गांव में बेबस मजदूर

लौकडाउन का 3 महीने से ज्यादा का समय बीत जाने के बाद भी सरकार प्रवासी मजदूरों को मनरेगा के अलावा रोजगार का कोई दूसरा रास्ता नहीं दिखा पाई है. एक मनरेगा योजना कितने मजदूरों का सहारा बन पाती?

ऐसे में गरीब लोगों का गांव से शहर की ओर जाना मजबूरी बन कर रह गया है. जिस शहर से भूखे, नंगे, प्यासे और डरे हुए लोग भागे थे, अब वे उन्हीं शहरों की ओर टकटकी लगा कर देख रहे हैं. रोजगार के तमाम दावों के बाद भी गांव लोगों का सहारा नहीं बन पाए हैं.

शहरों से वापस लौटते प्रवासी मजदूरों की दर्दनाक तसवीरें अभी भी भुलाए नहीं भूल रही हैं. गांव आए ये मजदूर वापस शहर जाने की सोच भी सकते हैं, यह उम्मीद किसी को नहीं थी.

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गांव की बेकारी से परेशान प्रवासी मजदूर वापस अब शहरों की तरफ जाने के रास्ते तलाशने लगे हैं. अपने दर्द को भूल कर इन के कदम शहरों की तरफ बढ़ चुके हैं.

मजदूरों को गांव में रोकने और वहीं पर रोजगार देने के वादे पूरी तरह से  झूठे साबित हो गए हैं. बेकारी के हालात का शिकार लोगों के मन से अब कोरोना का डर भी पहले के मुकाबले कम हो चुका है. ऐसे में वे वापस शहर की ओर लौटने लगे हैं.

जान जोखिम में डाल कर गांव से शहर की तरफ मजदूरों के वापस आने की सब से बड़ी वजह जाति और गरीबी है. गांव में गरीब एससी और बीसी तबके के पास न खेती के लिए जमीन है और न ही रहने के लिए घर.

शहरों में थोड़ी सी सुविधाओं के लिए ये मजदूर कोरोना संकट में भी गांव से शहरों की तरफ मुड़ रहे हैं. शहरों में कोरोना का संकट खत्म नहीं हुआ है. मजबूरी में मजदूरों को शहरों की संकरी गलियों में बने दमघोंटू मकानों में ही रहना पड़ेगा. अब फैक्टरियों की मनमानी सहन करते हुए काम करना पड़ेगा.

कोरोना से बचाव के उपाय के नाम पर ज्यादातर फैक्टरियों में केवल दिखावा हो रहा है. दवाओं के छिड़काव से ले कर मास्क और सैनेटाइजर का इस्तेमाल दिखावा भर रह गया है.

बहुत सारे उपायों के बाद जब अस्पतालों में काम करने वाले डाक्टर कोरोना का शिकार हो रहे हैं, तो फैक्टरियों में काम करने वाले मजदूर कैसे बच पाएंगे? अब अगर इन मजदूरों को कोरोना हो गया, तो इन की देखभाल करने वाला भी नहीं मिलेगा.

कोरोना संकट ने शहरों में कमाई करने गए लोगों को ‘प्रवासी मजदूर’ बन कर वापस लौटने के लिए मजबूर कर दिया था. सरकार ने इन को रोजगार दिलाने के लिए मनरेगा का सहारा लिया.

मनरेगा योजना के अलावा सरकार के पास रोजगार देने का कोई दूसरा उपाय नहीं है. मनरेगा के अलावा गांव में गरीबों के पास दूसरा काम नहीं है. गांव के लोग नोटबंदी से परेशान थे. गांव में जमीनों के सौदे बंद हो चुके हैं. खेतों में काम करने वालों को मजदूरी नहीं मिल रही है. ज्यादा तादाद में प्रवासी मजदूरों के गांव वापस आने से बेरोजगार लोगों की आबादी बढ़ गई.

बेरोजगारी के अलावा गांव में सुखसुविधाओं और आजादी की भी कमी है. शहरी जिंदगी के आदी हो चुके लोग गांव में वापस तो आ गए थे, पर यहां रहना उन के लिए आसान नहीं रह गया था.

इस से बेकारी के बो झ से कराह रहे गांव और भी दब गए. परिवार के साथ वापस गांव रहने आए लोगों में उन की पत्नी और बच्चों का गांव में तालमेल नहीं बैठ रहा था. कई ने तो पहली बार गांव में इतने ज्यादा दिन बिताए हैं.

पहले होलीदीवाली वगैरह की छुट्टियों में जब ये लोग गांव आते थे, तो घरपरिवार का बरताव कुछ और ही होता था, पर अब यह बदला सा नजर आ रहा है. जिस सरकारी सुविधा के लालच में गांव आए थे, उस की पोल भी यहां खुल चुकी है.

बेकारी के बो झ ने परिवार के बीच तनाव को बढ़ा दिया है. अब ये लोग कोरोना संकट के बावजूद वापस किसी भी तरह से शहर जाने के लिए मजबूर हो गए हैं. प्रवासी मजदूरों के रूप में समाज से इन को जिस तरह की हमदर्दी मिली थी, अब उस की भी कमी है.

लखनऊ के रामपुर गांव में दिनेश का संयुक्त परिवार रहता है. मुंबई से लौकडाउन में गांव आए तो यह सोचा कि अब मुंबई नहीं जाएंगे. यहीं गांव के पास बाजार में कोई दुकान खोल कर काम करेंगे. दिनेश के साथ उस का एक छोटा भाई और बेटा भी काम करता था. अब सब बेरोजगार हो चुके हैं.

इन लोगों की पत्नियां भी मुंबई में रहती थीं. गांव आ कर वे संयुक्त परिवार में रहने लगी हैं. यहां घर में चूल्हे पर खाना बनाना पड़ता है. वैसे, घर में एक गैस का चूल्हा भी है, जिस का इस्तेमाल सिर्फ चाय बनाने के लिए होता है.

मुंबई में ये लोग गैस पर खाना बनाते  थे. अब देशी चूल्हे पर खाना बनाने में औरतों को दिक्कत हो रही है. दिनेश पर पत्नी का दबाव बढ़ने लगा है. मुंबई में दिनेश की फैक्टरी काम शुरू करने वाली है. दिनेश बताते हैं, ‘‘हमें गांव में रोजगार की कोई उम्मीद नहीं है. ऐसे में परिवार में तनाव बढ़ाने से अच्छा है कि हम सब को ले कर मुंबई वापस चले जाएं.’’

बढ़ गई आपसी होड़

उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले में खेतापुर गांव के रहने वाले रमेश चौरसिया 30 साल पहले गुजरात के सूरत में कमाई करने गए थे. गांव में उन के पास जमीन नहीं थी. गांव में केवल कच्चा घर बना था. वहां न तो कोई कामधंधा था और न ही किसी तरह की इज्जत मिल रही थी.

