अनुपमा होगी शाह हाउस की नई मालकिन! आएगा ये बड़ा ट्विस्ट

टीवी सीरियल अनुपमा में इन दिनों लगातार बड़ा ट्विस्ट देखने को मिल रहा है. शो में अब तक आपने देखा कि काव्या शाह परिवार को बर्बाद करना चाहती है. ऐसे में वह चाल चलने में कामयाब होती दिखाई दे रही है लेकिन शो के आने वाले एपिसोड में काव्या का गेम उसी पर भारी पड़ने वाला है. आइए बताते हैं शो के अपकमिंग एपिसोड के बारे में.

शो में दिखाया जा रहा है कि काव्या शाह हाउस पर राज करना चाहती है. वह इसके लिए गेम प्लान करती नजर आ रही है. शो में आप देखेंगे कि काव्या अपने नाम पर शाह हाउस करा लेती है. और वह अनुज के करीबी दोस्त को बेच देती है.

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अनुज, अनुपमा को इस बारे में बताएगा तो उसके पैरों तले जमीन खिसक जाएंगे. लेकिन वह कुछ नहीं कर पाएगी.

 

तो दूसरी तरफ अनुज अपने दोस्त को शाह हाउस खरीदने के लिए कहेगा. शो के अपकमिंग एपिसोड में बड़ा ट्विस्ट देखने को मिलेगा.  रिपोर्ट के अनुसार अनुपमा शाह हाउस की मालकिन बनेगी. ऐसे में कहानी का एंगल पूरी तरह बदल जाएगा.

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शो में आप ये भी देखेंगे कि समर नंदिनी से कहेगा कि वह शुरू से चाहता था कि अनुपमा के जीवन में कोई खास हो, जो उसे सपोर्ट करे, उसका सम्मान करे. समर कहता है कि अनुज वो खास हो सकता है. शो में ये देखना दिलचस्प होगा कि समर कैसे अनुपमा-अनुज को एक करता है.

 

Crime Story: पति पत्नी का परायापन

लेखक- प्रफुल्लचंद्र सिंह

पीं.इसी प्रयास में शारदा प्रसाद मिश्रा नाम के व्यक्ति से बात हुई. उस ने बताया कि यह नंबर उस के भाई पंकज मिश्रा का है जो नोएडा के भंगेल गांव में रहता है. पुलिस ने उसे अस्पताल बुला लिया ताकि लाश की शिनाख्त हो सके. शारदा प्रसाद अस्पताल पहुंच गया. पुलिस ने जब उसे उस युवक की लाश दिखाई तो उस ने उस की शिनाख्त अपने छोटे भाई पंकज मिश्रा के तौर पर कर दी. उस ने पूछताछ के दौरान थानाप्रभारी भुवनेश कुमार को बताया कि पंकज जेपी कौसमोस सोसायटी में इलैक्ट्रिशियन का काम करता था और घटना के समय अपने काम पर जा रहा था. शिनाख्त हो जाने के बाद लाश पोस्टमार्टम के लिए राजकीय अस्पताल भेज दी गई.

इस के बाद थानाप्रभारी भुवनेश कुमार फिर से वारदात वाली जगह सेक्टर-132 पहुंचे. उन्होंने आसपास के लोगों से पूछताछ की तो कुछ लोगों ने बताया कि बाइक सवार 2 लोगों ने साइकिल सवार एक युवक को गोली मारी थी.

थानाप्रभारी भुवनेश कुमार ने शारदा प्रसाद मिश्रा की शिकायत पर अज्ञात हत्यारों के खिलाफ पंकज मिश्रा की हत्या का मामला दर्ज कर लिया. एसएसपी वैभवकृष्ण के निर्देश पर थानाप्रभारी भुवनेश कुमार टीम के साथ केस की जांच करने में जुट गए.

पुलिस ने शुरू की जांचपड़ताल

केस की गुत्थी सुलझाने के लिए उन्होंने जांचपड़ताल शुरू की. क्योंकि बदमाशों ने उस से किसी प्रकार की लूटपाट नहीं की थी, इसलिए इस संभावना को बल मिल रहा था कि शायद पंकज से किसी की कोई पुरानी रंजिश रही होगी, जिस के कारण मौका ताड़ कर उसे मौत के घाट उतार दिया गया.

पंकज भंगेल में एक किराए के मकान में रहता था. थानाप्रभारी पूछताछ के लिए उस के घर पर पहुंच गए. घर पर मृतक पंकज की पत्नी शैली मिश्रा मिली. थानाप्रभारी ने शैली मिश्रा से पंकज की दुश्मनी के बारे में पूछा तो उस ने किसी भी व्यक्ति के साथ रंजिश से साफ इनकार कर दिया.

मृतक के भाई शरदा प्रसाद मिश्रा से भी किसी से रंजिश आदि के बारे में पूछा गया. उस ने भी ऐसी किसी दुश्मनी से अनभिज्ञता जाहिर की. यह सब देख कर पुलिस ने हत्यारों तक पहुंचने के लिए अन्य संभावित कारणों के बारे में जांचपड़ताल की.

मृतक पंकज की पत्नी शैली मिश्रा से थानाप्रभारी ने और भी कई तरह के सवाल किए तो उस के बयानों में कुछ विरोधाभास मिला. इस पर पुलिस ने पंकज और शैली मिश्रा के मोबाइल फोन की काल डिटेल्स निकलवा कर गहन जांचपड़ताल की. पता चला कि शैली मिश्रा की एक मोबाइल नंबर पर अकसर बातें होती थीं.

जब उस मोबाइल नंबर की भी काल डिटेल्स निकलवाई गई तो वह सुरेश सिधवानी नाम के एक युवक का निकला जो नोएडा के सेक्टर-82 में रहता था. पुलिस ने शैली से कुछ नहीं कहा, बल्कि सुरेश सिधवानी को पूछताछ के लिए उस के घर से उठा लिया. थाने में उससे सख्ती से उस के और शैली मिश्रा के बारे में पूछा गया तो उस ने सारा सच उगल दिया.

उस ने बताया कि पिछले 2 सालों से उस के और शैली मिश्रा के बीच गहरी दोस्ती है, जो अवैध संबंधों में बदल गई थी. उस ने और शैली ने योजना बना कर पंकज को रास्ते से हटाया है.

इस के बाद पुलिस ने शैली मिश्रा को भी भंगेल स्थित उस के घर से गिरफ्तार कर लिया. वहां उस ने पहले से हिरासत में लिए गए सुरेश सिधवानी को देखा तो उस के चेहरे का रंग उतर गया. अब उस के सामने सच बोलने के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं था. लिहाजा पूछताछ में शैली ने भी स्वीकार कर लिया कि पंकज की हत्या उसी के इशारे पर की गई थी.

दोनों से विस्तार से पूछताछ करने पर पंकज की हत्या की जो कहानी सामने आई, इस प्रकार निकली—मूलरूप से उत्तर प्रदेश के जिला अयोध्या का रहने वाला पंकज मिश्रा पिछले कई सालों से अपनी पत्नी शैली और 7 साल के बेटे के साथ नोएडा के भंगेल गांव में रह रहा था. वह जेपी कौसमोस सोसायटी में इलैक्ट्रिशियन का काम करता था. वहां से उसे जो तनख्वाह मिलती थी, उस से उस के परिवार का गुजारा मुश्किल से हो पाता था.

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घरगृहस्थी चलाने में आ रही दुश्वारियों से दोनों हमेशा परेशान रहते थे. शैली सुंदर होने के साथसाथ कुछ पढ़ीलिखी भी थी. उस ने सोचा कि बेटे को स्कूल छोड़ने के बाद वह दिन भर घर में अकेली पड़ीपड़ी बोर होती रहती है, इसलिए उसे कहीं पर दिन की नौकरी मिल जाए तो काफी कुछ दुश्वारियां कम हो जाएंगी.

घर से निकलने पर बहक गई शैली

उस दिन जब पंकज अपनी ड्यूटी करने के बाद घर लौटा तो शैली ने उस से अपने मन की बात कही. शैली की बात सुन कर पंकज सोच में डूब गया. उस का दिल इस बात की गवाही नहीं दे रहा था कि शैली घर की दहलीज लांघ कर कहीं नौकरी करने जाए.

लेकिन घर की परिस्थितियां इस बात की ओर इशारा कर रही थीं कि उस की तनख्वाह में घर बड़ी मुश्किलों से चलता है. कई बार मुश्किलें आने पर उसे अपनी जानपहचान वालों से रुपए उधार मांगने पड़ते हैं, जिन्हें बाद में चुकाना भी काफी कठिन हो जाता है.

शैली को एकटक देखते हुए उस ने कहा, ‘‘शैली, मैं चाहता तो नहीं हूं कि तुम कहीं काम करो, लेकिन हालात को देखते हुए तुम से नौकरी करने के लिए कहना पड़ रहा है. अगर तुम्हें नौकरी करनी ही है तो कहीं पास में ही नौकरी तलाश करो.’’पति को चिंतित देख शैली ने उसे तसल्ली देते हुए कहा, ‘‘तुम मेरी चिंता मत करो, अपना अच्छाबुरा मैं अच्छी तरह जानती हूं.’’

इस के बाद वह अगले दिन से ही अपने लिए नौकरी की तलाश में जुट गई. थोड़ी कोशिश के बाद उसे एक बिल्डर के यहां नौकरी मिल गई. अब वह भी नौकरी पर जाने लगी. पत्नी के नौकरी करने से पंकज की आर्थिक स्थिति ठीक होने लगी. पैसे आए तो दोनों के चेहरों पर खुशी की लाली थिरकने लगी.

कुछ महीने तक तो पंकज के घर में सब कुछ ठीक था, परंतु एक साल गुजरने के बाद शैली के रंगढंग में काफी कुछ बदलाव आ गया. उस के रहनसहन और पहनावे को देख कर लगता था कि वह मौडर्न घराने से ताल्लुक रखती है.

औफिस से घर आने में वह कई बार लेट भी हो जाती थी. पंकज ने इस दौरान महसूस किया था कि शैली की चालढाल अब वैसी नहीं रही जैसी पहले थी. अब उस के पास महंगा मोबाइल फोन आ गया था, जिस पर वह हमेशा व्यस्त रहती थी. एक दिन पंकज शैली के मोबाइल का वाट्सऐप देख रहा था. उसे वहां कुछ ऐसे फोटो देखने को मिले, जिस में वह एक अपरिचित आदमी के साथ काफी खुश नजर आ रही थी. उस फोटो के बारे में पूछने के लिए पंकज ने शैली को अपने पास बुलाया तो उस के चेहरे की रंगत उड़ गई.

वह कहने लगी कि यह औफिस में ही काम करने वाला व्यक्ति है. मगर पंकज को उस की बातों पर विश्वास नहीं हुआ. इस के बाद उन दोनों के बीच किसी न किसी बात को ले कर नोकझोंक होने लगी. अब तक पंकज को पूरी तरह यकीन हो गया था कि शैली फोटो में जिस व्यक्ति के साथ है, उस से उस के अवैध संबंध होंगे.

एक दिन तो हद ही हो गई. उस रात शैली देर से घर लौटी थी. पंकज ने उस पर आरोप लगाया कि वह अपने प्रेमी के साथ गुलछर्रे उड़ा रही होगी, तभी घर आने में देर हो गई. पंकज ने उस समय उसे काफी भलाबुरा कहा था. शैली भी कहां चुप रहने वाली थी. उस ने भी कह दिया कि तुम मेरे ऊपर इतना शक करते हो तो मुझे तलाक दे दो. मेरी तुम्हारे साथ अब नहीं निभ सकती.

शैली की बात सुन कर पंकज सन्न रह गया. उसे उम्मीद नहीं थी कि शैली कभी उसे छोड़ कर सदा के लिए उस से दूर जाने का इरादा बना लेगी. लड़झगड़ कर उस रात दोनों सो गए. लेकिन उस दिन के बाद शैली हर 2-4 दिनों के बाद पंकज से तलाक ले कर अलग रहने पर दबाव बनाने लगी.

सुरेश सिधवानी से हो गए संबंध

दरअसल, शैली जहां नौकरी करती थी, उस की बगल में सेक्टर-82 निवासी सुरेश सिधवानी की दुकान थी. सुरेश सिधवानी मूलरूप से राजस्थान का रहने वाला था. वह शादीशुदा था लेकिन अपनी पत्नी से अधिक शैली को प्यार करता था. जब उस की पत्नी को शैली के साथ उस के अवैध संबंधों की जानकारी हुई तो उस ने उसे रोकने की कोशिश की.

लेकिन सुरेश सिधवानी के सिर पर शैली के इश्क का भूल चढ़ा था, इसलिए उस ने पत्नी की बात एक कान से सुन कर दूसरे से निकाल दी. आखिर वह सुरेश को छोड़ कर चली गई.

पत्नी के घर छोड़ चले जाने के बाद सुरेश ने शैली को अपने पति से तलाक लेने पर जोर डालना शुरू कर दिया, ताकि दोनों हमेशा के लिए एक हो कर रह सकें. लेकिन पंकज मिश्रा इस के लिए राजी नहीं हुआ. उसे अपने बेटे और खानदान की इज्जत अधिक प्यारी थी.

जब शैली को लगा कि पंकज उसे तलाक नहीं देगा तब उस ने सुरेश से कहा, ‘‘सुरेश, अगर तुम मुझे सच में प्यार करते हो और हमेशा के लिए अपना बनाना चाहते हो तो पहले पंकज को खत्म करना होगा.’’

सुरेश भी यही चाहता था, इसलिए उस ने कहा कि तुम अब परेशान मत होना, मैं इस का इंतजाम कर दूंगा.

सुरेश सिधवानी के पास नगला चरणजीतदास का रहने वाला मोटर मैकेनिक इंद्रजीत आता रहता था. वह उस का विश्वासपात्र भी था. सुरेश ने पंकज की हत्या के बारे में उस से बात की. साथ ही यह भी कहा कि इस काम के एवज में वह उसे 10 लाख रुपए देगा.

हत्या की दे दी सुपारी

इतनी बड़ी रकम के लालच में इंद्रजीत तैयार हो गया. उस ने पंकज की हत्या करने के लिए 50 हजार रुपए की पेशगी भी ले ली.

पंकज की हत्या करने की सुपारी लेने के बाद इंद्रजीत इस काम के लिए अपने दोस्त ककराला फेज-2 निवासी मोनू से मिला. उस ने मोनू से सारी बात तय कर के उसे .32 बोर की एक पिस्तौल तथा 3 गोलियां सौंप दीं.

मोनू ने गेझा, नोएडा निवासी अपने दोस्त सूरज तंवर को अपने साथ लिया. इस के बाद वे सभी पंकज की रेकी करने लगे. उन्होंने पता लगा लिया कि पंकज अपनी ड्यूटी के लिए किस रास्ते से आताजाता है. पूरी योजना बनाने के बाद 20 जून, 2019 को ये लोग पंकज का पीछा करने लगे. जैसे ही पंकज एक सुनसान जगह पर पहुंचा तो उसे रोकने के बाद गोली मार दी, जिस से घटनास्थल पर ही पंकज की मृत्यु हो गई.

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पुलिस ने उन दोनों से पूछताछ के बाद इंद्रजीत, मोनू और सूरज को भी गिरफ्तार कर लिया. उन की निशानदेही पर वारदात में इस्तेमाल पिस्तौल और बिना नंबर प्लेट वाली मोटरसाइकिल भी बरामद हो गई.

थानाप्रभारी भुवनेश कुमार ने पंकज हत्याकांड के पांचों आरोपियों सुरेश सिधवानी, शैली मिश्रा, इंद्रजीत, मोनू और सूरज तंवर को गौतमबुद्धनगर की अदालत में पेश किया, जहां से सभी को न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया.

सूरज तंवर की उम्र 19 साल है और वह गेझा गांव के स्कूल में 12वीं का छात्र है. वह अपनी गर्लफ्रैंड की जरूरतों को पूरा करने के लालच में इस हत्याकांड में शामिल हुआ था. पंकज की हत्या और शैली मिश्रा के जेल चले जाने के बाद पंकज का 7 वर्षीय बेटा अपने चाचा के पास था.

बस एक सनम चाहिए- भाग 1: शादी के बाद भी तनु ने गैर मर्द से क्यों रखा रिश्ता

‘‘सांसों की जरूरत है जैसे जिंदगी के लिए, बस एक सनम चाहिए आशिकी के लिए…’’ एफएम पर बजते ‘आशिकी’ फिल्म के इस गाने ने मुझे बरबस ही तनु की याद दिला दी. वह जब भी किसी नए रिश्ते में पड़ती थी, तो यह गाना गुनगुनाती थी.मनचली… तितली… फुलझड़ी… और भी न जाने किनकिन नामों से बुलाया करते थे लोग उसे…मगर वह तो जैसे चिकना घड़ा थी. किसी भी कमैंट का कोई असर नहीं पड़ता था उस पर. अपनी शर्तों पर, अपने मनमुताबिक जीने वाली तनु लोगों को रहस्यमयी लगती थी. मगर मैं जानती थी कि वह एक खुली किताब की तरह है. बस उसे पढ़ने और समझने के लिए थोड़े धीरज की जरूरत है.

वह कहते हैं न कि अच्छे दोस्त और अच्छी किताबें जरा देर से समझ में आते हैं…तनु के बारे में भी यही कहा जा सकता है कि वह जरा देर से समझ आती है. तनु मेरी बचपन की सहेली थी. स्कूल से ले कर कालेज और उस के बाद उस के जौब करने तक… मैं उस के हर राज की हमराज थी. पता नहीं कितनी चाहतें, कितने अरमान भरे थे उस के दिल के छोटे से आसमान में कि हर बार अपनी ही उड़ान से ऊपर उड़ने की ख्वाहिशें पलती रहती थीं उस के भीतर. वह जिस मुकाम को हासिल कर लेती थी वह तुच्छ हो जाता था उस के लिए. कभीकभी तो मैं भी नहीं समझ पाती थी कि आखिर यह लड़की क्या पाना चाहती है. इस की मंजिल आखिर कहां है?

8वीं क्लास में जब पहली बार उस ने मुझे बताया कि उसे हमारे क्लासमेट रवि से प्यार हो गया है तो मेरी समझ ही नहीं आया था कि मैं कैसे रिएक्ट करूं. तनु ने बताया कि रवि के साथ बातें करना, खेलना, मस्ती करना उसे बहुत भाता है. तब तो हम शायद प्यार के माने भी ठीक ढंग से नहीं जानते थे. फिर भी न जाने किस तलाश में वह पागल लड़की उस अनजान रास्ते पर आगे बढ़ती ही जा रही थी.

एक दिन रवि का लिखा एक लव लैटर उस ने मुझे दिखाया तो मैं डर गई. बोली, ‘‘फाड़ कर फेंक दे इसे…कहीं सर के हाथ लग गया तो तुम दोनों की खैर नहीं,’’ मैं ने उसे समझाते हुए उस की सहेली होने का अपना फर्ज निभाया.

‘‘अरे, कुछ नहीं यार… लाइफ में एक जिगरी यार तो होना ही चाहिए न. बस एक सनम चाहिए. आशिकी के लिए…’’ उस ने गुनगुनाते हुए कहा. ‘‘तो क्या मैं तुम्हारी जिगरी नहीं?’’ मैं ने तुनक कर पूछा.

‘‘तुम समझी नहीं. जिगरी यार से मेरा मतलब एक ऐसे दोस्त से है जो मुझे बहुत प्यार करे. सिर्फ प्यार… तुम तो सहेली हो. यार नहीं…’’ तनु ने मुझ नासमझ को समझाया. फिर एक दिन तैश में आते हुए बोली, ‘‘आई हेट रवि.’’

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मैं ने कारण पूछा तो उस ने बताया कि आज सुबह गेम्स पीरियड में बैडमिंटन कोर्ट में रवि ने उसे किस करने की कोशिश की. मैं ने कहा, ‘‘तुम ही तो प्यार करने वाला जिगरी यार चाहती

थी न?’’ सुनते ही बिफर गई तनु. बोली, ‘‘हां, चाहती थी प्यार करने वाला. मगर तभी जब उस में मेरी मरजी शामिल हो. बिना मेरी सहमती के कोई मुझे छू नहीं सकता.’’ कहते हुए उस ने रवि के लिखे सारे लव लैटर्स फाड़ कर डस्टबिन के हवाले कर दिए और लापरवाही से हाथ झटक लिए.

‘‘उम्र मात्र 14 वर्ष और ये तेवर?’’ मैं डर गई थी. 9वीं क्लास में हम दोनों ने कोऐजुकेशन छोड़ कर गर्ल्स स्कूल में ऐडमिशन ले लिया. स्कूल हमारे घर से ज्यादा दूर नहीं था, इसलिए हम सब सहेलियां साइकिल से स्कूल जाती थीं. 10वीं कक्षा तक आतेआते एक दिन उस ने मुझ से कहा, ‘‘स्कूल जाते समय रास्ते में अकसर एक लड़का हमें क्रौस करता है और वह मुझे बहुत अच्छा लगता है. लगता है मुझे फिर से प्यार हो गया…’’

मैं ने उसे एक बार फिर आग से न खेलने की सलाह दी. मगर वह अपने दिल के सिवा कहां किसी और की सुनती थी जो मेरी सुनती. अब तो स्कूल आतेजाते अनायास ही मेरा ध्यान भी उस लड़के की तरफ जाने लगा. मैं ने नोटिस किया कि आमनेसामने क्रौस करते समय तनु उस लड़के की तरफ भरपूर निगाहों से देखती है. वह लड़का भी प्यार भरी नजरें उस पर डालता है. स्कूल के मेन गेट में घुसने से पहले एक आखिरी बार तनु पीछे मुड़ कर देखती थी और फिर वह लड़का वहां से चला जाता था.

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Satyakatha: Sex Toys का स्वीट सीक्रेट

‘दूसरे देशों में सैक्स टौयज की दुकानें काफी तड़कभड़क वाली होती हैं, लेकिन हम ने अपनी दुकान कोसादा रखा है,’ नीरव मेहता बताते हैं, ‘हमारी दुकान के ग्राहक हमेशा जल्दी में रहते हैं इसलिए हम ने दुकान में कुरसी तक नहीं रखी है. लेकिन हम ने जानबूझ कर इसे आकर्षक या अंधेरे भूमिगत काल कोठरी की तरह नहीं बनाया है. हम ने इसे मैडिकल स्टोर की तरह बनाया और हमारे सभी सर्टिफिकेट दीवार पर टंगे हुए हैं. ऐसा हम ने किसी भी तरह के राजनैतिक विरोध से बचने के लिए किया है.’

यहां बात देश के मशहूर पर्यटन स्थल गोवा की हो रही है, जहां देश की पहली लीगल औनलाइन सैक्स टौयज की दुकान खुली है जिस का नाम है ‘ब्रिक एंड मोर्टार’. इस की लांचिंग बीती 14 फरवरी यानी वैलेंटाइंस डे पर हुई थी.

ऐसा नहीं है कि देश में सैक्स टौयज नहीं बिकते हों, लेकिन अभी वे चोरीछिपे गुमनाम दुकानों से बिक रहे हैं. मानो सैक्स टौय न हुए एके 47 जैसे हथियार हों.

नीरव ने प्रशासन से अनुमति ले कर दुकान खोल कर एक राह देश भर के बेचने वालों को दिखा दी है कि सैक्स टौयज की बढ़ती मांग को वे कानूनी रूप से दुकान खोल कर भी पूरा कर सकते हैं.

भारतीय समाज में सैक्स शिक्षा तो दूर की बात है सैक्स की चर्चा को भी वर्जित माना गया है, पर अब वक्त बदल रहा है, समाज बदल रहा है इसलिए सैक्स टौयज की मांग भी बढ़ रही है.

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लौकडाउन के दौरान जब लोग घरों में कैद थे, तब सैक्स टौयज की मांग हैरतंगेज तरीके से 65 फीसदी तक बढ़ी थी. लोग अपने पार्टनर तक नहीं पहुंच पा रहे थे और सैक्स की तलब जिन्हें सता रही थी, उन्होंने खूब औनलाइन सैक्स टौयज मंगा कर सैक्स को एंजौय किया था.

दैट्स पर्सनल डौट काम की एक विश्लेषण रिपोर्ट में विस्तार से इस का खुलासा किया गया था, जिस में बताया गया था कि सब से ज्यादा सैक्स टौयज महाराष्ट्र के लोग खरीदते हैं.

दूसरा नंबर कर्नाटक और तीसरा तमिलनाडु का है. बड़े शहरों में मुंबई के लोग सब से ज्यादा सैक्स टौय खरीदते हैं दूसरे और तीसरे नंबर पर दिल्ली और बेंगलुरु आते हैं.

इस विश्लेषण की एक चौंका देने वाली बात उत्तर प्रदेश के पुरुषों द्वारा सब से ज्यादा सैक्स टौयज खरीदने की रही. इस सर्वे के मुताबिक महिलाओं की खरीदारी का पसंदीदा वक्त दोपहर 12 से 3 बजे तक और पुरुषों का रात 9 बजे के बाद का है.

सैक्स टौयज सब से ज्यादा 25 से 34 साल के बीच की उम्र के लोग खरीदते हैं, लेकिन इन्हें बेचने वाली वेबसाइट्स पर ज्यादा वक्त गुजारने वाले लोग 18 से 25 साल के बीच की उम्र के हैं. सर्वे के एक दिलचस्प खुलासे के मुताबिक सैक्स प्रोडक्ट्स से 33 फीसदी शादियां टूटने से बची हैं.

दैट्स पर्सनल डौट काम के सीईओ समीर सरैया की मानें तो इन उत्पादों का बाजार तेजी से बढ़ रहा है क्योंकि लोग झिझक छोड़ रहे हैं और प्रयोग करने व नए उत्पादों को आजमाने के लिए उत्साहित हैं.

ऐसा भी नहीं है कि बड़ी तादाद में पुरुष ही सैक्स टौयज खरीदते हों बल्कि महिलाएं भी पीछे नहीं हैं. विजयवाड़ा, वड़ोदरा , बेलगाम और जमशेदपुर जैसे शहरों में महिलाएं पुरुषों से ज्यादा सैक्स टौयज खरीदती हैं. लौकडाउन के दौरान छोटे शहरों में भी सैक्स सुख देने वाले इन खिलौनों की बिक्री बढ़ी थी.

इन शहरों में शिलांग, पानीपत, भटिंडा, हरिद्वार, पणजी, राउरकेला और डिब्रूगढ़ प्रमुखता से शामिल हैं. औनलाइन खरीदारी में 66 फीसदी पुरुष और 34 फीसदी महिलाएं थीं. महिलाओं ने ज्यादातर मसाजर का और्डर दिया तो पुरुषों ने मेल पंप मंगाया.

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इस सर्वे के मुताबिक सैक्स टौय इस्तेमाल करने वाले 86 फीसदी पुरुषों ने पूर्ण संतुष्टि मिलने की बात स्वीकारी. जबकि ऐसी महिलाओं का प्रतिशत 89 था, जिन्होंने सैक्स टौय के इस्तेमाल से संतुष्टि के साथसाथ आर्गेज्म को भी महसूस किया.

पुरुषों को ले कर दिलचस्प बात यह सामने आई कि खुद हस्तमैथुन करने से संतुष्ट पुरुषों की तादाद 54 फीसदी थी, लेकिन जब हस्तमैथुन सैक्स टौय के जरिए किया गया तो 71 फीसदी को संतुष्टि मिली. महिलाओं में तो यह अनुपात हैरतंगेज तरीके से बड़ा पाया गया. बिना सैक्स टौय के हस्तमैथुन करने वाली संतुष्ट महिलाओं की संख्या महज 28 फीसदी थी, लेकिन सैक्स टौय से हस्तमैथुन करने वाली 83 फीसदी महिलाओं ने संतुष्टि मिलना बताया.

सैक्स टौयज का सालाना कारोबार कितना है, इस के ठीकठाक आंकड़े किसी के पास नहीं. लेकिन यह तय है कि यह बाजार बहुत तेजी से बढ़ रहा है क्योंकि बड़ी उम्र तक शादी न करने वालों की तादाद बढ़ रही है और कोई भी रेडलाइट इलाकों में जाने और अवैध संबंधों के बाद के खतरे और जोखिम नहीं उठाना चाहता.

अकेले रह कर नौकरी कर रहे युवक युवतियों के लिए भी सैक्स टौय वरदान साबित हो रहे हैं, जिन का इस्तेमाल जरूरत पड़ने पर कभी भी किया जा सकता है यानी अपने सीक्रेट ड्रीम पूरे किए जा सकते हैं, जिस का औसत खर्च 5 हजार रुपए से भी कम है.

काठमांडू के न्यू बाजार में स्थित स्वीट सीक्रेट दुकान सैक्स खिलौनों के लिए मशहूर है. यह दुकान भी रजिस्टर्ड है जिस में खुशबूदार कंडोम से ले कर बड़े आकार की गुडि़या जैसे कोई डेड़ सौ छोटेबड़े प्रोडक्ट मिलते हैं. सैक्स टौय के ज्यादातर आइटम चीन से मंगाए जाते हैं.

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मंजीत पौडेल और प्रवीण ढकाल नाम के युवकों ने इस दुकान को साल 2010 में खोला था. दुकान खूब चली और प्रतिदिन 5 लाख रुपए से भी ज्यादा की बिक्री होती है.

प्रवीन सैक्स टौय की दुकान खोलते वक्त चिंतित थे कि कहीं इस का विरोध न हो, पर यह आशंका फिजूल निकली और दुकान में रोजाना सौ के लगभग ग्राहक आते हैं, जिन में 10 महिलाएं होती हैं. दुकान से एकतिहाई बिक्री औनलाइन होती है.

मंजीत पौडेल के मुताबिक उन के ग्राहकों में ज्यादातर ऐसे होते हैं जिन का पार्टनर काम के सिलसिले में बाहर रहता है. किस उम्र के लोग ज्यादा सैक्स टौय खरीदते हैं, इस सवाल के जबाब में वह कहते हैं, ‘35 की उम्र के लगभग के लोग ज्यादा आते हैं. ये लोग कंडोम, वाइब्रेटर और सैक्स डौल ज्यादा खरीदते हैं. कई लोग तो सैक्स टौय घर में रह रही अकेली पत्नी के लिए खरीदते हैं.

यानी सैक्स टौय का इस्तेमाल युवा दंपति विवाहेतर संबंधों से बचने के लिए भी कर रहे हैं. यह एक सुखद बात सामाजिक लिहाज से है. वैसे भी देखा जाए तो सैक्स टौयज का इस्तेमाल किसी भी लिहाज से नुकसानदेह नहीं होता.

नरेंद्र दामोदरदास मोदी इन-इन “गलतियों” के लिए “मुआफी” मांगेंगे!

 सुरेशचंद्र रोहरा

नरेंद्र दामोदरदास मोदी को देश की जनता ने बहुत प्यार दिया और देश का प्रधानमंत्री बना करके ऐसा सम्मान दिया कि इतिहास में दर्ज हो गया.
सनद रहे कि कभी भी केंद्रीय राजनीति में आप नहीं रहे कभी भी संसदीय चुनाव नहीं लड़ा, कभी भी केंद्र में कैबिनेट मंत्री भी नहीं रहे, मगर देश की जनता ने उनके व्यक्तित्व और बातों को कुछ इस तरह सम्मान दिया कि सीधे-सीधे नरेंद्र दामोदरदास मोदी 2014 के “संसदीय चुनाव” में भारी बहुमत के साथ प्रधानमंत्री बन गए.
इसके साथ ही देश की जनता को जो सम्मान प्यार और अपनापन एक प्रधानमंत्री की और से मिलना चाहिए उस में भारी कमी रह गई. वह इसलिए कि 2014 में सत्ता में आते ही लोकतांत्रिक ढांचे को नरेंद्र मोदी सरकार मानो ध्वस्त करने में लग गई, होना तो यह चाहिए था कि देश की जनता को यह महसूस होता कि यह सरकार हमारे लिए बहुत कुछ कर रही है. यह भी कर रही है और वह भी कर रही है. मगर उल्टा हुआ यह कि देश की जनता को नरेंद्र दामोदरदास मोदी ने जो त्रासदी, पीड़ा और आंसू दिया है वह आजाद हिंदुस्तान में इतिहास बन चुका है. जिस की सबसे बड़ी नजीर है तीन कृषि कानून.

दरअसल,जब भी कोई कानून बनता है नियम उप नियम बनते हैं तो वह समाज के लिए देश के लिए हितकारी है इसलिए बनाए जाते हैं. यह इसलिए नहीं बनाए जाते की सिर्फ सत्ता उसकी चासनी का स्वाद ले या कुछ गिने-चुने बड़े उद्योगपति उसमें डुबकियां लगाएं. कृषि कानून के संदर्भ में भी देश और दुनिया ने देखा, कानून को आनन-फानन में संसद में पास करा दिया गया. देश की जनता किसान आवाक हो कर के देखते रह गए की यह क्या हो रहा है. मगर जनता की नाम पर एक लोकतांत्रिक सरकार द्वारा जिस तरीके से लाठी भांजी गई उसका दर्द उभर कर सामने आया जब किसानों ने यह कह दिया- यह कृषि कानून हमें मंजूर नहीं, और सरकार को वापस लेना होगा.
मगर सरकार तो यही कहती रही कि यह कानून तो भैया किसान तुम्हारे लिए है! तुम्हारे फायदे के लिए है!! किसान रोते रहे, मरते रहे आंदोलन करते रहे मगर सरकार टस से मस नहीं हो रही थी. बल्कि और भी तल्खी के साथ यह कहती रही कि यह किसान तो कुछ चुनिंदा लोग हैं, यह किसान तो भटके हुए लोग हैं, यह किसान तो आतंकवादी हैं. यह किसान खालिस्तानी हैं जो दिल्ली की सीमाओं में आकर के देश का माहौल खराब कर रहे हैं. आम भला किसान तो बेचारा अपने घर में बैठ कर के इस कृषि कानून के पास होने पर खुशियां मना रहा है.

औचक पलटी मारी!

अचानक देश ने देखा कि किस तरह इंदिरा गांधी की जयंती, गुरु नानकदेव की जयंती पर्व पर सुबह-सुबह अचानक प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदरदास मोदी ने पलटी मार दी. आकर मानो धमाका कर दिया कि कृषि कानूनों को सरकार वापस ले रही है.
यह मुआफी आज देश दुनिया के साथ-साथ नरेंद्र मोदी की आंखों के सामने भी हवाओं में तैर रही है. और उनसे शायद पूछ रही है कि एक लोकतांत्रिक देश के प्रधानमंत्री होने के नाते किसानों का, व्यापारियों का, देश की जन जन का हितेषी होने के अपने दायित्व को भूल कर के आपने क्यों अपने लगभग 7 वर्ष के कार्यकाल में ऐसे कदम उठाए, क्यों लोग टीस से भर गए त्रासदी से गुजर गए क्यों हजारों लोग मर गए.
पहला सवाल तो यह है कि जब कृषि कानून देश की सर्वाधिक जनसंख्या यानी किसानों के हित में नहीं था तो उसे लागू क्यों किया गया?
दूसरा-इसी तरीके से “एक देश एक टैक्स” का नारा देने के बाद जीएसटी लागू करने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदरदास मोदी ने पेट्रोल डीजल और कुछ अन्य चीजों पर अलग-अलग टैक्स का मानदंड क्यों रखा हुआ है. क्या यह कथनी और करनी अंतर नहीं दिखाता, अखिल पेट्रोल डीजल से आ रहा करोड़ों अरबों रुपए वसूल करने का आपको क्या अधिकार है?
तीसरा-देश को सेंट्रल विस्टा आपने सौंपने की योजना बना ली. आखिर आपसे किसने कहा है कि नया संसद भवन बना दीजिए अखिर आप उन पुरानी संवैधानिक संस्थाओं को जो आजादी की धरोहर हैं उन्हें तोड़कर के नया बनाने के लिए इतने लालायित क्यों हैं.
दरअसल, इतिहास में अमर होने के लिए आपने जो जो किया वह आपके लिए उल्टा पड़ गया है. यही कारण है कि नोटबंदी आपका एक ऐसा कदम है जिसका जवाब आपको इतिहास को देना ही पड़ेगा. यही नहीं जिस गुरु लालकृष्ण आडवाणी ने आपको उंगली पकड़कर राजनीति में आगे बढ़ाया आपका संरक्षण किया उन्हें भी आपने बार-बार अपमानित ही किया. आज देश की जनता में यह जन चर्चा का विषय है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदरदास मोदी क्या ऐसी ही कुछ और गलतियों के कारण भी देश और देश की आवाम से माफी मांगेंगे.

भोजपुरी क्वीन Rani Chatterjee ने फ्लॉन्ट किया कर्वी फिगर, देखें Video

भोजपुरी क्वीन रानी चटर्जी इन दिनों सोशल मीडिया पर काफी एक्टिव रहती है. वह अक्सर फैंस के साथ फोटोज और वीडियो शेयर करती रहती है. अब एक्ट्रेस का एक वीडियो वायरल हो रहा है, जिसमें वह अपना कर्वी फिगर फ्लॉन्ट करती नजर आ रही हैं.

फैंस इस वीडियो को काफी पसंद कर रहे हैं. आपको बता दें कि रानी चटर्जी ने सालों पहले एक बोल्ड फोटोशूट कराया था. जिसके लिए उन्होंने ब्लैक बिकिनी पहनी थी.

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एक्ट्रेस का यह वीडियो फैंस को काफी पसंद आ रहा है. रानी चटर्जी के फैंस इस वीडियो पर  लगातार कमेंट कर रहे हैं.

 

हाल ही में रानी चटर्जी ने एक फोटो शेयर की थी. जिसमें वह दुल्हन के अवतार में नजर आ रही हैं. रानी चटर्जी की ये तस्वीरें देखकर फैंस अंदाजा लगा रहे हैं कि एक्ट्रेस ने शादी कर ली है.

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बता दें कि रानी चटर्जी की ये तस्वीरें एक सीन के दौरान की हैं. रानी चटर्जी इन दिनों अपने अपकमिंग प्रोजेक्ट की शूटिंग में व्यस्त हैं. एक इंटरव्यू के अनुसार रानी चटर्जी ने बताया था  मैं अब अच्छा काम करना चाहती हूं. मैं हर प्रोजेक्ट का हिस्सा नहीं बनना चाहती क्योंकि अब मेरा फोकस क्वालिटी पर है.

अनुपमा के घर में खुशियों ने दी दस्तक तो पारितोष कहेगा अपनी मां को अय्याश

स्टार प्लस का टीवी सीरियल ‘अनुपमा’ (Anupama) की कहानी में लगातार ट्विस्ट एंड टर्न देखने को मिल रहा है. जिससे दर्शकों को एंटरटेनमेंट का डबल डोज मिल रहा है. शो में अब तक आपने देखा कि अनुपमा को नया घर मिल गया है. और अब वह वहां रहने वाली है. तो दूसरी तरफ शाह हाउस में काव्या अपने चाल में कामयाब हो रही है. अनुपमा के जाने के बाद वह शाह हाउस पर राज करना चाहती है. शो के आनेवाले एपिसोड में हाई वोल्टेज ड्रामा होने वाला है. आइए बताते हैं शो के नए एपिसोड के बारे में.

शो के अपकमिंग एपिसोड में दिखाया जाएगा कि बापूजी और किंजल दिवाली मनाने अनुपमा के घर जाते हैं. तो वहीं पाखी और और नंदनी भी पहले से मौजूद होते हैं. तो दूसरी तरफ बा, वनराज और काव्या अनुपमा को कोसते हैं.

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शो में आप ये भी देखेंगे कि वनराज की बहन डॉली शाह हाउस आएगी और बा को खूब सुनाएगी. वह कहेगी कि बा ने जो अनुपमा के साथ किया, वह अच्छा नहीं किया. डॉली ये भी कहेगी कि अब मां कहने में भी शर्म आती है.

 

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वह काव्या को भी सुनाएगी. ये सब सुनकर वनराज अपना आपा खो देगा. वह डॉली को उसकी पढ़ाई के समय के अहसान गिनाने से भी नहीं चूकेगा. वह कहेगा कि डॉली के नाम जो घर का हिस्सा है, उसे उसके नाम कर दे. डॉल पेपर पर साइन कर देगी.

 

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तो दूसरी तरफ अनुपमा के घर में फेस्टिवल सेलिब्रेट किया जाएगा. बापूजी, किंजल, पाखी, नंदनी, समर, गोपी काका, अनुज और अनुपमा की मां उसकी खुशियों में शामिल होंगे. इसी बीच पारितोष वहां आएगा. वह अनुपमा और अनुज के रिश्ते को लेकर खरी-खोटी सुनाएगा. वह अनुपमा को अय्याश और चरित्रहीन कहेगा. अनुपमा चुप नहीं रहेगी और वह वह तोषू के गाल पर जोरदार तमाचा मारेगी.

कानून: नौमिनी महज संरक्षक, उत्तराधिकारी नहीं

Writer- साधना शाह

अकसर हम अपने बैंक अकाउंट और बीमा पौलिसी के लिए अपने किसी करीबी को नौमिनी बना कर बेफिक्र हो जाते हैं, यह सोच कर कि अचानक मृत्यु हो गई तो नामित व्यक्ति को बैंक अकाउंट या बीमा पौलिसी की रकम मिल जाएगी. यह हमारा एक भ्रम है.

दरअसल, बीमा हो या बैंक अकाउंट, नौमिनी व्यक्ति उस का महज संरक्षक होता है, कानूनी उत्तराधिकारी नहीं होता. हमारे देश का कानून यही कहता है. बीमा संबंधित मामले की एडवोकेट देवस्मिता बसाक कहती हैं कि हमारे देश में नौमिनी या मनोनीत व्यक्ति कानूनीतौर पर उत्तराधिकारी नहीं होता है. बचत या निवेश का मालिकाना हक कानूनीतौर पर उसे प्राप्त नहीं हो सकता है. जिस व्यक्ति को नौमिनी बनाया गया है, अगर उसे कानूनीतौर पर अपने निवेश या बचत का मालिकाना हक दिलाना है तो नौमिनी बनाने के साथ उस के नाम पर वसीयत करना भी जरूरी है. यानी बचत-निवेश में किसी रिश्तेदार को नौमिनी बनाना काफी नहीं है.

नौमिनी बनाने या मनोनीत करने का अर्थ यही है कि खाताधारक या निवेशक के अचानक मर जाने पर बैंक खाते व निवेश की रकम को कोई मनोनीत व्यक्ति प्राप्त कर सकता है. लेकिन वह उस निवेश या अकाउंट की रकम का उत्तराधिकारी नहीं होता है.

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उदाहरण के तौर पर, किसी व्यक्ति ने बीमा पौलिसी लेते समय अपनी मां को नौमिनी बनाया. अगर वह व्यक्ति विवाहित है और मां के जीवित रहते उस व्यक्ति की अचानक मृत्यु हो जाती है तो बीमा की रकम उस की मां को नहीं मिलेगी, बल्कि वह रकम उस व्यक्ति के कानूनी उत्तराधिकारी यानी उस की पत्नी को मिलेगी. देवस्मिता बताती हैं कि नौमिनी व्यक्ति अगर कानूनीतौर पर उत्तराधिकारी नहीं है तो उस बीमा पौलिसी की रकम पर उस का अधिकार नहीं हो सकता. हमारे यहां यह एक बहुत आम समस्या है. अपने जीवित रहते हुए अकसर लोग अपना उत्तराधिकारी तय करने के बारे में सोचते ही नहीं हैं. जाहिर है, नौमिनेशन कानून के इस पक्ष से लोग बेखबर होते हैं. इसीलिए देश की तमाम अदालतों में इस से संबंधित बहुत सारे मामले लंबित पड़े हैं.

मध्यवर्ग की त्रासदी है कि वह जीवनभर पेट काटकाट कर थोड़ाबहुत बचत तो कर लेता है लेकिन जहां तक वसीयत बनाने का सवाल है, एक आम सामाजिक धारणा यह है कि यह काम तो रईस लोग करते हैं. एक या दो कमरे के फ्लैट, थोड़ी सी बचत व निवेश की एक छोटी सी रकम के लिए वसीयत करने के बारे में कम ही लोग सोचते हैं. जबकि, सचाई यह है कि वसीयत न होने पर पारिवारिक सदस्यों को संपत्ति व बीमा रकम प्राप्त करने में अदालतों के चक्कर लगाने के साथ बहुत सारे पापड़ बेलने पड़ते हैं.

तमाम तरह के दूसरे प्रमाणपत्रों के साथ उत्तराधिकारी प्रमाणपत्र यानी सक्सैशन सर्टिफिकेट भी जमा करने पड़ते हैं. यह सक्सैशन सर्टिफिकेट जुगाड़ करने में कई बार चप्पलें घिस जाती हैं. ऐसे में देवस्मिता का कहना है कि अगर आप अपनी मृत्यु के बाद अपने परिवार को किसी ऐसे झमेले में नहीं पड़ने देना चाहते हैं तो आप को नौमिनेशन की भूमिका और वसीयत के महत्त्व के बारे में विस्तार से जान लेना चाहिए.

बैंक अकाउंट

किसी बैंक में अकाउंट खोलने के समय हम लोग अपने परिवार में से किसी न किसी को अपना नौमिनी तय कर देते हैं. लेकिन अकसर होता यह है कि नौमिनी के मामले में किसी तरह का बदलाव होने पर हम बैंक में अपडेट करना भूल जाते हैं. ऐसा मामला अकसर युवा खाताधारक के मामले में होता है. आजकल 25-30 साल की उम्र में इन्हें मोटी रकम की सैलरी मिलने लगती है. अविवाहित होने पर ये लोग अकसर अपने मातापिता या भाईबहन को नौमिनी बनाते हैं. लेकिन विवाह हो जाने पर बैंक अकाउंट में अपडेट करना यानी पत्नी को अपना नौमिनी बनाना भूल जाते हैं.

ऐसे मामले में ग्राहक की मृत्यु हो जाने पर बैंक नौमिनी को रकम थमा कर अपनी जिम्मेदारी से फारिग हो जाता है. यहां ध्यान रखने वाली बात यह है कि नौमिनी केवल बैंक की रकम का संरक्षक मात्र होता है. अगर उस व्यक्ति ने किसी अन्य को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर रखा है तो वह उत्तराधिकारी नौमिनी को कानूनी चुनौती दे कर उस रकम पर अपना दावा कर सकता है.

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जीवन बीमा

जीवन बीमा के मामले में भी कानून लगभग एक ही है. बीमा क्षेत्र में नौमिनी की भूमिका ट्रस्टी की होती है. बीमा कानून 1939 की धारा 39 में साफतौर पर कहा गया है कि बीमा पौलिसी धारक की मृत्यु हो जाने पर पौलिसी की रकम नौमिनी को जाएगी. लेकिन 1983 में शरबती देवी बनाम उषा देवी मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि बीमा के मामले में नौमिनी बीमा की रकम का अधिकारी नहीं हो सकता, बल्कि नौमिनी बीमाधारक के कानूनी उत्तराधिकारी के ट्रस्टी के रूप में बीमा की रकम को प्राप्त कर सकता है.

बीमा कंपनी से प्राप्त रकम को बीमाधारक द्वारा वसीयत में तय किए गए कानूनी उत्तराधिकारी को सौंप देने की जिम्मेदारी नौमिनी की होगी. अगर वसीयत न हो, तो बीमाधारक उत्तराधिकारी रकम की प्राप्ति के लिए कानूनी रास्ता अपना सकता है.

म्यूचुअल फंड

म्यूचुअल फंड के मामले में भी नौमिनी की हैसियत महज निवेश के संरक्षक की होती है. निवेशक की मृत्यु होने पर निवेश की रकम म्यूचुअल फंड कंपनी नौमिनी के हाथों में सौंप देती है. लेकिन अगर नौमिनी और कानूनी उत्तराधिकारी एक ही व्यक्ति नहीं हुआ तो कानूनी उत्तराधिकारी ही उस रकम का उपभोग कर सकता है. यानी नौमिनी को वह रकम कानूनी उत्तराधिकारी को सौंपनी होगी. संयुक्त खाताधारक के मामले में पहले खाताधारक के रहते दूसरे की मृत्यु होने पर म्यूचुअल फंड के यूनिट पहले खाताधारक के नाम हो जाएंगे. पर डीमैट अकाउंट होने की सूरत में नियम अलग हो जाते हैं. डीमैट अकाउंट के नौमिनी व्यक्ति को म्यूचुअल फंड के नौमिनी की तरह लिया जाएगा.

चूंकि म्यूचुअल फंड को फिर से फिजिकल यूनिट में परिवर्तित किया जा सकता है, इसीलिए म्यूचुअल फंड कंपनी नौमिनेशन रद्द नहीं करती. फिजिकल यूनिट ट्रांसफर किए जाने पर ही नौमिनेशन लागू होगा.

जौइंट डीमैट अकाउंट के मामले में पहले खाताधारक की मृत्यु होने पर नियमानुसार प्राथमिक खाताधारक का नाम तालिका से हटा दिया जाता है. दूसरा खाताधारक प्राथमिक खाताधारक में परिवर्तित हो जाता है. दूसरी ओर, दूसरे खाताधारक की भी मृत्यु होने पर पूरी संपत्ति नौमिनी व्यक्ति को चली जाती है. अगर निवेशक ने किसी को नौमिनी नहीं बनाया है, तो कानूनी उत्तराधिकारी को वह रकम चली जाएगी.

शेयर

शेयर के मामले में नियम थोड़े अलग हैं. 2012 में सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले से नियम में तबदीली आई. किसी व्यक्ति ने अपने डीमैट अकाउंट के लिए अपनी भतीजी को नौमिनी बनाया था. व्यक्ति की मृत्यु के बाद उस की पत्नी ने डीमैट अकाउंट के शेयर पर अपना दावा अदालत में पेश किया. मामला सुप्रीम कोर्ट तक गया. मामले पर अपना फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कंपनी कानून के अनुसार वसीयत के तहत तय किया गया उत्तराधिकारी नहीं, बल्कि डीमैट अकाउंट का नौमिनी व्यक्ति ही शेयर का हकदार होगा. इसीलिए पत्नी डीमैट अकाउंट के शेयर की हकदार नहीं हो सकती.

साफ है कि  कंपनी कानून के अनुसार डीमैट अकाउंट के लिए अगर किसी व्यक्ति को नौमिनी बनाया गया और वसीयत में किसी और व्यक्ति का नाम है, तो भी डीमैट अकाउंट के नौमिनी को ही शेयर का मालिकाना हक प्राप्त होगा. वसीयत में तय किए गए कानूनी उत्तराधिकारी को शेयर का हक नहीं मिलेगा. इसी तरह संयुक्त खाताधारक यानी जौइंट अकाउंट के मामले में केवल दूसरे खाताधारक को ही शेयर का मालिकाना हक प्राप्त होगा.

कोऔपरेटिव  हाउसिंग सोसाइटी

कोऔपरेटिव हाउसिंग सोसाइटी के मामले में भी नियम अलग है. इस मामले में किसी व्यक्ति का फ्लैट सोसाइटी का महज एक यूनिट होता है. कोऔपरेटिव सोसाइटी में फ्लैट के लिए एक नौमिनी तय करना जरूरी है. लेकिन यहां भी नौमिनी संपत्ति यानी फ्लैट का केवल एक केयरटेकर होता है. फ्लैट का मालिकाना हक केवल कानूनी उत्तराधिकारी को ही मिलेगा.

मुंबई में ऐसा ही एक मामला लगभग 29 सालों तक चला. अंत में 2009 में बौंबे हाईकोर्ट ने उत्तराधिकारी मामले को स्पष्ट करते हुए कहा कि कोऔपरेटिव हाउसिंग सोसाइटी में किसी को केवल नौमिनी बनाया गया तो कानूनीतौर पर उस व्यक्ति को फ्लैट का मालिकाना हक नहीं मिलेगा. फ्लैट के मालिक की मृत्यु होने पर उस के कानूनी उत्तराधिकारी को ही फ्लैट का मालिकाना हक प्राप्त होगा, नौमिनी को नहीं.

अन्य संपत्तियों के मामलों में वसीयत न होने पर देश के उत्तराधिकारी कानून के तहत संपत्ति का वितरण होता है. दरअसल, जमीन या मकान के मामले में नौमिनी तय करने का कोई चलन है ही नहीं. लेकिन निवेश और अन्य किस्म की बचतों में नौमिनी तय किया जाता है. कुल मिला कर लब्बोलुआब यही है कि अगर हम चाहते हैं कि हमारे बाद तमाम बचत व निवेश की रकम हमारे नौमिनी को मिले तो केवल नौमिनी बनाना काफी नहीं होगा, उसे अपना उत्तराधिकारी भी बनाना होगा. तभी नौमिनी बनाने का  मकसद पूरा होगा और अपने पीछे रह गए पारिवारिक सदस्य को सहूलियत होगी.

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