Serial Story- और तो सब ठीकठाक है: भाग 2

हरदयाल अपनी योजना और भी विस्तार में समझाता, लेकिन तभी चौधरी साहब ने उसे टोक कर मुख्य मुद्दे पर बात करना जरूरी समझा.

आने वालों में अध्यापक ज्ञानेंद्र, वकील सुरेंद्रनाथ, सरपंच मोतीलाल, नेता ज्वालाप्रसाद और रमन उपस्थित थे. हरदयाल एक दूसरे सिलसिले में वहां आया था.

बात रमन ने ही शुरू की, ‘‘चौधरी साहब, अब पानी सिर के ऊपर से गुजरने लगा है. हम ने पूरे जिले की नाका चुंगियों का ठेका लिया है. ट्रैफिक से चुंगी वसूल करते हैं. 10 प्रतिशत पार्टी के दफ्तर को देते हैं…’’

‘‘रुकिए, सारी बातें समझदारी के साथ स्पष्ट करनी चाहिए. ऐसा करते हैं, हरदयालजी, आप सब 11 तारीख को हम से मिलना, जो भी उचित होगा, तय कर लेंगे,’’ चौधरी साहब ने रमन की बात बीच में ही काट दी.

हरदयाल चुपचाप उठ कर बाहर चला गया.

‘‘अरे भाई, तुम लोगों में इतनी भी बुद्धि नहीं है कि कोई अन्य बाहरी आदमी बैठा है. ठीक है, आगे कहो.’’

‘‘आगे क्या कहें? 20 प्रतिशत आप के खाते में डाल देते हैं. 20 प्रतिशत सरकारी कामकाज के लिए, खानेपिलाने के लिए रख छोड़ते हैं. बकाया 50 प्रतिशत में हम 4 लोग भागीदार हैं.’’

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‘‘फिर?’’

‘‘फिर क्या? वह ज्ञानीशंकर का लड़का नर्मदा अकड़ रहा है. 100-50 लड़के इकट्ठे कर लिए हैं और लड़नेमरने को आमादा है.’’

‘‘ठीक है, ठीक है, कुछ फूल उसे भी भेंट कर दो.’’

‘‘नहीं, चौधरी साहब, वह हरिश्चंद्र की औलाद बनता है. ऐसे लेनेदेने से तो नहीं टूटेगा. और भी जलील करेगा सब के आगे.’’

‘‘चांदी का जूता बहुत भारी होता है, नरेंद्रजी.’’

‘‘चौधरी साहब, नर्मदा अक्खड़- मिजाज और सनकी नौजवान है. उस ने अपना बहुमत बना लिया है. तब तो एक ही उपाय है. उसे साफ कर दिया जाए.’’

‘‘छि:छि:, कैसी छोटी बातें करते हो. ऐसे सनकी और जिद्दी आदमियों की हमें बहुत जरूरत है. मैं कल तहसील आऊंगा खुद नर्मदा से बातें करूंगा. और कुछ?’’

अध्यापक ज्ञानेंद्र ने अपनी बात कही, ‘‘चौधरी साहब, हम ने जिले के परमिट आप की राय के अनुसार ही वितरित किए थे. सेठ भगवानदास को सीमेंट का परमिट दिया गया. मुंशी प्यारेलाल भजनलाल फर्म को मिट्टी का तेल, गोवर्धनप्रसाद को सौफ्ट कोक, अली मुहम्मद को गैस आदि के ठेके दिए गए. हम ने वसूली के लिए चक्कर भी लगाए, लेकिन अधिकांश ने कहा कि उन्होंने अपना धन आप को दे दिया है. यदि ऐसा है तो हमारा हिस्सा दिलवा दीजिए.’’

‘‘देखो, मास्टर ज्ञानेंद्रजी. जब तुम एक निजी पाठशाला में मास्टरी करते थे तो चेहरे पर झुर्रियां थीं, आंखों में गड्ढे थे और कुरतापाजामा में पैबंद लगे थे. तुम्हारी पत्नी क्षयरोग की मरीज लगती थी और बच्चे ऐसे लगते थे जैसे सीधे अनाथाश्रम से आए हों.

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‘‘तुम 350 रुपए और मुट्ठीभर इज्जत ले कर बीमार जिंदगी से लड़ रहे थे. मैं ने तुम्हें सड़क से उठा कर  मकान में रखा, मकान में दुकान लगवाई, दुकान में चक्की लगवाई, चक्की की कमाई से तुम्हारी रोटियां चल रही हैं.

‘‘चुनाव में तुम्हें विधान सभा का सदस्य बनाने के लिए 1 लाख रुपए खर्च किए हमारे 2 आदमी किशन और रमेश चुनाव युद्ध में काम आ गए. हम ने उन्हें तालाब में फिंकवा कर मामला रफादफा कर दिया. तुम अच्छे वोटों से जीते, तुम्हारा नाम भी हुआ.

‘‘अब रही हिसाबकिताब की बात. भाई मास्टर, पहले मुझे अपने 1 लाख रुपए निकालने हैं. 20-20 हजार  रुपए मृत व्यक्तियों के रिश्तेदारों को देने हैं. अभी तो सिर्फ 80 हजार ही वसूल हुए हैं. आप लोग 60 हजार रुपए का प्रबंध कर के मुझे दिलवा दो. फिर चाहो तो मेरा हिस्सा भी तुम खा जाना.

‘‘गांधी, नेहरू जैसे बड़े नेता भी तो चुपचाप सब देखते थे. हिस्सेपट्टे से दूर रहते थे. मेरे पास तो ईमानदारी की कमाई ही बहुत है,’’ चौधरी साहब ने पैर सोफे से नीचे लटका दिए.

‘‘चौधरी साहब, यह तो ठीक है कि अब मेरा पक्का मकान है, लोगबाग इज्जत से देखते हैं, सेहत सुधर गई है, लेकिन राजनीति से इस का कुछ लेनादेना नहीं है.

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घर और घाट: अपमानित करती बहू की कहानी

मेरे पति आकाश का देहांत हो गया था. उम्र 35 की भी नहीं हुई थी. उन्हें कोई लंबी बीमारी नहीं थी. बस, अचानक दिल का दौरा पड़ा और उन की मृत्यु हो गई. अभी तक तो मित्रगण आते रहे थे, लेकिन पति के देहांत के बाद कोई नहीं आया. इस में उन का भी दोष नहीं. वहां की जिंदगी थी ही इतनी व्यस्त.

पहली 3 रातें मेरे साथ किरण सोई थी. अब से रातें अकेले ही गुजारनी थीं. शायद हफ्ता गुजरने तक दिन भी अकेले बिताने होंगे. क्या करूंगी, कहां रहूंगी, कुछ सोचा नहीं था.

यों तो कहने को मेरी ननद भी अमेरिका में ही रहती थीं लेकिन वह ऐसे मौके पर भी नहीं आई थीं. साल भर पहले कुछ देर के लिए आई थीं. तब मुझ से कह गई थीं, ‘रीता, आकाश बचपन से बड़ा विनोदप्रिय किस्म का है. तुम्हें दोष नहीं देती, लेकिन आकाश को कुछ हो गया तो भुगतोगी तुम ही. तुम लोगों की शादी को 10 बरस हो गए. देखती हूं पहले आकाश की हंसी जाती रही. फिर माथे पर अकसर बल पड़े रहने लगे. साथ ही वह चुप भी रहने लगा. 5 बरस से सिगरेट और शराब का सहारा भी लेने लगा है. रक्तचाप से शुरुआत हुई तनाव की. उस का कोलेस्ट्राल का स्तर ज्यादा है…’

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मुझे तो लगता है उन को और कुछ नहीं था, बस, दीदी ही की टोकाटाकी खा गई थी. उन से मेरा सुख नहीं देखा गया था.