सूरत में कुछ साल कमाई करने के बाद रमेश ने गांव में पक्की छत और घर बनवा लिया. उन का पूरा परिवार धीरेधीरे सूरत पहुंच कर रहने लगा. रमेश के मांबाप और पत्नी ही गांव में रहते थे. दोनों बेटे रमेश के साथ ही काम करने लगे थे.

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लौकडाउन के दौरान जब रमेश और उन के दोनों बेटे अपने गांव आए, तो यहां रोजगार का कोई साधन नहीं था. मनरेगा योजना में दोनों बेटों को केवल 5-5 दिन काम करने का मौका मिला, जिस से उन को 1-1 हजार रुपए मिले, जो उन की जरूरत के हिसाब से काफी कम थे.

रमेश कहते हैं कि शहर और गांव के रहनसहन में बहुत फर्क है. ऐसे में यहां रहना आसान नहीं है. जिस बेकारी को दूर करने के लिए 30 साल पहले गांव छोड़ कर गए थे, वह अब भी यहां बनी हुई है. इस के अलावा गांव में आपसी लड़ाई झगड़े शहरों के मुकाबले ज्यादा हैं. बाहर से आने वाले लोगों के प्रति गांव के लोगों में कोई हमदर्दी नहीं है.

इस की सब से बड़ी वजह यह है कि इन लोगों के बाहर रहने से गांव के दूसरे लोग इन की जमीन और खेत का इस्तेमाल करते थे, पर अब इन के वापस गांव आने के बाद जमीन और खेत को छोड़ना उन के लिए मुश्किल हो गया है. ऐसे में आपस में तनाव बढ़ गया है.

अपनेअपने गांव से रोजीरोजगार, इज्जत और पैसों की तलाश में जो लोग कमाई करने परदेश गए थे, वे कोरोना के संकट में वापस अपने गांवघर आने को मजबूर हो गए. कोरोना संकट के समय में ‘प्रवासी मजदूर’ का नाम इन की पहचान बन गया.

सरकार की तरफ  से ऐसे दावे किए गए कि प्रवासी मजदूरों को रोजगार के पूरे साधन दिए जाएंगे, पर प्रवासी मजदूरों को रोजगार देने के नाम पर मनरेगा के अलावा सरकार के पास कोई दूसरा साधन नहीं था.

मनरेगा में एक दिन की मजदूरी के लिए 200 रुपए की दिहाड़ी मिलती है. सरकार ने कोरोना संकट के समय में मनरेगा के काम को बढ़ाने की कोशिश की. प्रवासी मजदूरों के रूप में नए लोगों के गांव आ जाने से मनरेगा में रोजगार घट गया.

गांव में काम के सीमित साधन हैं. जिस गांव में एक काम को 10 लोग करते थे, उसी काम को करने के लिए जब 15 लोग मिल गए तो एक मजदूर के खाते में आने वाले दिनों की तादाद घट गई, जिस से मजदूर के कुल रोजगार के दिनों की तादाद भी घट गई. गांव में पहले से रहने वाले लोगों ने मजदूरी के दिन घटने के लिए इन प्रवासी मजदूरों को जिम्मेदार माना.

मनरेगा की बढ़ी जिम्मेदारी

मनरेगा यानी ‘महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम’ को साल 2005 में लागू किया गया था. इस के जरीए देश के गांवों में रहने वाले मजदूरों को रोजगार दिया जाता है. पहले इस का नाम ‘राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम’ था. महात्मा गांधी के जन्मदिन 2 अक्तूबर, 2009 से इस को मनरेगा के नाम में बदल दिया गया.

इस योजना का मकसद वित्तीय वर्ष में किसी भी ग्रामीण परिवार के बालिग सदस्यों को 100 दिन का रोजगार मुहैया कराना था. मनरेगा से गांवों में तरक्की के रास्ते खुले थे और गांवों में लोगों की खरीदारी करने की ताकत बढ़ी थी.

इस योजना के तहत गांव में रहने वाली औरतों को भी रोजगार दिया जाता है. 2005 में मनरेगा को शुरू करने का काम कांग्रेस और वामपंथी दलों के संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन ने किया था. फरवरी, 2006 में 200 जिलों से यह योजना शुरू की गई थी और साल 2008 तक यह योजना 593 जिलों में पहुंच गई.  मनमोहन सरकार के बाद साल 2014 में केंद्र में बनी मोदी सरकार ने मनरेगा को दरकिनार करने का काम किया था.

साल 2020 में जब कोरोना का संकट आया और पूरे देश में लौकडाउन किया गया. इस से शहरों से बड़ी तादाद में प्रवासी मजदूर अपनेअपने गांवों को लौटने के लिए मजबूर हुए.

उस समय सब से बड़ी समस्या गांवों में उन को रोजगार देने की आई. गांव में लोगों को रोजगार देने और ग्रामीणों को सहारा देने के लिए मोदी सरकार को उसी मनरेगा का सहारा लेने के लिए मजबूर होना पड़ा, जिस की वह बुराई करती थी.

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मोदी सरकार ने मनरेगा के बजट में कटौती की थी. सरकार के समर्थक इस योजना को बेकारी बढ़ाने वाला मानते थे. मनरेगा का विरोध करने वाले मानते थे कि इस योजना से गांव में भ्रष्टाचार और बेकारी बढ़ रही है. इस की वजह पूरी तरह से राजनीतिक थी.

मनरेगा पर राजनीतिक लड़ाई

मनमोहन सरकार की मनरेगा योजना को मोदी सरकार ने कोई अहमियत नहीं दी. इस की वजह राजनीतिक थी. प्रधानमंत्री डाक्टर मनमोहन सिंह की सरकार की यह योजना जनता में लोकप्रिय हो गई थी और साल 2009 में भी जनता ने उन को वोट दे कर दोबारा सरकार बनाने की ताकत दे दी थी.

मनमोहन सरकार की जीत में मनरेगा का भी बड़ा हाथ माना जाता है. साल 2014 में केंद्र में भाजपा की मोदी सरकार ने मनरेगा योजना को हाशिए पर ले जाने का काम किया. इस के बजट में कमी की गई और मनरेगा के होने पर  भी सवाल उठाने शुरू कर दिए. मनरेगा के अप्रभावी होने से भारत के ग्रामीण इलाकों में मंदी का दौर बढ़ने लगा.

बजट 2020-21 में मनरेगा के लिए 61,500 करोड़ रुपए का आवंटन किया गया, जबकि 2019-20 में यह बजट 71,001.81 करोड़ रुपए था. महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) का बजट तकरीबन 15 फीसदी तक घटा दिया है.

