जीने की राह- भाग 1: उदास और हताश सोनू के जीवन की कहानी

Writer- संध्या 

उस दिन सुबह से ही मौसम खुशगवार था. निशांत के घर में फूलों की महक थी, हवा गुनगुना रही थी. उस के मम्मी और डैडी कल ही कानपुर से आ गए थे. निशांत ने उन्हें सबकुछ बता दिया था. उन्हें खुशी थी कि बेटा 5 साल बाद ही सही, ठीक रास्ते पर आ गया था वरना न जाने उसे कौन सा रोग लग गया था कि शादी के नाम से भड़क जाता था.

मम्मीपापा के सामने स्निग्धा को खड़ा कर के निशांत ने कहा, ‘‘अब आप देख लीजिए. जैसा आप चाहते थे वैसा ही मैं ने किया. आप एक सुंदर, पढ़ीलिखी और अच्छी बहू अपने बेटे के लिए चाहते थे. क्या इस से अच्छी व सुंदर बहू कोई और हो सकती है?’’

स्निग्धा निशांत की मम्मी के चरण स्पर्श करने के लिए नीचे की तरफ झुकने लगी, परंतु उन्होंने स्निग्धा को अपने कदमों पर झुकने का मौका ही नहीं दिया. उस के पहले ही उसे अपने सीने से लगा लिया.

स्निग्धा पहली नजर में ही सब को पसंद आ गई थी.

निशांत ने मम्मीडैडी को स्निग्धा के बारे में बताना उचित नहीं समझा. वह जानता था कि स्निग्धा के दुखद और कष्टमय विगत को बताने से मम्मीडैडी को मानसिक संताप पहुंच सकता था. इसलिए उस ने थोड़े से झूठ का सहारा लिया और उन्हें केवल इतना बताया कि स्निग्धा को एक रिश्तेदार ने पालापोसा और पढ़ायालिखाया था. इलाहाबाद में वह उस के साथ पढ़ती थी, तभी उन दोनों की जानपहचान हुई थी. अब वह अपने पैरों पर खड़ी थी और दिल्ली में रह कर एक प्राइवेट फर्म में नौकरी कर रही थी. निशांत के परिवार वाले समझदार थे. स्निग्धा की भावनाओं को ध्यान में रखते हुए उस के परिवार के बारे में कोई बात नहीं की.

निशांत और स्निग्धा की शादी हो गई. बहुत सादगी और परंपरागत तरीके से उन दोनों की शादी का आयोजन किया गया था. निशांत तथा उस के घर वाले शादीब्याह में बहुत ज्यादा तामझाम और दिखावे के खिलाफ थे. थोड़े से खास रिश्तेदारों और मित्रों के बीच में उन की शादी संपन्न हो गई.

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शादी के पहले एक दिन एकांत में निशांत ने स्निग्धा से पूछा, ‘अगर तुम्हारा मन हो तो हम दोनों चल कर तुम्हारे मम्मीपापा को मना लाते हैं. उन का आशीर्वाद मिलेगा तो हम सब को अच्छा लगेगा.’

‘चाहती तो मैं भी हूं परंतु अभी मेरे पास इतना नैतिक साहस नहीं है. एक बार तुम्हारे साथ शादी कर के घरगृहस्थी सजा लूं तब फिर चल कर मम्मीपापा से मिलेंगे. तब वे मेरे अतीत की भूलों को माफ भी कर सकेंगे.’

‘जैसी तुम्हारी इच्छा,’ और बात वहीं समाप्त हो गई थी.

पति, सास, ससुर और एक पारिवारिक जीवन, बिलकुल नया अनुभव था स्निग्धा के लिए. कितना सुखद और स्निग्ध, वसंत के फूलों की खुशबू से भरा हुआ, वर्षा की पहली फुहारों की तरह मदहोश करता हुआ और पायल की मधुर झंकार की तरह कानों में संगीत घोलता हुआ, यह था जीवन का असली संगीत, जिस की धुनों के बीच हर व्यक्ति झूमझूम जाता है. और आज स्निग्धा जीवन के बीहड़ रास्तों के घुमावदार मोड़ों को पार करती हुई अपने लक्ष्य को प्राप्त करने में सफल हुई थी.

शादी के बाद स्निग्धा ने निशांत के घरपरिवार को ही नहीं, बल्कि उस के व्यक्तित्व को भी संवार दिया था. इस में निशांत की मम्मी का बहुत बड़ा हाथ था. उन्होंने स्निग्धा को एक बेटी की तरह घरपरिवार की जिम्मेदारी से अवगत कराया. उस ने भी अपनी सास से कुछ सीखने में संकोच नहीं किया. नतीजा यह हुआ कि कुछ ही दिनों में उस ने एक समझदार पत्नी, आदर्श बहू और सुलझी हुई गृहिणी के रूप में सब के दिलों में स्थान बना लिया.

अब उसे स्वयं विश्वास नहीं होता था कि वह 5 साल पहले की एक बिगड़ैल और गैरजिम्मेदार, सामाजिक परंपराओं को तोड़ने वाली लड़की थी.

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निशांत इतना शांत और सरल स्वभाव का व्यक्ति था कि वह कभी भी स्निग्धा के अतीत की चर्चा नहीं करता था, परंतु वह स्वयं कभीकभी एकांत के क्षणों में सोचने पर मजबूर हो जाती थी कि शादी के पहले वह किस प्रकार का गंदा जीवन व्यतीत कर रही थी. उस ने तब अपने जीवन के लिए जो राह चुनी थी वह एक न एक दिन उसे पतन के गर्त में डुबो देती. बिना शादी के किसी पुरुष के साथ रहना और शादी कर के अपने पति व एक परिवार के बीच रहने में कितना अंतर था. अब उसे महसूस हो रहा था कि शादी के पहले वह एक डरासहमा, उपेक्षित और घृणास्पद जीवन व्यतीत कर रही थी.

अपने रूप और सौंदर्य पर स्निग्धा को बहुत अभिमान था. वह सुशिक्षित और संपन्न परिवार की लड़की थी, इसलिए लालनपालन बहुत प्यार व दुलार के साथ हुआ था. उस ने अपने जीवन में किसी अभाव को कभी महसूस नहीं किया था, उस के ऊपर किसी प्रकार के पारिवारिक और सामाजिक प्रतिबंध नहीं थे, वह जिद्दी और विद्रोही स्वभाव की हो गई थी.

