2 भाइयों की करतूत : भाग 2

श्यामबाबू ने फोटो गौर से देखा फिर बोला, ‘‘सर, यह फोटो मेरी भांजी नीलम की है. इस की यह हालत किस ने की?’’

‘‘नीलम को उस के पति विजय प्रताप ने अपने भाई अजय की मदद से मार डाला है. इस समय दोनों भाई हवालात में हैं. 2 दिन पहले नीलम की लाश ईशन नदी पुल के नीचे मिली थी.’’ थानाप्रभारी ने बताया.

नीलम की हत्या की बात सुनते ही श्यामबाबू फफक पड़ा. वह बोला, ‘‘सर, मैं ने पहले ही नीलम को मना किया था कि विजय ऊंची जाति का है. वह उसे जरूर धोखा देगा. लेकिन प्रेम दीवानी नीलम नहीं मानी और 4 महीने पहले घर से भाग कर उस से शादी कर ली. आखिर उस ने नीलम को मार ही डाला.’’

थानाप्रभारी टी.पी. वर्मा ने बिलख रहे श्यामबाबू को धीरज बंधाया और उसे वादी बना कर भादंवि की धारा 302, 201 के तहत विजय प्रताप व अजयप्रताप के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर ली. इस के बाद उन्होंने कातिलों के पकड़े जाने की जानकारी एसपी अमरेंद्र प्रसाद सिंह तथा सीओ (तिर्वा) सुबोध कुमार जायसवाल को दे दी.

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जानकारी पाते ही एसपी अमरेंद्र प्रसाद सिंह ने प्रैसवार्ता कर के कातिलों को मीडिया के सामने पेश कर घटना का खुलासा कर दिया.

रमेश कुमार अपने परिवार के साथ  लखनऊ के चारबाग में रहता था. उस के परिवार में पत्नी सीता के अलावा एकलौती बेटी थी नीलम. रमेश रोडवेज में सफाईकर्मी था और रोडवेज कालोनी में रहता था. रमेश और उस की पत्नी सीता नीलम को जान से बढ़ कर चाहते थे.

रमेश शराब बहुत पीता था. शराब ने उस के शरीर को खोखला कर दिया था. ज्यादा शराब पीने के कारण वह बीमार पड़ गया और उस की मौत हो गई. पति की मौत के बाद पत्नी सीता टूट गई, जिस से वह भी बीमार रहने लगी. इलाज के बावजूद उसे भी बचाया नहीं जा सका. उस समय नीलम महज 8 साल की थी.

नीलम के मामा श्यामबाबू कानपुर शहर के फीलखाना थाना क्षेत्र के रोटी गोदाम मोहल्ले में रहते थे. बहनबहनोई की मौत के बाद श्यामबाबू अपनी भांजी को कानपुर ले आए और उस का पालनपोषण करने लगे. चूंकि नीलम के सिर से मांबाप का साया छिन गया था, इसलिए श्यामबाबू व उस की पत्नी मीना, नीलम का भरपूर खयाल रखते थे, उस की हर जिद पूरी करते थे. नीलम धीरेधीरे मांबाप की यादें बिसराती गई.

वक्त बीतता रहा. वक्त के साथ नीलम की उम्र भी बढ़ती गई. नीलम अब जवान हो गई थी. 19 वर्षीय नीलम गोरे रंग, आकर्षक नैननक्श, इकहरे बदन और लंबे कद की खूबसूरत लड़की थी. वह साधारण परिवार में पलीबढ़ी जरूर थी, लेकिन उसे अच्छे और आधुनिक कपड़े पहनने का शौक था.

नीलम को अपनी सुंदरता का अंदाजा था, लेकिन वह अपनी सुंदरता पर इतराने के बजाए सभी से हंस कर बातें करती थी. उस के हंसमुख स्वभाव की वजह से सभी उस से बातें करना पसंद करते थे.

नीलम के घर के पास एक प्लास्टिक फैक्ट्री थी. इस फैक्ट्री में विजय प्रताप नाम का युवक काम करता था. वह मूलरूप से कन्नौज जिले के ठठिया थाना क्षेत्र के गांव पैथाना का रहने वाला था. उस के पिता हरिनारायण यादव किसान थे.

3 भाईबहनों में विजय प्रताप उर्फ शोभित सब से बड़ा था. उस का छोटा भाई अजय प्रताप उर्फ सुमित पढ़ाई के साथसाथ खेती के काम में पिता का हाथ बंटाता था. विजय प्रताप कानपुर के रावतपुर में किराए के मकान में रहता था और रोटी गोदाम स्थित फैक्ट्री में काम करता था.

फैक्ट्री आतेजाते एक रोज विजय प्रताप की निगाहें खूबसूरत नीलम पर पड़ीं तो वह उसे अपलक देखता रह गया. पहली ही नजर में नीलम उस के दिलोदिमाग में छा गई. इस के बाद तो जब भी विजय प्रताप फैक्ट्री आता, उस की निगाहें नीलम को ही ढूंढतीं.

नीलम दिख जाती तो उस के दिल को सकून मिलता, न दिखती तो मन उदास हो जाता था. नीलम के आकर्षण ने विजय प्रताप के दिन का चैन छीन लिया था, रातों की नींद हराम कर दी थी.

तथाकथित प्यार में छली गई नीलम

ऐसा नहीं था कि नीलम विजय की प्यार भरी नजरों से वाकिफ नहीं थी. जब वह उसे अपलक निहारता तो नीलम भी सिहर उठती थी. उसे उस का इस तरह निहारना मन में गुदगुदी पैदा करता था. विजय प्रताप भी आकर्षक युवक था. वह ठाठबाट से रहता था. धीरेधीरे नीलम भी उस की ओर आकर्षित होने लगी थी. लेकिन अपनी बात कहने की हिम्मत दोनों में से कोई नहीं जुटा पा रहा था.

जब से विजय प्रताप ने नीलम को देखा था, उस का मन बहुत बेचैन रहने लगा था. उस के दिलोदिमाग पर नीलम ही छाई रहती थी. धीरेधीरे नीलम के प्रति उस की दीवानगी बढ़ती जा रही थी. वह नीलम से बात कर के यह जानना चाहता था कि नीलम भी उस से प्यार करती है या नहीं. क्योंकि नीलम की ओर से अभी तक उसे कोई प्रतिभाव नहीं मिला था.

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एक दिन लंच के दौरान विजय प्रताप फैक्ट्री के बाहर निकला तो उसे नीलम सब्जीमंडी बाजार की ओर जाते दिख गई. वह तेज कदमों से उस के सामने पहुंचा और साहस जुटा कर उस से पूछ लिया, ‘‘मैडम, आप अकसर फैक्ट्री के आसपास नजर आती हैं. पड़ोस में ही रहती हैं क्या?’’

‘‘हां, मैं पड़ोस में ही अपने मामा श्यामबाबू के साथ रहती हूं.’’ नीलम ने विजय प्रताप की बात का जवाब देते हुए कहा, ‘‘अब शायद आप मेरा नाम पूछोगे, इसलिए खुद ही बता देती हूं कि नीलम नाम है मेरा.’’

‘‘मेरा नाम विजय प्रताप है. आप के घर के पास जो फैक्ट्री है, उसी में काम करता हूं. रावतपुर में किराए के मकान में रहता हूं. वैसे मैं मूलरूप से कन्नौज के पैथाना का हूं. मेरे पिता किसान हैं. छोटा भाई अजय प्रताप पढ़ रहा है. मुझे खेती के कामों में रुचि नहीं थी, सो कानपुर आ कर नौकरी करने लगा.’’

इस तरह हलकीफुलकी बातों के बीच विजय और नीलम के बीच परिचय हुआ जो आगे चल कर दोस्ती में बदल गया. दोस्ती हुई तो दोनों ने एकदूसरे को अपनेअपने मोबाइल नंबर दे दिए. फुरसत में विजय प्रताप नीलम के मोबाइल पर उस से बातें करने लगा. नीलम को भी विजय का स्वभाव अच्छा लगता था, इसलिए वह भी फोन पर उस से अपने दिल की बातें कर लेती थी. इस का परिणाम यह निकला कि दोनों एकदूसरे के काफी करीब आ गए.

प्यार का नशा कुछ ऐसा होता है जो किसी पर एक बार चढ़ जाए तो आसानी से नहीं उतरता. नीलम और विजय के साथ भी ऐसा ही हुआ. अब वे दोनों साथ घूमने निकलने लगे. रेस्टोरेंट में बैठ कर साथसाथ चाय पीते और पार्कों में बैठ कर बतियाते. उन का प्यार दिन दूना रात चौगुना बढ़ने लगा.

एक दिन मोतीझील की मखमली घास पर बैठे दोनों बतिया रहे थे, तभी अचानक विजय नीलम का हाथ अपने हाथ में लेते हुए बोला, ‘‘नीलम, मैं तुम्हें बेइंतहा प्यार करता हूं. मैं अब तुम्हारे बिना नहीं रह पाऊंगा. मैं तुम्हें अपना बनाना चाहता हूं. बोलो, मेरा साथ दोगी?’’

नीलम ने उस पर चाहत भरी नजर डाली और बोली, ‘‘विजय, प्यार तो मैं भी तुम्हें करती हूं और तुम्हें अपना जीवन साथी बनाना चाहती हूं, लेकिन मुझे डर लगता है.’’

‘‘कैसा डर?’’ विजय ने अचकचा कर पूछा.

‘‘यही कि हमारी और तुम्हारी जाति अलग हैं. तुम्हारे घर वाले क्या हम दोनों के रिश्ते को स्वीकार करेंगे?’’

विजय प्रताप नीलम के इस सवाल पर कुछ देर मौन रहा फिर बोला, ‘‘नीलम, आसानी से तो घरपरिवार के लोग हमारे रिश्ते को स्वीकार नहीं करेंगे लेकिन जब हम उन पर दबाव डालेंगे तो मान जाएंगे. फिर भी न माने तो बगावत पर उतर जाऊंगा. मैं तुम से वादा करता हूं कि तुम्हें मानसम्मान दिला कर ही रहूंगा.’’

लेकिन इस के पहले कि वे दोनों अपने मकसद में सफल हो पाते, नीलम के मामा श्यामबाबू को पता चल गया कि उस की भांजी पड़ोस की फैक्ट्री में काम करने वाले किसी युवक के साथ प्यार की पींगें बढ़ा रही है. श्यामबाबू नहीं चाहता था कि उस की भांजी किसी के साथ घूमेफिरे, जिस से उस की बदनामी हो.

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मामा का समझाया नहीं समझी नीलम

जानें आगे क्या हुआ अगले भाग में…

शादीशुदा मर्द का चसका

4 जुलाई को जब मैं ऐसे ही गूगल पर खबरें सर्च कर रहा था तो पता चला कि अपने जमाने की मशहूर हिंदी फिल्म अदाकारा माला सिन्हा की बेटी प्रतिभा सिन्हा का उसी दिन जन्मदिन था.

