Scam 1992 फेम प्रतीक गांधी इस फिल्म में आएंगे नजर

हंसल मेहता की वेब सीरीज ‘‘स्कैम 1992’’ से शोहरत बटोरने वाले अभिनेता प्रतीक गांधी लगातार नई नई फिल्में अनुबंधित करते जा रहे हैं. अब उन्हे ‘रॉय फिल्मस’ की इनवेस्टिगेटिव कॉमेडी फिल्म ‘‘वो लड़की है कहाँ?” में तापसी पन्नू के साथ काम करने का अवसर मिला है.

मध्य भारत की पृष्ठभूमि वाली इस फिल्म में अभिनेत्री तापसी पन्नू एक चुलबुली पुलिस अधिकारी के किरदार में नजर आएंगी. जबकि अभिनेता प्रतीक गांधी एक ऐसे बिगड़ैल लडके के किरदार में नजर आएंगे, जो तापसी के साथ एक मस्तीभरे सफर पर निकलते हैं. जहां दोनों को पता चलता है कि जीवन के प्रति उनका नजरिया एक दूसरे से बहुत ही अलग है.

बतौर लेखक व निर्देशक अरशद सैयद इस फिल्म से अपनी नई शुरूआत कर रहे हैं. जब दो मुख्य किरदार सफर को एक साथ पूरा करने के लिए मजबूर हो जाते हैं, तब उनका विभिन्न व्यक्तित्व एक मजेदार मोड़ पर टकराता है. इस मोड़ पर छिड़ती है शब्दों की जंग जिसका दर्शक भरपूर आनंद उठाएंगे यह तय है.

ये भी पढ़ें- ‘लक्ष्मी बम’ की इस एक्ट्रेस ने बिकनी में दिखाया अपना हौट अंदाज, देखें Photos

फिल्म के निर्माता सिद्धार्थ रॉय कपूर कहते हैं, “जब अरशद ने हमें अपनी आकर्षक और आनंदमय पटकथा सुनाई,तभी हमें अहसास हो गया था कि हमें इस फिल्म का निर्माण करना है. हम विशेष रूप से तापसी के साथ काम करने के लिए बेहद उत्साहित हैं, जो स्क्रीन पर इतनी ऊर्जा और उल्लास लाती है, और प्रतीक, जिन्होंने स्कैम में अपने अविश्वसनीय प्रदर्शन से हम सभी को आश्चर्यचकित कर दिया. हम इस बात से भी बहुत खुश हैं कि अरशद, जो पहले से ही एक शानदार लेखक के रूप में जाने जाते हैं, अब इस फिल्म के साथ अपने निर्देशन की शुरुआत करेंगे.”

लेखक और निर्देशक अरशद सैयद कहते हैं कि रॉय कपूर फिल्म्स के साथ मिलकर इस फिल्म से निर्देशक के तौर पर कैरियर शुरू करने को लेकर मैं अति उत्साहित हूं. मैं सिद्धार्थ रॉय कपूर का शुक्रगुजार हूं कि उन्होंने फिल्म के प्रति मेरे नजरिए पर अपना विश्वास दिखाया. इसी के साथ मैं तापसी और प्रतीक का भी आभारी हूं कि उन्होंने ने इस फिल्म में जान डाल दी.

आरकेएफ और प्रतीक गांधी के साथ काम करने के लिए उत्साहित तापसी पन्नू का कहती है कि, ‘‘अरशद ने इस फिल्म में जिस तरह से मेरा किरदार लिखा है,वह अद्भुत और अद्वितीय है. निर्माता सिद्धार्थ रॉय कपूर के साथ ही प्रतीक गांधी के साथ काम करने के लिए भी बेहद उत्साहित हूं क्योंकि मुझे स्कैम 1992 में उनकी परफॉर्मेंस बेहद पसंद आई थी.”

प्रतीक गांधी कहते हैं, ‘‘ मैं इस फिल्म का हिस्सा बनने और तापसी, अरशद और सिड की टीम के साथ काम करने के लिए मैं बेहद उत्साहित हूं. मैं स्कैम के बाद कुछ अलग करना चाहता था और यह किरदार मेरी सारी उम्मीदों पर खरा उतरा है. मुझे यकीन है कि यह एक मजेदार यात्रा होगी और मुझे इस फिल्म की शूटिंग शुरू होने का बेसब्री से इंतजार है.’’

ये भी पढ़ें- ‘दिया और बाती हम’ की इस एक्ट्रेस के साथ हुई बदसलूकी, चार आरोपी हुए गिरफ्तार

Bigg Boss 14: राखी सावंत का Shocking खुलासा, कहा ‘मां बनने के लिए मुझे विक्की डोनर की जरूरत नहीं’

राखी सावंत अपनी बातों की वजह से अक्सर सुर्खियों में छायी रहती है. ‘बिग बॉस 14’ में वह घर की सबसे एंटरटेनिंग कंटेस्टेंट रही. घर में भी अपने हरकतों की वजह से लाइमलाइट में बनी रही.

बिग बौस 14 से बाहर होने के बाद राखी सावंत ने एक विवादित बयान दिया है. अब उन्होंने इस बात का ऐलान किया है कि अब वो मां बनना चाहती हैं.

 

View this post on Instagram

 

A post shared by ColorsTV (@colorstv)

 

जी हां, राखी सावंत इन दिनों मां बनने की प्लानिंग कर रही हैं. रिपोर्टस के अनुसार राखी सावंत ने कहा, ‘बिग बॉस 14’ खत्म होने के बाद अब मैं मां बनना चाहती हूं.

ये भी पढ़ें- Kapil Sharma ने बेटी अनायरा संग शेयर की क्यूट फोटो तो फैंस ने दिया ये रिएक्शन

 

View this post on Instagram

 

A post shared by ColorsTV (@colorstv)

 

खबरों के अनुसार राखी ने कहा कि कुछ साल पहले मैंने अपने एग फ्रीज करवाए थे. अब मैं उनका इस्तेमाल करना चाहती हूं. मां बनने के लिए मुझे किसी विक्की डोनर की जरूरत नहीं है. मैं अपने बच्चे के बाप की तलाश कर रही हूं. मैं चाहती हूं कि मेरे बच्चे को बाप का प्यार मिले. मुझे नहीं पता कि ये सब मैं कैसे करूंगी लेकिन मैं मां बनने के लिए तैयार हूं.

बताया जा रहा है कि राखी ने अपनी शादी के बारे में बात करते हुए कहा, रितेश हमेशा मेरे साथ खड़ा रहा है. हम दोनों एक दूसरे से बहुत प्यार करते हैं. वो एक बड़ा बिजनेसमैन है. उनकी कंपनी में हजारों लोग काम करते हैं.

 

View this post on Instagram

 

A post shared by ColorsTV (@colorstv)

 

खबरे ये भी आ रही है कि राखी सावंत ने आगे ये कहा कि  शादी के बाद मुझे पता चला कि रितेश शादीशुदा है और उनका बच्चा भी है. रितेश नहीं चाहता कि कोई उसके बारे में जाने. वो तो हमारी शादी को भी सीक्रेट रखना चाहता था लेकिन मैंने सबको बता दिया.

ये भी पढ़ें- Bigg Boss 14: Rubina Dilaik ने बेबी प्लानिंग को लेकर कही ये बात

Bigg Boss 14: सोशल मीडिया पर यूजर्स ने मेकर्स पर लगाया चीटिंग करने का आरोप

बिग बॉस 14 (Bigg Boss 14) की ट्राफी रूबिना दिलाइक को मिला. कल रात सलमान खान (Salman Khan) ने शो के विनर के तौर पर रुबीना दिलाइक (Rubina Dilaik) के नाम का ऐलान कर दिया है.

तो वहीं दूसरे नंबर पर राहुल वैद्य का नाम है. ऐसे में राहुल वैद्य काफी दुखी हुए. तो उधर सोशल मीडिया पर भी राहुल वैद्य के फैंस भी दुख जाहिर कर रहे हैं.

ये भी पढ़ें- ‘पांडेजी जरा संभलके’ में सतीश रे का नया अवतार, देखें Viral पोस्टर

दरअसल फैंस ने शो के मेकर्स पर राहुल के साथ चीटिंग करने का आरोप लगा रहे हैं.  सोशल मीडिया पर यूजर्स का कहना है कि शो में लाइव वोटिंग महज एक ढकोसला है. सब कुछ पहले से ही फिक्स होता है.राहुल के फैंस ने ये भी कहा कि शो के मेकर्स पहले से सब कुछ तय रखते हैं और बाद में केवल एक्टिंग करते हैं.

बता दें कि फिनाले के दिन सबसे पहले राखी सावंत ने 14 लाख रुपये लेकर गेम से बाहर हो गई.इसके बाद अली गोनी (Aly Goni) को निक्की से कम वोट मिलने के कारण बाहर कर दिया गया.दो इविक्शन के बाद में निक्की तंबोली को भी वोटिंग पर्सेंटेज के आधार पर बाहर कर दिया गया.

ये भी पढ़ें- Kapil Sharma ने बेटी अनायरा संग शेयर की क्यूट फोटो तो फैंस ने दिया ये रिएक्शन

आखिरकार सलमान खान ने रुबीना दिलाइक का नाम बिग बौस 14 के विनर के तौर पर अनाउंस किया. मालूम हो कि रुबीना दिलाइक घर में आने के बाद से एक बार भी घर से बाहर नहीं हुईं.

