यौन अपराध: लोमहर्षक कांड

जैसे-जैसे हम कथित रूप से सभ्य होते जा रहे हैं, देश में यौन अपराध बढ़ते चले जा रहे हैं. साथ साथ कानून भी सख्त होता जा रहा है. वस्तुतः यौन अपराध  जिस गति से बढ़ते चले जा रहे हैं वह एक सभ्य समाज के लिए चिंता का सबब है. दरअसल, पूर्व मे बलात्कार के बाद महिलाओं को अधमरा ही सही छोड़ दिया जाता था. क्योंकि कानून लाचर था. मगर अब जब कानून में तब्दीली करके उसे सरकार द्वारा सख्त बना दिया गया है,  यहां तक की फांसी प्रावधान किया गया है अपराधियों द्वारा अब कानून के भय के कारण बलात्कार के बाद  लड़कियों को मौत के घाट उतार दिया जाने लगा  है.

ऐसा ही एक लोमहर्षक कांड  छत्तीसगढ़ के बेमेतरा जिले के एक गांव में घटित हुआ है. जहां 14 वर्षीय एक  किशोरी को दो लोगों ने सिर्फ इसलिए जलाकर मार दिया कि उनके खिलाफ कानून  के पास कोई सबूत ना रह पाए और वे कानून के शिकंजे से बच जाएं.

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बेमेतरा जिले में एक  दिल दहला देने वाली शर्मनाक घटना हुई है. जिसकी गूंज आज संपूर्ण छत्तीसगढ़ में हो रही है.

जिले के दाढ़ी थाना क्षेत्र के मजगाँव में एक 14 वर्षीय किशोरी के साथ दो युवकों ने बलात्कार  की असफल  कोशिश की. बलात्कार की घटना को अंजाम देने विफल रहने वाले दोनों  युवकों ने  अपनी जान बचाने  किशोरी  पर मिट्टी तेल डालकर ज़िंदा जलाने का  असफल प्रयास किया.

80 पर्सेंट जल गई किशोरी

आरोपियों ने बलात्कार की असफल कोशिश के पश्चात किशोरी  पर ज्वलनशील पदार्थ डालकर उसे 80 पर्सेंट से अधिक जला दिया. आरोपियों की मंशा यह थी कि उनके कुकृत्य को ना पुलिस जान पाए और ना मामला लोगों तक पहुंच सके. इसीलिए बड़े ही शातिर  तरीके से उन्होंने  किशोरी  को जला डाला. यही कारण है कि  हॉस्पिटल में उसकी मृत्यु हो गई. घटना की जानकारी  प्राप्त होते ही  जहां पुलिस अलर्ट हो गई और आरोपियों को धर दबोचा वहीं यह गंभीर घटना जब बेमेतरा जिला से लेकर संपूर्ण छत्तीसगढ़ में प्रसारित होती चली गई तो लोगों में रोष पैदा हो गया. बेमेतरा जिला की पुलिस के मुताबिक इस घटना की जानकारी मिलते ही किशोरी को राजधानी रायपुर रिफर किया गया. मगर महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि किशोरी  ने मृत्यु  से पुलिसवालों को अपना अंतिम  बयान दर्ज करा दिया था.

बेमेतरा पुलिस अधीक्षक दिव्यांग पटेल ने हमारे संवाददाता को  बताया  घटना की जानकारी मिलते ही पुलिस ने तत्काल इस मामले में संज्ञान ले लिया था. यहां यह भी गौरतलब है कि घटना 22 जून सोमवार को  घटित हुई थी. बलात्कार की शिकार किशोरी का बयान लेने के बाद आरोपी दोनों युवकों को गिरफ्तार कर लिया गया . पकड़े गए आरोपियों में जहाँ  एक नाबालिग 13 वर्ष का है वहीं दूसरा 22 वर्ष का    है. दोनों ही युवा गाँव के ही रहने वाले हैं.

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उल्लेखनीय है कि कुछ दिनों पूर्व इसी तरह हुई एक घटना में बेमेतरा सिटी कोतवाली थाना क्षेत्र अंतर्गत  एक मासूम बच्ची को अगवा उसका रेप किया गया था. इस मामले को लेकर बेमेतरा शहर में जमकर हड़बोंग  हुआ था. पुलिस प्रशासन पर  लगातार सवाल उठाये जा  रहे थे. लगातार हो रहे प्रदर्शनों के बाद पुलिस आरोपी ट्रक ड्राईवर को गिरफ्तार करने सफल हो पाई थी. और अब यह मामला शांत ही हुआ है कि एक दूसरी लोमहर्षक घटना क्रम घटित हो गयी है.

8 वर्षीय बच्ची के साथ

छत्तीसगढ़ के बेमेतरा  जिले में ही,  इसी  जून  माह के प्रारंभ में, एक 8 साल की बच्ची के साथ दुष्कर्म  का मामला सामने आया था.  घर के आंगन में सो रही बालिका का  अपहरण किया गया. फिर  रेप की घटना को अंजाम दिया गया. आरोपी कथित रूप से बालिका  को घर से करीब 20 मीटर दूर छोड़कर भाग गये . ग्रामीणों ने बच्ची को सड़क किनारे देखा था. पूछताछ में  बालिका ने परिजनों को अपने साथ हुई पूरी घटना बताई. इसके बाद मामले की शिकायत पुलिस से की गई. शिकायत मिलते ही पुलिस ने मामला दर्ज कर लिया.   पुलिस को सूचना देकर बच्ची को अस्पताल में भर्ती कराया गया .

बालिका ने अपने साथ हुए वारदात की जानकारी दी जिसके बाद जिले में हड़कंप मच गया. फौरन पुलिस अधीक्षक दिव्यांग पटेल  अस्पताल पहुंचे. एसपी दिव्यांग पटेल ने  बताया कि बालिका ने अपने बयान में  वारदात की जानकारी दी.  अपहरणकर्ता ट्रक में उसे लेकर गया था और ट्रक से ही उसे छोड़कर चला गया. इस आधार पर बेमेतरा पुलिस चौक-चौराहों में लगे सीसीटीवी को खंगाल रही  रही थी मगर घटनाक्रम के पश्चात लोगों में आक्रोश फूट पड़ा और शिकायत गृहमंत्री तक पहुंच गई. अभी यह बलात्कार की घटना लोगों के जेहन से उतरी ही नहीं है कि पुनः दूसरी लोमहर्षक घटना घट गई.

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सुशांत की मौत के बाद बॉलीवुड से नाराज है बिहार के लोग, नहीं देखना चाहते इन सितारों की फिल्में!

बौलीवुड एक्टर सुशांत सिंह राजपूत (Sushant Singh Rajput) की सुसाइड के बाद से सभी जगह बस उन्ही की बातें चल रही है फिर चाहे वे सुशांत को इंसाफ दिलाने की बात हो या फिर स्टार किड्स (Star Kids) को बौयकौट करने की बात हो. बौलीवुड से लेकर भोजपुरी इंडस्ट्री तक सुशांत सिंह राजपूत के जाने से उदास है. ऐसे में भोजपुरी इंडस्ट्री से जुड़े कई लोगों ने सुशांत को याद कर उनके बारे में सोशल मीडिया पर काफी कुछ लिखा है और तो और खेसारीलाल यादव (Khesarilal Yadav) और अक्षरा सिंह (Akshara Singh) जैसे कलाकार सुशांत के घर उनके परिवार वालें से मिलने भी पहुंचे थे.

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सुशांत सिंह राजपूत पटना, बिहार के रहने वाले थे और उनकी आत्महत्या की खबर सुन पूरा बिहार इस समय काफी उदास है. इतना ही नहीं बल्कि पिछले दिनों पटना के लोगों ने सुशांत सिंह राजपूत को इंसाफ दिलाने के लिए कैंडल मार्च तक निकाली थी और उस कैंडन मार्च में करण जौहर (Karan Johar) और सलमान खान (Salman Khan) जैसे लोगों के पुतले भी जलाए गए थे जो कि बौलीवुड इंडस्ट्री में नेपोटिज्म फैला रहे हैं.

 

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Receive without pride, let go without attachment. #Meditations

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सुशांत सिंह राजपूत (Sushant Singh Rajput) के जाने का बाद बौलीवुड इंडस्ट्री के बारे में कई बातें सामने आई हैं जिससे के सभी लोग काफी गुस्से में हैं. सबसे बड़ी बात जो सामने आई वो ये है कि करण जौहर (Karan Johar), सलमान खान (Salman Khan), आलिया भट्ट (Alia Bhatt) और संजय लीला भंसाली (Sanjay Leele Bhansali) जैसे लोग इंडस्ट्री में नेपोटिज्म (Nepotism) फैला रहे हैं और इसका मतलब ये है कि ये लोग सिर्फ बड़े बड़े स्टार्स के बच्चों को ही अपनी फिल्म में लेना चाहते हैं फिर चाहे उनमें कोई टैलेंट हो या ना हो.

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ऐसे में सुशांत सिंह राजपूत जैसे टैलेंटेड एक्टर्स जो कि स्ट्रगल कर इंडस्ट्री का हिस्सा बनना चाहते हैं उन्हें ये लोग आगे नहीं बढ़ने देते. इसी कड़ी में बिहार के लोगों ने एक और बड़ा कदम उठाया है और उनका कहना हैं कि सलमान खान, आलिया भट्ट, करण जौहर जैसे अभिनेताओं और निर्देशकों की फिल्मों पर रोक लगनी चाहिए. इन सबकी मांग ये है कि ऐसे स्टार किड्स की फिल्में अब से बिहार में रिलीज नहीं की जानी चाहिए.

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अब देखने वाली बात ये होगी कि आखिर कब तक सुशांत के फैंस उन्हें न्याय दिलाने की लड़ाई लड़ेंगे और बौलीवुड इंडस्ट्री में कब तक ये नेपोटिज्म की वजह से टैलेंटेड एक्टर्स पीछे रहेंगे.

बिग बॉस विनर सिद्धार्थ शुक्ला ने पहली बार शादी को लेकर कहीं ऐसी बात, उड़ जाएंगे शहनाज के होश

टेलिवीजन इंडस्ट्री के सबसे बड़े रिएलिटी शो बिग बौस सीजन 13 (Bigg Boss 13) के विनर रह चुके सिद्धार्थ शुक्ला (Siddharth Shukla) अपने फैंस के बीच काफी पौपुलर हैं. बिग बौस (Bigg Boss) के चलते ही उनके फैंस ने खूब सपोर्ट किया था और सिद्धार्थ ने भी शो के दौरान खूब सुर्खियां बटोरी थीं. जैसा कि हम सब जानते हैं कि सिद्धार्थ शुक्ला अभी तक सिंगल हैं तो सिद्धार्थ के फैंस इस बात को लेकर काफी एक्साइटिड रहते हैं कि आखिर सिद्धार्थ शुक्ला कब और किस से शादी करेंगे.

 

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With no football in sight … that’s the best I could do with my jersey 😉

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भले ही बिग बौस के दौरान सिद्धार्थ शुक्ला (Siddharth Shukla) और शहनाज गिल (Shehnaz Gill) का कनेक्शन फैंस को बहुत पसंद और तो और फैंस ने तो इस जोड़ी का नाम तक रख दिया था “सिडनाज” (Sidnaaz). लेकिन बिग बौस से बाहर आने के बाद इन दोनो के रिलेशन में होने की कोई खबर सामने नहीं आई है. हाल ही में सिद्धार्थ शुक्ला के दिए एक इंटरव्यू में उन्होनें अपनी शादी के बारे में बात की.

 

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Things I need to do to be on social media 😋…. but yes missing the gym 😉

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सिद्धार्थ शुक्ला (Siddharth Shukla) ने अपनी शादी के बारे में बात करते हुए कहा कि, “शादी के लिए मैं फिलहाल किसी हमसफर की तलाश नही कर रहा हूं. ऐसे में आप ये कह सकते हैं कि मेरी शादी में अभी कुछ समय बचा है. मैं एक ऐसी लड़की से शादी करना चाहता हूं जो मुझे जज करने से पहले मेरी बात सुनना पसंद करे. मेरे लिए किसी की खूबसूरती प्यार की परिभाषा नही है. एक दूसरे को अच्छे से समझकर अपननाना ही मेरे लिए प्यार है.”

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It’s funny when I tell people what inspires me. It’s funny because most people think that the object of my inspiration is deep-seated in vain. I put my mind into two elements of paramount importance – fame & appreciation. For me, appreciation is the biggest motivator that cannot be compared to anything else for the simple reason that appreciating someone will always make them want to do more than what it is expected of them and makes one believe that you’re good at it and fortunately for me, I got it through acting. This inspires me to go the extra mile when I am acting; I like to do whatever it takes to hit the bull’s eye to own that role/character. Fame, however, has been a game-changer for me – It’s a beautiful feeling to be known by so many and believe that these people back my work. This is my Ultimate Inspiration Story and now I want you all to #UncoverInspiration in your life and share your story with me. Participate and stand a chance to win all new #OPPOFindX2Series #5G #TrueFlagshipExperience #PerfectScreenOf2020 @oppomobileindia . . Launching on 17th June. —————————————————- . Suit: @bharat_reshma Styled by: @stylebysaachivj 📷: @shivangi.kulkarni

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जैसा कि हम सबसे बिग बौस के घर में देखा कि सिद्धार्थ शुक्ला का नेचर काफी गुस्से वाला और अलग है तो उनकी इन बातों से ऐसा लग रहा है कि उन्हें कोई ऐसा साथी चाहिए जो कि उनके नेचर को समझे ना कि उन्हें समझने से पहले ही जज करने लगे फिर चाहे ऐसा साथी मिलने में जितना मर्जी समय लगे.

 

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💛

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सिद्धार्थ शुक्ला इसी बारे में आगे बात करते हुए कहते हैं कि, “अगर मुझे प्यार और करियर में से किसी एक को चुनने के लिए कहा जाएगा तो मैं केवल अपने करियर को चुनना पसंद करुंगा क्योंकि मेरी लाइफ पार्टनर को ये राज पता होगा, करियर को महत्व देना कोई बुरी बात नहीं है. ये बात उसे भी समझनी होगी. अगर मेरी लाइफपार्टनर ये समझ जाए तो ऐसे में हम दोनों को किसी तरह की कोई दिक्कत नही होगी.”

हल: आखिर क्यों पति से अलग होना चाहती थी इरा?

हल : भाग 2

पहला भाग पढ़ें- हल: आखिर क्यों पति से अलग होना चाहती थी इरा?

लेखक- विजया वासुदेवा

भाग-2

इरा हैरत से अपूर्व को देखने लगी. फिर पूछा, ‘‘अरे, ऐसा क्यों?’’

‘‘जब आप और पापा 15 साल एकदूसरे के साथ रह कर भी एकदूसरे के साथ नहीं रह सकते, अलग होना चाहते हैं तब हम तो आप के साथ 12 साल से रह रहे हैं. हमें आप कैसे जानेंगे? आप और पापा अगर अलग हो रहे हैं तो हमें होस्टल भेज देना, हम आप दोनों से ही नहीं मिलेंगे,’’ अपूर्व तिलमिला उठा था.

‘‘पागल है क्या तू?’’ इरा हैरान थी, ‘‘नहीं बिलकुल नहीं. इतने वर्षों साथ रह कर भी आप को एकदूसरे का आदर करना, एकदूसरे को अपनाना नहीं आया, तो आप हमें कैसे अपनाएंगे.

‘‘पापा आप का सम्मान नहीं करते तभी आप को घर छोड़ कर जाने देंगे. आप पापा को और घर को इतने सालों में भी समझा नहीं पाईं तभी घर छोड़ कर जाने की बात कर सकती हैं. इसलिए हम आप दोनों का ही आदर नहीं कर सकेंगे और हम मिलना भी नहीं चाहेंगे आप दोनों से,’’ अपूर्व के चेहरे पर उत्तेजना और आक्रोश झलक रहा था.