माला सिन्हा को कौन नहीं जानता है. उन्होंने ‘प्यासा’, ‘हिमालय की गोद में’, ‘दो कलियां’, ‘अनपढ़’, ‘आंखें’ जैसी तमाम फिल्मों में अपनी अदाकारी से दर्शकों का मनोरंजन किया था. पर आज हम उन की नहीं, बल्कि उन की बेटी प्रतिभा सिन्हा की बात करेंगे, जिन्होंने हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में बतौर हीरोइन ऐंट्री तो मारी थी, पर वे अपनी मां जितनी प्रतिभाशाली नहीं निकलीं.

याद नहीं आया कुछ? अरे, वही गोरे रंग की नाटे कद वाली प्रतिभा सिन्हा जिन्होंने आमिर खान की फिल्म ‘राजा हिंदुस्तानी’ के मशहूर गाने ‘परदेसीपरदेसी जाना नही…’ में बंजारन बन कर डांस किया था. वैसे, उन्होंने साल 1992 में फिल्म ‘महबूब मेरे महबूब’ से डैब्यू किया था, पर चंद फिल्मों के बाद ही फिल्म इंडस्ट्री को अलविदा कह गई थीं.

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फिल्मी दुनिया में तो प्रतिभा सिन्हा ने ज्यादा नाम नहीं कमाया था, पर निजी जिंदगी में वे अपने एक अफेयर को ले कर बड़ी बदनाम हुई थीं. वही ‘पति पत्नी और वो’ वाला किस्सा. दरअसल, वे गुलशन कुमार के खून का इलजाम झेल रहे शादीशुदा संगीतकार नदीम की तथाकथित प्रेमिका थीं और उन से शादी करना चाहती थीं. यह बात उन की मां माला सिन्हा को पसंद नहीं थी, जबकि नदीम यही कहते थे कि वे प्रतिभा को बतौर हीरोइन जानते हैं. इस से ज्यादा उन दोनों के बीच कुछ नहीं है.

नदीम और प्रतिभा सिन्हा की तथाकथित प्रेम कहानी तो कोई रंग नहीं लाई और इस वजह से प्रतिभा आज भी कुंआरी हैं और नदीम लंदन में छिपे बैठे हैं, पर इसी मायावी परदे की एक और उभरती गायिका ने हाल ही में ऐसा गुल खिला दिया है कि क्या कहने.

कभी ‘इंडियन आइडल’ जैसे मशहूर टेलीविजन शो का हिस्सा बनी अलवर, राजस्थान की गायिका रेणु नागर को एक 3 बच्चों के बाप द्वारा कथित तौर पर भगा ले जाने का मामला सामना आया है.

याद रहे कि रेणु नागर ने गायकी के बड़े मंच ‘इंडियन आइडल’ 2018 में अपनी सुरीली आवाज से अलग पहचान बनाई थी. इस के बाद से वे लगातार स्टेज शो भी करती रहती थीं. पिछले काफी समय से वे अपने पिता प्रकाश नागर के पास अलवर में ही रह रही थीं.

रेणु के पिता प्रकाश नागर भी संगीतकार हैं. उन के पास भरतपुर का एक शख्स रवि नट तबला सीखने आता था. वह रेणु के साथ अलवर शहर में किसी काम से गया था, उस के बाद वे दोनों ही नहीं लौटे.

प्रकाश नागर ने महिला थाने में रवि नट पर रेणु नागर को 30 जून को बहलाफुसला कर भगा ले जाने का मामला दर्ज कराया. उन्होंने यह भी बताया कि पहले 2 दिन तक वे अपने लैवल पर उन दोनों को ढूंढ़ने की कोशिश करते रहे, पर जब वे नहीं लौटे तो पुलिस के पास गए.

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रेणु नागर मामले में उसे भगाने वाला रवि नट कोई बड़ी हस्ती नहीं है, फिर भी रेणु ने बालिग होते हुए यह कदम उठाया, तो ऐसे में यह सवाल उठता है कि 3 बच्चों के बाप एक शादीशुदा मर्द में ऐसा क्या था कि वह घर से ही फुर्र हो गई?

वैसे, फिल्म इंडस्ट्री में तो यह नई बात नहीं है. वहां तो हेमा मालिनी से ले कर श्रीदेवी तक ने धर्मेंद्र और बोनी कपूर को चुना, जो पहले से ही शादीशुदा थे और उन के बच्चे भी थे.

अगर गिनने बैठें तो बौलीवुड में ऐसी हीरोइनों की कमी नहीं है, जिन्होंने किसी की दूसरी बीवी बनने में कोई गुरेज नहीं किया. करीना कपूर, करिश्मा कपूर, बिपाशा बसु, शिल्पा शेट्टी, विद्या बालन, रानी मुखर्जी, शबाना आजमी, जूही चावला, कल्कि कोचलिन…और भी न जाने कौनकौन.

दरअसल, कोई लड़की अगर किसी शादीशुदा मर्द की तरफ खिंचती है, तो इस की सब से बड़ी वजह होती है मर्द का ज्यादा मैच्योर होना. ऐसे मर्द अमूमन लड़की से ज्यादा समझदार होते हैं और उन की फैसला लेने की ताकत ज्यादा होती है.

इस के अलावा ऐसे मर्द अमूमन पैसे के लिहाज से अमीर होते हैं और उन से शादी करने या रिश्ता बनाने का मतलब होता है लड़की की आर्थिक तंगी का दूर होना. ऐसे मर्द अपने पैसे और दूसरी बातों से लड़की का दिल आसानी से जीत लेते हैं.

जब कोई मर्द हर लिहाज से सैटल होता है तो उसे किसी बात की चिंता नहीं होती है और वे अपनी महिला साथी का पूरा खयाल रखते हैं, उस की छोटी से छोटी ख्वाहिश को पूरा करने की कोशिश करते हैं.

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ऐसे संबंधों में अगर मर्द अपनी पहली शादी तोड़ कर लड़की से शादी कर ले, तो मामला संभल जाता है, पर अगर वह किसी लिहाज से सैटल नहीं है और लड़की सिर्फ जिस्मानी रिश्ते के चक्कर में उस की तरफ खिंची है तो वह न तो अपनी पत्नी को छोड़ने की हिम्मत दिखा पाएगा और न ही प्रेमिका को ही कानूनन अपना नाम दे पाएगा. ऐसे में लड़की की हालत प्रतिभा सिन्हा जैसी हो सकती जो आज भी अपनी मां के साथ रहती हैं या फिर रेणु नागर जैसा हाल, जिस ने अपने घर वालों को पुलिस का दरवाजा दिखा दिया.

भूपेश बघेल की “गोबर गणेश” सरकार!

भूपेश सरकार का एक निर्णय आज छत्तीसगढ़ के गांव-गांव में चर्चा का सबब बना हुआ है. यही नहीं छत्तीसगढ़ से बाहर देश भर में लोग इसका मजाक और मीम बना रहे हैं. यह निर्णय है गोधन के “गोबर” खरीदी का. भूपेश बघेल स्वयं को एक गांव किसान का लड़का कहने में फक्र महसूस करते हैं और मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के बाद उन्होंने निरंतर स्वयं को एक आम छत्तीसगढ़िया मानुष सिद्ध करने का प्रयास किया है. कई योजनाएं छत्तीसगढ़ की अस्मिता से जुड़ी हुई हैं.

अब जब उन्होंने गोबर को 1रूपये 50 पैसे किलो खरीदने का ऐलान किया है विपक्ष भाजपा सहित एक बड़े वर्ग ने उनके इस निर्णय पर व्यंग बाण छोड़ने शुरू कर दिए हैं. जिसमें सरकार के गोबर खरीदी के निर्णय का माखौल उड़ाया गया है .भूपेश सरकार की इस बहुचर्चित पहल का क्या परिणाम सामने आएगा यह आने वाला वक्त बताएगा मगर राजनीति की बिसात पर चौपड़ बिछ चुकी है. यह अहम कदम भूपेश बघेल के लिए मील का पत्थर सिद्ध होने जा रहा है. अगर सफल हुआ तो वाह वाह! और असफल हुआ तो एक ऐसा तमगा जो वर्षों वर्ष लोग याद करेंगे और भूपेश बघेल की हंसी तो  उड़ेगी ही.

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मजाक- दर मजाक

मुख्यमंत्री के रूप में भूपेश बघेल ने छत्तीसगढ़ को छत्तीसगढ़ की अपनी पहचान विकसित करने की कोशिश की है. पहले पहल उन्होंने नारा दिया,- ‘नरवा गरवा घुरवा बाड़ी’ का  यह नारा एक मुख्यमंत्री के रूप में आम जनता के लिए संदेश बन जाता लोग अपनाते तो प्रदेश का भला होता. मगर भूपेश बघेल ने आगे आकर इसे सरकारी अधोवस्त्र पहना कर खड़ा कर दिया. गांव गांव में नरवा गरवा घुरवा बाड़ी के नारे चस्पां  हो गए मगर जमीन पर हकीकत में कुछ नहीं दिखता. गौठान बना दिए गए भूपेश बघेल बड़े उत्साहित स्वयं गांव गांव पहुंचते और उद्घाटन करते मगर गोठान बनने के बाद करोड़ों रुपए खर्च के बाद किसी भी गोठान का कोई लाभ लोगों को नहीं मिल रहा है.

सरकारी धन और मशीनरी का जैसा दुरुपयोग भूपेश बघेल के नेतृत्व में दिखाई देता है वह पीड़ादायक है. यह एक योजना जब जमीन पर अंतिम सांसे ले रही है भूपेश बघेल ने गोबर खरीदी की योजना लांच कर दी है जिसका मजाक कुछ ऐसे उड़ रहा है.

पहला – छत्तीसगढ़ दुनिया का पहला ऐसा राज्य जहां चावल सस्ता और गोबर महंगा- चावल 1रूपये किलो गोबर 1.5 रुपए किलो .

दूसरा – सीजी  पीएससी प्री में 140 प्लस कट आफ आने और क्लियर नहीं होने से हतोत्साहित छात्रों में राज्य सरकार के द्वारा गोबर खरीदने के निर्णय ने उम्मीद की नई किरण जगा दी है.

कई छात्र अब सीजी पीएससी की तैयारी ना करके गोबर बीनने का काम करने की सोच रहे हैं उत्साहित युवाओं  ने पटाखे फोड़े.

