‘नागिन’ का ये हौट अवतार नहीं देखा होगा आपने

एक्ट्रेस और बिग बौस सीजन 8 की फाइनल कंटेस्टेंट करिश्मा तन्ना सोशल मीडिया पर अपनी सेंसेश्नल और हौट फोटोज के लिए जानी जाती हैं. संजू और ग्रैंड मस्ती जैसी फिल्मों के अलावा छोटे पर्दे पर ‘नागिन’ सीरियल से नाम कमाने वाली करिश्मा अपनी बोल्ड फोटोज की वजह से अपने फैन्स के बीच में काफी पौपुलर हैं.

हाल ही उन्होंने अपनी कुछ फोटोज इंस्टाग्राम पर शेयर किया है जिसे यूजर्स काफी पसंद कर रहे हैं. इन फोटोज में करिश्मा स्विमिंग पूल में मस्ती करती देखी जा सकती हैं. फोटो के कैप्शन में उन्होंने ‘हैप्पी संडे’ लिखा है.

तो आइए बिना किसी देरी के हम आपको उनकी हौट तस्वीरों से रूबरू कराते हैं.

 

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Hello Sunday!!! 🌞 #pool #swimming #waterbaby

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Aqua-Holic Splash splash!! #waterbaby #pool #live #love

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If u feel it let it happen!!🍁 #karishmatanna #ktians

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Weekend vibes!! 🌸 #photoshoot #karishmatanna #ktians #saturday

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#carfies I think I am getting better at it!! ☺️🤪💗 wat say ehh?? #karishmatanna #ktians #sanju #qayamatkiraat #love

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I feel beautifully beautiful today 🌸 #totd #ktians #karishmatanna

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रहस्य में लिपटी विधायक की मौत

37 वर्षीय विधायक सत्यजीत बिस्वास पश्चिम बंगाल के नदिया शहर स्थित कृष्णानगर मोहल्ले में अपने परिवार के साथ रहते थे. उन के परिवार में मांबहन के अलावा पत्नी रूपाली और 7 माह का बच्चा था. विधायक सत्यजीत बिस्वास काफी मिलनसार, मृदुभाषी और आकर्षक व्यक्तित्व के धनी थे, जिस की वजह से वह अपने विधानसभा क्षेत्र कृष्णागंज में काफी लोकप्रिय थे.

उन की लोकप्रियता का एक कारण यह भी था कि वह दिनरात क्षेत्र के विकास के लिए तत्पर रहते थे. क्षेत्र के लोगों की मदद के लिए वह हर समय तैयार रहते थे. इसी के चलते क्षेत्र के लोग उन से खुश रहते थे.

वह 9 फरवरी, 2019 की खुशनुमा शाम थी. तृणमूल कांग्रेस के विधायक सत्यजीत बिस्वास अपनी पत्नी रूपाली बिस्वास के साथ डाइनिंग रूम में बैठे बातचीत करते हुए चाय की चुस्की ले रहे थे. उस वक्त उन का चेहरा खुशी से चमक रहा था.

पति के चेहरे पर खुशी की ऐसी चमक रूपाली ने पहले कभी नहीं देखी थी. वह भीपति की खुशी से खुश हो कर उन्हें निहार रही थीं. चाय की चुस्की के दौरान बीचबीच में विधायक की नजरें कलाई पर बंधी घड़ी पर चली जाती थीं.

‘‘क्या बात है जो आज इतने मुसकरा रहे हैं जनाब?’’ रूपाली ने पति को गुदगुदाने की कोशिश की.

‘‘अपने घर में बैठा हूं. खूबसूरत बीवी की छत्रछाया में. खुश होना मना है क्या?’’

यह सुन कर रूपाली शरमाने के बजाए संजीदा हो गईं. फिर पति को कुछ याद दिलाते हुए बोलीं, ‘‘नेताजी, यहां बैठेबैठे यूं ही बातें करते रहेंगे या जिस के लिए तैयार हो कर बैठे हैं, वहां भी जाएंगे.’’

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‘‘अच्छा किया, तुम ने याद दिला दिया मैडम. ऐसा करो तुम भी तैयार हो जाओ. इसी बहाने तुम्हारा भी मूड बदल जाएगा और हमारा साथ भी बना रहेगा.’’ कलाई पर नजर डालते हुए सत्यजीत आगे बोले, ‘‘जल्दी करो, मेरे पास ज्यादा टाइम नहीं बचा है. तुम तैयार हो जाओ. तब तक मैं एक काल कर लेता हूं.’’

इस के बाद रूपाली तैयार होने के लिए चली गई. 10 मिनट में वह तैयार हो कर पति के पास आ गईं. उन्होंने 7 महीने के बेटे को भी तैयार कर दिया था.

दरअसल, विधायक सत्यजीत बिस्वास को फुलबारी इलाके में सरस्वती पूजन के उद्घाटन कार्यक्रम में शरीक होना था, जिस में उन्हें मुख्य अतिथि बनाया गया था. इन के अलावा उस कार्यक्रम में तृणमूल कांग्रेस नेता गौरीशंकर, लघु उद्योग मंत्री रत्ना घोष सहित शहर के तमाम सम्मानित लोगों को भी आमंत्रित किया गया था.

सत्यजीत बिस्वास का वहां पहुंचना जरूरी था. इस के बाद वह अपनी पत्नी और बेटे के साथ अपनी कार से कार्यक्रम स्थल फुलबारी पहुंच गए. कार्यक्रम स्थल उन के आवास से बमुश्किल 300 मीटर दूर स्थित था. वहां पहुंचने में उन्हें 3-4 मिनट का समय लगा होगा.

बुला रही थी मौत

बहुत बड़े मैदान में लगे पंडाल में कतार से कुर्सियां बिछी हुई थीं. आगे की कतार में बिछी स्पैशल कुर्सियों पर तमाम वीआईपी और नेता बैठे थे. आयोजकों की आंखें बारबार मुख्यद्वार पर जा कर टिक रही थीं. उन की परेशान आंखों से यही पता चल रहा था कि वह बड़ी बेसब्री से किसी के आने का इंतजार कर रहे थे.

जैसे ही विधायक सत्यजीत बिस्वास ने पंडाल में प्रवेश किया, वहां का माहौल खुशनुमा हो गया. सरस्वती पूजन के उद्घाटन की सारी तैयारियां पहले से कर ली गई थीं. दीप प्रज्जवलन का कार्यक्रम मंच पर ही होना था. विधायक बिस्वास के पहुंचते ही आयोजक उन्हें, उन की पत्नी रूपाली बिस्वास और कुछ अन्य गणमान्य लोगों को मंच पर ले गए और दीप प्रज्जवलन का कार्यक्रम संपन्न कराया गया.

दीप प्रज्जवलित करने के बाद विधायक सहित तमाम अतिथि कुर्सियों पर जा बैठे. उस के थोड़ी देर बाद अतिथियों के स्वागत में रंगारंग कार्यक्रम शुरू हुए. कार्यक्रम ने अतिथियों का मन मोह लिया. वे उस में तन्मयता से लीन हो कर लुत्फ उठा रहे थे. उस समय रात के करीब 9 बजे थे.

रंगारंग कार्यक्रम शुरू हुए अभी 5 मिनट भी नहीं हुए थे कि 2 नकाबपोश फुरती से पंडाल में पहुंचे. इस से पहले कि लोग कुछ समझ पाते, उन्होंने पीछे से विधायक सत्यजीत बिस्वास पर निशाना साध कर गोलियां चलानी शुरू कर दीं. गोलियां बरसा कर वे दोनों वहां से फरार हो गए. भागते हुए उन्होंने असलहे को वहीं पर फेंक दिया.

विधायक को 3 गोलियां लगी थीं. गोलियां लगते ही वह कुरसी पर गिर कर तड़पने लगे. गोली चलने से हाल में भगदड़ मच गई. जरा सी देर में वहां अफरातफरी का माहौल बन गया. तृणमूल कांग्रेस के नेता गौरीशंकर, रत्ना घोष सहित अन्य लोग आननफानन में गंभीर रूप से घायल विधायक बिस्वास को कार से जिला अस्पताल ले गए. लेकिन डाक्टरों ने उन्हें देखते ही मृत घोषित कर दिया.

टीएमसी विधायक सत्यजीत बिस्वास की हत्या की सूचना मिलते ही सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ताओं के खून में उबाल आ गया. कार्यकर्ता चारों ओर तोड़फोड़ करने लगे. तमाम लोग अपने लोकप्रिय युवा नेता को देखने अस्पताल भी पहुंचे.

उधर मौके पर मौजूद रही विधायक की पत्नी रूपाली बिस्वास को अभी भी अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हो रहा था कि उन्होंने जो देखा, वो सच है. सत्यजीत बिस्वास उन को हमेशा के लिए अकेला छोड़ कर दुनिया से चले गए थे. रोरो कर उन का बुरा हाल हो गया था. किसी तरह रूपाली और उन के 7 माह के दुधमुंहे बेटे को घर पहुंचाया गया. विधायक बेटे की हत्या की खबर जैसे ही बूढ़ी मां को मिली, उन की तो आंखें पथरा गईं. घर में कोहराम मच गया था.

पार्टी महासचिव पार्थ चटर्जी ने विधायक बिस्वास की हत्या पर गहरा दुख प्रकट करते हुए कहा कि कातिल चाहे जितना भी कद्दावर क्यों हो, उसे बख्शा नहीं जाएगा.

विधायक सत्यजीत की हत्या की सूचना मिलते ही एसपी रूपेश कुमार, एएसपी अमनदीप, डीएसपी सुब्रत सरकार, हंसखली के थानाप्रभारी अनिंदय बसु, कृष्णानगर के थानाप्रभारी राजशेखर पौल सहित जिले के तमाम पुलिस अधिकारी घटनास्थल पर पहुंच गए थे. पुलिस ने घटनास्थल को चारों ओर से घेर लिया था.

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संदेह से भरे सवाल

एसपी रूपेश कुमार ने घटना के लिए हंसखली थाने के थानाप्रभारी अनिंदय बसु को जिम्मेदार मानते हुए उन्हें तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया. विधायक सत्यजीत बिस्वास की सुरक्षा में एक सुरक्षागार्ड लगाया गया था. घटना के समय वह मौके पर नहीं था.

जांचपड़ताल में पता चला कि सुरक्षागार्ड दिनेश कुमार उसी दिन छुट्टी ले कर घर चला गया था. यह बात किसी भी अधिकारी के गले नहीं उतर रही थी कि दिनेश आज ही छुट्टी पर घर क्यों गया? जिस तरह से विधायक बिस्वास की हत्या की गई थी, वह सुनियोजित थी. सुरक्षा गार्ड दिनेश कुमार को जिम्मेदार मानते हुए उसे भी निलंबित कर दिया.

बात यहीं पर खत्म नहीं हुई थी. टीएमसी कार्यकर्ता अपने लोकप्रिय विधायक की हत्या के लिए भाजपा के सांसद मुकुल राय को जिम्मेदार मान कर उन्हें हत्या का आरोपी बनाने के लिए पुलिस पर दबाव बना रहे थे. टीएमसी कार्यकर्ताओं के बीच से फैलता हुआ यह आरोप फिजाओं में घुल रहा था. लोग कह रहे थे कि सांसद मुकुल राय के इशारे पर शूटर अभिजीत पुंडरी, सूरज मंडल और कार्तिक मंडल ने विधायक की हत्या को अंजाम दिया.

विधायक की पत्नी रूपाली बिस्वास भी पति की हत्या के लिए सांसद और कद्दावर नेता मुकुल राय को जिम्मेदार मान रही थीं. रूपाली की तहरीर पर हंसखली थाने में 4 आरोपियों मुकुल राय, अभिजीत पुंडरी, सूरज मंडल और कार्तिक मंडल के खिलाफ हत्या का नामजद मुकदमा दर्ज कर लिया गया.

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के आदेश पर मुकदमा दर्ज होने के कुछ देर बाद जांच थाना पुलिस से सीबीसीआईडी को सौंप दी गई. जांच की जिम्मेदारी मिलते ही सीबीसीआईडी की टीम भवानी भवन से मौके पर जा पहुंची और जांच शुरू कर दी.

सूरज मंडल और कार्तिक मंडल फुलबारी माठ के आसपास रहते थे. पुलिस जानती थी कि जांच में जितना विलंब होगा, उतना ही आरोपी पकड़ से दूर होते जाएंगे. बगैर वक्त गंवाए सीबीसीआईडी ने रात में ही सूरज मंडल के घर दबिश दी. सूरज मंडल गिरफ्तार कर लिया गया. सूरज की निशानदेही पर ही कार्तिक मंडल को उस के घर से गिरफ्तार किया गया. अभिजीत पुंडरी को नहीं पकड़ा जा सका. वह फरार हो गया था.

गिरफ्तार दोनों आरोपियों सूरज मंडल और कार्तिक मंडल को सीआईडी गिरफ्तार कर के पूछताछ के लिए हंसखली थाने ले आई उन से पूरी रात पूछताछ की गई. पर वे दोनों खुद को बेकसूर बताते रहे.

अगले दिन अधिकारियों की मौजूदगी में उन से फिर पूछताछ की गई. सूरज मंडल ने पुलिस के सामने घुटने टेक दिए. उस ने विधायक बिस्वास की हत्या में खुद और कार्तिक मंडल के शामिल होने की बात स्वीकार कर ली. पूछताछ के दौरान सूरज ने बताया कि उस ने अपने घर के पास एक कटार, बातचीत में इस्तेमाल किए गए सिमकार्ड और कुछ अन्य दस्तावेज छिपा रखे हैं.

अगली सुबह सीआईडी की टीम उसे ले कर उस के घर पहुंची. उस के घर के बाहर पुलिस टीम ने जमीन की खुदाई की तो धारदार हथियार और बड़ी संख्या में सिमकार्ड बरामद किए, जो बंगाल के अलावा दूसरे राज्यों के भी थे. इस के अलावा उस के घर की तलाशी लेने पर वहां से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तसवीरें भी मिलीं. इस बरामदगी के बाद नाराज स्थानीय लोगों ने सूरज मंडल के घर के पास एकत्र हो कर विरोध प्रदर्शन किए.

इस मामले में एक नया मोड़ तब आया जब सांसद मुकुल राय को पता चला कि विधायक की हत्या में उन्हें भी नामजद आरोपी बनाया गया है.

मुकुल राय की सफाई

अपना नाम घसीटे जाने को ले कर सांसद मुकुल राय ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि मैं कोलकाता में बैठा हूं और हत्या यहां से 120 किलोमीटर दूर नदिया जिले में विधायक के घर के पास हुई है. यह पूरी तरह से तृणमूल कांग्रेस की आपसी गुटबाजी और पश्चिम बंगाल सरकार की विफलता है.

उन्होंने कहा कि घटना की जांच सीबीआई से कराई जानी चाहिए, ताकि पूरे रहस्य से परदा उठ सके. आरोपों का खंडन करते हुए सांसद मुकुल राय ने कहा कि अभी ऐसी स्थिति है कि जो कुछ भी होगा, उस के लिए मेरा नाम घसीटा जाएगा. अगर दम है तो इस की निष्पक्ष एजेंसी से जांच करा लें. दूध का दूध पानी का पानी हो जाएगा.

प्रदेश भाजपा अध्यक्ष दिलीप घोष ने सांसद मुकुल राय का समर्थन करते हुए घटना की सीबीआई जांच की मांग कर दी. उन्होंने भी यही कहा कि विधायक बिस्वास की हत्या आपसी गुटबाजी में की गई है. यही नहीं, जब भी तृणमूल कांग्रेस के खिलाफ कुछ होता है तो वह उस का आरोप भाजपा पर मढ़ देती है.

कई बार तृणमूल खुद ऐसे काम कर के राजनैतिक विरोधियों को फंसाने की पूरी कोशिश करती है. सालों से टीएमसी में आपसी गुटबाजी चरम पर है, यह बात किसी से छिपी नहीं है.

खैर, सांसद मुकुल राय गिरफ्तारी से बचने के लिए कोलकाता उच्च न्यायालय की शरण में पहुंच गए. 12 फरवरी, 2019 को उन्हें बड़ी राहत मिल गई. कोलकाता हाईकोर्ट ने उन्हें अग्रिम जमानत दे दी. हाईकोर्ट ने वरिष्ठ भाजपा नेता मुकुल राय की गिरफ्तारी पर 7 मार्च, 2019 तक रोक लगा दी. टीएमसी पार्टी ने आखिर सांसद मुकुल राय पर हत्या जैसा गंभीर आरोप क्यों लगाया, यह तो जांच का विषय है और पुलिस अपनी काररवाई कर रही है. आइए जानें कि यह मुकुल राय हैं कौन?

65 वर्षीय मुकुल राय मूलरूप से पश्चिम बंगाल के उत्तरी 24 परगना के कंचरपाड़ा के रहने वाले हैं. इन के परिवार में पत्नी कृष्णा राय के अलावा एक बेटा है. भाजपा के सांसद मुकुल राय का राजनीतिक सफर युवा कांग्रेस के लीडर के रूप में शुरू हुआ था. कांग्रेस के साथ लंबी पारी खेलने के दौरान पिछली मनमोहन सिंह की सरकार में वह केंद्रीय रेल मंत्री थे.

11 जुलाई, 2011 को असम में एक रेल दुर्घटना हुई थी. मुकुल राय रेलमंत्री होने के बावजूद मौके पर नहीं पहुंचे तो प्रधानमंत्री ने उन्हें पद से हटा दिया था और उन की जगह दिनेश त्रिवेदी को यह भार सौंप दिया था.

इस से पहले ममता बनर्जी के साथ मुकुल राय की खूब निभती थी. 1998 में जब ममता बनर्जी कांग्रेस से अलग हुईं तो उन्होंने एक नई पार्टी तृणमूल कांग्रेस का गठन किया. तब उन्होंने मुकुल राय को पार्टी का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया था.

