गहरी पैठ

अच्छे दिनों की तरह प्रधानमंत्री का एक और वादा आखिर टूट ही गया. 24 मार्च, 2020 को उन्होंने वादा किया था कि लौकडाउन के 21 दिनों में वे कोरोना वायरस को हरा देंगे और महाभारत को याद दिलाते हुए कहा था कि 18 दिन के युद्ध की तरह कोरोना की लड़ाई भी जीती जाएगी.

अंधभक्तों ने यह बात उसी तरह मान ली थी जैसे उन्होंने नोटबंदी, जीएसटी, धारा 370 से कश्मीर में बदलाव, राष्ट्रभक्ति, 3 तलाक के कानून में बदलाव, नागरिक कानून में बदलाव मान लिया था. महाभारत के युद्ध की चाहे जितनी वाहवाही कर लो असलियत तो यही?है न कि युद्ध के बाद पांडवों की पूरी जमात में सिर्फ 5 पांडव और कृष्ण बचे थे, बाकी सब तो मारे गए थे.

पिछले 6 सालों से हम हर युद्ध में खुद को मरता देख रहे हैं. कोरोना के युद्ध में भी अब 15 लाख से ज्यादा मरीज हो चुके हैं और 35,000 से ज्यादा मौतें हो चुकी हैं. कहां है महाभारत का सा वादा?

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कोरोना की लड़ाई में हम उसी तरह हारे हैं जैसे दूसरी झड़पों में हारे. नोटबंदी के बाद करोड़ों देशवासियों को कतारों में खड़ा होना पड़ा पर काला धन वहीं का वहीं है. जीएसटी के बाद भी न तो सरकार को टैक्स ज्यादा मिला, न नकद लेनदेन बंद हुआ.

कश्मीर में धारा 370 को बदलने के बाद पूरा कश्मीर जेल की तरह बंद है. जो लोग वहां प्लौट खरीदने की आस लगा रहे थे या वादा जगा रहे थे अब भी मुंह छिपा नहीं रहे क्योंकि जो लोग रोज झूठे वादे करते हैं उन्हें वादों के झूठ के पकड़े जाने पर कोई गिला नहीं होता.

कोरोना के बारे में हमारी सरकार ने पहले जो भी कहा था वह इस भरोसे पर था कि हम तो महान हैं, विश्वगुरु हैं. हमें तो भगवान की कृपा मिली है. पर कोरोना हो या कोई और आफत वह धर्म और पूजा नहीं देखती. उलटे जो धर्म में भरोसा रखता है वह कमजोर हो जाता है. वह तैयारी नहीं करता. हम ने सतही तैयारी की थी.

हमारा देश अमेरिका और ब्राजील की तरह निकला जहां भगवान पर भरोसा करने वाले बहुत हैं. दोनों जगह पूजापाठ हुए. अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप के कट्टर समर्थक गौडगौड करते फिरते हैं. कई महीनों तक ट्रंप ने मास्क नहीं पहना. नरेंद्र मोदी भी मास्क न पहन कर अंगोछा पहने रहे जो उतना ही कारगर है जितना मास्क, इस पर संदेह है. देश की बड़ी जनता उन की देखादेखी मास्क की जगह टेढ़ासीधा कपड़ा बांधे घूम रही है.

इस देश में बकबकिए भी बहुत हैं. यहां बोले बिना चैन नहीं पड़ता और बोलने वाले को सांस लेने के लिए मास्क या अंगोछा टेढ़ा करना पड़ता है. यह अनुशासन को ढीला कर रहा है. नतीजा है 15 लाख लोग चपेट में आ चुके हैं और 5 लाख अभी भी अस्पतालों में हैं. जहां साफसफाई हो ही नहीं सकती क्योंकि साफसफाई करने वाले जिन घरों में गायों के दड़बों में रहते हैं वहां गंद और बदबू हर समय पसरी रहती है.

कोरोना की वजह से गरीबों की नौकरियां चली गईं. करोड़ों को अपने गांवों को लौटना पड़ा. जमापूंजी लौटने में ही खर्च हो गई. अब वे सरकारी खैरात पर जैसेतैसे जी रहे हैं. यह जीत नहीं हार है पर हमेशा की तरह हम घरघर पर भी जीत का सा जश्न मनाएंगे जैसे महाभारत पढ़ कर या रामायण पढ़ कर मनाते हैं.

देश में नौकरियों का अकाल बड़े दिनों तक बना रहेगा. पहले भी सरकारी फैसलों की वजह से देश के कारखाने ढीलेढाले हो रहे थे और कई तरह के काम नुकसान के कगार पर थे, अब कोरोना के लौकडाउनों की वजह से बिलकुल ही सफाया होने वाला है. रैस्टोरैंटों का काम एक ऐसा काम था जिस में लाखों नए नौजवानों को रोजगार मिल जाता था. इस में ज्यादा हुनर की जरूरत नहीं होती. गांव से आए लोगों को सफाई, बरतन धोने जैसा काम मिल जाता है. दिल्ली में अकेले 1,600 रैस्टोरैंट तो लाइसैंस वाले थे जो अब बंद हैं और उन में काम करने वाले घर लौट चुके हैं. थोड़े से रैस्टोरैंटों ने ही अपना लाइसैंस बनवाया है क्योंकि उन्हें नहीं मालूम कि कब तक बंदिशें जारी रहेंगी.

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ऐसा नहीं है कि लोग अपनी एहतियात की वजह से रैस्टोरैंटों में नहीं जाना चाहते. लाखों तो खाने के लिए इन पर ही भरोसा रखते हैं. ये सस्ता और महंगा दोनों तरह का खाना देते हैं. जो अकेले रहते हैं उन के लिए अपना खाना खुद बनाना एक मुश्किल काम है. अब सरकारी हठधर्मी की वजह से न काम करने वाले को नौकरी मिल रही है, न खाना खाने वाले को खाना मिल रहा है. यह हाल पूरे देश में है. मकान बनाने का काम भी रुक गया. दर्जियों का काम बंद हो गया क्योंकि सिलेसिलाए कपड़ों की बिक्री कम हो गई. ब्यूटीपार्लर बंद हैं, जहां लाखों लड़कियों को काम मिला हुआ था. अमीर घरों में काम करने वाली नौकरानियों का काम खत्म हो गया.

बसअड्डे बंद हैं. लोकल ट्रेनें बंद हैं. मैट्रो ट्रेनें बंद हैं. इन के इर्दगिर्द सामान बेचने वालों की दुकानें भी बंद हैं और इन में वे लोेग काम पा जाते हैं जिन के पास खास हुनर नहीं होता था. ये सब बीमार नहीं बेकार हो गए हैं और गांवों में अब जैसेतैसे टाइम बिता रहे हैं.

दिक्कत यह है कि नरेंद्र मोदी से ले कर पास के सरकारी दफ्तर के चपरासी तक सब की सोच है कि अपनी सुध लो. नेताओं को कुरसियों की पड़ी है, चपरासियों को ऊपरी कमाई की. ये जनता के फायदेनुकसान को अपने फायदेनुकसान से आंकते हैं. ये सब अच्छे घरों में पैदा हुए और सरकारी दया पर फलफूल कर मनमानी करने के आदी हो चुके हैं. इन्हें आम जनता के दुखदर्द का जरा सा भी खयाल नहीं है. ये गरीबों की सुध लेने को तैयार नहीं हैं. इन के फैसले बकबक करने वाले होते हैं, नारों की तरह होते हैं और 100 में से 95 खराब और गलत होते हैं. अगर देश चल रहा है तो उन लोगों की वजह से जो सरकार की परवाह किए बिना काम किए जा रहे हैं, जो कानून नहीं मानते, जो सड़कों पर घर बना सकते हैं, सड़कों पर व्यापार कर सकते हैं.

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आज अगर भुखमरी नहीं है तो उन किसानों की वजह से जो बिना सरकार के सहारे काम कर रहे हैं. उन कारीगरों की वजह से जो छोटेमोटे कारखानों में काम कर रहे हैं. आज देश गरीबों की मेहनत पर चल रहा है, अमीरों की सूझबूझ और सरकार के फैसलों पर नहीं.

दगाबाजी एक आशिक की

उपलब्धि : भाग 3- ससुर के भावों को समझ गई बहू

‘‘कमरे में रुई के गुब्बारे नहीं, उस के मथे हुए अरमानों की धूल उड़ रही थी. मेरे देखते ही देखते उन्होंने रजाई के चीथड़े कर दिए. ठंड से ठिठुर कर वह जाड़ा गुजारा मैं ने, पर मामा से दूसरी रजाई मांगने का साहस न जुटा पाया. जीवनभर कभी भी किसी से जिद कर के कुछ मांगने का दिन नहीं आया. ‘‘आज किसी बच्चे की कोई भी जिद पूरी कर के मुझे बड़ी आत्मतृप्ति होती है.

‘‘इस कच्ची उम्र में होस्टल में मत भेजो, जबकि तुम लोग जिंदा हो, मैं जिंदा हूं. कल से मैं पढ़ाया करूंगा मीतू को. वह सुधर जाएगी. मांबाप के प्यार में वह ताकत है जो शायद होस्टल के कठोर अनुशासन में नहीं है.’’ छोटी बहू की आंखें सजल हो उठतीं. क्या किसी के पास थोड़ा सा भी अतिरिक्त प्यार नहीं बचता है एक अनाथ बच्चे के लिए? थोड़ा सा स्नेह जहां जादू कर सकता है, सारे विष को अमृत में बदल सकता है, वहां ये समर्थ दुनिया वाले अपनी क्षमता का दुरुपयोग क्यों करते हैं?

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कुछ देर के लिए बाबूजी की उन धुंधली आंखों की सजल गहराई में डूबतीउतराती वह वर्षों पीछे घिसटती चली जाती. प्यार का लबालब भरा प्याला किसी के होंठों से लगा है, पर वह उस स्वाद की अहमियत नहीं जानता और जिस के आगे से अचानक प्यार की भरी लुटिया खींच ली गई हो वह प्यासे मृग की भांति भाग रहा है. और वह खो जाती है अपने वार्षिक परीक्षाफल की घोषणा के दिनों की याद में. वह कक्षा में प्रथम आती है और उस से उम्र में बड़ी चचेरी बहन किसी तरह पास हो जाती है. चाची हाथ मटकामटका कर कहती है, ‘‘देखो, आजकल की बहुरूपिया लड़कियों को, कैसे दीदे फाड़ कर चीखती थी कि हाय, मेरा परचा बिगड़ गया. इधर देखो तो पहला नंबर ले कर आ रही है. हाय, कितने नाटक रचे.’