मेरा भाई जिस लड़की को पसंद करता है वह मेरी बेस्टफ्रेंड है, मैं क्या करूं?

सवाल

मेरा भाई मेरी बैस्टफ्रैंड को पसंद करता है और उस के साथ रिलेशनशिप में आना चाहता है. मेरी बैस्टफ्रैंड इस बारे में क्या सोचती है, मुझे नहीं पता. लेकिन मैं नहीं चाहती कि मेरा भाई उस के साथ रिलेशनशिप में आए. अगर ऐसा हुआ तो सबकुछ बिगड़ जाएगा. वे दोनों मुझे किनारे कर एकसाथ हो जाएंगे, लड़ेंगेझगड़ेंगे और मैं बीच में पिस जाऊंगी. मुझे उन दोनों को अलग रखने के लिए क्या करना चाहिए?

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जवाब

मुझे लगता है कि उन दोनों को अलग करने के बजाय आप को उन्हें उन की जिंदगी के फैसले खुद लेने के लिए छोड़ देना चाहिए. यह उन की जिंदगी है और वे जिसे चाहे, पसंद कर सकते हैं या डेट कर सकते हैं. आप को बीच में टांग नहीं अड़ानी चाहिए. आप की बैस्टफ्रैंड को आप का भाई पसंद हो या न हो, यह उस की पर्सनल चौइस है और आप के भाई की भी. आप को बीच में नहीं पड़ना चाहिए.

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चौथा कंधा : पारो ने साहब को कैसे खुश किया

अन्य पिछड़ा वर्ग का दीना कोलकाता के एक उपनगर संतरागाछी में रहता था. वहीं एक गली में उस की झोंपड़ी थी. उसी झोंपड़ी के आगे उस की छोटी सी दुकान थी, जहां उस ने एक सिलाई मशीन लगा रखी थी. दुकान में वह रैक्सीन के साथसाथ कपड़ों के बैग भी तैयार करता था. साथ में कुछ चप्पलें भी बनाता था.

दीना की पत्नी मीरा महल्ले में मजदूरी का काम करती थी या फिर गल्ले की दुकानों में चावल, गेहूं, मसाले की सफाई करती थी. बदले में नकद मजदूरी या अनाज मिल जाता था.

दीना के 4 बेटे थे, सब से बड़ा बेटा गोलू, उस के बाद पिंकू, टिंकू और सब से छोटा सोनू. चारों बेटे स्कूल जाते थे. बीचबीच में दोनों बड़े बेटे शहर जा कर सामान बेचा करते थे. परिवार की गुजरबसर हो जाती थी.

एक दिन दीना ने अपनी पत्नी मीरा से कहा, ‘‘हम दोनों कितने भाग्यवान हैं. हमारी मौत पर कंधा देने वाले चारों बेटे हैं. बाहरी कंधे की जरूरत नहीं पड़ेगी.’’

देखतेदेखते गोलू और पिंकू दोनों बीए पास कर गए. इत्तिफाक से राज्य के नए मुख्यमंत्री भी अन्य पिछड़ा वर्ग से थे. उन्होंने फरमान जारी किया कि अन्य पिछड़ा वर्ग के कोटे के खाली पदों पर फौरन बहाली कर ऐक्शन टेकन रिपोर्ट सरकार को सौंपी जाए. दीना के दोनों बेटों को राज्य सरकार में आरक्षण के बल पर क्लर्क की नौकरी मिल गई थी. एक की पोस्टिंग बर्दवान थी और दूसरे की आसनसोल में हो गई.

कुछ साल तक वे दोनों परिवार की माली मदद करते रहे और बीचबीच में अपने घर भी आया करते थे. टिंकू और सोनू भी अपनी पढ़ाई में लग गए थे. मीरा ने अब बाहर का काम करना बंद कर दिया था. इधर दोनों बड़े बेटों ने अपनी मरजी से शादी कर ली. वे अपनीअपनी गृहस्थी में बिजी रहने लगे. घर में पैसे भेजना बंद कर दिया था.

टिंकू बीए फाइनल में था और सोनू मैट्रिक पास था. दीना को खांसी और दमे की पुरानी बीमारी थी. अब उस से काम नहीं होता था.

एक दिन सोनू ने पिता से कहा, ‘‘टिंकू भैया तो कुछ दिनों में बीए पास कर लेगा. उसे कुछ न कुछ काम जरूर मिल जाएगा. तब तक भैया को पढ़ने दें, आप का काम मैं संभाल लूंगा. भैया को नौकरी मिलते ही मैं अपनी पढ़ाई फिर से शुरू कर दूंगा.’’

दुकान का काम अब मीरा देखती थी. सोनू रोज कुछ बैग और चप्पलें ले कर बेचने निकल जाता था. रोज की तरह सोनू उस दिन भी दोनों कंधों पर एकएक थैला लिए था. एक थैले में कुछ जोड़ी चप्पलें थीं, कुछ जैट्स और कुछ लेडीज. दूसरे कंधे पर भी थैला होता था, जिस में रैक्सीन और कपड़े के बैग थे.

अकसर प्लैनेटोरियम इलाके से थोड़ा आगे सड़क के किनारे एक सुंदर लड़की उसे दिखती थी. जब भी उसे देखता, वह पूछता ‘‘दीदी, कुछ लोगी?’’वह मना करते हुए बोलती, ‘‘मुझे कुछ नहीं चाहिए, तुम अपना समय बरबाद न करो.’’

एक छुट्टी के दिन सोनू फिर उस लड़की के सामने रुक कर बोला, ‘‘दीदी, कुछ चाहिए आज? आप की चप्पलें काफी घिसी हुई लगती हैं.’’

लड़की ने अपनी साड़ी खींच कर नीचे कर चप्पलों को ढक लिया, फिर वह बोली, ‘‘कुछ नहीं चाहिए, पर तुम रोजरोज मुझ से ही क्यों पूछते हो? यहां तो थोड़ीथोड़ी दूरी पर हर खंभे पर लड़कियां खड़ी हैं, तुम उन से क्यों नहीं पूछते?’’

‘‘दीदी, आप मुझे अच्छी लगती हो. बस रुक कर दो पल आप से बात कर लेता हूं, बिक्री हो न हो.’’

‘‘अच्छा, अपना नाम बताओ?’’

‘‘मैं सोनू… और आप?’’

‘‘मैं पारो.’’

‘‘और, आप का देवदास कौन है?’’

‘‘सारा शहर मेरा देवदास है. चल भाग यहां से… बित्ते भर का छोकरा और गजभर की जबान,’’ पारो बोली.

सोनू हंसते हुए आगे बढ़ गया और पारो भी हंसने लगी थी.

अगले दिन फिर सोनू की मुलाकात पारो से हुई. उस ने पूछा, ‘‘दीदी, आप रोज यहां खड़ीखड़ी क्या करती हो?’’

‘‘मैं भी कुछ बेचती हूं.’’

‘‘क्या?’’

‘‘तुम नहीं समझोगे,’’ बोल कर पारो ने आगे वाले खंभे के पास खड़ी लड़की की तरफ दिखा कर कहा, ‘‘देख, जो वह करती है, मैं भी वही करती हूं.’’

सोनू ने देखा कि उस लड़की के पास एक लड़का आया और उस के साथ2 मिनट बात की, फिर वे दोनों एक टैक्सी में बैठ कर निकल गए.अगले दिन सोनू फिर उसी जगह पारो से मिला. दोनों ने आपस में एकदूसरे के परिवार की बातें कीं.

सोनू ने कहा, ‘‘मैं काम कर के घर का खर्च और बड़े भाई की पढ़ाई का खर्च जुटाने की कोशिश करता हूं.’’

पारो बोली, ‘‘तू तो बड़ा अच्छा काम कर रहा है. मैं भी अपने छोटे भाई को पढ़ा रही थी. वह बीए पास कर चुका है. कुछ जगह नौकरी की अर्जी दी है. उसे काम मिलने के बाद मैं यहां नहीं मिलूंगी.’’

कुछ दिनों तक ऐसे ही चलता रहा था. सोनू की अकसर पारो से मुलाकात होती रहती थी. टिंकू बीए पास कर चुका था. नौकरी के लिए उस ने भी अर्जी दे रखी थी. पर साहब को रिश्वत चाहिए थी, इसलिए औफर लैटर रुका हुआ था.

पिछले 2-3 दिनों से सोनू सामान बेचने नहीं निकल सका था. उस के पिता की तबीयत ज्यादा खराब थी. उन्हें सरकारी अस्पताल में भरती किया गया था. उन की हालत में कोई सुधार नहीं था. टिंकू पिता के पास अस्पताल में था.

आज सोनू बाजार निकला था. पारो ने सोनू को आवाज दे कर कहा, ‘‘तू कहां था? मैं तुझे खुशखबरी देने के लिए ढूंढ़ रही थी. मेरे भाई को नौकरी मिल गई है आसनसोल के कारखाने में. सोमवार को उसे जौइन करना है. बस, अब 2-4 दिन बाद मैं यहां नहीं मिलूंगी.’’

‘‘मुबारक हो दीदी, तो मिठाई नहीं खिलाओगी? मेरे पिता अस्पताल में भरती हैं, इसलिए मैं नहीं आ सका था.’’

‘‘घबराओ नहीं, सब ठीक हो जाएगा,’’ बोल कर पारो ने मिठाई उस के मुंह में डाल दी.

‘‘क्या ठीक होगा, टिंकू भैया की नौकरी रुकी है. वैसे, आरक्षण कोटे में औफर तो मिलना है, पर साहब ने घूस के लिए अभी तक लैटर इशू नहीं किया है.’’

‘‘तुम उस साहब का पता बताओ, मैं उन से रिक्वैस्ट करूंगी.’’

‘‘कोई फायदा नहीं, हम लोगों ने बहुत नाक रगड़ी उन के सामने, वह बिना रिश्वत लिए मानने वाला नहीं है.’’

‘‘अरे, तुम बताओ तो सही. हो सकता है कि कोई पहचान वाला हो और काम बन जाए.’’

‘‘ठीक है. बताता हूं, पर घूस की बात वह घर पर करता है.’’

‘‘ठीक है, घर पर ही मिल लूंगी.’’

उस दिन शाम को पारो उस साहब के घर पर मिली. एक काली मोटी सी औरत ने कहा, ‘‘मैं साहब की पत्नी हूं. कहो, क्या काम है?’’

पारो बोली, ‘‘मुझे भाई की नौकरी के सिलसिले में उन से बात करनी है.’’

‘‘ठीक है, तुम यहीं रुको. मैं उन्हें भेजती हूं,’’ बोल कर वह अंदर चली गई.

साहब आए, तो पारो को ऊपर से नीचे तक गौर से देखते रह गए. पारो ने अपने आने की वजह बताई, तो वे बोले, ‘‘तुम लोगों को पता होना चाहिए कि दफ्तर का काम मैं घर पर नहीं करता हूं.’’

पारो ने सीधे मुद्दे पर आते हुए धीमी आवाज में कहा, ‘‘सर, मैं ज्यादा रुपए तो नहीं दे सकती हूं, हजार डेढ़ हजार रुपए से काम हो जाता, तो बड़ी मेहरबानी होगी.’’

साहब ने धीरे से कहा, ‘‘मैं तुम से ज्यादा लूंगा भी नहीं. बस जो तुम्हारे पास है, उतने से मैं काम कर दूंगा. तुम कल शाम को इस होटल में मिलना. याद रहे, अकेले में प्राइवेट मीटिंग होगी,’’ और उन्होंने होटल और कमरा नंबर पारो को बता दिया.

अगले दिन साहब ने दफ्तर जाते समय पत्नी से कहा, ‘‘लंच के बाद मुझे बर्दवान जाना है. एक जरूरी मीटिंग है. आतेआते रात के 12 बज जाएंगे.’’

दूसरे दिन पारो सोनू को रोज वाली जगह पर नहीं मिली. वह तो साहब के साथ होटल के कमरे में मीटिंग में थी. रात के 12 बजे तक साहब ने पारो के साथ इस उम्र में खूब मौजमस्ती की. पारो ने पूछा, ‘‘मेरा काम तो हो जाएगा न सर?’’

साहब बोले, ‘‘मैं इतना बेईमान नहीं हूं. तुम ने मेरा काम कर दिया, तो समझो तुम्हारा काम हो चुका है. और्डर मैं ने आज साइन कर दिया है. मेरे ही दराज में है. कल सुबह भाई को अपना आईडी प्रूफ ले कर दफ्तर भेज देना. डाक से पहुंचने में कुछ दिन लग जाएंगे. सरकारी तौरतरीके तो जानती ही हो.’’

‘‘जी सर, मैं भाई को भेज दूंगी,’’ साड़ी लपेटते हुए पारो बोली. अगले दिन सुबहसुबह पारो सोनू के घर पहुंची. सोनू और टिंकू घर पर ही थे. उन की मां अस्पताल में थीं. पारो ने टिंकू से दफ्तर जा कर बहाली का और्डर लेने को कहा.

सोनू बोला, ‘‘कितनी घूस देनी पड़ी?’’

पारो बोली, ‘‘मेरे पास ज्यादा कुछ था भी नहीं. थोड़े में ही मान गए वे.’’

‘‘ओह दीदी, तुम कितनी अच्छा हो,’’ बोल कर सोनू उस के पैर छूने को झुका, तो पारो ने उसे रोक कर गले लगाया. टिंकू ने दफ्तर से और्डर ले कर उसी दिन जौइन भी कर लिया. दीना को यह खुशखबरी सोनू ने दे दी थी.

दीना बोला, ‘‘अब मैं चैन से मर सकूंगा. टिंकू अपनी मां और छोटे भाई की देखभाल करेगा.’’

उसी शाम को दीना चल बसा, इत्तिफाक से पारो और उस का भाई तपन उस दिन अस्पताल में दीना से मिलने गए थे. सोनू ने दोनों बड़े भाइयों को पिता की मौत की खबर उसी समय दे दी और कहा कि दाहसंस्कार कल सुबह होना है.

बड़ा बेटा गोलू तो 2 घंटे की दूरी पर बर्दवान में था. वह बोला, ‘‘मैं तो नहीं आ सकूंगा, बहुत जरूरी काम है, तेरहवीं के दिन आने की कोशिश करूंगा.’’ दूसरा बेटा पिंकू आसनसोल से उसी रात आ गया, पर उस की पत्नी नहीं आई. सुबह अर्थी उठने वाली थी. पारो भी अपने भाई के साथ आई थी.

टिंकू ने सोनू से कहा, ‘‘हम तीन भाई तो हैं ही. जा कर पड़ोस से किसी को बुला ला, कंधा देने के लिए.’’

पारो आगे बढ़ कर बोली, ‘‘चौथा कंधा मेरा भाई तपन देगा.’’

मीरा अपने पति की अंतिम विदाई के समय फूटफूट कर रो रही थी. उसे पति की कही बात याद आ गई. कितने फख्र से कहते थे कि मरने पर मेरे चारों बेटे हैं ही कंधा देने के लिए.कुछ दिनों बाद सोनू का घर सामान्य हो चला था. पारो अकसर आती रहती थी. सोनू अपनी पढ़ाई में लग गया.

एक दिन मीरा ने पारो से कहा, ‘‘बेटी, तुम ने बड़े एहसान किए हैं हम लोगों पर. एक और एहसान कर सकोगी?’’

‘‘मां, मैं ने कोई एहसान नहीं किया है. आप बोलिए, मैं क्या कर सकती हूं?’’

‘‘सोनू को अपना देवर बना लो, वह तुम्हारी बड़ी तारीफ करता है. हां, अगर टिंकू तुम्हें ठीक लगे तो…’’टिंकू भी उस समय घर में था, उस ने खामोश रह कर स्वीकृति दे दी थी और पारो की ओर देख कर उस के जवाब का इंतजार कर रहा था.

पारो बोली, ‘‘आप लोगों को मैं अंधेरे में नहीं रखना चाहती हूं. मैं कुछ दिन पहले तक कालगर्ल थी. पता नहीं, टिंकू मुझे पसंद करेंगे या नहीं.’’

‘‘कौन सी गर्ल, वह क्या होता है?’’ मां ने पूछा.

‘‘कुछ नहीं मां. सेल्स गर्ल समझो. सोनू इस के बारे में मुझे सब बताया करता था. पारो बहुत अच्छी लड़की है. अब फैसला इसे करने दो.’’सोनू पारो के पास आ कर बोला, ‘‘मान जाओ न दीदी… नहीं भाभी.’’ पारो ने नजरें झुका लीं. उस ने सिर पर पल्लू रख कर मां के पैर छुए.

 

Bigg Boss 15 के मेकर्स ने Akshara Singh को नहीं किया अप्रोच, फैंस हुए नाराज

कलर्स टीवी का पॉपुलर शो बिग बॉस 15 (Bigg Boss 15) दर्शकों का एंटरटेनमेंट करने में कामयाब हो रहा है. शो के मेंकर्स कुछ और कंटेस्टेंट्स की वाइल्ड कार्ड के जरिए एंट्री करवाने वाले हैं. जी हां खबर आ रही है कि शो में कुछ और भी कंटेस्टेंट नजर आने वाले हैं.

खबरों के अनुसार बिग बॉस हाउस में बिग बॉस ओटीटी के कंटेस्टेंट मुस्कान जट्टाना और इसी सीजन से इविक्ट हुई कंटेस्टेंट विधि पांड्या जल्द ही नजर आएंगी.

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कुछ दिन पहले खबर ये भी आई थी कि बिग बॉस ओटीटी की कंटेस्टेंट अक्षरा सिंह (Akshara Singh) भी बिग बॉस 15 में नजर आने वाली हैं. लेकिन लेटेस्ट रिपोर्ट के मुताबिक मेकर्स ने भोजपुरी एक्ट्रेस अक्षरा सिंह को इस गेम शो के लिए अप्रोच नहीं किया है.

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एक रिपोर्ट के मुताबिक मेकर्स ने अक्षरा सिंह को बिग बॉस 15 के लिए अप्रोच तक नहीं किया है. और बताया जा रहा है कि विधि पांड्या जल्दी ही दोबारा बतौर वाइल्ड कार्ड के तौर पर घर में आने वाली हैं.

 

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अक्षरा सिंह ने बिग बॉस ओटीटी में हिस्सा लिया था. फैंस शो में उन्हें काफी पसंद कर रहे थे. उनके इविक्शन से फैंस काफी नाराज थे. बता दें कि उनके नए कनेक्शन मिलिंद गाबा को मिले कम वोट के चलते घर से बेघर किया गया था. जिसे अक्षरा सिंह के फैंस गलत मानते हैं. एक्ट्रेस के फैंस लगातार उन्हें घर में बुलाने की मांग करते रहे हैं.

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बापूजी ने तोड़े बा के साथ सारे रिश्ते, अनुपमा के घर से निकाला बाहर

टीवी सीरियल अनुपमा में इन दिनों लगातार महाट्विस्ट देखने को मिल रहा है. जिससे दर्शकों को फुल एंटरटेनमेंट हो रहा है. शो में अब तक आपने देखा कि बा ने सबके सामने बापूजी की खूब बेइज्जती की है, जिससे बापूजी टूट चुके हैं. तो वहीं अनुपमा ने भी बा को खूब सुनाई है और वह बापूजी को अपने घर ले गई है. शो के अपकमिंग एपिसोड में हाईवोल्टेज ड्रामा होने वाला है. आइए बताते हैं शो के नए एपिसोड के बारे में.

शो के अपकमिंग एपिसोड में आप देखेंगे कि अनुपमा ने बापूजी को उनका मान-सम्मान वापस करने की ठानेगी. तो दूसरी तरफ काव्या बा से कहगी कि वनराज के वापस आने से पहले उन्हें सबकुछ ठीक करना होगा.

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तो दूसरी तरफ अनुपमा अपने बापूजी का पूरा ख्याल रखेगी. वह बापूजी को खुश करने के लिए नए-नए तरीके आजमाएगी लेकिन बापूजी सदमें से नहीं बाहर निकल पाएंगे.

 

बापूजी को हर वक्त बा की बात याद आएगी. वे अपने अपमान को नहीं बर्दाश्त कर पाएंगे. वह आधी रात को बिल्डिंग के बाहर चले जाएंगे और गार्ड से पूछेंगे कि उन्हें यहां पर सिक्युरिटी गार्ड की नौकरी मिल सकती है. ये देखकर अनुपमा और अनुज कपाड़िया परेशान हो जाएंगे.

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तो दूसरी तरफ किंजल बा को समझाने जाएगी लेकिन  बा उसे भी डांटकर भगा देगी. बा सोचती है कि 50 साल से दोनों के बीच काफी झगड़े हुए हैं, वह घर वापस जरूर आएंगे. तभी मामाजी आते हैं मामाजी रोते हुए कहते हैं कि भाई दूज पर वह टीका नहीं लगाएंगे. इसके अलावा राखी भी न बंधवाएंगे. वह घर छोड़कर जा रहे है.  बा ये सुनकर टूट जाती हैं. काव्या बा को भड़काती है कि ये सब अनुपमा के कारण हो रहा है.

 

शो में आप ये भी देखेंगे कि बा बापूजी को वापस लाने के लिए अनुपमा के घर जाएगी लेकिन बापूजी शाह हाउस जाने से मना कर देंगे. वह बा को अनुपमा के घर से जाने के लिए कहेंगे. तो दूसरी तरफ वनराज घर वापस आएगा, वह पारितोष से पूछेगा कि उसके जाने के बाद किसी ने बापूजी से कुछ कहा था. अब शो में ये देखना होगा कि वनराज बा-बापूजी के झगड़े बारे में पता चलेगा तो वह कैसे रिएक्ट करेगा.

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Satyakatha: प्रेमी ने खोदी मोहब्बत की कब्र- भाग 2

सौजन्य- सत्यकथा

अगले ही दिन जबलपुर शहर से निकलने वाले समाचार पत्रों में खुशबू की फोटो के साथ उस की गुमशुदगी की सूचना छप चुकी थी. सोशल मीडिया में भी खुशबू के गुम होने का समाचार उस की फोटो के साथ जम कर वायरल हो चुका था.

नंदकिशोर का हर दिन अब अपनी दुकान का कामधंधा छोड़ कर बेटी की खोजखबर लेने में बीतने लगा था. इधर रांझी पुलिस ने आसपास के इलाकों में खुशबू की तलाश की.

खुशबू के घर वालों और पड़ोसियों से पूछताछ में पुलिस को पता चला कि खुशबू का आकाश बेन नाम के लड़के से प्रेम प्रसंग था. खुशबू के मोबाइल की काल डिटेल्स में भी 31 मई को करीब आधे घंटे तक उस की बातचीत आकाश से होने की जानकारी मिली. इस से पुलिस को पूरा भरोसा हो गया था कि खुशबू के अपहरण में आकाश बेन का ही हाथ होगा.

पुलिस ने जब आकाश को थाने बुला कर पूछताछ की तो उस ने खुशबू से प्रेम होने की बात तो कुबूल ली, परंतु उस ने पुलिस को बताया कि वह लौकडाउन के बाद से खुशबू से मिला तक नहीं है.

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पुलिस ने लगातार आकाश से खुशबू के बारे में पूछताछ की, लेकिन हर बार वह भावुक हो कर पुलिस को यही कहता कि मैं भी खुशबू की तलाश में लगा हूं. मैं उस के बिना जिंदा नहीं रह सकता.

नंदकिशोर और उस की पत्नी सुधा को खुशबू और आकाश की नजदीकियों की जानकारी थी, इसलिए दोनों का शक आकाश पर ही था, परंतु आकाश नंदकिशोर के साथ खुशबू को खोजने में उस का साथ दे रहा था. इसलिए कई बार नंदकिशोर को लगता कि खुशबू के गायब होने में आकाश का हाथ न हो.

रांझी पुलिस ने जब खुशबू की मम्मी सुधा से पूछा कि तुम्हें किसी पर शक है, जो खुशबू को अगवा कर सकता है तो सुधा ने बेहिचक आकाश का नाम लिया था.

पुलिस टीम ने आकाश को 4 बार हिरासत में ले कर पूछताछ की, मगर वह हर बार वह यही कहता कि उसे खुशबू के गायब होने के संबंध में कोई जानकारी नहीं है.

धीरेधीरे समय बीत रहा था और पुलिस खुशबू को नहीं खोज पाई थी. नंदकिशोर पुलिस के बड़े अधिकारियों के दफ्तरों के चक्कर लगा चुका था, लेकिन उस की शिकायत दर्ज कर उसे केवल आश्वासन ही दिया जा रहा था.

पुलिस की हीलाहवाली से परेशान हो कर नंदकिशोर ने मुख्यमंत्री हेल्पलाइन में शिकायत दर्ज करा दी. शिकायत की जांच हेतु जब रांझी पुलिस थाने के टीआई पर दबाव पड़ा तो टीआई आर.के. मालवीय ने खुशबू को तलाश करने के बजाय नंदकिशोर को थाने में तलब किया.

टीआई ने नंदकिशोर को 2 दिन के भीतर खुशबू को खोज निकालने का भरोसा दिला कर उस पर दबाव बना कर शिकायत वापस करवा ली.

2 दिन बाद नंदकिशोर जब पुलिस स्टेशन गया तो टीआई बेकाबू हो कर बोले, ‘‘पुलिस के पास बहुत सारे काम हैं, एक अकेली तुम्हारी लड़की को खोजने नहीं बैठे रहेंगे.’’

पुलिस के इस व्यवहार से नंदकिशोर बहुत दुखी हुआ. अपनी बेटी के बारे में पता लगाने के लिए नंदकिशोर पिछले 3 महीनों में 50 बार से अधिक रांझी थाने और 5 बार एसपी से मिल चुका था, परंतु उसे कोरे आश्वासन ही मिलते थे. जिस से वंशकार समाज के लोग लामबंद हो कर पुलिस की इस लापरवाही पर आक्रोशित थे.

इस के बाद टीआई आर.के. मालवीय का तबादला कर दिया गया और रांझी पुलिस थाने की कमान तेजतर्रार टीआई विजय परस्ते को सौंप दी गई. टीआई विजय परस्ते ने एएसआई रामकुमार मार्को की मदद से पूरे केस की फिर से पड़ताल शुरू कर दी.

टीआई विजय परस्ते के निर्देश पर पुलिस टीम ने लापता खुशबू के प्रेमी आकाश की निगरानी शुरू कर दी. उस की हर गतिविधि पर कड़ी नजर रखी जा रही थी.

इधर चारों तरफ से घोर निराशा मिलने के बाद नंदकिशोर ने वकील से मिल कर जबलपुर हाईकोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका लगा दी. हाईकोर्ट ने इस मामले में दखल दे कर जबलपुर एसपी को खुशबू को खोजने का आदेश दिया तो एसपी सिद्धार्थ बहुगुणा ने प्रकरण में क्राइम ब्रांच को भी लगा दिया.

पूरे मामले में शुरू से ही आकाश बेन पहला संदेही था. क्राइम ब्रांच और रांझी पुलिस ने 23 सितंबर, 2021 की रात को आकाश को थाने में बुला कर जब सख्ती से पूछताछ की तो वह टूट गया. पुलिस पूछताछ में दिल दहला देने वाली कहानी सामने आई.

रांझी के बजरंग नगर के गंगा मैया इलाके में रहने वाला सूरज बेन व्हीकल फैक्ट्री के मेस में खानसामा था. उस के 2 बेटे आकाश और प्रकाश थे. 24 साल का आकाश कुछ समय पहले रिछाई के इंडस्ट्रियल एरिया में एक इंजेक्शन बनाने वाली फार्मा कंपनी में काम करता था.

बाद में अपने पिता सूरज बेन के कहने पर वह उस के साथ ही व्हीकल फैक्ट्री के मेस में वेटर का काम करने लगा. लौकडाउन के चलते व्हीकल फैक्ट्री का मेस जब बंद हो गया तो आकाश का काम छूट गया.

लौकडाउन खत्म होने के बाद वह काम की तलाश में राइस मिल गया तो उसे हम्माल का काम मिल गया. राइस मिल में चावल के बोरे काटने, भरने और सिलने का काम करने वाले मजदूरों को हम्माल कहा जाता है. आकाश मैट्रिक तक ही पढ़ा था, लेकिन वह फैशनपरस्त लड़का था.

पिता की आमदनी भी परिवार के लिए ऊंट के मुंह में जीरा के बराबर थी, इस वजह से आकाश ने हम्माली के काम को शौक से अपना लिया था.

आकाश और खुशबू दसवीं कक्षा तक जबलपुर के स्कूल में साथसाथ ही पढ़े थे और दोनों के परिवारों की आपस में नजदीकियां थीं.

रोज ही उन का एकदूसरे के घरों में आनाजाना लगा रहता था. इसलिए उन के मेलजोल पर किसी को ऐतराज भी नहीं था.

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स्कूल में हुई बचपन की दोस्ती जवां होते ही कब प्यार में बदल गई, दोनों को पता ही नहीं चला. दोनों एकदूसरे को दिलोजान से चाहने लगे. आकाश और खुशबू के घरवाले भी उन की परवान चढ़ती मोहब्बत से अंजान नहीं थे.  आकाश अकसर ही खुशबू को बाइक से शहर घुमाने ले जाता था. जबलपुर शहर के पार्क में घंटों वे बांहों में बांहें डाल अपने प्यार की पींगें बढ़ाने लगे थे. दोनों को जब भी एकांत मिलता तो आकाश खुशबू के होंठों को चूमते हुए कहता, ‘‘खुशबू, मैं तुम्हें अपनी जान से भी ज्यादा चाहता हूं और जल्दी ही तुम से शादी करना चाहता हूं.’’

आकाश खुशबू की हर ख्वाहिश का ध्यान रखता था. वह उसे घुमानेफिराने के साथ उसे नए कपड़े गिफ्ट करता था. यही वजह थी कि खुशबू भी आकाश की दीवानी थी.

पिछले साल मार्च 2020 में कोरोना महामारी के चलते जब लौकडाउन हुआ तो आकाश की फैक्ट्री बंद हो गई और उसे पैसे की तंगी होने लगा.

आकाश खुशबू की फरमाइशें पूरी नहीं कर पा रहा था. घूमनेफिरने की आदी और स्मार्टफोन की शौकीन खुशबू सोशल मीडिया के जरिए दूसरे लड़कों से नजदीकियां बढ़ाने लगी तो खुशबू के पिता नंदकिशोर और उस की पत्नी बेटी की इन हरकतों से परेशान रहने लगे.

मोहल्ले में नंदकिशोर की बदनामी होने लगी तो उस ने घमापुर में रहने वाले दिनेश नाम के लड़के से खुशबू की शादी तय कर दी. जून महीने में खुशबू की शादी होने वाली थी. खुशबू भी इस रिश्ते को ले कर अब गंभीर हो गई थी.

खुशबू आकाश से बेपनाह मोहब्बत करती थी, मगर वह पिता के द्वारा दिनेश के साथ तय किए गए शादी के रिश्ते के बाद अपने भविष्य के नए सपने बुनने लगी थी.

दिनेश एक प्राइवेट कंपनी में काम करता था और स्मार्ट भी था, जबकि आकाश की माली हालत उतनी अच्छी नहीं थी. यही सोच कर खुशबू आकाश से दूरी बनाने लगी. इस से आकाश तो जैसे पागल ही हो गया.

शादी का रिश्ता तय होते ही खुशबू ने आकाश से फोन पर बातचीत भी बंद कर दी. इसे ले कर आकाश परेशान रहने लगा. आकाश ने खुशबू के साथ जीनेमरने की कसमें खाई थीं और अब आकाश को यह लगने लगा था कि खुशबू किसी दूसरे लड़के से प्रेम करने लगी है.

अगले भाग में पढ़ें- घटनास्थल पर युवती के पहने हुए कपड़े और जूते भी पड़े हुए थे

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सौजन्य: सत्यकथा

ममता ने एक सरसरी नजर देवरानी के चेहरे पर डाली फिर उत्सुकता से पूछा, ‘‘रीता, कई दिनों से देवरजी नहीं दिखरहे हैं, क्या वह कहीं बाहर गए हैं?’’

‘‘हां दीदी, वह शायद दिल्ली गए हैं काम की तलाश में.’’ रीता ने जवाब दिया.

‘‘तुम ने परिवार में किसी को बताया क्यों नहीं कि शिवगोविंद दिल्ली गया है?’’

‘‘दीदी वह मुझ से लड़झगड़ कर कर गए हैं. जेवरजट्टा भी साथ ले गए हैं. गुस्से में मैं ने किसी को कुछ नहीं बताया. लेकिन दीदी, मुझे उन की चिंता सता रही है.’’

‘‘तुम्हारी शिवगोविंद से फोन पर बात हुई?’’ ममता ने पूछा.

‘‘नहीं दीदी, उन से फोन पर बात तो नहीं हुई?’’ रीता नजरें चुरा कर बोली.

‘‘तुम अपना फोन मुझे दो. मैं अभी शिवगोविंद से बात करती हूं.’’ ममता झुंझला कर बोली.

‘‘दीदी मेरा फोन पानी में गिर गया था, जिस से वह बंद हो गया है.’’ रीता ने जवाब दिया.

ममता पढ़ीलिखी सभ्य महिला थी. वह समझ गई कि रीता बात न कराने के लिए बहाने पर बहाने बना रही है. वह यह भी जान गई कि शिवगोविंद के गायब होने का रहस्य रीता के पेट में छिपा है, लेकिन वह बाहर नहीं लाना चाहती है.

अब ममता के मन में अनेक आशंकाएं उमड़नेघुमड़ने लगीं. वह सोचने लगी, ‘कहीं रीता ने देवर के साथ कोई षडयंत्र तो नहीं रच डाला.’

ममता ने अपनी आशंकाओं से पति बालगोविंद को अवगत कराया तो उन का कलेजा कांप उठा. बालगोविंद ने भाई की खोज हर संभावित स्थान पर की, लेकिन उस का कहीं कुछ पता नहीं चल पा रहा था. फोन भी उस का बंद था. उस के यारदोस्त भी कुछ नहीं बता पा रहे थे.

ममता व उस के पति बालगोविंद की समझ में नहीं आ रहा था कि शिवगोविंद को जमीन निगल गई या आसमान.

आखिरकार जब शिवगोविंद का कुछ भी पता नहीं चला तो उस ने 10 जून, 2021 की सुबह 9 बजे गुमशुदगी दर्ज कराने अकबरपुर कोतवाली जा पहुंचा.

थानाप्रभारी तुलसीराम पांडेय उस समय थाने पर मौजूद थे. बालगोविंद ने उन्हें अपना परिचय दिया, ‘‘सर, मेरा नाम बालगोविंद यादव है. मैं बलिहारा गांव में रहता हूं. मेरा छोटा भाई शिवगोविंद 6 जून से घर से लापता है. मैं ने उस की खोज हर जगह की. लेकिन कुछ भी पता नहीं चल पा रहा है. आप गुमशुदगी दर्ज कर भाई की खोज में मदद करें.’’

कोतवाल तुलसीराम पांडेय ने बालगोविंद की बात को गौर से सुना और फिर गुमशुदगी दर्ज कर ली. इस के बाद उन्होंने पूछा, ‘‘तुम्हारे भाई शिवगोविंद की गांव में किसी से रंजिश या लेनदेन का झगड़ा तो नहीं था.’’

‘‘सर, शिवगोविंद सीधासादा इंसान है. उस की गांव में किसी से रंजिश नहीं है और न ही किसी से लेनदेन का कोई झगड़ा है.’’ बालगोविंद ने जवाब दिया.

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‘‘तुम्हें किसी पर शक है?’’ थानाप्रभारी तुलसीराम पांडेय ने पूछा.

‘‘हां सर, रीता पर शक है.’’ बालगोविंद ने बताया.

‘‘ये रीता कौन है?’’ थानाप्रभारी बोले.

‘‘सर, रीता शिवगोविंद की ही पत्नी है. वह रंगीनमिजाज औरत है. मुझे शक है कि भाई के लापता होने का रहस्य उसी के पेट में छिपा है.’’

तुलसीराम पांडेय समझ गए कि मामला अवैध संबंधों का है और ऐसे रिश्तों में कुछ भी घटित हो सकता है. उन्होंने इस मामले को बेहद गंभीरता से लिया और सच्चाई जानने के लिए खास खबरियों को लगा दिया.

दूसरे दिन ही एक खबरी ने उन्हें बताया कि रीता रंगीनमिजाज औरत है. उस का चालचलन ठीक नहीं है. गांव के दीपक उर्फ लल्ला का उस के घर आनाजाना है. दोनों के बीच नाजायज रिश्ता है.

इस रिश्ते का रीता का पति शिवगोविंद विरोध करता था. शिवगोविंद के लापता होने का रहस्य इन्हीं दोनों से पता चल सकता है.

यह पता चलते ही कोतवाल तुलसीराम पांडेय ने आवश्यक पुलिस बल साथ लिया और बलिहारा गांव पहुंच कर रीता यादव को उस के घर से हिरासत में ले लिया. उसे थाने लाया गया. महिला पुलिस की मौजूदगी में रीता से पूछताछ शुरू की गई.

थानाप्रभारी ने उस से पूछा, ‘‘रीता सचसच बताओ, शिवगोविंद कहां है?’’

‘‘सर, मुझे पता नहीं, वह कहां हैं. वह मुझ से लड़झगड़ कर साथ में जेवर ले कर घर से दिल्ली जाने को निकले थे.’’ रीता ने जवाब दिया.

‘‘देखो, मुझे गुमराह करने की कोशिश मत करो. वरना सच्चाई उगलवाना मुझे आता है.’’

‘‘सर, मैं सच ही कह रही हूं.’’ वह बोली.

‘‘फिर झूठ. लगता है, तुम सीधी तरह मुंह नहीं खोलोगी.’’ थानाप्रभारी ने धमकाया.

इसी के साथ उन्होंने एक महिला कांस्टेबल को इशारा किया. इशारा पाते ही महिला पुलिस ने रीता से सख्ती की तो उसे मुंह खोलते ज्यादा वक्त नहीं लगा.

रीता ने कुबूला जुर्म

रीता ने मुंह खोला तो थानाप्रभारी के आश्चर्य का ठिकाना न रहा. रीता ने बताया, ‘‘सर, शिवगोविंद अब इस दुनिया में नहीं है. दीपक उर्फ लल्ला और उस के दोस्त अमन व निखिल ने मेरे कहने पर उस की हत्या कर दी है.’’

इस के बाद ताबड़तोड़ छापा मार कर तुलसीराम पांडेय ने 12 जून की सुबह दीपक उर्फ लल्ला तथा उस के साथी अमन को भी बाराजोड़ से गिरफ्तार कर लिया. उन्हें कोतवाली अकबरपुर लाया गया. वहां दोनों का सामना रीता से हुआ तो वे समझ गए कि हत्या का परदाफाश हो गया है. अत: उन दोनों ने सहज ही जुर्म कुबूल कर लिया. निखिल फरार हो गया.

थानाप्रभारी तुलसीराम पांडेय ने इस सनसनीखेज मामले की जानकारी पुलिस अधिकारियों को दी. फिर शिवगोविंद का शव बरामद करने बलिहारा गांव के पास नोन नदी के किनारे पहुंचे.

उन्होंने खुदाई के लिए जेसीबी भी मंगवा ली. इस के बाद अमन व दीपक की निशानदेही पर खुदाई की गई तो गहरे गड्ढे से शिवगोविंद का सड़ागला शव बरामद हो गया, जिस से तेज दुर्गंध आ रही थी.

शिवगोविंद की लाश बरामद होने की सूचना बलिहारा गांव पहुंची तो पूरे गांव में सनसनी फैल गई. बालगोविंद, उस की पत्नी ममता व परिवार के अन्य लोग घटनास्थल पहुंचे और शव देख कर फफक पड़े.

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इसी बीच खबर पा कर एसपी केशव कुमार चौधरी, एएसपी घनश्याम तथा डीएसपी (अकबरपुर) अरुण कुमार सिंह घटनास्थल आ गए. उन्होंने शव का निरीक्षण किया तथा मृतक के घर वालों से पूछताछ की. पुलिस अधिकारियों ने आरोपी अमन व दीपक से भी विस्तृत पूछताछ की.

पूछताछ के बाद आरोपियों ने हत्या में प्रयुक्त आलाकत्ल साबड़ तथा फावड़ा भी बरामद करा दिया, जिसे उन्होंने छिपा दिया था. पूछताछ के बाद अधिकारियों ने शिवगोविंद के शव को माती स्थित पोस्टमार्टम हाउस भिजवा दिया.

चूंकि आरोपियों ने जुर्म कुबूल कर लिया था और आलाकत्ल भी बरामद करा दिया था, अत: थानाप्रभारी तुलसीराम पांडेय ने मृतक के भाई बालगोविंद की तरफ से भादंवि की धारा 302, 201, 120बी तथा 34 के तहत रीता, दीपक उर्फ लल्ला, अमन तथा निखिल के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर ली और रीता, अमन व दीपक को न्यायसम्मत गिरफ्तार कर लिया.

पुलिस जांच में एक ऐसी औरत की कहानी प्रकाश में आई, जिस ने स्वयं ही अपना सिंदूर मिटा दिया.

कानपुर (देहात) जनपद के अकबरपुर थाना क्षेत्र में एक गांव है बलिहारा. रामसिंह यादव अपने परिवार के साथ इसी गांव में रहता था. उस के परिवार में पत्नी के अलावा 3 बेटे थे— हरगोविंद, बालगोविंद तथा शिवगोविंद. रामसिंह किसान था. खेती की आय से ही घरपरिवार चलाता था. उस की आर्थिक स्थिति तो मजबूत नहीं थी, लेकिन बिरादरी में मानसम्मान था.

भाइयों में हरगोविंद सब से बड़ा था. उस का विवाह रीता से हुआ था. खूबसूरत रीता को पत्नी के रूप में पा कर हरगोविंद बहुत खुश था. लेकिन आर्थिक अभाव उस की चाहत के बीच दीवार बने हुए थे.

पति की मौत के बाद रीता देवर के साथ रहने लगी थी

हरगोविंद पिता के साथ खेती में हाथ बंटाता था. वह इतना नहीं कमा पाता था कि मौजमजे से गुजर होती रहती. फिर भी हालात से उबरने की जद्दोजहद चलती रही.

समय के साथ जब हालात नहीं सुधरे, तब रीता ने पति को कोई और काम करने की सलाह दी. लेकिन हरगोविंद तो अपनी खेतीकिसानी में ही खुश था.

सहयोगी : जय कुमार मिश्र

अगले भाग में पढ़ें- रीता को भी मिल गया सहारा

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