Best of Crime Stories: प्यार किसी का मौत किसी को

7 मई, 2017 को मध्य प्रदेश के जिला झाबुआ की कोतवाली के प्रभारी आर.सी. भास्करे को हाथीपावा पहाड़ी पर चल रहे श्रमदान में जाना था. वहां एसपी महेशचंद जैन तथा जिलाधिकारी भी आ रहे थे, इसलिए वह समय से वहां पहुंच गए थे.

लेकिन आर.सी. भास्करे जैसे ही वहां पहुंचे, उन्हें किसी ने बताया कि नयागांव और डगरा फलिया के बीच सड़क पर एक लाश पड़ी है, जो नयागांव के रहने वाले तूफान थामोर की है. उस की मोटरसाइकिल भी वहीं पड़ी है. शायद रात को शराब पी कर वह मोटरसाइकिल से घर जा रहा था, तभी उस का एक्सीडेंट हो गया है.

आर.सी. भास्करे ने यह बात एसपी महेशचंद जैन को बताई तो उन्होंने दिशानिर्देश दे कर तुरंत उन्हें घटनास्थल पर पहुंचने को कहा. जब वह घटनास्थल पर पहुंचे तो उन्होंने देखा कि मोटरसाइकिल गिरी पड़ी है. लाश उसी मोटरसाइकिल के नीचे पड़ी थी. उन्होंने गौर से मोटरसाइकिल और लाश का निरीक्षण किया तो उन्हें यह देख कर हैरानी हुई कि न तो मोटरसाइकिल में किसी तरह की टूटफूट हुई थी और न ही मृतक को कहीं चोट लगी थी.

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वहां मोटरसाइकिल के घिसटने का भी कोई निशान नहीं था. जबकि अगर एक्सीडेंट हुआ होता तो मृतक को तो गंभीर चोट आई ही होती, मोटरसाइकिल भी उस के ऊपर गिरने के बजाय कहीं दूर पड़ी होती, साथ ही उस के घिसटने या गिरने के निशान भी होते.

मृतक और मोटरसाइकिल की स्थिति देख कर आर.सी. भास्करे को समझते देर नहीं लगी कि यह हत्या का मामला है. तूफान की हत्या कर के उस के ऊपर मोटरसाइकिल रख कर उसे एक्सीडेंट का रूप देने की कोशिश की गई है. आर.सी. भास्करे ने मृतक के घर सूचना भिजवा दी थी. सूचना पा कर मृतक की पत्नी रेमुबाई रोती हुई आ पहुंची. वह लाश पर सिर पटकपटक कर रो रही थी. पुलिस ने सांत्वना दे कर उसे अलग किया.

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आर.सी. भास्करे लाश और मोटरसाइकिल का निरीक्षण कर रहे थे कि एसपी महेशचंद्र जैन भी आ गए. उन्होंने भी लाश एवं घटनास्थल का निरीक्षण किया. आर.सी. भास्करे ने उन्हें अपने मन की बात बताई तो उन्होंने भी उन की बात का समर्थन किया. एसपी साहब थानाप्रभारी को आवश्यक निर्देश दे कर चले गए.

इस के बाद आर.सी. भास्करे के साथ आए एसआई पी.एस. डामोर, एम.एल. भाटी, एएसआई अनीता तोमर, आरक्षक रामकुमार व गणेश की मदद से घटनास्थल की काररवाई निपटाने लगे. उन्होंने सारी औपचारिकताएं पूरी कर के लाश को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया.

अब तक मृतक की पत्नी रेमुबाई काफी हद तक शांत हो गई थी. आर.सी. भास्करे ने उस से पूछताछ शुरू की तो उस ने बताया कि उस के पति की मौत एक्सीडेंट से हुई है. पुलिस ने जब उस से कहा कि तूफान की मौत एक्सीडेंट से नहीं हुई, किसी ने उस की हत्या की है तो उस ने हैरानी से कहा, ‘‘साहब, मेरे पति की कोई हत्या क्यों करेगा? उन की तो किसी से कोई दुश्मनी भी नहीं थी. आप को गलतफहमी हो रही है. रात में वह रोज शराब पी कर लौटते थे. कल भी शराब पी कर आ रहे होंगे, रास्ते में दुर्घटना हो गई होगी.’’

‘‘जब तुम्हारे पति रात में घर नहीं पहुंचे तो तुम ने उन की खोजखबर नहीं ली?’’ आर.सी. भास्करे ने पूछा.

‘‘साहब, खोजखबर क्या लेती, यह कोई एक दिन की बात थोड़े ही थी. अकसर शराब पी कर वह रात को घर से गायब रहते थे. कल वह घर नहीं पहुंचे तो मैं ने यही समझा कि हमेशा की तरह आज भी कहीं रुक गए होंगे.’’ रेमुबाई ने कहा.

रेमुबाई जिस तरह आत्मविश्वास के साथ पुलिस के सवालों का जवाब दे रही थी, वह भी हैरानी की बात थी. जिस औरत का पति मर गया हो, उस का इस तरह जवाब देना पुलिस को शक में डाल रहा था. क्योंकि इस स्थिति में तो औरत को कुछ कहनेसुनने का होश ही नहीं रहता.

बहरहाल, इस पूछताछ में पता चला था कि मृतक तूफान झाबुआ के बसस्टैंड के पास स्थित नीरज राठौर के टेंटहाउस में काम करता था. उस दिन शाम को घर आने के बाद साढ़े 10 बजे के करीब थोड़ी देर में लौट आने को कह कर वह मोटरसाइकिल ले कर घर से निकला तो लौट कर नहीं आया था.

आर.सी. भास्करे ने टेंटहाउस के मालिक नीरज राठौर और उस के यहां काम करने वाले कर्मचारियों से पूछताछ की तो उन सभी ने भी यही बताया कि तूफान बहुत ही मेहनती और सीधासादा आदमी था. ऐसे आदमी की भला किसी से क्या दुश्मनी होगी, जो उस की हत्या कर दी जाए.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार, तूफान की मौत मारपीट की वजह से हुई थी. अब पूरी तरह से साफ हो गया था कि यह एक्सीडेंट का मामला नहीं था. इस के बाद कोतवाली पुलिस ने अज्ञात के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज कर जांच शुरू कर दी.

आर.सी. भास्करे जल्द से जल्द इस मामले का खुलासा करना चाहते थे, लेकिन 3 दिनों की जांच में उन के हाथ कोई सुराग नहीं लगा. अंत में उन्होंने मुखबिरों की मदद ली. किसी मुखबिर से उन्हें पता चला कि तूफान की हत्या के बाद से उस की पत्नी रेमुबाई ने अपना मोबाइल फोन बंद कर लिया है.

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यह सुन कर आर.सी. भास्करे सोच में पड़ गए कि रेमुबाई ने आखिर अपना मोबाइल फोन क्यों बंद कर लिया है? उन्हें कुछ गड़बड़ लगा तो उन्होंने तूफान के बेटे को कोतवाली बुला कर पूछताछ की. एक सवाल के जवाब में बच्चा गड़बड़ाया तो उस का जवाब उन्होंने अपनी मां से पूछ कर बताने को कहा.

इस पर बच्चे ने कहा कि उस की मां का मोबाइल फोन बंद है, इसलिए वह उन से सवाल का जवाब नहीं पूछ सकता. थानाप्रभारी की समझ में नहीं आ रहा था कि ऐसी कौन सी वजह है कि रेमुबाई ने अपना मोबाइल फोन बंद कर दिया है.

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अब उन्हें तूफान की हत्या में रेमुबाई का हाथ होने का शक हुआ. उन्होंने यह बात एसपी महेशचंद्र जैन को बताई तो उन्होंने तुरंत रेमुबाई को थाने बुला कर पूछताछ करने का आदेश दिया.

थाने बुला कर रेमुबाई से पूछताछ शुरू हुई तो वह एक ही जवाब दे रही थी कि उसे नहीं मालूम कि उस रात क्या हुआ था? उसे सिर्फ यही पता है कि वह रात को घर से निकले तो लौट कर नहीं आए. घर आते समय उन का एक्सीडेंट हो गया था.

जब आर.सी. भास्करे ने पूछा कि तूफान की मौत के बाद उस ने अपना मोबाइल फोन क्यों बंद कर लिया तो इस का जवाब देने में रेमुबाई बगलें झांकने लगी. घबराहट उस के चेहरे पर साफ नजर आने लगी.

फिर तो थानाप्रभारी को समझते देर नहीं लगी कि तूफान की हत्या में किसी न किसी रूप में इस का भी हाथ है.  उन्होंने रेमुबाई को एएसआई अनीता तोमर के हवाले कर दिया. उन्होंने सख्ती से उस से पूछताछ शुरू की तो रेमुबाई ने पति की हत्या का अपना अपराध स्वीकार करने में देर नहीं लगाई. इस के बाद उस ने पति की हत्या की जो कहानी सुनाई, वह कुछ इस तरह थी—

मध्य प्रदेश के जिला झाबुआ की कोतवाली के अंतर्गत रहने वाले तूफान की पत्नी रेमुबाई के पेट में ऐसा दर्द उठा कि कई डाक्टरों के इलाज के बाद भी ठीक नहीं हुआ. तभी उस के एक परिचित ने बताया कि झाबुआ से ही जुड़े गुजरात के जिला दाहोद के थाना कतवारा के गांव खगेला का रहने वाला तांत्रिक मंथूर उस का इलाज कर सकता है.

उसे पूरा विश्वास है कि उस की झाड़फूंक से वह निश्चित रूप से ठीक हो जाएगी. यह करीब 4 साल पहले की बात है. रेमुबाई पति तूफान को ले कर तांत्रिक मंथूर के पास पहुंची. रेमुबाई पर एक गहरी नजर डाल कर तांत्रिक मंथूर ने कहा कि उसे 16 शनिवार बिना नागा लगातार आना पड़ेगा. तूफान नौकरी करता था, इसलिए वह पत्नी को हर शनिवार ले कर तांत्रिक के यहां नहीं जा सकता था. इसलिए रेमुबाई अकेली ही तांत्रिक मंथूर के यहां हर शनिवार झाड़फूंक कराने जाने लगी.

तांत्रिक मंथूर ने 4 शनिवार तक नीम की पत्तियों से उस की झाड़फूंक की. 5वें शनिवार को उस ने रेमुबाई से अपने कपड़े ढीले कर के फर्श पर लेट जाने को कहा. रेमुबाई को किसी तरह का कोई शकशुबहा तो था नहीं, इसलिए वह कपड़े ढीले कर फर्श पर लेट गई. करीब 2 घंटे तक मंथूर मंत्र पढ़ते हुए उस के शरीर पर हाथ फेरते हुए उस की बीमारी भगाता रहा.

रेमुबाई के अनुसार, मंथूर भले ही अधेड़ था, लेकिन उस के हाथों में ऐसी तपिश थी कि जब वह उस के शरीर पर हाथ फेरता था तो उसे अजीब सा सुख मिलता था.

7वें शनिवार को मंथूर ने उस से सारे कपड़े उतार कर लेटने को कहा तो रेमुबाई मना नहीं कर सकी. वह कपड़े उतार कर लेटने लगी तो तांत्रिक मंथूर ने दवा के नाम पर उसे थोड़ी शराब पीने को दी.

इस के बाद तांत्रिक ने भी शराब पी. झाड़फूंक करतेकरते मंथूर रेमुबाई के ऊपर लेट गया तो तांत्रिक प्रक्रिया समझ कर रेमुबाई ने कोई विरोध नहीं किया. इस तरह तांत्रिक मंथूर ने उस के साथ शारीरिक संबंध बना लिए.

इस के बाद रेमुबाई जब भी उस के यहां इलाज कराने जाती, मंथूर उसे शराब पिला कर उस के साथ शारीरिक संबंध बनाता. मंथूर के प्यार में तूफान से ज्यादा जोश और गरमी थी, इसलिए उसे उस के साथ शारीरिक संबंध बनाने में आनंद आने लगा. दूसरी ओर मंथूर भी रेमुबाई का दीवाना हो चुका था. अब वह इलाज के बहाने उस के घर भी आने लगा था.

