जानें क्यों हैं टीवी क्वीन एकता कपूर का ये बर्थडे स्पेशल

टीवी सीरियल क्वीन के नाम से पचाने जाने वाली निर्माता एकता कपूर आज अपना 44 वां जन्मदिन मना रही है. एकता  7 जून 1975 को मुंबई में जन्मी थी. इस साल एकता बर्थ डे बेहद खास है, वजह है उनके घर आया नन्हा मेहमान हैं. बता दे की एकता कपूर हाल ही में सेरोगेसी के जरिए मां बनी है. अपनी पूरी जिंदगी अपनी शर्तों पर अपने हिसाब से रहने वाली एकता कपूर ने अभी तक शादी नहीं की है. लेकिन मां बनने का सपना उन्होंने आखिरकार पूरा कर लिया है. एकता कपूर के बर्थडे पर टीवी इंडस्ट्री उन्हें विश करना शुरू कर चुकी है.  एकता के कैरियर की बात करें तो उन्होंने 23 साल पहले ‘मानो या ना मानो’ सीरियल से टेलीविजन की दुनिया में कदम रखा था. इसके बाद ‘हम पांच’, ‘कोशिश – एक आशा’ और ‘कसम’ जैसे कई सीरियल आई. इन सीरियल ने एकता को टेलीविजन की दुनिया में पहचान दिला दी थी. हालांकि एकता को उस वक्त का इंतजार था जब वह सीरियल की दुनिया में क्रांति ला दें. वह वक्त आया भी, जिसने एकता कपूर को सीरियल की दुनिया की क्वीन बना दिया.

 

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New haircut!!!!! Laquuuuu❤️

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This is US! @shobha9168 @tusshark89 missing from d pic!

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फैंस और दोस्तों ने किया विश

सोशल मीडिया पर ढेरों फैंस उनको विश करने में लगे हैं तो एकता के करीबी लोग स्पेशल पोस्ट डालकर उनको विश कर रहें हैं.

 

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Poutathon with the. Skinny bestie

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स्मृति ईरानी का स्पेशल बर्थ डे विश

महिला एवं बाल विकास मंत्री और बेहद खास दोस्त स्मृति ईरानी ने उन्हें विश करते हुए लिखा है,- ‘तुमने हमेशा अपनी मुस्कुराहट के साथ हमारे जीवन को उज्ज्वल बनाया है. तुम्हारा साथ हमें मजबूत रखता हैं, फिर चाहे कोई भी लड़ाई क्यों न हो. तुम्हें हमेशा से विश्वास रहा है कि वक्त हर घाव ठीक कर देता है और समय ही न्याय करने में मदद करता है. भगवान हमेशा आपके साथ रहा है. हमारी ईरानी परिवार में आपको बयां करने के कई तरीके हैं लेकिन शब्द इसके लिए काफी नहीं है. हैप्पी बर्थडे रॉकस्टार मौसी’.

अनिता हसनंदानी ने किया एकता को विश

अनिता हसनंदानी ने भी लिखा है, ‘मम्मी एकता आपको जन्मदिन की ढेर सारी शुभकामनाएं, ये साल थोड़ा ज्यादा स्पेशल है. क्योंकि इस साल तुम ज्यादा जिम्मेदार, ज्यादा खुश और ज्यादा फोकस हो अपने काम के लिए. और हमेशा की तरह ज्यादा सेक्सी. रवि तुम्हें अपनी मां के रुप में पाकर वाकई बेहद लकी है और मैं लकी हूं तुम जैसा दोस्त पाकर. एक बार फिर जन्मदिन की ढेर सारी शुभकामनाएं.’

‘‘इंटीमेसी के आधार पर फिल्म बेचना हमारा मकसद नही…’’

‘‘फिल्म‘हिप्पी’से हर युवा रिलेट करेगा..’’ दिगांगना सूर्यवंशी

अमूूमन टीवी या फिल्मों में बाल कलाकार के रूप में अभिनय करियर की शुरूआत करने वाले कलाकार युवा होते ही गायब हो जाते हैं. मगर छह साल की उम में टीवी सीरियलों में बाल कलाकार के रूप में करियर शुरू करने वाली दिगांगना सूर्यवंशी अब 21 साल की उम्र में फिल्मो में हीरोईन बन चुकी हैं. बाल कलाकार के रूप में जबरदस्त शौहरत बटोरने के बाद 14 साल की उम्र में उन्होंने सीरियल ‘‘वीरा-ंवीर एक अरदास’ में लीड किरदार निभाया. 18 साल की उम्र में वह ‘बिग बाौस’’में नजर आयीं. अब 21 साल की उम्र में ‘फ्रायडे’,‘जलेबी’और ‘रंगीला राजा’ यह तीन फिल्में बतौर हीरोइन रिलीज हो चुकी हैं. यह एक अलग बात है कि इन तीनों फिल्मों ने बाक्स आफिस पर पानी नहीं मांगा. पर अब सात जून को उनकी पहली तेलगू फिल्म ‘‘हिप्पी’’रिलीज हो रही है,जिसमें वह तेलगू फिल्मों के स्टार कार्तिक के साथ हीरोइन हैं. इतना ही नही दिगांगना सूर्यवंषी ने 16 व-नुवजर्या की उम्र में ही अंग्रेजी भा-नुवजयाा में एक उपन्यास ‘‘निक्सी द मरमेड एंड द पावर आफ लव’’ लिखा था, जिसे काफी लोकप्रियता मिली थी.दिगांगना के दो कविता संग्रह छप चुके हैं. वह अब तक दो से अधिक गीत लिख चुकी हैं. कुछ गीत अपने ही संगीत निर्देशन में रिकार्ड भी किया है.दो फिल्मों की पटकथाएं भी लिख रखी हैं.

 

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अक्सर देखा गया है कि बाल कलाकार युवावस्था में सफल नहीं हो पाते?

इमानदारी से कहूं तो मैं सिर्फ अपने बारे में ही बात कर सकती हूं. दूसरे कलाकारों पर कोई प्रतिक्रिया दे पाना मेरे लिए संभव नहीं है. अभिनय को एक रचनात्मक काम समझकर मैने बाल कलाकार के रूप में अभिनय करना शुरू किया था. उस वक्त मेरे दिमाग में यह नहीं था कि इससे पैसा कमा सकते हैं या इससे शौहरत मिलेगी. लोग मेरे प्रशंशक बनेंगे. मु-हजये अच्छी तरह से याद है कि मेरी लगभग आठ साल की उम्र रही होगी और उस वक्त तक बाल कलाकार के तौर पर मेरे दो सीरियल आ चुुके थे.एक दिन मैने पाया कि स्कूल में मेरे लिए अलग से बेंच रखी गयी थी. मैने सोचा कि अरे अचानक ऐसा क्या हुआ कि मुझे इतना स्पेशल ट्रीटमेंट दिया जा रहा है. जबकि सात आठ साल की उम्र में आपको कोई गंभीरता से नहीं लेता.दूसरी बात मैं अपने स्कूल के बच्चों के बीच वैसे ही लोकप्रिय थी.मैने अपनी बेंच अपने दूसरे साथियों के साथ ही मिला ली. इतना ही नहीं कई टीवी एड करके भी मैं काफी लोकप्रिय हो गयी थी.पर जब मैं थोड़ी बड़ी हुई, तो मुझे टीवी एड मिलने कम हो गए. क्योंकि हम बच्चों की उम्र वाले ब्रैकेट में फिट नही बैठते थे. तब मुझे अहसास हुआ कि अब मैं बड़ी हो गयी हूं. उसके बाद समय आया जब मेरी उम्र चैदह साल की थी.न मैं छोटी थी और न ही बड़ी थी. यह अजीब सा दौर था. तब मेरे माता पिता ने सम-हजयाया कि यह एक यात्रा है. बाल कलाकार के तौर पर करियर शुरू किया और 14 साल की होते होते मैंने छोड़ दिया. मैने मान लिया था कि अब मैं बाल कलाकार नही रही. फिर मैंने तय किया कि अब मु-हजये टीवी नही करना है. जब मेरा सीरियल‘वीरा’ काफी हिट हुआ,तभी मेरी 12वीं की परीक्षाएं आ गयी. लोगों ने कहा कि 12 वीं की परीक्षा देने की क्या जरुरत. तुम तो वैसे ही स्टार बन चुकी हो. तब मैंने सबसे कहा कि मैं गंवार नही रह सकती. मुझे पढ़ाई करनी है. मैंने परीक्षा षुरू होने से दस दिन पहले किताबें खरीदी थी. मुझे पचास पचास पन्ने के संवाद आसानी से याद हो जाते हैं.मु-हजये हमेशा लगता है कि अभी मुझे और भी कुछ करना है. कुछ और बेहतर करना है. 20 साल की उम्र मे मैने फिल्मों  में बतौर हीरोईन काम करते हुए फिल्म‘‘फायडे’’ साइन की थी.

 

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Smile… compose… and decide…

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फिल्म‘‘फ्रायडे ’’कैसे मिली थी?