अर्थव्यवस्था की जो हालत है, उस के हिसाब से ग्रामीण क्षेत्रों में आमदनी और मांग बढ़ाए जाने की जरूरत है, लेकिन सरकार ने ग्रामीण विकास मंत्रालय के कुल बजट आवंटन को भी कम कर दिया. बजट 2019-20 का संशोधित अनुमान 1,22,649 करोड़ रुपए था, जबकि बजट 2020-21 में इसे घटा कर 1,20,147.19 करोड़ रुपए कर दिया गया है.

जानकार मानते हैं कि मनरेगा का बजट बढ़ेगा, तो ग्रामीणों तक पैसा पहुंचेगा और उन की अर्थव्यवस्था में सुधार हो सकता है. मनरेगा के बजट में हर साल 20 फीसदी हिस्सा पुराने रुके हुए भुगतान को करने में निकल जाता है. मनरेगा के बजट में कटौती करने के बाद केंद्र सरकार ने प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना में मामूली बढ़ोतरी की.

साल 2019-20 के बजट में पीएमजीएसवाई के लिए 19,000 करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया था. 2020-21 के लिए 19,500 करोड़ रुपए के खर्च का अनुमान लगाया गया.

पंचायती राज संस्थानों के बजट में भी मामूली सी बढ़ोतरी की गई.

2019-20 में पंचायती राज संस्थानों के लिए 871 करोड़ रुपए का अनुमान लगाया गया था. अब नए बजट में इसे बढ़ा कर 900 करोड़ कर दिया गया है.

गांव में नहीं रोजगार

प्रवासी मजदूरों को गांव में केवल मनरेगा में काम दे कर नहीं रोका जा सकता. गांव में बरसात के मौसम में कामधंधे पूरी तरह से बंद हो जाएंगे. ऐसे में मनरेगा के तहत मिलने वाला काम और भी कम हो जाएगा, जिस से गांव में फैली बेकारी और भी ज्यादा बढ़ जाएगी.

अपने खेतों में काम कर रहे सतीश पाल बताते हैं कि शहरों में जो सुविधा मिलती है, वह गांवों में नहीं है. बिजली और सड़क के बाद भी यहां पर अच्छी तरह से जिंदगी नहीं बिताई जा सकती है. खेतों में काम करने के बाद भी मुनाफा नहीं होता है.

नीलगाय द्वारा और दूसरी तरह के तमाम नुकसान के बाद भी जब फसल अच्छी हो भी जाए, तो उस की सही कीमत नहीं मिलती है. अभी तो सूरत में हमारी फैक्टरी वाले हमें बुला रहे हैं. अगर किसी और ने हमारा काम करना शुरू कर दिया तो वापस काम भी नहीं मिलेगा. ऐसे में कोरोना से डर कर गांव में रहने से अच्छा है कि सूरत में रह कर कोरोना से मुकाबला करें.

प्रवासी मजदूरों को अब लगता है कि शहरों में रहना और काम करना आसान है, जबकि गांव में कोरोना के डर से छिप कर रहना मुश्किल है. उस से आसान है कि शहर जा कर कोरोना से मुकाबला करते हुए रोजगार करें.

दिनेश को इस बात का भी डर है कि अगर फैक्टरियों में काम शुरू होने के बाद मजदूर नहीं पहुंचे तो दूसरे लोगों को काम मिल जाएगा. ऐसे में उन का रोजगार चला जाएगा.

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बहुत सारी उम्मीदों के साथ शहरों से गांव लौटे मजदूर गांव की बेकारी से डर कर वापस शहरों में जाना चाह रहे हैं. ऐसे में साफ है कि प्रवासी मजदूरों को गांव में रोकने के लिए सरकार ने जो दावे किए थे, वे सब फेल होते दिख रहे हैं.

हैवानियत की हद : भाग 1

लेखक- विजय माथुर/कैलाश चंदेल 

गुरुवार 7 नवंबर, 2019. थी. दोपहर ढल रही थी. शहरों की पौश कालोनियों में आमतौर पर मामूली आवाजाही को छोड़ दें तो ज्यादातर सन्नाटा ही रहता है. भरतपुर शहर के जयपुर-आगरा हाइवे पर स्थित सूर्या सिटी कालोनी की स्थिति भी ऐसी ही थी. कालोनी में खामोशी तो नहीं थी, लेकिन कोई खास हलचल भी नहीं थी.

ढलती शाम में क्रीम कलर की एक कार दरख्तों से घिरी एक दोमंजिला कोठी के सामने आ कर रुकी. कार से 2 महिलाएं उतरीं. उन में से एक करीब 28-29 साल की खूबसूरत, आकर्षक युवती थी. जो नजर का चश्मा लगाए हुए थी. इस युवती का नाम डा. सीमा गुप्ता था. सीमा शहर की प्रख्यात स्त्री रोग विशेषज्ञ थी. दूसरी अधकटे सफेद बालों वाली बुजुर्ग महिला थी, जो डा. सीमा की सास सुरेखा गुप्ता थी. दोनों के चेहरे बुरी तरह तमतमाए हुए थे.

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सीमा कंधे पर बैग लटकाए हुए थी. उस के हाथ में सौफ्ट ड्रिंक की बोतल थी. दोनों महिलाओं ने पलभर के लिए इमारत की दीवार पर लगे स्पा सेंटर के बोर्ड को देख कर धीमे स्वर में बात की. फिर तेजी से कोठी के खुले गेट को लांघते हुए अंदर दाखिल हुईं.

घरों में ऐहतियाती तौर पर मेन गेट बंद ही रहते हैं, जो डोरबैल बजाने पर ही खुलते हैं. लेकिन जिस तरह दोनों महिलाएं धड़धड़ाते हुए अंदर दाखिल हुईं, उस से लगता था कि इत्तफाकन मेन गेट खुला रहा होगा. दोनों महिलाओं के भीतर दाखिल होने के चंद मिनटों बाद अंदर शोरशराबा सुनाई देने लगा.

मकान स्पा सेंटर चलाने वाली दीपा गुर्जर का था. इस मकान में वह अपने 6 वर्षीय बेटे शौर्य के साथ रह रही थी. दोनों महिलाओं के अंदर जाने के थोड़ी देर बाद  अंदर आवाजें तेज हो गईं. लग रहा था जैसे किसी बात को ले कर दोनों पक्षों की जुबानी तकरार ने हाथापाई का रूप ले लिया हो और नौबत मारपीट पर आ गई हो.