वह प्रथम आई है, इस की खुशी मनाना तो दूर रहा, पर कभी परचा बिगड़ जाने पर रो पड़ने की बात पर चाची उलाहना देना न भूलीं. स्वाभाविक था कि कितना भी अच्छा विद्यार्थी हो, वह परीक्षा के दिनों में ऊटपटांग सोचता है, डरता है. पर उस के लिए तो स्वाभाविक बात या व्यवहार करना भी संभव न था. वह सब की नजरों में एक वयस्क, समझदार और सख्त लड़की थी, जिस के लिए नाबालिग की तरह व्यवहार करना अशोभन था. और जब आर्थिक झंझटों के बावजूद बाबूजी ने उसे अपनी छोटी बहू मनोनीत किया था, तब तो मानो कहर बरपा था.

‘क्या देख कर ले जा रहे हैं?’ एक ने कटाक्ष करते हुए कहा था. ताईजी का स्नेह जरूर था इस पर. हौलेहौले वे बोली थीं, ‘अजी, ऐसा मत कहो. हमारी बिटिया का चेहरामोहरा तो अच्छा है. हरदम हंसती आंखें, तीखी नाक और पढ़ाई में अव्वल.’

हां, उस के साधारण से चेहरे पर एक ही असाधारण बात थी. उस की हंसती हुई आंखें-जैसे प्रतिज्ञा कर ली थी उन आंखों ने कि हर उदासी को हरा कर रहेंगे और यही उस का गुण बन गया था-हंसमुख बने रहना. वह अपने आसपास देखती कि इस अभावग्रस्त दुनिया में सुखसुविधा के बीच भी आदमी अभाव का अनुभव कर रहा है. जो भौतिक सुखों से वंचित है वह भी और जो सुविधाप्राप्त है वह भी. शायद भौतिक सुख दुनिया के हर कोने तक पहुंचाने में हम असमर्थ हैं, पर स्नेह के अगाध सागर से लबालब भरा है यह मानव मन. यदि थोड़ा सा भी सिंचन करना शुरू कर दे हर कोई तो सारी धरती, सारी जगती सिंच जाए. इतना थोड़ा सा त्याग वह भी करेगी और करवाएगी. आखिर इस में तो कोई खर्च नहीं है? आजकल की दुनिया में हिसाब से चलना पड़ता है, पर मन का कोई बजट नहीं बन सका है आज तक और न ही प्यार का कोई माप. इसलिए जहां तक स्नेहप्रेम खर्च करने का सवाल है, बेझिझक आगे बढ़ा जा सकता है. वहां न कोई औडिट होगा न कोई चार्ज.

पर हिसाबी है न मानव मन. हो सकता है कभी कोई माप निकल आए और स्नेह का भी हिसाब देना पड़े. शायद यही सोच कर स्नेह के भंडार भरे पड़े हैं और रोते दिलों को लुटाने को कोई तैयार नहीं दूरदर्शी, समझदार आदमी की जात. खिलखिला कर हंस उठी वह. ‘‘कैसी पगली हो तुम? मन ही मन हंसती हो और रोती हो,’’ पति की मीठी झिड़की सुन कर चुप हो गई वह. फिर तुनक कर बोली, ‘‘क्यों, हंसने पर कोई टैक्स तो है नहीं और जहां तक रोने का सवाल है, तुम्हें पा कर, तुम लोगों के बीच इस ग्रीन हाउस की ठंडी छांव में रो कर भी शांति मिलती है. मानो, बीती कड़वी यादों को धो कर बहाए दे रही हूं.’’

कड़ाके की सर्दी पड़ रही थी. परिवार के सभी सदस्य रजाई में दुबके पड़े थे, पर इतना शोरगुल होने लगा कि एकएक कर सब उठने को मजबूर हो गए. बैठक से शोरगुल की आवाज आ रही थी. एकएक कर सब भीतर झांकने लगे.

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‘‘आइए, आइए,’’ छोटी का सदा सहास स्वर. मेज पर एक बड़ा सा केक रखा था. और चाय की प्यालियां सजी थीं. सारे बच्चे बाबूजी को खींच कर मेज तक ला रहे थे. छोटी ने प्यालियां भरनी शुरू कीं. चाय की सुगंध से कमरा महक उठा. बच्चों ने दादाजी को ताजे गुलाब के फूलों का गुलदस्ता भेंट किया. छोटी ने उन की कांपती उंगलियों में छुरी पकड़ा दी. बच्चे एकसाथ गाने लगे, ‘‘हैप्पी बर्थ डे टू यू… दादाजी, जन्मदिन मुबारक हो…’’

परिवार के सदस्यों ने भुने हुए काजुओं के साथ चाय की चुस्की ली. केक का बड़ा सा टुकड़ा छोटी ने बाबूजी को पकड़ा दिया. कनखियों से सास की ओर देखा बाबूजी ने. फिर उन की आंखों में जो स्नेह का सागर उमड़ रहा था वह सब के कल्याण के लिए, सारी दुनिया के वंचित लोगों के लिए, सारी जगती के अतृप्त बच्चों के मंगल के लिए बहने लगा… ‘‘मेरा जन्मदिन आज तक किसी ने नहीं मनाया था, बेटी…’’ और छोटी को लगा, स्नेह के इन कीमती मोतियों को वह पिरो कर रख ले.

उपलब्धि : भाग 2- ससुर के भावों को समझ गई बहू

बाबूजी के प्रति एक नई स्नेहधारा प्रवाहित होने लगी उस के हृदय में. उस की थीसिस जमा हो गई थी. अब बाकी रहा था साक्षात्कार. सुबहसुबह बस से इंटरव्यू के लिए जाना था. घर के सभी सदस्य अभी सो रहे थे. उस के एक परीक्षक आज ही वापस भी चले जाने वाले थे शाम की गाड़ी से, इसलिए इतनी सुबह जाना था. किसी तरह तैयार हो कर वह निकली. सामने कांपते हाथों में चाय का प्याला पकड़े बाबूजी खड़े थे. लज्जित हो वह बोली, ‘‘आप ने क्यों तकलीफ की?’’

सस्नेह वे बोले, ‘‘मेरी कामना है कि तुम्हारा उद्देश्य सफल हो.’’ झुक कर उन के पांव छू कर वह चल दी.

एकांत के सुनहरे क्षणों में स्नेहमयी बांहों की घेराबंदी से अपने को मुक्त करती हुई वह बोली, ‘‘आज मुझे सुबहसुबह बड़ी अजीब सी स्थिति का सामना करना पड़ा. बाबूजी ने स्वयं अपने हाथों से मुझे चाय बना कर ला कर दी है.’’

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‘‘तो इस में इतना परेशान होने की क्या बात है, रानी? बाबूजी तो काफी समय से यही करते आए हैं. मां इतनी सुबह उठ नहीं पाती थीं. रात में घर के ढेरों काम रहते थे. बाबूजी रोज 5 बजे सुबह हम लोगों को चाय बना कर देते थे. तब कहीं जा कर हम लोग पढ़ने के लिए बैठते थे.’’ ‘‘ओह डार्लिंग, जिस बात को तुम लोग इतना सामान्य मानते हो, वह मेरे लिए एक निहायत ही मूल्यवान अनुभव है,’’ वह बोली, और उत्तर में मिली एक मुसकान.

इस घर के चारों ओर जो हरियाली थी उसी के कारण पड़ोसी उसे ग्रीन हाउस कहते और इस परिवार के सदस्यों का आपसी स्नेह सब की ईर्ष्या की वस्तु थी. नई बहू का शोषण करने के इरादे से कोई बातूनी आ कर कहती, ‘‘चलो न, छोटी, आज मेरे पति फ्री हैं. हम दोनों नाइट शो देख आएं. मेरे पति, तुम्हारे पति के सहकर्मी ही नहीं, जिगरी दोस्त भी हैं.’’ तनिक झिझक से वह कहती, ‘‘बाबूजी को ज्यादा रात गए घर लौटना पसंद नहीं है.’’

‘‘ओह, अपने बूढ़े ससुर से कहो ये दकियानूसी बातें भूल जाएं. आखिर एक मैट्रिकुलेट का देखनेसोचने का क्षेत्र तो सीमित होगा ही.’’

छोटी का दिल छलनी होने लगा. बाबूजी ज्यादा पढ़ नहीं पाए, क्या इसलिए वे व्यापक रूप से देखसमझ नहीं पाते? काश, ये छींटे कसने वाली यह गु्रेजुएट महिला जानती कि कितनी तमन्ना थी उन में पढ़ने की. पर कौन पढ़ाता उन्हें? दूर के रिश्ते के एक मामा ने मैट्रिक पास करते ही असम के जंगलों में भेज दिया उन्हें नौकरी करने. किसी तरह अपने को संभाल कर बोली, ‘‘छोटी ननदें हैं न घर में, उन पर क्या असर पड़ेगा?’’ ‘‘अरे, छोड़ो भी. वे क्या तुझे आदर्श बना कर जी रही हैं. ये स्कूलकालेजों में पढ़ने वाली छोकरियां तो अब तक अपना आदर्श ढूंढ़ चुकी होंगी.’’

अब वह क्या कहती? शिक्षा के दीवाने बाबूजी क्या उन लोगों को छोड़ने वाले हैं? हाथ धो कर पीछे लगे रहते हैं ताकि उन लोगों की पढ़ाई पूरी हो जाए. शांत, समझदार सास कभीकभी तुनक भी उठतीं, ‘पढ़ाई के पीछे होशोहवास खो बैठते हैं. यही एक नशा है इन को. लड़कियां घर का कामधाम भले ही न सीखें, बस दिनरात किताबें लिए रटती रहेंगी. लड़कों को तो पढ़ालिखा कर बड़ा लाट बना दिया.’ ‘लाट नहीं तो क्या? उन के ठाठ क्या किसी से कम हैं?’ बाबूजी एक संतोषपूर्ण मुखमुद्रा में चिल्लाचिल्ला कर कहते, ‘पड़ोसी पूछते हैं कि तुम्हारा कितना बैंक बैलेंस है? मैं कहता हूं कि मैं ने अपना पैसा बैंकों में जमा कर दिया है. पांचों बेटे मेरे हीरे हैं.’ उन्हें बैंक बैलेंस शून्य होने का कोई भी दुख नहीं था.

बेटे कभीकभी चिढ़ जाते, ‘हां, हां, लिखायापढ़ाया ही तो है. और क्या दिया है? हम लोग अपनी मेहनत से आगे बढ़े. तुम ने खापी कर सब खर्च कर दिया.’ ‘जरूर किया. कमाया है, खाऊंगा नहीं?’ बाबूजी अपना धीरज खो बैठते. भिन्नभिन्न प्रकार के पकवानों के प्रति वे अपना लोभ न रोक पाते. खाने का शौक बराबर रहा है उन्हें. यह तो उन के बाजार से अपनी मनपसंद चीजें लाने का शौक देख कर ही वह समझ जाती. दूसरी बहुएं और सास मुंह में कपड़ा ठूंस कर ठिठोली करतीं, ‘‘दांत नहीं रहे, फिर भी खाते किस शौक से हैं. शायद उम्र के साथ लालच और भी बढ़ गया है.’’