इसकी रोचक कहानी है.मैंने फ्रायडे के औडीशन भी नहीं दिया था. मुझे याद है कि मेरा 20वां जन्मदिन था. अब तक मेरा जन्मदिन मुंबई में ही मनाया जाता रहा है. इस बार पापा ने कहा कि हम अपने पैतृक स्थान सागर, मध्प्रदेश में सभी रिश्तेदारों  के बीच आपका जन्मदिन मनाएंगे. वहां पर होटल बुक कराया था. बहुत बड़ा जश्न हो रहा था. वहीं पर कास्टिंग डायरेक्टर का फोन आया कि एक फिल्म है, जिसमें गोविंदा व वरूण षर्मा हैं. गोविंदा के अपोजित मेरा किरदार था.उसने कहानी सुनने के लिए कहा.मैने मना कर दिया.मैं गोविंदा सर की काॅमेडी की कायल हूं.मैने खुद कभी कामेडी की नहीं हैं. इसलिए मैं यह फिल्म करने के लिए तैयार हो गयी.मेरे लिए यह बड़ा ब्रेक था. अभिषेक डोगरा इस फिल्म के निर्देशक थे.उन्होने‘डौली की डोली’ निर्देशित की थी. मैने उससे कहा कि मैं सागर हॅूदो दिन बाद मुंबई आ रही हूं. दो दिन बाद मुलाकात हुई और ‘चट मंगनी पट ब्याह’ वाला मसला हो गया. दो दिन बाद निर्देषक अभि-नुवजयोक कपूर से मिली. फिर गोविंदा सर से मिली. जब वापस मैं कार में बैठ रही थी,तभी अभि-नुवजयोक का फोन आ गया कि सब कुछ तय हो गया.हम अगले सप्ताह शुटिंग करने वाले हैं. उसके बाद मैने ‘जलेबी’की.

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लेकिन करियर की षुरूआत में ‘‘फ्रायडे’’ करना रिस्क नहीं थी?

निर्देशक अभिषेक डोगरा की पहली फिल्म असफल हो चुकी थी. गोविंदा काक रिर नह चल रहा . वरूण शर्मा की कोई पहचान नही है.

रिस्क कहां नही है.आपको खुद नहीं पता कि कल क्या होेने वाला है. दूसरी बात हर फिल्म की अपनी डेस्टिनी होती है.कलाकार की अपनी डेस्टिनी होती है.फिर मुझे यह फंडा कभी समझ में नहीं आता कि कोई इंसान अपना करियर प्लान कर सकता है. यहां जिनके कुछ बनने की उम्मीद नहीं होती है, वह शिखर पर पहुंच जाते हैं.यहां कभी भी कुछ भी हो सकता है.जिनसे उम्मीद होती है,वह कुछ नहीं कर पाते.जब मुझे ‘फ्रायडे’ का आफर मिला, तो मैने सोचा कि क्या यह वैसी फिल्म है,जिसे मैं खुद  देखना पसंद करुंगी. मुझे जवाब हां में मिला. फिल्म की सफलता या असफलता तय करने वाली मैं कौन होती हूं. जहां तक गोविंदा सर का सवाल है,तो उन्होेने बीच में कुछ अलग तरह की फिल्में की थी. ‘फ्रायडे’पूरी तरह से उनके लिए फिल्म थी.वरूण ‘फुकरे’की वजह से चर्चा में थे. मैने अभिषेक डोगरा की फिल्म‘डौली की डोली’देखी हुई थी. मुझे ऐसा नहीं लगा कि यह फिल्म देखने लायक नही है.अब वह फिल्म असफल हुई थी,यह अलग बात है.


मगर बाौलीवुड में सब कुछ सफलता के आधार पर ही तय होता है?

यह एकदम सच है.पर उस वक्त मेरे लिए सफलता की बात सोचने की बनिस्बत फिल्मों में प्रवेष पाना मायने रख रहा था.इमानदारी से कह रही हॅू.फिल्मों में प्रवेष पाना आसान नही है.फिर मैं पार्टी पर्सन नही हूं. मैंने कइयों को देखा है कि वह पाॅंच छह व-ुनवजर्याांे से लांच होने का इंतजार कर रहे हैं.मेरे दिमाग में यह साफ था कि मैने किसी और को देखकर अभिनय करने का निर्णय लिया नहीं था. मेरे दिमाग में था कि यदि आप अच्छा काम करते हो,तो उससे दूसरा अच्छा काम आपके पास खिंचा चला आता है.आप उटपटांग काम करोगे,तो अच्छा काम नही मिलेगा.

आपकी‘‘फ्रायडे’’,‘‘जलेबी’’और‘‘रंगीला राजा’’ तीन फिल्में रिलीज हुई. फिल्म इंडस्ट्ी से किस तरह का रिस्पाॅंस मिला?

इमानदारी की बात यह रही कि मुझे नकारात्मक रिव्यू नहीं मिले. फिल्म की असफलता की कई वजहें होती हैं. फिल्म कितने थिएटर में रिलीज हुई, किसके साथ रिलीज हुई, किस तरह के दर्शकों के बीच रिलीज हुई, क्या सही संदेश मिला. अब इन मसलों पर मेरी दखलंदाजी नहीं हो सकती. पर 20 साल की उम्र में अपने बलबूते पर फिल्म का चयन करना और अपनी ईमेज बना लेने की बात करना बहुत बड़ी बात है.मुझे लगता है कि फिल्म इंडस्ट्री के बीच यह बात पहुंच गयी कि दिगंगना बेहतरीन अदाकारा है. पर फिल्म के न चलने का दुःख जरुर हुआ. पर फिल्म की असफलता के लिए मैं कहीं से भी जिम्मेदार नहीं हूं. मैं यह तय नही कर सकती कि एडीटिंग टेबल पर फिल्म के पहुंचने के बाद किस तरह की फिल्म बनकर निकलेगी? या फिल्म का प्रमोशन किस तरह से होगा.फिल्म के रिलीज को लेकर पचास तरह की चीजें होती हैं,जिन पर मेरा अधिकार नहीं रहता. पर दो तीन फिल्मे करने के बाद अनुभव हो जाता है. दूसरा यह समझ में आ जाता है कि आपको कौन सी फिल्म कभी नही करनी चाहिए. इन दिनों मैं तेलगू फिल्म ‘‘हिप्पी’’को लेकर उत्साहित हूं.

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फिल्म‘‘हिप्पी’’को लेकर क्या कहेंगी?

यह एक प्रेम कहानी वाली फिल्म है.मेरा किरदार जबरदस्त है.फिल्म की लीडॉ हीरोईन हूं. बहुत पोटेंशियल वाला किरदार है. इस फिल्म में सब कुछ है.जितने भी डायनामिक हो सकते हैं,वह सब हैं.बहुत ही यंग लव स्टोरी है,जिसके साथ हर युवा जुड़ सकेंगे. फिल्म में मेरे संवाद काफी हैं.फिल्म के किरदार का नाम नही बता सकती. श्रीलंका,चेन्नई,हैदराबाद, पंडीचेरी में ‘‘हिप्पी’’को फिल्माया है. फिल्म के हीरो कार्तिकेय रेड्डी के साथ काम करने का अनुभव क्या रहा? बहुत अच्छे अनुभव रहे.वह हैदराबाद का रहने वाला है.इसलिए उसे हिंदी भी अच्छी आती है. बहुत अंतमुर्खी है.पर हम जल्द ही अच्छे दोस्त बन गए थे.हंसी मजाक के साथ शूटिंग की.

फिल्म‘‘हिप्पी’में इंटीमसी सीन के होने की काफी चर्चाएं हैं?

मैने इससे पहले कभी इस तरह के सीन नहीं किए हैं. पहली मीटिंग के दौरान ही निर्देेशक ने बताया था कि फिल्म में एक छोटा सा इंटीमसी का सीन है, मगर वह फिल्म में काफी बाद में है. मैं बहुत इमोषनल इंसान हूं.हर दृष्य को फील करके उसे करती हूं.मु-हजये रोने के दृष्य के लिए कभी भी ग्लीसरीन का उपयोग करने  की जरुरत नहीं पड़ी. देखिए,कला व वल्गैरिटी में बहुत बारीक अंतर होता है. हमने इस दृष्य को इस तरह बनाया है कि वह कला नजर आए न कि वल्गैरिटी.फिल्म में इंटीमसी  के सीन अब्जेक्टीफाई नहीं हैं.हमारा मकसद इन दृष्यों के माध्यम से दर्षकों को सिनेमाघर के अंदर बुलाना नहीं है.इंटीमसी के आधार पर फिल्म बेचाना हमारा मकसद नही.यह इंटीमसी का सीन फिल्म में एक ऐसे प्वाइंट पर आता है,जब आप उसे अनदेखा कर जाएंगे.कहीं भी खटकेगा नहीं.

इस सीन को शूट करना आपके लिए कितना सहज रहा?

इस दृष्य के फिल्मांकन के समय हम यह सोच रहे थे कि हम सही दिषा में खड़े हैं या नहीं…कैमरा एंगल क्या है, ठंड अलग से लग रही थी.तो दिमाग में था कि जितनी जल्दी यह सीन हो जाए,उतना अच्छा..ऐसे में  हमने अन्य दृष्यों की ही तरह इसे भी सहजता से ही षूट किया.रीयल लाइफ के घटनाक्रम अलग होते हैं,पर शूटिंग के दौरान हमारा दिमाग सतत कला व तकनिक को लेकर काम करता रहता है. उस वक्त हमारा दिमाग इस बात पर फोकस था कि यह विजुवल सही दिख रहा है या नही, इसलिए हम कुछ भी असहज महसूस नहीं करते.कंफर्ट इसलिए था कि हम पूरी फिल्म षूट कर चुके थे. पूरी युनिट से हम परिचित थे. युनिट के लोग इस बाद से परिचित थे कि हम किस दायरे में इस तरह के दृष्य षूट कर सकते हैं.हर इंसान के अपने अपने दायरे होेते हैं.