16 शनिवार पूरे हो गए तो तूफान ने पत्नी से कहा, ‘‘अब तो तुम्हारा इलाज पूरा हो चुका है, अब तुम तांत्रिक के यहां क्यों जाती हो?’’

तांत्रिक के प्यार में उलझी रेमुबाई ने कहा, ‘‘अभी मैं पूरी तरह स्वस्थ नहीं हुई हूं, इसलिए अभी मुझे इलाज की और जरूरत है.’’

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आखिर कब तक रेमुबाई बहाने बना कर तांत्रिक के पास जाती रहती. मंथूर भी उस के घर लगातार आता रहा. इन्हीं बातों से तूफान को पत्नी पर शक हुआ तो वह पत्नी को मंथूर के यहां जाने से रोकने लगा. अब इलाज तो सिर्फ बहाना था, रेमुबाई तो मंथूर से मिलने जाती थी, इसलिए पति के मना करने के बावजूद वह नहीं मानी.

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रेमुबाई की जिद से तूफान को चिंता हुई. फिर तो दोनों में झगड़ा होने लगा. रेमुबाई को लगा कि इलाज और बीमारी के नाम पर अब यह खेल ज्यादा दिनों तक नहीं चल सकता. जबकि वह मंथूर के प्यार में इस कदर कैद हो चुकी थी कि अब उस के बिना नहीं रह सकती थी, इसलिए वह उस के लिए कुछ भी कर सकती थी.

शायद यही वजह थी कि उस ने मंथूर से तूफान को रास्ते से हटाने के लिए कह दिया. मंथूर भी रेमुबाई के लिए कुछ भी करने को तैयार था. इसलिए उस के कहने पर वह भी तूफान की हत्या करने को तैयार हो गया.

योजना बना कर 6 मई, 2017 को मंथूर अपने दोस्त गोरचंद के साथ नयागांव डूंगरा के जंगल में पहुंचा और एक पेड़ की आड़ में छिप कर बैठ गया. रेमुबाई को उस ने यह बात बता दी, इसलिए जैसे ही तूफान घर आया, उस ने बहुत ज्यादा पेट में दर्द होने की बात कह कर कहा, ‘‘मंथूर किसी का इलाज करने झाबुआ आया है, मैं ने उसे फोन किया था, वह आने को तैयार है, इसलिए तुम डूंगरा जा कर उसे ले आओ.’’

तूफान बिना देर किए मोटरसाइकिल ले कर तांत्रिक मंथूर को लेने चला गया. नयागांव और डूंगरा के बीच मंथूर गोरचंद के साथ बैठा तूफान के आने का इंतजार कर रहा था.

जैसे ही तूफान उन के करीब पहुंचा, दोनों ने लाठियों से पीटपीट कर उस की हत्या कर दी. इस के बाद उस की लाश को मोटरसाइकिल के नीचे रख दिया, ताकि देखने से लगे कि इस का एक्सीडेंट हुआ है.

लेकिन उन की यह चाल कामयाब नहीं हुई और थानाप्रभारी आर.सी. भास्करे को सच्चाई का पता चल गया.

रेमुबाई की गिरफ्तारी के बाद आर.सी. भास्करे ने तांत्रिक मंथूर और उस के साथी गोरचंद को भी गिरफ्तार कर लिया था. इस के बाद तीनों को अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. जेल जाने के बाद रेमुबाई के हाथ से वह सब भी निकल गया, जो था. आखिर पति के साथ उसे ऐसी क्या तकलीफ थी, जो अधेड़ तांत्रिक के प्यार में पड़ कर अपना सब लुटा बैठी.

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सुशांत सिंह राजपूत की पोस्टमार्टम रिपोर्ट पर उठाया शेखर सुमन ने सवाल, ट्वीट कर कही ये बड़ी बात

बौलीवुड इंडस्ट्री के जाने माने एक्टर जिन्होनें अपनी फिल्मों से हमें खूब प्रेरित किया है वही आज हमारे बीच नहीं रहे. जी हां हम यहां बात कर रहे हैं सुशांत सिंह राजपूत (Sushant Singh Rajput) की जिन्होनें 14 जून को अपने अपार्टमेंट में खुद को फांसी लगा ली थी. इस खबर से ना सिर्फ सुशांत के फैंस बल्कि बौलीवुड इंडस्ट्री से जुड़े लोगों को भी यकीन नहीं हो रहा कि वे इस यह दुनिया छोड़ कर जा चुके हैं. खबरों की माने तो सुशांत पिछले 6 महीनों से डिप्रेशन में थे.

 

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I blame myself for not being in touch with you for the past year….. I have felt at times like you may have needed people to share your life with…but somehow I never followed up on that feeling…will never make that mistake again…we live in very energetic and noisy but still very isolated times …some of us succumb to these silences and go within…we need to not just make relationships but also constantly nurture them….Sushants unfortunate demise has been a huge wake up call to me …to my level of compassion and to my ability to foster and protect my equations…..I hope this resonates with all of you as well….will miss your infectious smile and your bear hug ….💔💔💔

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सुशांत सिंह राजपूत (Sushant Singh Rajput) के जाने का बाद बौलीवुड इंडस्ट्री के बारे में कई बातें सामने आई हैं जिससे के सभी लोग काफी गुस्से में हैं. सबसे बड़ी बात जो सामने आई वो ये है कि करण जौहर (Karan Johar), सलमान खान (Salman Khan), आलिया भट्ट (Alia Bhatt) और संजय लीला भंसाली (Sanjay Leele Bhansali) जैसे लोग इंडस्ट्री में नेपोटिज्म (Nepotism) फैला रहे हैं और इसका मतलब ये है कि ये लोग सिर्फ बड़े बड़े स्टार्स के बच्चों को ही अपनी फिल्म में लेना चाहते हैं फिर चाहे उनमें कोई टैलेंट हो या ना हो.

 

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Receive without pride, let go without attachment. #Meditations

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ऐसे में सुशांत सिंह राजपूत जैसे टैलेंटेड एक्टर्स जो कि स्ट्रगल कर इंडस्ट्री का हिस्सा बनना चाहते हैं उन्हें ये लोग आगे नहीं बढ़ने देते और इसी वजह से फैंस के साथ इंडस्ट्री से जुड़े कई लोग भी इस सुसाइड को मर्डर बता रहे हैं. बीते दिनों ही सुशांत की फाइनल पोस्टमोर्टम रिपोर्ट सामने आई है जिसमें साफ लिखा हुआ है कि सुशांत ने खुद से ही फांसी लगा कर आत्महत्या की है और उनके शरीर पर किसी तरह का कोई बाहरी निशान नहीं है.

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ऐसे में एक्टर शेखर सुमन (Shekhar Suman) को इस पोस्टमोर्टम रिपोर्ट पर भी शक है. हाल ही में शेखर सुमन ने अपने ट्विटर अकाउंट पर 2 ट्वीट्स किए हैं जिसमें से उन्होनें पहले ट्वीट में लिखा है कि, “तो यह साफ कर दिया गया है कि सुशांत सिंह राजपूत की मृत्यु में किसी का हाथ नहीं है और यह एक आत्महत्या है. इस जाल में नहीं फंसना है. मुझे शक था कि कुछ ऐसा ही होगा. यह पहले से ही तय था. इसीलिए यह फोरम महत्वपूर्ण है,  हम सभी को यहां अपनी आवाज उठानी है ताकि दोबारा जांच हो.”

वहीं शेखर सुमन (Shekhar Suman) ने अपने दूसरे ट्वीव में लिखा कि, “हमें इन सुसाइड जैसी कहानियां बनाने वालों के खिलाफ कड़क आवाज़ उठानी होगी. हम इस बार इस सब को नहीं मानेंगे और ना ही चुप बैठेंगे. #justiceforSushantforum.”

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आपको बता दें कि शेखर सुमन के अलावा ऐसे और भी लोग है जो कि सुशांत की इस सुसाइड में सीबीआई जांच की मांग कर रहे हैं. इस बार लोग काफी गुस्से में है और वे सब सुशांत को न्याय दिलाना चाहते हैं और वे ये भी चाहते हैं जो सुशांत के साथ हुआ वो और किसी के साथ ना हो.

‘पवित्र रिश्ता’ में सुशांत को देखते ही उनसे प्यार करने लगी थी ये भोजपुरी एक्ट्रेस, ऐसे दी जानकारी

बौलीवुड इंडस्ट्री के जाने माने एक्टर जिन्होनें अपनी फिल्मों से हमें खूब मोटिवेट किया, आज वही एक्टर हमारे बीच नहीं रहे. जी हां, हम यहां बात कर रहे हैं सुशांत सिंह राजपूत (Sushant Singh Rajput) की जिन्होनें ‘काय पो छे’ (Kai Po Che!), ‘छिछोरे’ (Chhichhore), ‘केदारनाथ’ (Kedarnath) जैसी फिल्मों में अपनी कमाल की भूमिका निभाई है लेकिन ये भी सच है कि उनकी किसी भी फिल्म को कोई अवार्ड नहीं मिला जिससे ये बात साफ होती है कि बौलीवुड इंडस्ट्री ने उन्हें अपनाने से इंकार कर दिया था.

 

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Rest in peace @sushantsinghrajput unbelievable news 🙏 speechless 😶 RIP ☹️

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खबरों की माने तो सुशांत पिछले 6 महीने से डिप्रेशन में थे और इसी के चलते उन्होनें 14 जून रविवार को अपने अपार्टमेंट में खुद को फांसी लगा कर अपनी जान दे दी. ना सिर्फ सुशांत के फैंस को बल्कि बौलीवुड और भोजपुरी इंडस्ट्री से जुड़े स्टार्स को भी अब तक यकीन नही हो रहा कि सुशांत अब इस दुनिया में नहीं रहे.

 

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Yakin nahi ho raha ☹️ Abhi bhi 💔 My television crush when he was doing Pavitra Rishta…

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जैसा कि हम सब जानते हैं कि सुशांत सिंह राजपूत (Sushant Singh Rajput) ने अपने एक्टिंग करियर की शुरूआत टेलिवीजन इंडस्ट्री से की थी. हाल ही में भोजपुरी इंडस्ट्री की जानी मानी एक्ट्रेस काजल राघवानी (Kajal Raghwani) ने अपने औफिशियल इंस्टाग्राम अकाउंट (Official Instagram Account) पर सुशांत की फोटो शेयर करते हुए इस बात का खुलासा किया कि जब सुशांत सिंह राजपूत सीरियल “पवित्र रिश्ता” (Pavitra Rishta) कर रहे थे तभी से वे उनको काफी पसंद थे.

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Real ⭐️

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काजन राघवानी ने सुशांत की फोटो शेयर कर कैप्शन में लिखा कि,- “Yakin nahi ho raha , Abhi bhi My television crush when he was doing Pavitra Rishta…” . काजल राघवानी के इस पोस्ट को देखने के बाद ये कहना बिल्कुल गलत नहीं होगा कि सुशांत के दुनिया छोड़ने की खबर से वे काफी दुखी हैं. इससे पहले भी खेसारीलाल यादव (Khesarilal Yadav) और अक्षरा सिंह (Akshara Singh) जैसे कलाकार सुशांत सिंह राजपूत के परिवार वालों से मिलने पहुंचे थे.

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वायरसी मार के शिकार कुम्हार

लेखक- डा. सत्यवान सौरभ

नोवल कोरोना वायरस  के चलते लागू किए गए लौकडाउन ने  मिट्‌टी बरतन बनाने वाले कारीगरों के सपनों को भी चकनाचूर कर दिया है. इन कारीगरों ने मिट्टी के बरतन बना कर रखे लेकिन बिक्री न होने की वजह से इन के लिए खाने के लाले पड़ गए हैं. लौकडाउन के चलते न तो चाक (बरतन बनाने का उपकरण) चल रहा है और न ही दुकानें खुल रही हैं. घर व चाक पर बिक्री के लिए पड़े मिट्टी के बरतनों की इन्हें रखवाली अलग करनी पड़ रही है. देशभर में प्रजापति समाज के लोग मिट्टी के बरतन बनाने का काम करते हैं.