पहली बार सन 2001 में मुकुल राय को टीएमसी से एमएलए का टिकट मिला. वह जगतदला विधानसभा से चुनाव लड़े लेकिन चुनाव हार गए थे. इस चुनाव में वह दूसरे स्थान पर रहे थे. इस के बाद वह निरंतर पार्टी की सेवा करते रहे.

बाद में तृणमूल कांग्रेस ने उन्हें राज्यसभा का सदस्य बना दिया. वह 28 मई, 2009 से 20 मार्च, 2012 तक राज्यसभा के सदस्य रहे. सन 2012 में मुकुल राय सांसद चुन लिए गए. फिर 3 अप्रैल, 2012 से 11 अक्तूबर, 2017 तक वह राज्यसभा के सदस्य रहे.

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राजनीति के मंझे खिलाड़ी हैं मुकुल राय

सारदा स्कीम घोटाले में सन 2015 में मुकुल राय और ममता बनर्जी का नाम आया. घोटाले में नाम आने के बाद ममता बनर्जी और मुकुल राय के बीच दूरी बन गई. फिर वे कभी एक नहीं हो सके.

तृणमूल कांग्रेस से मुकुल राय का मन भंग होने लगा था. ममता बनर्जी को उन पर संदेह होने लगा था कि वह पार्टी विरोधी गतिविधियों में लिप्त हैं. फिर क्या था, ममता बनर्जी ने उन्हें पार्टी से 6 साल के लिए निकाल दिया.

पार्टी से निकाले जाने के बाद मुकुल राय ने 25 सितंबर, 2017 को पार्टी से इस्तीफा दे दिया. इस के बाद 11 अक्तूबर, 2017 को उन्होंने राज्यसभा की सदस्यता से भी इस्तीफा दे दिया और 3 नवंबर, 2017 को भारतीय जनता पार्टी की सदस्यता ग्रहण कर ली. तब से वह भाजपा में हैं.

भाजपा का दामन थामने के बाद से मुकुल राय पश्चिम बंगाल में भाजपा की जमीन बनाने में लग गए. उन्होंने टीएमसी के कार्यकर्ताओं को तोड़ कर भाजपा में शामिल करना शुरू कर दिया. वैसे भी वह पुराने सियासी खिलाड़ी थे. उन्हें जोड़तोड़ की राजनीति अच्छी तरह आती थी. इस से टीएमसी पार्टी घबरा गई. इस बीच नदिया जिले में उन का कई बार दौरा हो चुका था.

विधायक सत्यजीत बिस्वास मतुआ समुदाय से आते थे, जिस का बंगाल में अच्छाखासा आधार है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जनवरी 2019 के अंतिम सप्ताह में मतुआ समुदाय को लुभाने के लिए ठाकुरनगर आए थे.

ठाकुरनगर के साथसाथ यह संप्रदाय नदिया और उत्तरी 24 परगना जिले में करीब 30 लाख की संख्या में मौजूद है और राज्य भर की कम से कम 10 से अधिक लोकसभा सीटों पर निर्णायक भूमिका में काम करता है. मतुआ समुदाय पर सत्यजीत बिस्वास की अच्छीखासी पकड़ बनी हुई थी. उन की हत्या का एक कारण यह भी माना जा रहा है.

बहरहाल, आरोपी सूरज मंडल और कार्तिक मंडल ने पूछताछ में पुलिस को बताया था कि विधायक की हत्या की योजना में निर्मल घोष और कालीपद मंडल भी शामिल थे. जांच में यह बात सच पाई गई.

इस के बाद पुलिस ने आरोपी निर्मल घोष और कालीपद मंडल को भी गिरफ्तार कर लिया. पुलिस को पूछताछ में निर्मल और कालीपद मंडल ने बताया कि हत्या की साजिश अभिजीत पुंडरी ने रची थी और गोली मैं ने और कालीपद ने मारी थी. यह हत्या उन्होंने क्यों की, इस बारे में वे कुछ नहीं बता सके.

आरोपी निर्मल घोष और कालीपद मंडल की निशानदेही पर पुलिस ने उसी दिन अभिजीत पुंडरी को पश्चिम मिदनापुर जिले के राधामोहनपुर इलाके से गिरफ्तार कर लिया. जामातलाशी में उस से एक पिस्टल बरामद की गई.

पूछताछ में अभिजीत पुंडरी ने हत्या की साजिश रचने की बात कबूल ली थी. उसे हत्या की सुपारी किस ने दी थी, यह बात उस ने पुलिस को नहीं बताई. विधायक की हत्या में सांसद मुकुल राय की क्या भूमिका थी, इस की जांच पुलिस कथा लिखने तक कर रही थी.

विधायक सत्यजीत बिस्वास की हत्या क्यों की गई, यह राज कहीं राज न रह जाए. आपसी गुटबाजी कह कर हत्या पर जो परदा डाला जा रहा है, क्या वह पर्याप्त वजह है? यह एक जलता हुआ सवाल है. इस सवाल का जवाब पुलिस को ही ढूंढना होगा.

-कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

सपा नेत्री की गहरी चाल

मुरादाबाद से 11 किलोमीटर दूर दिल्ली रोड पर एक कस्बा है पाकबड़ा. यह कस्बा राष्ट्रीय राजमार्ग-24 के दोनों ओर बसा हुआ है. कासिम सैफी अपनी पत्नी गुल हाशमीन के साथ इसी कस्बे में रहता था. वह आरटीआई कार्यकर्ता था. इस के अलावा वह किसी के साथ मिल कर प्रौपर्टी डीलिंग का भी काम करता था.

कासिम सैफी 27 दिसंबर, 2018 को अपनी पत्नी से यह कह कर गया था कि मुरादाबाद जा रहा है और वहीं से जमीन खरीदफरोख्त के लिए कहीं जाएगा. उसे घर लौटने में देर हो सकती है.

कासिम जब शाम 7 बजे तक घर नहीं पहुंचा तो उस के भाई आसफ अली ने कासिम को फोन किया. उस ने बताया कि वह किसी के साथ बैठ कर प्रौपर्टी संबंधी बात कर रहा है. उस ने यह भी बताया कि रात 9-10 बजे तक घर पहुंच जाएगा.

कासिम जब रात 10 बजे तक भी घर नहीं पहुंचा तो आसफ अली ने उसे फिर से फोन किया. उस के फोन की घंटी तो बज रही थी लेकिन वह उठा नहीं रहा था. आसफ ने सोचा, हो सकता है किसी जरूरी काम में व्यस्त होने की वजह से काल रिसीव न कर पा रहा हो. इसलिए उस ने थोड़ी देर बाद फिर से कासिम को फोन किया. इस बार भी उस के फोन पर घंटी तो जा रही थी पर उस ने फोन नहीं उठाया.

कासिम ने इस से पहले कभी ऐसा नहीं किया था. घर वालों के फोन करने पर वह काल जरूर रिसीव करता था. भले ही थोड़ी देर बात करे, जबकि उस दिन वह फोन ही नहीं उठा रहा था.

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सभी घर वाले चिंतित थे. कासिम चूंकि आरटीआई कार्यकर्ता था, इसलिए घर वालों को और ज्यादा चिंता होने लगी. घर वाले रात भर चिंता में बैठे उसी के आने का इंतजार करते रहे. बीचबीच में वह उस का मोबाइल नंबर भी डायल करते रहे. हर बार फोन तो मिल जाता, पर बात नहीं हो रही थी. घंटी जा रही थी, लेकिन वह उठा नहीं रहा था. बैठेबैठे उन की रात बीत गई.

अगले दिन 28 दिसंबर को भी कासिम के परिवार वालों ने उस की तलाश की पर उन्हें उस का कोई पता नहीं चल सका. उन्होंने कासिम के दोस्तों और जानपहचान वालों को फोन कर के उस के बारे में जानने की कोशिश की लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला. बेटे की कोई जानकारी न मिलते देख 29 दिसंबर को कासिम के पिता साबिर हुसैन कुछ लोगों के साथ थाना पाकबड़ा पहुंच गए.

थानाप्रभारी नीरज कुमार शर्मा को उन्होंने अपने 32 वर्षीय बेटे कासिम के गायब होने की जानकारी दी. इस पर थानाप्रभारी ने कहा कि कहीं वह नाराज हो कर तो नहीं चला गया.

‘‘नहीं साहब, नाराज होने का सवाल ही नहीं उठता. मेरा लड़का आरटीआई कार्यकर्ता है. वह पढ़ालिखा और समझदार है. मुझे डर है कि उस के साथ कहीं कोई अनहोनी न हो गई हो.’’ साबिर हुसैन ने आशंका जताई.

यह सुन कर थानाप्रभारी ने उन से कहा, ‘‘अगर आप को किसी पर शक हो तो बताइए. कभी उस का किसी से झगड़ा तो नहीं हुआ था?’’

‘‘साहब, छोटेमोटे झगड़े को छोड़ दें तो हमारी किसी से कोई दुश्मनी नहीं है.’’ साबिर हुसैन ने बताया.

थानाप्रभारी नीरज कुमार शर्मा ने साबिर हुसैन को यह कह कर घर भेज दिया कि कासिम के बारे में कहीं से कोई सुराग मिले तो पुलिस को जरूर बताना और किसी पर शक हो तो वह भी बताना.

पुलिस की चुप्पी देख घर वाले मिले एसपी से

कई दिन बीत गए, पुलिस भी किसी नतीजे पर नहीं पहुंच सकी. कासिम के घर वाले थाने का चक्कर लगातेलगाते परेशान हो गए तो थकहार कर वे 3 जनवरी, 2019 को एसएसपी जे. रविंद्र गौड़ से मिले. एसएसपी ने उन की बात को गंभीरता से ले कर उसी समय पाकबड़ा के थानाप्रभारी को तुरंत कासिम के अपहरण की रिपोर्ट दर्ज कर काररवाई करने को कहा.

एसएसपी का आदेश मिलते ही थानाप्रभारी ने कासिम सैफी के अपहरण की रिपोर्ट दर्ज कर उस के घर वालों से इस संबंध में बात की. दरअसल, जांच के लिए यह जानना जरूरी था कि कासिम अधिकांशत: किसकिस के साथ रहता था, उस के दोस्त कौनकौन हैं.

साबिर हुसैन ने बताया कि मुरादाबाद के रामगंगा विहार में अलका नाम की एक महिला रहती है, जो अपने परिचित विकास चौधरी के साथ प्रौपर्टी डीलिंग का धंधा करती है. रामगंगा विहार में ही उस का औफिस है. कासिम उसी के पास जाता था. उसी के औफिस में बैठ कर आरटीआई के कागजात तैयार करता था.

यह जानकारी मिलने के बाद थानाप्रभारी ने कासिम के मोबाइल फोन की काल डिटेल्स निकलवाई. कालडिटेल्स की जांच में पता चला कि कासिम के फोन से अंतिम बार जिस नंबर पर बात हुई, वह नंबर विकास चौधरी का था. आश्चर्य की बात यह थी कि कासिम के फोन की लोकेशन कभी हरियाणा, पंजाब की तो कभी उत्तर प्रदेश के सहारनपुर की मिली थी.

थानाप्रभारी उसी दिन पुलिस टीम के साथ मुरादाबाद के रामगंगा विहार पहुंच गए और विकास चौधरी को पूछताछ के लिए उस के औफिस से पाकबड़ा ले आए. उन्होंने विकास से कासिम के बारे में पूछताछ की तो उस ने बताया कि 27 दिसंबर को वह कासिम सैफी को प्रौपर्टी दिखाने के लिए लदावली गांव ले गया था. उस के बाद वह अपने घर जाने की बात कह कर चला गया था.

विकास ने जितने आत्मविश्वास के साथ यह बात पुलिस को बताई, उस से पुलिस को लगा कि विकास सच बोल रहा है. तफ्तीश के दौरान ही विकास की बिजनैस पार्टनर और सपा नेत्री अलका दूबे एक वकील को ले कर थाना पाकबड़ा पहुंची. अपने प्रभाव के इस्तेमाल और पहुंच का फायदा उठा कर वह विकास चौधरी को थाने से छुड़ा ले गई.

इस के बाद पुलिस ने विकास चौधरी द्वारा कही गई बातों की जांच शुरू कर दी. उस ने बताया था कि लदावली जाने के लिए उन्होंने अकबर के किले के पास से बस पकड़ी थी. इसलिए पुलिस ने अकबर के किले पर लगे सीसीटीवी कैमरों की 27 दिसंबर की फुटेज देखी. उस फुटेज में कासिम सैफी और विकास चौधरी मुजफ्फरनगर जाने वाली एक बस में चढ़ते दिखाई दिए.

फुटेज देख कर थानाप्रभारी का माथा ठनका कि मुजफ्फरनगर जाने वाली जिस बस में वे दोनों बैठ कर गए थे, उस में लदावली गांव का न तो टिकट बनता था और न ही वह बस लदावली गांव में रुकती थी. लिहाजा आगे की पूछताछ के लिए पुलिस ने विकास चौधरी को फिर से उठा लिया.

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विकास चौधरी ने खोला रहस्य

जब उस से सख्ती से पूछताछ की गई तो उस ने स्वीकार कर लिया कि कासिम सैफी अब जीवित नहीं है. उस ने उस की हत्या कर लाश एक खेत में छिपा दी है.

उस ने बताया कि कासिम उस की जाति की लड़कियों पर अश्लील कमेंट करता था. इस के अलावा अलका दूबे पर भी वह बुरी नजर रखता था, जिस की वजह से उस की हत्या करने के लिए मजबूर होना पड़ा.

विकास ने आगे बताया कि 27 दिसंबर को वह शामली में एक प्रौपर्टी दिखाने के बहाने से उसे साथ ले गया था. वहां पर गांव भभीसा का रहने वाला एक दोस्त कुलदीप मिला. उस की मोटरसाइकिल पर बैठ कर हम लोग शाहपुर गांव के गन्ने के एक खेत में पहुंचे. वहीं पर हम ने उस के पेट और पीठ में गोली मार कर उस की हत्या कर दी. उस की लाश खेत में छोड़ कर वह मुरादाबाद आ गया था और कुलदीप कासिम का मोबाइल फोन ले कर सहारनपुर रेलवे स्टेशन चला गया था.

योजना के अनुसार कुलदीप ने मृतक का फोन साइलेंट कर के सहारनपुर रेलवे स्टेशन पर आई एक सुपरफास्ट टे्रन के शौचालय में छिपा दिया, ताकि उस के फोन की लोकेशन बदलती रहे.

विकास चौधरी द्वारा कासिम की हत्या का खुलासा होने के बाद पुलिस ने उस की निशानदेही पर शामली के कांधला थाने के गांव शाहपुर में सतवीर के गन्ने के खेत से कासिम सैफी की लाश बरामद कर ली. यह 10 जनवरी, 2019 की बात है. कासिम के घर वालों को उस की हत्या की खबर मिली तो घर में कोहराम मच गया.

विकास चौधरी ने कासिम की हत्या किए जाने की जो वजह बताई थी वह मृतक के घर वालों के गले नहीं उतर रही थी. परिवार के लोगों का कहना था कि अलका दूबे से कासिम के नजदीकी संबंध नहीं थे. वह शरीफ, समझदार और नेकनीयत वाला आदमी था. उन्होंने कहा कि अभियुक्त विकास चौधरी गलत आरोप लगा कर पुलिस को गुमराह करने की कोशिश कर रहा है.

11 जनवरी, 2019 को शामली से कासिम का शव मुरादाबाद लाया गया. पोस्टमार्टम के बाद उस की लाश उस के घर वालों को सौंप दी गई. इस के बाद कस्बे के सैकड़ों लोग उन के साथ हो गए. कासिम की हत्या का सही खुलासा न करने का आरोप लगाते हुए लोगों ने कासिम का शव थाने में रख कर हंगामा करना शुरू कर दिया.

भीड़ ने थाने में तोड़फोड़ भी की. इतना ही नहीं हत्यारोपी विकास चौधरी को हवालात से खींचने की भी कोशिश की. विरोध पर पुलिसकर्मियों से धक्कामुक्की की गई.

थाने में बवाल मचाने के बाद गुस्साए लोग दिल्ली लखनऊ हाइवे नंबर 24 पर पहुंच गए. उन्होंने कासिम का शव सड़क पर रख कर जाम लगा दिया.

सूचना मिलते ही एसएसपी जे. रविंद्र गौड़, एसपी (सिटी) अंकित मित्तल, सीओ (हाइवे) अपर्णा गुप्ता, सीओ (सिविल लाइंस) राजेश कुमार टीम के वहां पहुंच गए.

एसएसपी ने आक्रोशित भीड़ को समझाया और आश्वासन दिया कि केस की फिर से जांच कराई जाएगी. जांच में जो भी दोषी पाया जाएगा, उस के खिलाफ सख्त काररवाई की जाएगी. आरोपी चाहे कितना भी असरदार क्यों न हो, उसे बख्शा नहीं जाएगा. एसएसपी के इस आश्वासन के बाद लोगों ने जाम खोला. इस के बाद लोग कासिम का शव दफनाने को तैयार हुए.

भारी पुलिस फोर्स के बीच कासिम सैफी के शव को दफनाया गया. पुलिस ने विकास चौधरी से पूछताछ कर 11 जनवरी 2019 को उसे जेल भेज दिया.

चूंकि लोगों ने अलका दूबे पर गंभीर आरोप लगाए थे, इसलिए एसएसपी जे. रविंद्र गौड़ ने सीओ (हाइवे) अपर्णा गुप्ता को निर्देश दिया कि अलका दूबे को हिरासत में ले कर पूछताछ करें. सीओ अपर्णा गुप्ता पुलिस को ले कर जब रामगंगा विहार स्थित उस के घर पहुंची तो उस के घर व औफिस पर ताला लगा मिला.

इतना ही नहीं, उस के दोनों मोबाइल फोन भी स्विच्ड औफ थे. उस के अंडरग्राउंड हो जाने के बाद पुलिस का शक और बढ़ गया. पुलिस ने उस के संभावित ठिकानों पर दबिश डाली, लेकिन सफलता नहीं मिली. लिहाजा पुलिस ने अपने मुखबिरों को सतर्क कर दिया.