Valentine’s Special- कड़ी: क्या इस कहानी में भी कोई कड़ी थी?

Valentine’s Special- कड़ी: भाग 3

अपूर्वा को यह संभव नहीं लगता क्योंकि उसे और आलोक को अभी तक तो एकदूसरे से कोई ऐसा लगाव है नहीं कि वह ग्रीनकार्ड वापस कर के भारत आ जाए. और अब जब उसे विवेक पसंद आ गया है तो वह कोशिश भी नहीं करेगी. हमें जबरदस्ती ही करनी पड़ेगी दोनों औरतों के साथ.’’

‘‘देखिए धर साहब, अपनी इज्जत तो सभी को प्यारी होती है खासकर अभिजात्य वर्ग की महिलाओं को अपने सोशल सर्किल में,’’ निखिल ने नम्रता से कहा, ‘‘जबरदस्ती करने से तो वे बुरी तरह बिलबिला जाएंगी और उन के ताल्लुकात अपूर्वा और विवेक के साथ हमेशा के लिए बिगड़ सकते हैं.’’

‘‘अपूर्वा और विवेक से ही नहीं, मेरे और केशव नारायण से भी बिगड़ेंगे लेकिन इन सब फालतू बातों से डर कर हम बच्चों की जिंदगी तो खराब नहीं कर सकते न?’’

ये भी पढ़ें- आठवां फेरा : मैरिज सर्टिफिकेट की क्यों पड़ी जरूरत

‘‘कुछ खराब करने की जरूरत नहीं है, धर साहब. धैर्य और चतुराई से बात बन सकती है,’’ निखिल ने कहा, ‘‘मैं यह प्रतियोगिता जीतने की खुशी के बहाने आप को सपरिवार क्लब में डिनर पर आमंत्रित करूंगा और अपनी ससुराल वालों को भी. फिर देखिए मैं क्या करता हूं.’’

जस्टिस धर ने अविश्वास से उस की ओर देखा. निखिल ने धीरेधीरे उन्हें अपनी योजना बताई. जस्टिस धर ने मुसकरा कर उस का हाथ दबा दिया.

निखिल का निमंत्रण सुकन्या ने खुशी से स्वीकार कर लिया. क्लब में बैठने की व्यवस्था देख कर उस ने निखिल से पूछा कि कितने लोगों को बुलाया है?

‘‘केवल जस्टिस धरणीधर के परिवार को?’’

‘‘उन्हें ही क्यों?’’ सुकन्या ने चौंक कर पूछा.

‘‘क्योंकि जस्टिस धर ने मैच जीतने की खुशी में मुझ से दावत मांगी थी. सो, बस, उन्हें बुला लिया और लोगों को बगैर मांगे छोटी सी बात के लिए दावत देना अच्छा नहीं लगता न,’’ निखिल ने समझाने के स्वर में कहा.

तभी धर परिवार आ गया. विवेक और अपूर्वा बड़ी बेतकल्लुफी से एकदूसरे से मिले और फिर बराबर की कुरसियों पर बैठ गए, जस्टिस धर ने आश्चर्य व्यक्त किया, ‘‘तुम एकदूसरे को जानते हो?’’

‘‘जी पापा, बहुत अच्छी तरह से,’’ अपूर्वा ने कहा, ‘‘हम दोनों रोज सुबह टैनिस खेलते हैं.’’

‘‘और तकरीबन 24 घंटे बराबर की कुरसियों पर बैठे रहे हैं अमेरिका से लौटते हुए,’’ विवेक ने कहा.

‘‘शीलाजी, आप ने शादी से पहले कुछ समय अपने साथ गुजारने को बेटी को दिल्ली बुला ही लिया?’’ सुकन्या ने पूछा.

‘‘नहीं आंटी, मैं खुद ही आई हूं,’’ अपूर्वा बोली, ‘‘मम्मी तो अभी भी वापस जाने को कह रही हैं लेकिन मैं नहीं जाने वाली. मुझे अमेरिका पसंद ही नहीं है.’’

‘‘लेकिन तुम्हारी सगाई तो अमेरिका में हो चुकी है,’’ सुकन्या बोली.

‘‘सगाईवगाई कुछ नहीं हुई है,’’ जस्टिस धर बोले, ‘‘बस, हम ने लड़का पसंद किया और उस के मांबाप ने हमारी लड़की. लड़का फिलहाल किसी प्रोजैक्ट पर काम कर रहा है और जब तक प्रोजैक्ट पूरा न हो जाए वह सगाईशादी के चक्कर में पड़ कर ध्यान बंटाना नहीं चाहता. एक तरह से अच्छा ही है क्योंकि उस के प्रोजैक्ट के पूरे होने से पहले ही मेरी बेटी को एहसास हो गया है कि वह कितनी भी कोशिश कर ले उसे अमेरिका पसंद नहीं आ सकता.’’

‘‘विवेक की तरह,’’ केशव नारायण ने कहा, ‘‘इस के मामा ने इसे वहां व्यवस्थित करने में बहुत मदद की थी, नौकरी भी अच्छी मिल गई थी लेकिन जैसे ही यहां अच्छा औफर मिला, यह वापस चला आया.’’

‘‘सुव्यवस्थित होना या अच्छी नौकरी मिलना ही सबकुछ नहीं होता, अंकल,’’ अपूर्वा बोली, ‘‘जिंदगी में सकून या आत्मतुष्टि भी बहुत जरूरी है जो वहां नहीं मिल सकती.’’

‘‘यह तो बिलकुल विवेक की भाषा बोल रही है,’’ निकिता ने कहा.

‘‘भाषा चाहे मेरे वाली हो, विचार इस के अपने हैं,’’ विवेक बोला.

‘‘यानी तुम दोनों हमखयाल हो?’’ निखिल ने पूछा.

‘‘जी, जीजाजी, हमारे कई शौक और अन्य कई विषयों पर एक से विचार हैं.’’

‘‘यह तो बड़ी अच्छी बात है,’’ निखिल शीला और सुकन्या की ओर मुड़ा, ‘‘आप इन दोनों की शादी क्यों नहीं कर देतीं.’’

‘‘क्या बच्चों वाली बातें कर रहे हो निखिल?’’ सुकन्या ने चिढ़े स्वर में कहा, ‘‘ब्याहशादी में बहुतकुछ देखा जाता है. क्यों शीलाजी?’’

‘‘आप ठीक कहती हैं, सिर्फ मिजाज का मिलना ही काफी नहीं होता,’’ शीला ने हां में हां मिलाई.

‘‘और क्या देखा जाता है?’’ निखिल ने चिढ़े स्वर में पूछा. ‘‘कुल गोत्र, पारिवारिक स्तर, और योग्यता वगैरा, वे तो दोनों के ही खुली किताब की तरह सामने हैं बगैर किसी खामी के…’’

‘‘फिर भी यह रिश्ता नहीं हो सकता,’’ सुकन्या और शीला एकसाथ बोलीं.

‘‘क्योंकि इस पर वरवधू की माताओं के महिला क्लब के सदस्यों की स्वीकृति की मुहर नहीं लगी है,’’ जस्टिस धर ने कहा.

ये भी पढ़ें- परवरिश : सोचने पर क्यों विवश हुई सुजाता

‘‘यह तो आप ने बिलकुल सही फरमाया, जज साहब,’’ केशव नारायण ठहाका लगा कर हंसे, ‘‘वही मुहर तो सुकन्या और शीलाजी की मानप्रतिष्ठा का प्रतीक है.’’ दोनों महिलाओं ने आग्नेय नेत्रों से अपनेअपने पतियों को देखा, इस से पहले कि वे कुछ बोलतीं, निखिल बोल पड़ा, ‘‘उन की मुहर मैं लगवा दूंगा, उन्हें एक बढि़या सी दावत दे कर जिस में विवेक और अपूर्वा सब के पांव छू कर आशीर्वाद के रूप में स्वीकृति प्राप्त कर लेंगे.’’

‘‘आइडिया तो बहुत अच्छा है, निखिल, लेकिन कन्या और वर की माताओं की समस्या का हल नहीं है,’’ जस्टिस धर ने उसांस ले कर कहा, ‘‘असल में शीला ने सब को बताया हुआ है कि उस का होने वाला दामाद अमेरिका में रहता है.’’

‘‘यह बात तो है,’’ निखिल कुछ सोचते हुए बोला, ‘‘आप ने सब को लड़के का नाम वगैरा बताया है आंटी?’’

‘‘नहीं, बस इतना ही बताया था कि अमेरिका में अनिल के पड़ोस में रहता है. हमें अच्छा लगा और हम ने अपूर्वा के लिए पसंद कर लिया.’’

‘‘उस के मांबाप के बारे में बताया था?’’

‘‘कुछ नहीं. किसी ने पूछा भी नहीं.’’

‘‘तो फिर तो समस्या हल हो गई, साले साहब भी तो अमेरिका से ही लौटे हैं, इन्हें अनिल का पड़ोसी बना दीजिए न. आप ने तो विवेक का अमेरिका का एड्रैस अपनी सहेलियों को नहीं दिया हुआ न, मां?’’ निखिल ने सुकन्या से पूछा.

