भेदभाव रहित हो शिक्षा तभी आएंगे अच्छे दिन

नौकरियों के घटते अवसर और  प्राइवेट स्कूलों के बढ़ते खर्चों से परेशान हो कर मातापिता एक बार फिर सरकारी स्कूलों की ओर रुख करने लगे हैं. 1950 से 1980 तक की पीढ़ी ज्यादातर इन्हीं सरकारी स्कूलों की देन है पर जब अंगरेजी माध्यम वाले निजी स्कूलों ने जोर मारा तो सरकारी स्कूलों को उन की घटिया पढ़ाई के लिए जिम्मेदार ठहराते हुए मातापिताओं ने प्राइवेट स्कूलों में लाइनें लगानी शुरू कर दीं, जिस की एक झलक हालिया रिलीज एक फिल्म में दिखी भी.

सरकारी स्कूलोंको छोड़ने की वजह उन की पढ़ाई का गिरता स्तर ही नहीं था, बल्कि उन स्कूलों के दरवाजे तथाकथित नीची जातियों के लिए खोले जाने भी थे. इन स्कूलों में अमीरों के बच्चों के साथ गरीबों के बच्चे तो आते ही थे, ऊंचे वर्णों के साथ नीचे वर्णों के बच्चे भी आने लगे, यह ऊंचे वर्णों को मंजूर न था. जातिवाद की खाइयों को स्कूलों की पढ़ाई पाट दे, इसलिए ऊंचे वर्णों ने पहले तो ईसाई मिशनरियों द्वारा चलाए जाने वाले स्कूलों की ओर रुख किया और फिर धड़ाधड़ अपने स्कूल खोले.

व्यापारियों ने इस में पैसा भी देखा और उन्होंने मुनाफा न कमाने वाली समाजसेवी संस्थाएं खोल कर हजारों स्कूल खोल डाले जबकि उन का उद्देश्य केवल पैसा कमाना है. आज इन स्कूलों में जो अच्छी पढ़ाई हो रही है वह स्कूलों के भव्य भवनों की वजह से नहीं, अच्छे अध्यापकों की वजह से नहीं, अनुशासन की वजह से नहीं बल्कि मातापिताओं की अपने बच्चों की निरंतर देखरेख के कारण हो रही है.

फिर भी, सरकारी स्कूल 12वीं की परीक्षाओं में बाजी मार रहे हैं. सैकड़ों मेधावी बच्चे सरकारी स्कूलों से निकल कर आ रहे हैं. सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों के मातापिता सुविधाओं के अभाव में, पेट काट कर बच्चों को पढ़ा रहे हैं.

सरकारी स्कूल आमतौर पर सरकार के लिए महंगे हैं. सरकारी स्कूल, जो दिखते फटेहाल हैं, में प्रति बच्चा कुल खर्च प्राइवेट स्कूलों से दोगुना है. प्राइवेट स्कूलों की फीस ज्यादा है तो इसलिए कि वहां करदाताओं का पैसा नहीं लगा है.

अब जबकि पिछड़ी और निचली जातियों के बच्चों को भी गरीब कोटे या उन के पास अपनी अच्छी कमाई होने से अंगरेजी माध्यम स्कूलों में जगह मिलने लगी है, निजी स्कूलों का मुख्य उद्देश्य-वर्णभेद-फीका होता जा रहा है और कम से कम संपन्न पिछड़े और निचले वर्णों के मातापिता घटिया प्राइवेट स्कूलों की जगह सरकारी स्कूलों की ओर रुख करने लगे हैं, तो जनता ने भी सरकारी स्कूलों की खैरखबर लेनी शुरू कर दी है. अच्छा परिणाम देना सरकारी स्कूलों के प्रबंधकों के लिए अब जरूरी होने लगा है.

स्कूली शिक्षा, कम से कम 8वीं कक्षा तक, केवल पड़ोस के सरकारी स्कूल में होनी चाहिए और उस में हर वर्ग, हर वर्ण, हर धर्म, हर सैक्स के बच्चे साथसाथ पढ़ें, एक ही पढ़ाई करें और जहां तक हो सके मुख्य पढ़ाई अपने इलाके की मातृभाषा व हिंदी में पढ़ाई जाए. अंगरेजी भी पढ़ाई जा सकती है पर वह एक विषय के रूप में.

बच्चों को ‘ए’ फौर ऐप्पल पढ़ाना जरूरी नहीं, जब तक घर में वे सेब ही खा रहे हैं. निजी स्कूलों ने वर्णव्यवस्था को बेहद मजबूत किया है. अगर एक देश बनाना है तो  छुआछूत को मिटा कर बच्चों को, एकदूसरे को, प्राकृतिक तौर पर समझने का अवसर दिया जाना चाहिए.

बिहार : फिर पंचायतों को मजबूत बनाने का ड्रामा

जर्जर पंचायत भवन, मुखिया और पंचायत प्रतिनिधियों की खोज में भटकते गांव वाले, ग्राम कचहरी का कहीं कोई नामलेवा नहीं मिलता. टूटी और कीचड़ से पटी गलियां, पंचायत की बैठकें भी समय पर नहीं होती हैं. रोहतास जिले की बिसैनी पंचायत की यही पहचान है. बिसैनी के रहने वाले बालेश्वर सिंह कहते हैं कि ग्राम कचहरी के बारे में सरकार बढ़चढ़ कर दावे करती रही है, लेकिन आज तक उसे कोई हक ही नहीं दिया गया है.

सरकारें बारबार रट लगाती रही हैं कि पंचायत के झगड़ों के निबटारे पंचायत में ही हो जाएंगे, कोर्ट जाने की जरूरत नहीं पड़ेगी, पर पंचायत चुनाव को 5 साल बीत गए, लेकिन ग्राम कचहरी को कोई हक ही नहीं दिया गया है. इस वजह से पंचायत के लोगों को सिविल कोर्ट के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं.

भोजपुर जिले के शाहपुर ब्लौक की पंचायतें सरकार की बेरुखी और अफसरों की लापरवाही की कहानी चीखचीख कर कहती हैं. गोविंदपुर, मरचईया, पचकौरी डेरा, दलन छपरा, करीयन ठाकुर डेरा, रमकरही, लक्षुटोला वगैरह पंचायतों में सड़कों का कहीं भी नामोनिशान नहीं मिलता है. बरसात का पानी महीनों तक संकरी गलियों में जमा रहता है.

दलन छपरा गांव के जीवन लाल बताते हैं कि पंचायत को मजबूत करने का जितना ढोल पीटा जाता है, उस का 10 फीसदी भी काम नहीं होता है.

छपरा तक तो तरक्की की धारा आज तक पहुंच नहीं सकी है. गांव के लोगों को नैशनल हाईवे तक पहुंचने में ही पापड़ बेलने पड़ते हैं. गलियों और संकरी सड़कों पर बारह महीने कीचड़ और पानी जमा रहता है. कोई देखने वाला नहीं है. मुखिया से जब लोग इस बारे में शिकायत करते हैं, तो वे अपना ही रोना रोने लगते हैं. वे कहते हैं कि फंड ही नहीं मिलता है, तो काम कैसे करेंगे?

बिहार में पंचायत चुनाव की डुगडुगी एक बार फिर बज गई है. हर 5 साल में पंचायत चुनाव तो हो जाते हैं, लेकिन पंचायतों की हालत बद से बदतर ही होती जा रही है.

सरकार पंचायतों के चुनाव करा कर अपनी जिम्मेदारी को खत्म होना मान कर फिर से अगले 5 सालों के लिए बैठ जाती है और पंचायतों के प्रतिनिधि अपने हक की लड़ाई लड़ते रह जाते हैं.

पंचायतों के चुनाव का मकसद पूरा करने में सरकार और प्रशासन कन्नी काटते रहे हैं. राज्य की राजधानी में बैठी कोई भी सरकार नहीं चाहती कि सत्ता की लगाम पंचायत प्रतिनिधियों के हाथों तक पहुंचे. वैसे, इस साल मईजून महीने में त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव होने हैं.

साल 2006 में राज्य में 23 सालों के बाद पंचायतों के चुनाव हुए थे. उस के बाद अप्रैल, 2011 में पंचायतों के चुनाव कराए गए थे. इस के बाद भी पंचायती राज संस्थाएं सफेद हाथी बनी हुई हैं.

पंचायतों और ग्राम कचहरियों के सदस्यों को पंचायतों और कचहरी के कामकाज को निबटाने और चलाने की ट्रेनिंग तक नहीं दी जा सकी है. ग्राम कचहरी के कामकाज को सुचारु रूप से चलाने के लिए पंच, सरपंच और न्यायमित्रों को ट्रेनिंग देने की केवल तारीख दर तारीख ही तय की जाती रही है.

समस्तीपुर जिले की मुस्तफापुर पंचायत के किसान संकेत कुमार कहते हैं कि उन की पंचायत में पंचायत भवन तो बना दिया गया है, लेकिन न समय पर पंचायत की बैठकें होती हैं और न ही ग्राम कचहरी का ही कहीं अतापता है. पंचायतों में शौचालय बनाने का काम ठप है.

समस्तीपुर की सरपंच रही अंजु देवी कहती हैं कि सरपंचों को उन के हक मिलने से गांवों की अनेक समस्याएं और झगड़ों का आसानी से निबटारा हो सकता है. छोटेमोटे झगड़ों का निबटारा करने के लिए लोग थाना और जिला अदालतों में चले जाते हैं, जहां उन का काफी पैसा और समय बरबाद होता है.

ग्राम कचहरियों को बनाने का मकसद गांवों में आसानी से इंसाफ मुहैया कराना है.

साल 2011 में पंचायत चुनाव के बाद ग्राम कचहरी को बनाया गया था. इस का कार्यकाल साल 2016 में खत्म हो जाएगा, पर अभी यह फाइलों से बाहर नहीं निकल सकी है. हाल यह है कि पंचायतों को मिलने वाले सारे हक और पैसों पर अफसरों का कंट्रोल है. पंचायत और ग्राम सभा को हर काम और फैसले के लिए अफसरों का मुंह ताकना पड़ता है. ग्राम सभा को बेजान बना कर रख दिया गया है.

गौरतलब है कि सरकार गाहेबगाहे सभी जिलों के एसपी को निर्देश देती रहती है कि ग्राम कचहरी लैवल पर हल होने वाले मामलों को थाने में दर्ज नहीं किया जाए, अदालतों पर बोझ कम करने के लिए ग्राम कचहरी लैवल पर मामलों का निबटारा होना जरूरी है.

आईपीसी की 40 धाराओं और 10 हजार रुपए तक के सिविल मामलों को निबटाने का काम ग्राम कचहरियों को मिला हुआ है, वहीं दूसरी ओर ग्राम कचहरियों को न कोई सुविधा मिली है, न ही काम निबटाने की ट्रेनिंग दी गई है.

बिहार प्रदेश मुखिया महासंघ के पटना जिला संयोजक अजीत कुमार सिंह बताते हैं कि पंचायतों को ज्यादा से ज्यादा अधिकार दे कर ग्राम स्वराज का सपना साकार किया जा सकता है.

संविधान के 73वें संशोधन के तहत पंचायतों को स्वतंत्र संवैधानिक संस्था का दर्जा तो दिया गया, पर उसे अधिकार देने का जिम्मा राज्य सरकारों के हाथों में सौंप दिया गया. इस से पंचायतों को सरकार की दया पर निर्भर रहना पड़ता है और राज्य सरकार उसे अपने हिसाब से चलाने की कोशिशें करती रही हैं.

पंचायत प्रतिनिधि सरकार के दोमुंहे रवैए से लगातार नाराज रहे हैं और अपने हक के लिए सड़कों पर उतरते रहे हैं. उन का गुस्सा इस बात को ले कर है कि पंचायत का बजट, तरक्की की योजनाएं, गांवों के स्कूल और अस्पतालों को बनाने से ले कर रखरखाव का काम अफसरों के हवाले कर दिया गया है, जबकि पंचायत कानून में इन सब पर ग्राम सभा का हक है.

इस के अलावा गरीबी रेखा को तय करने, सामाजिक सुरक्षा, इंदिरा आवास, पैंशन, राजस्व वसूली समेत सभी कल्याणकारी योजनाओं को पंचायतों और ग्राम सभा से छीन कर प्रशासन के हवाले कर दिया गया है. राज्य सरकार ने अफसरशाही के जिम्मे पंचायतों और ग्राम सभा का सारा काम सौंप कर ग्राम सभा को लाचार बना डाला है.

‘बिहार राज्य पंचसरपंच संघ’ के अध्यक्ष आमोद कुमार ‘निराला’ ने कहा कि पंचों और सरपंचों को उन के पद के हिसाब से कभी भी हक और इज्जत नहीं मिली है. सांसदों और विधायकों पर करोड़ों रुपए खर्च कर दिए जाते हैं, पर पंचसरपंचों को पद के हिसाब से मानदेय भी नहीं मिलता है. सही मौके और सुविधा मिलने पर पंचसरपंच न्यायपालिका के बोझ को काफी कम कर सकते हैं. इस से 50 फीसदी मामलों का निबटारा तो गांव में ही हो जाएगा.

दूसरी ओर प्रशासन और पुलिस के अफसर मुखिया समेत पंचायतों के प्रतिनिधियों को परेशान और बेइज्जत करने में लगे रहते हैं. उन्हें कई झूठे मुकदमों में फंसा दिया गया है, जबकि संविधान की धारा 170 के तहत मुखिया को लोक सेवक का दर्जा मिला हुआ है और उस के खिलाफ कोई भी कानूनी कार्यवाही करने से पहले सरकार की इजाजत लेना जरूरी है.

प्रदेश मुखिया महासंघ के मीडिया प्रभारी कामेश्वर गुप्ता कहते हैं कि तमाम मुखिया पर गबन और घपले के केस दर्ज किए गए हैं, पर कई साल बीत जाने के बाद भी उन पर चार्जशीट दाखिल नहीं की गई है. इस से यह साफ हो जाता है कि नौकरशाही का मकसद पंचायत प्रतिनिधियों को बेइज्जत करना और उन्हें नीचा दिखाना है.

पंचायतों, ग्राम कचहरियों को सुविधाएं और हक देने को अफसरशाही कतई तैयार नहीं हैं, इस से उन्हें उन के हकों में कटौती नजर आती है. इस से पंचायतों को बनाने और पंचायतों को हक दे कर गांवों को मजबूत बनाने का मकसद ही फेल होता दिखने लगा है.

खोखली साबित हुईं ग्राम कचहरियां

नीतीश कुमार ने इंसाफ के साथ तरक्की के नारे के बूते भले ही एक बार फिर बिहार की कमान थाम ली हो, पर गांवों में इंसाफ, ग्राम कचहरी, सरपंच और पंच तमाशा बन कर रह गए हैं.

पंचायती राज के तहत बनाई गई ग्राम कचहरी का मकसद गांव वालों को गांव में ही इंसाफ दिलाना था, लेकिन पूरे 5 साल ग्राम कचहरियां ही इंसाफ के पेंच में फंसी रह गईं. सरपंचों और पंचों को हक और पद तो मिला, लेकिन वे दफ्तर, मेज, कुरसी और कलमकागज के लिए तरसते रह गए.

जिन सरपंचों ने अपने घरों पर ही कचहरी लगानी शुरू की, तो उन्हें लोकल पुलिस और प्रशासन ने ही काम नहीं करने दिया और उलटे उन्हें ही कई मुकदमों में फंसा डाला.

ग्राम कचहरियों के सफेद हाथी बनने और सरपंचों को काम करने का मौका नहीं मिलने के बाद यह हालत है कि इस बार के पंचायत चुनाव में कोई भी सरपंच और पंच का चुनाव लड़ने को तैयार नहीं है.

ग्राम कचहरी को सही तरीके से चलाने और उन्हें तमाम सुविधाएं मुहैया कराने के लिए सरपंचों ने सरकार से कई बार गुहार लगाई, विधानसभा और मुख्यमंत्री का घेराव तक किया, पर आम जनता को इंसाफ देने और दिलाने की रट लगाने वाली सरकार इस मसले की अनदेखी करती रही.

इंसाफ के इंतजार में पंचायतों के 5 साल का कार्यकाल खत्म हो गया और ग्राम कचहरियां फाइलों से बाहर नहीं निकल सकीं.

‘अखिल भारतीय सरपंच संघ’ के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश बाबा कहते हैं कि सरपंचों को हकों का झुनझुना तो थमा दिया गया, पर उन्हें अपने हक के इस्तेमाल के लिए जगह और माहौल ही मुहैया नहीं कराया गया.

ग्राम कचहरियां कागजों पर ही चलती रह गईं और छोटेमोटे झगड़ों के लिए लोग जिला अदालतों में जाने को मजबूर रहे. इस से गांव वालों का समय और पैसा काफी खर्च हुआ और जिला अदालतों पर मुकदमों का बोझ भी बढ़ा.

ग्राम कचहरियों को 10 हजार रुपए तक की चोरी और जमीन के झगड़े को देखने का हक मिला हुआ है. अपनी ताकत का इस्तेमाल करने की ललक से कुछ सरपंचों ने जब अपने घर पर ही कचहरी लगानी शुरू की, तो पुलिस शांति भंग होने को ले कर सरपंचों के खिलाफ ही धारा 107 के तहत मामला दर्ज कर देती है.

सरपंच भोला सिंह कहते हैं कि कुछ सरपंचों ने जब गांव वालों को इंसाफ दिलाने की कोशिश की, तो पुलिस ने उन्हें ही मुकदमे में फंसा डाला. इस से बाकी सरपंचों के हौसले भी पस्त हो गए.

इतना ही नहीं, जिन लोगों के खिलाफ सरपंचों ने फैसला सुनाया था, उन्हें बहका कर पुलिस ने सरपंचों के खिलाफ ही केस दर्ज करवा दिया. पुलिस की ज्यादती के खिलाफ पंचायती राज महकमे में कई शिकायतें पहुंचीं, पर उन पर कोई खास कार्यवाही नहीं की जा सकी. सरपंचों को थानों का भी सहयोग नहीं मिल सका.

अफसर पंचायत प्रतिनिधियों को भाव नहीं देते हैं

– शशि देवी, मुखिया, पूर्वी दीघा ग्राम पंचायत

पूर्वी दीघा ग्राम पंचायत की मुखिया शशि देवी कहती हैं कि उन की पंचायत की तरक्की के लिए कई योजनाएं बनीं और उन में से काफी को वे जमीन पर उतारने में कामयाब रही हैं. सब से पहले उन्होंने अपनी पंचायत में सड़कों और नालों को पक्का कराया. उस के बाद पानी की टंकी, सामुदायिक भवन, अस्पताल वगैरह बनवाए. पंचायत के लोगों ने उन्हें काम करने और बुनियादों सुविधाओं को बहाल करने के लिए ही मुखिया बनाया है.

साल 2006 और साल 2011 का चुनाव जीतने वाली शशि देवी कहती हैं कि पंचायत के लोगों ने उन पर भरोसा जताया है, इसलिए वे जनता के भरोसे को कभी नहीं तोड़ेंगी. अगर आगे भी जनता उन्हें मौका देगी, तो वे बाकी बचे कामों को पूरा करने की कोशिश करेंगी.

राज्य की ज्यादातर पंचायतों की बदहाली के बारे में शशि देवी कहती हैं कि सरकारी अफसर पंचायत प्रतिनिधियों को हलके में लेते हैं और कोई खास तवज्जुह नहीं देते हैं. उन की मांगों और अर्जियों को रद्दी की टोकरी में फेंक दिया जाता है. ज्यादातर डीएम, एसपी, बीडीओ वगैरह मुखिया और सरपंचों को भाव ही नहीं देते हैं, जिस से पंचायतों की तरक्की की योजनाएं फाइलों से बाहर नहीं निकल पाती हैं.

गांवों की बदलती तसवीर के क्या हैं मायने

गांवों में बदलाव आ रहा है. वे तरक्की की राह पर आगे बढ़ रहे हैं. लग्जरी और महंगी गाड़ियां, आलीशान मकान गांवों की शोभा बढ़ा रहे हैं. हर घर में टैलीविजन पहुंच रहा है. महंगे मोबाइल फोन गांवों के लोगों के हाथों में देखे जा सकते हैं. चूल्हे की जगह गैस और गोबर गैस ले रही हैं. कुछ साल पहले तक शहरों के बड़े घरों में लगने वाली फाल सिलिंग अब गांव के लोग भी लगवाने लगे हैं. किसी ने सच ही तो कहा है कि गांवों की तरक्की से ही देश की तरक्की मुमकिन है और शहरी चमकदमक वक्त के साथ अब गांवों में भी देखने को मिल रही है. बैलगाड़ी व ऊंटगाड़ी को अब ट्रैक्टरट्रौलियों ने पीछे छोड़ दिया है.

पिछले 20 सालों से देश में आई संचार क्रांति के साथ ही मौडर्न खेतीबारी ने गंवई जिंदगी की तसवीर ही बदल कर रख दी है.

भासू गांव बना मिसाल

 राजस्थान के सब से पिछड़े जिलों में शुमार माने जाने वाले टोंक जिले का एक गांव है भासू. यह गांव दुनियाभर में मशहूर रही टोडा रायसिंह की बावडि़यों वाले कसबे टोडा रायसिंह से महज 7 किलोमीटर की दूरी पर है. 10 साल पहले तक सब से पिछड़े माने जाने वाले इस गांव में आज भी शहरी इलाके जैसी तमाम सहूलियतें मौजूद हैं.

लग्जरी गाडि़यां और आलीशान घर गांव की शोभा बढ़ा रहे हैं. हर घर की छत पर अलगअलग कंपनियों की डिश, हर हाथ में महंगे मोबाइल और खानपान के बदलते अंदाज से अंदाजा लगाया जा सकता है कि यह गांव तरक्कीशुदा है.

तकरीबन 5 हजार लोगों की आबादी वाले इस गांव में 30 साल पहले सरकारी लैवल पर बिजली सप्लाई के साथ घरघर में पानी की सप्लाई शुरू की गई थी. आज ऊंची तालीम से ले कर अस्पताल, बैंक, इंटरनैट समेत सभी सहूलियतें इस गांव में मुहैया हैं.

बांध से बदली जिंदगी

 प्रदेश के दूसरे बड़े बीसलपुर बांध का बनना भासू गांव के लिए वरदान साबित हुआ. बांध बनने के बाद गांव की 60 फीसदी खेती लायक जमीन बांध के डूब क्षेत्र में आ गई. इस के बावजूद इलाके के आसपास पानी की प्रचुर मात्रा में मौजूदगी के बीच बाकी बची जमीन पर खेतीबारी की उन्नत तकनीक व आधुनिक खेती यंत्रों के सहारे किसान मालीतौर पर तरक्की हासिल करते गए. इसी का नतीजा है कि गांव के लोगों के रहनसहन व खानपान के तौरतरीकों में बदलाव आया है.

गांव के लोग सरकारी नौकरी में न होने के बावजूद आधुनिकता की होड़ में किसी से पीछे नहीं हैं. नई पीढ़ी का ऊंचे शिक्षण संस्थानों से जुड़ाव गांव की बदलती तसवीर का आईना है.

10 साल पहले तक जहां गांव में 10 फीसदी ही पक्के मकान थे, अब गांव में एक भी मकान कच्चा नहीं है. कामधंधे के साधनों की तरक्की के साथसाथ खेतीबारी के यंत्रों का गांव में अलग ही बाजार बन चुका है.

इस गांव के सरपंच शिवराज खटीक का कहना है, ‘‘खेतीबारी की नई तकनीक अपनाने से ही गांव के लोगों ने तरक्की हासिल की है. पंचायत की ओर से भी गांव में तरक्की की कोई कसर नहीं छोड़ी जा रही है. सब तरह की सहूलियतें गांव के लोगों को मिले, इस के लिए पंचायत हर वक्त कोशिश करती रहती है.’’

पानी से आई बहार

बीसलपुर बांध से छोड़ी जाने वाली नहरें भी सैकड़ों गांवों के लिए भगीरथ बन कर आई हैं. नहरी पानी के चलते कई गांवों की कायापलट हो गई है. टोंक जिले के ही जयपुरकोटा नैशनल हाईवे की सड़क के किनारे बसे मेहंदवास गांव में घुसते ही आलीशान मकान व घरों के आगे खड़ी महंगी गाडि़यां बदलते गांव के हालात की दास्तां बयां कर देती हैं.

गांव के ही रहने वाले व खेतीबारी महकमे से रिटायर अफसर राधेश्याम प्रजापति बताते हैं कि सुबह छाछरबड़ी की जगह अब पोहा, सैंडविच व ब्रैड पकोड़े ने ले ली है. यातायात के लिए गाडि़यों की भी कमी नहीं है. एकदो घरों को छोड़ कर सभी घरों में स्कूटर, मोटरसाइकिल और कारें हैं.

गांव में सरकारी व प्राइवेट अस्पताल से ले कर बैंक व इंटरनैट वगैरह की सहूलियतें हैं. ईमित्र के जरीए भी लोग सभी तरह की सरकारी व गैरसरकारी सहूलियतों का फायदा ले रहे हैं.

वहीं पानी में मौजूद फ्लोराइड से बचने के लिए तकरीबन सभी गांव वालों ने आरओ सिस्टम भी लगवा रखे हैं. बीसलपुर नहर के पानी और आधुनिक व तकनीकी खेतीबारी के तौरतरीकों से किसानों की दशा व दिशा दोनों बदल गई हैं.

खेतीबारी के बूते खुशहाल हुए किसान महंगे मोबाइल फोन से एकदूसरे का हालचाल जानने के साथसाथ कृषि मंडियों से जिंसों के भाव की जानकारी भी ले रहे हैं.

पंचायत समिति के प्रधान मोहनलाल पालीवाल कहते हैं कि मेहंदवास गांव की बदलती तसवीर के पीछे बीसलपुर बांध से निकली नहर है. नहर के जरीए ही गांव में खेती की जमीन की सिंचाई होती है.

नहर के पानी से पैदावार भी पहले के मुकाबले 2 से 3 गुना ज्यादा हुई है, जबकि इस के चलते खर्च में कमी आई है. पहले जहां कुओं में लगी मोटरों को चलाने के लिए बिजली का बिल व पंपसैट को चलाने के लिए डीजल पर हजारों रुपए खर्च करने के बावजूद भी पैदावार कम ही मिल पाती थी, उपज

से मिली रकम से घर का खर्च चलाना भी मुश्किल था, लेकिन अब पानी की मौजूदगी से गांव के लोगों की जिंदगी में खुशहाली आ गई है.

तालीम से बदली तसवीर

महात्मा गांधी ने सच ही कहा है कि भारत की आत्मा गांवों में बसती है. गांव की तरक्की से ही देश की तरक्की जुड़ी हुई है. आधुनिकता की ओर बढ़ रहे शहरों की होड़ न सही, लेकिन उन के नक्शेकदम पर गांव भी आगे बढ़ रहे हैं.

बढ़ते शहरीकरण के चलते पैदा हो रहे विकट हालात भी गांवों की जिंदगी में बदलाव की वजह बने हैं. कच्चे रास्तों की जगह अब सीमेंट के रास्तों पर गाडि़यां दौड़ने लगी हैं. पक्के घर, मनोरंजन, संचार और यातायात के साधनों का बढ़ता इस्तेमाल गांवों में बदलाव की ओर इशारा करता है.

वहीं तालीम के प्रति गांव वालों की सोच में आए बदलाव का ही नतीजा है कि चंबल के बीहड़ों में बसे मोगेपुरा जैसे दर्जनों गांवों की तसवीर बदल गई है.

तालीम के चलते ही डांग इलाके के इस छोटे से गांव मोगेपुरा में एक दर्जन से भी ज्यादा लोग सरकारी अफसर बन चुके हैं. वहीं 4 लड़के तो अमेरिका व लंदन जैसे बड़े देशों में ऊंची तालीम हासिल कर रहे हैं.

कुछ साल पहले तक मोगेपुरा गांव की प्रदेश में पहचान डकैतों के इलाके के रूप में थी. लेकिन तालीम के प्रति सोच में आए बदलाव व गांव के नौजवानों के सरकारी नौकरी में लगने से गांव वालों की माली हालत में बदलाव आया है, जिस से गांव में तरक्की हुई है.

15 साल पहले नाबार्ड योजना में बनी गांव को शहर से जोड़ने वाली सड़क ने लोगों की तरक्की की राह खोली. ऊंची तालीम के लिए गांव के नौजवान करौली शहर जाने लगे.

बताया जाता है कि 15 साल पहले गांव को करौली शहर से जोड़ने वाली सड़क व आनेजाने की सहूलियत नहीं होने से गर्भवती औरतों को प्रसव के लिए चारपाई पर बैठा कर शहर के अस्पताल ले जाना पड़ता था. लेकिन अब यह गुजरे जमाने की बात हो गई है. अब गांव में ही सरकारी अस्पताल खुल गया है. 12वीं जमात तक का स्कूल भी खुला हुआ है.

सरपंच रमेशी मीणा बताती हैं कि पहले गांव के किसानों की खेती चंबल के पानी पर ही निर्भर थी. चंबल नदी में पानी का बहाव तेज होने से खेतों में खड़ी फसल सड़गल जाती थी, वहीं कम पानी रहने से फसल सूख जाती थी. पिछले सालों में गांव के तमाम किसानों ने अपने खेतों में नलकूप लगवाए हैं. इस से बंपर पैदावार होने लगी. समूचे गांव में तकरीबन 2 हजार बीघा क्षेत्रफल में किसान खेती कर रहे हैं.

गांव के पास ही सीमेंट का कारखाना लगने से कई नौजवानों को इस में कामधंधा मिला है. इस से लोगों के घरों में पैसा आने लगा, जिस से गांव वाले अपनी कमाई का एक बड़ा हिस्सा बच्चों की पढ़ाईलिखाई पर खर्च करते हैं. इस से देखते ही देखते गांव की सूरत बदल गई है.

लोपामुद्रा की ये अदाएं उड़ा सकती हैं आपके होश

‘बिग बॉस’ सीजन 10 की कंटेस्टेंट लोपामुद्रा ‘बिग बॉस’ सीजन की दूसरी रनरअप रहने के बाद से ही सोशल मीडिया पर काफी एक्टिव रहती हैं. हाल ही में वे नितिभा कॉल, आकांक्षा शर्मा और मनवीर गुर्जर के साथ पार्टी करती दिखाई दी थी. इसी के साथ लोपा अपने नये फोटोशूट्स को लेकर चर्चा में बनी हुई हैं.

हाल ही में लोपामुद्रा ने एक और बोल्ड फोटोशूट करवाया है. जिसमें वे स्टनिंग तो लग ही रही हैं, पर सात ही बेहद हॉट भी नजर आ रही हैं. इस फोटोशूट में लोपा ने व्हाइट एंड ब्लैक ड्रेस पहनी हुई है. जिसमें वह काफी ग्लैमर्स नजर आ रही हैं. इस फोटोशूट की तस्वीरें उन्होंने अपने इंस्टाग्राम पर भी पोस्ट की है.

हम आपको बता देना चाहते हैं कि इस फोटोशूट के अलावा लोपा, सिंगर जैजी बी और लील गोलू की म्यूजिक वीडियो में भी नजर आई हैं उनका यह गाना काफी हिट हो रहा है. इस गाने में लोपा पंजाबी बीट्स को एंजॉय करती दिखाई दे रही हैं.

इस वेस्टर्न फोटोशूट के अलावा लोपा ने, देसी लुक में भी एक शूट करवाया हैं. जिसमें वे बेहद खूबसूरत और प्यारी लग रही हैं. लोपा की यह सभी तस्वीरें फोटोग्राफर अमित खन्ना ने क्लिक की हैं.

लोपा कई सारे इवेंट का भी हिस्सा बन चुकीं है. हाल ही में वो गोवा में हुए बीच फैशन वीक 2017 को लेकर भी काफी लाइमलाइट में थीं. बता दें कि लोपा को एक सिंगिंग रियलिटी शो के लिए भी अप्रोच किया गया है, तो अब इस रियलिटी शो में लोपा होस्ट के तौर पर भी नजर आ सकती हैं.

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दरिंदगी की ये है शर्मनाक हद

गोवा में नए साल के जश्न के बाद एक नौजवान की रहस्मयी मौत के मद्देनजर पूछताछ के दौरान एक लड़की के अंग में मिर्च का पाउडर डाल देने का मामला सामने आया. लेकिन यह कोई अकेला मामला नहीं था. औरतों के नाजुक अंग पर इस तरह की दरिंदगी की वारदात आम है. औरत तो औरत, छोटी बच्चियों के साथ भी ऐसे वाकिए पेश आते हैं. छत्तीसगढ़ के बेमेतरा जिले के परपोड़ी इलाके में दुकलहीन बाई नामक एक औरत पर तांत्रिक होने के शक के चलते पूरे गांव के सामने उस के सारे कपड़े उतारे गए और फिर उस के अंग में मिर्च का पाउडर डाल दिया गया.

करनाल, हरियाणा में एक रिकशा चलाने वाले ने अपनी पत्नी पर बदचलनी का आरोप लगा कर उस के अंग में मिर्च का पाउडर डाल दिया था. शर्म के मारे उस औरत ने किसी से कुछ नहीं कहा, लेकिन जब हालत बिगड़ती चली गई, तो मामला सामने आया. तब जा कर पुलिस ने अस्पताल में उस का इलाज कराया.

आरोपी के बेटे के मुताबिक, उस के पिता ने ऐसा घिनौना काम पहले भी कई बार किया था. पश्चिम बंगाल में वीरभूम जिले के नानूर थाने के कीर्णाहार इलाके में तृणमूल कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के बीच बमबारी की घटना हुई.

इस घटना के दौरान तृणमूल कांग्रेस के पंचायत प्रधान के घर पर भी बम से हमला हुआ. इस घटना में पुलिस ने पाडुई के सात्तोर गांव के शेख मिठुन नाम के एक शख्स को नामजद किया था.

बताया जाता है कि शेख मिठुन भाजपा का समर्थक है और स्थानीय भाजपा नेताओं के उकसावे में आ कर उस ने पंचायत प्रधान के घर पर बम से हमला किया था. इस हमले में शेख मिठुन खुद भी घायल हुआ था.

पुलिस का मानना है कि हमले की घटना के बाद पानागढ़ के एक प्राइवेट नर्सिंगहोम में इलाज के बाद वह अपनी काकी के मायके में जा छिपा था. उधर मामले की जांच टीम तृणमूल कांग्रेस के स्थानीय नेताओं के साथ शेख मिठुन की गिरफ्तारी के लिए उस के घर गई. लेकिन घर पर वह नहीं मिला, तो पुलिस ने देवशाला गांव में उस के रिश्तेदारों के घर पर छापा मारा. वहां भी शेख मिठुन को न पा कर तृणमूल कांग्रेस नेताओं के दबाव में आ कर पुलिस मिठुन की काकी सईफुन्नेसा बीबी को उठा लाई.

आरोप है कि फरार शेख मिठुन का पता पूछने के लिए पाडुई थाने के प्रभारी अमरजीत विश्वास, बोलपुर थाने के अफसरों और स्थानीय तृणमूल कांग्रेस

के 2 नेताओं की मौजूदगी में 18 जनवरी की ठिठुरती ठंड में रातभर जंगल में सईफुन्नेसा बीबी पर बेरहमी से जोरजुल्म किया गया.

सब से पहले तो सईफुन्नेसा बीबी को जंगल में एक पेड़ से बांध कर पीटा गया. उसे इतना पीटा गया कि पुलिस की 2-2 लाठियां टूट गईं. पिटाई से सईफुन्नेसा बीबी के दोनों हाथों की उंगलियां टूट गई थीं. ब्लेड से उस के शरीर पर चोट पहुंचाई गई. दोनों हथेलियों को ब्लेड से काट कर जख्मी कर दिया गया.

इतना ही नहीं, सईफुन्नेसा बीबी के अंग में खुजली और जलन पैदा करने वाली जहरीली पत्तियों को रगड़ दिया गया. इतने जोरजुल्म के बाद सईफुन्नेसा बीबी जब बेहोश हो गई, तब थाने ला कर उसे रातभर के लिए पटक दिया.

गंभीर रूप से जख्मी हालत में पुलिस ने सुबह उसे छोड़ दिया. गिरतेपड़ते सुबह जब वह किसी तरह गांव पहुंची, तो घर वाले उसे सिउड़ी के स्वास्थ्य केंद्र ले गए. बाद में स्वास्थ्य केंद्र ने उसे वीरभूम जिला अस्पताल को रैफर कर दिया.

जब पीडि़ता का पति सबूर शेख पाडुई थाने में पुलिस के खिलाफ शिकायत का मामला दर्ज कराने पहुंचा, तो पुलिस ने शिकायत दर्ज करने से न केवल मना किया, बल्कि उसे धक्के दे कर बाहर कर दिया. पुलिस की यह दरिंदगी देख गांव वालों के बीच गुस्सा भड़क उठा. तब घटना का राजनीतिक फायदा लेने के लिए वामपंथियों से ले कर कांग्रेसी भी बीच में कूद पड़े. मामला फिलहाल कलकत्ता हाईकोर्ट में लंबित है.

ऐसी ही एक घटना पिछले साल टीटागढ़ पुलिस स्टेशन के तहत भी सामने आई थी. टीटागढ़ की एक औरत संध्या सेन ने अपनी 6 साल की बेटी को बिस्तर में पेशाब करने की सजा के तौर पर उस के अंग में मिर्ची का पाउडर डाल दिया था.

टीटागढ़ पुलिस के मुताबिक, श्यामल सेन और संध्या के कोई औलाद नहीं थी. उन्होंने 6 साल की एक बच्ची को गोद लिया था. दरअसल, बच्ची के मातापिता की मौत हो गई थी. वह अपनी एक काकी के यहां पलबढ़ रही थी. लेकिन काकी ने माली तंगी के चलते सेन दंपती को बच्ची दे दी थी. गोद लेने के लिए कानूनी खानापूरी नहीं की गई थी.

बहरहाल, यह मामला सामने आने के बाद पुलिस ने सेन दंपती को गिरफ्तार किया और गंभीर हालत में बच्ची को कोलकाता के आरजी कर अस्पताल में इलाज के लिए भेजा. इलाज के बाद बच्ची की काउंसलिंग चल रही है.

हालांकि गिरफ्तारी के बाद श्यामल सेन को जमानत मिल गई, लेकिन संध्या सेन को 14 दिन की न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया. फिलहाल तो इस मामले की जांच का जिम्मा जिला बाल कल्याण समिति के पास है.

पहली बॉलीवुड फिल्म में काम कर बेहद खुश हैं ये पाकिस्तानी अभिनेत्री

अपनी पहली बॉलीवुड फिल्म ‘मॉम’ में दुष्कर्म पीड़िता का किरदार निभाने वाली पाकिस्तानी अभिनेत्री सजल अली ने मीडिया से बात करते हुए कहा कि उन्होंने कभी भी भारतीय फिल्म उद्योग में आने का सपना नहीं देखा था.

सजल ने श्रीदेवी अभिनीत फिल्म ‘मॉम’ में अपने किरदार आर्या के बारे में कहती हैं कि ये निश्चित रूप एक चुनौतीपूर्ण किरदार था, मेरा मतलब कोई भी किरदार जिसे आप निभाते हैं, वास्तव में उसके प्रति आपको प्रतिबद्ध होना चाहिए और उसमें स्वभाविकता होनी चाहिए. कम से कम मैं तो ऐसे ही काम करती हूं.

एक मशहूर पाकिस्तानी अखबार ने उनके हवाले से बुधवार को बताया कि उनके लिए सबसे चुनौतीपूर्ण हिस्सा श्रीदेवी के सामने अभिनय करना था, जैसे पहले दृश्य में उन्हें अभिनेत्री के साथ गलत व्यवहार करना था और वह काफी घबराई हुई थीं. उन्होंने बताया कि जॉर्जिया में कंपकपाती ठंड में शूटिंग करना भी उनके लिए बेहद मुश्किल रहा.

सजल के मुताबिक ईमानदारी से कहू तो बॉलीवुड में आना मेरा सपना कभी नहीं रहा. मैं यहां काम कर खुश हूं. मैं बॉलीवुड में आने के लिए काम नहीं कर रही थी, लेकिन इस फिल्म की कहानी ने मुझे बहुत प्रभावित किया था.

अभिनेत्री अपनी सह-कलाकार श्रीदेवी से काफी प्रभावित हैं, जो फिल्म में उनकी मां बनी हैं. उन्होंने कहा कि वे बेहद अच्छी शख्स हैं.

सजल ने बताया कि श्रीदेवी के पति बोनी कपूर के साथ उनका तीन फिल्मों का करार है. उन्होंने कहा कि सीमा पार के समीक्षकों सहित सभी से अपने काम को लेकर तारीफ मिलने से उन्हें बेहद खुशी महसूस हो रही है.

कई अन्य कलाकारों की तरह ही सजल भी सोशल मीडिया पर बड़ी एक्टिव रहती हैं. आप इंस्टाग्राम पर उनकी बेहद खूबसूरत तस्वारें देखेंगे तो आप  उन्हें अपना दिल दे बैठेंगे.

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नरेंद्र मोदी सरकार के भगवाई कदम

देश के 65 पूर्व प्रशासकों ने एक खुला पत्र लिख कर चिंता व्यक्त की है कि नरेंद्र मोदी की सरकार के आने के बाद देश में न केवल सुनियोजित मुसलिम विरोधी, दलित विरोधी माहौल बनाया जा रहा है, बल्कि असहिष्णुता का वातावरण भी बना डाला गया है. पूर्व पुलिस अधिकारी जुलियो रिबेरो, जवाहर सरकार, हर्ष मंडेर, अरुणा राय जैसे प्रशासकों ने कहा है कि भारतीय संविधान की भावना के विरुद्घ अपने को बहुमत में कहने वाले अपना मन दूसरों पर थोप रहे हैं और धार्मिक परदे के सहारे उदार व तार्किक लोगों को भी अल्पसंख्यकों की तरह कठघरे में खड़ा किया जा रहा है.

इस में सत्तारूढ़ पार्टी के देशभर में फैले सैकड़ों भगवा गमछाधारी दबंग तो शामिल हैं ही, प्रधानमंत्री से ले कर केंद्रीय मंत्री, पार्टी के सांसद, कई मुख्यमंत्री भी शामिल हैं. ये सब हिंदू कट्टर, पौराणिक परंपराओं के नाम पर हिंदू धर्म को थोपना चाहते हैं.

खुले पत्र में पशु व्यापार पर प्रतिबंध, गौरक्षकों की फौज और शिक्षा संस्थानों पर भगवा कब्जे की खुल कर बात की गई है. संविधान की आत्मा कहती है कि इस देश में मसले बहस से हल होंगे, डंडों के जोर से नहीं, लेकिन आज लोकतंत्र को जिस तरह जूतों से कुचला जा रहा है, वह देश को तानाशाही की ओर ले जा रहा है.

आमतौर पर तटस्थ रहने वाले नौकरशाहों का इस तरह खुल कर सामने आने का अर्थ है कि वे स्थिति की गंभीरता को समझ रहे हैं. वे जानते हैं कि जो विषैले बीज बोए जा रहे हैं उन का असर पीढि़यों तक रहेगा और ये पेड़ बड़े होने पर महामारी फैलाएंगे. सरकार अपनी विषैली नीति को थोपने के लिए हर तरह के कानूनी डंडे का इस्तेमाल कर रही है और वे प्रशासक, जो 25-30 वर्ष इन कानूनों को लागू करते रहे हैं, अच्छी तरह जानते हैं कि ये कानून किस तरह आम नागरिक की कमर तोड़ सकते हैं.

स्वतंत्रता ही उत्पादकता व विकास को सब से बड़ी उर्वर जमीन देती है. अंगरेजों से लड़ाई केवल इसलिए नहीं लड़ी गई थी कि वे गोरे रंग के थे, इसलिए भी लड़ी गई थी कि वे भारत के नागरिकों को वह स्वतंत्रता नहीं दे रहे थे जो उन के अपने देश में थी. अमेरिका की आर्थिक सफलता के पीछे यही स्वतंत्रता रही है जो भारत में 1947 के बाद से बड़ी सीमित मात्रा में मिली. कुछ सरकारी तो कुछ सामाजिक बंधन ऐसे थे कि यहां का नागरिक कभी पूरी तरह से स्वतंत्र नहीं रहा.

देश में थोड़ीबहुत जो स्वतंत्रता रही, अब उसे भी कुचला जा रहा है. जो हो रहा है वह हिंदू समाज के पुनर्जागरण का नहीं, देश की भयंकर बीमारी का लक्षण है.

Video : ये है हौट लेडी बाहुबली, इनकी अदाओं पर मर मिटते हैं लोग

अब तक आपने एक से बढ़कर एक ताकतवर योद्धाओं को देखा होगा. आज हम आपको एक ऐसी महिला से मिलवाने जा रहे हैं जिसके सामने बड़े-बड़े पहलवानों की छुट्टी हो जाती है. इस लड़की का नाम है मामा लाउ. यह जितनी हौट है, इसकी बाजुओं में उतना ही दम है. इन्होंने अपनी बाजुओं के दम पर गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड में अपना नाम भी दर्ज करवा लिया है.

इस लेडी बाहुबली का पूरा नाम लिंडसे लिंगबर्ग है और लोग इन्हें प्यार से मामा लाउ कहते हैं. वह अपने बाजुओं से सेब तोड़ देती हैं. यह ताश की मोटी तह को दो टुकड़ों में चीर देती हैं. लाउ के नाम एक मिनट में सर्वाधिक सेब अपनी बाजुओं से तोड़ने का रिकार्ड दर्ज है. इनके नाम एक मिनट में 10 सेब और इतने ही वक्त में 5 टेलीफोन डायरेक्ट्री चीरने का गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड दर्ज है.

अपनी इस ताकत का अंदाजा उन्हें 20 साल की उम्र में लगा. तब से ही उन्होंने मर्दों की तरह अपनी ताकत को आजमाना शुरू कर दिया. इसके बाद उनके मन में सवाल आया क्या वह अपनी मजबूत बाजुओं से सेब को तोड़ सकती हैं. फिर क्या था उन्होंने इसकी प्रैक्टिस शुरू की और कामयाब भी हो गई. वह पूरी दुनिया में अपनी इस अनोखे स्टंट को परफार्म करती हैं.

मामा लाउ केटी पैरी की फैन हैं. उनका अगला लक्ष्य एक मिनट में ज्यादा से ज्यादा ताश की गड्डी को दो टुकड़ो में चीरना है. इसका नमूना भी उन्होंने अपने इस वीडियो में दिखाया है. यहां देखें वीडियो.

गाड़ी का रजिस्ट्रेशन : दो दोस्तों की कहानी

मैं ने एक बार एक कामर्शियल गाड़ी खरीदी. मेरे दोस्त रमाकांत ने भी कुछ दिन बाद एक कामर्शियल गाड़ी खरीद ली. उस का ट्रांसपोर्ट का लंबाचौड़ा कारोबार था और इस क्षेत्र में उसे काफी महारत हासिल थी. अपनी गाड़ी का रजिस्ट्रेशन कराने में मेरी हालत खराब हो गई, क्योंकि कभी पैन कार्ड, तो कभी आधार कार्ड और न जाने कितने कागजात देखे, तब जा कर मैं रजिस्ट्रेशन करा पाया.

नए आरटीओ अफसर से मेरा पहली बार वास्ता पड़ा था और मैं भुक्तभोगी था, यही जान कर मेरे दोस्त रमाकांत ने मुझ से सलाह लेने की सोची और एक दिन घर आ कर वह मुझ से रजिस्ट्रेशन के बारे में जानकारी लेने लगा.

मैं ने उसे बताया, ‘‘इस बार जो आरटीओ अफसर आया है, वह बहुत नियमकानून मानने वाला कड़क अफसर है. सारे कागजात खुद देखता है और गाड़ी के मालिक से भी मिल कर बात करता है.’’

‘‘क्याक्या कागजात देखता है यार?’’ रमाकांत ने पूछा.

मैं ने बताया, ‘‘आधार कार्ड, पैन कार्ड, वोटर कार्ड, बिजली का बिल, टैलीफोन का बिल, 4 पासपोर्ट साइज फोटो… तब कहीं जा कर रजिस्ट्रेशन करता है. इन 5 कागजात में से 3 को दिखाना जरूरी कर रखा है.’’

रमाकांत ने मजाक में कहा, ‘‘देखो यार, मैं तो केवल वोटर कार्ड और फोटो ले जा कर अपनी गाड़ी का रजिस्ट्रेशन करा लूंगा और रजिस्ट्रेशन भी उसी दिन ही होगा. इस के बाद पार्टी.’’

मैं ने सहमति में सिर हिला दिया. बात आईगई हो गई. नियम के मुताबिक कुछ दिन बाद मेरे दोस्त रमाकांत को भी आरटीओ दफ्तर से बुलावा आया. उस दिन वह अपने ट्रक ड्राइवर की गंदी सी लुंगी और कुरता पहन कर अफसर के कमरे में रसीद समेत दाखिल हुआ.

जब उस आरटीओ अफसर ने अंगरेजी में पूछा कि वाट डू यू ब्रिंग? तो जवाब में रमाकांत ने कहा, ‘‘साहब, मैं तो केवल हिंदी और उर्दू जानता हूं.’’

वह आरटीओ अफसर बंगाली था. उस ने अपनी टूटीफूटी हिंदी में पूछा, ‘‘क्याक्या कागज लाया है?’’

रमाकांत ने तुरंत अपना वोटर कार्ड और लुंगी में खींचे गए 2 फोटो आरटीओ अफसर के आगे कर दिए.

आरटीओ अफसर ने जैसे ही पैन कार्ड कहने की कोशिश की, तो रमाकांत ने उसे बीच में ही टोक दिया और बोला, ‘‘साहब, मेरे पास पैंट नहीं है. 2 लुंगी और 2 कुरते हैं. मैं एक धोता हूं, एक पहनता हूं.’’

तब आरटीओ अफसर ने समझाया, ‘‘पैंट नहीं…’’ तो रमाकांत ने बीच में बात काटते हुए कहा, ‘‘हांहां, मुझे मालूम है कि पैंट पहनी जाती है, पर मेरे पास पैंट नहीं है. जब मैं ने डीलर से गाड़ी खरीदी थी, तब भी मैं ने लुंगी ही पहनी थी. देखिए, मेरे ये लुंगी वाले 2 फोटो,’’ कह कर वह आरटीओ अफसर के सामने फोटो वाला हाथ नचाने लगा.

इस से घबरा कर आरटीओ अफसर ने कहा, ‘‘और क्या कागज हैं?’’

‘‘और कुछ नहीं हैं. मैं ट्रक चलाता हूं, उसी में सोता हूं. कभीकभार मैं इधरउधर सो जाता हूं. मेरे पास केवल वोटर कार्ड है. जब पैसा लिया, तब तो डीलर बोला नहीं था कि रजिस्टे्रशन कराने के लिए पैंट पहननी होगी. मैं 53 साल का हूं, अभी तक पैंट नहीं पहनी. मैं लुंगी पहन कर ही गाड़ी चलाता हूं.’’

आरटीओ अफसर ने माथे पर आए पसीने को अपने सफेद रूमाल से पोंछा. वह उस घड़ी को कोस रहा था, जब उस ने इस देहाती ट्रक ड्राइवर को दफ्तर में बुलाया था.

इधर मेरा दोस्त यही सुर अलाप रहा था, ‘‘आप के दफ्तर में जब टैंपरेरी रजिस्ट्रेशन हुआ था और पैसा ले कर रसीद दी थी, तब भी नहीं बोला गया था कि पैंट पहनने वाला आदमी ही गाड़ी खरीद सकता है और उस का रजिस्ट्रेशन करा सकता है.

‘‘मैं किसी को नहीं छोड़ूंगा, टैंपरेरी रजिस्ट्रेशन के नाम से जो पैसा लिया है, वह भी वापस दो. अपनी रसीद रखो. मैं थाने में जाऊंगा और शिकायत करूंगा. मुझे अनपढ़ जान कर आरटीओ अफसर और डीलर ने मिल कर मेरी 35 साल की कमाई हजम कर ली.’’

आरटीओ अफसर हैरानपरेशान था. यह उस की जिंदगी का पहला और कड़वा अनुभव था. वह निढाल हो कर कुरसी पर बैठ गया. मेज पर रखे गिलास का पूरा पानी एक ही सांस में गटक गया, फिर रमाकांत को बैठाया, अपने हाथों से पीने के लिए पानी दिया और बोला, ‘‘ठीक है, तुम दस्तखत कर दो.’’

दस्तखत करते ही आरटीओ अफसर ने तुरंत रमाकांत को गाड़ी का रजिस्ट्रेशन कर के सर्टिफिकेट थमा दिया और हाथ जोड़ कर बोला, ‘‘आप बेफिक्र हो कर लुंगी में ही गाड़ी चलाइए, कोई आप को पैंट पहनने को नहीं कहेगा.’’

रमाकांत हंसतेहंसते बाहर आ गया. दूसरे दिन मुझे रमाकांत ने चटकारे ले कर सारा मामला बताया कि कैसे उस ने गंवार बन कर एक पढ़ेलिखे अफसर को दिन में तारे दिखा दिए.

चुनौतियों से भरे हैं भारत के दिन

68 साल पार कर चुके भारतीय गणतंत्र के सामने गंभीर चुनौतियों का पहाड़ खड़ा है. ये चुनौतियां देश को शर्मसार करने वाली हैं. देश में माली सुधारों के 25 साल बाद भी अमीर गरीब के बीच का फर्क बड़ी तेजी से बढ़ा है. सवा सौ करोड़ देशवासियों की दौलत गिनेचुने लोगों की तिजोरी में कैद हो कर रह गई है. अभी हाल ही में दुनिया की 3 बड़ी एजेंसियों औक्सफैम, वर्ल्ड वैल्थ व क्रेडिट सुइस की रिसर्च रिपोर्टों के नतीजे आंखें खोलने और चौंकाने वाले हैं.

हमारे देश की कुल जमापूंजी का 53 फीसदी हिस्सा महज एक फीसदी परिवारों में सिमट कर रह गया है. इतना ही नहीं, देश की कुल जमापूंजी का 76.3 फीसदी हिस्सा देश के 10 फीसदी अमीर परिवारों की बपौती बन चुका है.

एक सुनियोजित तरीके से अमीर बड़ी तेजी से अमीर बनते चले गए और गरीब लगातार गरीब बनते चले गए हैं. आज देश में 36 करोड़ से ज्यादा लोग महज 50 रुपए रोज पर गुजारा करने के लिए मजबूर हैं. दुनिया के कम से कम साढ़े 20 फीसदी गरीब लोग हमारे देश के हैं.

आजादी हासिल करने के बाद सत्ता तंत्र का प्रमुख नारा ‘गरीबी हटाओ’ था, पर यह नारा आज भी महज ‘नारा’ ही बना हुआ है.

देश में पिछले 10 साल में स्लम यानी झुग्गीझोंपडि़यों की तादाद में 34 फीसदी का इजाफा दर्ज किया गया है. देश में तकरीबन 1 करोड़, 80 लाख झुग्गीझोंपडि़यां हैं, जिन में रहने वाले लोग बदतर जिंदगी जीने को मजबूर हैं.

साल 2011 की जनगणना के मुताबिक, देश के कुल 24.39 करोड़ परिवारों में से 73 फीसदी यानी 17.91 करोड़ परिवार गांवों में रहते हैं.

चौंकाने वाली बात यह है कि इन परिवारों में 49 फीसदी यानी 8 करोड़, 69 लाख परिवार बेहद गरीब हैं. इन गरीब परिवारों में से 44.84 लाख परिवार तो दूसरे के घरों में गुजारा करने को मजबूर हैं.

4 लाख परिवार कचरा बीन कर अपनी जिंदगी गुजार रहे हैं, वहीं साढ़े 4 लाख परिवार बेघर हैं और गंदे नालों, रेलवे लाइन, सड़क, फुटपाथों, पुलों वगैरह के नीचे रहने को मजबूर हैं.

जिन लोगों के सिर पर छत है, उन में से भी 5.35 फीसदी परिवार ऐसे हैं, जिन के मकानों की हालत बहुत बुरी है. साथ ही, 53 फीसदी मकानों में शौचालय ही नहीं हैं.

इंटरनैशनल फूड पौलिसी रिसर्च इंस्टीट्यूट के मुताबिक, दुनियाभर में अनाज वगैरह उगाने के मामले में दूसरे नंबर पर रहने के बावजूद भारत में तकरीबन 20 करोड़ लोग भूखे पेट सोते हैं.

एक तरफ देश में लाखों टन अनाज सड़ जाता है, वहीं दूसरी तरफ भूख व कुपोषण के चलते एक बड़ी आबादी भरपेट रोटी के लिए तरसती रहती है.

‘सेव द चिल्ड्रन’ की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में रोजाना 5 हजार से ज्यादा बच्चे कुपोषण के चलते दम तोड़ देते हैं. देश में हर साल 25 लाख से ज्यादा बच्चों की अकाल मौत होती है.

ग्लोबल टैलेंट कंपीटीटिव इंडैक्स के मुताबिक, देश में कुशल कामगारों की कमी हो गई है. इस मामले में दुनिया के लैवल पर भारत 11वें पायदान से फिसल कर 89वें पायदान पर पहुंच गया है. बेरोजगारी और बेकारी के चलते नौजवान अपराध के रास्ते पर आगे बढ़ रहे हैं.

बेहद शर्मसार करने वाली बात यह है कि देश के पोस्ट ग्रेजुएट लोग भी भीख मांगने के लिए मजबूर हैं.

साल 2011 की जनगणना के आधार पर जारी ‘नौनवर्कर्स बाय मेन ऐक्टिविटी ऐंड एजुकेशन’ के आंकड़ों के मुताबिक, देश में 410 भिखारी ऐसे हैं, जिन के पास पोस्ट ग्रेजुएशन या उस के बराबर की तकनीकी डिगरी है. इन में 137 औरतें और 273 मर्द हैं.

इस रिपोर्ट के मुताबिक, देश के 3.72 लाख भिखारियों में से तकरीबन 3 हजार भिखारी ग्रेजुएट व टैक्निकल या प्रोफैशनल डिप्लोमाधारी हैं. क्या सुपर पावर के रूप में तेजी से उभर रहे देश के लिए यह गहरा कलंक नहीं है?

देश का ‘अन्नदाता’ किसान कर्ज के चक्रव्यूह में फंस कर मौत को गले लगाने को मजबूर है. नैशनल क्राइम रिकौर्ड की एक रिपोर्ट के मुताबिक, देश में रोजाना 46 किसान खुदकुशी करते हैं.

देश का हर दूसरा किसान कर्ज के बोझ के नीचे दबा हुआ है. देश के 9 करोड़ किसान परिवारों में से 52 फीसदी किसान कर्ज के नीचे सिसक रहे हैं और हर किसान पर औसतन 47 हजार रुपए का कर्ज है.

एक आंकड़े के मुताबिक, साल 2001 में किसानों की तादाद 12 करोड़, 73 लाख थी, जो साल 2011 में घट कर 11 करोड़, 87 लाख रह गई. चौंकाने वाली बात यह है कि साल 1990 से साल 2000 के बीच खेती की 20 लाख हैक्टेयर जमीन में भी कमी दर्ज हो चुकी है.

यह आंकड़ा कितना खतरनाक साबित होने वाला है, इस का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि अगर 1000 हैक्टेयर खेती की जमीन कम होती है, तो कम से कम सौ किसानों और 760 किसान मजदूरों की रोजीरोटी छिन जाती है यानी वे बेरोजगार हो जाते हैं.

देश में औरतों के प्रति बढ़ते अपराध भी बेहद चिंता की बात है. नैशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो के मुताबिक, देश में रोजाना 92 बलात्कार के मामले दर्ज होते हैं.

देश में हर 29वें मिनट में एक औरत की इज्जत को लूटा जा रहा है. हर 77 मिनट में एक लड़की दहेज की आग में झोंकी जा रही है. हर 9वें मिनट में एक औरत अपने पति या रिश्तेदार की ज्यादती का शिकार हो रही है. हर 24वें मिनट में किसी न किसी वजह से एक औरत खुदकुशी करने को मजबूर हो रही है.

औरतों के मामले में स्वास्थ्य सेवाएं और भी बदतर हैं. एक सरकारी रिपोर्ट के मुताबिक, हर साल एक लाख औरतें खून की कमी यानी एनीमिया की वजह से मर जाती हैं, जबकि 83 फीसदी औरतें खून की कमी से जूझ रही हैं.

कहने की जरूरत नहीं है कि ये सभी आंकड़े हमारे देश पर बदनुमा दाग हैं. जब इन दागों से हमारा देश मुक्त हो जाएगा, तभी हकीकत में अच्छे दिन आएंगे.

– राजेश कश्यप  

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