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तीसरा – राज्य सरकार भविष्य में – गोबर बिनइया, दुध दुहैया ,गोबरहीन इत्यादि पदों का सृजन करके, वैकेंसी निकालने की सोच रही है. चौथा- नरवा गरवा अऊ बाड़ी, सबला गोबर बिनना है संगवारी।

पढ़ाई को दो कुर्बानी…

गोबर खरीदी के निर्णय के बाद विपक्ष भाजपा के नेता भूपेश बघेल सरकार पर मानो पिल पड़े  है. सबसे ज्यादा आक्रमक हुए भाजपा की विगत डॉ. रमन सरकार के मंत्री रहे अजय चंद्राकर उन्होंने ट्वीट कर भूपेश बघेल की गोबर खरीदी नीति पर वज्र प्रहार किया उन्होंने लिखा – “ पढ़ाई को दो कुर्बानी, गोबर बिनवाने की तुमसे भूपेश सरकार ने अब ठानी” अजय चंद्राकर ने सोशल मीडिया के माध्यम से भूपेश बघेल सरकार पर तंज कसते हुए गोबर योजना पर सवाल खड़े कर दिए हैं.  जिससे कांग्रेस बौखला गई है और प्रवक्ता भाजपा के 15 वर्ष की नीतियों पर तंज कस सवाल खड़े कर रहे हैं . नेताओं की शह पर कांग्रेस कार्यकर्ता हुंकार भर रहे हैं कि अजय चंद्राकर के खिलाफ थाने में एफ आई आर दर्ज करवाई जाएगी तो पलट कर अजय चंद्राकर ने कहा है,- थाने में क्या, इटली में रिपोर्ट दर्ज करवाओ.

मगर लाख टके का सवाल यह है की गोबर खरीदने का ख्याल छत्तीसगढ़ की भूपेश सरकार ने ऐसी स्थिति में किया है जब उसके दरबार में  रुचिर गर्ग जैसे अनेक बुद्धिजीवी रत्न हैं.

डेढ़ वर्ष के अल्प समय में छत्तीसगढ़ में कई सरकारी नीतियों से हवा निकल रही है. गोठान इसका ज्वलंत उदाहरण है जहां एक भी गाय का बसेरा नहीं है और यह योजना मुंह चिढाते हुए जुगाली कर रही है. ऐसे में प्रदेश को ऊर्जा, शिक्षा, उद्योग के क्षेत्र में अपने पैरों पर खड़ा करने की जगह आम लोगों को भ्रमित करने वाली, पीछे धकेलने वाली योजनाओं से प्रदेश का भविष्य क्या होगा यह अभी से दिखाई देने लगा है.

धर्म के नाम पर औरतों को भरमाता सोशल मीडिया

हाल ही में भारत ने चीन के मशहूर एप ‘टिकटौक’ पर बैन लगा दिया है. अब इस से भारत को कितना फायदा होगा या नुकसान, यह हमारा मुद्दा नहीं है, बल्कि हम तो उस बात से चिंतित हैं, जो सदियों से भारतीय समाज को धर्म के नाम पर घोटघोट कर पिलाई गई है खासकर औरतों को कि अगर वे अपने पति की सेवा करेंगी तो घर में बरकत होगी, बरकत ही नहीं छप्पर फाड़ कर रुपया बरसेगा. इस पूरे प्रपंच में धन की देवी लक्ष्मी और विष्णु का उदाहरण दिया जाता है और साथ ही उन छोटे देवता रूपी ग्रहों का सहारा लिया जाता है, जो अगर अपनी चाल टेढ़ी कर दें तो अच्छेखासे इनसान की जिंदगी में कयामत आ जाए.

पहले हम सोशल मीडिया के समुद्र में तैर रहे एक छोटे से वीडियो की चर्चा करेंगे, जो देखने में एकदम आम सा लगेगा, पर वह हमारी बुद्धि को भ्रष्ट करने की पूरी ताकत रखता है. एक मजेदार बात यह कि वह अलगअलग लोगों द्वारा अलगअलग घरों और माहौल में बनाया गया है, पर अंधविश्वास का जहर पूरे असर के साथ हमारे दिमाग में भर देता है.

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वीडियो की शुरुआत कुछ इस तरह होती है कि एक साधारण से कमरे में एक पलंग बिछा है और उस पर एक ठीकठाक रूपरंग की शादीशुदा औरत बैठी अपने पति के पैर दबा रही है.

अगर कमरे की बात करें तो यह एक लोअर मिडिल क्लास परिवार का लगता है, जहां उस औरत के बगल में एक टेबल फैन रखा हुआ है और पलंग भी ज्यादा महंगा नहीं है. वह औरत जिस आदमी के पैर दबा रही है उस का चेहरा नहीं दिखाया गया है, पर जिस तरह से वह औरत उस आदमी के पैर दबा रही है, वह एक ‘राजा बाबू’ टाइप आदमी ज्यादा लग रहा है.

अब आप पूछेंगे कि भाई इस वीडियो में खास क्या है? तो खास यह है कि वीडियो में जिस औरत का प्रवचननुमा ज्ञान सुनाई दे रहा है, वह है असली मुद्दे की जड़.

दरअसल, जब वह औरत अपने पति के पैर दबा रही होती है, तो बैकग्राउंड में किसी औरत की आवाज सुनाई देती है, ‘हरेक पत्नी को अपने पति के पैर रोज दबाने चाहिए. इस का कारण यह है कि मर्दों के घुटनों से ले कर उंगली तक का भाग शनि होता है और स्त्री की कलाई से ले कर उंगली तक का भाग शुक्र होता है. जब शनि का प्रभाव शुक्र पर पड़ता है तो धन की प्राप्ति के योग बनते हैं. आप ने अकसर देखा होगा तसवीरों में कि लक्ष्मीजी विष्णुजी के पैर दबाती हैं.’

इसी तरह का एक और वीडियो परखते हैं. यह सीन भी तकरीबन पहले सीन की तरह ही है, पर किरदारों के साथसाथ माहौल बदल गया है और स्क्रिप्ट के संवाद भी. इस सीन में दिखाई गई खूबसूरत औरत ने किसी सैलून से अपने बाल कलर करा रखे हैं और वह मौडर्न कपड़े पहने हुए है. हाथ पर टैटू बना है और कलाई पर स्मार्ट वाच बंधी है. घर भी अच्छाखासा लग रहा है. पर पलंग के बदले पत्नी सोफे पर बैठी अपने पति के पैर दबा रही है.

लगे हाथ बैकग्राउंड से आती आवाज का भी लुत्फ उठा लेते हैं. औरत बोल रही है, ‘मेरे पति हैं मेरा गुरूर. मुझ को अपनी पलकों पर बैठाते हैं, दिनभर मेहनत कर के कमाते हैं, पर मेरी हर फरमाइश पर दोनों हाथों से लुटाते हैं. शाम को जब थकेहारे घर आते हैं, फिर भी मुझे देख कर मुसकराते हैं.’

इन दोनों वीडियो में पत्नी अपने पति के पैर दबा रही है. वैसे, किसी के पैर दबाने में कोई बुराई नहीं है, पर जिस तरह से औरत को मर्द के पैर दबाते दिखाया गया है, वह बड़ा सवाल खड़ा करता है कि आज के जमाने में जहां औरतें किसी भी तरह से मर्दों से कम नहीं हैं, वहां इस तरह के वीडियो बनाने और दिखाने का मकसद क्या हो सकता है?

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दरअसल, यह सब उन पोंगापंथियों की चाल है, जो नहीं चाहते हैं कि औरतों को वाकई मर्दों के बराबर समझा जाए, इसलिए उन्हें धर्म की चाशनी में डुबो कर ज्ञान दिया जाता है कि पुराणों में जो लिखा है वह ब्रह्मवाक्य है और जब धन की देवी लक्ष्मी अपने नाथ विष्णु के पैर दबा कर पूरी दुनिया के धन की मालकिन बन सकती हैं, तो आप भी अपने पति के पैर दबा कर धन के घर आने का रास्ता तो बना ही सकती हैं.

यहां पर लक्ष्मी और विष्णु का ही उदाहरण ही नहीं लिया गया है, बल्कि 2 ग्रहों शनि और शुक्र का भी मेल मिलाया जाता है. हमारे दिमाग में भर दिया गया है कि शनि और शुक्र जैसे तमाम ग्रह बड़े मूडी होते हैं, उन्होंने जरा सी भी चाल टेढ़ी की नहीं, हमारी शामत आ जाएगी. ऐसा भरम फैला दिया गया है कि औरत को लगे अगर वह अपने हाथों से पति परमेश्वर के पैर नहीं दबाएगी तो लक्ष्मी रूठ जाएगी.

पर ऐसा कैसे हो सकता है? अगर हर पत्नी के हाथों में शुक्र की ताकत और उस के पति के पैरों में शनि का वास है और उन के मेल से घर में धनवर्षा होती है, तो फिर सब को शादी के बाद यही काम करना चाहिए. पति पलंग तोड़े और पत्नी अपने हाथों से उस के पैर दबाए. घर की सारी तंगी दूर हो जाएगी. जब पैसा अंटी में होगा तो कोई क्लेश भी नहीं होगा. हर तरफ खुशहाली का माहौल होगा और हर दिन त्योहार सा मनेगा.

दूसरा वीडियो धर्म के अंधविश्वास को तो बढ़ावा नहीं देता है, पर यह दिखाता है कि पति चाहे कैसा भी हो, अगर वह किसी औरत यानी अपनी पत्नी को पाल रहा है तो उस के पैर ही नहीं दबाने हैं, बल्कि उन्हें अपने सिरमाथे पर लगा कर रखना है, जिस से वह हमेशा आप पर दोनों हाथों से रुपए लुटाता रहे.

इन दोनों वीडियो की गंभीरता इसलिए भी ज्यादा है, क्योंकि इन में दिखाई गई औरतें पढ़ीलिखी लग रही हैं और शहर में रहती हैं. पक्का मकान है और दूसरी सुखसुविधाएं भी मौजूद हैं. हो सकता है वे खुद भी कमाई करती हों या फिर गृहिणी ही सही, लेकिन देहाती और अनपढ़ तो कतई नहीं हैं.

जब इस तरह की औरतों को ही औरतों की तरक्की का दुश्मन दिखाया जाए तो समझ लीजिए, मामला आप को उलझाने के लिए बुना गया है. जब से धर्म की हिमायती सरकार इस देश में आई है, सनातन के नाम पर उस हर चीज को खूबसूरती के साथ पेश किया जाने लगा है, जो तर्क की कसौटी पर कहीं नहीं टिकती है. सीधी सी बात है कि आज के महंगाई के जमाने में पत्नी अपने पति के पैर दबा कर या उस के चरण अपने माथे पर लगा कर घर को धनवान या खुशहाल नहीं बना सकती है, पर अगर वह पति की तरह अपने कंधे पर लैपटौप टांग कर किसी मल्टीनैशनल कंपनी में नौकरी करती है तो परिवार में दोहरी कमाई का सुख जरूर दे सकती है. अगर वह हाउस वाइफ है तो क्या हुआ, घर को सजासंवार कर रख सकती है, घर का हिसाबकिताब अपने हाथ में ले कर पति की चिंता को आधा कर सकती है.

चलो मान लिया कि पति थकाहारा घर आया है और चाहता है कि कोई उस के पैर दबा कर थकान मिटा दे, तो एक अच्छे जीवनसाथी की तरह उस की यह फरमाइश पूरी करने में कोई हर्ज नहीं है. पर अगर ऐसा ही पत्नी चाहती है तो पति को भी अपनी पत्नी के पैर दबाने में कोई हर्ज नहीं होना चाहिए. इस से शुक्र और शनि जैसे ग्रह नाराज हो जाएंगे, यह तो पता नहीं पर पतिपत्नी का प्यार जरूर बढ़ जाएगा. धनवर्षा न सही प्यार की बारिश जरूर हो जाएगी.

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गंजापन पुरुषों में ही क्यों : सिर के बाल लगाएं चारचांद

इंसान के जिस्म का कोई भी बाहरी हिस्सा कम या खत्म होने लगे या हो जाए तो उस में हीनभावना का पैदा हो जाना स्वाभाविक है. सिर के बाल भी इंसानी जिस्म का हिस्सा होते हैं. गंजापन, केशाभाव या बालों का झड़ना हलके से ले कर सिर के पूरी तरह गंजा होने तक का हो सकता है. आमतौर पर 50 से 100 बाल हर दिन टूटतेझड़ते हैं. यह कुदरती प्रक्रिया है. यदि इस से ज्यादा बाल झड़ते हैं, तो यह गंजेपन यानी बाल्डनैस का विषय हो सकता है.

देशदुनिया के लोगों में गंजापन तेजी से बढ़ रहा है. इस का कारण है लोगों का गलत खानपान और जीवनशैली. गंजेपन को ले कर पुरुषों में अकसर ही काफी हीनभावना रहती है. एक उम्र के बाद जब उन के सिर पर से बाल उड़ने लगते हैं, तो उन का सैल्फ कौन्फिडैंस चोट खा जाता है. अपनी इमेज को ले कर वे शर्म महसूस करने लगते हैं. आजकल तो छोटी उम्र के बच्चों में भी बाल झड़ने की समस्या होने लगी है.

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वहीं, गंजेपन का शिकार आमतौर पर सिर्फ पुरुष ही होते हैं, ऐसा क्यों? महिलाओं में गंजापन बहुत ही कम दिखाई देता है या किसी बीमारी के कारण होने वाला गंजापन ही उन में होता है. जबकि, पुरुषों की उम्र 40 पार होतेहोते आधे से ज्यादा में गंजापन ज़ाहिर होने लगता है.

बाल्डनैस क्यों :

मैडिकल एक्सपर्ट्स के अनुसार, पुरुषों में बालों के झड़ने का सब से आम कारण एंड्रोजेनेटिक एलोपीशिया माना जाता है. इस को ‘पुरुष पैटर्न गंजापन’ के रूप में भी जाना जाता है. इस में पुरुषों के सिर के बाल झड़ने लग जाते हैं. माथे की तरफ से या सिर के ऊपर से पहले धीरेधीरे बाल झड़ने शुरू होते हैं. फिर पतले होतेहोते ख़त्म हो जाते हैं. जैसे हमारे शरीर में चमड़ी के ऊपर रोमछिद्र होते हैं वैसे ही सिर की चमड़ी के ऊपर हेयर फौलिकल्स होते हैं. इन्हीं में से बाल निकलते हैं. जब ये हेयर फौलिकल्स सिकुड़ने लगते हैं, तो बाल पतले होने शुरू हो जाते हैं. समय के साथ धीरेधीरे ये गायब भी हो जाते हैं.

गंजेपन का एक कारण यह भी. स्वास्थ्य विशेषज्ञों के मुताबिक, इंसान के जिस्म में टैस्टोस्टेरौन एक ऐसा हार्मोन होता है, जो पुरुषों और महिलाओं दोनों में पाया जाता है मगर पुरुषों में इस की मात्रा बहुत ज्यादा होती है. पुरुषों के पुरुषत्व वाले शारीरिक बदलावों के लिए यही हार्मोन जिम्मेदार होता है. टैस्टोस्टेरौन पुरुषों में स्रावित होने वाले एंड्रोजन समूह का स्टेरौयड हार्मोन है, जिस के कारण पुरुषों में बाल झड़ने की समस्या पैदा होती है. दरअसल, इंसान के शरीर में कुछ एंजाइम ऐसे होते हैं जो टैस्टोस्टेरौन को डिहाइड्रो-टैस्टोस्टेरौन में बदल देते हैं. इसी डिहाइड्रो-टैस्टोस्टेरौन के कारण बाल पतले व कमजोर हो जाते हैं और फिर झड़ने लगते हैं. सामान्यतौर पर हार्मोंस में यह बदलाव करने वाले एंजाइम एक इंसान में उसे उस के जींस से प्राप्त हुए होते हैं. इसी कारण गंजेपन को आनुवंशिक यानी खानदानी भी माना जाता है.

स्किन स्पैशलिस्ट डाक्टर भावुक मित्तल का कहना है कि जेनेटिक्स (खानदानी कारण यानी पहले से घर के पुरुषों में यह दिक्कत चली आ रही हो), उम्र का बढ़ना, और हार्मोंस का ऊपरनीचे होना बाल्डनैस के सब से बड़े कारण हैं. दूसरे कारणों में विटामिन्स और मिनरल्स की कमी, न्यूट्रीशन वाला खाना न खाना, स्ट्रेस, लंबी बीमारी को गिना जाता है.

 बालों को झड़ने से रोकें :

अगर जेनेटिक कारणों से हेयर लौस हो रहा है, तो उसे धीमा किया जा सकता है. पूरी तरह से उस से छुटकारा नहीं पाया जा सकता. लेकिन अगर बीमारी या पोषण की कमी की वजह से बाल झड़ रहे हैं, तो उन के लिए उपाय किए जा सकते हैं. शरीर में आयरन की कमी की वजह से भी बाल झड़ते हैं. अगर इन में से कोई भी वजह नहीं है, तो आप को फुल बौडी टैस्ट करा कर अपने हार्मोंस की जांच भी करवा लेनी चाहिए. इस बाबत डाक्टर आप को बेहतर सलाह दे पाएंगे.

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महिलाओं में गंजापन नहीं :

महिलाओं में भी टैस्टोस्टेरौन पाया जाता है मगर उन में इस की मात्रा बहुत कम होती है. जब यह महिलाओं में अधिक स्रावित होता है तो महिलाओं में अनचाहे बालों की अधिक मात्रा में आने की समस्या पैदा होती है. महिलाओं के शरीर में मुख्यरूप से एस्ट्रोजन हार्मोन का स्राव होता है, जो महिलाओं के शरीर में टैस्टोस्टेरौन के डिहाइड्रो-टैस्टोस्टेरौन में बदलने की प्रक्रिया को धीमा कर देता है. इसीलिए, महिलाओं में बाल झड़ने की समस्या तो होती है मगर गंजापन नहीं होता है.

गर्भावस्था के दौरान महिलाओं के शरीर में कई तरह के हार्मोनल बदलाव होते हैं. कई बार जब महिलाओं के शरीर में इस दौरान टैस्टोस्टेरौन हार्मोन का स्राव बढ़ जाता है, तो बाल झड़ने की समस्या उत्पन्न होती है. इसलिए अकसर महिलाओं को गर्भावस्था और मेनोपौज में बाल झड़ने की समस्या होती है.

इस प्रकार साफ़ है कि मानव शरीर की संरचना में भिन्नता के चलते पुरुष के सिर के बाल झड़तेझड़ते उस पर गंजापन उभर आता है जबकि महिला के सिर के बाल झड़ते तो हैं लेकिन वे गंजापन की हद तक नहीं झड़ते. हां, उन में अनचाहे बालों के अधिक मात्रा में आने की समस्या पैदा हो सकती है. इस में शक नहीं है कि सिर के बाल इंसान की खूबसूरती में चारचांद लगाते हैं.

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भाजपा महामंत्री : भाग 3 – पति के निशाने पर नेता/पत्नी

जिस दिन से बंटी गुर्जर ने मुनेश गोदारा को देखा था उसी दिन से उस की खूबसूरती पर मर मिटा था. बंटी गुर्जर के दिल में उस के लिए एक साफ्ट कार्नर बन गया था. जबकि इस के विपरीत मुनेश उस का दिल से सम्मान करती थी क्योंकि उसी की बदौलत उसे राजनीति में बड़ा कद और पद मिला था.

उस के इसी सम्मान को वह अपने लिए प्यार समझने की भूल कर बैठा था. बंटी को मुनेश से जब भी बात करने की तलब होती थी, वह कर लेता था.

पार्टी में धीरेधीरे ये बात फैल गई थी कि नेताजी बंटी गुर्जर और जिलाध्यक्ष मुनेश गोदारा के बीच मोहब्बत की मीठी आंच पर प्यार की खिचड़ी पक रही है. उन के बीच में ईलूईलू चल रहा है. मुनेश अभी भी इस बात से अंजान थी कि नेताजी के मन में उसे ले कर क्या खिचड़ी पक रही है. फिजाओं में तैरती हुई मोहब्बत का यह पैगाम मुनेश के शौहर सुनील गोदारा तक जब पहुंचा तो वह आगबबूला हो गया था.

पहली बात तो यह थी कि उसे बीवी का राजनीति में जाना गवारा नहीं था. दूसरे जब उस ने सुना कि उस का अफेयर किसी नेता के साथ चल रहा है तो उस के तनबदन में आग लग गई.

बीवी को उस ने समझाया था कि वह अपना ध्यान घरगृहस्थी और बच्चों के बीच में लगाए. ये राजनीति की दुनिया शरीफों के लिए नहीं है, उस का चक्कर छोड़ दे.

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राजनीति के जिस मुकाम तक मुनेश पहुंच चुकी थी वहां से वापस लौटना शायद उस के लिए उतना आसान नहीं था जितना आसान उस का पति समझता था. सालों का लंबा सफर तय कर के वह जिलाध्यक्ष से प्रदेश महिला मोर्चा की महामंत्री बन चुकी थी. यही नहीं, वह एक स्टार प्रचारक के रूप में विख्यात हो चुकी थी. दिल्ली विधानसभा के चुनाव में मुनेश ने कई प्रत्याशियों के लिए प्रचार किया था. अपनी असीम महत्त्वाकांक्षा की वजह से ही वह राष्ट्रीय अध्यक्ष जे.पी. नड्डा के निकट तक पहुंच चुकी थी. इसी के बाद उसे भाजपा किसान मोर्चा का प्रदेश महामंत्री बना दिया गया था.

राजनीति की ऊंचाई पर पहुंची मुनेश ने पति से दो टूक कह दिया था कि राजनीति से वापस लौटना उस के लिए आसान नहीं होगा. वह सियासत में रह कर ही अपना घरसंसार और बच्चों की देखभाल अच्छी तरह से कर सकती है. लेकिन राजनीति से अलग होने के लिए उस पर दबाव न डाले.

दोनों के बीच में यहीं से विवाद की नींव पड़ी थी. सुनील गोदारा एक सैनिक था. उस के रगों में भी एक आर्मी पिता का खून दौड़ रहा था. भला वो बीवी के इंकार को कैसे सहन कर सकता था. उस ने बीवी को समझाया कि अभी भी समय है, कुछ नहीं बिगड़ा है, वापस घर लौट आओ. सब कुछ ठीक हो जाएगा. मुनेश ने साफ मना कर दिया कि वह सियासत के बिना नहीं रह सकती.

इस दौरान मुनेश ने अपने नाम पर भिवानी के बाढड़ा इलाके में 2 फ्लैट खरीदे थे. पति को इस की जानकारी दे दी थी. पतिपत्नी के बीच बंटी गुर्जर के प्रेमसंबंधों को ले कर तूफान खड़ा हो चुका था. मुनेश ने पति को सफाई भी दी थी कि उन के बीच ऐसा कोई नाजायज रिश्ता नहीं है जिस से समाज में उन की हंसाई हो. उन के बीच के रिश्ते गंगा जल की तरह पवित्र हैं लेकिन सुनील इस बात को मानने के लिए कतई तैयार नहीं था कि बीवी जो कह रही है वो सच है. उस के मन में दोनों के बीच अनैतिक संबंधों को ले कर शक का बीज अंकुरित हो चुका था.

मुनेश और सुनील के शांत और सुखद जीवन में बंटी को ले कर तूफान आ चुका था. बातबात पर पतिपत्नी दोनों के बीच तूतू, मैंमैं होती रहती थी. स्वर्ग जैसा घर नरक का अखाड़ा बन चुका था. इस बीच मुनेश ने समझदारी का परिचय दिया.

उस ने ससुर की सहमति पर चरखी दादरी वाला घर छोड़ दिया और परिवार सहित गुरुग्राम में स्पेस सोसाइटी के सैक्टर-93 में फ्लैट ले कर किराए पर रहने लगी. सासससुर चरखी दादरी में ही रहते थे. उन का जब बच्चों से मिलने का मन होता था, वे बच्चों के पास सेक्टर-93 आ जाते थे और उन से मिल कर वापस चरखी दादरी चले जाते थे.

बात सन 2018 की है. सुनील गोदारा रिटायर हो कर घर आ गया था. रिटायर के बाद खाली बचे समय में उस ने एक सुरक्षा एजेंसी में गार्ड की नौकरी जौइन कर ली थी ताकि उस का समय अच्छे से बीते और 2 पैसों के लिए मोहताज न रहे. वैसे भी पतिपत्नी के बीच सालों से अनबन चलती चली आ रही थी.

उन के बीच मतभेद पराकाष्ठा पर थे. दोनों के प्यार के बीच नफरत ने जगह ले ली थी. ऐसे में उन के बीच एक और सर्पकाल कुंडली मार कर बैठ गया था जिस की आग में सुनील भड़क उठा था.

दरअसल, मुनेश अपने नाम से भिवानी में लिए गए दोनों फ्लैट को बेच कर एक क्रेटा कार खरीदना चाहती थी, जिस से वह पार्टियों में शिरकत कर सके. हालांकि पति सुनील के पास उस की अपनी खुद की एसेंट कार थी लेकिन खराब रिश्तों के कारण मुनेश पति की कार में न तो बैठती थी और न ही उस कार को ले कर कहीं जाती थी.

भिवानी के बाढड़ा वाले फ्लैट बेचने को ले कर दोनों के बीच झगड़े होने लगे. पति सुनील कीमती फ्लैट बेचने को तैयार नहीं था जबकि मुनेश अपनी ही जिद पर अड़ी हुई थी कि वो फ्लैट बेच कर क्रेटा कार खरीदेगी तो खरीदेगी. उसे कार खरीदने से कोई नहीं रोक सकता.

मुनेश की इस जिद ने सुनील के गुस्से को और भड़का दिया. उस ने भी बीवी से कह दिया कि देखता हूं तुम कैसे फ्लैट बेचती हो. इस बात को ले कर घर में पतिपत्नी के बीच महासंग्राम छिड़ गया था.

सुनील की जिंदगी कड़वाहट से भर गई थी. एक तो बीवी के अफेयर को ले कर वह पहले से परेशान था. दूसरे करोड़ों रुपए के फ्लैट बीवी औनेपौने दामों में बेचने जा रही थी. बीवी की करतूतों से सुनील बुरी तरह से आजिज आ चुका था. जिंदगी को थोड़ा सूकून देने के लिए उस ने शराब को अपने जीवन का हिस्सा बना लिया था. वह शराब पीने लगा था.

इसी शराब के नशे में धुत हो कर 8 फरवरी, 2020 की रात 9 बजे के करीब सुनील घर लौटा तो कमरे में पत्नी को न पा कर उस ने दोनों बेटियों से उस के बारे में पूछा. बड़ी बेटी प्रीति ने पापा से कहा, ‘‘मां रसोई में खाना पका रही हैं.’’ बेटी का जवाब सुन कर सुनील लड़खड़ाता हुआ किचन की ओर हो लिया.

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उस समय मुनेश वीडियो कौल पर अपनी छोटी बहन मनीषा से हंसहंस कर बातें कर रही थी. सुनील समझा कि वह अपने प्रेमी बंटी गुर्जर से हंसहंस कर बातें कर रही है. फिर क्या था? सुनील शक की आग में धधक उठा.

उस ने आपा खो दिया और ईर्ष्या की आग में जलते हुए अपनी सर्विस रिवाल्वर से 2 गोलियां मुनेश के पेट और सीने में दाग दीं. गोली लगते ही मुनेश फोन को हाथ में पकड़े हुए फर्श पर जा गिरी और बहन से आखिरी बार कहा, ‘‘बहन…तेरे जीजा ने गोली मार दी है.’’ उस के बाद मुनेश का गरम जिस्म आहिस्ताआहिस्ता ठंडा पड़ने लगा. उस के प्राण पखेरू उड़ चुके थे.

सुनील पुलिस से बचने के लिए अपनी एसेंट कार में सवार हो कर अपने एक दोस्त के घर जा कर छिप गया था. अगली सुबह 9 फरवरी को जब मुनेश गोदारा हत्याकांड ने तूल पकड़ा तो सुनील वहां से भी कार ले कर फरार हो गया था और कई दिनों तक यहांवहां छिपता रहा. आखिरकार 7 दिनों की लुकाछिपी के बाद यानी 15 फरवरी, 2020 को पुलिस के हत्थे चढ़ ही गया.

बहरहाल, गिरफ्तारी के बाद सुनील गोदारा ने बीवी की हत्या का जुर्म कबूल कर लिया. सुनील की निशानदेही पर हत्या में प्रयुक्त रिवौल्वर भी बरामद कर लिया गया. बीवी की हत्या कर उस ने रिवौल्वर अपनी कार में छिपा कर रखी थी. उसे बीवी की हत्या का जरा भी अफसोस नहीं था.

उस ने पुलिस को दिए अपने बयान में कहा था, ‘‘बीवी का अफेयर बंटी गुर्जर के साथ चल रहा था. मैं ने उसे समझाने की बारबार कोशिश भी की थी लेकिन वह नहीं मानी तो मजबूर हो कर मुझे यह कदम उठाना पड़ा. मुझे बीवी की हत्या का कोई अफसोस नहीं है.’’

कथा लिखे जाने तक पुलिस फरार चल रहे आरोपी बंटी गुर्जर और उस की बीवी अनु को गिरफ्तार कर जेल भेज चुकी थी. मृतका के ससुर चंद्रभान ने बंटी गुर्जर और उस की बीवी अनु के खिलाफ इस लिए मुकदमा दर्ज कराया था कि इन्हीं दोनों की वजह से उन की होनहार बहू असमय काल के गाल में जा समाई थी. तीनों आरोपी सुनील गोदारा, बंटी गुर्जर और अनु गुर्जर जेल की सलाखों के पीछे सजा काट रहे थे.   द्य

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधार

भाजपा महामंत्री : भाग 2 – पति के निशाने पर नेता/पत्नी

पुलिस ने मौके की काररवाई निपटा कर लाश पोस्टमार्टम के लिए अस्पताल भिजवा दी. मृतका के ससुर चंद्रभान गोदारा ने बहू की हत्या के लिए अपने बेटे सुनील गोदारा और भाजपा नेता बंटी गुर्जर और उस की बीवी अनु गुर्जर के खिलाफ लिखित शिकायत थानेदार संजय कुमार को दी.

उन की तहरीर पर पुलिस ने तीनों आरोपियों सुनील गोदारा, बंटी गुर्जर और अनु गुर्जर के खिलाफ  भादंवि की धारा 302 के तहत मुकदमा पंजीकृत कर के उन की तलाश शुरू कर दी. ये बात 8 फरवरी, 2020 की है.

अगले दिन आरोपियों को गिरफ्तार करने की मांग करते हुए भाजपा कार्यकर्ताओं ने सड़क जाम कर दी थी. वह पुलिस के खिलाफ नारेबाजी कर रहे थे. मामला तूल पकड़ने लगा था. पुलिस बंटी गुर्जर और उस की बीवी अनु को गिरफ्तार करने उस के घर कादरपुर गई तो दोनों पतिपत्नी मौके से फरार थे. आरोपियों को पकड़ना पुलिस के लिए चुनौती बनी हुई थी.

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जांचपड़ताल में पुलिस को इतना पता चला था कि सुनील गोदारा और उस की बीवी मुनेश गोदारा के बीच रिश्ते काफी समय से खराब चल रहे थे. पत्नी मुनेश के भाजपा नेता बंटी गुर्जर से मधुर संबंध थे. यह बात बंटी गुर्जर की बीवी अनु को भी पता थी. लेकिन पति सुनील ये बात पसंद नहीं करता था. इसी बात को ले कर पतिपत्नी के बीच आए दिन विवाद होता रहता था. ये बात किसी से छिपी नहीं थी.

पुलिस यह मान कर चल रही थी कि मुनेश की हत्या प्रेम संबंधों की वजह से हुई है. मुनेश की कालडिटेल्स में बंटी के साथ लंबीलंबी बातचीत करना पाया गया था. यही हत्या की मूल वजह मान कर पुलिस ने अपनी जांच की दिशा आगे बढ़ाई.

आरोपी सुनील गोदारा को गिरफ्तार करने के लिए पुलिस उस के संभावित ठिकानों पर दबिश दे रही थी लेकिन वह पुलिस की पकड़ से बहुत दूर था. ऐसा नहीं था कि पुलिस हाथ पर हाथ धरे बैठी हुई थी. उसे पकड़ने के लिए पुलिस ने मुखबिरों का जाल भी बिछा रखा था. सुनील की खोजबीन में मुखबिर जुट गए थे.

बात 15 फरवरी, 2020 की है. दोपहर का वक्त था. थानेदार संजय कुमार थाने में मौजूद थे. तभी एक चौंका देने वाली खबर उन के खास मुखबिर ने दी. उस ने बताया कि मुनेश का हत्यारा सुनील गोदारा हयातपुर चौक पर घूमता हुआ देखा गया है. जल्दी करें तो पकड़ा जा सकता है. फिर क्या था? संजय कुमार मुखबिर की सूचना पर उस के द्वारा बताई गई जगह पर आवश्यक पुलिस बल के साथ पहुंच गए.

उन्होंने चौक को चारों ओर से घेर लिया ताकि आरोपी मौके से भाग न सके. सभी पुलिस वाले सादा पोशाक में थे, ताकि आरोपी उन्हें आसानी से पहचान न सके और हुआ भी यही. सुनील गोदारा गिरफ्तार कर लिया गया. उसे पुलिस थाना सेक्टर-10 ए पूछताछ के लिए ले कर आई.

हत्यारे पति सुनील गोदारा के गिरफ्तार होने की सूचना थानेदार संजय कुमार ने पुलिस अधिकारियों को दे दी. तब एसीपी (सिटी) राजिंदर सिंह सूचना पा कर थाना सेक्टर- 10ए पूछताछ के लिए पहुंच चुके थे. उन्होंने सुनील से पूछताछ करनी शुरू की तो उस ने बिना हीलाहवाली के अपना जुर्म कबूल कर किया कि उसी ने बीवी की हत्या की थी.

हत्या की वजह उस ने बीवी का नैतिक पतन बताई थी. उस ने उन्हें बताया कि उस के लाख मना करने के बाद भी वह अपने आशिक से नैनमटक्का करने से बाज नहीं आ रही थी. जिस के कारण परिवार टूट रहा था, इस के बाद उस ने घटना की पूरी कहानी पुलिस को बता दी.

पुलिस ने उसे अदालत में पेश किया. वहां से जेल भेज दिया गया. सुनील के अलावा दोनों आरोपी बंटी गुर्जर और उस की बीवी अनु अभी भी पुलिस की पकड़ से दूर थे. मुनेश गोदारा हत्याकांड की कहानी कुछ इस तरह सामने आई—

35 वर्षीय मुनेश गोदारा मूल रूप से  हरियाणा की रहने वाली थी. उस के घर में मांबाप और 4 भाई बहनें थीं. सब से बड़ा भाई सुनील कुमार जाखड़, उस के बाद खुद मुनेश, उस से छोटा विमलेश और छोटी बहन मनीषा थी. बचपन से ही मुनेश कुशाग्र और प्रखर बुद्धि की थी. पढ़नेलिखने से ले कर बातचीत के कौशल तक सब कुछ अलग था. जिस काम को करने की एक बार वह ठान लेती थी अपनी हिम्मत और साहस के बदौलत उसे कर के ही दम लेती थी.

समय के साथ जवान हुई मुनेश की शादी साल 2001 में चरखी दादरी (हरियाणा) के चंपापुरी में रहने वाले पूर्व फौजी चंद्रभान गोदारा के इकलौते बेटे सुनील गोदारा से हुई थी.

चंद्रभान की इलाके में बड़ी पहचान थी. नियम और उसूल के पक्के चंद्रभान ने सालों तक आर्मी में नौकरी करते हुए शराब को पीना तो दूर की बात, कभी हाथ तक नहीं लगाया था. न ही ऐसे लोगों को वह पसंद करते थे.

वह इकलौते बेटे सुनील को भी अपनी तरह देखना चाहते थे. उन्होंने बेटे को अच्छी तालीम दिलाई और सीख भी दी कि जीवन में आगे बढ़ना है तो कभी शराब मत पीना. अपने को उस का गुलाम कभी मत बनने देना. यदि एक शराब ने अपना गुलाम बना लिया तो जीवन भर उस की गुलामी करते रहोगे. पिता की नसीहत को गांठ बांध कर सुनील ने अपने दिमाग में बैठा ली थी.

तब सुनील आर्मी में जाने की तैयारी कर रहा था. उसी दौरान बहू के रूप में मुनेश गोदारा परिवार में साक्षात लक्ष्मी बन कर आई थी. बीवी के आने के बाद सुनील के बंद भाग्य के दरवाजे खुल गए थे. उस की आर्मी की नौकरी पक्की हो गई थी. ससुर चंद्रभान बहू मुनेश को साक्षात लक्ष्मी मानते थे. उस के शुभ कदमों से घर में खुशियों ने अपने पांव पसार दिए थे.

इसीलिए चंद्रभान उसे बहू कम बेटी ज्यादा मानते थे. रही बात सुनील की, तो वह परिवार से मिलने बीचबीच में घर आता रहता था. इस बीच मुनेश ने 2 बेटियों प्रीति और मोंटी को जन्म दिया. बाद के दिनों में चंद्रभान गोदारा रिटायर हो कर घर आ गए.

आर्मी से रिटायर चंद्रभान गोदारा का घरसंसार बड़े हंसीखुशी से चल रहा था. पैसों की घर में कोई कमी नहीं थी. बेटा कमा रहा था, ससुर की अच्छीखासी पेंशन थी और क्या चाहिए था. प्रीति और मोंटी बड़ी हो रही थीं. बेटियां बड़ी और समझदार हुईं तो मुनेश गृहस्थ आश्रम से बाहर निकल कर समाज के लिए कुछ करने के लिए लालायित होने लगी थी.

मुनेश की सहेली अनु गुर्जर भारतीय जनता पार्टी में काफी दिनों से जुड़ी हुई थी. उस के पति बंटी गुर्जर भाजपा के पुराने सिपाही थे. सहेली को देख कर ही मुनेश के मन में खयाल आया था कि वह भी राजनीति में कदम रखे और गरीबबेसहारों के लिए एक मजबूत कदम बने. उन की बुलंद आवाज बने.

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लेकिन यह मुनेश के लिए आसान नहीं था. वह यही सोच रही थी कि पता नहीं पति इस के लिए तैयार होंगे या नहीं. उन का साथ मिलेगा या नहीं. पति की मरजी के बिना राजनीति में कदम रखा तो घर में तूफान खड़ा हो सकता है. क्या करे? किस से सलाह मशविरा ले? उसी समय उस के मन में एक विचार कौंधा और उस की आंखों के सामने ससुर का चेहरा तैरने लगा. उसे विश्वास था कि ससुरजी उस की बातों को कभी नहीं टाल सकते. वह जरूर उस की भावनाओं को समझेंगे.

एक दिन समय और अवसर देख कर मुनेश ने ससुरजी के सामने अपने मन के भाव प्रकट कर दिए. उस ने कहा कि उस की इच्छा है वह राजनीति में जाना चाहती है. इस के लिए आप की इजाजत और आशीर्वाद दोनों की जरूरत है. अगर आप इजाजत दें तो मैं अपने कदम आगे बढ़ाऊं.

ससुर चंद्रभान बहू की बात सुन कर असमंजस में पड़ गए. उन्होंने बहू की बातों पर विचार किया. काफी सोचने और समझने के बाद उन्होंने बहू को राजनीति में जाने की हरी झंडी दिखा दी. ससुर की ओर से मिली हरी झंडी से मुनेश के हौसले बुलंद हुए और उस ने भाजपा की सदस्यता ग्रहण कर ली. ये सब उस की सहेली अनु और उस के पति बंटी गुर्जर के द्वारा संभव हुआ था. इसलिए वह दोनों की अहसानमंद थी. ये बात साल 2013 की है.

यहीं से मुनेश गोदारा के बुरे दिन शुरू हो गए. जिस के चलते उस के जीवन में उठापटक होने लगी. मुनेश ने कभी सोचा नहीं था कि जिस राजनीति की चकाचौंध में उस के पांव बढ़ते जा रहे हैं, इसी राजनीति के कारण एक दिन उस का हंसताखेलता घर तिनकातिनका बिखर जाएगा और उस की सांसों की डोर उस के जिस्म से जुदा हो जाएगी.

अपनी मेहनत और लगन की बदौलत मुनेश गोदारा ने कम समय में राजनीति के महारथियों के बीच अच्छीखासी जगह बना ली थी. जल्द ही उसे चरखी दादरी की जिलाध्यक्ष बना दिया गया. ये सब बंटी गुर्जर की मेहरबानियों की बदौलत संभव हुआ था. बंटी गुर्जर पार्टी का बड़ा नेता माना जाता था. पार्टी में उस की ऊंची पकड़ थी. बड़ेबड़े नेताओं से अच्छे संबंध थे.

जानें आगे क्या हुआ अगले भाग में…

भाजपा महामंत्री : भाग 1 – पति के निशाने पर नेता/पत्नी

हरियाणा प्रदेश की भारतीय जनता पार्टी किसान मोर्चा की प्रदेश महामंत्री 35 वर्षीय मुनेश गोदारा उभरती हुई एक राजनेत्री थी. इतने बड़े पद पर रहते हुए भी वह अपना काम स्वयं करने में यकीन रखती थी. चाहे वह घरेलू काम हो अथवा रसोई के, जब तक वह खुद से नहीं करती थी उसे चैन नहीं आता और बच्चे भी अधीर रहते थे.

गुरुग्राम (हरियाणा) के सेक्टर-10ए, स्पेस सोसाइटी के 8वीं मंजिल पर रहने वाली मुनेश गोदारा कुछ ही देर पहले बड़े भाई सुनील कुमार जाखड़ के घर से हो कर आई थी. दरअसल, छोटे भाई के बेटे की तबीयत खराब थी, उसे ही देखने मुनेश अकेली मायके आई थी. उस के मायके वाले सेक्टर-83 में रहते थे जो कि उस के फ्लैट से थोड़ी दूरी पर स्थित था.

उस समय रात के लगभग 8 बज रहे थे. रात गहराती चली गई तो बड़े भाई सुनील जाखड़ ने मुनेश से कहा भी था कि आज रात वह वहीं रुक जाए और सुबह होते ही वह उसे घर पहुंचा देंगे. लेकिन मुनेश वहां रुकने के लिए तैयार नहीं हुई थी.

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उस ने बड़े भाई से कहा, ‘‘भैया, भतीजे को देखने आई थी, सो देख लिया. तुम तो मेरी दोनों बेटियों की आदत को जानते ही हो, घर नहीं पहुंची तो दोनों सिर पर पहाड़ उठा कर तांडव करने लगेंगी और बगैर कुछ खाएपीए भूखे ही सो जाएंगी. इसलिए मुझे जाना ही पड़ेगा.

फिर कल सुबह मोंटी के दाखिला के लिए आर्मी स्कूल जाना होगा. तुम तो जानते हो भैया, आर्मी स्कूल है, वहां का नियमकानून बहुत सख्त होता है. जरा सी लापरवाही हुई तो बेटी का दाखिला होने से रुक भी सकता है और फिर भैया, आप ही बताओ किस लड़की को अपना मायका प्यारा नहीं होता.

अपना मायका सभी लड़कियों को प्यारा होता है. उन का बस चले तो जीवन भर यहीं रुक जाएं. इसलिए आज मत रोको. लेकिन मैं जल्दी ही आऊंगी तुम से मिलने, समझे.’’

बहन की शरारत भरी बातों को सुन कर सुनील खिलखिला कर हंस पड़े तो मुनेश से भी अपनी हंसी नहीं रोकी जा सकी. वह भी ठहाका मार कर हंसने लगी. फिर वहां से उठी और निजी वाहन से सेक्टर-93 स्थित अपने घर लौट आई. मायके से घर पहुंचने में मुश्किल से 20 मिनट का समय लगा था.

उस समय रात के 9 बज रहे थे. मुनेश की दोनों बेटियां अपने कमरे में बैठी पढ़ रही थीं. फटाफट कपड़े बदल कर मुनेश सीधे रसोई में जा पहुंची और खाना पकाने में जुट गई थी. वह जान रही थी कि बेटियों के पेट में चूहों ने अपना करतब दिखाना शुरू कर दिया होगा. जरा सी और देर हुई तो उन दोनों से भूख सहन नहीं होगी.

उस समय तक उस का पति सुनील गोदारा अपनी ड्यूटी से लौटा नहीं था. वह एक सुरक्षा एजेंसी में गार्ड की नौकरी करता था. यहां एक बात साफ कर देना चाहता हूं मुनेश के पति और उस के भाई दोनों का ही नाम सुनील था. फर्क सिर्फ इतना कि मुनेश के पति के नाम के आगे गोदारा लगा हुआ था जबकि भाई के नाम के आगे जाखड़ था.

मुनेश ने रोटियां बना ली थीं. गैस के दूसरे चूल्हे पर कड़ाही चढ़ा सब्जी के लिए तड़का लगाने जा रही थी. तभी उस के फोन की घंटी बजी. मुनेश ने स्क्रीन पर नजर डाली तो वह वीडियो काल थी. उस की छोटी बहन मनीषा ने काल की थी. मुनेश गैस बंद कर बहन से बात करने में मशगूल हो गई थी. उसी समय पति सुनील गोदारा ड्यूटी से घर लौट आया.

करीब 16 साल सेना में नौकरी करने के बाद वह वहां से रिटायर हो गया था. रिटायर होने के बाद से वह सुरक्षा एजेंसी में गार्ड की नौकरी कर रहा था. खैर, कमरे में घुसते ही सुनील गोदारा ने बेटियों से उन की मां के बारे में पूछा तो बड़ी बेटी प्रीति ने बता दिया मां रसोई में है, खाना पका रही है.

बेटी का जवाब सुन कर सुनील जिस हालत में था, उसी हालत में रसोई की ओर बढ़ गया. सुनील का मजबूत जिस्म हवा में लहरा रहा था. उस के पांव यहांवहां पड़ रहे थे. उस ने रोज की तरह उस दिन भी जम कर शराब पी रखी थी.

सुनील किचन के दरवाजे के पास पहुंचा तो देखा कि पत्नी दरवाजे की ओर अपनी पीठ कर के फोन पर किसी से हंसहंस कर बातें करने में व्यस्त थी. उसे पति के आने का आभास भी नहीं हुआ. ये देख कर सुनील का पारा सातवें आसमान पर पहुंच गया.

सुनील ने बीवी को एक भद्दी सी गाली दी. गाली की आवाज कान के पर्दों से टकराते ही मुनेश बुरी तरह से चौंक गई. उस के हाथ से फोन गिरतेगिरते बचा. फिर उस ने पलट कर देखा सामने पति सुनील खड़ा था. उस ने रोजाना की तरह आज भी जम कर शराब पी रखी थी. उस के पैर डगमगा रहे थे.

मुनेश कुछ कहती इस के पहले ही सुनील उस पर चीखा, ‘‘हरामजादी, कुतिया… हजार बार मैं ने तुझे मना किया था कि तू अपनी आदत सुधार ले. उस कमीने से अपने रिश्ते तोड़ ले और अपनी घरगृहस्थी और बच्चों को संभालने में लग, लेकिन तू है कि तेरी मोटी बुद्धि में मेरी कोई बात आसानी से घुसती ही नहीं.

लाख समझाता हूं, तेरे भेजे में घुसता ही नहीं. तेरे कारण मैं ने जिंदगी नर्क बना ली है. तुझ से मैं तंग आ चुका हूं. रोजरोज की किचकिच से आज मैं किस्सा ही मिटा देता हूं. कहते ही नशे में चूर सुनील गोदारा ने होलेस्टर से अपनी सर्विस रिवाल्वर निकाली और 2 गोलियां बीवी के पेट और सीने में दाग दीं.

गोली लगते ही मुनेश हाथ में फोन लिए फर्श पर धड़ाम से गिर गई और उस के मुंह से आखिरी शब्द निकला, ‘‘बहन… तेरे जीजा सुनील ने गोली मार दी है.’’ इतना कहते ही मुनेश की सांसें थम गईं.

गोली की आवाज सुनते ही प्रीति और मोंटी दौड़ीभागी रसोई में पहुंची तो देखा मां चित अवस्था में फर्श पर पड़ी अपने ही खून में सनी दम तोड़ चुकी हैं. उस के पापा सुनील गोदारा वहां नहीं थे. दोनों को समझते देर न लगी कि पापा ने मम्मी की गोली मार कर हत्या कर दी और फरार हो गए. प्रीति और मोंटी को कुछ सूझ नहीं रहा था कि ऐसे में वे क्या करें? मां की लाश के पास दोनों खड़ी जोरजोर से चीखचिल्ला रही थीं.

अचानक गोदारा के घर से रोने की आवाज सुन कर पड़ोसी वहां जमा हो गए थे. हंसमुख मुनेश की हत्या की खबर सुन कर सभी हतप्रभ रह गए थे. इधर तब तक मनीषा ने बहन की हत्या की खबर बड़े भाई सुनील कुमार जाखड़ को दे दी थी. बहन की हत्या की खबर सुनते ही उन्हें जैसे काठ मार गया हो, ऐसे हो गए थे. सुनील आननफानन में अपने निजी वाहन से मुनेश के घर सेक्टर-93, स्पेस सोसाइटी पहुंच गए. इस बीच प्रीति अपने बाबा चंद्रभान गोदारा को मां की हत्या की खबर फोन से दे चुकी थी. वो चरखी दादरी में दादी के साथ रहते थे. बहू की हत्या की खबर सुनते ही पिता की बूढ़ी आंखे पथरा सी गईं. उन के पांव लड़खड़ा से गए और वो बिस्तर पर जा गिरे. उन्हें बेटे की घिनौनी करतूत पर घिन आ रही थी.

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खैर, होनी को कौन टाल सकता है, जो होना है वो तो हो कर रहता है. बहू की हत्या की जानकारी होते ही ससुर चंद्रभान गोदारा आननफानन में सेक्टर-93 पहुंचे. अब तक यह खबर जंगल में आग की तरह समूचे गुरुग्राम में फैल चुकी थी. मुनेश कोई छोटीमोटी हस्ती नहीं थी.

वह भाजपा किसान मोर्चा की प्रदेश महामंत्री थी. हरियाणा राज्य में तेजी से उभरती हुई राजनेत्री थी. राजनीति में उस ने अपना अच्छा मुकाम बना लिया था. बड़ेबड़े नेताओं से उस के अच्छे संबंध थे. इन्हीं के बल पर वह मजलूमों और गरीबों के हक की लड़ाई लड़ती थी.

प्रदेश महामंत्री मुनेश गोदारा की हत्या की खबर मिलते ही सेक्टर-93 में धीरेधीरे भाजपा कार्यकर्ताओं और उस के शुभचिंतकों का जमावड़ा होने लगा था. ससुर चंद्रभान ने थाना सेक्टर-10 ए के थानेदार संजय कुमार को फोन कर के घटना की जानकारी दी. घटना की सूचना मिलते ही थानेदार संजय कुमार आननफानन में फोर्स के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. उस समय रात के 11 बज रहे थे.

मामला हाईप्रोफाइल था, इसलिए थानेदार संजय ने घटना की सूचना कमिश्नर मोहम्मद आकिल, डीसीपी (ईस्ट) चंद्र मोहन, डीसीपी (वेस्ट) सुमेर सिंह और एसीपी (सिटी) राजिंदर सिंह को दे दी थी. इधर भाजपा कार्यकर्ता हत्यारे पति सुनील गोदारा को जल्द से जल्द गिरफ्तार करने की मांग कर रहे थे.

घटना की सूचना मिलते ही पुलिस अधिकारी मौके पर पहुंच गए थे. मौके पर नारेबाजी कर रहे भाजपा कार्यकर्ताओं को उन्होंने समझाबुझा कर शांत किया और उन्हें भरोसा दिया कि जल्द से जल्द हत्यारा पकड़ लिया जाएगा. कानून को अपना काम करने दें. पुलिस अधिकारियों के आश्वासन के बाद वे शांत हुए.

पुलिस ने लाश का निरीक्षण किया. लाश चित अवस्था में थी. मृतका के हाथ में मोबाइल फोन था. पुलिस ने सब से पहले मोबाइल फोन अपने कब्जे में ले लिया. फिर किचन की तलाशी ली. तलाशी के दौरान मौके से कारतूस के 2 खोखे बरामद हुए.

पुलिस ने मृतका मुनेश की दोनों बेटियों प्रीति और मोंटी से हत्या के बारे में पूछताछ की. दोनों ने पिता के ऊपर आरोप लगाते हुए मां को गोली मारने की बात कही थी. मतलब साफ था कि पति सुनील गोदारा ने ही मुनेश की गोली मार कर हत्या की थी. घटना को अंजाम देने के बाद वह मौके से अपनी एसेंट कार में बैठ कर फरार हुआ था.

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जानें आगे क्या हुआ अगले भाग में…

भाजपा महामंत्री : पति के निशाने पर नेता/पत्नी

न्याय-अन्याय : भाग 2 – निम्मी ने जब लांघी दरवाजे की दहलीज

लेखक – आरती लोहानी 

निम्मी अब बेफिक्र थी कि उसे मदद मिल जाएगी और वह धनी सेठ की रपट लिखा सकेगी.

शाम को देवेंद्र उस के पास आया, तो निम्मी ने सारी बात बताई और मदद मांगी.

‘‘तुम बिलकुल मत घबराओ. मैं तुम्हारी हर संभव मदद करूंगा,‘‘ पुलिस वाले ने कहा.

चाय पी कर जब देवेंद्र वहां से जाने लगा, तो अचानक बहुत तेज आंधी और बारिश होने लगी. आसमान से बिजली ऐसे कड़क रही थी, मानो सबकुछ खत्म कर के ही मानेगी. अब तो देवेंद्र को वहीं रुकना पड़ा.

छत पर सूख रहे कपड़े उतारने लिए निम्मी भागी, तो उस की साड़ी ही उड़ने लगी. देवेंद्र ने उस से कहा, ‘‘मैं ले आता हूं कपडे़. आप रहने दीजिए.‘‘

बारिश रुकने का नाम नहीं ले रही थी. इधर देवेंद्र अपने पर काबू नहीं  कर पाया और जो उस की शिकायत सुनने आया था, उसी निम्मी को दबोच बैठा, जैसे शिकारी को कोई खास शिकार हाथ लगा हो.

लगभग आधे घंटे तक तेज की बारिश होती रही और पुलिस वाला एक लाचार को अपनी जिस्म की भूख मिटाने को मसलता रहा. उस के जाने के बाद निम्मी बदहवास सी इधरउधर घूम रही थी, पर घर की दीवारें भला उसे क्या सांत्वना देती.

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वह सोच रही थी कि क्या महिला का जिस्म इतना जरूरी है कि हर कोई अपना ईमान तक गिरवी रख दे. निम्मी मर जाना चाहती थी, पर जहर भी कहां से लाए इस तालाबंदी में. उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था.

निम्मी ने अमर को फोन करना चाहा. जैसे ही उस ने मोबाइल हाथ में लिया, तो खुद से ही सवाल करने लगी, ‘क्या कहेगी निम्मी उस से… वह परदेश में क्या करेगा, कैसे मदद को आएगा?‘

उस के बाद निम्मी ने फोन रख दिया. उसे सहसा याद आया कि बीती सुबह एक ट्रेन यहां से गुजरी थी और उस ने सुना था कि श्रमिक ट्रेन इन दिनों चल रही है. उसे अब यही एक रास्ता दिखा. किसी तरह वह रात काट लेती है और तड़के उठ कर घर से चल देती है पास में ही पटरियों की ओर.

पौ फटने का समय था और निम्मी बदहवास सी जा रही थी. सामने से आता पुजारी उसे देख लेता है और उस का पीछा करता है.

पुजारी पीपल के पेड़ को जल दे कर आ रहा था. तभी वह देखता है कि निम्मी पटरी पर लेट गई और ट्रेन की आवाज उसे सुनाई दी.

पुजारी भाग कर उसे पटरी से खींच लेता है और समझाबुझा कर घर ले आता है.

‘‘ये क्या कर रही थीं तुम… क्या करोगी इस तरह मर कर. इतनी खूबसूरत हो तुम और मुझ जैसे यौवन के पुजारी पूरी उम्र तुम्हारी पूजा करने को तैयार हैं,‘‘ पुजारी उस से कहता है.

‘‘तो और क्या करूं इस जिस्म का… कैसे इसे संभालू,‘‘ कह कर निम्मी रोने लगती है.

‘‘जरूरत ही क्या है इसे सहेज कर रखने की… ऐसा सुंदर रूप तो आज तक नहीं देखा मैं ने,‘‘ मौका पा कर पुजारी उसे सांत्वना देने के बहाने से अपने समीप ले आता है. धीरेधीरे वह उस के नशे में डूब जाता है और उसे यह भी भान नहीं रहता कि वह उस की मदद को आया था.

इसी तरह एक पुजारी भी किसी न किसी वजह से वहां आनेजाने लगा. अब तो लगभग हर रोज कोई न कोई वहां आता ही था कि तालाबंदी खत्म होने का आदेश भी जारी हो गया.

अब अमर के आने की भी उम्मीद होने लगी. इधर निम्मी अमर की राह देख रही थी, उधर निम्मी के दीवाने दुखी हो रहे थे.

निम्मी की मजबूरी का खूब फायदा उठा चुके ये लोग अभी तृप्त नहीं हुए थे. अनूप तो सोचने लगा कि अमर घर आता ही नहीं तो अच्छा था, क्योंकि उसे निम्मी के शरीर की मादक खुशबू से अभी तक मन नहीं भरा था. उस के साथ बिताया हर पल उसे याद आ रहा था.

अनूप को निम्मी की मिन्नतें, रोना और याचना करना भी याद था. उस शाम जब निम्मी चीनी लेने घर से बाहर निकली, तो वह जबरन उस के साथ अंदर आ गया. निम्मी ने उस से घर से बाहर जाने को कहा, तो उस ने मना कर दिया.

निम्मी मदद के लिए चिल्लाने लगी, तो उस ने उस का मुंह बंद कर दरवाजे की अंदर से कुंडा लगा दी. निम्मी रोती रही, पर उस की मदद को भला कौन आता. पुलिस पर भरोसा भी कैसे करे. अनूप उसे अपनी हवस की आग में जला रहा था और वह रोए जा रही थी, तभी वहां से कश्यप मास्टर गुजर रहे थे, तो उन्होंने उस की चीख सुनी तो फौरन घर की ओर मुड़े.

‘‘क्या हुआ बेटी? क्यों चीख रही हो तुम? दरवाजा खोलो बेटी.‘‘

बेटी शब्द सुनते ही निम्मी को न जाने कैसी शक्ति आ गई और उस ने अनूप के बालों को खींच कर उस के अंग पर वार कर दिया.

अनूप दर्द से चीखने लगा और मौका पा कर निम्मी ने दरवाजा खोल दिया. सामने मास्टर कश्यप खड़े थे. उन्होंने अपना अंगोछा निम्मी को ओढ़ा दिया. इस बीच अनूप भाग गया.

‘‘रो मत बेटी,‘‘ मास्टर साहब उसे सांत्वना दे रहे थे. निम्मी रोतेरोते कब मास्टर साहब की गोद में ही सो गई. मास्टर साहब ने अपनी बेटी को बुला कर निम्मी की देखभाल करने को कहा और चले गए.

अगले दिन अमर को घर आया देख वह बहुत खुश थी. अमर ने देखा कि गेहूं गोदाम में भरे हुए हैं, तो उस ने पूछा, ‘‘निम्मी, ये गेहूं किस ने काटे?‘‘

निम्मी ने उत्तर देते हुए कहा ,‘‘पुजारी और धनी सेठ ने.‘‘

अमर समझ रहा था कि निम्मी कुछ अनमनी सी है और कुछ कहने की कोशिश कर रही है, पर कुछ कह नहीं पा रही.

कुछ ही दिन बीते थे कि अमर की तबीयत खराब हो गई. उसे लोगों की मदद से अस्पताल ले जाया गया, जहां उस के टेस्ट चल रहे थे… इधर निम्मी भी एक रोज चक्कर खा कर गिर पड़ी.

पड़ोस की मिसेस सुधा उसे अस्पताल ले गई, जहां डाक्टर ने तुरंत उसे दवा दे कर कहा कि घबराने की कोई बात नहीं है… कुछ कमजोरी है… उधर, अमर के टेस्ट की रिपोर्ट आ चुकी थी. उसे डाक्टर ने एचआईवी पौजिटिव की तसदीक की, तो उस के तो जैसे पैरों के नीचे से जमीन ही खिसक गई. उसे याद नहीं आ रहा था कि उस ने ऐसा क्या किया. उस ने कभी गलत रिश्ता तो किसी से बनाया भी न था.

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अमर सोचसोच कर परेशान था. वह जैसेतैसे घर आया, तो निम्मी की तबीयत और खराब हो रही थी. उस की शुगर भी बढ़ रही थी.

अमर ने उसे तुरंत दवा दी, तो थोड़ा आराम हुआ. इस तरह दिन बीत रहे थे. अमर निम्मी को कैसे बताए, यह सोच रहा था, उधर निम्मी परेशान थी कि अमर को कैसे बताए कि कैसे उस के जिस्म के टुकड़ेटुकड़े हुए.

अमर ने चुप्पी तोड़ते हुए कहा, ‘‘निम्मी, तुम मुझ पर भरोसा करती हो न?‘‘

‘‘यह पूछने की जरूरत है अमर?‘‘

‘‘तो सुनो… मेरी रिपोर्ट एचआईवी पौजिटिव आई है,‘‘ अमर ने एक ही सांस में कह दिया, ‘‘पर, यकीन मानो कि मेरा किसी से कोई संबंध नहीं है. मुझे याद आ रहा है, जब पिछली बार मैं शहर काम से गया था, तो एक सैलून में मैं ने अपनी दाढ़ी बनवाई थी, क्योंकि मुझे मीटिंग को देर हो रही थी, इसलिए मैं ने ही नाई को जल्दी शेव करने को कहा… शायद, उस ने ब्लेड को बदला नहीं था.‘‘ गहरी सांस लेते हुए अमर ने कहा.

यह सुन कर निम्मी चुप थी. बस वह आंखों से आंसू बहाए जा रही थी. कुछ देर बाद सहसा उस के चेहरे पर एक जीत की जैसी मुसकान दौड़ गई.

अमर अपनी बीमारी के कारण ही अधमरा हुआ जा रहा था और निम्मी मुसकरा रही थी. वह बोली, ‘‘अभी चलो, मुझे भी यह टेस्ट कराना है.‘‘

‘‘कल तुम्हें भी बुलाया है डाक्टर ने,’’ अमर ने कहा.

पूरी रात दोनों के लिए काटनी मुश्किल हो रही थी. निम्मी ने भी अमर को सबकुछ सच बता दिया था. दोनों बस रोए जा रहे थे.

अगले दिन निम्मी का भी टेस्ट किया गया, तो वह भी एचआईवी पौजिटिव निकली. दुखी होने के बजाय निम्मी खुश थी. पर दोनों के लिए जीना आसान न था. दोनों अपनी मजबूरियों पर रो रहे थे. जैसेतैसे संभलते हुए दोनों घर आए और एकदूजे को दिलासा दे ही रहे थे कि अनूप, देवेंद्र, धनी सेठ, पुजारी सब निम्मी के घर आए और अमर की तबीयत पूछने लगे.

इन सब को निम्मी ने ही फोन कर के बुलाया था. पहले तो अमर को बहुत गुस्सा आ रहा था, पर जैसेतैसे संभल कर उस ने सब को निम्मी का साथ देने के लिए धन्यवाद दिया और निम्मी से चाय बनाने को कहा.

‘‘आप लोगों का मैं जितना भी धन्यवाद करूं कम ही होगा,‘‘ अमर ने कहा, तो धनी सेठ ने कहा, ‘‘इस में धन्यवाद कैसा अमर साहब… हम अगर एकदूसरे के काम नहीं आएंगे, तो और कौन आएगा?‘‘

‘‘जी, कह तो आप बिलकुल सही रहे हैं… पर आप तो हमारे दुखसुख के सचमुच भागीदार हैं. इतना ही नहीं, हमारी बीमारी के भी…‘‘ एक कुटिल हंसी के साथ अमर ने कहा.

‘‘हम कुछ समझे नहीं अमर… बीमारी के भागीदार कैसे?’’ सभी ने चौंकते हुए पूछा.

अमर ने रहस्य खोला, तो सब के सब सकपका कर रह गए और एकदूसरे का मुंह ताकने लगे.

पुजारी समेत वहां मौजूद सब के चेहरे पीले पड़ गए. उधर निम्मी और अमर चैन की सांस ले रहे एकदूसरे को हिम्मत दे रहे थे और कुदरत के इस अजब न्याय और अन्याय को समझने की कोशिश कर रहे थे.

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