मनोविज्ञान की छात्रा छोटी सोचती कि इन लोगों को कौन समझाए. स्नेह और प्यार की वह भूख जो मिट न पाई, उसे जीभ की संतुष्टि द्वारा पेटभर कर मिटाना चाहता है स्नेह का प्यासा वह व्यक्ति. उस के अतृप्त मन ने अपना समाधान खोज निकाला है, पर यदि वह बोलने लगे तो वे हंस कर बोलेंगी, ‘‘चल री, यह कोई तेरी विश्वविद्यालय की कक्षा है, जो लैक्चर झाड़ रही है. अपनी छात्राओं को सिखाना जा कर.’’ प्यार मिला नहीं, पर प्यार लुटाना आता है बाबूजी को. पतंग पकड़ने के लिए जाने पर किस तरह मामा के हाथों पिटाई हुई थी, वही किस्सा सुनातेसुनाते वे मंडू को पतंग बनाना सिखाते. ‘‘स्कूल खुल रहे हैं, मीतू की बरसाती लानी है,’’ सुबह से ही वे हल्ला मचाने लगते मानो मीतू की बरसाती लाने से बड़ा कोई काम इस दुनिया में बचा ही न हो. जब मीतू शैतानी करती तब संझली कहती, ‘‘अब मैं इसे होस्टल में डाल दूंगी.’’

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‘‘मजाक में भी होस्टल का नाम मत लेना. बेटी, मांबाप के रहते बच्ची को भला होस्टल में क्यों रहना पड़े इस कच्ची उम्र में? मुझे भी मामा ने 9वीं कक्षा में होस्टल में रख दिया था…’’ वे खो जाते उन दिनों की याद में जब उन्हें पोखर से कमल चुरा कर लाने में बड़ा आनंद आता था. लालाजी के कुम्हड़े की बेल काट कर फेंक देने में हर्ष होता था. और कितना मजा आता था चाचाजी की गाय के बछड़े को छोड़ देने में, जिस से पूरा दूध बछड़ा पी जाए और लल्लन चाचा उसे गालियां सुनाने घर आ धमकें. इस खेल में उपलब्धि शायद भौतिक लाभ की दृष्टि से कुछ भी न होती, पर एक किशोर बालक का अहं तृप्त हो जाता. पर किस को परवा थी उस के अहं की. वह तो पराश्रित अनाथ बालक था, इसीलिए मामा ने उसे होस्टल में भरती कर दिया था. ‘‘जाड़े के दिन थे. बहू और मामा नई रजाई दे गए थे मुझे. लड़कों ने मेरी नईनई रजाई देखी तो ईर्ष्यावश दौड़े आए और हंसने लगे, ‘अरे, मुंडी रजाई है, मुंडी.’ मेरी रजाई के किनारों पर पाइपिंग नहीं थी. बस, छोकरों को बहाना मिल गया. सब के सब टूट पड़े मुंडी रजाई पर और सारी रुई नोचनोच कर हवा में उछालने लगे. एक असहाय किशोर पर उस रात क्या बीती, यह उस का दिल ही जानता है.

जानें आगे क्या हुआ कहानी के अगले भाग में…

उपलब्धि : भाग 1- ससुर के भावों को समझ गई बहू

पहले आने वालों का तांता लगा रहा और अब जाने वालों का सामान बंध रहा था. घर एक चौराहा बन गया था, न वहां किसी को पहचानने का काम था न जानने की फुरसत. सपने की तरह दिन बीत गए और अब एकदूसरे के करीब आने का वक्त मिला था. बैंडबाजे, शहनाई की इतराती धुन और बच्चों के कोलाहल के बाद यह मधुर शांति अच्छी ही लग रही थी उसे. केवल बहुत ही नजदीकी संबंधियों और इस बड़े परिवार के सदस्यों के सिवा लगभग सभी मेहमान विदा हो चुके थे.

जब भी खाली समय मिलता, अवकाशप्राप्त वृद्ध ससुर नई छोटी बहू के पास आ कर बैठ जाते. नयानया घूंघट बारबार खिसक जाता और मंद मुसकान से भरी 2 आंखें वृद्ध की ओर सस्नेह ताकती रहतीं. यह सब बिलकुल नयानया लग रहा था उसे. वास्तविकता की क्रूर धरती पर पली, आदर्श की सूखी ऋतुओं को झेलती, हर परिस्थिति से जूझने की क्षमता रखने वाली वह इस अनोखे स्नेहसिक्त ‘ग्रीन हाउस’ की छत तले अपनेआप को नए सांचे में ढाल रही थी. ‘‘बेटी, अधूरी मत छोड़ना अपनी पढ़ाई, तुझे कोई सहयोग दे न दे, मैं पूरा सहयोग दूंगा. मैं तो दीवाना हूं लिखाईपढ़ाई का.’’ वृद्ध बारबार उस से यह आशा कर रहे थे कि वह उन की बात का उत्साह से जवाब देगी जबकि वह लाज से सिमटी कनखियों से जेठानी व ननदों की भेदभरी मुसकान का सामना कर रही थी.

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क्या बाबूजी भूल गए कि उस का ब्याह हुए केवल 3 ही दिन हुए हैं और अभी वह जिस दुनिया में विचर रही है, वह पढ़ाईलिखाई से कोसों दूर है? पर बाबूजी की निरंतर कथनी न जाने किस अंतरिक्षयान की सी तेज रफ्तार से उसे चांदसितारों की स्वप्निल दुनिया से वास्तविकता की धरती पर ला पटके दे रही थी. पिछले कुछ दिनों में वह लगभग भूल गई थी कि उसे अपने शोधकार्य की थीसिस इसी माह के अंत में जमा करनी है. नातेरिश्तेदारों के मानसम्मान, आवभगत और बच्चों के कोलाहल के बीच भी बाबूजी बराबर उसे आआ कर कुरेदते रहते थे, ‘‘देख बेटी, राजा अपने देश में ही पूज्य होता है, पर विद्वान

का हर जगह सम्मान होता है. तुम विदुषी हो, अपना ध्यान बंटने न देना. तुम्हारे हमजोली लाख भड़काएं, तुम अडिग रहना.’’ और यह कुछ हद तक सच भी था. बड़ी ननद 2-3 बार मजाक में कह चुकी थी, ‘‘अब मेरा भैया ही इस की थीसिस बन गया है. क्या होगी अब लिखाईपढ़ाई इस से. और पीएचडी कर के भी क्या करना है? आखिर में तो वही चूल्हाचौका करना है.’’

‘‘सिर्फ यही दीदी?’’ मझली जेठानी ने आंख मारते हुए कहा था और लाज से उस के कान लाल हो उठे थे. परिवार की हमउम्र सदस्याएं कहती थीं, ‘‘यह दिन रोजरोज नहीं आएगा. जाओ, क्वालिटी में तुम दोनों आज नाइट शो में फिल्म देख आओ.’’ भरेपूरे परिवार में 2 सहमतेधड़कते दिलों को मिलाने वाले मासूम एकांत क्षण, भविष्य के सुनहरे स्वप्नजाल और एकदूसरे में खो जाने के अरमान, पर घड़ी की टिकटिक की तरह बूढ़े बाबूजी की वही रट हरदम मानो कानों पर चोट करती रहती और वह अपनेआप को अपराधी महसूस करने लगती. ओह, ज्यादा पढ़लिख लेना भी अच्छा नहीं, जीना दूभर हो जाता है.

मधुर मिलन की मीठी घडि़यों में भी एक अपराधी सी हो उठती वह. क्या यही चीज कभी उस की कम पढ़ीलिखी जेठानी या बड़ी ननद को कचोटती न रही होगी? कभी नहीं. वे तो जीवन की स्थूल उपलब्धि से ही बेहद संतुष्ट दिखलाई देती हैं. वह केवल सूक्ष्मतम उपलब्धि की बात क्यों सोचती है? इतने बड़े मकान की बंद हवा में वह घुटन सी महसूस करती और इसीलिए वह छत पर जा कर आसमान के नीचे खुले में खड़ी हो जाती. एक बार वह बादल के एक सफेद टुकड़े की सूर्यकिरणों के साथ होती अठखेलियां देखने में मग्न थी कि उस के कानों में कुछ खुसुरफुसुर सुनाई दी.

‘‘बाबूजी का सारा स्नेह मानो बरसात की तरह उमड़ा आ रहा है. छोटी बहू ने आज क्या खाना खाया? वह कमजोर होती जा रही है? और देखा, ढेर सारे फल उस के लिए बाजार से खरीद लाए. खाए चाहे न खाए. हम लोगों से भी तो पूछना था?’’ तभी उसे याद आया. नई जगह में आ कर उसे भूख ही नहीं लग रही थी. यह बात जान कर कि उसे रोज रात को गरम दूध पीने की आदत थी, ससुर अपने सामने बैठा कर दूध का गिलास देने लगे थे. फिर जब भूख नहीं सुधरी तो बारबार पूछते, ‘‘तुम्हें क्या तकलीफ है, बेटी, शरमाना मत. जरूर बतलाना.’’ और फिर एक दिन ढेरों फल ले आए थे. वह क्या बोलती? स्मितभरी आंखों से उन की ओर ताकती रही. उसे यह सब अजीब सा लगता.

बचपन में ही वह मातापिता को खो बैठी थी. ताऊचाचा, ताईचाची और फुफेरेचचेरे भाईबहनों के कठोर अनुशासन के बीच वह जान ही न पाई थी कि ममता का स्रोत उस के जीवन में सूख गया है. स्नेहममता का यह नया झरना उस के लिए अनोखा था. समय पर उसे खानेपहनने को मिल जाता है. पर कभी किसी ने उस के दिल में क्या है, जानने का न तो प्रयत्न किया था और न ही कभी यह सोचा था कि उस की भी कोई इच्छा हो सकती है. ये छोटीछोटी बातें, ये जराजरा से आग्रह उस के लिए तो हिमालय जैसे थे.

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सीढि़यों पर पदचाप ऊपर की ओर ही आ रहा था. मझली के उलाहने का उत्तर देती हुई मझली बोली, ‘‘तुम ठीक कह रही हो, दीदी, पर बाबूजी ने छोटी को देखने के बाद यही कहा था, ‘लड़की देखनेसुनने में साधारण है, पर प्रतिभाशाली लगती है. खैर, प्रतिभाशाली लड़कियां तो मेरे छोटे बेटे के लिए कई मिली हैं, लेकिन मैं यहीं उस की शादी करूंगा.’ मालूम है क्यों? छोटी के मांबाप नहीं हैं न. बाबूजी उस की पीड़ा शायद हम लोगों से ज्यादा समझते हैं.’’ ‘‘हां, यह तो सच है. उस लिहाज से देखो तो बाबूजी का स्नेह भले ही पक्षपातपूर्ण हो, पर है सही.’’

उस ने हौलेहौले चूडि़यां खनका दीं. दोनों तब तक ऊपर आ चुकी थीं. ‘‘अरे छोटी, तेरी चूडि़यों की खनक से पता चला, तू यहां है. तेरी ही बात हो रही थी. बाबूजी तुम से बेहद स्नेह करते हैं. मालूम है क्यों? उन्हें भी न मां का प्यार मिला, न पिता का लाड़.’’ फिर उसे प्यार से अपनी छाती से सटा कर मझली बोली, ‘‘मेरे प्यारे देवर को पाने के बाद तुझ सा प्रसन्न भला और कौन हो सकता है?’’ प्यार के इस छोटे से प्रदर्शन से ही उस का दिल कुलांचें भरने लगा. कभी भी किसी ने उसे इस तरह प्यार नहीं किया था. बचपन से ही वह वयस्कों में मानी जाने लगी थी. उस की बालसुलभ आकांक्षाओं को भी तो असमय ही कुचल दिया गया था अनुशासन की कुल्हाड़ी से.

जानें आगे क्या हुआ कहानी के अगले भाग में…

न्याय करता ‘गुंडों का गैंग’

भीड के रूप में ‘गुंडो का गैंग’ बनाकर न्याय देने का चलन नया नहीं है. महाभारत में द्रोपद्री का गुनाह इतना था कि वह अंधेपन पर हंस दी थी. द्रोपदी को दंड देने के लिये जुएं में उसका छलपूर्वक जीता गया और भरी सभा में अपमानित करके दंड दिया गया. सभा भीड का ही एक रूप थी. औरत के अपमान पर मौन थी. ऐसी तमाम घटनायें धार्मिक ग्रंथों में मौजूद है. यही कहानियां बाद में कबीलों में फैसला देने का आधार बनने लगी. देश की आजादी के बाद कबीले खत्म हो गये पर उनकी संस्कृति खत्म नहीं हुई. कबीलों की मनोवृत्ति ‘खाप पंचायतो’ में बदल गई. कानूनी रूप से खाप पंचायतो पर रोक लगी तो भीड के रूप में न्याय देने की शुरूआत हो गई. इनको राजनीति से ताकत मिलती है. भीड के रूप में उमडी जनता ने 1992 में अयोध्या में ढांचा ढहा दिया. जिन पर आरोप लगा वह हीरो बनकर समाज का प्रतिनिधित्व कर रहे है. मजेदार बात यह है कि ढांचा ढहाने की जिम्मेदारी भी कोई लेने को तैयार नहीं है. कानून के समक्ष चैलेंज यह है कि भीड के रूप में किसको सजा दे ? भीड के रूप को तय करने की उहापोह हालत ही अपराध करने वालों को बचने का मौका दे देती है.

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कन्नौज जिले के कोतवाली क्षेत्र के बनियान गांव में शिवदेवी नामक की महिला अपने मायके में रहती थी. शिवदेवी के पति की मौत हो चुकी थी. उसके अपने 5 बच्चे भी थे. पति की मौत के बाद ससुराल वालों के व्यवहार से दुखी होकर शिवदेवी अपने मायके रहने चली आई थी. यहां भी परिवार के लोग उसका साथ नहीं दे रहे थे. ऐसे में गांव के ही रहने वाले दीपक ने उसकी मदद करनी शुरू की. दीपक दिव्यांग था. वह अक्सर समय बेसमय भी जरूरत पडने पर शिवदेवी के घर आ जाता था. शिवदेवी के चाचा और उनके परिजनों को यह बुरा लगता था. 24 अगस्त 2020 को दीपक शिवदेवी से मिलने उसके घर आया तो शिवदेवी के चाचा और उनके लडको ने उसे और शिवदेवी को कमरे में बंद करके पीटना शुरू कर दिया. इसके बाद अगले दिन बुद्ववार की सुबह दोनो के सिर मुंडवाकर मुंह पर कालिखपोत कर, गले में जूतों की माला पहनाकर, डुगडुगी बजाकर पूरे गांव में जुलूस बनाकर निकालना शुरू कर दिया.

मुंह पर कालिख पोते, गले में जूतों की माला पहने शिवदेवी और दीपक भीड के द्वारा पूरे गांव में घुमाये जा रहे थे. गांव के बच्चे, महिलायें, बडेबूढे इस तमाषें को देख रहे थे. कुछ लोग इसका वीडियों भी बना रहे थे. वीडियों बनाकर वायरल भी कर दिया गया. जिसकी आलोचना षुरू हो गई. इसके बाद पुलिस गांव पहुंची तो भीड से किसी तरह से दोनो को छुडाकर थाने लाई. शिवकुमारी और दीपक को थाने में नजरबंद किया गया. पुलिस ने भीड के खिलाफ मुकदमा कायम करने की बात कही. भीड का यह न्याय केवल कन्नौज भर तक सीमित नहीं है. पूरे देश में भीडतंत्र ‘गुंडो का गैंग’ बनाकर न्याय देने का काम करने लगा है. यही घटना जब हिन्दू मुसिलम के बीच होती है तो ‘मौब लिन्चिग‘ मान लिया जाता है.

जैसा नेता वैसी प्रजा:

कहावत कि ‘जैसा राजा वैसी प्रजा‘ कन्नौज में भी यह कहावत पूरी तरह से फिट बैठती है. कोरोना काल में सही तरह से काम ना करने का आरोप लगाते हुये कन्नौज के भाजपा सासंद सुब्रत पाठक ने कन्नौज के दलित तहसीलदार अरविंद कुमार और लेखपाल को उनके घर में घुसकर पीटा. सांसद अकेले नहीं थे वहां पर 25 से अधिक उनके समर्थक थे. पीटे गये तहसीलदार ने न्याय की गुहार लगाई. विपक्ष के नेता अखिलेश यादव और मायावती भी घटना के विरोध में बयान देने लगे. इसके बाद पुलिस ने मुकदमा कायम कर पूरे मामलें की लीपापोती कर दी. अखिलेश यादव ने कहा कि ‘संासद के द्वारा एक दलित अफसर को पीटा जाना सरकार के चरित्र का बताता है‘.

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मायावती ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से कडे कदम उठाने की मांग की. सरकार ने कोई ऐसा कडा कदम उठाया नही. जो नजीर बन सके. इससे भयभीत होकर तहसीलदार अरविंद कुमार कर पत्नी अलका रावत ने कहा कि यहां हमें खतरा है इसलिये हमारा तबादला कहीं और कर दिया जाये. सांसद को किसी भी सरकारी कर्मचारी के खिलाफ कदम उठाने का अधिकार है. पर इस तरह से किसी अफसर को घुसकर उसके औफिस में पीटना सहीं नहीं है. जब नेता इस तरह से अपने काम करता है तो जनता भी उसी की राह पर चलने लग रही है. उसे भी कानून और पुलिस पर भरोसा नहीं रहा. वह ‘गुंडों का गैंग’ बनाकर खुद की फैसला करने लगी है.

मौब लिन्चिग‘ बनाम ‘गुंडो का गैंग’:

हिन्दू मुसलिम विवाद में भीड तंत्र के काम को ‘मौब लिन्चिग‘ का नाम दिया जाता है. भीड केवल अगल धर्म के लोगों के साथ ही भीड का रूप रखकर न्याय नहीं करती है अपने धर्म में भी यह भीड खूब न्याय करती है. यह न्याय ‘गुंडो का गैंग’ करता है. जिसे प्रषासन और सरकार का समर्थन हासिल होता है. उनको लगता है कि सरकार के बहाने वह प्रषासन को दबा लेगे. दबाव में पुलिस दरोगा उनके खिलाफ कोई काररवाई नहीं कर सकेगी. उत्तर प्रदेश में योगी सरकार आने के बाद ऐसी घटनाओं में ‘गुंडो के गैंग’ द्वारा भगवा कपडे या गमछा ले लिया जाता है. जिससे पुलिस को लगे की यह सरकार के आदमी है.

डायन, बाइक चोर, गौ-तस्कर, बच्चा चोर, हिंदू- मुस्लिम विवाद, धर्म का अपमान न जाने क्या-क्या कारण ढूंढ भीड़ बिना सुनवाई के सड़क पर ‘न्याय‘ करने लगी है. भीड़ आरोपी को बिना किसी सुनवाई के मौत के घाट उतार देती है. लोकतंत्र का अर्थ देश की जनता भूल गई है. झारखंड के खूंटी जिले के पास कर्रा में दिव्यांग व्यक्ति की गोकशी के संदेह में पीटकर हत्या कर दी जाती है. गुजरात के जामनगर जिले में चोर होने के शक में सात लोगों के एक समूह ने एक अज्ञात व्यक्ति की कथित तौर पर लाठी-डंडों से पिटाई कर दी. दरभंगा में चोरी के शक में एक युवक को भीड़ ने पीट-पीट कर अधमरा कर दिया, अस्पताल में उसकी मौत हो गई. झारखंड में तबरेज अंसारी को भीड़ द्वारा चोरी के शक में पकडा गया था, शक चोरी का था लेकिन उससे जय श्रीराम का नारा लगवाया जा रहा था. उसने जय श्री राम भी बोला और जय हनुमान भी, लेकिन मर चुकी मानवीय संवेदना को कहा फर्क पड़ने वाला था. वो उसे घंटों पीटते गए. तबरेज ही नहीं इससे पहले अखलाक और पहलू खान के साथ भी यही हुआ.

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छूट जाते है आरोपी:

भीड में ‘गुंडो का गैंग’ अपना काम कर जाता है और प्रषासन, पुलिस और कोर्ट इनको कोई सजा नहीं दे पाते. जिसके कारण आरोपियों के हौसले बुलंद होते है. भीड के द्वारा मारे गये लोगो के कई मामलों में ऐसा ही हुआ है. षाहजहांपुर में पुलिस के इंसपेक्टर की हत्या भीड के द्वारा की जाती है. आरोपी जमानत पर छूट कर बाहर आता है तो भगवा गैंग के लोग उसको सम्मान करते है. भीड के सामाजिक और मनोविज्ञानिक व्यवहार को देखे तो पता चलता है कि किसी घटना में एक व्यक्ति या संस्था के द्वारा भीड को भडकाया जाता है. भीड को भडकाने के बाद वह दूर से तमाषा देखता है. भीड के रूप में अपराध करने वाले दूसरे लोग होते है. पुलिस भडकाने वाले के खिलाफ मुकदमा कायम करके उसको हीरो बना देती है. कोई सबूत एकत्र नहीं किया जाता जिसकी वजह से भडकाने वाले व्यक्ति को अदालत छोड देती है. भीड के रूप में अपराध करने वाला कभी कानून की पक डमें नहीं आता है.

भीड के रूप में न्याय करने वाले हमेषा बहुसंख्यक होते है. यह जाति, धर्म, भाशा, बोली और क्षेत्रवाद के रूप मे अलग अलग हो सकते है. कहीं उत्तर भारत के रहने वालों पर भीड हमला करती है कहीं नार्थ ईस्ट के रहने वालों पर भीड हमला करती है तो कहीं उत्तर प्रदेश और बिहार के रहने वालों को इसका षिकार बनाया जाता है. जहां जैसी जरूरत होती है वहां वैसा फैसला भीड करती है. भीड के काम का श्रेय लेने वाले भी होते है पर कानून के सामने यह जिम्मेदारी नहीं लेते. देश में राममंदिर विवाद में अयोध्या का ढांचा ढहाया जाना सबसे बडी मिसाल है. भीड को भडकाने वालों ने राजनीति की. उसके बल पर कुर्सी हासिल की. जब अदालत ने पूछा तो सबसे इंकार कर दिया कि उन्होने भीड को भडकाया था.

भीड का बचाव है डायन-बिसाही जैसी प्रथायें:

बिहार और झारखंड से डायन-बिसाही जैसी कुप्रथा और अंधविश्वास की आड में भीड डायन बताकर औरतों को पीटपीट कर मार देती है. इसके तहत मारी गई औरतों की सबसे अधिक संख्या विधवाओं की होती है. इसकी वजह केवल यह होती है कि इनको मार दो जिससे जमीन जायदाद में हिस्सा ना देना पडे. रांची से तकरीबन 10 किलोमीटर दूर नामकुम के हाप पंचायत के बरूडीह में 55 वर्षीय चामरी देवी को डायन बताकर उनके ही परिवारवालों ने मार डाला था. इस मामले में सूमा देवी के परिवार के ही फौदा मुंडा, उनके बेटे मंगल मुंडा और रूसा मुंडा, खोदिया मुंडा समेत पांच लोगों पर आईपीसी की धारा 302 और 34 के तहत मामला दर्ज किया गया है.

इस तरह की एक नहीं तमाम घटनायें है. एनसीआरबी की रिपोर्ट में बताया गया है कि साल 2017 में झारखंड में डायन बताकर हत्या के 19 मामले समाने आए हैं. झारखंड पुलिस के अनुसार 2017 में ऐसी हत्याओं की संख्या 41 थी. 2016 में एनसीआरबी के हिसाब से राज्य में 27 औरतों को डायन बताकर मार दिया गया. झारखंड पुलिस के अनुसार यह आंकड़ा 45 है. साल 2015 में एनसीआरबी ने यह संख्या 32 बताई और झारखंड पुलिस ने 51. इसके बाद भी डायन और बिसाही बताकर भीड के द्वारा औरतों को मारने की आजादी पर रोक लगाने की बात कोई नहीं कर रहा है.

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एनसीआरबी के पांच साल के आंकड़ें बताते है कि भारत भर में डायन-बिसाही के नाम 656 हत्याएं हुई हैं. झारखंड में 2011 से लेकर सितंबर 2019 तक डायन-बिसाही के नाम पर 235 हत्याएं हुई है. सामाजिक संस्थाओं के द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार 1992 से लेकर अब तक 1800 महिलाओं को सिर्फ डायन, जादू-टोना, चुड़ैल होने और ओझा के इशारे पर मारा गया. झारखंड में डायन-बिसाही का शिकार होने वाली महिलाओं में 35 प्रतिशत आदिवासी और 34 प्रतिशत दलित हैं. बिहार में ‘डायन प्रथा प्रतिषेध अधिनियम 1999’ लागू होने के बाद वहां घटनायें जारी है. देश में न्याय कानून और संविधान से नहीं भीड के तंत्र और गंुडों के गैंग से चलता है. भीड पर सही फैसला ना होने के कारण हौसला बढता जा रहा है. भीड का न्याय रूकने का नाम नहीं ले रहा है.

दगाबाजी एक आशिक की : भाग 4

प्रिया आए दिन उस से सारा पैसा लौटाने का दबाव बना रही थी, लेकिन अचानक लौकडाउन लग गया. 28 मार्च को शमशाद लेबर को पैसे देने के लिए एक प्रकाशक से 2.80 लाख रुपए लाया था. प्रिया ने शमशाद के पास इतनी बड़ी रकम देख कर जब अपने पैसे मांगे तो शमशाद ने कहा कि यह पैसा मजदूरों को देना है.

लौकडाउन के कारण उन के पास खाने का कुछ नहीं है जब हालात थोड़ा ठीक होंगे और पैसा आएगा तो वह सारा पैसा चुका देगा. बस इसे ले कर दोनों में विवाद शुरू हो गया. बात हाथापाई तक पहुंच गई. उस वक्त रात का समय था.

प्रिया ने नाखूनों से शमशाद का मुंह नोंच डाला. इस के बाद वह दौड़ कर रसोई में गई और चाकू ले आई. उस ने शमशाद पर हमला कर दिया. इस हमले में शमशाद के हाथ की कलाई कट गई.

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हाथ से खून बहता देख शमशाद गुस्से से पागल हो गया और उस ने प्रिया को जोर का धक्का दे दिया. प्रिया जमीन पर गिर पड़ी.

शमशाद ने लपक कर जमीन पर पड़ी प्रिया का गला पकड़ लिया और जोर से दबाने लगा. गुस्से और जुनून में शमशाद उस का गला तब तक दबाता रहा जब तक उस के शरीर ने छटपटाना बंद नहीं कर दिया.

शमशाद के सिर पर चढ़ा गुस्से का उबाल जब शांत हुआ तो उस ने अपने सामने प्रिया का शिथिल पड़ा शरीर देखा. उस ने प्रिया को हिला डुला कर देखा. पहले उसे लगा कि शायद वो बेहोश हो गई है. लेकिन उस ने प्रिया की नब्ज से ले कर नथुनों से आने वाली सांसों को टटोला. तब उसे यकीन हुआ कि उस ने गुस्से में आ कर क्या कर दिया है. प्रिया की मौत हो चुकी थी. तभी शमशाद के दिमाग में एकाएक खुद को बचाने के लिए एक शैतानी खयाल आया.

उस ने सोचा कि क्यों  न प्रिया के साथ उस की बेटी कशिश को भी खत्म कर दिया जाए. जब कोई गवाह ही नहीं रहेगा तो पुलिस उसे किस सबूत के आधार पर पकड़ेगी.

कुछ देर बाद शमशाद लंबी सांस छोड़ते हुए इस तरह निश्चिंत हो गया मानो उस ने सब कुछ तय कर लिया हो. इस के बाद शमशाद पूरा हैवान बन गया. वह दूसरे कमरे में गया, जहां खुद के लिए खतरा बन चुकी प्रिया की 9 साल की बेटी कशिश गहरी नींद सो रही थी.

उस ने कशिश की मासूमियत की परवाह किए बिना बेदर्दी से गला दबा कर उसे भी मार डाला. तब तक 28 मार्च की रात के करीब 12 बज चुके थे.

मांबेटी की हत्या करने के बाद शमशाद ने दोनों लाशों को ठिकाने लगाने की योजना बनाई. पहले उस ने दोनों लाशों को कहीं बाहर ले जा कर ठिकाने लगाने की सोची, मगर पकड़े जाने के डर से योजना बदल दी. 29 मार्च की सुबह करीब 5 बजे शमशाद ने अपने घर के बेडरूम में करीब 3 फुट गहरा गड्ढा खोदा. इस के बाद दोनों लाशों को एक साथ चादर में अच्छी तरह से लपेटा और लाशें गड्ढे में डाल दीं.

लाश जल्दी से गल जाए और बदबू ना आए, इस के लिए उस ने दोनों लाशों के नीचे और ऊपर नमक डाल दिया. ऊपर से मिट्टी डाल कर शमशाद ने ऊपर से वैसा ही सीमेंट वाला प्लास्टर कर दिया जैसा पहले था.

किसी को शक न हो इसलिए ऊपर अपना डबलबैड डाल दिया. वह रात को उसी बैड पर सोता जिस के नीचे कल तक उस की अंकशायिनी बन कर रहने वाली प्रिया व उस की बेटी की लाश दबी थीं.

जिस मकान में यह वारदात हुई, वहां शमशाद अकेला रहता था. फिलहाल वहां फरनीचर फिटिंग का काम चल रहा था. उस की पत्नी गाजियाबाद के इंदिरापुरम में किराए के मकान में रहती थी. पत्नी को बिना बताए उस ने यहां प्रिया के साथ दूसरा घर बसा रखा था.

पूछताछ में पता चला कि बिहार के बेगूसराय का रहने वाला शमशाद करीब 16 साल पहले मेरठ आया था. यहां भूड़बराल में किराए का प्लौट ले कर उस ने उस में 2 कमरे बनाए और वहां बुक बाइंडिंग का काम करने लगा. वहीं वह रहता भी था.

पुलिस को पूछताछ में यह भी पता चला कि शमशाद ने एक और शादी कर रखी थी. बेगूसराय की रहने वाली अफसाना से उस ने परिवार वालों की मरजी से शादी की थी. पत्नी अफसाना व अपने साले दिलावर के साथ वह गाजियाबाद के इंदिरापुरम में किराए पर रहता था. ये मकान भूड़बराल में ही रहने वाले उस के दोस्त कपिल विकल का था.

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शमशाद ने अपनी पत्नी अफसाना व उस के भाई को बता रखा था कि शादी के पहले से ही उस के संबध एक विवाहित महिला प्रिया से हैं, जिन के साथ वो परतापुर में रहता है. शमशाद ने अपनी पत्नी को बताया था कि प्रिया के पास कुछ प्रौपर्टी है, जैसे ही वह प्रौपर्टी उस के कब्जे में आ जाएगी, प्रिया व उस की बेटी को रास्ते से हटा देगा.

जब उस ने प्रिया व उस की बेटी की हत्या कर दी तो अगले दिन गाजियाबाद जा कर अपनी पत्नी व साले को सारी बात बताई कि उस ने किस तरह प्रिया को अपने रास्ते से हटा दिया है. इस के बाद पत्नी अफसाना व साला दिलावर किसी तरह उस के साथ मेरठ पहुंचे और उन्होंने घर में प्रिया की निशानी के सभी सबूत खत्म कर दिए.

इस दौरान भूड़बराल गांव में रहने वाले शमशाद के एक दोस्त नीरज शर्मा को जब अचानक पता चला कि प्रिया और उस की बेटी लापता हैं तो उस ने कपिल विकल के साथ शमशाद से उन के बारे में पूछा शमशाद ने दोनों को सारी हकीकत बता दी और वादा किया कि अगर वे इस झमेले से निकलने में उस की मदद करेंगे तो वह उन को पैसा देगा.

सारी बात जानने के बाद भी उन्होंने पुलिस को ये बात नहीं बताई और उलटा शमशाद की मदद करते हुए न सिर्फ चंचल को धमकाते रहे बल्कि पुलिस से भी शमशाद को बेकुसूर बता कर उस की पैरवी करते रहे.

शमशाद से पूछताछ में इस बात की जानकारी मिलने के बाद पुलिस ने उस के खिलाफ दर्ज मुकदमे में धारा 302, 201,120बी, 34 जोड़ कर शमशाद की पत्नी अफसाना, उस के भाई दिलावर और भूडबराल निवासी नीरज को भी साजिश में शामिल होने व सबूत नष्ट करने का आरोपी बना दिया.

नीरज को तो पुलिस ने भूड़बराल से गिरफ्तार कर लिया. मगर गाजियाबाद में रहने वाली शमशाद की पत्नी अफसाना व साला दिलावर उस की गिरफ्तारी की भनक पा कर फरार हो गए.

पुलिस उन की गिरफ्तारी के लिए छापेमारी कर रही थी. हालांकि इस दौरान शमशाद ने भी पुलिस की गिरफ्त से भागने का प्रयास किया था, लेकिन पुलिस ने उसे 24 घंटे बाद ही मुठभेड़ के बाद गिरफ्तार कर लिया.

आजाद जिंदगी बसर करने की चाह में अलग रहने वाली प्रिया को अपने मातापिता से मतभेद कर के एक ऐसा जीवनसाथी चुनना कितना महंगा पड़ा जो न तो उस के धर्म का था और न उस की नीयत साफ थी.

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प्रिया को अपनी इस गलती के लिए पछताने का भी मौका नहीं मिला. अगर उस की सहेली चंचल अचानक उस के लापता होने पर उस की खोजबीन नहीं करती और इंसाफ के लिए आवाज नहीं उठाती तो हो सकता है प्रिया और उस की बेटी कशिश की मौत का राज कभी उजागर नहीं होता.

(कथा पुलिस की जांच, आरोपियों से पूछताछ व चंचल के बयानों पर आधारित)

दगाबाजी एक आशिक की : भाग 3

वैसे तो चंचल और और प्रिया के बीच सप्ताह में एकदो बार फोन पर बातचीत हो ही जाती थी लेकिन इस बार उसे सप्ताह भर तक बात करने का मौका नहीं मिला. उस ने 30 मार्च को जब प्रिया से बात करने की कोशिश की तो प्रिया का फोन बंद मिला.

अगले दिन उस ने फिर प्रिया से बात करने के लिए फोन मिलाया तो तब भी फोन बंद मिला. जब कई दिन तक ऐसा होता रहा तो चंचल ने शमशाद को फोन कर के पूछा कि प्रिया का फोन बंद क्यों है. उस की तबियत तो ठीक है.

शमशाद ने चंचल को बताया कि हां उस की तबीयत तो ठीक है लेकिन उस का फोन खराब हो गया था. वह अपने किसी रिश्तेदार के घर गई हुई है. चंचल को ये जानकर हैरानी हुई कि आखिर ऐसा कौन सा रिश्तेदार है, जिस के बारे में प्रिया ने उसे नहीं बताया.

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इधर प्रिया का फोन नहीं मिल रहा था, दूसरी ओर वह जब भी शमशाद से प्रिया के बारे में पूछती तो वह इधरउधर की बातें कर के टरका देता था. चंचल समझ गई कि प्रिया के साथ कोई ऐसी अनहोनी हो गई है, जिस की वजह से शमशाद उसे सच नहीं बता रहा है. दिक्कत यह थी कि लौकडाउन के कारण घर से बाहर जा कर भी प्रिया की तलाश नहीं की जा सकती थी.

अचानक अप्रैल महीने में परतापुर थाने का एक दरोगा वीर सिंह चंचल के घर पहुंच गया. उस ने बताया कि शमशाद ने उस के खिलाफ शिकायत दी है कि उस की बीवी प्रिया का चचंल ने बहलाफुसला कर अपहरण कर लिया है. उस ने प्रिया और उस की बेटी की हत्या की आशंका भी जताई है.

इस से चंचल समझ गई कि शमशाद ने प्रिया व उस की बेटी के साथ जरूर कोई अहित कर दिया है और खुद को बचाने के लिए अब उस के ऊपर ही आरोप लगा रहा है. क्योंकि वह प्रिया की छानबीन कर रही थी.

चंचल समझ गई कि अब अगर प्रिया का पता लगाना है तो उसे खुल कर सामने आना होगा. इसलिए वह दरोगा वीर सिंह के बुलावे पर परतापुर थाने पहुंच गई. क्योंकि वहां इंसपेक्टर (क्राइम) भूपेंद्र सिंह शमशाद की शिकायत पर इस मामले की छानबीन कर रहे थे.

चंचल ने उन्हें सब कुछ बता दिया कि कैसे शमशाद ने खुद को हिंदू बता कर प्रिया के साथ छल से प्यार किया और फिर किस तरह उस का भेद खुला. अप्रैल महीने में ही चंचल ने भी इंसपेक्टर भूपेंद्र को लिखित में एक शिकायत दी, जिस में उस ने आरोप लगाया कि उसे आशंका है, शमशाद ने प्रिया व उस की बेटी की हत्या कर लाश कहीं गायब कर दी है.

चंचल ने इंस्पेक्टर भूपेंद्र पर इस बात का भी दबाव डाला कि वे शमशाद और प्रिया के मोबाइल की काल डिटेल्स निकालें. जिस से पता चल सकता है कि जिस समय प्रिया का फोन बंद हुआ उस की व शमशाद की लोकेशन कहां थी.

लेकिन पुलिस तो पुलिस होती है. जब जांच नहीं करनी हो तो वह फरियादी को उलटी कहानी समझा देती है, डरातीधमकाती है. शमशाद के खिलाफ चंचल की शिकायत मिलने के बाद भी पहले परतापुर चौकी इंचार्ज और फिर परतापुर थाने के इंसपेक्टर (क्राइम) भूपेंद्र सिंह उसे बारबार डांट लगाते रहते कि वह क्यों पराई आग में अपने हाथ जला रही है. अगर जांच शुरू हुई तो वो उलटा फंस सकती है.

इतना ही नहीं कभीकभी तो इंसपेक्टर भूपेंद्र सिंह चंचल से बात करते समय अश्लीलता की हद पार कर जाते थे और गालीगलौज तक करने लगते थे. इसी दौरान शमशाद और भूड़बराल में रहने वाले उस के कुछ साथियों ने भी चंचल पर फोन कर के दबाव डाला कि वह इस मामले से दूर रहे वरना खुद फंस जाएगी.

इसी तरह 4 महीने बीत गए. चंचल के सामने कोई चारा नहीं रहा तो उस ने इंसपेक्टर भूपेंद्र सिंह के साथ शमशाद व उस के साथियों से फोन पर हुई बातचीत के औडियो सोशल मीडिया में वायरल कर दिए.

मामला चूंकि संवेदनशील था सो औडियो की बातचीत सुन कर कुछ हिंदू संगठनों के कार्यकर्ताओं ने चंचल से संपर्क साधा और परतापुर पुलिस से इस मामले में काररवाई करने की मांग की.

लेकिन पुलिस ने तो मानो इस मामले में शमशाद को पाकसाफ मानने की कसम खा ली थी. जब हिंदू संगठनों के कार्यकर्ताओं ने देखा की पुलिस कोई एक्शन नहीं लेना चाहती तो 14 जुलाई, 2020 को कई दरजन हिंदू संगठनों के कार्यकर्ता एकत्रित हो कर परतापुर थाने पहुंच गए और परतापुर थानाप्रभारी आनंद प्रकाश मिश्र से मिले और सारी बात बताई.

दबाव बढ़ता देख एसएचओ आनंद मिश्रा ने उसी दिन चंचल की शिकायत पर परतापुर थाने में चंचल व उस की बेटी का मुकदमा अपहरण की धारा 364 आईपीसी के तहत दर्ज करवा दिया. जांच का काम उन्होंने भूपेंद्र सिंह को ही सौंपा. साथ ही इस मामले में जल्द काररवाई करने का सख्त आदेश दिया.

लेकिन पुलिस यहां पर भी नहीं चेती. शमशाद को थाने बुला कर पूछताछ तो की लेकिन बाद में पता चला कि चौकी इंचार्ज वीर सिंह ने 20 हजार व इंसपेक्टर भूपेंद्र सिंह ने 78 हजार रुपए ले कर उसे छोड़ दिया और कोई काररवाई नहीं की.

इस दौरान चंचल परतापुर थाने की पुलिस को फोन कर के रोज पूछती कि शमशाद के खिलाफ कोई काररवाई हुई. लेकिन हर बार उसे नया बहाना बना कर टरका दिया जाता. चंचल समझ गई कि घी सीधी अंगुली से नहीं निकलेगा.

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जिस तरह रिपोर्ट दर्ज कराने के लिए दबाव बनाया गया था, उसी तरह काररवाई के लिए भी टेढ़ा रास्ता ही अपनाना होगा. और फिर 21 जुलाई को चंचल हिंदू संगठनों के सैकड़ों कार्यकर्ताओं को ले कर परतापुर थाने पहुंच गई.

सैकड़ों की तादाद में लोगों द्वारा थाने को घेरने और प्रदर्शन करने की जानकारी जब पुलिस मुख्यालय में एसएसपी अजय साहनी को मिली तो वे अपनी टीम के साथ परतापुर थाने पहुंचे और उसी रात इस मामले में एक्शन कराया.

जब शमशाद नहीं मिला तो पुलिस ने उस के घर पर बुलडोजर चलवा दिया. लेकिन उसी रात पुलिस की दूसरी टीम ने शमशाद को मुखबिर की सूचना पर गिरफ्तार कर लिया. शमशाद से पूछताछ के बाद उस के घर में बैडरूम के फर्श के नीचे दबे प्रिया व उस की बेटी के कंकाल बरामद हो गए.

मांबेटी की लाशें शमशाद के घर से मिलने के बाद लोग पुलिस के खिलाफ इतने आक्रोशित हो गए कि उन्होंने आरोपी एसआई वीर सिंह तथा इंसपेक्टर भूपेंद्र सिंह को दौड़ा लिया. हालात काबू करने के लिए पीएसी बुलानी पड़ी. तब जा कर भीड़ को काबू किया गया.

इस से यह बात साफ हो गई कि इस मामले में उन दोनों की भूमिका संदिग्ध थी. अगर वे ठीक से जांच करते तो मामला 4 महीने पहले ही खुल जाता. लिहाजा एसएसपी अजय साहनी ने इंसपेक्टर व एसआई को उसी समय सस्पेंड कर दिया और उन के खिलाफ लगे आरोपों तथा वायरल हुए औडियो की जांच का काम सीओ चक्रपाणि त्रिपाठी को सौंप दिया.

पुलिस को शमशाद से पूछताछ में पता चला कि पिछले कुछ समय से प्रिया छोटीछोटी बातों पर उस से लड़ने लगी थी. उसे बातबात में ताना देती थी कि उस ने अपना धर्म छिपा कर उस की जिंदगी खराब कर दी है. इस बीच शमशाद प्रिया पर कभीकभी नमाज अदा करने के लिए भी दबाव बनाता था, जिस की वजह से दोनों के बीच तकरार और ज्यादा बढ़ जाती थी.

हुआ यह कि प्रिया ने कांशीराम कालोनी में जो फ्लैट खरीदा था, शमशाद ने उसे प्रिया पर दबाव डाल कर 3 लाख रुपए में बिकवा दिया और उस से वादा किया कि कुछ दिनों में उस के पास एक बड़ी पेमेंट आने वाली है, जिसे मिला कर वह प्रिया को एक महंगा मकान दिलवा देगा.

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लेकिन 2 महीना गुजर जाने के बाद भी न तो शमशाद ने दूसरा मकान खरीदवाया और न ही बिके हुए मकान की रकम लौटाई. ज्यादा दबाव डालने पर उस ने एक दिन प्रिया को 30 हजार रुपए जरूर लौटाए.

जानें आगे क्या हुआ अगले भाग में…

दगाबाजी एक आशिक की : भाग 2

21 जुलाई, 2020 की शाम का समय था. मोदी नगर की सीमा से सटे मेरठ जिले के परतापुर थाने के बाहर सैंकड़ों की तादाद में बजरंग दल, हिंदू वाहिनी और हिंदू महासभा जैसे हिंदूवादी संगठनों के कार्यकर्ता थाने के बाहर प्रदर्शन करते हुए ‘परतापुर पुलिस मुरदाबाद’,‘कातिल को गिरफ्तार करो’, जैसे नारे लगा रहे थे.

थाने के बाहर जमा भीड़ इस कदर अनियंत्रित थी कि डर लग रहा था कि कहीं भीड़ थाने पर हमला न कर दें. इसलिए जिले के एसएसपी अजय साहनी, एसपी (सिटी) अखिलेश नारायण सिंह और ब्रह्मपुरी सर्किल के सीओ चक्रपाणि त्रिपाठी दूसरे थानों की फोर्स व अतिरिक्त पुलिस बल ले कर परतापुर थाने पहुंच गए थे.

उच्चाधिकारियों ने जब प्रर्दशन करने वाले लोगों को समझा कर बातचीत की तो वे समझ गए कि मामला संवेदनशील है. अगर जल्द ही उस पर एक्शन नहीं लिया गया तो बात बिगड़ भी सकती है. प्रर्दशनकारियों के साथ प्रिया चौधरी की सहेली चंचल सिंह भी थी.

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चंचल ने परतापुर थाने पहुंचे उच्चाधिकारियों को अपने फोन की कुछ औडियो क्लिप सुनवाई, जिस से साफ हो गया कि चंचल ने भूड़बराल चौकी इंचार्ज वीर सिंह और परतापुर थाने के इंसपेक्टर (क्राइम) भूपेंद्र सिंह को जो शिकायत दी थी, उस पर कोई कार्रवाई करना तो दूर पुलिस आरोपी शमशाद से एक लाख रुपए ले कर उल्टा चंचल को ही इस मामले में फंसाने की साजिश रच रही थी.

चंचल ने हिंदूवादी संगठनों के कार्यकर्ताओं के सामने पुलिस के आला अफसरों को इंसपेक्टर भूपेंद्र सिंह, चौकी इंचार्ज वीर सिंह तथा भूड़बराल गांव के कुछ लोगों की आडियो भी सुनवाई, जिस में बात करने वाले चंचल को धमकी देते हुए इस मामले से दूर रहने की चेतावनी दे रहे थे.

मामला जिस तरह का था उस में तत्काल काररवाई करना लाजिमी था लिहाजा एसएसपी अजय साहनी ने उसी वक्त इस मुकदमे की जांच का काम इंसपेक्टर भूपेंद्र सिंह से ले कर परतापुर थानाप्रभारी इंसपेक्टर आनंद प्रकाश मिश्रा के सुपुर्द कर दिया.

एसएसपी अजय साहनी ने एसपी (सिटी) व सीओ को निर्देश दिया कि जब तक इस मामले का निस्तारण नहीं हो जाता, तब तक वे परतापुर थाने में ही डटे रहें.

पुलिस जब अपनी कार्यशैली में आ कर कोई काम करती है, तो झटपट सारे काम होते चले जाते हैं. एसपी (सिटी) के आदेश पर परतापुर थानाप्रभारी आनंद मिश्रा ने उसी रात भूड़बराल गांव में रहने वाले शमशाद को उस के मकान से हिरासत में ले लिया. शमशाद को थाने ला कर उस से सख्ती से पूछताछ की गई.

5 घंटे की पुलिसिया पूछताछ में शमशाद टूट गया और उस ने बताया कि उस ने प्रिया चौधरी व उस की बेटी कशिश की गला दबा कर हत्या कर दी है और उन दोनों के शव अपने ही घर में बेडरूम का फर्श खोद कर दबा दिए हैं. शमशाद ने बताया कि उस ने शव दबाने के बाद दोबारा फर्श बना दिया था और ऊपर से डबल बैड बिछा दिया है.

परतापुर पुलिस ने एसपी (सिटी) की निगरानी में अगली सुबह मजदूरों को बुलवा कर शमशाद के घर के बैडरूम के फर्श की खुदाई करवाई तो वहां 3 फुट जमीन के नीचे दबे 2 कंकाल मिले. पुलिस ने घटनास्थल की वीडियोग्राफी और फौरेंसिक जांच करवा कर दोनों कंकालों को जांच के लिए भेज दिया. ताकि यह साबित किया जा सके कि दोनों कंकाल प्रिया व उस की बेटी के ही हैं. इस के लिए पुलिस ने चंचल से प्रिया के पिता का मोबाइल नंबर हासिल कर के उन्हें भी बुलवा लिया. पुलिस ने पोस्टमार्टम के बाद दोनों के शव मांगेराम को सौंपने से पहले उन का ब्लड सैंपल भी लिया ताकि दोनों की डीएनए जांच कराई जा सके.

पुलिस ने शमशाद से पूछताछ के बाद उस के घर के नीचे फर्श को खोदने व साक्ष्य जुटाने के लिए बुलडोजर से भी खुदाई करवाई, लेकिन पुलिस को दूसरा कोई साक्ष्य नहीं मिला.

पूनम नाम बदल कर प्रिया चौधरी की जिंदगी में अचानक शमशाद की एंट्री कैसे हुई और उस ने प्रिया की हत्या क्यों कर दी. इस की कहानी बेहद चौंकाने वाली है.

चंचल का मकान छोड़ कर प्रिया जब मेरठ में अपने प्रेमी अमित गुर्जर के पास रहने के लिए आई तो उस ने परतापुर में कांशीराम कालोनी में किराए का मकान ले लिया और वहां प्रिया व उस की बेटी कशिश के साथ लिव इन रिलेशन में रहने लगा.

जब प्रिया ने पूछा कि वह उसे अपने भूड़बराल के मकान में क्यों नहीं रखता तो उस ने बताया कि वह मकान अभी छोटा है और उसी में वह अपनी लेबर के साथ बुक बाइंडिंग का काम करता है. कुछ दिन बाद जब मकान में 1-2 कमरे बनवा लेगा तो उसे घर ले जाएगा.

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यहां तक तो ठीक था लेकिन कुछ समय बाद प्रिया पर ये भेद खुल गया कि उस ने अमित गुर्जर नाम के जिस युवक के हाथों में अपनी जिंदगी सौंप दी है वह हिंदू नहीं बल्कि मुसलिम युवक है और उस का असली नाम शमशाद है. प्रिया को जब यह बात पता चली तो उस का अमित उर्फ शमशाद से जम कर झगड़ा हुआ.

काफी दिन तक दोनों के बीच झगडे़ होते रहे. बात इस कदर बढ़ी कि प्रिया ने शमशाद के खिलाफ खरखोदा थाने में बहलाफुसला कर अपहरण करने, धर्म छिपा कर शादी का झांसा देने, बलात्कार करने की शिकायत दर्ज करा दी. लेकिन शमशाद ने प्रिया को किसी तरह अपनी चिकनीचुपड़ी बातों के झांसे में ले लिया और उस से वादा किया कि वह सारी जिंदगी उस का साथ निभाएगा.

शमशाद ने तब उस से यह भी कहा कि वह मुसलिम धर्म में पैदा हुआ है तो इस में उस का क्या गुनाह है. क्या मुसलिम होने से उस का प्यार कम हो गया है.

प्रिया जिंदगी में बहुत भटकाव देख चुकी थी, अब वह जिंदगी में सुकून और ठहराव चाहती थी, लिहाजा उस ने शमशाद को माफ कर दिया और उसी के साथ रहने लगी.

करीब 4 साल तक कांशीराम कालोनी में रहने के बाद करीब डेढ़ साल पहले शमशाद प्रिया व उस की बेटी को भूड़बराल वाले अपने मकान में ले आया और तीनों साथ रहने लगे. शमशाद ने इस मकान में काम के साथ परिवार को रखने के लिए अलग से 2 कमरे बनवा लिए थे.

प्रिया जब कांशीराम कालोनी में रहती थी उसी वक्त उस ने वहां सवा दो लाख रूपए में अपने पैसे से एक जनता फ्लैट खरीदा था. ताकि भविष्य में जरूरत के समय इस मकान में किया गया निवेश उस की बेटी के काम आ सके.

शमशाद के साथ प्रिया की जिंदगी ठीक तो चल रही थी लेकिन हर गृहस्थी की तरह बीचबीच में उन की भी कुछ ऐसी बातें होती रहती थीं जिस से शमशाद और प्रिया के बीच झगड़ा हो जाता था. वैसे भी प्रिया स्वभाव से जिद्दी और गुस्सैल थी.

शमशाद के धर्म के बारे में जानने के बाद भले ही माफी मांगने पर शमशाद और प्रिया के रिश्ते ठीक हो गए थे, लेकिन दोनों एक ही छत के नीचे रह रहे थे. एक सच यह भी था कि प्रिया दिल से उस पर भरोसा नहीं करती थी. इसलिए वह अपने दिल के हर सुखदुख की बातें अपनी सहेली चंचल से करती रहती थी.

चंचल को अमित गुर्जर से शमशाद के रूप में सामने आए प्रिया के आशिक के बारे में हर बात पता थी. चंचल उसे बीच में समझाती भी रहती थी कि उसे क्या करना चाहिए और क्या नहीं.

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इसी बीच अचानक 22 मार्च को देश भर में कोरोना महामारी के कारण देशव्यापी लौकडाउन लग गया, जिस से लोगों का एकदूसरे से मिलनाजुलना बंद हो गया और अपनी परेशानी में उलझे लोग कुछ दिन तक फोन पर भी एक दूसरे से संपर्क नहीं कर सके.

जानें आगे क्या हुआ अगले भाग में…

दगाबाजी एक आशिक की : भाग 1

मूलरूप से गाजियाबाद के लोनी की इंद्रापुरी कालोनी में रहने वाली पूनम चौधरी के पिता मांगेराम उत्तर प्रदेश होमगार्ड में नौकरी करते थे. उन के 3 बच्चे थे. पूनम सब से बड़ी थी. मांगेराम बहुत ज्यादा तो नहीं कमा पाते थे, लेकिन किसी तरह गुजरबसर हो जाती थी.

पूनम बचपन से आजादखयाल लड़की थी. उस ने इंटरमीडिएट तक पढ़ाई की और ब्यूटीपार्लर का कोर्स कर के एक ब्यूटीपार्लर में नौकरी कर ली थी. लेकिन जवानी की दहलीज पर कदम रखते ही मातापिता ने उस की शादी कर दी.

पूनम की शादी सन 2010 में गाजियाबाद के भोजपुर थाना क्षेत्र के खंजरपुर निवासी राजीव चौधरी से हुई थी. एक तो पश्चिमी उत्तर प्रदेश में रहने वाला जाट परिवार, ऊपर से पूनम जैसी लड़की का आजादखयाल और महत्त्वाकांक्षी होना. सो पति और ससुराल वालों से पूनम की ज्यादा पटरी नहीं बैठी. छोटीछोटी बातों पर टोकाटाकी और सासससुर के शर्मलिहाज के उलाहनों से पूनम इतनी आजिज आ गई कि उस के राजीव से आए दिन झगड़े होने लगे.

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इस दौरान पूनम एक बेटी की मां बन चुकी थी. जिस का नाम उस ने कशिश रखा. लेकिन बंदिशों में रहना पूनम को मंजूर नहीं था, इसलिए पति और ससुराल वालों से उस का विवाद कम होने के बजाय और ज्यादा बढ़ गया. पूनम के मातापिता ने भी उसे समझाया कि शादीब्याह के बाद लड़की को बहुत से समझौते करने पड़ते हैं, इसलिए वह अपनी ससुराल वालों और पति के साथ कुछ समझौते कर के चले.

लेकिन अपने ही तरीके से जिंदगी जीने वाली पूनम की समझ में यह बात नहीं आई. आखिरकार नतीजा यह निकला कि दोनों परिवारों के बीच कई बार मानमनौव्वल की कोशिशें बेकार गईं. अंतत: सन 2013 में पूनम का राजीव से तलाक हो गया.

तलाक के समय पूनम को ससुराल की तरफ से हरजाने के रूप में 3-4 लाख रुपए मिले. पूनम अपनी बेटी को ले कर माता पिता के पास आ गई. कुछ दिनों बाद मांगेराम ने लोनी का अपना घर बेच दिया और वह गाजियाबाद के सिहानी गेट स्थित नेहरू नगर में आ कर रहने लगे. 5 साल पहले वे होमगार्ड से रिटायर हो गए.

इधर, पति से तलाक के बाद पूनम मातापिता के साथ उन के घर आ कर रहने लगी. लेकिन पूनम आजादखयाल जिंदगी बसर करना चाहती थी, जिस के चलते मातापिता के घर में भी सुसराल की तरह जिंदगी जीने पर प्रतिबंध लगने लगे. कुछ महीने तो जैसेतैसे गुजर गए. लेकिन फिर आए दिन पूनम को कभी मां से तो कभी पिता से रोकटोक के कारण झगड़ा होने लगा.

आए दिन की कलह के बाद आखिर एक दिन पूनम ने अपना घर छोड़ने का फैसला कर लिया. उस ने सोच लिया कि वह अपनी बेटी कशिश को ले कर परिवार से अलग रह कर अपनी जिंदगी अपने पैरों पर खड़े हो कर गुजारेगी. इस के लिए उसने अपना नाम भी बदल लिया. उस ने पूनम की जगह अपना नाम प्रिया चौधरी रख लिया. उस ने इसी नाम से अपना आधार कार्ड व दूसरे दस्तावेज भी तैयार करवा लिए.

पूनम उर्फ प्रिया ने जब मायका छोड़ा तो मातापिता ने उसे लाख समझाना चाहा, लेकिन वह नहीं मानी. इसीलिए मातापिता से उस की खूब कहासुनी भी हुई. तब पिता ने दुखी हो कर प्रिया से कहा था कि जो बच्चे  अपने मातापिता की बात नहीं सुनते, वे कभी खुश नहीं रहते और एक न एक दिन उन्हें पछताना पड़ता है.

लेकिन प्रिया के सिर पर तो आजादी से आत्मनिर्भर हो कर रहने का भूत सवार था लिहाजा उस वक्त मातापिता की ये बात उसे ऐसी लगी मानो वे उसे अभिशाप दे रहे हैं. यही कारण था कि माता पिता का घर छोड़ते समय उस ने यहां तक कह दिया कि अगर वो मर भी जाए तो वे उस की अर्थी को कंधा देने ना आएं.

घर छोड़ने के बाद मातापिता से प्रिया ने कभी बहुत ज्यादा संबंध नहीं रखे. हां, यदाकदा उस की मां और बहनभाई फोन पर उस की कुशलक्षेम जरूर पूछते रहते थे. इस से ज्यादा परिवार वालों का उस की जिंदगी में कोई दखल नहीं था.

इधर, मातापिता का घर छोड़ने के बाद प्रिया के सामने दिक्कत थी कि अब क्या करे और कहां रहे. लिहाजा उस ने अपनी सहेली चंचल से इस बारे में बात की. चंचल उस की ही बिरादरी की युवती थी. दोनों की पुरानी दोस्ती थी.

लोनी की ही रहने वाली चंचल की शादी मोदी नगर में हुई थी. वह अपने पति के साथ मोदीनगर के सुदामा पुरी में रहती थी. चंचल को जब प्रिया के तलाक और माता पिता से विवाद के बाद घर छोड़ने की बात पता चली तो उस ने प्रिया से कहा कि वह मोदीनगर आ जाए और उस के घर में रहे.

साल 2013 के अंत में प्रिया अपनी बेटी कशिश को ले कर मोदी नगर के सुदामा पुरी चली गई और वहां चंचल के मकान में किराए पर रहने लगी. चूंकि प्रिया ब्यूटीपार्लर का काम जानती थी, इसलिए उस ने किराए की एक दुकान ले कर वहां बेटी के नाम से एक ब्यूटीपार्लर भी खोल लिया. संयोग से पार्लर का काम ठीक से चल निकला और धीरेधीरे उस की जिंदगी ढर्रे पर आने लगी.

प्रिया को आज की पीढ़ी के लोगों की तरह सोशल मीडिया पर एक्टिव रहने की लत थी. वह फेसबुक पर एक्टिव रहती थी. सन 2014 में उसे फेसबुक पर अमित गुर्जर नाम के एक आकर्षक नौजवान की फ्रेंड रिक्वेस्ट मिली तो उस ने उस की रिक्वेस्ट स्वीकार कर ली.

बाद में फेसबुक मैसेंजर के जरिए अमित गुर्जर से उस की चैट होने लगी. चैट पर बातचीत होतेहोते प्रिया ने अमित गुर्जर से उस के बारे में पूछा तो उस ने बताया कि वह अपने मातापिता की एकलौती संतान है और उस के मातापिता की मौत हो चुकी है.

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अमित ने बताया कि वह मेरठ के भूड़बराल में रहता है और मेरठ के ही बुक प्रकाशकों के यहां ठेके पर उन की किताबों की बुक बाइंडिंग का काम करता है. उस के पास पैसा, रोजगार सब कुछ है लेकिन जीवन में साथ देने वाला कोई हमसफर नहीं है.

अमित गुर्जर मैसेज में ऐसी इमोनशल और प्यारी बातें करता था कि कुछ समय बाद प्रिया भी उस से बेतकल्लुफ हो कर बातचीत करने लगी. कुछ महीने की फेसबुक दोस्ती में ही प्रिया अमित के साथ इतनी घुलमिल गई मानों उन की सालों पुरानी जानपहचान हो.

उस ने अपने दिल की किताब का हर पन्ना अमित के सामने खोल दिया. दोनों की फेसबुक दोस्ती धीरेधीरे प्यार में बदलने लगी. जल्दी ही दोनों ने प्यार का इजहार भी कर लिया और साथ जीनेमरने की कसमें भी खा लीं. प्रिया को अमित में ऐसे जीवन साथी का अक्स दिखाई दे रहा था, जैसा उस ने सोचा था. फेसबुक पर दोनों एकदूसरे को अपनी फोटो और वीडियो भी सेंड करते थे.

प्रिया ने अमित से अपनी दोस्ती के बारे में अपनी सहेली चंचल को भी बताया था. परिवार के नाम पर उस के पास चंचल ही थी जिस से वह अपने हर सुखदुख की बात शेयर करती थी. चंचल को भी लगा कि अगर अमित के कारण प्रिया की जिंदगी को एक नया ठौर मिल जाए तो उस की बिखरी जिंदगी संवर सकती है.

2014 के मध्य में प्रिया और अमित का प्यार इस कदर परवान चढ़ा कि दोनों ने एक साथ रहने और शादी करने का फैसला कर लिया. लिहाजा इस के लिए वह पहले अमित से मिली. दोनों की रूबरू यह पहली मुलाकात थी.

इस मुलाकात में प्रिया ने अमित को वैसा ही पाया, जैसा उस ने खुद के बारे में बताया था. दोनों के बीच भविष्य को ले कर बहुत सी बातें हुईं और फिर एक दिन प्रिया अपनी बेटी कशिश के साथ चंचल का मकान छोड़ कर अपने सामान सहित अमित के पास मेरठ चली गई.

अमित गुर्जर ने मेरठ के परतापुर इलाके में स्थित कांशीराम कालोनी में किराए का एक कमरा ले लिया और प्रिया व उस की बेटी के साथ लिवइन रिलेशन में रहने लगा. इस दौरान प्रिया ने अपना ब्यू्टी पार्लर भी बंद कर दिया था. वक्त इसी तरह तेजी से गुजरने लगा.

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प्रिया अपनी नई जिंदगी में बेहद खुश थी. लेकिन वो अपने हर सुख के बारे में अपनी सहेली चंचल को फोन पर सब कुछ बता देती थी. सप्ताह में एकदो बार दोनों के बीच फोन पर बातचीत जरूर होती थी. कभी प्रिया चंचल को फोन करती तो कभी चंचल प्रिया को फोन करती थी. प्रिया चंचल से मिलने के लिए मोदीनगर भी चली जाती थी.

जानें आगे क्या हुआ अगले भाग में…

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