समस्या: बिजली गुल टैंशन फुल

अनंत सितारों से भरे आकाश की तरह समस्याएं भी अनंत को छू रही हैं. मोबाइल फोन की बैटरी मौत के कगार पर है. बिजली कब आएगी, यह सवाल भूखे गांव वालों की जबान पर तैर रहा है.

यह नजारा राजस्थान में अघोषित बिजली संकट की भयावहता की ओर इशारा कर रहा है. कमोबेश 4-5 दिनों से रोजाना हम इन हालात से गुजर रहे हैं. गरमी में पसीने से लथपथ हर किसी के मन में राज्य सरकार की बदइंतजामी को ले कर काफी गुस्सा है.

गौरतलब है कि जोधपुर डिस्कौम के गांवदेहात के इलाके में 3 से 4 घंटे तक की बिजली कटौती की जा रही है. इतना ही नहीं, सभी नगरपालिका क्षेत्रों (जिला हैडक्वार्टर को छोड़ कर) में दिन में एक घंटे की बिजली कटौती हो रही है. जयपुर की कालोनियों में भी 4 घंटे से 7 घंटे तक बिजली कटौती की घोषणा की गई है.

ऐसे में गांवों की हालत बद से बदतर है. वहां लोगों को 8 से 9 घंटे अघोषित बिजली कटौती का सामना करना पड़ रहा है. इस की वजह साफ है और सरकार ने भी माना है कि देश में कोयला संकट गहराता जा रहा है.

कोयला संकट गहराने का सीधा असर बिजली के प्रोडक्शन पर पड़ रहा है, क्योंकि देश में ज्यादातर बिजली कोयले से पैदा होती है.

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कोयले की कमी के चलते राजस्थान में गहराते बिजली संकट पर ऊर्जा विभाग काफी चिंतित है. इस चिंता के बीच सोलर एनर्जी प्रोडक्शन के इस्तेमाल को बिजली संकट से जोड़ कर देखा जा रहा है.

याद रहे कि राजस्थान सोलर एनर्जी प्रोडक्शन में देश में पहले नंबर पर होने के बावजूद शहरी और गांवदेहात के इलाकों में अघोषित बिजली कटौती करनी पड़ रही है.

राजस्थान 7,738 मैगावाट सौर ऊर्जा क्षमता उत्पादन कर देश में पहले पायदान पर है. इस आंकड़े से लगता है कि राजस्थान में बिजली की कोई कमी नहीं है, फिर भी बिजली उपभोक्ताओं को सस्ती बिजली नहीं मिल पा रही.

विभाग को यह भी पता है कि ऊर्जा के विभिन्न माध्यमों में सोलर एनर्जी प्रोडक्शन सब से सस्ता होता है, लेकिन इस उपलब्धि का सही इस्तेमाल नहीं होने के पीछे राजनीतिक वजह ज्यादा मानी जा रही है.

राजस्थान में सोलर एनर्जी उत्पादन की सरकारी इकाइयां कम और बाहरी निवेशकों की ज्यादा हैं. निवेशकों को सोलर सैक्टर में निवेश की छूट दी गई, लेकिन उन से सस्ती बिजली लेने की दिशा में कोई ठोस कोशिश नहीं की गई. इसी वजह से ज्यादा निवेशक अपनी बिजली दूसरे राज्यों में बेचते हैं.

कोयले से बिजली बनाने की लागत काफी महंगी होती है. इस के बावजूद राजस्थान की ज्यादातर उत्पादन इकाइयां थर्मल आधारित हैं. यही वजह है कि कोयले की कमी से बारबार उत्पादन प्रभावित होता है.

कोयले के संकट की वजह से 15 से 20 रुपए प्रति यूनिट की दर से महंगी बिजली खरीदनी पड़ती है, जिस का बोझ आम उपभोक्ता पर ही पड़ता है.

अगर देश की बात करें, तो देश में 135 बिजली संयंत्र हैं, जहां कोयले से बिजली का उत्पादन होता है.

कोयला उत्पादन पर एक नोट के मुताबिक, 1 अक्तूबर को इन 135 बिजली संयंत्रों में से 72 के पास 3 दिनों से भी कम का स्टौक था, वहीं 4 दिनों से 10 दिनों का स्टौक रखने वाले बिजलीघरों की संख्या 50 है.

अगस्तसितंबर, 2019 में बिजली की खपत 106.6 अरब यूनिट थी, जबकि इस साल अगस्तसितंबर में 124.2 बीयू की खपत हुई थी.

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इसी अवधि के दौरान कोयले से बिजली का उत्पादन साल 2019 में 61.91 फीसदी से बढ़ कर 66.35 फीसदी हो गया. अगस्तसितंबर, 2019 की तुलना में इस साल के समान 2 महीनों में कोयले की खपत में 18 फीसदी की बढ़ोतरी हुई.

मार्च, 2021 में इंडोनेशिया से आने वाले कोयले की कीमत 60 डालर प्रति टन थी, लेकिन सितंबरअक्तूबर में इस की कीमत में 200 डालर प्रति टन की बढ़ोतरी हुई. इस से कोयले का आयात कम हो गया. मानसून के मौसम में कोयले से चलने वाली बिजली की खपत बढ़ गई, जिस से बिजली स्टेशनों में कोयले की कमी हो गई.

दरअसल, कोविड महामारी की दूसरी लहर के बाद भारत की अर्थव्यवस्था में तेजी आई है और बिजली की मांग भी अचानक से बढ़ गई है. पिछले 2 महीनों में अकेले बिजली की खपत में साल 2019 की तुलना में 17 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है.

इस बीच दुनियाभर में कोयले की कीमतों में 40 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है, जबकि भारत का कोयला आयात 2 सालों में अपने सब से निचले लैवल पर है.

हालांकि, भारत के पास दुनिया में कोयले का चौथा सब से बड़ा भंडार है, लेकिन खपत के मामले में भारत कोयले के आयात में दुनिया में दूसरे नंबर पर है.

आमतौर पर आयातित कोयले पर चलने वाले बिजली प्लांट अब देश में उत्पादित कोयले पर निर्भर हैं. इस वजह से पहले से ही कमी से जूझ रही कोयले की सप्लाई और भी ज्यादा दबाव में आ गई है.

हाल के सालों में भारत अपनी तकरीबन 140 करोड़ की आबादी की जरूरतों को कैसे पूरा कर सकता है और भारी प्रदूषण वाले कोयले पर अपनी निर्भरता को कैसे कम कर सकता है, यह सवाल सरकारों के लिए एक चुनौती रहा है.

फिलहाल तो सरकार ने कहा है कि वह उत्पादन बढ़ाने, सप्लाई और खपत के बीच की खाई को पाटने और ज्यादा खनन करने के लिए कोल इंडिया के साथ काम कर रही है.