इरा ने अपूर्व के कंधे को कस कर पकड़ लिया. उस का बेटा इतना समझदार होगा उस ने सोचा भी नहीं था. नवीन से अलग हो कर उस ने सोचा भी नहीं था कि अपने बेटे की नजरों में वह इतनी गिर जाएगी. अगर नवीन उसे सम्मान नहीं दे रहा, तो वह भी अलग हो रही है नवीन का तिरस्कार कर के. इस से वह नवीन को भी तो अपमानित कर रही है. परिवार टूट रहा है, बच्चे असंतुलित हो रहे हैं. वह विवाहविच्छेद नहीं करेगी. उस के आशियाने के तिनके उस के आत्मसम्मान की आंधी में नहीं उड़ेंगे. उसे नवीन के साथ अब किसी अलग ही धरातल पर बात करनी होगी.

अक्सर ही नवीन झगड़े के बाद 2-4 दिन देर से घर आता है. औफिस में अधिक काम का बहाना कर के देर रात तक बैठा रहता. इरा उस की इस मानसिकता को अच्छी तरह समझती है.

इरा ने औफिस से 10 दिनों का अवकाश लिया. नवीन 2-4 दिन तटस्थता से इरा का रवैया देखता रहा. फिर एक दिन बोला, ‘‘ये बेमतलब की छुट्टियां क्यों ली जा रही हैं?’’

छुट्टियां खत्म हो जाएंगी तो हाफ पे ले लूंगी, जब औफिस जाना ही

नहीं है तो पिछले काम की छुट्टियों का हिसाब पूरा कर लूं,’’ इरा ने स्थिर स्वर में कहा.

‘‘किस ने कहा तुम औफिस छोड़ रही हो?’’ नवीन ने ऊंचे स्वर में कहा, ‘‘मैडम, आजकल नौकरी मिलती कहां है जो तुम यों आराम से लगीलगाई नौकरी को लात मार रही हो?’’

‘‘और क्या करूं?’’ इरा ने सपाट स्वर में कहा, ‘‘जिन शर्तों पर नौकरी करनी है वह मेरे बस के बाहर की बात है.’’

‘‘कौन सी शर्तें?’’ ‘‘नवीन ने अनजान बनते हुए पूछा.’’

‘‘देरसबेर होना, जनसंपर्क के काम में सभी से मिलनाजुलना होता है, वह भी तुम्हें पसंद

नहीं. कैरियर या होम केयर में से एक का चुनाव करना था. सो मैं ने कर लिया. मैं ने नौकरी

छोड़ने का निर्णय कर लिया है,’’ इरा ने अपना फैसला सुनाया.

‘‘क्या बच्चों जैसी जिद करती हो,’’ नवीन झल्लाई आवाज में बोला, ‘‘एक जने की सैलरी में घरखर्च और बच्चों की पढ़ाई कैसे होगी?’’

‘‘पर नौकरी छोड़ कर तुम सारा दिन करोगी क्या?’’ नवीन को समझ नहीं आ रहा था कि वह किस तरह इरा का निर्णय बदले.

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‘‘जैसे घर पर रहने वाली औरतें खुशी से दिन बिताती हैं. टीवी, वीडियो, ताश, बागबानी, कुकिंग, किटी पार्टी हजार तरह के शौक हैं. मेरा भी टाइम बीत जाएगा. टाइम काटना कोई समस्या नहीं है,’’ इरा आराम से दलीलें दे रही थी.

‘‘तुम्हारा कितना सम्मान है, तुम्हारे और मेरे सर्किल में लोग तुम्हें कितना मानते हैं. कितने लोगों के लिए तुम प्रेरणा हो, सार्थक काम कर रही हो,’’ नवीन ने इरा को बहलाना चाहा.

‘‘तो क्या इस के लिए मैं घर में रोजरोज कलहकलेश सहूं, नीचा देखूं, हर बात पर मुजरिम की तरह कठघरे में खड़ी कर दी जाऊं बिना किसी गुनाह के?

‘‘क्यों सहूं मैं इतना अपमान इस नौकरी के लिए? इस के बिना भी मैं खुश रह सकती हूं. आराम से जी सकती हूं,’’ इरा ने बिना किसी तनाव के अपना निर्णय सुनाया.

‘‘इरा आई एम वैरी सौरी, मेरा मतलब तुम्हें अपमानित करने का नहीं था. जब भी तुम्हें आने में देर होती है मेरा मन तरहतरह की आशंकाओं से घिर जाता है. उसी तनाव में तुम्हें बहुत कुछ उलटासीधा बोल दिया होगा. मुझे माफ कर दो. मेरा इरादा तुम्हें पीड़ा पहुंचाने या अपमानित करने का नहीं था,’’ नवीन के चेहरे पर पीड़ा और विवशता दोनों झलक रही थीं.

‘‘ठीक है कल से काम पर चली जाऊंगी. पर उस के लिए आप को भी वचन देना होगा कि इस स्थिति को तूल नहीं देंगे. मैं नौकरी करती हूं. मेरे लिए भी समय के बंधन होते हैं. मुझे भी आप की तरह समय और शक्ति काम के प्रति लगानी पड़ती है. आप के काम में भी देरसबेर होती ही है पर मैं यों शक कर के क्लेश नहीं करती,’’ कहतेकहते इरा रोआंसी हो उठी.

‘‘यार कह दिया न आगे से ऐसा नहीं करूंगा. अब बारबार बोल कर क्यों नीचा दिखाती हो,’’ इरा का हाथ अपने दोनों हाथों में थाम कर नवीन ने कहा.

इरा सोच रही थी कि रिश्ता तोड़ कर अलग हो जाना कितना सरल हल लग रहा था. लेकिन कितना पीड़ा दायक. परिवार के टूटने का त्रास सहन करना क्या आसान बात थी. मन ही मन वह अपने बेटे की ऋणी थी, जिस की जरा सी परिपक्वता ने यह हल निकाल दिया था, उस की समस्या का.

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9 लाशों ने खोला एक हत्या का राज

हल : भाग 1

लेखक- विजया वासुदेवा

इरा कल रात के नवीन के व्यवहार से बेहद गुस्से में थी. अब मुख्यमंत्री की प्रैस कौन्फ्रैंस हो और वह मुख्य जनसंपर्क अधिकारी हो कर जल्दी कैसे घर आ सकती थी. पर नहीं. नवीन कुछ भी सुनने को तैयार नहीं था. माना लौटने में रात के 11 बज गए थे, लेकिन मुख्यमंत्री को बिदा करते ही वह घर आ गई थी. नवीन के मूड ने उसे वहां एक

भी निवाला गले से नीचे नहीं उतारने दिया. दिनभर की भागदौड़ से थकी जब वह रात को भूखी घर आई, तो मन में कहीं हुमक उठी कि अम्मां की तरह कोई उसे दुलारे कि नन्ही कैसे मुंह सूख रहा है तुम्हारा. चलो हम खाना परोस

दें. लेकिन कहां वह कोमलता और ममत्व की कामना और कहां वास्तविकता में क्रोध से उबलता चहलकदमी करता नवीन. उसे देखते ही उबल पड़ा, ‘‘यह वक्त है घर आने का? 12 बज रहे हैं?’’

‘‘आप को पता तो था आज सीएम की प्रैस कौन्फ्रैंस थी. आप की नाराजगी के डर से मैं ने वहां खाना भी नहीं खाया और आप हैं कि…’’ इरा रोआंसी हो आई थी.

‘‘छोड़ो, आप का पेट तो लोगों की सराहना से ही भर गया होगा. खाने के लिए जगह ही कहां थी? हम ने भी बहुत सी प्रैस कौन्फ्रैंस अटैंड की हैं. सब जानते हैं महिलाओं की उपस्थिति वहां सिर्फ वातावरण को कुछ सजाए रखने से अधिक कुछ नहीं?’’

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‘‘शर्म करो… जो कुछ भी मुंह में आ रहा है बोले चले जा रहे हो,’’ इरा साड़ी हैंगर में लगाते हुए बोली.’’