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‘‘हिप्पी’’के साथ युवा पी-सजय़ी क्यों रिलेट करेगी?

हर पी-सजय़ी इसके साथ रिलेट करेगी. यह एक कमरे की कहानी है. यह अलग तरह की प्रेम कहानी है. इसमें हम इस पर बात कर रहे हैं कि रिलेशनशिप में रहना या न रहना यह सारी चीजें इस पर निर्भर करता है कि प्यार क्या है.

प्यार के पैरामीटर क्या हैं?

आज की तारीख में प्यार क्या है?उसकी बात यह फिल्म करती है.आज की तारीख में एक लड़के व लड़की के लिए रिष्ता क्या है?इन दोनो की अपनी निजी यात्रा है, दोनों की अपनी अपनी सोच व विचार धारा है.जब दो अपने तरीके के लोग होते हैं और वह रिलेशनशिप में होते हैं, तो वह ज्यादा टिकी  होता है.

प्यार को लेकर आपकी अपनी सोच क्या है?

प्यार हो जाता, तो ज्यादा बेहतर तरीके से बता पाती.समानता का व्यवहार हो.सम-हजय हो. विचार एक समान हो. जिंदगी को लेकर अप्रोच, सोच यह सब एक जैसी होनी चाहिए. यदि बेसिक लेवल पर ही क्लैष हो गया, तब तो रिलेषनषिप गयी तेल लगाने.सम-हजयदारी बहुत जरुरी है.मु-हजये रोमांटिक ही नही किसी भी रिष्ते में यह बात पसंद नहीं कि आप सामने वाले के लिए कुछ करें और फिर उसे जताएं.

Edited by – Neelesh Singh Sisodia

डाक्टर नहीं जल्लाद

साल 1981 में राजतिलक द्वारा निर्देशत एक फिल्म आई थी ‘चेहरे पे चेहरा’. यह एक थ्रिलर और हौरर फिल्म थी. फिल्म के केंद्रीय पात्र संजीव कुमार थे, जिन्होंने एक वैज्ञानिक और डा. विल्सन का किरदार निभाया था. विल्सन एक ऐसा कैमिकल ईजाद कर लेता है, जो आदमी की बुराइयों को खत्म कर सकता है. इस कैमिकल का प्रयोग वह सब से पहले खुद पर करता है, लेकिन इस का असर उलटा हो जाता है. विल्सन के भीतर की बुराइयों का प्रतिनिधित्व करता एक और किरदार ब्लैक स्टोन उस की अच्छाइयों पर हावी होने लगता है.

सी ग्रेड की यह फिल्म हालांकि दर्शकों ने ज्यादा पसंद नहीं की थी, लेकिन फिल्म यह संदेश देने में सफल रही थी कि आदमी के अंदर अच्छाइयां और बुराइयां दोनों मौजूद रहती हैं. इन में से जिसे अनुकूलताएं मिल जाती हैं, वह बढ़ जाती हैं.

मध्य प्रदेश के होशंगाबाद के एक डाक्टर सुनील मंत्री की कहानी या किरदार काफी हद तक विल्सन के दूसरे चेहरे ब्लैक स्टोन से मिलताजुलता है, जिस के भीतर का हैवान या पिशाच बगैर कोई कैमिकल दिए ही जाग गया था.

होशंगाबाद के आनंदनगर में रहने वाले इस हड्डी रोग विशेषज्ञ की पोस्टिंग नजदीक के कस्बे इटारसी के सरकारी अस्पताल में थी. सुनील मंत्री पोस्टमार्टम भी करता था, लिहाजा लाशों को चीरफाड़ कर मौत की वजह निकालना उस का काम था. अकसर होशंगाबाद-इटारसी अपडाउन करने वाले इस डाक्टर की जिंदगी की कहानी भी हिंदी फिल्मों सरीखी ही है.

अब से कोई सवा साल पहले तक सुनील मंत्री की जिंदगी में कोई कमी नहीं थी. उस के पास वह सब कुछ था, जिस की तमन्ना हर कोई करता है. इज्जतदार पेशा, खुद का मकान व कारें और सुंदर पत्नी सुषमा के अलावा बेटा श्रीकांत और बेटी जो नागपुर के एक नामी कालेज में पढ़ रही है. बेटा श्रीकांत भी मुंबई की एक प्राइवेट कंपनी में नौकरी करता है.

वक्त काटने और कुछ और पैसा कमाने की गरज से सुषमा ने साल 2010 में एक बुटीक खोला था. इसी दौरान उन के संपर्क में रानी पचौरी नाम की महिला आई, तो उन्होंने उसे भी अपने बुटीक में काम पर लगा लिया.  रानी मेहनती और ईमानदार थी, इसलिए देखते ही देखते सुषमा की विश्वासपात्र बन गई. सुषमा भी उसे घर के सदस्य की तरह मानने लगी थी.

सुनील मंत्री की दिलचस्पी बुटीक में कोई खास नहीं थी लेकिन जब से उस ने रानी को देखा था, तब से उस के होश उड़ गए थे. रानी का पति वीरेंद्र उर्फ वीरू पचौरी एक तरह से निकम्मा और बेरोजगार था, जो कभीकभार छोटेमोटे काम कर लिया करता था. नहीं तो वह पत्नी की कमाई पर ही आश्रित था. वीरू जैसे पतियों की समाज में कमी नहीं है. ऐसे लोगों के लिए एक कहावत है, ‘काम के न काज के, दुश्मन अनाज के.’

रानी जैसी पत्नियों की भी यह मजबूरी हो जाती है कि वे ऐसे पति को ढोती रहें, जो कहने भर का पति होता है. उस से उन्हें कुछ नहीं मिलता सिवाय एक सामाजिक सुरक्षा के, इसलिए वह वीरू को ढो ही रही थी.

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पत्नी की मौत के बाद डाक्टर ने रानी में ढूंढा मन का सुकून

यह कोई हैरानी या हर्ज की बात नहीं थी, पर ऐसे मामलों में जैसा कि अकसर होता है, इस में भी हुआ यानी कि डा. सुनील मंत्री और रानी के बीच भी सैक्स की खिचड़ी पकने लगी. चूंकि रानी के घर आनेजाने की कोई रोकटोक नहीं थी, इसलिए दोनों को साथ वक्त गुजारने में कोई दिक्कत नहीं आती थी.

उस दौरान डा. सुनील मंत्री का वक्त कैसे गुजरता था, यह तो कोई नहीं जानता लेकिन 7 अप्रैल, 2017 को डाक्टर की पत्नी सुषमा की भोपाल के बंसल हौस्पिटल में मौत हो गई. पत्नी के देहांत के बाद तनहा रह गए डा. सुनील मंत्री का अधिकांश वक्त रानी के साथ ही गुजरने लगा.

सुषमा के बाद दिखावे के लिए बुटीक का काम रानी ने संभाल लिया था, लेकिन यह कोई नहीं जानता था कि रानी ने और कई चीजों की डोर अपने हाथ में ले ली थी. जब तक सुषमा थी तब तक रानी का पति वीरू रानी को उस के यहां आनेजाने पर कोई ऐतराज नहीं जताता था लेकिन बाद में रानी पहले से कहीं ज्यादा वक्त बुटीक में बिताने लगी तो उस का माथा ठनका, जो स्वाभाविक बात थी. क्योंकि सुनील मंत्री अब अकसर अकेला रहता था.

रानी जब अपने घर में होती थी तब भी डा. सुनील मंत्री से फोन पर लंबीलंबी और अंतरंग बातें करती रहती थी. वीरू को शक तो था कि डाक्टर साहब और रानी के बीच प्यार की खिचड़ी पक रही है लेकिन उस का शक तब यकीन में बदल गया जब उस ने खुद अपने कानों से डाक्टर और रानी के बीच हुई अंतरंग बातचीत को सुन लिया.

दरअसल हुआ यह था कि मोबाइल फोन खराब हो जाने के कारण रानी ने अपना सिम कार्ड कुछ दिनों के लिए वीरू के फोन में डाल लिया था. न जाने कैसे बातचीत की रिकौर्डिंग वीरू के फोन में रह गई. वही रिकौर्डिंग वीरू ने सुन ली तो उस का खून खौल उठा.

पहले तो उस के जी में आया कि बेवफा बीवी और उस के आशिक डाक्टर का टेंटुआ दबा दे, पर जब उस ने धैर्य से विचार किया तो बस इतना सोचा कि क्यों न डा. सुनील मंत्री को सोने का अंडा देने वाली मुर्गी बना कर रोज एक अंडा हासिल किया जाए. क्योंकि वह अगर डा. सुनील मंत्री को मारता या हल्ला मचाता तो उस के हाथ कुछ नहीं लगना था, उलटे लोग यही कहते कि गलती डाक्टर के साथसाथ रानी की भी थी.

लिहाजा एक दिन वीरू ने सुनील मंत्री को बता दिया कि वह उस के और अपनी पत्नी रानी के अवैध संबंधों के बारे में जान गया है और इस की वाजिब कीमत चाहता है. इस पेशकश पर शुरू में सुनील मंत्री को कोई नुकसान नजर नहीं आया, उलटे फायदा यह दिखा कि वीरू का डर खत्म हो गया.