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सरकार को भी बंधक खदानों से कोयला मिलने की उम्मीद है. ये वे खदानें हैं, जो कंपनियों के कंट्रोल में होती हैं और उन से उत्पादित कोयले का इस्तेमाल वही कंपनियां करती हैं.

इन खदानों को सरकार के साथ समझौते की शर्तों के तहत कोयला बेचने की इजाजत नहीं है. भारत शौर्टटर्म उपायों से मौजूदा संकट से किसी तरह निकल सकता है, लेकिन देश की बढ़ती ऊर्जा की जरूरतों को पूरा करने के लिए भारत को लंबी मीआद के उपायों में निवेश करने की दिशा में काम करना होगा.

क्या ईसाई धर्म अपना कर मुझे कोई दिक्कत तो नहीं आएगी?

सवाल

मुझे एक क्रिश्चियन लड़की से प्यार हो गया है. मेरे घरवालों को कोई एतराज नहीं है लेकिन उस के घरवाले क्रिश्चियन लड़के से ही उस की शादी करना चाहते हैं. मैं उस से इतना प्यार करता हूं कि अपना धर्म परिवर्तन कर सकता हूूं उस के लिए. मेरे मातापिता ने मेरी खुशी के लिए अपनी रजामंदी दे दी है. क्या ईसाई धर्म अपना कर मुझे कोई दिक्कत तो नहीं आएगी? यह कैसी प्रक्रिया होती है?

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जवाब

ईसाई धर्म अपनाने के बाद दिक्कत आएगी या नहीं आएगी, ऐसा कुछ तो हम भी नहीं कह सकते हैं, हां ईसाई बनने के लिए आप को बापतिस्मा की प्रक्रिया से गुजरना होगा. यह एक खास रिवाज है, जो औपचारिक रूप से धर्म ग्रहण करने की रस्म को पक्का कर देता है. अगर कभी जरूरत पड़े तो चर्च धर्म को ले कर सर्टिफिकेट भी इश्यू कर देते हैं.

वैसे यदि आप के घरवालों को कोई एतराज नहीं तो दोनों हिंदू रीतिरिवाज से शादी कर सकते हैं. लड़की के घरवाले देरसवेर अपनी नाराजगी छोड़ ही देंगे. विचार कीजिए. आगे आप की इच्छा.

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अगर आपकी भी ऐसी ही कोई समस्या है तो हमें इस ईमेल आईडी पर भेजें- submit.rachna@delhipress.biz
 
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क्या कांग्रेसी कन्हैया की बांसुरी पर थिरकेंगे वोटर?

Writer- बिरेन्द्र बरियार

28सितंबर, 2021 को वामपंथियों के ‘लाल सलाम’ के नारे से पल्ला झाड़ कर कन्हैया कुमार ने कांग्रेस का हाथ थाम लिया. जहां एक तरफ कांग्रेस को भरोसा है कि वे बिहार में पार्टी का मजबूत चेहरा बनेंगे, वहीं दूसरी तरफ कन्हैया कुमार को भी यकीन है कि कांग्रेस के कंधे पर सवार हो कर बिहार में उन की राजनीति चमक उठेगी.

कांग्रेस को जहां बिहार में एक दमदार नेता की तलाश थी, वहीं भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी में हाशिए पर धकेल दिए गए कन्हैया कुमार को एक बड़े प्लेटफार्म की दरकार थी. कन्हैया कुमार के सहारे कांग्रेस राज्य में अपनी खोई हुई जमीन को एक बार फिर हासिल करने की कवायद में लगी है.

राष्ट्रीय जनता दल, जनता दल (यूनाइटेड) और भारतीय जनता पार्टी के वोट बैंक में सेंध लगाना कन्हैया कुमार के लिए सब से बड़ी चुनौती है. पर क्या इस ‘कन्हैया’ की ‘बांसुरी’ की धुन में वोटरों को खींच पाने की ताकत है?

कन्हैया कुमार अचानक ही कांग्रेस में शामिल नहीं हो गए हैं. भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी में दरकिनार कर दिए जाने और पिछला लोकसभा चुनाव हारने के बाद से ही उन का इस पार्टी से मोह भंग हो गया था. उस के बाद से ही वे लगातार कांग्रेस नेताओं के संपर्क में रहने लगे थे.

कन्हैया कुमार ने साल 2019 में हुए 17वें लोकसभा चुनाव में भाकपा के टिकट पर बेगुसराय सीट से चुनाव लड़ा था. तब वे भाजपा के नेता गिरिराज सिंह से 4 लाख, 22 हजार वोट से हार गए थे.

पर पिछले कुछ महीनों से कन्हैया कुमार इस पार्टी में अलगथलग पड़ गए थे. जनवरी, 2021 में हैदराबाद में पार्टी की बैठक में अनुशासनहीनता के मामले में कन्हैया कुमार के खिलाफ निंदा प्रस्ताव पास किया गया था. इस बैठक में कुल 110 सदस्य मौजूद थे और 107 सदस्यों ने इस निंदा प्रस्ताव का समर्थन किया था. कन्हैया कुमार पर पार्टी के सचिव इंदुभूषण के साथ बदसुलूकी करने का आरोप था.

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‘बिहार का लेनिनग्राद’ कहे जाने वाले बेगुसराय से लोकसभा का चुनाव हारने के बाद से ही कन्हैया कुमार का भाकपा से मन ऊब गया था और वे पिछले कई महीनों से कांग्रेस के नेताओं से मिल रहे थे.

बिहार कांग्रेस के गलियारे में चर्चा है कि कन्हैया कुमार को बिहार कांग्रेस की कमान सौंपी जा सकती है. कन्हैया कुमार भी बारबार यह दोहरा रहे हैं कि कांग्रेस को बचा कर ही देश को बचाया जा सकता है. महंगाई, बेरोजगारी और गरीबी जैसे मसलों पर नाकाम रही भाजपा को कन्हैया कुमार अपने पक्ष में भुना सकते हैं.

यही नहीं, कन्हैया कुमार राजद नेता तेजस्वी यादव के लिए बड़ी चुनौती बन सकते हैं. तेजस्वी और कन्हैया के बीच छत्तीस का आंकड़ा है. इस के पीछे की वजह यह है कि साल 2019 में जब कन्हैया कुमार बेगुसराय लोकसभा सीट से चुनावी मैदान में उतरे थे, तो राजद ने उन के खिलाफ तनवीर हसन को मैदान में उतार दिया था. महागठबंधन के वोटों का बिखराव होने से राजग को सीधा फायदा मिला और भाजपा के गिरिराज सिंह जीत गए.

तेजस्वी यादव को जहां राजनीति विरासत में मिली है, वहीं कन्हैया कुमार छात्र राजनीति की उपज हैं. कन्हैया कुमार से मिली चुनौतियों का सामना सब से ज्यादा तेजस्वी यादव को ही करना होगा.