लौकडाउन ने इन की उम्मीदों पर पानी फेर दिया है. इन के बरतनों की बिक्री नहीं हो रही है. महीनों की मेहनत घर के बाहर पड़ी है. इन हालात में परिवार का गुजारा करना मुश्किल हो गया है. गरमी के सीजन को देखते हुए बरतन बनाने वालों ने बड़ी संख्या में मटके बनाए. डिजाइनर टोंटी लगे मटकों के साथ छोटी मटकी और गुल्लक, गमले भी तैयार किए. दरअसल,  आज भी ऐसे लोग हैं जो मटके के पानी को प्राथमिकता देते हैं. मगर इस बार इन को घाटा हो गया. इन का परिवार कैसे गुजरबसर करेगा. कोई भी मटके खरीदने नहीं आ रहा है. धंधे से जुड़े लोगों ने ठेले पर रख कर मटके बेचने भी बंद कर दिए हैं.

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मिट्टी के बरतनों के जरिए अपनी आजीविका चलने वाले कुशल श्रमिकों के लिए उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की पहल से देशभर के प्रजापति समाज के लोगों के लिए एक आस जगी है, जिस के अनुसार राज्य के हर प्रभाग में एक माइक्रो माटी कला कौमन फैसिलिटी सेंटर (सीएफसी) का गठन किया जाएगा.  सीएफसी की लागत 12.5 लाख रुपए होगी, जिस में सरकार का योगदान 10 लाख रुपए का होगा. शेष राशि समाज या संबंधित संस्था को वहन करनी होगी. भूमि, यदि संस्था या समाज के पास उपलब्ध नहीं है, तो ग्रामसभा द्वारा प्रदान की जाएगी. हर केंद्र में गैसचालित भट्टियां, पगमिल, बिजली के बरतनों की चक और पृथ्वी में मिट्टी को संसाधित करने के लिए अन्य उपकरण होंगे. श्रमिकों को एक छत के नीचे अपने उत्पादों को विकसित करने के लिए सभी सुविधाएं उपलब्ध होंगी. इन केंद्रों के माध्यम से अधिक से अधिक लोगों को रोजगार उपलब्ध कराया जाएगा.

खादी और ग्रामोद्योग विभाग का यह बहुत अच्छा प्रयास है. यदि उत्पाद गुणवत्ता के हैं और उन की कीमतें उचित हैं, तो बाजार में उन के लिए अच्छी मांग होगी. इस से व्यापार से जुड़े लोगों के लिए स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर बढ़ेंगे. इस के अलावा, तालाबों से मिट्टी उठाने से बाद की जलसंग्रहण क्षमता बढ़ जाएगी. इन उत्पादों को पौलिथीन का विकल्प बनने से पौलिथीन संदूषण को भी रोका जा सकेगा. कोरोना वायरस के प्रसार को रोकने के लिए किए गए लौकडाउन से लगभग हर क्षेत्र में कामकाज बिलकुल ठप पड़ा है.

केंद्र सरकार छोटे, मझोले और कुटीर उद्योगों के लिए स्पेशल पैकेज की घोषणा कर के उन को जीवित रखने का प्रयास भले कर रही है. लेकिन, अस्पष्टता और सही दिशानिर्देश के अभाव में बहुत राहत मिलती नहीं दिख रही है. देश में बहुत से ऐसे वर्ग हैं जिन पुश्तैनी धंधा रहा है और कई जातियां ऐसी भी है जो विशेष तरह का काम कर के अपना जीवनयापन करती हैं, जैसे माली, लोहार, कु्म्हार, दूध बेचने वाले ग्वाला, दर्जी, बढ़ई, नाई, पत्तलदोने का काम कर के जीवनयापन करने वाले मुशहर जाति के लोग. ये ऐसे लोग हैं जिन का कामकाज लौकडाउन से सब से अधिक प्रभावित हुआ है. सरकार ने बड़े व मझोले कारोबारियों के लिए तो काफी कुछ दे दिया है, लेकिन उपर्युक्त लोगों के लिए सरकार की तरफ से कोई विशेष राहत का ऐलान नहीं किया गया है.

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प्रधानमंत्री नरेंद्र ने मोदी देश को संबोधित करते हुए आत्मनिर्भर भारत बनाने पर जो दिया. उन्होंने देश को आगे बढ़ाने के लिए एमएसएमई को फौरीतौर पर राहत देने की घोषणा की. लेकिन, बजट का निर्धारण करना वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण पर छोड़ दिया. साथ ही, उन्होंने लोकल के प्रति वोकल होने की बात जरूर की लेकिन लौकडाउन से प्रभावित होने वाले ऐसे लोगों के बारे में जिक्र नहीं किया जिन की रोजीरोटी खुद के कारोबार और हुनर पर निर्भर है. लौकडाउन से उन के ऊपर गहरा असर हुआ है. ऐसे लोगों के पास बचत भी बहुत अधिक नहीं होती है कि वे अपनी जमापूंजी खर्च कर के घरखर्च चला सकें. ऐसे लोग हर रोज कमाते हैं, जिस से उन के खाने का इंतजाम हो पाता है. अब लौकडाउन हो जाने से उन का कामकाज बिलकुल बंद हो गया है. ऐसे में सरकार को इन लोगों के लिए कुछ न कुछ अलग से उपाय करना चाहिए, ताकि उन का जीवन भी सुचारु रूप से चल सके.

आज जब भारत के गांव बदलाव के दौर से गुजर रहे हैं तो गांवों के परंपरागत व्यवसायों को भी नया रूप दिए जाने की जरूरत है. गुजरात के राजकोट निवासी मनसुख भाई ने कुछ ऐसा ही नया करने का बीड़ा उठाया है. पेशे से कुम्हार मनसुख ने अपने हुनर और इनोवेटिव आइडिया का इस्तेमाल कर के न सिर्फ अच्छा बिजनेस स्थापित किया, बल्कि नेशनल अवार्ड भी हासिल किया. आज उन के नाम और काम की तारीफ भारत ही नहीं, दुनिया में हो रही है. उन के मिट्टी के बरतन विदेशों में भी बिक रहे हैं. पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम ने उन्हें ‘ग्रामीण भारत का सच्चा वैज्ञानिक’ कहा था. एक अन्य पूर्व राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने उन्हें सम्मानित करते हुए कहा था कि ग्रामीण भारत के विकास के लिए उन के जैसे साहसी और नवप्रयोगी लोगों की जरूरत है. आज वे उद्यमियों के लिए एक मिसाल हैं.

कुछ लोग गांवों के परंपरागत व्यवसाय के खत्म होने की बात करते हैं, जो गलत है. अभी भी हम ग्रामीण व्यवसाय को जिंदा रख सकते हैं, बस, उस में थोड़ी सी तबदीली करने की जरूरत है. भारत के गांव अब नई तकनीक और नई सुविधाओं से लैस हो गए हैं. भारत के गांव बदल रहे हैं, इसलिए अपने कारोबार में थोड़ा सा बदलाव करने की जरूरत है. नई सोच और नए प्रयोग के जरिए ग्रामीण कारोबार को बरकरार रखा जा सकता है और उस के जरिए अपनी जीविका चलाई जा सकती है.

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जब हम गांव में कोई कारोबार शुरू करते हैं, उस से सिर्फ हमें ही फायदा नहीं मिलता, बल्कि हमारी सामाजिक जिम्मेदारी भी पूरी होती है. हम आत्मनिर्भर बनते हैं और तमाम बेरोजगारों को रोजगार देते हैं. हर व्यक्ति की यह जिम्मेदारी बनती है कि वह अपने साथ ही दूसरे लोगों को भी प्रोत्साहित करे. उन्हें काम करने के प्रति जागरूक करे. इसी से ग्रामीण भारत के सशक्तीकरण का सपना पूरा होगा.

करामात : भाग 1 – आखिर सुखदेव क्या चाहता था राजेश्वरी से?

आज सनीचरी की तेरहवीं थी, मगर सुखदेव को ईंटभट्ठे पर मजदूरी के लिए जाना ही पड़ा. आज अगर वह कुछ रुपए नहीं लाया, तो सनीचरी की तेरहवीं नहीं हो पाएगी. अगर गुनेसर बाबा का गुस्सा बढ़ गया, तो सुखदेव भी मारा जाएगा.

बाबा ने पहले ही चेता दिया था कि सनीचरी की तेरहवीं में पूजा कराना जरूरी है और अच्छी तरह भोग लगाना भी, नहीं तो सनीचरी की आत्मा प्रेत योनि में भटकती हुई तेरा जीना हराम कर देगी.

सुखदेव छत्तीसगढ़ के बस्तर इलाके में नारायणपुर गांव में रहता था. ईंटभट्ठे की मजदूरी में जैसेतैसे 3 पेट पल रहे थे. घर में मवेशी पाल कर उस की बीवी सनीचरी भी कुछ इंतजाम कर ही लेती थी. छोटी सी झोंपड़ी और रातदिन के टुकड़ों में बंटी थी उन की पारिवारिक जिंदगी. बेटे को ले कर सनीचरी बड़े ख्वाब बुनती थी.

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बेटा कार्तिक भी होशियार था. सालभर मीलों साइकिल दौड़ादौड़ा कर वह स्कूल जाता, अव्वल आता और इस साल गांव के स्कूल में उस की आखिरी पढ़ाई थी. अगले साल वह कसबे के हाईस्कूल में दाखिला लेगा. बहुत उमंग थी मांबेटे के दिल में. पर कुछ समय से सनीचरी की तबीयत बिगड़ती ही जा रही थी.

सनीचरी को रात में अचानक जब खून की उलटी हुई, तो कार्तिक पूरी रात सो न सका. सुबह जल्दी स्कूल पहुंचा, ताकि मास्टरनी से कुछ पूछ सके. विज्ञान की मास्टरनी बड़ी भली थीं. पढ़ाई में अच्छे बच्चों को कुछ ज्यादा ही लाड़ जताती थीं. फिर कार्तिक का प्रिय विषय विज्ञान ही था, सो मास्टरनी कार्तिक की बातों को ध्यान से सुनने लगीं.

सोचविचार कर उन्होंने कहा, ‘‘कार्तिक, तुम्हारी मां को कहीं कैंसर तो नहीं है? तुम अपने बापू से कहो कि उसे तुरंत अस्पताल ले जाएं.’’

कार्तिक छुट्टी मांग कर जल्दी घर आ गया था. बापू से कहा, तो बापू ने कहा, ‘‘हां, ले जाऊंगा.’’

रात को मां और बापू वापस आए, तो कार्तिक ने मां से पूछा, ‘‘क्या कहा डाक्टर ने?’’

‘‘तेरे बापू गुनेसर तांत्रिक बाबा के पास ले गए थे. वे कहते हैं कि उन के पास बहुत करामात हैं. वे मुझे जल्द ठीक कर देंगे.’’

यह सुनते ही कार्तिक उदास हो गया. वह बापू से हर रोज विनती करता कि वे उसे डाक्टर के पास ले जाएं, लेकिन बापू रोज यही कहता, ‘‘बाबा अंतर्यामी हैं. उन्हें अगर पता चल गया कि मैं इसे बाबा के पास न ले जा कर डाक्टर के पास ले जाता हूं, तो वे गुस्से में हम सब का नाश कर देंगे.’’

और इस तरह मुरगियां, बकरियां, रुपए, चांदी के जेवर सबकुछ लुटा कर सनीचरी इस लोक से चली गई, कार्तिक के सामने एक बड़ा सवाल छोड़ कर.

सुखदेव को ईंटभट्ठे के मालिक से आज उस की मजदूरी के सौ रुपए मिल गए थे, साथ ही जल्दी छुट्टी भी.

सुखदेव आज किराना की दुकान छोड़ कर सीधे घर आया. सनीचरी की तेरहवीं पूरी हो जाए, तो उस की भी जान छूटे. बाबा ने सुखदेव को डरा दिया था. सनीचरी की तेरहवीं में अगर काल भैरव खुश नहीं हुए, तो सनीचरी प्रेत योनि में चली जाएगी और फिर सुखदेव दूसरी औरत कभी नहीं ला पाएगा.

