Satyakatha: पैसे का गुमान- भाग 1

सौजन्य- सत्यकथा

मुरादाबाद के रहने वाले कुलदीप गुप्ता की पत्नी सुनीता, बेटी इशिता और बेटे दिव्यांशु के लिए खुशी का दिन था. क्योंकि उस

दिन यानी 4 जून, 2021 को कुलदीप गुप्ता का जन्मदिन था, इसलिए घर के सभी लोगों ने अपनेअपने तरीके से उन के जन्मदिन पर विश करने की योजना बना ली थी.

पत्नी सुनीता शाम के वक्त इस मौके पर आने वाले मेहमानों की खातिरदारी के इंतजाम में जुटी हुई थी, जबकि बेटी इशिता और बेटा दिव्यांशु सजावट और केक के इंतजाम का जिम्मा उठाए हुए थे. सभी उन्हें जन्मदिन की शुभकामनाएं और उपहार देने के सरप्राइज एकदूसरे से छिपाए हुए थे.

दिन के ठीक 12 बजे सुनीता के पास पति कुलदीप का अचानक फोन आया. उन्होंने फोन पर कहा कि वह घर का सब काम छोड़ कर तुरंत बैंक जाए और 4 लाख रुपए निकाल कर दुकान में मुस्तफा को दे आए.

सुनीता अभी इतने पैसे के बारे में पति से कुछ पूछती कि इस से पहले ही कुलदीप ने गंभीरता से कहा कि बहुत ही अर्जेंट है, वह देरी न करे.

मुस्तफा घर से महज 500 मीटर की दूरी पर उन की आटो स्पेयर पार्ट्स हार्डवेयर की दुकान का विश्वस्त सेल्समैन था. सुनीता को पता था कि कारोबार के सिलसिले में पैसे की जरूरत पड़ती रहती थी, फिर भी कैश में इतनी बड़ी रकम ले कर सोच में पड़ गई.

फिर भी उस ने पैसे को ले कर अपने दिमाग पर जोर नहीं डाला, क्योंकि अचानक उसे ध्यान आया कि कुलदीप कुछ दिनों से एक सेकेंडहैंड कार खरीदने की बात कर रहे थे. उस ने सोचा शायद उन्होंने उस के लिए पैसे मंगवाए हों.

सुनीता को भी जन्मदिन का गिफ्ट खरीदने के लिए जाना था, तय किया कि वह दोनों काम एक साथ कर लेगी और दोपहर डेढ़-दो बजे तक वापस घर लौट कर बाकी की तैयारियों में लग जाएगी.

सुनीता ने पति के कहे अनुसार ठीक साढ़े 12 बजे मुस्तफा को पैसे का थैला पकड़ाया और जाने लगी. मुस्तफा सिर्फ इतना बता पाया कि कोई पैसा लेने आएगा, उसे देने हैं. सुनीता ने कहा, ‘‘ठीक है, पैसे संभाल कर रखना. मैं चलती हूं मुझे बहुत काम है.’’

उस के बाद सुनीता ने पास ही एक शोरूम से कुछ शौपिंग की और घर आ कर बाकी का काम निपटाने में जुट गई. सुनीता के पास दिन में ढाई बजे के करीब कुलदीप का फोन आया.

उन्होंने पैसे मिलने जानकारी दी थी. सुनीता ने शाम को जल्द आने के लिए कहा. लेकिन इस का कुलदीप ने कोई जवाब नहीं दिया. सुनीता से इसे अन्यथा नहीं लिया और अपना अधूरा काम पूरा करने लगी.

शाम के 4 बज गए थे. दिव्यांशु ने अपने पिता को फोन किया, लेकिन फोन बंद था. वह मां से बोला, ‘‘मम्मी, पापा का फोन बंद आ रहा है.’’

‘‘क्यों फोन करना है पापा को?’’ सुनीता बोली.

‘‘4 बज गए हैं. उन को जल्दी आने के लिए बोलना है.’’ दिव्यांशु कहा.

‘‘अरे आ जाएंगे समय पर… मैं मुस्तफा को बोल आई हूं जल्दी घर आने के लिए.’’ सुनीता बोली.

‘‘मगर मम्मी, पापा का फोन बंद क्यों है?’’ दिव्यांशु ने सवाल किया.

‘‘बंद है? अरे नहीं, बैटरी डिस्चार्ज हो गई होगी. थोड़ी देर बाद फोन करना.’’ सुनीता बोली.

दिव्यांशु ने मां के कहे अनुसार 10 मिनट बाद पापा को फिर फोन लगाया. अभी भी उन का फोन बंद आ रहा था. उस ने मां को फोन लगाने के लिए कहा. सुनीता ने भी फोन लगाया. उसे भी कोई जवाब नहीं मिल पाया. उस ने 2-3 बार फोन मिलाया मगर फोन नहीं लगा.

उसे अब पति की चिंता होने लगी. वह 4 लाख रुपए को ले कर चिंतित हो गई. अनायास मन में नकारात्मक विचार आ गए. कहीं पैसे के कारण कुलदीप के साथ कुछ हो तो नहीं गया.

देरी किए बगैर सुनीता ने फोन न लगने की बात अपने जेठ संजीव गुप्ता और दूसरे रिश्तेदारों को बताई. उन्हें भी चिंता हुई और कुलदीप के हर जानपहचान वाले को फोन लगाया गया. कहीं से उस के बारे में कोई जानकारी नहीं मिल पाई.

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परिवार के लोग परेशान हो गए. जैसेजैसे समय बीतने लगा, वैसेवैसे उन की चिंता और गहरी होने लगी. सभी किसी अनहोनी से आशंकित हो गए. इशिका और दिव्यांशु रोनेबिलखने लगे. घर में खुशी के जन्मदिन की तैयारी का माहौल गमगीन हो गया.

रात के 11 बज गए थे. कुलदीप के बड़े भाई संजीव गुप्ता ने कुलदीप के लापता होने की जानकारी थाना पाकबड़ा के थानाप्रभारी योगेंद्र यादव को दी.

सुनीता ने उन्हें दिन भर की सारी बातें बताई कि किस तरह से कुलदीप ने अचानक पैसे मंगवाए और उन के अलावा किसी की भी कुलदीप से फोन पर बात नहीं हो पाई.

पैसे की बात सुन कर पुलिस ने इस बात का अंदाजा लगा लिया कि लेनदेन के मामले में कुलदीप कहीं फंसा होगा या फिर उस की हत्या हो गई होगी. इस की सूचना थानाप्रभारी योगेंद्र ने अपने उच्चाधिकारियों को दी और आगे की काररवाई में जुट गए.

अगले दिन पुलिस ने कुलदीप की दुकान के खास कर्मचारी मुस्तफा से पूछताछ शुरू की. मुस्तफा ने बताया कि दुकान खोलने के कुछ समय बाद ही वह किसी के साथ एक मरीज देखने के लिए अस्पताल जाने की बात कहते हुए चले गए थे. उस वक्त साढ़े 9 बजे का समय था.

मुस्तफा ने बताया कि जाते समय कुलदीप ने लौटने में देर होने की स्थिति में बाइक को वहीं किनारे लगा कर दुकान की चाबियां घर दे आने को कहा था.

थानाप्रभारी ने मुस्तफा से उस रोज की पूरी जानकारी विस्तार से बताने को कहा. मुस्तफा ने 4 जून, 2021 को दुकान खोले जाने के बाद की सभी जानकारियां इस प्रकार दी—

सुबह के 9 बजे हर दिन की तरह कुलदीप पाकबाड़ा के डींगरपुर चौराहे पर स्थित अपनी आटो स्पेयर पार्ट्स की दुकान पर पहुंच गए थे. उन्होंने कर्मचारियों को चाबियां दे कर दुकान खोलने को कहा था.

उन का अपना मकान करीब आधे किलोमीटर दूरी पर मिलन विहार मोहल्ले में था. उन के भाई संजीव गुप्ता का मकान भी वहां से 500 मीटर की दूरी पर था.

चाबियां सौंपने के बाद कुलदीप ने अपने खास कर्मचारी मुस्तफा को अलग बुला कर बताया कि वह एक परिचित को देखने के लिए अस्पताल जा रहे हैं. इसी के साथ उन्होंने हिदायत भी दी कि उन्हें वहां से लौटने में देर हो सकती है, इसलिए आज दुकान की पूरी जिम्मेदारी उसी के ऊपर रहेगी.

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कुलदीप गुप्ता ऐसा पहले भी कर चुके थे. इस कारण मुस्तफा ने उस रोज की बात पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया.

उसी वक्त सड़क के दूसरी ओर बाइक पर एक आदमी आया. वह हेलमेट पहने हुए था. कुलदीप उस की बाइक पर बैठ कर चले गए. यह सब 5-7 मिनट में ही हो गया.

दुकान के कर्मचारी अपनेअपने काम में लग गए. सेल्समैन का काम संभालने वाला मुस्तफा काउंटर पर आ गया. इस तरह दुकान की दिनचर्या शुरू हो गई.

अगले भाग में पढ़ें- कुलदीप की हत्या की सूचना से घर में कोहराम मच गया

Manohar Kahaniya: प्यार के जाल में फंसा बिजनेसमैन- भाग 2

‘‘तो क्या मुझे कालीकलूटी बदसूरत होना चाहिए था?’’ अपनी सुंदरता की प्रशंसा सुन कर मानसी ने तंज कसा.

‘‘अरे मैं ने ऐसा कब कहा, और न ही ऐसा कोई खयाल मेरे दिमाग में ही आया. अगर मेरी बात बुरी लगी हो तो उस के लिए माफी मांगता हूं.’’ ऐसा कहते हुए संजीव ने अपना हाथ मानसी के हाथ पर रख दिया.

मानसी थोड़ी असहज हुई, लेकिन अन्यथा नहीं लिया और बात बदलते हुए बोली, ‘‘आप का यहां आना बिजनैस के सिलसिले में हुआ है?’’

‘‘ऐसा ही समझो. फिलहाल तो मैं यही कहूंगा कि तुम ने मुझ पर भरोसा किया. मेरे बुलाने पर आ गई और हम साथसाथ डेटिंग पर हैं.’’ संजीव ने कहा.

‘‘मुझे आप के साथसाथ खुद पर भी विश्वास है. तभी तो मैं ने दोस्ती की है. इसे निभाया जाना बहुत कुछ दूसरी बातों पर भी निर्भर है,’’ मानसी बोली.

उस के बाद दोनों ने रायपुर में करीब 2 घंटे साथसाथ गुजारे. हाइवे से होते हुए उन्होंने एक रेस्टोरेंट में साथ खाना खाया, माल में खरीदारी की. इस दौरान उन्होंने एकदूसरे को समझते हुए कई तरह की बातें की.

मानसी ने जब संजीव से विदा ली तो उस का चेहरा खिला हुआ था. संजीव भी घंटों की निजी व्यस्तता के बावजूद संतुष्ट और तरोताजा महसूस कर रहा था.

रायपुर में हुई दोनों की पहली मुलाकात में ही दोस्ती की बुनियाद पड़ गई थी. हालांकि संजीव और मानसी की उम्र में 15 सालों का अंतर था. फिर भी उन के बातव्यवहार हमउम्र युवाओं की तरह होने लगे थे.

बातोंबातों में संजीव ने मानसी को आश्वस्त कर दिया था कि वह उस के हर सुखदुख में भागीदार बनेगा. इस तरह बहुत जल्द ही वे एकदूसरे के काफी करीब आ गए.

दोनों के बीच दोस्ती की आड़ में प्रेम संबंध की प्रगाढ़ता गहरी होती चली गई, जबकि संजीव विवाहित था और मानसी अविवाहित अपने करियर की तलाश में थी.

संजीव और मानसी अकसर मिलनेजुलने लगे. उन की डेटिंग का नियमित सिलसिला चल पड़ा. यह कहें कि उन की दोस्ती सरपट दौड़ पड़ी थी. उस में ठहराव की कोई गुंजाइश नजर नहीं आ रही थी.

एक दिन मानसी ने संजीव के कई काल रिसीव नहीं किए. संजीव के साथ ऐसा पहली बार हुआ था. उसे आश्चर्य हुआ. काफी समय बाद मानसी की काल आने पर संजीव ने चिंता जताते हुए पूछा, ‘‘क्या बात है? किसी प्राब्लम में हो क्या?’’

मानसी छूटते ही बोली, ‘‘अब मैं तुम्हें क्या बताऊं, मुझे कुछ रुपयों की अचानक जरूरत आ गई है. इसी परेशानी में थी जब तुम्हारा फोन आ रहा था.’’

‘‘बस, इतनी सी बात. अरे, मैं भला क्यों हूं. मुझे बताने में हर्ज क्या है? बताओ तुम्हें कितना पैसा चाहिए?’’

‘‘यूपीएससी की कोचिंग में एडमिशन के बैच की कल अंतिम तारीख है. उस के लिए कुछ पैसे कम पड़ रहे हैं.’’

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‘‘तुम चिंता मत करो, मैं तुम्हारे अकाउंट में आज ही रुपए डलवा दूंगा, अमाउंट बताओ. और अब मुसकरा दो. खिलखिला दो हमेशा की तरह, अकाउंट नंबर बैंक के आइएफएस कोड के साथ भेज दो.’’

खाते में एक लाख रुपए भेजने पर चौंक गई मानसी

शाम होतेहोते मानसी के अकाउंट में एक लाख रुपए की राशि आ चुकी थी. इतनी बड़ी राशि देख कर के मानसी को विश्वास ही नहीं हो पा रहा था. उसे तो सिर्फ 25 हजार रुपए की ही जरूरत थी.  उस ने सोचा ही नहीं था कि संजीव इतनी बड़ी राशि भेज देगा.

मानसी सोच में पड़ गई कि आखिर इतना पैसा संजीव ने क्यों दिया? गलती से या फिर जानबूझ कर? इसे संजीव ने बहुत ही हलके में लिया.

उस के बाद संजीव और मानसी की मुलाकातें और भी अधिक होने लगी थीं. एक बार जब मानसी ने पैसे लौटाने की बात की तब संजीव ने उसे झिड़क दिया था. डांटते हुए कहा था कि वह दोबारा ऐसी बात नहीं करे. उस के पास सब कुछ है. किसी बात पर जब भी मानसी को संजीव उदास देखता, तो तुरंत पूछ बैठता, ‘‘अरे, यह क्या, तुम्हें कुछ पैसे की जरूरत है तो बेझिझक बताओ.’’

मानसी जवाब देने के बजाय सिर्फ उस की ओर देखती रहती और गोलगोल आंखें मटका देती. इस पर संजीव बोल देता, ‘‘यही तो तुम्हारी खूबी है, जिस कारण मैं तुम्हें जी जान से चाहता हूं, प्यार करता हूं.’’

संजीव समयसमय पर मानसी की बढ़चढ़ कर आर्थिक मदद करने लगा. यह कहा जा सकता है कि संजीव ने मानसी के लिए न केवल अपने दिल के दरवाजे खोल दिए थे, बल्कि तिजोरी भी खोल रखी थी.

दूसरी तरफ संजीव जैन की करोड़ों की दौलत देख कर के मानसी की रुपयों की चाहत बढ़ती चली गई. जब भी जरूरत होती, वह संजीव से पैसे मांग लेती थी. संजीव ने भी कभी आनाकानी नहीं की.

एक दिन सुबहसुबह मानसी का फोन आया, संजीव ने काल रिसीव की तो मानसी ने चिंतित भाव से कहा, ‘‘संजू मुझे कुछ रुपए की जरूरत है. मैं कहना नहीं चाह रही थी… मैं ने तुम से वैसे भी बहुत पैसे ले रखे हैं, लेकिन क्या करूं समझ में नहीं आ रहा. तुम्हारे सिवाय कोई और मेरा मददगार भी तो नहीं.’’

‘‘हांहां बोलो, मैं भेज दूंगा.’’ संजीव ने कहा.

‘‘दरअसल, मुझे कुछ ज्यादा रुपए चाहिए. पैरेंट्स मकान ले रहे हैं. कुछ पैसे मेरे पास हैं…’’ मानसी झिझकते हुए बोली.

‘‘ओह, यह तो बहुत अच्छी बात है, मकान के लिए कितना चाहिए?’’

‘‘यही करीब 50 लाख रुपए.’’

‘‘क्या कहा 50 लाख?’’ संजीव चौंक गया.

‘‘हां मकान 70 लाख का है और मुझे 50 लाख चाहिए.’’ मानसी बोली.

‘‘मगर इतनी बड़ी रकम मै कहां से, कैसे दे पाऊंगा?’’ संजीव ने मजबूरी बताई.

‘‘फिर भी संजीव, कुछ करो न मेरी खातिर.’’ मानसी आग्रह करती हुई बोली.

‘‘मैं तुम्हें ज्यादा से ज्यादा 25 लाख रुपए का इंतजाम करवा सकता हूं, बाकी का फाइनैंस करवाने की कोशिश करता हूं.’’ संजीव ने उपाय बताया.

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किसी न किसी बहाने से ऐंठती रही रुपए

मानसी खुशी से चहक पड़ी, ‘‘हांहां, यह ठीक रहेगा. कुछ रुपए तुम दे देना, बाकी का फाइनैंस करवा देना. उस की किस्त पैरेंट्स के साथ मिल कर मैं भरती रहूंगी… सचमुच तुम बहुत अच्छे हो. कैसे तुम्हारा शुक्रिया करूं समझ नहीं पा रही हूं.’’

‘‘अरे इस की कोई जरूरत नहीं, तुम खुश तो समझो उस में मेरी भी खुशी.’’ यह कह कर संजीव ने फोन कट कर दिया.

संजीव जैन ने अपने पास से 25 लाख रुपए मानसी को 3 दिनों के भीतर ही दे दिए. बाकी के 25 लाख रुपए बैंक से फाइनैंस करवाने के लिए आवेदन करवा दिया. गारंटर खुद बन गया.

जल्द ही होम लोन फाइनैंस भी हो गया और मानसी को नया मकान मिल गया. संजीव की मदद यहीं तक नहीं रुकी. उस के बाद घर का फरनीचर, गाड़ी लेने के नाम पर कई तरीके से मानसी संजीव जैन का दोहन करती रही.

संजीव बिना किसी आनाकानी के खुशीखुशी उस पर रुपए लुटाता रहा. उस के बाद रुपयों की लालच मानसी की बढ़ती ही जा रही थी. इसी बीच उस का विवाह उत्तर प्रदेश के शहर मेरठ के रहने वाले ललित सिंह से हो गया. इस से संजीव को झटका भी लगा, लेकिन वह इस में कुछ कर भी नहीं सकता था.

कुछ दिनों तक उस का मानसी से संपर्क टूटा रहा. हालांकि मानसी अपनी ससुराल मेरठ में कम मायके रायपुर में ही अधिक रहती थी.

शादी के बाद मानसी ने संजीव को एक बार भी याद नहीं किया. कई महीने बीत गए थे. एक दिन संजीव ने ही मानसी को फोन कर हालचाल पूछा.

मानसी अपना हाल बतातेबताते रो पड़ी, ‘‘मैं बहुत दुखी हूं, मैं मर जाऊंगी, मेरा कुछ भी नहीं हो सकता…  अच्छा किया तुम ने फोन कर लिया.’’

भोजपुरी एक्ट्रेस मोनालिसा ने फ्लॉन्ट किया सिंपल लुक, देखें Photos

भोजपुरी इंडस्ट्री की हॉट एक्ट्रेस मोनालिसा (Monalisa) अक्सर अपनी फोटोज और वीडियो को लेकर सुर्खियों में छायी रहती है. वह अपनी अदाओं से दर्शकों का दिल जीतने में कामयाब होती जा रही है. मोनालिसा अक्सर फैंस के साथ अपनी फोटोज शेयर करती रहती हैं. लेकिन अब एक्ट्रेस ने अपना सिंपल लुक फ्लॉन्ट किया है.

मोनालिसा ने इंस्टाग्राम पर कुछ तस्वीरें शेयर की हैं. वह येलो ब्लाउज और ब्लू कलर की साड़ी में काफी खूबसूरत लग रही हैं. इसके साथ ही उन्होंने न्यूड मेकअप किया है.

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इन तस्वीरों में मोनालिसा का सिंपल लुक देखने को मिल रहा है. इस तस्वीर में वो हाथ में पेपर-पैन लिए हुए लिखने से पहले कुछ सोचते हुए नजर आ रही हैं.एक्ट्रेस ने इन फोटोज शेयर करते हुए लिखा,  ये रुकने के लिए ठीक है. बस… पूर्वी.’

 

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सोशल मीडिया पर  फैंस उनकी जमकर तारीफ कर रहे हैं. एक यूजर ने लिखा,  मोना आप सोना की तरह दिखती हो, सुंदर सुंदर. बता दें कि मोनालिसा ने वो हंगामा की वेब सीरीज ‘पूर्वी’  में काम कर रही हैं. इसमें वो शादीशुदा महिला के किरदार में नजर आने वाली हैं.

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अगर मोनालिसा के इसके अलावा वर्कफ्रंट की बात की जाए तो उनकी पाइपलाइन में कई प्रोजेक्ट्स हैं. उनके पास इस समय वेब सीरीज ‘धप्पा’ और ‘रात्रि के यात्रि 2’ भी है.

Imlie: आर्यन के घर में रहेगी इमली, अब क्या करेगा आदित्य

स्‍टार प्‍लस का सीरियल इमली की कहानी में इन दिनों लगातार बड़ा ट्विस्ट देखने को मिल रहा है. शो में आपने देखा कि इमली आदित्य की जिंदगी से काफी दूर चली गई है. तो वहीं अब वह आर्यन के करीब होती जा रही है. शो के आने वाले एपिसोड में दिलचस्प मोड़ आने वाला है. आइए बताते हैं शो के नए एपिसोड के बारे में.

शो के बिते एपिसोड में आपने देखा कि इमली आदित्‍य का घर छोड़कर हॉस्‍टल में रहती थी. लेकिन उसे हॉस्‍टल से भी निकाल दिया गया है और वह ऑफिस में रहने लगी. तो दूसरी तरफ जब आर्यन को इस बात का पता लगा तो उसने इमली को ऑफिस से निकाल दिया.

 

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शो में आप देखेंगे कि इमली रास्‍ते में एक बेंच पर सो जाएगी तभी वहां कुछ गुंडे आएंगे. लेकिन आर्यन इन गुंडों से इमली को बचाएगा. और वह अपने घर में रहने के लिए उसे कहेगा.

 

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तो दूसरी तरफ इमली मना कर देगी लेकिन वह उसे कहेगा कि घर का किराया देकर वह रह सकती है. इमली आर्यन की बात मान लेगी.जब इमली आर्यन के घर पहुंचेगी तो वहां पार्टी चल रही होगी. इसी बीच आर्यन इमली के साथ पहुंचेगा.

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आर्यन और इमली के बीच नोक-झोक देखने को मिलेगा. आर्यन इमली से कहेगा कि वह इसकी जिंदगी में आने वाला पहला इंसान है जो इडियट नहीं हैं. वह कहेगा कि तुम्‍हारी लाइफ में मुझसे पहले जो भी आये हैं, सब इडियट हैं जिन्होंने तुम्‍हें कभी कुछ नया सीखने नहीं दिया और ये कहकर एक्‍सक्‍यूज दे दिया कि तुम जो हो जैसी हो सही हो.

 

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इमली ये सुनकर हक्का-बक्का रह जाएगी. आर्यन इमली को बदलने की बात कहेगा. तो दूसरी तरफ मालिनी आदित्‍य को तस्‍वीर दिखाएगी जिसमें इमली आर्यन की कार में बैठ रही है तो आदित्‍य ये देखकर टूट जाएगा और उसे काफी दर्द होगा.

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Anupamaa: अनुज से माफी मांगेगा वनराज तो अनुपमा मनाएगी जश्न

रुपाली गांगुली (Rupali Ganguly) और सुधांशु पांडे (Sudhanshu Pandey)  स्टारर ‘अनुपमा’ (Anupama) में फुल ऑन ड्रामा चल रहा है. शो में इन दिनों अनुपमा अनुज की नजदीकियां बढ़ रही है तो वहीं दूसरी ओर काव्या-वनराज में दूरियां बढ़ रही है. शो के आने वाले एपिसोड में बड़ा ट्विस्ट आने वाला है. आइए बताते हैं शो के नए एपिसोड के बारे में.

शो में आप देखेंगे कि बा और बापूजी की एनिवर्सरी सेलिब्रेशन की शुरुआत होगी. इस फोटोशूट में बा और बापूजी का लुक पूरी तरह बदला नजर आएगा. तो वहीं पूरा परिवार बा और बापूजी की खुशियां मनाएगा. तो दूसरी तरफ बा अपने भाई और बेटी-दामाद को याद करके रो पड़ेगी. लेकिन बा की खुशियों में संजय और डॉली और मामा जी भी आएंगे.

Balika Vadhu 2: आनंदी और जिगर की होगी शादी तो आनंद करेगा ये काम

 

काव्या मन ही मन अनुपमा को कोसेगी. वनराज उसे इग्नोर करेगा. शो में आप ये भी देखेंगे कि सेलिब्रेशन के दौरान अनुज और गोपी काका की एंट्री होगी. तो वही सब चौंक जाएंगे. बा जाकर दोनों का स्वागत करेगी और आने के लिए शुक्रिया कहेगी.

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वह दोनों से माफी भी मांगेगी. इतना ही नहीं बा इशारे से वनराज को कुछ कहेगी. तो वहीं वनराज अनुज से अपने किए की माफी मांगेगा.

 

यह सब देखकर अनुपमा बहुत खुश होगी. तो वहीं काव्या को होश उड़ जाएंगे. तो दूसरी गोपी काका और बापूजी अनुपमा-अनुज के रिश्ते को आगे बढ़ाने की बात करेंगे. शो में अब ये देखना होगा कि क्या शाह परिवार की खुशियां बरकरा रहेगी या फिर काव्या और राखी दवे कोई नई चाल चलेगी?

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खूबसूरती की मल्लिका अनारा बेगम- भाग 3: एक हिंदू राजा ने मुस्लिम स्त्री से ऐसे निभाया प्यार

महाराजा ने उस के नाजुक हाथ को चूमते हुए कहा, ‘‘बेगम, मैं बहुत ही अय्याश रहा हूं, लेकिन आप से प्यार होने के बाद मेरा दिल बदल गया है. मैं भी बदल गया हूं. मुझे लगता है कि वह गजसिंह जो औरतों को खेल और भोग विलास की वस्तु समझता था, मर गया है.’’

प्रकाश धीमा था. बेगम रुंधे गले से बोली, ‘‘कुछ कीजिए न, मुझ से अब अलगाव नहीं सहा जाता. मैं कब तक मोहब्बत की झूठी बातों से नवाब को भरमाए रखूंगी. जिंदगी जीने का असली लुत्फ तो आप के साथ है. सच, मैं आप के इश्क के साए में इन बलिष्ठ भुजाओं में ही दम लेना और तोड़ना चाहती हूं. मैं नवाब के साथ हरगिज नहीं रह सकती.’’

गजसिंह बाहर फैले अंधेरे को देखते रहे, बेगम खिड़की की चौखट पर सिर रख कर लंबीलंबी सांसें ले रही थी. गज सिंह ने तभी कहा, ‘‘अनारा मेरी जान, चिंता मत करो, मैं आप के लिए संसार की सारी खुशियां छोड़ सकता हूं. मैं आप को वचन देता हूं कि आप को प्राण रहते नहीं छोड़ूंगा. मैं राजपूताने का वीर हूं. क्षत्रिय हूं. क्षत्रियों में राठौड़ हूं. हम राजपूत अपनी प्रतिज्ञा पूरी करने के लिए सिर कटने के बाद भी धराशाई नहीं होते. आप को अपनी तलवार पर हाथ रख कर भरोसा देता हूं कि आप का वही ओहदा होगा, जो हमारे महलों में पटरानी का होता है.’’

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‘‘फिर आप मुझे यहां से ले चलिए,’’ अनारा बेगम ने कहा.

‘‘मैं आप को अभी ले जा सकता हूं.’’

‘‘फिर देरी क्यों?’’

और फिर उसी वक्त रात के अंधेरे में दोनों प्रेमी झरोखे से उतर कर चल दिए.

खामोश रात और दोनों के खामोश इरादे. किसी को कुछ पता न चला. सिर्फ जरीन जानती थी कि अनारा बेगम कहां गई है. दूसरे दिन आगरा में तूफान मच गया.

आगरा के हर प्रतिष्ठित व्यक्ति के यहां इसी चर्चा का बाजार गरम था. लोगों को पता था कि अनारा बेगम कहां गई हैं? पर सब चुप थे. हां, यह निर्विवाद रूप से कहा जाता रहा कि बेगम की उम्र नवाब फजल से बहुत कम थी. कुल मिला कर नवाब अनारा बेगम के लायक नहीं थे.

नवाब साहब जो मुगल सम्राट शाहजहां के कृपापात्र थे, जहांपनाह के हुजूर में हाजिर हुए.

‘‘क्या बात है नवाब साहब?’’ बादशाह शाहजहां ने पूछा.

नवाब फजल ने सारी बातें दर्द भरी आवाज में सम्राट शाहजहां को सुना दी.

‘‘आप फिक्र न करो.’’

शाहजहां ने तुरंत महाराजा गजसिंह को तलब किया. गजसिंह ने भी हाजिर हो कर औपचारिकताएं पूरी करने के बाद बादशाह से कहा, ‘‘जहांपनाह कहिए, कैसे याद किया?’’

सुन कर बादशाह ने तनिक आदेश भरे स्वर में कहा, ‘‘अनारा बेगम कहां हैं?’’

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‘‘मुझे नहीं मालूम, और आप ने मुझ से ऐसा सवाल किया ही क्यों? मैं मुगलिया सल्तनत की देखभाल करता हूं. उस के मनसबदारों, सरदारों की बीबियों की नहीं.’’ गजसिंह कठोरता से एक ही सांस में बोलते चले गए.

शाहजहां ने प्रश्नवाचक नजरें गजसिंह पर डालीं. ईरानी कालीन पर थोड़ी चहलकदमी करते हुए कहा, ‘‘मुगलिया सल्तनत पर आप के बहुत एहसान हैं. आप ने अपनी बहादुरी और जवांमर्दी से हमारे तख्तोताज की कई बार हिफाजत की है, लेकिन हम यह भी जानते हैं कि औरत आप की कमजोरी रही है. ऐसी हालत में आप हमारे किसी खैरख्वाह को नाराज कर हमारे बीच झगड़ा भी करा सकते हैं. आप हमारी बात पर गौर कीजिए कि इस से फसाद भी हो सकता है.’’

गजसिंह की भौहें तन गई थीं. रूखेपन से बोले, ‘‘एक अदना सा मनसबदार मुझ पर बेबुनियाद दोष लगा रहा है आलमपनाह. राठौड़ का रक्त अभी ठंडा नहीं हुआ है कि मुगल जब चाहें उन्हें ललकार दें. यदि मुझ पर झूठा दोष लगाने का साहस किया गया तो नवाब को बहुत बुरे अंजाम से टकराना पड़ेगा.’’

अब शाहजहां ने अपना रुख बदला. वह समझ गए कि महाराजा गजसिंह राठौड़ इस तरह की डांटडपट और धमकियों में नहीं आ सकते. तुरंत मधुरता से बोले, ‘‘आप मेरी बात का मतलब नहीं समझे. आप मुझ पर यकीन क्यों नहीं करते? मुझ में भी आप का खून है. मैं आप को तहेदिल से कहता हूं, मामू आप मुझे अपना समझ कर सब कुछ सचसच बता दें. मैं आप से एक शहंशाह की हैसियत से नहीं जाती तौर पर अर्ज कर रहा हूं, मैं आप के हक में ही फैसला करूंगा.’’

‘‘वायदा करते हो.’’

‘‘वायदा करता हूं मामू.’’ शाहजहां ने विनीत स्वर में कहा, ‘‘मैं नहीं चाहता कि ऐसी मामूली बातें खौफनाक अंजाम में बदल जाएं.’’

गजसिंह ने सारी बातें बता कर कहा, ‘‘बेगम हमारे पास हैं. हम उन से अलग नहीं रह सकते. हम उन के लिए सब कुछ छोड़ने के लिए तैयार हैं. आप की नजरेइनायत और ओहदा भी. यह भी सच है कि हम उस के लिए दुनिया की बड़ी से बड़ी ताकत से टकरा भी सकते हैं.’’

‘‘हम से भी मामू?’’ सम्राट शाहजहां ने कहा.

‘‘गुस्ताखी मुआफ हो, वक्त आया तो मुगल सल्तनत से भी.’’ गज सिंह की आंखें झुक गई थीं.

बादशाह ने बात बदलते हुए पूछा, ‘‘आप के राठौड़ वंश में बेगम का ओहदा क्या रहेगा?’’

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‘‘हम उन्हें बड़ी इज्जत देंगे, जो अपनी महारानी को दे रहे हैं. जहांपनाह, हम उन्हें बहुत प्यार करते हैं. हम उन के साथ पूरी वफा से पेश आएंगे.’’ गजसिंह ने जवाब दिया.

शाहजहां ने कहा, ‘‘हम आप को उसे गैर तरीके से बख्शते हैं. आप उसे जोधपुर भेज दीजिए. पीछे से आप भले जाइए, लेकिन बहुत ही खुफिया से. हम नवाब को दक्षिण भेज देते हैं.’’

‘‘हम आप का यह एहसान कभी नहीं भूल सकेंगे.’’ गजसिंह ने सिर झुका लिया.

महाराजा गजसिंह ने अनारा बेगम को अपनी मौत तक एक हिंदू रानी की तरह इज्जत दी. आज भी जोधपुर में महाराजा की प्रेम दीवानी की याद में अनारा की बावड़ी बनी हुई है.

Satyakatha: पुलिसवाली ने लिया जिस्म से इंतकाम- भाग 2

सौजन्य- सत्यकथा

सुनने के बाद एसीपी सोनावने भी सोच में पड़ गए, ‘‘लांडगे साहब, हम ऐसे ही किसी पर हाथ नहीं डाल सकते, क्योंकि हमारे पास कोई सबूत नहीं हैं. आप ऐसा करो, एक टीम तैयार करो और जरा पता करो कि इन आरोपों में कितनी सच्चाई है.’’

शिवाजी की पत्नी के कहने पर पनवेल पुलिस ने जांच तो शुरू कर दी, लेकिन खुद लांडगे के पास अभी भी इस केस को सड़क दुर्घटना नहीं मानने के लिए कोई सबूत नहीं था.

हालांकि पुलिस को अभी तक यह भी नहीं पता था कि शिवाजी का ऐक्सीडेंट जिस कार से हुआ था, वह कौन सी कार थी.

लेकिन कहानी में पहला ट्विस्ट तब आया, जब इंसपेक्टर लांडगे को पता चला कि शिवाजी सानप के ऐक्सीडेंट वाले स्थान से 2 किलोमीटर की दूरी पर एक सुनसान जगह पर उसी रात एक नैनो कार जली हालत में मिली.

संबंधित चौकी के स्टाफ से जानकारी मिलने के बाद लांडगे सोच में पड़ गए. लांडगे एक ही रात में शिवाजी तथा ऐक्सीडेंट स्पौट से करीब 2 किलोमीटर दूर एक जली हुई कार के मिलने की कडि़यों को जोड़ने की कोशिश कर रहे थे.

इस के अगले ही दिन जब शिवाजी की पत्नी गायत्री ने यह शक जताया कि उस के पति की मौत सड़क दुर्घटना नहीं, बल्कि सोचीसमझी साजिश के तहत की गई है तो पुलिस मौत की जांच का काम करने में जुट गई.

जिस जगह यह हादसा हुआ था, पुलिस ने उस के आसपास लगे तमाम सीसीटीवी कैमरों की फुटेज निकालनी शुरू कर दी. पुलिस ने थाना नेहरू नगर के ड्यूटी औफिसर और शिवाजी के परिवार वालों से शिवाजी के आनेजाने के रुटीन का पता किया कि वह पुणे से नेहरू नगर पुलिस स्टेशन कैसे आताजाता था.

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इस के बाद उन्होंने नेहरू नगर थाने से ले कर कुर्ला स्टेशन तक जितने भी सीसीटीवी लगे थे, सब को चैक किया. यह एक लंबी कवायद थी, लेकिन मामला चूंकि अपने ही विभाग से जुड़े हैडकांस्टेबल की संदिग्ध मौत से जुड़ी जांच का था, लिहाजा पुलिस ने कोई कसर नहीं छोड़ी.

करीब 250 सीसीटीवी फुटेज को खंगालने के बाद 15 अगस्त की रात शिवाजी की कुर्ला रेलवे स्टेशन से बाहर निकलने की एक फुटेज कैमरे में मिल ही गई.

जांच आगे बढ़ी तो पनवेल के बस स्टैंड पर बस पकड़ने के लिए पैदल चलते एक और सीसीटीवी कैमरे में उन की फुटेज मिल गई. कडि़यों को जोड़ते हुए सड़क को कवर करने वाले सीसीटीवी कैमरों को भी खंगालना शुरू किया तो एक कैमरे में वह वारदात भी कैद मिली, जिस में शिवाजी को तेज रफ्तार नैनो कार कुचलती हुई आगे निकली थी.

इस से एक बात साफ हो गई कि घटना वाली रात करीब 2 किलोमीटर दूर जो नैनो कार जली मिली, उस का संबंध शिवाजी सानप से ही था.

अब नेहरू नगर के सीनियर पीआई अजय कुमार लांडगे को यह समझ आने लगा कि शिवाजी के परिवार ने उन की हत्या की जो आशंका जताई थी, उस में जरूर सच्चाई छिपी थी क्योंकि अगर शिवाजी की मौत सिर्फ हादसा होती तो नैनो कार को जलाने की जरूरत ही नहीं थी.

यानी साफ था कि कातिल सबूत मिटाने के लिए कत्ल के लिए इस्तेमाल हुई कार को जला कर सबूत खत्म करना चाहता था. पुलिस ने जब कुछ और कैमरों को खंगाला तो पता चला कि उस में 2 लोग सवार थे.

पुलिस ने एक्सपर्ट की मदद से कार में बैठे दोनों लोगों की तसवीर जूम कर के तैयार करवाई. पहले पुलिस ने अपने रिकौर्ड खंगाले कि कहीं ऐसा तो नहीं किसी पुराने अपराधी ने शिवाजी से अपनी पुरानी दुश्मनी निकालने के लिए उन की योजनाबद्ध तरीके से हत्या कर दी हो. पुलिस रिकौर्ड में जितने भी अपराधी दर्ज थे, सीसीटीवी से मिले फोटो कहीं भी मैच नहीं हुए.

इस दौरान पुलिस की एक दूसरी टीम जो इस बात की जांच कर रही थी कि शिवाजी सानप की तैनाती कहांकहां रही और उन का रिकौर्ड कैसा था. इस बिंदु पर तफ्तीश करने वाली पुलिस टीम को एक और कहानी पता चली.

कहानी के मुताबिक, साल 2019 में शीतल पंचारी नाम की एक महिला कांस्टेबल ने शिवाजी के खिलाफ 2 अलगअलग पुलिस थानों में 2 रिपोर्ट लिखाई थीं.

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ये दोनों रिपोर्ट छेड़खानी और यौनशोषण की थीं. नई कहानी सामने आने के बाद पुलिस ने 2019 में झांकने का फैसला किया, तब एक नई कहानी सुनने को मिली.

दरअसल, 2019 तक शिवाजी सानप और शीतल पंचारी मुंबई के नेहरू नगर पुलिस स्टेशन में एक साथ काम करते थे. इन दोनों के बीच काफी गहरे रिश्ते भी थे. लेकिन फिर अचानक रिश्तों में काफी कड़वाहट आ गई. दोनों के बीच झगड़े होने लगे और इसी झगड़े के बाद 2019 में शीतल ने 2 अलगअलग पुलिस थानों में शिवाजी के खिलाफ रिपोर्ट लिखा दी.

यह बात शिवाजी की पत्नी और साले को भी पता थी. यही वजह है कि दोनों ने यह शक जताया कि शिवाजी की मौत सड़क हादसा नहीं, बल्कि कत्ल है और इस कत्ल में शीतल का हाथ होने का उन्होंने इशारा किया था.

पनवेल पुलिस स्टेशन नवी मुंबई के जोन-2 एरिया में आता है जिस के डीसीपी हैं शिवराज पाटिल. मामला चूंकि एक पुलिस वाले की मौत का था और शक की सुई विभाग की ही एक महिला कांस्टेबल की तरफ घूम रही थी.

इसलिए इंसपेक्टर लांडगे और एसीपी भगवत सोनावने ने शीतल पंचारी के बारे में डीसीपी पाटिल को बताया गया तो उन्होंने लांडगे को क्लीन चिट दे दी कि कोशिश कर के शीतल के खिलाफ पहले सबूत एकत्र करें, उस के बाद ही उस पर हाथ डालें.

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लेकिन अभी तक शीतल के खिलाफ केवल शक था. पुलिस के पास कोई सबूत नहीं था कि वह उसे कातिल ठहरा सके. इसीलिए इंसपेक्टर लाडंगे ने अपनी टीम को बड़ी खामोशी के साथ शीतल के बारे में जानकारी इकट्ठा करने के काम पर लगा दिया.

शीतल उस समय शस्त्र शाखा में काम कर रही थी. पुलिस ने शीतल के मोबाइल की काल डिटेल्स निकलवा ली. इतना ही नहीं, उस के सोशल मीडिया अकांउट का पता लगा कर उस में भी झांकना शुरू किया, कोशिश रंग लाई.

साथी- भाग 4: क्या रजत और छवि अलग हुए?

‘‘क्या रजत का दिल नहीं करता होगा कि उस के दोस्तों की बीवियों की तरह उस की पत्नी भी स्मार्ट व शिक्षित दिखे, इतना वजन बढ़ा लिया है तुम ने… इस बेडौल शरीर को ढोना तुम्हें क्या उच्छा लगता है? तुम अच्छी पत्नी तो बनी छवि पर अच्छी साथी न बन सकी अपने पति की… सोचो छवि, कई लड़कियों को ठुकरा कर रजत ने तुम्हें पसंद किया था. कहां खो गईर् वह छवि, जिसे वह दीवानों की तरह प्यार करता था?’’

रीतिका की बातें सुन कर छवि को याद आने लगा कि ऐसा कुछ रजत भी कहता था. कई तरह से कई बातें समझाना चाहता था पर उस ने कभी ध्यान ही नहीं दिया. रजत की बातें कभी समझ में नहीं आईं पर रीतिका की बातें उस के कहने के अंदाज से समझ में आ रही थीं.

रीतिका उसे चुप देख कर फिर बोली, ‘‘छवि आज यह बात स्त्रियों पर ही नहीं पुरुषों पर भी समान रूप से लागू होती है… स्मार्ट और शिक्षित स्त्री भी अपने पति में यही सब गुण देखना पसंद करती है… बड़ी उम्र की महिलाएं भी आज अपने प्रति उदासीन नहीं हैं… वे अपने रखरखाव के प्रति सजग हैं… बेडौल पति तो उन्हें भी अच्छा नहीं लगता. फिर पुरुष की तो यह फितरत है.’’

‘‘तो मैं अब क्या करूं रीतिका?’’ छवि हताश सी बोली.

‘‘करना चाहोगी तो सबकुछ आसान लगेगा… पहले तो घर के पास वाला जिम जौइन कर लो… तरहतरह के पकवान बनाना थोड़ा कम करो… रोज का अखबार पढ़ो… टीवी पर समाचार सुनो… बाहर के हर कार्य के लिए बेटे और रजत पर निर्भर मत रहो, खुद करो… इन सब बातों से विश्वास बढ़ता है और विश्वास बढ़ने से व्यक्तित्व निखरता है और व्यक्तित्व निखरने से पति पर अधिकारभावना खुद आ जाएगी.’’

रीतिका की बात सुन कर छवि खुद में गुम हो गई. फिर खुद से एक वादा सा करते हुए बोली, ‘‘मुझे माफ करना रीतिका… मैं ने तुम्हें गलत समझा… मैं आज ही से तुम्हारी बात पर अमल करूंगी. बस एक बात की उम्मीद कर सकती हूं तुम से?’’

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‘‘हां, क्यों नहीं.’’

‘‘तुम्हारीमेरी यह मुलाकात रजत को कभी पता न चले.’’

‘‘कभी पता नहीं चलेगी मुझ पर विश्वास करो. मैं कभी नहीं चाहूंगी कि किसी भी कारण से तुम दोनों के बीच दूरी आए… हमारी यह मुलाकात मेरे सीने में दफन हो गई. तुम बेफिक्र हो कर घर जाओ.’’

छवि घर आ गई. घर लौटते हुए जिम में बात करती आई. 4 महीने का पैकेज था. जिम चलाने वाले ने शर्तिया 15 किलोग्राम वजन घटाने का वादा किया था… उसे एक डाइट चार्ट भी दिया कि उसे सख्ती से इस का पालन करना होगा.

रजत से बिना कुछ बोले छवि अपने अभियान में जुट गई. सच है कोई कितना भी बदलना चाहे किसी को तब तक नहीं बदल सकता, जब तक कोई खुद न बदलना चाहे. अब छवि का नियम बन गया था रोज अखबार पढ़ना और टीवी पर समाचार सुनना. उस ने अखबार वाले से कई पत्रपत्रिकाएं भी लगा ली थीं.

घर की साफसफाई और पकवान बनने कुछ कम हो गए थे पर किसी के जीवन पर इस का कोई खास असर नहीं पड़ा. अलबत्ता छवि की जिंदगी बदलने लगी थी. अब वह अकसर किसी न किसी काम से घर से निकल जाती. इस से खुद को तरोताजा महसूस करती.

बाहर के काम खुद करने से उसे संतुष्टि महसूस होती, जिस से उस में आत्मविश्वास आना शुरू हो गया था. रजत उस में धीरेधीरे आने वाले परिवर्तन को देख रहा था, पर सोच रहा था कि थोड़े दिन की बात है, जो उस की बेरुखी की वजह से शायद छवि में आ गया हो. थोड़े दिनों में अपने फिर पुराने ढर्रे पर आ जाएगी.

लेकिन छवि अपनी उसी दिनचर्या पर कायम रही. 4-5 महीने होतेहोते छवि का वजन 15 किलोग्राम कम हो गया. बदन के उतारचढ़ाव की प्रखरता फिर अपनी मौजूदगी का एहसास कराने लगी. चेहरे की चरबी घट कर कसाव आने से चेहरा कांतिमय हो गया. बड़ीबड़ी झील सी आंखें, जो चरबी बढ़ने से छोटी हो गई थीं, फिर से अपनी गहराई नापने लगीं.

रजत देखता कि अकसर वह खाली समय में पत्रपत्रिकाएं पढ़ते हुए मिलती या फिर बच्चों से कंप्यूटर सीखने का प्रयास करती. वह छवि को फोन पर किसी से बात करते हुए सुनता तो उसे छवि के लहजे व बातचीत पर हैरानी होती. उस की बातचीत का अंदाज तक बदल चुका था.

एक दिन उस ने पार्लर जा कर अपने पूंछ जैसे बाल भी कटवा लिए. कंधों तक लहराते बालों में जब उस ने शीशे में अपना चेहरा देखा तो खुद को ही नहीं पहचान पाई. उस ने कटे बालों को रबड़बैंड से बांधा और घर आ गई.

दूसरे दिन उन्हें सपरिवार मामाजी के घर जाना था. बच्चे तैयार हो कर बाहर निकल गए थे. रजत भी तैयार हो कर बाहर निकला. कार बैक कर के खड़ी की और छवि के बाहर आने का इंतजार करने लगा. थोड़ी देर इंतजार करने के बाद छवि को देर करते देख वह उसे बुलाने अंदर चला गया.

‘‘कहां हो छवि… कितनी देर लगा रही हो… जल्दी करो, देर हो रही है,’’ कहता हुआ वह बैडरूम में चला गया. उस ने देखा चूड़ीदार सूट पहने एक सुंदर व स्मार्ट सी युवती अपने कंधों तक लहराते बालों पर कंघी फेर रही है.

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‘‘छवि,’’ आवाज सुन कर छवि ने पलट कर देखा.

‘‘छवि यह तुम हो,’’ रजत उसे खुशी मिश्रित आश्चर्य से देख रहा था. उसे सामने देख कर छवि ऐसे शरमा रही थी जैसे कल ही शादी हुई हो.

रजत उस के करीब आ गया, ‘‘विश्वास नहीं हो रहा कि यह तुम हो… तुम्हें देख कर तो आज 17-18 साल पहले के दौर में पहुंच गया हूं… ‘‘कितनी सुंदर लग रही हो,’’ वह उस की झील सी गहरी आंखों में डुबकी लगाते हुए बोला.

‘‘चलो हटो… ऐसे ही बोल रहे हो… बहुत सताया आप ने मुझे.’’

‘‘सच कह रहा हूं छवि… प्यार तो मैं तुम्हें हमेशा ही करता था पर पतिपत्नी को एकदूसरे को प्यार करने के लिए, प्यार के माध्यम कभी कम नहीं होने देने चाहिए,’’ वह उसे बांहों में कसते हुए बोला, ‘‘आज तो दिल बहकने को कर रहा है.’’

‘‘मुझे माफ कर दो रजत… मैं ने आप की बातें समझने में बहुत देर कर दी.’’

‘‘कोई बात नहीं… आखिर समझ तो गई, पर अब मेरा मामाजी के घर जाने का मूड नहीं है… बच्चों को भेज देते हैं…’’ रजत शरारत से उस के कान के पास मुंह ला कर बोला.

‘‘ठीक है,’’ रजत की बात समझ खिलखिलाती हुई छवि ने अपनी बांहें रजत के गले में डाल दीं.

मुहरे- भाग 3: विपिन के लिए रश्मि ने कैसा पैंतरा अपनाया

8 बजे निकलती है, मैं उसी समय डस्टबिन बाहर रख देती हूं. हमारी बिल्डिंग में 4 फ्लैट हैं. 2 में महाराष्ट्रियन परिवार रहते हैं. दोनों परिवारों में पतिपत्नी कामकाजी हैं. चौथे फ्लैट में बस एक आदमी ही है. उम्र पैंतीस के आसपास होगी. वीकैंड पर उस के दरवाजे पर ताला लगा रहता है. मेरा अंदाजा है शायद अपने घर, आसपास के किसी शहर जाता होगा. इस आदमी की विपिन और हमारे बच्चों से कभी कोई हायहैलो नहीं हुई है. एक दिन मुझ से सामना होने पर उस ने पूछा, ‘‘मैडम, पीने के पानी की एक बौटल मिलेगी प्लीज? मेरा फिल्टर खराब हो गया है.’’

मैं ने ‘श्योर’ कहते हुए उस की बौटल में पानी भर दिया था. जब मैं डस्टबिन रख रही होती हूं तो वह भी अकसर अपने घर से निकल रहा होता है और मुझे गुडमौर्निंग मैम कहता हुआ सीढि़यां उतर जाता है. उस से सामना होने पर अब मेरी हायहैलो हो जाती है. बस, हायहैलो और कभी कोई बात नहीं. एक दिन हम चारों बाहर से आ रहे थे और लिफ्ट का वेट कर रहे थे तो वह आदमी मुझे गुड ईवनिंग मैम कहता हुआ सीढि़यां चढ़ गया. मैं ने भी सिर हिला कर जवाब दे दिया.

विपिन ने पूछा, ‘‘यह कौन है?’’ ‘‘हमारा पड़ोसी.’’

‘‘वह किराएदार?’’ ‘‘हां.’’

‘‘तुम से हायहैला कब शुरू हो गई? तुम्हें कैसे जानता है?’’ ‘‘एक दिन पानी मांगा था, तब से.’’

‘‘तुम से ही क्यों पानी मांगा, भई?’’ ‘‘बाकी दोनों फ्लैट दिन भर बंद रहते हैं. पानी मांगना कोई बहुत बड़ी बात थोड़े ही है.’’

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‘‘तमीज देखो महाशय की. सिर्फ तुम्हें विश कर के गया.’’ ‘‘अरे, तुम लोगों को जानता ही नहीं है तो विश क्या करेगा? तुम लोग भी तो अपनी धुन में रहते हो… कहां किसी में इंट्रैस्ट लेते हो.’’

‘‘हां, ठीक है, घर में तुम हो न सब में इंट्रैस्ट लेने के लिए. आजकल बड़ी सोशल हो रही हो… कभी लिफ्ट वाले लड़के को अपना नाम बताती हो, तो कभी पड़ोसी को पानी देती हो.’’ मैं ने नाटकीय ढंग से सांस छोड़ते हुए कहा, ‘‘भई, बढ़ती उम्र में आसपास के लोगों से जानपहचान होनी चाहिए. क्या पता कब किस की जरूरत पड़ जाए.’’

‘‘क्या बुजुर्गों जैसी बातें कर रही हो?’’ ‘‘हां, विपिन, उम्र बढ़ने के साथ आसपास के लोगों से संबंध रखने में ही समझदारी है.’’

विपिन मुझे घूरते रह गए. कहते भी क्या. अब बातें करतेकरते हम घर आ कर चेंज कर रहे थे. कई दिन बाद लिफ्ट वाला प्रशांत मुझे शाम के समय गार्डन में भी दिखा तो मैं चौकन्नी हो गई. वह गार्डन में अब मेरे आनेजाने के समय कुछ बातें भी करने लगा था जैसे ‘आप कैसी हैं, मैम?’ या ‘कल आप सैर करने नहीं आईं’ या ‘यह ड्रैस आप पर बहुत अच्छी लग रही है, मैम.’ उस के हावभाव से, नजरों से मैं सावधान होने लगी थी. यह तो कुछ और ही सोचने लगा है.

विपिन और मेरे डिनर के बाद टहलने के समय प्रशांत रोज नीचे मिलने लगा था और मुझे देख कर मुसकराते हुए आगे बढ़ जाता था. प्रशांत का मेरे आसपास मंडराना तो इरादतन था पर नए पड़ोसी का मुझ से आमनासामना होना शतप्रतिशत संयोग होता था. स्त्री हूं इतना तो समझती ही हूं पर विपिन की बेचैनी देखने लायक थी.

वान्या को बाय कहती हुई मैं अकसर पड़ोसी की भी गुडमौर्निंग का जवाब देती तो ड्राइंगरूम में पेपर पढ़ते विपिन मुझे अंदर आते हुए देख कर यों ही पूछते, ‘‘कौन था?’’

मैं पड़ोसी कह कर किचन में व्यस्त हो जाती. अब अच्छे मूड में विपिन अकसर मुझे ऐसे छेड़ते, ‘‘इतनी वैलड्रैस्ड हो कर सैर पर जाती हो… लगता ही नहीं कि तुम्हारे इतने बड़े बच्चे हैं… बहन लगती हो वान्या की.’’

मैं हंस कर उन के गले में बांहें डाल देती, ‘‘कितनी भी बहन लगूं पर उम्र तो हो ही रही है न?’’

‘‘अभी तो तुम बहुत स्मार्ट और यंग दिखती हो, फिर उम्र की क्या टैंशन है?’’ ‘‘सच?’’ मैं मन ही मन खुश हो जाती.

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‘‘और क्या? देखती नहीं हो? आकर्षक हो तभी तो वह लिफ्ट वाला और यह पड़ोसी तुम से हायहैलो का कोई मौका नहीं छोड़ते.’’ ‘‘अरे, उन की क्या बात करनी… उन की उम्र देखो, दोनों मुझ से छोटे हैं.’’

‘‘फिर भी उम्र की तो बात छोड़ ही दो, नजर तुम पर उठती ही है. तुम ने अपनेआप को इतना फिट भी तो रखा है.’’ मैं मुसकराती रही. अब मैं ने नोट किया विपिन ने पूरी तरह से उम्र बढ़ने के मजाक बंद कर दिए थे पर अब भी जब प्रशांत और पड़ोसी मुझे विश कर रहे होते, ये मुझे गंभीर होते लगते.

विपिन और मैं एकदूसरे को दिलोजान से चाहते हैं. सालों का प्यार भरा साथ है, जो दिन पर दिन बढ़ ही रहा है. मैं उन्हें इन गैरों के लिए टैंशन में नहीं देख सकती थी. मुझे उम्र के मजाक हर बात में पसंद नहीं थे, वे अब बंद हो चुके थे. यही तो मैं चाहती थी. मुझे स्वयं को ऊर्जावान, फिट रखने का शौक है और मैं स्वयं को कहीं से भी बढ़ती उम्र का शिकार नहीं समझती तो क्यों विपिन उम्र याद दिलाएं. अब ऐसा ही हो रहा था. विपिन को सबक सिखाने के लिए अब प्रशांत और उस पड़ोसी का जानबूझ कर सामना करने की शरारत की जरूरत नहीं थी मुझे. मैं डस्टबिन और पहले बाहर रखने लगी थी. सैर के समय में भी बदलाव कर लिया था. मुझे आते देख कर प्रशांत लिफ्ट की तरफ बढ़ रहा होता तो मैं झट सीडि़यां चढ़ जाती थी. प्रशांत और पड़ोसी मुहरे ही तो थे. इन का काम अब खत्म हो गया था. इन से मेरा अब कोई लेनादेना नहीं था.

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