भारत में क्यों है सब से ज्यादा गरीबी

कुछ समय पहले वर्ल्ड बैंक ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा था कि दुनिया में सब से ज्यादा गरीब लोग भारत में हैं. ‘गरीबी व साझा खुशहाली’ नामक इस रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2013 में भारत की 30 फीसदी आबादी की औसत आमदनी 1.90 अमेरिकी डौलर यानी तकरीबन 126 रुपए रोज से भी कम थी, इसलिए दुनिया में हर तीसरा गरीब भारतीय है. बेशक भारत तरक्की के रास्ते पर आगे बढ़ रहा है, लेकिन गरीबी का मसला छोटा नहीं है, क्योंकि यह सच है कि अमीर और अमीर हो रहे हैं, जबकि गरीब अपनी जरूरतों के लिए जूझ रहे हैं.

दिल्ली, मुंबई वगैरह कुछ शहरों में आसमान छूती इमारतें, चिकनी सड़कें, लंबे फ्लाईओवरों और बिजली की चकाचौंध से लगता है कि हमारा देश बहुत तेजी से बदल रहा है, लेकिन यह तसवीर का सिर्फ अधूरा पहलू है, जो सरकारें दिखाती हैं. दीया तले का असल अंधेरा तरक्की पर तमाचा व गरीबी दूर करने के खोखले नारों व स्कीमों का कड़वा सच है.

इन की उलटबांसी

एक ओर नेता, अफसर, कारोबारी व धर्म के धंधेबाज चांदी काट रहे हैं, वहीं दूसरी ओर गांव, कसबों, पहाड़ी, रेतीले इलाकों, मलिन बस्तियों व झोंपड़पट्टियों में रहने वाले गरीब जानवरों से बदतर जिंदगी जी रहे हैं. वे दो दून की रोटी, तन ढकने के लिए कपड़ा व सिर छिपाने के लिए टूटे छप्पर या खपरैल जैसी बुनियादी जरूरतें भी आसानी से पूरी नहीं कर पाते हैं. यह गरीबों के साथ सरासर नाइंसाफी नहीं तो और क्या है?

बेशक एक ओर मोबाइल फोन, कंप्यूटर और गाडि़यों की गिनती तेजी से बढ़ रही है, वहीं इस के उलट दूसरी ओर दिल दहलाने वाली घटनाएं मीडिया में आ रही हैं. मसलन, पिछले दिनों एक गरीब 12 किलोमीटर तक अपनी पत्नी की लाश को कंधे पर ढोने को मजबूर हुआ, तो दूसरे को कूड़े के ढेर में आग लगा कर लाश का क्रियाकर्म करना पड़ा.

सरकारी इश्तिहारों में भले ही खुशहाली के दावे किए जाते रहे हों, लेकिन गरीबों की बदहाली किसी से छिपी नहीं है. शहरी गरीबों के लिए तो आवास मंत्रालय है, लेकिन गंवई गरीबों के हालात ज्यादा खराब हैं. उन के लिए बसावट, तालीम, इलाज, सफर व इंसाफ सब टेढ़ी खीर हैं. सहूलियतें सिर्फ अमीरों के हिस्से में हैं, गरीब हर कदम पर धक्के खाते हैं.

गलत हैं तरीके

गरीबी हटाने के नाम पर केंद्र व राज्यों की बहुत सी सरकारी स्कीमें हैं, लेकिन खामी यह रही कि गरीबी की वजहों पर पूरा ध्यान ही नहीं दिया गया. किसी मसले को हल करने की कोशिश ही नहीं की गई. सरकारी लोगों को यह सोचने की फुरसत ही कहां है.

इस का नतीजा यह है कि दुनिया में सब से ज्यादा गरीब भारत में हैं. गरीबों को रोजगार के मौके व उन की आमदनी बढ़ाने व उन्हें सस्ता अनाज मुहैया कराने पर जोर दिया गया. मनरेगा वगैरह योजनाओं में पानी की तरह पैसा बहाया गया, लेकिन ये सारे उपाय ऊंट के मुंह में जीरा साबित हुए, क्योंकि इन स्कीमों का एक बड़ा हिस्सा दूसरे खा गए.

नतीजतन, गरीबों को उन का हक नहीं मिला. राज करने वाले भूल जाते हैं कि अगर ये तरीके कारगर होते, तो बीते 70 सालों में गरीबी दूर हो जाती. गरीब आज भी गरीब हैं, लेकिन उन की आड़ में, उन का हिस्सा हड़प कर सरकारी मुलाजिम व छुटभैए नेता जरूर अमीर हो गए.

आसान शिकार

झूठे, धोखेबाज और मक्कार नेता लच्छेदार व ललचाऊ भाषणों में गरीबों को सुनहरे सपने दिखाते हैं. उन के लिए सिर्फ घडि़याली आंसू बहाते हैं. असलियत में गरीबों के मुद्दे उठाने व उन्हें सुलझाने का कोई सच्चा हिमायती रहनुमा ही नहीं है. कुरसी पाते ही नेता गरीबों को भूल जाते हैं. लूटनेखसोटने, अपना घर भरने व कुनवापरस्ती में लग जाते हैं.

गरीब वह गाय है, जिसे नेता, सरकारी मुलाजिम व दाढ़ीचोटी वाले सब बड़े आराम से दुहते हैं और फिर कचरा खाने के लिए उस के हाल पर खुला छोड़ देते हैं. वोट, घास व चढ़ावा ऐंठने के लिए अपनेअपने मतलब से गरीबों से फायदा सब उठाते हैं, लेकिन गरीबों की समस्याओं पर कभी कोई ध्यान नहीं देता. सब गरीबों की अनदेखी करते हैं, क्योंकि सब अमीर यही चाहते हैं कि गरीबों की गिनती बढ़ती रहे, ताकि वे उन का शिकार करते रहें.

ये हैं वजहें

* हमारे देश में गरीबी होने के भी कई बड़े कारण हैं. मसलन, शिक्षा से समझ, सूझबूझ, जानकारी, रोजगार और जागरूकता बढ़ती है, दिमाग की खिड़कियां खुलती हैं व खुद पर यकीन बढ़ता है, लेकिन पिछड़ों, दलितों, गरीबों को सदियों से पढ़ाईलिखाई से दूर रखा गया, उन्हें कमजोर किया गया, इसलिए देश में ज्यादातर गरीब अनपढ़ व कम पढ़े हैं. ऊपर से पढ़ाईलिखाई महंगी

है. इसलिए गरीबों के लिए पढ़नालिखना आसान नहीं है.

* हुनरमंदों की कमी से अकुशल मजदूरों की भरमार है. इसलिए रोज सुबह उन अड्डों पर भारी भीड़ लगी रहती है, जहां दिहाड़ी पर काम करने वाले मजदूर ईंटपत्थर ढोने जैसे इमारती काम की तलाश में इकट्ठा होते हैं. तनबदन में जान रहने तक वे मेहनतमजदूरी करते हैं, लेकिन 60 साल की उम्र आने पर इन गरीब मजदूरों का जीना मुश्किल हो जाता है. हुनर सिखाने की सरकारी स्कीमें सिर्फ शहरों तक सिमटी हैं, इसलिए गांवों के गरीब जस के तस हैं.

* हुनर सिर्फ कारीगरी या दस्तकारी का ही नहीं होता. जिंदगी को सुख से जीने, ज्यादा पैसा कमाने, उसे समझदारी से खर्च करने, बचाने व सही जगह लगा कर बढ़ाने का हुनर भी बेहद अहम होता है. गुरबत से नजात पा कर अमीर बनने के लिए सिर्फ पैसा कमाना ही काफी नहीं है. माली इंतजाम के गुर जानना भी लाजिमी है. कर्ज ले कर मुंडन व मृत्युभोज करना गलत है, लेकिन सरकारें गरीबगुरबों को ऐसी जानकारी देने के लिए कभी कुछ भी नहीं करतीं.

