Imlie: क्या आदित्य और मालिनी की शादी टूट जाएगी, आएगा नया ट्विस्ट

स्टार प्लस का सीरियल ‘इमली’ में लव ट्रैंगल का ट्रैक चल रहा है इससे कहानी में नए-नए ट्विस्ट आ रहे हैं. जिससे दर्शकों को एंटरटेनमेंट का  फुल डोज  मिल रहा है. शो में इन दिनों दिखाया जा रहा है कि आदित्य खोया-खोया सा रहता है और मालिनी ये बात नहीं समझ पा रही है कि आखिर आदित्य को हुआ क्या है.

आदित्य चाहकर भी अपने मन की बात भी मालिनी से शेयर नहीं कर पा रहा है, वहीं आदित्य के इस बिहेव से  मालिनी परेशान नजर आ रही है. सीरियल के लेटेस्ट एपिसोड में दिखाया गया कि मालिनी अपने रिश्ते को लेकर कमरे में आदित्य से बात करती है, वह कहती है कि अब आदित्य ने उससे अच्छे से बात करना बंद कर दिया है.

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वह कहती है न ही आदित्य मालिनी को फोन करता है और न ही उस पर ध्यान देता है. मालिनी ये भी कहती है कि वो आदित्य को बहुत मिस करती है. ये बात सुनकर आदित्य इमोशनल हो जाता है, और मालिनी उसके करीब आने की कोशिश करती है, तभी वहां इमली आ जाती है.

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मालिनी, इमली को देखकर नाराज होती है और कहती है कि किसी भी पति-पत्नी के कमरे में आने से पहले नॉक कर लिया करो. इतना ही नहीं, मालिनी उसे फटकार भी लगाती है.

सीरियल के पिछले एपिसोड में आपने देखा कि होली के दिन आदित्य, इमली को अपने घर ले आता है. उसे देखकर घरवाले बहुत खुश होते है. लेकिन मालिनी की मां अनु, इमली को खूब खरी-खोटी सुनाती है. अनु को लगता है कि आदित्य मालिनी को धोखा दे रहा है.

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कोरोना: तंत्र मंत्र और हवन का ढोंग

सच तो यह है कि भारत भूमि की हवा कुछ ऐसी है कि यहां हर चीज में ढोंग शुरू हो जाता है. कोरोना कोविड 19 की दूसरी लहर के साथ राजधानी रायपुर में  हो रहा तंत्र मंत्र पूजन हवन यह बताता है कि जब राजधानी का यह हालो- हवाल है तो गांव कस्बे में कैसे अशिक्षा और अंधविश्वास की चपेट में लोगों को ठगा जा रहा है.

कोरोना कोविड-19 की हवा क्या चली अंधविश्वास की लहर दौड़ पड़ी है. जो बताती है कि किस तरह हमारे यहां आज भी अनपढ़ तो अनपढ़ पढ़े लिखे लोग भी तंत्र मंत्र हवन, पूजा के फंदे में फंसे हुए हैं.

दरअसल, अंधविश्वास के इस मनोविज्ञान को हम बहुत समझदारी और होशियारी से ही जान समझ सकते हैं. अन्यथा इनका संजाल कुछ ऐसा है कि कोई बच नहीं सकता.

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यही कारण है कि जब कोरोना कोविड-19 की दूसरी लहर उठी है तो मानो हवन पूजा तंत्र मंत्र करने वालों की दुकानदारी अपने सबाब पर  है. क्योंकि हमारे यहां शिक्षित वर्ग  भी अंधविश्वास के फेर में फंस  रूपए पैसे खूब लूटाता है. इसी का लाभ उठाते हुए गेरुआ वस्त्र धारी और काले वस्त्र धारी तंत्र और मंत्र की झूठी कहानियां गढ़ कर लोगों के जेब खाली कर रहे हैं.

विगत दिनों छत्तीसगढ़ के रायपुर में संपूर्ण विश्व से कोरोना महामारी का नाश करने के लिए एक बड़े धार्मिक संगठन परिवार के सदस्यों ने  अपने-अपने घर में यज्ञ करके आहुति दी.महामृत्युजंय मंत्र और सूर्य मंत्र के उच्चारण से आहुति देकर सभी जाति, धर्म, पंथ के लोगों के लिए प्रार्थना की. पीले कपड़े पहनने वाला यह धार्मिक परिवार कहता है कि विश्वव्यापी हवन, यज्ञ अभियान के तहत छत्तीसगढ़ के 30 हजार से अधिक परिवारों में हवन का आयोजन किया गया. अंधविश्वास यह की इसके परिणाम स्वरूप कोरोना कोविड-19 काबू में आ जाएगा. कुल मिलाकर  कोरोना काबू में आए या ना आए मगर धार्मिक दुकान चलाने वालों का धंधा आज भी बड़ा चोखा चल रहा है.

मंत्र तंत्र का चोखा धंधा

केंद्र सरकार, राज्य सरकार और प्रशासनिक अमला कोरोना संक्रमण से लड़ने की बहुतेरी कोशिशें कर रही हैं. फिर भी  दोबारा कोरोना वायरस बड़ी तेजी से फैल रहा है. इसलिए अब धार्मिक गतिविधियां की भी मानो बाढ़ आ गई है . पंडे पुजारी कहते है कि  हमारे मंत्र हवन से प्रदेशवासियों को कोरोना से राहत मिलेगी.

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स्वामी राघेश्वरा नंद के मुताबिक कोरोना के लिए हम लगातार हवन कर रहे है. पुराणों के अनुसार भी किसी गंभीर बीमारी में जाप करना लाभदायक  है. इसलिए हमने तय किया कि जाप किया जाए. जाप में महामृत्युंजय मंत्र, मूल रामायण का पाठ, बगलामुखी का मंत्र और नवग्रहों के मंत्र का जाप किया जा रहा है.

उन्होंने बताया कि भगवान शिव के मंत्रों का उच्चारण कर हवन किया जाता है. 9 पंडितों ने मिलकर प्रतिदिन 11 हजार जाप करने का लक्ष्य रखा है. इस जप का समापन रामनवमी के दिन किया जाएगा. इससे पहले भी रायपुर में कोरोना भगाने के लिए हवन और पूजा अर्चना किया जा चुका है.

छत्तीसगढ़ में यह रिपोर्ट लिखते वक्त कोरोना के 5 हजार 250 नए कोरोना पॉजिटिव मरीज़ सामने आए हैं. इस संक्रमण से 32 लोगों की मौत हुई है. हालांकि 2 हजार 918 मरीज़ स्वस्थ होने के बाद डिस्चार्ज किए गए हैं. रायपुर में 1 हजार 213 कोरोना मरीज मिले थे और 14 लोगों की जान गई है.  दरअसल,कुछ लोगों  को अपने धंधे से मतलब है और यह धंधा ऐसा है जो पुरातन काल से चला रहा है और हमारे यहां वोटों की राजनीति के कारण कोई इन पर अंकुश लगाने वाला भी नहीं है. ऐसे में आज जबकि सारी दुनिया कोरोना से त्रस्त है कथित  साधु संत को मौका मिल गया है जमकर रुपए बनाने का.

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देश में जरूरत है डाक्टरों की!

नतीजा यह हुआ कि उस की पत्नी भी नौसिखिया नीमहकीम के हाथों मारी गई और बच्चा भी. अगर कहीं यह काम करने वाला राजेंद्र शुक्ला की जगह रहमान होता तो अब तक उत्तर प्रदेश में कोहराम मच चुका होता पर अब यह कोने में रह जाने वाली खबर बन कर रह गई. एक औरत मर गई, एक बच्चा मर गया, एक मर्द बरसों अकेला रह जाएगा. राजेंद्र शुक्ला 10-20 दिन जेल में रह कर बाहर आ जाएगा क्योंकि वह देशभक्तों में से है, टुकड़ेटुकड़े गैंग का या खालिस्तानीपाकिस्तानी नहीं.

