अमिता जब छोटी थी तो मेरे साथ खेलती थी. मुझे पता नहीं अमिता के पिता क्या काम करते थे, लेकिन उस की मां एक घरेलू महिला थीं और मेरी मां के पास लगभग रोज ही आ कर बैठती थीं. जब दोनों बातों में मशगूल होती थीं तो हम दोनों छोटे बच्चे कभी आंगन में धमाचौकड़ी मचाते तो कभी चुपचाप गुड्डेगुडि़या के खेल में लग जाते थे.
धीरेधीरे परिस्थितियां बदलने लगीं. मेरे पापा ने मुझे शहर के एक बहुत अच्छे पब्लिक स्कूल में डाल दिया और मैं स्कूल जाने लगा. उधर अमिता भी अपने परिवार की हैसियत के मुताबिक स्कूल में जाने लगी थी. रोज स्कूल जाना, स्कूल से आना और फिर होमवर्क में जुट जाना. बस, इतवार को वह अपनी मां के साथ नियमित रूप से मेरे घर आती, तब हम दोनों सारा दिन खेलते और मस्ती करते.
हाईस्कूल के बाद जीवन पूरी तरह से बदल गया. कालेज में मेरे नए दोस्त बन गए, उन में लड़कियां भी थीं. अमिता मेरे जीवन से एक तरह से निकल ही गई थी. बाहर से आने पर जब मैं अमिता को अपनी मां के पास बैठा हुआ देखता तो बस, एक बार मुसकरा कर उसे देख लेता. वह हाथ जोड़ कर नमस्ते करती, तो मुझे वह किसी पौराणिक कथा के पात्र सी लगती. इस युग में अमिता जैसी सलवारकमीज में ढकीछिपी लड़कियों की तरफ किसी का ध्यान नहीं जाता था. अमिता खूबसूरत थी, लेकिन उस की खूबसूरती के प्रति मन में श्रद्धाभाव होते थे, न कि उस के साथ चुहलबाजी और मौजमस्ती करने का मन होता था.
वह जब भी मुझे देखती तो शरमा कर अपना मुंह घुमा लेती और फिर कनखियों से चुपकेचुपके मुसकराते हुए देखती. दिन इसी तरह बीत रहे थे.
फिर मैं ने नोएडा के एक कालेज में बीटैक में दाखिला ले लिया और होस्टल में रहने लगा. केवल लंबी छुट्टियों में ही घर जाना हो पाता था. जब हम घर पर होते थे, तब अमिता कभीकभी हमारे यहां आती थी और दूर से ही शरमा कर नमस्ते कर देती थी, लेकिन उस के साथ बातचीत करने का मुझे कोई मौका नहीं मिलता था. उस से बात करने का मेरे पास कोई कारण भी नहीं था. ज्यादा से ज्यादा, ‘कैसी हो, क्या कर रही हो आजकल?’ पूछ लेता. पता चला कि वह किसी कालेज से बीए कर रही थी. बीए करने के बावजूद वह अभी तक सलवारकमीज में लिपटी हुई एक खूबसूरत गुडि़या की तरह लगती थी. लेकिन मुझे तो जींसटौप में कसे बदन और दिलकश उभारों वाली लड़कियां पसंद थीं. उस की तमाम खूबसूरती के बावजूद, संस्कारों और शालीन चरित्र से मुझे वह प्राचीनकाल की लड़की लगती थी.
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गरमी की एक उमसभरी दोपहर थी. मैं अपने कमरे में एसी की ठंडी हवा लेता हुआ एक उपन्यास पढ़ने में व्यस्त था, तभी दरवाजे पर एक हलकी थाप पड़ी. मैं चौंक गया और लेटेलेटे ही पूछा, ‘‘कौन?’’
‘‘मैं, एक मीठी आवाज कानों में पड़ी. मैं पहचान गया, अमिता की आवाज थी, मैं ने कहा, आ जाओ, दरवाजे की सिटकिनी नहीं लगी है.’’
‘‘हां,’’ उस का सिर झुका हुआ था, आंखें उठा कर उस ने एक बार मेरी तरफ देखा. उस की आंखों में एक अनोखी कशिश थी, जो सामने वाले को अपनी तरफ आकर्षित कर रही थी. उस का चेहरा भी दमक रहा था. वह बहुत ही खूबसूरत लग रही थी. उस के नैननक्श बहुत सुंदर थे. मैं एक पल के लिए देखता ही रह गया और मेरे हृदय में एक कसक सी उठतेउठते रह गई.
‘‘तुम…अचानक…इतनी दोपहर को? कोईर् काम है?’’ मैं उस के सौंदर्य से अभिभूत होता हुआ बिस्तर पर बैठ गया. पहली बार वह मुझे इतनी सुंदर और आकर्षक लगी थी.
वह शरमातीसकुचाती सी थोड़ा आगे बढ़ी और अपने हाथों को आगे बढ़ाती हुई बोली, ‘‘मिठाई लीजिए.’’
‘‘मिठाई?’’
‘‘हां, आज मेरा जन्मदिन है. मां ने मिठाई भिजवाई है,’’ उस ने सिर झुकाए हुए ही कहा.
‘‘अच्छा, बधाई हो,’’ मैं ने उस के हाथों से मिठाई ले ली.
मैं उस वक्त कमरे में अकेला था और एक जवान लड़की मेरे साथ थी. कोई देखता तो क्या समझता. मेरा ध्यान भी उपन्यास में लगा हुआ था. कहानी एक रोचक मोड़ पर पहुंच चुकी थी. ऐसे में अमिता ने आ कर अनावश्यक व्यवधान पैदा कर दिया था. अत: मैं चाहता था कि वह जल्दी से जल्दी मेरे कमरे से चली जाए. लेकिन वह खड़ी ही रही. मैं ने प्रश्नवाचक भाव से उसे देखा.
‘‘क्या मैं बैठ जाऊं?’’ उस ने एक कुरसी की तरफ इशारा करते हुए कहा.
‘‘हां…’’ मेरी हैरानी बढ़ती जा रही थी. मेरे दिल में धुकधुकी पैदा हो गई. क्या अमिता किसी खास मकसद से मेरे कमरे में आई थी? उस की आंखें याचक की भांति मेरी आंखों से टकरा गईं और मैं द्रवित हो उठा. पता नहीं, उस की आंखों में क्या था कि डरने के बावजूद मैं ने उस से कह दिया, ‘‘हांहां, बैठो,’’ मेरी आवाज में अजीब सी बेचैनी थी.
कुरसी पर बैठते हुए उस ने पूछा, ‘‘क्या आप को डर लग रहा है?’’
‘‘नहीं, क्या तुम डर रही हो?’’ मैं ने अपने को काबू में करते हुए कहा.
‘‘मैं क्यों डरूंगी? आप से क्या डरना?’’ उस ने आत्मविश्वास से कहा.
‘‘डरने की बात नहीं है? चारों तरफ सन्नाटा है. दूरदूर तक किसी की आवाज सुनाई नहीं पड़ रही. भरी दोपहर में लोग अपनेअपने घरों में बंद हैं. ऐसे में एक सूने कमरे में एक जवान लड़की किसी लड़के के साथ अकेली हो तो क्या उसे डर नहीं लगेगा?’’
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वह हंसते हुए बोली, ‘‘इस में डरने की क्या बात है? मैं आप को अच्छी तरह जानती हूं. आप भी तो कालेज में लड़कियों के साथ उठतेबैठते हैं, उन के साथ घूमतेफिरते हो. रेस्तरां और पार्क में जाते हो, तो क्या वे लड़कियां आप से डरती हैं?’’
मैं अमिता के इस रहस्योद्घाटन पर हैरान रह गया. कितनी साफगोई से वह यह बात कह रही थी. मैं ने पूछा, ‘‘तुम्हें कैसे मालूम कि हम लोग लड़कियों के साथ घूमतेफिरते हैं और मौजमस्ती करते हैं?’’
‘‘अब मैं इतनी भोली भी नहीं हूं. मैं भी कालेज में पढ़ती हूं. क्या मुझे नहीं पता कि किस प्रकार युवकयुवतियां एकदूसरे के साथ घूमते हैं और आपस में किस प्रकार का व्यवहार करते हैं?’’
‘‘लेकिन वे युवतियां हमारी दोस्त होती हैं और तुम…’’ मैं अचानक चुप हो गया. कहीं अमिता को बुरा न लग जाए. अफसोस हुआ कि मैं ने इस तरह की बात कही. आखिर अमिता मेरे लिए अनजान नहीं थी. बचपन से हम एकदूसरे को जानते हैं. जवानी में भले ही आत्मीयता या निकटता न रही हो, लेकिन इस का मतलब यह नहीं कि वह मुझ से मिल नहीं सकती थी.
सौजन्य- सत्यकथा
Writer- मुकेश तिवारी
माना कि शराब की लत बुरी होती है, लेकिन उस से भी बुरा होता है वासना का नशा. अगर पति और पत्नी दोनों इन आदतों के शिकार हो जाएं तब तो उन की जिंदगी की गाड़ी को पटरी से उतरने से कोई नहीं रोक सकता.
ऐसा ही हुआ मालती और उस के पति फेरन के साथ. पति को नशे की लत थी और पत्नी अनैतिकता की मस्ती में ऐसी डूबी कि उस ने पतिपत्नी के रिश्ते को वासना की आग में झोंक दिया था.
एक दिन बाजार से घर के कुछ जरूरी सामान की खरीदारी कर मालती तेज कदमों से अपने घर लौट रही थी. पीछे से साइकिल चला कर आते रामऔतार ने उसे रोका, ‘‘पैदल क्यों चल रही हो, पीछे कैरियर पर बैठ जाओ.’’ रामऔतार उस के गांव का ही रहने वाला युवक था.
‘‘अरे, नहींनहीं, तुम जाओ. गांव वाले देखेंगे तो गलत समझेंगे.’’ मालती ने उस से कहा.
‘‘गलत समझेंगे तो क्या हुआ. हम कौन भला सच्चे हैं.’’ रामऔतार बोला.
‘‘सब की नजरों में तो अच्छे हैं. पति घर आ चुका होगा. 2 हफ्ते बाद काम पर गया है.’’ मालती बोली.
‘‘अच्छा कोई बात नहीं. अपना थैला मुझे दे दो. और हां, अपने पति फेरन को बोलना कि मैं शाम आऊंगा. मैं ने उस के लिए एक बोतल खरीदी है.’’ कहते हुए रामऔतार ने मालती के हाथ से सब्जी और सामान का थैला ले लिया. उसे कैरियर पर एक हाथ से बांधने लगा, क्योंकि एक हाथ से वह विकलांग था.
‘‘तुम एक हाथ से कैसे सब काम कर लेते हो, मुझे देख कर हैरत होती है,’’ देख कर मालती बोली.
‘‘इस में हैरानी की क्या बात है, यह तो तुम्हारा प्यार है, जो तुम्हें देख कर हिम्मत आ जाती है.’’ रामऔतार उस के गाल को छूते हुए बोला.
मालती शरमा गई. वह बोली, ‘‘बसबस, मैं चलती हूं तुम कितना खयाल रखते हो मेरा.’’
‘‘मैं तुम्हारा सामान तुम्हारे घर में दरवाजे की बगल में रख कर टोकरी से ढंक कर रख दूंगा,’’ कह कर रामऔतार वहां से चला गया.
मालती खाली हाथ सड़क किनारे चलती हुई पैडल मारते रामऔतार को देखती रही. निश्चित तौर पर वह रामऔतार के बारे में ही सोचने लगी थी.
मालती उसे पिछले 7 सालों से जानती थी. वह उस के पति फेरन का जिगरी दोस्त था. उस के घर से कुछ मकान छोड़ कर वह दूसरे टोले में रहता था. एक हाथ से विकलांग होने के बावजूद वह खेतीकिसानी से ले कर घर का सारा कामकाज खुद करता था. उस की शादी नहीं हुई थी. परिवार में वह अकेला था.
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उस की दूसरे रिश्तेदारों से जरा भी नहीं पटती थी. यही कारण था कि उस का अपने दोस्त फेरन के घर निर्बाध रूप से आनाजाना था. मालती भी उस के घर बेरोकटोक आतीजाती थी. उस के यहां वह झाड़ू और साफसफाई जैसे घरेलू काम को अपने घर का कामकाज समझ निपटा दिया करती थी.
फेरन को इस का जरा भी बुरा नहीं लगता था. रामऔतार की एक ही लत थी शराब पीने की. कहते हैं कि यह लत फेरन ने ही उसे लगाई थी. हालांकि सालों से शराब का इंतजाम करने का काम रामऔतार ही करता आ रहा था. उस रोज भी वह अपने दोस्त के लिए एक बोतल शराब खरीद लाया था.
मालती अंधेरा होने से पहले अपने घर पहुंच गई थी, उस का पति भी काम से लौट आया था.
‘‘कितने दिनों का काम मिला है?’’ मालती ने सामान का थैला उठाते हुए पति ने पूछा.
‘‘2 हफ्ते का है, लेकिन ठेकेदार पैसे कम दे रहा है. कहता है लौकडाउन में काम कम हो गया है.’’ फेरन ने बताया.
‘‘कोई बात नहीं, घर में कुछ तो आएगा, खाली बैठे रहने से तो अच्छा है.’’ मालती लंबी सांस लेते हुई बोली.
‘‘आज कुछ अच्छा मसालेदार खाना पकाओ.’’ फेरन ने कहा.
‘‘हांहां, क्यों नहीं! तुम्हारा दोस्त भी आने वाला होगा, काम मिलने की खुशी में उस के साथ जश्न मनाना.’’ मालती ने चुटकी ली.
इसी बीच रामऔतार ने दरवाजे पर आवाज दी.
‘‘लो, आ गया तुम्हार यार!’’ मालती कह कर हंसने लगी.
रामऔतार के आने के बाद कुछ देर में ही घर के आंगन में फेरन और रामऔतार की दारू की महफिल सज गई थी. खाने को 3 तरह के नमकीन थे. बड़ी बोतल के साथ रखे 2 गिलासों में शराब खाली होने का नाम ही नहीं ले रहा था.
जैसे ही फेरन का गिलास खाली होता, रामऔतार उस में और शराब डाल देता था. मक्के की मोटी रोटी के एक टुकड़े के साथ चटखारेदार सब्जी का आनंद लेते हुए सहज बोल पड़ता कि मीट होती तो और भी मजा आ जाता.
मालती भी पति रामऔतार के गिलास से ही फेरन की नजर बचा कर एकदो घूंट पी लेती थी. धीरेधीरे दोनों दोस्त नशे में झूमने लगे थे, लेकिन फेरन पर नशा अधिक चढ़ गया था.
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वह एक ओर मुंह नीचे कर बड़बड़ाने लगा, ‘‘रामऔतार तू मेरा बहुत अच्छा यार है, इस कड़की में भी तूने मुझे अच्छी दारू पिलाई. मजा आ गया.’’
‘‘तू पैसे और काम की चिंता मत कर, जब तक तेरा दोस्त है तब तक दारू पिलाएगा. और अच्छीअच्छी विदेशी दारू भी पिलाएगा.’’ रामऔतार ने कहते हुए बगल में खड़ी मालती का हाथ खींच कर बिठा लिया.
मालती के बैठने के धम्म की आवाज सुन कर फेरन बोला, ‘‘कौन, मालती है? जरा मुझे पकड़ कर उठाना, पैर भर गया है. पेशाब करने जाना है.’’
मालती ने बैठेबैठे फेरन को हाथ का सहारा दिया. वह उठ कर कुछ पल खड़ा रह कर बोला, ‘‘अब ठीक है, मैं अभी आया.’’
यह कहता हुआ पेशाब करने के लिए घर से बाहर नाले के पास चला गया. उस के जाते ही रामऔतार ने मालती के कमर में हाथ डाल दिया. इस अंदेशे से बेखबर मालती बोल उठी, ‘‘अरे, क्या करते हो?’’
‘‘कुछ नहीं, थोड़ा प्यार करने का मन हो आया है. ये लो एक घूंट और पी लो.’’ रामऔतार ने कमर से हाथ निकाल कर अपने शराब का गिलास उस की होंठ से लगा दिया.
मालती भी बिना किसी झिझक के घूंट पीने लगी. रामऔतार ने तुरंत उस के गाल को चूम लिया. मालती थोड़ी असहज हो गई.
‘‘इतना बेचैन क्यों हो रहे हो. 2 दिन पहले ही तो तुम ने…’’ मालती की बात पूरी करने से पहले ही फेरन ने आवाज दी. उस ने कहा कि वह सोने जा रहा है, अब और दारू नहीं पिएगा.
उस के बाद फेरन अपने कमरे की ओर चला गया. मालती उठी और बाहर का दरवाजा बंद कर लिया. रामऔतार ने अपने गिलास में कुछ और शराब डाली. मालती भी वहीं आ कर खाने के लिए रोटियां तोड़ने लगी.
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डाक्टर सारांश मंच पर खड़े लोगों के सवालों का जवाब दे रहे थे. तभी कोने से एक व्यक्ति ने वही प्रश्न किया जो उन के दिमाग पर दस्तक दिए जा रहा था. ‘‘क्या आप मानते हैं कि आज भी भारत में सारी व्यवस्था राजनीतिज्ञों के इर्दगिर्द घूमती है और पढ़ालिखा डाक्टर सारांश भी उसी व्यवस्था की भेंट चढ़ जाता है जब उसे एक भारतीय फौजी मेजर बलदेव राज की जान बचाने के लिए अपने कैरियर को जोखिम में डालना पड़ता है और बदले में उसे जिल्लत का सामना करना पड़ता है?’’
डाक्टर सारांश की आंख उस ओर मुड़ गई, उन्हें पहचानने में देर नहीं लगी कि प्रश्न मेजर बलदेव राज का था. ‘‘बात कुछ हद तक सही भी है मगर मैं सकारात्मक सोच रखता हूं और मुझे यकीन है कि सबकुछ बदल रहा है, हर बदलाव में समय तो लगता ही है. जहां तक मेरा प्रश्न है, मुझे अनगिनत लोगों से प्यार मिला है और उस प्यार के सामने उस जिल्लत की मेरे लिए कई अहमियत नहीं है जो चंद सरकारी लोगों ने मुझे दी. मुझे इस के आगे कुछ नहीं कहना है.’’
समारोह के खत्म होने के बाद डाक्टर सारांश अपने होटल की ओर जा रहे थे. सामने से मेजर बलदेव आते नजर आए, ‘‘आप ने मेरी जान तो बचा ली लेकिन दुश्मन की गोली अपना काम कर चुकी थी. फौज के नियमों के तहत घायल सैनिक को दफ्तर की पोस्ंिटग दी जाती है. भला मुझ जैसा दौड़नेभागने वाला अफसर दफ्तर की चारदीवारी में क्या करेगा, लेकिन चाह कर भी फौज छोड़ न पाया. सेना से तो जीवनमृत्यु का गठबंधन है. कैसे तोड़ पाता यह संबंध. यहां मैं भारतीय दूतावास में हूं. यह दोस्त मुल्क है, इसलिए यहां कुछ ज्यादा करने को नहीं, मगर यहां से दुश्मन मुल्कों को देखना आसान है.’’
‘‘अगर मैं गलत नहीं सोच रहा तो, मुझे यहां तक लाने में आप का ही हाथ है,’’ डाक्टर सारांश ने कहा.
‘‘हां, डाक्टर साहब, मैं आप को फौलो कर रहा था. यहां काउंसिल में मैं ने आप के बारे में जानकारी दी. इन्होंने भारत सरकार की मदद ली और आप को यहां तक ले आए. मैं जानता हूं आप ने कितनी तकलीफ झेली. आप चाहते तो अपने उसूलों से हट सकते थे. मुझे उधमपुर या जम्मू भेजना आप के लिए बहुत आसान था, लेकिन यह भी तय था कि मैं वहां तक नहीं पहुंच पाता. हां, तिरंगे में लपेटा हुआ एक सैनिक जरूर पहुंचता, जिस पर कुछ दिन सियासत होती, फिर भुला दिया जाता. आप के उपकार के एवज में मैं ने जो भी कुछ किया वह कुछ नहीं था.’’
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डाक्टर सारांश ने एक ठंडी सांस ली और मेजर को धन्यवाद दिया. इस बीच, मेजर साहब ने डाक्टर सारांश के हाथ में एक लिफाफा पकड़ा दिया.
‘‘यह क्या है?’’ डा. सारांश ने पूछा.
‘‘यहां के सब से बड़े अस्पताल का आप के नाम प्रशस्तिपत्र.’’ डाक्टर सारांश ने लिफाफा अपने ब्रीफकेस में डाल दिया.
‘‘बेहतर होता कि आप इस पर एक नजर डाल लेते,’’ मेजर साहब ने कहा तो डाक्टर सारांश ने लिफाफा खोल कर पत्र पढ़ना शुरू किया. एक ही सांस में पत्र पढ़ कर उन्होंने फिर से उसे अपने ब्रीफकेस में डाल दिया और होटल की ओर चल पड़े.
‘‘आप ने डाक्टर सारांश को हमारा पत्र दे दिया?’’ यह सिंगापुर के अस्पताल के डाइरैक्टर एक भारतीय डाक्टर निकुंज का फोन था.
‘‘हां, दे दिया, उन्होंने इनकार नहीं किया, बल्कि कुछ कहा भी नहीं.’’
‘‘सबकुछ कहा नहीं जाता मेजर, कुछ चीजें समझी जाती हैं. आप कह रहे थे डाक्टर सारांश पत्र पढ़ कर उसे रद्दी की टोकरी के हवाले कर देंगे, मगर मैं जानता था कि इतना अच्छा औफर कोई पागल ही ठुकरा सकता है.’’ डा. निकुंज ने कहा तो मेजर ने फौरन कहा, ‘‘डाक्टर सारांश पागल ही हैं सर.’’
दूसरे दिन हवाईअड्डे पर डाक्टर सारांश को छोड़ने आए वीआईपी लोगों में सिंगापुर अस्पताल के निदेशक और मेजर बलदेव मौजूद थे.
‘‘मुझे आप का प्रस्ताव मंजूर है,’’ डाक्टर सारांश ने कोट की जेब से एक लिफाफा पकड़ाते हुए कहा, ‘‘इस में कुछ शर्ते हैं जिन के बारे में आप को सोचना है.’’
‘‘हमें आप की सारी शर्तें मंजूर हैं, बस, आप की हां चाहिए. मैं आज ही काउंसिल की मीटिंग में इन पर विचार कर के आप को जवाब भेज दूंगा.’’
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मेजर बलदेव को डाक्टर सारांश से शायद कुछ और ही उम्मीद थी. उन के चेहरे पर निराशा के भाव थे. डाक्टर सारांश का हवाई जहाज उड़ चुका था. मेजर बलदेव अनमने से हवाई अड्डे पर ही खड़ेखड़े कौफी की चुस्कियों के साथ कुछ सोच रहे थे, ‘इंसानी जरूरतें, भारत में डाक्टर सारांश के साथ हुई बेइंसाफी, ऐसे में अगर उन्होंने सिंगापुर का औफर स्वीकार कर लिया तो क्या बुरा किया. उन की जगह कोई भी होता तो यही करता जो उन्होंने किया.’
कौफी पीने के बाद थोड़ा आगे बढ़े तो डाक्टर निकुंज मिल गए. ‘‘मेजर साहब, अपने डाक्टर सारांश का जवाब पढ़ना नहीं चाहेंगे,’’ यह कहते हुए उन्होंने डाक्टर सारांश का पत्र मेजर के सामने कर दिया.
मेजर बलदेव ने एक सांस में ही पत्र पढ़ लिया था. डाक्टर सारांश ने प्रस्ताव तो मंजूर किया था मगर शर्त यह रखी थी कि अस्पताल कश्मीर के रामबन इलाके में ही बने, जहां मैडिकल सुविधाएं न के बराबर हैं. लोगों को इलाज के लिए श्रीनगर या जम्मू जाना पड़ता है.
‘‘डाक्टर सारांश ने एक तरह से हमारी पेशकश ठुकरा दी है. मगर मैं हार मानने वाला नहीं हूं. मैं काउंसिल से अस्पताल वहीं बनाने की सिफारिश करूंगा, जहां डाक्टर सारांश चाहते हैं,’’ डा. निकुंज ने कहा.
मेजर बलदेव कुछ समझ नहीं पा रहे थे कि इस पर वे क्या प्रतिक्रिया दें एक पल उन्होंने सोचा और कहा, ‘‘डाक्टर निकुंज, मेरी एक राय है. आप इस बात को यहीं खत्म कर दें. काउंसिल में अधिकतर विदेशी हैं, मैं नहीं चाहता कि अपने देश का नाम नीचे हो.’’
‘‘यह कैसी बातें कर रहे हैं मेजर साहब. इस से तो हमारे देश का नाम ऊंचा होगा. डाक्टर सारांश को भी वह सम्मान मिलेगा जिस के वे सही माने में हकदार हैं.’’
‘‘आप ठीक कह रहे हैं मगर आप भी एक भारतीय हैं. माना कि आप बरसों से यहां बसे हुए हैं मगर हमारे देश की कार्यप्रणाली को नहीं भूले होंगे. माना कि बदलाव आ रहा है मगर अभी भी बहुतकुछ पहले जैसा ही है, समय लगेगा. आप का प्रस्ताव बरसों दफ्तरों के चक्कर लगाता रहेगा. फाइलें इधर से उधर घूमती रहेंगी. राज्य सरकार और केंद्र सरकार के बीच खेल शुरू हो जाएगा. विरोधी दल सियासत करेंगे. जम्मू और कश्मीर के खास दर्जे पर चर्चा होगी. सबकुछ होगा मगर अस्पताल का प्रोजैक्ट पास नहीं होगा. सोचिए, क्या गुजरेगी डाक्टर सारांश पर और क्या सोचेंगे आप के विदेशी साथी और सहयोगी.’’
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‘‘शायद आप ठीक कह रहे हैं,’’ डाक्टर निकुंज ने ठंडी आह भरते हुए कहा, ‘‘सिर्फ एक डाक्टर सारांश के आगे आने से काम नहीं चलेगा. आवश्यकता है कि सरकार के मंत्री और सरकारी कर्मचारी दोनों ही अपनी सोच को बदलें. तभी सही मानों में बदलाव आएगा. बहुत जरूरी है कि देश में वीआईपी कल्चर, लालफीताशाही और जिम्मेदारी से दाएंबाएं होने का खेल सरकारी दफ्तरों से खत्म हो. तभी विदेशों में हमारी छवि और लोगों की हमारे बारे में सोच बदलेगी. वे हमें गंभीरता से लेंगे.’’
डाक्टर सारांश का हवाई जहाज जब दिल्ली पहुंचा तो उन के स्वागत के लिए कई लोग हवाई अड्डे पर मौजूद थे. भीड़ में सब से आगे मंत्री महोदय और मैडिकल डाइरैक्टर थे. उन के चेहरों पर कुटिल मुसकान अभी भी मौजूद थी.
दिल्ली प्रैस की हिंदी पत्रिकाओं के लिए इंटर्नस के अवसर उपलब्ध हैं. आवेदक हिंदी माध्यम से हानर्स स्नातक हों और उनकी लेखन में क्षमता हो. दिल्ली, मुंबई, पटना, जयपुर, भोपाल, फरीदाबाद, गुड़गांव में अवसर. आवेदन में पूरा पता और मोबाइल नंबर देते हुए ईमेल करें: pn2@delhipress.biz
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टीवी सीरियल गुम है किसी के प्यार में (Ghum Hai Kisikey Pyaar Meiin) फेम नील भट्ट (विराट) और ऐश्वर्या शर्मा (पाखी) असल जिंदगी में एक-दूसरे को हो चुके हैं. 30 नवंबर को इस जोड़े ने सात फेरे लिए हैं. पाखी और विराट की शादी की फोटो सोशल मीडिया पर जमकर वायरल हो रही है. फैंस अपने फेवरेट कपल को लगातार बधाईयां और शुभकामनाएं दे रहे हैं.
ऐश्वर्या शर्मा (Aishwarya Sharma) का एक और वीडियो तेजी से वायरल हो रहा है. इस वीडियो में आप देख सकते हैं कि पाखी यानी ऐश्वर्या शर्मा अपनी विदाई में खूब आंसू बहाती नजर आ रही हैं. विदाई के दौरान ऐश्वर्या शर्मा अपने पिता के गले लगकर बहुत रो रही हैं. विदाई की रस्मों के दौरान ही ऐश्वर्या शर्मा ने रोना शुरू कर दिया था. जिसके बाद ऐश्वर्या शर्मा का रोना नहीं बंद हुआ.
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ऐश्वर्या शर्मा का ये वीडियो देखकर फैंस भी इमोशनल हो गए हैं. आपको बता दें कि नील भट्ट और ऐश्वर्या शर्मा इंदौर में एक प्राइवेट इवेंट में शादी के बंधन में बंध गए. उन्होंने खुद इंस्टाग्राम पर इस खबर को फैंस के साथ शेयर किया था.
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विराट ने अपने फैंस के साथ शादी की कुछ तस्वीरें भी शेयर की थी. इन तस्वीरों में दोनों की रोमांटिक केमिस्ट्री फैंस का दिल जीत रही है. शो की बात करे तो ‘गुम है किसी के प्यार में’ की कहानी में बड़ा ट्विस्ट दिखाया जा रहा है. विराट ने अपने दोस्त सदानंद का एनकाउंटर किया है. सदानंद की मौत विराट उसके पत्नी और बच्चे का जिम्मेदारी लेगा.
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जब चौहान परिवार और सई को ये बात पता चलेगी तो उन्हें बड़ा झटका लगेगा. तो दूसरी तरफ पाखी सम्राट को शादी तोड़ने की धमकी देगी.
टीवी सीरियल अनुपमा में लगातार महाट्विस्ट देखने को मिल रहा है, जिससे दर्शकों को एंटरटेनमेंट का डबल डोज मिल रहा है. शो में अब तक आपने देखा कि अनुपमा अनुज की तरफ खींची चली जा रही है. और शाह परिवार में खुशियों ने दस्तक दी है. बा-बापूजी की मैरिज एनिवर्सरी का जश्न मनाया जा रहा है. इसी बीच अनुपमा की जिंदगी एक बड़ा तूफान आने वाला है. आइए बताते हैं शो में आगे क्या होगा.
शो में दिखाया जा रहा है कि अनुज और अनुपमा धीरे धीरे करीब आने लगे हैं. तो दूसरी तरफ बापूजी ने भी अनुपमा से कह दिया है कि वह अनुज को अपने दिल में आने दे.
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ऐसे में फैंस को अब अनुज और अनुपमा की शादी का बेसब्री से इंतजार है. फैंस चाहते हैं कि अनुज और अनुपमा की शादी जल्द से जल्द हो जानी चाहिए. अब खबर आ रही है कि जल्द ही सीरियल ‘अनुपमा’ में अनुज की एक्स गर्लफ्रेंड की एंट्री होने वाली है. जी हां सही सुना आपने. सीरियल बेहद फेम अनेरी वजानी जल्द ही सीरियल अनुपमा में एंट्री करने वाली हैं.\
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रिपोर्ट के अनुसार अनेरी वजानी सीरियल अनुपमा में अनुज की एक्स गर्लफ्रेंड का किरदार निभाने वाली हैं. हालांकि शो में अनुज की पर्सनल लाइफ के बारे में कुछ नहीं दिखाया गया है. लेकिन अब खबर है कि अनेरी वजानी अनुज की एक्स गर्लफ्रेंड का किरदार निभाएंगी.
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अगर शो में अनुज की एक्स गर्लफ्रेंड एंट्री होती है तो कहानी में नया ट्विस्ट देखने को मिलेगा. ऐसे में अनुज-अनुपमा को कई मुश्किलों का समाना करना पड़ेगा. शो में आपने ये भी देखा कि बा ने भी अनुज से माफी मांग ली है. और वह बा और बापूजी की शादी की रस्में निभाने वाला है. इस दौरान बापूजी और गोपी काका ने अनुपमा-अनुज की रिश्ते को लेकर बात भी की.
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Writer- वीना त्रेहन
रियाअपनी दादी के कंधे पर सिर रख कर रो रही थी. रिया की मां ने देखा कि दादी रिया के सिर पर हाथ फेरते हुए उसे शांत होने को कह रही थीं. पापा बाहर के कमरे में कुरसी पर बैठे दोनों हाथों से सिर पकड़े रो रहे थे कि जान से प्यारी बेटी रिया को विदेश भेज क्या मिला?
वह तो उन्हें छोड़ जाना ही नहीं चाहती थी. मगर पत्नी की सहेली के बेटे से शादी का प्रस्ताव आया तो विदेश में बसे लड़के का मोह रिया की मां रेखा नहीं छोड़ सकीं. सोचा घर बैठे रिश्ता मिल रहा है… आजकल लड़के ढूंढ़ना और फिर उन की डिमांड्स पूरी करना क्या आसान है?
रिया ने तो अपने लिए साथ काम करते स्मार्ट, अच्छे परिवार व अच्छी पोस्ट पर लगे लड़के से विवाह करने की सोची थी. पापा सुरेश की इस में पूरी सहमति भी थी पर दादी बिदक गई थीं यह जान कर कि लड़का ब्राह्मण परिवार से नहीं है.
सुरेशजी ने मां को समझाने का पूरा प्रयास किया कि आज के समय की सोच अलग है पर रूढि़वादी मां को मनाना नामुमकिन था. रिया ने पापा से कहा था कि जल्दी न करें. शायद दादी अपनी सोच बदल लें. मगर ऐसा नहीं हो पाया.
2 साल पहले दादाजी के गुजर जाने के बाद दादी और भी जिद्दी हो गई थीं. अपने कमरे में ही रहतीं. उन्हें स्नान करना, अलग बरतनों में अलग खाना बनाना, मां के अलावा किसी और से कोई काम न करवाना मां के लिए कठिन होता जा रहा था. पर क्या करें. अपने ही बेटे को पराया कर दिया. उन के दरवाजे की चौखट पर खड़े पापा प्रणाम कहते और वे वहीं बैठी हाथ उठा आशीर्वाद दे देतीं.
सहेली ने सूचना दी और बेटे अमन को ले रिया को देखने चली आईं. काफी समय अमेरिका की बातें करती रहीं.
रेखाजी ने पूछा, ‘‘तो तुम घूम आई वहां?’’
‘‘नहीं. अब इन की शादी के बाद जाऊंगी. देखो हमें कोई दहेजवहेज नहीं चाहिए. बस बेटीदामाद के लिए अमेरिका के टिकट करवा दें.’’
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रिया को अजीब लगी थीं आंटी, आंटी का बेटा और उन की सोच… पर मां ने कहा, ‘‘बेटा यहां से क्या कुछ ले जाना… वहां अच्छीअच्छी चीजें मिलती हैं… फिर हमारा ढेरों आशीर्वाद जो होगा तुम्हारे साथ.’’
रिया के मम्मीपापा खुश थे, दादी नाराज कि कहां गए सब ब्राह्मण जाति के लोग और उन के बेटे… रिया को तो देखो पहले अपनी मरजी का लड़का ढूंढ़ बैठी और अब जब दूसरा मिल रहा है, तो वह है तो ब्राह्मण पर विदेश में रहता… क्या भरोसा मांसाहारी हो… शराब भी पीता हो… आज रिया के दादाजी होते तो यह रिश्ता कभी नहीं मानते.
मगर दादी को क्या पता कि पढ़लिखे व सरकारी नौकरी में अफसर वे दादी की हां में हां इसलिए मिलाते थे कि वे जानते थे कि मायके से लाई सोच को पत्नी कभी नहीं बदलेगी. पढ़ालिखा, कमाता व संस्कारी लड़का उन की रिया को खुश रखे और ससुराल वाले सब एकदूसरे का मान, सम्मान करें यही सोच होती दादाजी की.
अचानक सहेली के घर से आई सूचना कि अमन आ रहा है, जल्दी शादी करनी है ने सब को व्यस्त कर दिया. अकेली बेटी को बहुत धूमधाम से ब्याहने के सपने को छोटा कर साधारण ढंग से ब्याह कर विदा किया. अमेरिका के अनजाने शहर में पहुंच रिया थोड़ा अकेला महसूस कर रही थी, पर औफिस के बाद का समय अमन उसे न्यूयौर्क घुमाने में बिताता, कभी वर्डट्रेड सैंटर, कभी स्टेटन आईलैंड फेरी और आज ऐंपायर स्टेट बिल्डिंग की 104वीं मंजिल पर खड़े न्यूयौर्क शहर के कई फोटो खींचते रोमांच हो आया रिया को. कई फोटो भेजते मैसेज भी लिख डाला कि मैं बहुत खुश हूं. मम्मीपापा को तसल्ली हुई.
1 महीना खुशीखुशी बीत गया. फिर एक दिन अमन ने झिझकते बताया कि उसे 3 दिनों के लिए औफिस के काम से बाहर जाना है. तब रिया ने भी साथ चलने को कहा तो अमन बोला कि नहीं, वह उसे फोन करता रहेगा.
मगर न तो स्वयं फोन किया और न ही रिया के किए फोन को उठाया. 3 दिन की कह 25वें दिन लौटे अमन को देख रिया घबरा गई. ऐसा लगा जैसे कुछ पीछे छोड़ आया हो. उस के गले लगने लगी तो हाथ से रोकते कहा कि वह बहुत थका है. आराम करेगा. क्या हुआ शायद काम ज्यादा हो या कुछ काम बिगड़ गया हो.
बिगड़ ही तो गया था. पिछले 3 सालों से साथ रह रही गर्लफ्रैंड कैसे बरदाश्त करती अमन की पत्नी को. पहले तो अमन भी टालता रहा मां की इस जिद को कि शादी कर लो. वहां अकेले रहते हो. उन्हें चिंता होती है. पर उन का थोपा विवाह उसे रास आया.
कितनी प्यारी और उस का ध्यान रखने वाली है रिया. उस के स्पर्श में कितना अपनापन है. उस की मुसकराहट देख उस के अंदर तक प्यार की लहर झूम उठती है. मगर अब अचानक आए बदलाव से कैसे बचे?
कहीं नहीं गया था वह औफिस के काम से…गर्लफ्रैंड अमीलिया की धमकी से उस के घर में छिपा था… बिना विवाह किए साथ रह रहे थे, उस के चलते 2 बार गर्भपात करवाया था अमीलिया ने. अस्पताल के कागज पू्रफ थे, जिन पर पिता के नाम के आगे अमन का नाम लिखा था. क्या वह ये सब बता पाएगा रिया को?
परेशान रिया जानने की कोशिश कर रही थी कि अमन में अचानक आए बदलाव का क्या कारण हो सकता है. जल्दी परदाफाश हो गया. औफिस से लौटते एक लड़की बड़ा सा सूटकेस लिए अमन के साथ आई तो बताया गया कि उस के मकानमालिक ने जल्दी में उस से मकान खाली करवा लिया. दूसरा मिलते ही चली जाएगी.
भोली रिया खुश हुई कि कुछ दिन अच्छी कंपनी रहेगी. दूसरा बैडरूम उसे दे दिया. दोनों सुबह इकट्ठे निकलते और रात देर से आते. चौथे ही दिन सुबह अमन को अमीलिया के कमरे से निकलते देख रिया का तो रंग ही फक हो गया. सोचने लगी कि सही सुना था अमेरिका के कल्चर के बारे में… बिना बात किए अमन तैयार हो चला गया. अमीलिया घर पर ही रुकी.
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थोड़ी देर बाद अमीलिया सीधी रिया के सामने जा खड़ी हुई. धमकाते हुए अमीलिया ने कहा कि चाहे तुम्हारी अमन से इंडिया में शादी हो चुकी है, पर उस पर अभी भी उस का हक ज्यादा है. इस देश में बिना शादी किए भी बच्चे पैदा करने की मान्यता है और यदि पिता चाहे तो बच्चे का खर्चा उठा अलग हो सकता है. सरकार भी ऐसी स्थिति में सिंगल मदर की सहायता करती है.
ये सब सुन रिया का सिर घूम गया. कुछ समझ न पाने की स्थिति में वह धम्म से पास रखी कुरसी पर जा गिरी. जब होश आया तो अमीलिया को वहां नहीं पाया. उस रात वह लौटी भी नहीं.
अमन औफिस से जल्दी लौटा तो बिस्तर पर बैठी रिया को शून्य में ताकते पाया. न कुछ पूछा न कहा. चाय व नाश्ता ला सामने आ बैठा. रो दी रिया. क्यों किया अमन ऐसा? का उत्तर उस ने संक्षेप में दिया कि तुम चाहो तो यहां रहो नहीं तो लौट जाओ. रिया का जवाब था कि कौन है मेरा यहां तुम्हारे सिवा. बीचबीच में अमीलिया आती रहती. रिया ने सोच लिया कि वह पति को नहीं बांटेगी. क्या मां से बात कर सलाह ले? पर फिर घबरा उठी.