झगड़े की आवाजें आसपास के मकानों तक सुनाई दे रही थीं. उठापटक की आवाजें तेज हुईं तो आसपास के लोग भी माजरा जानने के लिए घरों से बाहर निकल कर कोठी के बाहर जमा होने लगे. कुछ ही देर में घर के भीतर से बच्चे की चीखपुकार सुनाई देने लगी. लग रहा था जैसे बालक शौर्य के साथ भी मारपीट की जा रही हो.

इस से पहले कि लोग बीचबचाव के लिए घर में दाखिल होने की कोशिश करते, सीमा और सुरेखा चीखते हुए बाहर निकलीं. बला की फुरती से मेनगेट की कुंडी बाहर से बंद करते हुए सीमा जोर से चिल्लाई, ‘‘अब भुगत अपनी करनी का अंजाम.’’

कोठी के बाहर जमा हुए लोग डा. सीमा से कुछ जानने की कोशिश करते या उस की धमकी का मतलब समझ पाते, अचानक मकान के भीतर से शोले भड़कते दिखाई दिए. इस के साथ ही दीपा की चीखपुकार और बच्चे की दर्दनाक चीखों ने लोगों को दहला दिया. लग रहा था डा. सीमा के पास कोई ज्वलनशील पदार्थ था, जिसे भीतर फेंकने और आग लगाने के बाद वह बाहर निकली थी.

डा. सीमा की हैवानियत

मकान से आग की लपटें उठीं तो लोगों को सीमा की धमकी का मतलब समझने में देर नहीं लगी. उस ने जो किया, उस के नतीजे के रूप में हैवानियत का खौफनाक मंजर सामने नजर आ रहा था. एक तरफ मासूम बच्चे की हौलनाक चीखें लोगों के कलेजे को दहला रही थीं, दूसरी तरफ सीमा और उस की सास पैशाचिक अट्टहास करते हुए भीड़ को चुनौती दे रही थीं, ‘हम ने लगाई है आग…किसी में दम है तो बचा लो इन्हें.’

लोग धिक्कारते हुए उन पर टूटते तब तक उन का ध्यान दीपा के भाई अनुज ने भटका दिया. रोताबिलखता अनुज धधकते घर में घुसने की कोशिश कर रहा था.

भीड़ में मौजूद किसी शख्स ने फायर ब्रिगेड को सूचना दे दी थी. नतीजतन घंटियों के शोर के साथ धड़धड़ाती हुई दमकल की 3 गाडि़यां वहां पहुंच गईं. लेकिन जब तक फायर ब्रिगेड के दस्ते ने आग पर काबू पाया, तब तक सब राख हो चुका था.

इस घटना की सूचना मिलने पर आईजी (जोन) लक्ष्मण गौड़, एसपी हैदर अली जैदी, एएसपी मूल सिंह राणा और सीओ हवासिंह घूमरिया पुलिस टीम के साथ मौके पर पहुंच गए. लेकिन आग से घिरे मकान को देख कर कुछ भी करना संभव नहीं था.

जब सीमा के पति डा. सुदीप गुप्ता को इस वारदात की खबर मिली, तब वह आरबीएम अस्पताल में थे. डा. सुदीप आंधीतूफान की रफ्तार से मौके पर पहुंचे तो इस तरह पगलाए हुए थे कि धधकती आग में कूदने पर उतारू हो गए. लेकिन पुलिस की मजबूत गिरफ्त ने उन्हें कामयाब नहीं होने दिया. अंतत: बिलखते हुए डा. सुदीप गुप्ता वहीं पसर गए और घुटनों में मुंह छिपा कर फूटफूट कर रोने लगे. डा. सीमा गुप्ता और उस की सास सुरेखा गुप्ता को पुलिस ने मौकाएवारदात पर ही गिरफ्तार कर लिया. साथ ही डा. गुप्ता को भी हिरासत में ले लिया.

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रोंगटे खड़े कर देने वाली इस खौफनाक घटना ने पूरे शहर को दहला दिया था. मांबेटे को जिंदा जलाने की खबर पूरे शहर में फैल गई. जिस ने भी सुना, देखने के लिए दौड़ा चला आया. बहरहाल, तमाम कोशिशों के बावजूद आग पूरी तरह नहीं बुझ पाई.

मकान के अधिकांश हिस्सों में प्लास्टिक का फरनीचर लगा होने के कारण दूसरे दिन भी आग पूरी तरह नहीं बुझी. अगले दिन जब पुलिस जांच के लिए पहुंची तब भी मकान का एक हिस्सा जल रहा था. पुलिस ने एक बार फिर फायर ब्रिगेड बुला कर आग को ठंडा कराने की कोशिश की.

छानबीन और मौके से सबूत जुटाने के लिए पुलिस की क्राइम टीम के साथ फोरैंसिक टीम भी पहुंच गई थी. फोरैंसिक टीम की जांच में चौंकाने वाले रहस्य उजागर हुए. जांच में पता चला कि मौत से पहले मां और बेटे ने करीब आधे घंटे तक पूरी जद्दोजहद के साथ जिंदगी के लिए जंग लड़ी थी. आग की बढ़ती लपटों को देख कर दीपा ने संभवत: बेटे शौर्य को वाश बेसिन में बिठा कर शावर चला दिया था और खुद उस के पाइप को हटा कर नीचे बैठ गई थी.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट में प्रथमदृष्टया मौत का कारण आग के साथ दम घुटना माना गया. फोरैंसिक टीम ने डा. सीमा और सुरेखा गुप्ता के हाथों की जांच की तो उन के हाथों पर स्पिरिट के अंश पाए गए. पुलिस द्वारा खंगाले गए सीसीटीवी फुटेज और कालोनी के चौकीदार से की गई पूछताछ में पता चला कि सीमा और सुरेखा ने इस से पहले 2 चक्कर लगाए थे. लेकिन दीपा के घर पर नहीं मिलने से दोनों वापस लौट गई थीं.

सीसीटीवी कैमरे की फुटेज से पता चला कि लगभग ढाई बजे डा. सुदीप भी दीपा के घर पहुंचे थे और लौट आए थे. जबकि सीमा और उस की सास को आखिरी बार करीब 5 बजे दीपा के मकान में दाखिल होते देखा गया था. सीसीटीवी फुटेज के हिसाब से दोनों के बीच करीब एक घंटा विवाद हुआ था.

सासबहू को 6 बजे दीपा के मकान से बाहर निकलते देखा गया. डा. सीमा ने जिस गेट की बाहर से कुंडी लगाई थी, वह दूसरे दिन भी जस का तस मिला. दरवाजा एक चौखट जलने से खुला था. पुलिस ने यहीं से मृत दीपा और शौर्य के शव निकाले. दोनों के शव रसोईघर में पाए गए. पोस्टमार्टम के बाद पुलिस ने दोनों शव परिजनों को सौंप दिए.