‘‘हमारी सहेलियों को यह सब पूछने की फुरसत नहीं है, निखिल. लेकिन वे इतनी बेवकूफ भी नहीं हैं कि तुम्हारी बचकानी बातें सुन कर यह मान लें कि विवेक वही लड़का है जो शीलाजी अमेरिका में पसंद कर के आई थीं,’’ सुकन्या ने झल्ला कर कहा, ‘‘वे मुझ से पूछेंगी नहीं कि मैं ने यह, बात उन सब को क्यों नहीं बताई?’’

‘‘क्योंकि आप नहीं चाहती थीं कि जब तक सगाईशादी की तारीख पक्की न हो, वे सब आप दोनों को समधिन बना कर क्लब के अनौपचारिक माहौल और आप के रिश्तों को खराब करें,’’ निखिल बोला.

‘‘यह बात तो निखिलजी ठीक कह रहे हैं, सुकन्या और पिछली मीटिंग में ही किसी के पूछने पर कि आप ने विवेक के लिए कोई लड़की पसंद की या नहीं. आप ने कहा था कि लड़की तो पसंद है लेकिन जिस से शादी करनी है उसे तो फुरसत मिले. विवेक आजकल बहुत व्यस्त है,’’ शीला ने कुछ सोचते हुए कहा.

‘‘तो अगली मीटिंग में कह दीजिएगा कि विवेक को फुरसत मिल गई है और फलां तारीख को उस की सगाई है. अगली मीटिंग से पहले तारीख तय कर लीजिए,’’ निखिल ने कहा.

‘‘वह तो हमें अभी तय कर लेनी चाहिए, क्यों धर साहब?’’ केशव नारायण ने पूछा.

‘‘जी हां, इस से पहले कि कोई और शंका उठे.’’

‘‘तो ठीक है आप लोग तारीख तय करिए, हम लोग पीने के लिए कोई बढि़या चीज ले कर आते हैं,’’ निखिल उठ खड़ा हुआ. ‘‘चलो विवेक, अपूर्वा और निक्की तुम भी आ जाओ.’’

ये भी पढ़ें- रीते हाथ : सपनों के पीछे भागती उमा

‘‘कमाल कर दिया जीजाजी आप ने भी,’’ विवेक ने कुछ दूर जाने के बाद कहा. ‘‘समझ नहीं पा रहा आप को जादूगर कहूं या जीनियस?’’

‘‘जीनियसवीनियस कुछ नहीं, साले साहब,’’ निखिल मुसकराया, ‘‘मैं तो महज एक अदना सी कड़ी हूं आप दोनों का रिश्ता जोड़ने वाली.’’

‘‘अदना नहीं, अनमोल कड़ी, जीजाजी,’’ अपूर्वा विह्वल स्वर में बोली.

Valentine’s Special- कड़ी: भाग 2

घर जाने के बाद विवेक का फोन आया कि मां बहुत बिगड़ीं कि अगर वह कह कर भी लड़की देखने नहीं गईं तो उन की क्या इज्जत रह जाएगी. तो मैं ने कह दिया कि मेरी इज्जत का क्या होगा जब मैं वादा तोड़ कर शादी करूंगा? पापा ने मेरा साथ दिया कि मां ने तो सिर्फ प्रस्ताव रखा है और मैं वादा कर चुका हूं. सो, मां गुड़गांव वालों को फिलहाल तो लड़के की व्यस्तता का बहाना बना कर टाल दें.

जैसा निकिता का खयाल था, अगली सुबह मां का फोन आया कि वह किसी तरह भी समय निकाल कर उन से मिलने आए. निकिता तो इस इंतजार में थी ही, वह तुरंत मां के घर पहुंच गई. मां ने उसे उत्तेजित स्वर में सब बताया, गुड़गांव वाली डाक्टर लड़की की तारीफ की और कहा, ‘‘महज इसलिए कि अमेरिका के रहनसहन पर विवेक और अपूर्वा के विचार मिलते हैं और वह उसी से शादी करना चाहता है, मैं उस लड़की को अपने घर की बहू नहीं बना सकती.’’

ये भी पढ़ें- हैलमैट: सबल सिंह क्यों पहनते थे हैलमेट

‘‘पापा क्या कहते हैं?’’

‘‘उन के लिए तो जस्टिस धरणीधर के घर बेटे की बरात ले कर जाना बहुत गर्व और खुशी की बात है,’’ मां ने चिढ़े स्वर में कहा.

‘‘तो आप किस खुशी में बापबेटे की खुशी में रुकावट डाल रही हैं, मां?’’

‘‘क्योंकि सब सहेलियों में मजाक तो मेरा ही बनेगा कि सुकन्या को बेटे से बड़ी लड़की ही मिली अपनी बहू बनाने को.’’

‘‘आप ने अपनी सहेलियों को विवेक की उम्र बताई है?’’

‘‘नहीं. उस का तो कभी जिक्र ही नहीं आया.’’

‘‘तो फिर उन्हें कैसे पता चलेगा कि अपूर्वा विवेक से बड़ी है क्योंकि लगती तो छोटी है?’’

‘‘शीलाजी कहती थीं कि लड़का उन के बेटे का पड़ोसी है. सो, शादी तय होने के बाद अकसर ही वह उन के घर आता होगा और लड़की उस के घर जाती होगी. क्या गारंटी है कि लड़की कुंआरी है?’’

‘‘अमेरिका से विक्की जो पिकनिक वगैरा की फोटो भेजा करता था उस में उस के साथ कितनी लड़कियां होती थीं? आप क्या अपने बेटे के कुंआरे होने की गारंटी ले सकती हैं?’’

सुकन्या के चुप रहने से निकिता की हिम्मत बढ़ी.

‘‘गुड़गांव वाली लड़की के बायोडाटा के अनुसार, वह भी किसी विशेष ट्रेनिंग के लिए 2 वषों के लिए अमेरिका गई थी. सो, गारंटी तो उस के बारे में भी नहीं ली जा सकती. अपूर्वा को नापसंद करने के लिए आप को कोई और वजह तलाश करनी होगी, मां.’’

‘‘यही वजह क्या काफी नहीं है कि वह विवेक से बड़ी है और मांबाप का तय किया रिश्ता नकार रही है?’’

तभी निकिता का मोबाइल बजा. निखिल का फोन था पूछने को कि मां निकिता को समझा सकी या नहीं और सब सुनने पर बोला कि यह क्लब की सहेलियों वाली समस्या तो शायद अपूर्वा की मां के साथ भी होगी. सो, बेहतर रहेगा कि दोनों सहेलियों को एकसाथ ही समझाया जाए.

‘‘मगर यह होगा कैसे?’’ निकिता ने पूछा.

‘‘साथ बैठ कर सोचेंगे. फिलहाल तुम मां से ज्यादा मत उलझो और किसी बहाने से घर वापस चली जाओ. मैं विवेक को शाम को वहीं बुला लेता हूं,’’ कह कर निखिल ने फोन रख दिया.

जैसा कि अपेक्षित था, सुकन्या ने पूछा. ‘‘किस का फोन था?’’

‘‘निखिल का पूछने को कि शाम को कुछ लोगों को डिनर पर बुला लें?’’

‘‘तो तू ने क्या कहा?’’

‘‘यही कि जरूर बुलाएं. मैं जाते हुए बाजार से सामान ले जाऊंगी और निखिल के लौटने से पहले सब तैयारी कर दूंगी.’’

‘‘और मैं ने जो तुझे अपनी समस्या सुलझाने व बापबेटे को समझाने को बुलाया है, उस का क्या होगा?’’  सुकन्या ने चिढ़े स्वर में पूछा.

‘‘आप की तो कोई समस्या ही नहीं है, मां. आप सीधी सी बात को उलझा रही हैं और आप के एतराज से जब मैं खुद ही सहमत नहीं हूं तो पापा या विक्की को क्या समझाऊंगी?’’ कह कर निकिता उठ खड़ी हुई. सुकन्या ने भी उसे नहीं रोका.

शाम को निखिल व विवेक इकट्ठे ही घर पहुंचे.

‘‘अपूर्वा को सब बात बता कर पूछता हूं कि क्या उस की मां के साथ भी यह समस्या आएगी,’’ विवेक ने निखिल की बात सुनने के बाद कहा और बरामदे में जा कर अपूर्वा से मोबाइल पर बात करने लगा.

‘‘आप का कहना सही है, जीजाजी, अपूर्वा कहती है कि घर में सिर्फ मां ही को उस का रिश्ता तोड़ने पर एतराज है वह भी इसलिए कि लोग, खासकर उन की महिला क्लब की सहेलियां, क्या कहेंगी. रिश्ता तो खैर टूट ही रहा है क्योंकि जस्टिस धर ने अपने बेटे को आलोक से बात करने को कह दिया है. लेकिन मेरे साथ रिश्ता जोड़ने में भी उस की मां जरूर अडं़गा लगाएंगी, यह तो पक्का है,’’ विवेक ने कहा.

ये भी पढ़ें- और तो सब ठीकठाक है : कैसे थे चौधरी जगत नारायण

‘‘आलोक से रिश्ता खत्म हो जाने दो, फिर तुम्हारे से जोड़ने की प्रक्रिया शुरू करेंगे. मां के कुछ कहने पर यही कहो कि कुछ दिनों तक सिवा अपने काम के, तुम किसी और विषय पर सोचना नहीं चाहते. अपूर्वा को आश्वासन दे दो कि उस की शादी तुम्हीं से होगी,’’ निखिल ने कहा.

‘‘मगर कैसे? 2 जिद्दी औरतों को मनाना आसान नहीं है, निखिल,’’ निकिता ने कहा.

‘‘पापा को तो बीच में डालना नहीं चाहता क्योंकि तब मां उन से और अपूर्वा दोनों से चिढ़ जाएंगी,’’ निखिल कुछ सोचते हुए बोला. ‘‘पापा से इजाजत ले कर मैं ही जस्टिस धरणीधर से बात करूंगा.’’

‘‘मगर पापा या जस्टिस धर की ओर से तो कोई समस्या है ही नहीं,’’ विवेक ने कहा.

‘‘मगर जिन्हें समस्या है, उन दोनों को एकसाथ कैसे धाराशायी किया जा सके, यह तो उन से बात कर के ही तय किया जा सकता है. फिक्र मत करो साले साहब, मैं उसी काम की जिम्मेदारी लेता हूं जिसे पूरा कर सकूं,’’ निखिल ने बड़े इत्मीनान से कहा, ‘‘जस्टिस धर के साथ खेलने का मौका तो नहीं मिला लेकिन बिलियर्ड्स रूम में अकसर मुलाकात हो जाती है. सो, दुआसलाम है. उसी का फायदा उठा कर उन से इस विषय में बात करूंगा.’’

कुछ दिनों के बाद क्लब में आयोजित एक बिलियर्ड प्रतियोगिता जीतने पर जस्टिस धर ने उस के खेल की तारीफ की, तो निखिल ने उन्हें अपने साथ कौफी पीने के लिए कहा और उस दौरान उन्हें विवेक व अपूर्वा के बारे में बताया.

जस्टिस धर के यह कहने पर कि उन्हें तो अपूर्वा के लिए ऐसे ही घरवर की तलाश है. सो, वे विवेक और उस के पिता केशव नारायण से मिलना चाहेंगे. निखिल ने कहा कि वे तो स्वयं ही उन से मिलना चाहते हैं, लेकिन समस्या सुकन्या के एतराज की है, महिला क्लब के सदस्यों को ले कर और यह समस्या अपूर्वा की माताजी की भी हो सकती है.

ये भी पढ़ें- आठवां फेरा : मैरिज सर्टिफिकेट की क्यों पड़ी जरूरत

‘‘अपूर्वा की माताजी के महिला क्लब की सदस्यों ने तो मेरी नाक में दम कर रखा है,’’ जस्टिस धर ने झल्ला कर कहा, ‘‘शीला स्वयं भी नहीं चाहती कि अपूर्वा शादी कर के अमेरिका जाए लेकिन सब सहेलियों को बता चुकी है कि उस का होने वाला दामाद अमेरिका में इंजीनियर है. सो, उन के सामने अपनी बात बदलना नहीं चाहती, इसलिए अपूर्वा को समझा रही है कि फिर अमेरिका जाए और आलोक को बहलाफुसला कर भारत में रहने को मना ले.

बेगैरत औरत का खेल: भाग 1

सौजन्य- सत्यकथा

संजय उर्फ कल्लू शाहजहांपुर के सदर बाजार क्षेत्र के मोहल्ला महमंद जलालनगर में रहता था. उस के पिता अनिल प्राइवेट नौकरी करते थे. मां रमा देवी गृहिणी थीं. संजय का एक छोटा भाई दीपक भी था.

करीब 11 साल पहले संजय ने रेशमा नाम की युवती से प्रेम विवाह किया था, वह दूसरे धर्म की थी. कालांतर में रेशमा ने 2 बेटों अंशू (10 वर्ष), अजय (4 वर्ष) और एक बेटी चांदनी (डेढ़ वर्ष) को जन्म दिया. संजय मैडिकल कालेज में प्राइवेट तौर पर लगी बोलेरो को चलाता था.

संजय चूंकि संयुक्त परिवार में रहता था, इसलिए रेशमा की आजादी पर बंदिशें थीं. उस ने संजय से कहना शुरू कर दिया, ‘‘आखिर कब तक तुम अपने पिता के बताए रास्ते पर चल कर दिन भर की गाढ़ी कमाई उन के हाथों में थमाते रहोगे. अब हमारा भी तो परिवार है, क्या हम अपने परिवार के लिए कुछ भी जमा कर के नहीं रखेंगे? तुम कहीं और मकान देख लो, अब हम यहां नहीं रह सकते.’’

रेशमा की बातों को एकाध बार तो संजय ने नजरअंदाज कर दिया और रेशमा को समझाया भी लेकिन वह नहीं मानी और बारबार उस पर अलग होने का दबाव बनाने लगी. आखिर संजय ने रेशमा की इच्छा के सामने घुटने टेक दिए.

इस के बाद संजय रेशमा और तीनों बच्चों के साथ कांशीराम कालोनी में रहने चला गया. यहां वे सब मजे से रहने लगे. कालोनी की जिस बिल्डिंग में संजय रहता था, उसी बिल्डिंग में भूतल पर सचिन नाम का एक 19 वर्षीय युवक रहता था.

सचिन शहर के ही अजीजगंज मोहल्ले में रहने वाले सुमित कुमार का बेटा था. कांशीराम कालोनी में भी उसे आवास आवंटित हो गया था. सचिन का परिवार अजीजगंज में तो सचिन कांशीराम कालोनी में रहता था. सचिन ईरिक्शा चलाता था. वह अविवाहित था.

सचिन कम पढ़ालिखा था, लेकिन उस के व्यक्तित्व और बात करने के अंदाज से कभी यह नहीं लगता था कि वह अधिक पढ़ा नहीं है. देखने में भी काफी सुंदर था. उस का मन होता तो ईरिक्शा ले कर काम पर चला जाता, मन नहीं होता तो घर पर ही पड़ा रहता.

ये भी पढ़ें- Crime News: बंगला गाड़ी की हसरतें और जेल!

एक ही बिल्डिंग में होने के कारण सचिन की नजर रेशमा पर पड़ गई थी. रेशमा भी सचिन के सामने आने पर एकटक उसे निहारती रहती थी. निगाहें मिलतीं तो दोनों के होंठ मुसकराने लगते. उन के बीच परिचय हुआ तो बातें भी होने लगीं.

सचिन के पास एक कुत्ता था जो रेशमा को बहुत अच्छा लगता था. उसी कुत्ते की वजह से ही सचिन और रेशमा में परिचय और बातें होनी शुरू हुई थीं. रेशमा के नजदीक बने रहने के लिए सचिन को कुत्ते से बढि़या कोई तरीका नहीं लगा.

सचिन ने संजय से भी दोस्ती कर ली. रेशमा ने संजय से सचिन का कुत्ता मांग लेने की जिद की तो संजय ने उसे कई बार समझाया लेकिन रेशमा नहीं मानी. रेशमा की जिद के आगे संजय को झुकना पड़ा.

एक दिन संजय ने सचिन से बात की कि अगर उसे बुरा न लगे तो वह उस का कुत्ता लेना चाहता है. इस पर सचिन ने अपना कुत्ता उसे दे दिया. सचिन ने उस से इस की कोई कीमत भी नहीं ली. संजय के दिमाग में यह कभी नहीं आया कि यह भेंट उस पर कितनी भारी पड़ेगी.

जिस फ्लोर पर संजय रहता था, वहां तक पानी आसानी से नहीं पहुंचता था. इसलिए संजय ने सचिन से कह दिया कि वह अपनी मोटर से पाइप लगा कर पानी भरवा दिया करे. सचिन ने हामी भर दी.

सचिन काफी खुश था, वह जानता था कि संजय सुबह का निकला शाम को ही घर में घुसता था, पूरे दिन उस की पत्नी रेशमा घर में अकेली रहती थी. बच्चे तो उस के छोटे थे. ऐसे में रेशमा को अपने रंग में रंगने का उसे अच्छा मौका मिला था.

जब से उस ने रेशमा को देखा था, उस का सौंदर्य उस की आंखों में रचबस गया था. संजय तो उस के सामने पानी भरता था, मतलब लंगूर के हाथ हूर लग गई थी.

अब हर रोज किसी भी समय पानी खत्म हो जाता तो रेशमा आवाज दे कर सचिन को पानी का पाइप लगाने को कह देती. पहले कुत्ते के बहाने से और अब पानी भरवाने के बहाने से सचिन रेशमा के पास उस के कमरे में जाने लगा. इस के बाद उन के बीच बातचीत का सिलसिला और तेजी से बढ़ने लगा. धीरेधीरे दोनों एकदूसरे से काफी खुल गए. उन के बीच हंसीमजाक भी शुरू हो गया.

दिन भर अकेले रहने के कारण रेशमा का मन नहीं लगता था. लेकिन जब से सचिन ने उस के यहां आनाजाना शुरू किया था, तब से उस का अकेलापन दूर हो गया था. वह अब दिन भर हंसतीमुसकराती रहती थी. उस के खिले चेहरे को देख कर सचिन को भी अच्छा लगता था. रेशमा सचिन से 12 साल बड़ी थी. रेशमा की उम्र 31 साल थी तो सचिन की 19 साल.

सर्दी का समय था. घना कोहरा छाया था. ऐसे में सचिन ने रेशमा के घर का पानी भरवाया तो उस में वह भीग गया, जिस से वह सर्दी से और कांपने लगा. उस ने जा कर कपड़े चेंज किए और रेशमा के पास उस के कमरे में पहुंच गया.

