छोटी छोटी खुशियां- भाग 2: शादी के बाद प्रताप की स्थिति क्यों बदल गई?

Writer- वीरेंद्र सिंह

आनंद मामा ने बिरादरी के न जाने कितने लड़केलड़कियों की शादियां कराई थीं. इसलिए किसी भी लड़की के लिए लड़के वालों को कैसे पटाया जाता है, यह उन्हें अच्छी तरह आता था. ‘लड़की में कोई कमी नहीं है,’ मामा ने बताया था, ‘बस, स्वभाव से थोड़ा गरम है और बोलती भी कुछ ज्यादा है. अपना प्रताप तो सीधासादा और चुप्पा है. इसलिए उस के साथ आराम से निभ जाएगी. जिंदगी गुजारने के लिए एक का थोड़ा गरम होना जरूरी है. दोनों ही एक तरह के हो जाएंगे तो सबकुछ बंटाधार हो जाएगा. जिस का मन होगा, वही बेवकूफ बना देगा.’

प्रताप के मांबाप ने हां में सिर हिलाया तो आनंद ने आगे कहा, ‘देखो न, अरविंद दिल्ली में कब से रह रहा है.’ प्रताप के बड़े भाई का उल्लेख करते हुए वे असली मुद्दे पर आ गए, ‘हाड़तोड़ मेहनत कर के 15 साल में भी वह इस तरह का एक घर नहीं बना सका, जिस में दोनों भाई साथसाथ रह लेते. यह तो 4 भाइयों की अकेली बहन है. उस से शादी होते ही प्रताप की स्थिति बदल जाएगी.

फिर सचमुच ही शादी के बाद उस की स्थिति बदल गई थी. ससुर ने सुधा को जो फ्लैट दिया था, सुधा प्रताप को उस में पालतू पिल्ले की तरह ले आई थी. ससुराल से मिले फ्लैट में पूरी तरह से व्यवस्थित हो जाने के बाद प्रताप ने मांबाप को गांव से बुला लिया था. उन के आने के 2 दिन बाद ही सुधा ने घर का माहौल भारी बना दिया था. बातबात में वह प्रताप के मांबाप का अपमान करते हुए अपना वर्चस्व कायम करने का प्रयास कर रही थी.

अगले दिन ही शाम को उस के मांबाप के सामने सुधा ने प्रताप को आड़े हाथों ले लिया था. बात कोई खास नहीं थी फिर भी वह प्रताप का अपमान करते हुए धमका रही थी. यह देख कर प्रताप की मां का खून खौल उठा था. उन्होंने सुधा को सलाह दी कि पति के साथ ऐसा व्यवहार शोभा नहीं देता.

सुधा तो जैसे इसी बात का इंतजार कर रही थी. प्रताप को छोड़ कर वह सास पर बरस पड़ी. सात पीढ़ी तक को तारतार कर दिया था. जब तक यह महाभारत चलता रहा, प्रताप की मां की आंखों से आंसू बहते रहे. पिताजी स्थितिप्रज्ञ बने माला फेरने का दिखावा करते रहे. प्रताप की धड़कन बढ़ गई थी. पूरा शरीर पसीनेपसीने हो गया था. मन कर रहा था कि वह सुधा की चोटी पकड़ कर उसे जमीन पर पटक दे. परंतु वह ऐसा नहीं कर सका क्योंकि ऐसा उस के स्वभाव में नहीं था. दोनों हाथों से सिर थामे वह चुपचाप बैठा रहा.

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पिताजी थोड़ी देर बाद उठे और पत्नी की ओर देख कर बोले, ‘प्रताप, एक गिलास पानी ला.’

उन की आवाज में नाराजगी और लाचारी का मिश्रण था. उन की उपस्थिति में बेटे की तकलीफें और बढ़ेंगी, यह समझने की सूझबूझ उन में थी. यहां रह कर बेटे की लाचारी देख कर दुखी होने के बजाय गांव में परेशानी सह कर रह लेना उन्हें उचित लगा. पैसे वाली बहू लाने के लालच में उन्होंने बेटे का जीवन दुखभरा बना दिया था. यह पीड़ा उन के चेहरे पर साफ झलक रही थी.

प्रताप एक गिलास में पानी ले आया. सुधा मुंह खोले तीनों को ताक रही थी. प्रताप के पिता ने दाहिने हाथ की अंजुरी में पानी ले कर प्रताप की ओर ताकते हुए कहा, ‘मैं देवशंकर हाथ में जल ले कर संकल्प लेता हूं कि जब तक मेरी सांस चलेगी, इस घर में कभी कदम नहीं रखूंगा. और हां, तेरे लिए मेरे घर के दरवाजे हमेशा खुले रहेंगे. जब तेरा मन यहां से ऊब जाए, आ जाना.’

रिकशे में बैठी मां भीगी आंखों से प्रताप को ताक रही थीं. प्रताप की इस कमजोरी को वह पहले से ही जानती थीं. घर के बाहर कोई लड़का उसे मार देता था तो घर में वह इस की शिकायत नहीं करता था. इस तरह की बहू के साथ प्रताप का जीवन कैसे बीतेगा? यह सोचसोच कर वे परेशान थीं. यही पीड़ा उन की आंखों से बह रही थी. रिकशा चला गया तो प्रताप घर आया और उस रात बिना कुछ खाए ही सो गया.

सुधा सुंदर थी, साथ ही पैसे वाले बाप की बेटी भी. इसी सुंदरता और बाप के पैसे के अभिमान ने उसे घमंडी बना दिया था. उस की जीभ में जो भयानक धार और कड़वाहट थी, उसे देख कर पहली नजर में कोई नहीं भांप सकता था. अड़ोसपड़ोस में रहने वालों से वह शालीनता से हंसहंस कर बातें करती थी. मगर प्रताप, उस के परिजनों व रिश्तदारों से वह ऐसा व्यवहार करती थी जैसे वे सभी उस के पुराने दुश्मन हों. उस का व्यवहार दिनोंदिन कू्रर होता जा रहा था.

शादी के सालभर बाद ही प्रताप सुधा के व्यवहार से पूरी तरह परिचित हो गया था. इसी दौरान सुधा ने प्रताप के लगभग सभी संबंधियों से उस के संबंध खत्म करा दिए थे. भैयाभाभी, मामामामी, चाचाचाची, मौसामौसी, सभी इसी शहर में रहते थे, फिर भी प्रताप से अब उन का कोई संबंध नहीं रह गया था. एक बार जो भी प्रताप के घर आया, सुधा ने उस के साथ ऐसा व्यवहार किया कि दोबारा उस की आने की हिम्मत नहीं हुई.

कालेज की पढ़ाई प्रताप ने होस्टल में रह कर की थी. सुबह ब्रश करते समय उस ने एक दृश्य कई बार देखा था. नाली से निकलने वाले काकरोच के लिए गौरैया घात लगाए बैठी रहती थी. काकरोच का शिकार करने की उस की गजब की युक्ति थी. काकरोच दौड़ता तो गौरैया उछल कर उस के एक पैर पर चोंच मारती. एक पैर टूट जाने पर जान बचाने के लिए काकरोच घिसटते हुए आगे बढ़ता तो गौरैया दूसरे पैर पर चोंच मारती. फिर तीसरे, चौथे, इस तरह एक के बाद एक पैर टूटने के बाद काकरोच दौड़ नहीं सकता था. उस के बाद गौरैया आराम से उसे चोंच मारमार कर चीथती थी.

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उसी तरह सुधा ने भी चालाकी से प्रताप को लगभग सभी संबंधियों से अलग कर के उस की सभी टांगें तोड़ दी थीं. भूलचूक से प्रताप का कोई सहकर्मी कभी उस के घर आ जाता तो सुधा के व्यवहार में एकदम से परिवर्तन आ जाता. जब तक वह घर में रहता, सुधा उस की बुराई करती रहती. सुधा के इस व्यवहार से परेशान प्रताप का मन होता कि वह किसी दिन उसे पीट दे. परंतु हृदय की तीव्र इच्छा के बावजूद हाथ लाचार थे क्योंकि बचपन से ही प्रताप का व्यक्तित्व कुछ इस तरह का रहा था कि कभी वह अपनी उग्रता व्यक्त नहीं कर पाया. सहीगलत सहने की उस को आदत सी पड़ गई थी, जो छूट नहीं रही थी. स्कूलकालेज के झगड़ों में भी वह कभी जनून के साथ आगे नहीं आया था.

Satyakatha- सुहागन की साजिश: सिंदूर की आड़ में इश्क की उड़ान- भाग 2

सौजन्य: सत्यकथा

आखिर पति की खुशी को रीता ने भी स्वीकार कर लिया. वह पति की सीमित आमदनी में ही खुश रहने लगी. लेकिन यह खुशी शायद ज्यादा दिनों तक कायम न रह सकी. रीता पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा.

हुआ यह कि एक दिन किसी काम से हरगोविंद अकबरपुर कस्बा गया. शाम को लौटते समय बाराजोड़ के पास उस का एक्सीडेंट हो गया.

गंभीर चोट लगने से उस की मौके पर ही मौत हो गई. उस की मौत की खबर घर पहुंची तो घर में कोहराम मच गया. रीता बिलखबिलख कर रोने लगी. घर वालों ने उसे किसी तरह संभाला. यह बात वर्ष 2012 की है.

समय बीतते जब दुख के बादल छंटने लगे तो रीता को अपने भविष्य की चिंता सताने लगी. वह सोचने लगी कि आखिर वह पहाड़ सी जिंदगी पुरुष के सहारे के बिना कैसे गुजारेगी. मायके में रह कर वह विधवा का जीवन नहीं बिताना चाहती थी. रीता की चिंता से घर वाले भी परेशान थे. लेकिन उन्हें कोई उपाय नहीं सूझ रहा था.

रीता के देवर का नाम शिवगोविंद था. रीता और शिवगोविंद की उम्र में लगभग 10 साल का अंतर था. रीता जब से ब्याह कर ससुराल आई थी, शिवगोविंद से उस की खूब पटरी खाती थी.

पति की मौत का जहां रीता को गम था, वहीं शिवगोविंद भी बड़े भाई की मौत पर दुखी था. अब शिवगोविंद ही रीता की देखभाल करता था और उस के गमों को बांटता था.

रीता को भी मिल गया सहारा

30 वर्षीय रीता विधवा जरूर हो गई थी, लेकिन खूबसूरत व जवान थी. शिवगोविंद भी 20 वर्षीय गबरू जवान था. धीरेधीरे दोनों के बीच नजदीकियां बढ़ने लगीं और दिलों में चाहत जाग उठी.

शिवगोविंद ने अपनी चाहत को एक दिन उजागर भी कर दिया, ‘‘रीता भाभी, मैं तुम से प्यार करता हूं और तुम्हें अपना जीवनसाथी बनाना चाहता हूं.’’

‘‘सोच लो देवरजी. मैं विधवा हूं और विधवा से ब्याह रचाना तो दूर, उस से हंसनाबोलना भी यह समाज गुनाह मानता है.’’ रीता ने शंका प्रकट की.

‘‘भाभी, मुझे समाज की नहीं, तुम्हारी चिंता है. मैं तुम्हारी मांग में सिंदूर भर कर विधवा होने का कलंक मिटाना चाहता हूं.’’ शिवगोविंद ने अपनी मंशा जाहिर की.

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‘‘तुम्हें मेरी चिंता है तो मैं साथ देने को तैयार हूं.‘‘ रीता ने रजामंदी दे दी.

रीता राजी हो गई तो इस बाबत शिवगोविंद ने अपने मंझले भाई बालगोविंद तथा भाभी ममता से बातचीत की. पहले तो दोनों चौंके, फिर आमनेसामने बिठा कर रीता तथा शिवगोविंद से बात की.

उस के बाद उन्होंने उन दोनों को शादी करने की इजाजत दे दी. गांव में भी चर्चा आम हो गई कि शिव अपनी विधवा भाभी से ब्याह रचा रहा है.

घर वालों की रजामंदी हुई तो एक दिन शिवगोविंद व रीता मंदिर पहुंचे, वहां शिवगोविंद ने रीता की मांग में सिंदूर भर कर उसे विधवा से सुहागिन बना दिया. इस के बाद रीता, शिवगोविंद की पत्नी बन कर उस के साथ रहने लगी.

शिवगोविंद का प्यार मिला तो रीता पहले पति की यादें भुला बैठी. हंसीखुशी से 4 साल बीत गए. इस बीच रीता एक बेटी राधा की मां बन गई. राधा के जन्म से घर की खुशियां और बढ़ गईं.

लगभग 5 साल तक रीता और शिवगोविंद का जीवन आनंदपूर्वक बीता. उस के बाद उन के बीच विवाद शुरू हो गया. विवाद की कोई बड़ी वजह नहीं थी.

शिवगोविंद रनिया स्थित एक फैक्ट्री में काम करता था. फैक्ट्री में उसे कभी काम मिलता तो कभी नहीं मिलता. रीता खर्चीली थी. कंजूसी उस का मिजाज न था. जरूरत और शौक के आगे उस के लिए पैसे का महत्त्व न था. यही कारण था कि वह शिवगोविंद से पैसे की मांग करती रहती.

पत्नी की मांग सुन कर शिवगोविंद झुंझला उठता, ‘‘रीता मेरा वेतन ज्यादा नहीं है, इसलिए तुम अपने खर्चों पर कंट्रोल करो. मुझे किसी के आगे हाथ फैलाने को मजबूर मत करो.’’

‘‘जितना कर सकती थी कर लिया, अब और कंट्रोल नहीं,’’ रीता भी झुंझला कर जवाब देती, ‘‘पत्नी के खर्चे पति नहीं पूरे करेगा तो क्या पड़ोसी करेंगे?’’

‘‘रीता, मेरी कमाई उतनी नहीं है कि मैं तुम्हारे महंगे शौक पूरे कर सकूं.’’

‘‘पहले आमदनी बढ़ाते, फिर मेरी मांग में सिंदूर भरते,’’ रीता का जवाब पैना तथा द्विअर्थी होता, ‘‘हर रात तुम्हें मुझ से तो अपनी खुशी चाहिए, मेरे खर्च उठाने की तुम्हें परवाह नहीं. तुम्हारा शौक मैं पूरा करती हूं तो तुम्हें भी मेरे शौक पूरे करने होंगे.’’

‘‘तुम्हें खर्च में कटौती भी करनी पड़ेगी और हालात से समझौता भी करना होगा.’’

‘‘हरगिज नहीं करूंगी,’’ रीता ने झुंझला कर जवाब दिया.

बस इसी मुद्दे पर विवाद बढ़ता गया. शिवगोविंद महसूस करने लगा कि उस ने रीता की मांग सिंदूर से सजा कर जबरदस्त गलती की है, तो रीता महसूस करने लगी कि शिव से प्रेम विवाह कर के उस ने स्वयं अपना मुकद्दर फोड़ लिया है.

दिलों की बढ़ गईं दूरियां

दिल में गांठ पड़ जाए तो वह कम नहीं होती, निरंतर बढ़ती जाती है. रीता व शिव भी एकदूसरे को अपने जीवन की गलती मान कर धीरेधीरे एकदूजे से दूरियां बढ़ाने लगे.

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शिवगोविंद सुबह काम पर चला जाता, देर रात को घर आता. काम से इतना थका होता कि अकसर खाना खाते ही सो जाता. रीता की हसरतें प्यासी ही रह जातीं.

रीता अकेलापन महसूस करने लगी तो उस का मन बहकने लगा. मन बहका तो वह पति से विश्वासघात करने पर उतारू हो गई.

वह भूल गई कि जिस इंसान ने उसे विधवा से सुहागन बनाया, मांग में सिंदूर भर कर समाज में सम्मान दिलाया, उसी के साथ वह विश्वासघात करने का मंसूबा पाल रही है. मांग का सिंदूर भी उसे बेमानी लगने लगा.

रीता ने इधरउधर नजर दौड़ाई तो उस की नजर दीपक उर्फ लल्ला पर टिक गई. दीपक उस के पति शिवगोविंद का दोस्त था और पड़ोस में ही रहता था.

उस का आनाजाना घर में लगा रहता था. खासकर उस रोज जब शिवगोविंद घर पर रहता था. दोनों में खूब गपशप होती तथा खानेपीने का दौर चलता था.

रीता के मन में पाप समाया तो उस ने दीपक को खुली छूट दे दी. उन दोनों के बीच हंसीठिठोली भी होने लगी. रीता जहां गबरू जवान दीपक पर फिदा हो गई थी, वहीं दीपक उर्फ लल्ला भी मतवाली भाभी रीता का दीवाना बन गया था.

सहयोगी : जय कुमार मिश्र

अगले भाग में पढ़ें- पति बना इश्क में रोड़ा

सजा किसे मिली- भाग 4: आखिर अल्पना अपने माता-पिता से क्यों नफरत करती थी?

लेखिका- सुधा आदेश

पूरी सावधानी बरतने के बाबजूद एक दिन अल्पना को लगा जैसे उस के शरीर में कुछ ऐसा हो रहा है जो वह पहली बार महसूस कर रही है. वह राहुल को इस बारे में बताना चाहती ही थी कि उस ने कहा, ‘अल्पना, मांपिताजी विवाह के लिए जोर डाल रहे हैं, अब मुझे दूसरा घर ढूंढ़ना होगा.’

राहुल की बात सुन कर अल्पना चौंक गई और बोली, ‘तुम ऐसा कैसे कर सकते हो. और मुझे ऐसी हालत में छोड़ कर तुम कैसे जा सकते हो?’

‘कैसी हालत?’ राहुल बोला.

‘मैं तुम्हारे बच्चे की मां बनने वाली हूं.’

‘यह तुम्हारी प्रोब्लम है, इस में मैं क्या कर सकता हूं?’

‘सहयोगी तो तुम भी रहे हो.’

‘वह तो तुम्हारी वजह से…तुम्हीं ने कहा था कि जब मुझे एतराज नहीं है तो तुम्हें क्यों है…अब तुम भुगतो?’

‘ऐसा तुम कैसे कह सकते हो…तुम तो मेरे मित्र, हमदर्द रहे हो.’

‘देखो अल्पना, पिताजी मेरा विवाह तय कर चुके हैं और उन्हें मना करना मेरे लिए संभव नहीं है. फिर मैं तुम्हारी जैसी लड़की के साथ संबंध कैसे बना सकता हूं जो विवाह जैसी संस्था में विश्वास ही न करती हो और विवाह से पहले ही अपना शरीर किसी को दे देने में उसे कुछ आपत्तिजनक नहीं लगता हो.’

‘परंपराओं की दुहाई मत दो, राहुल. तुम भी विवाह से पहले संबंध बना चुके हो. क्या तुम उस लड़की के साथ अन्याय नहीं करोगे जिस के साथ तुम विवाह कर रहे हो?’

‘मेरी बात और है, मैं पुरुष हूं… फिर तुम्हारे पास प्रमाण क्या है?’

प्रमाण की बात सुनते ही अल्पना गुस्से से थरथराती हुई राहुल को मारने के लिए झपटी. वह तेजी से हटा तो सामने रखी टेबल से अल्पना टकराई और जमीन पर गिर गई. असहनीय दर्द से पेट पकड़ कर वह वहीं बैठ गई.

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राहुल ने उसे उठाना चाहा तो उस ने चिल्ला कर कहा, ‘मुझे छूना मत…तुम ने मुझे धोखा दिया…तुम मेरी जिंदगी में न कभी थे, न हो और न ही रहोगे…चले जाओ मेरे घर से.’

राहुल अपना सामान समेट कर चला गया…पूरी रात वह रोती रही. पेट दर्द सहा नहीं गया तो उठ कर उस ने पेन किलर खा लिया. अल्पना को बारबार यही लगता रहा कि क्यों उसे किसी का प्यार और विश्वास नहीं मिलता. पहले मातापिता और अब राहुल…खैर सुबह तक पेटदर्द तो ठीक हो गया था पर मन अभी भी ठीक नहीं हुआ था.

क्या करे इस बच्चे का…माना कि यह बच्चा उस की जिंदगी में जबरदस्ती आ गया है पर है तो उस का अपना अंश ही न, वह अकेली कैसे इस बच्चे की परवरिश कर पाएगी…क्या अपने बच्चे को वह प्यारदुलार और अपनत्व दे पाएगी जिस के लिए वह अपने मातापिता को दोष देती रही थी.

मन में अजीब सी कशमकश चल रही थी. अपने कैरियर के लिए जहां वह बच्चे का बलिदान देना चाहती थी वहीं उस के प्रति स्नेह भी जागने लगा था. वह जानती थी कि बिना विवाह के मां बनना समाज सह नहीं पाएगा…उस के मातापिता सुनेंगे तो जीतेजी ही मर जाएंगे. आज न जाने क्यों मां के शब्द उस के कानों में गूंज रहे थे, जो उन्होंने उसे राहुल के साथ रहते देख कहे थे, ‘बेटा, माना कि मैं तुझे उतना प्यार, दुलार नहीं दे पाई जिस की तू आकांक्षी थी. मैं अपराधिनी हूं तेरी…पर मेरे किए की सजा तू खुद को तो न दे. आज भी हमारा समाज विवाहपूर्व संबंधों को मान्यता नहीं देता है, ऐसे संबंध अवैध ही कहलाएंगे.’

उस समय तो वह सिर्फ वही करना चाहती थी जिस से उस के मातापिता को चोट पहुंचे…राहुल, जिस पर उस ने विश्वास किया उस से ऐसी उम्मीद नहीं थी. बारबार राहुल के शब्द उस के दिलोदिमाग में गूंज कर उस के अस्तित्व को नकारने लगते कि मैं तुम्हारी जैसी लड़की के साथ संबंध कैसे बना सकता हूं जो विवाह जैसी संस्था में विश्वास ही न करती हो.

कभी मन करता कि आत्महत्या कर ले पर तभी मन उसे धिक्कारने लगता…उसे अपनी वार्डन के शब्द याद आते कि जीवन से भागना बेहद आसान है बेटा, लेकिन कुछ सार्थक करना बेहद ही कठिन, पर तुम ने तो आसान राह ढूंढ़ ली है.

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वह कोई निर्णय नहीं ले पा रही थी. आफिस में छुट्टी की अर्जी भिजवा दी थी. कशमकश इतनी ज्यादा थी कि उस का न बाहर निकलने का मन कर रहा था और न ही किसी से मिलने का. पेट में दर्द उठता पर वह डाक्टर को दिखाने के बजाय दर्दनाशक दवा खा कर दबाने की कोशिश करती रही.

एक दिन जब वह ऐसे ही दर्द से तड़प रही थी तभी बीना मिलने आ पहुंची, उस की ऐसी दशा देख कर वह अचंभित रह गई तथा उसे जबरन अपनी गाड़ी में बिठा कर डाक्टर के पास ले गई…

डाक्टर ने उसे चेकअप करवाने के लिए कहा.

सोनोग्राफी की रिपोर्ट देख कर डाक्टर उस पर बहुत गुस्सा हुई तथा बोली, ‘तुम ने पहले क्यों नहीं बताया कि तुम गर्भवती हो.’

उस को कोई उत्तर न देते देख वह फिर बोली, ‘तुम लड़कियों की यही तो समस्या है…जरा भी सावधानी नहीं बरततीं…क्या पेट में तुम्हें कोई चोट लगी थी…अपने पति को बुलवा लो, क्योंकि तुम्हारा शीघ्र आपरेशन करना पड़ेगा. लगता है किसी चोट के कारण तुम्हारा बच्चा मर गया है और उसी के इन्फेक्शन से पेट में दर्द हो रहा है.’

डाक्टर की बात सुन कर वह दोनों चौंक गईं. बीना ने बात बनाते हुए कहा, ‘डाक्टर, आपरेशन कब करना पडे़गा. दरअसल इन के पति कुछ दिनों के लिए बाहर गए हैं. उन का इतनी जल्दी आना संभव नहीं है.’

‘आपरेशन कल ही करना पड़ेगा. कोई तो रिश्तेदार होंगे…उन्हें जल्द बुलवा लो…हम इन्हें आज ही एडमिट कर लेते हैं.’

बीना ने अल्पना को देखा फिर डाक्टर की ओर मुखातिब होती हुई बोली, ‘डाक्टर, मैं ही इन की जिम्मेदारी लेती हूं क्योंकि इन का कोई भी रिश्तेदार इतनी जल्दी नहीं आ सकता.’

अल्पना के मना करने पर भी बीना ने उस के मातापिता को फोन कर दिया था. उन्होंने तुरंत आने की बात कही. उन के आने से पहले ही वह आपरेशन थिएटर में जा चुकी थी. बेहोशी की हालत में भी डाक्टर के शब्द उस के कानों में पड़ ही गए, ‘इस के यूट्रस में इन्फेक्शन इतना फैल गया है कि अगर निकाला नहीं तो जान जाने का खतरा है. बाहर जा कर इन के रिश्तेदारों से इजाजत ले लो.’

उस के बाद क्या हुआ पता नहीं. सुबह जब आंख खुली तो मम्मीपापा को अपने पास बैठा पाया. उन को देखते ही उस की नफरत फिर से भड़क उठी थी, अगर उसे उन का प्यार और अपनत्व मिलता तो उस के साथ ऐसे हादसे ही क्यों होते? अगर उस समय नर्स नहीं आती तो वह पता नहीं क्याक्या कह बैठती.

‘‘बेटा, कुछ खा ले वरना ताकत कैसे आएगी?’’ आवाज सुनते ही अल्पना अतीत से निकल कर वर्तमान में आ गई. नर्स पता नहीं कब चली गई थी. मां हाथ में फलों की प्लेट लिए खाने का इसरार कर रही थीं तथा उन के पास ही बैठे पापा आशा भरी नजरों से उसे देख रहे थे. उस ने बिना कुछ कहे ही मुंह फेर लिया क्योंकि वह जानती थी कि मां की आंखों से आंसू बह रहे होंगे पर वह अपने दिल के हाथों विवश थी.

बारबार एक ही विचार उस के मन में आ रहा था कि माना मातापिता उस की उचित परवरिश न कर पाने के लिए दोषी थे पर हर सुविधा मिलने के बावजूद उस ने भी कौन सा अच्छा काम किया. दूसरों को दोष देना तो बहुत आसान है पर जिंदगी बनानाबिगाड़ना तो इनसान के अपने हाथ में है.

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अल्पना समझ नहीं पा रही थी कि कुदरत ने औरत को इतना कमजोर क्यों बनाया है कि एक छोटा सा आंधी का झोंका उस के सारे वजूद को हिला कर रख देता है. सब से ज्यादा दुख तो उसे इस बात का था कि हादसे में उस के गर्भाशय को निकाल देना पड़ा…अपूर्ण औरत बन कर वह कैसे जीएगी?

मां ने तो अपने कैरियर के लिए उस की तरफ ध्यान नहीं दिया पर उस ने तो उन्हें दुख देने के लिए ही यह सब किया…उस का तो यही हश्र होना था. पर वह अभी भी नहीं समझ पा रही थी कि सजा किसे मिली? द्य

GHKKPM: सई-विराट की वजह से मिट गई अश्विनी-निनाद की दूरियां! क्या भवानी चलेगी नई चाल?

नील भट्ट, आयशा सिंह और ऐश्‍वर्या शर्मा स्‍टारर सीरियल गुम है किसी के प्‍यार में (Ghum Hai Kisikey Pyaar Meiin) की कहानी में  दिलचस्प मोड़ दिखाया जा रहा है. शो में आपने देखा कि सई और विराट ने मिलकर अपने आई-बाब की एनिवर्सिरी मनाने का फैसला किया है. सई-विराट चाहते हैं कि इनके बीच की दूरियां मिट जाए. शो के आने वाले एपिसोड में बड़ा ट्विस्ट आने वाला है. आइए बताते हैं शो के नए एपिसोड के बारे में.

शो में अब तक आपने देखा कि निनाद अपनी पत्‍नी अश्विनी की इज्‍जत नहीं करता है और ऐसे में भवानी, ओमी भी उसे सम्‍मान नहीं देते. इस बारे में जब सई को पता चलता है तो वह विराट के साथ मिलकर उनकी 35वीं एनिवर्सिरी मनाने का प्‍लान करती है. तो वहीं निनाद अपने बेटे विराट की खातिर तैयार हो जाता है.

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शो के आने वाले एपिसोड में आप देखेंगे कि सई और विराट के कारण निनाद-अश्विनी की दूरियां खत्‍म हो जाएंगी. आप ये भी देखेंगे कि निनाद को अहसास होगा कि उसने अश्विनी के साथ कितना गलत किया है.

 

शो में दिखाया जाएगा कि निनाद पूरे परिवार के सामने अपनी गलती मानेगा और अश्विनी को अपनी पत्‍नी के रूप में सम्‍मान देने का वादा करेगा.

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तो दूसरी तरफ भवानी और ओमी ये देखकर हैरान हो जाएंगे. निनाद ये भी कहेगा कि अब वह अश्विनी के साथ बुरा बर्ताव बर्दाश्‍त नहीं कर सकता है.  पाखी, सोनाली और ओमी को इस बात से मिर्ची लगेगी. और वे तीनों मिलकर भवानी को भड़काने की कोशिश करेंगे.

शो का नया प्रोमो सामने आया है, इसमें दिखाया जा रहा है कि भवानी कोई नई चाल चलने वाली है ताकि वह चौहान परिवार पर राज कर सके.

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Bigg Boss 15: प्रतीक सहजपाल और तेजस्वी प्रकाश के बीच छिड़ी जंग, नॉमिनेशन के लिए आया इस कंटेस्टेंट का नाम

टीवी का विवादित शो बिग बॉस 15 (Bigg Boss 15) दर्शकों का एंटरटेन करने में कामयाब हो रहा है. शो का लेटेस्ट एपिसोड काफी दिलचस्प रहा. शो में दिखाया गया कि रश्मि देसाई (Rashmi Desai), गौतम गुलाटी (Gautam Gulati), देवोलीना भट्टाचार्जी और काम्या पंजाबी कंटेस्टेंट्स को खूब खरी-खोटी सुना रहे थे.

दरअसल ये एक्स कंटेस्टेंट बिग बॉस 15 के कंटेस्टेंट को गेम का टिप्स बता रहे थे, जिससे वह इस शो में बेहतर गेम खेल सके. शो में दिखाया गया कि किचन के कामों की वजह से प्रतीक सहजपाल और तेजस्वी प्रकाश आपस में भिड़ गए. इस दौरान कई कंटेस्टेंट्स तेजस्वी प्रकाश का साथ देते हुए नजर आए.

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प्रतीक सहजपाल ने भी समझदारी दिखाई और खुद को संभाल लिया. इसी बीच बिग बॉस ने ऐलान किया कि वे जय भानुशाली, करण कुंद्रा, विशाल कोटियन और तेजस्वी प्रकाश को स्पेशल पावर दे रहे हैं. लेकिन बिग बॉस ने इन्हें वार्निंग भी दी.

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स्पेशल पावर मिलने के बाद ये 4 कंटेस्टेंट्स आपसी सहमति से घर के किसी एक सदस्य को डायरेक्ट नॉमिनेट कर सकते हैं. वार्निंग मिलने के बाद करण कुंद्रा,  तेजस्वी प्रकाश, विशाल कोटियन और जय भानुशाली ने नॉमिनेशन के लिए मायशा अय्यर को चुना.

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Diwali 2021: चांद सा रोशन चेहरा

दीवाली पर सजनेसंवरने की उमंग आप में भी जगने लगती होगी. तो फिर देर किस बात की. दीवाली की जगमगाहट में आप के चेहरे का नूर कर देगा सब को हैरान. कैसे, बता रही हैं आभा यादव.

महिलाएं हमेशा से ही सजधज कर खूबसूरत दिखना चाहती हैं पर त्योहारों का मौसम आते ही उन में सजनेसंवरने की उमंगें ज्यादा ही उठने लगती हैं और जब दीवाली का त्योहार हो तो बात ही क्या, प्रकाशोत्सव उन्हें कुछ नया करने को प्रेरित करता है ताकि वे उस दिन लगें निखरीनिखरी और बहुत खूबसूरत.

ब्यूटी ट्रीटमैंट : रोशनी के त्योहार का रोशन चेहरे के साथ स्वागत करें. मेकअप ऐक्सपर्ट रेनू महेश्वरी का कहना है कि दीवाली पर खूबसूरत दिखने के लिए त्योहार से 1 महीना पहले ब्यूटी ट्रीटमैंट लेना चाहिए. फिर 15 दिन के बाद दोबारा ट्रीटमैंट लें. सब से पहले चेहरे की क्लीनिंग के लिए औक्सी फेसवाश का प्रयोग करें. यह फेसवाश चेहरे की सफाई के साथसाथ चेहरे पर नमी भी प्रदान करता है. इस मौसम में स्किन शुष्क होने लगती है. इसलिए मौश्चराइजिंग वाले प्रोडक्ट प्रयोग करने चाहिए. इस के अलावा अपनी त्वचा के स्वभाव को जानें कि वह किस प्रकार की है, उसी के अनुसार प्रोडक्ट का इस्तेमाल करें. त्वचा को पोषण देने के लिए फेशियल करवाएं.

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फेशियल : कुछ फेशियल त्वचा की गहराई से सफाई करते हैं, चेहरे की धूलमिट्टी को आसानी से बाहर निकाल कर नए कोशों को विकसित करने में मदद करते हैं तो कुछ त्वचा पर उम्र के बढ़ते प्रभाव को कम करने में मदद करते हैं. पर किसी भी फेशियल में स्ट्रोक्स बहुत महत्त्वपूर्ण है. अगर उचित तरीके से स्ट्रौक्स करना न आता हो तो ऐंटीक्लाकवाइज स्ट्रौक्स खुद कर सकते हैं. वैसे इसे एक ऐक्सपर्ट ही कर सकता है कि किस चेहरे की किनकिन जगहों पर प्रैशर पौइंट देने हैं. सही स्ट्रोक्स व प्रैशर पौइंट से रक्त संचार बढ़ने के साथसाथ थकान भी उतर जाती है, जिस से आप और भी ताजा महसूस करेंगी. फेशियल मसाज क्रीम बादाम व शहद वाली ही इस्तेमाल करें. ये त्वचा को अच्छा पोषण देती हैं.

डेविस ग्लो किट (इंस्टाग्लो) : मार्केट में फेशियल की तरहतरह की किट हैं पर डेविस ग्लो किट में चिनार की जड़ को डालते हैं जिस से त्वचा गोरी होती है. इस में नीबू, संतरे और गन्ने के रस का मिश्रण होता है. गन्ने का रस त्वचा को मौश्चराइज करता है. नतीजतन, त्वचा को अतिरिक्त विटामिन मिलता है और त्वचा शुष्क नहीं होती है. दीवाली के मौसम में एलोवीरा का प्रयोग भी करें. इस में रौयल जैली व शहद दोनों चीजें मिला कर त्वचा पर लगाएं. यह त्वचा में मिनरल की कमी को पूरा करता है, जींस और हार्मोंस को पुन: उत्पन्न करता है और वसा के स्तर को कम करता है.

घरेलू टिप्स : केला, पपीता, संतरा, खीरा व टमाटर में से किसी को भी कद्दूकस कर के उस में नीम व तुलसी के पत्तों को पीस कर साथ में शहद मिला लें. फिर अपने हाथपैर पर 10 मिनट लगा कर रखें. फिर गुलाबजल या सादे पानी से हलके हाथों से साफ कर लें. यह त्वचा के लिए ऐंटीसैप्टिक का काम करता है.

बौडी पौलिश्ंिग : जब त्वचा शुष्क होने लगे तो मसाज करें. त्वचा में नमी बनी रहेगी. कौन सी त्वचा पर कैसी मसाज करनी है, यह जानना जरूरी है. जिन की त्वचा औयली हो या दाने निकले हों उन्हें ‘जैल मसाज’ करनी चाहिए. त्वचा के सूखेपन से छुटकारा पाने के लिए क्रीम में हलदी मिला लें. ऐसा करने से त्वचा जल्दी ठीक होगी. हलदी का रस निकाल कर क्रीम में मिलाएं, फिर इस्तेमाल करें.

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गोल्ड पौलिश्ंिग : आजकल केसर और गोल्ड डस्क मिली हुई पौलिश्ंिग किट बाजार में उपलब्ध है. इस में आयुर्वेदिक प्रोडक्ट होते हैं. इस की मसाज से बौडी में चमक आती है, साथ ही इस में विटामिन ‘ई’ और बादाम का तेल मिला हुआ होता है. इस की मसाज से मृत त्वचा बाहर निकल जाती है और बौडी में लंबे समय तक चमक बनी रहती है. यह मसाज 10 मिनट तक करें. तैलीय त्वचा के लिए चौकलेट जैल मसाज करें. जिन को बौडी में चमक नहीं चाहिए वे चौकलेट मसाज करवाएं.

यदि केले और क्रीम को लगा रही हैं तो लगाने के बाद बालों को कपड़े या फौइल पेपर में लपेट कर रखें. इस से परिणाम अच्छा आता है और बालों को अच्छी तरह से पोषण मिलता है. आप चाहें तो मेथीदाने को पीस कर दही में मिला कर बालों में लगा सकती हैं. इस से बाल काले व चमकदार दिखेंगे. बालों में विटामिन ‘ई’ की मालिश करें. तेल गुनगुना कर के हर 15 दिन में लगाएं. इस से बालों में नई जान आ जाएगी.

इस तरह इस बार दीवाली के अवसर पर दीए ही नहीं आप का चेहरा भी रोशन होगा. ऐसे में आप को दीवाली का भरपूर मजा उठाने में कुछ ज्यादा ही खुशी का एहसास होगा और दूसरे लोग आप से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकेंगे.

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Diwali 2021: फेस्टिवल के दौरान पालतू का ऐसे रखें खयाल

दीवाली के दौरान आप का कुत्ता डरा, सहमा, कांपता और भूंकता रह सकता है लेकिन त्योहार की मौजमस्ती के बीच अकसर लोग कुत्तों की परेशानियों को दरकिनार कर देते हैं. हालांकि, यह समझना महत्त्वपूर्ण है कि कुत्तों और बिल्लियों की सुनने की ताकत ज्यादा होती है, इसलिए हम जिस आवाज को तेज समझते हैं वह उन के लिए और ज्यादा तेज तथा कई बार असहनीय होती है. इस के अलावा, कुत्ते तेज आवाज से होने वाले कंपन के प्रति भी संवेदनशील होते हैं. सो, दीवाली के मौके पर कुत्ते,

बिल्ली जैसे पालतू जानवरों का अतिरिक्त खयाल रखा जाना जरूरी है.

क्या करें

सुनिश्चित करें कि आप का कुत्ता छुटपन में ही सभी से घुलमिल जाए. उसे भिन्न किस्म की आवाजें सुनने दें और अलग अनुभवों से गुजरने दें. हालांकि, कुछ कुत्ते आतिशबाजी से फिर भी डरेंगे. इसलिए यह सुनिश्चित करना उन के मालिकों की जिम्मेदारी है कि वे अपने कुत्ते को इस तरह ट्रेंड करें कि आतिशबाजी के दौरान भी वह अपनेआप को सुरक्षित महसूस करे.

डा. कलाहल्ली उमेश कहते हैं कि दीवाली में आतिशबाजी के शोरशराबे से पालतू जानवर थोड़े सहम जाते हैं. जिस तरह से हम अपने बच्चों को आतिशबाजी या किसी अन्य बदलावों के बारे में बताते हैं, ठीक उसी तरह अपने पालतू जानवरों को भी इन बदलावों के अनुकूल होने में सहायता करने की जरूरत है ताकि वे डरमुक्त हो सकें.

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ऐसे करें ट्रेंड

अपने कुत्ते को आतिशबाजी शुरू होने से 1 दिन पहले बाहर घुमाने के लिए ले जाएं. अगर आतिशबाजी चल रही हो तो अपने कुत्ते को घर में रखें. ऐसे समय में कभी भी उसे घुमाने के लिए न ले जाएं और न बाहर रखें. पटाखों के शोर व प्रकाश के प्रभाव से बचने के लिए खिड़कियां और दरवाजे बंद कर परदे लगा दें. ध्यान रहे, अगर इस के बावजूद कमरे में धुआं भर गया हो तो खिड़कीदरवाजे खोल दें. पटाखों की आवाज कम करने के लिए टैलीविजन या रेडियो की आवाज थोड़ी तेज भी कर सकते हैं. साथ ही, कुत्ते का ध्यान भी बंटाए रखें.

अगर आप का कुत्ता डरने जैसा व्यवहार कर रहा हो तो उसे दुलारिए नहीं, क्योंकि इस से उस का यह व्यवहार मजबूत हो सकता है. उस से सामान्य व्यवहार कीजिए, जैसे डरने की कोई बात ही न हो. उसे एक उपयुक्त सुरक्षित जगह दीजिए जहां वह छिप सके और जब वह इस जगह पर जाए तो उसे परेशान नहीं करना चाहिए. आप चाहें तो उस के कान में रुई डालने की आदत भी डाल सकते हैं.

इस के अलावा कुछ लोग अपने पालतू जानवर को शोर के पास जाने के लिए मजबूर करते हैं. शोर डरावना होता है. ऐसा नहीं करना चाहिए. इस से आखिरकार आप अपने कुत्ते को और ज्यादा डरा देंगे. ऐसी स्थिति से बचने के लिए कुत्ता आक्रामक भी हो सकता है.

दीवाली के बाद

दीवाली गुजर जाए तो आतिशबाजी के प्रति अपने कुत्ते की संवेदनशीलता कम करने के बारे में सोचना शुरू कर दें. इस से आप को यह फायदा होगा कि अगली बार वह पटाखों से नहीं डरेगा. आप आतिशबाजी की सीडी या टेप खरीद सकते हैं. शुरू में चलाते समय आवाज काफी कम रखें. यह आप दीवाली से पूर्व भी कर सकते हैं ताकि आप का कुत्ता धीरेधीरे शोरशराबा सुनने का आदी हो जाए.

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  1.   आवाज वाली इस सीडी को चलाने के दौरान उसे पेडिग्री खाने जैसी कोई आनंददायक चीज दीजिए या फिर उस के साथ खेलिए. इसे हर दिन, कई बार, कुछ देर के लिए दोहराइए. जब तक आप का कुत्ता कोई नकारात्मक प्रतिक्रिया न दिखाए, आप धीरेधीरे आवाज बढ़ा सकते हैं. कुछ समय के बाद आप का कुत्ता आवाज को डरावना मानना बंद कर देगा और इसे खानेखेलने जैसे आनंददायक अनुभवों से जोड़ने लगेगा.
  2.    कुछ बेहद गंभीर मामलों में आप के कुत्ते के डाक्टर उसे कुछ दवा देने के लिए कह सकते हैं ताकि आप के कुत्ते का आतिशबाजी से डर खत्म किया जा सके.
  3.     याद रखिए, दवाओं का उपचार सिर्फ डाक्टर की सलाह पर किया जाना चाहिए. हालांकि, यह सिर्फ अस्थायी समाधान है और समस्या को दूर नहीं करेगा. आतिशबाजी के प्रति अपने कुत्ते की संवेदनशीलता को कम करने के लिए विशेषज्ञ की सलाह लेना महत्त्वपूर्ण है.

आज दिन चढ़या तेरे रंग वरगा- भाग 1

‘‘10 मिनट पहले शुरू हो चुकी होगी क्लास.’’ कालेज के गेट से अंदर आते हुए अपने मोबाइल में टाइम देख अमन बोला.

‘‘यह दिल्ली की धोखेबाज मैट्रो, आज ही रुकना था इसे रास्ते में. क्या यार,’’ सिर झटक कर निराश स्वर में साक्षी ने कहा.

दोनों लगभग भागते हुए क्लासरूम की ओर जा रहे थे.

‘‘प्रशांत सर के लैक्चर में लेट होने का मतलब है क्लास में प्रवेश करते ही खूब सारी डांट, टाइम की वैल्यू पर लंबा सा भाषण और आज तो…’’

‘‘क्या आज तो? डरा क्यों रहा है?’’ साक्षी ने शिकायती अंदाज में पूछा.

‘‘हम दोनों हैं एकसाथ, कोई और दोस्त नहीं है.’’

‘‘ओ माय गौड, मैं तो भूल ही गई थी. लड़कालड़की साथ, मतलब सर का पारा हाई.’’

‘‘वही तो. एक दिन नेहा और कार्तिक कैंटीन में साथसाथ बैठे थे. प्रशांत सर भी पहुंच गए वहां. वे पूछने लगे, उन का रिलेशन, दोनों की कास्ट वगैरहवगैरह.’’

‘‘लगता है सर की शादी नहीं हुई, तभी तो किसी का प्यार देखा नहीं जाता इन से. पिछले महीने कालेज के फाउंडेशन डे पर सभी टीचर्स अपने परिवार के साथ आए थे, लेकिन सर अकेले ही थे. फिफ्टी प्लस तो होंगे ही न, ये सर?’’ साक्षी प्रशांत सर की आयु का अनुमान लगाने लगी.

‘‘हां, फिफ्टी? फिफ्टी फाइव प्लस होंगे, यार.’’

‘‘बेचारे, कुंआरे बिना सहारे,’’ साक्षी ठहाका लगा कर हंस पड़ी.

‘‘चुप, चुप, क्लासरूम आ गया.’’ अमन ने अपने होंठों पर उंगली रख साक्षी को चुप रहने का इशारा किया और दोनों क्लासरूम के भीतर चले गए.

अंदर दृश्य कुछ और ही था. सभी छात्र किसी चर्चा में लीन थे. सर नहीं थे वहां.

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‘‘क्या हो गया?’’ अमन ने हर्षित को संबोधित करते हुए कहा.

‘‘अरे, आज इमरान क्लास में बेहोश हो कर गिर पड़ा. दीपेश ने उस के मुंह पर पानी के छींटे मारे. 2 मिनट बाद ही होश तो आ गया था उसे, पर बहुत बेचैन सा लग रहा था वह. विनायक और दीपेश उसे ले कर उस के घर गए हैं,’’ हर्षित ने बताया.

‘‘तो अब क्यों चिंता कर रहे हो तुम सब, उस के पेरैंट्स ले जाएंगे न डाक्टर के पास, सब ठीक हो जाएगा. नो फिक्र, यार,’’ अमन ने हर्षित को आश्वस्त करते हुए कहा.

‘‘क्या खाक ठीक हो जाएगा. पूरी बात तो सुन ले भाई,’’ हर्षित बोला.

‘‘अब तू और क्या सुनाएगा?’’ साक्षी के माथे पर चिंता की रेखाएं खिंच गईं.

‘‘हुआ यों कि जब इमरान के होश में आने पर हम उसे तसल्ली दे रहे थे कि स्वाति न सही कोई और सही, क्यों इतना मरा जा रहा है उस के लिए, तभी…’’

‘‘अरे, इमरान और स्वाति का ब्रेकअप हो गया क्या? इलैवंथ से साथसाथ थे वे दोनों. 6 साल पुराना रिश्ता अचानक कैसे टूट गया?’’ अमन ने हर्षित की बात बीच में ही काट कर प्रश्न किया.

‘‘ब्रेकअप हुआ नहीं, करवा दिया है स्वाति के घरवालों ने. उन को दोनों की रिलेशनशिप का पता लग गया और उन्होंने इमरान को धमकी दे दी कि अगर उस ने कभी स्वाति से बात भी की तो उस का नामोनिशान मिट जाएगा. देखा नहीं, 2 दिनों से वे दोनों दूरदूर बैठ रहे थे. आज तो आई ही नहीं स्वाति. सुना है उस ने अपने पेरैंट्स से कह दिया था कि वह इमरान से रिश्ता नहीं तोड़ सकती. शायद, इसलिए आने न दिया हो उस को,’’ हर्षित ने दोनों को वस्तुस्थिति से अवगत करवाया.

‘‘ओह, बड़ा बुरा हुआ यह तो,’’ साक्षी मुंह बना कर बोली.

‘‘अरे यार, अपनी वह बात तो पूरी कर कि जब सब लोग समझा रहे थे इमरान को, तब क्या हुआ?’’ अमन बेचैन हो कर बोला.

‘‘हां, हुआ यह कि हम सब इमरान को समझाने की कोशिश में लगे हुए थे तो पीछे से प्रशांत सर चुपचाप आ कर खड़े हो गए और उन्होंने सबकुछ सुन लिया.’’

‘‘गई भैंस पानी में,’’ अमन के माथे पर बल पड़ गए.

‘‘और फिर सर भी दीपेश और विनायक के साथ इमरान के घर चले गए,’’ हर्षित की बात पूरी होते ही तीनों चिंतित हो उठे.

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दोपहर मे कक्षा के लगभग सभी छात्र कैंटीन में बैठे इसी विषय पर चर्चा कर रहे थे.

‘‘सर ने जरूर इमरान के पेरैंट्स को सबकुछ बता दिया होगा,’’ साक्षी निराश स्वर में बोली.

‘‘पता नहीं क्या पट्टी पढ़ाई होगी आज सर ने उन को,’’ ग्रुप में से आवाज आई.

‘‘अगर इमरान अब कभी स्वाति के साथ बात करने की कोशिश भी करेगा तो सर की नजर रहेगी उस पर,’’ अमन इमरान के भविष्य में आने वाली परेशानियों का अनुमान लगा रहा था.

‘‘अरे, हम लोग बस इमरान के बारे में ही सोच रहे हैं. क्या स्वाति कम दुखी हो रही होगी?’’ अब तक चुप बैठी मारिया स्वाति के मन में उठ रहे तूफान के विषय में सोचते हुए बोली.

तभी दीपेश वहां हांफता हुआ आ पहुंचा. सब को संबोधित कर वह कुछ बोलने ही वाला था कि सब ने प्रश्नों की झड़ी लगा दी, ‘‘क्या हुआ? सर ने क्या कहा वहां जा कर? इमरान के साथ कुछ बुरा तो नहीं हुआ न? सब ठीक तो है न?’’

‘‘गाएज, यू वुंट बिलीव इट. सुनो, प्रशांत सर आज इमरान के पेरैंट्स के साथ स्वाति के घर गए थे. दोस्ती करवा दी उन्होंने दोनों परिवारों की. और स्वाति अब इमरान की तबीयत का हालचाल पूछने उस के घर गई है.’’

‘‘चल झूठे, क्यों हमारे जले पर नमक छिड़क रहा है?’’ तानिया बोली.

‘‘यह ठीक कह रहा है,’’ वहां पहुंच विनायक ने दीपेश का समर्थन करते कहा.

कोई इस घटना पर यकीन ही नहीं कर रहा था.

‘‘दीपेश, तू पहले यह बता कि वहां क्याक्या हुआ.’’

‘‘बता न विनायक, ऐसा किया क्या सर ने कि यह सब हो गया?’’

सब ने उन्हें घेर कर प्रश्न करने शुरू कर दिए.

‘‘मुझे नहीं पता. मैं और विनायक तो इमरान को उस के घर छोड़ कर मौल चले गए थे. दोपहर में व्हाट्सऐप पर इमरान का स्टेटस देख हम चौंक गए. उस में स्वाति और इमरान की एकसाथ हंसते हुए आज खींची हुई एक तसवीर थी. उसे देख कर विनायक ने इमरान को फोन किया. तब उस ने बताया हमें कि यह सब हो गया. लेकिन सर और बाकी सब के बीच क्याक्या बातें हुईं, यह तो उसे भी नहीं पता.’’

‘‘क्यों न हम सर से ही पूछने की कोशिश करें?’’ हर्षित ने सुझाव दिया.

‘‘हां, हम उन को थैंक्स भी बोल देंगे,’’ साक्षी बोली.

‘‘ऐसा करते हैं, 4 बजे शिखा मैम के लैक्चर के बाद हम लोग उन के पास चलेंगे,’’ अमन ने कहा. अमन से सहमत हो सब कक्षा की ओर चल दिए.

शाम 4 बजे प्रशांत सर यूनिवर्सिटी में नहीं थे, इसलिए अमन, साक्षी, दीपेश और हर्षित ने उन के घर जाने का फैसला किया, जो कैंपस में ही था.

वहां पहुंच कर अमन ने डोरबैल बजाई. प्रशांत सर ही आए दरवाजा खोलने. ड्राइंगरूम में विशेष सजावट तो नहीं थी, पर कुछ था जो आकर्षित कर रहा था वहां. लाल रंग के कालीन पर साफसुथरा नीले रंग का सोफा और बीच में गोलाकार सैंटर टेबल पर समाचारपत्र रखा था. दीवार से सटी शैल्फ में रखी साहित्यिक पुस्तकें गृहस्वामी के साहित्य प्रेम की व्याख्या कर रही थीं, तो ऊपर टंगा नदी और सागर के मिलन का तैलचित्र उन के अनुरागी हृदयी होने का प्रमाण था.

‘‘सर, हम आप का शुक्रिया अदा करने आए हैं, आप ने इमरान और स्वाति को एक तरह से नई जिंदगी दे दी है,’’ दीपेश ने बात शुरू की.

‘‘हां सर, हमारे पास धन्यवाद करने के लिए भी शब्द नहीं हैं. पर यह हुआ कैसे?’’ साक्षी ने बात आगे बढ़ाई.

‘‘प्लीज सर, हमें बताइए न, आप ने ऐसा क्या कहा उन के पेरैंट्स को कि दोनों को मिलने दिया आज उन्होंने?’’ अमन बोला.

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‘‘आप जानना चाहते हैं, ओके, अभी आता हूं मैं, तब तक आप कुछ ले लीजिए, कमला, चाय बना दो,’’ और रसोई में खड़ी स्त्री को चाय बनाने को कह वे दूसरे कमरे में चले गए.

जब वे लौटे तो उन के हाथ में लकड़ी का छोटा सा डब्बा और एक पुरानी डायरी थी.

‘‘आप सब को अपने प्रश्न का उत्तर जानने के लिए कुछ समय देना होगा. लो हर्षित, इस पृष्ठ से पढ़ना शुरू करो,’’ डायरी खोल कर सर ने हर्षित के हाथों में देते हुए कहा.

‘‘लेकिन सर, यह तो आप की लिखाई है. मतलब आप की पर्सनल डायरी, जोरजोर से पढ़ूं क्या?’’ हर्षित झिझकते हुए बोला.

‘‘हां, पढ़ो, आज से लगभग 34 साल पहले की है यह,’’ प्रशांत सर बोले.

तब तक चाय और नमकीन लग गए टेबल पर. चाय की चुसकियों के बीच हर्षित ने डायरी खोल कर सर के बताए पृष्ठ से पढ़ना शुरू किया.

1 मई, 1984

अगले सप्ताह से परीक्षाएं शुरू. अविश्वसनीय ही लग रहा है कि मैं एमए फाइनल भी पास करने जा रहा हूं. आज से खुद को अध्ययन में ही केंद्रित करना होगा. कल से यह डायरी अलमारी में और पुस्तकें बाहर.

29 मई

कल अंतिम दिन था परीक्षा का, आज चैन की सांस ली है. लेकिन पूरा दिन खाली बैठना उबाऊ भी लग रहा है. कल सैंट्रल लाइब्रेरी जा कर कुछ पुस्तकें ले आऊंगा. कम से कम घर पर मन तो लगा रहेगा.

30 मई

पुस्तकें ले कर घर लौटा, तो मम्मी ने बताया कि आज सामान लेने चांदनी चौक गई थीं वे. वहां अचानक उन की भेंट अपनी एक पुरानी सहेली जसवंत कौर से हो गई. वे अपने पति के साथ विवाह की खरीदारी करने लुधियाना से दिल्ली आई हुई हैं. जुलाई में उन के परिवार में एक शादी है.

आंटीजी को यहां शौपिंग करने में थोड़ी परेशानी हो रही थी, क्योंकि अंकलजी जल्दबाजी करते हैं. मम्मी के कहने पर वे लोग होटल छोड़ कर कुछ दिनों के लिए हमारे घर आ जाएंगे, फिर आंटीजी मम्मी के साथ 2-3 दिनों में आराम से सब खरीदारी कर सकेंगी.

31 मई

आज दोपहर में वे दोनों आ गए थे. अच्छा लगा उन से मिलना. आंटीजी एक गृहिणी हैं और अंकलजी का पारिवारिक व्यवसाय है.

उन की एक बेटी है जसप्रीत, जो दिल्ली यूनिवर्सिटी से बीए कर रही है. वह छात्रावास में रहती है. आज उस की परीक्षा का अंतिम दिन था. अब वह उन लोगों के साथ लुधियाना चली जाएगी. छुट्टियां भी हैं और वहां उस के ताऊजी के बेटे की शादी भी.

एग्जाम दे कर शाम को जसप्रीत भी आ गई थी हमारे घर. लेकिन उस से मिलना नहीं हो सका मेरा. मैं अपने मित्र सोहन के घर गया हुआ था. कुछ देर पहले ही लौटा हूं. रात के 11 बजे हैं, तेज नींद आ रही है.

1 जून

सुबह नाश्ते के बाद अपने कमरे में एक कहानीसंग्रह ले कर बैठा था. फिर से पढ़ी फणीश्वर नाथ रेणु की कहानी ‘मारे गए गुलफाम’. सचमुच, कितनी भोलीभाली है यह कहानी, मन मोह लेती है पढ़ने वाले का, तभी तो बनी उस पर ‘तीसरी कसम’ जैसी फिल्म.

अचानक दरवाजे पर दस्तक हुई. ‘कौन होगा जो आधे खुले दरवाजे को खटखटा रहा है?’ सोच कर मैं ने दरवाजा खोला. वह जसप्रीत थी.

ओह, कितना गोरा रंग है उस का और बड़ीबड़ी मनमोहक आंखें. मेरा दिल तेजी से धड़क उठा जसप्रीत को देख कर.

‘मारे गए गुलफाम’ के हीरामन को शायद ऐसा ही लगा होगा जब चांदनी रात में उस ने हीराबाई का चेहरा पहली बार देखा था. उस के मुंह से निकल गया था, ‘अरे बाप रे, ई तो परी है.’

गुलाबी सलवारसूट और सितारे लगे दुपट्टे में किसी परी से कम कहां लग रही थी जसप्रीत.

वह अंदर आ कर बैठ गई. मैं डीयू से हिंदी में एमए कर रहा हूं, जान कर वह प्रसन्न हुई. वह हिस्ट्री (औनर्स)

के दूसरे वर्ष की परीक्षा दे चुकी है.

बातोंबातों में पता लगा कि उसे भी साहित्य में रुचि है. मेरी मेज पर रखे कहानीसंग्रह को वह खोल कर देखने लगी. उस में चंद्रधर शर्मा गुलेरी की अमर कहानी ‘उस ने कहा था’ का उल्लेख करते हुए वह बोली कि यह कहानी उसे बेहद पसंद है.

जसप्रीत की आंखों, उस की बातों और विशेषकर लंबे बालों में न जाने क्या आकर्षण था कि उस की अनामिका उंगली में पहनी हुई अंगूठी मेरी आंखों में खटक रही थी. ‘क्या जसप्रीत का रिश्ता हो चुका है कहीं?’ जी चाहा मैं भी ‘उस ने कहा था’ कहानी के लहना सिंह की तरह ही पूछ लूं, ‘तेरी कुड़माई हो गई?’

पर उस के हाथ में अंगूठी का मतलब यह तो नहीं कि उस की सगाई हो गई हो, उम्र तो ज्यादा नहीं है उस की.

‘आप के हाथ में जो अंगूठी है क्या वह सोने की है?’ आखिर मुझ से रहा नहीं गया.

‘अरे, मैं तो इसे उतारना ही भूल गई. सोने की है पर यह अंगूठी नहीं ‘कलिचड़ी’ है. मेरे वीरजी की मैरिज है न लुधियाना में. यह अंगूठी भरजाईजी की बहन के लिए बनवाई है.’

‘हां, जानता हूं. दूल्हा शादी में अपनी साली को जो अंगूठी देता है, उसे पंजाब में ‘कलिचड़ी’ कहते हैं. पर तुम पहन कर क्यों बैठ गईं इसे?’ मैं जसप्रीत से दोस्ताना अंदाज में बोला.

‘मम्मी ने कहा था कि पहन कर देख लो. उस का और मेरा साइज एक है,’ अंगूठी उतारते हुए मेरी ओर देख मुसकरा कर जसप्रीत बोली.

‘अंगूठी उस की सगाई की नहीं है,’ सोच कर मैं मन ही मन राहत महसूस करने लगा. फिर अगले ही क्षण मुझे अपने पर ही हंसी आ गई. यदि जसप्रीत का रिश्ता तय हो चुका होता तो भी क्या फर्क पड़ता.

2 जून

नाश्ते के समय आज सुबह मैं और जसप्रीत बालकनी में कुरसियां डाल कर बैठे थे. उस ने मुझे अपनी सहेलियों और कालेज के विषय में बताया. मैं ने भी उस से अपने खास मित्रों की चर्चा की.

मम्मी और आंटीजी के चांदनी चौक चले जाने के बाद वह मेरे कमरे में आ कर बैठ गई. हम दोनों को बातचीत के लिए मनपसंद विषय मिल गया था-साहित्य.

उसे हिंदी कहानियों के साथसाथ कविताएं भी अच्छी लगती हैं. हिंदी साहित्य में उस की रुचि देख मुझे आश्चर्यमिश्रित हर्ष हो रहा था.

जब मैं ने उसे बताया कि मुझे रूसी भाषा का हिंदी में अनुवादित साहित्य भी पसंद है तो वह उस विषय में जानने को उत्सुक हो गई. यह सुन कर कि मैं ने मैक्सिम गोर्की का कालजयी उपन्यास ‘मां’ हिंदी में पढ़ा है, वह बेहद प्रभावित हुई. अपनी बड़ीबड़ी आंखें फाड़े मेरी ओर देख कर वह बोली, ‘अरे वाह, कुछ और भी बताओ न रूसी साहित्य के विषय में.’

जसप्रीत का चेहरा उस समय मुझे बेहद मासूम लग रहा था. मेरा नटखट मन चाह रहा था कि मैं उसे कोई प्रेमकहानी सुना दूं. तब मैं ने जानबूझ कर आंतोन चेखोव की कहानी ‘एक छोटा सा मजाक’ के बारे में बताना शुरू कर दिया. कहानी में एक लड़का नाद्या नाम की लड़की से बारबार तेजी से स्लेज पर फिसलते समय कहता है कि वह उस से प्यार करता है और भोलीभाली नाद्या हर बार यही सोचती है कि वह आवाज हवा की है.

कहानी सुन कर जसप्रीत कुछ देर तक मेरी ओर देखती रही. ऐसा लग रहा था जैसे उस की झील सी आंखों में कोई प्रश्न तैर रहा है.

3 जून

आज जसप्रीत भी गई थी चांदनी चौक, उसे अपने लिए खरीदारी करनी थी.

अंकलजी प्रतिदिन मम्मी और आंटीजी के चले जाने के बाद 2-3 घंटे तक सोते रहते हैं और शेष समय समाचारपत्र व पत्रिकाएं आदि पढ़ने में बिता देते हैं. पर आज वे मेरे साथ बैठ कर खूब बातें करते रहे. अंकलजी बहुत रोचक किस्से सुनाते हैं. उन्होंने बताया कि कालेज के दिनों में वे अपने दोस्तों के साथ मिल कर खूब शरारत करते थे. किसी भी बरात में वे सजधज कर चले जाते और दूल्हे के आगे खूब नाचते थे. बाद में खापी कर चुपचाप वापस आ जाते थे.

अंकलजी हिंदी बोलते हुए बीचबीच में पंजाबी के शब्दों का प्रयोग करते हैं. मुझे यह बहुत अच्छा लगता है.

वे मुझे प्रशांत पुत्तर कह कर पुकारते हैं. उन के साथ बातों में दिन हंसते हुए बीत गया.

शाम को सब लोग वापस आ गए. जसप्रीत पास ही खड़े ठेले से मेरे लिए कोला वाली बर्फ की चुस्की ले कर आई. आज सुबह बात कर रहे थे हम दोनों अपनी पसंदनापसंद के विषय में. याद रही जसप्रीत को मेरी पसंद. मेरा रोमरोम खिल उठा.

4 जून

ओह, आज का दिन…क्या लिखूं? इस समय रात में डेढ़ बज चुके हैं. प्रीत सो गई होगी या नहीं? पता नहीं. पर मुझे नींद कहां?

सुबह से ही मेरे दोस्त अविनाश

और संजीव आए हुए थे. शाम

को वापस गए. सारा दिन कोई बात नहीं हुई मेरी जसप्रीत से.

रात को खाना खाने के बाद हम दोनों छत पर चले गए. आसमान में बादल छाए हुए थे और हवा कुछ शीतलता लिए थी. शायद कहीं बारिश हुई होगी.

जसप्रीत मुझे अपनी अब तक की खरीदारी के विषय में बता रही थी. किनारी बाजार और परांठे वाली गली के अनुभव सुना रही थी. मैं टहलते हुए निरंतर उस की ओर देख रहा था. रात की चांदनी में चांदनी चौक की बातें सुनते हुए उस का मदमाता रूप मुझे बारबार किसी और ही लोक में ले जा रहा था. तब मुझे तेज झटका लगा जब जसप्रीत ने अचानक पूछ लिया, ‘क्या आप ने कभी प्यार किया है?’

‘शायद नहीं.’

‘शायद? मतलब?’

‘अभी तक तो नहीं किया था,’ मैं मुसकरा दिया.

‘अच्छा बताओ, मुझे ऐसा क्यों लगता है कि आप के साथ मैं महफूज हूं. आप मुझे जो कहते हो, मेरा वही करने को दिल करता है. आप ने कहा, मैं छत पर चलूं, मैं आ गई, जबकि मैं अंधेरे से बहुत डरती हूं.’

‘सच? पर तुम्हें अचानक यह प्यार वाली बात कैसे सूझी?’ मुझे जसप्रीत की बात से नशा सा होने लगा था.

‘क्योंकि मैं जानना चाहती थी कि तब कैसा लगता होगा जब किसी से प्यार हो जाता है?’

‘हूं, सुनो, तब ऐसा लगता है जैसे आप किसी के पास महफूज हैं,’ मैं अपनी आवाज को गंभीर बनाते हुए बोला.

‘हाय, तुसी ते बड़े शैतान हो,’ आंखें फाड़ कर जसप्रीत लगातार मुझे देख रही थी.

अंधेरे में मुझे उस की आंखों में वह सब दिखाई दे रहा था, जो तेज रोशनी में एक लाज का परदा छिपा लेता है.

‘पर तुम बिलकुल शैतान नहीं हो,’ मैं भावहीन सा चेहरा लिए बोला.

जसप्रीत तेजी से अपना चेहरा मेरे चेहरे के पास लाई और पंजों के बल खड़े हो कर मेरे माथे को हौले से चूम लिया. मैं इस के लिए बिलकुल भी तैयार नहीं था. अचानक ही मेरे अंदर एक मादक सी ऊर्जा भरने लगी. हाथ उस को कस कर लपेट लेना चाहते थे, आंखें बस उस को ही देखना चाहती थीं और उस को मैं अपने बहुत करीब महसूस करना चाहता था. मैं ने उस का चेहरा अपने दोनों हाथों में थाम लिया और अपना मुंह उस के कान के पास ले जा कर धीरे से बोला, ‘मेरी सोहणी.’

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