असल खिलाड़ी थी अलका दूबे

इसी दौरान पुलिस को अलका दूबे के बारे में सूचना मिली कि वह सीमावर्ती जिले रामपुर की मिलक तहसील में कहीं रह रही है. सीओ अपर्णा गुप्ता की टीम ने इस सूचना पर काम करना शुरू किया. इस के बाद 14 जनवरी, 2019 को पुलिस टीम ने अलका दूबे को रामपुर जिले की तहसील मिलक से हिरासत में ले लिया.

सीओ अपर्णा गुप्ता ने अलका दूबे को मुरादाबाद के महिला थाने ले जा कर उस से पूछताछ की तो वह खुद को बेकसूर बताते हुए बारबार बयान बदलती रही. उस ने बताया कि मृतक कासिम से उस की मुलाकात मुरादाबाद कचहरी में हुई थी. इस से ज्यादा वह उस के बारे में कुछ नहीं जानती.

पुलिस को लगा कि वह उसे गुमराह कर रही है, तब उस से सख्ती से पूछताछ की गई. पुलिस की सख्ती के आगे अलका दूबे को सच बोलने के लिए मजबूर होना पड़ा. उस ने कासिम सैफी की हत्या की जो कहानी बताई वह बड़ी रहस्यमयी निकली—

अलका दूबे राजनीति में सक्रिय थी. वह समाजवादी पार्टी की जिला सचिव थी. सपा की जिला कार्यकारिणी में ही हारून सैफी भी जिला सचिव था. हारून सैफी पाकबड़ा का रहने वाला था और वहां का प्रधान रह चुका था.

पार्टी के कार्यक्रमों में हारून सैफी और अलका दूबे की अकसर मुलाकात होती रहती थी. चूंकि वह सपा जिला कार्यकारिणी में समान पद पर थे, इसलिए दोनों की फोन पर भी अकसर बातें होती रहती थीं.

करीब 3-4 महीने पहले मुरादाबाद की कचहरी में अलका की मुलाकात हारून सैफी से हुई. उस समय हारून बेहद परेशान दिखाई दे रहा था. अलका के पूछने पर उस ने बताया कि पाकबड़ा निवासी कासिम ने उसे और उस के घर वालों को परेशान कर रखा है.

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कासिम और हारून सैफी की दुश्मनी

दरअसल हुआ यह था कि हारून सैफी की पत्नी शायदा बेगम, बेटी नौरीन, एक रिश्तेदार आरिफ और आरिफ की पत्नी कैसरजहां ने फरजी डाक्यूमेंट बनवा कर रानी लक्ष्मीबाई पेंशन और समाजवादी पेंशन का लाभ लिया था. आरिफ ने पास सरकारी सस्ते गल्ले की दुकान भी थी.

यह जानकारी पाकबड़ा निवासी आरटीआई कार्यकर्ता कासिम सैफी को मिली तो उस ने संबंधित विभागों में आरटीआई लगाने के बाद शिकायत की. उस की शिकायत पर गंभीरता से काररवाई करते हुए संबंधित विभाग ने उपरोक्त सभी से पेंशन हेतु दिए गए पैसे जमा कराने का नोटिस दे दिया था.

बताया जाता है कि कासिम सैफी और हारून सैफी में पिछले 10 सालों से रंजिश चली आ रही थी. दोनों के बीच दुश्मनी की शुरुआत ग्राम पंचायत चुनाव से शुरू हुई थी. करीब 10 साल पहले हारून और कासिम ने चुनाव लड़ने की शुरुआत की थी.

हारून सैफी ने बिरादरी की पंचायत में लोगों को अपने हक में कर के कासिम सैफी को चुनाव लड़ने से रोक दिया था. पंचायत चुनाव जीतने के बाद हारून सैफी ने कासिम के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था. यहीं से दोनों के बीच दुश्मनी शुरू हो गई थी.

इस के बाद कासिम हारून के खिलाफ लगातार शिकायत करने लगा. अप्रैल 2014 में कासिम ने हारून व उस की पत्नी शायदा बेगम के खिलाफ वोटर लिस्ट में धोखाधड़ी की रिपोर्ट दर्ज करवा दी थी.

हारून सैफी ने फरजी तरीके से 2 पहचान पत्र भी बनवा रखे थे. उस ने ब्राइट फ्यूचर के नाम से एक गैर सरकारी संस्था (एनजीओ) भी बना रखी थी. अपने इसी एनजीओ के नाम से उस ने मुरादाबाद प्राधिकरण से मोटी रकम की प्रौपर्टी खरीदी थी.

कासिम ने संबंधित विभागों में आरटीआईलगाकर फरजी पहचानपत्र और जमीन खरीदने के लिए जो मोटी रकम एमडीए को दी थी उस की आमदनी के स्रोत की जानकारी मांगी थी. कासिम सैफी द्वारा हारून सैफी और उस के परिवार पर लगाई गई आरटीआई से हारून बहुत परेशान हो गया था.

वह किसी भी तरह कासिम से छुटकारा पाना चाहता था. हारून ने अपनी परेशानी अलका दूबे को बताते हुए उस से कहा, ‘‘देखिए, इस समय हमारी सरकार नहीं है, अधिकारी भी हमारी बात नहीं सुन रहे. यदि चाहो तो तुम मेरी मदद कर सकती हो.’’

‘‘बताइए, मैं किस तरह आप की मदद कर सकती हूं.’’ अलका बोली.

‘‘आप बस इतना कर दो कि उसे अपने जाल में फंसा कर किसी तरह रास्ते से हटा दो. इस के लिए मैं 10 लाख रुपए दूंगा.’’ हारून ने कहा, ‘‘मैं समझता हूं कि यह काम आप के आसान होगा.’’

अलका ने बनाई योजना

10 लाख रुपए की बात सुन कर अलका को लालच आ गया. उस ने कहा, ‘‘देखिए मेरा एक बिजनैस पार्टनर है विकास चौधरी. वह बहुत दबंग है. रामगंगा विहार में वह मेरे ही घर में रहता है. मैं उस से बात करूंगी. यदि वह चाहेगा तो आप का यह काम हो जाएगा.’’

‘‘अलकाजी, मैं विकास चौधरी को जानता हूं. आप चाहेंगी तो काम हो जाएगा.’’ कहते हुए हारून सैफी ने अलका को एडवांस में 50 हजार रुपए दिए और कहा कि बाकी रकम काम होने के बाद दे दूंगा. इस से पहले अलका कासिम सैफी को नहीं जानती थी.

50 हजार की रकम हाथ में आने के बाद अलका ने हारून से कासिम का मोबाइल नंबर ले लिया. इस के बाद अलका ने हारून सैफी से कहा कि अब आप निश्ंिचत हो कर जाइए, बाकी काम मेरा है.

अलका ने यह बात अपने बिजनैस पार्टनर विकास चौधरी को बताई तो पैसों के लालच में विकास कासिम को ठिकाने लगाने के लिए तैयार हो गया.

लेकिन इस के पहले अलका को कासिम से जानपहचान करनी थी. अक्तूबर 2018 की दिवाली से पहले की बात है. अलका ने कासिम सैफी को फोन कर के कहा, ‘‘हैलो कासिम भाई, कैसे हैं?’’ कासिम को आवाज अनजानी लगी तो वह बोला, ‘‘आप कौन, सौरी मैं ने पहचाना नहीं.’’

‘‘मैं मुरादाबाद से समाजवादी पार्टी की जिला सचिव बोल रही हूं.’’ अलका ने कहा.

‘‘सपा के जिला सचिव पूर्व प्रधान हारून सैफी भी हैं, आप उन्हें तो जानती होंगी?’’ कासिम ने पूछा.

‘‘हां वो भी हैं लेकिन मेरा काम महिलाओं की समस्याएं हल करना व उन के काम करवाना है. मुझे तो बस अपने काम से मतलब. हारून सैफी क्या करते हैं मुझे नहीं मालूम, वैसे भी उन से मेरी ज्यादा बनती भी नहीं है. मेरा अपना प्रौपर्टी खरीदनेबेचने का काम है.’’ अलका ने बताया.

‘‘चलो कोई बात नहीं. अब यह बताओ मैडम की मुझे कैसे याद किया?’’ कासिम बोला.

‘‘कासिम भाई, मुझे कहीं से यह पता लगा कि आप आरटीआई कार्यकर्ता हैं. हमारी तरह आप भी समाजसेवा से जुड़े हुए हैं. देखो, पहले सपा सरकार थी तो हमारे सारे काम चुटकियों में हो जाते थे, लेकिन अब भाजपा की सरकार है. अब तो अफसर भी निगाहें फेर कर बात करते हैं. कुछ अफसरों के खिलाफ आरटीआई डलवानी है इसी संबंध में मुझे आप की मदद चाहिए.’’ अलका बोली.

‘‘कैसी मदद.’’ कासिम ने पूछा.

‘‘हम दोनों मिल कर भाजपा सरकार के भ्रष्ट अफसरों के खिलाफ आरटीआई डालेंगे. उन के सबूत मैं दूंगी. आप मुरादाबाद के रामगंगा विहार स्थित मेरे औफिस आ जाइए इस बारे में और डिटेल्स से बात कर लेंगे.’’ इस दौरान अलका ने उसे अपने औफिस का पता भी दे दिया.

कासिम भांप नहीं पाया अलका की चाल को

कासिम सैफी अलका की योजना से अनभिज्ञ था. एक दिन वह उस के औफिस पहुंच गया. वहीं पर अलका ने विकास चौधरी से उस की मुलाकात कराई. इस के बाद कासिम का अलका के औफिस में आनाजाना शुरू हो गया.

धीरेधीरे वह उन के साथ प्रौपर्टी डीलिंग का धंधा भी करने लगा. अलका कासिम को पूरी तरह अपने विश्वास में लेने के बाद ही योजना को अंजाम देना चाहती थी. इसलिए उस ने योजना को अंजाम देने में जल्दबाजी नहीं दिखाई.

अलका दूबे से घनिष्ठता बढ़ जाने के बाद कासिम सैफी का ज्यादातर समय अलका के साथ उस के औफिस में ही बीतता था. वहीं पर बैठ कर वह आरटीआई के कागजात तैयार करता. विकास चौधरी से भी कसिम की गहरी दोस्ती हो गई थी.

एक दिन विकास ने कासिम से कहा, ‘‘कासिम भाई शामली से खेती की जमीन का सौदा आया है. बताते हैं कि वह जमीन मौके की है. मैं चाहता हूं कि हम दोनों उस जमीन को एक बार देख आएं. बात बन गई तो मैं खरीदार का भी जुगाड़ कर लूंगा. सब कुछ ठीक रहा तो हम इस में मोटा पैसा कमा सकते हैं.’’

चूंकि कासिम को विकास पर भरोसा था इसलिए वह जमीन देखने जाने के लिए तैयार हो गया. फिर 27 दिसंबर, 2018 को विकास चौधरी कासिम सैफी को साथ ले कर बस से शामली के लिए निकल गया. जैसे ही वह दोनों शामली पहुंचे विकास चौधरी का दोस्त कुलदीप मोटरसाइकिल ले कर आ गया. कुलदीप वहीं पास के एक गांव में रहता था.

वह कासिम और विकास को मोटरसाइकिल पर बैठा कर शाहपुर गांव की तरफ चल दिया. वहीं गन्ने के एक खेत में ले जा कर विकास ने अपने साथ लाए तमंचे से कासिम को 2 गोलियां मारीं. एक गोली उस के पेट में और दूसरी पीठ में लगी. कुछ ही देर में उस की वहीं मौत हो गई.

हत्या को दूसरा रूप देने के लिए विकास चौधरी ने कासिम सैफी की पेंट उतार दी. हत्या करने के बाद विकास चौधरी वापस मुरादाबाद आ गया. जबकि कुलदीप कासिम का मोबाइल ले कर सहारनपुर रेलवे स्टेशन चला गया. जहां उस ने अमृतसर जाने वाली एक ट्रेन के टौयलेट में मोबाइल साइलेंट मोड पर कर के छिपा कर रख दिया.

हत्या के बाद हारून सैफी ने अलका दूबे को 50 हजार रुपए और दिए थे. हारून ने उस से कहा था कि वह उमरा करने सउदी अरब जा रहा है, बाकी के 9 लाख रुपए वह लौटने के बाद दे देगा.

हारून ने अलका से यह भी कहा था कि अगर कभी हत्या का राज खुल भी जाएगा तो वह मुकदमे का सारा खर्चा वहन करेगा और हर महीने 10 हजार रुपए विकास चौधरी के घर वालों को देता रहेगा. हारून 3 जनवरी को सऊदी अरब चला गया.

पुलिस ने अलका दूबे से पूछताछ के बाद उस से 27 हजार रुपए भी बरामद किए. फिर 16 जनवरी, 2019 को कुलदीप वर्मा को भी गिरफ्तार कर के दोनों को न्यायालय में पेश कर के जेल भेज दिया.

अब पुलिस को हारून सैफी के सऊदी अरब से लौटने का इंतजार था. उस का 15 दिन बाद लौटने का कार्यक्रम था. कथा लिखे जाने तक हारून भारत नहीं पहुंचा था. पुलिस ने उस के खिलाफ लुकआउट नोटिस जारी कर दिया था, जिस से उस के विदेश से लौटते ही उसे एयरपोर्ट पर ही गिरफ्तार किया जा सके.

निशान

पूर्व कथा

हर मातापिता की तरह सुरेश और सरला भी अपनी बेटी मासूमी को धूमधाम से विदा कर ससुराल भेजना चाहते हैं. 2 भाइयों की इकलौती बहन मासूमी खूबसूरत होने के साथ घर के कामों में दक्ष है. उस के रिश्ते भी खूब आते लेकिन जब शादी की बात पक्की होने को आती, उसे दौरे पड़ जाते. वह चीख उठती और रिश्ता जुड़ने से पहले टूट जाता. एक दिन मौसी ने मासूमी से उस के दिल की बात जाननी चाही तो वह बोली, ‘मौसी, आप ने ऐसा सोचा भी कैसे…’ वहीं, मासूमी को कई बार विवाह की महत्ता का एहसास होता रहा. वह सोचने लगी कि उसे भी शादी कर घर बसा लेना चाहिए. 28 साल की हो चुकी मासूमी का नया रिश्ता आया तो सभी ने सोचा कि यह रिश्ता चूंकि काफी समय बाद आया है, लड़का अच्छा पढ़ालिखा व उच्च पद पर है और मासूमी ज्यादा समझदार भी हो गई है, अत: वह इस रिश्ते को हरी झंडी दे देगी लेकिन मासूमी को लगा कि वह विवाह का रिश्ता संभालने में असफल रहेगी. उधर वह अपने पापा से बेहद डरीसहमी रहती थी. स्कूल से घर आते ही उस का पहला प्रश्न होता, ‘मां, पापा तो नहीं आ गए, राकेश भैया स्कूल गए थे या नहीं, दोनों भाइयों में झगड़ा तो नहीं हुआ?’ सरला उसे परेशानी में देख कहती, ‘तू क्यों इन चिंताओं में डूबी रहती है? अरे, घर है तो लड़ाईझगड़े भी होंगे.’ इसी असमंजस में फंसी मासूमी स्कूल से कालेज में आ गई थी और आज फिर वह दिन आ गया था जो किसी आने वाले तूफान का संकेत दे रहा था…

अब आगे…

हमेशा की तरह इस बार भी शादी के लिए आए रिश्ते को मासूमी ने ठुकरा दिया तो पिता सुरेशजी ने उस से उस की परेशानी स्पष्ट करने को कहा. तब मासूमी ने जो बताया, उसे जान कर वे सन्न रह गए.

गतांक से आगे…

भाई राकेश का मुकदमा मां की अदालत में था. मांपिताजी दोनों की चुप्पी आने वाले तूफान का संकेत दे रही थी. किसी भी क्षण झगड़ा होने वाला था. इसलिए मासूमी फिर पिता की ओर बढ़ कर बोली, ‘‘पापा, आप हाथमुंह धोएं, मैं चाय बनाती हूं.’’

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रसोई में जा कर भी मासूमी का मस्तिष्क उलझा रहा. पापा काम से थकेहारे आते हैं. ये बातें तो बाद में भी हो सकती हैं. भाई राकेशप्रकाश भी अब बड़े हैं, उन्हें अपनी जिम्मेदारियां समझनी चाहिए. समय से घर आना व पढ़ना चाहिए पर दोनों कुछ खयाल ही नहीं रखते. मासूमी अकसर पिता का पक्ष लेती. इस के पीछे छिपा कारण यह था कि वह मां को गुस्से से बचाना चाहती थी लेकिन सरला को शिकायत होती कि वह सबकुछ जानते हुए भी पिता का पक्ष लेती है.

पिता चाय की प्याली ले कमरे में चले गए और मासूमी से पूछा, ‘‘तुम्हारी मां को क्या हुआ?’’

‘‘कुछ नहीं, क्यों? आप से कुछ कहा?’’ मासूमी ने अनजान बन कर पूछा.

‘‘नहीं, कहा तो नहीं पर लग रहा है कुछ गड़बड़ है. जाओ, बुला कर लाओ मां को,’’ उन्होंने आदेश देने के अंदाज में मासूमी से कहा तो उस का दिल अनजानी आशंका से धड़क उठा.

दरवाजे पर खड़ी मां तमतमाए चेहरे से उसे देख कर बोलीं, ‘‘रसोई में जाओ और खाने की तैयारी करो.’’