रहरह कर अतीत मेरे दिमाग में घूमने लगा. मैं ने दशकों से बहुओं के ऊपर होते हुए अत्याचारों को देखतेसुनते मन में ठान ली थी कि मैं कभी अपने ऊपर किसी की ज्यादती नहीं होने दूंगी. अगर आप जुल्म न सहें तो कोई कर ही कैसे सकता है. इस तरह समस्या जड़ से ही उखड़ जाएगी.

लेकिन मैं जैसी शरीर की बेडौल हूं वैसी अक्ल की भी मोटी हूं. मेरी लंबाई कम और चौड़ाई ज्यादा है. जहां तक खूबसूरती का सवाल है, कहीं न कहीं, कुछ न कुछ होगी ही वरना क्यों आकाश जैसा खूबसूरत नौजवान, वह भी अमेरिका में बसा हुआ सफल इंजीनियर, मुझ 18 बरस की अल्हड़ को एक ही बार देख पसंद कर लिया था. ऊपर से उन्होंने न तो दहेज की मांग की थी, न ही खर्च की नोकझोंक हुई थी.

मेरे मांबाप भी होशियार निकले थे. उन्होंने एक बार की ‘हां’ के बाद आकाश और उस के कितने रिश्तेदारों के कहने पर भी उन्हें एक और झलक न मिलने दी थी. मां ने कह दिया था, ‘शादी के बाद सुबहशाम अपनी दुलहन को बैठा कर निहारना.’

डर तो था ही कि कहीं लेने के देने न पड़ जाएं. मां ने शादी के वक्त भी अपारदर्शी साड़ी में मुझ को नख से शिख तक छिपाए रखा था. क्या मालूम बरात ही न लौट जाए. खैर, जैसेतैसे शादी हो गई और मैं सजीधजी ससुराल पहुंच गई.

अभी तक तो घूंघट में कट गई. मरफी का सिद्धांत है कि यदि कुछ गलत होने की गुंजाइश है तो अवश्य हो कर रहेगा. मैं कमरे में आ कर बैठी ही थी कि ननद ने पीछे से आ कर घूंघट सरका दिया. मैं बुराभला सब सुनने को तैयार थी. मगर किसी ने कुछ कहा ही नहीं. मुंह दिखाई के नाम पर कुछ चीजें और रुपए मिलने अवश्य शुरू हो गए. दीदी तो अमेरिका से आई थीं. उन्होंने वहीं का बना खूबसूरत सैट मुझे मुंह दिखाई में दिया. बाकी रिश्तेदार और अड़ोसीपड़ोसी भी आते रहे.

इतने में ददिया सास आईं. दीदी झट बोलीं, ‘लता, जरा आगे बढ़ कर दादीजी के पैर छू लो.’

मैं ने वहीं बैठेबैठे जवाब दे दिया, ‘पैर छुआने का इतना ही शौक था तो ले आतीं गांव की गंवार. मैं तो बी.ए. पास शहरी लड़की हूं.’

दीदी को ऐसा चुप किया कि वह उलटे पांव लौट गईं. कुछ देर बाद एक कमरे के पास से गुजर रही थी तो खुसरफुसर सुनाई पड़ी, ‘इस को इतना गुमान है बी.ए. करने का. एक आकाश की मां एम.ए. पास आई थी, जिस के मुंह से आज तक भी कोई ऐसीवैसी बात नहीं सुनी.’

अब आप ही बताइए, सास के एम.ए. करने का मेरे पैर छूने से क्या सरोकार था? खैर, मुझे क्या पड़ी थी जो उन लोगों के मुंह लगती. मुझे कल मायके चले जाना था, उस के 4 दिन बाद आकाश के संग अमेरिका. वहां दीदी जरूर मेरी जान की मुसीबत बन कर 4 घंटे की दूरी (200 किलोमीटर) पर रहेंगी. मैं पहले दिन से ही संभल कर रहूंगी तो वह मेरा क्या बिगाड़ लेंगी. अनचाहे ही मुझे किसी कवि की लिखी पंक्ति याद आ गई, ‘क्षमा बड़न को चाहिए, छोटन को उत्पात.’

लेकिन देखूंगी, दीदी की क्षमा कब तक चलेगी मेरे उत्पात के सामने. बड़ी आई थीं मेरे से दादीजी के पैर छुआने. डाक्टर होंगी तो अपने लिए, मेरे लिए तो बस, एक सठियाई हुई रूढि़वादी ननद थीं.

सच पूछिए तो पिछले 4 दिन में मैं एक बार भी उन को याद नहीं आई थी. मैं पिछले दिनों अपनी एक सहेली के यहां गई थी. पूरा 1 महीना उस की देवरानी उस के घर रह कर गई थी. एक मेरी ननद थीं, जिन के चेहरे पर जवान भाई के मरने पर शिकन तक नहीं आई थी.

जब मैं 10 बरस पहले आकाश के साथ इस घर में घुसी थी तो गुलाब के फूलों का गुलदस्ता हमारे लिए पहले से इंतजार कर रहा था. उसे ननद ने भेजा था. आकाश ने मुझ को घर की चाबी थमा दी थी, लेकिन मुझे ताला खोलते हुए लगा था जैसे ननद वहां पहले से ही विराजमान हों.

घर क्या था, जैसे किसी राजकुमार की स्वप्न नगरी थी. मुझ को तो सबकुछ विरासत में ही मिला था. भले ही वह सब आकाश की 4 साल की कड़ी मेहनत का इनाम था. मैं इतनी खुश थी कि मेरे पैर जमीन पर नहीं पड़ रहे थे. मेरे सब संबंधियों में इतना अच्छा घरबार उन के खयाल से भी दूर की चीज थी.

मैं ने गुलाब के फूल बैठक में सजा लिए. मगर दीदी का शुक्रिया तो क्या अदा करती, उन की रसीद तक नहीं पहुंचाई. दोचार दिन बाद उन का फोन आया तो कह दिया, ‘हां, मिल तो गए थे.’

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एक बार दीदी शुरू में सपरिवार आई थीं. वह रात को 9 बजे पहुंचने वाली थीं. भला इतनी रात गए तक कौन उन लोगों के लिए इंतजार करता. मैं ने 8 बजे ही खाना लगा दिया था. आकाश कुछ बोलते, इस से पहले ही मैं ने सुना कर कह दिया, ‘9 बजे आने के लिए कहा है. फिर भी क्या भरोसा, कब तक आएं? आप खाना खा लो.’

वह न चाहते हुए भी खाने बैठ गए थे. अभी खाना खत्म भी नहीं हुआ था कि दरवाजे की घंटी बजी. मैं बोली, ‘अब खाना खाते हुए तो मत उठो. पहले खाना खत्म कर लो फिर दरवाजा खोलना.’

खाना खा कर आकाश दरवाजा खोलने गए. मैं बरतन मांजने लगी. उधर न पहुंची तो 15 मिनट बाद ही दीदी रसोई में आ गईं और नमस्ते कर के लौट गईं. मैं ने उन सब का खाना लगा दिया.

दीदी ने हम से भी खाने को पूछा. फिर बोलीं, ‘इस देश में खाने की कमी नहीं है. हर चौराहे पर मिलता है. साथ न खाना था तो कह देते, हम खा कर आते.’

तो क्या मैं ने कहा था कि यहां आ कर खाएं या उन को किसी डाक्टर ने सलाह दी थी? मैं ने सिरदर्द का बहाना बनाया और ऊपर शयनकक्ष में चली गई. खुद ही निबटें अपने भाईजान से.

सुबह उठी तो दीदी चाय बना रही थीं, ‘क्या खालाजी का घर समझ रखा है, जो पूछने की भी जरूरत न समझी?’ मैं ने दीदी को लताड़ा, ‘आप ने क्या समझा था कि मैं आप को उठ कर चाय भी नहीं दूंगी.’

मेरी रसोई को अपनी रसोई समझा था. उस के बाद कभी दीदी को मेरी रसोई में घुसने की हिम्मत न हुई.

मैं ने दीदी को नहानेधोने के लिए 2 तौलिए दिए तो वह 2 बच्चों के लिए और मांग बैठीं. अपने घर में 4 तौलिए इस्तेमाल करें या 8, यहां एक दिन 2 तौलियों से काम नहीं चला सकती थीं? मैं ने एक पुराना सा तौलिया और दे दिया. आखिर मेरा घर है, जो चाहूंगी करूंगी.

उस के बावजूद कुछ ही दिनों बाद दीदी अचानक दोनों बच्चों के साथ मेरे यहां आ धमकीं. रात को देर तक आकाश से बातें करती रही थीं. वह पति महोदय से खटपट कर के आई थीं. मैं पूछ बैठी, ‘आप ने तो अपनी इच्छा से प्रेम विवाह किया था. फिर अब किस बात का रोना?’ दीदी से कुछ जवाब देते न बना.

मैं तो घबरा गई. कहीं दीदी जिंदगी भर मेरे घर डेरा न डाल लें. अगली सुबह आकाश दफ्तर गए और मैं सोती दीदी के पास ही पहुंच गई, ‘दीदी, वापस लौटने के बारे में क्या सोचा है?’

समझदार को इशारा काफी है. उन्होंने हमारे घर रह पति महोदय से बिलकुल बात न बढ़ाई. उसी दिन जीजाजी को फोन किया और शाम को वापस अपने घर लौट गईं. बस, समझ लीजिए तभी से उन का हमारे यहां आनाजाना कुछ खास नहीं रहा. हम ही उन के यहां साल में 2-3 दिन के लिए चले जाते थे. जाते भी क्यों न, वह बड़े आग्रह से बुलाती जो थीं. बुलातीं भी क्यों न, आखिर उन की पति से कम ही पटती थी. हम से भी नाता तोड़ लेतीं तो आड़े वक्त में कहां जातीं? कौन काम आता?

और फिर उन पर क्या जोर पड़ता था हमें बुलाने में. उन्होंने खाना बनाने को एक विधवा फुफेरी सास को साथ रखा हुआ था. घर की सफाई करने वाली अलग आती थी.

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एक बार दीदी भारत गईं तो मेरे लिए मां ने उन के साथ कुछ सामान भेजा. जब मुझे सामान मिला तो उस में से एक कटहल के अचार का डब्बा गायब था, ‘दीदी, अचार चाहिए था तो आप कह देतीं, मैं आप के लिए भी मंगा देती. चोरी करना तो बहुत बुरी बात है.’

बाद में मां ने बताया कि अचार का डब्बा भेजने से रह गया था. बात आईगई हो चुकी थी, तो मैं ने फिर दीदी से कुछ कहने की जरूरत न समझी.

अभी पिछले दिनों दीदी फिर भारत गई थीं. उन्होंने लौट कर फोन किया, ‘लता, तुम्हारे मांबाबूजी से मिल कर आ रही हूं. सब मजे में हैं. मगर तुम्हारे लिए कुछ नहीं भेजा है.’

‘हां, मैं ने ही मां को मना कर दिया था कि हर ऐरेगैरे के हाथ कुछ न भेजा करें. फिर भी मां किसी न किसी के हाथों सामान भेजती रहती हैं. एक पार्सल तो पिछले 8 बरस से आ रहा है. एक 6 महीने बाद मिला था.’

खैर, जो हुआ सो हुआ. मैं अतीत को भूल कर वर्तमान के धरातल पर आ गई. मुझ को अकेले नींद नहीं आ रही थी. रात के 2 बज गए थे. एक तरफ आंसू नहीं थम रहे थे और दूसरी तरफ डर भी लग रहा था इतने बड़े घर में. भूख लग रही थी मगर…मैं अकेली थी…बिलकुल अकेली. शरीर टूट सा रहा था.

मैं मां को भारत ट्रंककाल करने लगी, ‘‘मां, आप कुछ दिनों के लिए अमेरिका आ जाइए. मैं आप का टिकट भेज देती हूं.’’

मां अपनी मजबूरी सुनाने लगीं. विरासत में मिला सुख कुछ भी तो काम नहीं आ रहा था. पति के मरते ही कुछ भी अपना न रहा था. 10 बरस बाद भी उस घर में न तो कोई अपनापन था, न ही देश में.

आकाश 1 लाख डालर छोड़ कर मरे थे. मैं एअर इंडिया को फोन करने लगी, ‘‘मैं वापस भारत जाना चाहती हूं. अपने घर.’’

भारत लौट कर पीहर पहुंची तो वहां कुछ और ही नजारा पाया. भाई की शादी हो चुकी थी, सो एक कमरा भाईभाभी का और दूसरे में मेरे मांबाबूजी. मेरा बैठक में सोने का प्रबंध कर दिया था. मेरा सामान मां के साथ. सुबह बिस्तर समेटते ऐसा लगता था, जैसे उस घर में मैं फालतू थी. मैं ने सोचा, ‘सहना शुरू किया तो जिंदगी भर सहती ही रहूंगी. ऐसी कोई गईगुजरी स्थिति मेरी भी नहीं है. आखिर 10 लाख रुपए ले कर लौटी हूं. चाहूं तो इन चारों को खरीद लूं.’

एक दिन भाभीजान फरमाने लगीं, ‘‘दीदी, पूरी तलवाने में मदद कर दो न, मैं बेलती जाती हूं.’’

आखिर भाभी ने मुझे समझ क्या रखा था…मैं नौकरानी बन कर आई थी क्या वहां? इतना पैसा था मेरे पास कि 10 नौकर रख देती. लेकिन बात बढ़ाने से क्या फायदा था. मैं कुछ भी नहीं बोली थी. मदद नहीं करनी थी, सो नहीं की.

खाना खाने के वक्त भाभी ने अपना खाना परोसा और खाने लगीं. मैं ने भी ले तो लिया, मगर वह बात मेरे मन को चुभ गई. जब मांबाबूजी ही सब बातों में चुपी लगाए थे तो भाभी तो मेरी छाती पर मूंग दलेंगी ही.

मैं ने कहा, ‘‘मेरे आने का तुम लोगों को इतना कष्ट हो रहा है तो मैं वापस चली जाती हूं. मेरे पास जितना पैसा है, मैं उतने में जिंदगी भर मजे से रहूंगी. न किसी से कहना, न सुनना.’’

कोई कुछ भी न बोला. मैं सन्नाटे में रह गई. मैं सपने में भी नहीं सोच सकती थी कि मेरे मांबाबूजी ही इतने बेगाने हो जाएंगे. फिर ससुराल से ही क्या आशा करती.

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घर छोड़ते हुए मेरे आंसू टपक पड़े. मैं फिर अकेली हो गई थी. बिलकुल अकेली. बिलकुल धोबी का कुत्ता बन कर रह गई, न घर की न घाट की.

Serial Story- और तो सब ठीकठाक है: भाग 1

चौधरी जगत नारायण राजनीति के धुरंधर खिलाड़ी थे. सामने वाले को कैसे पटखनी देनी है और कैसे अपना उल्लू सीधा करना है, वह भलीभांति जानते थे. इसीलिए तो वह भ्रष्टाचार में लिप्त हो कर हजारों डकार जाते, किसी को खबर तक न होती.

दरबार जमा हुआ था. सबकुछ निश्चित कर लिया गया था. अब किसी को कोई परेशानी नहीं थी. पंडित गिरधारीलाल की समस्या का समाधान हो चुका था. रजब मियां के चेहरे पर भी संतुष्टि के भाव थे.

हां, कल्लू का मिजाज अभी ठीक नहीं हुआ था. उस ने भरे दरबार में चौधरी साहब की शान में गुस्ताखी की थी. नरेंद्र तो आपे से बाहर भी हो गया था, किंतु चौधरी साहब ने सब संभाल लिया था.

चौधरी जगतनारायण खेलेखाए घाघ आदमी थे. जानते थे कि वक्त पर खोटा सिक्का भी काम आ जाता है. फिर दूध देने वाली गाय की तो लात भी सही जाती है. उन्होंने बड़ी मीठी धमकी देते हुए कल्लू को समझाया था, ‘‘कल्लू भाई, थूक दो गुस्सा. धंधे में क्रोध से काम नहीं चलता. हम तो तुम्हारे ग्राहक हैं. ग्राहक से गुस्सा करना तो व्यवसाय के नियमों में नहीं आता.’’

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‘‘लेकिन चौधरी साहब, मैं अपने इलाके का शेर हूं, कुत्ता नहीं. कोई दूसरा गीदड़ मेरी हद में आ कर मेरा हक छीने, यह मुझे बरदाश्त नहीं होगा. वह रशीद का बच्चा, उस का तो मैं पोस्टमार्टम कर ही दूंगा.’’

‘‘कल्लू के मुंह से कौर छीनना इतना आसान तो नहीं है, जितना आप लोगों ने समझ लिया है. आज का फैसला आप के हाथ में है. लेकिन आगे का फैसला मैं अपनी मरजी से लिखूंगा. और हां, यह भी आप लोगों को बता दूं कि अपना आदमी जब बागी हो जाता है तो कहीं का नहीं छोड़ता.’’

‘‘तू क्या कर लेगा? तीन कौड़ी का आदमी. जानता नहीं जुम्मन की लंबी जबान काट कर फेंक दी थी. हरिशंकर आज भी जेल की चक्की पीस रहा है. कृपाराम मतवाला कुत्ते की मौत मरा था. आखिर, तू समझता क्या है अपनेआप को? चिड़ीमार कहीं का.

‘‘दोचार चूहे इधरउधर मार लिए तो बड़ा भेडि़या समझने लगा है अपनेआप को. सुन, हम राजनीति करते हैं. कोई भाड़ नहीं झोेंकते. तुझ जैसे तीन सौ पैंसठ घूमते हैं झाडू लगाते हुए. चल फूट यहां से,’’ नरेंद्र ने एक फूहड़ सी गाली बकी.

चौधरी साहब ने उसे रोक दिया, ‘‘नहीं नरेंद्र, कहने दो उसे, जो वह कहना चाहता है. उसे भी अपनी बात कहने का हक है. भई, देश में लोकतंत्र है. लोकतंत्र के तहत किसी को उचितअनुचित कुछ भी कहने से रोका नहीं जा सकता. बोलने दो इसे. यह समाजवाद का जमाना है. इसे कुछ गलत लगा है. इसे अपने दर्द को कहने का पूरापूरा हक है. फिर यह हमारा आदमी है. यह हमारे लिए कुछ भी सोचे, हम इस का बुरा नहीं सोच सकते.’’

‘‘हां, हरीश. तुम ध्यान रखना कल्लू भाई का. इसे जब भी कोई जरूरत हो तो उसे पूरी करना. इस समय इसे गुस्सा है. जब यह शांत हो जाएगा तो समझ जाएगा कि कौन अपना है, कौन पराया,’’ चौधरी साहब गांधीवादी मुद्रा में बुद्धआसन लगाए हुए थे.

लेकिन कल्लू एकदम चिकना घड़ा था. वह अपनी हैसियत जानता था. वह यह भी जानता था कि चौधरी साहब के बिना उस का गुजारा नहीं और यह भी मानता था कि अपनेआप को अधिक सस्ता और सुगम बनाने से इनसान की औकात घटती है.

अब चौधरी साहब का दबदबा था. जिस का दबदबा हो उसी के साथ रहने में लाभ था. फिर कल्लू तेजी से घूम कर बाहर निकल गया.

इधर नरेंद्र चौधरी साहब को राजनीति समझा रहा था, ‘‘आप ने बहुत मुंह लगा रखा है उस घटिया आदमी को. उसे न तो बोलने का शऊर है, न ही उठनेबैठने की तमीज. उस दिन धर्मदास को ही दरवाजे पर धक्का मार दिया और फिर पिस्तौल भी निकाल ली. वह तो अच्छा हुआ कि मनोहरलालजी आ गए और बात संभल गई. नहीं तो गजब हो जाता.’’

‘‘अरे, कुछ भी गजब नहीं होता. इंदिरा गांधी को गोली मार दी गई तो मारने वालों पर कौन सा गजब टूट पड़ा? वही अदालत- कचहरी के चक्कर, वकीलों की तहरीरें, न्यायविदों की दलीलें. मुलजिम आनंद करते रहे. उन की रक्षा और देखभाल पर लाखों रुपया पानी की तरह बहाया जाता रहा. अब उच्चतम न्यायालय ने उन में से एक को बरी भी कर दिया है. बाकी को फांसी पर लटका दिया जाएगा. इस से क्या होगा? क्या पंजाब में अब शांति है.

‘‘जुलियस रिबेरो को पद्मश्री से अलंकृत कर दिया गया तो क्या उन की राइफलों में नई गोलियां आ गईं? पंजाब सरकार बरखास्त हो गई तो क्या आतंकवाद दब गया. सबकुछ वैसा ही चल रहा है.

‘‘राजनीति की शतरंज की चालें चली जाती रहेंगी और घाघ मुहरों के घर बदलते रहेंगे, पर मुहरे वही रहेंगे. धर्मनिरपेक्ष समाजवाद, लोकतंत्रीय संविधान, बीस सूत्री कार्यक्रम सब अपनी जगह ठीक हैं, लेकिन हम भी अपनी जगह ठीक हैं.