यानी वह अपनी मरजी से ब्लैकमेल होने को तैयार हो गया. शुरू में सुनील मंत्री जिसे मुनाफे का सौदा समझ रहा था, वह धीरेधीरे बहुत घाटे का साबित होने लगा. क्योंकि वीरू अब जब चाहे तब उसे ब्लैकमेल करने लगा था. उस का मुंह सुरसा की तरह खुलता और बढ़ता जा रहा था.

डाक्टर की इस दिक्कत या कमजोरी का वीरू पूरा फायदा उठा रहा था. डाक्टर अगर पुलिस में रिपोर्ट भी करता तो बदनामी उसी की ही होती. लिहाजा वह रानी को अपने पहलू में बनाए रखने के लिए अपनी गाढ़ी कमाई वीरू को सौंपने को मजबूर था.

वक्त गुजरता रहा और वीरू डा. सुनील मंत्री को अपने हिसाब से निचोड़ता रहा. इस से डाक्टर को लगने लगा कि ऐसे तो वह एक दिन कंगाल हो जाएगा और रानी भी हाथ से निकल जाएगी.

यह डा. सुनील मंत्री की 56 साला जिंदगी का बेहद बुरा वक्त था. रानी से मिल रहे देह सुख की कीमत जब उस की हैसियत पर भारी पड़ने लगी तो उस ने एक बेहद खतरनाक फैसला ले लिया. चेहरे पे चेहरा फिल्म का हैवान ब्लैक स्टोन उस के भीतर जाग उठा और उस ने वीरू की इतनी नृशंस तरीके से हत्या कर डाली कि देखनेसुनने वालों की रूह कांप उठे. हर किसी ने यही कहा कि यह डाक्टर है या जल्लाद.

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डाक्टर बना जल्लाद

डा. सुनील मंत्री फंस इसलिए गया था कि उस के और रानी के नाजायज ताल्लुकातों के सबूत वीरू के पास थे, नहीं तो तय था कि वह रानी को छोड़ देता. ये सबूत जो कभी सार्वजनिक या उजागर नहीं हो सकते, अब पुलिस के पास हैं.

वीरू की ब्लैकमेलिंग से आजिज आ गए सुनील मंत्री ने उसे अपने यहां बतौर ड्राइवर की नौकरी पर रख लिया. पगार तय की 16 हजार रुपए महीना.

इस जघन्य हत्याकांड का एक विरोधाभासी पहलू यह भी चर्चा में है कि डाक्टर ने वीरू को समझाया था कि तुम मेरे ड्राइवर बन जाओ तो चौबीसों घंटे मुझे देखते रहोगे. इस से तुम्हारा शक दूर हो जाएगा.

जबकि हकीकत में डा. सुनील मंत्री वीरू की हत्या का खाका काफी पहले से ही दिमाग में बना चुका था. उसे दरकार थी तो बस एक अदद मौके की, जिस से वीरू नाम की बला से हमेशाहमेशा के लिए छुटकारा पाया जा सके. 3 फरवरी, 2019 की सुबह वीरू डा. सुनील को कार से होशंगाबाद से इटारसी ले कर गया था.

दोनों शाम कोई 4 बजे वापस लौट आए. लेकिन वीरू अपने घर नहीं पहुंचा. दूसरे दिन रानी ने फोन पर यह खबर अपने ससुर लक्ष्मीकांत पचौरी को दी.

5 फरवरी की सुबह लक्ष्मीकांत होशंगाबाद आए और बेटे की ढुंढाई शुरू की. रानी ने उन्हें इतना ही बताया था कि वीरू ने 2 दिन पहले ही डा. सुनील मंत्री के यहां ड्राइवर की नौकरी शुरू की है.

यह बात सुन कर वह सीधे डा. सुनील मंत्री की कोठी पर जा पहुंचे और बेटे वीरू की बाबत पूछताछ की तो डाक्टर ने उन्हें गोलमोल जवाब दे कर टरकाने की कोशिश की. इस पर बुजुर्ग और अनुभवी लक्ष्मीकांत का माथा ठनकना स्वाभाविक था. उन्होंने डाक्टर से उस के घर के अंदर जाने की जिद की तो डाक्टर ने अचकचा कर मना कर दिया.

इस पर दोनों में झगड़ा शुरू हो गया. बेटे की चिंता में हलकान हुए जा रहे लक्ष्मीकांत डाक्टर पर वीरू को गायब करने का आरोप लगा रहे थे और डाक्टर उन के इस आरोप को खारिज कर रहा था.

झगड़ा होते देख वहां भीड़ जमा हो गई. इन में कुछ डा. सुनील मंत्री के पड़ोसी भी थे, जिन की नजरों में सुनील मंत्री पिछले 2 दिन से संदिग्ध हरकतें कर रहा था.

इत्तफाक से इसी दौरान पुलिस की एक गश्ती गाड़ी वहां से गुजर रही थी, जिस के पहिए यह झगड़ा देख रुक गए.

आखिर माजरा क्या है, यह जानने के लिए पुलिस वाले गाड़ी से नीचे उतरे और बात को समझने की कोशिश करने लगे. लक्ष्मीकांत ने फिर आरोप दोहराते हुए कहा कि डाक्टर ने उन के बेटे को गायब कर दिया है और अब कोठी के अंदर भी नहीं देखने दे रहा.

इस पर पुलिस वालों को हैरानी हुई कि अगर डाक्टर ने कुछ नहीं किया है तो उसे किसी के अंदर जाने पर इतना सख्त ऐतराज या जिद नहीं करनी चाहिए. लिहाजा खुद पुलिस वालों ने अंदर जाने का फैसला ले लिया.

कीमे के रूप में मिली लाश

अंदर जाने के बाद सख्त दिल पुलिस वाले भी दहल उठे, क्योंकि ड्राइंगरूम में जगहजगह खून बिखरा पड़ा था. इतना ही नहीं, मांस के छोटेछोटे टुकड़े भी यहांवहां बिखरे पड़े थे मानो यह आलीशान कोठी कोई गलीकूचे की मटन शौप हो. पुलिस वालों के साथ अंदर गए लक्ष्मीकांत पहले से ही किसी अनहोनी की आशंका से ग्रस्त थे. उन्होंने खोजबीन की तो एक ड्रम में उन्हें एक कटा हुआ सिर दिखा, जिसे देख वे दहाड़ मार कर रोने लगे. वह सिर उन के जवान बेटे वीरू का था.

जब पुलिस वालों ने घर का और मुआयना किया तो उन्हें टौयलेट में 4 आरियां मिलीं. इन में से 2 आरियों के बीच वीरू के एक पैर के दरजन भर टुकड़े फंसे हुए थे. जब ड्रम को गौर से देखा गया तो एसिड में वीरू के कटे सिर के साथसाथ हाथपैर भी पडे़ दिखे. डाक्टरों द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले दस्ताने भी खून से सने हुए थे. इस हैवान डाक्टर ने वीरू के शरीर के 4-6 नहीं बल्कि करीब 500 टुकड़े कर डाले थे.

अब बारी सुनील मंत्री की थी, जिस ने शराफत से अपना जुर्म स्वीकारते हुए बताया कि वह वीरू की ब्लैकमेलिंग से आजिज आ गया था, इसलिए उस ने उस की हत्या कर डाली.

दरअसल, 3 फरवरी को वीरू के दांत में दर्द था. यह बात उस ने डा. सुनील मंत्री को बताई तो उस ने इटारसी जाते वक्त एक गोली दी. लेकिन होशंगाबाद वापस आने के बाद वीरू ने फिर दांत दर्द की बात कही तो डा. सुनील के अंदर बैठे ब्लैक स्टोन ने उसे बेहोशी का इंजेक्शन लगा दिया. इसी बेहोशी में उस ने वीरू का गला रेता और फिर उस की लाश के टुकड़े करने शुरू कर दिए.

एक दिन में लाश को काट कर टुकड़ेटुकड़े कर डालना मुश्किल काम था, इसलिए दूसरे दिन भी वह यही करता रहा और इटारसी अस्पताल भी गया था. लेकिन जल्द ही वापस आ गया था. जाते समय उस ने वीरू के खून से सने कपड़े बाबई के पास फेंक दिए थे. दोनों दिन उस ने घर की लाइटें नहीं जलाई थीं ताकि कोई मरीज न आ जाए. दूसरे दिन लाश के टुकड़े वह दूसरी मंजिल पर ले गया था.

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सुनील मंत्री अपनी योजना के मुताबिक काफी दिनों से एसिड इकट्ठा कर रहा था. चूंकि वह डाक्टर था, इसलिए दुकानदार उस पर शक नहीं कर रहे थे और वह भी पहले से ही बता देता था कि वह स्वच्छ भारत अभियान के तहत एसिड खरीद रहा है. डाक्टर होने के नाते सुनील बेहतर जानता था कि लाश के टुकड़े गल कर नष्ट हो जाएंगे और किसी को हवा भी नहीं लगेगी.

लेकिन जब हवा होशंगाबाद, इटारसी से भोपाल होते हुए देश भर में फैली तो सुनने वालों का कलेजा मुंह को आ गया कि डाक्टर ऐसा भी होता है.

ऐसा हो चुका था और डा. सुनील मंत्री खुद पुलिस वालों को बता भी रहा था कि ऐसा कैसे और क्यों हुआ.

इस खुलासे पर सनसनी मची तो होशंगाबाद के तमाम आला पुलिस अधिकारी घटनास्थल पर पहुंच गए. पुलिस अधिकारियों के आते ही डाक्टर की हालत खस्ता हो गई और वह ऊटपटांग हरकतें करने लगा. कभी वह गुमसुम बैठ जाता था तो कभी रोने लगता था. कहीं वह कुछ उलटासीधा न कर बैठे, इस के लिए उस के इर्दगिर्द दरजन भर पुलिसकर्मी तैनात कर दिए गए और उस का पैर जंजीर से बांध दिया गया.

यह बात सच है कि डा. सुनील अपना दिमागी संतुलन अस्थाई रूप से खो बैठा था. उस की शुगर और ब्लडप्रेशर दोनों बढ़ गए थे और वह सोडियम पोटैशियम इम्बैलेंस का भी शिकार हो गया था, जिस में मरीज कुछ भी बकने लगता है और ऊटपटांग हरकतें करनी शुरू कर देता है.

इन बीमारियों पर काबू पाया गया तो एक के बाद एक वीरू की हत्या से ताल्लुकात रखते राज खुलते गए कि इस की आखिर वजह क्या थी.

फंस ही गया डाक्टर चक्रव्यूह में

छानबीन और जांच में पुलिस वालों की जानकारी में जब डाक्टर की पत्नी सुषमा मंत्री की मौत संदिग्ध होनी पाई गई तो एक टीम भोपाल के नामी बंसल हौस्पिटल भी पहुंची. दरअसल, सुषमा की मौत भी सुनील के लगाए गए इंजेक्शन के रिएक्शन से हुई थी. इंजेक्शन लगाने के बाद सुषमा के शरीर में संक्रमण फैलने लगा तो सुनील उसे भोपाल ले कर आया था. इस संदिग्ध मौत के बाद भी सुषमा का पोस्टमार्टम क्यों नहीं किया गया था, इस बात की जांच पुलिस कथा लिखे जाने तक कर रही थी.

रानी के बयान और किरदार दोनों अहम हो चले थे, लेकिन पूछताछ में वह अनभिज्ञता जाहिर करती रही. पुलिस ने जब सुनील मंत्री से उस के संबंधों के बारे में पूछा तो वह खामोश रही. इस से पुलिस को रानी की भूमिका ज्यादा संदिग्ध नजर आई, जिस की जांच पुलिस कथा लिखने तक कर रही थी. सुनील मंत्री से उस की फोन पर हुई बात की रिकौर्डिंग भी पुलिस ने हासिल कर ली.

पुलिस ने मामला दर्ज कर के वीरू की टुकड़ेटुकड़े बनी लाश पोस्टमार्टम के बाद उस के परिजनों को सौंप दी, जिस का दाह संस्कार भी हो गया. कुछ सामान्य होने के बाद सुनील कहने लगा कि हां, उस ने वीरू की हत्या की थी लेकिन अब अदालत में उस का वकील बोलेगा.

रिमांड पर लिए जाने के बाद वह अदालत में असामान्य दिखा, जिस से उस की हिरासत की अवधि लगातार बढ़ाई जा रही है. हालांकि सच यह है कि किसी अंतिम निष्कर्ष पर पुलिस तभी पहुंचेगी, जब रानी मुंह खोलेगी. पुलिस सुषमा की मौत को भी संदिग्ध मान कर काररवाई कर रही है कि कहीं वह भी हत्या तो नहीं थी.

सब कुछ मुमकिन है लेकिन जिस तरह वीरू की हत्या डा. सुनील मंत्री ने की वह जरूर हैरत वाली बात है कि कोई डाक्टर जो जिंदगियां बचाता है, वह इतने वीभत्स, हिंसक और जघन्य तरीके से किसी की जिंदगी भी छीन सकता है.

हिन्दी पर मोदी का यू-टर्न

हिन्दी अब पूरे मुल्क में पढ़ी-पढ़ाई जाएगी. यह अनिवार्य भाषा होगी. इसके अलावा दूसरी भाषा अंग्रेजी और तीसरी भाषा क्षेत्रीय होगी. देशभर में ‘त्रिभाषा फार्मूला’ लागू होगा. केन्द्र सरकार की नयी शिक्षा नीति के तहत हिन्दी भाषा को पूरे देश में लागू करने के उद्देश्य से बनाया गया नया ड्राफ्ट जैसे ही सामने आया, देशभर में इसका विरोध शुरू हो गया. विरोध के तीव्र स्वर खासतौर पर दक्षिण भारत से उठे. मजे की बात यह कि इस मामले में अपने ही मंत्रियों का विरोध भी प्रधानमंत्री को झेलना पड़ा. हालत यह हो गयी कि लोग मरने-मारने तक की बातें करने लगे. द्रमुक के राज्यसभा सांसद  तिरूचि सिवा ने तो केन्द्र  सरकार को चेतावनी देते हुए यहां तक कह दिया है कि हिन्दी को तमिलनाडु में लागू करने की कोशिश कर केन्द्र-सरकार आग से खेलने का काम कर रही है. हिन्दी भाषा को तमिलनाडु पर थोपने की कोशिश को यहां के लोग बर्दाश्त नहीं करेंगे. हम केन्द्र सरकार की ऐसी किसी भी कोशिश को रोकने के लिए, किसी भी परिणाम का सामना करने के लिए तैयार हैं. वहीं, डीएमके अध्यक्ष एम.के. स्टालिन ने भी ट्वीट कर कहा कि तमिलों के खून में हिन्दी के लिए कोई जगह नहीं है. यह देश को बांटने वाला कदम होगा. यदि हमारे राज्य के लोगों पर इसे थोपने की कोशिश की गयी तो डीएमके इसे रोकने के लिए युद्ध करने को भी तैयार है. नये चुने गये सांसद लोकसभा में अपनी आवाज उठाएंगे. उपराष्ट्रपति एम. वेंकैया नायडू, मक्कल नीधि मय्यम पार्टी के कमल हासन, महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के राज ठाकरे, कांग्रेस नेता शशि थरूर और पूर्व वित्त मंत्री पी. चिदम्बरम, कर्नाटक के मुख्यमंत्री एचडी कुमार स्वामी, पूर्व मुख्यमंत्री सिद्दरमैया सब एकसुर में चीखे – हिन्दी हमारे माथे पर मत थोपो….

बवाल बढ़ा तो स्थिति की गम्भीरता को देखते हुए मोदी सरकार को यू-टर्न लेना पड़ा और ड्राफ्ट में बदलाव करते हुए हिन्दी की अनिवार्यता को खत्म कर दिया गया. कहा जा रहा है कि अब संशोधित शिक्षा नीति के मसौदे में ‘त्रिभाषा फॉर्मूले’ को लचीला कर दिया गया है. अब इनमें किसी भी भाषा का जिक्र नहीं है. छात्रों को कोई भी तीन भाषा चुनने की स्वतंत्रता दे दी गयी है. सरकार को मामले की लीपापोती भी करनी पड़ी है. केन्द्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ ने सफाई देते हुए कहा, ‘सरकार अपनी नीति के तहत सभी भारतीय भाषाओं के विकास को प्रतिबद्ध है और किसी प्रदेश पर कोई भाषा थोपी नहीं जाएगी. हमें नयी शिक्षा नीति का मसौदा प्राप्त हुआ है, यह सिर्फ रिपोर्ट है, फाइनल नीति नहीं है. इस पर लोगों एवं विभिन्न पक्षकारों की राय ली जाएगी, उसके बाद ही कुछ होगा. कहीं न कहीं लोगों को गलतफहमी हुई है.’

आखिर जिस मुद्दे पर आजादी के पहले से लेकर आजादी के बाद तक कभी पूरे देश में एकराय नहीं बनी, ऐसे संवेदनशील मुद्दे पर इतनी जल्दबाजी दिखा कर केन्द्र-सरकार को मुंह की तो खानी ही थी. सरकार की छीछालेदर हुई तो तमिलनाडु से सम्बन्ध रखने वाली देश की वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण को भी मोर्चा संभालना पड़ा. गौरतलब है कि तमिलनाडु में मोदी-सरकार के फरमान का सबसे ज्यादा विरोध हो रहा था, लिहाजा सीतारण ने ट्विटर कर कहा कि इस ड्राफ्ट को अमल में लाने से पहले इसकी समीक्षा की जाएगी. जनता की राय सुनने के बाद ही ड्राफ्ट पॉलिसी लागू होगी. सभी भारतीय भाषाओं को पोषित करने के लिए ही प्रधानमंत्री ने ‘एक भारत-श्रेष्ठ भारत’ योजना लागू की थी. केन्द्र तमिल भाषा के सम्मान और विकास के लिए समर्थन देगा.’

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वहीं विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने भी सरकार के बचाव में ट्वीट किया कि, ‘कोई भी भाषा किसी पर थोपी नहीं जाएगी. इस मुद्दे पर अंतिम फैसला लिए जाने से पहले राज्य सरकारों से परामर्श लिया जाएगा. केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्री को सौंपी गयी राष्ट्रीय शिक्षा नीति महज एक मसौदा रिपोर्ट है. इस  पर आम जनता से प्रतिक्रिया ली जाएगी. राज्य सरकारों से परामर्श किया जाएगा. इसके बाद ही इस मसौदे को अंतिम रूप दिया जाएगा. भारत सरकार सभी भाषाओं का सम्मान करती है. कोई भाषा किसी पर थोपी नहीं जाएगी.’

हिन्दी थोपने और हिन्दी अपनाने में फर्क है

सर्वविदित है कि कोई चीज जबरन थोपा जाना किसी को पसन्द नहीं आता और न ही स्वीकार्य होता है. मगर ‘तानाशाही दिमाग’ इसको समझने में हमेशा नाकाम रहा है और हमेशा मुंह की खायी है. मोदी-सरकार भी इस रोग से अछूती नहीं है. सवाल यह कि हिन्दी की अनिवार्यता को लेकर बना नयी शिक्षा नीति का ड्राफ्ट अगर अभी सिर्फ मसौदा था तो इस पर बिना विचार-विमर्श हुए और बिना परिणाम पर पहुंचे इसका ऐलान ही क्यों हुआ? राज्य सरकारों को तो छोड़िये, इसके लिए सरकार में मौजूद अपने ही मंत्रियों तक से विमर्श नहीं किया गया और देश भर के लिए हिन्दी को अनिवार्य बनाने की घोषणा कर दी गयी? क्या मोदी सरकार को लगता है कि उसने पूरे दमखम के साथ सरकार बना ली है, तो अब उसका हर फैसला सबको मानना ही पड़ेगा? या फिर प्रधानमंत्री पर भारत को ‘हिन्दू राष्ट्र’ बनाने के लिए राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का दबाव इतना ज्यादा है, कि अपने मंत्रियों और राज्य सरकारों से विचार-विमर्श करने तक का वक्त उनको नहीं दिया जा रहा है?

दरअसल चाबुक के दम पर धर्म, जाति, भाषा, परिधान, आस्था, प्रेम जैसी चीजो में बदलाव या उसके लिए स्वीकार्यता पैदा नहीं की जा सकती है. थोपी हुई चीजें कभी दिल से स्वीकार्य नहीं होतीं, मगर यह सीधी सी बात दक्षिणपंथी विचारधारा में पगे लोगों की समझ में नहीं आती हैं. मोदी-सरकार को समझना चाहिए कि चीजें तब स्वीकार्य होती हैं, जब उनकी स्वीकार्यता के लिए माकूल वातावरण तैयार किया जाये, लोगों के बीच विचारों का आदान-प्रदान हो, उस पर चर्चा हो, आलोचना हो, उसके प्रति आकर्षण पैदा किया जाये और उससे लोगों को कोई फायदा मिले.

हिन्दी के लिए किया क्या?

हिन्दी को शिक्षा में अनिवार्य भाषा बनाने के लिए उतावली मोदी-सरकार बताये अखिर बीते पांच साल के कार्यकाल में उसने हिन्दी के लिए क्या किया? देशभर में हिन्दी संस्थानों की हालत जर्जर है. हिन्दी के विद्वानों और लेखकों की कहीं कोई पूछ नहीं है. हिन्दी माध्यम से पढ़ने वाले छात्र बेरोजगारी का तमगा गले में डाल कर घूम रहे हैं. किसी प्राइवेट संस्थान में नौकरी के लिए जाते हैं तो उन्हें हिन्दीभाषी होने के कारण खुद पर शर्म आती है. देश भर में उच्च शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी है. किताबें अंग्रेजी में हैं. शिक्षक अंग्रेजी में पढ़ाते हैं. वे हिन्दी में बात करने वाले छात्रों को हेय दृष्टि से देखते हैं. उनके सवालों का समाधान करना तो दूर, सुनना तक नहीं चाहते. सरकारी संस्थानों का प्राइवेटाइजेशन होता चला जा रहा है, जहां अंग्रेजी का ही बोलबाला है. चाहे चिकित्सा का क्षेत्र हो, इंजीनियरिंग का, बिजनेस का या वकालत का, कहां है हिन्दी?

सच पूछें तो आज हिन्दी और दूसरी भारतीय भाषाएं वे सौतेली बहनें हैं, जिनकी अम्मा अंग्रेजी है. अंग्रेजी में ही देश का राजकाज चलता है, कारोबार चलता है, विज्ञान चलता है, विश्वविद्यालय चलते हैं, मीडिया संस्थान और सारी बौद्धिकता चलती है. अंग्रेजी का विशेषाधिकार या आतंक इतना है कि अंग्रेजी बोल सकने वाला शख्स बिना किसी बहस के ही योग्य मान लिया जाता है. अंग्रेजी में कोई अप्रचलित शब्द आये तो आज भी लोग खुशी-खुशी डिक्शनरी पलटते हैं, जबकि हिन्दी का ऐसा कोई अप्रचलित शब्द अपनी भाषिक हैसियत की वजह से हंसी का पात्र बना दिया जाता है. पिछले तीन दशकों में हिन्दी की यह हैसियत और घटी है. सरकारी स्कूलों की बात छोड़ दें, तो पूरे देश में पढ़ाई-लिखाई की भाषा अंग्रेजी ही है. गरीब से गरीब आदमी अपने बच्चे को अंग्रेजी स्कूल में दाखिला दिलाना चाहता है और हिन्दी घर में बोली जाने वाली एक बोली बन कर रह गयी है.

हां, यह कहा जा सकता है कि आज हिन्दी फिल्में विदेशों में खूब देखी जा रही हैं, हिन्दी सीरियल हर जगह देखे जा रहे हैं, कम्प्यूटर और स्मार्टफोन में हिन्दी को जगह मिल गयी है, इंटरनेट पर हिन्दी दिख रही है, मगर ऐसा कहने वाले यह नहीं देख रहे हैं कि यह हिन्दी बाजार की वजह से है, इसे सिर्फ बाजार ही बढ़ावा दे रहा है. यह सिर्फ एक बोली के रूप में इस्तेमाल हो रही है, जो बाजार कर रहा है. हिन्दी विशेषज्ञता की भाषा नहीं रह गयी है क्योंकि देश की सरकारों ने हिन्दी के हित में कभी कोई काम नहीं किया.

दूसरे, यह बात संघ और मोदी-सरकार को समझना चाहिए कि भाषा की विविधता ही इस देश की खूबसूरती है, भारत की पहचान है, उसकी समृद्धि है, उसका सौन्दर्य है और यह विविधता ही हम भारतीयों को एक-दूसरे के प्रति आकर्षण में बांधे रखने का काम भी करती है. हिन्दी हमारी राष्ट्रभाषा हो सकती है, मगर उसके लिए वातावरण तैयार करना होगा ताकि उसकी सहज स्वीकार्यता बन सके. चाबुक के दम पर वह कभी स्वीकार्य नहीं होगी.

दक्षिण का हिन्दी से झगड़ा पुराना है

दक्षिण भारत ने तो अंग्रेजी पर ही निवेश किया है. उन्होंने अंग्रेजी का सामाजिक विकास और आर्थिक समृद्धि की सीढ़ी के रूप में इस्तेमाल किया है और तरक्की पायी है. सॉफ्टवेयर के क्षेत्र में दक्षिण भारत का योगदान अतुल्नीय है और यह अंग्रेजी के बिना कभी पूरा नहीं हो सकता था. दूसरी ओर हिन्दी बोलने वाले लोग दक्षिण के राज्यों में खेतिहर मजदूर के रूप में काम करने के लिए जाते थे और आज भी जाते हैं. लिहाजा उनके द्वारा बोली जाने वाली हिन्दी भाषा को तमिल लोग अपने सिर-माथे पर उठाएंगे, ऐसा सोचना भी मूर्खता है. साउथ में हिन्दी के प्रति उपेक्षा का भाव आज भी कमोबेश वैसा ही है, जैसा नेहरू या इंदिरा के वक्त में था. जवाहरलाल नेहरू ने भी हिन्दी को अनिवार्य बनाने की बहुत कोशिश की और हमेशा मुुंह की खायी. दरअसल जिस देश में हर दो कोस पर पानी और बानी बदलती हो, वहां एक भाषा को अनिवार्य करने का सपना पालना ही मूर्खता है.

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गौरतलब है कि दक्षिण भारत से हिन्दी का झगड़ा बहुत पुराना है. हालांकि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को भाषा को लेकर समझ साफ थी. वे इस बात को समझते थे कि अंग्रेजों की मानसिक गुलामी को तोड़ने के लिए भारतीय लोगों को अपनी भाषा बरतनी चाहिए. वे जानते थे कि हिन्दी में वो ताकत है कि वो पूरे देश को एक सूत्र में बांध सकती है और उस वक्त उसने बांधा भी, मगर वह इसलिए क्योंकि तब हम एक विदेशी ताकत से लड़ रहे थे. तब पूरे देश ने ‘हिन्दी’ को हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया, मगर उसके बाद इस हथियार को रख दिया गया. कहते हैं जब सन् 1928 में मोतीलाल नेहरू ने हिन्दी को भारत में सरकारी कामकाज की भाषा बनाने का प्रस्ताव रखा था, तो उस वक्त ही तमिल नेताओं ने इसका घोर विरोध किया था. करीब नौ साल बाद सन् 1937 में तमिल नेता चक्रवर्ती राजगोपालाचारी ने मद्रास राज्य में हिन्दी लाने का समर्थन किया और हिन्दी को स्कूलों में अनिवार्य बनाने का प्रस्ताव दिया. अप्रैल 1938 में मद्रास प्रेसिडेंसी की 125 सैकेंडरी स्कूलों में हिन्दी को कम्पलसरी लैंग्वेज के तौर पर लागू भी कर दिया गया. मगर इसके खिलाफ आवाजें उठने लगीं. राजगोपालाचारी के इस फैसले के खिलाफ सबसे पहले मोर्चा लिया तमिल शिक्षाविदों ने. उनका आरोप था कि सूबे की कांग्रेस सरकार हिन्दी के जरिए तमिल का गला घोंट रही है. इस आंदोलन के दौरान तमिल समर्थक उन स्कूलों के दरवाजे घेर कर बैठ गये, जहां हिन्दी पढ़ाये जाने का प्रस्ताव था. प्रदर्शनकारियों का कहना था कि सरकार उन पर जबरन हिन्दी थोपना चाहती है. यह उनकी तमिल संस्कृति पर सीधा हमला है. 1 जून 1938 को सीवी राजगोपालाचारी के घर के सामने बड़ा प्रदर्शन हुआ. देखते ही देखते इस आंदोलन ने राजनीतिक मोड़ ले लिया. जो दो नेता इस आंदोलन का नेतृत्व कर रहे थे वे आगे आने वाले समय में तमिल अस्मिता आंदोलन का चेहरा बन गये. इसमें पहले थे ईवी रामास्वामी ‘पेरियार’ और दूसरे थे सीएन अन्ना दुरई, जिन्हें उस वक्त गिरफ्तार किया गया था. द्रविड़ कषगम (डीके) की ओर से भी इसका घोर विरोध हुआ है और यह विरोध हिंसक झड़पों में बदल गया, जिसके चलते दो लोगों की मौत भी हुई. दो साल चले आंदोलन के बाद आखिरकार सरकार को अपने पैर पीछे खींचने पड़े और हिन्दी को कम्पलसरी भाषा के तौर पर लागू करने का फैसला वापिस लेना पड़ा.

आजादी के वक्त भाषाओं के आधार पर राज्यों के विभाजन को लेकर कांग्रेस के भीतर आम सहमति बनी थी. महात्मा गांधी ने 10 अक्टूबर 1947 को अपने एक सहयोगी को लिखी चिट्ठी में कहा, ‘मेरा मानना है कि हमें भाषिक प्रांतों के निर्माण में जल्दी करनी चाहिए… कुछ समय के लिए यह भ्रम हो सकता है कि अलग-अलग भाषाएं अलग-अलग संस्कृतियों का प्रतिनिधित्व करती हैं, लेकिन यह भी सम्भव है कि भाषिक आधार पर प्रदेशों के गठन के बाद यह गायब हो जाए.’ पं. जवाहर लाल नेहरू भी भारत की भाषिक विविधता को सम्मान की दृष्टि से देखते थे, लेकिन साम्प्रदायिक आधार पर हुए देश-विभाजन और मार-काट के बाद नेहरू और पटेल दोनों इस राय के हो चुके थे कि अब भाषिक आधार पर किसी विभाजन की जमीन तैयार न हो. मगर हिन्दी को वे तब भी किसी तरह देश की अनिवार्य भाषा के रूप में स्थापित नहीं कर पाये. दक्षिण भारत के तमाम प्रान्त इसका लगातार विरोध करते रहे. वे अपनी क्षेत्रीय भाषा और अंग्रेजी को ही ज्यादा महत्व देते रहे.

तमिलनाडु के पहले मुख्यमंत्री अन्ना दुरई द्वारा हिन्दी विरोध की कहानी तो बेहद जबरदस्त है. सन् 1960 में अन्ना दुरई ने अपने एक ख्यात भाषण में हिन्दी के संख्या बल के तर्क पर सवाल उठाया और कहा – शेरों के मुकाबले चूहों की संख्या ज्यादा है तो क्या चूहों को राष्ट्रीय पशु बना देना चाहिए? उन्होंने मंच से हिन्दी को ललकारा और जनता से सवाल किया – मोर के मुकाबले कौवों की संख्या ज्यादा है तो क्या कौवों को राष्ट्रीय पक्षी बना देना चाहिए?

वर्ष 1965 में एक बार फिर दक्षिण भारत में हिन्दी को राष्ट्रभाषा के रूप में स्थापित करने की कोशिश हुई. मगर इस बार तो हिन्दी के खिलाफ स्थानीय लोगों का पारा बहुत ऊपर चढ़ गया. लोग खिलाफत के लिए सड़कों पर उतर आये और सरकार को काले झंडे दिखाये. पहले ये लोग 26 जनवरी को काले झंडे दिखाने वाले थे, मगर गणतन्त्र दिवस की लाज रखते हुए 25 जनवरी को यह काम किया गया. इस दिन को आज भी वहां ‘बलिदान दिवस’ के रूप में मनाया जाता है, क्योंकि इस दौरान हुई आगजनी और हिंसक झड़पों में सत्तर से ज्यादा लोगों की जानें गयी थीं. स्थानीय कांग्रेस दफ्तर के बाहर एक हिंसक झड़प में आठ लोगों को जिन्दा जला दिया गया. डीएमके नेता डोराई मुरुगन को मद्रास शहर के पचाइअप्पन कॉलेज से गिरफ्तार किया गया. इसके बाद हजारों लोगों की गिरफ्तारियां हुर्इं. दो सप्ताह चले इस जबरदस्त विरोध को दबाने में सरकार के पसीने छूट गये.

हिन्दी के खिलाफ तमिलनाडु के मुखर विरोध की अभिव्यक्तियां बाद में महाराष्ट्र, गुजरात और बंगाल में भी सुनायी देने लगीं. वे लोग मानते थे और आज भी मानते हैं कि उनके क्षेत्र में उनकी भाषा, हिन्दी के मुकाबले कहीं ज्यादा प्राचीन और समृद्ध है. पश्चिम बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री बीसी रॉय भी बांग्ला-भाषियों पर हिन्दी थोपे जाने के सख्त खिलाफ थे. दक्षिण भारत में हिन्दी के खिलाफ उठे इस तूफान को देखते हुए तत्कालीन सूचना एवं प्रसारण मंत्री इंदिरा गांधी को राजभाषा अधिनियम में तुरंत संशोधन करना पड़ा था और अंग्रेजी को सहायक राजभाषा का दर्जा देकर अमल में लाया गया था. यही नहीं, तमाम विरोध-प्रदर्शनों को देखते हुए उस वक्त के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और लाल बहादुर शास्त्री को जनता से क्षमायाचना तक करनी पड़ी थी और तमाम तरह के आश्वासन देने पड़े थे.

दक्षिण भारतीय भाषाओं के प्रति उपेक्षा

आजादी के इतने वर्ष बाद भी यदि हिन्दी दक्षिण भारतीयों का मन नहीं मोह पायी है, तो इसके दोषी केन्द्र सरकार ही नहीं, हिन्दी भाषी प्रदेश भी हैं. गैर हिन्दी भाषी प्रदेशों में छात्रों ने तमिल, तेलुगू, मराठी, बांग्ला के साथ अंग्रेजी और हिन्दी पढ़ी, मगर हिन्दी भाषी प्रदेशों में तेलुगू, तमिल, मराठी या बंगाली कोई नहीं पढ़ता, बल्कि यहां के छात्र अपनी तीसरी भाषा के तौर पर संस्कृत को अपनाते हैं, जो देश के किसी भी हिस्से में प्रमुखता से बोली नहीं जाती है. तो जब आप दक्षिण की भाषाओं के प्रति उपेक्षा बरतते हैं तो उनसे कैसे उम्मीद कर सकते हैं कि वह आपकी भाषा को सिर-माथे पर लेगा? निस्संदेह संस्कृत एक प्राचीन और समृद्ध भाषा है, जिसका अलग से अध्ययन होना चाहिए, लेकिन इसे ‘त्रिभाषा फॉर्मूले’ में फिट कर हिन्दी भाषी प्रदेशों ने गैर हिन्दी भाषी प्रदेशों से अपनी जो दूरी बढ़ायी, वह लगभग अक्षम्य है. आज अगर हिन्दी भाषी भी बड़ी तादाद में तमिल, तेलुगू, मराठी या बंगाली बोल रहे होते, तो बीते सत्तर सालों में हिन्दी का विरोध काफी कम हो चुका होता, लोग वैचारिक रूप से एक दूसरे के करीब आ गये होते, मगर यह नहीं हुआ, सरकारों ने ऐसा होने नहीं दिया, इसलिए ‘त्रिभाषा फॉर्मूले’ के ताजा प्रस्ताव पर विरोध फिर से भड़क उठा है.

संघ के दबाव में मोदी

संघ के दबाव में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी हिन्दू राष्ट्र की स्थापना का सेहरा अपने सिर बांधने को उतावले हैं, इसीलिए पहले कदम के तौर पर हिन्दी को पूरे देश में अनिवार्य करने की तेजी दिखा दी, बगैर जमीनी हकीकत को समझे. वे नहीं जानते कि हिन्दू राष्ट्र की घोषणा करना तो बहुत आसान है, परंतु इसके पेंच बेहद खतरनाक हैं. मुख्य खतरा है कि यह कदम भारत को पाकिस्तान की तरह एक धर्मशासित देश में बदल देगा. यह हमारी राष्ट्रीय एकता को कमजोर करेगा, पृथकतावादी प्रवृत्तियों को बढ़ावा देगा, आंतरिक कलह और हिंसा का कारण बनेगा, भारत के सौन्दर्य को मिटा कर भारत की साख को नुकसान पहुंचाएगा. इससे भी अधिक क्षतिपूर्ण बात यह होगी कि एक हिन्दू राष्ट्र, भारत का विश्वगुरु के रूप में एक वैश्विक नेता बनने का सपना हमेशा के लिए खत्म कर देगा. कोई भी सम्प्रभु देश विशुद्ध धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत के अलावा भारत के साथ न किसी संघ में शामिल होगा, न ही उसका अनुसरण करेगा. विडम्बना यह भी कि स्वयं हिन्दुत्व – जिसे इस कदम के समर्थक सबसे अधिक प्रदर्शित करना चाहते हैं, की भावना, परम्परा और प्रतिष्ठा को सबसे अधिक क्षति पहुंचाएगा.