उसे सर्दी से कंपकंपाते हुए रेशमा ने देखा तो उस से कहा, ‘‘बैठो, मैं तुम्हारे लिए चाय बना कर लाती हूं.’’ कह कर रेशमा रसोई में चाय बनाने चली गई. सचिन भी उस के साथ पीछेपीछे रसोई में पहुंच गया.

‘‘अरे तुम क्यों आ गए, वहीं कुरसी पर बैठते. और कुछ खाना हो तो बताओ?’’

‘‘जो चाहो, खिला दो. मैं तो तुम्हारे इन कोमलकोमल हाथों से जहर खाने के लिए भी तैयार हूं.’’ कह कर सचिन ने रेशमा का हाथ अपने हाथ में ले कर चूम लिया.

‘‘हाय राम, ये क्या कर रहे हो.’’ रेशमा ने झट से अपना हाथ छुड़ा लिया.

ये भी पढ़ें- Crime Story: त्रिकोण प्रेम- दीपिका का खूनी खेल

‘‘क्यों, कुछ गलत कर दिया क्या? तुम भी तो मुझे प्यार करती हो, मैं यह अच्छी तरह से जानता हूं.’’ सचिन ने कहा.

‘‘किस ने कहा?’’ रेशमा इठलाते हुए बोली.

‘‘तुम्हारी आंखों ने…क्यों सच कह रही हैं न तुम्हारी आंखें?’’ सचिन ने रेशमा की आंखों में आंखें डाल

कर कहा.

‘‘तुम बड़े बेशर्म हो.’’ रेशमा ने इतरा कर बोली..

‘‘वह कैसे?’’

‘‘इतना भी नहीं जानते कि दरवाजा खुला है और इस बीच कोई आ गया तो आफत आ जाएगी.’’ वह मुसकरा कर बोली.

‘‘अरे हां, मैं तो भूल ही गया था. क्या करूं, तुम्हारा रूप ही ऐसा है कि देखते ही सब भूल जाता हूं. संजय भाई की तो पांचों अंगुलियां घी में तैरती हैं.’’

रेशमा ने ठंडी सांस ले कर कहा, ‘‘उन की छोड़ो वह जैसे हैं वैसे ही रहेंगे जिंदगी भर. तुम अपनी बताओ कि तुम्हारे दिल में क्या है मेरे रूप का नशा तुम पर किस हद तक चढ़ा है.’’ रेशमा ने कहा.

अगले भाग में पढ़ें- ड्राइविंग सीट के पास वाली सीट पर खून फैला हुआ था

Valentine’s Special- कड़ी: भाग 1

बृहस्पति की शाम को विवेक को औफिस से सीधे अपने घर आया देख कर निकिता चौंक गई.

‘‘खैरियत तो है?’’

‘‘नहीं दीदी,’’ विवेक ने बैठते हुए कहा, ‘‘इसीलिए आप से और निखिल जीजाजी से मदद मांगने आया हूं, मां मुझे लड़की दिखाने ले जा रही है.’’

निखिल ठहाका लगा कर हंस पड़ा और निकिता भी मुसकराई.

‘‘यह तो होना ही है साले साहब. गनीमत करिए, अमेरिका से लौटने के बाद मां ने आप को 3 महीने से अधिक समय दे दिया वरना रिश्तों की लाइन तो आप के आने से पहले ही लगनी शुरू हो गई थी.’’

‘‘लेकिन मैं लड़की पसंद कर चुका हूं जीजाजी और यह फैसला भी कि शादी करूंगा तो उसी से.’’

‘‘तो यह बात मां को बताने में क्या परेशानी है, लड़की अमेरिकन है क्या?’’

‘‘नहीं जीजाजी. आप को शायद याद होगा, दीदी, जब मैं अमेरिका से आया था तो एयरपोर्ट पर मेरे साथ एक लड़की भी बाहर आई थी?’’

ये भी पढ़ें- तुम ही चाहिए ममू : क्या राजेश ममता से अलग रह पाया

निकिता को याद आया, विवेक के साथ एक लंबी, पतली युवती को आते देख कर उस ने मां से कहा था, ‘विक्की के साथ यह कौन है, मां? पर जो भी हो दोनों की जोड़ी खूब जम रही है.’ मां ने गौर से देख कर कहा था, ‘जोड़ी भले ही जमे मगर बन नहीं सकती. यह जस्टिस धरणीधर की बेटी अपूर्वा है और इस की शादी अमेरिका में तय हो चुकी है, शादी से पहले कुछ समय मांबाप के साथ रहने आई होगी’.

निकिता ने मां की कही बात विवेक को बताई.

‘‘तय जरूर हुई है लेकिन शादी होगी नहीं. मेरी तरह अपूर्वा को भी अमेरिका में रहना पसंद नहीं है और वह हमेशा के लिए भारत लौट आई है,’’ निकिता की बात सुन कर विवेक ने कहा.

‘‘उस ने यह फैसला तुम से मुलाकात के बाद लिया?’’

‘‘मुझ से तो उस की मुलाकात प्लेन में हुई थी, दीदी. बराबर की सीट थी, सो, इतने लंबे सफर में बातचीत तो होनी ही थी. मेरे से यह सुन कर कि मैं हमेशा के लिए वापस जा रहा हूं, उस ने बताया कि उस का इरादा भी वही है. उस के बड़े भाई और भाभी अमेरिका में ही हैं.

‘‘पिछले वर्ष घरपरिवार अपने बेटे के पास बोस्टन गया था. वहां जस्टिस धर को पड़ोस में रहने वाला आलोक अपूर्वा के लिए पसंद आ गया. अपूर्वा के यह कहने पर कि उसे अमेरिका पसंद नहीं है, उस की भाभी ने सलाह दी कि बेहतर रहे कि वीसा की अवधि तक अपूर्वा वहीं रुक कर कोई अल्पकालीन कोर्स कर ले ताकि उसे अमेरिका पसंद आ जाए. सब को यह सलाह पसंद आई. संयोग से आलोक के मातापिता भी उन्हीं दिनों अपने बेटे से मिलने आ गए और सब ने मिल कर आलोक और अपूर्वा की शादी की बात पक्की कर दी और यह तय किया कि शादी आलोक का प्रोजैक्ट पूरा होने के बाद करेंगे.

‘‘अपूर्वा को आलोक या उस के घर वालों से कोई शिकायत नहीं है. बस, अमेरिका की भागदौड़ वाली जिंदगी खासकर ‘यूज ऐंड थ्रो’ वाला रवैया कोशिश के बावजूद भी पसंद नहीं आ रहा. भाईभावज ने कहा कि वह बगैर आलोक से कुछ कहे, पहले घर जाए और फिर कुछ फैसला करे. मांबाप भी उस से कोई जोरजबरदस्ती नहीं कर रहे मगर उन का भी यही कहना है कि वह रिश्ता तोड़ने में अभी जल्दबाजी न करे क्योंकि आलोक के प्रोजैक्ट के पूरे होने में अभी समय है. तब तक हो सकता है अपूर्वा अपना फैसला बदल ले. यह जानते हुए कि उस का फैसला कभी नहीं बदलेगा, अपूर्वा आलोक को सच बता देना चाहती है ताकि वह समय रहते किसी और को पसंद कर सके.’’

‘‘उस के इस फैसले में आप का कितना हाथ है साले साहब?’’

‘‘यह उस का अपना फैसला है, जीजाजी. हालांकि मैं ने उस से शादी करने का फैसला प्लेन में ही कर लिया था मगर उस से कुछ नहीं कहा. टैनिस खेलने के बहाने उस से रोज सुबह मिलता हूं. आज उस के कहने पर कि समझ नहीं आ रहा मम्मीपापा को कैसे समझाऊं कि आलोक को ज्यादा समय तक अंधेरे में नहीं रखना चाहिए, मैं ने कहा कि अगर मैं उन से उस का हाथ मांग लूं तो क्या बात बन सकती है तो वह तुरंत बोली कि सोच क्या रहे हो, मांगो न. मैं ने कहा कि सोचना मुझे नहीं, उसे है क्योंकि मैं तो हमेशा नौकरी करूंगा और वह भी अपने देश में ही. सो, आलोक जितना पैसा कभी नहीं कमा पाऊंगा. उस का जवाब था कि फिर भी मेरे साथ वह आलोक से ज्यादा खुश और आराम से रहेगी.’’

‘‘इस से ज्यादा और कहती भी क्या, मगर परेशानी क्या है?’’ निखिल ने पूछा.

‘‘मां की तरफ से तो कोई परेशानी नहीं होनी चाहिए क्योंकि अपूर्वा की मां शीला से उन की जानपहचान है…’’

‘‘वही जानपहचान तो परेशानी की वजह है, दीदी,’’ विवेक ने बात काटी, ‘‘मां कहती हैं कि अपूर्वा की मां ने उन्हें जो बताया है वह सुनने के बाद वे उसे अपनी बहू कभी नहीं बना सकतीं.’’

‘‘शीला धर से मां की मुलाकात सिर्फ महिला क्लब की मीटिंग में होती है और बातचीत तभी जब संयोग से दोनों बराबर में बैठें. मैं नहीं समझती कि इतनी छोटी सी मुलाकात में कोई भी मां अपनी बेटी के बारे में कुछ आपत्तिजनक बात करेगी.’’

‘‘मां उन से मिली जानकारी को आपत्तिजनक बना रही हैं जैसे लड़की की उम्र मुझ से ज्यादा है…’’

‘‘तो क्या हुआ?’’ निकिता ने बात काटी, ‘‘लगती तो तुम से छोटी ही है और आजकल इन बातों को कोई नहीं मानता. मैं समझाऊंगी मां को.’’

ये भी पढ़ें- प्रायश्चित : सुधीर के व्यवहार से हैरान थी सुधि

‘‘यही नहीं और भी बहुतकुछ समझाना होगा, दीदी,’’ विवेक ने उसांस ले कर कहा, ‘‘फिलहाल तो शनिवार की शाम को गुड़गांव में जो लड़की देखने जाने का कार्यक्रम बना है, उसे रद करवाओ.’’

‘‘मुझे तो मां ने इस बारे में कुछ नहीं बताया.’’

‘‘कुछ देर पहले मुझे फोन किया था कि शनिवारइतवार को कोई प्रोग्राम मत रखना क्योंकि शनिवार को गुड़गांव जाना है लड़की देखने और अगर पसंद आ गई तो इतवार को रोकने की रस्म कर देंगे. मैं ने टालने के लिए कह दिया कि अभी मैं एक जरूरी मीटिंग में हूं, बाद में फोन करूंगा. मां ने कहा कि जल्दी करना क्योंकि मुझे निक्की और निखिल को भी चलने के लिए कहना है.’’

निखिल फिर हंस पड़ा,

‘‘यानी मां ने जबरदस्त नाकेबंदी की योजना बना ली है. पापा भी शामिल हैं इस में?’’

‘‘शायद नहीं, जीजाजी. सुबह मैं और पापा औफिस जाने के लिए इकट्ठे ही निकले थे. तब मां ने कुछ नहीं कहा था.’’

‘‘मां योजना बनाने में स्वयं ही सिद्धहस्त हैं. उन्हें किसी को शामिल करने या बताने की जरूरत नहीं है. उन के फैसले के खिलाफ पापा भी नहीं बोल सकते,’’ निकिता ने कहा.

‘‘तुम्हारा मतलब है साले साहब को गुड़गांव लड़की देखने जाना ही पड़ेगा,’’ निखिल बोला.

‘‘जब उसे वहां शादी करनी ही नहीं है तो जाना गलत है. तुम कई बार शनिवार को भी काम करते हो विवेक, सो, मां से कह दो कि तुम्हें औफिस में काम है और फिर चाहे अपूर्वा के साथ या मेरे घर पर दिन गुजार लो.’’

‘‘औफिस में वाकई काम है, दीदी. लेकिन उस से समस्या हल नहीं होगी. मां लड़की वालों को यहां बुला लेंगी.’’

‘‘तुम चाहो तो मां को समझाने के लिए विवेक के साथ जा सकती हो, निक्की. मैं बच्चों को खाना खिलाने के बाद सुला भी दूंगा.’’

‘‘तब तो मां और भी चिढ़ जाएंगी कि मैं ने दीदी से उन की शिकायत की है. फिलहाल तो दीदी को मुझे यह समझाना है कि गुड़गांव वाला परिच्छेद खुलने से पहले बंद कैसे करूं. और जब मां मेरी शिकायत दीदी से करें तो वह कैसे बात संभालेंगी,’’ विवेक ने कहा.

निकिता ने विवेक को समझाया कि वह मां से कह दे कि न तो वह उन की मरजी के बगैर शादी करेगा और न अपनी मरजी के बगैर. सो, लड़की देखने जाने का सवाल ही नहीं उठता.

दिल्ली का सुपरकॉप संजीव यादव

संजीव यादव दिल्ली पुलिस के वह सुपरकौप हैं, जिन के नाम से बड़ेबड़े बदमाश थरथर कांपते हैं. स्पैशल सेल के डीसीपी संजीव अब तक 75 बदमाशों को मौत के घाट उतार चुके हैं. फिल्म बटला हाउस में जौन अब्राहम ने उन्हीं का किरदार निभाया था. संजीव का अपराधों के विरूद्ध अभियान…

एसीपी संजीव यादव को जामिया नगर स्थित बटला हाउस की बिल्डिंग एल 18 के मकान नंबर 108 तक पहुंचने में 20 मिनट का समय लगा था. लेकिन उस से पहले ही उन की टीम के बहादुर इंसपेक्टर मोहनचंद्र शर्मा और

हैडकांस्टेबल आतंकवादियों की गोलियों से जख्मी हो चुके थे. जिन्हें स्पैशल सेल की टीम के लोग अस्पताल ले गए थे.

संजीव यादव को बटला हाउस पहुंचने से पहले जब मोहनचंद्र शर्मा की आतंकवादियों से हुई मुठभेड़ और उन के घायल होने की सूचना मिली थी तो उन्होंने अपने डीसीपी आलोक वर्मा तथा जौइंट कमिश्नर करनैल सिंह को भी इस की सूचना दे दी थी.

sanjiv-yadav

इसी बीच उन्होंने अपनी गाड़ी के पीछे चल रहे स्टाफ को संदेश दे दिया कि बुलेटप्रूफ जैकेट पहन लें और हथियारों से लैस हो मुठभेड़ के लिए तैयार रहें.

तैयारी पूरी थी, बटला हाउस में आतंकवादियों के छिपे होने वाले मकान पर पहुंच कर उन्होंने अपने स्टाफ के साथ धावा बोल दिया, जहां भीतर से हुई फायरिंग के कारण इंसपेक्टर मोहनचंद्र शर्मा घायल हुए थे.

बुलेटप्रूफ  जैकेट पहने एसीपी संजीव यादव ने जान जोखिम में डाल कर मकान नंबर 108 में जब प्रवेश किया तो उन की टीम पर अंदर छिपे आतंकवादियों ने ताबड़तोड़ फायरिंग की, लेकिन किस्मत अच्छी थी कि गोली किसी को लगी नहीं. जवाब में संजीव यादव की टीम ने भी क्र्रौस फायरिंग की. गोलीबारी का यह सिलसिला करीब 7-8 मिनट तक चला और जब सब कुछ शांत हो गया तो पुलिस टीम ने मकान की तलाशी ली.

अंदर जा कर देखा तो कमरे में सामने 2 लाशें पड़ी थीं और कुछ हथियार व गोलियों के खाली कारतूस भी थे. बाथरूम में घायल हालत में एक युवक मिला, जिस ने अपना नाम नाम सैफ बताया. साथ ही उस ने लाशों की पहचान आतिफ अमीन और साजिद के रूप में की. उस ने यह भी बताया कि वे सब आतंकी संगठन हिजबुल मुजाहिदीन के लिए काम करते हैं.

sanjeev-yadavv-with-wife-so

ये भी पढ़ें- आईपीएल नीलामी: खेलखेल में बने करोड़पति

19 सिंतबर, 2008 की सुबह जामिया नगर के बटला हाउस में हुए इस एकाउंटर से ठीक एक हफ्ते पहले यानी 13 सितंबर, 2008 को दिल्ली में 5 अलगअलग जगहों पर हुए सीरियल बम ब्लास्ट में 30 लोगों की मौत हुई थी. उसी ब्लास्ट की जांच और धरपकड़ करते हुए स्पैशल सेल को ब्लास्ट में शामिल कुछ संदिग्ध लोगों के इस मकान में छिपे होने की जानकारी मिली थी.

स्पैशल सेल के इंसपेक्टर मोहनचंद्र शर्मा इसी सूचना को वैरीफाई करने के लिए बटला हाउस की एल 18 नंबर बिल्डिंग के मकान नंबर 108 में अपनी टीम के साथ पहुंचे थे. लेकिन बिना स्वचालित हथियार और बुलेटप्रूफ जैकेट पहने सर्च के लिए गई टीम को पता नहीं था कि मकान के भीतर खूंखार आतंकवादी घातक हथियारों के साथ मौजूद हैं. पुलिस के मकान में घुसते ही दहशतगर्दों ने पुलिस पर ताबड़तोड़ गालियां चला दीं, जिस में मोहनचंद्र शर्मा व हवलदार बलवंत घायल हो गए.

आतंकवादियों की गोलियां लगने के कुछ घंटों के बाद ही इंसपेक्टर मोहन चंद शर्मा की मौत हो गई थी. बाद में एसीपी संजीव यादव मौके पर पहुंचे और उन्होंने मोर्चा संभाला. मकान के भीतर छिपे आतंकियों से लोहा लिया और इस एनकाउंटर में 2 आतंकवादी मारे गए. सैफ नाम के एक आतंकवादी को घर में ही पकड़ लिया गया था. बाद में एक आतंकवादी जीशान को पुलिस ने उसी शाम पकड़ लिया.

एसीपी संजीव यादव ने जिस बहादुरी के साथ बटला हाउस एनकाउंटर को लीड किया था, ताबड़तोड़ छापेमारी कर इस वारदात में शामिल अपराधियों की धरपकड़ की थी और विवादों का सामना करते हुए जिस मानसिक प्रताड़ना को सहा था, उसी बहुचर्चित एनकाउंटर पर कुछ सालों बाद डायरेक्टर निखिल आडवानी ने ‘बटला हाउस’ के नाम से फिल्म बनाई थी. फिल्म में अभिनेता जौन अब्राहम ने तत्कालीन एसीपी संजीव यादव का किरदार निभाया था.

sanjeev-kumar-yadav

इस फिल्म में संजीव यादव का किरदार निभाने से पहले अभिनेता जौन अब्राहम ने जब असल जिंदगी के डीसीपी (बाद में) संजीव कुमार यादव से मुलाकात की तो वह यह जान कर दंग रह गए थे कि करीब 75 मुठभेड़ों में अपराधियों से 2-2 हाथ करने वाले संजीव यादव ने बाटला हाउस मुठभेड़ के विवाद के बीच मानसिक प्रताड़ना के एक बुरे दर्दनाक दौर का सामना किया था. संजीव यादव यहां तक हतोत्साहित हो गए थे कि मन में आत्महत्या करने तक का ख्याल आया था. क्योंकि बाटला हाउस एनकांउटर के बाद उन्हें स्पैशल सेल से हटा दिया गया था.

बाटला हाउस फिल्म में एक सीन है, जिस में जौन अपनी पिस्तौल को नष्ट कर के अपनी पत्नी को दे देते हैं. क्योंकि वह डर गए थे कि वह उस पिस्तौल से खुद को भी गोली मार सकते थे. उन्होंने पिस्तौल के सभी हिस्सों को घर के अलगअलग हिस्सों में रखवा दिया था.

अभिनेता जौन अब्राहम ने संजीव यादव से मिलने के बाद महसूस किया था कि एक कठोर मिजाज सुपर कौप असल जिंदगी में बेहद शर्मीला और शांत स्वभाव का इंसान भी हो सकता है.

संजीव यादव दिल्ली पुलिस के उन जांबाज अफसरों में से एक हैं, जिन का नाम सुन कर बदमाश दिल्ली के आसपास फटकने से भी कन्नी काटते हैं. दिल्ली पुलिस की स्पैशल सेल में कार्यरत डीसीपी संजीव यादव देश के इकलौते ऐसे पुलिस अफसर हैं, जिन को उन के काम के लिए 9 गैलेंट्री अवार्ड यानी राष्ट्रपति वीरता पदक मिल चुके हैं.

dcp

दिल्ली पुलिस में सुपर कौप के नाम से पहचान बना चुके डीसीपी संजीव यादव दिल्ली पुलिस की शान और ऐसी धरोहर हैं, जिन की मौजूदगी पूरे शहर को महफूज रहने का भरोसा देती है.

ये भी पढ़ें- जबरन यौन संबंध बनाना पति का विशेषाधिकार नहीं

कुख्यात अपराधी हो या आतंक फैलाने वाले दहशतगर्द, इस सुपर कौप की नजर में एक बार जो चढ़ गया समझो उस का काम तमाम हो गया. पुलिस विभाग में काम करते हुए जांबाजी से अपराधियों के हौसले पस्त करने की सीख उन्हें विरासत में मिली है.

संजीव यादव पिछले काफी सालों से स्पैशल सेल में पहले एसीपी रहे. इस के बाद अब बतौर डीसीपी तैनात हैं. स्पैशल सेल के साथ उन्होंने लंबे वक्त तक क्राइम ब्रांच में भी काम किया. संजीव यादव जहां भी रहे, आतंक फैलाने से ले कर अपराध करने वालों के बीच खौफ पैदा करते रहे हैं.

यूपी के बलिया के रहने वाले संजीव यादव एक रसूखदार परिवार में पैदा हुए थे. पिता नंदजी यादव उत्तर प्रदेश पुलिस में थे और एसपी पद से रिटायर होने के बाद जिला पंचायत अध्यक्ष चुने गए थे.

संजीव कुमार यादव के सब से बड़े भाई विनोद यादव डिप्टी एसपी से रिटायर होने के बाद फिलहाल गोरखपुर में रह रहे हैं और एक निजी बैंक में डिप्टी मैनेजर हैं. विनोद यादव से छोटे प्रमोद कुमार यादव सबरजिस्ट्रार हैं, जबकि उन से छोटे राजीव डिप्टी डायरेक्टर (रोजगार) व अजय कुमार यादव सेना में कर्नल हैं.

batla

दिल्ली पुलिस में आने से पहले संजीव यादव मध्य प्रदेश पुलिस में डीएसपी रह चुके हैं. 1998 में दिल्ली पुलिस में बतौर दानिप्स संजीव यादव एसीपी सेलेक्ट हुए तो उन्होंने मध्य प्रदेश पुलिस की नौकरी छोड़ दी.

पुलिस विभाग में काम करते हुए अपराध और अपराधियों का खात्मा करने का जज्बा सुपर कौप संजीव यादव को इसी पारिवारिक विरासत से मिला है. दिल्ली पुलिस में 1998 में एसीपी के रूप में भरती होने के बाद संजीव यादव की सब से पहली नियुक्ति मध्य जिले के औपरेशन सेल में हुई थी.

बटला हाउस एनकांउटर के बाद उठे विवाद के कारण उन्हें क्राइम ब्रांच में भेज दिया गया था. यहां भी उन्होंने अपराधियों के खिलाफ अपना अभियान लगातार जारी रखा.

लेकिन दिल्ली में 2010 में हुए आतंकी हमले के बाद देश की सुरक्षा और जेहादियों के खिलाफ बेहतरीन नेटवर्क के कारण संजीव यादव को फिर से स्पैशल सेल में बुला कर स्पैशल सेल में डीसीपी बना दिया गया. इस के बाद उन्हें आईपीएस कैडर मिला.

स्पैशल सेल में संजीव यादव ने अब तक 42 केस अपने हाथ में लिए हैं, जिस में से 32 का फैसला आ चुका है और अदालत से आरोपियों को सजा मिली है. इन में 2004, 2008, 2010 और 2012 के आतंकी हमले वाले केस भी शामिल हैं.

संजीव यादव आतंकवादियों से ले कर कुख्यात अपराधियों के निशाने पर हैं, इसीलिए खुफिया विभाग की सलाह पर सरकार ने उन्हें जेड कैटेगरी का सुरक्षा कवच दिया हुआ है. आतंकवादियों के खिलाफ औपरेशन हो या किसी खतरनाक गैंगस्टर के खिलाफ अभियान, संजीव कभी अपनी जान की परवाह नहीं करते और औपरेशन को खुद ही लीड करते हैं, रणनीति बनाते हैं और टीम का मनोबल बढ़ाते हुए साथ ले कर चलते है.

दिल्ली  में एक गैंगस्टर के लिए चलाया गया उन का औपरेशन उन के कैरियर का सब से बड़ा एनकाउंटर औपरेशन था.

जून, 2018 का वाकया है. संजीव यादव उन दिनों दिल्ली पुलिस की स्पैशल सेल में नार्दर्न रेंज के डीसीपी की कमान संभाल रहे थे. एक दिन उन्हें अपने एक खबरी से सूचना मिली की कुख्यात इनामी बदमाश राजेश भारती और उस के गैंग के कुछ लोग छतरपुर के चानन होला इलाके में एक फार्महाउस में आने वाले हैं.

संजीव ने अपने मातहत तेजतर्रार पुलिस अफसरों की 5 टीमें गठित की और उन्हें उस इलाके में हर रास्ते पर इस तरह से तैनात कर दिया कि जब राजेश भारती को घेरा जाए तो वह भागने में कामयाब न हो सके.

सादे कपड़ों में टीमों को बाइक और गाडि़यों में बैठा कर ऐसे लगाया गया, जिस से बदमाश अपनी गाडि़यों से पुलिस की गाडि़यों में टक्कर मार कर भी भागे तो वे पकड़े जाएं. उन की टीमों ने छतरपुर इलाके में अपना पूरा जाल बिछा दिया था.

ये भी पढ़ें- रिंकू शर्मा हत्याकांड: धर्मजीवी होने से बचिए

उस के बाद शुरू हुआ राजेश भारती के आने का इंतजार. 31 घंटे तक बिना पलक झपकाए संजीव यादव अपनी टीम के साथ टकटकी लगाए राजेश भारती के आने का रास्ता देखते रहे. जिस फार्महाउस पर नजर रखी जा रही थी, वह एक प्रौपर्टी डीलर का था.

चूंकि खबर एकदम पुख्ता थी कि राजेश भारती वहां जरूर आएगा, इसलिए पूरा दिन इंतजार करने के बाद संजीव यादव अपनी टीमों के साथ मुस्तैदी से वहीं डटे रहे. सब ने बिस्कुट, नमकीन के साथ पानी पी कर रात गुजारी, लेकिन वहां से हटे नहीं.

किसी तरह सुबह हुई तो खबरी से एक बार फिर फोन पर संपर्क साधा गया. उस ने बताया कि आज राजेश भारती हर हाल में  वहां पहुंचेगा. संजीव की सभी टीमें इस सूचना पर अलर्ट हो गईं.

दोपहर होतेहोते शिकार के आने का इंतजार खत्म हो गया. फार्महाउस के बाहर एक एसयूवी आ कर रुकी, जिस की पिछली सीट पर राजेश भारती बैठा था. एसयूवी को उमेश उर्फ डौन ड्राइव कर रहा था. एसयूवी के साथ सफेद रंग की एक दूसरी कार भी थी जिस में 4 लोग सवार थे.

गाडि़यों के फार्महाउस के बाहर पहुंचते ही पहले से घेराबंदी कर चुकी पुलिस की टीमों ने चारों तरफ से दोनों गाडि़यों की ओर आगे बढ़ना शुरू कर दिया. थोड़ा नजदीक पहुंचते ही संजीव यादव ने कोर्डलैस लाउडस्पीकर से बदमाशों को सरेंडर करने की चेतावनी दी. लेकिन उन्होंने सरेंडर करने के बजाय भागने का फैसला किया और अपनी गाडि़यां तेज गति से दौड़ा दीं.

संजीव यादव इस तरह के बदमाशों से पहले भी कई बार लोहा ले चुके थे, इसलिए जानते थे कि ऐसा हो सकता है. इसीलिए उन्होंने बदमाशों को दबोचने के लिए 3 स्तरीय घेराबंदी की थी. पहला घेरा तोड़ कर भागे बदमाशों को पीछे से घेरने के साथ आधा किलोमीटर की दूरी पर घेराबंदी कर के खड़ी टीम ने घेर लिया.

बदमाशों की दोनों गाडियां करीब एकडेढ़ किलोमीटर तक पुलिस को छकाती रहीं. लेकिन त्रिस्तरीय घेराबंदी इतनी पुख्ता थी कि बदमाश 2 मिनट बाद ही चौतरफा इस तरह घिर गए कि उन के सामने 2 ही रास्ते थे कि या तो सरेंडर कर दें या मुकाबला करें.

लेकिन खुद को फंसा देख बदमाशों ने सरेंडर करने की जगह पुलिस पर फायरिंग शुरू कर दी. बदमाशों की फायरिंग के जवाब में संजीव का इशारा मिलते ही उन की टीम ने भी फायरिंग शुरू कर दी. पुलिस की टीम स्वचालित हथियारों से लैस थी.

पूरा इलाका ताबड़तोड़ गोलियों की तड़तड़ाहट से गूंज उठा. मुश्किल से 3 मिनट लगे 31 घंटे से चले आ रहे औपरेशन को खत्म होने में. बदमाशों की ओर से करीब 50 और पुलिस की तरफ से 100 राउंड फायरिंग हुई. एनकाउंटर में राजेश कंडेला उर्फ भारती, संजीत विद्रोही, गुड़गांव निवासी उमेश उर्फ डौन तथा दिल्ली के घेवरा का वीरेश राणा उर्फ विक्कू वहीं पर ढेर हो गए.

संजीव यादव की टीम के 8 जवान भी गोली लगने से घायल हुए थे. जिन 4 बदमाशों को गोली लगी थी, उन की मौके पर ही मौत हो चुकी थी. इस के बावजूद उन्हें भी अस्पताल भेजा गया. दरअसल अपराधी राजेश भारती ने दिल्ली के एक बिजनैसमैन को फोन कर के 50 लाख रुपए की रंगदारी मांगी थी. इसी की शिकायत मिलने के बाद संजीव यादव ने राजेश भारती और उस के गुर्गों की कुंडली खंगाल कर उन के पीछे अपने खबरियों की टीम लगाई थी.

गांव में घरेलू रंजिश के कारण अपराध की डगर पर चलते हुए राजेश भारती के खिलाफ अपराध के 15 संगीन मामले दर्ज थे. भारती की गिरफ्तारी पर दिल्ली पुलिस की तरफ से एक लाख का ईनाम भी घोषित किया गया था. राजेश भारती दिल्ली के उन टौप टेन अपराधियों में से एक था, जो रंगदारी से ले कर तमाम तरह के गुनाहों को अंजाम दे रहे थे. लेकिन संजीव यादव की नजर में चढ़ते ही उस के गुनाहों के साथ जिदंगी का भी खात्मा हो गया.

संगठित अपराध व आतंकवादियों के खिलाफ सब से दमदार मुहिम चलाने वाली दिल्ली पुलिस की 2 यूनिटों स्पैशल सेल तथा क्राइम ब्रांच में रहते हुए संजीव यादव अब तक 75 एनकांउटरों को अंजाम दे चुके हैं. उन्होंने कई पाकिस्तानी और कश्मीरी आतंकवादियों को मुठभेड़ में धराशायी किया तो बहुतों को गिरफ्तार किया.

कई नामचीन गैंगस्टर उन की गोली का शिकार बने तो कई ईनामी बदमाशों को उन्होंने हथकड़ी पहनाई. उन्होंने ही दिल्ली के सब से बड़े गैंगस्टर 5 लाख के ईनामी कुख्यात सोनू दरियापुर को 2017 में मुठभेड़ के बाद गिरफ्तार किया था. ड्रग्स सिंडीकेट चलाने वालों के खिलाफ तो डीसीपी संजीव यादव ने मानों मुहिम ही छेड़ी हुई है. उन के नेतृत्व में 4 दरजन से अधिक देशीविदेशी नशे के तसकर और कई सौ करोड़ की ड्रग्स पकड़ी जा चुकी है.

संजीव यादव की जांबाजी से सिर्फ दिल्ली की जनता ही महफूज नहीं है. उन्होंने पश्चिमी उत्तर प्रदेश व पूर्वांचल के साथ बिहार के भी कई दुर्दांत अपराधियों का खात्मा कर के इन राज्यों की पुलिस व जनता को राहत दिलाई है.

24 अक्तूबर, 2013 की रात को वसंत कुंज में होटल ग्रैंड के पास हुई एक मुठभेड़ में सुरेंद्र मलिक उर्फ नीटू दाबोदिया और उस के साथी आलोक गुप्ता और दीपक गुप्ता मारे गए थे. इस गिरोह ने अपना पीछा कर रही दिल्ली पुलिस के एक एसीपी मनीष चंद्रा की स्कौर्पियो को अपनी कार से टक्कर मार दी थी और अपनी गाडि़यों से उतर कर अलगअलग दिशा में भागते हुए पुलिस पर जबरदस्त तरीके से गोलियां दागी थीं.

डीसीपी संजीव यादव की अगुवाई में इन बदमाशों का पीछा कर उन की टीम के इंसपेक्टर ललित मोहन नेगी, हृदय भूषण और रमेश चंदर लांबा व सबइंसपेक्टर सुखबीर सिंह ने अपनी जान पर खेलते हुए सभी बदमाशों को बसंतकुंज के होटल ग्रैंड के पास एनकाउंटर में धराशायी किया था. यह 13 अक्तूबर, 2013 की रात की बात है. इस मुठभेड़ में सुरेंद्र मलिक उर्फ नीटू दाबोदिया, आलोक गुप्ता और इन का साथी दीपक गुप्ता मारे गए थे. दिल्ली शहर में बदमाशों के खिलाफ इस बहादुरी के लिए संजीव यादव समेत इन सभी चारों पुलिस वालों को राष्ट्रपति का पुलिस मैडल मिला था.

इसीलिए पुलिस विभाग में संजीव यादव को दिल्ली का सुपर कौप कहा जाता है. वैसे तो संजीव यादव अपनी पिस्तौल से सिर्फ बदमाशों पर ही निशाना लगाते हैं. लेकिन उन का एक शौक ऐसा है, जिस के बारे में शायद लोगों का ज्यादा जानकारी न हो.

संजीव यादव अचूक निशानेबाज हैं. उन्होंने साल 2018 में 45वीं दिल्ली स्टेट शूटिंग चैंपियनशिप में एक गोल्ड व 2 ब्रोंज मैडल जीते थे. साथ ही 10 मीटर एयर पिस्टल और 25 मीटर सेंटर फायर पिस्टल में 2 ब्रोंज मेडल अपने नाम किए. खास बात ये है कि जिस उम्र में शूटर शूटिंग से रिटायरमेंट ले लेते हैं, डीसीपी संजीव यादव ने उस उम्र में शूटिंग शुरू की और अपनी मेहनत से पुलिस की व्यस्त जिंदगी से वक्त निकाल कर यह कारनामा कर दिखाया.

शूटिंग की कई प्रतियोगिताओं में मैडल जीतने के बाद उन का चयन भारत की राष्ट्रीय शूटिंग टीम में साउथ एशियन गेम्स 2019 के लिए हुआ और वे भारत की तरफ से शूटिंग में हिस्सा लेने के लिए नेपाल गए.

संजीव यादव की तमाम उपलब्धियों में उन की पत्नी शोभना यादव की भी अहम भूमिका है जो उन्हें सदैव प्रेरित करती हैं. शोभना यादव उत्तर प्रदेश के प्रयागराज जिले की हैं. पत्रकारिता के प्रति उन का रुझान कालेज के दिनों में हुआ था, लिहाजा पत्रकारिता की पढ़ाई के बाद सब से पहले उन्होंने आईटीवी नाम के एक लोकल न्यूज चैनल में काम किया. कुछ महीनों बाद उन्हें पहला ब्रेक इंडिया टीवी में मिला. यहीं से उन को प्रसिद्धि मिली. उन्होंने इस चैनल के साथ काफी दिनों तक काम किया.

बटला हाउस एनकाउंटर के समय वह लाइव रिपोर्टिंग कर रही थीं, यह जानते हुए भी कि उन का पति ही एनकाउंटर को लीड कर रहा है. दर्शकों को उन्होंने इस बात का अहसास तक नहीं होने दिया. उस वक्त वह कितनी टेंशन में रही होंगी, इस का अंदाजा लगाया जा सकता था. संजीव कुमार यादव और उन की पत्नी शोभना यादव एक बेटे व एक बेटी के मातापिता हैं.

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें