रमेश के नाजायज रिश्ते का… ?

त्रिया चरित्र भाग-2

यहां पढ़िए पहला भाग- त्रिया चरित्र भाग-1

अब आगे….

आशा के पति रतनलाल ने जब उस में आए इस बदलाव को महसूस किया तो उस का माथा ठनका. रतनलाल को लगा कि हो न हो, आशा ने घर से बाहर अपना कोई यार पाल लिया है.

एक रात को वह आशा से बोला, ‘‘आशा, आजकल तू किस दुनिया में रह रही है?’’

पति रतनलाल के इस सवाल पर आशा चौंकी, पर जल्द ही अपनेआप

को संभालते हुए वह बोली, ‘‘क्या मतलब…?’’

‘‘मैं देख रहा हूं कि आजकल तेरे तो रंगढंग ही बदल गए हैं. तू यह बात बिलकुल भूल गई है कि घर में तेरा एक पति भी है. रात को जब मैं तुझे हाथ लगाता हूं तो तू मेरा हाथ झटक देती है. कहीं तू ने घर के बाहर अपना कोई यार तो नहीं पाल लिया है?’’

मन ही मन डरती आशा तेज आवाज में बोली, ‘‘तुम्हें अपनी पत्नी से ऐसी बातें करते हुए शर्म नहीं आती? यह सीधासीधा मेरे चरित्र पर लांछन है.’’

‘‘अच्छा होगा, यह लांछन ही हो. मगर हकीकत में बदला तो याद रख. मैं तेरा जीना हराम कर दूंगा,’’ रतनलाल उसे घूरता हुआ बोला.

पति रतनलाल के शक को देखते हुए आशा कुछ दिनों तक रमेश यादव से मिलने में सावधानी बरतती रही और जब उसे पक्का यकीन हो गया कि रतनलाल उस की ओर से बेपरवाह हो गया है तो फिर से खुल कर उस से मिलने लगी.

पर रतनलाल उस की ओर से लापरवाह नहीं हुआ था, बल्कि चोरीछिपे उस की हरकतों पर नजर रख रहा था.

कुछ ही दिन के बाद रतनलाल को मालूम हो गया कि आशा ने रमेश यादव नामक के एक अपराधी से यारी गांठ ली है और उस के साथ मिल कर रंगरलियां मनाती है.

ये भी पढ़िए- अथ माफिया पुराण

सचाई जानते ही उस का खून खौल उठा. एक रात जब वह घर लौटी, तो रतनलाल बोला, ‘‘कहां से आ रही है तू?’’

‘‘पुलिस स्टेशन से.’’

‘‘पता है, इस समय रात के 11 बज रहे हैं?’’ रतनलाल उसे घूरता हुआ बोला, ‘‘मैं ने पुलिस स्टेशन फोन किया था. मालूम हुआ कि तू वहां से शाम 7 बजे ही निकल गई थी.’’

‘‘रास्ते में एक सहेली मिल गई थी. उसी के साथ उस के घर चली गई थी,’’ आशा उस से नजरें चुराते हुए बोली.

‘‘और तुम्हारी उस सहेली का नाम रमेश यादव है?’’ रतनलाल गुस्से से चिल्लाया, ‘‘यह कहते हुए तेरी रूह कांपती है कि तू अपने इसी यार के साथ रंगरलियां मना कर वापस लौट रही है.’’

आशा बौखलाई हुई सी उसे देखती रह गई.

‘‘बोलती क्यों नहीं?’’

‘‘यह सरासर झूठ है,’’ आशा कांपती हुई आवाज में बोली.

बदले में रतनलाल उस की ओर लपका, फिर उस के गाल पर एक जोरदार थप्पड़ रसीद करता हुआ बोला, ‘‘तू क्या समझती है, मैं अंधा और

बहरा हूं. मुझे कुछ भी दिखाई या सुनाई नहीं देता?

‘‘जानती है, जिस रमेश यादव की तू आजकल प्यारी बनी हुई है, उस के फार्महाउस का गार्ड मेरा दोस्त है. कल वह मजे लेले कर कह रहा था कि उस के साहब ने आजकल एक रखैल पाल रखी है जिस का नाम आशा है और वह घंटों उस की बांहों में झूलती वासना का नंगा खेल खेलती है.’’

आशा के मुंह से बोल नहीं फूटे. दूसरी ओर गुस्से से पागल हुआ पति रतनलाल उसे पीटता चला गया.

रतनलाल उसे पीट कर घर से निकल गया, पर आशा घंटों बेइज्जती और बदले की आग में जलतीसिसकती रही.

अगली मुलाकात में रमेश यादव से जब आशा ने ये सारी बातें कहीं, तो वह गुस्से से उबलता हुआ बोला, ‘‘उस की यह हिम्मत कि वह रमेश यादव की यार पर हाथ उठाए, पर तुम फिक्र न करो. मैं जल्द ही इस का इलाज कर दूंगा. बस, तुम्हें मेरा साथ देना होगा.’’

आशा ने उसे इस की सहमति दे दी.

आशा के घर के दरवाजे पर एक खास अंदाज में थाप पड़ी. इसे सुनते ही बिछावन पर आंखें मूंदे लेटी आशा ने अपनी आंखें खोल दीं. वह चुपके से बिछावन से उतरी, फिर बिछावन पर गहरी नींद में सोए रतनलाल पर एक गहरी नजर डालने के बाद दरवाजे की ओर बढ़ गई. उस ने जब दरवाजा खोला तो रमेश यादव जल्दी से अंदर आता हुआ बोला, ‘‘कहां है?’’

‘‘अपने कमरे में गहरी नींद में सोया पड़ा है.’’

‘‘चलो,’’ रमेश यादव बोला.

आशा ने अंदर से दरवाजा बंद कर दिया, फिर कमरे में आ गई. कमरे में बिछी चारपाई पर पति रतनलाल दीनदुनिया से बेखबर सो रहा था.

बिछावन के पास पहुंच कर रमेश यादव ने आंखों ही आंखों में आशा को कुछ इशारा किया, फिर चुपके से वह बिछावन पर चढ़ गया. उस ने रतनलाल के बगल में पड़ा तकिया उठा कर उस के मुंह पर रखा, फिर उस के सीने पर सवार हो कर अपनी हथेलियों का पूरा वजन तकिए पर डाल दिया.

दबाव पड़ते ही रतनलाल ने अपनी आंखें खोल दीं. ऐसे में जब उस की नजर अपने सीने पर सवार रमेश यादव पर पड़ी तो हैरानी से उस की आंखें फटती चली गईं. उसे समझते देर न लगी कि रमेश यादव उस का गला घोंटना चाहता है. यह समझते ही उस की आंखों में खौफ के भाव उभरते चले गए और वह उस के चंगुल से छूटने के लिए अपने हाथपैर पटकने लगा.

ये भी पढ़िए- करकट

उस के ऐसा करते ही रमेश यादव बिछावन के पास ही खड़ी आशा से बोला, ‘‘इस के पैर पकड़ो आशा.’’

पर ऐसा लगा, जैसे आशा ने उस की बात सुनी ही न हो. वह मूर्ति बनी कभी रतनलाल के सीने पर सवार, उस का गला घोंटते रमेश यादव को देख रही थी, तो कभी हाथपैर पटकते रतनलाल को.

सच तो यह था कि इस समय उस के दिलोदिमाग में एक भयानक लड़ाई चल रही थी. एक औरत और एक पत्नी में धीरेधीरे पत्नी का पलड़ा भारी पड़ता चला गया और आशा सोचने लगी कि चाहे रतनलाल कैसा भी है, पर है तो उस का पति ही. उस का और उस के बच्चे का भविष्य उसी के साथ सुरक्षित था.

दूसरी ओर रमेश यादव एक अपराधी था और इस समय भी एक अपराध करने जा रहा था. वह उसे भी इस अपराध में शामिल करना चाहता था.

पुलिस में होने के चलते आशा को यह बात अच्छी तरह से मालूम थी कि अगर उस का यह अपराध उजागर हो जाता तो उस के साथ उस की भी जिंदगी तबाह हो जाती. पर आशा ऐसा हरगिज नहीं चाहती थी, तो फिर…?

जवाब में आशा ने अपनी नजरें कमरे में चारों तरफ दौड़ाईं. उसे कमरे में एक ओर मोटा डंडा पड़ा दिखाई दिया. उस ने डंडा उठाया, फिर रतनलाल का गला घोंटते रमेश यादव के सिर पर पूरी ताकत से दे मारा.

रमेश यादव के मुंह से एक दर्दनाक चीख उभरी. रतनलाल का गला छोड़ वह अपना सिर पकड़ कर वहीं जमीन पर गिर पड़ा. उस का सिर फट गया था और वहां से खून का फव्वारा फूट पड़ा था. कुछ देर तक वह तड़पता रहा, फिर वह मर गया.

एक घंटे बाद आशा के घर में पुलिस वालों की भीड़ लगी हुई थी और उस ने इंस्पैक्टर को यह बयान दिया था कि रमेश यादव उस पर बुरी नजर रखता था जिस का विरोध उस का पति रतनलाल करता था. रमेश यादव उस के घर में घुस आया और उस ने उस के पति का गला घोंट कर मारना चाहा. अपने पति की जान बचाने के लिए उसे रमेश यादव को मारना पड़ा.

जब आशा अपना यह बयान दे रही थी तो रतनलाल हैरत भरी नजरों से उसे देख रहा था.

आशा के इस बरताव ने उसे सकते में ला दिया था और वह यह सोचने पर मजबूर हो गया था कि लोग यह गलत नहीं कहते, ‘औरत का चरित्र इनसान तो क्या कोई नहीं समझ सकता.’

Hina Khan ने खास अंदाज में दी Erica को जन्मदिन की बधाई, शेयर की पुरानी Photos

टेलिवीजन इंडस्ट्री के पौपुलर सीरियल कसौटी जिदगी की 2 (Kasautii Zindagii Kay) में प्रेरणा शर्मा बासू का किरदार निभाने वाली बेहतरीन एक्ट्रेस एरिका फर्नांडिस (Erica Fernandes) आज अपना 27वां जन्मदिन मना रही हैं. इस खास मौके पर जानी मानी एक्ट्रेस हिना खान (Hina Khan) ने एरिका को अनोखे अंदाज में जन्मदिन की बधाई दी. हिना खान ने एरिका की अन्देखी फोटोज सोशल मीडिया पर शेयर कर उन्हें जन्मदिन की शुभकामनाएं दी.

erica

एरिका फर्नांडिस (Erica Fernandes) और हिना खान (Hina Khan) ने एक साथ सीरियल कसौटी जिंदगी की 2 में ही काम किया था. जहां एक तरफ एरिका ने प्रेरणा शर्मा का किरदार निभाया था तो वहीं दूसरी तरफ हिना खान ने उसी सीरियल में कमोलिका का रोल अदा किया था. पिछले साल हिना खान ने एरिका के जन्मदिन पर शानदार एंट्री मारी थी और उसी दिन की फोटोज ही हिना खान ने शेयर कर एरिका को खास अंदाज में बधाई दी है.

ये भी पढ़ें- धोनी की EX-गर्लफ्रेंड रह चुकी हैं ये साउथ एक्ट्रेस, बिकिनी गर्ल के नाम से हैं फेमस

erica-1

एरिका फर्नांडिस एक बेहतरीन और खूबसूरत एक्ट्रेस होने के साथ साथ खुशमिजाज इंसान हैं और अपनी लाइफ को खुल कर जीना पसंद करती हैं. यह पार्टी की फोटोज इस बात का सबूत है कि एरिका को मस्ती करना और सबके साथ एंजौय करना बेहद पसंद है. एरिका ने सीरियल्स के अलावा तमिल, तेलुगू, कन्नड़ और हिन्दी फिल्मों में भी काम किया है.

ये भी पढ़ें- Lockdown के बीच Sunny Leone ने किया प्रैंक तो बदहवास दिखे पति Daniel

कसौटी जिंदगी की 2 से पहसे एरिका ने सोनी टीवी के सीरियल कुछ रंग प्यार के ऐसे भी में डा. सोनाक्षी दिक्षित का किरदान निभाया था. एरिका फर्नांडिस दिखने में भी काफी खूबसूरत हैं और फैंस भी उनकी एक्टिंग के साथ साथ उनके लुक्स के भी दिवाने हैं.

ये भी पढ़ें- एक बार फिर छाया अंगूरी भाभी का जादू, सोशल मीडिया पर वायरल हुईं Shilpa की ये फोटोज

कोरोना ने किया आइसक्रीम बिजनेस का कबाड़ा

इस साल गर्मियों के मौसम का सबसे पसंदीदा आइसक्रीम व्यवसाय कोरोना वायरस की चपेट में आ गया है. लौक डाउन की बजह से इस व्यवसाय को करोड़ों रुपए का घाटा हुआ है और इस व्यवसाय से जुड़े लाखों लोग बेरोजगार हो गए हैं.

आइसक्रीम कारोबार के लिए मार्च, अप्रेल,म‌ई और जून के चार महीने  का समय सबसे ज्यादा आमदनी वाला सीजन होता है. इन्हीं महिनों में शादी विवाह और विभिन्न प्रकार के समारोह होने के कारण पूरे कारोबार का पचास फीसदी बिजनेस होता है. यही कारण है कि इसके कारोबारी इस सीजन का आठ माह इंतजार करते हैं. 25 मार्च से लौक डाउन के शुरू होते ही आइसक्रीम और कोल्ड ड्रिंक का व्यवसाय पूरी तरह  पटरी से उतर गया है.

आइसक्रीम कारोबार से जुड़े लोगों का कहना है कि करोड़ों रुपए मूल्य की आइसक्रीम और कच्चा माल फैक्ट्रियों में रखा हुआ है, लेकिन पार्लर बंद रहने से सप्लाई नहीं हो पा रही है.ग्रीन जोन में भी आइसक्रीम सप्लाई की अनुमति न होने से तैयार माल खराब होने की कगार पर है.

ये भी पढ़ें- औरतें, शराब और कोरोना

लौक डाउन के दौरान अकेले मध्यप्रदेश में करीब 150 करोड़ का नुक़सान आइसक्रीम कारोबारियों को हुआ है.प्रदेश में आइसक्रीम की खपत भोपाल, इंदौर, ग्वालियर, जबलपुर में सबसे ज्यादा होती है.इंदौर और भोपाल शहरों में अलग अलग कंपनियों के करीब 80 डिस्ट्रीब्यूटर हैं और हर साल रोजाना आठ से दस लाख की बिक्री होती है.लेकिन इस वार इस कारोबार पर कोरोना की माश्र पडी है. इंदौर के टाप एन टाउन के डिस्ट्रीब्यूटर दर्पण हसीजा के अनुसार इस सीजन में बड़ा नुक़सान हुआ है. अब उम्मीद यही कर रहे हैं कि 17 म‌ई के बाद कुछ रिकवरी इस कारोबार में हो सके.ग्वालियर  के बाडीलाल कंपनी के संदीप जैन के मुताबिक रेस्टोरेंट,बार, शापिंग मॉल, पार्लर आदि बंद होने से कारोबार का कबाड़ा ही हो चुका है.

18 फीसदी टेक्स स्लैब से जुड़े इस कारोबार में कारोबारियों को तो करोड़ों का नुक़सान हुआ ही है, इस व्यवसाय से जुड़े लेबर भी लौक डाउन में अपने अपने घर की ओर पलायन कर गये हैं. भोपाल के हबीबगंज स्टेशन इलाके में ठेला गाड़ी चलाने वाले मनमोहन चौरसिया बताते हैं कि लौक डाउन में आइसक्रीम का काम बंद रहने से रोज़ी रोटी का संकट खड़ा हो गया था, इसलिए मजबूरन वे अपने गांव वापस आ गये हैं.

लौक डाउन की बजह से वर्फ की फैक्ट्रियों में भी ताले लटके हुए हैं. आइस फैक्ट्री के संचालक संदीप जायसवाल का कहना है कि मार्च के आखिर में ही वर्फ की मांग शुरू हो जाती है, लेकिन लौक डाउन लागू होते ही न इस वार आर्डर मिले और न ही फैक्ट्री चालू हो सकी. फैक्ट्री  से हर साल छोटे छोटे व्यवसायी भी वर्फ ले जाकर गांव कस्बों में बेचते थे, जो इस वार पूर्ण रूप से बंद है. मटका कुल्फी का धंधा गांव और कस्बाई इलाकों में काफी लोकप्रिय है और इनसे जुड़े लोगों के लिए फायदेमंद भी है . राजस्थान से क‌ई लोग मध्यप्रदेश के गांवों में आकर मटका कुल्फी बनाने एव बेचने का काम करते हैं. होली के बाद से ही ये गांव, कस्बों में आ जाते हैं, परन्तु इस वार  मटका कुल्फी का धंधा शुरू नहीं कर पाए. लौक डाउन  होने से ऐसे लोग बेकारी में समय काट रहे हैं. वर्फ फैक्ट्रियां बंद होने के बावजूद उल्टे लाखों रुपए के विजली बिल उनके मालिकों को थमाये जा रहे हैं. कमोवेश यही हाल कोल्ड ड्रिंक कंपनियों का है.

ये भी पढ़ें- आईएएस रानी नागर का इस्तीफा: संगठित हिंदुत्व ने उजाडे ख्वाब

आइसक्रीम और कोल्ड ड्रिंक व्यवसाय से जुड़े लोग भी सरकार से अब राहत की मांग करने लगे हैं.उन्हे अब सरकार से यही आस लगी है कि 17 म‌ई के बाद इस सेक्टर को भी पूरी छूट दी जाय, जिससे  एक डेढ़ महिने के बचे हुए सीजन में कुछ भरपाई हो सके.

डायन के नाम पर सर मुंड़ाकर कपड़े फाड़कर एवं पेशाब पिला कर गांव से बाहर निकाला

बिहार राज्य के मुजफ्फरपुर जिला अंतर्गत डकरामा नाम के गाँव में डायन के नाम पर तीन महिलाओं को सिर मुड़वाकर, पेशाब पिलाई और पूरे गाँव मे घुमाया.तीन औरतें लाचार बैठी हैं. पास खड़ी भीड़ शोर कर रही है. उन औरतों का सिर का मुंडन किया जा रहा है और पेशाब पिलाया जा रहा है. और लोग हँस रहे हैं. इस तरह का वीडियो वायरल हो रहा है. एक आदमी जब मदद करने के लिए आया तो उसे भी यही सजा सुना दी गयी जो इन औरतों को सुनाई गयी थी.उसके बाद पंचायत ने तीनों औरतों को गाँव से निकाल दिया.वे लोग चली भी गयीं.एक औरत इस गाँव की थी बाकी दो उसके रिश्तेदार थे.

द  फ्रीडम के संस्थापक सुधीर कुमार ने दिल्ली प्रेस को बताया कि एक ओर सरकार, प्रशासन और बुद्धिजीवी तबका डायन प्रथा को खत्म करने के प्रयास में जुटा है, दूसरी ओर पुरोहित बिरादरी और पाखंड समर्थक पूरे जोर-शोर से डायन प्रथा को बढ़ावा देने में लगे हुए हैं. पुरोहितों और उनकी ढकोसलेबाजी का प्रमुख समर्थक मीडिया भी इसमें अप्रत्यक्ष रूप से खूब समर्थन कर रहा है.

पहले हम जानते हैं कि डायन प्रथा का मूल आधार क्या है ? डायनों के बारे में कहा जाता है कि वह मंत्र पढ़कर (देहातों में बान मारना भी कहा जाता है) किसी की जान ले सकती है या फिर बीमार कर दे सकती है.मंत्र और टोटके के सहारे वह ऐसे कारनामें कर सकती है, जो और किसी भी तरह संभव ही नहीं है.यानी मंत्रों में शक्ति होती है, यह डायन प्रथा का मुख्य आधार है.

विज्ञान के विकास ने और मानवाधिकारों के प्रति बढ़ती जागरुकता ने इन ढकोसलों के खिलाफ काफी काम किया है. लोगों को लगातार लंबे अरसे तक समझाने के बाद काफी हद तक यह समझाने में सफलता मिली है कि डायन का असर केवल मन का वहम है.ऐसा कुछ नहीं होता. बीमारियों और मौतों के पीछे दूसरे कारण होते हैं.

परंतु, दूसरी ओर हर धर्म के पुरोहित लगातार मंत्रवाद को बढ़ावा देने में लगे हुए हैं.वे दिन-रात इस थ्योरी में लगे रहते हैं कि मंत्रों में शक्ति होती है.मंत्रों का असर होता है. हालांकि मंत्रों के असर का षड्यंत्रों का काफी हद तक पर्दाफाश हो चुका है, लेकिन पुरोहित वर्ग इसे फिर से लोगों के मन में बिठाने में लगा है. इसमें पूरा साथ दे रहा है मीडिया.

ये भी पढ़ें- रातों का खेल: भाग 2

लगभग सभी समाचार पत्रों और चैनलों में मंत्रों की महिमा बार-बार बताई जा रही है. फलाने मंत्र से यह लाभ होता है, फलाने मंत्र से शक्ति बढ़ती है, फलाने मंत्र से पुत्रों की रक्षा होती है.कई बार तो यह चुटकुला की हद तक हास्यास्पद हो जाता है.जैसे हाल ही में नागपंचमी के दिन एक समाचार पत्र में छपा कि फलाने मंत्र के जाप से सर्पदंश का असर कम हो जाता है.पाखंड फैलाने वाला यह आलेख आधे पेज पर छपा था.यह लिखने वाला पुरोहित और छापने वाला संपादक दोनों ही जानते हैं कि यह कोरा पाखंड फैलाने से अधिक कुछ नहीं है.

इसी तरह चैनलों और अखबारों में देवी-देवताओं को खुश करने वाले मंत्र लगातार बताये जा रहे हैं. कई दीर्घायु होने के मंत्र भी हैं. हालांकि हाल के वर्षों में देवताओं को खुश करने में लगे भक्त ही थोक में मर रहे हैं या मारे जा रहे हैं.केदारनाथ, वैष्णो देवी, बोलबम यात्रा से लेकर हज आदि इसके ढेर सारे उदाहरण हैं.

पुरोहित वर्ग लगातार ढोंग ढकोसले फैलाने के उपाय तलाशते रहता है. कभी गणेश को दूध पिलाकर, कभी पेड़ में देवी-देवताओं के चेहरे दिखाकर.और फिर ढेर सारे पर्व-त्यौहार तो हैं ही.

लेकिन मंत्रों का प्रभाव बताना इन सबमें सबसे अधिक खतरनाक है. यह सीधे तौर पर डायन प्रथा और झाड़-फूंक को बढ़ावा देना है. अपनी दुकानदारी चलाने के लिए पुरोहित वर्ग यह लगातार कर रहा है.शर्मनाक है कि इसमें मीडिया घराने भी सहयोग कर रहे हैं. तिलक लगाने वाले ढोंगियों का बाजार गुलजार हो जाएगा, यह उतना खतरनाक नहीं है.लेकिन मंत्रों का असर अगर लोगों को दिमाग में बैठने लगा तो फिर डायन के नाम पर गरीब और लाचार औरतों की शामत आएगी ही.उन पर अमानवीय जुल्म तेजी से बढ़ने लगेंगे.

इसी तरह हवन आदि कर्मकांडों को भी बढ़ावा देने पर जोर दिया जा रहा है.चंद दिन पहले कोरोना जब फैलना शुरू हुआ था तो पाखंड समर्थकों ने देश भर में हवन किया.दूसरे मजहब के पाखंडियों ने अल्लाह से रहम की अपील और गॉड की विशेष प्रार्थना शुरू कर दी.हवन और दुआ में इतनी ही शक्ति है तो फिर खुद पुजारी, मौलवी और पादरी अस्पताल में भर्ती होने की मूर्खता क्यों कर रहे हैं? जो भगवान अपना मंदिर और जो खुदा अपनी मस्जिद नहीं बचा सकता, वह दूसरों को क्या बचाएगा?

ये भी पढ़ें- पति की गरदन पर प्रेमी का वार: भाग 2

ऐसा ही नजारा क्रिकेट विश्वकप के दौरान भी दिखता है. प्रशंसक टीम को जीतने के लिए हवन करते हैं.जब टीम हारती है तो क्रिकेटरों पर गुस्सा करते हैं. अरे मूर्खों, जब तुम्हारे देवताओं की जीत दिलाने की औकात नहीं थी तो बेचारे क्रिकेटर तो साधारण मनुष्य हैं.अखबार वाले भी देवी-देवताओं की बजाय खिलाड़ियों को कोसने लगते हैं.इससे यह तो साफ जाहिर हो जाता है कि सबको पता है कि हवन और प्रार्थना सिवाय ढोंग-ढकोसला के और कुछ नहीं है. लेकिन पुरोहित प्रपंच जारी रखने के लिए यह आवश्यक है.चाहे देश जितना बदहाल हो जाए. मंत्र की शक्ति साबित करने के पाखंड को बढ़ावा देते रहेंगे.

पुरोहितों को इससे क्या ? उन्हें तो सिर्फ अपनी दुकान की फिक्र है. वे अपनी दुकान चलाने के लिए साईं को लेकर तो धर्मसभा कर सकते हैं, लेकिन एक बार भी डायन प्रथा का विरोध नहीं कर सकते. लेकिन वे भी बेचारे क्या करें, डायन प्रथा को झूठा कहेंगे तो उनके मंत्रों के पाखंड का पर्दाफाश हो जाएगा. उनकी दुकान बंद होने लगेगी.और मीडिया भी आजकल दुकानदारी ही हो गया है. उसे चाहिए मसाला और विज्ञापन चाहे निर्मल जैसे चुटकुलेबाज बाबा को ही क्यों न दिन-रात चलाना पड़े. चाहे इसके लिए लोगों को जागरूक करने की बजाय अंधविश्वास ही क्यों न फैलाना पड़े.अंधविस्वास के विरोध में सच्चाई के पक्ष में दिल्ली प्रेस की पत्रिकाएँ लगातार आर्टिकल प्रकाशित करते रहती है.चंद मीडिया घराना और कुछ सामाजिक संगठन लगातार संघर्षरत हैं.लेकिन उनलोगों के सामने इनका संघर्ष छोटा पड़ जा रहा है.

तो फिर हाल क्या है? पुरोहितों को तो कोई समझा नहीं सकता कि अब पाखंड फैलाना बंद करो. जो लोग डायन प्रथा को गलत मानते हैं, उन्हें मुखर होना पड़ेगा.डायन प्रथा की जड़ पर प्रहार करना होगा.वह यह है कि लोगों को बताया जाए कि मंत्रों में, दुआओं में, हवन-रोजा, नमाज में कोई शक्ति नहीं होती.ये सब पाखंड और शोषण के तरीके हैं.यह पुरोहितों की चाल है अपनी दुकानदारी चमकाने के लिए.

ये भी पढ़ें- रातों का खेल: भाग 1

सीधी सी बात है कि अगर आप मानते हैं  कि मंत्र, दुआ और प्रार्थना में शक्ति होती है तो आप भी डायन प्रथा के समर्थक हैं, क्योंकि डायन प्रथा का मूलाधार ही यही है.डायन प्रथा के झूठे विरोध की नौटंकी मत कीजिए.

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें