अंधविश्वास : काले बाबा की काली करतूत

21 अक्तूबर, 2020 की रात के तकरीबन 9 बजे जब लोगों की भीड़ कम हो गई तो कुछ लोगों ने एक मजार से सट कर बनाए कोठरीनुमा कमरे के नीले रंग के दरवाजे पर दस्तक देनी शुरू की. कमरे के बाहर दरवाजे के पास एक जोड़ी आदमी के जूते और एक जोड़ी औरत की चप्पल रखी थी. इस से यह बात साफ समझ आ रही थी कि कमरे के अंदर एक आदमी और एक औरत मौजूद हैं.

दरवाजे पर दस्तक देने वाले 3 से 4 लोग थे. उन के हाथों में मोबाइल कैमरे थे. वे लोग वीडियो बना रहे थे. कमरे के अदंर से कोई आवाज नहीं हुई.

इस बीच मजार पर रहने वाला निसार हुसैन उर्फ काले बाबा बगल के दरवाजे से निकल कर आया और पूछने लगा, ‘यह सब क्या कर रहे हो?’

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काले बाबा को लगा कि उस की धौंस से वहां आए लोग भाग जाएंगे. पर वहां माहौल दूसरा था. लोगों ने काले बाबा को पीटना शुरू कर दिया और उस पर दबाव डाला कि वह कमरा खुलवाए.

दूसरों के दर्द का इलाज करने का दावा करने वाले काले बाबा के चेहरे की हवाइयां उड़ चुकी थीं. उसे साफ पता चल चुका था कि अब उस का परदाफाश हो चुका है. उस की कोई जुगत काम नहीं आई. कमरा खुलवाना पड़ा.

एक आदमी अंदर से निकला और उस ने भागने की कोशिश की. कमरे के अंदर पीली रोशनी देता एक बल्ब जल रहा था. परदा डाल कर कमरे को 2 हिस्सों में बांट दिया गया था, जिस से किसी के कमरे में आने पर परदे के हिस्से को छिपाया जा सके.

परदे वाले हिस्से पर नीचे जमीन पर बिस्तर लगा था. बिस्तर पर एक औरत बैडशीट ओढ़ कर लेटी थी. आवाजें सुन कर वह उठी और अपना सलवारकुरता पहनने लगी. औरत के जिस्म पर केवल ब्रा और पेंटी ही थी.

वीडियो बनाने वाले उस की इसी दशा को कैमरे में कैद कर रहे थे. इस के बाद लोगों ने पुलिस को सूचना दी. पुलिस वहां आई तो तमाम लोग काले बाबा से मारपीट करे थे. उन का वह सहयोगी भाग चुका था.

ठाकुरगंज थाने की पुलिस वहां आई और काले बाबा को पकड़ कर ले गई. बाबा के खिलाफ मुकदमा कायम हो गया. उस को जेल भेज दिया गया.

बाबा का सहयोगी फरार हो गया है. पुलिस उस को तलाश रही है. महिला को पुलिस ने निजी मुचलके पर पूछताछ के बाद छोड़ दिया.

काले बाबा की काली करतूतों की जानकारी लखनऊ पुलिस को पहले से थी, पर वह अभी तक चुप थी, क्योकि उस के पास काले बाबा के खिलाफ कोई सुबूत नहीं थे.

बात सुबूत की नहीं है, बल्कि धार्मिक और संवेदनशील मामलों में पुलिस सीधे ऐक्शन लेने से बचती है. इस वजह से काले बाबा का यह गोरखधंधा चल रहा था.

राख से इलाज की शुरुआत

यह हाल है उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के ठाकुरगंज में बने जामा मजार का. यह मजार ठाकुरगंज के रईस मंजिल इलाके के पास है. इस मजार का नाम दरगाह सैयद अहमद शाह शहीद (ईरानी) उर्फ पिन्नी वाले बाबा है. मजार पर सालाना उर्स होता है.

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मजार के पास लगे बैनर में इस के बारे में सब लिखा है. इस में काले बाबा का फोटो और उस का मोबाइल नंबर भी लिखा है. वहां हर वीरवार और रविवार को सफेद दाग, बच्चे न होने की बीमारी, मानसिक परेशानी, भूतप्रेत उतारने समेत कई दूसरी किस्म की तमाम बीमारियों का भी इलाज होता था.

ऐसे में कई बार मरीज बुधवार से ही यहां आना शुरू हो जाते थे. बीमारों में ज्यादा तादाद औरतों की होती थी. इन में 25 साल से 40 साल उम्र की औरतों की तादाद ज्यादा होती थी. सब से ज्यादा मानसिक परेशानी, सफेद दाग और बच्चे न होने की दिक्कत वाले लोग वहां जमा होते थे. कई औरतें ऐसी होती थीं, जिन के बच्चे न होने के चलते उन के पति तलाक देने की धमकी देते थे.

मजार के पास मन्नत के लिए जो भी औरतें जाती थीं वे धूप, अगरबत्ती और मजार पर चादर चढ़ाती थीं. इस के बाद काले बाबा औरतों के सिर पर मोरपंख की झाड़ू मार कर उन के दुख दूर करने का काम करता था. जो औरत देखने में खूबसूरत और कम उम्र की होती थी, उस से वह किसी न किसी बहाने बात करने की कोशिश करता था.

ऐसी औरतों को देख कर उन के सिर पर झाड़ू मारते समय बाबा कहता था, ‘आप बहुत परेशान हैं. बीमारी आप का पीछा नहीं छोड़ रही है. बीमारी को दूर भगाने के लिए खास झाड़फूंक करनी होगी.’

आमतौर पर औरतें इस खास झाड़फूंक के बारे में पूछने लगती थीं. ऐसे में बाबा उन्हें अपने सहयोगी के पास भेज देता था. बाबा का सहयोगी खास झाड़फूंक के बारे में बताने लगता था, जिस की शुरुआत राख लगाने से होती थी. राख लगाने के लिए औरतों को बाद में बुलाया जाता था.

जब मजार पर भीड़ कम होती थी, तब राख लगाने के लिए औरत को मजार के बगल वाले कमरे में ले जाया जाता था. इस के बाद बाबा का सहयोगी औरतों कोे अपने कपड़े उतार कर लेट जाने को कहता था. जब कोई औरत इस के लिए तैयार हो जाती थी तो मजार की गरमगरम राख ले कर औरत के शरीर पर राख से मसाज की जाती थी.

मसाज करते समय का वीडियो भी धोखे से बना लिया जाता था. इसी वीडियो को दिखा कर औरतों को बाद में ब्लैकमेल कर के उन से कई तरह के नाजायज काम कराए जाते थे और इसी के डर से उन को मुंह बंद रखने के लिए मजबूर किया जाता था.

आपसी झगड़े में खुला राज

काले बाबा का मजार पर कब्जा था. लंबे समय से वह यहां रहता था. बाबा अपने सहयोगी बदलता रहता था. तकरीबन 6 महीने पहले इदरीश नामक एक सहयोगी को बाबा ने मजार के काम से बेदखल कर दिया था. इदरीश मजार पर सफेद दाग का इलाज कराने आने वाली एक औरत से मुहब्बत कर बैठा था. काले बाबा को यह बात पंसद नहीं थी. काले बाबा ने जब इदरीश को मजार के काम से बाहर किया तो वह बाबा और उंस की काली करतूतों की जानकारी लोगों को देने लगा. बात पुलिस तक भी पहुंची थी.

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चौक एरिया के असिस्टैंट पुलिस कमिश्नर एसीपी आईपी सिंह कहते हैं, ‘बाबा लंबे समय से औरत की झाड़फूंक और इलाज का काम कर रहा था. कई बार लोगों ने शिकायत की, पुलिस ने भी छानबीन की, पर कोई सुबूत सामने नहीं आया था.’

इदरीश को यह पता था कि जब तक काले बाबा के खिलाफ कोई पुख्ता सुबूत नहीं होगा, तब तक कोई बाबा की हरकतों पर यकीन नहीं करेगा. पर इदरीश बाबा से डरता भी था, क्योकि बाबा के पास उस के भी कुछ राज थे. ऐसे में उस ने 4-5 लोगों को बताया कि बाबा राख लगाने के नाम पर औरतों के साथ गलत हरकत  करता है. लोगों को यकीन नहीं हो रहा था. ऐसे में बुधवार को उस ने कहा कि कमरा खुलवा कर देख लो.

इदरीश लोगों को भड़का कर खुद पूरे मामले से बाहर हो गया. लोगों को जब यह लगा कि कमरे में औरत के साथ गलत हरकत हो रही है तो वहां मजमा लग गया और काले बाबा रंगे हाथ पकड़ा गया.

ठाकुरगंज थाने के प्रभारी निरीक्षक राजकुमार कहते हैं, ‘बाबा और उस के साथियों के चंगुल में जो भी औरतें फंस जाती थीं, ये लोग उन को ब्लैकमेल भी करते थे. पुलिस पूरे मामले की जांच कर के दोषी लोगों के खिलाफ कड़ी कार्यवाही करेगी.’

जानकारी के मुताबिक बाबा के जाल में 100 से भी ज्यादा औरतें फंसी हैं. उन की जानकारी भी जमा की जा रही है.

बीजेपी की ओर से जारी विज्ञापन से नीतीश की फोटो गायब, पढ़ें खबर

  • 2012 में जब मोदी तीसरी बार गुजरात के मुख्यमंत्री बने थे, तब भी सीएम नीतीश कुमार ने बधाई नहीं दी थी.
  • नरेंद्र मोदी को 2013 में भाजपा के प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया, तो जदयू ने भाजपा से गठबंधन तोड़ लिया.

28 अक्टूबर को पहले चरण की वोटिंग से ठीक पहले बीजेपी की ओर से एक विज्ञापन सामने आया है. इस विज्ञापन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तो नजर आ रहे है लेकिन नीतीश कुमार गायब हैं. ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि क्या बिहार में गूंजती सत्ता विरोधी लहर की वजह से बीजेपी नीतीश कुमार से परहेज कर रही है. क्या यही वजह है कि पार्टी नीतीश कुमार की तस्वीर का इस्तेमाल अपने पोस्टर-बैनर में नहीं कर रही है? हालांकि हाल ही में प्रधानमंत्री मोदी बिहार में चुनाव प्रचार की शुरुआत करने पहुंचे थे. जहां प्रधानमंत्री ने तीन रैली की और तीनों में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार मौजूद थे. साथ ही मंच पर दोनों में खूब गर्मजोशी भी दिखी और एक-दूसरे के लिए सम्मान भी.

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राजनीतिक इतिहास में ये पहला मौका है, जब बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के लिए नरेंद्र मोदी प्रचार कर रहे हैं. बता दें कि यही नीतीश कुमार कभी नरेंद्र मोदी से प्रचार करवाने के सवाल पर कहा करते थे कि हमारे पास एक मोदी है तो हमें दूसरे मोदी की क्या जरूरत है?

चलिए हम आपको आज से ठीक 5 साल पीछे लेकर चलते हैं. जब मोदी-नीतीश एक दूसरे पर हमलावर हुआ करते थे. 25 जुलाई 2015 को प्रधानमंत्री मोदी ने बिहार में परिवर्तन रैली की शुरुआत की थी. पहली ही रैली में उन्होंने नीतीश के पॉलिटिकल DNA पर कई सवाल उठाए थे. तब नीतीश कुमार ने इसे ही अपना चुनावी मुद्दा बनाया था और जीत भी दर्ज की थी.

इसकी शुरूआत 2010 से हुई थी. जब 2008 में कोसी में आई बाढ़ के बाद उस वक्त गुजरात के मुख्यमंत्री रहे नरेंद्र मोदी ने बिहार को 5 करोड़ रुपए दिए थे. जिसके बाद 2010 में पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में गुजरात के कुछ एनजीओ ने ये विज्ञापन दिया कि कैसे बिहार की बाढ़ में गुजरात सरकार ने मदद की है. इससे गुस्साए नीतीश ने नरेंद्र मोदी को वो पैसे वापस कर दिए. उस दौर में नीतीश मोदी के धुर विरोधियों में शामिल हुआ करते थे. उसी दिन भाजपा की तरफ से पटना में एक डिनर पार्टी रखी गई थी, जिसमें मोदी भी मौजूद थे. इस पार्टी में जब नीतीश कुमार ने मोदी को देखा तो नाराज नीतीश ये डिनर पार्टी छोड़कर चले गए.

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इसके बाद सितंबर 2013 में जब बीजेपी ने नरेंद्र मोदी को 2014 के लिए भाजपा प्रचार अभियान समिति का अध्यक्ष बनाया गया और फिर भाजपा ने नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर दिया . तो नीतीश कुमार इस बात को बर्दाश्त ना कर सकें और उन्होंने इसके बाद जदयू और भाजपा का 17 साल पुराना गठबंधन तोड़ लिया.

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इसके बाद 2014 के लोकसभा चुनाव में नीतीश की जदयू पार्टी सिर्फ दो सीट ही जीत सकी. जिसके कारण  नीतीश ने सीएम पद से इस्तीफा दे दिया और जीतन राम मांझी को मुख्यमंत्री पद सौप दिया. नीतीश कुमार ने इस पद से इस्तीफे की घोषणा फेसबुक पर की थी. साथ ही इसी पोस्ट में उन्होंने मोदी को प्रधानमंत्री बनने की बधाई भी दी. तब सुशील मोदी ने तंज कसा था कि नीतीश फेसबुक पर ही प्रधानमंत्री को बधाई दे सकते हैं. फोन पर बधाई देने की उनकी हिम्मत नहीं है. हालांकि, ये पहली बार था जब नीतीश ने मोदी को किसी चीज पर बधाई दी हो. 2012 में जब मोदी तीसरी बार गुजरात के मुख्यमंत्री बने थे, तब भी नीतीश ने उन्हें बधाई नहीं दी थी.

इस सब में अबतक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तरफ से कोई बयान नहीं आया था. लेकिन जुलाई 2015 में मुजफ्फरपुर में एक रैली में पीएम मोदी ने ‘DNA’ पर बयान दिया. इस बयान में जीतन राम मांझी की चर्चा करते हुए मोदी ने कहा था, ‘जीतन राम मांझी पर जुल्म हुआ तो मैं बैचेन हो गया. एक चाय वाले की थाली खींच ली, एक गरीब के बेटे की थाली खींच ली. लेकिन जब एक महादलित के बेटे का सबकुछ छीन लिया गया तब मुझे लगा कि शायद DNA में ही गड़बड़ है.’

मोदी के इस बयान को नीतीश ने बड़ा मुद्दा बनाया. उन्होंने कहा कि बिहार के 50 लाख लोग प्रधानमंत्री को अपना DNA सैंपल भेजेंगे. जिसके बाद सितंबर 2015 तक ही 1 लाख से ज्यादा DNA सैंपल पीएमओ भेज दिए गए. हालांकि, पीएमओ ने इसे लिया नहीं. इसके बाद नीतीश ने तंज कसते हुए कहा था, नहीं चाहिए तो वापस कर दो. बता दें कि इस पूरे मामले पर नीतीश ने प्रधानमंत्री को खुला खत भी लिखा था.

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जुलाई 2017 में उस समय के डिप्टी सीएम तेजस्वी यादव पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे. जिसके बाद सीबीआई ने जगह-जगह पर छापेमारी की. उसके बाद 26 जुलाई 2017 को नीतीश ने इस्तीफा दे दिया. इस वक्त नीतीश ने कहा था, ‘मौजूदा माहौल में मेरे लिए नेतृत्व करना मुश्किल हो गया है. अंतरात्मा की आवाज पर कोई रास्ता नहीं निकलता देखकर खुद ही नमस्कार कह दिया. अपने आप को अलग किया.’ इस्तीफा देने के एक दिन बाद ही नीतीश ने भाजपा के समर्थन से सरकार बनाई और छठी बार बिहार के मुख्यमंत्री बनें. हालांकि, एनडीए में जदयू की वापसी की ये कवायद जनवरी से ही शुरू हो गई थी, जब मोदी गुरु गोविंद सिंह की जयंती पर पटना गए थे. इसके बाद फरवरी में नीतीश के कमल में रंग भरने की फोटो आई, उसके भी कई मायने निकाले गए थे.

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मीका सिंह के साथ रोमांस करती नजर आईं Bigg Boss 13 फेम शेफाली जरीवाला, वायरल हुईं Photos

पिछले साल टेलीविजन के बेहद पौपुलर रिएलिटी शो बिग बॉस के सीजन 13 (Bigg Boss 13) में वाइल्ड कार्ड एंट्री के रूप में नजर आईं एक्ट्रेस शेफाली जरीवाला (Shefali Jariwala) एक बार फिर चर्चाओं में आ गई हैं. जी हां बिग बॉस 13 (Bigg Boss 13) के घर से निकलने का बाद उन्हें कई बड़े ऑफर्स मिल रहे हैं. जैसा कि हम सब जानते हैं कि शेफाली जरीवाला (Shefali Jariwala) दिखने में बेहद खूबसूरत हैं और उनके फिगर की तारीफ तो हर किसी की जुबान पर होती है.

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ऐसे में बिग बॉस 13 (Bigg Boss 13) फेम शेफाली जरीवाला (Shefali Jariwala) और पौपुलर सिंगर मिका सिंह (Mika Singh) की कुछ ऐसी फोटोज सामने आई हैं जिसे देख सभी के होश उड़ गए हैं. अपने हॉट अंदाज से सबको दीवाना करने वाली शेफाली जरीवाला (Shefali Jariwala) से अपने लुक्स से एक बार फिर फैंस के दिलों की धड़कनें बढ़ा दी हैं. जैसा कि आप सब इन फोटोज में देख सकते हैं शेफाली जरीवाला और मीका सिंह (Mika Singh) एक दूसरे में पूरी तरह से खोए हुए हैं.

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शेफाली जरीवाला (Shefali Jariwala) और मीका सिंह (Mika Singh) का ऐसा अवतार फैंस को पहली बार देखने को मिला है. इन फोटोज में शेफाली जरीवाला (Shefali Jariwala) अपने हुस्स के जलवे बिखेरती हुईं दिखाई दे रही हैं और साथ ही मीका सिंह (Mika Singh) भी उनकी आंखों में खोए हुए हैं. इन फोटोशूट्स में से एक फोटो तो ऐसी है जिसमें शेफाली जरीवाला ने बेहद ही हॉट अंदाज में मीका सिंह के चेहरे पर चाकू रखा हुआ है और वे दोनों एक दूसरे के बेहद ही करीब नजर आ रहे हैं.

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फोटोशूट में शेफाली जरीवाला (Shefali Jariwala) पूल टेबल पर लेटी हुईं भी दिखाई दे रही हैं जिसमें वे फैंस के होश उड़ा रही हैं. फैंस को शेफाली जरीवाला का ये अंदाज बेहद पसंद आ रहा है और ऐसा लग रहा है मीका सिंह (Mika Singh) जल्द ही एक नए म्यूजिक एल्बम के साथ हाजिर होने वाले हैं जिसमें उनकी और शेफाली जरीवाला की जबरदस्त कैमिस्ट्री देखने को मिलने वाली है.

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ब्लैक बिकिनी पहन स्वीमिंग पूल किनारे कहर बरसाती नजर आई मोनालिसा, इंस्टाग्राम पर शेयर की फोटोज

भोजपुरी फिल्मों की जानी मानी एक्ट्रेस मोनालिसा (Monalisa) अपने फैंस के बीच काफी पौपुलर है. मोनालिसा (Monalisa) सोशल मीडिया पर काफी एक्टिव रहती हैं और एक्टिव रहने के साथ साथ वे अपने फैंस के साथ काफी कनेक्टिड रहती हैं और अपनी लेटेस्ट फोटोज और वीडियोज शेयर कर सुर्खियां बटोरती नजर आती हैं. मोनालिसा (Monalisa) के ट्रेडिशनल लुक से लेकर बोल्ड फोटोज तक सभी फोटोशूट फैंस को बेहद पसंद आते हैं.

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हाल ही में मोनालिसा (Monalisa) ने अपना एक फोटोशूट इंस्टाग्राम पर शेयर किया है जिसमें वे ब्लैक कलर की बिकिनी पहने कहर बरसा रही हैं. इन फोटोज में वे स्वीमिंग पूल किनारे समय बिता रही हैं और उनके इस अवतार की तारीफ फैंस पूरे जोरों शोंरों से कर रहे हैं. इन फोटोज को 24 घंटे के अंदर अंदर 96 हजार से भी ज्यादा लाइक्स मिल चुके हैं.

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मोनालिसा (Monalisa) के फैंस उन्हें बेहद पसंद करते हैं और उनके हर पोस्ट पर जमकर प्यार लुटाते हैं. इससे पहले भी मोनालिसा (Monalisa) ने अपने कई फोटोशूट्स सोशल मीडिया पर शेयर किए हैं जिसे देख फैंस के होश उड़ जाते हैं. मोनालिसा (Monalisa) दिखने में इतनी खूबसूरत है कि कोई भी उन्हें देख दीवाना हो जाता है. आपको बता दें मोनालिसा (Monalisa) टेलीविजन के पौपुलर रिएलिटी शो बिग बॉस के 10वें (Bigg Boss 10) सीजन का भी हिस्सा रह चुकी हैं.

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कर्तव्य : क्या दीपक और अवनि खरे उतरे

पकड़ा गया 5 लाख का इनामी डौन : भाग 1

(कहानी सौजन्य-मनोहर कहानियां)

लाख के इनामी माफिया डौन अखिलेश  सिंह को झारखंड और बिहार की पुलिस सालों से तलाश रही थी. वह जमशेदपुर के अदालत परिसर में की गई झारखंड मुक्ति मोर्चा के कद्दावर नेता और रीयल एस्टेट कारोबारी उपेंद्र सिंह की हत्या में जेल से पैरोल पर बाहर आने के बाद से फरार चल रहा था. जेलर उमाशंकर पांडेय हत्याकांड में भी उसे आजीवन कारावास की सजा सुनाई जा चुकी थी.

दोनों मामलों में उसे न्यायालय में पेश होने का आदेश दिया जा चुका था, लेकिन उस का कहीं पता नहीं चल रहा था. जमशेदपुर के जिला जज (पंचम) सुभाष ने पुलिस को आदेश दिया था कि अखिलेश सिंह को किसी भी तरह ढूंढ कर 11 दिसंबर, 2017 को अदालत में पेश किया जाए. पुलिस को यह आदेश अगस्त, 2017 में दिया गया था.

जिला न्यायालय से आदेश आने के बाद जमशेदपुर पुलिस ऊहापोह की स्थिति में थी. हार्डकोर क्रिमिनल अखिलेश सिंह झारखंड और बिहार पुलिस के लिए सिरदर्द बना हुआ था. 36 मुकदमों में वांछित डौन अखिलेश सिंह पर प्रदेश के बड़े पुलिस अधिकारियों और राजनेताओं का वरदहस्त था, इसलिए पुलिस उस के गिरेबान पर हाथ डालने से कतराती थी. डौन सालों से कहां छिपा था, किसी को पता नहीं था. झारखंड पुलिस कई महीनों से उस की तलाश में जुटी थी.

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आखिर जमशेदपुर पुलिस की मेहनत रंग लाई. सर्विलांस के जरिए जमशेदपुर (झारखंड) पुलिस को माफिया डौन अखिलेश सिंह की लोकेशन हरियाणा के गुरुग्राम की मिली. पुलिस ने सूचना की पुष्टि की तो वह पक्की निकली. अखिलेश सिंह महीनों से अपनी पत्नी गरिमा सिंह के साथ गुरुग्राम के सुशांत लोक स्थित एक गेस्टहाउस में छिपा बैठा था और किसी बड़ी घटना को अंजाम देने की योजना बना रहा था.

आखिर निशाने पर आ ही गया डौन अखिलेश

जमशेदपुर के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक अनूप टी. मैथ्यू ने गुरुग्राम के पुलिस आयुक्त संदीप खिरवार से संपर्क कर के 5 लाख के इनामी डौन अखिलेश सिंह को गिरफ्तार कराने में सहयोग मांगा. संदीप खिरवार इस के लिए तैयार हो गए. इस के बाद 8 सितंबर, 2017 को झारखंड पुलिस गुरुग्राम पहुंच गई.

दोनों प्रदेशों के पुलिस अधिकारियों ने डौन अखिलेश सिंह को जिंदा पकड़ने का एक ब्लूप्रिंट तैयार किया. पुलिस जानती थी कि अखिलेश सिंह के पास आधुनिक हथियार हो सकते हैं, इसलिए इस योजना को बड़े ही गोपनीय ढंग से तैयार किया गया.

इस औपरेशन में जमशेदपुर पुलिस के एसपी (ग्रामीण) प्रभात कुमार, एसएसपी अनूप टी. मैथ्यू, गुरुग्राम के पुलिस आयुक्त संदीप खिरवार, डीसीपी (क्राइम) सुमित कुमार और सीआईए यूनिट-9 के इंचार्ज इंसपेक्टर राजकुमार सहित चुनिंदा पुलिसकर्मी शामिल हुए.

डौन की पहचान के लिए एसएसपी मैथ्यू के पास उस की युवावस्था की एक पुरानी तसवीर थी, जिस में वह काफी खूबसूरत दिख रहा था. गोपनीय तरीके से बनाई गई योजना पूरी हुई तो 9 अक्तूबर, 2017 को पुलिस ने गुरुग्राम के सुशांत लोक स्थित उस गेस्टहाउस को चारों ओर से घेर लिया, जिस में अखिलेश रह रहा था.

एसपी प्रभात कुमार, डीसीपी सुमित कुमार और इंसपेक्टर राजकुमार ने रिसैप्शन पर अखिलेश सिंह नाम के गेस्ट का पता किया तो एंट्री रजिस्टर में उस नाम से कोई कस्टमर नहीं मिला. गेस्टहाउस के कमरा नंबर 102 में अजय कुमार नाम का एक कस्टमर अपनी पत्नी के साथ ठहरा था.

पुलिस कमरा नंबर 102 पर पहुंची. एसपी प्रभात कुमार ने दरवाजे की झिर्री से भीतर झांक कर देखा तो बैड पर एक युवक बैठा था. उस के चेहरे पर काली और घनी दाढ़ी थी. देखते ही वह पहचान गए कि अजय

कुमार नाम से ठहरा गेस्ट अखिलेश सिंह ही है. कमरे के सामने पहुंच कर सुमित कुमार ने जैसे ही दरवाजा खटखटाया तो भीतर से गोलियां चलने लगीं. मौके पर पोजीशन लिए पुलिस अधिकारी सतर्क हो कर साइड हो गए. उस के बाद आधा दरवाजा तोड़ कर पुलिस की ओर से कई राउंड गोलियां चलाई गईं.

भीतर से गोलियां चलनी बंद हो चुकी थीं. जब अंदर कोई हलचल नहीं हुई तो पोजीशन ले कर पुलिस टीम पूरा दरवाजा तोड़ कर भीतर घुसी. कमरे में कसरती बदन वाला एक युवक और एक महिला मौजूद थी. युवक के चेहरे पर घनी दाढ़ी थी और उस के दोनों पैरों के घुटने के ऊपर गोली लगी थी. गोली लगने से घायल हो कर बिस्तर पर पड़ा तड़प रहा था.

पूछताछ में पता चला कि वही माफिया डौन अखिलेश सिंह है और महिला उस की पत्नी गरिमा सिंह. जब पुलिस अखिलेश को वहां से ले जाने लगी तो गरिमा सिंह इंसपेक्टर राजकुमार की सर्विस रिवौल्वर छीनने की कोशिश करने लगी. इस से पहले कि कोई अप्रिय घटना घटती, महिला पुलिस ने उसे दबोच लिया.

मुठभेड़ के बाद 5 लाख के इनामी डौन अखिलेश सिंह और उस की पत्नी गरिमा सिंह के गिरफ्तार होने की सूचना जैसे ही पत्रकारों को मिली, वे गुरुग्राम के थाना सुशांत लोक पहुंच गए. इस बीच पुलिस ने अखिलेश सिंह के विरुद्ध गुरुग्राम के थाना सेक्टर-29 में भादंवि की धारा 307, 353, 436 और शस्त्र अधिनियम का मुकदमा दर्ज कर लिया था.

अखिलेश के दोनों पैरों में घुटनों के ऊपर गोलियां लगी थीं. इलाज के लिए उसे गुरुग्राम के जिला अस्पताल भिजवा दिया गया. उस के बाद पुलिस अधिकारियों ने संयुक्त प्रैसवार्ता कर मुठभेड़ की पूरी कहानी विस्तार से बताई.

बिजनैस से कैरियर की शुरुआत की अखिलेश ने

अखिलेश सिंह मामूली हैसियत वाला आदमी नहीं था. वह सेवानिवृत्त सबइंसपेक्टर और आजसू पार्टी (औल झारखंड स्टूडेंट्स यूनियन पार्टी) के नेता चंद्रगुप्त सिंह का बेटा था. अखिलेश ने ट्रांसपोर्ट का धंधा शुरू किया था, लेकिन वह ऐसी बुरी संगत में पड़ गया कि एक मामूली ट्रांसपोर्टर से झारखंड राज्य का 5 लाख का सब से बड़ा मोस्टवांटेड डौन बन गया, जिस की एक बोली पर बड़ेबड़े व्यापारियों की तिजोरियां खुल जाती थीं.

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अखिलेश सिंह मूलत: जमशेदपुर जिले के थाना बिष्टुपुर क्षेत्र के बिष्टुपुर इलाके का रहने वाला था. वह चंद्रगुप्त सिंह का बड़ा बेटा था. उन का दूसरा बेटा अमलेश सिंह है.

चंद्रगुप्त सिंह ने पुलिस में सिपाही के पद से नौकरी शुरू की थी. अपनी ईमानदारी, लगन और मेहनत से वह सबंइसपेक्टर के ओहदे तक पहुंचे. अतिमहत्त्वाकांक्षी और तेजदिमाग का अखिलेश सिंह पढ़लिख कर पिता की तरह काबिल अफसर बनना चाहता था. इस के लिए उस ने पोस्टग्रैजुएशन भी किया. लेकिन वह पिता जैसे मुकाम को छू तक नहीं पाया.

व्यवसाय के रूप में अखिलेश सिंह ने पार्टनरशिप में ट्रांसपोर्ट का काम शुरू किया था. उस ने और अशोक शर्मा ने गुलशन रोडलाइंस की शुरुआत की थी. अखिलेश और अशोक का यह व्यवसाय चल निकला. वैसे भी अशोक शर्मा इस धंधे का पुराना मास्टर था. उस का ट्रांसपोर्ट का धंधा सालों से मजे में चल रहा था. अखिलेश के आने से उस का काम और भी अच्छा चलने लगा था.

अशोक ने अखिलेश को इसलिए पार्टनर बनाया था, क्योंकि वह एक ताकतवर आदमी का बेटा था. उस के पिता चंद्रग्रप्त सिंह की पुलिस और सत्ता के गलियारों में अच्छी पहुंच थी. कोई परेशानी आने पर वह काम आ सकता था. वैसे भी अखिलेश व्यवसाय के प्रति काफी ईमानदार था.

ट्रांसपोर्ट की कमाई से अशोक शर्मा ने करोड़ों की प्रौपर्टी अर्जित की थी. उस के खास दोस्तों में एक था हरीश अरोड़ा. वह उस से अपने दिल की हर बात शेयर करता था. हरीश को उस की यही बात सब से अच्छी लगती थी.

हरीश जानता था कि अशोक के पास किसी चीज की कमी नहीं है. अगर किसी चीज की कमी थी तो वह थी बीवीबच्चों की. हरीश ने सन 1997 में अपनी परिचित मधु शर्मा उर्फ पिंकी नाम की युवती के साथ उस की शादी करा दी. इस के बाद अशोक हरीश को पहले से ज्यादा मानने लगा.

शादी के करीब 1 साल बाद की बात है. उस दिन तारीख थी 18 सितंबर, 1998 और समय दिन. अशोक शर्मा किसी काम से घर से बाहर जा रहे थे. बिष्टुपुर थानाक्षेत्र में हिलव्यू रोड स्थित सेक्रेड हार्ट कौन्वेंट स्कूल के पास कुछ अज्ञात बंदूकधारियों ने दिनदहाड़े गोली मार कर उन की हत्या कर दी.

अपराध की राह खुद उतर आई अखिलेश की जिंदगी में

ट्रांसपोर्टर अशोक शर्मा की हत्या से जमशेदपुर में सनसनी फैल गई. व्यवसाई एकजुट हो कर पुलिस के खिलाफ नारेबाजी करते हुए आंदोलन के लिए सड़कों पर उतर आए. वैसे भी दिन पर दिन जिले की कानूनव्यवस्था बिगड़ती जा रही थी और अपराधियों के हौसले बुलंद थे. हरीश अरोड़ा ने थाना बिष्टुपुर में अशोक के व्यावसायिक पार्टनर अखिलेश सिंह के साथ 3 अन्य लोगों बालाजी बालकृष्णन, विक्रम शर्मा और विजय कुमार सिंह उर्फ मंटू के खिलाफ हत्या की रिपोर्ट दर्ज करा दी.

अशोक शर्मा हत्याकांड में नामजद होते ही अखिलेश सिंह जमशेदपुर छोड़ कर फरार हो गया. विक्रम शर्मा और विजय कुमार गिरफ्तार कर लिए गए. अखिलेश सिंह के खिलाफ पहली बार हत्या जैसे संगीन मामले में मुकदमा दर्ज हुआ. इस के बाद वह चर्चाओं में आ गया.

3 साल तक बिष्टुपुर पुलिस हत्या के कारणों की जांच करती रही, लेकिन उसे कुछ हासिल नहीं हुआ. इस घटना की जांच सबइंसपेक्टर विश्वेश्वरनाथ पांडेय कर रहे थे. जांच के दौरान पता चला कि अशोक शर्मा को शूटर रवि चौरसिया ने गोली मार कर हत्या की थी. पुलिस ने रवि चौरसिया को गिरफ्तार कर के जेल भेज दिया. 28 जनवरी, 2000 को रवि चौरसिया के खिलाफ आरोपपत्र तैयार कर के न्यायालय को सौंप दिया गया.

बिष्टुपुर पुलिस द्वारा मामले की लीपापोती के बाद सन 2001 में अशोक हत्याकांड की जांच सीआईडी को सौंप दी गई. सीआईडी इंसपेक्टर कन्हैया उपाध्याय ने अशोक हत्याकांड का परदाफाश कर दिया. जांच में घटना का असल सूत्रधार हरीश अरोड़ा ही निकला. उसी ने दोस्त की संपत्ति हथियाने और उस की पत्नी को पाने के लिए यह दांव खेला था.

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घटना का खुलासा उस समय हुआ, जब सन 2001 में जमशेदपुर के एक बड़े मोबाइल व्यापारी ओमप्रकाश काबरा का अपहरण कर लिया गया. काबरा के अपहरण में एक बार फिर अखिलेश सिंह का नाम उछला तो पुलिस की पेशानी पर बल पड़ गए. अब तक अखिलेश सिंह गैंगस्टर बन चुका था.

खैर, पुलिस ने ओमप्रकाश काबरा अपहरण की जांच शुरू की तो ट्रांसपोर्टर अशोक शर्मा हत्याकांड में एक चौंकाने वाले राज का खुलासा हुआ. इस मामले की जांच करते हुए पुलिस को पता चला कि अशोक शर्मा की हत्या की साजिश हरीश अरोड़ा ने रची थी.

यह लालच, विश्वासघात और प्रेम का मामला था. दरअसल, पुलिस जांच में पता चला कि मधु शर्मा उर्फ पिंकी और हरीश अरोड़ा आपस में एकदूसरे से प्रेम करते थे. हरीश अरोड़ा ट्रांसपोर्टर अशोक शर्मा का जिगरी यार था. करोड़पति अशोक शर्मा की शादी नहीं हुई थी.

हरीश अरोड़ा की नीयत अपने दोस्त अशोक की संपत्ति पर थी. वह एक झटके में उस की संपत्ति हासिल कर लेना चाहता था. इस के लिए उस ने एक बड़ी साजिश रची.

जानें आगे क्या हुआ अगले भाग में…

पकड़ा गया 5 लाख का इनामी डौन : भाग 3

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(कहानी सौजन्य-मनोहर कहानियां)

लेकिन अखिलेश सिंह ने बीच में आ कर आशीष डे को हट जाने को कहा. आशीष डे ने अखिलेश की बात नहीं मानी तो उस ने उन्हें जान से मारने की धमकी दी. इस के बाद भी आशीष डे ने अखिलेश की बात नहीं सुनी. मामला दोनों के बीच अहं पर आ टिका.

2 नवंबर, 2007 की सुबह साढ़े 9 बजे आशीष डे अपने चेनार रोड स्थित घर से साकची बाजार स्थित दुकान पर जा रहे थे. बाजार में गाड़ी पार्किंग की समस्या थी. इस वजह से वह पैदल ही जा रहे थे. इस का फायदा उठाते हुए अखिलेश सिंह ने अपने शूटरों के साथ मिल कर बीच चौराहे पर एके 47 से आशीष डे को भून डाला और हवा में असलहे लहराता हुआ फरार हो गया. जबकि आशीष डे का अखिलेश के पिता चंद्रगुप्त सिंह से पारिवारिक रिश्ता था.

दोनों परिवारों का एकदूसरे के घर आनाजाना था, फिर भी 2 गज जमीन के लिए अखिलेश ने आशीष डे की जान लेने से तनिक भी संकोच नहीं किया. हत्या करने के बाद उस ने राज्य के एक पुलिस अफसर के घर पनाह ली. उस की तलाश में पुलिस यहांवहां मारी फिर रही थी, लेकिन उसे पकड़ना तो दूर, पुलिस उस की परछाईं तक नहीं छू पाई थी.

मार्च, 2008 में पूर्व न्यायाधीश आर.पी. रवि के घर पर फायरिंग, टाटा स्टील के सुरक्षा अधिकारी जयराम सिंह की हत्या, प्रतिद्वंदी परमजीत सिंह के घर पर फायरिंग वगैरह में अखिलेश शामिल था. पकड़े जाने के डर से वह फरार था. अखिलेश सिंह को 31 दिसंबर, 2011 को उत्तर प्रदेश के विशेष कार्यबल और झारखंड पुलिस ने नोएडा के एक मौल से गिरफ्तार किया. सन 2014 में जेल के भीतर अफवाह उड़ी कि वह राजनीति में शामिल हो रहा है. यह अफवाह उस के सहयोगियों ने उड़ाई थी. इस के बाद पुलिस ने उसे साकची जेल से दुमका जेल में ट्रांसफर कर दिया.

मई, 2015 में जेलर उमाशंकर पांडेय के हत्यारे अखिलेश को दोषी ठहराया गया था और उसे आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई. हालांकि 4 सितंबर, 2015 को उसे जमानत मिल गई.

जबकि उस पर क्राइम कंट्रोल एक्ट (सीसीए) के तहत अपराध दर्ज किया गया था, जिस के तहत एक साल के लिए कोई जमानत याचिका पर विचार नहीं किया जा सकता था. लेकिन उस ने अपनी ऊपर तक की पहुंच के बल पर झारखंड हाईकोर्ट से स्टे ले लिया और स्टे के आधार पर उच्च न्यायालय से जमानत ले ली. जमानत मिलने के बाद एक बार फिर वह जेल से बाहर आ गया.

जमानत पर बाहर आने के बाद अखिलेश करीब 15 महीने तक खामोश रहा. 30 नवंबर, 2016 को जमशेदपुर न्यायालय के भीतर उस के गुर्गों ने रीयल एस्टेट कारोबारी और झारखंड मुक्ति मोर्चा के नेता उपेंद्र सिंह को एके 47 से भून कर राज्य भर में सनसनी फैला दी.

झारखंड मुक्ति मोर्चा नेता उपेंद्र सिंह कोई दूध का धुला नहीं था. वह हत्या, हत्या के प्रयास और अपहरण जैसे कई संगीन मामलों का आरोपी था. 30 नवंबर, 2016 को दिन के डेढ़ बजे नेता उपेंद्र सिंह एक मुकदमे में अगली तारीख लेने जमशेदपुर न्यायालय आया था.

1 अगस्त, 2015 को बिजनैस पार्टनर और ठेकेदार रामशकल यादव की सुबह मौर्निंग वाक करते समय मोटरसाइकिल सवार कुछ अज्ञात हमलावरों ने एके47 से हत्या कर दी थी.

उपेंद्र सिंह के मर्डर ने फैलाई सनसनी

इस हत्याकांड में नेता उपेंद्र सिंह का नाम उछला था. यही नहीं दोनों के बीच खिंची दुश्मनी की रेखा भी किसी से छिपी नहीं थी. उपेंद्र सिंह और विकी टापरिया ने पटना के हार्डकोर गैंगस्टर मनोज सिंह के साथ मिल कर रामशकल यादव की हत्या की 75 लाख रुपए में डील की थी.

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जिस में से 25 लाख बतौर पेशगी मनोज सिंह को एडवांस में दिए गए थे और बाकी के 50 लाख रुपए काम हो जाने के बाद देना तय हुआ था. कारोबारी रामशकल यादव की हत्या के मामले में उपेंद्र सिंह को आरोपी बनाया गया था. उसी सिलसिले में उपेंद्र सिंह अदालत में हाजिर हो कर मुकदमे की अगली तारीख लेने आया था.

पुलिस के अनुसार, विनोद सिंह अखिलेश सिंह का सब से निकटतम सहयोगी था. विनोद सिंह को 1 दिसंबर, 2016 को तड़के 3 बजे पुलिस ने उस के घर से उठाया. पहले उसे मानगो थाना में रखा गया. उस के बाद उस से साकची थाने में पूछताछ की गई. साथ ही शहर के विभिन्न इलाकों से अनिल सिंह, विजय यादव, मनोज सिंह, एक महिला सहित 15 लोगों को उठाया गया.

इन में अनिल सिंह और मनोज सिंह, उपेंद्र सिंह पर गोली चलाने वाले विनोद सिंह उर्फ मोगली के भाई थे. विनोद सिंह ने पूछताछ में पुलिस को बताया था कि हत्या अखिलेश सिंह के कहने पर की गई थी. उपेंद्र की हत्या रंगदारी न देने की वजह से की गई थी. इस के 6 दिनों बाद 6 दिसंबर, 2016 को रंगदारी न देने पर उपेंद्र सिंह के करीबी अमित राय की गोली मार कर हत्या कर दी गई.

एक के बाद एक ताबड़तोड़ 2 हत्याओं से जमशेदपुर हिल उठा. दोनों हत्याओं में पुलिस को अखिलेश सिंह के शामिल होने के पर्याप्त सबूत भी मिल गए. पुलिस अखिलेश की तलाश में लग गई. लेकिन उसे पकड़ना तो दूर की बात, उस का पता तक नहीं चल रहा था. अखिलेश पर दबाव बनाने के लिए उस के घर की कुर्की और जब्ती हुई, पुलिस ने उस के घर में सीसीटीवी कैमरा, बंदूक, कारतूस, पलंग, फ्रिज, टीवी, एसी से ले कर अलमारी, एक्वेरियम, शोकेस, गैस चूल्हा, गद्दा, अटैची, पाजामाकुरता, चौकीबेलन, डिब्बा, कटोरी और चम्मच तक कुछ नहीं छोड़ा.

सिदगोड़ा के क्वार्टर नंबर 28 से सारे सामान को उठा कर गोलमुरी थाने में रख दिया गया. चंद्रगुप्त सिंह के 2 लाइसेंसी हथियार और 12 बोर के कारतूसों का डिब्बा भी पुलिस ले गई.

यहां यह बताना जरूरी होगा कि जिस फ्लैट में कुर्कीजब्ती की गई, वहां अखिलेश के पिता चंद्रगुप्त सिंह रहते थे, जबकि अखिलेश सिंह बारीडीह के सृष्टि अपार्टमेंट के एक फ्लैट में रहता था. केस में चूंकि अखिलेश का आवासीय पता उसी क्वार्टर था, इसलिए वहीं काररवाई हुई.

पूरे मामले को देखते हुए झारखंड के मुख्यमंत्री रघुबर दास ने प्रदेश के पुलिस प्रमुख डी. कश्मीर पांडेय को निर्देश दिया कि वह प्रदेश भर में अदालतों और उस के आसपास सुरक्षा का व्यापक प्रबंध करें. एसएसपी अनूप टी. मैथ्यू ने हत्या के मामले में लिप्त लोगों को गिरफ्तार करने के लिए 8 टीमों का गठन किया. इन का काम अखिलेश सिंह से जुड़े लोगों का लिंक तलाशना था. एक टीम को शहर से बाहर भी भेजा गया.

अखिलेश सिंह तो पुलिस के हाथ नहीं लगा, लेकिन पुलिस को एक बड़ी कामयाबी हासिल हुई. 4 अप्रैल, 2017 को पुलिस को उत्तराखंड के देहरादून में अखिलेश सिंह के आपराधिक गुरु विक्रम शर्मा के छिपे होने की सूचना मिली.

देहरादून पुलिस की मदद से जमशेदपुर पुलिस ने विक्रम शर्मा को गिरफ्तार कर लिया और जमशेदपुर ले आई. वह सन 2006 से फरार चल रहा था. विक्रम शर्मा के गिरफ्तार होने के 6 महीने बाद 2 सितंबर, 2017 को जमशेदपुर पुलिस और उड़ीसा पुलिस ने संयुक्त रूप से मिल कर अखिलेश सिंह के भाई अमलेश सिंह को उड़ीसा के भुवनेश्वर एयरपोर्ट से गिरफ्तार किया. अखिलेश के साथ उस का नाम भी 20 वारदातों में दर्ज था.

गिरफ्तारी के बाद अमलेश सिंह को 8 सितंबर को जमशेदपुर न्यायालय में पेश किया गया. जमशेदपुर पुलिस ने न्यायालय से 5 दिनों का रिमांड मांगा, लेकिन न्यायालय ने 3 दिनों का रिमांड दिया. कुछ मामलों में पूछताछ के बाद उसे जेल भेज दिया गया.

दो राज्यों की पुलिस परेशान थी अखिलेश के लिए

अखिलेश सिंह को काबू करने के लिए एसएसपी अनूप टी. मैथ्यू ने विक्रम शर्मा पर दांव खेला. विक्रम से पुलिस को अखिलेश का नंबर मिल गया. पुलिस ने उस के नंबर को सर्विलांस पर लगा दिया. सर्विलांस के जरिए जमशेदपुर पुलिस को उस की लोकेशन राजस्थान की मिली. पुलिस जब तक राजस्थान जाने की तैयारी करती, तब तक उस ने अपना ठिकाना बदल दिया. दोबारा उस की लोकेशन हरियाणा के गुरुग्राम में मिली. इस के बाद क्या हुआ, ऊपर बताया जा चुका है.

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गुरुग्राम से डौन अखिलेश सिंह को गिरफ्तार करने के पहले 31 मार्च, 2017 को पुलिस ने गुप्त सूचना के आधार पर बिरसानगर थाना इलाके में स्थित अखिलेश सिंह के सृष्टि अपार्टमेंट के फ्लैट नंबर 508 में छापेमारी की थी. इस दौरान फ्लैट के अंदर से एक बैग बरामद किया गया, जिस में बहुत सारे दस्तावेज मिले थे.

इस में चलअचल संपत्ति के दस्तावेज भी थे, जिस में सेल डीड, एग्रीमेंट की मूल कौपी, आधार कार्ड, पैन कार्ड, वोटर कार्ड, ड्राइविंग लाइसेंस सहित बैंक पासबुक और अन्य दस्तावेज शामिल थे. दस्तावेजों की जांच करने पर पाया गया कि इन में नाम किसी और का था और फोटो अखिलेश सिंह का था. अधिकतर दस्तावेजों में उस का फर्जी नाम संजय सिंह, अजीत सिंह पुत्र हरिद्वार सिंह, दिलीप सिंह पुत्र रमेश सिंह लिखा था और गरिमा सिंह के नाम की जगह अन्नू सिंह लिखा हुआ था.

झारखंड का अब तक का सब से बड़ा 5 लाख का इनामी डौन अखिलेश सिंह जमशेदपुर की घाघीडीह जेल में बंद था. बाद में उसे दुमका जेल भेज दिया गया. डौन के जेल में आने के बाद उस की सेवा करने के लिए उस के कई गुर्गे अपनी जमानत रद्द करा कर जेल चले गए थे.

घाघीडीह जेल में बंद अखिलेश सिंह के लिए 23 अपराधी रंगदारी वसूलने और व्यापारियों की गतिविधियों की सूचना देने का काम कर रहे हैं. इस संबंध में स्पैशल ब्रांच के एडीजी ने 10 नवंबर को अपनी रिपोर्ट डीजीपी को भेजी है. रिपोर्ट में कहा गया है कि अखिलेश गुट और जेल के गांधी वार्ड में बंद अपराधियों के बीच कभी भी खूनी संघर्ष हो सकता है.

अखिलेश सिंह के साथसाथ आशीष श्रीवास्तव उर्फ भूरिया और नीरज सिंह पर कड़ी निगरानी रखने की भी बात कही गई है. बताया गया है कि 10 नवंबर को अखिलेश गुट के आशीष और परमजीत गुट के झब्बू के बीच मारपीट हुई थी. इस के बाद उसे सेल में डाला गया. पत्र में यह भी लिखा गया है कि जेल में बंद नीरज सिंह अखिलेश सिंह के लिए जासूसी का काम कर रहा है. अखिलेश सिंह पर दर्ज कुल 52 मुकदमों में से वह 36 मुकदमों में वांछित रहा था, बाकी के 16 मुकदमों में वह बरी किया जा चुका था.????

 – कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

पकड़ा गया 5 लाख का इनामी डौन : भाग 2

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(कहानी सौजन्य-मनोहर कहानियां)

इस साजिश में उस ने पिंकी उर्फ मधु शर्मा को भी शामिल कर लिया. हरीश अरोड़ा ने मधु को मजबूर किया कि वह उस से शादी कर ले. यह शादी सिर्फ दिखावे के लिए होगी, क्योंकि शादी के कुछ दिनों बाद उसे रास्ते से हटा दिया जाएगा. इस के बाद उस की पूरी संपत्ति उन की हो जाएगी और जीवन भर दोनों पतिपत्नी की तरह एक साथ रहेंगे.

हालांकि मधु इस के लिए आसानी से राजी नहीं हुई थी. पर वह हरीश के दबाव में आ कर अपने प्यार की खातिर तैयार हो गई थी. योजना के मुताबिक, सन 1997 में मधु शर्मा उर्फ पिंकी की शादी ट्रांसपोर्टर अशोक शर्मा से हो गई. मधु अशोक की पत्नी बन तो गई, लेकिन उस की रगरग में हरीश अरोड़ा का प्यार दौड़ रहा था. पत्नीधर्म निभाते हुए मधु ने अशोक को शरीर तो सौंप दिया था, लेकिन उस की आत्मा हरीश में ही बसी थी. मधु हरीश को अपना वादा बारबार याद दिलाती रहती थी.

दोस्त ही बन गया जान का दुश्मन

हरीश अरोड़ा को अपना वादा अच्छी तरह याद था. रास्ते के कांटे अशोक शर्मा को हटाने के लिए वह ऐसी योजना बनाना चाहता था कि पुलिस को उस पर कभी शक न हो और पुलिस इसे व्यावसायिक प्रतिद्वंदिता में की गई हत्या मान कर उस के कारोबारी प्रतिद्वंदियों को गिरफ्तार कर ले.

हरीश अरोड़ा ने भाड़े के 2 शूटरों परमजीत सिंह और रणजीत चौधरी को अशोक शर्मा की हत्या की सुपारी दे कर उस की हत्या करा दी. यह सब कुछ इस तरह किया गया कि पुलिस का पूरा शक उस के व्यावसायिक साथियों अखिलेश सिंह, विक्रम सिंह, विजय कुमार सिंह उर्फ मंटू और बालाजी बालकृष्णन पर गया.

हुआ वही जो हरीश अरोड़ा चाहता था. इस के बाद हरीश अरोड़ा अशोक शर्मा की पत्नी और संपत्ति पर कब्जा करने में लग गया. लेकिन वह अपने मंसूबों में कामयाब नहीं हो पाया. अशोक की मां, बहन और भाई को हरीश अरोड़ा और पिंकी पर शक हो गया था कि दोनों के बीच कोई खिचड़ी पक रही है. उन्होंने मजिस्ट्रैट के सामने कुछ ऐसा बयान दिया कि दोनों शक के दायरे में आ गए.

फलस्वरूप केस की जांच थाने से ले कर सीआईडी को सौंप दी गई. अपनी जांच में सीआईडी ने अशोक शर्मा हत्याकांड का राजफाश कर दिया. उधर घटना का परदाफाश होने से पहले पुलिस अखिलेश सिंह को गिरफ्तार करने के लिए दिनरात उस के ठिकानों पर दबिश दे रही थी. बाद में पिता के दबाव में आ कर उस ने अदालत में आत्मसमर्पण कर दिया था.

बहरहाल, 27 जून 2005 को अनिल कुमार आर्य के फास्टट्रैक कोर्ट (5) ने हरीश अरोड़ा को ट्रांसपोर्टर, पारिवारिक मित्र अशोक शर्मा की हत्या के लिए दोषी ठहराया. उसे आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई. जबकि पिंकी शर्मा उच्च न्यायालय झारखंड से जमानत ले कर फरार हो गई थी. उसे हरीश अरोड़ा के साथ मिल कर आपराधिक षडयंत्र रचने के लिए दोषी पाया गया था.

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अदालत ने अशोक शर्मा हत्याकांड के चारों आरोपियों अखिलेश सिंह, विक्रम शर्मा, विजय कुमार सिंह उर्फ मंटू और बालाजी बालकृष्णन को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया. भाड़े के 2 शूटर परमजीत सिंह और रंजीत चौधरी गिरफ्तार कर लिए गए थे. उन से हत्या में इस्तेमाल हथियार भी बरामद कर लिए गए थे.

शूटरों से बरामद हथियार जांच के लिए कोलकाता प्रयोगशाला भेजे गए. रिपोर्ट से पता चला कि उन से जो हथियार बरामद किए थे, गोली उन्हीं से चली थी. फलस्वरूप रंजीत और परमजीत दोनों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई.

अशोक शर्मा हत्याकांड से बेदाग निकलने के बाद भी अखिलेश सिंह का बुरे वक्त ने पीछा नहीं छोड़ा. मोबाइल कारोबारी ओमप्रकाश काबरा अपहरण में नाम आने के बाद अखिलेश सिंह एक बार फिर चर्चाओं में आ गया. पुलिस उसे गिरफ्तार करने के लिए यहांवहां ढूंढ रही थी.

कभीकभी अपराध खुद भी मजबूर कर देता है गलत राह पर जाने को

28 जुलाई, 2001 को किए गए बिजनैसमैन ओमप्रकाश काबरा के अपहरण के मामले में अखिलेश सिंह ज्यादा दिनों तक पुलिस की पकड़ से नहीं बच पाया. पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया. इस केस में अखिलेश सिंह के अलावा 5 और आरोपी विजय सिंह मंटू, संतोष तिवारी, रमन सिंह, लालचंद सिंह और अरविंद सिंह नामजद किए गए थे. यह मुकदमा थाना साकची में दर्ज था. गिरफ्तारी के बाद अखिलेश को दूसरी बार जमशेदपुर की घाघीडीह जेल जाना पड़ा.

किसी बात को ले कर अखिलेश सिंह जेलर उमाशंकर पांडेय को अपना दुश्मन मानने लगा था. कुछ दिन जेल में रहने के बाद वह जेल से फरार हो गया और 15 दिन बाद 12 फरवरी, 2002 को जेल कैंपस स्थित जेलर उमाशंकर के घर जा कर उन की गोली मार कर हत्या कर दी और फरार हो गया.

जेलर पांडेय मर्डर केस में न्यायाधीश आर.पी. रवि ने अखिलेश सिंह को उम्रकैद की सजा सुनाई. सजा सुनने के बाद अखिलेश ने 19 मार्च, 2008 को न्यायाधीश आर.पी. रवि के घर में घुस कर उन पर ताबड़तोड़ फायरिंग की. अखिलेश सिंह जज रवि के फैसले से नाराज था. हालांकि बाद में उसे काबरा अपहरण केस से दोषमुक्त कर दिया गया था.

खैर, हमले में जज आर.पी. रवि बालबाल बच गए थे. इस घटना के बाद जमशेदपुर में अखिलेश सिंह को आतंक का पर्याय माना जाने लगा. जुर्म किए बिना अपराध की सजा पाने के बाद अखिलेश ने जुर्म को ही सब कुछ मान लिया. विक्रम शर्मा अंडरवर्ल्ड डौन के रूप में कुख्यात था. अखिलेश सिंह ने विक्रम की अंगुली पकड़ कर अपराध की दुनिया में पांव रखा और उसे अपना गुरु बना लिया.

विक्रम शर्मा ने उसे जुर्म का ककहरा सिखाया. धीरेधीरे अखिलेश सिंह जुर्म की आग में तप कर कुख्यात बन गया. वह एक के बाद एक जुर्म कर के अपराधों की फेहरिस्त में अपना नाम लिखाता गया. जमशेदपुर की पुलिस, सफेदपोश और व्यापारी उस के नाम से खौफ खाने लगे. जान की सलामती के लिए पुलिस के बड़ेबड़े अधिकारी और सफेदपोश अखिलेश सिंह को संरक्षण देने लगे.

वह शान से नेताओं की कार में घूमता था. किसी की मजाल नहीं थी कि उसे कोई रोके या उस से कोई सवाल पूछे. जो भी उस के रास्ते में रोड़ा बनने की कोशिश करता था, फिल्मी खलनायकों की तरह वह बेदर्दी से गोली मार कर उस की हत्या कर देता था. जमशेदपुर पुलिस के लिए जब वह सिरदर्द बन गया तो उस ने अपना एक गिरोह बना लिया और ठिकाना बनाया राजधानी रांची को.

राजधानी रांची में उस ने गैंग की कमान अपने दाहिने हाथ कहे जाने वाले नंदन यादव को सौंपी. आज भी नंदन यादव अखिलेश सिंह के आपराधिक साम्राज्य की कमान संभालता है. उस के सहारे वह आपराधिक घटनाओं को अंजाम देता है.

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नंदन यादव का नाम रांची में उस समय उछला, जब लोहारदगा के बाक्साइड कारोबारी ज्ञानचंद अग्रवाल को रातू रोड के गैलेक्सी मोड़ पर गोली मारी गई. इस मामले का मुख्य साजिशकर्ता नंदन यादव ही था. व्यवसाई अरविंद भाई पटेल ने नंदन यादव को ज्ञानचंद अग्रवाल के नाम की सुपारी दी थी. मामला 25 लाख में तय हुआ था और बतौर पेशगी 9 लाख रुपए दिए गए थे, बाकी पैसा काम हो जाने के बाद देना तय हुआ था.

बाद में नंदन यादव गिरफ्तार कर लिया गया और उसे जेल भेज दिया गया. जमानत पर रिहा होने के बाद उस ने अखिलेश सिंह का कारोबार संभाल लिया. सुपारी के रुपए अखिलेश के फरजी नामों वाले बैंक एकाउंट में जमा हो जाते थे.

बाद में ओमप्रकाश काबरा के अपहरण के मामले में जेल जाने की वजह से अखिलेश ने अपने सब से भरोसेमंद शूटर रंजीत चौधरी के साथ अपने खिलाफ गवाही देने वाले काबरा को उस के साकची स्थित कार्यालय पहुंच कर दिनदहाड़े गोली मार कर हत्या कर दी थी.

मैच के दिन लगा दिया हत्या का दांव, क्योंकि पुलिस वीआईपी मेहमानों की सेवा में थी

यह हत्या दिन में उस समय की गई थी, जब जमशेदपुर के कीनन स्टेडियम में भारत इंग्लैंड के बीच एकदिवसीय मैच हो रहा था. मैच के चलते तत्कालीन मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी और कई अंतरराष्ट्रीय मेहमान शहर में मौजूद थे, जिस की वजह से पुलिस महकमा कीनन स्टेडियम की सुरक्षा में तैनात था. पुलिस सुरक्षा को धता बताते हुए अखिलेश ने इस घटना को अपने गुर्गों के साथ अंजाम दिया था.

व्यवसाई ओमप्रकाश काबरा की हत्या से बौखलाए कुख्यात परमजीत सिंह ने अखिलेश सिंह को हत्या की चुनौती दे दी. अखिलेश सिंह और परमजीत सिंह के बीच 36 का आंकड़ा था. दोनों एकदूसरे के जानी दुश्मन थे. परमजीत सिंह को अखिलेश के वर्चस्व को चुनौती देना महंगा पड़ा और दोनों के बीच गैंगवार छिड़ गई.

इस गैंगवार में अखिलेश और परमजीत दोनों के कई शूटर मारे गए. अखिलेश और परमजीत की गिरफ्तारी के बाद दोनों को घाघीडीह जेल में रखा गया. तब अखिलेश ने जेल में ही परमजीत सिंह की हत्या करवा दी. परमजीत की हत्या के लिए अखिलेश ने अपने भरोसेमंद गुर्गे कपाली को जेल में ही पिस्टल उपलब्ध करवा दी थी.

अब तक अखिलेश सिंह गैंगस्टर से डौन बन चुका था. झारखंड में उस के नाम का सिक्का चलने लगा था. उस के एक फोन से झारखंड के बड़ेबड़े व्यापारियों की तिजोरियां खुल जाती थीं. वे उसे मुंहमांगी रकम देने को तैयार रहते थे. पाप की कमाई से अखिलेश सिंह ने कई राज्यों में रीयल एस्टेट के धंधे में करोड़ों रुपए निवेश किए थे.

अपराध जगत में कदम रखने के बाद उस ने 500 करोड़ की अकूत संपत्ति अर्जित की थी. अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा उस ने ट्रांसपोर्ट, रीयल एस्टेट समेत अन्य कई बिजनैस में लगाया था. टाटा समेत कोल्हान की कई कंपनियों में भी उस का काम चलता था. झारखंड, बिहार, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, दिल्ली, राजस्थान और हरियाणा में भी उस ने निवेश किया. सन 2007 में अखिलेश सिंह का अपना कानून चलता था. वह जहां खड़ा हो जाता था, अदालत वहीं लग जाती थी. उस के जबान से जो फरमान जारी हो जाता, कानून बन जाता था.

2 गज जमीन बनी श्रीलेदर के मालिक आशीष डे की हत्या का कारण

उन दिनों झारखंड के बड़े व्यवसायियों में एक श्रीलेदर के मालिक आशीष डे का नाम शुमार था. आशीष लेदर के जूतों के बड़े कारोबारी थे. आशीष डे का मकान जमशेदपुर के साकची स्थित आमबागान के बगल में था. उन के घर के पास 2 गज जमीन खाली थी, जोकि एक बंगाली परिवार की थी. वह परिवार आशीष डे को जमीन बेचना चाहता था और डे वह जमीन अपने एक परिचित बंगाली परिवार को दिलाने का प्रयास कर रहे थे.

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जानें आगे क्या हुआ अगले भाग में…

कर्तव्य : भाग 5

अवनि कुछ पूछने ही वाली थी कि दीपक के कराहने की आवाज आई और उस के हाथों की उंगलियां हिलने लगीं. नर्स भागते हुए डाक्टर को बुलाने गई और अवनि ने दीपक का हाथ पकड़ लिया. डाक्टर आए, उन्होंने अवनि और नीरज को बाहर जाने को कहा और दीपक को चैक करने लगे. थोड़ी देर बाद नर्स बाहर आई और बोली, ‘‘आप लोग अंदर आ सकते हैं.’’ अंदर आ कर देखा तो दीपक की आंखें खुली थीं और वह सब को देख रहा था. उस ने अवनि को देख कर हाथ उठाने की कोशिश की पर वह फिर धीरे से हाथ नीचे करता हुआ फिर बेहोश हो गया.

डाक्टर सब को बाहर लाए और बोले, ‘‘अब दीपक जल्दी ठीक हो जाएगा, सुबह तक उसे पूरी तरह होश आ जाएगा.’’ अवनि और नीरज फिर होटल आ गए.

सुबह 8 बजे दोनों अस्पताल पहुंचे. अंदर जाने से पहले नीरज ने अवनि से कहा, ‘‘देखो, दीपक को होश आने के बाद उस से ज्यादा बात नहीं करना और न ही पूछताछ, गुस्सा तो बिलकुल नहीं. उस के पूरी तरह ठीक होने के बाद फिर तुम जानो और वो, मैं फिर बीच में नहीं बोलूंगा.’’

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अवनि ने ‘‘हां’’ कहा और दोनों मुसकराते हुए रूम में गए तो देखा दीपक को होश आ चुका था. नर्स ने कहा, ‘‘ये अभी बोलने की स्थिति में नहीं हैं और डाक्टर भी चैक कर के जा चुके हैं.’’ अवनि वहीं बैठ गई. उस ने नर्स को देखा, वह खुश थी, उस के चेहरे पर थकान का नामोनिशान नहीं था.

अवनि ने नर्स से कहा, ‘‘अब तो आप घर जा सकती हो, अब तो इन्हें होश भी आ गया.’’ अवनि ने ‘इन्हें’ शब्द पर जोर दे कर कहा तो नर्स भी मुसकरा कर बोली, ‘‘हां, बस, आप एक घंटे बाद इन्हें ये 2 गोलियां और फिर एक घंटे बाद यह सीरप दे दीजिएगा और प्लीज, इन से ज्यादा बात नहीं करना. इन्हें तकलीफ होगी. गोली और सीरप लेने के बाद इन्हें नींद आ जाएगी. तब तक मैं भी जाऊंगी,’’ कहती हुई नर्स चली गई.

अवनि दीपक को देखने लगी. दीपक कुछ कहना चाह रहा था, उस के होंठ हिले तो अवनि ने उसे इशारे से चुप रहने को कहा. समय पर अवनि ने उसे दवा दी और फिर वह सो गया. शाम होने से पहले नर्स भी आ गई. उस ने आते ही दीपक को चैक किया, फिर रिपोर्ट लिखी. डाक्टर ने भी चैक किया. करीब 2 हफ्ते तक अवनि ने दीपक की खूब सेवा की और समय पर उसे दवाइयां व खाना देती रही. जल्दी ही दीपक थोड़ा ठीक हुआ और कुछकुछ बोलने की स्थिति में भी आ गया. अवनि और नीरज को उस ने अपनी इस स्थिति के बारे में अभी भी कुछ नहीं बताया और न ही अवनि ने कुछ पूछा. बस, साधारण बातें ही कीं.

रात को नीरज ने अवनि से कहा, ‘‘अब दीपक ठीक हो रहा है. कुछ दिनों में पूरी तरह ठीक हो जाएगा. अब हमें वापस घर चलना चाहिए. सुहानी के स्कूल से भी फोन आया था. उस के एग्जाम शुरू होने वाले हैं. एग्जाम के बाद हम फिर आ जाएंगे. बीचबीच में उस से फोन पर बात करते रहना.’’ अवनि का जाने का मन तो नहीं था पर बच्ची के एग्जाम के कारण उस ने हां कह दी. फिर अब दीपक भी अच्छा हो ही रहा था.

अगले दिन नीरज डाक्टर के पास गए. उन्हें अपने जाने के बारे में बता कर फिर कुछ रुपयों का चैक दिया और दीपक के रूम में गए. अवनि और नीरज ने दीपक से कहा, ‘‘अपना ध्यान रखना, बच्ची की परीक्षा नहीं होती तो हम नहीं जाते.’’ दीपक ने बच्ची को देखने की इच्छा जाहिर की तो बोले, ‘‘बाहर खेल रही है, उसे अंदर नहीं लाते और वैसे भी यहां छोटे बच्चों का आना मना है.’’ फिर दोनों ने दीपक से ‘अपना ध्यान रखना’ कहते हुए विदा ली और अवनि ने नर्स की ओर देख कर कहा, ‘‘इन का अच्छे से ध्यान रखोगी, यह हमें पूरा विश्वास है. इन्हें अकेला मत छोड़ना कभी.’’ नर्स ने शरमाते हुए हां में सिर हिला दिया.

करीब 20 दिन तक सुहानी के एग्जाम चले, फिर रिजल्ट के कुछ दिनों बाद उस की धमाचौकड़ी, फिर स्कूल रीओपन, उस की ड्रैस, किताबें आदि की खरीदारी, पढ़ाई, इस सब के कारण होने वाली थकान के बावजूद भी अवनि 2-3 दिन में दीपक से बात कर लेती थी. इस सब में वक्त कैसे गुजर गया, पता ही नहीं चला.

‘‘मम्मी, मम्मी उठो, कोई अंकलआंटी आए हैं, बाहर आप का इंतजार कर रहे हैं. उठो, उठो,’’ अवनि का हाथ जोरजोर से हिलाते हुए सुहानी ने उसे उठा दिया. ‘‘कौन आया है, क्यों चिल्ला रही हो… अच्छा जाओ, तुम खेलो. मैं देखती हूं,’’ कहती हुई वह बाहर आई तो उस के आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा. सामने खड़े हुए व्यक्ति को देखते ही हंसते हुए जोर से चिल्लाई, ‘‘दीपक, तुम यहां? कैसे हो? कब आए? बताया भी नहीं? फोन तो करते?’’ अपने वही पुराने अंदाज में सवालों की बौछार करते हुए उस की आंखों से आंसू निकल आए. फिर थोड़ा संभल कर बोली, ‘‘ये कौन है? अच्छा, ये तो…’’

‘‘दीपक की ज्योति है,’’ यह आवाज सुन कर वह चौंकी और दरवाजे की तरफ देखा तो वहां नीरज खड़े थे. उन्होंने कहा, ‘‘जी हां, यह है दीपक की ज्योति, वही… हौस्पिटल वाली नर्स. इन का चक्कर कई महीनों से चल रहा था, पर हमें कुछ बताया नहीं. इस शहर में आ गए, फिर भी खबर नहीं दी. वह तो मुझे बसस्टैंड पर टैक्सी में बैठते हुए दिख गए.’’

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‘‘फिर आप ने मुझे फोन क्यों नहीं किया,’’ अवनि ने पूछा.

‘‘इन्होंने मना कर दिया, पूछो इन से,’’ नीरज बोले, ‘‘अरे भाई, कुछ बोलते क्यों नहीं, चुप क्यों खड़े हो, बोलो.’’

‘‘क्या बोलूं, कैसे बोलूं, मुझे बोलने का मौका तो दो, तुम दोनों ही बोले जा रहे हो,’’ दीपक ने कहा तो दोनों ने हंसते हुए कहा, ‘‘सौरी, बैठो और बताओ.’’

‘‘मैं तुम दोनों को सरप्राइज देना चाहता था,’’ फिर अवनि की तरफ देख कर बोला, ‘‘मुझे अचानक सामने देख कर तुम्हारी खुशी और अपने प्रति प्यार को देखना चाहता था… और मैं ने देख भी लिया कि तुम मुझे कितना प्यार करती हो. मैं बहुत खुश हूं कि तुम मेरी दोस्त हो और नीरज भी,’’ दीपक ने कहा, ‘‘मुझे ज्योति और डाक्टर ने सब बता दिया. तुम लोगों ने मेरे लिए क्याक्या किया और कितनी परेशानी उठाई. मैं तुम लोगों का हमेशा एहसानमंद रहूंगा.’’

‘‘दोस्ती में एहसान शब्द नहीं होता. यह मेरा फर्ज था. तुम ने भी तो मेरे लिए क्याकुछ नहीं किया. यहां तक कि अपनी सेहत खराब होने के बाद भी मेरे साथ रहे. मेरी मदद की और खुद तकलीफ उठाई,’’ अवनि ने कहा.

इस तरह गिलेशिकवे, शिकायतगुस्सा, हंसीमजाक में रात हो गई. ‘‘क्या तुम दोनों ने शादी कर ली?’’ अवनि ने पूछा.

‘‘नहीं, तुम को बिना बताए और बिना बुलाए तो शादी होती ही नहीं,’’ दीपक ने कहा. अवनि ने ज्योति को छेड़ते हुए कहा, ‘‘क्यों ज्योति, ‘इन्हें’ बहुत प्यार करती हो न. इन से शादी करने का इरादा है?’’ ज्योति ने ‘हां’ में सिर हिलाया. अवनि ने फिर कहा,’’ इन्होंने तुम्हारे घर वालों की रजामंदी भी ली होगी.’’ इस बार ज्योति शरमाते हुए ‘हां’ बोल कर वहां से थोड़ा आगे चली गई.

‘‘ज्योति ने भी तुम्हारा खूब ध्यान रखा. बहुत सेवा की है उस ने तुम्हारी. कितने दिनों तक वहीं रही. घर भी नहीं जाती थी. बहुत अच्छी लड़की है. अब तो तुम दोनों की शादी बहुत धूमधाम से करेंगे,’’ अवनि ने कहा तो नीरज ने भी अवनि की बात से सहमति जताई.

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2 महीने बाद दीपकज्योति की शादी धूमधाम से हुई. दीपक ने अपना औफिस फिर से जौइन कर लिया और ज्योति ने भी शादी के कुछ दिनों बाद एक अस्पताल में नर्स की नौकरी कर ली. सब का मिलनाजुलना बदस्तूर जारी था और सब जिंदगी आराम से जी रहे थे.

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