डा. सुदीप और डा. सीमा का अपना अस्पताल था

भरतपुर शहर के काली बगीची में रहने वाले डा. सुदीप गुप्ता राजकीय आरबीएम अस्पताल में सीनियर फिजिशियन के पद पर तैनात थे. उन के परिवार में पत्नी डा. सीमा के अलावा उन की मां सुरेखा गुप्ता थीं. इसी इलाके में डा. गुप्ता का श्री राम गुप्ता अस्पताल के नाम से निजी क्लिनिक भी था.

उन की पत्नी सीमा इसी क्लिनिक में डाक्टर थी. सब कुछ मजे में चल रहा था, लेकिन डा. गुप्ता के सुखी दांपत्य के तिनके उड़ने की शुरुआत करीब 3 साल पहले तब हुई, जब दीपा गुर्जर नाम की युवती को श्री राम अस्पताल में बतौर रिसैप्शनिस्ट रखा गया.

दीपा गुर्जर सुंदर और स्मार्ट युवती थी. उस ने कंप्यूटर कोर्स कर रखा था. उस की बातचीत के व्यावसायिक लहजे ने डा. सीमा को सब से ज्यादा प्रभावित किया. डा. सीमा अस्पताल प्रबंधन की खुद मुख्तार थी. इसलिए किसी को नौकरी पर रखने या न रखने के मामले में वह पति डा. सुदीप गुप्ता से सलाहमशविरा करना जरूरी नहीं समझती थी.

जीवनयापन के लिए आर्थिक संकट से गुजर रही दीपा के प्रति डा. सीमा के मन में सौफ्ट कौर्नर बन गया था. दीपा न केवल विवाहित थी, बल्कि 3 वर्षीय बेटे की मां भी थी. दीपा के बताए अनुसार, उस का पति से अलगाव चल रहा था और बात तलाक तक पहुंच गई थी. ऐसे में नौकरी उस की तात्कालिक जरूरत थी.

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डा. सीमा का मानना था कि अपनी नौकरी बचाए रखने के लिए दीपा ज्यादा मुस्तैदी से काम करेगी. साथ ही डा. सीमा की एक सोच यह भी थी कि रिसैप्शन पर सुंदर स्त्रियां लुभावने व्यावसायिक पैकेज की तरह साबित होती हैं.

जानें आगे क्या हुआ अगले भाग में…

छद्म वेश : कहानी मधुकर और रंजना की

अंधविश्वास की बलि चढ़ती महिलाएं

छत्तीसगढ़ देश दुनिया का एक अजूबा राज्य है. दरअसल, छत्तीसगढ़ का ज्यादातर हिस्सा वन प्रांतर है, यहां बस्तर है, अबूझमाड़ है. यहां सरगुजा का पिछड़ा हुआ अंचल है तो रायगढ़ मुंगेली आदि जिलों की गरीब बेबस लाचार आवाम का रहवास भी.

यहां शिक्षा का स्तर निम्नतम है वहीं जीवन स्तर भी बेहद निम्न. छत्तीसगढ़ राज्य बनने के पश्चात जिस विकास और उजाले की उम्मीद यहां की आवाम कर रही थी उसका कहीं पता नहीं है. और आज भी दशकों पूर्व जैसा माहौल है आज भी यहां अंधविश्वास में महिलाओं की छोटी सी बात पर बेवजह हत्या हो जाती है. हाल ही में अंधविश्वास और टोना टोटका का एक मामला राज्य के रायगढ़ जिला के पास थाना पूंजीपथरा के बिलासखार में घटित हुआ. पत्नी की तबियत खराब रहने पर जादू टोने की शंका में 50 वर्षीय मीरा बाई की मुदगल (लकड़ी के गदा) से सिर में मार कर हत्या कर दी गई और यही नहीं घटना के बाद शव को जला दिया. बाद में घटना की रिपोर्ट मृतका के भाई किर्तन राठिया निवासी ग्राम पानीखेत द्वारा सात जुलाई को दर्ज करायी.

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पुलिस  बताती है कथित आरोपी राजू की पत्नी की तबीयत खराब रहती थी तब राजू शंका करता था कि मीराबाई जादू टोना करती है. छह जुलाई को राजू की पत्नी की तबीयत खराब होने पर राजू गुस्से में आकर घर में रखें लकड़ी के मुगद्ल गदा से महिला के सिर में ताबड़तोड़ वार कर हत्या कर  देता है. यहां अंधविश्वास में महिलाओं की अक्सर क्रूरतम  हत्या हो जाती है और शासन-प्रशासन सिर्फ औपचारिकता निभाता हुआ आंखें मूंदे हुए हैं.

अंधविश्वास का संजाल

छत्तीसगढ़ आसपास के अनेक राज्यों में जहां आदिवासी बाहुल्य हैं अंधविश्वास को लेकर के महिलाओं की हत्या हो जाती है.छत्तीसगढ़ के पड़ोसी राज्य झारखंड के साहिबगंज जिले के राधानगर थाना क्षेत्र की मोहनपुर पंचायत के मेंहदीपुर गांव की मतलू चाैराई नामक एक 60 वर्षीय महिला की हत्या डायन बताकर कर दी गई. जिस व्यक्ति ने हत्या की उसे यह शक था कि इसने उसके बेटे को जादू टोना कर मारा है. महिला की हत्या गांव के सकल टुडू ने विगत  7 जुलाई को गला काट कर की और दुस्साहसिक  ढंग से और धड़ से कटे सिर को लेकर बुधवार 8 जुलाई की सुबह वह थाने पहुंच गया.

पुलिस बताती है कि कि आरोपी का 25 वर्षीय बेटा साधिन टुडू बीमार था. उसे सर्दी खांसी थी और सोमवार 6 जुलाई की शाम उसकी मौत हो गई. उसकी मौत के बाद गांव में यह अफवाह फैल गई कि जादू टोना कर मतलू चाैराई ने उसकी जान ले ली. इसके बाद साधिन का पिता अपने बेटे का अंतिम संस्कार करने के बजाय महिला की हत्या तय करने का ठान लिया. उसने मंगलवार 7 जुलाई की रात मतलू की गर्दन काट कर हत्या कर दी और कट हुआ सिर लेकर अगली सुबह राधानगर थाना पहुंच गया.

इससे पहले हाल में ही रांची जिले के लापुंग में दो भाइयों ने मिल कर अपनी चाची की डायन होने के संदेह में हत्या कर दी थी. रांची जिले के लापुंग थाना क्षेत्र के चालगी केवट टोली की रहने वाली 56 वर्षीया फुलमरी होनो की हत्या शनिवार 4 जुलाई को उनके दो भतीजों ने धारदार हथियार से कर दी. जहां तक छत्तीसगढ़ की बात है ऐसा कोई महीना नहीं व्यतीत होता जब कुछ पुरुष और महिलाओं की तंत्र मंत्र के नाम पर हत्या नहीं हो जाती.

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आवश्यकता जागरूकता की

छत्तीसगढ़ सहित देश में ऐसे अंधविश्वास के खिलाफ जागरूकता की दरकार अभी भी बनी हुई है इसके लिए छत्तीसगढ़ में टोनही अधिनियम बनाया गया है मगर वह भी कागजों में सिमटा हुआ है ऐसे में लगभग तीन दशक से अंधविश्वास और तंत्र मंत्र के खिलाफ जागरूकता फैला रहे डॉक्टर दिनेश मिश्रा की पहल एक आशा की किरण जगाती है.

डॉ. दिनेश मिश्र  के अनुसार  अंधविश्वास में  की गई ये हत्याएं अत्यंत शर्मनाक व दुःखद हैं. जादू टोने जैसे मान्यताओं का कोई अस्तित्व नहीं है और कोई महिला डायन/टोनही नहीं होती. यह अंधविश्वास है, जिस पर ग्रामीणों को भरोसा नहीं करना चाहिए. विभिन्न बीमारियों के अलग-अलग कारण व लक्षण होते हैं. संक्रमण, कुपोषण, दुर्घटनाओं से लोग अस्वस्थ होते है, जिसका सही परीक्षण एवं उपचार किया जाना चाहिए. किसी भी बैगा, गुनिया के द्वारा फैलाये भ्रम व अंधविश्वास में पड़ कर कानून हाथ में नहीं लेना चाहिए. मगर सच तो यह है कि शासन, प्रशासन व छत्तीसगढ़ की सामाजिक संस्थाएं हाथ पर हाथ धरे बैठी हुई हैं और महिलाएं अंधविश्वास की चपेट में आकर मारी जा रही है.

कमाल का है गमछा : जब सलमान ने लपेटा था गले में गमछा

अप्रैल से ले कर सितंबर तक भारत के मैदानी इलाकों में गरमी और बरसात का मौसम रहता है. कभी चिलचिलाती जानलेवा लू तो कभी बादल बरसने के बाद उमस भरी चिपचिपाती गरमी.

शहरों में तो लोग छाते या टोपी से अपना बचाव कर लेते हैं, पर गांवदेहात में इन चीजों का चलन ज्यादा नहीं है. हां, वहां की लड़कियां शहर की लड़कियों की तरह चुन्नी वगैरह से खुद को ढक कर धूप के हमले से खुद को बचा लेती हैं, पर लड़कों को छाते और टोपी का झंझट ज्यादा रास नहीं आता है.

इस सब में उन का साथी बनता है गमछा. यह अमूमन सूती कपड़े से बने छोटे आकार के तौलिए जैसा होता है, पर मोटाई में तौलिए से कम पतला.

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जरूरत और फैशन

गांवकसबों में गमछा तकरीबन हर उम्र के आदमी के काम का होता है. बूढ़ों के लिए मक्खीमच्छर भगाने का साधन तो जवान लड़कों के गले में बंधा देशी मफलर. हिंदी फिल्म ‘टाइगर जिंदा है’ में सलमान खान ने ऐसा ही गमछा अपने गले के इर्दगिर्द लपेटा था, जो अपनेआप में एक फैशन ट्रेंड बन गया था. उस के बाद तो बड़े शहरों के साप्ताहिक बाजारों में ऐसे गमछे ज्यादा मात्रा में बिकने के लिए आने लगे थे. गांवदेहात में तो नौजवानों ने सलमान खान की तरह गले में रंगबिरंगे गमछे लपेट कर सोशल मीडिया पर खूब वीडियो और फोटो अपलोड किए थे.

कोरोना में काम का

इतना ही नहीं, देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कोरोना संकट शुरू होने के बाद जब चौथी बार देश को संबोधित किया था, तब उन का मुंह भी गमछे से ढका हुआ था. बाद में उन्होंने उसे अपने गले में लपेट लिया था.

बिहार और उत्तर प्रदेश समेत देश के बहुत से इलाकों में लोग आम जिंदगी में गमछे का काफी इस्तेमाल करते हैं. दूरदराज के इलाकों में कोरोना महामारी से बचने के लिए बनाए गए मास्क तो नहीं मिलेंगे, ऐसे में गमछा उन के बचाव में बहुत उपयोगी साबित हो सकता है. यह नाक और मुंह पर मास्क का काम देगा तो तेज धूप में सिर को ढकने का काम भी करेगा. ज्यादा तेज आंधी आ जाए तो आंखों को धूलमिट्टी के नुकसान से बचाएगा.

चूंकि गमछा सूती और पतला होता है, इसलिए इसे संभालने का भी झंझट नहीं रहता है. धोना और सुखाना भी आसान काम. जुकाम है तो छींक आने पर यह ओट का काम करता है और गरमी लगे तो हाथ के पंखे की तरह हिला कर हवा के मजे भी लिए जा सकते हैं. कुछ खाया तो जमीन पर बिछा कर बैठ गए और आराम करना है तो तह कर के सिर के नीचे दबाया और बना लिया तकिया.

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जब फिल्मी सितारे गमछे के टशन से नहीं बच पाए हैं, तो भला नेता क्यों पीछे रहेंगे. छोटे उभरते नेताओं की यह पहली पसंद होता है. सफेद कमीजपैंट और गले में गमछा. समझ लीजिए, नेताजी भाषण देने को तैयार. बाकी अगर गमछे के फुल मजे लेने हों तो देख आइए कोई भोजपुरी सिनेमा. परदे पर हीरो और बगल वाली सीट पर कोई सीटी बजाता मनचला, दोनों के गले में गमछा दिख ही जाएगा.

जल्द ऑन एयर होने जा रहा है इंडियन आइडल 12, क्या नेहा और आदित्य की फिर से होगी लव स्टोरी शुरू?

सोनी टीवी के सबसे बड़े सिंगिग रिएलिटी शो इंडियन आइडल (Indian Idol) दर्शकों के बीच काफी पौपुलर है और साथ ही दर्शकों का फेवरेट भी है. यही वजह है कि रिएलिटी शो इंडियन आइडल का एक सीजन जैसे ही खत्म होता है तभी से ही दर्शक इसके अगले सीजन के इंतजार में जुट जाते हैं. इंडियन आइडल के 11वां सीजन ने काफी लोकप्रीयता हासिल की थी और इस सीजन के विनर सन्नी हिंदुस्तानी (Sunny Hindustani) रहे थे. इस सीजन में नेहा कक्कड़ (Neha Kakkar) और उदित नायारण (Udit Narayan) के बेटे आदित्य नारायण (Aditya Narayan) की लव स्टारी भी स्टार्ट हुई थी.

 

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Its time to relive some fantastic performances from the #AuditionRound of #IndianIdol11 tonight at 8:30 PM.

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अब बात करें इंडियल आइडन (Indian Idol) के अगले सीजन यानी कि सीजन 12 की तो दर्शकों के लिए एक बहुत बड़ी खुशखबरी है कि इंडियन आइडल सीजन 12 जल्द ही ऑन एयर होने वाला है. खबरों की माने तो इंडियन आइडल सीजन 12 इस साल अक्टूबर तक टीवी पर ऑन एयर हो जाएगा. हालांकि इस शो को लेकर सोनी टीवी (Sony TV) या मेकर्स ने अभी कोई फैसला नहीं लिया है.

आपको बता दें, कि खबरों के अनुसार इंडियन आइडल के अगले सीजन में भी हर बार की तरह नेहा कक्कड़ (Neha Kakkar), विशाल ददलानी (Vishal Dadlani) और हिमेश रेशमिया (Himesh Reshammiya) ही बतौर जज दिखाई देंगे. कुछ समय पहले शो के मेकर्स ने दर्शकों के साथ इस शो का प्रोमो शेयर किया था जिसे दर्शकों ने खूब पसंद किया था और तो और इस प्रोमो में खुद आदित्य नायारण (Aditya Narayan) परफोर्म करते नजर आ रहे थे और साथ ही इस बात की जानकारी भी दे रहे थे कि इस बार इंडियन आइडल के ऑडिशंस ऑनलाइन ही हो रहे हैं.

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खबरें तो कुछ ऐसी भी थी कि इंडियन आइडल के साथ साथ सबका पसंदीदा शो कौन बनेगा करोड़पति (Kaun Banega Crorepati) भी ऑन एयर किया जाएगा लेकिन अब अमिताभ बच्चन (Amitabh Bachchan) जो कि इस समय कोरोना के संकट से जूझ रहे हैं तो अब ये कहना थोड़ा मुश्किल होगा कि शो कौन बनेगा करोड़पति कब टीवी पर ऑन एयर होगा.

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रानी चटर्जी और पवन सिंह का रिलीज हुआ नया भोजपुरी सौंग, इंटरनेट पर मचा धमाल

भोजपुरी सिनेमा (Bhojpuri Cinema) जगत में हर समय सुर्खियों में रहनें वाली रानी चटर्जी (Rani Chatterjee) फिल्मों के साथ-साथ सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर भी काफी सक्रिय हैं. जिस पर वह आए दिन अपनी फोटोज और वीडियो शेयर करती रहतीं हैं. कोरोना संक्रमण के चलते रानी चटर्जी (Rani Chatterjee) की बन कर तैयार फिल्में रिलीज में फंसी हुई हैं. वहीं वह फिल्मों में व्यस्तता के चलते वह काफी दिनों से किसी भोजपुरी म्यूजिक वीडियो में नजर नहीं आई थी.

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लेकिन Unlock-2 में उन्होंने अपनें फैन्स के बीच एक धमाकेदार भोजपुरी वीडियो एल्बम से वापसी की है. इस भोजपुरी वीडियो एल्बम का नाम साड़ी पा के फोटो (Sadi Pa Ke Photo) है. जिसे पवन सिंह (Pawan Singh) और अंकिता सिंह (Ankita Singh) नें गाया है. इस वीडियो में रानी चटर्जी (Rani Chatterjee) भोजपुरी फिल्मों के सुपरस्टार पवन सिंह (Pawan singh) के साथ रोमांस करती नजर आ रहीं हैं.

इस भोजपुरी वीडियो में रानी साड़ी में कहर ढा रहीं हैं. वहीं उनका लुक उनके फैन्स पर बिजलियां गिराता नजर आ रहा है. रानी एक सीन में पिंक (Pink) टी-शर्ट और टाईट जींस में खुबसूरत नजर आ रही हैं. इस भोजपुरी गानें में रानी को शादी के लिए देखने आए लड़के वालों के सामने जाने के लिए पहनी गई साड़ी का फोटो पवन सिंह को भेजे जाने पर आए रिएक्शन को भी बड़ी खूबसूरती से फिल्माया गया है. इस एल्बम में पवन सिंह (Pawan singh) और रानी चटर्जी (Rani Chatterjee) की जोड़ी बहुत दिनों बाद एक साथ नजर आई है.

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वीडियो एल्बम साड़ी पा के फोटो (Sadi Pa Ke Photo) के Lyricist हैं अरुण बिहारी (Arun Bihari) और संगीत दिया है भलार्ड जी नें. मिक्स एंड मास्टर की भूमिका निभाई है जगन्नाथ स्टूडियो आरा (Jagannath Studio Ara) ने व कास्टिंग दीपक सिंह (Deepak Singh) का है. कोरियोग्राफर (Choreographer) रवि पंडित (Ravi Pandit) हैं व निर्देशक नीरज सिंह (Niraj Singh) हैं. इस भोजपुरी Video Album की प्रोडक्शन टीम फ्यूचर विज एडवरटाइजिंग प्राइवेट लिमिटेड है जबकि डिजिटल की जिम्मेदारी (Future Wiz Advertising Pvt. Ltd.) नें निभाई है. इस गाने में मैनेजर रितु राज (Ritu Raj) हैं व डिजिटल पार्टनर म्यूजिक वाइड (Music Wide) है.  कंपनी / लेबल म्यूजिक वाइड एलएलपी (Music Wide LLP) नें दिया है.

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आलिया भट्ट की बहन शाहीन को मिली रेप और जान से मारने की धमकी तो लिया ये बड़ा फैसला

बौलीवुड एक्टर सुशांत सिंह राजपूत (Sushant Singh Rajput) की सुसाइड को भले ही अब काफी समय हो गया हो लेकिन सुशांत के फैंस उनकी इस अचानक हुई मौत का सदमा अभी तक नहीं भूल पाए हैं. सुशांत के केस को लेकर जब भी कुछ नया सामना आता है तो उनके फैंस उनके केस के लिए सीबीआई (CBI) जांच की मांग करते हैं क्योंकि काफी लोगों को ऐसा लगता है कि सुशांत सिंह राजपूत की मौत का कारण सुसाइड नहीं बल्कि मर्डर है.

 

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Hair courtesy: @priyanka.s.borkar Cute face and good personality courtesy: Mom & Dad.

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जैसा कि हम सब जानते हैं कि सुशांत सिंह राजपूत के फैंस सुशांत की सुसाइड का कारण सलमान खान (Salman Khan), करण जौहर (Karan Johar), आलिया भट्ट (Alia Bhatt), संजय लीला भंसाली (Sanjay Leela Bhansali) जैसे बड़े लोगों को ठहरा रहे हैं जो कि बॉलीवुड इंडस्ट्री में खुलेआम नेपोटिज्म (Nepotism) फैला रहे हैं. इसी के चलते आलिया भट्ट (Alia Bhatt) की बहन शाहीन भट्ट (Sheheen Bhatt) ने अपने सोशल मीडिया अकाउंट्स पर शेयर कर बताया कि अभी भी उनको रेप और जान से मारने की धमकी दी जा रही है और अब वे इन सबके खिलाफ लीगल एक्शन लेने वाली हैं.

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शाहीन भट्ट (Shaheen Bhatt) ने अपने पोस्ट में लिखा,- ‘मैं अब उन लोगों के खिलाफ आवाज उठाऊंगी, जो मुझे या किसी को ऐसे नकारात्मक मैसेज भेजते हैं. अगर कोई मुझे या मेरे परिवार को ऐसे मैसेज भेजेगा तो उसे माफ नहीं किया जाएगा. सबसे पहले मैं कमेंट ब्लॉक करूंगी और उसके बाद इंस्टाग्राम से शिकायत करूंगी. मैं ऐसे लोगों के नाम भी समाज के सामने रखूंगी. जो लोग मुझे गंदे मैसेज भेजेंगे, मैं उनके नाम के साथ उस मैसेज को इंटरनेट पर पोस्ट करूंगी. मैं ऐसे लोगों के खिलाफ लीगल एक्शन भी लूंगी. अगर किसी को लगता है कि उसका पता नहीं लगाया जा सकता है क्योंकि वो ये सब फेक अकाउंट से कर रहा है तो बता दूं कि तुम्हारी आईपी ट्रैक की जा सकती है. अब तुम नहीं छुप पाओगे, किसी को प्रताड़ित करना जुर्म है.’

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No make-up, no editing. Just Panda-Eyes, good angles and retinol.

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आलिया भट्ट की प्रोफेशनल लाइफ की बात करें तो वे आने वाले दिनों में कई फिल्मों में नजर आने वाली हैं जैसे कि ‘सड़क 2’ (Sadak 2), ‘ब्रह्मास्त्र’ (Brahmastra), ‘गंगूबाई काठियावाड़ी’ (Gangubai Kathiawadi).

दूल्हेभाई का रंगीन ख्वाब

अपनों के खून से रंगे हाथ

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में लगभग तीन साल पूर्व घटित हत्या के एक मामले का खुलासा जुलाई 2020 में हुआ. अर्थात् 3 वर्ष बाद ही सही मामले का खुलासा हुआ है. इस मामले में चौंकाने वाली बात यह कि रायपुर पुलिस ने मृतक के बेटे को गिरफ्तार किया है. मामला राजधानी रायपुर के डीडी नगर थाना क्षेत्र का है.

अक्सर देखा गया गया है कि जो हत्या होती है, अपराध होते हैं. उनमें आसपास के लोगों का ही हाथ होता है. यहां अपने ही निकटतम जनों के खून से सने हाथों के संदर्भ में कहा जा सकता है कि मनुष्य के जीवन की सबसे बड़ी सच्चाई यही है कि जहां वह अपनों के बीच प्रेम, सद्भावना और विश्वास पाता है. आस्था और प्रेम प्राप्त करता है वहीं जब रिश्तो के धागे टूटने लगते हैं तो बात हत्या और अन्य तरह के अपराधों तक पहुंच जाती है. आज हत्या के इस पहलू पर हम इस विशेष लेख में आपसे रूबरू हो रहे हैं.

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आइए! देखते हैं अपनों ही के हाथों से कैसे-कैसे अपराध घटित हो जाते हैं-

पहली घटना- यगढ़ जिला के खरसिया  थाना अंतर्गत एक लोमहर्षक हत्या हुई एक पुत्र ने मां की हत्या कर दी. कारण यह था कि मां ने उसे शराब पीने के लिए पैसा देने से अंततः इंकार कर दिया था. कलयुगी पुत्र ने मां की हत्या कर दी.

दूसरी  घटना- छत्तीसगढ़ के  जिला मुंगेली में एक भाई ने अपने ही बड़े भाई की हत्या कर दी. मामला जमीन जायदाद के मसले को लेकर घटित हुआ था.

तीसरी घटना- कोरबा जिला के पसान थाना अंतर्गत एक गांव में बुजुर्ग शख्स ने अपनी पत्नी को सिर्फ इसलिए मार डाला क्योंकि वह उसके कहे मुताबिक भोजन नहीं बना रही थी.

ऐसे ही अनेक घटनाएं हमारे आसपास आए दिन घटित होती रहती है. इन्हें देखकर हम अनदेखा कर देते हैं जबकि सच्चाई यह है कि यह समाज का एक ऐसा पहलू है जिसका निरंतर समाजशास्त्रीय अध्ययन चलता रहता है. यह समाज की एक बड़ी विकृति है, जिसे दुरुस्त करना भी समाज का ही दायित्व है.

पिता की  हत्या,  राज दफन

दरअसल 11 जनवरी 2017 को राजधानी रायपुर के ग्राम सरोना में सीताराम ध्रुव सर में चोट लगने की वजह से गंभीर रूप से घायल हो गया था.  स्वाभाविक रूप से उसे अस्पताल में भर्ती कराया गया वहीं 24 जनवरी 2017 को इलाज के दरमियान सीताराम की मौत हो गई थी. इस मामले में डीडी नगर पुलिस ने मर्ग कायम कर जांच शुरू की थी. सीताराम ग्राम खपरापोल, जिला महासमुंद का रहवासी था.

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सीताराम के सर पर मिले चोट के निशान और शुरुआती पूछताछ में हत्या की आशंका मानते हुए पुलिस जाँच कर रही थी. इस दौरान साढ़े तीन साल में पुलिस मृतक के परिजनों से कई बार पूछताछ करती  रही  थी. लेकिन कामयाबी अब जाकर जुलाई 2020 में  मिली. पुलिस जांच के दरमियान सूक्ष्म रूप से  मृतक के बेटे पंकज ध्रुव की गतिविधियों पर लगातार नजर बनाए हुए थी. पुलिस को जब यह पूरी तरह से यकीन हो गया कि सीताराम का हत्यारा उसका बेटा पंकज ही है, तो पुलिस अधिकारियों ने कड़ाई से पूछताछ की. और जैसा कि होता है, अंततः पूछताछ में पंकज टूट गया उसने अपने पिता की हत्या करना कबूल कर लिया.

पंकज ने आंसू बहाते हुए बताया कि वह पिता  से बहुत सारे रुपए चाहता था मगर पिता उसे नालायक समझकर टालते रहते थे. उसने सोचा क्यों नहीं पिता को मारकर सारी संपत्ति का मालिक बन जाए.

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