‘‘जी,’’ कह मासूमी बाहर निकल गई पर उस के पैर कांपने लगे थे. हमेशा यही होता था. जब घर में कलह होती तो उसे रसोई में जाने का आदेश मिल जाता था. और फिर वह पल आ गया जिस से उस का मन हमेशा कांपता था. अंदर मां पापा से कह रही थीं :

‘‘देखिए, आज मैं आप से ऐसी बात कहने वाली हूं जिस में आप की, बच्चों की व इस घर की भलाई है. यह समझ लीजिए कि घर के इस माहौल ने मासूमी की जिंदगी पर गहरा असर डाला है. हमेशा एक तानाशाह बन कर घर पर राज किया है. मुझे बराबरी का दर्जा देना तो दूर, आप ने हमेशा अपने पैर की जूती समझा है. मैं ने फिर भी कुछ नहीं कहा. मासूमी भी मुझे ही चुप कराती है, क्योंकि वह लड़ाईझगड़े से डरती है लेकिन अब मामला दोनों लड़कों का है. अब राकेश ने भी कह दिया है कि पापा हमें दूसरों के सामने बेइज्जत न करें. संभालिए खुद को वरना कल प्रकाश घर से भागा था अब कहीं राकेश भी…’’

‘‘कर चुकीं बकवास. खबरदार, अब एक शब्द भी आगे बोला तो,’’ अंगारों सी लाल आंखें लिए मुट्ठियां भींचे सुरेश की कड़क आवाज दूर तक जा रही थी, ‘‘कान खोल कर सुन लो, बच्चों को बिगाड़ने में सिर्फ तुम्हारा हाथ है. तुम्हारे कारण ही वे इतनी हिम्मत करते हैं. कहां है वह उल्लू का पट्ठा, मेरे सामने कहता तो खाल खींच देता उस सूअर की औलाद की.’’

‘‘गाली देने से झूठ, सच नहीं हो जाता. तुम्हें बदलते वक्त का अंदाजा नहीं. बच्चों के साथ कदम नहीं मिला सकते तो उन का रास्ता मत रोको,’’ सरला भी तैश में आ गई थीं.

जिस बात से दूर रखने के लिए सरला ने मासूमी को रसोई में भेजा था वे सारी बातें दीवारों की हदें पार कर उस के कानों में गूंज रही थीं.

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सुरेश मर्दों वाले अंदाज में सरला की कमजोरियों को गिनवा रहे थे और दोनों बेटे मां की बेइज्जती पर दुख से पहलू बदल रहे थे तो मासूमी दोनों भाइयों को फटकार रही थी :

‘‘लो, पड़ गया चैन. एक दिन भी घर में शांति नहीं रहने देते. रोज कोई न कोई हंगामा होता है. रोज के झगड़ों से मेरी जान निकल जाती है. इस से अच्छा है, मैं मर ही जाऊं. ऊपर से मौसी, बूआ रोज आ कर अपने पतियों की वीरगाथाएं सुनाती हैं कि वे उन से लड़ते हैं. क्या सारे पुरुष एक से होते हैं? उन्हें यही करना होता है तो वे शादियां ही क्यों करते हैं?’’

प्रकाश गुस्से से गुर्राया, ‘‘तुम चुप ही रहो. सारा दोष मांपिताजी का है. हर समय ये झगड़ते रहते हैं. पापा तो सारी उम्र हमें बच्चा ही समझते रहेंगे. जब मन में आया डांट दिया, जब मन आया गाली दे दी.’’

उधर मां की तेज आवाज आने पर मासूमी मां की ओर बढ़ी, ‘‘मां, रहने दो. आप ही चुप हो जाइए. आप को पता है कि पापा अपनी बात के आगे किसी की नहीं सुनते तो आप मत बोलिए.’’

‘‘तू हट जा. आज फैसला हो कर रहेगा. मुझे गुलाम समझ रखा है. बाप रौब जमाता है तो बेटे अलग मनमानी करते हैं. तेरा क्या है, शादी के बाद अपने घर चली जाएगी, पर मेरे सामने तो बुढ़ापा है. अगर तेरे पिता का यही हाल रहा तो क्या दामाद और बहुओं के सामने भी ऐसे ही गालियां खाती रहूंगी? नहीं, आज होने दे फैसला,’’ मां बुरी तरह हांफ रही थीं और मासूमी रो रही थी.

राकेश बोला, ‘‘क्यों रोती है? हम बच्चे तो नहीं कि हर बात को सही मान लें.’’

मासूमी चिल्लाई, ‘‘देखा प्रकाश, सारा झगड़ा इसी का शुरू किया है. बित्ते भर का है और मांबाप का मुकाबला कर रहा है.’’

‘‘चुप रह वरना एक कस कर पड़ेगा. पापा की चमची कहीं की,’’ राकेश लालपीला हो कर बोला.

प्रकाश भी तमक उठा, ‘‘दिमाग फिर गया है तुम लोगों का…उधर वे लड़ रहे हैं इधर तुम. कोई मानने को तैयार नहीं है.’’

‘‘आप माने थे…’’ राकेश ने पलट- वार किया तो प्रकाश उसे मारने दौड़ा.

उसी समय अंदर से कुछ टूटने की आवाजें आईं. मासूमी दौड़ कर अंदर गई तो देखा पिताजी हाथ में क्रिकेट का बैट लिए शो केस पर तड़ातड़ मार रहे हैं.

राकेश द्वारा पाकेटमनी जोड़ कर खरीदा गया सीडी प्लेयर और सारी सीडी जमीन पर पड़ी धूल चाट रही थीं…शोपीस टुकड़ेटुकड़े हो कर बिखरा पड़ा था.

मासूमी हाथ जोड़ कर बोली, ‘‘पापा, प्लीज, शांत हो जाएं.’’

लेकिन सुरेशजी की जबान को लगाम कहां थी, गालियों पर गालियां देते चीख रहे थे, ‘‘तू हट जा. एकएक को देख लूंगा. बहुत खिलाड़ी, गवैए बने फिरते हैं पर मैं ये नहीं होने दूंगा. इन को सीधा कर दूंगा या जान से मार डालूंगा.’’

प्रकाश का जवान खून भी उबाल खा गया, ‘‘हां, हां, मार डालिए. रोजरोज के झगड़ों से तो अच्छा ही है.’’

सरला और मासूमी ने मिल कर प्रकाश को बाहर धकेलना चाहा और राकेश ने बाप को पकड़ा पर कोई बस में नहीं आ रहा था.

मासूमी ने घबरा कर इधरउधर देखा तो बहुत सारी आंखें उन की खिड़कियों से झांक रही थीं और कान दरवाजे से चिपके हुए थे. बस, यही वह समय था जब मासूमी का सिर चकराने लगा. उसे लगा कि वह गहरे पाताल में धंसती जा रही है, जहां न उसे मां की बेबसी का होश था न पिता के गुस्से का और न भाइयों की बगावत का.

मासूमी को होश आया तो सारा माहौल बदला हुआ था. पिता सिर झुकाए सिरहाने बैठे थे, मां पल्लू से आंखें पोंछ रही थीं, भाई हाथपैर सहला रहे थे. पिता का गुस्सा तो साबुन के बुलबुलों की तरह बैठ गया था पर मां सरला आज मौके का फायदा उठा कर फिर बोल उठी थीं, ‘‘जवान बच्चों के लिए आप को अपनी आदतों और कड़वाहटों पर काबू पाना चाहिए. यह नहीं कि घर में घुसते ही हुक्म देना शुरू कर दें.’’

प्रकाश ने उन्हें चुप कराया, ‘‘मां, बस भी करो. देख नहीं रही हैं मासूमी की हालत.’’

सुरेशजी मासूमी की हालत देख खामोश और शर्मिंदा थे तो मांबेटों की तकरार चालू थी. सब एकदूसरे को दोष दे रहे थे. पिता का कहना था कि अगर बच्चों पर लगाम न कसो तो वे बेकाबू हो जाएंगे. बच्चों का कहना था, ‘‘पापा हमें हर बात पर बस डांटते हैं. घर से बाहर रहो तो घर में रहने का आदेश, घर पर रहो तो टोकाटाकी. गाने सुनें तो हमें भांड बनाने लगते हैं. दोस्तों के साथ खेलें तो उसे आवारागर्दी कहते हैं. हम तो यहां बस मां के कारण चुप हैं वरना…’’

सरला बेटों को चुप करा रही थीं, ‘‘चुप रहो, जवान हो गए हो तो इस का मतलब यह नहीं कि पिता के सामने जबान खोलो.’’

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सब मिल कर मासूमी को एहसास दिलाना चाह रहे थे कि कोई किसी का दुश्मन नहीं. हां, झगड़े तो होते ही रहते हैं. देखो, तुम्हें तकलीफ हुई तो सब तुम्हारी चिंता में बैठे हैं.

मां ने मासूमी के बाल सहलाए, ‘‘सब लड़झगड़ कर एक हो जाते हैं पर तुम बेकार में उसे दिल में पाल लेती हो…’’

मासूमी बिखर गई, ‘‘मां, आप को अच्छा लगे या बुरा पर सच यह है कि गलती आप की भी है. आप को यही लगता है कि पिताजी ने कभी आप की कद्र नहीं की लेकिन मैं जानती हूं कि पापा के मन में आप के लिए क्या है. आप घर नहीं होतीं तो आप को पूछते हैं. आप की बहुत सी बातों की सराहना निगाहों से करते हैं पर कहना नहीं आता उन्हें. लेकिन उन की तकलीफदेह बातों के कारण आप का ध्यान उन की इन बातों पर नहीं जाता. इसी कारण पापा पर गुस्सा आने पर आप बच्चों के सामने पापा की कमजोरियां गिनवाती हैं और फिर बच्चे उन को आप की पीठ पीछे बुराभला कहते हैं,’’ मासूमी बोल रही थी और सरला चोर सी बनी सब बातें सुन रही थीं.

सुरेशजी भी मासूमी की हालत से घबराए थे. हमेशा ही गुस्सा ठंडा होने पर वह एकदम बदल जाते. उन्हें बीवीबच्चों पर प्यार उमड़ आता था. आज भी यही हुआ. वे उठे और टूटा शोपीस, सीडी प्लेयर उठा कर गाड़ी में रखने लगे. टूटी सीडी के नाम, नंबर नोट करने लगे. मासूमी खामोशी से लेटी देख रही थी कि अब पापा बाजार जा कर सब नया सामान लाएंगे. आइसक्रीम, मिठाई से फ्रिज भर जाएगा. मां के लिए नई साड़ी, भाइयों को पाकेटमनी मिलेगी. प्यार से समझाएंगे कि बेटा, अभी तुम लोगों का ध्यान पढ़ने में लगना चाहिए. मैं तो चाहता हूं कि तुम लोग खाओपियो, हंसोबोलो.

पिताजी खुश होंगे तो सब के साथ बैठे दुनियाजहान की बातें करेंगे. मां भी चहकती फिरेंगी. बस, 2 दिन बाद ही जरा सी कोई बात होगी तो फिर हंगामा शुरू हो जाएगा. मासूमी का तो कालेज जाना भी बंद हो चुका था. यों वहां जाने पर भी हमेशा की तरह मन धड़कता था कि कहीं फिर दोनों भाइयों में, मांबाप में झगड़ा न हो गया हो. कहीं मौसी और बूआ अपनेअपने पतियों से झगड़ कर न आ बैठी हों. बस, यही हालात थे जिन के कारण मासूमी को पुरुषों से नफरत हो गई थी, जिस में उस के पिता, भाई, फूफा, मौसा सभी शामिल थे. सारे पुरुष उसे जल्लाद लगते थे, जो सिर्फ स्त्रियों पर अपना हक जता कर उन्हें नीचा दिखाना चाहते थे. इस से बचने के लिए वह इतना ही कर सकती थी कि मर्दों के साए से दूर रहे.

आज उस के भाई अच्छाखासा कमा कर परिवार वाले हो गए थे. एक मासूमी ही थी जिस के लिए सबकुछ बेकार हो चला था. अब यह रिश्ता फिर से हाथ आया था और मासूमी ने फिर से इनकार कर दिया था. इस बार सुरेशजी को गुस्सा तो बहुत आया फिर भी खुद पर काबू पा कर वे मासूमी को समझा रहे थे, ‘‘यह क्या नादानी है. तुम्हारी इतनी उम्र होने पर भी यह रिश्ता आया है. अब कहीं न कहीं तो समझौता करना ही पड़ेगा. खुशियां दरवाजे पर खड़ी हैं फिर तुम्हें क्या परेशानी है? या तो तुम्हें मुझे यह बात स्पष्ट समझानी होगी वरना मैं अपने हिसाब से जो करना है कर दूंगा.’’

कुछ समय मासूमी सिर झुकाए खड़ी रही फिर हिम्मत कर के बोली, ‘‘आप मुझ से जवाब मांग रहे हैं तो सुनिए पापा, मैं हार गई हूं खुद से लड़तेलड़ते. बहुत सोचने के बाद मुझे विश्वास हो गया है कि मैं मां जैसी हिम्मत व सब्र नहीं रखती. मैं नहीं चाहती कि मेरे पिता द्वारा जो व्यवहार मेरी मां से किया गया वही व्यवहार कोई और व्यक्ति मेरे साथ करे.

‘‘औरत होने के नाते मैं उस औरत के दुख को महसूस कर सकती हूं जो मेरी मां है. हो सकता है कि विवाह के बाद मैं भी व्यावहारिकता में जा कर सबकुछ सह लूं पर मैं इतिहास दोहराना नहीं चाहती. आप के, मां व परिवार के बीच होने वाले झगड़ों ने मेरे अस्तित्व को ही जैसे खोखला व कमजोर बना दिया है. मुझे नहीं लगता कि मैं अब किसी परिवार का हिस्सा बनने लायक हूं. एक अनजाना सा डर मुझे हर खुशी से दूर ही रखेगा. इसलिए आप मुझे माफ कर दें और रिश्ते के लिए मना कर दें.’’

इतना कह कर वह दोनों हाथों से मुंह छिपा कर फूटफूट कर रो दी और कमरे में भाग गई.

मासूमी की बात सुन कर सुरेशजी सन्न रह गए. उन्होंने सोचा भी नहीं था कि आएदिन घर में होने वाले झगड़े उन की बेटी की जिंदगी में ऐसा गहरा निशान छोड़ जाएंगे कि उस की जिंदगी की खुशियां ही छिन जाएंगी. जिंदगी के कटघरे में आज वे अपराधी बन सिर झुकाए खड़े थे.

: स्मिता जैन

फिल्म समीक्षा : अवेंजर्स एंड गेम- बेहतरीन समापन 

बुराई पर अच्छाई की जीत पर भारत में सैकड़ों फिल्में बन चुकी हैं. मगर हौलीवुड ने अपने सुपर हीरो द्वारा पूरे विश्व को बुरी शक्तियों से बचाने वाली 22वीं फिल्म बना डाली, जिसका अंत ‘‘अवेंजर्स गेम एंड’ के साथ हो गया. बहरहाल, इस फिल्म में इसी सीरीज की पुरानी फिल्मों के सीन्स के साथ कई जटिल नाटकीय घटनाक्रमों के साथ ही कभी न मरने वाले यानी कि अजेय सुपर हीरो को श्रृद्धांजली भी दी गयी है.

निर्माताः केविन फिएग

निर्देशक: एंथनी रूसो, जौ रूसो

कलाकार: रौबर्ट डाउनीक्रिस इवांस, क्रिस हेम्सवर्थ, स्कारलेट जोहानसन और अन्य

रेटिंग: चार स्टार

कहानी

थैनोस (जोश ब्रोलिन) के खिलाफ आइरन मैन (रौबर्ट डाउनी), कैप्टन अमरीका (क्रिस इवांस), थौर (क्रिस हैम्सवर्थ), हल्क (मार्क रैफलो), ब्लैक विडो (स्कारलेट जोहानसन), जरेमी रेनर, ऐंट मैन (पौल रड), कैप्टन मार्वल (ब्री लार्सन) ने एकजुट होकर जंग छेड़ दी हैं. वास्तव में एंट मैन (पौल रड) इन सुपर हीरोज को आकर बताता है कि क्वांटम थ्योरी के जरिए वह अतीत में जाकर थैनोस से पहले उन मणियों को हासिल करें, तो इंफीनिटी वार की स्थिति से बचा जा सकता है. उस जंग में जिन अपनों को खो दिया गया था,उन्हें भी वापस लाया जा सकता है.

लेकिन क्या यह सभी क्वांटम थियरी को चाक चैबंद करके अतीत में जाकर विभिन्न जगहों से मणियों को हासिल कर पाएंगे. क्या अब थैनोस की बुराइयों का अंत हो पाएगा? क्या अवेंजर्स अपने प्यारों को वापस ला पाते हैं?क्या सुपर हीरोज का जलवा बरकरार रह पाता है? इन सारे दिलचस्प सवालों व कहानी के उतार चढ़ाव के लिए आपको अवेंजर्स देखनी होगी.

Avengers endgame full review in hindi

कैसी है फिल्म

इस साल की बहुप्रतीक्षित यह फिल्म दर्शकों की उम्मीदों पर खरी उतरती है. मार्वल सिनेमैटिक यूनिवर्स के लिए यह शानदार एंडिंग है. दर्शकों ने इसके कुछ पात्रों को काफी पसंद किया. इसमें जिस तरह से कहानी का विस्तार होता रहा है, वह सदैव रोमांचक रहा. क्रिस्टोफर मार्कस व स्टीफन एम सी फीली की पटकथा फिल्म की असली हीरो तो इसकी पटकथा ही है. लेखक व निर्देशक ने हिंसा व नाटकीय घटनाक्रमों के बीच भावनाओं के सागर को भी बरकरार रखने में अद्भुत सफलता पायी. इस फिल्म से क्वांटम भौतिकी थियरी को नए आयाम मिले.

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डायरेक्शन

फिल्म ‘‘अवेंजर्स एंडगेम’’की गति धीमी है, पर लगता है कि ऐसा जान बूझकर किया गया. जिससे चरित्रों का गहन विकास और उनसे मिलने वाली सशक्त प्रेरणा अच्छे ढंग से उभर सके. निर्देशक ने इंफरनिटी वार के बाद के हालात में सबसे पहले सुपर हीरो को स्थापित किया, कि वह किस तरह अपने कारनामों और सुपर पावर्स से दूर आम जीवन बिता रहे हैं. मगर जब एंट मैन आकर उनके अंदर अपनों को दोबारा वापास लाने का जज्बा भरताहै, तब कहानी सरपट दौड़ती है. इस तरह तीन घंटे की फिल्म में से आखिरी आधे घंटे की फिल्म ही महत्वपूर्ण है, इसके बावजूद फिल्म बोर नही करती है. इसके लिए फिल्म के एडीटर भी बधाई के पात्र हैं.

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एक्टिंग

जहां तक एक्टिंग का सवाल है, तो हर कलाकार ने बेहतरीन अभिनय किया है. आइरन मैन (रौबर्ट डाउनी जूनियर), कैप्टन अमरीका (क्रिस इवांस), थौर (क्रिस हैम्सवर्थ), हल्क (मार्क रैफलो), ब्लैक विडो (स्कारलेट जोहानसन),जरेमी रेंटर, ऐंट मैन (पौल रड) सुपर हीरो का रोल करते हुए अपनी अभिनय प्रतिभा की छाप छोड़ जाते हैं. (थैनोस) जोश ब्रोलिन तो लार्जर देन लाइफ ही नजर आते हैं.

Edited by- Nisha Rai

कागर : क्या खून बहाए बिना राजनीतिक बदलाव संभव नहीं

कागर, कागर हिंदी रिव्यू, कागर मराठी फिल्म, रिंकू राजगुरू, शुभंकर तावड़े कागर का हिंदी में अर्थ हुआ अंकुरित/पल्लवित होता प्यार. पर यह प्रेम अंकुरित होता है राज्य में राजनीतिक बदलाव के लिए रक्तरंजित क्रांति के बीच, जिसमें प्रेमिका के पिता की राजनीतिक महत्वाकांक्षा, राजनीतिक व शतरंजी चालों की भेंट चढ़ता है प्रेमी.

मराठी फिल्म ‘‘रिंगणे’’के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त फिल्मकार मकरंद माने इस बार देश की कुल्सित राजनीति के चेहरे और रक्तरंजित राजनीति के चेहरे को बेनकाब करती फिल्म ‘‘कागर’’ लेकर आए हैं. इसमें चुनाव के चलते राजनीतिक प्रचार, कार्यकर्ताओं द्वारा किया जा रहा प्रचार, राजनीतिक उठापटक,  राजनीतिक शत्रुता, शतरंजी चालें और गुरू जी राजनीतिक महत्वाकांक्षा के चलते बहते रक्त के बीच रानी व युवराज की प्रेम कहानी भी है. मगर गुरूजी की राजनीतिक महत्वाकांक्षा के चलते अंततः युवराज का भी रक्त बहता है.

फिल्म समीक्षाः कागर

निर्देशक: मकरंद माने

कलाकार: रिंकू राजगुरूशुभंकर तावड़े, शशांक शिंदे, शांतनु गांगने व अन्य

अवधिदो घंटे, दस मिनट

रेटिंगतीन स्टार

कहानी

कहानी शुरू होती है मुंबई से, युवराज (शुभंकर तावड़े) अपने तीन साथियों के साथ महाराष्ट्र के वीराई नगर से मुंबई में मुख्यमंत्री के बंगले वर्षा पर आता है और बंगले पर मुख्यमंत्री के पी ए गुप्ते को प्रभाकर देशमुख उर्फ गुरूजी (शशांक शिंदे) द्वारा दिया गया बैग देकर चल देता है, तभी उनमें से एक वापस लौटकर गुप्ते को एक लिफाफा पकड़ाता है. इस लिफाफे के बारे में युवराज भी नहीं जान पाता. युवराज के कहने पर गुप्ते व गुरूजी के बीच बात होती है, जिससे यह बात साफ होती है कि इस बार गुरूजी के इशारे पर विधायक का चुनाव लड़ने के लिए भैयाजी (शातंनु गांगने) को टिकट मिलेगी. दूसरे दिन से वीराई नगर में भैयाजी चुनाव प्रचार करने लगते हैं. इस प्रचार में युवराज व उसके साथियों के साथ-साथ गुरूजी की बेटी प्रियदर्शनी देशमुख उर्फ रानी (रिंकू राजगुरू) भीहिस्सा लेती है. इससे विधायक भावदया नाराज होते हैं. हर कोई हैरान है कि पिछले 15 सालों से भावदया के साथ रहने वाले गुरूजी ने अचानक एक नए युवा भैयाजी के कैसे खडे हो गए, इस पर गुरूजी कहते हैं कि बदलाव चाहिए. युवा पीढ़ी को आगे लाना चाहिए.

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इसी बीच रानी और युवराज मंदिर में शादी करने का निर्णय लेते हैं. इसकी भनक गुरूजी को लगती है, तो गुरूजी अपनी शतंरजी चाल में युवराज को ऐसा फंसाते हैं कि युवराज शादी भूलकर गुरूजी की मदद के लिए दौड़ता है, उधर मंदिर में रानी इंतजार करती रह जाती है. गुरूजी अपनी पिस्तौल युवराज को देते हैं.

युवराज, भावदया की हत्या करने के लिए निकलता है, उसे गलत जानकारी दी जाती है जिसके चलते युवराज के हाथों भावदया की बजाय भैयाजी की हत्या हो जाती है. पर गुरूजी ऐसी चाल चलते है कि भैयाजी की हत्या के जुर्म में भावदया जेल पहुंच जाते हैं. युवराज नही समझ पाता कि गुरूजी ने तो उसे अपना मोहरा बनकार पीटा है. अब गुरूजी अपनी बेटी रानी को चुनाव मैदान में यह कह कर उतार देते है कि उन्होने युवराज को राजनीति की शिक्षा लेने के लिए पार्टी मुख्यालय भेज रखा है.

रानी जोरदार तरीके से चुनाव प्रचार में जुट जाती है. पर चुनाव से पहले ही रानी को सच पता चल जाता है कि उसके पिता यानी कि गुजी ने ही भैयाजी की हत्या करवाई है. क्योंकि वह रानी को विधायक बनाना चाहते हैं. जहां युवराज छिपा है, वहां रानी जाकर युवराज से जुर्म कबूल करने के लिए कहती है. रानी कहती है कि वह सजा काटकर आने तक युवराज का इंतजार करेगी, पर तभी गुरूजी अपने दलबल के साथ पहुंच जाते हैं.

कई लोग मौत के घाट उतारे जाते हैं. अंततः रानी के विरोध के बावजूद युवराज को भी गुरूजी मौत दे देते हैं. रानी को गुरूजी समझाते हैं कि वह जो खुद नहीं बन सके, वह उसे बनाना चाहते है. रानी अपनी कलाई काटकर आत्महत्या करने का असफल प्रयास करती है. अंततः चुनाव के दिन वोट देने के लिए जाते समय रानी अपने पिता से कहती है कि वह इस बात को कभी नहीं भूलेगी कि उसके पिता हत्यारे हैं. बेटी की बातों से आहत गुरूजी आत्महत्या कर लेते हैं. रानी विधायक बन जाती है. पर वह अपने प्यार व युवराज को भुला नही पाती हैं.

लेखन व निर्देशनः

चुनाव के वक्त राजनीतिक दलों के अंदर होने वाली उठा पटक, एक ही दल से जुड़े लोगों के बीच एक दूसरे के खून के प्यासे हो जाने की हद तक की आपसी दुश्मनी, चुनाव प्रचार, चुनाव प्रचार रैली सहित जिस तरह से लोग अपनी अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा और अपनी अपनी कुर्सी बचाने के लिए दूसरों का खून बहाने पर आमादा रहते हैं, उसका यथार्थपरक चित्रण करने में फिल्मकार मकरंद माने पूर्णरूपेण सफल रहे हैं.मगर लेखक के तौर पर वह दिग्भ्रमित सा लगते है. इसी के चलते इंटरवल तक यह फिल्म पूर्णरूपेण प्रेम कहानी नजर आती है. इंटरवल के बाद

अचानक यह रोमांचक और राजनीतिक फिल्म बन जाती है. परिणामतः प्रेम की हार होती है और स्वार्थपूर्ण रक्त रंजित राजनीति की विजय होती है.

निर्देशक के तौर पर मकरंद माने फिल्म के क्लाइमेक्स को गढ़ने में मात खा गए. फिल्म के कुछ सीन्स को जिस तरह से गन्ने के खेतों, गांव आदि जगह पर फिल्माया गया है, उससे फिल्म सुंदर बन जाती है. फिल्म के कुछ संवाद काफी अच्छे बन पड़े हैं. निर्देशक के तौर पर महाराष्ट्र में खुरदरी ग्रामीण राजनीति के साथ ही छोटे शहर के रोजमर्रा के जीवन का सटीक चित्रण करने में मकरंद माने सफल रहे हैं. लेकिन फिल्म को एडीटिंग टेबल पर कसे जाने की भी जरुरत थी.

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एक्टिंग

जहां तक अभिनय का सवाल है तो प्रियदर्शनी देशमुख उर्फ रानी के किरदार को परदे पर जीवंतता प्रदान कर रिंकू राजगुरू ने एक बार फिर साबित कर दिखाया कि अभिनय में उनका कोई सानी नहीं है. मगर निर्देशक रिंकू राजगुरू की प्रतिभा का सही ढंग से उपयोग नहीं कर पाए, यह उनके लेखन व निर्देशन दोनों की कमियों को उजागर करता है. एक चतुर राजनीतिज्ञ के हाथों की कठपुतली बने युवराज के किरदार में नवोदित अभिनेता शुभंकर तावडे़ में काफी संभावना नजर आती हैं. गुरूजी के किरदार में शंशाक शिंदे की भी तारीफ की जानी चाहिए. अन्य कलाकारों ने भी ठीक ठाक काम किया है. फिल्म का गीत संगीत उत्कृष्ट होने के साथ ही सही जगह पर उपयोग किया गया है.

Edited by- Nisha Rai

किसे kiss कर रही हैं अकिंता लोखेंडे, वायरल हुआ वीडियो

कंगना रनौत की फिल्म मणिकर्णिका से बड़े पर्दे पर अपने करियर की शुरुआत करने वाली अंकिता लोखंडे अपने एक वायरल वीडियो की वजह से काफी चर्चा में हैं. इस वीडियो में अंकिता और विक्की जैन अलग अंदाज में दिखाई दे रहे हैं. आमतौर पर सेलिब्रिटीज अपने रिश्तों को पब्लिकली दिखावा करने से बचते हैं पर इस वीडियो में चीजें बिल्कुल उलट हैं. वीडियो में दोनों एक दूसरे को किस करते हुए दिखें.

जी हां, एक मैरिज पार्टी में शिरकत करने पहुंचे अंकिता और विक्की ने डांस के दौरान एक दूसरे को चूम लिया. सोशल मीडिया पर ये वीडियो वायरल हो गया है, जिसे लोग काफी पसंद कर रहे हैं. हालांकि विक्की इस पर बात करने से बचना चाहते हैं. वीडियो के वायरल होने के बाद जब मीडिया विक्की से बात करनी चाही तो उन्होंने फोन काट दिया. वो इसपर कुछ भी बात नहीं करना चाहते. वैसे जब- जब अंकिता से विक्की जैन से जुड़ा सवाल किया जाता है उनका हमेशा वही जवाब होता है कि ‘वो सिर्फ अच्छे दोस्त है’. अंकिता कहती हैं कि वो जब भी शादी की प्लानिंग करेंगी, मीडिया को जरूर बताएंगी.

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आपको बता दें कि विक्की जैन से पहले अंकिता लोखंडे एक्टर सुशांत सिंह राजपूत को डेट करती थी. कुछ साल पहले दोनों का ब्रेकअप हुआ. कुछ सालों तक सिंगल रहने के बाद अंकिता लोखंडे का नाम बिजनसमैन विक्की जैन से जुड़ने लगा. इसके बाद ये दोनों अक्सर पार्टीज और इवेंट्स में साथ दिखने लगे.

यह दोस्ती हम नहीं झेलेंगे

रात को 8 से ऊपर का समय था. मेरे खास दोस्त रामहर्षजी की ड्यूटी समाप्त हो रही थी. रामहर्षजी पुलिस विभाग के अधिकारी हैं. डीवाईएसपी हैं. वे 4 सिपाहियों के साथ अपनी पुलिस जीप में बैठने को ही थे कि बगल से मैं निकला. मैं ने उन्हें देख लिया. उन्होंने भी मुझे देखा.

उन के नमस्कार के उत्तर में मैं ने उन्हें मुसकरा कर नमस्कार किया और बोला, ‘‘मैं रोज शाम को 7 साढ़े 7 बजे घूमने निकलता हूं. घूम भी लेता हूं और बाजार का कोई काम होता है तो उसे भी कर लेता हूं.’’

‘‘क्या घर चल रहे हैं?’’ रामहर्षजी ने पूछा.

मैं घर ही चल रहा था. सोचा कि गुदौलिया से आटोरिकशा से घर चला जाऊंगा पर जब रामहर्षजी ने कहा तो उन के कहने का यही तात्पर्य था कि जीप से चले चलिए. मैं आप को छोड़ते हुए चला जाऊंगा. उन के घर का रास्ता मेरे घर के सामने से ही जाता था.

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लोभ विवेक को नष्ट कर देता है. यही लोभ मेरे मन में जाग गया. नहीं तो पुलिस जीप में बैठने की क्या जरूरत थी. रामहर्षजी ने तो मित्रता के नाते ऐसा कहा था पर मुझे अस्वीकार कर देना चाहिए था.

यदि मैं पैदल भी जाता तो 20-25 मिनट से अधिक न लगते और लगभग 15 मिनट तो जीप ने भी लिए ही, क्योंकि सड़क पर भीड़ थी.

‘‘जाना तो घर ही है,’’ मैं ने जैसे प्रसन्नता प्रकट की.

‘‘तो जीप से ही चलिए. मैं भी घर ही चल रहा हूं. ड्यूटी खत्म हो गई है. आप को घर छोड़ दूंगा.’’

पुलिस की जीप में बैठने में एक बार संकोच हुआ, पर फिर जी कड़ा कर के बैठ गया. मैं अध्यापक हूं, इसलिए जी कड़ा करना पड़ा. अध्यापकी बड़ा अजीब काम है. सारा समाज अपराध करे पर जब अध्यापक अपराध करता है तो लोग कह बैठते हैं कि अध्यापक हो कर ऐसा किया. छि:-छि:. कोई यह नहीं कहता कि व्यापारी ने ऐसा किया, नेता ने ऐसा किया या अफसर ने ऐसा किया. अध्यापक से समाज सज्जनता की अधिक आशा करता है.

बात भी ठीक है. मैं इस से सहमत हूं. समाज को बनाने की जिम्मेदारी दूसरों की भी है पर अध्यापक की सब से ज्यादा है. दूसरों का आदर्श होना बाद में है, अध्यापक को पहले आदर्श होना चाहिए.

मैं जीप में बैठ गया. रामहर्षजी ड्राइवर की बगल में बैठे. बाद में 4 सिपाही बैठे. 2 सामने और 1-1 मेरी अगलबगल.

जीप चल पड़ी.

जैसे ही जीप थोड़ा आगे बढ़ी, मैं ने चारों तरफ देखा. अगलबगल में इक्का, रिकशा, तांगा और कारें आजा रही थीं. किनारों पर दाएंबाएं लोग पैदल आजा रहे थे.

जीप में मेरे सामने बैठे दोनों सिपाही डंडे लिए थे, जबकि अगलबगल में बैठे सिपाहियों के हाथों में बंदूकें थीं. मैं चुपचाप बैठा था.

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एकाएक मेरे दिमाग में अजीब- अजीब से विचार आने लगे. मेरा दिमाग सोच रहा था, यदि किसी ने मुझे पुलिस की जीप में सिपाहियों के बीच में बैठे देख लिया तो क्या सोचेगा. क्या वह यह नहीं सोचेगा कि मैं ने कोई अपराध किया है और पुलिस मुझे पकड़ कर ले जा रही है. पुलिस शरीफ लोगों को नहीं पकड़ती, अपराधियों को पकड़ती है.

मेरा चेहरा भी ऐसा है जो उदासी भरा गंभीर सा बना रहता है, हंसने में मुझे कठिनाई होती है. लोग जिन बातों पर ठहाके लगाते हैं, मैं उन पर मुसकरा भी नहीं पाता. मेरा स्वभाव ही कुछ ऐसा है- मनहूसोें जैसा.

अपने अपराधी होने की बात जैसे ही मेरे मन में आई, मैं घबराने लगा. शरीर से पसीना छूटने लगा. मन में पछतावा होने लगा कि यह मैं ने क्या किया. 10 रुपए के लोभ में इतनी बड़ी गलती कर डाली. अब बीच में जीप कैसे छोड़ूं. यदि मैं कहूं भी कि मुझे यहीं उतार दीजिए तो मेरे मित्र रामहर्षजी क्या सोचेंगे. प्रेम और सज्जनता के नाते ही तो उन्होंने मुझे जीप में बैठा लिया था.

मेरी मानसिक परेशानी बढ़ती जा रही थी. बचने का कोई उपाय सूझ नहीं रहा था. एकतिहाई दूरी पार कर चुका था. यदि अब आटोरिकशा से जाता या पैदल जाता तो व्यावहारिक न होता. मुझे यह ठीक नहीं लगा कि इतनी आफत झेल लेने के बाद जीप से उतर पड़ूं.

जीप आगे बढ़ रही थी. तभी मेरे एक मित्र शांतिप्रसादजी मिले. उन्होंने मुझे जीप में देखा पर मैं ने ऐसा बहाना बनाया मानो मैं उन्हें देख नहीं रहा हूं. उन्होंने मुझे नमस्कार भी किया पर मैं ने उन के नमस्कार का उत्तर नहीं दिया.

नमस्कार करते समय शांतिप्रसादजी मुसकराए थे. तो क्या यह सोच कर कि पुलिस मुझे पकड़ कर ले जा रही है, लेकिन शांतिप्रसाद के स्वभाव को मैं जानता हूं. वे मेरी तकलीफ पर कभी हंस नहीं सकते, सहानुभूति ही दिखा सकते हैं. फिर भी मैं यह सोच कर परेशान हो रहा था कि शांति भाई मुझे पुलिस की जीप में बैठा देख कर न जाने क्या सोच रहे होंगे. यदि सचमुच उन्होंने मेरे बारे में गलत सोचा या यही सोचा कि पुलिस गलती से मुझे गिरफ्तार कर के ले जा रही है, तब भी वे बड़े दुखी होंगे.

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अब पुलिस की जीप में बैठना मेरे लिए मुश्किल हो रहा था. मैं बारबार पछता रहा था कि क्यों जरा से पैसे के लोभ में आ कर पुलिस की गाड़ी में बैठ गया. अब तक न जाने मुझे कितने लोग देख चुके होंगे और क्याक्या सोच रहे होंगे.

चलतेचलते एकाएक जीप रुक गई. रामहर्षजी उतरे और 2 ठेले वालों को भलाबुरा कहते हुए डांटा. ठेले वाले ठेला ले कर भागे. वास्तव में उन ठेले वालों से रास्ता जाम हो रहा था, पर मित्र महोदय ऐसी भद्दीभद्दी गालियां दे सकते हैं, यह सुन कर मैं आश्चर्य में पड़ गया. हालांकि दूसरे पुलिस वालों को मैं ने उस से भी भद्दी बातें कहते हुए सुना है, पर एक अध्यापक का मित्र ऐसी बातें करेगा, यह अजीब लगा. लग रहा था मैं ने बहुत बड़ी भूल की है. मैं कहां फंस गया, किस जगह आ गया. लोग क्या जानें कि डीवाईएसपी रामहर्षजी मेरे मित्र हैं. लोग तो यही जानेंगे कि रामहर्षजी पुलिस अधिकारी हैं और मैं किसी कारण जीप में बैठा हूं, शायद किसी अपराध के कारण.

जब जीप रुकी हुई थी और रामहर्षजी ठेले वालों को डांट रहे थे, राजकीय इंटर कालेज के अध्यापक शशिभूषण वर्मा बगल से निकले. उन्होंने मुझे पुलिस के साथ जीप में देखा तो रुक गए, ‘‘अरे, विशेश्वरजी, आप. क्या बात है? कोई घटना घटी क्या. मैं साथ चलूं?’’

इस समय मैं शशिभूषण को न देखने का बहाना नहीं कर सकता था. बोला, ‘‘जीप गुदौलिया से लौट रही थी. डीवाईएसपी साहब ने मुझे जीप में बैठा लिया कि आप को घर छोड़ देंगे. डीवाईएसपी साहब मेरे मित्र हैं.’’

फिर मैं ने हंस कर कहा, ‘‘मैं ने कोई अपराध नहीं किया है. आप चिंता मत करिए. मैं न थाने जा रहा हूं, न जेल,’’ यह सुन कर मेरे मित्र शशिभूषण भी हंस पड़े. सिपाहियों को भी हंसी आ गई.

रामहर्षजी सड़क की भीड़ को ठीकठाक कर के जीप में आ कर बैठ गए थे. ड्राइवर ने जीप स्टार्ट की. आगे फिर थोड़ी भीड़ मिली. पुलिस की गाड़ी देख कर भीड़ अपनेआप इधरउधर हो गई और जीप आगे बढ़ती चली गई.

मेरा घर अभी भी नहीं आया था जबकि कई लोग मुझे मिल चुके थे. मैं चाह रहा था कि घर आए और मुझे पुलिस जीप से मुक्ति मिले. अब तक मैं काफी परेशान हो चुका था.

आखिर घर आया. जीप दरवाजे पर रुकी. मेरा छोटा बेटा पुलिस को देख कर डरता है. वह घर में भागा और दादी को पुलिस के आने की सूचना दी.

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मां, दौड़ीदौड़ी बाहर आईं. मैं तब तक जीप से उतर कर दरवाजे पर आ गया था. उन्होंने घबरा कर पूछा, ‘‘क्या बात है. तुम पुलिस की जीप में क्यों बैठे थे? किसी से झगड़ा तो नहीं हुआ. मारपीट तो नहीं हो गई. कहीं चोट तो नहीं लगी है. फिर तो सिपाही घर नहीं आएंगे?’’

‘‘मां, तुम तो यों ही डर रही हो,’’ मैं ने मां को सारी बात बताई.

वे बोलीं, ‘‘मैं तो डर ही गई थी. आजकल पुलिस बिना बात लोगोें को परेशान करती है. अखबार में मैं रोज ऐसी घटनाएं पढ़ती रहती हूं. गुंडेबदमाशों का तो पुलिस कुछ कर नहीं पाती और भले लोगों को सताती है.’’

‘‘अरे, नहीं मां, रामहर्षजी ऐसे आदमी नहीं हैं. वे मेरे बड़े अच्छे मित्र हैं. तभी तो उन्होंने मुझे जीप में बैठा लिया था. वे कभी किसी को बेमतलब परेशान नहीं करते.’’

‘‘चलो, ठीक है,’’ बात समाप्त हो गई.

घर आ कर मैं ने कपड़े बदले, हाथमुंह धोया और बैठक में बैठ कर चाय पीने लगा.

‘‘टन…टन…टन…’’ घंटी बजी. मैं ने दरवाजा खोला.

‘‘आइए, आइए, आज कहां भूल पड़े,’’ मैं ने हंस कर रामपाल सिंह से कहा. रामपाल सिंह मेरे फुफेरे भाई हैं.

बैठक में आ कर कुरसी पर बैठते ही रामपाल सिंह बोले, ‘‘भाई, मैं तो घबरा कर आया हूं. लड़के ने तुम को नई सड़क पर पुलिस जीप से जाते देखा था. पुलिस बगल में बैठी थी. क्या बात थी. तुम्हें पुलिस क्यों ले जा रही थी? मैं यही जानने आया हूं्.’’

मैं ने रामपाल सिंह को सारा किस्सा बताया. फिर यह कहा, ‘‘मुझे पुलिस जीप में बैठा देख कर न जाने किसकिस ने क्याक्या सोचा होगा और न जाने कौनकौन परेशान हुआ होगा.’’

‘‘तब आप को पुलिस जीप में नहीं बैठना चाहिए था. जिस ने देखा होगा, उसे ही भ्रम हुआ होगा. हमलोग अध्यापक हैं,’’ वे बोले.

‘‘आप ठीक कहते हैं भाई साहब, मुझे अपने किए पर बहुत दुख हुआ. आज मैं ने यही अनुभव किया. आज मैं ने कान पकड़ लिए हैं. ऐसा नहीं होगा कि फिर कभी किसी पुलिस जीप में बैठूं.’’

मैं अभी बात कर ही रहा था कि हमारे एक पड़ोसी घबराए हुए आए और मेरा हालचाल पूछने लगे. चाय फिर से आ गई थी और तीनों चाय पी रहे थे. पुलिस जीप में बैठने की बात मैं अपने पड़ोसी को भी बता रहा था. मेरी बात पड़ोसी सुन कर खूब हंसे.

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मैं पुलिस जीप में क्या बैठा, एक आफत ही मोल ले ली. एक बूढ़ी महिला मेरी मां से इसी बारे में पूछने आईं, एक पड़ोसिन ने श्रीमतीजी से पूछा और एक महाशय ने रात के 11 बजे फोन कर के बगल वाले घर में बुलाया, क्योंकि मेरे घर में फोन नहीं है. मैं मोबाइल रखता हूं जिस का नंबर उन के पास नहीं था. फोन पर उन्होंने पूरी जानकारी ली.

2 व्यक्ति दूसरे दिन भी मेरा हालचाल लेने आए, ‘‘भाई साहब, हम तो डर ही गए थे इस बात को सुन कर.’’

तीसरे दिन दोपहर को एक महाशय जानकारी लेने आए और कालेज में प्रिंसिपल ने पूरी जानकारी ली.

यद्यपि इस घटना ने यह सिद्ध कर दिया कि शहर में मेरे प्रति लोगों की बड़ी अच्छी धारणा है तथा मेरे शुभचिंतकों की संख्या काफी अधिक है, पर अब मैं ने 2 प्रतिज्ञाएं भी की हैं, पहली, कि मैं कभी लोभ नहीं करूंगा और दूसरी, कि कभी पुलिस की जीप में नहीं बैठूंगा. पहली प्रतिज्ञा में कभी गड़बड़ी हो भी जाए, पर दूसरी प्रतिज्ञा का तो आजीवन पालन करूंगा.

रामहर्षजी गुदौलिया में बाद में भी मिले हैं और उन्होंने जीप में बैठने का प्रेमपूर्वक आग्रह भी किया है, पर मैं किसी न किसी बहाने टाल गया. जरा से लोभ के लिए अब प्रतिज्ञा तोड़ कर परेशानी में न पड़ने की कसम जो खा रखी है.

अरबों की गुड़िया: रेडियो एक्टिव डांसिंग डौल

बदलते जमाने के साथ अपराधों के तौरतरीके भी बदल रहे हैं. चोरीडकैती, ठगी और हत्या जैसे अपराध आदिकाल से होते रहे हैं. फर्क केवल इतना है कि समय के साथ इन के चेहरेमोहरे बदल जाते हैं. ठगी के मामले में भारत में नटवर लाल और दुनिया में चार्ल्स शोभराज का नाम प्रसिद्ध है. नटवरलाल कोई ज्यादा पढ़ालिखा नहीं था, लेकिन अपनी लच्छेदार और लुभावनी बातों से लोगों को ऐसा सम्मोहित कर लेता था कि वे खुद उस के बिछाए जाल में फंस कर ठगी का शिकार बन जाते थे. भले ही नटवरलाल से ज्यादा बड़ी रकम की ठगी करने वालों में दूसरे नाम जुड़ गए हों, लेकिन नटवरलाल का नाम आज भी ठगी का पर्याय बना हुआ है.

ठगों की इस दुनिया में अब विज्ञान भी शामिल हो गया है. ठगी के तरीके भी हाईटेक हो गए हैं. यहां तक कि अणु और परमाणु के नाम पर भी ठगी होने लगी है. मैकेनिकल इंजीनियर जैसे सम्मानजनक पेशे से जुड़े लोग भी ठगी की ऐसी वारदातों को अंजाम देने लगे हैं. उच्चशिक्षित और पैसे वाले लोग ऐसी ठगी का शिकार बनते हैं. ठगी भी कोई छोटीमोटी नहीं बल्कि करोड़ोंअरबों रुपए की है. यह कहानी ऐसे ही अंतरराष्ट्रीय ठगों की है, जो न्यूक्लियर पदार्थ रेडियोएक्टिव के नाम पर लोगों से करोड़ों रुपए की ठगी करते रहे हैं.

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पिछले साल की बात है. पुणे के रहने वाले 3 बिजनैसमैन योगेश सोनी, समीर मोहते और गिरीश सोनी का कारोबार के सिलसिले में मध्य प्रदेश के इंदौर निवासी दिनेश आर्य से संपर्क हुआ. दिनेश आर्य ने पुणे के कारोबारियों को रेडियोएक्टिव पदार्थ के बारे में बताया. साथ ही यह भी बताया कि रेडियोएक्टिव के काम में मोटा मुनाफा हो सकता है. शर्त यह है कि इस काम में रकम भी मोटी ही लगानी पड़ेगी.
पुणे के इन तीनों बिजनैसमैनों के पास पैसा था. उन का अच्छाखासा कारोबार चल रहा था. इसलिए उन्होंने दिनेश आर्य से कहा कि पैसों की कोई कमी नहीं है, तुम्हारी नजर में अगर किसी के पास रेडियोएक्टिव पदार्थ हो तो बताना.

उस समय तो बात आईगई हो गई, लेकिन इस के कुछ दिनों बाद दिनेश आर्य ने उन्हें बताया कि उस के एक परिचित सत्यनारायण आरोनिया, जो जयपुर में रहते हैं, के पास अंग्रेजों के जमाने की ईस्ट इंडिया कंपनी की एक डांसिंग डौल है. यह डांसिंग डौल रेडियोएक्टिव पदार्थ की बनी हुई है.

तीनों बिजनैसमैनों ने वह डांसिंग डौल देखने की इच्छा जताई. इस पर दिनेश आर्य ने बातचीत कर एक दिन तीनों बिजनैसमैनों को पुणे से जयपुर बुला लिया. दिनेश खुद भी इंदौर से जयपुर पहुंच गया था. ये लोग एक होटल में ठहरे. जयपुर में दिनेश ने बिजनैसमैन योगेश, समीर और गिरीश की मुलाकात सत्यनारायण से करवाई.

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डांसिंग डौल ने नचाया नाच

सत्यनारायण ने उन बिजनैसमैनों को एक डांसिंग डौल दिखाई. उस ने शीशे के शोकेस में रखी उस डांसिंग डौल के बारे में बताया कि रेडियोएक्टिव पदार्थ से बनी वह डौल दुनिया भर में एकमात्र डौल है. सत्यनारायण ने उस डौल की लंबाई 58 इंच बताई. उस ने बताया कि इस बेशकीमती डांसिंग डौल को बेच कर करोड़ोंअरबों रुपए की कमाई की जा सकती है.

बिजनेसमैनों ने डांसिंग डौल की खूबियां सुन कर उस के बारे में दिलचस्पी दिखाई. इस पर सत्यनारायण ने उन्हें मुंबई की रेनसेल कंपनी के बारे में बताया. साथ ही यह भी कि वह इस कंपनी के डायरेक्टर गणेश इंगले से मिल लें, आगे की बातें वही करेंगे.

इस के बाद तीनों बिजनैसमैन पुणे लौट गए. एक दिन उन्होंने सत्यनारायण की बताई रेनसेल कंपनी के बारे में जानकारी लेने के लिए गूगल पर सर्च किया. रेनसेल टाइप करते ही गूगल पर कई सारी साइटें सामने आ गईं. उन्होंने रेनसेल एनर्जी एंड मेटल लिमिटेड की साइट खोली. साइट पर कंपनी का मुंबई का पता लिखा हुआ था. कंपनी के होम पेज पर अंतरिक्ष यात्रियों जैसी पोशाक में तसवीरें लगी थीं. कंपनी के बारे में लिखा था—हम गर्व के साथ 2016 से सेवाएं प्रदान कर रहे हैं.

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कंपनी के कार्यकलाप के बारे में रेडियोएक्टिव वेस्ट और न्यूट्रीलाइजेशन के बारे में लिखा था. यह भी लिखा था कि हम रेडिशन शेल टैक्नोलौजी एंड स्टेमराड के भारत के आथराइज्ड डिस्ट्रीब्यूटर हैं. यह कंपनी न्यूक्लियर प्रोटेशन, न्यूक्लियर वेस्ट मैनेजमेंट व सोलर एनर्जी के क्षेत्र में इंटरनैशनल स्तर पर खरीदफरोख्त और सेवाएं प्रदान करती है.

कंपनी के होमपेज पर यह भी लिखा था कि रेनसेल एनर्जी एंड मेटल लिमिटेड दुनिया को सुरक्षित, स्वच्छ और कुशल उर्जा देने के लिए काम कर रही है. होमपेज पर कुछ वीडियो भी दिखाए गए थे, जिन में परमाणु वैज्ञानिकों से बातचीत थी.

होमपेज पर कंपनी के बारे में ज्यादा कुछ प्रदर्शित नहीं किया गया था, लेकिन इस कंपनी की दूसरी लिंक साइटों से यह बात पता चल गई कि कंपनी के डायरेक्टर गणेश इंगले हैं. रेनसेल कंपनी की इंग्लैंड की एक साइट भी बनी हुई थी.

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तीनों बिजनैसमैनों ने कुछ ही देर में गूगल पर प्रदर्शित रेनसेल कंपनी से जुड़ी अन्य साइटें खंगाल डालीं. इन में कंपनी की प्रोफाइल और कार्यकलापों को देख कर उन्हें यह भरोसा हो गया कि जयपुर के सत्यनारायण ने उन्हें सही कंपनी का नाम सुझाया है. अब उन्हें इस कंपनी के डायरेक्टर गणेश इंगले से मिलने की जरूरत थी.

एक दिन ये बिजनेसमैन योजना बना कर मुंबई पहुंच गए. मुंबई में रेनसेल एनर्जी एंड मेटल लिमिटेड और औथराइज्ड कंपनी का औफिस लेवल-8 विबग्योर टावर्स, बांद्रा कुर्ला में था. वहां पहुंच कर इन लोगों ने कंपनी के डायरेक्टर गणेश इंगले से मुलाकात की.

इंगले ने चलाया चक्कर

गणेश इंगले ने उन की अच्छी आवभगत की. फिर उन्होंने उन के मुंबई आने का मकसद पूछा. व्यापारियों ने बताया कि जयपुर में एक आदमी के पास रेडियोएक्टिव पदार्थ से बनी काफी पुरानी डांसिंग डौल है. हम उस डौल को खरीद कर बेचना चाहते हैं.

उन की सारी बातें सुनने के बाद गणेश ने कहा, ‘‘आप सही जगह आए हैं. हमारी कंपनी इसी तरह का काम करती है. साथ ही वर्ल्ड न्यूक्लियर एसोसिएशन की सदस्य भी है.’’ गणेश ने अपनी बात को मजबूती से रखने के लिए उन्हें कई तसवीरें दिखाईं. वे तसवीरें लंदन, फ्रांस की राजधानी पेरिस, चीन की राजधानी बीजिंग और स्पेन के मेड्रिड शहर में आयोजित न्यूक्लियर से जुड़े कई अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रमों की थीं.

गणेश इंगले ने बताया कि वह इन कार्यक्रमों में अपने एक पार्टनर अमित गुप्ता के साथ वर्ल्ड न्यूक्लियर एसोसिएशन के सदस्य के रूप में शामिल हुए थे. गणेश ने अमित गुप्ता से भी उन की मुलाकात करा दी.

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न्यूक्लियर पर दुनिया के विभिन्न बड़े शहरों में आयोजित अंतरराष्ट्रीय आयोजनों के कुछ वीडियो भी गणेश ने उन व्यापारियों को दिखाए. इन वीडियो में दुनिया के कई नामी न्यूक्लियर वैज्ञानिक रेडियोएक्टिव पदार्थ की महत्ता और दुनिया में इस की आवश्यकता बताते हुए नजर आ रहे थे. तसवीरें और वीडियो देख कर तीनों बिजनैसमैन काफी प्रभावित हुए. उन्होंने गणेश इंगले से डांसिंग डौल की बात की.

गणेश ने उन्हें बताया कि जिस डांसिंग डौल को आप रेडियोएक्टिव पदार्थ की बनी हुई बता रहे हैं, उस का पहले डीआरडीओ यानी रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन से प्रमाणीकरण करवाना पड़ेगा. प्रमाणीकरण के लिए डीआरडीओ के वैज्ञानिक पहले उस रेडियोएक्टिव आर्टिकल की टैस्टिंग करेंगे. इस टैस्टिंग की फीस 70 लाख रुपए होगी.

बिजनैसमैन डांसिंग डौल की डीआरडीओ के वैज्ञानिकों से टैस्टिंग कराने को तैयार हो गए लेकिन उन्होंने सवाल किया कि वह डौल अगर टैस्टिंग में पास हो गई तो उसे खरीदा कैसे जाएगा.

गणेश ने कहा कि उस न्यूक्लियर पदार्थ को हमारी कंपनी 7 हजार करोड़ रुपए प्रति इंच के हिसाब से खरीद लेगी. इस के लिए कंपनी आप से एक करारनामा भी करेगी. इतना सुन कर व्यापारियों ने मन ही मन हिसाब लगाया कि इस हिसाब से तो 58 इंच की वह डांसिंग डौल 4 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा की बिक जाएगी.

इतने मोटे मुनाफे की बात सुन कर उन्होंने गणेश इंगले से सवाल किया कि आप की कंपनी उस डौल का क्या करेगी. गणेश ने हंसते हुए कहा, ‘‘यही तो हमारी कंपनी का काम है. हमारी कंपनी उस डांसिंग डौल वाले रेडियोएक्टिव पदार्थ को करोड़ों रुपए के भाव से अंतरराष्ट्रीय बाजार में या नासा को बेच देगी.’’

बिजनैसमैनों का न तो डीआरडीओ में कोई संपर्क था और ना ही नासा में उन की कोई जानपहचान थी. इतना जरूर पता था कि नासा और डीआरडीओ बहुत महंगे दामों पर रेडियोएक्टिव पदार्थ खरीदते हैं. इसलिए उन के लिए रेडियोएक्टिव से बनी डांसिंग डौल बेचने के लिए एकमात्र कड़ी के रूप में गणेश इंगले ही था. उन्होंने गणेश इंगले का मोबाइल नंबर ले कर जल्दी ही मुलाकात करने की बात कही.
तीनों व्यापारियों को डांसिंग डौल के सौदे में मोटा फायदा होता दिख रहा था, इसलिए उन्होंने टैस्टिंग के बाद वह डौल खरीदने का फैसला कर लिया. उन्होंने दिनेश आर्य के मार्फत सत्यनारायण से डांसिंग डौल खरीदने की बात जारी रखी. उन्होंने सत्यनारायण से कहा कि पहले वह डीआरडीओ के वैज्ञानिकों से उस डौल की टैस्टिंग कराएंगे.

सत्यनारायण को इस में कोई ऐतराज नहीं था. उस ने कहा कि आप दुनिया के किसी भी वैज्ञानिक से इस की टैस्टिंग करा लें. लेकिन इस का खर्चा आप को ही देना होगा. एक शर्त यह भी होगी कि डौल की टैस्टिंग केवल जयपुर में ही कराई जाएगी. व्यापारियों ने उस की बात मानते हुए टैस्टिंग का खर्चा वहन करने पर सहमति जता दी.

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बढ़ता गया लालच

सत्यनारायण से बात तय होने पर उन्होंने गणेश से मोबाइल पर संपर्क किया. गणेश ने उन्हें डौल की टैस्टिंग के लिए मुंबई आ कर रेनसेल कंपनी में 70 लाख रुपए जमा कराने को कहा. इस पर उन व्यापारियों ने कहा कि डौल की टैस्टिंग हम जयपुर में कराना चाहते हैं.

तब गणेश ने कहा कि डीआरडीओ के वैज्ञानिकों के जयपुर आनेजाने के लिए हवाई यात्रा का खर्च और उन के लिए लग्जरी गाडि़यों के साथ फाइव स्टार होटल में ठहरने की व्यवस्था अलग से करनी होगी.
पुणे के योगेश, समीर और गिरीश बिजनैस के खड़े खिलाड़ी थे. उन्हें पता था कि इस तरह के मामलों में मुंहमांगा पैसा खर्च करना पड़ता है. व्यापारियों ने सोचा कि जब वह डौल की टैस्टिंग के 70 लाख रुपए देंगे तो 5-7 लाख रुपए और ज्यादा खर्च हो जाएंगे. लिहाजा उन्होंने जयपुर में टैस्टिंग कराने को कह दिया.

सारी बातें तय हो जाने पर उन्होंने गणेश इंगले की कंपनी में 70 लाख रुपए जमा करा दिए. पैसे जमा होने के बाद गणेश ने कहा कि डीआरडीओ के वैज्ञानिकों से डौल की टैस्टिंग की तारीख तय कर के उन्हें बता दिया जाएगा. उन्होंने जयपुर में सत्यनारायण को भी बता दिया कि टैस्टिंग के पैसे जमा करा दिए हैं और जल्दी ही डीआरडीओ के वैज्ञानिकों की तारीख मिल जाएगी. इसलिए आप पहले से ही सारा इंतजाम कर लें.

पिछले साल जुलाई में जयपुर में डांसिंग डौल की टैस्टिंग का कार्यक्रम तय किया गया. तय तारीख को गणेश इंगले, पुणे के तीनों बिजनैसमैन, इंदौर का दिनेश आर्य वगैरह जयपुर पहुंच गए. वहां पर जिंदाल नाम का व्यक्ति और उस के सहयोगी भी पहुंचे. उन के पास कई तरह के वैज्ञानिक उपकरण, कैमिकल, एंटी रेडियोएक्टिव सूट आदि थे. गणेश इंगले ने जिंदाल को डीआरडीओ का वैज्ञानिक बताया. जिंदाल और उस के सहयोगियों, गणेश इंगले आदि को जयपुर के नामी फाइव स्टार होटल में ठहराया गया. इन के जयपुर में टैस्टिंग के लिए आनेजाने और घूमनेफिरने के लिए मर्सिडीज गाडि़यों की व्यवस्था की गई.
जयपुर में आमेर इलाके के एक फार्महाउस पर डांसिंग डौल की टैस्टिंग की सारी तैयारी की गई. जिंदाल और उस के सहयोगियों ने एक बंद कमरे में लैब बनाई. फिर एंटी रेडियोएक्टिव सूट पहन कर कई तरह के उपकरणों और कैमिकलों से डांसिंग डौल की टैस्टिंग की. टैस्टिंग के दौरान कमरे में बनी उस लैब में वैज्ञानिक व उस के सहयोगियों के अलावा किसी को नहीं जाने दिया गया.

इसी बीच टैस्टिंग करते समय उस कमरे में अचानक तेज धमाका हुआ. बाहर खड़े बिजनैसमैन और अन्य लोग अंदर पहुंचे, तो वैज्ञानिक और उस के सहयोगी जमीन पर गिरे पड़े थे. उन्होंने बताया कि जांच के दौरान किसी कैमिकल की मात्रा ज्यादा होने के कारण धमाका हो गया और टैस्टिंग फेल हो गई. बाद में होटल आने के बाद सभी लोग अपनेअपने शहरों को चले गए.

इस के बाद उन व्यापारियों ने गणेश इंगले और सत्यनारायण से फिर संपर्क किया. गणेश ने रेडियोएक्टिव की जांच के लिए फिर से 70 लाख रुपए जमा करा लिए. बाद में कभी दोबारा टैस्टिंग कराने, कभी कैमिकल के नाम पर और कभी वैज्ञानिकों को बुलाने के नाम पर 7 करोड़ रुपए से ज्यादा ले लिए.

हुआ अहसास ठगे जाने का

इतनी बड़ी धनराशि खर्च करने के बावजूद अभी तक उन्हें कुछ हाथ नहीं लगा था. न तो डांसिंग डौल की टैस्टिंग हुई थी और ना ही डीआरडीओ का प्रमाणपत्र मिला था. अब उन्हें डांसिंग डौल 7 हजार करोड़ रुपए प्रति इंच के हिसाब से बिकने की बात में भी कोई दम नजर नहीं आ रहा था. उन्होंने रेनसेल कंपनी की असलियत का पता लगाया तो पता चला कि यह पूरी तरह फरजी है.

एक दिन तीनों बिजनैसमैन ने बैठ कर सब बातों पर विचार किया. काफी विचारविमर्श करने पर उन्हें यह यकीन हो गया कि इंदौर के दिनेश आर्य से ले कर जयपुर के सत्यनारायण और मुंबई की रेनसेल कंपनी के डायरेक्टर गणेश इंगले व पार्टनर अमित गुप्ता वगैरह सब लोग एक ही गिरोह से जुड़े हुए हैं.
इस गिरोह ने उन्हें रेडियोएक्टिव के नाम पर बेवकूफ बना कर लगातार ठगी की थी. इस पर उन्होंने पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराने का फैसला किया.

इसी साल फरवरी के महीने में पुणे के रहने वाले तीनों बिजनैसमैन योगेश सोनी, समीर मोहते और गिरीश सोनी ने जयपुर के जवाहर नगर पुलिस थाने में एक रिपोर्ट दर्ज कराई. इस रिपोर्ट में इन्होंने कहा कि रेडियो एक्टिव पदार्थ की बनी डांसिंग डौल दिखा कर डीआरडीओ और नासा के नाम पर उन से 7 करोड़ रुपए से ज्यादा की ठगी की गई है.

रेडियोएक्टिव पदार्थ परमाणु बम बनाने के काम भी आते हैं. जयपुर में रेडियोएक्टिव पदार्थ होने की जानकारी गंभीर और महत्वपूर्ण थी. इसलिए थानाप्रभारी ने अपने उच्चाधिकारियों को दर्ज हुई रिपोर्ट की जानकारी दी. पुलिस कमिश्नर आनंद श्रीवास्तव को जब इस बात की जानकारी मिली तो उन्हें चिंता हुई कि अगर जयपुर में किसी के पास अवैध रूप से रेडियोएक्टिव पदार्थ है, तो इस से कभी भी जनहानि हो सकती है.

सब बातों पर गंभीरता से विचार कर पुलिस कमिश्नर ने एडिशनल सीपी (क्राइम) प्रसन्न खमेसरा से चर्चा की. इस के बाद उन्होंने इस मामले की जांच के लिए एक पुलिस टीम गठित की. इस टीम में एडिशनल सीपी (स्पैशल क्राइम) विमल नेहरा के नेतृत्व में एक टीम गठित करने का फैसला किया.

इस टीम में सांगानेर थानाप्रभारी लाखन खटाना, बजाज नगर थानाप्रभारी मानवेंद्र सिंह, भट्टा बस्ती थानाप्रभारी शिवनारायण, ब्रह्मपुरी थानाप्रभारी भारत सिंह, आदर्श नगर थानाप्रभारी अरुण कुमार, मालवीय नगर थानाप्रभारी रघुवीर सिंह, मोतीडूंगरी थानाप्रभारी जोगेंद्र सिंह के अलावा कई तेजतर्रार सबइंसपेक्टरों को शामिल किया गया.

व्यापक जांचपड़ताल के बाद जयपुर पुलिस ने 9 मार्च को मुंबई निवासी गणेश इंगले, गाजियाबाद निवासी अमित गुप्ता व राकेश कुमार गोयल, इंदौर के दिनेश कुमार आर्य, जयपुर के सत्यनारायण सहित कुल 18 लोगों को अलगअलग स्थानों से गिरफ्तार कर लिया. पुलिस का कहना है कि रेडियोएक्टिव के नाम पर ठगी करने वाला यह अंतरराष्ट्रीय गिरोह है.

गिरोह में शामिल जिन अन्य आरोपियों को गिरफ्तार किया गया, उन में दिल्ली के कालकाजी निवासी संतोष सिंघानिया, मुंबई के अंधेरी ईस्ट निवासी अमित प्रजापति, उत्तर प्रदेश के सिकंदराबाद निवासी विपिन कुमार राजपूत, संतोष कुमार जाट, वीरेंद्र सैनी, बुलंदशहर के रहने वाले शंकर सिंह, जयपुर के बापू कालोनी निवासी धर्मवीर वाल्मीकि, सेंट्रल जेल के पीछे रहने वाले अब्दुल रईस, कानोता निवासी मनोहर सिंह चौहान, बीकानेर के मधुर मोहन गुप्ता, भीलवाड़ा के उत्तमचंद नौलखा, नागौर के संजयनाथ, झुंझुनूं के राजेंद्र प्रसाद शामिल थे.

ये लोग ठग गिरोह से जुड़ कर गणेश, अमित गुप्ता, सत्यनारायण आदि के लिए ग्राहकों को फंसाने का काम करते हैं. पुलिस की ओर से गिरफ्तार आरोपियों से की गई पूछताछ में जो कहानी उभर कर सामने आई, वह इस तरह है—

नवी मुंबई के घनसोली स्थित अटलांटिस टावर में रहने वाले 41 साल के गणेश इंगले ने अमरावती विश्वविद्यालय से मैकेनिकल इंजीनियरिंग में बीई और मुंबई विश्वविद्यालय से रोबोटिक्स में एमई की डिग्री हासिल की थी. पढ़ाई पूरी करने के बाद इंगले ने भाभा अटौमिक रिसर्च सेंटर में काम किया, लेकिन वहां उस का मन नहीं लगा.

गणेश ने नौकरी छोड़ कर सन 2004-05 में अपने एक पुराने साथी लोलगे के साथ मिल कर सौफ्टवेयर डवलपमेंट एंड ट्रैनिंग का बिजनैस आरंभ किया. ये दोनों इंजीनियरिंग पासआउट विद्यार्थियों को mसौफ्टवेयर डवलपमेंट और ट्रैनिंग के कोर्स करवाते थे. गणेश इंगले ने इस के साथसाथ वह ज्योतिषी बन कर हस्तरेखा देखने का काम भी करने लगा. हालांकि उसे ज्योतिष का कोई ज्ञान नहीं था, लेकिन उस ने लोगों की कमजोरियां जानसमझ कर उन्हें बेवकूफ बनाया और मोटी रकम ऐंठी.

खड़ी हो गई ठग कंपनी

बाद में सन 2016 में गणेश ने गाजियाबाद निवासी अमित गुप्ता के साथ मिल कर रेनसेल एनर्जी एंड मेटल लिमिटेड नाम की कंपनी बनाई. इस कंपनी का औफिस मुंबई के बांद्रा कुर्ला में खोला गया. इस कंपनी में गणेश डायरेक्टर बना और अमित गुप्ता रिलेशनशिप मैनेजर कम पार्टनर था.

अमित की भतीजी शिवानी गुप्ता को कंपनी में सेके्रट्री बनाया गया. इस कंपनी के माध्यम से गणेश व अमित ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर न्यूक्लियर प्रोटेक्शन, न्यूक्लियर वेस्ट मैनेजमेंट और सोलर एनर्जी के क्षेत्र में ट्रेडिंग और सर्विस का काम शुरू किया.

लोगों को झांसा देने और दिखावे के तौर पर इन्होंने अपनी कंपनी में ओलगा नामक व्यक्ति को एनवायरमेंटल इकोनोमिस्ट, एलेक्स फाल्कन को रेनसेल वेबमास्टर, पीटर मार्गन को अकेडमिक इंगेजमेंट मैनेजर, सांदरा को रिसर्च असिस्टेंट बना रखा था. वास्तव में इन चारों के ये नाम फरजी थे और इन नामों के कोई व्यक्ति कंपनी में नहीं थे.

गणेश और इंगले ने जोड़जुगत कर के वर्ल्ड न्यूक्लियर एसोसिएशन की सदस्यता भी हासिल कर ली थी. इस एसोसिएशन का कार्यालय यूके में सेंट्रल लंदन में है. इस सदस्यता के आधार पर दोनों ने 2017 में लंदन में आयोजित वर्ल्ड न्यूक्लियर एसोसिएशन सिंपोजियम में हिस्सा लिया.

इस आयोजन में इन की मुलाकात इकेटेरिना नामक महिला से हुई. दोनों ने इकेटेरिना को अपने झांसे में लिया और अपनी कंपनी रेनसेल का यूके का डायरेक्टर बना दिया. इकेटेरिना बाद में भारत भी आई थी.
लंदन में हुई इसी सिंपोजियम में गणेश व अमित की मुलाकात टिटियाना साइलाबस नामक बुल्गारियन महिला से भी हुई थी. यह महिला बुल्गारिया की एनआरडब्ल्यू नामक कंपनी में पार्टनर थी. गणेश और अमित ने इस महिला से यह टाईअप किया कि न्यूक्लियर वेस्ट मैनेजमेंट से संबंधित कोई कार्य भारत में रेनसेल कंपनी को मिलता है, तो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वह उन का साथ देंगी. बाद में टिटियाना साइलाबस भी भारत आई थी.

ठगी के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बनाई पहचान

यूके के सेंट्रल लंदन में पिछले साल आयोजित ग्लोबल न्यूक्लियर इनवेस्टमेंट समिट में भी गणेश और अमित ने भाग लिया था. इस समिट में दुनियाभर की लगभग 100 कंपनियों के प्रतिनिधि शामिल हुए थे.
जून 2018 में गणेश और अमित ने फ्रांस के पेरिस शहर में आयोजित वर्ल्ड न्यूक्लियर एक्जीबिशन में भी हिस्सा लिया. स्पेन के मैड्रिड शहर में आयोजित वर्ल्ड न्यूक्लियर फ्यूल साइकल 2018 के आयोजन में भी दोनों ने भागीदारी की.

ये लोग इंदौर के विजय नगर निवासी दिनेश आर्य के मार्फत ग्राहकों को फांसने का काम करते थे. दिनेश के जरिए ही गणेश इंगले जयपुर के सत्यनारायण के संपर्क में आया था. अमित गुप्ता लगातार सत्यनारायण के संपर्क में रहता था और जयपुर आताजाता रहता था.

पुणे के बिजनैसमैनों को बेवकूफ बनाने के लिए गणेश इंगले खुद भी जयपुर आया था. ये लोग अपने शिकार पर प्रभाव जमाने के लिए फाइव स्टार होटलों में रुकते थे और मर्सिडीज जैसी प्राइवेट लग्जरी कारें किराए पर मंगा कर उपयोग में लाते थे. पिछले साल जुलाई में डांसिंग डौल की टैस्टिंग के नाम पर जयपुर के आमेर इलाके में ड्रामा किया गया था. इस ड्रामे में जिंदाल नामक जिस आदमी को डीआरडीओ का वैज्ञानिक बना कर लाया गया, वह सत्यनारायण का परिचित था.

गणेश इंगले की कंपनी रेनसेल एनर्जी एंड मेटल द्वारा डीआरडीओ, नासा और वर्ल्ड न्यूक्लियर एसोसिएशन के नाम पर फरजी दस्तावेजों का इस्तेमाल कर के लोगों से करोड़ोंअरबों रुपए ठगने की बात पता चली है. पुलिस का दावा है कि इस गिरोह ने जयपुर, दिल्ली व हैदराबाद सहित देश के हिस्सों में लोगों से 300 से 400 करोड़ रुपए तक की ठगी की है.

जयपुर पुलिस ने गिरोह के सदस्यों से 10 लाख रुपए नकद, डीआरडीओ के फरजी लेटरपैड, कथित कैमिकल टैस्टिंग रिपोर्ट और एंटी रेडियोएक्टिव की नकली ड्रेस बरामद की है. पता चला है कि रेनसेल कंपनी ने इजरायल से साढ़े 3 लाख रुपए प्रति नग के हिसाब से 2 एंटी रेडियोएक्टिव सूट खरीदे थे. इन सूटों को दिखा कर ये लोग अपने शिकार को रेडियोएक्टिव की खरीदफरोख्त के लिए फांसते थे.
गिरोह की ओर से अंग्रेजों के जमाने की ईस्ट इंडिया कंपनी की जिस डांसिंग डौल का सौदा ग्राहकों से किया जाता था, वह साधारण लकड़ी की बनी हुई थी, जिसे फिश एक्वारियम में रखा हुआ था. इस डांसिंग डौल को दिखा कर यह गिरोह कई लोगों से ठगी कर चुका है.

जयपुर निवासी सत्यनारायण 2 दशक पहले तक जयपुर नगर निगम में कर्मचारी था. बाद में उस ने सरकारी नौकरी छोड़ दी. अब उस ने जवाहर सर्किल के पास औफिस खोल रखा था. जहां वह जादूटोने, स्टोन, मालाएं, पेंटिंग्स, कैमिकल और एंटीक आइटम्स के नाम पर लोगों से ठगी करता था.

उस के औफिस में हर समय कई एजेंट बैठे रहते थे. सत्यनारायण ने कई शादियां कर रखी हैं. उस ने एक पत्नी के नाम पर आयुर्वेद की फर्म भी रजिस्टर करवा रखी है. इस फर्म के जरिए वह चमत्कारी दवाओं के नाम पर लोगों से ठगी करता था. जयपुर में उसके कई मकान हैं.

पुलिस इस गिरोह के बारे में नए तथ्य जुटाने में लगी है. यह विडंबना है कि पैसे वाले लोग मोटे मुनाफे के लालच में गणेश, अमित और सत्यनारायण जैसे ठगों के चक्कर में फंस जाते हैं. पुलिस मामले की जांच कर रही है.

पन्नूराम का पश्चात्ताप

सांप के आकार वाली पहाड़ी सड़क ढलान में घूमतेघूमते रूपीन और सुपीन नदियों के संगम पर बने पुल को पार करते हुए एक मोड़ पर पहुंचती है. वहां सदानंद की चाय की दुकान है, जहां आतेजाते पथिक बैठ कर चाय पीते हुए दो पल का विश्राम ले लेते हैं. दुकान पर आने वाले ग्राहकों के लिए पन्नूराम दिनभर बैंच पर बैठा रहता. उस के बाएं हाथ की कलाई से हथेली और पांचों उंगलियां गायब थीं. चाय पीते राहगीर पन्नूराम से उस के बाएं हाथ के बारे में पूछते तो वह अपने पर घटी दुर्घटना की आपबीती सुनाता.

दोनों नदियों के संगम से निकला हुआ सोता चट्टानों के बीच तंग हो कर नीचे की तरफ बहता है. उसी के बाएं किनारे पर खड़े सेमल के पेड़ की ओर इशारा करते हुए पन्नूराम बोलता : ‘‘उस सेमल के नीचे बैठ कर मैं कंटिया से दिनभर मछली पकड़ता था. तरहतरह की मछलियां, महाशीर, टैंगन, शोल, काली ट्राउट आदि सोते के पानी की विपरीत दिशा में आती थीं. दिनभर कंटिया में मछलियों का चारा लगा कर बैठा रहता और मछलियों का अच्छाखासा शिकार कर लेता था. परिवार वाले बहुत प्रसन्न थे. रूपीन व सुपीन नदियों की मछलियों का स्वाद ही कुछ अलग था.’’

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एक हाथ से पकड़ी चाय की प्याली से घूंट भरते हुए पन्नूराम अपनी कहानी जारी रखता : ‘‘तब गांव में आबादी काफी कम थी. आहिस्ताआहिस्ता सभी को रूपीन व सुपीन नदियों की मछलियों के अनोखे स्वाद के बारे में पता लग चुका था. चूंकि वर्षाकाल आते ही मछलियों के पेट अंडे से भर जाते थे और वर्षा ऋतु की समाप्ति तक मछलियां पानी के अंदर उगे घास, पत्ते व पत्थरों के बीच अंडे देती थीं, इसलिए उन दिनों गांव के लोग मछलियों के वंश की रक्षा के लिए उन्हें खाना बंद रखते थे. मैं भी मछली का शिकार बंद कर देता था.’’ गले की खराश को बाहर थूकते हुए पन्नूराम अपनी कहानी जारी रखता…

‘‘5 साल पहले मल्ला गांव के ऊपरी ढलान पर, जहां रूपीन नदी का स्रोत ढलान से बहते हुए झरने के रूप में गिरता है, वहां पनबिजली संयंत्र लगाने के लिए सरकारी योजना बनी. पहाडि़यों के ऊपर कृत्रिम जलाशय बनाने के लिए चीड़ के जंगल की कटाई शुरू हो गई तो इलाके में लकड़ी के ठेकेदार, लकडि़यों की ढुलाई के लिए ट्रक चालकों और लकड़ी काटने व चीरने में लगे मजदूरों की चहलपहल बढ़ती गई. बाहरी लोगों को भी स्थानीय लोगों से रूपीन व सुपीन नदियों की मछलियों के अनोखे स्वाद के बारे में जानकारी मिली.

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‘‘अब आएदिन पकड़ी हुई मछलियों का सौदा करने के लिए लोग मेरे पास आने लगे. अपनी जरूरत से अधिक पकड़ी हुई मछलियों को मैं ने बेचना शुरू कर दिया. कुछ पैसे मिले तो घर की आमदनी बढ़ने लगी. इस तरह हर रोज मछलियों की मांग बढ़ती गई. कंटिया से पकड़ी मछलियों से मांग पूरी नहीं हो पाती थी. अच्छीखासी कमाई होने की संभावना को देखते हुए मैं अधिक मछली पकड़ने के उपाय की तलाश में था.’’

इसी बीच रामानंद ने कहानी सुनने वाले ग्राहकों के आदेश पर उन्हें और पन्नूराम को गरम चाय की एकएक प्याली और थमाई. गरम चाय की चुस्की लगाते हुए पन्नूराम ने अपनी कहानी जारी रखी… ‘‘एक दिन लकड़ी के ट्रकों में आतेजाते एक ठेकेदार ने कंटिया के बजाय जाल का इस्तेमाल करने की सलाह दी. यही नहीं उस ठेकेदार ने मछली पकड़ने का जाल भी शहर से ला दिया. जाल देते समय उस की शर्त यह थी कि मैं रोजाना उस को मुफ्त की मछली खिलाता रहूं. ‘‘जहां पर चट्टानों के बीच संकरा रास्ता था वहां मैं ने संगम से निकले सोते में खूंटों के सहारे जाल को इस प्रकार से डाला जिस से पानी से कूदती हुई मछलियां जाल में फंस जाएं. यह तरीका अपनाने के बाद पहले से दोगुनी मछलियां पकड़ में आने लगीं. परिवार की कमाई भी बढ़ गई.’’

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चाय के प्याले से अंतिम घूंट लेते हुए पन्नूराम ने फिर से कहना शुरू किया : ‘‘जाल से मछली पकड़ना आसान हो गया. परिवार का कोई भी सदस्य बीचबीच में जा कर फंसी हुई मछलियों को पकड़ लाता. रोजगार बढ़ाने की इच्छा से पहाडि़यों के ऊपर डायनामाइट से पत्थरों को तोड़ कर मैं रूपीन नदी में कृत्रिम जलाशय बनाने के काम में लग गया. धीरेधीरे विद्युत परियोजना के कार्यों के लिए मल्लागांव में लोगों की भीड़ जमा होती गई और इसी के साथ रूपीन व सुपीन की स्वादिष्ठ मछलियों की मांग बढ़ती गई. मछलियों की मांग इतनी बढ़ी कि उसे जाल से पूरा करना संभव नहीं था. ‘‘मैं और अधिक मछली पकड़ने के तरीके की तलाश में था. इसी बीच जल विद्युत परियोजना के लिए बड़ेबड़े ट्रकों और संयंत्रों के आवागमन, पहाड़ी सड़क की चौड़ाई बढ़ाने और डामरीकरण में लगे पूरब से आए मजदूरों में से रामदीन के साथ मेरी दोस्ती हो गई.

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बातोंबातों में एक दिन मैं ने रामदीन को अपनी समस्या बताई. सब सुन कर वह बोला, ‘यार, यह तो काफी आसान कार्य है. जाल से नहीं… डायनामाइट से मछली मारो. देखना, मछली का शिकार कई गुना अधिक हो जाएगा.’ ‘‘रामदीन की बात सुनते ही मेरे पूरे शरीर में सिहरन सी होने लगी. मैं डायनामाइट से पत्थर तोड़ने के काम में लगा ही था. अत: एकआध डायनामाइट चुरा कर मछली मारना मुझे खासा आसान लगा था. फिर एक दिन शाम को काम से छुट्टी के बाद मैं रामदीन के साथ चुराए हुए डायनामाइट को ले कर मछली के शिकार के लिए चल पड़ा.

‘‘एक समतल जगह पर चट्टानों के बीच नदी का पानी फैल कर तालाब सा बन गया था. वहां किनारे पर खड़े हम मछलियों के झुंड की प्रतीक्षा कर रहे थे. तालाब का पानी इतना स्वच्छ था कि तलहटी तक सबकुछ साफ दिखाई दे रहा था. जैसे ही मछलियों का एक झुंड बहते पानी से स्रोत के विपरीत दिशा में तैरता हुआ दिखाई दिया रामदीन ने डायनामाइट में लगी हुई सुतली में आग लगाई और झुंड के नजदीक आने का इंतजार करने लगा. मुझे तो डर लग रहा था कि डायनामाइट कहीं हाथ में ही न फट जाए लेकिन रामदीन ने ठीक समय पर जलते हुए डायनामाइट को पानी में फेंका और देखते ही देखते एक विकट सी आवाज के साथ ऊपर की ओर पानी को उछालते हुए डायनामाइट फटा.

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‘‘धमाका इतना तेज था कि चट्टानों के पत्थरों के बीच से कंपन का अनुभव होने लगा. तालाब में छोटी, बड़ी और मझोली सभी तरह की मछलियां, यहां तक कि पानी की तलहटी में रहने वाले केकड़े, घोंघा आदि भी पानी की सतह पर तड़पते नजर आने लगे. तालाब में तड़पती मछलियों का ढेर देख कर मैं खुशी से भर उठा. रामदीन की सहायता से तड़पती हुई मछलियों को पकड़ लिया. उस दिन मछलियों से आमदनी पहले की अपेक्षा दस गुना अधिक हो गई.’’

एक लंबी सांस लेने के बाद पन्नूराम ने कहना शुरू किया : ‘‘रामदीन भी अच्छा मछुआरा था. उस को मछलियों की काफी जानकारी थी. मछली मारने के लिए नईनई जगह की तलाश करना तथा मछलियों के आवागमन के प्रति नजर रखने का काम रामदीन ही करता था. मैं डायनामाइट ले कर रामदीन के इशारे का इंतजार करता था और इशारा मिलते ही सुलगते हुए डायनामाइट को ऐसा फेंकता कि पानी की सतह स्पर्श करते ही फट जाए. बहुत खतरनाक कार्य था, लेकिन अधिक पैसा कमाने के इरादे से खतरे को नजरअंदाज कर दिया.

‘‘उन दिनों जब मछलियां गर्भधारण से ले कर प्रजनन का कार्य करती हैं, उन का शिकार बंद नहीं किया. इस से मछलियों के छोटेछोटे बच्चे समाप्त होते गए. एक बार काफी बड़ी महाशीर मछली डायनामाइट से घायल हो कर पकड़ी गई. मैं ने जब उसे उठाया तो उस का पेट अंडों से भरा था. मुझे लगा कि मछली मुझे बताने की कोशिश कर रही थी, ‘मेरे साथसाथ हजारों बच्चों का भी तुम लोग विनाश कर रहे हो. हम तो उजड़ ही जाएंगे, तुम्हारा भविष्य भी खतरे में है.’ तब मैं मन ही मन सोच रहा था कि महाशीर के स्वादिष्ठ अंडों से भी अच्छीखासी कमाई हो जाएगी.’’

दुकान पर बैठे ग्राहकों की ओर तिरछी नजरों से देखते हुए पन्नूराम ने महसूस किया कि वे मछलियों के कत्लेआम से कातर हो रहे थे. अपने द्वारा मछलियों पर किए गए अत्याचार को सही साबित करते हुए पन्नूराम कहता, ‘‘क्या करें, हमें भी तो पेट पालना था. गांव में रोजीरोजगार का दूसरा कोई भी जरिया नहीं था जिस से हम मछलियों के ऊपर रहम करते हुए जीविका का कोई और साधन अपना लें. मछली मारने से हुई मेरी आर्थिक तरक्की को देख कर अन्य गांव वालों ने भी डायनामाइट के जरिए मछली मारना शुरू कर दिया. देखते ही देखते रूपीन व सुपीन नदियां रणक्षेत्र बन गईं. मछलियां कम होती गईं. अंत में तो ऐसा हुआ कि स्रोतों में कीड़े तक नहीं दिखाई देते थे.

मछली से आमदनी कम होती गई तो मैं चिंतित हो उठा. अब घर चलाने का जरिया क्या होगा? मछलियों के झुंड ढूंढ़ने के लिए नदी के किनारेकिनारे मुझे मीलों तक जाना पड़ता था. कमाई कम होते ही रामदीन अपने गांव वापस चला गया. ‘‘सावन के महीने में एक दिन बारिश की धारा अनवरत बह रही थी. दिनभर की खोज के बाद शाम के समय काफी दूर से मछलियों का एक झुंड आता दिखाई दिया. अपनी उत्तेजना को वश में रखने के लिए मैं दाएं हाथ में जलती बीड़ी से कश मारते हुए बाएं हाथ में सुलगता डायनामाइट पकड़े मौके का इंतजार करता रहा. महीनों बाद पानी के स्रोत में तैरती मछलियों का झुंड देख कर मैं इतना खुश हुआ था कि मानो खुली आंख से कोई सपना देख रहा हूं. हिसाब लगा रहा था कि इतने बड़े झुंड से कितनी कमाई होगी. परिवार की आवश्यकताएं तो पूरी हो जाएंगी साथ ही कुछ पैसा भविष्य के लिए भी बच जाएगा. थोड़ी देर में जब देखा तो मछली का झुंड आ चुका है. मैं ने त्वरित गति से अपनी कार्यवाही की… लेकिन डायनामाइट का धमाका नहीं निकला.

परेशान हो कर अपनी बंद आंखें खोल कर जब देखा तब तक डायनामाइट मेरे बाएं हाथ को धम से उड़ा कर ले जा चुका था. सपने में लीन मैं अपने दाहिने हाथ की सुलगती हुई बीड़ी को फेंक कर समझ रहा था कि मैं ने डायनामाइट फेंक दिया.’’ अपनी पूरी कहानी सुनाने के बाद स्वाभाविक होने पर पन्नूराम दोहराता, ‘‘मछलियों की आंसू भरी कातर आखें मुझे सताती रहती हैं. मैं अपने सीने में एक असहनीय पीड़ा अनुभव करते हुए आज भी मूर्छित हो जाता हूं. अपराधबोध से अपनी आत्मा की मुक्ति के लिए रोजाना मैं सहृदय पथिक को आपबीती कहानी सुना कर पश्चात्ताप करता रहता हूं…

कम से कम सुनने वाला पथिक ऐसे कुकृत्य से बचा रहे.’’ सदानंद को पन्नूराम की कहानी में कोई दिलचस्पी नहीं थी. उस के फायदे की बात यह थी कि सुनने वाले राहगीर कहानी सुनतेसुनते एक के बजाय कई प्याली चाय पी जाया करते थे…पन्नूराम की कहानी से सदानंद की आमदनी में बढ़ोतरी होती रही और…सदानंद ने पन्नूराम की दिनभर की चाय मुफ्त कर दी.

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