* असल दोष धर्म के उन धंधेबाजों का भी है, जिन्होंने गरीबी को पिछले जन्मों के पापों का फल बताया है. गरीबी को भगवान का प्रसाद व परीक्षा मान कर खुशी से मंजूर करना सिखाया है. गरीबी को ब्राह्मणों का जेवर व भिक्षा को उन का धन बताया है. इसलिए बहुत से लोग गरीबी में जीते रहने के आदी हैं. वे गरीबी को अपनी किस्मत मानते हैं. उन की इस खराब सोच को सुधारने का कहीं कोई उपाय नहीं किया जाता.

* धर्म की किताबों में लिखा है कि ऊपर वाला दीनहीनों में रहता है. गरीब को ऊपर वाला जैसा बताया गया है. इसलिए गरीब लोग अपनी गुरबत से नफरत नहीं करते. वे उस से निकलने की कोशिश नहीं करते. खुद को ऊपर वाला समझने की गफलत में खराब हालात से भी समझौता कर के गरीबी के दलदल में ही पड़े रहते हैं. ऐसे में देश में गरीब तो ज्यादा होंगे ही.

* हमारे देश में साधुसंत, भिखारी, अपाहिज, नशेड़ी ही नहीं, निठल्ले भी बहुत हैं. वे सहीसलामत होते हुए भी पूरा दिन बिना कुछ किए, खाली बैठ कर, ताश खेल कर या फालतू की बकवास कर के गंवा देते हैं. निकम्मापन भी इतना ज्यादा है कि मैलेकुचैले व फटे चिथड़ों में, बगैर नहाए व बाल बढ़ाए बेमकसद जिंदगी को ढो रहे हैं. वे गरीबी का सांप खुद गले में डाले रखते हैं.

* अपने देश में आज भी बहुत से लोग यही मानते हैं कि अजगर करे न चाकरी पंछी करे न काम, दास मलूका कह गए सब के दाता राम. ऐसी सोच व बेवकूफी भरी बातें बचपन से ही सिखाई जाती हैं. जिस समाज की रगरग में ऐसी बातें हों, वहां गरीबी बढ़ेगी व बरकरार रहेगी ही.

* ज्यादातर गरीब अपना अच्छाबुरा नहीं सोचते. कम कमाई के बावजूद नशे की लत गरीबी की एक बड़ी वजह है. बीड़ीसिगरेट, गुटका, तंबाकू, अफीम, गांजा व शराब पीने से जेब हलकी होती है. नशे में बीवीबच्चों को पीटना, गाली देना, लड़ाईझगड़ा करना, बीमार पड़ना व जल्दी मरना आम है.

राह भी उलटी

लानत है हमारे उन मतलबी नेताओं पर, जो आग में घी डालने के आदी हैं. वे गरीबों को ऊपर नहीं उठने देते. वे कभी नहीं चाहते कि गरीब अपनी मेहनत व सूझबूझ से, दिमाग लगा कर, नई साच ले कर आगे बढ़ें, अमीर बनें. नेता गरीबों को मुफ्तखोरी सिखाते हैं. वे उन्हें तरहतरह के लालच देते हैं. गरीबों की जमीन मार कर उन्हें भिखारी बनाते हैं. बिना करे पाने की गलत राह दिखाते हैं. इस खोट के चलते भी हमारे देश में सब से ज्यादा गरीब हैं.

आज विज्ञान के सहारे दुनिया तेजी से आगे बढ़ रही है, लेकिन हमारे देश में आज भी करोड़ों लोग लकीर के फकीर हैं. उन की सोच वैज्ञानिक न होने से बहुत पुरानी रूढि़यों की जंजीरें उन के पांवों में पड़ी हैं. वे पुरानी परंपराओं के इतने आदी हैं कि उन्हें पिछड़ना मंजूर है, लेकिन वे वक्त के साथ बदलना व सुधरना ही नहीं चाहते. इसलिए उन की आमदनी कम है.

समाज में फैले धार्मिक अंधविश्वासों ने भी गरीबी को बढ़ाने का काम किया है. जीने से मरने तक के कर्मकांड, मठमंदिर, टोनेटोटके, गंडेतावीज, पूजा, हवन, जागरण, कथाकीर्तन, शोभायात्राओं के जुलूस, तीर्थ, दानपुण्य व चढ़ावे में भोलीभाली जनता व भक्तों की जेबें खूब हलकी होती हैं और दानपात्र व पंडेपुजारियों, संतोंमहंतों के घर भरते हैं.

उपाय हैं…

हमारे देश के ज्यादातर किसान छोटे व गरीब हैं. इसलिए कर्ज लेना उन की आदत व मजबूरी है. अगर वे अपनी उपज की कीमत बढ़ाना सीख लें, उस की प्रोसैसिंग व पैकेजिंग कर के बेचने लगें. आपस में मिल कर गांव में ही अपनी यूनिट लगा लें, तो खेती से ज्यादा कमा सकते हैं, लेकिन सरकारें फूड प्रोसैसिंग में उन की मदद नहीं करतीं.

इन सभी वजहों से जाहिर है कि शासक व शोषक नहीं चाहते कि गरीबी दूर हो. इसलिए वे हर मुमकिन कोशिश करते हैं कि गरीब और गरीब ही बने रहें. उन्हें यह डर सताता रहता है कि अगर गरीब गरीब न रह कर अमीर हो गए, तो वे उन की नहीं सुनेंगे, उन की मार व उन के वार नहीं सहेंगे. तब उन की खिदमत कौन करेगा?

अवार्ड फंक्शन में डांस करने के लिए उत्साहित हैं सनी लियोन

पौर्न स्टार से अभिनेत्री बनीं, सनी लियोन एक पुरस्कार समारोह में पहली बार ब्रॉडवे जैज-शैली में नृत्य प्रस्तुति देने को लेकर बहुत उत्साहित हैं.

सनी की यह प्रस्तुति बिग जी एंटरटेनमेंट अवॉर्ड्स 2017 कार्यक्रम में होगी. इस कार्यक्रम की प्रस्तुतियों का निर्देशन गीता कपूर कर रही हैं.

सनी ने हाल ही में ये ऐलान भी किया कि वे इस साल के बिग जी एंटरटेनमेंट अवार्डस में प्रस्तुति देने के लिए बहुत उत्साहित हैं. पहली बार ब्रॉडवे जैज शैली में प्रस्तुति देंगी, जो उन्हें बहुत पसंद है. यह पहली बार है जब उन्हें इस शैली में नृत्य करने का मौका मिल रहा है.

मीडिया से बात करते हुए उन्होंने कहा कि “खुशी है कि गीता मैम ने मुझे इसके लिए चुना है. मैं बगैर रुके पहले से इसकी तैयारी कर रही हूं क्योंकि मैं चाहती हूं कि इस प्रस्तुति के बाद वह मुझ पर गर्व करें.”

इस समारोह का सह-संचालन करन जौहर व हास्य कलाकार सुनील ग्रोवर करेंगे. यह 13 अगस्त को टेलीविजन पर प्रसारित होगा.

हालही में सनी एक बच्ची को गोद लेने के कारण चर्चा में आईं थीं. सनी ने महाराष्ट्र के लातूर से एक 21 महीने की लड़की को गोद लिया है. सनी और उनके पति वेबर ने बच्ची का नाम निशा रखा है.

गोद लेने के बाद सनी के समाने समस्या ये आ गई कि उनकी बेटी निशा को अग्रेजी का सिर्फ एक ही शब्द आता है ‘बाए’.बता दें कि निशा केवल मराठी समझती है.

धर्म के नाम पर पागलपन आखिर किस काम का

हिंदू-मुसलिम विवादों को आज लगातार हिंसक बनाया जा रहा है. हिंदुत्व के नाम पर कहीं भी, बिना किसी पूर्वयोजना के किसी मुसलिम की हत्या की जा सकती है. कट्टर हिंदू दलों ने सोशल मीडिया के माध्यम से हिंदुओं को घरघर संदेश पहुंचा दिया है कि हिंदू धर्म के नाम पर जो चाहे कर लो, कोई कुछ नहीं कहेगा.

भारत के मुसलिम चाहे किसी विदेशी धर्म के अनुयायी हों, वे हैं भारतीय और बहुमत की आस्था से चाहे उन का मतभेद हो, उन्हें इस देश में रहने का पूरा और बराबर का अधिकार वैसा ही है जैसे 3 करोड़ भारतीय मूल के लोगों के दूसरे देशों में रहने का है. धर्म, रंग, जाति, भाषा के नाम पर एक पूरे समुदाय को कठघरे में खड़ा करने का जो प्रयास किया जा रहा है वह कट्टर हिंदुओं को चाहे सुकून दे पर यह उन के खुद के लिए भी खतरनाक है.

हरियाणा के बल्लभगढ़ में 23 जून को ट्रेन के भीतर सीट को ले कर हुए झगड़े को गोमांस ले जाने के आरोप में बदल कर भीड़ द्वारा 19 वर्षीय युवक की हत्या करना बताता है कि हिंदू कट्टरवादी लीडरों का अब अपने समर्थकों पर नियंत्रण नहीं रह गया है. वे धर्म के नाम पर कहीं भी उत्पात मचा सकते हैं.

धर्मभीरुओं की भीड़ मुसलिमों के अल्पमत में होने के कारण उन्हें कभी भी मार सकती है. लेकिन, कट्टरों की यह आदत बाद में अपनों को भी सीधा करने में शुरू हो सकती है. 1960 व 1970 के दशकों में कम्युनिस्टों ने श्रमिक संगठन बना कर मजदूरों को अधिकारों के नाम पर दंगा करने का अवसर दे दिया और नतीजा यह हुआ कि देश के अधिकांश बड़े उद्योग बेमौत मारे गए. आज देश की बदहाली (वित्त मंत्री द्वारा छाती ठोकने के बावजूद) उन जैसे दिनों की तरह है जब लाल सलाम के नाम पर किसी भी उद्योगपति, व्यापारी को परेशान किया जा सकता था.

नतीजा क्या है, औद्योगिक क्षेत्र आज कब्रिस्तान लग रहे हैं और कारखानों की जगह अब मकान बनाने पड़ रहे हैं. कारखाने चीनी ले गए. यही, हिंदू कट्टरवादी कर रहे हैं. आज वे मुसलमानों के खिलाफ भीड़ का इस्तेमाल कर रहे हैं, कल वे अपनों के खिलाफ करेंगे. दलितों के खिलाफ तो वे शुरू हो ही गए हैं. फिर, किसान लपेटे में आएंगे क्योंकि वे महामहंतों को चुनौती दे रहे हैं. और फिर महामहंत खुद निशाना बनेंगे.

हर देश में ऐसा हो चुका है. हमारा इतिहास तो इन घटनाओं से भरा पड़ा है. रामायण और महाभारत के वे आदर्श पात्रों जिन के नाम पर खूब हल्ला मचाया जाता है, के जीवन के अंत दुखद ही थे. उन के वंश ही समाप्त हो गए. ये आदर्श एक पीढ़ी में ही चमके थे. उन की कहानियां बचीं, उन के आने वालों की नहीं.

जो बीज आज बोए जा रहे हैं, वे विषैले प्रदूषण के जनक हैं और जल्द ही देश को इन का खमियाजा भुगतना पड़ सकता है. आज सहारनपुर, मुजफ्फरनगर, राजस्थान, हरियाणा पर जो खीखी कर रहे हैं वे कल के भयंकर तूफान को आमंत्रित कर रहे हैं. नोटबंदी और जीएसटी का प्रहार सहने वाली जनता की क्षमता इस अत्याचार को भी उठाने की नहीं है. दार्जिलिंग व कश्मीर के मामलों को हलके में न लें, ये बडे़ तूफानों के आसार हैं.

इस्तीफा मास्टर नीतीश कुमार की ये कहानी भी पढ़ें

नीतीश कुमार ने 26 जुलाई की शाम 6:32 मिनट पर राज्यपाल को अपना इस्तीफा सौंप कर 20 महीने पुराने महागठबंधन को एक झटके में तोड़ डाला. संघ मुक्त भारत का नारा गला फाड़-फाड़ कर चिल्लाने वाले नीतीश रात 9 बजते-बजते एक बार फिर संघ और भाजपा की गोद में जा बैठे. बिहार की सियासत में ‘इस्तीफा मास्टर’ और ‘पलटीमार’ नेता के नाम से मशहूर हो चुके नीतीश ने एक बार फिर अपनी इमेज को पक्का कर दिया है.

भ्रप्टाचार के आरापों से घिरे तेजस्वी यादव को इस्तीफा नहीं देने पर जब लालू अड़ गए, तो नीतीश ने अपना पुराना राग ‘अंतरात्मा की आवाज’ गाया और महागठबंधन और लालू से नाता तोड़ अपने पुराने साथी भाजपा से हाथ मिला लिया. जिस भाजपा को उन्होंने लालू के साथ मिलकर 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में धूल चटा दिया था, उसी भाजपा के लिए बिहार सियासत की मजबूत जमीन तैयार कर दी. इस्तीफा देने के एक घंटे बाद ही नीतीश ने भाजपा नेताओं के साथ बैठक की और राज्यपाल से मिल कर सरकार बनाने का दावा भी पेश कर दिया. सब कुछ इतनी तेजी और आसानी के साथ हुआ तो खुलासा हो गया कि नीतीश और भाजपा के बीच काफी समय से सियासी खिचड़ी पक रही थी और नीतीश इसे परोसे जाने के लिए खास समय का इंतजार कर रहे थे या इसके लिए भूमिका तैयार कर रहे थे.

5 जुलाई को तेजस्वी के खिलाफ सीबीआई की एफआईआर और 7 जुलाई को लालू के 20 ठिकानों पर सीबीआई और इनकम टैक्स की छापामारी के बाद से ही महागठबंधन में तेजस्वी के इस्तीफे को लेकर घमासान मचा हुआ था. 26 जुलाई को जब लालू यादव ने राजद विधयक दल की बैठक के बाद तेजस्वी यादव के इस्तीफा नहीं देने की बात दुहराई तो महागठबंधन में सन्नाटा पसर गया था. उसी शाम होने वाली जदयू विधयक दल की बैठक पर सबकी निगाहें टिक गई और जैसे अनुमान था, वही हुआ. नीतीश ने राज्यपाल को जाकर अपना इस्तीफा सौंप दिया. उसके बाद जब नरेंद्र मोदी ने ट्वीट के जरिए नीतीश की तारीफ की तो लालू भड़क गए और उन्होंने नया फार्मूला सुझा कर महागठबंधन को बचाने की पूरी कोशिश की. उन्होंने कहा कि न तो नीतीश मुख्यमंत्री रहें और न ही तेजस्वी उपमुख्यमंत्री रहें. राजद, जदयू और कांग्रेस के विधायकों की बैठक हो और नए नेता को चुन लिया जाए. राजद सबसे बड़ा दल है, इसलिए मुख्यमंत्री की कुर्सी पर उसका अधिकार बनता है. लालू के इस बयान के बाद शह और मात का खेल तेज हो गया और उसी बीच भाजपा ने लोहा गरम देख कर नीतीश का साथ देने का हथौड़ा चला दिया.

इस्तीफा सौंप कर नीतीश ने खुद को सियासत को बड़ा इस्तीफा मास्टर या कहिए भगोड़ा की इमेज को और ज्यादा पक्का कर लिया. नैतिकता के नाम पर जब-तब इस्तीफा देकर सियसी हड़कंप मचाने वाले नीतीश के बारे में कहा जाता है कि वह सियासी मुश्किलों से जूझने के बजाए भाग खड़े होते हैं. इस बार भी बड़े जतन से बनाए गए महागठबंधन को नैतिकता के नाम पर झटके में तोड़ डाला. 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में जनता ने महागठबंधन को जनादेश दिया था न कि अकेले नीतीश कुमार को. सबसे बड़ा दल होने के बाद भी राजद (80 सीट) ने जदयू (71 सीट) के नेता नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री की कुर्सी सौंप दी थी. राजद को झटका देने से पहले नीतीश भाजपा को भी इस्तीफे का झटका दे चुके हैं. जून 2013 को भी भाजपा के साथ 17 साल पुराने रिश्ते को पलक झपकते ही इसलिए तोड़ डाला क्योंकि नरेंद्र मोदी को भाजपा ने प्रधानमंत्री के तौर पर प्रोजेक्ट कर दिया था और मोदी गोधरा कांड के आरोपों से घिरे हुए थे.

नीतीश कहते हैं कि 20 महीने में उन्होंने पूरी इमानदारी के साथ गठबंधन सरकार को चलाने की कोशिश की. उनका दावा है कि वह किसी भी कीमत पर भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टौलरेंस की नीति से समझौता नहीं कर सकते हैं. नीतीश यह सफाई भी दे रहे हैं कि वह हमेशा से विपक्षी एकता के हिमायती रहे हैं, लेकिन विपक्षी एकता का कोई एजेंडा भी होना चाहिए.

लालू नीतीश पर हमला करते हुए कहते हैं कि वह कहते थे कि मिट्टी में मिल जाएंगे पर भाजपा के साथ नहीं जाएंगे, पर जनता से मिले भारी मेंडेट को लात मार कर दंगाईयों के साथ चले गए? अपने ऊपर लगे पुत्र मोह के आरोपों को खारिज करते हुए लालू कहते हैं कि उन्होंने आंखें मूंद कर बेटे का साथ नहीं दिया, जनता ने उन्हें मेंडेट दिया था, इसलिए तेजस्वी को उपमुख्यमंत्री बनाया गया. अगर आंख मूंद कर हम काम करते तो बेटे को मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठाते, क्योंकि उन्हें ही ज्यादा सीट मिली थी.

इस सियासी उठापटक से नीतीश को जहां दुबारा मुख्यमंत्री की कुर्सी मिल गई, वहीं 2015 के विधान सभा चुनाव में हीरो बन कर उभरे लालू एक बार फिर सियासी हाशिए पर ढकेल दिए गए हैं. सबसे बड़ी पार्टी होने के बाद भी वह अलग-थलग पड़ गए हैं. किंगमेकर कहे जाने वाले लालू को अपने ही बेटे को किंग बनाने के चक्कर में बहुत बड़ा झटका लगा है. वहीं लालू-नीतीश की दोस्ती से कांग्रेस के भाग से सत्ता छींका फूटा था और उसे मलाई खाने का मौका मिला था. कांग्रेस को अपना सियासी वजूद बचाने के लिए एक बार पिफर जददोजहद करनी पड़ेगी. उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह के परिवार में फूट की वजह से उसका सियासी गुना-भाग गड़बड़ा गया था और अब बिहार में लालू-नीतीश की फूट से उसके राज्य की सियासत में पैठ बनाने का सपना तार-तार हो गया है. उत्तर प्रदेश और बिहार में लोक सभा के कुल 120 सीट हैं, जिसमें से एक भी कांग्रेस के कब्जे में नहीं है.

बिहार में सियासी उठापठक का सबसे बड़ा फायदा भाजपा को मिल गया है. साल 2015 के विधान सभा चुनाव में जीतने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाने के बाद भी उसे करारी हार का सामना करना पड़ा था और फिलहाल वह 2020 में बिहार पर फतक करने की कवायद में लगी हुई थी. लालू-नीतीश में फूट डाल कर उसने 3 साल पहले ही बिहार में अपनी सरकार बना ली. भाजपा के सूत्र बताते हैं कि अमित शाह और नरेंद्र मोदी की जोड़ी ने बिहार में सत्ता पाने के लिए लंबा इंतजार करने के बजाए महागठबंधन में उठापटक मचा कर सत्ता हासिल कर ली. लालू और उनके परिवार को सीबीआई, इनकम टैक्स, ईडी और कोर्ट के चक्कर में उलझा कर उन्हें कमजोर बना दिया और नीतीश को अपने पाले में मिला कर सत्ता का मलाई हासिल कर लिया.

पिछले साल नवंबर में नोटबंदी के बाद से ही नीतीश ने नरेंद्र मोदी के सुर में सुर मिलाना चालू कर दिया था. उसके बाद सर्जिकल स्ट्राइक के मामले में भी नीतीश मोदी के साथ खड़े दिखे. इस साल जनवरी में पटना में गुरू गोविंद सिंह के 350वें जन्मदिन पर आयोजित प्रकाश पर्व के मौके पर मोदी और नीतीश के बीच जुगलबंदी तेज हो गई थी. नीतीश महागठबंधन की लाइन से अलग जाकर कई मौकों पर केंद्र सरकार और प्रधनमंत्री की तारीफ में कसीदे गढ़ चुके थे. जीएसटी, सर्जिकज स्ट्राइक, नोटबंदी और बेनामी संपति के मामले में नीतीश ने खुल कर मोदी के सुर में सुर मिलाया. इन मामलों में नीतीश ने बिना-लाग लपेट के मोदी का साथ देते रहे.

पिछले दिनों उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, गोवा ओैर मणिपुर में भाजपा की जीत और सरकार बनने नीतीश की बांछे खिली थी. उसी समय से नीतीश कुमार और महागठबंधन में उनके साथी और ‘बड़े भाई’ लालू यादव के बीच सब कुछ ठीक-ठाक नहीं चल रहा था. जदयू के कई नेता दबी जुबान में कहते रहे हैं कि लालू के बढ़ते सियासी दबाब और उलजलूल डिमांड से नीतीश खासे परेशान है. भाजपा से दुबारा हाथ मिलाने का धौंस दिखा कर नीतीश अपने सियासी साथी लालू यादव को काबू में रखने का दांव चल सकते हैं.

पिछले दिनों राबड़ी देवी ने अपने बेटे तेजस्वी यादव को बिहार का मुख्यमंत्री बनाने की मांग कर महागठबंधन के अंदर भी खलबली मचा दिया था. राजद का खेमा पिछले कुछ महीने से उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव को बिहार का मुख्यमंत्री बनाने की हवा बनाने में लगा हुआ था. राबड़ी देवी ने अपनी बात को बल देने के लिए कह डाला कि राज्य की जनता तेजस्वी को मुख्यमंत्री के रूप में देखना चाहती है.

भाजपा नेता और अब नीतीश की ताजा सरकार में उपमुख्यमंत्री बने सुशील मोदी कई बार यह यह कहते रहे हैं कि नीतीश कुमार पलटी मारने में माहिर हैं. जब भाजपा से 17 साल पुराना रिश्ता वह एक झटके में तोड़ सकते हैं तो लालू के उनकी सियासी दोस्ती लंबी नहीं चलने वाली है. नेशनल पार्टी होने के बाद भी भाजपा ने बिहार में नीतीश को बड़े भाई की भूमिका सौंप रखी थी, उसके बाद भी नीतीश ने उस रिश्ते की लाज नहीं रखी थी. अब लालू के साथ मिलने से नीतीश छोटे भाई की भूमिका में आ गए हैं और लालू के बढ़ते सियासी दबाब को को वह ज्यादा समय तक नहीं झेल पाएंगे. छोटे मोदी की यह बात आखिरकार 26 जुलाई की शाम को सच हो गई. जदयू के भी कई नेता भी गाहे-बगाहे कहते रहे हैं कि लालू की महत्वाकाक्षांओं और परिवारवाद का बोझ नीतीश ज्यादा समय तक नहीं ढो सकते हैं. यह सही ही साबित हुआ है.

धार्मिक तानाशाही का समाज पर असर

जड़ समाज और सक्रिय समाज में अंतर जरा सा ही होता है. ऊपर से देखने पर तो पता भी नहीं चलता. जड़ समाज में न नया सोचने की इजाजत होती है, न नया करने की. लेकिन जड़ समाज सदियों से जो भी नई तकनीक आती है उसे अपना ही लेता है. पर इसे विकास नहीं कहा जा सकता क्योंकि तकनीक उन इलाकों से आती हैं जहां विविधता को बढ़ावा मिलता है.

हमारा समाज एक बार फिर जड़ता की ओर बढ़ रहा है. पहले सैकड़ों देवीमां, देवताओं को पुजवाने वाले चतुर बिचौलियों ने अब देश के झंडे, राष्ट्रभक्ति, भारतमाता और वंदेमातरम को पूज्य आइकनों की तरह पेश कर दिया है और उन को सरदार पटेल, शिवाजी, महाराणा प्रताप जैसों से जोड़ दिया है. उद्देश्य यह है कि साबित किया जा सके कि जो उन का युग था वही आदर्श था.

हां, इस का एक बड़ा कारण इसलामी कट्टरपन का बढ़ना है. पश्चिमी एशिया के देशों में जिस तरह तेल के पैसों के कारण इसलाम ने अपनी कट्टरता और पुरानी सोच बनाए रख कर दुनियाभर में अपने भक्तों को न केवल सोच में पुरातनवादी होने का जो आदेश दिया है, पहरावे व दिखने में भी उन को धर्म का पट्टा माथे पर लगा कर चलने का जो आदेश दिया है, उस से उदार होते समाज भी डर गए हैं.

यही नहीं, इसलामी कट्टरपंथी ही आज के आतंकवादी हैं. उन के आतंक के आगे जापान की रैड आर्मी या दक्षिणी अमेरिका के चे ग्वेरा के समर्थक फीके पड़ गए हैं. श्रीलंका के तमिल उग्रवादियों व पंजाब के खालिस्तानी बंदूकधारियों

ने इतना कहर नहीं मचाया है जितना इसलामी कट्टरवादियों ने मचाया है. और इसी ने, दूसरे धर्मों के दुकानदारों को सुनहरा मौका दे दिया है कि वे अपने समर्थकों को बरगला सकें.

दुनियाभर में ईसाई, हिंदू, यहूदी व अन्य धर्मों वाले अब और ज्यादा मुखर होने लगे हैं और उन के देशों में अब खुली सोच, विचारों की अभिव्यक्ति, बहुरंगीन समाज खतरे में हैं. हर देश में हम ही हम का नारा लगने लगा है. सभी देशों में हिटलरवादी तत्त्व सिर उठाने लगे हैं.

जो प्रगति समाज ने पिछले 200 सालों में की है उसे अब दफनाया जा रहा है. लेखक, पत्रकार विचारक सिर्फ चाटुकार और भांड़ बन कर रह गए हैं. जिन का काम शासक की तारीफों के पुल बनाने का ही रहता जा रहा है.

नतीजा क्या हो सकता है, यह जानना है तो क्यूबा चले जाइए जहां कम्युनिस्ट शासक फिदेल कास्त्रो ने देश को 50 साल पहले का अजायबघर बना कर रखा है. अमेरिका का पड़ोसी क्यूबा बेहद गरीब देश है. टूटे मकान, पुरानी गाडि़यां, फटेहाल लोग, अस्पतालों में दवाएं नहीं, शिक्षा बेकार लेकिन शासक के नाम पर सिर्फ वाहवाही और वाहवाही.

बॉलीवुड के कई सितारों के साथ था इस एक्ट्रेस का अफेयर

मॉडल से एक्ट्रेस बनीं सुमन रंगनाथन का जन्म साल 1974 को बेंगलुरु में हुआ था. साल 1996 में आई फिल्म ‘फरेब’ से हिंदी सिनेमा में डेब्यू करने वाली एक्ट्रेस सुमन रंगनाथन अब 43 साल की हो चुकी हैं. उन्होंने डायरेक्टर शंकर नाग की कन्नड़ फिल्म ‘सीबीआई शंकर’ से अपना एक्टिंग डेब्यू किया था.

वैसे, सुमन का नाम एक्टिंग से कहीं ज्यादा उनके अफेयर को लेकर चर्चा में रहा. नब्बे के दशक की सुपरहिट फिल्म ‘आशिकी’ के हीरो राहुल रॉय से लेकर फरहान अख्तर तक, बॉलीवुड की ऐसी कई हस्तियां हैं, जिनसे सुमन का अफेयर चर्चा में रहा.

राहुल रॉय के साथ रिलेशन में रहीं सुमन

– 1996 में जब सुमन बॉलीवुड फिल्मों में करियर बनाने के लिए स्ट्रगल कर रही थीं तो उस वक्त राहुल रॉय ने उनकी मदद की.

– यहां तक कि सुमन को जब पहली फिल्म ‘फरेब’ में स्विम सूट पहनना था तो वो पहले झिझक रही थीं लेकिन राहुल ने ही उन्हें कन्विंस किया और इसके बाद वो इस सीन के लिए तैयार हो गई थीं.

– उस दौर में राहुल रॉय और सुमन का रिलेशन काफी सुर्खियों में रहा था. यहां तक कि दोनों शादी भी करने वाले थे लेकिन बाद में किसी बात को लेकर दोनों का ब्रेकअप हो गया.

इन मशहूर हस्तियों  के साथ भी रहा सुमन रंगनाथन का अफेयर…

फरहान अख्तर

मॉडलिंग के शुरुआती दिनों में सुमन रंगनाथन का लिंकअप फरहान अख्तर के साथ भी रहा. कहा तो ये भी जाता है कि सुमन ही फरहान का पहला प्यार थीं. साल 1997 में फरहान महज 23 साल के थे और सुमन को लेकर काफी सीरियस भी थे. हालांकि उम्र में सुमन उनसे बड़ी थीं लेकिन बावजूद इसके फरहान को कोई प्रॉब्लम नहीं थी.

सुमन किसी आजाद पंछी की तरह लाइफ गुजारना चाहती थीं. वे किसी रिलेशनशिप में बंधकर नहीं रहना चाहती थीं. यही वजह थी कि फरहान को भी सुमन का नखरेबाजी वाले नेचर से इनसिक्योर फील होने लगा और उन्हें लगा कि वे दोनों साथ नहीं रह सकते.

इस सब के करीब एक साल फरहान अधुना से मिले और बाद में उन्होंने शादी कर ली.

उरु पटेल

सुमन का अफेयर इंडस्ट्रियलिस्ट उरू पटेल से भी रहा, जिसके लेकर वे काफी चर्चा में बनी रहती थी. हालांकि बाद में दोनों के बीच काफी कड़वाहट के बाद इनके रिश्ते का अंत हो गया.

सुमन ने आरोप लगाया था कि उरू को ये तक नहीं पता कि औरतों की रिस्पेक्ट कैसे की जाती है. उसने मुझसे गंदी भाषा में बात की. मुझे ऐसे शख्स की कोई जरूरत नहीं, जो खुद कंगाल हो. बात यहीं खत्म नहीं हुई थी. इतना होने के बाद में उरू ने भी कहा कि सुमन भले ही फिल्मों में अच्छी एक्ट्रेस ना हो लेकिन ऑफस्क्रीन वे बहुत अच्छा नाटक कर लेती हैं.

गौतम कपूर

उरू से ब्रेकअप के बाद सुमन का अफेयर मॉडल गौतम कपूर से रहा. दोनों ने 28 दिसंबर, 2000 को शादी भी कर ली. लेकिन दूसरे अफेयर्स की तरह यह रिश्ता भी ज्यादा वक्त तक नहीं चला. गौतम की अपनी क्लॉदिंग लाइन (गारमेंट का बिजनेस) थी.

बंटी वालिया

गौतम कपूर से शादी टूटने के बाद सुमन का अफेयर बॉलीवुड के फेमस प्रोड्यूसर बंटी वालिया से हुआ और दोनों ने शादी कर ली. हालांकि इनकी शादी को सिर्फ 8 महीने ही हुए थे कि साल 2006 में एकता कपूर की पार्टी में किसी बात को लेकर दोनों का जमकर झगड़ा हुआ. इसके बाद दोनों अलग-अलग रहने लगे थे. बाद में एक इंटरव्यू में बंटी ने बताया था कि मैंने उसे प्यार, पैसा और आजादी सबकुछ दी लेकिन उसने इसका गलत इस्तेमाल किया. यहां तक कि बंटी ने सुमन पर ट्रेनर और कजिन से भी एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर्स होने का आरोप लगाया था.

इन फिल्मों में काम किया सुमन ने

फिल्म ‘फरेब’ से बॉलीवुड में डेब्यू के बाद सुमन ने ‘आ अब लौट चलें’ (1999), एक स्त्री, आगाज और कुरुक्षेत्र (2000), हम हो गए आपके (2001), हम तुम्हारे हैं सनम (2002), ‘बागवान’ (2003), सौदा (2005), मेहबूबा (2006), गुमनाम (2008) जैसी प्रमुख फिल्मों में काम किया है. इसके अलावा उन्होंने साउथ की भी कई फिल्मों में काम किया है. सुमन कई नामी फैशन शोज में रैम्पवॉक भी कर चुकी हैं.

क्या आप जानते हैं इन दिनों कहां हैं केजरीवाल

देश की राजनीति बड़े उबाऊ दौर से गुजर रही है, जिससे लगता ऐसा है कि अब गाय, दलित और नव राष्ट्रवाद जैसे मुद्दों से सभी ने समझौता कर एक बड़े बहुमत वाली सरकार के सामने घुटने टेक दिये हैं. हताश बसपा प्रमुख मायावती राज्यसभा से इस्तीफा देकर लखनऊ लौट गईं हैं, ममता बनर्जी की दहाड़ रिरियाहट में बदलती जा रही है, लालू यादव अपने कुनबे को लेकर चिंतित हैं तो मुलायम सिंह भगवा खेमे की शरण में हैं. और तो और बात बात पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार की उद्योगपतियों से सांठ गांठ को हवा देकर विपक्षी चूल्हे में आंच बनाए रखने वाले दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के कहीं अते पते नहीं हैं. वे आखिरी बार कब क्या बोले थे शायद ही किसी को याद हो.

लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका एक सचेतक की होती है, जिसे कम से कम केजरीवाल तो प्रभावी ढंग से निभा रहे थे. जिन लोगों को केजरीवाल का बोलना खटकता था, वे तक उनकी हैरान कर देने वाली सियासी गुमशुदगी पर सकते में हैं. राजनीति की रंगीन मसालेदार फिल्म को ब्लेक एंड व्हाइट डाक्यूमेंटरी में तब्दील होते देखना जरूर यह एहसास कराता है कि कहीं सचमुच तो आपातकाल नहीं लग गया. अरविंद केजरीवाल की खामोशी रहस्यमयी इस लिहाज से भी है कि बीते दिनों कई ऐसी घटनाएं और हादसे हो गए जिन पर अपना मुंह सिल पाना उनके लिए असंभव सी बात थी. किसान आंदोलन पर वे चुप रहे, रामनाथ कोविंद की राष्ट्रपति पद की उम्मीदवारी के पेंच पर भी वे खामोश रहे और तो और जीएसटी लागू हो जाने जैसे अहम मुद्दे पर भी उन्होंने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी.

बिलाशक राजनीति में उनकी इमेज एक ऐसे उद्दंड किशोर की बन गई है जो बात कुछ भी हो बोलता जरूर है, दखल देना उसकी आदत में शुमार है और वह किसी से डरता नहीं. दो ही स्थितियों में कोई प्रतिक्रियावादी चुप रहता है, पहली यह कि उसे समझ आ जाता है कि अब बोलने से कोई फायदा नहीं और दूसरी यह कि उसका मुंह बांध दिया गया हो. मौजूदा सत्ता पक्ष बड़ी चालाकी और चतुराई से विपक्ष को मिटा रहा है, जिससे नुकसान लोकतन्त्र और आम लोगों का हो रहा है. मोदी सरकार में आलोचना बर्दाश्त करने की हिम्मत नहीं है, ऐसे में राजनीति के रंगमंच पर एक ही किरदार था, जो सरकार को आईना दिखाता रहता था, वे अरविंद केजरीवाल चुप क्यों हैं इस का खुलासा होना बेहद जरूरी है. क्या वे किसी से भयभीत हैं या उन्हें भी अमित शाह ने मेनेज कर लिया है, इस बात की जांच के लिए कोई आयोग भी गठित करना पड़े तो करना चाहिए.

देश खतरनाक अंधे मोड पर है जहां से जनता को आगाह करने वाले नेता एक एक कर पलायन कर रहे हैं या फिर डिप्रेशन की गिरफ्त में आ गए हैं, तो अब ज़िम्मेदारी जनता की बनती है कि वह इन ऊर्जावान और जुझारू नेताओं को वेंटिलेटर से उठाकर खुले मैदान में लाये, नहीं तो फिर खुद भी इसी वेंटिलेटर पर चढ़ने तैयार रहे. केजरीवाल जैसे नेताओं की छद्म बेहोशी की वजह से कट्टरवाद तेजी से पनप रहा है, आम हिंदुवादी उन्माद का शिकार हो रहा है जिससे धर्म निरपेक्षता खतरे में है. इसलिए केजरीवाल कहां हैं इसका खुलासा होना जरूरी हो चला है. यह भी सच है कि वे कोई करिश्मा नहीं कर देंगे, पर सच यह भी है कि उन जैसे नेता ही सरकार के कान उमेठने की हिम्मत कर पाते हैं जो लोकतन्त्र की अनिवार्यता है.

‘डिजिटल इंडिया’ पर भारी नासमझी का नासूर

* हाल ही में राजस्थान के प्रतापगढ़ जिले के एक गांव किराड़ के एक काली मंदिर में राम सिंह नाम के आदमी ने अपनी 4 महीने की बेटी की बलि देने की कोशिश की. हालांकि मंदिर ट्रस्ट के एक मुलाजिम ने ऐन मौके पर मासूम बच्ची को उस जालिम बाप के चंगुल से छुड़ा लिया.

* उदयपुर जिले के गांव निमाना से 5 किलोमीटर दूर रामदेव की पहाड़ी पर तंत्रमंत्र के चक्कर में 6 साल के बच्चे जितेश की बलि चढ़ा दी गई.

* सिरोही जिले के रतनाड़ा गांव में दकियानूसी लोगों की भीड़ ने निचले तबके की एक 45 साला औरत को डायन होने के शक में नंगा कर के जलील किया.

ये तो महज चंद बानगियां हैं. सचाई यह है कि इस तरह की दिल दहला देने वाली घटनाएं आएदिन देश के किसी न किसी कोने में होती रहती हैं. कभी किसी औरत को डायन होने के शक में मार दिया जाता है, तो किसी को नंगा कर के पूरे गांव के गलीमहल्लों में घुमाया जाता है.

ढोंगीपाखंडी बाबाओं व तांत्रिकों की काली करतूतें तो आएदिन मीडिया में भी छाई रहती हैं. बीमारी, पारिवारिक कलह व बच्चा न होने से निराश औरतों के बीच ये तांत्रिक अपने तंत्रमंत्र का मायाजाल कुछ इस तरह से बुनते हैं कि वे उन के झांसे में आसानी से आ कर अपनी इज्जत, दौलत व जिंदगी तक गंवा बैठती हैं.

राजस्थान के आदिवासी इलाके डूंगरपुर में पिछले 10 साल के दौरान 48 औरतों की जिंदगी डायन बता कर छीन ली गई. इस के अलावा 76 औरतों को दूसरे तरीकों से सताया गया.

राजस्थान में ही नहीं, बल्कि देश के दूसरे राज्यों जैसे बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश व ओडिशा जैसे राज्यों में भी मर्दों को ओझा और औरतों को डायन बता कर मार डालने की घटनाएं भी दिन ब दिन बढ़ रही हैं.

21वीं सदी का नारा, तकनीकी उड़ान का दावा, चांद और मंगल ग्रह समेत अंतरिक्ष पर फतेह के बीच डायन का वजूद भी सारे दावों व नारों की पोल खोल कर रख देता है.

इस बारे में प्रोफैसर अजय कुमार कहते हैं, ‘‘अनपढ़ लोग अंधविश्वास के जाल से बाहर नहीं निकल सकते. जो इलाके पढ़ाईलिखाई के मामले में पिछड़े हुए हैं, वहीं अंधविश्वास व पोंगापंथ की जड़ें ज्यादा गहरी हैं.’’

गांव में किसी बच्चे या जवान शख्स की मौत होने पर गांव वाले मानते हैं कि किसी डायन ने अपने काले जादू से उसे मार डाला और जिस किसी औरत पर शक होता है, उसे मारापीटा जाता है. इतना ही नहीं, लाश को जिंदा करने के लिए कहा जाता है. बेचारी वह औरत चिल्लाती, रोती, गिड़गिड़ाती रहती है, पर कोई उसे बचाने नहीं आता.

इस मसले पर सामाजिक कार्यकर्ता दिनेश बडोलिया कहते हैं, ‘‘डायन होने के आरोप झेलती औरत को जबरन गंदगी खिलाना, उस के साथ बलात्कार करना, नंगा कर के पूरे गांव में घुमाना जैसी शर्मनाक घटनाएं खुलेआम हो रही हैं. इस के बावजूद ऐसे लोगों पर पुलिस  कोई कार्यवाही नहीं करती है, क्योंकि ऐसी हरकत करने वाले ज्यादातर दबंग लोग होते हैं, जिन की मोटी गरदन तक पुलिस वालों का पहुंचना नामुमकिन है.’’

पिछले दिनों राजस्थान विधानसभा में निर्दलीय विधायक हनुमान बेनीवाल ने यह सवाल उठाया था कि क्या सरकार ने यह पता लगाने की कोशिश की है कि पिछले 2 साल के भाजपा सरकार के राज में डायन के नाम पर कितनी औरतों की हत्याएं की गई हैं?

इस के जवाब में तिलकधारी हठीले गृह मंत्री गुलाबचंद कटारिया ने बताया कि सरकार ने ऐसा कोई सर्वे नहीं कराया है. अलबत्ता, राज्य अपराध रिकौर्ड ब्यूरो के पास मौजूद सूचना के मुताबिक, साल 2015 के दौरान प्रदेश में जादूटोने की वजह से 126 औरतों की हत्याएं हुई हैं.

डूंगरपुर जिले के एक गांव संग्रामपुरा में 6 साल के बच्चे जितेश की बलि देने वाली घटना कई सवाल खड़े करती है. जितेश की हत्या करने वाले 16-17 साल की उम्र के किशोर थे. हत्या के पहले सिर का मुंडन व दूसरे कर्मकांड किए गए थे.

ऐसे में यह सवाल उठना लाजिम है कि कम उम्र के किशोर एक मासूम की बलि चढ़ा कर आखिर क्या हासिल करना चाहते थे और कम उम्र के इन किशोरों ने यह सब कहां से सीखा?

उदयपुर के रहने वाले रामेश्वर प्रजापत की बीवी सुनीता अकसर पेट के दर्द से परेशान रहती थी. एक दिन सुनीता ने एक साधु को अपनी तकलीफ बताई. साधु ने उसे खाने के लिए चुटकीभर भभूत दी.

भभूत खाते ही सुनीता की हालत बिगड़ने लगी. आननफानन उसे अस्पताल में भरती कराया गया, जहां उस की मौत हो गई. बीकानेर के पुरानी बस्ती इलाके में गरीबी और बीमारी से तंग मनभरी देवी के घर 2 पंडे पहुंचे और उन्होंने बताया, ‘घर के भीतर जमीन में खजाना छिपा है, लेकिन उसे निकालने से पहले जरूरी पूजा करानी होगी और जब तक काम पूरा नहीं हो जाता, तब तक यह बात किसी को नहीं बताई जाए.’

मनभरी देवी ने ऐसा ही किया. 5 हजार रुपए खर्च कर के उस ने बताई गई सामग्री मंगाई और 21 सौ रुपए पंडों को दिए. हवन के दौरान निकले धुएं से मनभरी के दोनों बच्चे बेहोश हो गए. उधर पंडे सारा सामान ले कर फरार हो गए.

पाखंडी पंडेपुजारी व तांत्रिक दावा करते हैं कि बलि देने से जादुई ताकत हासिल की जा सकती है. इस के बारे में हिंदू धर्मग्रंथों में भी लिखा गया है.

किसी जमाने में राजस्थान के करौली, अलवर, भानगढ़ व अजबगढ़ के आसपास का इलाका जादूटोने के लिए बदनाम था, पर अब वहां के हालात में सुधार आया है. दूसरी तरफ प्रदेश के आदिवासी व पिछड़े जिलों में लोगों की सोच आज भी अंधविश्वास से छूट नहीं पाई है. अमूमन अंधविश्वास की बुनियाद पर उपजी घटनाओं को ‘चमत्कार’ का जामा पहना दिया जाता है.

इस बारे में डाक्टर सतीश सेहरा ने बताया, ‘‘समाज और धर्म के धंधेबाज अंधविश्वास को खाद व पानी दे कर सींचने का ही काम कर रहे हैं. वे धर्म की आड़ ले कर किसी औरत को डायन बता कर मारना व बाल विवाह तक की पैरवी करते रहते हैं.’’

इन रूढि़यों, कुप्रथाओं, पाखंड, अंधविश्वास व तंत्रमंत्र के जंजाल को काटने के लिए बड़े पैमाने पर लोगों को जगाने की जरूरत है. कानून को सख्ती के साथ लागू करने के साथ ही लोगों की सोच में बदलाव लाने की भी जरूरत है.

जब इनसान निराशा व हताशा के गहरे अंधेरे में डूब जाता है, तो वह इन चमत्कारी नतीजों के ख्वाब देखने लगता है. इस का नाजायज फायदा उठाने के लिए हर जगह पेशेवर मतलबी लोग मौजूद रहते हैं.

टौपलेस होकर अमेरिकी मौडल ने किया ये कारनामा

पिज्जा डिलीवरी का काम आसान नहीं होता है, डिलीवरी में अगर थोड़ा सा भी लेट हो जाएं तो कस्‍टमर्स की डांट से लेकर रेस्‍त्रां ऑनर की खरीखोटी तक सुनने को मिलता है. सुबह से शाम तक के भागमभाग वाले शेड्यूल में 2 मिनट का भी आराम नहीं होता है. लेकिन इन दिनों सोशल मीडिया में एक वीडियो वायरल हो रहा है जिसमें अमेरिका की कुछ मॉडल्‍स ने पिज्‍जा ब्‍वॉय के साथ मिलकर ऐसी शरारत की जिनके बारे में आपको सुनकर शर्म आ जाएं. आइए जानते है इस पूरे मामले के बारे में जो सोशल मीडिया में आग की तरह वायरल हो रहा हैं.

टॉपलेस मॉडल का मजाक

टॉपलेस मॉडलों ने पिज्जा डिलीवरी करने आए लड़कों के साथ अजीबोगरीब मजाक किया. मॉडल जैसे ही पिज्जा डिलीवरी लेने आई उसका टॉवल खिसक गया. जिसे देखकर पिज्जा लेकर आए लड़कों का चेहरा शर्म से भर गया. कोई शर्म से अपनी नजरें चुरा रहा था तो कोई छुपी हुई निगाहों से उसे देखता रहा.

पिज्जा डिलीवरी ब्वॉय के सामने गिरा टॉवल

वीडियो में देखा जा सकता है कि जैसे ही पिज्जा डिलीवरी ब्वॉय दरवाजे पर लगी घंटी बजाता, टॉवल पहने लड़की दरवाजा खोलती और जानबूझकर अपना टॉवल गिरा देती है. ऐसा वो हर डिलीवरी ब्वॉय के ऐसा ही करती है और उनके सामने टॉपलेस हो जाती है. दरअसल अमेरिकन मॉडल्‍स ने एक प्रैंक वीडियो बनाने के मकसद से ऐसा किया था.

बिना कपड़ों के थी मॉडल

मॉडल के साथ उसकी दो और सहेलियां भी थी, जो बिकनी में थी और टॉपलेस मॉडल के साथ लड़कों को शर्मसार कर रही थी. टॉवल पहने लड़की दरवाजा खोलने के साथ जैसे ही डिलीवरी लेती अपने टॉवल को छोड़ देती थी. जिसके बाद वो उसकी दोनों सहेलियां भी वहां पहुंच जाती हैं और डिलीवरी ब्वॉय का मजाक उड़ाती है.

सोशल मीडिया पर वायरल हुआ वीडियो

एक अमेरिकी वेबसाइट ने इस प्रैंक वीडियो को रिकॉर्ड किया है. जिसमें टॉपलेस लड़की के सामने युवकों के रिएक्शन को रिकॉर्ड करना था. इस वीडियो को अब तक 8.3 मिलियन लोगों ने देखा है.

आप भी देखें वीडियो…

अब रेंपवॉक करती नजर नहीं आएंगी बहुत पतली और स्कीनी मॉडल्‍स

फ्रांस जिसे फैशन वर्ल्‍ड माना जाता है. पेरिस फैशन वीक जहां हर मॉडल का सपना होता है कि वो इस इवेंट के लिए रैम्‍प वॉक करें. फ्रांस की मॉडल्‍स को दुनिया की सबसे सुंदर और बेहतरीन मॉडल्‍स माना जाता है. पेरिस में मॉडलिंग करने के लिए सुंदरता का अलग ही पैमाना तय कर रखा है. जितनी ज्‍यादा पतली मॉडल उतनी ही ज्‍यादा आकर्षक. सुंदरता के इस कसौटी पर खुद को खरा उतारने के लिए मॉडल्‍स अपने आप को बहुत ही ज्‍यादा पतली बनाई रखती है.

दुबले बनाए रखने की वजह से वो महीनों महीनों खाने से दूर रहती है और तरह तरह की दवाईयों का सेवन करती है. जिस वजह से वो अवसाद की शिकार हो जाती है.

इसलिए मॉडल्‍स के स्‍वास्‍थ्‍य को देखते हुए फ्रांस की सरकार ने नया कानून बनाया जिसके तहत अब बहुत ही ज्‍यादा पतली और स्किनी लड़कियां मॉडलिंग नहीं कर पाएंगी . मॉडलिंग करने के लिए उन्‍हें मेडिकल वैरिफिकेशन करवाना होगा.

डॉक्‍टर का सेटिफिकेट

जरुरी मॉडल बनने के लिए अब लड़कियों को डॉक्‍टर से मेडिकल वैरिफिकेशन करवाना होगा. मॉडल्स को अपनी सेहत के बारे में डॉक्टर का प्रमाणपत्र दिखाना होगा. इसमें उनके बॉडी मास इंडेक्स (बीएमआई) की जानकारी भी रहेगी. बीएमआइ लंबाई और वजन के अनुपात के आधार पर निकाला जाता है. जरूरत से ज्यादा पतली मॉडल्स को फैशन इवेंट में पार्टीसिपेट करने का मौका नहीं मिलेगा.

इसलिए पड़ी इस कानून की जरुरत

ऐसा एनोरेक्सिया नामक एक बीमारी से बचाने के लिए किया गया है. फ्रांस में 30 से 40 हजार तक लोग एनोरेक्सिया नामक बीमारी से ग्रसित है. जिसमें से 90 प्रतिशत संख्‍या औरतों की हैं. एनोरेक्सिया एक ईटिंग डिसऑर्डर है. इसमें भूख लगने पर भी मरीज खाना नही खाता क्योंकि उसे वजन बढ़ जाने का डर सताता रहता है. एनोरेक्सिया से पीड़ित लोग खाने से दूर भागते हैं. वजन ज्यादा न होने पर भी वे अपने आप को खाने से दूर रखते है. सही समय पर इलाज न मिलने से एनोरेक्सिया जानलेवा साबित हो जाती है.

फ्रेंच मॉडल ने की थी शुरुआत

इस डिसऑर्डर को सबसे पहले फ्रेंच फैशन मॉडल ईजाबेल कारो सबके सामने लाई थी. वो इस बीमारी से जूझ रही थी. इसलिए अपनी स्किनी बॉडी के साथ उन्‍होंने एक फोटो शूट करके एंटी एनोरेक्यिा कैम्‍पेन की शुरुआत की और सरकार का इस मुद्दे की तरफ ध्‍यान खींचा. लोगों को खासकर मॉडल्‍स को अवेयर करते हुए 2010 में सिर्फ 28 साल की उम्र में मर गई थी.

फोटोशॉप करने पर भी पाबंदी

अगर कोई फैशन हाउस या कोई कंपनी किसी मॉडल्‍स की फोटो को एडिट या फोटोशॉप करके मॉडल्‍स को पतला दिखाना चाहता है तो उसके लिए फोटो के नीचे एक जगह “touched up” या edited लिखना होगा.

75 हजार यूरो तक देना पड़ सकता है हर्जाना

अगर कोई फैशन हाउस किसी पतली या दुबली मॉडल के साथ काम करता है तो सरकार की नजर में आने के बाद उस मॉडल और फैशन हाउस को 63 हजार 500 से लेकर 75 हजार यूरो तक जुर्माना देना पड़ सकता है. इसके अलावा कंपनी के मालिक को 6 महीनें तक की जेल भी हो सकती है.

फ्रांस ही नही इन देशों ने भी कर रखा है बैन

फ्रांस इकलौता ऐसा देश नहीं है जिसने ऐसी पहल की है. इससे पहले इटली, स्‍पेन और इजराइल भी ऐसा कानून पारित कर चुके हैं.

 

 

 

 

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें