आखिरी मंगलवार: भाग -3

वेणी शंकर पटेल ‘ब्रज’

सपना कालेज में मार्शल आर्ट में ब्लैक बैल्ट ले चुकी थी. कालेज की पढ़ाई के दौरान कई मनचलों को वह सबक सिखा चुकी थी. लिहाजा, उस ने सब से पहले तो सुभाष के सामने धर्मराज की पूरी सचाई खोल कर रख दी. इस के लिए उस ने सुभाष से माफी भी मांग ली.

सुभाष को धर्मराज के इस पाखंड पर पहले तो बहुत गुस्सा आया, लेकिन उस ने भी ठंडे दिमाग से धर्मराज को सबक सिखाने की बात सोची और सपना को ले कर दूसरे ही दिन शहर के पुलिस स्टेशन पहुंच गया. पुलिस स्टेशन में मौजूद महिला इंस्पैक्टर रीना को सपना ने उस के साथ हुई दरिंदगी की बात बताई. रीना धर्मराज की करतूत जानती थी.

सपना की बात सुन कर रीना को याद आया कि तकरीबन 4 महीने पहले धर्मराज स्वामी की इसी तरह की शिकायत एक अधेड़ औरत ने की थी. जब धर्मराज को उस मामले की जांच के लिए पुलिस स्टेशन में बुलाया गया था, तो शहर के नेताओं के साथ पुलिस के बड़े अफसरों के फोन आने शुरू हो गए थे. उस पर इतना दबाव बनाया गया कि मजबूरन उसे धर्मराज को छोड़ना पड़ा था.

लेकिन इंस्पैक्टर रीना इस बार धर्मराज को किसी भी सूरत में छोड़ना नहीं चाहती थी. उस ने सपना और सुभाष को पूरा प्लान समझते हुए अगले मंगलवार को दरबार में जाने को कहा. इंस्पैक्टर रीना के प्लान के मुताबिक अगले मंगलवार को सपना अकेले ही धर्मराज के दरबार में हाजिर थी. उस ने धर्मराज से एकांत में मिलने की इच्छा जाहिर की, तो पाखंडी धर्मराज खुशी से झूम उठा. उसे लगा कि शिकार फिर से जाल में फंस चुका है.

शाम होते ही सपना धर्मराज के आने के पहले ही उस के कमरे में आ गई थी. धर्मराज पर तो उस के हुस्न का जादू ऐसा चढ़ चुका था कि जैसे ही सपना को करीब देखा, उसे अपनी बांहों में भर लिया. आज सपना पूरे होश में थी और धर्मराज की किसी हरकत का विरोध भी नहीं कर रही थी. धर्मराज हवस की आग में जल रहा था. वह सपना के संग संबंध बनाने को उतावला हो रहा था.

तभी सपना ने पर्स की तरफ हाथ बढ़ा कर धर्मराज से कहा, ‘‘मैं अपना मोबाइल बंद कर देती हूं. मैं नहीं चाहती कि रंग में भंग पड़े.’’ इसी बहाने उस ने अपने मोबाइल से एक मिस्ड काल इंस्पैक्टर रीना को कर के मोबाइल का कैमरा औन कर बिस्तर के सामने वाली टेबल पर रख दिया.

इंस्पैक्टर रीना सादे लिबास में अपनी टीम के साथ पहले से ही दरबार में मौजूद थीं. जैसे ही सपना का मिस्ड काल आया, वे अपने साथी पुलिस वालों के साथ धर्मराज के गुप्त कमरे के पास पहुंच कर दरवाजा खटखटाने लगीं. धर्मराज को इस का अंदाजा नहीं था. दरवाजे पर किसी की आवाज सुन कर वह सकपका गया कि तभी सपना ने उठ कर कमरे का दरवाजा खोल दिया.

इंस्पैक्टर रीना ने कड़क आवाज में कहा, ‘‘धर्मराज, तुम रंगे हाथ पकड़े गए हो. अब तुम कानून के हाथों से बच नहीं सकते.’’ इंस्पैक्टर रीना का इशारा पाते ही पुलिस टीम ने धर्मराज को अपनी गिरफ्त में ले लिया. सपना ने अपने मोबाइल फोन के कैमरे में बने वीडियो को इंस्पैक्टर रीना को दिखाते हुए कहा, ‘‘धर्म की आड़ में न जाने इस पाखंडी ने कितनी औरतों को अपनी हवस का शिकार बनाया होगा. ऐसे ढोंगियों को छोड़ना नहीं. इसे कड़ी से कड़ी सजा मिलनी चाहिए, जिस से कोई मजबूर और लाचार औरत इस की हवस का शिकार न बन सके.’’

सारे न्यूज चैनलों पर आज शाम से ही धर्मराज स्वामी की गिरफ्तारी के साथ उस की काली करतूतों की पोल खोलती खबरें दिखाई जा रही थीं. सपना और सुभाष यही सोचकर खुश हो रहे थे कि एक पाखंडी बाबा को कानून के हवाले कर उन्होंने समाज को धर्मराज के पाखंड से मुक्त कर दिया है.

24 साल तक खाद कारखाने के लिए किसी ने नहीं ली सुध

गोरखपुर खाद कारखाना, एम्स और रीजनल मेडिकल रिसर्च सेंटर के लोकार्पण समारोह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का स्वागत करते हुए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि विपक्ष के लिए नामुमकिन रहे कार्यों को पीएम मोदी ने मुमकिन बनाया है.

सीएम योगी ने कहा कि आज प्रधानमंत्री के हाथों तीन बड़ी विकास परियोजनाओं की सौगात पाकर पूर्वी उत्तर प्रदेश अभिभूत और उद्वेलित होकर आनन्द का उत्सव मना रहा है. आज का यह कार्यक्रम उस सपने को साकार करने जैसा है जिसे विपक्ष ने नामुमकिन मान लिया था. गोरखपुर के खाद कारखाना का उल्लेख करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि तीन दशकों तक पांच सरकारों ने बंद खाद कारखाना को चलाने की हामी भरकर भी इसे असंभव मान लिया था. पर “मोदी है तो मुमकिन है” के स्थापित सत्य के अनुरूप प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस असम्भव को भी सम्भव और नामुमकिन को मुमकिन बना दिया है. सीएम योगी ने कहा कि गोरखपुर का खाद कारखाना 10 जून 1999 को बंद हो गया था. 1990 से लेकर 2014 तक 24 वर्षों में किसी ने भी इसकी सुध नहीं ली. 22 जुलाई 2016 को पीएम मोदी ने इसका शिलान्यास किया तो आज इसका उद्घाटन भी उन्हीं के करकमलों से हो रहा है. मुख्यमंत्री ने बताया कि इस खाद कारखाने की क्षमता पुराने कारखाने से चार गुना अधिक है.

इंसेफेलाइटिस से मौतों पर 40 सालों तक तमाशबीन रहीं सरकारें

मुख्यमंत्री ने कहा कि गोरखपुर और पूर्वी उत्तर प्रदेश को लेकर लगातार यही माना जाता था यह क्षेत्र बीमारू है. मलेरिया, कालाजार, इंसेफलाइटिस और अन्य विषाणु जनित रोगों से 40 सालों तक लगातार हजारों मौतें होती रही लेकिन केंद्र व राज्य सरकारें मौन धारण कर तमाशबीन बनी रहती थीं. उन्होंने कहा कि हर व्यक्ति के प्रति संवेदना और आत्मनिर्भरता के सपनों को सजाने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रयासों की परिणति से एम्स का शिलान्यास भी उन्हीं के हाथों हुआ और लोकार्पण भी. मुख्यमंत्री ने कहा कि हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर में उत्तर प्रदेश तेजी से आगे बढ़ा है और आज वह 17 करोड़ लोगों को कोविड वैक्सिनेशन से आच्छादित करने जा रहा है. उन्होंने कहा कि दुनिया में सबसे बड़ा टीकाकरण अभियान पीएम मोदी के नेतृत्व में ही चलाया गया है. कोरोना प्रबंधन को लेकर पूरी दुनिया ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का लोहा माना है.

खड़ी हो रही मेडिकल कॉलेजों की लंबी श्रृंखला

सीएम योगी ने कहा कि 2014 में पूर्वी उत्तर प्रदेश में चिकित्सा के बड़े केंद्र के रूप में इकलौता गोरखपुर का मेडिकल कॉलेज था. आज यहां एम्स भी है और गोरखपुर के मेडिकल कॉलेज में सुपर स्पेशलिटी ब्लॉक भी, जिसका उद्घाटन इसी भूमि पर पीएम मोदी ने 2019 में किया था. उन्होंने कहा कि प्रदेश में मेडिकल कॉलेजों की लंबी श्रृंखला खड़ी हो रही है. 20 17 तक प्रदेश के निजी व सरकारी क्षेत्र में मिलाकर सिर्फ 17 मेडिकल कॉलेज थे. आज 59 जिलों में मेडिकल कॉलेज की सुविधा मिल गई है या उन पर काम चल रहा है. शेष बचे 16 जिलों के लिए भी युद्ध स्तर पर प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जा रहा है उन्होंने बताया कि देवरिया, सिद्धार्थनगर, बस्ती, बहराइच, अयोध्या में मेडिकल कॉलेज प्रारंभ हो गया है जबकि कुशीनगर, बलरामपुर,गोंडा आदि जिलों में निर्माण कार्य शुरू हो गया है.

अब गोरखपुर में ही विश्व स्तरीय जांच की सुविधा

मुख्यमंत्री ने कहा कि पहले गोरखपुर में इंसेफलाइटिस मरीजों के सैंपल जांच के लिए नेशनल इंस्टीट्यूट आफ वायरोलॉजी पुणे भेजे जाते थे. जब तक जांच कंफर्म होती थी तब तक मरीज या तो मर जाता था या दिव्यांगता का शिकार हो जाता था. आज पीएम के हाथों मिले आरएमआरसी की सौगात से गोरखपुर में ही विश्वस्तरीय जांच की सुविधा उपलब्ध हो गई है. कोरोना, इंसेफेलाइटिस, कालाजार, डेंगू जैसे वेक्टर डिजीज की जांच की सुविधा अब यही मिलने लगेगी.

आज मिली.परियोजनाओं की सौगात आत्मनिर्भर भारत की नई तस्वीर

सीएम योगी ने कहा कि आजादी के अमृत महोत्सव और चौरीचौरा शताब्दी महोत्सव के अवसर पर पीएम के हाथों मिली इन बड़ी परियोजनाओं की सौगात आत्मनिर्भर भारत की नई तस्वीर है. इसे प्रस्तुत करने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दुनिया के सर्वाधिक लोकप्रिय नेता हैं.

सामरोह में इनकी रही प्रमुख सहभागिता

राज्यपाल आनंदी बेन पटेल, केंद्रीय वित्त राज्यमंत्री पंकज चौधरी, केंद्रीय मंत्री अनुप्रिया पटेल, उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य, उप मुख्यमंत्री डॉ दिनेश शर्मा, निषाद पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ संजय निषाद, भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष स्वतन्त्र देव सिंह,  राज्य सरकार के मंत्रीगण सूर्य प्रताप शाही, स्वामी प्रसाद मौर्य, दारा सिंह चौहान, जयप्रताप सिंह, डॉ सतीश चंद्र द्विवेदी, जयप्रकाश निषाद, उपेंद्र तिवारी,श्रीराम चौहान, आनंद स्वरूप शुक्ल, राज्यसभा सदस्य शिव प्रताप शुक्ल, बृजलाल, जयप्रकाश निषाद, सांसद रविकिशन शुक्ल, कमलेश पासवान, रमापति राम त्रिपाठी, जगदम्बिका पाल, हरीश द्विवेदी, विजय दूबे, रविंद्र कुशवाहा, प्रवीण निषाद, महापौर सीताराम जायसवाल, विधायकगण डॉ राधामोहन दास अग्रवाल, फतेह बहादुर सिंह, महेंद्रपाल सिंह, बिपिन सिंह, संत प्रसाद, संगीता यादव, शीतल पांडेय समेत आसपास के जिलों के कई विधायक, भाजपा के क्षेत्रीय अध्यक्ष डॉ धर्मेंद्र सिंह आदि.

डंकी फ्लाइट: दूसरे देश में घुसने का जोखिम भरा रास्ता

‘मृग मरीचिका’ कहनेसुनने में जितना जादुई शब्द लगता है, असलियत में उतना ही भयानक होता है. यह शब्द उस प्यासे हिरन की कहानी से उपजा है, जो गरम रेत के मरुस्थल में पानी होने का धोखा खाता गया, पर यहांवहां भटकने के बाद भी प्यास से मर गया.

जब किसी इनसान में ऐसी ही ‘मृग मरीचिका’ का भरम होता है, तो वह अपनी जान को जोखिम में डालने से नहीं चूकता है. अब एक और शब्द पर गौर फरमाते हैं, जिसे इंगलिश में ‘डंकी फ्लाइट’ कहते हैं. इस शब्द की तह में जाने से पहले यह जान लें कि अचानक यह शब्द क्यों सुर्खियों में आ गया है?

दरअसल ऐसी खबर आई है कि शाहरुख खान और राज कुमार हिरानी एक फिल्म पर काम कर रहे हैं, जो गैरकानूनी तरीके से किसी दूसरे देश में दाखिल होने वाले लोगों और उन की समस्याओं से जुड़ी हुई बताई जा रही है. शाहरुख खान इस फिल्म ऐसे इनसान का किरदार निभाएंगे, जो विदेश जाने के लालच में अपना सबकुछ दांव पर लगा देता है.

फिल्म की तो छोडि़ए, अगर असली जिंदगी की बात करें तो भारत में ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो किसी भी कीमत पर और किसी भी तरीके से विदेश जाने का नशा पाले रखते हैं.

अकेले पंजाब राज्य के बहुत से नौजवान अमेरिका और कनाडा में घुसने के लिए दलालों को लाखों रुपए देने के लिए तैयार रहते हैं. यही वजह है कि न जाने कितने भारतीय नागरिक अपनी जान जोखिम में डाल कर लैटिन अमेरिका के रास्ते अमेरिका पहुंचने की कोशिश करते हैं.

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मैक्सिको ने साल 2019 में 311 भारतीय लोगों को वापस भारत भेज दिया था. वे सब गैरकानूनी तरीके से बौर्डर पार कर अमेरिका जाने की फिराक में थे. हद तो यह थी कि अमेरिका में घुसने के लिए उन्होंने मानव तस्करों को 20 लाख से 50 लाख रुपए दिए थे.

इन लोगों में से ज्यादातर भारत से पहले इक्वाडोर पहुंचे थे, उस के बाद कोलंबिया, पनामा और होंडुरास होते हुए आखिरकार मैक्सिको पहुंचे थे. उन में से ज्यादातर पंजाब और हरियाणा के किसान परिवारों के बेरोजगार नौजवान थे.

पनामा के जंगलों से गुजरते हुए उन नौजवानों ने कई लाशें देखी थीं, जो शायद उन लोगों की थीं, जो उन की ही तरह गैरकानूनी तरीके से अमेरिका जाना चाहते थे. जंगल में न खाना था और न ही पानी. पकड़े गए बहुत से नौजवानों ने बताया कि प्यास बु?ाने के लिए उन्हें अपनी कमीजों से पसीना निचोड़ कर पीना पड़ा था.

साल 2019 में ही एक बापबेटी की तसवीर ने पूरी दुनिया को ?ाक?ार दिया था, जो नदी के किनारे पड़े हुए थे. वह बाप अपनी मासूम बच्ची को टीशर्ट में छिपाए हुए था.

बाद में पता चला कि वह शख्स एल सल्वाडोर का रहने वाला था, जो अपनी तकरीबन 2 साल की बेटी के साथ अमेरिका में घुसने की कोशिश कर रहा था. रिपोर्टों के मुताबिक, वह आदमी काफी समय से अमेरिका में शरण लेने की कोशिश कर रहा था, पर नाकाम होने के बाद उस ने नदी के रास्ते अमेरिका में घुसने की कोशिश की और यह हादसा हो गया.

अमेरिकी कस्टम ऐंड बौर्डर पैट्रोल के मुताबिक, साल 2018 में मैक्सिको के रास्ते गैरकानूनी तरीके से अमेरिका में घुसने की कोशिश में तकरीबन 9,000 भारतीय लोगों को पकड़ा गया था. साल 2017 के मुकाबले यह तादाद तकरीबन 3 गुना ज्यादा थी. इसी साल अमेरिका की दक्षिणपश्चिमी सीमा के रास्ते गैरकानूनी तरीके से देश में घुसते पकड़े जाने वालों में सब से बड़ा समुदाय भारतीयों का था.

जब ऐसे लोग पकड़े जाते हैं, तो अमेरिका में बसने के लिए तरहतरह की दलील देते हैं, जैसे अपने देश में वे भुखमरी के शिकार हैं या जाति और धर्म के नाम पर उन्हें सताया जाता है या फिर वहां राजनीतिक तौर पर उन पर जुल्म होते हैं.

लेकिन किसी देश में घुसना आसान काम नहीं है. ऐसा ही एक मामला 6 साल की गुरुप्रीत कौर के साथ हुआ था, जो एरिजोना के मरुस्थल में अपनी मां के साथ सीमा पार करते हुए प्यास से मर गई थी.

हरियाणा के फरीदाबाद जिले के गांव में रहने वाले एक नौजवान ने नाम और पता न छापने की शर्त पर बताया कि वह भी एक एजेंट के भरोसे मैक्सिको से अमेरिका में घुसा था. यह 2-3 साल पुरानी बात है और इस के लिए लाखों रुपए का खर्च भी हुआ था.

एजेंट ने पक्के कागज बनवाने का दावा किया था और अमेरिका में घुसने में कोई दिक्कत नहीं होगी, यह भी वादा किया था, पर अमेरिका में जाने के बाद वहां के एयरपोर्ट पर अफसरों को शक हो गया. नौकरी की आस लिए वहां पहुंचे उस नौजवान के कागजात में उन्हें कमी लगी और उसे पूछताछ के बाद एक ऐसे कैंप में, जहां 2,000 से ज्यादा ऐसे लोग थे, जो अमेरिका में घुसने में नाकाम रहे थे.

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उस कैंप में वैसे तो हर तरह की सुविधा थी, खानापीना भी ठीक था, पर तकरीबन 10 महीने वहां रहने के बावजूद उसे अपने घर वालों से बात करने की इजाजत नहीं थी. वहां कई देशों के नौजवान थे, जिन में से ज्यादातर अमेरिका में बसने के लिए अपने घर से निकले थे.

जब उस नौजवान को इस बात की आस खत्म हो गई कि अब वह अमेरिका में किसी तरह दाखिल नहीं हो सकता है तो उस ने वापस लौटने की अपील की, जो वहां से जुड़े जज ने मंजूर कर ली.

क्यों है विदेश का लालच

अगर कानूनी तरीके से किसी देश में जा कर बसना हो, तो बहुत से नियमकानूनों का पालन करना होता है, जो हर किसी के बूते की बात नहीं है और इसीलिए दलाल पैसे ले कर नौजवानों को विदेश भेजने के सब्जबाग दिखाते हैं, जो असलियत के आसपास भी नहीं होते हैं.

सवाल उठता है कि लोग अपनी जान जोखिम में डाल कर विदेश क्यों जाना चाहते हैं? बेरोजगारी इस की सब से बड़ी वजह है. साथ ही, अमेरिका जैसे अमीर देशों की चकाचौंध और डौलर में कमाई का लालच उन्हें वहां जाने को उकसाता है.

हरियाणा और पंजाब के बहुत से किसान अपनी कीमती जमीन की वजह से अमीर हो गए हैं. उन के बच्चे खेती करना नहीं चाहते हैं और पढ़ाईलिखाई में भी वे तीसमारखां नहीं होते हैं. लिहाजा, जमीन बेच कर विदेश में जाना उन्हें आसान और सस्ता सौदा लगता है.

अकेले अमेरिका में साल 2019 में  7,720, साल 2017 में 4,620, साल 2016 में 3,544, साल 2015 में 3,091 और साल 2014 में 1,663 भारतीय मूल के लोग घुसपैठ करते हुए पकड़े गए थे, जिन में महिलाएं और नाबालिग भी शामिल थे.

बहुत से लोग हैं, जो जानते हैं कि इस तरह की समस्याएं आ सकती हैं और बहुत से तो भुगत भी चुके होते हैं, पर फिर भी न जाने क्यों वे इसी उम्मीद में बारबार कोशिश करते रहते हैं कि दांव लगते ही वे अमेरिका में घुस ही जाएंगे.

इस के लिए बहुत से घरपरिवार अपनी जमीन गिरवी रख देते हैं, कई बार बेच भी देते हैं या नातेरिश्तेदारों से उधार या ब्याज पर कर्ज भी ले लेते हैं, पर विदेश जाने की अपनी इच्छा को जिंदा रखते हैं.

मिडिल ईस्ट देशों में भी भारतीयों के जाने का चसका देखा जा सकता है. वहां तो बहुत से शेखों के जोरजुल्म सह रही औरतें डिटेंशन कैंपों से ज्यादा बदहाली में जीती हैं.

साल 2018 की बात करें, तो दुबई की एक गैरसरकारी भारतीय संस्था ‘सरबत दा भला’ के मुताबिक, मिडिल ईस्ट देशों में 100 से ज्यादा पंजाबी महिलाएं अमीर शेखों की कैद में थीं, जो भारत लौटना चाहती थीं.

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ऐसी औरतें जालसाजी और लालची ट्रैवल एजेंटों के चंगुल में फंस कर वहां नरक से बदतर जिंदगी जी रही थीं. इन यातनाओं में मारपीट, यौन शोषण, बहुत ज्यादा काम करवाना या फिर काम के बदले कोई पैसा न देना भी शामिल है.

कहने का मतलब है कि यह ‘डंकी फ्लाइट’ ज्यादातर नौजवानों पर भारी पड़ती है और उन की जिंदगी को नरक बना देती है.

दो कदम तन्हा- भाग 1: अंजलि ने क्यों किया डा. दास का विश्वास

Writer- डा. पी. के. सिंह 

‘‘दास.’’ अपने नाम का उच्चारण सुन कर डा. रविरंजन दास ठिठक कर खड़े हो गए. ऐसा लगा मानो पूरा शरीर झनझना उठा हो. उन के शरीर के रोएं खड़े हो गए. मस्तिष्क में किसी अदृश्य वीणा के तार बज उठे. लंबीलंबी सांसें ले कर डा. दास ने अपने को संयत किया. वर्षों बाद अचानक यह आवाज? लगा जैसे यह आवाज उन के पीछे से नहीं, उन के मस्तिष्क के अंदर से आई थी. वह वैसे ही खड़े रहे, बिना आवाज की दिशा में मुड़े. शंका और संशय में कि दोबारा पीछे से वही संगीत लहरी आई, ‘‘डा. दास.’’

वह धीरेधीरे मुड़े और चित्रलिखित से केवल देखते रहे. वही तो है, अंजलि राय. वही रूप और लावण्य, वही बड़ी- बड़ी आंखें और उन के ऊपर लगभग पारदर्शी पलकों की लंबी बरौनियां, मानो ऊषा गहरी काली परतों से झांक रही हो. वही पतली लंबी गरदन, वही लंबी पतली देहयष्टि. वही हंसी जिस से कोई भी मौसम सावन बन जाता है…कुछ बुलाती, कुछ चिढ़ाती, कुछ जगाती.

थोड़ा सा वजन बढ़ गया है किंतु वही निश्छल व्यक्तित्व, वही सम्मोहन.  डा. दास प्रयास के बाद भी कुछ बोल न सके, बस देखते रहे. लगा मानो बिजली की चमक उन्हें चकाचौंध कर गई. मन के अंदर गहरी तहों से भावनाओं और यादों का वेग सा उठा. उन का गला रुंध सा गया और बदन में हलकी सी कंपन होने लगी. वह पास आई. आंखों में थोड़ा आश्चर्य का भाव उभरा, ‘‘पहचाना नहीं क्या?’’

‘कैसे नहीं पहचानूंगा. 15 वर्षों में जिस चेहरे को एक पल भी नहीं भूल पाया,’ उन्होंने सोचा.

‘‘मैं, अंजलि.’’

डा. दास थोड़ा चेतन हुए. उन्होंने अपने सिर को झटका दिया. पूरी इच्छा- शक्ति से अपने को संयत किया फिर बोले, ‘‘तुम?’’

‘‘हां, मैं. गनीमत है पहचान तो लिया,’’ वह खिलखिला उठी और

डा. दास को लगा मानो स्वच्छ जलप्रपात बह निकला हो.

‘‘मैं और तुम्हें पहचानूंगा कैसे नहीं? मैं ने तो तुम्हें दूर से पीछे से ही पहचान लिया था.’’

मैदान में भीड़ थी. डा. दास धीरेधीरे फेंस की ओर खिसकने लगे. यहां कालिज के स्टूडेंट्स और डाक्टरों के बीच उन्हें संकोच होने लगा कि जाने कब कौन आ जाए.

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‘‘बड़ी भीड़ है,’’ अंजलि ने चारों ओर देखा.

‘‘हां, इस समय तो यहां भीड़ रहती ही है.’’

शाम के 4 बजे थे. फरवरी का अंतिम सप्ताह था. पटना मेडिकल कालिज के मैदान में स्वास्थ्य मेला लगा था. हर साल यह मेला इसी तारीख को लगता है, कालिज फाउंडेशन डे के अवसर पर…एक हफ्ता चलता है. पूरे मैदान में तरहतरह के स्टाल लगे रहते हैं. स्वास्थ्य संबंधी प्रदर्शनी लगी रहती है. स्टूडेंट्स अपना- अपना स्टाल लगाते हैं, संभालते हैं. तरहतरह के पोस्टर, स्वास्थ्य संबंधी जानकारियां और मरीजों का फ्री चेकअप, सलाह…बड़ी गहमागहमी रहती है.

शाम को 7 बजे के बाद मनोरंजन कार्यक्रम होता है. गानाबजाना, कवि- सम्मेलन, मुशायरा आदि. कालिज के सभी डाक्टर और विद्यार्थी आते हैं. हर विभाग का स्टाल उस विभाग के एक वरीय शिक्षक की देखरेख में लगता है. डा. दास मेडिसिन विभाग में लेक्चरर हैं. इस वर्ष अपने विभाग के स्टाल के वह इंचार्ज हैं. कल प्रदर्शनी का आखिरी दिन है.

‘‘और, कैसे हो?’’

डा. दास चौंके, ‘‘ठीक हूं…तुम?’’

‘‘ठीक ही हूं,’’ और अंजलि ने अपने बगल में खड़े उत्सुकता से इधरउधर देखते 10 वर्ष के बालक की ओर इशारा किया, ‘‘मेरा बेटा है,’’ मानो अपने ठीक होने का सुबूत दे रही हो, ‘‘नमस्ते करो अंकल को.’’

बालक ने अन्यमनस्क भाव से हाथ जोड़े. डा. दास ने उसे गौर से देखा फिर आगे बढ़ कर उस के माथे के मुलायम बालों को हलके से सहलाया फिर जल्दी से हाथ वापस खींच लिया. उन्हें कुछ अतिक्रमण जैसा लगा.

‘‘कितनी उम्र है?’’

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‘‘यह 10 साल का है,’’ क्षणिक विराम, ‘‘एक बेटी भी है…12 साल की, उस की परीक्षा नजदीक है इसलिए नहीं लाई,’’ मानो अंजलि किसी गलती का स्पष्टीकरण दे रही हो. फिर अंजलि ने बालक की ओर देखा, ‘‘वैसे परीक्षा तो इस की भी होने वाली है लेकिन जबरदस्ती चला आया. बड़ा जिद्दी है, पढ़ता कम है, खेलता ज्यादा है.’’

बेटे को शायद यह टिप्पणी नागवार लगी. अंगरेजी में बोला, ‘‘मैं कभी फेल नहीं होता. हमेशा फर्स्ट डिवीजन में पास होता हूं.’’

डा. दास हलके से मुसकराए, ‘‘मैं तो एक बार एम.आर.सी.पी. में फेल हो गया था,’’ फिर वह चुप हो गए और इधरउधर देखने लगे.

कुछ लोग उन की ओर देख रहे थे.

‘‘तुम्हारे कितने बच्चे हैं?’’

अनुज-अनुपमा के दिल मिल रहे हैं चुपके-चुपके, देखें Video

टीवी सीरियल अनुपमा और अनुज कपाड़िया की जोड़ी को फैंस काफी पसंद करते हैं. दोनों की फोटोज और वीडियो सोशल मीडिया पर अक्सर वायरल होती है. अब अनुपमा-अनुज की रोमांटिक वीडियो वायरल हो रही है.

इस वीडियो में अनुपमा और अनुज एक साथ ‘दो दिल मिल रहे हैं चुपके चुपके’  गाने पर डांस करते हुए नजर आ रहे हैं. वीडियो में दोनों की केमिस्ट्री शानदार लग रही है. शो के आने वाले एपिसोड में बड़ा ट्विस्ट आने वाला है. शो में दिखाया जाएगा कि अनुज का एक्सीडेंट हो जाएगा इसके बाद अनुपमा अनुज के  करीब आएगी.

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शो के लेटेस्ट एपिसोड में दिखाया जा रहा है कि वनराज काव्या को तलाक देना चाहता है ऐसे में काव्या बौखला गई है. वह अनुपमा को नुकसान पहुंचाना चाहती है.

 

तो दूसरी तरफ अनुपमा वनराज को समझाएगी कि वो ये तलाक ना ले और वनराज उसे कहेगा कि वो उसके मामलों से दूर ही रहे. अनुपमा कहेगी कि इस तलाक से सभी घरवाले बहुत दुखी होंगे. वनराज कहेगा कि अब वो काव्या से प्यार नहीं करता इस वजह से वो इस रिश्ते में नहीं रह पाएगा.

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काव्या की ऐसी हालत देखकर अनुपमा को अपने पुराने दिन याद आ जाएंगे. अनुपमा को काव्या के अंदर अपना गुजरा हुआ कल नजर आएगा और वो काव्या को गले से लगा लेगी. वनराज गुस्से में काव्या को और भी सुनाने लगेगा लेकिन अनुपमा काव्या को संभालने को कहेगी.

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शो में आप ये भी देखेंगे कि अनुपमा वनराज  को समझाएगी कि वो ये तलाक ना ले और वनराज उसे कहेगा कि वो उसके मामलों से दूर ही रहे. अनुपमा कहेगी कि इस तलाक से सभी घरवाले बहुत दुखी होंगे. वनराज कहेगा कि अब वो काव्या से प्यार नहीं करता इस वजह से वो इस रिश्ते में नहीं रह पाएगा.

GHKKPM: ‘विराट’ ने थामा ‘पाखी’ का हाथ तो सई ने ढूंढ लिया नया साथी, देखें Video

टीवी सीरियल ‘गुम है किसी के प्यार में’ (Ghum Hai Kisikey Pyaar Meiin) फेम निल भट्ट और ऐश्वर्या शर्मा यानी विराट और पाखी ने हाल ही में शादी के बंधन में बंध गए. तो दूसरी तरफ ऐश्वर्या शर्मा ने अपने लिए नया साथी ढूढ लिया है. जी हां, और वह खूब मस्ती करती नजर आ रही है. आइए मिलवाते हैं सई के नए साथी से.

‘गुम है किसी के प्यार में’  की सई सोशल मीडिया पर काफी एक्टिव रहती हैं. वह अक्सर फैंस के साथ फोटोज और वीडियो शेयर करती रहती हैं. अब उन्होंने एक ऐसी वीडियो शेयर की है, जिसे देखकर हर कोई हैरान रह गया है. आइए बताते हैं इस वीडियो के बारे में.

 

हाल ही में शो के सेट से एक वीडियो सामने आया है, जिसमें सई एक टाइगर के सामने बैठी हुई है. इस वीडियो में एक्ट्रेस एक टाइगर के सामने बैठकर मस्ती करती नजर आ रही हैं.

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फैंस इस वीडियो को देखकर हैरान रह गए. लेकिन बाद में पता चला कि कि यह सिर्फ एक धोखा है. ‘गुम है किसी के प्यार में’  की कहानी में दिलचस्प मोड़ आ चुका है. शो में दिखाया जा रहा है कि सई को अहसास हो रहा है कि वह विराट से प्यार करने लगी है. तो दूसरी तरफ विराट अपने प्यार का इजहार नहीं कर पा रहा है.

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विराट का दोस्त सदानंद और उसकी पत्नी ने विराट को फंसाने की कोशिश कर रहे हैं.  विराट को लगता है कि उसको दोस्त अब नहीं रहा तो उसके परिवार की जिम्मेदारी उठाना उसका कर्तव्य है. तो दूसरी तरफ सई विराट को बहुत मिस करती है. ऐसे में सम्राट उसका मूड ठीक करने की कोशिश करता है. पाखी उनदोनों को देखकर भड़क जाती है.

 

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इतना ही नहीं, पाखी सई को खूब सुनाएगी. इस बार सई पाखी की बोलती बंद कर देगी. सई विराट और उसके रिश्ते पर भी सवाल खड़ा करती है.

मिसाल: हरेकाला हजब्बा- एक संतरे बेचने वाले अनपढ़ ने खोल दिया स्कूल

आज मैं ने अपने दोनों बच्चों से एक सवाल पूछा कि नीरज चोपड़ा कौन है, तो उन्होंने तपाक से बता दिया कि वही जैवलिन एथलीट, जिस ने टोक्यो ओलिंपिक खेलों में गोल्ड मैडल जीता है. मेरे ही बच्चे क्यों, आज हर कोई जानता है कि भालाफेंक नीरज चोपड़ा दिखने में जितना हैंडसम है, उस का कारनामा भी उतना ही शानदार है.

पर, जब मैं ने अपने दोनों बच्चों से पूछा कि हाल ही में देश के राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने राष्ट्रपति भवन के ‘दरबार हाल’ में हरेकाला हजब्बा को देश के सब से प्रतिष्ठित सम्मानों में से एक ‘पद्मश्री अवार्ड’ से क्यों नवाजा है, तो यह सुन कर वे दोनों एकदूसरे का मुंह ताकने लगे, फिर बोले, ‘यह कैसा नाम है और ‘पद्मश्री अवार्ड’ क्या होता है’, तो मु?ो कोई हैरानी नहीं हुई.

ज्यादातर बच्चे क्या नौजवान भी इस नाम से अनजान होंगे और जिस काम के लिए हरेकाला हजब्बा को ‘पद्मश्री अवार्ड’ मिला है, इस की अहमियत उन्हें आज तो कतई नहीं सम?ा में आएगी. वजह, एक साधारण सी कदकाठी के इस आम गरीब इनसान ने उस काम के लिए अपनी पूरी जिंदगी लगा दी है, जो किसी की कामयाबी की पहली सीढ़ी होता है.

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65 साल के बुजुर्ग हरेकाला हजब्बा खुद तो संतरे बेच कर अपनी जिंदगी गुजार चुके हैं, पर नई पीढ़ी को उन्होंने जो सौगात दी है, वह किसी गोल्ड मैडल की सुनहरी चमक से कम नहीं है.

हरेकाला हजब्बा को यह सम्मान शिक्षा के क्षेत्र में सामाजिक काम करने के लिए दिया गया है. एक संतरे बेचने वाला शिक्षा के क्षेत्र में यह सम्मान पा रहा है, यह सुनने में क्या थोड़ा अजीब नहीं लग रहा है?

पर ऐसा हुआ है. दरअसल, कर्नाटक के दक्षिण कन्नड़ जिले के न्यूपाड़ापू गांव के रहने वाले हरेकाला हजब्बा ने अपने गांव में अपनी जमापूंजी से एक स्कूल खोला है. इस के साथ ही वे हर साल अपनी बचत का पूरा हिस्सा स्कूल के विकास के लिए देते रहे हैं.

हरेकाला हजब्बा कर्नाटक के मंगलुरु शहर में एक संतरा विक्रेता हैं. अपने गांव में स्कूल न होने की वजह से वे पढ़ाई नहीं कर सके थे, लेकिन पढ़ाईलिखाई की अहमियत को बहुत ज्यादा सम?ाते थे, तभी तो उन्होंने ऐसा कारनामा किया है, जिस के बारे में लोग बातें तो बहुत करते हैं, पर अमल में लाने की बात पर कन्नी काट लेते हैं.

कभी खुद स्कूल की शक्ल न देखने वाले हरेकाला हजब्बा बताते हैं, ‘‘एक दिन एक विदेशी जोड़ा मु?ा से संतरे खरीदना चाहता था. उन्होंने कीमत भी पूछी, लेकिन मैं सम?ा नहीं सका.

‘‘यह मेरी बदकिस्मती थी कि मैं स्थानीय भाषा के अलावा कोई दूसरी भाषा नहीं बोल सकता हूं. वह जोड़ा चला गया. मु?ो बेहद बुरा लगा. इस के बाद मु?ो यह खयाल आया कि गांव में एक प्राइमरी स्कूल होना चाहिए, ताकि हमारे गांव के बच्चों को कभी उन हालात से गुजरना न पड़े, जिन से मैं गुजरा हूं.’’

इस के बाद हरेकाला हजब्बा ने गांव वालों को सम?ाया और उन की मदद से एक मसजिद में एक स्कूल शुरू किया. इस के अलावा वे स्कूल की साफसफाई करते थे और बच्चों के लिए पीने का पानी भी उबालते थे. साथ ही, छुट्टियों के दौरान वे गांव से 25 किलोमीटर दूर दक्षिण जिला पंचायत दफ्तर जाते थे और बारबार बड़े अफसरों से स्कूल से जुड़ी बुनियादी सुविधाओं को औपचारिक रूप देने की गुजारिश करते थे.

स्कूल की जमीन लेने और शिक्षा विभाग से इस की मंजूरी लेने के लिए हरेकाला हजब्बा ने एड़ीचोटी का जोर लगाया. साल 1995 से शुरू की गई उन की इन कोशिशों को साल 1999 में तब कामयाबी मिली, जब दक्षिण कन्नड़ जिला पंचायत ने उन के स्कूल को मंजूरी दे दी.

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संतरे बेच कर अपनी गुजरबसर करने वाले की आमदनी का आसानी से अंदाजा लगाया जा सकता है, पर पढ़ाईलिखाई न मिलने से जिंदगी में कितनी बड़ी समस्याएं आ सकती हैं, यह बात नई पीढ़ी को सम?ा नहीं आ पाती है.

हरेकाला हजब्बा जैसे लोग अपने जज्बे से दुनिया को यह बता देते हैं कि तालीम की चाबी कामयाबी का ताला खोलने के लिए बहुत ज्यादा जरूरी है.

यही वजह है कि अब हरेकाला हजब्बा अपने बनाए गए स्कूल को और बड़ा बनाना चाहते हैं, जिसे करने में वे कामयाब भी रहेंगे. वे खुद तो अनपढ़ रहे हैं, पर उन के इस काम ने उन्हें ‘अक्षर संत’ की ऐसी उपाधि दिला दी है, जो हर किसी के लिए मिसाल है.

बोल कि लब “आजाद” हैं तेरे

यह सब इसलिए कि अपनी चिर परिचित शैली से अलग इन दिनों गुलाम नबी आजाद जिन्हें कभी मजाक में काग्रेस का “गुलाम” कहा जाता था अब खुलकर  रेलिया कर रहे हैं और कांग्रेस के खिलाफ अप्रत्यक्ष रूप से व्यंग बाण चला रहे हैं.

परिणाम स्वरूप उनकी रैलियों में भारी भीड़ जुट रही है वही कांग्रेस आलाकमान के लिए यह एक चिंता का सबब बना हुआ है. लेकिन इन सबके बीच देश की सत्ता संभाल रही भारतीय जनता पार्टी और उसका आलाकमान जम्मू कश्मीर में शायद राजनीति की चौपड़ पर एक नया इतिहास लिखने के लिए बेताब है.

वहयह भली भांति जानता है कि भाजपा अकेले दम जम्मू कश्मीर में सत्ता नहीं वरण कर सकती ऐसे में गुलाम नबी आजाद की गलबहियां उसे रास आएंगी.

इधर, कांग्रेस आलाकमान अपने ही पैरों में कुल्हाड़ी मारता हुआ दिखाई दे रहा है जिस तरीके से पंजाब में अमरिंदर सिंह जैसे बड़े कद के राजनीतिक हस्ती को कांग्रेस ने घर बैठे बाहर का रास्ता दिखा करके कांग्रेस को कमजोर किया, जैसा आंध्र प्रदेश में जगन मोहन रेड्डी के साथ और पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस की स्थापना से पहले ममता बनर्जी के साथ शायद वही इतिहास की इबादत दोबारा लिखने के लिए कांग्रेस का भविष्य जम्मू कश्मीर में भी गुलाम नबी आजाद को बाहर का रास्ता दिखाने के लिए लालायित है.

इन सब परिस्थितियों के बाद क्या जम्मू कश्मीर भी कांग्रेस के हाथों से बाहर नहीं निकल जाएगा?

आज हम इस रिपोर्ट में जम्मू कश्मीर की सियासी हलचल को लेकर के आपके समक्ष इस रिपोर्ट में कुछ महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा कर रहे हैं जो यह बताएगा कि क्या गुलाम नबी आजाद के “आजाद लब” जम्मू कश्मीर की राजनीति में कुछ नयी आवाज बुलंद करने जा रहे हैं. आगामी परिसीमन के बाद जब चुनाव होंगे तो क्या मुख्यमंत्री के रूप में गुलाम नबी आजाद शपथ लेंगे.

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गुलाम नबी आजाद की “आजादी”

राजनीतिक जानकार यह अच्छी तरह जानते हैं कि गुलाम नबी आजाद कांग्रेस के एक ऐसे चेहरे हैं जो इंदिरा गांधी, राजीव गांधी के बाद अब सोनिया गांधी और राहुल के साथ भी घुले मिले हुए हैं. इस सब के बावजूद कांग्रेस पार्टी में “जी 123” का जो एक अलग कॉकस सामने आया है इसमें गुलाम नबी आजाद की उपस्थिति यह दर्शाती है कि उनके नाम में आरंभ भले ही गुलाम शब्द से होता है मगर वह हृदय से एक आजाद तबीयत के शख्स है. यही कारण है कि उन्होंने एक कर्तव्यनिष्ठ सच्चा कांग्रेसी होने के नाते कांग्रेस आलाकमान को आगाह किया कि अगर कांग्रेस को देश का नेतृत्व संभालना है तो पार्टी को महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा करनी चाहिए. मगर कांग्रेस ने इन सब चीजों को नकारा, अब हालात यह है कि जम्मू-कश्मीर में आजाद 4 दिसंबर तक लगातार  रैलियां करते रहे उनमें भारी भीड़ भी जुटती रही.यहां  स्पष्ट दिखाई दिया कि किस तरह गुलाम नबी आजाद को जम्मू कश्मीर की आवाम अपना समर्थन दे रही है. उन्होंने अपने विभिन्न भाषणों में कुछ महत्वपूर्ण बातें कही है और राजनीतिक संकेत भी दिए हैं जिनसे यह स्पष्ट होता है कि जहां वे कांग्रेस के प्रति आक्रामक है वहीं भाजपा के प्रति नरम दिखाई दे रहे हैं . नरेंद्र मोदी  देश की सरकार ने सबसे बड़ी रियासत जम्मू-कश्मीर को दो भागों में बांट दिया और केंद्र शासित राज्य बना दिया. इस पर आजाद अब मौन हैं.

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दूसरी तरफ उनके खासम खास सारे बड़े नेता कांग्रेस को आंख दिखाते हुए पार्टी को लगातार छोड़ रहे हैं जिसका स्पष्ट संकेत यह है कि आने वाले समय में आजाद एक नई पार्टी का आगाज करने वाले हैं.

गहरी पैठ

सरकारी और भारतीय भाषाओं के स्कूलों के साथ देश में बड़ा भेदभाव किया जा रहा है. वहां टीचर तो नियुक्त होते हैं ऊंची जातियों के, पर पढ़ने वाले 90 फीसदी छात्रछात्राएं पिछड़ी व निचली जातियों की होती हैं और उन में तालमेल नहीं बैठता. संविधान व कानून चाहे कहता रहे कि देश का हर नागरिक बराबर है, पर सच यही है कि देश में जाति की जड़ें बहुत गहरी हैं और हर शहर ही नहीं, बल्कि महल्ले और एक ही बिल्डिंग में साथसाथ रहने वाले परिवारों के बीच भी न दिखने वाली लाइनें खिंची रहती हैं.

महाराष्ट्र में गोखले इंस्टीट्यूट औफ पौलिटिक्स ऐंड इकोनौमिक्स ने अपने सर्वे और 2004 की जनगणना के आधार पर पाया कि मराठा, कुरबी व अन्य पिछड़ी व निचली जातियों के लोगों की गिनती 84.3 फीसदी के लगभग है और इन का स्तर बाकी ऊंचों से कहीं कम है. गायकवाड़ आयोग ने अपनी लंबी रिपोर्ट में अपने सर्वे से यह सिद्ध किया कि 1872 और 2021 के बीच राज्य में कोई लंबाचौड़ा फर्क नहीं आया है और आज भी लोग अपनी जाति से चिपके हुए हैं.

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जाति का यह बिल्ला न सिर्फ नौकरियों में आड़े आता है, आम लेनदेन, दोस्ती, प्रेम, विवाह में आड़े आता है. जब से हर जाति को अपने देवीदेवता पूजने को दे दिए गए हैं, तब से यह फर्क और ज्यादा पड़ने लगा है. अब हर जाति के इतने लोग हो गए हैं कि वे खोदखोद कर अपने देवीदेवता की कहानियां सुननेसुनाने लगे हैं और समाज में खिंची न दिखने वाली लाइनें हर रोज और ज्यादा गहरी होती जा रही हैं. चूंकि हर जाति के लोगों की गिनती अपनेआप में कहीं ज्यादा है. आपसी लेनदेन, समूह के रहने में, शहरी सुविधाएं जुटाने में दिक्कत नहीं होती और अपनी ही जाति के इतने लोग इकट्ठे किसी भी काम के लिए हो जाते हैं कि दूसरों की जरूरत नहीं होती.

विवाह और प्रेम जातियों में ही हो, यह हर मातापिता की पहली जिम्मेदारी होती है और हर जाति के पंडेपुजारी इस बात को पूरी तैयारी से मातापिता ही नहीं युवाओं पर थोपने को भी खड़े रहते हैं. इस में घर से निकाले जाने से ले कर पुलिस में अपहरण और बलात्कार तक के मामले दर्ज कराना आम है.

संविधान, कानून, नेता, समाजसुधारक, एक सी स्कूली किताबें कुछ भी कहती रहें, जाति का भेद बना रहना राजनीतिक दलों के लिए बड़े काम का है. आमतौर पर सत्ता में बैठे नेता को शासन के बारे में कम सोचना पड़ता है क्योंकि वोट लेते समय जाति के हिसाब से वोट मिलते हैं, काम के हिसाब से नहीं. राजनीतिक दल इन में न दिखने वाली लाइनों को हर रोज और गहरी और चौड़ी करते रहते हैं और वहां भी खींचते रहते हैं जहां पहले नहीं थीं.

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युवाओं को सही दोस्त और सही जीवनसाथी को चुनने में कठिनाई इसलिए ज्यादा होती है कि न सिर्फ एकजैसी आदतों वाला साथी चाहिए, एक जाति का भी चाहिए. बचपन से इस भेदभाव को इतना ज्यादा मन में बैठा दिया जाता है कि युवा अपनी कमजोरियों को भी जातिवाद के परदे में छिपा देने के आदी हो जाते हैं.

देश का हर गांव, शहर ही नहीं हर महल्ला आज भी जाति के कहर से पीडि़त है और यह कम नहीं हो रहा जो ज्यादा चिंता की बात है.

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