देश को असल में जरूरत है डाक्टरों की, अस्पतालों की, नर्सिंगहोमों की पर बन रहे हैं भगवा पंडितपुजारी, मंदिर और आश्रम. गांवगांव का दौरा कर लो. सब से बड़ी चीज जो बनी दिखेगी वह अस्पताल तो नहीं होगा, मंदिर होगा. स्कूल जरूर होंगे क्योंकि आजादी के बाद सरकारों ने चप्पेचप्पे पर स्कूल खोले मगर उन में घुस गए ऐसे टीचर जो पाठ पढ़ाते हैं कि भजन करो, योग करो, ठीक रहोगे. यह गलती थी. पढ़ाना था रोजमर्रा की तकनीक, हिसाब रखना, लिखना, सेहत का ध्यान रखना, अपने हकों के बारे में कैसे जागें बताना, यह सब न कर के पहले ही प्रार्थना में कह दिया जाता है कि हमें तो पूजापाठ पर भरोसा है.

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बच्चों को शुरू से नीमहकीमों के पैरों में बैठने की आदत डाल दी जाती है चाहे ये नीमहकीम राजनीति के हों या सेहत और इलाज के. जो मैडिकल कालेज खुल रहे हैं उन में भी मंदिर बन रहे हैं. मैडिकल के छात्रों को भी सिखा दिया जाता है कि मरीज को कह दो कि दवा तो ले पर दुआ भी करे यानी अगर गलत दवा दी, कुछ नहीं हुआ या खराब हुआ तो चूक दुआ में थी. डाक्टर साफ बच गया. कौन डाक्टर ऐसे शौर्टकट नहीं अपनाएगा.

और ऊपर से अगर सफेद कोट पहन लिया जाए तो किसी को भी डाक्टर मान लिया जाता है जैसे हर भगवा कपड़े वाले को शांत, ईमानदार, भगवान का पक्का एजेंट मान लिया जाता है. सफेद कोट वाले भी और भगवा कुरते वाले भी पैसा पूरा लेते हैं पर करते न के बराबर हैं. इस राजाराम और उस की बीवी पूनम के साथ कुछ ऐसा ही हुआ. वे सफेद कोट के झांसे में आ गए और शायद और कहां जाते. शायद वही सब से पास एकलौता अस्पताल या नर्सिंगहोम था. मंदिर थोड़े ही जाना था जो हर नुक्कड़ पर मिल जाएंगे.

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यह अभी जनता की समझ में नहीं आएगा कि मंदिरोंमसजिदों की जरूरत नहीं, अस्पतालों की जरूरत है. कोविड-19 ने बता दिया है कि सेहत कितनी जरूरी है. कब कैसी बीमारियां आ सकती हैं जो मंदिरों के दरवाजे भी बंद करवा सकती हैं, पता नहीं. सरकार तो चेतेगी नहीं. उस का तो लक्ष्य ही दूसरा है. यह काम तो जनता को खुद करना होगा. सरपंच, मेयर का काम अपने इलाकों में अस्पताल बनवाने के लिए चंदा जमा करना होना चाहिए. यह सब से ज्यादा जरूरी है.

जातजमात की बैठकें- नेता बनने की जोर आजमाइश

लेखक- धीरज कुमार

बिहार सरकार ने घोषणा कर दी है कि साल 2021 के अप्रैल महीने में पंचायत चुनाव होंगे. हालांकि अभी तारीख तय नहीं की गई है, लेकिन ऐसी उम्मीद जताई जा रही है कि अप्रैलमई तक चुनाव करा लिए जाएंगे.

पंचायत चुनाव का बिगुल बजते ही गांवगांव में चुनाव की सरगर्मी तेज होने लगी है. लोग अपनेअपने कुनबे में चर्चा करने लगे हैं. साथ ही, कहींकहीं तो लोग जातीय बैठकें, सम्मेलन करना भी शुरू कर चुके हैं.

चुनाव आयोग ने घोषणा कर रखी है कि बिहार में पंचायत चुनाव ईवीएम मशीन से ही होंगे. सरकार ने इलैक्ट्रौनिक वोटिंग मशीन खरीदने के लिए 122 करोड़ रुपए मंजूर किए हैं. ऐसा लग रहा था कि ईवीएम खरीद से संबंधित मामला कोर्ट में जाने के चलते इस बार भी सरकार बैलेट पेपर पर ही चुनाव कराएगी, लेकिन सरकार ने 90,000 इलैक्ट्रौनिक वोटिंग मशीन खरीदने का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया है.

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बिहार में पंचायती राज व्यवस्था में तकरीबन 6 पदों के लिए चुनाव किए जाने हैं. इन में जिला परिषद अध्यक्ष, पंचायत समिति प्रमुख, मुखिया, वार्ड सदस्य, पंच, सरपंच आदि पद शामिल हैं. इन जीते हुए प्रतिनिधियों में से जिला परिषद उपाध्यक्ष, उपमुखिया, पंचायत समिति उपप्रमुख आदि का चयन चुने हुए प्रतिनिधियों द्वारा किया जाता है.

राज्य चुनाव आयोग के मुताबिक, इस बार पंचायत चुनाव में लगभग 10 लाख लोग अपना हाथ आजमाएंगे. इन में तकरीबन 5 लाख लोग नए उम्मीदवार खड़े होने की उम्मीद है.

बिहार की 8,387 ग्राम पंचायतों में चुनाव किए जाने हैं, इसलिए पूरे राज्य में तकरीबन 8,387 पद पर मुखिया, पंच, सरपंच वगैरह उम्मीदवारों का चयन किया जाएगा.

तकरीबन 1,14,667 वार्ड सदस्यों का चयन किया जाएगा. पंचायत समिति सदस्यों के 11,491 पदों पर चुनाव किए जाएंगे, जबकि जिला परिषद सदस्यों के 1,161 पद के लिए चुनाव किए जाने हैं.

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बिहार में अभी पंचायत चुनाव में दूसरे राज्यों की तरह राजनीतिक पार्टियां अपने उम्मीदवार खड़े नहीं करती हैं. अभी तक चुनाव में खड़े होने वाले उम्मीदवार दलरहित और पार्टीरहित ही होते हैं.

वैसे देखा जाए तो काम तो कार्यरत सरकार के अधीन ही करना पड़ता है. कार्यरत सरकार ही उन के लिए योजनाएं वगैरह बनाती है, इसीलिए इस चुनाव में स्थानीयता का असर ज्यादा रहता है.

बिहार सरकार ने पंचायती राज में चुने हुए उम्मीदवारों का वेतन पहले से ही तय कर रखा है, जिस में जिला परिषद प्रमुख को 12,000 रुपए दिए जाते हैं, वहीं जिला परिषद उपाध्यक्ष और पंचायत समिति सदस्य को 10,000 रुपए मिलते हैं. पंचायत समिति उपाध्यक्ष को 5,000 रुपए दिए जाते हैं.

मुखिया, सरपंच, जिला परिषद सदस्यों को 2,500 रुपए मासिक वेतन के रूप में मिलते हैं. उपमुखिया और उपसरपंच को 1,200 रुपए दिए जाते हैं.
पंचायत समिति सदस्य को 1,000 रुपए तय किए गए हैं. वार्ड सदस्य और पंच को 500-500 रुपए हर महीने दिए जाते हैं.

बिहार के रोहतास जिले के डेहरी ब्लौक की पहलेजा पंचायत के वर्तमान मुखिया प्रमोद कुमार सिंह का कहना है, ‘‘सरकार ने भले ही पंचायत प्रतिनिधियों का वेतन तय कर दिया है, लेकिन वह उन्हें समय से वेतन नहीं देती है. अभी भी मुखिया और वार्ड का पैसा तकरीबन डेढ़ साल से बकाया है.

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‘‘दरअसल, मुखिया को जो अनुदान अपने क्षेत्र में काम कराने के लिए मिलता है, उस का 80 फीसदी वार्ड सदस्यों के खाते में ट्रांसफर करना होता है यानी पंचायत के 80 फीसदी काम वार्ड सदस्यों द्वारा किए जाते हैं. मुखिया बची हुई 20 फीसदी राशि का उपयोग अपने लैवल से काम कराने के लिए करता है.
‘‘वार्ड सदस्य जो काम करते हैं, उस के लिए मुखिया भी जिम्मेदार होता है. काम गलत होने या भ्रष्टाचार के दोषी पाए जाने पर सरकार वार्ड सदस्य के साथसाथ मुखिया को भी दोषी ठहराती है और मुखिया को भी जेल जाना पड़ सकता है, भले ही उस काम को मुखिया ने नहीं करवाया हो.

‘‘इस तरह देखा जाए तो वार्ड सदस्यों का कार्य विस्तार तो किया गया है, पर मुखिया के अधिकारों को सीमित करने का काम किया गया है.’’ हालांकि इस चुनावी मौसम में गली, नुक्कड़, सड़कें, बाजार आदि में चर्चाएं तेज हो गई हैं कि इस बार किस जाति के वोट कितने हैं और इस बार कौनकौन लोग खड़े होने के लिए तैयारी कर रहे हैं. इस बार कौनकौन से नए चेहरे शामिल होने वाले हैं वगैरह.

कुछ लोगों ने तो बैनर, पोस्टर, होर्डिंग लगवाने भी शुरू कर दिए हैं. कुछ तो कई महीने पहले से ही बैनरहोर्डिंग से त्योहारों में शुभकामनाएं देने लगे थे, फिर भले ही वे बैनर में अपना नाम भावी उम्मीदवार के रूप में लिखते थे.

कुछ लोग समाज की कमियां गिना कर खुद को खास साबित करना चाह रहे हैं. अभी कुछ लोग चुपकेचुपके एकदूसरे की जातिकुनबे का भी विश्लेषण कर रहे हैं. इस के साथ ही पुराने उम्मीदवारों के कामकाज की समीक्षा गांवसमाज में होने लगी है.

कुछ लोगों का मानना है कि कुछ उम्मीदवारों ने तो अच्छा काम किया है. इस चुनाव में उन को दोबारा आने का मौका दिया जा सकता है. पर वे लोग
जो 5 साल मिलने के बाद भी अपना काम ठीकठाक नहीं कर पाए, अपने गांवसमाज के लिए अच्छा काम नहीं कर पाए, आम लोगों को बरगलाते रहे और नेता बन कर सरकारी पैसा हड़पते रहे, वैसे लोगों का पत्ता साफ करने के लिए कुछ लोगों में सुगबुगाहट शुरू हो गई है.

रोहतास जिले के डेहरी ब्लौक के अर्जुन महतो सब्जी विक्रेता हैं. उन का कहना है, ‘‘गली, नाली, सड़कें, जल, नल योजना में प्रतिनिधियों द्वारा जो काम किया गया है, उस की क्वालिटी कितनी है और कैसी है, किसी से छिपी नहीं है. आज भी कई गांव ऐसे हैं जहां नल लगे ही नहीं, जबकि कुछ ऐसे भी गांव हैं, जहां नल तो लगे, पर कुछ दिन में ही नल गायब हो गए.

‘‘अभी तक सरकार की घरघर स्वच्छ जल पहुंचाने की योजना अधूरी ही रह गई है. कहींकहीं जलनल योजना हाथी के दांत की तरह दिखावे की चीज बन गई है.’’
सरकार ने घोषणा कर रखी है कि जिन के पास चरित्र प्रमाणपत्र रहेगा, वही चुनाव में उम्मीदवार बनेंगे, इसलिए जिस तरह से एसपी दफ्तर में चरित्र प्रमाणपत्र बनवाने की भीड़ उमड़ रही है, लोगों ने कयास लगाना शुरू कर दिया है कि इस बार पंचायत चुनाव में नए लोगों की ऐंट्री काफी होगी. पुराने लोग तो जोरआजमाइश करेंगे ही, नए लोगों ने भी अपनी घुसपैठ के लिए कोशिश जारी कर दी है.

कल तक पंचायत चुनाव में ऊंचे तबके के लोगों का बोलबाला ज्यादा रहता था. निचले तबके के लोग चुनाव में खड़े होने की हिम्मत नहीं कर पाते थे. लेकिन सरकार ने पिछले चुनाव में खड़े होने के लिए पिछड़ी जाति के 26 फीसदी और एसटीएससी के 16 फीसदी लोगों के लिए आरक्षण लागू किया था.

इस बार भी पुरानी आरक्षण व्यवस्था पर ही चुनाव होंगे, इसलिए सामान्य जातियों के साथसाथ पिछड़ी जाति और एसटीएससी के लोग चुनाव में खड़े होने लगे हैं.

इस के साथ ही बिहार सरकार ने पंचायत चुनाव में महिलाओं को 50 फीसदी आरक्षण तय किया है, जिस के चलते महिलाओं की भागीदारी भी बढ़ी है. लेकिन आज भी महिलाएं नाममात्र की उम्मीदवार होती हैं. उन की आड़ में उन के पति या बेटे ही काम करते हैं.

उम्मीदवारों का अपनी जातजमात में आनाजाना, उठनाबैठना, बढ़चढ़ कर बातें करना शुरू हो गया है. उन्होंने अपने क्षेत्र में घूमनाफिरना शुरू कर दिया है. लोगों के घर शादीब्याह, जलसे वगैरह में जाना शुरू कर दिया है. लोगों में अपनी बात रखनी शुरू कर दी है, ताकि आने वाले चुनाव में उन्हें नेता बनने का मौका मिल सके.

औरंगाबाद के बारुण के रहने वाले 75 साल के रामबालक सिंह मुसकराते हुए कहते हैं, ‘‘चुनाव आते ही उम्मीदवार बड़ेबुजुर्गों को दंडवत प्रणाम करना शुरू कर देते हैं. वे अपनी जातजमात में बैठकें कर आने वाले चुनाव में उम्मीदवार बनने की सहमति और समर्थन हासिल करना चाहते हैं. चूंकि यह लोकल चुनाव होता है, इसलिए लोकल लैवल पर जातजमात के वोट और उन का साथ मिलना जीत की उम्मीद को बढ़ा देता है.’’

निचले तबके से ताल्लुक रखने वाले 65 साल के मोहन प्रसाद रोहतास जिले के डेहरी औन सोन में रहते हैं. एक समय था, जब उन्होंने अपने गांव में मुखिया उम्मीदवार के रूप में खड़ा होने की कोशिश की थी.

उन का कहना है, ‘‘एक समय था, जब बिहार में निचले तबके के लोग कभी उम्मीदवार के रूप में खड़ा होने से डरते थे, लेकिन बिहार में लालू प्रसाद यादव के मुख्यमंत्री रहने के दौरान पिछड़ी जाति और निचले तबके के लोगों में आत्मविश्वास जगा और वे राजनीति में शिरकत करने लगे. आज इस बात को नीतीश कुमार भी स्वीकार करते हैं, तभी उन्होंने बिहार में आरक्षण भी लागू किया.

‘‘आज भी पिछड़ी जाति और निचले तबके में शिक्षा की कमी है, इसलिए वे अपने हक से अनजान हैं. आज भी इस तबके में जागरूकता की कमी है, जिस के कारण वे राजनीति से अपनेआप को दूर रखते हैं, जबकि ऊंची जाति के लोग आज भी हर क्षेत्र में आगे हैं.

‘‘दूसरी बात यह कि निचले तबके में गरीबी इतनी है कि वे राजनीति के बारे में सोच ही नहीं पाते हैं. गरीब बेचारा गरीबी से त्रस्त और रोटी के लिए दिनरात परेशान रहता है, तो भला वह राजनीति कहां से करेगा.’’

सब से बड़ी बात यह है कि चुनाव में वही लोग खड़ा होने की कोशिश कर रहे हैं, जो समाज के दबंग हैं, ऊंची जाति के लोग हैं, अपराधी सोच के हैं. समाज के पढ़ेलिखे और सम झदार लोग अपनेआप को राजनीति से दूर रख रहे हैं. यही वजह है कि समाज में बदलाव नहीं हो पा रहा है.

आज भी भ्रष्टाचार व अपराध हद पर है, इसलिए जरूरी है कि जो लोग समाज को नई दिशा दे सकते हैं, समाज में बदलाव ला सकते हैं, वैसे लोगों को राजनीति में जरूर शिरकत करनी चाहिए, तभी समाज की तसवीर बदल सकती है, वरना सिर्फ जातपांत की राजनीति की बात करने से कोई फायदा नहीं.

समाज को विकसित करने के लिए इस से ऊपर उठ कर विकास की बात करनी होगी, तभी समाज का भला होगा.

प्यार और हवस में फर्क करना सीखें- काजल राघवानी

भोजपुरी फिल्मों की हौट हीरोइन काजल राघवानी को भोजपुरी बैल्ट की सनसनी माना जाता है. वे भोजपुरी फिल्मों की ऐसी हीरोइन हैं, जिन की एक  झलक पाने के लिए उन के चाहने वाले बेताब रहते हैं. फिल्मों की शूटिंग के दौरान काजल राघवानी के साथ सैल्फी लेने की भीड़ देख कर यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि उन्हें लोग किस हद तक पसंद करते हैं.

पुणे, महाराष्ट्र में पलीबढ़ी काजल राघवानी ने दर्जनों कामयाब फिल्में दी हैं, जिन में  ‘सब से बड़ा मुजरिम’, ‘पटना से पाकिस्तान’, ‘भोजपुरिया राजा’, ‘मेहंदी लगा के रखना’, ‘दबंग सरकार’, ‘कुली नंबर वन’ वगैरह शामिल हैं.

भोजपुरी फिल्म ‘अमानत’ के सैट पर काजल राघवानी से हुई मुलाकात में उन के फिल्मी सफर पर खुल कर बात हुई. पेश हैं, उसी के खास अंश :

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अपने परिवार के बारे में बताएं?

मैं मूल रूप से गुजराती हूं और मेरे मम्मीपापा पुणे में रहते हैं. या कह लिया जाए कि अब वहीं पर मेरा घर भी है. मेरी एक बहन और एक भाई हैं.

अब भोजपुरी हीरोइनों के लिए मजबूत किरदार लिखे जा रहे हैं. इस बदलाव को आप कैसे देखती हैं?

सच कहूं, तो अभी भी भोजपुरी हीरोइनों को फोकस कर के उतने मजबूत किरदार नहीं लिखे जा रहे हैं, जितनी जरूरत है, फिर भी इस की शुरुआत भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री में हो चुकी है और ऐसी फिल्में कामयाब भी हुई हैं. मु झे उम्मीद है कि आने वाले दिनों में इस में तेजी आएगी.

आजकल दर्शकों में रोमांच पैदा करने के लिए डरावनी फिल्में भी खूब बनती हैं. क्या डरावनी फिल्मों को शूट करते हुए या देखते हुए आप को डर लगता है?

डरावनी फिल्मों से डर कैसा? ये महज मन की कोरी कल्पना पर आधारित होती हैं और उसी आधार पर कहानियां गड़ी जाती हैं. चूंकि मैं फिल्मों का ही हिस्सा हूं, इसलिए मु झे पता होता है कि ऐसी फिल्में कैसे फिल्माई जाती हैं.

फिल्म ‘अमानत’ में आप किस तरह के रोल में नजर आने वाली हैं?

यह एक लव स्टोरी मूवी है, जिस में फैमिली ड्रामा होगा. इस फिल्म में मैं एक ऐसी लड़की के रूप में नजर आने वाली हूं, जो एक फौजी से प्यार करती है.

आप को अपने सपनों के जिस राजकुमार की तलाश है, उस के अंदर क्याक्या खूबियां होनी चाहिए?

मेरे सपनों का राजकुमार मुझ पर विश्वास करने वाला हो और उस में ढेर सारी अच्छाइयां हों. वह लोगों की इज्जत करना जानता हो. उस के पास मेरे लिए बहुत सारा प्यार हो. साथ ही, मेरा जो भी हमसफर बने, मैं चाहती हूं कि वह मेरी भावनाओं का सम्मान करे, साथ ही वह दूसरों का भी सम्मान करना जानता हो.

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इन दिनों फिल्म इंडस्ट्री में प्यार गुम सा होता जा रहा है और उस की जगह हवस हावी होती जा रही है. इस बारे में आप क्या कहना चाहेंगी?

आज के जमाने में प्यार की जगह हवस ज्यादा हावी है. मेरा मानना है कि प्यार चुनिंदा लोगों को ही मिल पाता  है. यह भी देखा गया है कि कई बार  काम के चक्कर में भी लोगों का गलत इस्तेमाल किया जाता है. मैं ऐसे लोगों से बस इतना ही कहूंगी कि काम को लेकर गलत तरीके से इस्तेमाल न हों और प्यार व हवस में फर्क करना सीखें.

आप भोजपुरी सिनेमा में किस कलाकार के साथ सहज महसूस करती हैं?

अभी तक मैं ने जितने भी भोजपुरी कलाकारों के साथ काम किया है, किसी के साथ भी असहजता महसूस नहीं  हुई. यहां तक कि जिस कलाकर के  साथ पहली बार भी काम किया, उस के साथ भी खुद को सहज ही महसूस  किया है.

मैं फिल्म ‘अमानत’ में हीरो जय यादव के साथ पहली बार काम कर रही हूं और उन के साथ भी फिल्म को खूब मौजमस्ती करते हुए शूट कर रही हूं.

आप स्टारडम को किस तरह संभाल रही हैं? इस का खुमार आप पर चढ़ा है या नहीं?

यह सही है कि भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री में मेरे चाहने वालों की तादाद करोड़ों में है और मु झे उन्हीं लोगों ने स्टार बनाया भी है. ऐसे में मैं खुद को जमीन पर रखने की कोशिश करती रही हूं, क्योंकि जिस भी कलाकार पर स्टारडम हावी हुआ, वह अपने चाहने वालों से दूर होता जाता है. फिर उस का स्टारडम भी धरा का धरा रह जाता है.

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मैं ने खुद को स्टारडम से दूर ही रखने की कोशिश की है और कभी भी अपने चाहने वालों के सामने स्टारडम को हावी नहीं होने दिया है, इसलिए वे मेरे साथ घुलमिल कर रहते हैं और मु झे अपने ही बीच का मानते हैं.

मैं गर्व से कह सकती हूं कि मेरे ऊपर स्टारडम का खुमार न चढ़ा है और न ही चढ़ने पाएगा.

Serial Story- रिश्तों से परे: भाग 2

सलिल ने बड़ी प्रसन्नता से बांड पर हस्ताक्षर कर के कम से कम 4 वर्ष तो वहीं रुकने का इंतजाम कर लिया था. शिक्षा के क्षेत्र में होने के कारण उन की इच्छा थी कि उन की पत्नी विनीता यानी विनी भी शिक्षा में ही रहे. काम तो करना ही था फिर इधरउधर भटकते हुए स्टोर, मौल अथवा किसी और जगह क्यों…. क्यों नहीं शिक्षा के क्षेत्र में? विनी ने न जाने कैसेकैसे स्कूल में एक साल पूरा किया…हरेक सांस में वह अपने स्वतंत्र होने की बात सोचती पर सलिल उस के निर्णय से बिलकुल खुश नहीं थे. वह कहते, ‘‘सीढ़ी पर चढ़ने के लिए पहला कदम ही मुश्किल होता है. जैसे एक साल गुजरा, 2-4 साल में तो आदी हो जाओगी इस वातावरण की.’’

विनी का दिल धड़क उठा. पति की नाराजगी उस से बहुत कुछ कह गई. वह कमजोर बन गई और चाहते हुए भी त्यागपत्र न दे सकी. छुट्टियों में भारत आ कर जब वह मां के गले मिली तो मानो उस की हिचकियों का बांध टूट कर मां के दिल में समा गया. मां भी क्या कर सकती थीं… इंगलैंड लौटने पर सलिल ने उसे खुशखबरी दी.

‘‘डोरिथी मेरे काम से इतनी खुश है कि उस ने मुझे प्रमोट करने का प्रस्ताव रखा है और अब हम अपना घर खरीदने जा रहे हैं.’’ इतनी जल्दी घर? यह सवाल मन में कौंधा पर वह कुछ बोली नहीं. प्रसन्नता और सफलता में डूबे पति का चेहरा निहारती रही. उस की अपनी क्या कीमत है? उस ने सोचा, सभी फैसले सलिल के ही तो होेते हैं. वह तो बस, कठपुतली या मशीन की भांति वही सब करती है जो सलिल चाहते हैं.

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बेमन से विनी बच्चों और सलिल के साथ घर देखने गई. डोरिथी ने ‘रिकमेंड’ किया था, वह बौस थी सलिल की और उसे अपने पास ही रखना चाहती थी. जल्दी ही वह पूरे परिवार सहित अपने घर में ‘शिफ्ट’ हो गई. घर सुंदर था, पूरे साजोसामान सहित बड़े ही कम ‘इंस्टालमेंट’ पर घर मिल गया था, जो सलिल की तनख्वाह से ही हर माह कटता रहेगा. अब तो उस के लिए अधिक कमाना और भी आवश्यक हो गया था. घर में आने के अगले दिन जैसे ही विनी ने सो कर उठने के बाद बेडरू म की खिड़की का परदा उठाया, उसे चक्कर आ गया. घर के ठीक सामने जेड खड़ी थी, किसी लड़के से चिपट कर. 2 मिनट वह सुन्न सी खड़ी देखती रही फिर लड़के के साथ जब जेड सामने वाले घर के अंदर चली गई तब वह टूटे हुए पैरों से घिसट कर पलंग पर आ पड़ी.

शनिवार छुट्टी का दिन था व अगले दिन रविवार…2 दिन की छुट्टियों में वह आसपास घूमफिर कर देखना चाहती थी. कार्नर शौप, शौपिंग मौल्स, लाइबे्ररी, सब के बारे में पता करना चाहती थी पर उस के तो पैर ही मानो बर्फ के हो गए थे. उस ने एक नजर सलिल पर डाली, जो चैन की नींद, प्रसन्नवदन सो रहे थे. धीरे से उठ कर उस ने स्वयं को संभालने की चेष्टा की. शीघ्र ही विनी को पता चला कि जेड उसी घर में रहती है, अपनी मां व अपनी 2 सौतेली छोटी बहनों के साथ. उस की मां का बौयफें्रड जब भी आता है, दोनों छोटी बहनों और उस की मां को अपने साथ बाहर ले जाता है. एक दिन विनी ने सुना, उस की मां का बौयफ्रेंड जेड को सब के साथ चलने के लिए कह रहा था और वह चिल्ला रही थी :

‘नहीं, तुम मेरे पिता नहीं हो, मैं तुम्हारे साथ नहीं जा सकती.’ कुछ देर बाद ही गाड़ी जेड के सिवा सब को ले कर फर्राटे से निकल गई और जेड का दोस्त उसे ले कर अपने से चिपटाते हुए घर में घुस गया.

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विनी का धैर्य जवाब देने लगा. अपने बच्चों को कैसे इस वातावरण में रख सकेगी? अब तो जेड ने यहां पर भी बदतमीजी शुरू कर दी थी. वह उस की बेटी को चिल्लाचिल्ला कर ‘बिच’ बोलती, गालियां बकती, ‘गो बैक टू योर इंडिया…’ और न जाने क्याक्या.

विनी व सलिल बच्चों को समझाते रहते थे. भारत से सलिल के मातापिता भी बच्चों की देखभाल के लिए वहीं आ गए थे. 4 बेडरूम वाले इस घर में जगह ठीकठाक ही थी अत: इस जेड नामक अशांति के अलावा सब ठीक ही चल रहा था. अब कभीकभी जेड अपने बौयफें्रड के साथ निकल कर दरवाजे की घंटी दबा जाती, कभी उस के बेटे कुणाल को साइकिल चलाते हुए देख कर जूता मार देती, फिर दोनों खिलखिला कर मजाक करते, गालियां देते निकल जाते. अब तो यह रोज का कार्यक्रम बन गया था और अनमनी सी विनी बच्चों के लिए हर क्षण भयभीत बनी रहती. जेड की बदतमीजी हद से अधिक बढ़ जाने से उसे स्कूल से निकाल दिया गया था. अब स्कूल में शांति थी परंतु घर में तो वही अशांति बन कर उस के समक्ष रहती थी. वह कपड़ों की तरह लड़के बदलती और उन के साथ घूमती रहती.

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विनी को उस की मां पर आश्चर्य होता, मानो कोई सरोकार ही नहीं. साल दर साल गुजरते रहे और सबकुछ उसी प्रकार चलता रहा. जेड और परिपक्व दिखाई देने लगी थी. हर साल छुट्टियों में विनी अपने पूरे परिवार सहित मुंबई आती. इस साल सलिल के मातापिता ने बच्चों को अपने साथ दिल्ली ले जाने और उन की बूआ के पास कुछ दिन ठहरने का प्रस्ताव रखा. सलिल को भी उस की बहन बारबार बुलाती थीं, सो सलिल, बच्चे एवं उस के मातापिता दिल्ली के लिए रवाना हो गए थे जबकि विनी को 2 दिन बाद की टिकट मिली थी. वह मुंबई हवाई अड्डे पर उतरी तो वहां जेड को देख कर आश्चर्य से उस का मुंह खुला रह गया. हवाई जहाज से उतरते समय जेड का पैर न जाने कैसे फिसल गया था और वह किसी चीज से उलझ कर औंधेमुंह जा गिरी थी. खून से लथपथ उस को देखते ही विनी उस के पास जा पहुंची. अचानक ही ढेरों सवाल उस के जेहन में कुलबुलाने लगे. उस के साथ कोई नहीं था, कैसे और क्यों वह यहां अकेले आई थी?

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भारत और भारतीयों के लिए मन मेें ढेरों कटुता भरे हुए वह यहां आखिर करने क्या आई थी? इस सवाल को मन में रख कर विनी ने हवाई अड्डे के प्रबंधकों से जेड के साथ स्वयं भी अस्पताल चलने का आग्रह किया. विनी के भाईभाभी उसे लेने पहुंचे हुए थे, वह भी विनी के साथ अस्पताल पहुंचे. जेड का काफी खून निकल गया और उसे खून की जरूरत थी. जब विनी को पता चला कि जेड का ब्लड ग्रुप ‘बी पौजिटिव’ है तो उस ने डाक्टरों से प्रार्थना की कि वे उस का खून ले लें क्योंकि उस का भी वही ग्रुप था. देखते ही देखते विनी का खून जेड की नसों में दौड़ने लगा. जेड अब भी बेहोश थी. विनी ने अस्पताल में अपना टेलीफोन नंबर लिखवा कर प्रार्थना की कि कृपया घायल की स्थिति से उसे अवगत कराया जाए. अस्पताल में बहुत सी औप- चारिकताएं पूरी करनी थीं, सो विनी को बताना पड़ा कि वह उसे किस प्रकार जानती है और फार्म पर अपने हस्ताक्षर भी किए.

दूसरे दिन जब जेड को होश आया तब विनी उस के सामने ही थी. अब जेड के आश्चर्य का ठिकाना न था. उस के आंसुओं के आवेग को विनी ने बहुत मुश्किल से बंद कराया, फिर जो जेड ने बताया वह और भी चौंका देने वाला था.

जेड को अभी कुछ दिन पहले ही पता चला था कि वह एक भारतीय पिता की बेटी है और उस के पिता कहीं मुंबई में ही थे. उन का पता ले कर अपनी मां की सहायता से जेड भारत आई थी. पिता से मिलने की उत्सुकता ने मानो उस में पंख लगा दिए थे. अस्पताल के अधिकारी उस के पिता को सूचित कर चुके थे. जेड, विनी का हाथ पकड़े पश्चात्ताप के आंसुओं से अपना मुख भिगोती रही और विनी शब्दहीन रह कर उसे सांत्वना देती रही. जेड के पिता बेटी से मिलने विनी की मौजूदगी में ही आए थे. साथ उन की पत्नी और 2 बच्चे भी थे. भावावेश में आ कर उन्होंने जेड को अपने सीने से चिपटा लिया पर जेड की तेज तर्रार आंखों ने उन की पत्नी की उदासीनता को भांप लिया.

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‘‘आई जस्ट वांटेड टू सी यू डैड,’’ जेड हिचकियों के बीच बोली. वह जानती थी कि उस परिवार में उस का मन से स्वागत नहीं किया जाएगा. पिता के जाने के बाद उस ने एक प्रश्नवाचक दृष्टि विनी पर डाली. विनी ने उस का हाथ थपथपा कर सांत्वना दी. अस्पताल से छुट्टी मिलने पर वह उसे अपने घर ले गई, जहां जेड के पिता उस से मिलने कई बार आए.

अतीत के गलियारों में भटकना छोड़ कर जेड अब विनी के बेहद करीब आ गई थी, इतनी कि विनी के गले से चिपट गई. ‘‘आई वांट टू बी लाइक यू…. मैम,’’ पश्चात्ताप के आंसुओं ने जेड के दिलोदिमाग में अविश्वसनीय परिवर्तन भर दिया था.

कंठ अवरुद्ध होने के कारण जेड ने घूम कर विनी की ओर अपनी पीठ कर ली और तेजी से अपने गंतव्य की ओर बढ़ चली.

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एक इंजीनियर की मौत: कैसे हुआ ये हादसा

महज 70-80 घरों वाले उस छोटे से गांव के छोटे से घर में मातम पसरा हुआ था. गिनती के कुछ लोग मातमपुरसी के लिए आए हुए थे. 28 साल की जवान मौत के लिए दिलासा देने के लिए लोगों के पास शब्द नहीं थे. मां फूटफूट कर रो रही थी. जब वह थक जाती तो यही फूटना सिसकियों में बदल जाता. बाप के आंसू सूख चुके थे और वह आसमान में एकटक देखे जा रहा था. ज्यादा लोग नहीं थे. वैसे भी गरीब के यहां कौन जाता है.

‘‘पर, विजय ने खुदकुशी क्यों की?’’ एक आदमी ने पूछा.

‘‘पता नहीं… उस ने 3 साल पहले इंजीनियरिंग पास की थी. नौकरी नहीं मिली शायद इसीलिए,’’ पिता ने जैसेतैसे जवाब दिया.

‘‘सुरेश, तुम तो उस के बचपन के दोस्त हो. तुम से तो वह अपने दिल की हर बात कहता था. क्या तुम वजह जानते हो?’’ उस आदमी ने पास खड़े नौजवान से पूछा जो चुपचाप अपने दोस्त की मौत पर आंसू बहा रहा था.

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‘‘चाचा, इस सिस्टम, इन सरकारों ने जो सपने दिखाने के कारखाने खोले हैं यह मौत उसी का नतीजा है.

‘‘आप को याद होगा कि 10 साल पहले जब विजय ने इंटर पास की थी, तब वह इस गांव का पहला लड़का था जो 70 फीसदी अंक लाया था. सारा गांव कितना खुश था.

‘‘गांव के टीचरों ने भी अपनी मेहनत पर पहली बार फख्र महसूस करते हुए उसे इंजीनियरिंग करने की सलाह दी थी. तब क्या पता था कुकुरमुत्ते की तरह खुले ये कालेज भविष्य नहीं सपने बेच रहे हैं.

‘‘यह तो आप लोग भी जानते हैं कि विजय के परिवार के पास 8 एकड़ जमीन ही थी. दाखिले के समय विजय के पिताजी ने अपनी बरसों की जमापूंजी लगा दी. उस के अगले साल भी जैसेतैसे जुगाड़ हो ही गया. पर आखिरी 2 साल के लिए उन्हें अपनी 2 एकड़ जमीन भी बेचनी पड़ी.

‘‘सभी को यह उम्मीद थी कि इंजीनियरिंग होते ही 4-6 महीने में विजय की नौकरी लग जाएगी. कालेज भी नामीगिरामी है और कैंपस सिलैक्शन के लिए भी कई कंपनियां आती हैं. कहीं न कहीं जुगाड़ हो ही जाएगा.

‘‘यह किसे पता था कि आने वाली सभी कंपनियां प्रायोजित होती हैं और उन्हीं छात्रों को चुनती हैं जिन का नाम कालेज प्रशासन देता है.

‘‘कालेज प्रशासन भी उन्हीं छात्रों के नाम देता है जो उन के टीचरों से कालेज टाइम के बाद कोचिंग लेते हैं.

‘‘विजय अपने घर के हालात को बखूबी जानता था. वह फीस ही मुश्किल से भर पाता था, ऐसे में कोचिंग लेना उस के लिए मुमकिन नहीं था. ऊपर से दिक्कत यह कि उस के पास होने के एक साल पहले से उन प्रायोजित कंपनियों ने भी आना बंद कर दिया था. शायद दूसरे कालेज वालों ने ज्यादा पैसे दे कर उन्हें बुलवा लिया था.

‘‘इतने सारे इंजीनियरों के इम्तिहान पास करने के बाद सरकार के खुद के पास नौकरी के मौके नहीं थे. विजय को अपने लैवल की नौकरी मिलती कैसे?

‘‘पिछले 3 सालों से उस क्षेत्र की कोई कंपनी नहीं बची थी जहां पर विजय ने नौकरी के लिए अर्जी न दी हो. अब तो हालत यह हो गई थी कि उन कंपनियों के सिक्योरिटी गार्ड और चपरासी भी उसे पहचानने लगे थे. दूर से ही उसे देख कर वे हाथ जोड़ कर मना कर दिया करते थे.

‘‘एक दिन एक साधारण सी फैक्टरी का सिक्योरिटी गार्ड गेट पर नहीं था तो विजय मौका देख कर उस के औफिस में घुस गया और वहां बैठे उस के मालिक को अर्जी देते हुए नौकरी की गुजारिश करने लगा.

‘‘तब उस के मालिक ने कहा, ‘मेरी फैक्टरी में इंजीनियर, सुपरवाइजर, मैनेजर सबकुछ वर्कर ही है जो 50 किलो की बोरियां अपने कंधों पर उठता भी है, 200 किलो का बैरल धकाता भी है और प्रोडक्शन के लिए मशीनों को औपरेट भी करता है. शायद तुम अपनी डिगरी के चलते ये सब काम न कर पाओ.

मैं तो सरकार को सलाह दूंगा कि वह इंजीनियर बनाने के बजाय मल्टीपर्पज वर्कर बनाने के लिए इंस्टीट्यूट खोले. यह देश के फायदे में होगा.’

‘‘कारखानों, कंपनियों और सरकारी महकमों में चपरासी तक की नौकरी न मिलते देख विजय ने टीचर बनने की सोची. पर मुसीबतों ने उस का साथ यहां भी नहीं छोड़ा. सरकारी स्कूलों में उसे अर्जी देने की पात्रता नहीं थी. प्राइवेट स्कूलों में जब इंटरव्यू के लिए वह गया तो सभी इस बात से डरे हुए थे कि जब उसे अपनी फील्ड की नौकरी मिलेगी तो वह स्कूल की नौकरी बीच में ही छोड़ देगा और स्कूल के बच्चों का भविष्य अधर में लटक जाएगा.

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‘‘गांव के रीतिरिवाजों के मुताबिक, विजय की शादी भी उस के इंजीनियरिंग में दाखिला लेते ही तय कर दी गई थी. लड़की पास ही के गांव की थी. विजय जब भी गांव आता तो उस से मिलने जरूर जाता था.

‘‘विजय के इंजीनियर बनने के साथ ही उस ने भी अपनी ग्रेजुएशन पूरी कर ली थी. पर पिछले 3 सालों से विजय का कुछ होता न देख कर लड़की के घर वालों ने कहीं और शादी करने का फैसला ले लिया.

‘‘उस लड़की ने भी विजय को यह कहते हुए छोड़ दिया था कि वह जानबूझ कर जद्दोजेहद की दुनिया में नहीं जा सकती.

‘‘उस लड़की ने कहा था, ‘याद करो विजय, हम ने सुखद भविष्य के जो भी सपने देखे हैं उन में कोई संघर्ष नहीं है तो मैं अब कैसे संघर्षों को चुन सकती हूं? मैं आंखों देखी मक्खी नहीं निगल सकती.’

‘‘विजय गांव वापस आ कर खेती इसलिए भी नहीं कर सकता था, क्योंकि 2 एकड़ खेती बिकने का कुसूरवार वह अपनेआप को मानता था. वैसे भी बची हुई 6 एकड़ खेती से 3 लोगों का खर्चा निकलना मुश्किल ही था. विजय चाहता था अगर वह परिवार की कुछ मदद न कर सके तो कोई बात नहीं, पर कम से कम परिवार के लिए बोझ न बने.

‘‘मैं उसे फोन लगा कर रोज बातें किया करता था ताकि उस की हिम्मत बनी रहे. पर पिछले 15 दिनों से हालात बहुत खराब हो गए थे. जिन लोगों के साथ वह रूम शेयर कर के रहता था उन्होंने 6 महीने से पैसा न दे पाने के चलते रूम से निकाल दिया था. मैं हजार 5 सौ रुपए की मदद जरूर करता था पर वह मदद पूरी नहीं पड़ती थी.

‘‘पेट भरने के लिए वह अकसर रात में सब्जी मंडी बंद होने के बाद चला जाता था और विक्रेताओं द्वारा फेंकी गई सड़ी हुई सब्जियों और फलों के अच्छे हिस्से निकाल कर खा लेता था.

‘‘लेकिन परसों हुई घटना ने न सिर्फ उस की उम्मीदों को तोड़ दिया था, बल्कि तथाकथित इनसानियत पर से भी उस का थोथा विश्वास हमेशा के लिए उठ गया था.

‘‘रूममेट्स द्वारा निकाले जाने के बाद विजय अलगअलग फुटपाथों पर अपनी रातें बिताया करता था. परसों वह ऐसे ही किसी फुटपाथ के किनारे बैठा था. पिछले 2 दिनों से सड़ी हुई सब्जियों के अलावा उस ने कुछ खाया भी नहीं था.

‘‘तभी एक बड़ी सी कार में से एक अमीर औरत उतरी. उस के हाथों में कुछ रोटियां थीं. वह अपनी पैनी निगाहों से कुछ खोज रही थी. उसे सामने कुछ ही दूरी पर एक काला कुत्ता दिखाई पड़ा. शायद वह उसी को खोज रही थी. उस औरत ने उस कुत्ते को अपनी तरफ बुलाने की बहुत कोशिश की. रोटियां शायद वह उस काले कुत्ते को खिलाना चाहती थी.

‘‘कुत्ते ने उस औरत की तरफ देखा जरूर, पर आया नहीं. शायद उस का पेट भरा हुआ था. हार कर वह औरत उन रोटियों को वहीं रख वापस अपनी गाड़ी की तरफ चली गई.

‘‘जब विजय ने देखा कि कुत्ता रोटी नहीं खा रहा?है तो उस ने वह रोटी खुद के खाने के लिए उठा ली. कार में बैठते समय उस औरत ने सारा कारनामा देखा तो वह तुरंत कार में से उतर कर आई और विजय से रोटी छीनते हुए बोली, ‘यह रोटी मैं ने शनि महाराज की पूजा के लिए बनाई है और इसे काले कुत्ते के खाने से ही मेरी शनि बाधा दूर होगी, तुम जैसे आवारा के खाने से नहीं.’

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‘‘भूखा विजय कब तक सिस्टम से, समाज से और अपनी भूख से इंजीनियरिंग की डिगरी के दम पर लड़ता? आखिरकार उस ने जिंदगी से हार मान ली और पानी में डूब कर खुदकुशी कर ली.’’

मातमपुरसी के लिए आए सब लोग चुप थे. वे समझ नहीं पा रहे थे कि किसे कुसूरवार समझें. बिना भविष्य की योजनाएं लिए चल रही सरकारों को या पकवानों के साथ पेट भर कर एयरकंडीशंड कमरों में बैठे सपने बेचने वाले अफसरों को या उन भोलेभाले लोगों को जो इन छलावों में आ कर अपना आज तो खराब कर ही रहे हैं, भविष्य के बुरे नतीजों से भी बेखबर हैं.

Serial Story- रिश्तों से परे: भाग 1

जून का मौसम अपनी पूरी गरमाहट से स्टे्रटफोर्ड के निवासियों का स्वागत करने आ गया था. उस ने यहां पर जिन पेड़ों को बिलकुल नग्न अवस्था में देखा था, वे अब विभिन्न आकार के पत्तों से सुसज्जित हो हवा में नृत्य करने लगे थे. चैरी के पेड़ों पर फूलों के गुच्छे आने वाले को अपनी ओर आकर्षित तो कर ही रहे थे, अपनी छाया में बिठा कर विश्राम भी दे रहे थे. यह वही स्टे्रटफोर्ड है जहां महान साहित्यकार शेक्सपियर ने जन्म लिया था. अभीअभी वह शेक्सपियर के जन्मस्थान को देख कर आई थी. लकड़ी का साफसुथरा 3 मंजिल का घर, जहां आज भी शेक्सपियर पालने में झूल रहा था, आज भी वहां गुलाबी रंग की खूबसूरत शानदार मसहरी रखी हुई थी, आज भी साहित्यकार की मां का चूल्हा जल रहा था. जिस शेक्सपियर को उस ने पढ़ा था, उस को वह महसूस कर पा रही थी.

सोने में सुहागा यह कि वह उस समय वहां पहुंची थी जब शेक्सपियर का जन्मदिवस मनाया जा रहा था. नुमाइश देख कर वह उसी से संबंधित दुकान में गई. जैसे ही वह दुकाननुमा स्टोर से बाहर निकली, अपने सामने शेक्सपियर को खड़ा पाया. वही कदकाठी, वही काली डे्रस. एकदम भौचक रह गई. रूथ ने अंगरेजी में बताया था, ‘इस आदमी ने शेक्सपियर का डे्रसअप कर रखा है. जैसे आप के भारत में बहुरूपिए होते हैं…’ समझने के अंदाज में उस ने गरदन हिलाई और अन्य कई लोगों को जमीन पर पड़े हुए काले कपड़े पर पैसे डालते हुए देख कर उस ने 20 पैंस का एक सिक्का उस कपडे़ पर उछाल दिया.

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भारत से इंगलैंड आए हुए उसे कुछ माह ही हुए थे. जिस स्कूल में उसे नौकरी मिली थी, उस के कुछ अध्यापक-अध्यापिकाओं के साथ वह स्टे्रटफोर्ड आई थी, शेक्सपियर की जन्मभूमि को महसूस करने, उस की मिट्टी की सुगंध को अपने भीतर उतार लेने. इस नौकरी को पाने के लिए उसे न जाने कितने पापड़ बेलने पडे़ थे. पूरे स्कूल में एक अकेली वही ‘एशियन’ थी, सो सभी की नजर उस पर अटक जाती थी. उसे औरों से अधिक परिश्रम करना था, स्वयं को सिद्ध करने के लिए दिनरात एक करने थे. रूथ उस की सहयोगी अध्यापिका थी, जो बहुत अच्छी महिला थी, उसी के बाध्य करने पर वह यहां आई थी और सब से मेलमिलाप बढ़ाने का प्रयास कर रही थी.

चैरी के घने पेड़ के नीचे एक ऊंची मुंडेर सी बनी हुई थी. वह सब के साथ उस पर बैठ गई और सोचने लगी कि क्या हमारे तुलसीदास और कालीदास इतने समर्थ साहित्यकार नहीं थे? स्टे्रटफोर्ड के चारों ओर शेक्सपियर को महसूस करते हुए भारतीय महान साहित्यकार उस के दिमाग में हलचल पैदा करने लगे. हम क्यों अपने साहित्यकारों को इतना सम्मान नहीं दे पाते…ऐसा जीवंत एहसास इन साहित्यकारों के जन्मस्थल पर जाने से क्यों नहीं हो पाता? ‘‘प्लीज हैव दिस…’’ इन शब्दों ने उसे चौंका दिया मगर नजर उठा कर देखा तो सामने रूथ अपने हाथों में 2 बड़ी आइस्क्रीम लिए खड़ी थी.

‘‘ओह…थैंक्स….’’ उस ने अपने चारों ओर नजर दौड़ाई तो सब लोग अपनेअपने तरीके से मस्त थे. गरमी के कारण अधनंगे गोरे शरीर लाल हो उठे थे और हाथों में ठंडे पेय के डब्बे या आइस्क्रीम के कोन ले कर गरमी को कम करने का प्रयास कर रहे थे. उन के साथ के लोग अपनीअपनी रुचि के अनुसार आनंद लेने में मग्न थे. यह केवल रूथ ही थी जो लगातार उसी के साथ बनी हुई थी.

स्कूल में नौकरी मिलने के बाद हर परेशानी में रूथ उस का सहारा बनती, उसे विद्यार्थियों के बारे में बताती, कोर्स के बारे में सिखाती और पढ़ाने की योजना तैयार करने में सहायता करती. कुछेक माह में ही उसे अपनी भूल का एहसास होने लगा था. बेहतर था कि वह कहीं और नौकरी करती, किसी स्टोर में या कहीं भी पर स्कूल में…जहां के वातावरण को सह पाना उस के भारतीय मनमस्तिष्क के लिए असहनीय हो रहा था. सरकार के आदेशानुसार 10वीं तक की पढ़ाई आवश्यक थी. फीस माफ, कोई अन्य खर्चा नहीं…जब तक छठी, 7वीं तक बच्चे रहते सब सामान्य चलता पर उस के बाद उन्हें बस में करना तौबा….उस के पसीने छूटने लगे. स्कूल से घर आते ही प्रतिदिन तो वह रोती थी. आंखें लाल रहतीं. कोई न कोई ऐसी घटना अवश्य घट जाती जो उसे भीतर तक हिला कर रख देती और तब उसे अपने भारतीय होने पर अफसोस होने लगता.

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चैरी के फूल झरझर कर उस के ऊपर पड़ रहे थे, खिलते हुए सफेद- गुलाबी से फूलों को उस ने अपने कुरते पर से समेट कर पर्स में डाल लिया. रूथ उसे देख कर मुसकराने लगी थी. आज फिर स्कूल में वह पढ़ा नहीं सकी, क्योंकि जेड ठीक उस के सामने बैठ कर तरहतरह के मुंह बनाती रहती है. च्यूइंगम चबाती हुई जेड को देख कर उस का मन करता है कि एक झन्नाटेदार तमाचा उस के गाल पर रसीद कर दे पर मन मसोस कर रह जाती है. इंगलैंड में किसी छात्र को मारने की बात तो दूर जोर से बोलना भी सपने की बात है. वह मन मार कर रह जाती है. अनुशासन वाले इस समाज में विद्यार्थी इतने अनुशासनहीन… यह बात किस प्रकार गले उतर सकती है? पर सच यही है.

वैसे भी उस की कक्षा को जेड ने बिगाड़ रखा है. 9वीं कक्षा के ये विद्यार्थी अपनी नेता जेड के इशारे पर हर प्रकार की असभ्यता करते हैं. एकदूसरे की गोद में बैठ कर चूमाचाटी करना तो आम बात है ही, उस ने अपने पीछे से जेड की आवाज में ‘दिस इंडियन बिच’ न जाने कितनी बार सुना है और बहरों की भांति आगे बढ़ गई है. यह बात और है कि उस की आंखों में आंसुओं की बाढ़ उमड़ आई है. हर दिन सवेरे स्कूल के लिए तैयार होते हुए वह सोचती कि आखिर ऐसा कब तक चलेगा? फिलहाल तो अपने इस प्रश्न का कोई उत्तर उस के पास नहीं है. उस ने एक साल का बांड भरा है, उस से पहले तो वहां से छुटकारा पाना उस के लिए संभव ही नहीं. अपने पीछे ठहाकों की बेहूदी आवाजें सुनना उस की नियति हो गई है.

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इस अमीर देश में वह बेहद गरीब है, जो अपने बच्चों की जूठन और फैलाव तो समेटती ही है जेड जैसी जाहिलोंके उस के कमरे में फैलाई हुई ‘गंद’ भी उसे ही समेटनी पड़ती है. भरीभरी आंखों से वह एक मशीन की भांति काम करती रहती है. अधिक संवेदनशील होने के कारण सूई सा दर्द भी उसे तलवार का घाव महसूस होता है. आसान नहीं है यहां पर ‘टीचिंग प्रोफेशन’ यह जानती तो वह पहले से ही थी पर इतना मानसिक क्लेश होता होगा, यह अनुभव से ही उसे पता चल सका.

एक साल बीता तो उस ने चैन की सांस ली. अब वह सलिल से कहेगी कि वह यह काम नहीं कर पाएगी. खाली तो रहेगी नहीं, कुछ न कुछ तो करना ही है. सलिल को ‘वारविकशायर विश्वविद्यालय’ में प्रोजेक्ट पर काम करने के लिए आमंत्रित किया गया था. उन का पिछला रेकार्ड देख कर ही कई अंतर्राष्ट्रीय विश्व- विद्यालयों से उन्हें निमंत्रण मिलते रहे थे. कुछ साल पहले वह अमेरिका भी 2 वर्ष के लिए हो आए थे और समय पूर्ण होने पर भारत लौट गए थे. यहां पर उन का ऐसा प्रभाव पड़ा कि उन से पूरे 4 वर्ष के बांड पर हस्ताक्षर करवा लिए गए. भारतीय दिमाग का तो वाकई कोई जवाब नहीं है. हर तरफ मलाई की कीमत है, केवल अपने यहां ही वह सम्मान नहीं प्राप्त होता जिस का आदमी हकदार है.

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