जानें ब्राजीलियन मौडल व भारतीय अभिनेत्री नतालिया कौर को भारत से क्यूं है इतना प्रेम

यदि कुछ भारतीय कलाकार हौलीवुड जाकर काम करने के दीवाने हैं, तो वहीं पिछले कुछ वर्षों से विदेशी कलाकारों को बौलीवुड अपनी तरफ आकर्षित करता रहा है. ब्राजीलियन मौडल नतालिया कौर (Nathalia Kaur) (पूरा व असली नाम-नतालिया पिनहेइरो फिलिप मार्टिंन्स) 2012 से बौलीवुड व दक्षिण भारतीय फिल्मों में अभिनय करते हुए खुद को भारतीय अभिनेत्री कहने लगी हैं. वैसे भी नतालिया की जड़ें भारत से जुड़ी हुई हैं. नतालिया के दादा जी पंजाबी यानी कि भारतीय और दादी पुर्तगाली थीं. 2012 में एक मौडलिंग के लिए ही तीन माह के लिए भारत आयी थी. यहां उन्हे मौडलिंग के साथ ही कन्नड़ फिल्म ‘‘देव सन आफ मुद्डे गौड़ा’’ मिली, उसके बाद ‘डिपार्टमेंट’ सहित कुछ हिंदी फिल्मों में वह स्पेशल अपियरेंस के रूप में अभिनय करती रही. पर अब वह फिल्म ‘‘गंस औफ बनारस’’ (Guns of Banaras) में हीरोईन बनकर आ रही है, जो कि 28 फरवरी को रिलीज होगी.

प्रस्तुत है उनसे हुई एक्सक्लूसिब बातचीत के अंश –

आप ब्राजील में मौडलिंग कर रही थी. फिर आपने ब्राजील को छोड़कर भारत, मुंबई और बौलीवुड में करियर बनाने की बात क्यों सोची?

– मैं हमेशा कहती हूं कि मैने भारत या मुंबई को नहीं चुना, बल्कि भारत ने मुझे चुना. मैं पहली बार ब्राजील से बाहर मौडलिंग के लिए तीन माह के लिए भारत आयी थी. पर यहां पर मुझे मौडलिंग का इतना काम मिला कि मैं दो वर्ष के लिए रूक गयी. इन दो वर्षों में मुझे भारत और भारतीयों से प्यार हो गया. यहां मुंबई की फिल्म इंडस्ट्री, यहां जिस तरह से फिल्में बनती हैं, जिस तरह से लोग काम करते हैं, वह सब मेरे लिए किसी सपने से कम नहीं था. यह सब बहुत अमेजिंग लगा. मुझे लगा कि मैं वंडरलैंड पहुंच गयी हूं. बहुत खूबसूरत देश है. ऐसा लगता है जैसे कि हम जगते हुए दिन में सपना देख रहे हों.

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हम कलाकार के तौर पर कई लोगों के सपनों को परदे पर संजोते हैं. जब लोग फिल्मी परदे पर आपको देखते हैं, तो आप किसी न किसी रूप में लोगों की जिंदगी का हिस्सा बन जाते हैं. हम लोगो का सिर्फ मनोरंजन ही नहीं करते हैं, बल्कि उनकी जिंदगी में घुसकर उनकी जिंदगी को बेहतर बनाने का भी काम करते हैं. यह सब मेरे लिए भी प्रेरणा दायक रहा.

आपको बौलीवुड में अभिनेत्री के तौर पर काम करते देखकर आपकी मां की प्रतिक्रिया?

– मेरी मां को भारत से अगाध प्यार है. जब मैने ब्राजील छोड़ा था, तब वह काफी दुःखी हुई थीं. मुझसे ज्यादा वह दुःखी थीं. लेकिन कुछ दिनों बाद मेरे साथ ही मेरी मां को भी अहसास हुआ कि हमारे ब्राजील की बनिस्बत भारत ज्यादा सुरक्षित है. अब मेरी मां को लगता है कि मुंबई व भारत में रहते हुए मैं ज्यादा सुरक्षित हूं. मैं यह सच पूरी इमानदारी से कबूल कर रही हूं. मैं जब कहीं और जाती हूं, तो वह परेशान व चिंताओं से घिरी रहती है, मगर जब मैं मुंबई या भारत में रहती हूं, तो वह मानसिक रूप से संतुष्ट और शांत रहती हैं. वह भारत से प्यार करती है. जिस तरह से भारत के लोग मेरे साथ व्यवहार करते हैं या पेश आते हैं, वह सब उन्हे अच्छा लगता है. उन्हे मेरा काम पसंद आ रहा है. मेरे भारत में रहने से वह सबसे अधिक खुश हैं.

आपको या आपकी मां को यह क्यों लगता है कि आप अपने देश या वतन ब्राजील की बनिस्बत भारत में ज्यादा सुरक्षित हैं?

– हर भारतीय हर इंसान का बड़ी गर्मजोशी के साथ स्वागत करते हैं. वह हम दूसरे देश के लोगों के साथ भी प्राकृतिक रूप से और नेच्युरली बहुत अच्छे ढंग से पेश आते हैं. देखिए अच्छे और बुरे इंसान तो हर जगह हो सकते हैं. यह प्रकृति का नियम है. मगर भारत में बुरे इंसानों की बनिस्बत अच्छे इंसान ज्यादा हैं. मुंबई में मैं इस टेबल पर अपना मोबाइल फोन रखकर वौशरूम तक जाकर आउंगी, तो भी मोबाइल फोन गायब नही होगा, मगर ब्राजील में मैं बैठी रहूंगी, इसके बावजूद टेबल से कब व कैसे मोबाइल फोन गायब हो जाएगा, पता ही नहीं चलेगा. यहा लोग काफी दयालु है. यहां हम जैसे हैं, वैसे ही रह सकते हैं. हमें दिखावा करने या कुछ भी छिपाने की जरुरत नहीं. यहां स्वार्थी लोग कम हैं. यहां के लोग हमेशा आपके बारे में सोचते हैं. यहां के लोग हमेशा इस बात का ख्याल रखते हैं कि आप क्या चाहते हैं, आपकी पसंद का भी ख्याल रखते हैं.

आपको भारत में सबसे ज्यादा क्या पसंद है?

– यहां के लोग. मेरा मानना है कि यहां के निवासियों ने ही भारत को खास देश बना रखा है.

मौडलिंग में शोहरत मिलने के ही चलते आपको अभिनय को करियर बनाने का अवसर मिला?

– ऐसा आप कह सकते हैं. एक्च्युअली लोग मुझसे यह सवाल बार बार करते हैं. मेरी समझ में नही आता कि ऐसा सवाल मुझसे बार बार क्यों किया जाता है? मैने कई बार बताया है कि बचपन में मैं अपनी सहेलियों से कहती थी कि मुझे डौक्टर बनना है या मुझे इंजीनियर बनना है. मैं शिक्षक व वकील भी बनना चाहती थी. आज आपसे इमानदारी के साथ कबूल कर रही हूं कि मुझे खुद नही पता था कि मुझे क्या बनना है. मैं पूरी तरह से कन्फ्यूज्ड थी. इसलिए मैं बार बार अपनी पसंद बदलती रहती थी. पर मुझे अंदर से लगता था कि मैं बहुत कलात्मक इंसान हूं. मैं गाती थी. मैं बहुत ही ज्यादा संजीदा लड़की रही हूं. मुझे अंदर से लगता था कि शायद मैं कला से जुड़ा हुआ काम करुंगी. लेकिन उन दिनों बहुत शर्मीली किस्म की लड़की थी.

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आज लोग जब मुझसे मिलते हैं, तो वह कल्पना भी नही कर सकते कि मैं कभी शर्मीली थी. क्योंकि अब मैं बहुत बोलती हूं. अब मैं सुबह उठकर हर इंसान से बात करना चाहती हूं. जबकि वह दिन भी थे, जब मैं सुबह उठने के बाद किसी से भी बात करना पसंद नहीं करती थी. पर अब लोग मुझे देखकर समझ ही नहीं सकते कि मैंं कभी बहुत शर्मीली लड़की थी. अब अभिनय को करियर बनाने के बाद मैं काफी जिम्मेदार भी हो गयी हूं. निश्चित रूप से मैं हमेशा अभिनय पसंद करती थी. मैने अभिनय की ट्रेनिंग भी ली है. नृत्य करती थी. मैं यह भी जानती थी कि मेरा व्यक्तित्व करिश्मायी है. मैं यह भी जानती थी कि एक बार पब्लिक फिगर बनने के बाद मैं खुद को सीमित नहीं कर सकती. अब हमें हर किसी से बात करनी होती है. हम किसी के साथ भी रूडली या गुस्से में या गलत ढंग से बात नही कर सकते. अब मैं जिस पेशे में हूं. उसमें यदि आप मुझसे परिचित हैं और आप मेरे घर आते हैं, तो मैं यदि मूड़ में नहीं हूं और आपसे बात नही करना चाहती, मुस्कुराकर आपका स्वागत नही करना चाहती, तो भी मुझे अपने अंदर जबरन बदलाव लाकर आपके सामने मुस्कुराना होगा, आपसे अच्छे ढंग से बात करनी ही होगी.

इस जिम्मेदारी का अहसास हो चुका है. मुझे लगता है कि आप मेरी बात समझ रहे हैं. पर वह दिन भी थे, जब मैं बहुत ही ज्यादा आत्मकेंद्रित थी. जबकि कुछ लोग हर दिन फुल औफ एनर्जी के साथ सुबह अपने बिस्तर से उठते हैं. शायद यह वजह रही होगी कि मैंने पहले कभी नहीं कहा कि मुझे अभिनय में करियर बनाना है. इसके अलावा जब आपके सामने कोई बेहतरीन मौका आता है, तो आप उसे खोना भी नहीं चाहते. उस वक्त आप उस काम को न सिर्फ करते हैं, बल्कि अपनी तरफ से सर्वश्रेष्ठ देने का प्रयास करते हैं. ऐसा ही कुछ मेरे साथ हुआ और मुझे खुशी है कि मैं उसे करने में सफल रही हूं. अब मैं जो कर रही हूं, उस पर मुझे गर्व है. मुझे लगता है कि मैं इससे अच्छा कुछ भी नहीं कर सकती थी. मैं अब यह नहीं कह सकती कि मैं इस तरह से अभिनय नही कर सकती. कलाकार के तौर पर हमें हर तरह के किरदार निभाने ही होते हैं. मुझे लगता है कि ईश्वर ने ही मुझे अभिनय करने के लिए चुना है. मुझे खुशी है कि मैं कई तरह के बैरियर को तोड़ने में सफल हुई हूं.

आप किस फिल्म को अपने कैरियर के लिए टर्निंग प्वाइंट मानती हैं?

– मुझे लगता है कि शीघ्र प्रदर्शित होने वाली मेरी फिल्म ‘‘गंस आफ बनारस’’ है. इसमें मेरा फुल फ्लेज्ड या पूर्णरूपेण किरदार था. मैने इस फिल्म में लीड रोल निभाया था. जो कि हिंदी भाषी भारतीय लड़की है. इससे पहले लोगों ने मुझे बहुत ही ज्यादा अंडर एस्टीमेट किया था. लोगों ने उससे पहले एक लंबी चौडी विदेशी लड़की के रूप में ही मुझे आंका. वह मुझे सिर्फ फिल्म में ग्लैमरस टच देने के लिए जोड़ते थे. मेरा मानना है कि किसी को भी मुझे ही नहीं किसी भी कलाकार को अंडर एस्टीमेट या कमतर नहीं आंकना चाहिए. क्योंकि आपको नहीं पता किसके अंदर क्या दबा हुआ है और कब वह ज्वालामुखी बनकर फूट पड़ेगा. उसे एक अच्छे मौके की तलाश रहती है.

एक कलाकार की यही खूबी है कि चुनौती पूर्ण किरदार मिलने पर वह अपने अंदर का गुबार उस किरदार के साथ सामने ला देता है. मैं बहुत अलग अलग तरह के किरदार निभा सकती हूं, पर पता नहीं क्यों फिल्मकार ऐसा नहीं सोचते. आप खुद अंदाजा लगा ले कि ब्राजीलीयन लड़की, जिसकी मातृभाषा पुर्तगीज है, वह बनारस की लड़की बनकर शुद्ध हिंदी बोलती है. मैं एक कलाकार हूं और हर फिल्म के किरदार में मैं खुद को खो देना चाहती हूं. ‘गंस आफ बनारस’ में मैं पूरी तरह से बनारस की लड़की बन गयी.

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फिल्म ‘‘गंस आफ बनारस’’ के किरदार को कैसे डिफाइन करेंगी?

-मैंने इसमें धार्मिक नगरी बनारस में रहने वाली, भारतीय संस्कृति में आकंठ डूबी तथा सशक्त लड़की हेमा का किरदार निभाया है. उसका अपना अलग व्यक्तित्व है. उसे पता है कि उसे क्या चाहिए. उसके अंदर भोलापन है. जबकि इन दिनों हर लड़की के चेहरे से भोलापन गायब हो चुका है. उसकी अपनी सोच है. वह वही करती है, जो उसे करना है.

आपको लगता है कि नृत्य/डांस ने आपकी बैरियर तोड़ने में मदद की?

– आपने बहुत बुद्धिमत्ता पूर्ण सवाल किया है. मुझे डांस का शौक रहा है. मैं बौलीवुड फिल्मों में नृत्य देखकर काफी प्रभावित हुई थी. जब मैने डांस करना सीखना शुरू किया, तो डांस करते समय हमें चेहरे पर एक्सप्रेशन और भाव भी लाने पड़ते थे. क्योंकि मैं जो भी करती हूं, उसमें मैं अपनी तरफ से सौ प्रतिशत देती हूं. डांस की वजह से ही मेरी झिझक और शर्मीलापन खत्म हुआ. जैसा कि आपने कहा मुझे डांस ने कई बैरियर खत्म करने में मदद की. कई बार हम काफी कुछ जानते हैं, पर करना नही चाहते. मुझे खुशी है कि मैने डांस करना शुरू किया. डांस करते हुए मैंने काफी चीजें सीखीं. मैने सीखा कि अपने आपको किस तरह से एक्सप्रेस किया जाए. आप किस तरह अच्छे ढंग से बाते करें. किस तरह आप अपनी बैड लैंगवेज या खराब भाषा पर अंकुश लगाएं. सब कुछ आपके शरीर से जुड़ा होता है और किस तरह आप अपने शरीर को मैनेज करें.

आपकी बौडी लैंगवेज बहुत कुछ कह जाती है. मैने डांस से सीखा कि मैं अपने आपको कैसे पढूं, और किस तरह अपने आपको मैं समझ कर एक्सप्रेस कर सकूं. डांस से मैंने अपने शरीर को समझना सीखा. बौडी लैंगवेज से हम साठ प्रतिशत अभिनय कर लेते हैं. अपनी बौडी लैंगवेज को बदलना आप डांस करके ही सीखते हैं. मेरे कहने का अर्थ यह नही है कि इससे आप सर्वश्रेष्ठ डांसर बन जाते हैं. आपको डांस करना नापसंद हो, तो भी आपको एक बार सीखने का प्रयास करना चाहिए. इससे आपको बहुत कुछ समझ में आता है. जी हां! डांस कई तरह से आपको एक इंसान और एक कलाकार के रूप में विकसित करता है.

आप सोशल मीडिया पर क्या लिखना पसंद करती हैं?

– मुझे अपनी निजी जिंदगी पर बात करना पसंद नहीं. इसलिए सोशल मीडिया पर भी निजी जिंदगी को लेकर कुछ भी पोस्ट नहीं करती. मगर मैं अपने काम को लेकर ही सोशल मीडिया पर भी बाते करती हूं. मैं अति संजीदा इंसान हूं. मैं कभी नहीं चाहती कि मेरी वजह से किसी की भी भावनाएं आहत हों. मैं लेखन के मसले पर खुद को काफी मैच्योर मानती हूं. कुछ लोग सोशल मीडिया पर लिखते समय इस बात की कल्पना नही करते है कि उनके इस लेखन से क्या पैदा होने वाला है.

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पोस्टर वार के साथ चुनावी सरगर्मी

बिहार में मौसम के मिजाज के साथसाथ राजनीतिक चुनावी तापमान भी बढ़ने लगा है और राजनीतिक दलों द्वारा एकदूसरे पर पोस्टर वार जारी है.

साल 2020 में बिहार राज्य में विधानसभा चुनाव होने वाला है. शहर से ले कर गंवई इलाकों तक में चुनाव की गरमाहट के साथसाथ इस बार किस की सरकार बनेगी यह चर्चा जोरों पर है.

सरकार का पोस्टर वार

सब से पहले जनता दल (यूनाइटेड) के प्रदेश कार्यालय के बाहर होर्डिंग लगाया गया, जिस में यह दिखाया गया, ‘क्या करें विचार ठीके तो हैं नीतीश कुमार’, वहीं एक और होर्डिंग पर लिखा था, ‘चलो नीतीश के साथ चलें’.

देशी अंदाज में पोस्टर के जरीए लोगों को सम झाने की कोशिश की गई कि जब नीतीश कुमार हैं ही, तो दूसरे के नाम पर विचार क्यों करना है.

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चुनावी साल का आगाज दूसरे इस पोस्टर के साथ हुआ. पटना की कई बड़ी सड़कों पर इस तरह के पोस्टर जनता दल (यू) की तरफ से लगाए गए हैं, जिस में ऊपर के हिस्से में लिखा है, ‘हिसाब दो- हिसाब लो’. बडे़ फ्लैक्स पर बने पोस्टर को 2 हिस्सों में बांटा गया है और फिर एक शीर्षक बनाया गया है, ‘पंद्रह साल बनाम पंद्रह साल’.

एक हिस्से में लालू प्रसाद यादव और राबड़ी देवी की तसवीर के साथ उन के कार्यालय की हालत दिखाई गई है, वहीं दूसरे हिस्से में नीतीश कुमार के साथ उन के कार्यकाल को दिखाया गया है. इस साल होने वाले विधानसभा चुनाव को ले कर जद (यू) ने भय और भरोसे को केंद्रित कर नारा गढ़ा है. भय के 15 साल और भरोसे के 15 साल. यह फ्लैक्स भी जद (यू) कार्यालय के बाहर लगाया गया है.

तसवीरों के साथ बनाए गए इस बडे़ आकार के पोस्टर में सड़क और बिजली की चर्चा की गई है. लालूराबड़ी वाले शासनकाल के हिस्से में यह दिखाया गया है, वहीं नीतीश कुमार के 15 साल का जो हिस्सा है, उस में दिखाया गया है चमचमाती सड़क, फ्लाईओवर, बिजली के टावर और रोशन इलाके. इस पोस्टर में साइकिल से स्कूल जाती लड़कियां और महिला सशक्तीकरण को दिखाया गया है.

लालूराबड़ी के हिस्से वाली तसवीर में लालू प्रसाद को भैंसों के साथ एक कार्टून के साथ जोड़ा गया है. कुछ हिंसक घटनाओं की तसवीरें भी दिखाई गई हैं.

राजद का जवाबी हमला 

राजद के विधायक रविंद्र सिंह का कहना है कि  जद (यू) ने अपने नारों से ही हकीकत को बयान कर दिया कि नीतीश कुमार ठीके हैं, न कि  ठीक हैं. नीतीश कुमार को उन की पार्टी भी मजबूरी का मुख्यमंत्री मान रही है.

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छात्र राजद नेता राहुल यादव का कहना है कि ‘ठीके हैं और ठीक हैं’ में बड़ा फर्क है. ठीके हैं का मतलब कामचलाऊ होता है. ऐसे में नीतीश कुमार की हालत को सम झ सकते हैं.

राजद ने पोस्टर जारी किया, जिस का नारा है, ‘क्यों न करें विचार, बिहार जो है बीमार’. राजद ने बिहार सरकार और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की नाकामियों को उजागर किया है और अपने पोस्टर पर बिहार के नक्शे में चमकी बुखार, बाढ़, हत्या, सुखाड़, डकैती, अपहरण, लूट को दिखाते हुए बिहार की बुरी व्यवस्था को दिखाया है.

राजद ने जद (यू) का जवाब देते हुए अपने प्रदेश कार्यालय के बाहर पोस्टर लगाया, ‘ झूठ की टोकरी, घोटालों का धंधा’.

राजद ने राज्य के साथसाथ केंद्र सरकार को भी आडे़ हाथों लिया. देश में महंगाई, राफेल खरीद पर सवाल, नीरव मोदी, ललित मोदी, विजय माल्या को देश से भागने पर तंज कसा. केंद्र सरकार को जुमलों की टोकरी बताया, तो वहीं पोस्टर के एक हिस्से में बिहार सरकार पर निशाना साधते हुए सृजन घोटाला अपराध और कानून व्यवस्था के मसले को दिखाया गया है. हत्या, बलात्कार, लूट में बढ़ोतरी का आरोप है. महंगाई से जनता के परेशान होने का जिक्र है. रोजी, रोजगार, छात्रवृत्ति, हर घर नल का जल वगैरह योजनाओं पर सवाल उठाए हैं. राजद ने अपने पोस्टर में राज्य सरकार के ऐलानों को  झूठ की टोकरी कहा है.

लालू प्रसाद यादव ने नया नारा दिया, ‘दो हजार बीस, नीतीश फिनिश’. राजद का नया पोस्टर भी आया ‘दो हजार बीस, हटाओ नीतीश’.

पोस्टर वार अभी राज्य की राजधानी तक ही सिमटी है. यह संदेश पक्ष औैर विपक्ष दोनों की तरफ से गांव और कसबे में भी आ जाएगा. दोनों तरफ से अभी से ही शब्द अपनी मर्यादा खोने लगे हैं.

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जाति की वकालत करता नागरिकता संशोधन कानून

लेखक- कुशलेंद्र श्रीवास्तव

जाहिर है कि यह कानून सब को मंजूर नहीं है. इसे ले कर विपक्ष में तो असंतोष है ही, साथ ही देश के कुछ राज्यों में भी असंतोष फैला हुआ है. जनता के इस विरोध ने यह साबित कर दिया है कि हर समय लच्छेदार भाषणों से जनता को नहीं बरगलाया जा सकता.

नोटबंदी और जीएसटी कानून के बाद आर्थिक मंदी की मार  झेल रही केंद्र सरकार जनता को असली मुद्दों से भटका कर हिंदुत्व के अपने एजेंडे पर चल कर पीछे के दरवाजे से वर्ण व्यवस्था को वापस लाना चाहती है.

राम मंदिर जैसे मसलों पर धार्मिक भावनाएं भड़का कर देश के हिंदूमुसलिम समाज के बीच अलगाव पैदा करने की कोशिश की जा रही है, क्योंकि भाजपाई पुजारियों की असली कमाई इन्हीं मंदिरों से ही होती है.

संसद से पास नागरिकता संशोधन कानून अफगानिस्तान, बंगलादेश और पाकिस्तान से भारत में आए गैरमुसलिम शरणार्थियों को भारत की नागरिकता देने की बात करता है. इन तीनों देशों को इसलिए रखा गया है, क्योंकि ये तीनों देश धर्मनिरपेक्ष नहीं हैं. पाकिस्तान और बंगलादेश तो साल 1947 तक भारत का हिस्सा थे और अफगानिस्तान तकरीबन भारत का सांस्कृतिक हिस्सा था. तीनों ही अब इसलामिक देश हैं.

यह कानून साल 1955 में पास नागरिकता कानून को संशोधित कर उन हिंदू, सिख, बौद्ध, ईसाई और पारसियों को भारत की नागरिकता के योग्य बना देगा, जो अफगानिस्तान, बंगलादेश और पाकिस्तान से भारत आए हैं.

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यह अधिकार 31 दिसंबर, 2014 तक उन सभी लोगों पर लागू होगा, जो इस मीआद तक भारत में आ चुके हैं.

नागरिकता संशोधन कानून में लिखा है कि भारत की नागरिकता उन्हें ही दी जाएगी, जो 5 सालों से भारत में रह रहे हैं और अपने देशों में धार्मिक उत्पीड़न के शिकार हैं.

इस कानून के पास होने के पहले तक भारत की नागरिकता केवल उन्हीं लोगों को मिलती थी, जिन का जन्म भारत में हुआ हो या उन के पुरखे भारत के नागरिक हों या वे कम से कम 12 साल से भारत में रह रहे हों.

इस कानून की धारा 7 में एक उपधारा डी भी शामिल की गई है, जिस के मुताबिक अगर भारत का कोई ओवरसीज कार्ड है और उस ने नागरिकता कानून या किसी दूसरे कानून का उल्लंघन किया है, तो उस की ऐसी नागरिकता खारिज कर दी जाएगी.

इस सरकार ने यह मान लिया है कि मुसलिम बहुल देशों में अल्पसंख्यकों यानी हिंदुओं पर जोरजुल्म हो रहे हैं. वे अपनी जान बचा कर भारत की ओर उम्मीद भरी नजरों से देख रहे हैं. इन देशों के बहुत से शरणार्थी भारत में रह भी रहे हैं.

नागरिकता संशोधन कानून ने अनेक सवालों को जन्म दे दिया है. इस का मतलब है कि बदले में हमें अपने अल्पसंख्यकों, मुसलिमों से भेदभाव करने का हक है और हम उन पर जोरजुल्म करें तो गलत न होगा. लिहाजा, यह भेदभाव फैलाने वाला कानून है.

हिंदुत्व की छाप

भाजपा हिंदुत्व की पहचान के रूप में जानी जाती है. नरेंद्र मोदी की अगुआई में जब भाजपा ने साल 2014 में केंद्र में अपनी सरकार बनाई तो उस के सामने वोटरों को लुभाने के लिए दिए गए आश्वासनों का भारी पिटारा था, जिसे वे अपने पहले कार्यकाल में ही पूरा कर लेना चाहते थे, पर उस कार्यकाल में उन के पास लोकसभा में खुद का बहुमत नहीं था और न ही राज्यसभा में. ऐसे में वे चाहते हुए भी अपने एजेंडे पर काम नहीं कर पाए थे.

तब भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने देश के विभिन्न राज्यों में अपनी सरकार बनाने का लक्ष्य रखा और तकरीबन 72 फीसदी इस टारगेट को हासिल भी कर लिया और खुद के ही सांसदों की संख्या को तय बहुमत के पार पहुंचा दिया. इस जीत ने उन का मनोबल भी बढ़ाया और अपने एजेंडे को पूरा करने का मौका भी पा लिया.

कश्मीर से धारा 370 हटाना भाजपा का पहला कदम था. अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण भी उन के लक्ष्य में शामिल था, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने पूरा कर दिया. एनआरसी पर तो वे पहले ही काम शुरू कर चुके थे और अब सारे देश को इस में शामिल करने का ऐलान भी वे कर चुके हैं. नागरिकता संशोधन विधेयक को पास करना भी उन के सपनों के पूरा हो जाने जैसा है.

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भाजपा आम वोटरों के बीच बनी अपनी हिंदुत्ववादी और राष्ट्रवादी इमेज को गहरा करना चाहती है, ताकि उस का वोट बैंक और भी मजबूत बना रहे. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भी चाहता है कि भारत एक ‘हिंदू राष्ट्र’ बने.

नागरिकता संशोधन विधेयक 2019 को दोनों सदनों में पास कराने के बाद भाजपा ने इस दिशा में अपने मजबूत कदम आगे बढ़ा दिए हैं, ऐसा माना जा सकता है.

कश्मीर से धारा 370 हटाई जा चुकी है और राम मंदिर के लिए सुप्रीम कोर्ट के बेसिरपैर के फैसले से रास्ता साफ कर दिया गया है.

इस नागरिकता संशोधन कानून में गैरमुसलिम शरणार्थियों को नागरिकता दे कर वे हिंदू, बौद्ध, सिख, जैन, पारसी और ईसाई धर्म के लोगों को नागरिकता दे कर अपना वोट बैंक मजबूत करेंगे ही, साथ ही यहां के मुसलिमों पर हिंदू विरोधी होने की मोहर भी लगा देना चाहेंगे.

पाकिस्तान, बंगलादेश और अफगानिस्तान में रहने वाले हिंदू अगर वहां सताए जाते हैं, तो वे भारत नहीं आएंगे तो और कहां जाएंगे. वैसे, इस में यह सवाल भी सामने आता है कि इन तीनों देशों में रहने वाले हिंदू क्या असल में सताए जाते रहे हैं? तो क्या सत्तारूढ़ दल केवल अपने वोट बैंक के लिए इस देश को ऐसे हालात में ले जा रहा है जहां से उबरना उस के लिए मुश्किल ही साबित होगा?

पाकिस्तान में रहने वाले बंटवारे के समय भारत से गए मुसलिम पाकिस्तान में ‘मुजाहिर’ कहे जाते हैं और उन के साथ दूसरे दर्जे का बरताव ही किया जाता है. इस के अलावा शिया मुसलिमों को भी कट्टरपंथी सुन्नी समुदाय अपने गुस्से का शिकार बनाता है. क्या उन के भविष्य के बारे में सोचा जाना उचित नहीं होेता? वहां सिर्फ हिंदुओं के साथ ही नहीं, बल्कि मुसलिमों से भी भेदभाव हो सकता है, जैसा हमारे यहां पिछड़ों, दलितों, बौद्धों के साथ होता है.

सच तो यह भी है कि सरकार ने मुसलिम महिलाओं के लिए तीन तलाक का कानून पास करा कर मुसलिमों में अपनी अच्छी इमेज बनाने की पहल की थी. उस इमेज को इस कानून से नुकसान पहुंच सकता है.

वैसे, भाजपा को इस की ज्यादा चिंता है भी नहीं, क्योंकि महज 2-3 फीसदी नाराज मुसलिमों के चलते वह अपने एजेंडे को बदल नहीं सकती थी.

अब भाजपा के निशाने पर एनआरसी बिल रहेगा, जिसे पूरे भारत में लागू करना चाहते हैं. हालांकि नागरिकता संशोधन कानून का जिस तरह से विरोध हो रहा है, उसे देखते हुए लग रहा है कि पूरे भारत से एनआरसी को लागू करना आसान नहीं होगा, क्योंकि अभी तो भाजपा को नागरिकता संशोधन कानून से पैदा हुए विरोध से ही निबटने में समय लगेगा.

विपक्ष इसे इतनी आसानी से शांत नहीं होने देगा. कालेजों में पढ़ने वाली नौजवान पीढ़ी, जिस तरह से अपने विरोध की आवाज को बाहर निकाल रही है उस से केंद्र को चिंतित होना चाहिए, क्योंकि नौजवानों के गुस्से को दबा पाना आसान नहीं होता.

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बहरहाल, इस कानून के जरीए केंद्र सरकार पाकिस्तान समेत दूसरे मुसलिम बहुल देशों को यह संदेश देने में कामयाब रही है कि भारत के दरवाजे उन के देशों में अत्याचार सहन कर रहे हिंदू अल्पसंख्यकों के लिए हमेशा खुले हैं और वह सीना ठोंक कर उन की मदद कर सकती है.

नागरिकता संशोधन कानून को ले कर भाजपाइयों के अपने तर्क हैं. गाडरवारा की विधायक रह चुकी और भाजपाई साधना स्थापक का कहना है कि भारत के दरवाजे किसी के लिए बंद नहीं हैं, पर हमारा मानना है कि आज हमारी प्राथमिकता उन हिंदुओं को नागरिकता देने की है, जो हिंदू होने के चलते इन देशों में सताए जा रहे हैं.

राज्यसभा सांसद कैलाश सोनी ने अपने जागरूकता अभियान में कहा कि कांग्रेस अपने फायदे के चलते हिंसा को बढ़ावा दे रही है, जबकि इस कानून से किसी भी जाति, धर्म के लोगों को कोई परेशानी नहीं होने वाली.

जिला नरसिंहपुर के भाजपा अध्यक्ष अभिलाष मिश्रा का भी यही कहना है कि पाकिस्तान, बंगलादेश और अफगानिस्तान में वहां के हिंदू अल्पसंख्यकों को परेशान किया जाता है. वे भारत की ओर उम्मीद भरी निगाहों से देखते हैं. यह कानून उन्हें नागरिकता दे कर उन के भविष्य को संवारने का काम करेगा.

भाजपा इस बात पर ज्यादा जोर देती दिखाई दे रही है कि इस कानून से किसी को कोई नुकसान नहीं होने वाला, पर वह इस बात पर रोशनी नहीं डाल पा रही है कि इन तीनों देशों में अल्पसंख्यक न होने के बावजूद अगर मुसलिम सताया जाता है तो वह भारत की नागरिकता क्यों नहीं ले सकता?

भाजपा का जागरण अभियान तो चालू है, पर इस के बावजूद भारत को इस कानून के साइड इफैक्ट के लिए तैयार रहने की जरूरत है. इन सभी नेताओं के बयानों में हिंदूमुसलिम की बात है. हिंदू यानी कर्मकांडी हिंदू और मुसलिम यानी टोपी लगाने वाला नमाजी मुसलिम.

आखिर खिलाफत क्यों

नागरिकता संशोधन कानून का विरोध बड़े लैवल पर हो रहा है. भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 को बारबार रेखांकित किया जा रहा है. इस अनुच्छेद में समानता की बात कही गई है. विरोध करने वालों का मानना है कि जब समानता का अधिकार हमारा ही संविधान हमें देता है, तब गैरमुसलिम शरणार्थियों को नागरिकता देने की बात क्यों की जा रही है?

विदेशों में भी इसी आधार पर विरोध के स्वर सुनाई दे रहे हैं. अमेरिका के ‘वैश्विक धार्मिक आयोग’ ने भी इस कानून का विरोध किया है. अमेरिकी आयोग ने भी अपना विरोध दर्ज कराया है.

इस सब के बीच भारत इस नए कानून का पालन कराने के लिए तैयारी कर चुका है. उस ने सारे विरोधों के प्रति अपनी असहमति देते हुए नए कानून को देश के लिए जरूरी करार दिया है.

भाजपा इस कानून के संबंध में लाख दलीलें दे, पर जमीनी सचाई यही है कि वह देश की जनता को धार्मिक मसलों में उल झा कर उन की जातीय भावनाओं को जाहिर करने का मौका दे रही है. हिंदू और मुसलिमों के बीच विवाद खड़ा कर के वर्ण व्यवस्था की वकालत कर के वह अपनी हिंदुत्व वाली इमेज को बनाए रखना चाहती है.

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आज देश में केंद्र सरकार जिस हिंदुत्व के एजेंडे पर काम कर रही है, उस में ‘मनुस्मृति’ अपनेआप ही आ जाती है. वर्ण व्यवस्था खुद ब खुद आ जाती है और जाति के आधार पर सजा का मापदंड जो ‘मनुस्मृति’ में लिखा है, ऐसी व्यवस्था को बढ़ाने वाली सरकार जो बाबा साहब अंबेडकर के संविधान की आड़ में मनुस्मृति को लागू करना चाहती है, तो उस सरकार से उम्मीद नहीं की जा सकती कि देश में महिलाओं और दलितों को समान अधिकार और सुरक्षा मिलेगी.

लव-कुश की वजह से कार्तिक-नायरा ने छोड़ा घर, कायरव से भी हुए दूर

सीरियल ये रिश्ता क्या कहलाता है (Yeh Rishta Kya Kehelata Hai) कि कहानी दिन ब दिन एक अलग ही मोड़ लेती दिखाई दे रही है. पिछले काफी दिनों से लव-कुश (Luv-Kush) की वजह से कार्तिक-नायरा (Kartik Naira) काफी परेशान थे लेकिन अब लव-कुश की वजह से कायरव (Kairav) भी गलत रास्ते पर चल चुका है जिसके कारण अब कार्तिक-नायरा और भी ज्यादा परेशान हो गए हैं. बीते एपिसोड में कार्तिक (Mohsin Khan) के सामने लव-कुश की सारी असलीयत सामने आ गई है और उसको नायरा (Shivangi Joshi) का साथ ना देने की गलती का एहसास भी हो गया है.

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मनीष हुआ लव-कुश को सजा दिलाने के सख्त खिलाफ…

कायरव की हरकतें और उसे बिगड़ता देख कार्तिक को यह भी एहसास हो गया है कि उसे बहुत पहले ही नायरा का साथ देकर लव-कुश को उनके कीए की सजा दिलवा देनी चाहिए थी. ऐसे में अब कार्तिक-नायरा ने ये फैसला किया है कि वे दोनों लव-कुश को सजा दिलवा कर ही रहेंगे. इसी के चलते कार्तिक नायरा का ये फैसला उन पर भारी भी पड़ने वाला है क्योंकि मनीष लव-कुश को सजा दिलाने के सख्त खिलाफ है.

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कार्तिक और नायरा ने किया घर छोड़ने का फैसला…

इसी को लेकर मनीष और कार्तिक के बीच काफी बहस भी हुई जिसके बाद कार्तिक और नायरा दोनों ने घर छोड़ने का फैसला भी कर लिया. कार्तिक ने अब जाकर ये ठान लिया है कि वे हर मोड़ पर नायरा का साथ देगा और लव-कुश के खिलाफ सारे सबूत इकठ्ठे कर उनको सजा दिलाने की पूरी कोशिश करेगा और त्रिशा को इंसाफ दिलवा कर रहेगा.

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कायरव ने कार्तिक के साथ चलने से किया इंकार…

ऐसे में कार्तिक और नायरा को कायरव से भी दूर होना पड़ेगा क्योंकि जब कार्तिक कायरव को लेने जाएगा तो उसको ऐसा लगेगा कि कहीं कार्तिक उसे भी पुलिस के हवाले ना कर दी इस वजह से वे उनके साथ जाने से साफ मना कर देगा. ऐसा देखने में आ रहा है कि कार्तिक और नायरा का लव-कुश को सजा दिलवाना इतना आसान नहीं होगा.

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अब देखने वाली बात ये होगी की आखिर कैसे कार्तिक और नायरा मिलकर लव-कुश को सजा दिलाएंगे और कार्तिक और नायरा के घर छोड़ने के फैसले से उनको किस किस परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है.

होली से पहले ही भोजपुरी एक्ट्रेस आम्रपाली दुबे के इस गाने ने मचाई धूम, देखें वीडियो

भोजपुरी इंडस्ट्री की जानी मानी एक्ट्रेस आम्रपाली दुबे (Amrapali Dubey) इन दिनों खूब चर्चा में हैं. साल 2014 से अपने फिल्मी करियर की शुरूआत करने वाली आम्रपाली दुबे (Amrapali Dubey) ने अब तक 20 से भी ज्यादा भोजपुरी फिल्मों में काम कर अपनी काफी अच्छी फैन फौलोविंग बना ली है. इन दिनों आम्रपाली दूबे अपने नए गाने ‘होलिया में लागे बड़ी डर’ (Holiya me lage badi dar) की वजह से लगातार चर्चा में बनी हुई हैं.

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बेहद सुंदर लग रही हैं आम्रपाली दुबे…

आम्रपाली दुबे (Amrapali Dubey) का यह गाना 23 फरवरी को रिलीज किया गया था जिसे उनके फैंस भरपूर प्यार दे रहे हैं. इस गाने को अपनी खूबसूरत आवाज दी है खुशबू जैन (Khushboo Jain) ने और इस गाने में आम्रपाली दुबे बेहद ही सुंदर दिखाई दे रही हैं और सुंदर दिखने के साथ ही उनका डांस भी लोगों को काफी इम्प्रेस कर रहा है. इस गाने को यू-ट्यूब (Youtube) पर अब तक करीब 5 लाख बार देखा जा चुका है और साथ ही इस गाने को साढ़े 7 हजार से भी ज्यादा लाइक्स मिल चुके हैं.

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जल्द ही निरहुआ के साथ आने वाली हैं नजर…

 

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Trailer of #romeoraja releasing on 21st Feb morning 6.30 am on #wavebhojpuri 😍

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पूरे गाने में आम्रपाली दुबे ने व्हाइट कलर की ड्रैस पहनी हुई है जिसमें वे वाकई कमाल लग रही हैं. यह गाना स्पैशल होली के अवसर को ध्यान में रख के बनाया गया है. बात करें आम्रपाली दुबे की आने वाली फिल्मों की तो जल्द ही आम्रपाली फिल्म ‘रोमियो राजा’ में दिनेश लाल यादव यानी कि निरहुआ के साथ नजर आने वाली हैं.

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आम्रपाली दुबे ने निरहुआ के लिए लिखा ऐसा कैप्शन…

 

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Happy birthday my most favourite boy 😍🥰😘 May God bless you with His choicest blessings love you 😍😘 @dineshlalyadav

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कुछ दिनों पहले ही आम्रपाली दुबे ने निरहुआ के बर्थडे के दिन अपने औफिशियल इंस्टाग्राम अकाउंट से एक वीडियो शेयर की थी जो कि काफी वायरल भी हुई थी. इस वीडियो के कैप्शन में आम्रपाली ने निरहुआ के लिए लिखा था, “Happy birthday my most favourite boy. May God bless you with His choicest blessings love you.”

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होलिया में लागे बड़ी डर गाने का लिंक –

शहीद सिपाही रतन लाल क्यों रखते थे अभिनंदन जैसी मूंछें

दिल्ली के गोकुलपुरी (Gokulpuri) में तैनात दिल्ली पुलिस (Delhi Police) के कौंस्टेबल रतन लाल (Ratan Lal) न सिर्फ जिंदादिली में जीते थे, उन में गजब का साहस था.

24 फरवरी को वे अपने अन्य पुलिस कर्मियों के साथ ड्यूटी पर थे. दिल्ली के गोकुलपुरी क्षेत्र में तब सीएए के विरोध में प्रदर्शन चल रहा था. तभी उपद्रवियों ने तोङफोङ और पत्थरबाजी शुरू कर दी.

डटे रहे पर हटे नहीं

रतन लाल मुस्तैदी से डटे रहे. उन्होंने शांति से काम लिया और गुस्साई भीङ को समझाने की असफल कोशिश की. तभी एक उपद्रवी ने पीछे से उन के ऊपर पत्थर से हमला कर दिया. इस पत्थरबाजी में रतन लाल शहीद हो गए.

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हमला इतना सुनियोजित था कि उन्हें संभलने का मौका तक नहीं मिला.

इस घटना में अनेक पुलिसकर्मी घायल हुए हैं और एसीपी को गंभीर अवस्था में अस्पताल में भरती कराया गया है.

एक जाबांज सिपाही

नौर्थ ईस्ट, दिल्ली के ऐडिशनल डीसीपी बिजेंद्र यादव ने कहा,”रतन एक जाबांज सिपाही थे. वे साहसी थे और कठिन परिस्थितियों में भी मुसकराते रहते थे.”

राजस्थान के सीकर में जन्मे रतन लाल अपने 3 भाईबहनों में सब से बङे थे. उन्होंने साल 1998 में दिल्ली पुलिस में बतौर कौंस्टेबल जौइन किया था.

अपने बच्चों के काफी करीब थे

अपने परिवार के साथ वे दिल्ली के बुराङी स्थित अमृत विहार कालोनी में रहते थे. रतन लाल की 2 बेटियां और 1 बेटा है. उन्होंने अपने बच्चों से वादा किया था कि इस होली में वे सब के साथ राजस्थान अपने गांव जाएंगे पर बच्चों को क्या मालूम कि उन के पिता अब इस वादे को पूरा करने के लिए कभी नहीं आएंगे.

घर में गृहिणी बीवी का रोरो कर बुरा हाल है.

अभिनंदन जैसी ही रखते थे मूंछें

रतन लाल के भाई दिनेश लाल बताते हैं,”भैया देशभक्त थे और जब से अभिनंदन वर्धमान ने पाकिस्तान का जेट विमान मार गिराया था तब से भैया अभिनंदन के जबरदस्त फैन बन गए थे. उन्होंने अपनी मूंछें भी अभिनंदन की तरह ही रख ली थीं.”

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रतन लाल के मूछों की तारीफ कोई करता तो वे फूले नहीं समाते और मूंछों पर ताव देना नहीं भूलते.

दिल्ली पुलिस के ही उन के एक करीबी दोस्त ने बताया,”रतन को अभिनंदन पर नाज था, जिस ने पाकिस्तान के लड़ाकू विमान को मार गिराने के बाद पाकिस्तान से भी सकुशल लौट आए थे. रतन अकसर कहता था कि एक जाबांज सिपाही को देश के लिए समर्पित रहना चाहिए.”

वे कहते हैं,”रतन अपने परिवार के काफी नजदीक था और अकसर गांव भी आताजाता रहता था. बच्चों के लिए वह हमेशा कुछ न कुछ ले कर जरूर जाता था.”

परिवार के एक सदस्य ने बताया,”रतन भैया शहीद हुए तो इस बात की जानकारी मां को नहीं दी जल्दी. वे पूछती रहीं पर हम बताते भी तो कैसे?”

आखिर ‘कमरिया हिला रही है…’ गाने ने क्यों मचा दिया है तहलका

हिंदी गाना ‘कमरिया हिला रही है…’ (Kamariya Hila Rahi Hai) ने तहलका मचा दिया है. भोजपुरी के गायक सुपरस्टार पवन सिंह (Pawan Singh) द्वारा गाया यह गाना रिलीज होते ही लोगों के दिलों की धडकन बन चुका है और मात्र 24 घंटे में 1 करोड़ से अधिक व्यूज पार कर बड़ा रिकौर्ड बना लिया है. अभी भी यह गाना लगातार ट्रैंडिंग (Trending) में है और यही हाल रहा तो जबरदस्त रिकौर्ड बना लेगा.

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इस के व्यूज को देख कर ही इस की लोकप्रियता का सहज अंदाजा लगाया जा सकता है कि मात्र 24 घंटे में ही इस गाने ने तहलका मचा दिया.

यों पवन सिंह (Pawan Singh) भोजपुरी के नंबर 1 सिंगर जाने जाते हैं. उन का भोजपुरी में गाया गाना ‘कमरिया करै लपालप लौलीपौप लागे लू…’ (Lollypop Lagelu) इतना हिट हुआ था कि आज भी यह गाना शादी-विवाह या अन्य अवसरों पर धूम मचा रहा है. लेकिन पवन सिंह (Pawan Singh) का हिंदी गाना ‘कमरिया हिला रही है…’ (Kamariya Hila Rahi Hai) इस कदर हिट हो जाएगा, यह शायद ही किसी ने सोचा होगा.

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भोजपुरी गायकी के सुपरस्टार पवन का यह नया होली सौंग है जिसे खासकर होली (Holi) को ध्यान में रख कर रिलीज किया गया है. यह गाना यूट्यूब (YouTube) पर खूब वायरल हो रहा है, जिसे लोग बेहद पसंद कर रहे हैं.

इस वीडियो में पवन सिंह और ऐक्ट्रैस लौरेन गौटलिब (Lauren Gottlieb) की जोड़ी जम कर थिरकी भी है. इस गाने में पवन सिंह (Pawan Singh) के साथ स्वर मिलाया है पायल देव (Payal Dev) ने. पायल इस गाने की म्यूजिक कंपोजर (Music Composer) भी हैं. गीतकार मोहसिन और संगीतकार आदित्य देव हैं.

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हनीमून : क्या था मुग्धा का दूसरा हनीमून प्लान

हनीमून भाग 1 : क्या था मुग्धा का दूसरा हनीमून प्लान

सुधाकरजी और उन की पत्नी मीरा एकाकी व नीरसता भरा जीवन व्यतीत कर रहे थे. इकलौती बेटी मुग्धा की वे शादी कर चुके  थे. परंतु जिद्दी बेटी ने जरा सी बात पर नाराज हो कर पिता से रिश्ता तोड़ लिया था. इस कारण पतिपत्नी के बीच भी तनाव रहता था. इसी गम ने उन्हें असमय बूढ़ा कर दिया था. आज सुबह लगभग 4 बजे सपने में बेटी को रोता देख कर उन की आंख खुल गई थी.

उन को भ्रम था कि सुबह का सपना सच होता है. इसलिए अनिष्ट की आशंका से उन की नींद उड़ गई थी. वे पत्नी से बेटी को फोन करने के लिए भी नहीं कह सकते थे क्योंकि यह उन के अहं के आड़े आता. बेटी के जिद्दी और अडि़यल स्वभाव के कारण वे डरे हुए रहते थे कि एक दिन अवश्य ही वह तलाक का निर्णय कर के लुटीपिटी  यहां आ कर खड़ी हो जाएगी.

‘‘मीरा, मेरा सिर भारी हो रहा है, एक कप चाय बना दो.’’

‘‘अभी तो सुबह के 6 ही बजे हैं.’’

‘‘तुम्हारी लाड़ली को सपने में रोते हुए देखा है, तभी से मन खराब है.’’

‘‘आप ने उस के लिए कभी कुछ अच्छा सोचा है जो आज सोचेंगे, हमेशा नकारात्मक बातें ही सोचते हैं. इसी वजह से ऐसा सपना दिखा होगा.’’

‘‘तुम्हारी नजरों में तो हमेशा से मैं गलत ही रहता हूं.’’

‘‘आप की वजह से ही, न तो वह अब यहां आती है और न ही आप से बात करती है. तब भी आप उस के लिए बुरा सपना ही देख रहे हैं.’’

‘‘तुम ने मेरे मन की पीड़ा को कभी नहीं समझा.’’

उदास मन से वे उठे और सुबह की सैर को बाहर चले गए. तभी मीरा का मोबाइल बज उठा था. उधर से बेटी की चहकती हुई आवाज सुन कर वे बोलीं, ‘‘इस एनिवर्सरी पर आशीष ने कुछ खास गिफ्ट दिया है क्या? बड़ी खुश लग रही हो.’’

‘‘नहीं मां, वे तो मुझे हमेशा गिफ्ट देते रहते हैं. इस बार का गिफ्ट तो उन्हें मेरी तरफ से है,’’ वह शरमाते हुए बोली थी, ‘‘मां, हम दोनों इस बार एनिवर्सरी पर सैकंड हनीमून के लिए मौरीशस जा रहे हैं.’’

तभी नैटवर्क चला गया था, इसलिए फोन डिसकनैक्ट हो गया था. मीरा के दिल को ठंडक मिली थी. उन के मन को खुशी हुई थी कि देर से ही सही परंतु अब बेटी ने पति को पूरी तरह स्वीकार कर लिया है. पति से बेटी के हनीमून पर जाने की बात वे बताना चाह रहीं थीं लेकिन वे अपने रोजमर्रा के कामों में व्यस्त हो गईं.

रात के लगभग साढ़े 10 बजे थे. सुधाकर उनींदे से हो गए थे. तभी उन का मोबाइल घनघना कर बज उठा था. दामाद आशीष का नंबर देख वे चौंक उठे थे. लेकिन मोबाइल पर आशीष का मित्र अंकुर की आवाज सुनाई दी, ‘‘अंकल, आशीष का सीरियस ऐक्सिडैंट हो गया है. उस की हालत गंभीर है. उसे अस्पताल में भरती करा दिया है. आप तुरंत आ जाइए.’’

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उन के हाथ से मोबाइल छूट गया था. सुधाकर के सफेद पड़े हुए चेहरे को देखते ही मीरा को समझ में आ गया था कि जरूर कुछ अप्रिय घटा है.

‘‘क्या हुआ?’’

‘‘आशीष की गाड़ी का ऐक्सिडैंट हो गया है. हम लोगों को तुरंत मुंबई के लिए निकलना है.’’

‘‘आशीष ठीक तो हैं?’’

‘‘पता नहीं. तुम्हारी बेटी के लिए तो यह खुशी का क्षण होगा. जब से शादी हुई है उस ने उन्हें एक दिन भी चैन से नहीं रहने दिया. सुबह जब वे औफिस के लिए निकले होंगे तो तुम्हारी बेटी ने अवश्य उन से झगड़ा किया होगा. वे तनाव में गाड़ी चला रहे होंगे. बस, हो गया होगा ऐक्सिडैंट.

‘‘तुम से मैं ने कितनी बार कहा था कि अपनी बेटी को समझाओ कि पति की इज्जत करे. गोरेकाले में कुछ नहीं रखा है. लेकिन तुम भी अपनी लाड़ली का पक्ष ले कर मुझे ही समझाती रहीं कि धैर्य रखो, आशीषजी की अच्छाइयों के समक्ष वह शीघ्र ही समर्पण कर देगी.’’

‘‘मुग्धा कैसी होगी?’’

‘‘उस का नाम मेरे सामने मत लो. आज तो वह बहुत खुश होगी कि आशीष घायल क्यों हुए, मर जाते तो उसे उस काले आदमी से सदा के लिए छुटकारा मिल जाता.’’

‘‘ऐसा मत सोचिए. पहले मुग्धा को फोन कर के पूरा हाल तो पता कर लीजिए.’’

‘‘क्या मुझे उस ने फोन किया है?’’

उन्होंने अपने मित्र संजय से अस्पताल पहुंचने के लिए कहा और अपने पहुंचने की सूचना दी.

मीरा आखिर मां थीं, उन की ममता व्याकुल हो उठी थी. उन के कान में उस के चहकते हुए शब्द ‘सैकंड हनीमून’ गूंज रहे थे. उन्होंने बेटी को फोन लगा कर आशीष के ऐक्सिडैंट के बारे में पूछा.

वह रोतेरोते बुझे स्वर में बोली थी, ‘‘उन की हालत गंभीर है. उन्हें इंसैटिव केयर यूनिट में रखा गया है. खून बहुत बह गया है. इसलिए उन के ब्लड ग्रुप के खून की तलाश हो रही है.’’

गुमसुम, असहाय मीरा अतीत में खो गई थी. उन की शादी के कई वर्षों बाद बड़ी कोशिशों के बाद उन्होंने इस बेटी का मुंह देखा था. सुंदर इतनी की छूते ही मैली हो जाए. लाड़प्यार के कारण बचपन से ही वह जिद्दी हो गई थी. लेकिन चूंकि पढ़ने में बहुत तेज थी, इसलिए सुधाकर ने उसे पूरी आजादी दे रखी थी.

मुग्धा के मन में अपनी सुंदरता और गोरे रंग को ले कर बड़ा घमंड था. बचपन से ही वह काले रंग के लोगों का मजाक बनाती और उन्हें अपने से हीन समझती. उस के मन में अपने लिए श्रेष्ठता का अभिमान था. जिस की वजह से उन्होंने उसे कई बार डांट भी लगाई थी और सजा भी दी थी.

समय को तो पंख लगे होते हैं. वह बीटैक पूरा कर के आ गई थी. वे मन ही मन उस की शादी के सपने बुन रही थीं. परंतु बेटी मुग्धा एमबीए करना चाह रही थी. इस के लिए सुधाकर तो तैयार भी हो गए थे. परंतु मीरा उस से पहले उस की शादी करने के पक्ष में थीं. उस की इच्छा को देखते हुए एमबीए कर लेने के बाद ही शादी पर विचार करने का अंतिम निर्णय ले लिया गया था.

परंतु वे कुछ दिन से देख रही थीं कि उस की चंचल और शोख बेटी चुपचुप रहती थी. उस के चेहरे पर चिंता और परेशानी के भाव दिख रहे थे. वह फोन पर किसी से देर तक बातें किया करती थी. एक दिन उन्होंने उस से प्यार से पूछने की कोशिश की थी, ‘क्या बात है, बेटी? तुम्हारी तबीयत तो ठीक है. कोई समस्या हो तो बताओ?’

‘नो मौम, कोई समस्या नहीं है. औल इज वैल.’

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मुग्धा के चेहरे से स्पष्ट दिखाई पड़ रहा था कि वह सफेद झूठ बोल रही है. मीरा के मन में शक का कीड़ा बैठ गया था क्योंकि मुग्धा अपने फोन को एक क्षण के लिए भी अपने से अलग नहीं करती थी और उन के छूते ही वह चिल्ला पड़ती थी. एक रात जब वह गहरी नींद में सो रही थी तो चुपके से उन्होंने उस के फोन को उठा कर देखा तो उसी फोन ने उन के सामने सारी हकीकत बयां कर दी.

एहसान माई लाइफ, उस के साथ सैल्फी, फोटोग्राफ, ढेरों मैसेज देख वे घबरा उठी थीं. अंतरंग क्षणों की भी तसवीरें मोबाइल में कैद थीं. प्यार में दीवानी बेटी धर्मपरिवर्तन कर के उस के साथ शीघ्र ही निकाह करने वाली थी.

उसी क्षण उन्होंने पति को सारी बातें बताईं तो उन्होंने बेटी को डांटडपट कर और आत्महत्या की धमकी दे कर बिना किसी विलंब के अपने मित्र के बेटे आशीष के साथ उस का रिश्ता पक्का कर दिया था. उन्होंने एक हफ्ते के अंदर ही शादी पक्की कर दी.

उन्होंने एक बार पति से कहा भी था, ‘जल्दबाजी मत कीजिए. बेटी को संभलने का एक मौका तो दीजिए. लड़के का रंग बहुत काला है. अपनी मुग्धा उस के साथ खुश नहीं रह पाएगी.’

वे नाराज हो उठे थे, ‘सब तुम्हारे लाड़प्यार का नतीजा है. यदि उसे एक मौका दिया तो निश्चय ही तुम्हारी लाड़ली धर्मपरिवर्तन कर के, उस की जीवन सहचरी बन कर कुरान की आयतें पढ़नी शुरू कर देगी.’

वे सहम कर चुप हो गई थीं. परंतु उन की आंखें डबडबा उठी थीं.

पिता के क्रोध और धमकी के कारण मुग्धा ने उन के समक्ष समर्पण कर दिया था. स्पष्टरूप से विरोध तो नहीं किया था परंतु उस के नेत्रों से अश्रु निरंतर झरते रहे थे. बेटी के मन की पीड़ा की कसक से मजबूर उन की आंखों में भी आंसू उमड़ते रहे थे.

जयमाला और विवाहमंडप में मुग्धा के चेहरे पर विरक्ति व घृणा के भाव थे. तो आशीष सुंदर अर्धांगिनी को पा कर गर्व से फूला नहीं समा रहा था. उस का चेहरा गर्व से प्रदीप्त हो रहा था तो मुग्धा निर्जीव पुतले के मान चुप थी.

आशीष मुंबई आईआईटी का गोल्ड मैडलिस्ट था. मुंबई में उस का अपना फ्लैट था. 30 लाख रुपए का उस का सैलरी पैकेज था. उस ने हनीमून के लिए मौरीशस का पैकेज लिया हुआ था.

मौरीशस की हरीभरी, सुंदर वादियों में भी वह अपनी पत्नी के चेहरे पर मुसकराहट लाने में कामयाब न हो सका था. मुग्धा को खुश करने के लिए उस के हर संभव प्रयास असफल रहे थे.

मुग्धा चाह रही थी कि  वह उस की हरकतों से परेशान हो कर उसे अपनी मां के यहां जाने को कह दे ताकि उस के पापा ने उस के साथ जो अन्याय किया है, उस का परिणाम उन्हें भुगतना पड़े और फिर वह अपने प्रियतम एहसान की बांहों में चली जाएगी. एक दिन वह बोला था, ‘मुग्धा, क्या तुम्हें यहां पर आ कर अच्छा नहीं लगा? तुम्हारा सुंदर, प्यारा सा चेहरा हर समय बुझाबुझा सा रहता है.’

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वह तपाक से बोली थी, ‘हां, बिलकुल भी अच्छा नहीं लगा क्योंकि मैं तुम्हें प्यार नहीं करती. तुम से पहले मेरी जिंदगी में कोई दूसरा जगह ले चुका है.’ ‘होता है मुग्धा, प्यार किसी से किया नहीं जाता बल्कि हो जाता है. फिर तुम तो इतनी खूबसूरत परी हो, जिस को तुम ने प्यार किया होगा वह भी बहुत सुंदर रहा होगा. और तुम्हारी सुंदरता पर तो कोई भी अपनी जान कुरबान कर सकता है.’

वह सोचने लगी कि यह इंसान किस मिट्टी का बना हुआ है. इस के चेहरे पर न तो कोई क्रोध है न आक्रोश.

‘आप ने भी तो अपने कालेज के दिनों में किसी न किसी को प्यार किया होगा?’

‘मेरा यह आबनूसी काला चेहरा देख कर भला मुझ से कौन इश्क करेगा?’

‘मैं तो बहुत खुश हूं, जो मुझे तुम सी सुंदर पत्नी मिली. मैं तो तुम्हारे लिए अपनी जान भी दे सकता हूं.’

‘मैं किसी दूसरे को पहले से प्यार करती थी, यह जान कर आप को बुरा नहीं लगा?’

‘बुरा लगने की भला क्या बात है? तुम अकेली थीं. आजाद थीं. किस को चाहो, किसे न चाहो, यह तुम्हारा व्यक्तिगत फैसला था. शादी मुझ से की है, इसलिए मेरी पत्नी हो, मैं तो केवल यही जानता हूं. तुम बहुत ही खूबसूरत हो और इसलिए मैं अपने पर इतरा रहा हूं.’

जानें आगे क्या हुआ कहानी के अगले भाग में…

दम तोड़ते सरकारी स्कूल

मध्य प्रदेश के सरकारी स्कूलों में पढ़ाईलिखाई की क्वालिटी बढ़ाने के लिए पिछले 15-20 सालों में नएनए प्रयोग तो खूब किए गए, पर इन स्कूलों में टीचरों की कमी दूर करने के साथ ही इन में पढ़ने वाले बच्चों की जरूरतों को पूरा करने की दिशा में कोई ठोस उपाय सरकारी तंत्र द्वारा नहीं किए गए.

नतीजतन, स्कूलों में पढ़ाईलिखाई का लैवल बढ़ने के बजाय दिनोंदिन गिरा है और छात्रों के मांबाप भी प्राइवेट स्कूलों की ओर खिंचे हैं.

प्राइवेट स्कूलों में आज भी काबिल टीचर मुहैया नहीं हैं. इस की वजह उन को मिलने वाली तनख्वाह है. सरकारी स्कूलों में पढ़ाने वाले टीचरों को जहां आज 50,000 रुपए से 70,000 रुपए तक मासिक तनख्वाह मिलती है, वहीं इस की तुलना में प्राइवेट स्कूलों में पढ़ा रहे टीचर बमुश्किल 10,000 रुपए से 15,000 रुपए मासिक कमा रहे हैं.

पढ़ेलिखे नौजवान भी टीचिंग जौब में आना चाहते हैं. वे शिक्षक पात्रता परीक्षा पास कर सरकारी स्कूलों में सिलैक्ट हो जाते हैं और जो परीक्षा पास नहीं कर पाते, तो वे प्राइवेट स्कूलों में नौकरी करने लगते हैं.

नरसिंहपुर जिले के आदित्य पब्लिक स्कूल में इंगलिश पढ़ाने वाले सचिन नेमा बताते हैं कि वे साल 2011 की शिक्षक पात्रता परीक्षा 2 अंक से पिछड़ने के चलते प्राइवेट स्कूल में 15,000 रुपए मासिक तनख्वाह पर 5 पीरियड पढ़ाते हैं. इस के अलावा स्कूल मैनेजमैंट द्वारा उन्हें छात्रों के मांबाप से मेलजोल करने का ऐक्स्ट्रा काम भी दिया जाता है.

प्राइवेट स्कूलों में पढ़ाने का तरीका रटाने वाला हो गया है. छोटेछोटे बच्चों को भारी होमवर्क दिया जाता है, जिसे बच्चों के मांबाप ही ज्यादा करते हैं.

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साहित्यकार और शिक्षाविद डाक्टर सुशील शर्मा कहते हैं कि प्राइवेट स्कूलों में भी अब पढ़ाईलिखाई के बेहतर रास्ते नहीं हैं. उन्होंने निजी तौर पर शहर के कई प्राइवेट स्कूलों में जा कर यह देखा है कि वहां बच्चों को हर बात रटाई जा रही है. इन स्कूलों में ट्रेनिंग पाए टीचरों की कमी इस की खास वजह है.

काम का बोझ

शिक्षा संहिता के नियमों के मुताबिक और शिक्षा के अधिकार अधिनियम के प्रावधानों के तहत राष्ट्रीय महत्त्व के काम चुनाव और जनगणना को छोड़ कर टीचरों की सेवाएं गैरशिक्षकीय कामों में नहीं ली जा सकतीं, पर अधिनियम को धता बताते हुए टीचरों से बेगारी कराई जा रही है. वोटर लिस्ट अपडेट करने से ले कर बच्चों के जाति प्रमाणपत्र बनवाने तक का काम टीचरों को करना पड़ता है.

पिछले साल मध्य प्रदेश के सिंगरौली जिले में सरकार द्वारा कराए जा रहे सामूहिक विवाह आयोजन में बाकायदा कलक्टर के निर्देश पर जिला शिक्षा अधिकारी ने 28 टीचरों की ड्यूटी पूरी, दाल, सब्जी परोसने में लगा दी.

इसी तरह विभिन्न जिलों में गांवों व शहरों को बाह्य शौच मुक्त (ओडीएफ) करने के लिए वार्डवार्ड जा कर खुले में शौच करने वाले लोगों को रोकने में टीचरों की ड्यूटी लगाई गई.

मध्य प्रदेश के ही 83,969 प्राइमरी स्कूल पढ़ाईलिखाई की क्वालिटी में भारी कमी, टीचरों के खाली पदों पर भरती न होने और बुनियादी जरूरतों की कमी में दम तोड़ते नजर आ रहे हैं.

प्रदेश के सरकारी स्कूल केवल सरकारी योजनाओं का ढिंढोरा पीटते नजर आ रहे हैं. एयरकंडीशंड कमरों में बैठे अफसर व मंत्री सरकारी स्कूलों में नए प्रयोग कर पढ़ाईलिखाई को गड्ढे की ओर ले जा रहे हैं.

टीचर भी हैं कुसूरवार

पढ़ाईलिखाई की क्वालिटी में भारी गिरावट के लिए सरकारी नीतियों के साथ टीचर भी कम कुसूरवार नहीं हैं. छात्र पढ़ाईलिखाई करने के लिए स्कूल जाते हैं, लेकिन वहां टीचर ही नदारद रहते हैं.

मध्य प्रदेश में साल 2018 के हाईस्कूल इम्तिहान में 30 फीसदी से कम रिजल्ट देने वाले स्कूलों में पढ़ाने वाले टीचरों का सरकार द्वारा इम्तिहान लिया गया. इस इम्तिहान में ज्यादातर टीचर फेल हो गए.

बाद में इन टीचरों को इम्तिहान का एक और मौका दिया गया, जिस में किताब खोल कर इम्तिहान का प्रश्नपत्र हल करने को कहा गया. इस के बावजूद प्रदेश के 16 फीसदी टीचर इस में फेल हो गए.

दक्षिण कोरिया पर दांव

पिछले कुछ सालों में दिल्ली की केजरीवाल सरकार ने सरकारी स्कूलों की तसवीर बदलने का काम किया है, पर मध्य प्रदेश सरकार के अफसरों को दक्षिण कोरिया की शिक्षा पद्धति रास आ रही है. वहां की शिक्षा पद्धति को देखने प्रदेश सरकार के शिक्षा विभाग के अफसर, बाबू और प्रिंसिपलों के दल 3 बार दक्षिण कोरिया की यात्रा का मजा लूट चुके हैं.

कभी टीचर रहे भाजपा के पूर्व विधायक मुरलीधर पाटीदार ने इस यात्रा पर सवाल खड़े किए हैं. उन का कहना है कि प्रदेश के स्कूलों में टीचरों की कमी दूर करने और स्कूलों में बुनियादी समस्याओं को हल करने में बजट का रोना रोने वाले अफसर करोड़ों रुपए दक्षिण कोरिया की यात्रा पर खर्च कर चुके हैं, जबकि दक्षिण कोरिया की जिस शिक्षा पद्धति को लागू करने की बात कही जा रही है, वह तो हमारे प्रदेश में बहुत पहले से ही चल रही है.

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जब से देश में शिक्षा के अधिकार अधिनियम के तहत 5वीं और 8वीं जमात की बोर्ड परीक्षाओं को खत्म कर हर बच्चे को अगली जमात में पास करने का नियम बना है, छात्रों की दिलचस्पी पढ़ने में और टीचरों की दिलचस्पी पढ़ाने में नहीं रह गई है. आज किसी भी टीचर, मुलाजिम, अफसर के बच्चे इन सरकारी स्कूलों में नहीं पढ़ रहे हैं, जिस से सरकारी स्कूलों पर किसी का कंट्रोल भी नहीं रह गया है.

प्राइवेट स्कूलों की मनमानी

प्राइवेट स्कूल तालीम को प्रोडक्ट की तरह बेच रहे हैं. नया शिक्षा सत्र शुरू होते ही प्राइवेट स्कूल वाले मांबाप की जेब हलकी करने में लग जाते हैं. इस के लिए उन्होंने अनेक तरीके खोज लिए हैं. पहले मनमाने तरीके से स्कूल की फीस बढ़ा दी जाती है और हर स्कूल अपनी अलगअलग किताबें चलाते हैं.

कोर्स की किताबों और यूनिफौर्म पर दुकानदारों से बाकायदा कमीशन तय कर लेते हैं, जिस के चलते दुकानदरों द्वारा मनमाने दामों पर इन्हें बेच कर मांबाप की जेब ढीली की जाती है.

यहां तक कि स्कूल का नाम और मोनोग्राम छपी कौपियों की भी मांबाप से मनमानी कीमत वसूल की जाती है. अगर वे बिना मोनोग्राम की कौपी खरीद कर बच्चों को दे भी देते हैं, तो स्कूल में इन कौपियों को नकार दिया जाता है और बच्चों को परेशान किया जाता है.

अनेक प्राइवेट स्कूल वाले अपने यहां बाकायदा काउंटर लगा कर बस्ता समेत पूरा कोर्स बेचने का धंधा भी करते हैं, जिस में कौपी, किताब समेत स्टेशनरी का पूरा सामान खुलेआम बेचा जाता है. इन प्राइवेट स्कूलों द्वारा दाखिले के समय पर भी डोनेशन के नाम पर मांबाप से मोटी रकम वसूल की जाती है.

प्राइवेट स्कूलों पर शिक्षा विभाग के अफसरों का कोई कंट्रोल नहीं रहता है, क्योंकि नामीगिरामी प्राइवेट स्कूलों का संचालन विधायक, सांसदों के अलावा बड़ेबड़े उद्योगपतियों द्वारा किया जा रहा है.

बस्ते का बढ़ता बोझ

स्कूली बच्चों की पीठ पर बस्ते के बो झ को कम करने के लिए भारत सरकार के मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा अक्तूबर, 2018 में नई गाइडलाइन जारी की गई है, जिस के मुताबिक क्लास के आधार पर बच्चों के बस्ते का वजन तय किया गया है.

मसलन, पहली और दूसरी जमात के लिए बस्ते का वजन डेढ़ किलो, तो तीसरी से 5वीं जमात के बच्चों के बस्ते का वजन 2 से 3 किलो है. 6वीं और 7वीं जमात के लिए 4 किलो और 8वीं, 9वीं जमात के लिए साढ़े 4 किलो और 10वीं जमात के लिए 5 किलो वजन तय किया गया है.

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दरअसल, बच्चों की पीठ पर लदे बस्ते का बो झ सरकार द्वारा तय सिलेबस के बोझ से सीधा संबंध रखता है. हमारे सिलेबस की यही खामी है कि यह बच्चों की उम्र व दिमागी सोच के मुताबिक तय नहीं है. कम उम्र के बच्चोंको कई विषयों के ज्यादा सिलेबस को पढ़ना पड़ता है.

उत्कृष्ट विद्यालय नरसिंहपुर के टीचर डाक्टर अशोक उदेनियां मानते हैं कि स्कूली सिलेबस बनाने वाली समिति में यूनिवर्सिटी के कुलपति, कालेज के प्रिंसिपल और प्रोफैसर होते हैं, जो स्कूली बच्चों का सिलेबस तैयार करते हैं. इन्हें स्कूली बच्चों के मनोविज्ञान और गांवदेहात के इलाकों के हालात का कोई खास तजरबा नहीं होता है.

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