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‘‘कल्लू भाई की अपनी राजनीति है, अपना पैंतरा है, लेकिन वह हमारे लिए काम का आदमी है. बड़ा जीवट वाला आदमी है. देखो, उस दिन कालीप्रसाद को बुलाने भेजा तो उसे गिरेबान पकड़ कर घसीटता हुआ ले आया. कालीप्रसाद जैसे धाकड़ और झगड़ालू आदमी के गिरेबान पर हाथ डालना कोई हंसीखेल नहीं है, नरेंद्र.’’

चौधरी साहब आ गए नेताओं वाली भाषण मुद्रा में. लेकिन तभी चपरासी बुद्धा अंदर आया. बोला, ‘‘साहब, दिल्लीपुरा के ठाकुर लोग आए हैं.’’

चौधरी साहब ने उन्हें अंदर भेजने का संकेत किया. कीमती खादी के कपड़ों में झकाझक तड़कभड़क के साथ 5 विशिष्ट व्यक्तियों ने प्रवेश किया.

चौधरी साहब का इशारा समझ कर सभी साथी बाहर खिसक गए. कुछ देर तक कुशलक्षेम चलता रहा.

‘‘साहब, वह आप का पुलिसिया कुत्ता था, अब वह कैसा है?’’

‘‘अरे भाई, किस पुलिसिए कुत्ते की बात कर रहे हो. उस के बाद तो मैं 7 कुत्ते बदल चुका.’’

अभ्यागतों में रमन नामक सदस्य भी था. वह सोचने लगा, ‘कुत्ते नहीं हुए, चप्पलें हो गईं. 1 साल में 7 कुत्ते बदल डाले.’

उधर चौधरी साहब पूछताछ करने लगे, ‘‘हरदयालजी, वह आप के भतीजे की बहू का कुछ चक्कर था… मामला सिमट गया कि नहीं?’’

‘‘नहीं, साहब. उस में कुछ गड़बड़ हो गई. हम समझे थे कि बलात्कार का मामला दर्ज कराएंगे. बहू पढ़ीलिखी है. साहस के साथ कह देगी कि दुर्गा ने उस के साथ जबरदस्ती की.

‘‘लेकिन बहू पहले दिन ही अदालत में घबरा गई और रोने लगी. वकीलों ने जिरह कर उसे और भी बौखला दिया. फिर बाद में कुछ मामला बना भी तो गवाह बिक चुके थे.

‘‘मुरली बाबू ने कुछ टुकड़े फेंक कर उन्हें खरीद लिया, लेकिन चौधरी साहब, एक बाजी जिच भी हो गई तो क्या अगली मात तो हम ही देंगे.’’

‘‘वह कैसे?’’ चौधरी साहब ने दोनों पैर सोफे पर खींच लिए. तभी अवधनारायण ने उठ कर उन की धोती ठीक कर दी.

हरदयाल अपना नक्शा समझाने लगे, ‘‘ ‘अपनी धरती’ अखबार का संपादक है न, शंभूप्रसाद. वह अपना यार है. कुछ मामला उस से बना है. उसी के आदमियों ने कुछ तसवीरें खींची हैं. गुलजार रेस्तरां में शराब पीते हुए, मालतीमाधवी के साथ रंगरलियां मनाते हुए, मार्क्सवादी नेता अर्जुनकुमार के साथ शतरंज खेलते हुए. बस, उन्हीं सब तसवीरों के आधार पर एक कहानी बन गई. यही फिल्म उस की असलियत खोल कर रख देगी.’’

श्रुति राव को खेसारीलाल यादव ने क्यों कहा ‘तू फ्रॉड है’

इन दिनों सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हो रहा है. इस वीडियो में भोजपुरी अभिनेता खेसारीलाल यादव को जिस लड़की ने मंडप में छोड़ा था, अब उसी लड़की ने फिर से उनके गले में वरमाला डाल दिया. उसकी यह हरकत खेसारीलाल यादव को अच्छी नहीं लगी, तो उन्होंने उस लड़की को फ्रॉड ही कह दिया.

यह लड़की कोई और नही बल्कि भोजपुरी फिल्मों की कमसिन अदाकारा श्रुति राव हैं. और यह सारा मसला प्रदीप के शर्मा निर्देशित भोजपुरी फिल्मल ‘आशिकी‘ के एक दृश्य की शूटिंग का है.

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‘बाबा मोशन पिक्चर्स प्रा. लि.’ के बैनर तले बन रही फिल्म ‘आशिकी‘की शूटिंग इन दिनों प्रयागराज में जोर शोर से चल रही है,जहां श्रुति राव और खेसारीलाल यादव के ऊपर एक गाना भी फिल्माया गया.इस गाने में श्रुति राव भाग-भाग कर खेसारीलाल यादव को रिझाने का प्रयास कर रही हैं. उन्हें मनाने की कोशिश करती नजर आ रही हैं, लेकिन एक बार धोखा खा चुके खेसारीलाल उनसे दूर भाग रहे हैं.

यह गाने का बेहद रोमांटिक शरारती दृश्य है, जिसको लेकर श्रुति राव बेहद खुश नजर आईं. श्रुति राव कहती हैं-‘‘फिल्म ‘आशिकी‘ मेरे लिए बेहद महत्वपूर्ण फिल्म है. इसमें मेरी भूमिका बहुत ही ज्यादा चुनौतीपूर्ण है. इसमें मुझे खेसारीलाल यादव और आम्रपाली दुबे के साथ परफॉर्म करना है. मैं खेसारीलाल यादव, प्रदीप के शर्मा और पराग पाटिल का धन्यवाद अदा करना चाहूंगी, जिन्होंने मुझे पूरा सहयोग दिया.

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आज जिस गाने को फिल्माया गया है,वह अमेजिंग हैं. मुझे उम्मीद है दर्शकों को यह गाना पसंद आएगा.’’ ज्ञातब्य है कि फिल्म ‘आशिकी‘की शूटिंग अब अंतिम चरण में है.इस फिल्म की सह निर्माता अनीता शर्मा और पदम सिंह हैं.

Nia Sharma ने बॉयफ्रेंड को बताया झूठा, पढ़ें खबर

टीवी की फेमस एक्ट्रेस निया शर्मा इन दिनों अपनी पर्सनल लाइफ को लेकर सुर्खियों में छायी हुई हैं. फैंस को उनसे जुड़ी खबरों का बेसब्री से इंतजार रहता है.

हाल ही में निया शर्मा  इंस्टाग्राम पर लाइव सेशन कर रही थी. इस दौरान एक यूजर ने निया शर्मा से उनके बॉयफ्रेंड को लेकर सवाल किया, कहा- अपने बॉयफ्रेंड के बारे में कुछ बताइए तो निया ने इस जवाब में लिखा, ‘वह झगड़े से बचने के लिए हमेशा झूठ बोलता रहता है कि मैं बहुत प्रिटी दिख रही हूं.

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हालांकि यह नहीं पता कि निया सिंगल हैं या फिर किसी को डेट कर रही हैं. लेकिन निया शर्मा के इस जवाब से अंदाजा लगाया जा रहा है कि निया शर्मा ने स्टार राहुल सुधीर के लिए यह बात कही हैं.

खबर यह आ रही थी कि निया और राहुल एक-दूसरे को डेट कर रहे हैं. पर दोनों में से किसी ने भी कभी इस बारे में खुलकर नहीं बोला.

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रिपोर्ट के अनुसार निया शर्मा ने अपने रिलेशनशिप को लेकर कहा था कि वह उसे ‘मीडिया रिलेशनशिप’ नहीं बनाना चाहतीं. उन्होंने कई ऐसे कपल्स का ब्रेकअप होते हुए देखा है जो सोशल मीडिया पर और पब्लिक जगहों पर खूब प्यार दिखाते हैं.

खबर यह आ रही थी कि निया ने ये भी कहा था कि उन्हें और उनके बॉयफ्रेंड को पब्लिकली रोमांटिक तस्वीरें शेयर करना पसंद नहीं हैं.

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Imlie की मांग में सिंदूर देखकर मालिनी पूछेगी कई सवाल, तो आदित्य का होगा बुरा हाल

स्टार प्लस का सीरियल ‘इमली’ में इन दिनों कहानी का ट्रैक आदित्य, इमली और मालिनी के इर्द-गिर्द घुम रही है. शो के लेटेस्ट एपिसोड में धमाकेदार ट्विस्ट देखने को मिलने वाला है. जी हां, जैसा कि शो के पिछले एपिसोड में आपने देखा कि आदित्य मालिनी को इग्नोर कर रहा है. और वह इस समय सिर्फ और सिर्फ इमली के बारे में सोच रहा है. तो चलिए बताते है शो के अपकमिंग एपिसोड में क्या होने वाला है.

शो के लेटेस्ट एपिसोड में दिखाया गया कि पंडित भविष्यवाणी करता है कि आदित्य की दो शादियां होंगी. ये सुनकर मालिनी काफी परेशान हो जाती है. दरअसल मालिनी के मन में कई तरह के सवाल आते है कि आखिर आदित्य उससे बात क्यों नहीं करना चाहता है?  और उसकी मां आदित्य के खिलाफ मालिनी को खूब भड़काती है.

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और वह इमली की बेइज्जती करती है तो वहीं आदित्य इमली को मालिनी के घर पर नहीं रहने देता है और उसके साथ वहां से चल जाता है.

आदित्य और इमली, मालिनी के घर से निकल जाते हैं. आदित्य रास्ते में अपने दिल की बात  इमली को बताता है.  आदित्य कहता  है कि वह उससे बहुत प्यार करता है, इमली उस पर भरोसा कर सकती है.

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शो के अपकमिंग एपिसोड में ये दिखाया जाएगा कि आदित्य, इमली की मांग में सिंदूर भरेगा. जब मालिनी इमली की भरी हुई मांग देखेगी तो कई सवाल पूछेगी. अब ये देखना दिलचस्प होगा कि क्या आदित्य और इमली की रिश्ते का पर्दाफाश मालिनी के सामने होता है या नहीं.

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फसल बर्बाद करते आवारा जानवर

प्रेमचंद की कहानी ‘पूस की रात’ का मेन किरदार हलकू नीलगायों द्वारा खेत को चर कर बरबाद कर देने के चलते खेतीकिसानी का काम छोड़ कर मजदूर बन जाने का फैसला ले लेता है. यही हालात एक बार फिर किसानों के सामने आ चुके हैं. दलहनी व तिलहनी फसलों की कौन कहे, अब तो गेहूं और धान के खेतों की भी बाड़बंदी करानी पड़ रही है.

अगर किसी किसान को एक एकड़ खेत की बाड़बंदी करानी पड़ती है, तो इस पर कम से कम 40,000 रुपए से ले कर 50,000 रुपए की लागत आ रही है.

राजस्थान के अकेले टोंक जिले में  80 फीसदी से ज्यादा ऐसे खेतों की बाड़बंदी की गई है, जिन में कोई फसल बोई गई है. इस से आम किसानों पर आई इस नई महामुसीबत का आप अंदाजा लगा सकते हैं, जो पिछले 8-10 सालों से किसानों पर आई हुई है.

जंगल महकमे के एक सर्वे के मुताबिक, अकेले टोंक जिले में 5,000 से ज्यादा नीलगाय हैं. इन्होंने तकरीबन 450 गांवों में किसानों को परेशान कर रखा है. इन में से भी 100 गांव ऐसे हैं, जहां नीलगाय हर साल सब से ज्यादा नुकसान करती हैं.

हर साल नीलगायों से रबी व खरीफ सीजन में सालाना 15 करोड़ रुपए के नुकसान का अंदाजा है. ये 6,000 हैक्टेयर इलाके में फसल प्रभावित करती हैं. हालांकि सालाना नुकसान और प्रभावित क्षेत्र को ले कर विभाग की ओर से कभी पूरी तरह से सर्वे नहीं हुआ है. किसान फसल को बचाने के लिए खेतों की तार की बाड़ और परदे लगाने पर ही लाखों रुपए खर्च कर रहे हैं, इस के बावजूद राहत नहीं मिल रही है.

माहिर रामराय चौधरी बताते हैं कि एक नीलगाय की औसत उम्र 7 साल होती है. अपनी तेज रफ्तार और कई फुट लंबी छलांग लगाने वाली नीलगाय आसानी से काबू में नहीं आती है. वहीं गांव वालों ने बताया कि खेतों में तारबंदी में करंट छोड़ने के बाद भी यह पशु अपनी पूंछ को तार पर फेर कर खतरा भांपने में सक्षम हैं.

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गांव तामडि़या में कई किसानों ने गेहूं, सौंफ, जीरा, सरसों व दूसरी फसल वाले खेतों में नीलगाय से बचाव के लिए चारों ओर सफेद रंग की पट्टी लगा रखी है. इस के बावजूद फसल का बचाव नहीं हो पाता है. किसानों को रातभर जागना पड़ता है.

किसान रामप्रसाद ने 2 बीघा खेत के चारों ओर तारबंदी कराई है. 6 फुट ऊंचाई तक की जालियां लगाई गई हैं. इस के बावजूद नीलगाय खेतों में घुस ही जाती हैं. तार लगे होने के बाद भी रामप्रसाद को रात में भी रखवाली करनी पड़ती है.

गौरतलब है कि कुछ साल पहले नीलगाय से फसल खराब होती थी तो कीमत लगा कर मुआवजा देने का नियम था. पर कुछ सालों में कोई रकम नहीं मिली है.

मंदसौर के रेवासदेवड़ा, सीतामऊ के ऐरा, मल्हारगढ़ के बूड़ा, टकराव, चिल्लौद पिपलिया, खड़पाल्या, गरोठ के बर्डियापूना, बर्डियाराठौर, बुगलिया, भालोट, साबाखेड़ा समेत कई गांवों के लोग नीलगाय से बहुत ज्यादा परेशान हैं.

गौभक्ति की देन

यह समस्या काफी हद तक वर्तमान शासकों की गौभक्ति की देन है, जिस के चलते गोवंश की खरीदफरोख्त पर सरकारी आदेश द्वारा रोक लगा दी गई है. पहले किसान परिवारों को अनुपयोगी हो गए गौवंश की बिक्री से कुछ आमदनी हो जाती थी, पर यह न हो पाने के चलते उसे अब अपने ही पशुओं के लिए चारापानी का इंतजाम करना भारी पड़ रहा है.

इस की एक वजह यह भी है कि गेहूं व धान की कटाई कंबाइन मशीनों से होने के चलते गेहूं व धान के फसल अवशेषों का ज्यादातर भाग बरबाद हो जाता है और जो बचता भी है, उसे किसान या तो जला देते हैं या फिर उसे रोटावेटर चलवा कर मिट्टी में मिलवा देते हैं. इस से जहां गेहूं व धान की फसल से खाद्यान्न का उत्पादन बढ़ा है, वहीं दूसरी ओर पशुओं के चारे की समस्या ने विकराल रूप ले लिया है.

खेती के पूरी तरह से यंत्र आधारित हो जाने के चलते भी गौवंश अनुपयोगी हो गए हैं. पहले खेती की जुताई, बोआई, सिंचाई से ले कर मड़ाई व खाद्यान्न के परिवहन तक में बैलों का इस्तेमाल होता था. किसान परिवारों में गाय द्वारा बछड़े को जन्म दिए जाने को फायदेमंद माना जाता था, पर अब मामला पूरी तरह से उलट चुका है.

किसान परिवारों की गाय अगर बछिया को जन्म देती है, तब तो किसान दूध के लालच में उस का पालनपोषण करता है. अगर गाय बछड़े को जन्म देती है, तो जब तक गाय दूध देती है तब तक तो किसान उसे घर में रखते हैं, पर जैसे ही गाय दूध देना बंद करती है, तो वे बछड़ों को खुला छोड़ देते हैं.

ऐसे ही बछड़े आगे चल कर आवारा पशुओं के ?ांड में शामिल हो कर किसानों की खेती को चरते हैं और फसल को तहसनहस कर रहे होते हैं.

किसान रामदेव गूजर बताते हैं, ‘‘मैं एक किसान हूं और खेती करता हूं. तकरीबन 15-20 साल पहले तक खेती मु?ो और मेरे परिवार को खिलाती थी, मगर आज खेती मु?ो और मेरे परिवार को खा रही है. मैं और मेरा परिवार खेती और पशुपालन के चलते कर्ज और फिर कर्ज के तले दबता जा रहा है, क्योंकि सरकार की नीतियां अब किसानों के खिलाफ बनती जा रही हैं.’’

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नीलगाय की प्रजाति

यह शोध का विषय है कि जिन नीलगायों की बातें हम अपनी पुरानी पीढ़ी से सुनते आए हैं और जिन के बारे में कथाकार प्रेमचंद की कहानियों में पढ़ा है, वे नीलगाय (वनरोज) इतनी बड़ी संख्या में कहां से आ गई हैं? इन की आबादी इस कदर बढ़ गई है कि इन से खेती की हिफाजत कर पाना बेहद मुश्किल काम बन चुका है. बिना सरकारी इजाजत के इन्हें मारना भी जुर्म है. इस के लिए 4 पन्ने का एक लंबा शासनादेश जारी है.

यह जानवर वनरोज हिरन या बकरी की प्रजाति का है, जो आजकल खेती को खूब बरबाद कर रहा है. गांवदेहात की भाषा में इसे नीलगाय या जंगली गाय कहा जाता है.

पिछले तकरीबन 20 सालों से इन की तादाद बहुत ज्यादा बढ़ गई है. इन से खेती को बचाना मुश्किल हो गया है. दरअसल, यह जानवर ?ांड में रहता है और रात में अचानक धावा बोल कर फसलों को चरने के साथ ही उसे बरबाद कर देता है. दलहनी फसलों जैसे अरहर, उड़द, मूंग, व मटर वगैरह.

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सरकारी भाषा में इसे वनरोज कहा जाता है और इसे मारने के लिए एसडीएम से इजाजत लेने पड़ती है. मारने के बाद ग्राम प्रधान व कम से कम

5 लोगों के सामने इसे जमीन में गड्ढा खोद कर दफनाए जाने की व्यवस्था शासनादेश में दी गई है.

उड़ान: क्या था जाहिदा का फैसला

आज फिर जाहिदा को देखने आया लड़का शकील मुंह बना कर बाहर निकल गया. उस के साथ आए उस के मांबाप ने घर लौट कर लड़की पसंद नहीं आने का जवाब भिजवा दिया.

पिछले तकरीबन 5-6 सालों से यही सिलसिला चल रहा था. इस बीच 17 लड़के वालों ने जाहिदा पर ‘नापसंद’ की मुहर लगा दी थी.

लेकिन आज तो जाहिदा का सब्र जवाब दे गया. लड़के वालों के घर से बाहर निकलते ही वह भाग कर अपने कमरे में बिस्तर पर पड़ी कई घंटों तक रोती रही.

जाहिदा की बेवा मां शरीफन उस के लिए काबिल दूल्हा ढूंढ़ढूंढ़ कर थक गई थीं. जो भी लड़का आता जाहिदा का सांवला रंग देख कर उलटे पैर लौट जाता. नौबत यहां तक आ गई थी कि 10वीं जमात फेल और आटोरिकशा चलाने वाले लड़कों तक ने उस से शादी करने से इनकार कर दिया था.

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साइकिल रिपेयर करने की दुकान से परिवार पालने वाले जाहिदा के अब्बा नासिर खां की मौत के बाद बेवा हुई शरीफन ने बामुश्किल अपनी 3 बेटियों को पालपोस कर बड़ा किया था. उन्होंने सिलाईकढ़ाई कर के जैसेतैसे 2 बेटियों अंजुम और जरीना की शादी भी की लेकिन सब से बड़ी बेटी जाहिदा का रिश्ता तय करने में उन्हें बहुत मुश्किलें आ रही थीं. उस का सांवला रंग हमेशा रिश्ता होने में आड़े आ जाता था.

हर बार नापसंद किए जाने के बाद जाहिदा को गहरा सदमा लगता और वह घंटों तक रोती रहती.

जाहिदा बचपन से ही पढ़नेलिखने में काफी होशियार थी. उस ने 10वीं जमात से ले कर बीएससी तक का इम्तिहान फर्स्ट डिविजन में पास किया था. उस की अम्मी शरीफन मामूली पढ़ीलिखी घरेलू औरत थीं. लेकिन वक्त की ठोकरों ने उन्हें मजबूत बना दिया था. गुजरे सालों में जाहिदा के रिश्ते में आ रही दिक्कतों की वजह से वे हमेशा फिक्र में डूबी रहती थीं.

कमरे से बेटी जाहिदा की सिसकियों की आ रही आवाज सुन कर शरीफन उस की फूटी किस्मत को कोस रही थीं.

तभी थोड़ी देर बाद अचानक कमरे से जाहिरा की आवाज सुनाई दी, ‘‘अम्मी, इधर आओ. मुझे आप से कुछ बात करनी है.’’

कमरे में झाड़ू लगाती अम्मी ने पूछा, ‘‘अरी बेटी, क्या बात है? थोड़ा रुक, मैं झाड़ू लगा कर आती हूं तेरे पास.’’

बहुत देर तक अम्मी को आते नहीं देख जाहिदा कमरे से धीरेधीरे चल कर उन के सामने आ कर खड़ी हो गई. बड़ी देर तक रोते रहने से उस की आंखें सूजी हुई थीं.

जाहिदा कहने लगी, ‘‘अम्मी, मैं ने फैसला कर लिया है कि मैं तब तक शादी नहीं करूंगी जब तक मैं कोई बड़ा मुकाम हासिल न कर लूं.

‘‘मैं समाज को कुछ बन कर दिखाना चाहती हूं ताकि दकियानूसी सोच में जकड़ी इस कौम को पता चले कि तन की खूबसूरती के सामने काबिलीयत और मन की खूबसूरती में क्या फर्क है…’’

जाहिदा बोले जा रही थी, ‘‘अम्मी, लोग किसी इनसान के सांवले रंग पर उस को बेइज्जत क्यों करते हैं? क्या गोरा रंग होने से ही लड़की में सभी खूबियां आ जाती हैं?’’

फिर आखिर में जाहिरा ने अपना फैसला सुनाते हुए कहा, ‘‘सुनो अम्मी, अब आप मेरे लिए रिश्ते देखना बंद कर दें. अब मेरी जिंदगी का एक ही मकसद है कि मुझे सरकारी अफसर बन कर दिखाना है. इस की तैयारी के लिए मुझे दिल्ली पढ़ाई करने जाना पड़ेगा.’’

अपने सामने खड़ी बेटी के इस फैसले से परेशान शरीफन ने कहा, ‘‘लेकिन बेटी, तू सोच तो सही कि आखिर मैं इतनी महंगी पढ़ाई के लिए इतने सारे पैसे कहां से लाऊंगी?’’

10-15 दिन तो पैसों के जुगाड़ की उधेड़बुन में गुजर गए लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला. एक दिन अचानक जयपुर सचिवालय में सैक्शन अफसर के पद पर काम कर रहे शरीफन के छोटे भाई शहजाद अली मिलने आए.

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शरीफन ने भाई को जाहिदा के फैसले के बारे में बताते हुए उन से मदद करने की गुजारिश की.

भानजी के बुलंद इरादों और लगन की बातें सुन कर शहजाद ने बहन से फौरन कहा, ‘‘आप बिलकुल बेफिक्र हो जाओ. जाहिदा बेटी की पढ़ाई की जिम्मेदारी अब उस के मामा की है. मैं सब संभाल लूंगा. देखना हमारा बेटी हमारे खानदान का नाम रोशन करेगी.’’

इस बीच 5 साल गुजर गए. एक दिन दोपहर बाद शरीफन के घर के सामने लालबत्ती लगी 2 कारों के साथ पुलिस और कई सरकारी जीपें आ कर रुकीं. पहली कार से एक गोराचिट्टा नौजवान उतर कर आगे आया और उस ने झुक कर शरीफन के पैर छू कर नमस्कार किया. तभी पिछली कार से उतर कर जाहिदा ने शरीफन को गले लगा लिया.

जाहिदा बोली, ‘‘अम्मी देखो, आप की बेटी एसडीएम बन गई है. मैं ने अपना मुकाम हासिल कर लिया है. लेकिन अभी मेरी उड़ान बाकी हैं.

‘‘अम्मी, ये हैं आप के दामाद सुरेश. ये यहां के जिला समाज कल्याण अधिकारी हैं,’’ जाहिदा ने पास खड़े अपने पति सुरेश का परिचय कराते हुए कहा.

थोड़ी देर रुक कर जाहिदा ने कहा, ‘‘अम्मी, अभी हमें पास के गांव में दौरे पर जाना है. इजाजत दें. बाद में वक्त निकाल कर मिलने आएंगे.’’

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शरीफन दूर जाती गाडि़यों के काफिले को बड़ी देर तक खड़ी देखती रहीं. अपनी बेटी की कामयाबी देख उन की आंखों से खुशी के आंसू छलक पड़े.

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भोजपुरी सिनेमा के मशहूर एक्टर खेसारी लाल यादव (Khesari Lal Yadav) और काजल राघवनी (Kajal Raghwani) की नयी फिल्म ‘लिट्टी चोखा’ का ट्रेलर यूट्यूब पर लांच कर दिया गया है. इस फिल्म के ट्रेलर को दर्शकों को काफी अच्छा रिस्पांस मिल रहा है.

बता दें कि यूट्यूब पर इस ट्रेलर को अब तक 3,258,866 व्यूज मिल चुके हैं. फैंस को इस फिल्म का बेसब्री से इंतजार था.

‘बाबा मोशन पिक्चर प्रा.लि.’ के बैनर तले फिल्म ‘लिट्टी चोखा‘ में मुख्य भूमिका में खेसारीलाल यादव, काजल राघवानी, मनोज सिंह टाइगर, पदम सिंह, प्रगति भट्ट, प्रीति सिंह, श्रुति राव, उत्कर्ष, यादवेन्द्र यादव, देव सिंह, करण पांडे, प्रकाश जैश हैं. फिल्म की सह निर्माता अनीता शर्मा और पदम सिंह हैं. फिल्म के संगीतकार ओम झा हैं.

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इस फिल्म का निर्देशन पराग पाटिल ने किया है जबकि इसका निर्माण प्रदीप के शर्मा द्वारा किया गया है. इस ट्रेलर में खेसारी और काजल की रोमांटिक केमिस्ट्री काफी अच्छी लग रही है.

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Taarak Mehta Ka Ooltah Chashmah की ‘बबीता जी’ ने बयां की दर्दभरी दास्तान, कहा ‘कोचिंग टीचर ने मेरे साथ की गंदी हरकत’

टीवी का मशहूर कॉमेडी सीरियल ‘तारक मेहता का उल्टा चश्मा’ की बबीता जी यानी मुनमुन दत्ता इन दिनों सुर्खियों में छायी हैं. और वह सोशल मीडिया पर काफी एक्टिव रहती हैं. आए दिन वह अपने लाइफ से जुड़े पलों को फैंस के साथ शेयर करती हैं.

तो अब मुनमुन दत्ता ने खुद के साथ हुई घटना के बारे में खुलकर बताया है जिससे सुनकर आप हैरान हो जाएंगे. रिपोर्ट्स के अनुसार मुनमुन दत्ता ने बताया कि यौन शोषण के बारे में लिखते समय मेरी आंखों में आंसू आ जाते है. जब मैं एक छोटी बच्ची थी, मैं अपने पड़ोस के एक अंकल से बहुत डरती थी. मुझे उनकी आंखों से बहुत डर लगता था. वो अंकल हमेशा मौके की तलाश में रहते थे.

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खबरों के अनुसार मुनमुन दत्ता ने ये भी कहा कि  ये बात मैं किसी से नहीं कह पाई. मेरे कजिन्स की निगाहें मुझ पर रहती थीं. जबकि वो खुद लड़कियों के पिता थे.

उन्होंने ये भी बताया कि एक आदमी ने मुझे उस समय देखा था जब मैं पैदा हुई थी और उसी आदमी ने 13 साल की उम्र में मुझे गलत तरीके से छूने की कोशिश की थी. मेरे कोचिंग टीचर ने मेरी पैंट में हाथ डाल दिया था और मैंने उस टीचर को राखी बांधी थी.

 

खबर ये भी आ रही है कि मुनमुन दत्ता ने कहा है कि मेरे साथ इस तरह की अनेक घटनाएं हुई हैं क्योंकि उस समय मैं बहुत छोटी थी. पता नहीं माता पिता ये बात क्यों नहीं समझ पाते हैं कि उनके बच्चों के साथ क्या हो रहा है. उन्होंने आगे कहा कि आज मैं गर्व के साथ ये कह सकती हूं कि मैं एक महिला हूं.

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