भले ही हम आधुनिक होने के कितने ही दाबे कर लें,मगर दकियानूसी ख्याल और परम्पराओं से हम बाहर नहीं निकल पा रहे हैं. आज भी समाज के एक बड़े तबके में फैली छुआछूत की समस्या कोरोना रोग से कम नहीं है. छुआछूत केवल गांव देहात के कम पढ़े लिखे लोगों के बीच की ही समस्या नहीं है,बल्कि इसे शहरों के सभ्य और पढ़ें लिखे माने जाने वाले लोग भी पाल पोस रहे हैं.सामाजिक समानता का दावा करने वाले नेता भी इन दकियानूसी ख्यालों से उबर नहीं पाए हैं.

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