‘‘इस घर में रहना है, तो समय पर आनाजाना होगा… यह नहीं कि जब जी चाहा घर से चली गई जब भी चाहा चली आई. यह घर है कोई सराय नहीं.’’

‘‘क्या मैं तफरीह कर के आ रही हूं? तुम इतने बड़े व्यापारिक संस्थान में काम करते हो, तुम्हें नहीं पता, देरसबेर होना अपने हाथ की बात नहीं होती?’’ इरा को इस बेमतलब की बहस पर गुस्सा आ रहा था.

गुस्से से उस की भूख और थकान दोनों ही गायब हो गई. फिर कौफी बना कप में डाल कर बच्चों के कमरे में चली गई. दोनों बच्चे गहरी नींद में सो रहे थे.

इरा ने शांति की सांस ली. नवीन की टोकाटाकी उस के लिए असहनीय हो गई थी.

फोन किसी का भी हो, नवीन के रहते आएगा तो वही उठाएगा. फोन पर पूरी जिरह करेगा क्या काम है? क्या बात करनी है? कहां से बोल रहे हो?

लोग इरा का कितना मजाक उड़ाते हैं. नवीन को उस का जेलर कहते हैं. कुछ लोगों की नजरों में तो वह दया की पात्र बन गई है.

इरा सोच कर सिहर उठी कि अगर ये बातें बच्चे सुनते तो? तो क्या होती उस की छवि बच्चों की नजरों में. वैसे जिस तरह के आसार हो रहे हैं जल्द ही बच्चे भी साक्षी हो जाएंगे ऐसे अवसरों के. इरा ने कौफी का घूंट पीते हुए निर्णय लिया, बस और नहीं. उसे अब नवीन के साथ रह कर और अपमान नहीं करवाना है. पुरुष है तो क्या हुआ? उसे हक मिल गया है उस के सही और ईमानदार व्यवहार पर भी आएदिन प्रश्नचिन्ह लगाने का और नीचा दिखाने का…अब वह और देर नहीं करेगी. उसे जल्द से जल्द निर्णय लेना होगा वरना उस की छवि बच्चों की नजरों में मलीन हो जाएगी. इसी ऊहापोह में कब वह वहीं सोफे पर सो गई पता ही नहीं चला.

अगले दिन बच्चों को स्कूल भेजा. नवीन ऐसा दिखा रहा था मानो कल की रात रोज गुजर जाने वाली सामान्य सी रात थी. लेकिन इरा का व्यवहार बहुत सीमित रहा.

इरा को 9 बजे तक घर में घूमते देख, नवीन बोला, ‘‘क्या आज औफिस नहीं जाना है? आज छुट्टी है? अभी तक तैयार नहीं हुई.’’

‘‘मैं ने छुट्टी ली है,’’ इरा ने कहा.

‘‘तुम्हारी तबीयत तो ठीक लग रही है, फिर छुट्टी क्यों?’’ नवीन ने पूछा.

‘‘कभीकभी मन भी बीमार हो जाता है इसीलिए,’’ इरा ने कसैले स्वर में कहा.

‘‘समझ गया,’’ नवीन बोला, ‘‘आज तुम्हारा मन क्या चाह रहा है. क्यों बेकार में अपनी छुट्टी खराब कर रही हो, जल्दी से तैयार हो जाओ.’’

‘‘नहीं,’’ इरा बोली, ‘‘आज मैं किसी हाल में भी जाने वाली नहीं हूं,’’ इरा की आवाज में जिद थी. नवीन कार की चाबी उठाते हुए बोला, ‘‘ठीक है तुम्हारी मरजी.’’

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बच्चों और पति को भेजने के बाद वह देर तक घर में इधरउधर चहलकदमी करती रही. उस का मन स्थिर नहीं था. अगर नवीन की नोकझोंक से तंग आ कर नौकरी छोड़ भी दूं तो क्या भरोसा कि नवीन के व्यवहार में अंतर आएगा या फिर बात का बतंगड़ नहीं बनाएगा… लड़ने वाले को तो बहाने की भी जरूरत नहीं होती. नवीन के पिता के इसी कड़वे स्वभाव के कारण ही उस की मां हमेशा घुटघुट कर जी रही थीं. पैसेपैसे के लिए उन्हें तरसा कर रखा था नवीन के पिता ने.

अपनी मरजी से हजारों उड़ा देंगे. नवीन की नजरों में उस के पिता ही उस के आदर्श पुरुष थे और मां का पिता से दब कर रहना ही नवीन के लिए मां की सेवा और बलिदान था.

इरा जितना सोचती उतना ही उलझती जाती, उसे लग रहा था अगर वह इसी तरह मानसिक तनाव और उलझन में रही तो पागल हो जाएगी. हर जगह सम्मानित होने वाली इरा अपने ही घर में यों प्रताडि़त होगी उस ने सोचा भी न था. असहाय से आंसू उस की आंखों में उतर आए. अचानक उस की नजर घड़ी पर पड़ी. अरे, डेढ़ बज गया… फटाफट उठ कर नहाने के लिए गई. वह बच्चों को अपनी पीड़ा और अपमान का आभास नहीं होने देना चाहती थी. नहा कर सूती साड़ी पहन हलका सा मेकअप किया. फिर बच्चों के लिए सलाद काटा, जलजीरा बनाया, खाने की मेज लगाई.

दोनों बेटे मां को देख कर खिल उठे. बिना छुट्टी के मां का घर होना उन के लिए कोई पर्व सा बन जाता है. तीनों ने मिल कर खाना खाया. फिर बच्चे होमवर्क करने लग गए.

5 बजे के लगभग इरा को याद आया कि उस की सहेली मानसी पाकिस्तानी नाटक का वीडियो दे कर गई थी. बच्चे होमवर्क कर चुके थे. इरा ने उन्हें नाटक देखने के लिए आवाज लगाई. दोनों बेटे उस की गोदी में सिर रख कर नाटक देख रहे थे. अजीब इत्तफाक था. नाटक में भी नायिका अपने पति की ज्यादतियों से तंग आ कर अपने अजन्मे बच्चे के संग घर छोड़ कर चली जाती है हमेशा के लिए.

इरा की तरफ देख कर अपूर्व बोला, ‘‘मां, आप ये रोनेधोने वाली फिल्में मत देखा करो. मन उदास हो जाता है.’’

‘‘मन उदास हो जाता है इसीलिए नहीं देखनी चाहिए?’’ इरा ने सवाल किया.

‘‘बेकार का आईडिया है एकदम,’’ अपूर्व खीज कर बोला, ‘‘इसीलिए नहीं देखनी चाहिए?’’

‘‘अपूर्व,’’ इरा ने कहा, ‘‘समझो इसी औरत की तरह अगर हम भी घर छोड़ना चाहें तो तुम किस के साथ रहोगे?’’

‘‘कैसी बेकार की बातें करती हैं आप भी मां,’’ अपूर्व नाराजगी के साथ बोला, ‘‘आप ऐसा क्यों करेंगी?’’

‘‘यों समझो कि हम भी तुम्हारे पापा के साथ इस घर में नहीं रह सकते तो तुम किस के साथ रहोगे?’’ इरा ने पूछा.

‘‘जरूरी नहीं है कि आप के हर सवाल का जवाब दिया जाए,’’ 13 वर्ष का अपूर्व अपनी आयु से अधिक समझदार था.

‘‘अच्छा अनूप तुम बताओ कि तुम क्या करोगे?’’ इरा ने छोटे बेटे का मन टटोला.

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अनूप को बड़े भाई पर बड़प्पन दिखाने का अवसर मिल गया. बोला, ‘‘वैसे तो हम चाहते हैं कि आप दोनों साथ रहें? लेकिन अगर आप जा रही हैं तो हम आप के साथ चलेंगे. हम आप को बहुत प्यार करते हैं,’’ अनूप बोला, ‘‘चल झूठे…’’ अर्पूव बोला, ‘‘मां, अगर पापा आप की जगह होते तो यह उन्हीं को भी यही जवाब देता.’’

‘‘नहीं मां, भैया झूठ बोल रहा है. यही पापा के साथ जाता. पापा हमें डांटते हैं. हमें नहीं रहना उन के साथ. आप हमें प्यार करती हैं. हम आप के साथ रहेंगे,’’ अनूप प्यार से इरा के गले में बांहें डालते हुए बोला.

‘‘डांटते तो हम भी है,’’ इरा ने पूछा, ‘‘क्या तब तुम हमारे साथ नहीं रहोगे?’’

‘‘आप डांटती हैं तो क्या हुआ, प्यार भी तो करती हैं, फिर आप को खाना बनाना भी आता है. पापा क्या करेंगे?’’ अगर नौकर नहीं होगा तो? अनूप ने कहा.

‘‘अच्छा अपूर्व तुम जवाब दो,’’ इरा ने अपूर्व के सिर पर हाथ रख कर उस का मन फिर से टटोलना चाहा.

इरा का हाथ सिर से हटा कर अपूर्र्व एक ही झटके में उठ बैठा. बोला, ‘‘आप उत्तर चाहती हैं तो सुन लीजिए, हम आप दोनों के साथ ही रहेंगे.’’

अगले भाग में पढ़िए- क्या पति को छोड़ पाएगी इरा?

9 लाशों ने खोला एक हत्या का राज : भाग 3

घर से निकलने से पहले रफीका ने बच्चों से कह दिया था कि वह संजय के साथ मां से मिलने कोलकाता जा रही है. 4 दिनों बाद वह वापस लौट आएगी. तुम सब ठीक से रहना, अपना खयाल रखना. किसी चीज की जरूरत पड़े तो निशा फूफी से कह कर ले लेना.

खैर, उस रात रेलगाड़ी वारंगल से तडेपल्लगुडम पहुंची तो रफीका की पलकें झपकने लगीं. वह सो गई तो संजय ट्रेन से प्लेटफार्म पर उतरा. स्टाल से उस ने एक पैकेट छाछ का लिया और वापस ट्रेन में अपनी सीट पर बैठ गया.

एक डिब्बे में छाछ पलट कर उस ने बड़ी सफाई से उस ने उस में नींद की 10 गोलियों का चूण मिला दिया. जब दवा छाछ में घुल गई तो उस ने नींद में सोई रफीका को जगा कर छाछ पिला दी.

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छाछ पीने के बाद वह फिर सो गई. उसे क्या पता था कि जीवन का हमसफर बनने वाला संजय यमराज बन कर उस की जिंदगी छीनने वाला है और अब वह चंद पलों की मेहमान है.

थोड़ी देर बाद दवा ने अपना असर दिखाना शुरू किया. संजय ने रफीका को हिलाडुला कर देखा. वह बेसुध पड़ी थी. उसी दौरान बड़ी सफाई से उस ने उसी के दुपट्टे से उस का गला घोंट दिया.

फिर मौका देख कर रफीका को अंधेर में तडेपल्लीगुडम और राजमुंद्री रेलवे स्टेशन के बीच रेलगाड़ी से नीचे गिरा दिया. वह मन ही मन खुश हो रहा था. क्योंकि उस के और शाइस्ता के बीच का रोड़ा हमेशाहमेशा के लिए निकल गया था.

रफीका को ठिकाने लगाने के बाद सितमगर आशिक संजय अगले स्टेशन राजमुंद्री पर उतर गया. पूरी रात उस ने स्टेशन पर बिताई. फिर अगले 2 दिनों तक वह राजमुंद्री शहर में रहा और तीसरे दिन अकेले वारंगल वापस लौट आया.

संजय को अकेले आया देख कर मकसूद को अजीब लगा. उस ने उस से रफीका के बारे में पूछा तो उस ने झूठ बोल दिया कि रफीका अपने एक रिश्तेदार के यहां रुक गई है. 2-4 दिनों में वापस लौट आएगी.

पता नहीं क्यों संजय का यह जवाब मकसूद के गले नहीं उतर रहा था. फिर उस ने सोचा कि हो सकता है लंबे समय के बाद वह मायके गई है, किसी रिश्तेदार से मिलने का मन हुआ हो, तो रुक गई हो. 2-4 दिन में खुद ही लौट आएगी. आखिर बच्चों की भी तो चिंता होगी उसे.

रफीका को कोलकाता गए 10 दिन बीच चुके थे. न तो रफीका घर वापस लौटी थी और न ही उस ने फोन किया था. मां को ले कर बच्चे भी परेशान हो रहे थे. संजय से पूछने पर वह गोलमोल जवाब दे देता था. मकसूद भी उस से पूछपूछ कर परेशान हो चुका था.

फिर मकसूद ने रफीका की मां के पास फोन किया और उस के बारे में पूछा. उस की मां ने कहा कि रफीका तो यहां आई ही नहीं. यह सुन कर मकसूद का माथा ठनक गया. उसे यह समझते देर नहीं लगी कि दाल में कुछ काला है. संजय ने रफीका के साथ जरूर कुछ ऐसावैसा कर दिया है.

इसी बीच कोरोना संकट को ले कर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लौकडाउन की घोषणा कर दी, जिस से लोगों के घरों से निकलने पर सख्त पाबंदी लग गई.

मकसूद जिस कारखाने में काम करता था, ऐहतियात के तौर पर उस के मालिक ने उसे परिवार सहित शहर से गांव गोर्रेकुंठा शिफ्ट कर दिया था. जबकि संजय रफीका के बच्चों को साथ ले कर रहता था.

झूठी बातें कह कर उस ने बच्चों को अपनी बातोें में उलझाए रखा. उधर मकसूद संजय से फोन कर के पूछता रहा कि बताओ रफीका का तुम ने क्या किया. वह कहां है?

रफीका जिंदा होती तो वह आती. वह मर चुकी थी, फिर संजय क्या जवाब देता. इसलिए वह मकसूद से बचने लगा था. संजय समझ गया था कि मकसूद को सच के बारे में पता चल चुका है. कहीं मकसूद ने पुलिस को बता दिया तो उसे जेल जाना पड़ सकता है.

जेल जाने की सोच कर संजय डर गया. वह जेल नहीं जाना चाहता था. उसी समय उस के दिमाग में एक खतरनाक योजना ने जन्म ले लिया. उस ने सोचा कि क्यों न वह मकसूद के पूरे परिवार को खत्म कर दे. जब परिवार में कोई जीवित नहीं रहेगा तो रफीका के बारे में पूछने वाला कोई नहीं होगा और यह राज सदा के लिए दफन हो जाएगा.

खतरनाक विचार मन में आते ही संजय आगे की योजना बनाने लगा. 20 मई, 2020 को मकसूद के बड़े बेटे शादाब का जन्मदिन था. संजय जानता था मकसूद बेटे का जन्मदिन धूमधाम से मनाता है. उस ने सोचा कि अगर खाने में जहर मिला दे तो खाना खाते ही पूरा परिवार यमलोक सिधार जाएगा और यह राज राज बन कर रह जाएगा.

मकसूद कई दिनों से संजय को बुला रहा था. लेकिन संजय उस से मिलने उस के घर नहीं जा रहा था. वह जान था कि मकसूद उसे क्यों बुला रहा है. 16 मई को फोन कर के मकसूद ने संजय को बेटे के जन्मदिन पर अपने यहां आमंत्रित किया. घर पर ही छोटी सी पार्टी का आयोजन है, तुम जरूर आना.

मकसूद जान रहा था कि वैसे तो संजय आ नहीं रहा है, लेकिन बर्थडे के नाम पर वह जरूर आएगा. उसी दौरान उस से रफीका के बारे में पूछूंगा. संजय ने पार्टी में सही समय पर आने के लिए हामी भर दी थी.

18 मई को संजय ने मैडिकल स्टोर से नींद की 60 गोलियां खरीदीं और घर में पीस कर रख दी. 20 मई की शाम मकसूद ने संजय को फोन कर के याद दिलाया कि उसे बेटे के जन्मदिन पर आना है. संजय ने हां में जवाब दिया और कहा कि वह पार्टी में जरूर आएगा.

20 मई, 2020 की रात 8 बजे संजय मकसूद के घर पहुंचा. घर में उस के परिवार के सभी लोग यानी पत्नी निशा, बेटी बुशरा खातून, बेटे शादाब आलम, सोहेल आलम, 3 वर्षीय नाती के साथ मकसूद का दोस्त शकील मौजूद थे. कारखाने के 2 और मजदूर श्रीराम और श्याम भी वहां आए थे. वे दोनों ऊपर के कमरे में ठहरे हुए थे.

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इसी बीच संजय मौका देख कर किचन में गया और नींद की 60 गोलियों का पाउडर दाल में मिला दिया और बाहर निकल आया. रात साढे़ 9 बजे खाना शुरू हुआ. संजय ने खाना खाने से साफ मना कर दिया. मकसूद और उस के परिवार वाले, शकील, श्रीराम और श्याम ने खाना खाया. खाना खाने के कुछ ही देर बाद नींद की गोलियों ने अपना असर दिखाना शुरू कर दिया. एकएक कर सभी नींद के आगोश में समाते चले गए. संजय भी वहीं सो गया था.

संजय रात साढ़े 12 बजे उठा. सभी को हिलाडुला कर देखा. किसी के शरीर में हरकत नहीं हो रही थी. इस के बाद संजय ने घर में रखे बोरे में एकएक कर के सभी को भरा और घर से बोरा घसीटते हुए गांव के बाहर गोदाम के पास स्थित कुएं में डालता गया. उस का यह काम सुबह 5 बजे तक चला. सभी 9 लोगों को जिंदा कुएं में डालने के बाद संजय इत्मीनान से घर लौट आया और सो गया. वहां पानी में डूबने के बाद उन की मौत होती गई.

21 मई को कुछ चरवाहे अपनी भैंसों को चराते हुए कुएं की ओर गए. उन्होंने भैंसों को चरने के लिए छोड़ दिया और खेलने लगे. खेलतेखेलते उन की प्लास्टिक की गेंद कुएं में चली गई. गेंद को देखने के लिए उन्होंने कुएं में झांका तो भीतर का नजारा देख कर उन के होश उड़ गए.

चरवाहे चीखते हुए उलटे पांव वहां से भागे. कुएं के भीतर पानी में लाशें तैर रही थीं. चरवाहों ने गांव पहुंच कर इस की सूचना ग्राम प्रधान को दी. ग्राम प्रधान ने इस घटना की खबर गिचिकोंडा थाने को दे दी.

घटना की सूचना मिलते ही एसओ शिवरामे पुलिस टीम ले कर गांव पहुंच गए. कुएं का निरीक्षण किया तो उस में 4 लाशें तैरती नजर आईं. जबकि 5 लाशें कुएं की तलहटी में बैठ गई थीं, जो अगले दिन पानी पर उतराती दिखाई दीं.

पूछताछ के बाद पुलिस कमिश्नर वी. रविंद्र ने प्रैस कौन्फ्रैंस कर के घटना की जानकारी पत्रकारों को दी. संजय ने एक हत्या छिपाने के लिए 9 और हत्याओं को अंजाम दिया था. सबूत मिटाने के लिए उस ने सभी के मोबाइल फोन छिपा दिए थे, जो बरामद कर लिए गए.

सीसीटीवी फुटेज में भी उसे देखा गया. संजय की घिनौनी करतूत से पूरी मानवता शर्मसार हुई. उसे उस के किए की सजा जरूर मिलेगी.

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– कथा में शाइस्ता परिवर्तित नाम है. कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

9 लाशों ने खोला एक हत्या का राज : भाग 2

दिल दहला देने वाली घटना को घटे 3 दिन बीत चुके थे. घटना को ले कर समूचे राज्य में दहशत थी. पुलिस पर जनता का काफी दबाव था.

लोग मांग कर रहे थे कि घटना का खुलासा जल्द से जल्द कर के हत्यारों को जेल भेजा जाए. जल्द खुलासा न होने पर लोगों ने पुलिस प्रशासन के खिलाफ बड़ा आंदोलन करने की चेतावनी भी दी. पुलिस कमिश्नर वी. रविंद्र ने डीसीपी वेंकट रेड्डी को घटना का खुलासा जल्द से जल्द करने के आदेश दे दिए.

घटना की छानबीन में यह मामला आत्महत्या का नहीं बल्कि हत्या का प्रमाणित हो चुका था. मृतक मकसूद का दोस्त संजय कुमार यादव शक के दायरे में पहले ही आ चुका था. अब तक की जांच के दौरान जुटाए गए साक्ष्य संजय के खिलाफ थे.

24 मई, 2020 को पुलिस ने शक के आधार पर संजय को गिचिकोंडा से हिरासत में ले लिया. जब उस से पूछताछ की तो वह बारबार खुद को निर्दोष बताता रहा. पुलिस ने जब उस से सख्ती से रफीका के बारे में पूछा तो उस के चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगीं.

संजय समझ चुका था अब और देर तक उस का नाटक चलने वाला नहीं है. इस के बाद वह डीसीपी रेड्डी के पैरों पर वह गिर कर गिड़गिड़ाने लगा, ‘‘साहब, मुझे मत मारिए. मैं सचसच बताता हूं. सभी हत्याएं मैं ने ही की हैं.’’

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‘‘क्याऽऽ’’ संजय के मुंह से हत्या की बात सुन कर सभी पुलिसकर्मी हैरान रह गए.

‘‘क्या करता, सर. मैं मजबूर था. रफीका के बारे में सवाल पूछपूछ कर मकसूद और उस के घर वालों ने मेरा दिमाग खराब कर दिया था. राज छिपाने का मेरे पास यही आखिरी रास्ता बचा था…’’ इस के बाद संजय पूरी कहानी से परतदरपरत परदा उठाता चला गया.

संजय के बयान के आधार पर दिल हदला देने वाली कहानी कुछ ऐसे सामने आई –

45 वर्षीय मोहम्मद मकसूद आलम मूलरूप से पश्चिम बंगाल के कोलकाता का रहने वाला था. करीब 25 साल पहले अपनी बीवीबच्चों को साथ ले कर तेलंगाना के वारंगल जिले के गोर्रेकुंठा में बस गया था. तब वारंगल जिला आंध्र प्रदेश में पड़ता था. पत्नी निशा आलम और 3 बच्चे शादाब, बुशरा खातून और सोहेल, मकसूद का बस यही घरसंसार था. ब्याह के बाद से बेटी बुशरा मायके में बेटे के साथ रहती थी.

मोहम्मद मकसूद आलम और उस की पत्नी निशा आलम बोरे बनाने वाली एक फैक्ट्री में काम करते थे. उसी फैक्ट्री में बिहार के दरभंगा जिले का रहने वाला 26 वर्षीय संजय कुमार यादव भी काम करता था.

मिलनसार, कर्मठ और व्यवहार कुशल संजय ने अपने व्यवहार से मकसूद ही नहीं, सभी कर्मचारियों के दिलों में जगह बना ली थी. मकसूद भले ही उम्र में संजय से 20 साल बड़ा था, लेकिन वह संजय को अपना दोस्त मानता था.

उस का मकसूद के घर भी आनाजाना था. मकसूद के बच्चे उसे चाचा कहते थे.

संजय की मकसूद के घर के भीतर तक पैठ बन गई थी. उस के घर वाले जानते थे कि वह नेक इंसान है और अकेला रहता है. मकसूद की पत्नी निशा जब भी कुछ अच्छा पकाती थी तो संजय को खाने पर जरूर बुलाती थी.

संजय की जिंदगी में सब कुछ ठीकठाक और मजे से चल रहा था. इसी बीच उस की किस्मत में रफीका आ कर बैठ गई. रफीका, मकसूद की पत्नी निशा के भाई की बेटी थी. किस्मत की मारी रफीका कई साल पहले कोलकाता से बच्चों को साथ ले कर फूफी के पास रहने आई थी. रफीका के 3 बच्चे थे. बच्चों की परवरिश की जिम्मेदारी उसी के कंधों पर थी.

5 साल पहले रफीका को उसके पति ने तलाक दे दिया था. तलाक के बाद से रफीका की जिंदगी तबाह हो गई थी. इस महंगाई के जमाने में 3-3 बच्चों का भरणपोषण करना कोई मामूली बात नहीं थी. वह भी तब जब आय का कोई स्रोत न हो. वह दिनरात इसी चिंता में रहती थी कि जीवन की नैया कैसे चलेगी, कौन हमारा खेवनहार होगा?

रफीका की सब से बड़ी बेटी शाइस्ता 15 साल की हो चुकी थी. रफीका को सब से ज्यादा उसी की चिंता सताती थी. रफीका की जिंदगी दूसरों के रहमोकरम पर चल रही थी. निशा से भतीजी की तकलीफ देखी नहीं जा रही थी तो उस ने उसे कोलकाता से अपने पास गोर्रेकुंठा बुला लिया.

मालिक से सिफारिश कर के मकसूद ने रफीका को भी अपनी फैक्ट्री में नौकरी दिलवा दी. तभी से वह बच्चों को ले कर फूफी के साथ रह रही थी.

संजय मकसूद का दोस्त था. उस की घर में भीतर तक पैठ भी थी. संजय की नजर रफीका के गोरे चेहरे पर पड़ी तो वह उसे मन भा गई. कुंवारे संजय ने अपने दिल पर रफीका का नाम लिख दिया. जब संजय ने रफीका की कारुणिक कहानी सुनी तो उस के प्रति उस का प्रेम और भी बढ़ गया था.

उस दिन से संजय रफीका और उस के बच्चों का खास खयाल रखने लगा. वह उन की जरूरत के सामान ला कर देता रहता था. कह सकते हैं कि वह अभिभावक की तरह बच्चों की जरूरतें पूरी करने लगा. उस का समर्पण देख रफीका भी संजय की ओर आकर्षित हुए बिना नहीं रह सकी.

दोनों के बीच भावनात्मक रिश्ते बनते गए. अब रफीका संजय के लिए दोनों वक्त का खाना पकाती, उसे खिलाती और उस के कपड़े भी धो कर देती थी.

दोनों ओर प्यार की चाहत थी. यह बात मकसूद और उस की पत्नी निशा को भी पता चल गई थी, लेकिन उन्होंने कोई आपत्ति दर्ज नहीं की. संजय ने शहर में किराए का एक कमरा ले लिया था. रफीका और उस के बच्चों को साथ ले कर वह उसी कमरे में रहने लगा. दोनों पतिपत्नी की तरह रह रहे थे. उन के बीच जिस्मानी संबंध भी बन चुके थे.

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रफीका संजय पर शादी करने के लिए दबाव बनाने लगी थी. वह अपने रिश्ते को छिपा कर नहीं जीना चाहती थी. क्योंकि समाज ऐसे रिश्ते को गंदी निगाहों से देखता है. वह पत्नी का पूरा हक चाहती थी. संजय ने उस से थोड़ा वक्त मांगा. इस पर रफीका राजी हो गई.

एक दिन संजय की शर्मनाक हरकत देख कर रफीका हैरान रह गई. वह बेटी समान शाइस्ता के गदराए जिस्म के साथ छेड़छाड़ कर रहा था. शाइस्ता उस से बचने के लिए इधरउधर भाग रही थी. संयोग से इसी बीच रफीका की नजर उस पर पड़ गई.

संजय की घिनौनी हरकत देख कर रफीका का खून खौल उठा. उस ने संजय को आड़े हाथों लेते हुए खबरदार किया और कहा कि आइंदा मेरी बेटी से दूर रहना. उस पर बुरी नजर डालने की कभी कोशिश की तो मुझ से बुरा कोई नहीं होगा. सीधे पुलिस में शिकायत कर दूंगी.

रफीका की धमकी काम कर गई. उस दिन के बाद से संजय शाइस्ता से दूरी बना कर रहने लगा. उस ने शाइस्ता को ले कर अपने मन में जो अरमान पाले थे, उन पर पानी फिर गया था, लेकिन वो ऐसा हरगिज होने देना नहीं चाहता था.

दरअसल, शातिर दिमाग वाला खतरनाक संजय दोहरा चरित्र जी रहा था. रफीका तो उस के लिए एकमात्र सीढ़ी थी, उस का निशाना तो उस की खूबसूरत और कमसिन बेटी शाइस्ता थी. रफीका से वह दिखावे के लिए प्यार करता था, जबकि शाइस्ता उस के दिल की रानी बन चुकी थी.

रानी को हासिल करने के लिए संजय के दिमाग में एक बड़ी योजना चल रही थी. योजना ऐसी कि सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे. संजय ने रफीका को रास्ते से हटा कर उस की बेटी शाइस्ता से ब्याह रचाने की योजना बना ली. वह समझ चुका था कि जब तक रफीका जिंदा रहेगी, शाइस्ता उस की नहीं हो सकती.

योजना के मुताबिक, 8 मार्च, 2020 को संजय मकसूद से यह कह कर रफीका के साथ गरीब रथ एक्सप्रैस से कोलकाता के लिए रवाना हुआ कि वह रफीका से निकाह करना चाहता है.

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वह उस के मांबाप के पास शादी की बात करने जा रहा है. इस पर न तो मकसूद ने कोई आपत्ति की और न ही उस की पत्नी निशा ने. मकसूद की ओर से रजामंदी मिलने के बाद ही 8 मार्च, 2020 की रात वारंगल से दोनों कोलकाता के लिए रवाना हुए थे. उस के तीनों बच्चे घर पर ही थे.

जानें आगे क्या हुआ अगले भाग में…

9 लाशों ने खोला एक हत्या का राज : भाग 1

9 लातेलंगाना का एक जिला है वारंगल. इसी जिले के थाना गिचिकोंडा क्षेत्र के गोर्रेकुंठा गांव के बाहर गोदाम से सटे कुएं के पास सैकड़ों लोगों की भीड़ जमा थी.

गिचिकोंडा थाने के एसओ शिवरामे, डीसीपी (अर्बन) वेंकट लक्ष्मी, एसीपी श्याम सुंदर, पुलिस कमिश्नर वी. रविंद्र, थाना परवंथगिरी के एसओ किशन और साइबर क्राइम इंसपेक्टर जनार्दन रेड्डी भी वहां मौजूद थे.

दरअसल, कुएं के भीतर पानी में 4 लाशें तैर रही थीं. जरा सी देर में यह खबर आसपास के गांवों में भी फैल गई. इस के चलते क्षेत्र में सनसनी फैल गई. शवों को निकालने के लिए पुलिस ने मोटी रस्सी के सहारे कुएं में गोताखोरों को उतार दिया. घंटे भर की मशक्कत के बाद एकएक कर चारों लाशें बाहर निकाल ली गईं.

गांव के लोगों ने बताया कि चारों लाशें एक ही परिवार के लोगों की हैं, जो पश्चिम बंगाल के रहने वाले थे. यह परिवार कई साल पहले यहां आ कर बस गया था. मृतकों के नाम थे मोहम्मद मकसूद आलम, उस की पत्नी निशा आलम, बेटी बुशरा खातून और बेटा शादाब.

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ताज्जुब की बात यह थी कि ँस परिवार के 2 सदस्य लापता थे, जिस में एक मकसूद का बेटा सोहेल आलम और बुशरा खातून का 3 वर्षीय बेटा. उन का कहीं पता नहीं था. इन दोनों के लापता होने से पुलिस के माथे पर परेशानी की लकीरें खिंच गई थीं.

पुलिस ने लाशों का मुआयना किया, तो उन की स्थिति देख कर आत्महत्या करने का मामला लग रहा था, क्योंकि उन के शरीर पर कहीं भी चोट के निशान नहीं थे. अगर मृतकों की हत्या की गई होती तो उन के शरीर पर कहीं न कहीं चोट के निशान होते. जबकि ऐसा कुछ भी नहीं था.

मामला आत्महत्या का है या हत्या का, इस का पता पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद ही चल सकता था. पुलिस ने जरूरी काररवाई पूरी कर के चारों शव पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल वारंगल भिजवा दिए. यह 21 मई, 2020 की बात है.

आगे की काररवाई करने के लिए पुलिस को चारों शवों की पोस्टमार्टम रिपोर्ट का इंतजार था. लेकिन अगले दिन सुबह उसी कुएं में 5 और लाशें तैरती हुई दिखीं तो गांव ही नहीं समूचे जिले में सनसनी फैल गई. यह सोच कर पुलिस के भी हाथपांव फूल गए कि आखिर ये लाशें आ कहां से रही हैं.

पुलिस अधिकारी मौके पर पहुंचे और मोटी रस्सी के सहारे गोताखोरों को कुएं में उतार कर सभी लाशें बाहर निकलवाई. स्थानीय लोगों से लाशों की पहचान कराई गई तो उन में से 2 लाशों की शिनाख्त आसानी से हो गई. उन में से एक लाश मोहम्मद मकसूद परिवार के सोहेल आलम की और दूसरी बुशरा खातून के 3 वर्षीय बेटे की लाश थी.

थोड़ी कोशिश के बाद 3 लाशों की पहचान त्रिपुरा के रहने वाले प्रवासी मजदूर शकील अहमद और बिहार के रहने वाले प्रवासी मजदूर श्रीराम और श्याम के रूप में हुई. शकील, श्रीराम और श्याम के शरीर पर कई जगह चोटों के निशान थे, जबकि सोहेल और बच्चे के शरीर पर कोई चोट नहीं थी.

इस बार पुलिस को यह मामला आत्महत्या का नहीं लगा. शकील, श्रीराम और श्याम के शरीर पर चोटों को देख कर पुलिस का माथा ठनका कि कोई तो है जो इन की हत्याओं को आत्महत्या का रूप देना चाहता है. अगर ये आत्महत्या का मामला होता तो उन के शरीर पर कोई चोट नहीं होती, जबकि तीनों के शरीर पर चोटों के निशान थे.

इस का मतलब यह कि मामला आत्महत्या का नहीं, बल्कि हत्या का था. हत्यारा जो भी है बहुत ही शातिर है. खैर, कानूनी काररवाई कर के पुलिस ने पांचों लाशों को पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल गिचिकोंडा भिजवा दिया. साथ ही पुलिस ने अज्ञात के खिलाफ भादंवि की धारा 302, 201, 120बी के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया.

23 मई को पुलिस के पास 9 लाशों की पोस्टमार्टम रिपोर्ट आ गई. पोस्टमार्टम रिपोर्ट में सभी की मौत का कारण पानी में डूबना बताया गया था. रिपोर्ट के मुताबिक उन्हें कुएं में फेंका गया था, जिस से पानी में डूबने से उन की मौत हो गई थी.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद मामला और भी पेंचीदा हो गया था. एक साथ इतने लोगों ने कुएं में कूद कर कैसे आत्महत्या की होगी, निश्चय ही यह मामला आत्महत्या के बजाय हत्या की ओर इशारा कर रहा था. इस घटना में कई लोगों के शामिल होने के संकेत मिल रहे थे. इस दिल दहलाने वाली घटना को जिस ने भी देखा, उस का कलेजा कांप उठा. लाशों के अंबार से समूचे इलाके में सनसनी फैली थी.

पुलिस ने घटना की जांचपड़ताल शुरू कर दी. घटना के एकएक पहलू पर बड़ी बारीकी से जांच की थी. छानबीन के दौरान पुलिस क ो पता चला कि मोहम्मद मकसूद आलम के पूरे परिवार की हत्या की जा चुकी है. उस परिवार में ऐसा कोई नहीं बचा है, जिस से कोई जानकारी हासिल हो सके.

इस से एक बात स्पष्ट हो गई कि हत्यारे जो भी थे, इस परिवार से रंजिश रखते थे, तभी पूरे परिवार का खात्मा कर दिया था. पुलिस का माथा यह सोच कर ठनका हुआ था कि हत्यारों ने मकसूद के परिवार के साथसाथ 3 प्रवासी मजदूरों की हत्या क्यों की? उस परिवार से इन का क्या कनेक्शन हो सकता है?

इस गुत्थी को सुलझाने का पुलिस के पास एक ही रास्ता बचा था. वह था मृतकों के फोन की काल डिटेल्स. काल डिटेल्स के आधार पर ही गुत्थी सुलझाई जा सकती थी. लेकिन पुलिस के पास मृतकों के फोन नंबर नहीं थे.

ताज्जुब की बात यह थी कि मकसूद के घर से सभी मोबाइल फोन गायब थे. इस से एक बात तो पक्की थी कि इस लोमहर्षक घटना में मकसूद का कोई बहुत करीबी शामिल रहा होगा. उस के पकड़े जाने पर ही घटना का खुलासा हो सकता है.

बहरहाल, जांचपड़ताल के दौरान पुलिस के हाथ एक मजबूत सूत्र लगा, जिस के सहारे वह मृतकों के फोन नंबर हासिल करने में कामयाब हो गई. दरअसल मोहम्मद मकसूद की पत्नी निशा आलम के बड़े भाई की बेटी रफीका मकसूद के घर से थोड़ी दूरी पर अपने 3 बच्चों के साथ किराए के कमरे में रहती थी.

रफीका की सब से बड़ी बेटी 15 साल की थी. उस का नाम शाइस्ता था. शाइस्ता की मां रफीका करीब 2 महीने से रहस्यमय ढंग से लापता थी. रफीका मकसूद के दोस्त संजय कुमार यादव के साथ वारंगल से कोलकाता मां से मिलने गई थी. 3 दिनों बाद संजय तो वारंगल वापस लौट आया था, जबकि रफीका वापस नहीं लौटी थी.

मकसूद के पूछने पर संजय ने उसे बताया था कि रफीका अपने रिश्तेदार के यहां रुक गई है, कुछ दिनों बाद घूमफिर कर लौट आएगी, चिंता की कोई बात नहीं. कई दिन बीत जाने के बाद भी जब रफीका बच्चों के पास वापस नहीं लौटी, तो मकसूद को चिंता सताने लगी. पुलिस को यह भी जानकारी मिली कि मोहम्मद मकसूद ने जब संजय से रफीका के बारे में पूछा तो वह बिदक गया. उस के बाद दोनों के बीच विवाद हुआ.

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20 मई, 2020 को मकसूद के बड़े बेटे शादाब का जन्मदिन था. बेटे के जन्मदिन पर उस ने घर पर एक छोटी सी पार्टी का आयोजन किया था.

पार्टी में मकसूद के परिवार के अलावा उस का दोस्त शकील और पड़ोस के 2 प्रवासी मजदूर श्रीराम और श्याम शरीक हुए थे. पार्टी रात 10 बजे तक चली थी.

शाइस्ता के बयान से संजय का चरित्र शक के दायरे में आ गया था. शाइस्ता से पुलिस को मकसूद आलम, उस की पत्नी निशा आलम, बेटी बुशरा और दोनों बेटों शादाब और सोहेल के फोन नंबर मिल गए.

पुलिस ने मकसूद आलम के फोन की काल डिटेल्स निकलवाई. शाइस्ता के द्वारा पुलिस ने संजय का भी फोन नबंर हासिल कर लिया था. उस के नंबर को पुलिस ने सर्विलांस पर लगा दिया था, ताकि उस की हर गतिविधि पर नजर रखी जा सके.

मकसूद की काल डिटेल्स से पुलिस को पता चला कि संजय और मकसूद के बीच कई बार लंबीलंबी बातें हुई थीं. घटना वाले दिन शाम 6 बजे के करीब मकसूद ने संजय को काल की. मकसूद का फोन 4 घंटे चालू रहा, फिर रात 10 बजे उस का और उस के पूरे परिवार के फोन बंद हो गए थे.

परेशान करने वाली बात यह थी कि घर के सभी सदस्यों के फोन एक ही समय पर कैसे बंद हुए. इस का मतलब साफ था कि उस वक्त हत्यारे मकसूद के घर में मौजूद थे. उन्होंने ने ही फोन स्विच्ड औफ कर के अपने कब्जे में ले लिए होंगे ताकि पुलिस उन तक आसानी से न पहुंच सके.

जानें आगे क्या हुआ अगले भाग में…

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