इधर नारायणपुर के जंगली इलाकों में डकैतों का भी बड़ा आतंक था. यह भी एक बड़ी वजह थी कि सुखदेव की तरह सारे गांव वाले तांत्रिक बाबा की छत्रछाया में रहना पसंद करते थे. गांव वालों को पूरा भरोसा था कि बाबा के डर से डकैत उन का नुकसान नहीं करते, वरना दूसरे गांव में तो आएदिन खूनखराबा और अपहरण होते रहते हैं.

गांव के लोग बाबा के खानेपीने और उन के आराम का इंतजाम करते रहते. अपनी फसल देते, भेंट में मुरगियां और बकरियां काल भैरव को बलि के नाम पर चढ़ाई जातीं.

बाबा बताते कि कैसे उन में करामाती जादुई ताकत है. इस ताकत की वजह से वे अंतर्यामी हैं. वे तुरंत खबर सुनाते, ‘‘टेकराम, तेरी बीवी कल झगड़ कर मायके गई थी. यह बात सच है न?’’

‘‘हां बाबा.’’

‘‘मनिराम, तेरी गाय अब ज्यादा दूध देने लगी है. इधर भी एक सेर ज्यादा पहुंचाना, नहीं तो दूध बंद करवा दूंगा. ऐसा मंतर पढ़ूंगा कि गाय दूध देना ही बंद कर देगी.’’

‘‘जोहार बाबा, पहुंचा दूंगा.’’

‘‘अब बता कि मैं कैसे समझ रहा हूं इधर मंदिर में बैठेबैठे?’’

‘‘जी बाबा, आप ध्यान में सब जान जाते हो.’’

भीड़ के बीच तांत्रिक का खबरी गुनेसर बोला, ‘‘गांव वालो, मेरी बात पर ध्यान दो. अनाज, गुड़, दूध, दाल, सब्जी, मुरगी, बकरी सब थोड़ाथोड़ा बढ़ा दो. काल भैरव अनाज की कमी से गुस्सा हो रहे हैं.’’

‘‘दूसरी बात यह कि सारंग की बेटी घर छोड़ कर धोबन के बेटे के साथ भाग गई है. ऐसा कुकर्म नहीं चलेगा. अब से सब के घर की बेटियों को इधर भेजना. मैं उन का चरित्र पूजन कर दूंगा. अपनी बहुओं को भी भेजना. उन का गर्भपूजन करूंगा, तभी वे भले मानस को जन्म देंगी,’’ गुनेसर ने कहा.

‘‘हां बाबा, आप तो यहां हमारे भले के लिए ही हो,’’ बाबा के किसी मुखबिर ने कहा.

सभी बाबा के कहे मुताबिक भजनकीर्तन में लग गए. इस तरह पूजाअर्चन का माहौल बना कर लोगों का विश्वास जीता जाता. दिनरात हर घर से खाना आता. खाना क्या था, पकवान. जीभ की लालसा से ले कर शरीर के हर अंग की प्यास बुझाने की तरकीब बाबा ने निकाल रखी थी इन मति के मारे गांव वालों के जरीए.

पहले के जोड़े हुए 5 सौ रुपए और आज के सौ रुपए मिला कर सुखदेव बाबा के पास पहुंचा. बाबा ध्यान में बैठे थे यानी उसे आता देख वे ध्यान में बैठ गए थे.

10 मिनट तक बिना आंखें खोले वे कुछ बुदबुदाते रहे, फिर कह पड़े, ‘‘आ गया सुखदेव.’’

सुखदेव हैरान हो कर बोला, ‘‘जोहार माईबाप.’’

‘‘रख दे इस आसन पर, जो कुछ लाया है.’’

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सुखदेव के 6 सौ रुपए रखते ही बाबा नाराज होते हुए बोले, ‘‘ये क्या है रे? इतने से तो तू क्या अपनी बीवी को नरक में जाने से रोक पाएगा? मुक्ति दिलाएगा बस इतने में?’’

‘‘बाबा, जो था, मैं सब ले आया.’’

‘‘झूठ.’’

‘‘बाबा, आप ही बताइए और क्या दूं?’’

‘‘क्यों, सनीचरी का मंगलसूत्र, उस की अंगूठी, चांदी के कड़े तेरे पास हैं न? उसे तो पहने हुए देखा था मैं ने. कितना दरिद्दर है रे तू? भोलेनाथ और काल भैरव तुझ पर प्रसन्न न होंगे.’’

‘‘नहीं बाबा, आप आज्ञा दें, मैं अभी लाता हूं.’’

‘‘जा, जल्दी आना. किसी हेराफेरी में पड़ा, तो तेरे बेटे को ही चढ़ा दूंगा यज्ञ में.’’

‘‘मैं अभी आया,’’ हांफता सा सुखदेव घर पहुंचा और सनीचरी का टिन का बक्सा खोल कर कुछ ढूंढ़ने लगा. बापू को परेशान देख कार्तिक पूछ बैठा, ‘‘क्या हो गया बापू? क्या ढूंढ़ रहे हो?’’

‘‘तेरी मां का सामान. वह लाल पोटली नहीं दिख रही.’’

‘‘यहीं अंदर होगी, जिस में मंगलसूत्र है?’’

‘‘हांहां.’’

कार्तिक ने पोटली ढूंढ़ कर बापू के हाथ में थमा दी.

‘‘क्या करोगे बापू तुम इस का?’’

‘‘अरे तू ज्यादा पूछ मत. तेरी मां की तेरहवीं ऐसे ही हो जाएगी? देवता को खुश तो करना पड़ेगा, वरना उसे प्रेत योनि से मुक्ति कैसे मिलेगी?’’

‘‘क्या बोल रहे हो बापू… हमारी विज्ञान मैडम कल ही बता रही थीं कि ऐसा कुछ नहीं होता. बेवकूफ बना रहा है बाबा तुम्हें. वह खुद सब चीजें हड़प जाएगा.’’

सुखदेव ने डर के मारे कार्तिक के गाल पर एक चांटा रसीद कर दिया.

‘‘क्या बकता है? अगर कोई सुन लेगा, तो गजब हो जाएगा. तू दरवाजा बंद कर के पढ़ाई कर. आने में रात हो जाएगी. भूख लगे तो दोपहर का चावल पड़ा है हांड़ी में, अचार के साथ खा लेना.’’

सुखदेव ने अपनी खाट के नीचे से देशी ठर्रे की बोतल निकाली, बैग में सारी चीजों को भरा और बाहर निकल गया.

मंदिर पहुंच कर सुखदेव इस डर से बाबा के चरणों में लेट गया कि फिर किसी बात की कोई कमी न रह जाए. आखिर उस के पास अब कुछ भी नहीं बचा था, यहां तक कि सनीचरी की मुक्ति के उपाय को ‘न’ कहने का रास्ता भी नहीं था, क्योंकि इस से न सिर्फ सनीचरी के भूत बन कर तंग करने का डर था, बल्कि बेटे के बलि चढ़ जाने का खतरा मंडरा रहा था.

बाबा को ये सारी चीजें जल्दी निबटाने की जरूरत रहती है, क्योंकि रात 11 बजे से उन का गर्भपूजन का कार्यक्रम चालू हो जाता है. हां, गर्भपूजन की हुई लड़की सुबह होने से पहले ही अपने घर उन के नुमाइंदे की देखरेख में पूरी हिदायत के साथ पहुंचा दी जाती है. भला हो बाबा का, जो वे मान गए.

‘‘चलचल, काल भैरव मान गए. जा, तू मंदिर के उस कोने में जा कर आंखें बंद कर के बैठ जा और भोलेनाथ को याद करते रहना.’’

‘‘जी बाबा,’’ सुखदेव बोला.

कार्तिक बड़ी दुविधा में था. मां जब तक जिंदा थीं, दोगुनी मेहनत करती थीं. मां की बीमारी ने उन का सत्यानाश कर दिया.

कार्तिक ने दरवाजे पर ताला लगाया, अपनी साइकिल उठाई और चल पड़ा. आज कुछ न कुछ करना ही है. घर में हर घड़ी खानेपीने के लाले पड़ते जा रहे हैं. छमाही के इम्तिहान के बाद स्कूल से भी उसे अल्टीमेटम दे दिया गया है कि वह कांपियां खरीद ले. किताबें तो फिर भी मिल जाती हैं स्कूल से, जो अब तक वह पढ़ाई जारी रखे हुए है. खाने का इंतजाम स्कूल के मिड डे मील में और ईंटभट्ठे के मालिक के बेटे के कपड़े भी कार्तिक को आ ही जाते हैं.

मगर आज तो हद ही हो गई. मां के गहने उन की आखिरी निशानी भी चली गई. आएदिन उस का बापू गुनेसर बाबा की खातिरदारी में गांजाभांग पी कर खुद को बड़ा भक्त बनाता जा रहा है. ईंटभट्ठे से आते ही वह बाबा के पास निकल जाता, इधर घर पर गरीबी की मार, तिस पर मां का दुख.

कार्तिक की सोच की रफ्तार साइकिल के पेडल पर जोरजोर से पड़ रही थी.

गोधूली बेला के डूबते सूरज की विपरीत दिशा में कार्तिक जा रहा था, नया सूरज उगाने को. मवेशी घर लौट रहे थे और वह अपना घर बचाने के लिए घर से दूर. मौसी राजेश्वरी के गांव पहुंचने तक कार्तिक को रात के 9 बज गए थे.

मौसी भी उस की ऐसीवैसी नहीं, इस गांव की दमदार औरत थी. बचपन से लगातार कुश्ती की वह चैंपियन रही थी और राज्यस्तरीय प्रतियोगिताओं में बहुत पदक जीत चुकी थी. नानी के साथ मौसी अकेली रहती थी. एक मामा भी थे, जो मामी और बच्चों के साथ दूर शहर में रहते थे. मौसी ने शादी नहीं की, मगर उस की शादी के चर्चे खास रहे. अभी सालभर पहले ही कार्तिक को उस की मां ने बताया था.

एक लड़का बराती के साथ सजधज कर मौसी को ब्याहने पहुंचा. लड़के ने मौसी का फोटो देखा हुआ था, मगर जब सामने देखा, तो बात उठ गई कि लड़की काली है. पैसे ज्यादा चलेंगे, अगर ब्याहनी है तो…

कार्तिक की नानी राधा देवी पहले ही अपना खेत बेच कर दूल्हे को 15 हजार रुपए नकद, एक रंगीन टैलीविजन, एक मोपैड, एक सिलाई मशीन और एक पंखा दे चुकी थीं.

अब 10 हजार रुपए और…? दूल्हा मंडप में बैठा था.

मौसी बीच मंडप में आईं, सजीसंवरी दुलहन के वेश में. फिर उन्होंने कहना शुरू किया, ‘‘दूल्हे बाबू से मेरा निवेदन है कि वे अपने बरातियों के साथ वापस लौट जाएं. दूल्हा बाबू का कहना है कि मैं काली हूं, और मेरा भी कहना है कि दूल्हा बाबू नाटे हैं, मोटे हैं, उन का कोई धर्म नहीं, वे मांस के कारोबारी हैं, जिन को अपनी होने वाली बीवी की दुखतकलीफ का कोई खयाल नहीं.’’

यह सुन कर सब हैरान रह गए. ऐसी दुलहन को देख बराती दूल्हा ले कर उलटे पैर भागे. बस, तब से मौसी कुंआरी ही हैं. राजेश्वरी का सांवला गदराया बदन था. जवानी के बोझ से मदमस्त, लेकिन कोराअनछुआ. देखने में भोली, लेकिन चुस्त पैनी आंखें, सतर्कता रगरग में.

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30 साल की राजेश्वरी खुद ही खेत संभालती, मवेशी पालती, फसल शहर जा कर बेच आती.

कुछ महीने पहले की बात है. पड़ोस की एक बहू रामवती पेट से थी. अचानक रात को उस की तबीयत बिगड़ी. पति ने ध्यान नहीं दिया. उस का बेटा दौड़ता हुआ आया और बोला, ‘‘मौसी, देख तो… मेरी मां को क्या हो गया है?’’