लालू प्रसाद यादव की गैरमौजूदगी में तेजस्वी यादव महागठबंधन के नेता बने हुए थे और सभी घटक दलों को कबूल भी थे. कन्हैया कुमार के कांग्रेस में शामिल होने के बाद तेजस्वी यादव को कड़ी टक्कर मिलनी तय है.

तेजस्वी यादव के मुकाबले कन्हैया कुमार ज्यादा तेजतर्रार और काफी पढ़ेलिखे नेता हैं. कन्हैया कुमार अपनी सटीक बातों के दम पर अच्छेअच्छे नेताओं की जबान पर ताला लगा सकते हैं. कांग्रेस अगर महागठबंधन में रही, तो तेजस्वी और कन्हैया के बीच की खींचतान को देखना दिलचस्प होगा.

फिलहाल राजद कन्हैया कुमार को कितने हलके में ले रहा है, इस का नमूना राजद के प्रवक्ता भाई वीरेंद्र ने तब पेश किया, जब उन से पूछा गया कि कन्हैया कुमार के कांग्रेस में शामिल होने से बिहार में महागठबंधन पर क्या असर पड़ेगा, तो उन्होंने तपाक से सवाल दाग दिया कि यह कन्हैया कौन है?

गौरतलब है कि साल 1990 में लालू प्रसाद यादव के सत्ता में आने के बाद कांग्रेस लगातार कमजोर होती गई. अब वह सबकुछ लुटा कर होश में आई है और कन्हैया कुमार के भरोसे अपनी डूबती नैया को पार लगाने की जुगत में लग गई है.

कन्हैया कुमार की वजह से अगड़ी जातियों का एक बड़ा हिस्सा फिर से कांग्रेस से जुड़ सकता है, वहीं मुसलिमों में भी कन्हैया कुमार की अच्छीखासी पैठ है.

कांग्रेस के बड़े नेता कहते हैं कि जब तक कांग्रेस राजद से नाता नहीं तोड़ेगी, तब तक कांग्रेस का कुछ नहीं होने वाला है. आज की तारीख में बिहार कांग्रेस कुछ भी खोने की हालत में नहीं है, ऐसे में रिस्क ले कर बड़ा दांव खेला जा सकता है.

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राजद से नाता तोड़ कर कांग्रेस अकेले अपने दम पर चुनाव मैदान में उतरे, तो उस से बिदका हुआ वोट बैंक दोबारा हासिल हो सकता है. राजद के भरोसे नैया पर लगाने की सियासत को छोड़ने का समय आ गया है.

साल 1985 तक कांग्रेस की हालत बिहार में काफी मजबूत रही थी. उस साल बिहार विधानसभा की कुल

323 सीटों (उस समय झारखंड बिहार का ही हिस्सा था) में से 196 सीटें कांग्रेस के खाते में आई थीं. तब 39.30 फीसदी वोट कांग्रेस को मिले थे.

उस के बाद से ले कर अब तक बिहार में राज कर रहे लालू प्रसाद यादव, नीतीश कुमार, सुशील कुमार मोदी और रामविलास पासवान जैसे धुरंधर नेता तो कांग्रेस विरोध की राजनीति की उपज हैं. कांग्रेस की कब्र पर ही दर्जनों बड़े नेताओं की फसलें पैदा हुई हैं और फलीफूली हैं.

लालू प्रसाद यादव के बिहार की सत्ता में आने के बाद से कांग्रेस में गिरावट शुरू हो गई थी. साल 1990 में कांग्रेस को 323 सीटों में से केवल

71 सीटें ही मिल सकी थीं और उस का वोट फीसदी 24.86 रहा था.

उस के बाद से ही कांग्रेस का ग्राफ तेजी से गिरता गया. साल 1995 में वह 320 सीटों पर चुनाव लड़ी थी और उसे

29 सीटें मिली थीं. उस का वोट फीसदी 16.51 हो गया था. साल 2000 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस 323 सीटों में से 23 सीटों पर ही जीत सकी थी और उस का वोट बैंक घट कर 11.06 फीसदी रह गया था.

साल 2005 में कांग्रेस ने 51 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे और 9 सीटें ही उस के खाते में आ सकी थीं. उस का वोट फीसदी बढ़ कर 29.04 हुआ था, पर सीटें नहीं बढ़ सकी थीं. साल 2010 में वह 243 सीटों पर लड़ी थी, पर उसे केवल 4 सीटों पर ही जीत मिली थी. वहीं वोट 8.37 फीसदी मिल सके थे.

साल 2015 में महागठबंधन के बैनर तले 41 सीटों पर कांग्रेस ने अपने उम्मीदवार उतारे थे और उसे 27 सीटों पर जीत मिली थी. तब उस का वोट फीसदी भी बढ़ कर 39.49 हो गया था.

साल 2020 में हुए विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के 70 उम्मीदवार मैदान में उतरे थे, पर 19 ही विधानसभा में पहुंच सके थे.

कांग्रेस की नजर अब राज्य की 11 फीसदी अगड़ी जातियों, 16 फीसदी मुसलमानों और 14 फीसदी दलितों के वोट पर है. इसी को साधने के लिए कन्हैया कुमार को आगे लाया गया है.

अब देखने वाली बात यह होगी कि कन्हैया कुमार कांग्रेस के खिसक चुके वोट बैंक को किस तरह से अपने पाले में ला सकते हैं?

Satyakatha- दिल्ली: शूटआउट इन रोहिणी कोर्ट

दिल्ली में स्थित रोहिणी जिला न्यायालय के एक कोर्टरूम में 24 सितंबर की दोपहर को अंधाधुंध गोलियां चलीं.

Satyakatha- दिल्ली: शूटआउट इन रोहिणी कोर्ट- भाग 1

सौजन्य- सत्यकथा

लेखक- शाहनवाज

24सितंबर, 2021. शुक्रवार का दिन था. दोपहर के करीब एक बजे का टाइम था. दिल्ली में स्थित रोहिणी की कोर्ट में हर दिन की तरह ही काम हो रहा था. हर कोर्टरूम में अदालती काररवाई चल रही थी. कोर्ट परिसर की बिल्डिंग के अंदर और बाहर दोनों ही एरिया में वकीलों, पीडि़तों, फरियादियों, पुलिस वालों इत्यादि की भीड़ जमा थी. हर कोई अपनेअपने काम में व्यस्त था.

बिल्डिंग के अंदर कोर्ट रूम नंबर 207 के बाहर भी ऐसा ही कुछ माहौल था. दोपहर करीब सवा बजे के आसपास एडिशनल सेशन जज गगनदीप सिंह अपने कोर्टरूम में दाखिल हुए तो रूम में बैठे सभी लोग उन के सम्मान में खड़े हुए और धीमी आवाज में हो रही खुसफुसाहट एकदम से शांत हो गई.

रूम में दाखिल होते ही उन्होंने कोर्टरूम में सभी लोगों पर अपनी नजर घुमाई और ये सुनिश्चित किया कि सब ठीक तो है.

नजर घुमाने के बाद न्यायाधीश ने अपनी जगह पर बैठते हुए सभी लोगों को हाथ से बैठने का इशारा किया और अपनी कुरसी पर बैठ गए. उस समय कोर्टरूम में बाएं और दाएं दोनों ओर कठघरों के पास वकील की ड्रैस पहने 2 व्यक्ति चुपचाप खड़े थे.

कमरे के बीचोबीच नीले रंग की कमीज और काली पैंट में एक शख्स 2 पुलिस वालों के साथ खड़ा था. उस के हाथों में हथकडि़यां लगी थीं और वह ठीक न्यायमूर्ति के सामने ही खड़ा था.

यह शख्स मशहूर गैंगस्टर जितेंद्र मान उर्फ गोगी था, जिस पर दिल्ली और हरियाणा पुलिस ने एक समय पर कुल मिला कर 6 लाख रुपए का ईनाम घोषित किया हुआ था. गोगी पर जून 2018 में दिल्ली पुलिस ने मकोका एक्ट लगा दिया था, जिस की सुनवाई उस दिन होने वाली थी. गोगी इतना बड़ा और खतरनाक गैंगस्टर था कि उसे स्पैशल सेल और थर्ड बटालियन की कस्टडी में कोर्ट में लाया गया था.

करीब 2 मिनट के बाद सामने कुरसियों पर बैठे लोगों में से एक वकील अपने हाथों में एक भारीभरकम मोटी सी फाइल लिए अपनी कुरसी से उठा और अपनी फाइल में से केस का वारंट निकाल कर जज साहब की ओर आगे बढ़ा दिया.

उस का दिया वारंट अभी जज के हाथों में पहुंचा ही था कि दोनों कठघरों के पास खड़े काले कोट में वकील जैसे दिखाई देने वाले दोनों लोग अचानक से गोगी की तरफ आगे बढ़े और अपनी कमर में पीछे की ओर से पिस्तौल निकाल कर गोगी की छाती पर तान दी.

उन्होंने गोगी की छाती पर अपनी पिस्तौल तान कर गोली चला दी. वकील के काले कोट में दोनों लोगों ने एकएक कर करीब कुल मिला कर आधा दरजन गोलियां चला कर उस के शरीर को भेद दिया, जिस से वह वहीं ढेर हो कर जमीन पर गिर पड़ा.

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ये सब अचानक से और इतनी जल्दी हुआ कि किसी को संभलने का मौका तक नहीं मिला. कोर्टरूम में अचानक से अफरातफरी का माहौल बन गया. सब के दिलों में दहशत फैल गई थी. कोर्टरूम के आगे और पीछे के गेट से जितने लोग अपनी जान बचाने के लिए निकल सकते थे, वे जल्दीजल्दी निकल गए.

लेकिन कोर्टरूम में अभी भी गोलियां चलाने वाले दोनों हमलावर, पुलिस की टीम (जो गोगी को कोर्टरूम में ले कर आए थे), अन्य पुलिसकर्मी, न्यायमूर्ति गगनदीप सिंह और उन

के साथ कुछ और लोग कोर्टरूम में ही फंसे थे.

दोनों हमलावर कोर्टरूम से भाग कर निकल न सकें, इस के लिए अंदर मौजूद पुलिसकर्मियों ने कोर्टरूम के दोनों दरवाजों को बंद कर दिया. कोर्टरूम में हर कोई खुद को सुरक्षित करने के लिए जिसे जहां जगह मिली, वह उसी के पीछे या नीचे छिप कर चलने वाली गोलियों से खुद को बचाने लगा. न्यायाधीश गगनदीप सिंह भी अपनी जान बचाने के लिए अपनी डेस्क के नीचे छिप गए.

हमलावरों ने गोगी पर गोलियां चलाने के बाद भागने के लिए जब कोर्टरूम के दरवाजों पर नजर घुमाई तो देखा कि दोनों गेट बंद थे. यह देख कर वे और भी अंधाधुंध गोलियां बरसाने लगे. ऐसे में रूम में मौजूद पुलिसकर्मियों ने भी जवाबी काररवाई करते हुए उन दोनों हमलावरों पर गोलियां चलाईं.

पुलिस की गोलियों से बचने के लिए दोनों हमलावरों ने अपनेअपने कोनों में कुरसियों के पीछे छिप कर पोजीशन बना और पुलिस पर गोलियां चलाने लगे थे. पुलिसकर्मी भी खुद को सुरक्षित रखते हुए और बाकी लोगों की जान बचाने के लिए जल्द से जल्द उन हमलावरों को ढेर कर देना चाहते थे.

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उधर दूसरी ओर कोर्टरूम के बाहर और पूरे अदालत परिसर में गोलियों की आवाजें गूंजने लगी थीं. लोग अपनी जेब से मोबाइल फोन निकाल कर उस घटना का वीडियो बनाने को आतुर थे. अदालत परिसर में जहांजहां तक गोलियां चलने की आवाजें पहुंच रही थीं, लोग उसे रिकौर्ड कर रहे थे.

जो रिकौर्ड नहीं कर रहे थे, वह जल्द से जल्द अदालत से बाहर निकल कर खुद की जान बचाना चाहते थे. उस समय गोलियों की धायंधायं आवाजें सुन कर जिला अदालत रोहिणी कोर्ट के हर कोने में हर व्यक्ति के दिल में दहशत फैल गई थी.

वहीं कोर्टरूम में गोलियां चलने की आवाजें थमने का नाम ही नहीं ले रही थीं. हमलावर और पुलिसकर्मी दोनों ओर से एकदूसरे पर फायरिंग की जा रही थी.

अगले भाग में पढ़ें- 17 साल की उम्र में एक दुर्घटना में उस का दाहिना कंधा घायल हो गया था

अब और नहीं- भाग 2: आखिर क्या करना चाहती थी दीपमाला

Writer- ममता रैना

पहले भूपेश औफिस से घर जल्दी आता था तो दोनों साथ में खाना खाते, अब देर रात तक दीपमाला उस का इंतजार करती रहती और फिर अकेली ही खा कर सो जाती. कुछ दिनों से भूपेश के रंगढंग बदल गए थे. औफिस में भी सजधज कर जाता. उधर इन सब बातों से बेखबर दीपमाला नन्हें मेहमान की कल्पना में डूबी रहती. उस की दुनिया सिमट कर छोटी हो गई थी.

एक रोज धोने के लिए कपड़े निकालते वक्त उसे भूपेश की पैंट की जेब से फिल्म के 2 टिकट मिले. उसे थोड़ी हैरानी हुई. भूपेश फिल्मों का शौकीन नहीं था. कभी कोई अच्छी फिल्म लगी होती तो दीपमाला ही जबरदस्ती उसे खींच ले जाती.

उस ने भूपेश से इस बारे में पूछा. टिकट की बात सुन कर वह कुछ सकपका गया. फिर तुरंत संभल कर उस ने बताया कि औफिस के एक सहकर्मी के कहने पर वह चला गया था. बात आईगई हो गई.

इस बात को कुछ ही दिन बीते थे कि एक दिन भूपेश के बटुए में दीपमाला को सुनार की दुकान की एक परची मिली. शंकित दीपमाला ने भूपेश के घर लौटते ही उस पर सवालों की बौछार कर दी.

उपासना को जन्मदिन में देने के लिए भूपेश ने एक गोल्ड रिंग बुक करवाई थी, लेकिन किसी शातिर अपराधी की तरह भूपेश उस दिन सफेद झूठ बोल गया. अपने होने वाले बच्चे का वास्ता दे कर.

उस ने दीपमाला को यकीन दिला दिया कि उस के दोस्त ने अपनी पत्नी को सरप्राइज देने के लिए ही परची उस के पास रखवाई है. इस घटना के बाद से भूपेश कुछ सतर्क रहने लगा. अपनी जेब में कोई सुबूत नहीं छोड़ता था.

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दीपमाला की डिलीवरी का समय नजदीक था. भूपेश ने उस के जाने का इंतजाम कर दिया. दीपमाला अपनी मां के घर चली आई. अपने मायके पहुंचने के कुछ दिन बाद ही दीपमाला ने एक बेटे को जन्म दिया. उस की खुशी का ठिकाना नहीं था. उस के दिनरात नन्हे अंशुल के साथ बीतने लगे. 4 दिन दीपमाला और बच्चे के साथ रह कर भूपेश औफिस में जरूरी काम की बात कह कर लौट आया. दीपमाला के न रहने पर वह अब बिलकुल आजाद पंछी था. उस की और उपासना की प्रेमलीला परवान चढ़ रही थी. औफिस में लोग उन के बारे में दबीछिपी बातें करने लगे थे, मगर भूपेश को अब किसी की परवाह नहीं थी. वह हर हालत में उपासना का साथ चाहता था.

कुछ महीने बीते तो दीपमाला ने भूपेश को फोन कर के बताया कि वह अब घर आना चाहती है. जवाब में भूपेश ने दीपमाला को कुछ दिन और आराम करने की बात कही. दीपमाला को भूपेश की बात कुछ जंची नहीं, मगर उस के कहने पर वह कुछ दिन और रुक गई. 3 महीने बीतने को आए, मगर भूपेश उसे लेने नहीं आया तो उस ने भूपेश को बताए बिना खुद ही आने का फैसला कर लिया.

दरवाजे की घंटी पर बड़ी देर तक हाथ रखने पर भी जब दरवाजा नहीं खुला तो दीपमाला को फिक्र होने लगी. ‘आज इतवार है. औफिस नहीं गया होगा. दरवाजे पर ताला भी नहीं है. इस का मतलब कहीं बाहर भी नहीं गया है. तो फिर इतनी देर क्यों लग रही है उसे दरवाजा खोलने में?’ वह सोचने लगी.

कंधे पर बैग उठाए और एक हाथ से बच्चे को गोद में संभाले वह अनमनी सी खड़ी थी कि खटाक से दरवाजा खुला.

एक बिलकुल अनजान लड़की को अपने घर में देख दीपमाला हैरान रह गई. वह कुछ पूछ पाती उस से पहले ही उपासना बिजली की तेजी से वापस अंदर चली गई. भूपेश ने दीपमाला को यों इस तरह अचानक देखा तो उस की सिट्टीपिट्टी गुम हो गई. उस के माथे पर पसीना आ गया.

उस का घबराया चेहरा और घर में एक पराई औरत को अपनी गैरमौजूदगी में देख दीपमाला का माथा ठनका. गुस्से में दीपमाला की त्योरियां चढ़ गईं. पूछा, ‘‘कौन है यह और यहां क्या कर रही है तुम्हारे साथ?’’

भूपेश अपने शातिर दिमाग के घोड़े दौड़ाने लगा. उपासना उस के मातहत काम करती है, यह बताने के साथ ही उस ने दीपमाला को एक झूठी कहानी सुना डाली कि किस तरह उपासना इस शहर में नई आई है. रहने की कोई ढंग की जगह न मिलने की वजह से वह उस की मदद इंसानियत के नाते कर रहा है.

‘‘तो तुम ने यह मुझे फोन पर क्यों नहीं बताया? तुम ने मुझ से पूछना भी जरूरी नहीं समझा कि हमारे साथ कोई रह सकता है या नहीं?’’

‘‘यह आज ही तो आई है और मैं तुम्हें बताने ही वाला था कि तुम ने आ कर मुझे चौंका दिया. और देखो न मुझे तुम्हारी और मुन्ने की कितनी याद आ रही थी,’’ भूपेश ने उस की गोद से ले कर अंशुल को सीने से लगा लिया. दीपमाला का शक अभी भी दूर नहीं हुआ कि तभी उपासना बेहद मासूम चेहरा बना कर उस के पास आई.

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‘‘मुझे माफ कर दीजिए, मेरी वजह से आप लोगों को तकलीफ हो रही है. वैसे इस में इन की कोई गलती नहीं है. मेरी मजबूरी देख कर इन्होंने मुझे यहां रहने को कहा. मैं आज ही किसी होटल में चली जाती हूं.’’

‘‘इस शहर में बहुत से वूमन हौस्टल भी तो हैं, तुम ने वहां पता नहीं किया?’’ दीपमाला बोली.

‘‘जी, हैं तो सही, लेकिन सब जगह किसी जानपहचान वाले की गारंटी चाहिए और यहां मैं किसी को नहीं जानती.’’

भूपेश और उपासना अपनी मक्कारी से दीपमाला को शीशे में उतारने में कामयाब हो गए. दीपमाला उन दोनों की तरह चालाक नहीं थी. उपासना के अकेली औरत होने की बात से उस के दिल में थोड़ी सी हमदर्दी जाग उठी. उन का गैस्टरूम खाली था तो उस ने उपासना को कुछ दिन रहने की इजाजत दे दी.

भूपेश की तो जैसे बांछें खिल गईं. एक ही छत के नीचे पत्नी और प्रेमिका दोनों का साथ उसे मिल रहा था. वह अपने को दुनिया का सब से खुशनसीब मर्द समझने लगा.

दीपमाला के आने के बाद भूपेश और उपासना की प्रेमलीला में थोड़ी रुकावट तो आई पर दोनों अब होशियारी से मिलतेजुलते. कोशिश होती कि औफिस से भी अलगअलग समय पर निकलें ताकि किसी को शक न हो. दीपमाला के सामने दोनों ऐसे पेश आते जैसे उन का रिश्ता सिर्फ औफिस तक ही सीमित हो.

दीपमाला घर की मालकिन थी तो हर काम उस की मरजी से होता था. थोड़े ही अंतराल बाद उपासना उस की स्थिति की तुलना खुद से करने लगी थी. उस के तनमन पर भूपेश अपना हक जताता था, मगर उन का रिश्ता कानून और समाज की नजरों में नाजायज था. औफिस में वह सब के मनोरंजन का साधन थी, सब उस से चुहल भरे लहजे में बात करते, उन की आंखों में उपासना को अपने लिए इज्जत कम और हवस ज्यादा दिखती थी.

समाज में पत्नी का दर्जा क्या होता है, भूपेश और दीपमाला के साथ रहते हुए उसे इस बात का अंदाजा हो गया था. दीपमाला की जो जगह उस घर में थी वह जगह अब उपासना लेना चाहती थी. वह सोचने लगी आखिर कब तक वह भूपेश की खेलने की चीज बन कर रहेगी. कभी न कभी तो भूपेश इस खिलौने से ऊब जाएगा. उपासना को अब अपने भविष्य की चिंता होने लगी.

दो कदम तन्हा- भाग 3: अंजलि ने क्यों किया डा. दास का विश्वास

Writer- डा. पी. के. सिंह 

बालक ने नकरात्मक भाव से सिर हिलाया तो डा. दास ने पूछा, ‘‘लस्सी पीओगे?’’

‘‘नो…नथिंग,’’ बालक को नदी का दृश्य अधिक आकर्षित कर रहा था.

चाय पी कर डा. दास ने सिगरेट का पैकेट निकाला.

अंजलि ने पूछा, ‘‘सिगरेट कब से पीने लगे?’’

डा. दास ने चौंक कर अपनी उंगलियों में दबी सिगरेट की ओर देखा, मानो याद नहीं, फिर उन्होंने कहा, ‘‘इंगलैंड से लौटने के बाद.’’

अंजलि के चेहरे पर उदासी का एक साया आ कर निकल गया. उस ने निगाहें नीची कर लीं. इंगलैंड से आने के बाद तो बहुत कुछ खो गया, बहुत सी नई आदतें लग गईं.

अंजलि मुसकराई तो चेहरे पर स्वच्छ प्रकाश फैल गया. किंतु डा. दास के मन का अंधकार अतीत की गहरी परतों में छिपा था. खामोशी बोझिल हो गई तो उन्होंने पूछा, ‘‘मृणालिनी कहां है?’’

‘‘इंगलैंड में. वह तो वहीं लीवरपूल में बस गई है. अब इंडिया वापस नहीं लौटेगी. उस के पति भी डाक्टर हैं. कभीकभी 2-3 साल में कुछ दिन के लिए आती है.’’

‘‘तभी तो…’’

‘‘क्या?’’

‘‘कुछ भी नहीं, ब्रिलियंट स्टूडेंट थी. अच्छा ही हुआ.’’

मृणालिनी अंजलि की चचेरी बहन थी. उम्र में उस से बड़ी. डा. दास से वह मेडिकल कालिज में 2 साल जूनियर थी.

डा. दास फाइनल इयर में थे तो वह थर्ड इयर में थी. अंजलि उस समय बी.ए. इंगलिश आनर्स में थी.

अंजलि अकसर मृणालिनी से मिलने महिला होस्टल में आती थी और उस से मिल कर वह डा. दास के साथ घूमने निकल जाती थी. कभी कैंटीन में चाय पीने, कभी घाट पर सीढि़यों पर बैठ कर बातें करने, कभी बोटिंग करने.

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डा. दास की पहली मुलाकात अंजलि से सरस्वती पूजा के फंक्शन में ही हुई थी. वह मृणालिनी के साथ आई थी. डा. दास गंभीर छात्र थे. उन्हें किसी भी लड़की ने अपनी ओर आकर्षित नहीं किया था, लेकिन अंजलि से मिल कर उन्हें लगा था मानो सघन हरियाली के बीच ढेर सारे फूल खिल उठे हैं और उपवन में हिरनी अपनी निर्दोष आंखों से देख रही हो, जिसे देख कर आदमी सम्मोहित सा हो जाता है.

फिर दूसरी मुलाकात बैडमिंटन प्रतियोगिता के दौरान हुई और बातों की शुरुआत से मुलाकातों का सिलसिला शुरू हुआ. वह अकसर शाम को पटना कालिज में टेनिस खेलने जाते थे. वहां मित्रों के साथ कैंटीन में बैठ कर चाय पीते थे. वहां कभीकभी अंजलि से मुलाकात हो जाती थी. जाड़ों की दोपहर में जब क्रिकेट मैच होता तो दोनों मैदान के एक कोने में पेड़ के नीचे बैठ कर बातें करते.

मृणालिनी ने दोनों की नजदीकियों को देखा था. उसे कोई आपत्ति नहीं थी. डा. दास अपनी क्लास के टापर थे, आकर्षक व्यक्तित्व था और चरित्रवान थे.

बालक के लिए अब गंगा नदी का आकर्षण समाप्त हो गया था. उसे बाजार और शादी में आए रिश्तेदारों का आकर्षण खींच रहा था. उस ने अंजलि के पास आ कर कहा, ‘‘चलो, ममी.’’

‘‘चलती हूं, बेटा,’’ अंजलि ने डा. दास की ओर देखा, ‘‘चश्मा लगाना कब से शुरू किया?’’

‘‘वही इंगलैंड से लौटने के बाद. वापस आने के कुछ महीने बाद अचानक आंखें कमजोर हो गईं तो चश्मे की जरूरत पड़ गई,’’ डा. दास गंगा की लहरों की ओर देखने लगे.

अंजलि ने अपनी दोनों आंखों को हथेलियों से मला, मानो उस की आंखें भी कमजोर हो गई हैं और स्पष्ट दिखाई नहीं दे रहा है.

‘‘शादी कब की? वाइफ क्या करती है?’’

डा. दास ने अंजलि की ओर देखा, कुछ जवाब नहीं दिया, उठ कर बोले, ‘‘चलो.’’

मैदान की बगल वाली सड़क पर चलते हुए गेट के पास आ कर दोनों ठिठक कर रुक गए. दोनों ने एकदूसरे की ओर देखा, अंदर से एकसाथ आवाज आई, याद है?

मैदान के अंदर लाउडस्पीकर से गाने की आवाज आ रही थी. गालिब की गजल और तलत महमूद की आवाज थी :

‘‘आह को चाहिए इक उम्र असर होने तक…’’

तलत महमूद पटना आए थे.

डा. घोषाल ने रवींद्र भवन में प्रोग्राम करवाया था. उस समय रवींद्र भवन पूरा नहीं बना था. उसी को पूरा करने के लिए फंड एकत्र करने के लिए चैरिटी शो करवाया गया था. बड़ी भीड़ थी. ज्यादातर लोग खड़े हो कर सुन रहे थे. तलत ने गजलों का ऐसा समा बांधा था कि समय का पता ही नहीं चला.

डा. दास और अंजलि को भी वक्त का पता नहीं चला. रात काफी बीत गई. दोनों रिकशा पकड़ कर घबराए हुए वापस लौटे थे. डा. दास अंजलि को उस के आवास तक छोड़ने गए थे. अंजलि के मातापिता बाहर गेट के पास चिंतित हो कर इंतजार कर रहे थे. डा. दास ने देर होने के कारण माफी मांगी थी. लेकिन उस रात को पहली बार अंजलि को देर से आने के लिए डांट सुननी पड़ी थी और उस के मांबाप को यह भी पता लग गया कि वह डा. दास के साथ अकेली गई थी. मृणालिनी या उस की सहेलियां साथ में नहीं थीं.

हालांकि दूसरे दिन मृणालिनी ने उन्हें समझाया था और डा. दास के चरित्र की गवाही दी थी तब जा कर अंजलि के मांबाप का गुस्सा थोड़ा कम हुआ था किंतु अनुशासन का बंधन थोड़ा कड़ा हो गया था. मृणालिनी ने यह भी कहा था कि डा. दास से अच्छा लड़का आप लोगों को कहीं नहीं मिलेगा. जाति एक नहीं है तो क्या हुआ, अंजलि के लिए उपयुक्त मैच है. लेकिन आजाद खयाल वाले अभिभावकों ने सख्ती कम नहीं की.

बालक ने अंजलि का हाथ पकड़ कर जल्दी चलने का आग्रह किया तो उस ने डा. दास से कहा, ‘‘ठीक है, चलती हूं, फिर आऊंगी. कल तो नहीं आ सकती, शादी है, परसों आऊंगी.’’

‘‘परसों रविवार है.’’

‘‘ठीक तो है, घर पर आ जाऊंगी. दोपहर का खाना तुम्हारे साथ खाऊंगी. बहुत बातें करनी हैं. अकेली आऊंगी,’’ उस ने बेटे की ओर इशारा किया, ‘‘यह तो बोर हो जाएगा. वैसे भी वहां बच्चों में इस का खूब मन लगता है. पूरी छुट्टी है, डांटने के लिए कोई नहीं है.’’

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डा. दास ने केवल सिर हिलाया. अंजलि कुछ आगे बढ़ कर रुक गई और तेजी से वापस आई. डा. दास वहीं खड़े थे. अंजलि ने कहा, ‘‘कहां रहते हो? तुम्हारे घर का पता पूछना तो भूल ही गई?’’

‘‘ओ, हां, राजेंद्र नगर में.’’

‘‘राजेंद्र नगर में कहां?’’

‘‘रोड नंबर 3, हाउस नंबर 7.’’

‘‘ओके, बाय.’’

Manohar Kahaniya: आस्था की चोट- भाग 3

सौजन्य- मनोहर कहानियां

Writer- शाहनवाज 

लेकिन अब जब अरुण हर रात को सोने अपनी फैक्ट्री चला जाता था तो आस्था को भी अरुण पर शक होने लगा था. आस्था के मन में पति के खिलाफ शक उठता कि अरुण का भी कहीं बाहर कोई चक्कर तो नहीं चल रहा.

आस्था के मन में पति के खिलाफ शक पैदा होने के बाद से बीच में कुछ समय के लिए उन दोनों के बीच झगड़े होने बंद हो गए थे. लेकिन अरुण उस के बावजूद भी रात को सोने के लिए अपनी फैक्ट्री में ही चला जाता था.

उसे फैक्ट्री में सोने, शराब पीने, सिगरेट फूंकने इत्यादि की मानो लत सी लग गई थी. उस के ऐसा करने पर आस्था के मन में अरुण के लिए और भी ज्यादा संदेह पैदा होने लगा था.

इस बीच वह अरुण को उस की संपत्ति अपने बच्चों और उस के नाम करने के लिए दबाव बनाने लगी. आस्था को लगता था कि यदि अरुण का बाहर किसी और लड़की से संबंध हुआ तो कहीं वह उसे और उस के बच्चों को बेदखल न कर दे.

दोस्त से करा दी पति की पिटाई

संपत्ति ट्रांसफर करने की बात से अरुण खीझ उठता था. वह जीते जी यह नहीं चाहता था कि उस की मेहनत से कमाई हुई संपत्ति को वह आस्था के नाम कर दे.

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इन सारी बातों को ले कर आस्था और अरुण के बीच एक बार फिर से 28 सितंबर, 2021 की रात को झगड़ा हुआ. दोनों के बीच झगड़ा इतना ज्यादा बढ़ गया कि अरुण ने आस्था की पिटाई कर दी.

उसी रात डा. आस्था ने अपने उसी दोस्त को फोन कर के अरुण के साथ हुई मारपीट के बारे में सब कुछ बता दिया और वह भी अरुण के सामने.

यह देख कर अरुण पूरी तरह से अपने होश खो चुका था. उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह क्या करे. देखते ही देखते कुछ ही पलों में आस्था का प्रेमी उन के घर पहुंच गया और उस ने बच्चों के सामने आस्था पर हाथ उठाने के लिए अरुण को खूब मारापीटा.

इस घटना के बाद अरुण का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया. उस ने मन ही मन आस्था को जान से मारने का फैसला कर लिया. मार खा कर वह फैक्ट्री में विकास से मिला और उसे सारी घटना बताते हुए आस्था को जान से मारने के अपने विचार के बारे में भी बताया.

विकास बेशक काम सिक्युरिटी गार्ड का करता था लेकिन वह कई कौन्ट्रैक्ट किलर्स को जानतापहचानता था, जो पैसों के लिए किसी की भी जान ले सकते थे.

विकास ने अरुण को 2 कौन्ट्रैक्ट किलर्स से मिलवाया, अशोक उर्फ टशन और पवन. दोनों से बातचीत कर अरुण ने एक लाख रुपए में पत्नी को जान से मारने का कौन्ट्रैक्ट दे दिया.

अरुण ने 60 हजार रुपए एडवांस में दे कर दिन और टाइम तय कर लिया. 13 अक्तूबर, 2021 की रात को वे चारों लोग अरुण की गाड़ी में सवार हो कर उस के घर पहुंचे.

उस के बाद अरुण ने बच्चों को डराधमका कर टीवी वाले कमरे में बंद कर के टीवी का वौल्यूम बढ़ा दिया और तीनों के साथ मिल कर पत्नी आस्था की गला दबा कर हत्या कर दी. हत्या करने के बाद उन्होंने उस की लाश छत के हुक से लटका दी ताकि मामला आत्महत्या का लगे.

हत्या के बाद हत्यारे अपनेअपने रास्ते निकल गए और अरुण बच्चों को ले कर घर पर ताला लगा कर अपने भाई तरुण के घर पहुंच गया. उस ने अपने बड़े भाई तरुण को आस्था की हत्या की बात बता दी और अपने बच्चों और चाबियां सौंप कर दिल्ली के लिए निकल गया.

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कौन्ट्रैक्ट किलर्स को बाकी के पैसे उसे वहीं देने थे. पैसे देने के बाद उस के पास अपने पैसे खत्म हो गए थे. वह पैसे लेने के लिए कासिमपुर आया था और विकास को फोन करने के लिए अपना फोन चालू किया, तभी उस की लोकेशन पुलिस को पता चल गई और वह पकड़ा गया.

अभी तक डा. आस्था अग्रवाल की हत्या के 4 आरोपी पकड़े जा चुके हैं. पहले तरुण अग्रवाल, फिर अरुण अग्रवाल, सिक्युरिटी गार्ड विकास और कौन्ट्रैक्ट किलर पवन. पांचवां आरोपी अशोक उर्फ टशन अभी भी पुलिस की गिरफ्त में नहीं आ पाया, वह कथा लिखे जाने तक फरार था.

काशी में चलेंगी सीएनजी आधारित बोट

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी  ने पिछली देव दीपावली पर काशी में जब क्रूज़ से गंगा की सैर की थी तभी उन्होंने डीजल से चलने वाली बोट के ज़हरीले धुएं और शोर से गंगा को मुक्ति दिलाने के लिए तयकर लिया था. उत्तर प्रदेश  के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इसका बखूबी जिम्मा लिया.

वाराणसी में गंगा में चलने वाली करीब 500 मोटर बोट को 19 नवंबर देव दीपावली तक सीएनजी से चलाने का लक्ष्य है. आने वाले समय में गंगा में शत प्रतिशत बोट सीएनजी से चलाने की योजना है. मोक्षदायिनी गंगा दुनिया की पहली नदी होगी, जहां इतने बड़े पैमाने पर सीएनजी आधारित बोट चलेंगी.

धर्म नगरी काशी में आने वाले पर्यटक गंगा में बोटिंग करके अर्धचंद्राकार घाटों के किनारे सदियों से खड़ी इमारतों, मंदिर-मठों को देखते हैं. अब यहाँ आने वाले पर्यटकों को गंगा में बोटिंग करते समय ज़हरीले धुएं और बोट की तेज आवाज से मुक्ति मिलने वाली है. सभी डीज़ल आधारित बोटों को देव दीपावली तक सीएनजी आधारित  करने का लक्ष्य है . वाराणसी दुनिया का पहला शहर होगा, जहां इतने बड़े पैमाने पर सीएनजी से नावों का संचालन होगा. गंगा में फ्लोटिंग सीएनजी स्टेशन की भी योजना है. इससे गंगा के बीच में भी सीएनजी भरी जा सकेगी.

स्मार्ट सिटी के जीएम डी वसुदेवम ने बताया कि गंगा में क़रीब 1700 छोटी-बड़ी नावें चलती हैं. इनमे से करीब 500 बोट डीज़ल इंजन से चलने वाली है. लगभग 177 बोट में सीएनजी इंजन लगा चुका है. बचे हुए मोटर बोट को देव दीपावली तक सीएनजी इंजन से चला देने का लक्ष्य है. ये काम गेल इण्डिया कोर्पोरेट सोशल रिस्पांसबिल्टी के तहत करा रही है. करीब 29 करोड़ के बजट से 1700 छोटी और बड़ी नाव में सीएनजी इंजन लगया जा रहा है. इसमें छोटी नाव पर करीब 1.5 लाख का खर्च आ रहा है, जबकि बड़ी नाव और बज़रा पर लगभग 2.5 लाख का ख़र्च है . नाविकों के नाव में सीएनजी किट मुफ़्त लगाया जा रहा है. स्मार्ट सिटी के प्रोजेक्ट मैनेजर सुमन कुमार राय ने बताया कि जिस नाव पर सीएनजी आधारित इंजन लगेगा, उस नाविक से डीज़ल इंजन वापस ले लिया जाएगा. घाट पर ही डाटर स्टेशन हैं. जेटी पर डिस्पेंसर भी लग गया है. नाविकों का कहना है कि सीएनजी इंजन से आधे खर्चे में दुगनी दूरी तय  कर रहे हैं. धुआँ और तेज आवाज नहीं होने से पर्यटकों को भी अच्छा लग रहा है.

सीएनजी से प्रदूषण भी होगा कम

सीएनजी आधारित इंजन डीज़ल और पेट्रोल इंजन के मुक़ाबले 7 से 11 प्रतिशत  ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन कम करता है, वहीं सल्फर डाइऑक्सइड जैसी गैसों के न निकलने से भी प्रदूषण कम होता है. डीजल इंजन से नाव चलाने पर जहरीला धुआं निकलता है जो आसपास रहने वाले लोगों के लिए बहुत हानिकारक है, जबकि सीएनजी के साथ ऐसा नहीं है. डीजल इंजन की तेज आवाज़ से कंपन होता है, जिससे इंसान के साथ ही जलीय जीव-जन्तुओं पर बुरा असर पड़ता है और इको सिस्टम भी खराब होता है. इसके साथ ही घाट के किनारे हज़ारों सालों से खड़े  ऐतिहासिक धरोहरों को भी नुकसान पहुंच रहा था. डीजल की अपेक्षा सीएनजी कम ज्वलनशील होती है अतः इससे चालित नौकाओं से आपदाओं की आशंका कम होगी.

निरहुआ के गाने पर Amrapali Dubey ने लगाए ठुमके, देखें Viral Video

भोजपुरी एक्ट्रेस (Bhojpuri Actress) आम्रपाली दुबे (Amrapali Dubey)  इन दिनों सोशल मीडिया पर काफी एक्टिव रहती हैं. आए दिन एक्ट्रेस का फोटोज और वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होता है.

अब निरहुआ के गाने ‘ए राजा हमके बनारस घुमाई दा’ (Ae Raja Hamke Banaras ghumayi da) पर आम्रपाली दुबे का डांस वीडियो वायरल हो रहा है. इस वीडियो में वह जोरदार ठुमके लगाते हुए दिखाई दे रही हैं.

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दरअसल आम्रपाली दुबे ने इंस्टाग्राम पर एक डांस वीडियो शेयर किया है, जिसमें वो लॉन्ग ड्रेस में नजर आ रही हैं और बैकग्राउंड में दिनेश लाल यादव निरहुआ का पुराना गाना ‘ए राजा हमके बनारस घुमाई द’ पर डांस कर रही हैं.

 

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एक्ट्रेस ने इस वीडियो को शेयर कर कैप्शन में लिखा है कि  ये वाला तो दोबारा बनाना ही था बॉस. एक्ट्रेस के इस पोस्ट पर एक यूजर ने लिखा, वाह गजब परफॉर्मेंस है  तो  दूसरे यूजर ने लिखा, आओ मैम घुमा देता हूं.’

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वर्कफ्रंट की बात करें तो आम्रापाली और निरहुआ की फिल्म ‘फसल’ जल्द ही धमाल मचाने आ रही है. इसके साथ ही वे फिल्म ‘हम हैं दूल्हा हिंदुस्तानी’ में भी नजर आएंगे. इसका ट्रेलर और फर्स्ट लुक रिलीज किया जा चुका है.

 

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