बस, चल पड़ी राजेश्वरी. रामवती को उठा कर पड़ोस के पंचू रिकशे वाले के घर गई. वह तो नशे में धुत्त पड़ा था.

राजेश्वरी ने आव देखा न ताव, उस का रिकशा निकाला, रामवती को उस में किसी तरह लिटाया और 7 किलोमीटर दूर ले चली सरकारी अस्पताल.

अब ऐसी मौसी पर कार्तिक को भरोसा क्यों न हो. मौसी के एक ही धोबी पछाड़ पर गुनेसर दुम दबा कर भागेगा.

कार्तिक की इस सोच ने उस के होंठों पर मुसकान ला दी.

‘‘क्या सोच कर हंसे जा रहा रे तू? तू कब आया? जीजा ठीक हैं न?’’ मौसी ने पूछा.

जानें आगे क्या हुआ कहानी के अगले भाग में…

करामात : आखिर सुखदेव क्या चाहता था राजेश्वरी से?

ठगी के नए-नए तरीकों से रहें सावधान

शारीरिक और मानसिक मेहनत किए बिना पैसा कमाना आसान नहीं होता. मगर लोगों को यह बात समझ नहीं आती. इसी वजह से वे ठगों और जालसाजों के चक्कर में पड़ जाते हैं. लोगों को लालच दे कर ठगी करने वाले अपना शिकार बना लेते हैं. जब तक असलियत पता चलती है, तब तक उन का सबकुछ लुट जाता है.

मध्य प्रदेश के गोटेगांव में कुछ लोगों की नासमझी की वजह से ठगी का दिलचस्प मामला सामने आया है. लौकडाउन में घरों के अंदर कैद रहे ठगों ने अनलौक 1.0 में नोटों को 10 गुना करने का लालच दे कर यहां के कुछ युवकों को रुपयों की चपत लगा दी.

गोटेगांव पुलिस के मुताबिक, जबलपुर शहर के 5 ठगों ने शिक्षक कालोनी में रहने वाले देवेश दुबे को 5,000 रुपयों को  50,000 रुपयों में बदलने का प्लान समझाया.

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ठगों ने देवेश को समझाते हुए कहा, “पहले हमारे द्वारा बनाए गए नोटों को बाजार में चला कर देख लेना. यदि नोट बाजार में चल जाएं, तो हम नोट बनाने वाले कागज और केमिकल देंगे, जिन से घर बैठे आप नोट बना सकेंगे.”

देवेश को ठगों ने पहले 200 रुपए का एक असली नोट दिया,जो बाजार में चल गया. इस के बाद देवेश उन जालसाजों के चंगुल में फंस गया. जालसाजों ने देवेश से 5,000 रुपए ले कर नोट बनाने के लिए काले कागज की एक गड्डी और केमिकल दे दिए.

उन पांचों युवकों के चले जाने के बाद देवेश ने उन के बताए अनुसार काले कागज से केमिकल के इस्तेमाल से नोट बनाने की खूब कोशिश की, लेकिन नोट नहीं बने. तब उसे ठगे जाने का अहसास हुआ और उस ने पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराई.

पुलिस ने जब इन ठगों को जबलपुर से गिरफ्तार कर पूछताछ की तो पता चला कि इन ठगों ने और भी कई लोगों को लालच दे कर अपने झांसे में ले कर इस तरह की ठगी की थी.

डिजिटल युग में ठगों द्वारा ठगी के नएनए तरीके ईजाद किए जा रहे हैं. कभी मोबाइल पर इनामी कूपन और सर्टिफिकेट भेज कर, कभी एटीएम बंद होने की सूचना दे कर एटीएम का नंबर और ओटीपी मांग कर, फेसबुक पर फर्जी मैसेज के माध्यम से रुपयों की मदद मांग कर, तो कभी औनलाइन शौपिंग का डेटा चुरा कर पढ़ेलिखे लोगों को अपना निशाना बनाया जा रहा है.

अगर आप के पास रुपयों की डिमांड को ले कर अचानक ही किसी परिचित का कोई फोन और मेल आईडी है, तो उसे पेमेंट करने से पहले उस से फोन के जरीए बातचीत कर लें.  जल्दबाजी में रिप्लाई करने और रुपए भेज कर आप ठगी का शिकार हो सकते हैं.

बेहतर होगा कि आप ऐसा करने से पहले मेल या फोन कर  अपने परिचित से दोबारा इस की पुष्टि कर लें, वरना आप भी स्पूफ यानी किसी धोखाधड़ी के शिकार हो सकते हैं.

स्पूफ मेल और काल से साइबर अपराधी कर रहे हैं ठगी

साइबर अपराधियों ने अब काल और अन्य तरीकों को छोड़ कर ठगी का नया तरीका खोज निकाला है, जिसे जानकारों ने स्पूफ का नाम दिया है.

दरअसल, कुछ पढ़ेलिखे ठग इंटरनेट पर सौफ्टवेयर की मदद से स्पूफ मेल तैयार करते हैं. इस मेल में वह डिस्प्ले पर मेल भेजने वाले जानकार की ईमेल आईडी का इस्तेमाल करते हैं. इसे आप मुखोटा भी कह सकते हैं. इस के पीछे ठग अपना काम करता है. ऐसे में ठग मेल कर बड़ीबड़ी कंपनियों को अपना टारगेट बनाता है. इस के बाद उन्हीं के किसी परिचित क्लाइंट के नाम से रुपयों की डिमांड को ले कर मेल भेजा जाता है.

दर‌असल, यह मेल संबंधित कंपनी या व्यक्ति के किसी भी क्लाइंट या परिचित के मेल की कापी ही होता है. ऐसे में कंपनी या कोई भी परिचित परिचय होने के चलते फट से डिमांड किया हुआ रुपया मेल पर दिए अकाउंट में डलवा देते हैं. इस के बाद यह रुपया सीधा ठग के पास पहुंचता है.

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पीड़ित को ठगी का पता अपने क्लाइंट या परिचित को काल करने या उस के पेमेंट की डिमांड करने पर लगता है, लेकिन जब तक इस का पता लगता है, तब तक ठग अपना काम कर चुका होता है.

पुलिस के साइबर सेल में पदस्थ राकेश दीक्षित बताते हैं कि स्पूफ मेल के कई मामले सामने आ चुके हैं. कुछ महीने पहले ही दिल्ली में अलगअलग जगह बैठे नाइजीरियन गिरोह ने ग्रेटर नोएडा स्थित होटल क्राउन प्लाजा के एमडी को स्पूफ मेल कर 42 लाख रुपए खाते में डलवा लिए थे. उन्हें इस का पता क्लाइंट के रुपया न मिलने की काल आने पर लगा.

पता लगते ही उन्होंने तुरंत इस की शिकायत नोएडा के अन्वेषण अपराध केंद्र को दी. इस पर साइबर टीम ने 10 नवंबर, 2019  को दिल्ली से 4 नाइजीरियन को पकड़ कर खुलासा किया.

पुलिस की गिरफ्त में आए सभी नाइजीरियन युवकों का वीजा निरस्त हो चुका था. वे दिल्ली के बुराड़ी, पुष्प विहार, महरौली और देवली एक्सटेंशन में चोरीछिपे रह कर स्पूफ मेल के जरीए ठगी की वारदात को अंजाम दे रहे थे. पुलिस ने इन के पास से 34 लाख रुपए रिकवर करने के साथ ही इन के पास से 65 चेकबुक, 70 एटीएम, 65 बैंक अकाउंट और फर्जी सि‍म बरामद किए थे.

पुलिस अधिकारी ने बताया कि आरोपी कुछ सौफ्टवेयर और एप का इस्तेमाल कर स्पूफ काल करने के बाद लोगों से ठगी करते थे. आरोपी काल करने वाले शख्स के परिचित बन कर उन को काल करते थे. मोबाइल पर काल करते समय शख्स के परिचित का नंबर और नाम शो होने पर वह भी बिना जांचे रुपया ट्रांसफर कर देते थे. इस के बाद शख्स को अपने साथ ठगी होने का पता लगता था.

औनलाइन शौपिंग में भी ठगे जाने का खतरा

ज्यादातर मामलों में मोबाइल पर काल कर इनाम खुलने या एटीएम, सिम बंद होने के नाम पर ओटीपी मांग कर ठगी करना शामिल होता है, लेकिन अब लोगों को और अधिक सावधान रहने की जरूरत है, क्योंकि अब ठगों ने लोगों को ठगने के तरीके बदल लिए हैं. ये ठग अब नए तरीके से लोगों के घरों पर इनामी कूपन और सर्टिफिकेट भेज कर अपने जाल में फंसा रहे हैं.

गंभीर बात यह है कि लोग डर के मारे या अपनी जगहंसाई होने के डर से पुलिस तक इस की सूचना नहीं देते, जिस से ऐसे ठगों के हौसले बुलंद हो रहे हैं.

औनलाइन ठगी करने वाले अपराधियों द्वारा औनलाइन सामग्री खरीदने वाले लोगों का डेटा लीक कर संबंधित कंपनी के नाम से घर पर डाक से कुछ दिनों बाद स्क्रैच कार्ड भेजा जा रहा है. कार्ड को स्क्रैच करने पर लाखों रुपए इनाम में जीतने की जानकारी दी जाती है. इतना ही नहीं, व्यक्ति को जाल में फंसाने के लिए उसे लालच भी दिया जाता है.

ग्राहक झांसे में फंस कर स्क्रैच कार्ड पर लिखे हैल्पलाइन नंबर पर काल कर के जीता हुआ पैसा मांगते हैं तो शातिर ठग मोटी रकम होने की वजह से 50,000 रुपए पहले खाते में टैक्स के रूप में जमा कराने की कह कर ठगी कर रहे हैं. टैक्स जमा न कराने पर इनामी योजना लैप्स होने की भी बात कही जाती है.

कुछ जागरूक लोग इस तरह की ठगी से बच रहे हैं, परंतु कई लोग इन का शिकार भी बन रहे हैं.

ठग इतने शातिर हैं कि औनलाइन खरीदारी करने वालों का डेटा चुरा लेते हैं. इस से उन्हें ग्राहक के नाम, पते, मोबाइल नंबर और औनलाइन और्डर किए हुए सामान तक की डिटेल्स उपलब्ध रहती है. इस के बाद वह उसी औनलाइन शौपिंग कंपनी के नाम से फर्जी लेटर, शानदार डिजाइन के फर्जी स्क्रेच कूपन, एक लाख रुपए का सर्टिफिकेट बना कर डाक से निर्धारित पते पर भेज देते हैं.

कूपन में ठग हैल्पलाइन के नाम पर 2 मोबाइल नंबर डाल देते हैं. औनलाइन सामग्री खरीदने के बाद उसी कंपनी के नाम से डाक द्वारा शानदार डिजाइन के स्क्रेच कूपन, लैटर और सर्टिफिकेट दिखाते हैं, जिस से ग्राहक को उस पर पूरा भरोसा हो जाता है कि यह उक्त औनलाइन कंपनी द्वारा ही भेजा गया है. इसे देख कर कोई भी इन ठगों के जाल में फंस सकता है.

फेसबुक के जरीए भी की जा रही ठगी

ठगों के द्वारा औनलाइन ठगी का एक नया तरीका फेसबुक एकाउंट द्वारा दोस्तों से मदद के नाम पर पैसा मांगने का भी इस्तेमाल किया जा रहा है. साइबर अपराधी फेसबुक एकाउंट हैक कर इस में जुड़े दोस्तों को मैसेज भेज कर इन से अपने खाते में रुपए मंगा रहे हैं.

मध्य प्रदेश के गुना शहर के एक व्यवसायी के फेसबुक एकाउंट को भी ठगों ने हैक कर लिया और उस में जुड़े दोस्तों को मैसेज कर लिखा कि मैं अस्पताल में हूं, मेरी मदद करो. मुझे कुछ रुपयों की जरूरत है. इस ने एकांउट नंबर दिया और इस पर लोगों से रुपए मांगे.

हालांकि जब लोगों ने यह मैसेज पढ़ कर व्यवसायी को फोन किया, तो हकीकत सामने आ गई. इस के बाद व्यवसायी ने अज्ञात आरोपितों के खिलाफ कोतवाली में एफआईआर दर्ज कराई.

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पंजाबी महल्ला में रहने वाले अरुण सूद पुत्र प्रेमकुमार सूद होटल व्यवसायी हैं. इन्होंने बताया कि मेरे मित्र शैलेंद्र जैन ने 7-8 साल पहले मेरी फेसबुक आईडी बनाई थी. मैं सोशल मीडिया का कम ही इस्तेमाल करता हूं, इसलिए कुछ दिन बाद ही इस आईडी का पासवर्ड भूल गया था और चलाना भी बंद कर दिया. इस के बाद 11 नवंबर, 2019 को कुछ दोस्तों के फोन मेरे पास आए. इन लोगों ने पूछा कि तुम्हारी फेसबुक आईडी से तो रुपए मांगे जा रहे हैं. लोगों के काल आना बढ़े, तो फिर मैं ने मामले की शिकायत एसपी से की.

साइबर अपराधियों के हौसले इतने बुलंद हैं कि वे बड़ेबड़े अधिकारियों के फर्जी फेसबुक एकाउंट से भी ठगी का अंजाम देने से नहीं चूकते.

लौकडाउन में नरसिंहपुर जिले के गाडरवारा के एसडीएम राजेश शाह के फेसबुक एकाउंट के जरीए रुपयों की मदद मांगने का मामला दर्ज हुआ था.

ठगी के और भी हैं क‌ई तरीके, पर बरतें सावधानियां

बदलते जमाने के साथ ठगी करने वाले बदल चुके हैं. ऐसे ठगों से बचने के लिए आप को भी कमर कसनी होगी.

कभीकभी जालसाजों द्वारा आरबीआई के नाम फेक ईमेल ठगी करने के लिए भेजा जाता है. इस ईमेल में यूके में लगी किसी लौटरी को पाने के लिए ईमेल के जरीए पैनकार्ड, मोबाइल नंबर, बैंक का नाम, ब्रांच और अकाउंट की जानकारी मांगी जाती है.

ठग बैंक अकाउंट की जानकारी हासिल कर आप के अकाउंट से पैसे ट्रांसफर कर लेते हैं. आरबीआई ने विज्ञापन जारी कर लोगों को चेताया है कि इस तरह के झांसे में कतई न फंसें. वहीं आरबीआई ने सलाह दी है कि किसी भी अनजान आदमी को अपने अकाउंट की जानकारी न दें. किसी के भी साथ किसी तरह की लौटरी या पैसा पाने के लिए किसी भी तरह का पत्राचार न करें.

आरबीआई के मुताबिक, अगर आप के साथ ऐसा धोखा होता है, तो साइबर सेल में इस की शिकायत जरूर करें.

ठगी का एक और तरीका है एलआईसी बोनस ट्रांसफर का औफर. एलआईसी की पौलिसी में बहुत से लोगों का निवेश है. इस का फायदा उठा कर कुछ लोग एलआईसी से बोनस के नाम पर लोगों से ठगी कर रहे हैं.

एलआईसी ने लोगों को विज्ञापन के जरीए चेताया है कि एलआईसी के नाम पर आए कालर की पहचान और उन को आईआरडीए से जारी लाइसेंस को वेरिफाई करें. साथ ही, कोई भी शिकायत होने पर co_crm_fb@licindia.com पर शिकायत करें.

इसी तरह इंश्योरेंस रेगुलेटर आईआरडीए के नाम पर काल कर लोगों को इंश्योरेंस पौलिसी खरीदने की बात कही जाती है. हम आ पको बता दें कि आईआरडीए कोई इंश्योरेंस पौलिसी नहीं बेचता, सिर्फ इंश्योरेंस कंपनियों को रेगुलेट करता है. अगर आप को ऐसी कोई शिकायत है, तो आईआरडीए के टोल फ्री नंबर 155255 पर शिकायत कर सकते हैं.

क‌ई बार ठगी करने वाले नामीगिरामी कंपनियों के नाम पर ईमेल के जरीए नौकरी के औफर देते हैं. ये लोग पहले नौकरी के ईमेल के नाम पर सारी जानकारी हासिल कर लेते हैं, फिर नौकरी लगवाने के लिए लोगों से पैसों की डिमांड करते हैं. ऐसे किसी भी प्रकार के जौब औफर मिलने पर  सीधे उस कंपनी के एचआर डिपार्टमेंट से संपर्क करना चाहिए.

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कलेक्टिव इन्वेस्टमेंट स्कीम के नाम पर भारी रिटर्न का वादा कर के भी जालसाजी की जाती है. अगर कोई कंपनी आप से ऐसी स्कीम में निवेश करने के लिए कहती है, तो पहले जांच करें कि वह सेबी में रजिस्टर है कि नहीं. अगर आप को कलेक्टिव इन्वेस्टमेंट स्कीम से कोई शिकायत है, तो सेबी के टोल फ्री नंबर 1800 266 757 पर काल करें.

ठगी के और भी कई तरीके हैं. इन से बचने का सब से कारगर उपाय है, अपने पर भरोसा करें और शार्टकट से पैसा कमाने का लालच कतई न करें.

करामात : भाग 2 – आखिर सुखदेव क्या चाहता था राजेश्वरी से?

पिछले अंक में आप ने पढ़ा था:

सनीचरी की तेरहवीं कराने के चक्कर में सुखदेव एक तांत्रिक बाबा के हत्थे चढ़ गया. बाबा ने उसे भूतप्रेत का डर दिखाया. सुखदेव का बेटा कार्तिक इस अंधविश्वास को नहीं मानता था. उसे पता था कि उस की मां को कैंसर है, पर सुखदेव उसे डाक्टर के बजाय तांत्रिक बाबा के पास ले गया. कार्तिक को अपने पिता को धूर्त बाबा से बचाना था. वह अपनी मौसी के गांव गया, जो एक बिंदास औरत थी.

अब पढ़िए आगे…

‘‘हां मौसी, पहले मुझे बैठ तो लेने दे, थक गया हूं,’’ कार्तिक बोला. नानी भी अब तक दालान में आ गई थीं. कार्तिक का यहां बड़ा मन लगता है. मौसी के दालान के एक किनारे मुरगियों के दड़बे और कुएं के पास बकरियों के रहने के ठिकाने हैं. कुल 7 बकरियां हैं. मौसी इन्हें बेचती भी है.

दालान से ऊपर चबूतरा और उस से लगे 2 बड़े हवादार कमरे हैं. पलंग, कुरसी, बड़ा शीशा, पंखा, टैलीविजन सबकुछ है मौसी के पास. मोपैड भी है, जो अब मौसी ही चलाती है.

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कार्तिक ने मौसी को ढोंगी बाबा और अपने बापू की सारी बातें बताईं. मौसी ने कहा, ‘‘देख बेटा, तेरा भविष्य तो जीजा के पास एकदम चौपट है. कहीं तांत्रिक तेरे बापू से तुझे ही न मांग ले.

‘‘नशा इनसान का दिमाग खराब कर देता है. वह ढोंगी गांव वालों को नशे का आदी इसलिए बनाता होगा, ताकि अपनी मनमानी करता रहे.

‘‘तू अब हमारे पास ही रुक जा. मैं तुझे कसबे के बड़े वाले स्कूल में भरती करवा दूंगी.’’

‘‘मौसी, आप ने मेरे लिए जो सोचा है, वह तो अच्छी बात है, मगर गुनेसर बाबा को हमारे गांव से भगाओ न आप. किसी की भी हिम्मत नहीं कि उस से लड़े. वह मेरे बापू को नशे के चक्कर में एक दिन खत्म ही न कर दे.’’

कार्तिक की बात सुन कर राजेश्वरी पसीज गई थी. सुबह होते ही वह अकेले ही उमाशंकर पहलवान से मिलने जा पहुंची. उन से सारी बातें तय कर के राजेश्वरी पहले खेत और फिर घर पहुंची.

वहां जीजा को दालान में बैठा देख राजेश्वरी चौंक गई. वह कार्तिक को डांटफटकार रहा था.

राजेश्वरी खीझ गई और पूछा, ‘‘ऐसे कैसे चले आए जीजा? कार्तिक की फिक्र में…’’

‘‘कुछ होश भी है तुम को? लड़का चुपचाप बैठा लिया, कोई खोजखबर नहीं दी,’’ सुखदेव बोला.

‘‘जीजा, तुम ने बेटे को ऐसा लाचार कर दिया कि भागा आया इधर. जिस बाप का खुद का ठिकाना नहीं, उसे खबर कैसे दूं? बाप हो तो सलीके से क्यों न रहते बेटे के साथ?’’

सुखदेव उस बाबा के डर के साए में रह कर नशेड़ी हो कर अपनी सोचने की ताकत खो बैठा था. वह थोड़ी सी धमक पर ही डर कर बैठ गया और अपना सिर खुजाने लगा. नानी ने कार्तिक को दोपहर का खाना खिलाया और वापस जाने को कहा.

लेकिन राजेश्वरी ने दोटूक कहा, ‘‘कार्तिक को कब भेजना है, मैं सोचूंगी. बेचारा खानेपीने को तरस गया है. यह जीजा के साथ नहीं जाएगा.’’ नानी चुप हो गईं. कार्तिक हफ्ताभर और वहां रहा, फिर अपने घर लौट गया.

उधर उमाशंकर ने पहलवान छात्रों को कुछ निर्देश दिए और अपने भतीजे रंजन के घर नारायणपुरा में ही आ गए.

इधर कार्तिक के गांव वालों के रंगढंग देख कर राजेश्वरी दंग रह गई. सभी गांव वाले बिना कोई पूछताछ किए बाबा के कदमों में लोटे रहते थे.

आज की रात दिल की धड़कन बढ़ाने वाली थी. राजेश्वरी मंदिर के पीछे बने मकान के कमरे तक पहुंच चुकी थी. खिड़की खुली थी. उस ने भीतर झांका. गुनेसर भूरे, सफेद पाउडर के पैकेट के बदले 3 लोगों से रुपयों की गड्डी ले रहा था. उस का चेहरा ठीक सामने था. राजेश्वरी हटने को हुई, तो बाबा की नजर उस पर पड़ी. बाबा चिल्लाया, ‘‘पकड़ो इसे.’’

उन में से एक दौड़ कर जैसे ही उसे पकड़ने को हुआ, राजेश्वरी उसे धक्का दे कर भाग खड़ी हुई.

बाबा ने कहा, ‘‘यह तो सुखदेव की साली है. मंदिर के आसपास 2 दिन से घूम रही थी. गांव वालों से पता किया है. पहलवानी करती है. औरत जात पर कलंक है. यहां जासूसी करने आई थी.

‘‘यह कुछ खुराफात करे, इस से पहले अभी अपने आदमियों से कह दो कि रातोंरात इस की चिता सजा दें.

‘‘लोगों की फसल में जगहजगह आग लगा दो, लोगों के मवेशी चुरा लो, कई घरों में सेंधमारी करो और फिर सुबह से ही बात फैलाओ कि यह पहलवान टोनही है, जो जादूटोना कर के सब का नाश कर रही है. देखो, कैसे मेरी बात मान कर सब गांव वाले इस का क्रियाकर्म करते हैं.’’

तीनों हुक्म के गुलाम चल दिए. इधर भोर होने तक राजेश्वरी अपनी मोपैड से उमाशंकर के भतीजे रंजन के घर पहुंची. उमाशंकर सुबह की कसरत कर रहे थे. उन का 30 साला भतीजा रंजन अपनी चाय की दुकान खोलने की तैयारी में था.

राजेश्वरी ने बताया, ‘‘मैं ने आते वक्त खेतों को जलते देखा है. यह निश्चित ही उस गुनेसर का काम है, जो अब यह इलजाम मुझ पर लगाने वाला है.’’

उमाशंकर बोले, ‘‘राजेश्वरी, अब वह वक्त आ चुका है, जिस का हम इंतजार कर रहे थे. कार्तिक पर भी हमला हो सकता है, इसलिए अभी सीधे तुम उस के पास जाओ. मैं सगुणा को अपने गांव फोन कर देता हूं, वह तैयार हो जाएगा. दूसरे छात्रों को भी अब बुलवा लेता हूं.

‘‘मैं बस पकड़ कर सीधे शहर पहुंच रहा हूं. वहां से मैं अपने एक पत्रकार दोस्त को ले कर जल्दी लौटूंगा. फोन पर उस को इत्तिला कर देता हूं कि वह मेरे साथ चलने को तैयार रहे.’’

इधर तांत्रिक गांव वालों को इकट्ठा कर चुका था और मंदिर के सामने पीपल के पेड़ के नीचे बने चबूतरे पर खड़ा हो कर भाषण झाड़ रहा था, ‘‘हमारे गांव में टोनही घुस आई है. सुखदेव की साली. कब से जानता हूं मैं इसे. उस ने तुम लोगों के खेत जला डाले, बकरियां गायब कर दीं…’’

‘‘मेरी मुरगियां भी बाबा,’’ एक गांव वाले ने कहा.

‘‘खाती है सब. जादूटोना करने वाले उन्हें कच्चा खा जाते हैं…’’ बाबा ने बताया, ‘‘वह तुम लोगों के पास आ कर यह कहे कि बाबा चोर है, तुम लोगों को ठग रहा है, उस से पहले तुम सब उसे यहां पकड़ लाओ.’’

‘हां बाबा, अभी लाते हैं,’ कई गांव वाले एकसाथ बोले.

‘‘सुखदेव मिले तो उसे भी ले आओ,’’ बाबा ने कहा.

सुखदेव के घर में राजेश्वरी तो नहीं मिली, अलबत्ता सुखदेव को ही लोग घसीटते हुए ले गए.

सुखदेव को देखते ही बाबा ने हुंकार भरी, ‘‘क्यों रे सुखदेव, बहुत मचल रहा था. जो पहलवान साली घर में बिठा ली? और कोई औरत नहीं मिली तुझे?’’

एक औरत ने तांत्रिक को खुली चुनौती दी थी. उस की चोरी पकड़ी गई थी. वह तिलमिला उठा था. चरसगांजे की मारी जनता ‘हेहे’ कर के हंस पड़ी.

सुखदेव डर के मारे बाबा के पैरों में लोट गया और कहा, ‘‘उस औरत से मेरा कोई नाता नहीं है. बेटे को खिलानेपिलाने की खातिर जबरदस्ती इधर पहुंच गई. हमें क्या पता, वह गांव में क्या कर रही है.’’

‘‘टोनही है वह. टोनाटोटका कर के मेरे रहते गांव वालों का इतना नुकसान कर दिया. गांव वालों की ओर जो आंख उठा कर देखेगा, मैं उस की बलि कालभैरव के सामने चढ़ा दूंगा.’’

‘‘आप राजेश्वरी को ला कर जो करना है करो, मुझे कोई मतलब नहीं. मेरे बेटे और मुझे छोड़ दो बाबा,’’ सुखदेव ने कहा.

‘‘जा, फिर ढूंढ़ कर ला उसे गांव वालों के साथ जा कर.’’

इधर गांव वाले गांव छानते रहे, उधर कार्तिक को ले कर राजेश्वरी गांव के बाहर अपने पहलवान गुरुभाई के घर छिप कर बैठी रही. जब तक तांत्रिक का इलाज नहीं हो जाता, उस के हिलनेडुलने से बात बिगड़ सकती थी.

रात के वक्त मंदिर के पास पत्रकार और उमाशंकर छिप गए. अंदर गुनेसर के कमरे में कुछ बातचीत चल रही थी. ‘‘बाबा, मैं आप के पैर पड़ता हूं. सामान है मेरे पास… आप दे दो.’’ ‘‘चलचल, यह सब यहां नहीं है. तुझे गलत बात पता चली है.’’

सगुना उठ खड़ा हुआ और बोला, ‘‘बाबा, बड़ी मुश्किल से मां की 2 पायल उठा कर लाया हूं.’’

‘‘ठीक है, देखता हूं,’’ बाबा ने अपने मन की कूदफांद को काबू में रखते हुए कहा.

लेकिन अचानक बाबा सतर्क हो गया और पूछा, ‘‘तू कहीं जासूस तो नहीं है? क्या नाम है तेरा?’’

‘‘नहीं बाबा, आप तो अंतर्यामी हैं. सब समझ सकते हैं. ये पायल मां की ही हैं. मैं उन्हें चुरा कर लाया था कि पुडि़या मिल जाए. कहीं पकड़ा गया तो पुलिस जो न करेगी, उस से ज्यादा घर वाले मेरा कर देंगे. आप दे दो बाबा, तो मैं निकल जाऊं जल्दी.’’

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बाबा को विश्वास हो चला था. उन्होंने ड्रग का एक पैकेट निकाला. उस में चरस थी.

‘‘बाबा, हेरोइन की भी एक छोटी पुडि़या दे दो न.’’

‘‘पाकिस्तान बौर्डर पर लड़ाई चल रही है. अफगानिस्तान का सारा माल रुका हुआ है. इसी पर संतोष कर और चल भाग यहां से. फिर कभी दोबारा इधर दिखना मत, वरना जिंदा जमीन में गड़वा दूंगा.’’

‘‘जा रहा हूं बाबा, मगर एक बात रह गई.’’

‘‘क्या…? जल्दी बोल?’’

‘‘बाबा, हमारे गांव की एक लड़की थी. मैं उस से शादी करना चाहता था, मगर उस के बाप ने मुझे निकम्मा और चरसखोर कह कर बहुत पिटवाया. अब लड़की को बहला कर मैं आप के पास छोड़ देना चाहता हूं. आप उस का पूजन करते रहना.’’

‘‘बहुत होशियार है रे तू चल, ले आना. कितनी उम्र है उस की?’’ उस हवस के भूखे भेडि़ए ने कुटिल मुसकान के साथ पूछा.

‘‘24 साल की होगी. बहुत खूबसूरत है वह.’’

‘‘कब लाएगा?’’

‘‘हफ्तेभर बाद.’’

‘‘भूलना मत.’’

सगुना ने बहुत बड़ा खतरा मोल लिया था. छिपतेछिपते उस ने उमाशंकर और पत्रकार को इशारा कर दिया. वे तीनों वहां से निकल लिए.

सगुना अपने गांव चला गया. उमाशंकर और पत्रकार शहर पुलिस को यह स्टिंग वीडियो दिखाने चले गए, जो सगुना की कमीज के बटन में लगालगा सबकुछ कैद कर रहा था.

उमाशंकर ने फोन पर राजेश्वरी को अब सब के सामने आने को कह दिया था, क्योंकि उन के हिसाब से तांत्रिक के पापों का आज आखिरी दिन था.

पुलिस सादा लिबास में उमाशंकर और पत्रकार के साथ नारायणपुरा गांव पहुंची. राजेश्वरी गांव वालों की पकड़ में आ चुकी थी. उसे ‘टोनही’ पुकारते हुए लोग उस पर कीचड़ मल रहे थे.

राजेश्वरी चाहती, तो उन्हें अपने ‘धोबी पछाड़’ से पटकनी दे देती, लेकिन वह चाहती थी कि तांत्रिक का कियाधरा पुलिस की नजर में आ जाए.

इधर राजेश्वरी के साथ भीड़ मंदिर के सामने पीपल के पेड़ तक चली आ रही थी, उधर बाबा की धरपकड़ के बाद उस के कमरे की तलाशी में सैकड़ों की तादाद में गंदी फिल्मों के वीडियो, लड़कियों के फोटो, चरसगांजा और रुपयों की अनगिनत गड्डियां पुलिस को मिल चुकी थीं.

‘‘सब पीपल पेड़ के पास इकट्ठा हो चुके थे. इतने में उमाशंकर तलाशी लेने वाले अफसर के सामने आए और कहा, ‘‘सर, राजेश्वरी राज्यस्तरीय कुश्ती चैंपियन है. हमारे कुछ छात्र भी यहां मौजूद हैं, जो पहलवानी करते हैं. राजेश्वरी भी हम से कुश्ती सीखती है. इसे टोनही कह कर बदनाम करने वाले ठग बाबा का भंडाफोड़ कराने में राजेश्वरी और उस के भांजे कार्तिक का बड़ा हाथ है. सर, आप इजाजत दें, तो इस का स्टिंग वीडियो चलाया जाए.’’

बाबा वहां मुंह लटकाए खड़ा था. लोगों में कानाफूसी चल रही थी. अफसर ने कहा, ‘‘पुलिस को इस गुनेसर के घर से काफी सुबूत मिले हैं, जिन से साफ जाहिर है कि वह गलत धंधा कर के पैसे कमा रहा था और आप सब को ठग रहा था. हमारे पास छिप कर बनाया गया वीडियो है, जिस से सच का पता लगा है. ये महाशय जेल जाने वाले हैं. आगे से आप लोग ऐसे किसी करामाती बाबा के चंगुल में मत फंसिएगा.’’

कार्तिक, राजेश्वरी और उमाशंकर सुखदेव के घर पहुंचे. राजेश्वरी अपना सामान बांध रही थी. उमाशंकर के साथ वह सुबह ही निकल जाने वाली थी. कार्तिक सुखदेव से नजरें चुरा रहा था.

उमाशंकर ने कहा, ‘‘सुखदेव, अब तो सारा सच तुम्हारे सामने है. बाबा की पोलपट्टी खुल चुकी है. तुम्हारे गहने, रुपए मवेशी सब गए. बीवी भी गई. अब बेटे को कैसे पालोगे?’’

सुखदेव सिर खुजाते हुए बोला, ‘‘क्या करूंगा? जैसे पहले जाता था स्कूल, जाएगा.’’ कार्तिक के मन को पढ़ते हुए राजेश्वरी ने कहा, ‘‘जीजा, मैं तुम्हें जितना समझती हूं, लगता नहीं कि इसे पाल पाओगे. जी लेना और जिंदगी बनाने में बड़ा फर्क है. होनहार बच्चा है. मैं इसे पालूंगी. ले जाती हूं अपने साथ.’’

सुखदेव कसमसाता सा बोला, ‘‘तू इधर ही रह जा.’’ राजेश्वरी को तरस भी आया और गुस्सा भी. फिर भी वह संभल कर बोली, ‘‘देखो जीजा, मैं तुम्हारी घरवाली बन कर तो रह नहीं सकती… तेरी अक्ल क्या चरस और भांग चरने गई है?’’

कार्तिक हंस पड़ा.

‘‘अपने जीजा की देखभाल की नहीं सोच रही है,’’ कुढ़ता हुआ सुखदेव फिर भी बोल पड़ा.

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‘‘अरे जीजा, ज्यादा बोला तो दूंगी पटक के… तू कर ले न दूसरी औरत. मेरे पीछे क्यों पड़ गया?

‘‘मेरे लिए बहुत काम पड़े हैं. तू अपना रास्ता देख और कभी बेटे से लाड़ करने का मन करे, तो हमारे घर का दरवाजा खुला है, आ जाना,’’ राजेश्वरी बोली. उमाशंकर अपनी साइकिल पर, कार्तिक अपनी छोटी सी पोटली के साथ राजेश्वरी की मोपैड पर अपनी मौसी के गांव की ओर चल दिया.

ससुराल में पूरे हुए रूपा के सपने

लेखक- डा. श्रीगोपाल नारसन एडवोकेट

रूपा यादव की तीसरी जमात में पढ़ते हुए ही 8 साल की अबोध उम्र में शादी हो गई थी. रूपा ने ब्याहता बन कर भी घर का कामकाज करने के साथसाथ अपनी पढ़ाई जारी रखी.

शादी के बाद गौना नहीं होने तक रूपा मायके में पढ़ी और फिर ससुराल वालों ने उसे पढ़ाया. ससुराल में पति और उन के बड़े भाई यानी रूपा के जेठ ने सामाजिक रूढि़यों को दरकिनार करते हुए रूपा की पढ़ाई जारी रखी. पढ़ाई का खर्च उठाने के लिए दोनों भाइयों ने खेती करने के साथसाथ टैंपो भी चलाया.

रूपा ने ससुराल का साथ मिलने पर डाक्टर बनने का सपना संजोया और 2 साल कोटा में रह कर एक इंस्टीट्यूट से कोचिंग कर के दिनरात पढ़ाई की.

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जयपुर के चैमू क्षेत्र के गांव करेरी की रूपा यादव, जिस ने नीट 2017 में 603 अंक हासिल किए थे, को प्रदेश के सरकारी सरदार पटेल मैडिकल कालेज में दाखिला मिल गया.

ऐसी है कहानी

रूपा यादव गांव के ही सरकारी स्कूल में पढ़ती थी. जब वह तीसरी क्लास में थी, तब उस की शादी कर दी गई. गुडि़यों से खेलने की उम्र में ही वह शादी के बंधन में बंध गई थी. दोनों बहनों की 2 सगे भाइयों से शादी हुई थी. उस के पति शंकरलाल की भी उम्र तब 12 साल की थी. रूपा का गौना 10वीं जमात में हुआ था.

गांव में 8वीं जमात तक का सरकारी स्कूल था, तो वह उस में ही पढ़ी. इस के बाद पास के गांव के एक प्राइवेट स्कूल में दाखिला लिया और वहीं से 10वीं जमात तक की पढ़ाई की.

10वीं जमात का इम्तिहान दिया. जब रिजल्ट आया तब रूपा ससुराल में थी. पता चला कि 84 फीसदी अंक आए हैं. ससुराल में आसपास की औरतों ने घर वालों से कहा कि बहू पढ़ने वाली है, तो इसे आगे पढ़ाओ.

शंकरलाल ने इस बात को स्वीकार कर रूपा का दाखिला गांव से तकरीबन 6 किलोमीटर दूर प्राइवेट स्कूल में करा दिया.

रूपा के 10वीं जमात में अच्छे अंक आए. पढ़ाई के दौरान ही उस के सगे चाचा भीमाराव यादव की दिल का दौरा पड़ने से मौत हो गई. उन्हें पूरी तरह से उपचार भी नहीं मिल सका था.

इस के बाद ही रूपा ने बायलौजी विषय ले कर डाक्टर बनने का निश्चिय किया. 11वीं जमात की पढ़ाई के दौरान रूपा बहुत कम स्कूल जा पाती थी. वह घर के कामकाज में भी पूरा हाथ बंटाती थी. गांव से 3 किलोमीटर स्टेशन तक जाना होता था. वहां से बस से

3 किलोमीटर दूर वह स्कूल जाती थी. उस के 11वीं जमात में भी 81 फीसदी अंक आए. उस ने 12वीं जमात का इम्तिहान दिया और 84 फीसदी अंक हासिल किए.

बाद में रूपा यादव ने बीएससी में दाखिला ले लिया. बीएससी के पहले साल के साथ एआईपीएमटी का इम्तिहान भी दिया. इस में उस के 415 नंबर आए और 23,000वीं रैंक आई.

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लिया बड़ा फैसला

रूपा के पति व जेठ ने फैसला किया कि जमीन बेचनी पड़ी तो बेच देंगे, लेकिन रूपा को पढ़ाएंगे. रूपा कोटा में पढ़ने गई तो वहां का माहौल आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करने वाला था. टीचर बहुत मदद करते थे. कोटा में रह कर एक साल मेहनत कर के रूपा अपने लक्ष्य के बहुत करीब पहुंच गई.

रूपा ने पिछले साल नीट में 506 अंक हासिल किए, लेकिन लक्ष्य से थोड़ी सी दूर रह गई. फिर से कोचिंग करने में परिवार की गरीबी आड़े आ रही थी. परिवार उलझन में था कि कोचिंग कराएं या नहीं. ऐसे में एक कैरियर इंस्टीट्यूट ने रूपा का हाथ थामा और उसे पढ़ाई के लिए प्रेरित किया.

उस संस्थान द्वारा रूपा की 75 फीसदी फीस माफ कर दी गई. सालभर तक उस ने दिनरात मेहनत की और 603 अंक हासिल किए. नीट रैंक 2283 रही. अगर वह कोटा नहीं आती, तो शायद आज बीएससी कर के घर में ही काम कर रही होती.

रूपा ने लोगों के ताने भी सहे, लेकिन हिम्मत नहीं हारी. तभी तो वह आज यहां तक भी पहुंच पाई है. इस में उस की ससुराल का बहुत बड़ा योगदान रहा है. पहले साल सिलैक्शन नहीं हुआ या तो खुसुरफुसुर होने लगी कि क्यों पढ़ा रहे हो? क्या करोगे पढ़ा कर? घर की बहू है तो काम कराओ.

इस तरह की बातें होने लगी थीं. यही नहीं, कोटा में पढ़ाई के दौरान ससुराल वालों ने खर्चों की भरपाई के लिए उधार पैसे ले कर भैंस खरीदी थी, ताकि दूध दे कर ज्यादा कमाई की जा सके, लेकिन वह भैंस भी 15 दिन में मर गई. इस से तकरीबन सवा लाख रुपए का घाटा हुआ, लेकिन ससुराल वालों ने उसे कुछ नहीं बताया, बल्कि पति व जेठ और मजबूत हो गए. इस से रूपा बहुत प्रोत्साहित हुई और उस ने पढ़ने में बहुत मेहनत की.

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कोटा में रहने व दूसरे खर्च उठाने के लिए पति और जेठ टैंपो चलाने का काम करने लगे, जबकि रूपा रोजाना 8 से 9 घंटे पढ़ाई करती थी. रूपा जब कभी घर जाती है, तो घर का सारा काम भी बड़ी लगन से करती है. सुबहशाम का खाना बनाने के साथसाथ झाड़ूपोंछा लगाना उस की दिनचर्या में शामिल है. इस के साथ ही खेत में खरपतवार हटाने के काम में भी रूपा हाथ बंटाती है.

रूपा ने असाधारण हालात के बावजूद कामयाबी हासिल की है. रूपा की मदद का सिलसिला जारी रखने के लिए एक संस्थान ने उसे एमबीबीएस की पढ़ाई के दौरान 4 साल तक मासिक छात्रावृत्ति देने का फैसला किया है.

वहशीपन: 6 साल की मासूम के साथ ज्यादती

दिमाग में चढ़ा वहशियानापन इस हद तक पहुंच जाएगा कि न आगे सोचा न पीछे. अब तो रेप शब्द का नाम सुन कर ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं. चाहे किशोरी हो या मासूम, इससे फर्क नहीं पड़ता. बस, हवस पूरी करने का मौका चाहिए.

जी हां, ऐसा ही एक मामला 3 जुलाई, 2019 को सामने आया है. मासूम के साथ हुई घटना यह सोचने पर मजबूर कर देती है कि वहशी कितना शातिर है. बच्ची के मां-बाप काम के सिलसिले में मेहनत मजदूरी करते हैं. घर में बच्ची के अकेले रहने का फायदा उठाते हैं वहशी. ऐसे शख्स जगह-जगह अपने शिकार की तलाश में रहते हैं. मौका मिलते ही ये बच्चियों व किशोरियों को धर दबोचते हैं और अपने मकसद को अंजाम देते हैं.

6 साल की बच्ची के साथ रेप…

3 जुलाई, 2019 को दिल्ली के द्वारका सेक्टर 23 के पास के एक गांव में 6 साल की एक मासूम के साथ रेप की घटना घटी. भले ही सीसीटीवी फुटेज के आधार पर आरोपी 24 साला मोहम्मद नन्हे को गिरफ्तार कर लिया गया लेकिन बच्ची की हालत बेहद नाजुक है.

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सीसीटीवी फुटेज में घटना वाले दिन आरोपी लड़की के साथ दिखा है. उसे एक अलग जगह ले जाने के बाद आरोपी ने लड़की के साथ बलात्कार किया और भाग गया.

बच्ची की हालत नाजुक…

इलाके के एक बाशिंदे ने बच्ची को सड़क पर बेहोश और खून से लथपथ देखा. उस ने तुरंत ही पीसीआर को फोन किया. बच्ची को सफदरजंग अस्पताल ले जा कर भरती कराया गया. डाक्टरों ने कहा कि उस के प्राइवेट पार्ट की नसें फट गई हैं. अब तक वह कई सर्जरी से गुजर चुकी है.

पुलिस ने कहा कि आरोपी मोहम्मद नन्हे बेरोजगार था और उसी इलाके में रहता था. आरोपी भी लहूलुहान हालत में मिला था. उस ने अपना अपराध कबूल कर लिया है.

सामने आया पिता का दर्द…

आंखों में हताशा, निराशा लिए बच्ची के पिता ने कहा कि बिटिया आज ही बोली है, ”पापा, पापा.” वे कहते हैं, ”दिल्ली का बड़ा नाम सुना था. दो वक्त की रोटी के लिए कमाने आए थे यहां. क्या बताएं कि क्या हुआ.”

पीड़िता के पिता ने बताया, ”मेरे 4 बच्चे हैं. बिटिया दूसरे नंबर की है. इकलौती है. कमरे का किराया और बच्चों को पालने के लिए पैसों की जरूरत है, इसलिए दोनों काम करते हैं. 2 साल पहले काफी उम्मीदें लेकर दिल्ली आया था. लेकिन यहां गरीब के लिए ज्यादा कुछ नहीं है. थोड़े दिन ठीक से चलता रहा, मगर अब बिटिया के साथ गलत काम हो गया.”

वहीं, बच्ची की मां ने बताया कि वहशी बच्ची को बहला कर मंदिर से ले गया था. उस ने टौफी का लालच दिया. बच्ची के साथ खेल रहे बच्चों को आरोपी ने धमका कर वहां से भगा दिया था.

क्या इंसाफ के लिए करना होगा आंदोलन…

दिल्ली महिला आयोग की अध्यक्ष स्वाति जयहिंद का कहना है कि रेप करने वालों के खिलाफ, आंदोलन के बाद, दोषियों के लिए फांसी का कानून बना है, मगर यह कानून लागू नहीं हो पा रहा है. क्या दोबारा आंदोलन छेड़ना पड़ेगा ताकि दोषियों को फांसी की सजा मिल सके.

सफदरजंग अस्पताल में भरती पीड़ित बच्ची को देखने स्वाति जयहिंद पहुंचीं. उन्होंने कहा कि उस बच्ची के शरीर के हर हिस्से में खरोंच और चोट के निशान हैं. जगहजगह शरीर नोंचने के निशान रेप करने वाले के वहशीपन को उजागर करते हैं. बेशक, रेप का आरोपी गिरफ्तार हो गया हो, लेकिन क्या यह काफी है. उन्होंने सवाल उठाया कि कब ऐसा सिस्टम बनेगा जिस में बच्चों के रेपिस्ट को जल्द से जल्द फांसी हो?

उन्होंने मांग की कि मामले की सुनवाई फास्ट ट्रैक कोर्ट में हो और आरोपी को फांसी की सजा दी जाए.

केजरीवाल पहुंचे बच्ची को देखने…

वहीं दूसरी ओर, दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल भी इस बच्ची को देखने सफदरगंज अस्पताल गए. उन्होंने कहा कि एक हैवान ने छोटी सी बच्ची के साथ गलत काम किया. डाक्टर ने बताया कि जब वे यहां आई थी तब उस की हालत बेहद खराब थी, पर अब ठीक है. मैं बच्ची के पिता से मिला. दिल्ली सरकार 10 लाख रुपए का मुआवजा देगी और अच्छा वकील खड़ा करेगी. जो दोषी है, सरकार उसे सजा दिलाएगी, ताकि यह दूसरों के लिए सबक बन सके.

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शासन-प्रशासन कानून अगर समय रहते सबक ले सके तो ठीक, वरना आने वाला समय रेपिस्टों का होगा. मासूमों को बचा सकते हो तो बचा लो. कोई कुछ न कर सकेगा.

अदालतें सुबूतों पर चलती हैं. अपराध को कोर्ट में साबित करना होगा. क्या पता, पुलिस की मार से बचने के लिए आरोपी ने हामी भरी हो.

यह तो समय ही बताएगा कि अदालत आरोपी की क्या सजा तय करती है, पर आप सावधान हो जाइए और ऐसे लोगों पर पैनी निगाह रखिए, चाहे पड़ोसी ही क्यों न हो.

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