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उल्लेखनीय है कि साल 2008 तक नेपाल देश धरती का इकलौता हिन्दू राष्ट्र था. मगर वहां भी क्षत्रीय राजवंश का खात्मा हुआ और 2008 में नेपाल गणतंत्र बन गया. नेपाल को हिन्दू राष्ट्र भी सिर्फ इसलिए कहा जाता था क्योंकि हिन्दू संहिता मनुस्मृति के अनुसार कार्यकारी सत्ता का स्रोत राजा था. इसके अलावा वहां धार्मिक ग्रंथ की कोई और बात लागू नहीं थी क्योंकि ये ‘मानवाधिकारों की सार्वभौम घोषणा’ के खिलाफ होती. बावजूद इसके नेपाल को अपनी हिन्दू राष्ट्र की छवि को तोड़ कर गणतन्त्र का रास्ता इख्तियार करना पड़ा.

हिन्दू राज के खिलाफ थे आंबेडकर

संविधान के रचयिता डॉ. आंबेडकर ने अपनी किताब ‘पाकिस्तान आॅर दि पार्टिशन आफ इण्डिया’ (1940) में चेताया है कि अगर हिन्दू राज हकीकत बनता है, तब वह इस मुल्क के लिए सबसे बड़ा अभिशाप होगा. हिन्दू कुछ भी कहें, हिन्दू धर्म स्वतन्त्रता, समता और बन्धुता के लिए खतरा है. उस आधार पर वह लोकतन्त्र के साथ मेल नहीं खाता है. हिन्दू राज को किसी भी कीमत पर रोका जाना चाहिए. डॉ. आंबेडकर ये बात बहुत साफतौर पर समझते थे कि हिन्दू राष्ट्र का सीधा अर्थ द्विज वर्चस्व की स्थापना था, यानी ब्राह्मण-वाद की स्थापना. वे हिन्दू राष्ट्र को मुसलमानों पर हिन्दुओं के वर्चस्व तक सीमित नहीं करते हैं, जैसा कि भारत का प्रगतिशील वामपंथी या उदारवादी लोग करते हैं. उनके लिए हिन्दू राष्ट्र का मतलब मुसलमानों के साथ दलित, ओबीसी और महिलाओं पर भी द्विजों यानी ब्राह्मणों के वर्चस्व की स्थापना था, जो एक लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष देश के लिए, जहां इतनी बोलियां, जातियां और भिन्न्ताएं हैं, कभी भी हितकारी नहीं है.

क्या है त्रिभाषा फार्मूला?

त्रिभाषा फॉर्मूला यानी बारहवीं कक्षा तक के सिलेबस में तीन भाषाओं को शामिल किया जाना. 1948 में भारत में भाषा के आधार पर राज्यों को बांटने के आन्दोलन हो रहे थे. ठीक इसी समय यूनिवर्सिटी एजुकेशन कमीशन ने पढ़ाई-लिखाई के लिए तीन भाषा का फॉर्मूला दिया था. इसके अनुसार अंग्रेजी, हिन्दी के अलावा एक स्थानीय भाषा भी पाठ्यक्रम में शामिल किये जाने का प्रावधान किया गया. यह व्यवस्था स्विट्जरलैंड और नीदरलैंड के सिलेबस को देखकर तैयार की गयी थी. वर्ष 1964 में यूनिवर्सिटी ग्रांट कमिशन के चेयरमैन दौलत सिंह कोठारी के नेतृत्व में त्रिभाषा फॉर्मूले के लिए एक कमीशन बनाया गया. इस कमीशन ने 1966 में अपनी रिपोर्ट सौंपी. वर्ष 1968 में भारतीय संसद ने कोठारी कमिशन की सिफारिश के आधार पर ‘त्रिभाषा फॉर्मूले’ को स्वीकार कर लिया. उस समय तमिलनाडु के मुख्यमंत्री अन्ना दुरई थे. अन्ना दुरई ने इसके खिलाफ तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की और तमिलनाडु की सरकारी स्कूलों से हिन्दी भाषा को हटा दिया.

दक्षिणी राज्यों के कड़े विरोध के चलते एजुकेशन पॉलिसी में ‘त्रिभाषा फॉर्मूले’ को खारिज कर दिया गया. फिर साल 1990 में उर्दू के मशहूर लेखक अली सदर जाफरी के नेतृत्व में ‘त्रिभाषा फॉर्मूले’ पर विशेषज्ञों की एक कमिटी बनायी गयी. इस कमिटी ने अपनी सिफारिश में उत्तर भारत और दक्षिण भारत के लिए अलग-अलग त्रिभाषा फॉर्मूले की सिफारिश की. इसके अनुसार उत्तर भारत में हिन्दी, अंग्रेजी के अलावा तीसरी भाषा के तौर पर उर्दू को शामिल किया गया, वहीं दक्षिण भारत में हिन्दी और स्थानीय भाषा के अलावा अंग्रेजी को शामिल किये जाने की बात कही गयी. वर्ष 1992 में भारत की संसद ने इसको स्वीकार कर लिया. लेकिन गौरतलब बात यह है कि भरतीय संविधान के अनुसार शिक्षा राज्यों का विषय है. ऐसे में कोई भी राज्य ‘त्रिभाषा फॉर्मूले’ को लागू करने के लिए बाध्य नहीं है.

हिन्दी के विरोधी क्यों हैं तमिल

भारत गणराज्य में सैकड़ों भाषाएं हैं. ब्रिटिश राज के दौरान, अंग्रेजी आधिकारिक भाषा थी. जब 20वीं शताब्दी के प्रारम्भ में भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में तेजी आयी, तो ब्रिटिश सरकार के खिलाफ विभिन्न भाषाई समूहों को एकजुट करने के लिए हिन्दी को आम भाषा बनाने के प्रयास किये गये. 1918 की शुरुआत में, महात्मा गांधी ने ‘दक्षिण भारत प्रचार सभा’ (दक्षिण भारत में हिन्दी के प्रचार के लिए संस्थान) की स्थापना की. वर्ष 1925 में, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने अपनी कार्यवाही करने के लिए अंग्रेजी से हिन्दी की ओर रुख किया. महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू दोनों हिन्दी के समर्थक थे और कांग्रेस भारत के गैर-हिन्दी भाषी प्रांतों में हिन्दी की शिक्षा का प्रचार करना चाहती थी. लेकिन हिन्दी को आम भाषा बनाने का विचार दक्षिण के महान चिन्तक, विचारक और नेता ई.वी. रामासामी ‘पेरियार’ को कभी स्वीकार्य नहीं था. किसी भी किस्म की अंधश्रद्धा, कूपमंडूकता, जड़ता, अतार्किकता और विवेकहीनता पेरियार को स्वीकार नहीं थी. वर्चस्व, अन्याय, असमानता, पराधीनता और अज्ञानता के हर रूप को उन्होंने चुनौती दी. दक्षिण भारत में पेरियार को भगवान की तरह पूजा जाता है और उनके विचारों को बड़ा सम्मान प्राप्त है.

पेरियार ने दक्षिण में हिन्दी के प्रसार को तमिलों को उत्तर भारतीयों के अधीन एक प्रयास के रूप में देखा. उन्होंने कहा कि इस तरह ब्राह्मण तमिलों पर हिन्दी और संस्कृत थोपने का प्रयास कर रहे हैं. उन्होंने इसके खिलाफ आन्दोलन किये, जिन्हें तमिलभाषी मुसलमानों का भी सहयोग मिला. पेरियार के हिन्दी विरोधी विचार के आधार में दरअसल हिन्दुओं का धर्मग्रन्थ रामायण था, जिसे पेरियार ने कभी धार्मिक किताब नहीं माना. उनका कहना था कि यह एक विशुद्ध राजनीतिक पुस्तक है; जिसे ब्राह्मणों ने दक्षिणवासी अनार्यों पर उत्तर के आर्यों की विजय और प्रभुत्व को जायज ठहराने के लिए लिखा है. यह गैर-ब्राह्मणों पर ब्राह्मणों और महिलाओं पर पुरुषों के वर्चस्व को कायम करने वाला एक उपकरण मात्र है. उन्होंने कहा कि रामायण को इस चतुराई के साथ लिखा गया है कि ब्राह्मण दूसरों की नजर में महान दिखें; महिलाओं को इनके द्वारा दबाया जा सके तथा उन्हें दासी बनाकर रखा जा सके. रामायण में जिस लड़ाई का वर्णन है, उसमें उत्तर का रहने वाला कोई भी (ब्राह्मण) या आर्य (देव) नहीं मारा गया. वे सारे लोग, जो इस युद्ध में मारे गये; वे तमिल थे. जिन्हें राक्षस कहा गया. रामायण की कथा का उद्देश्य तमिलों को नीचा दिखाना है. तमिलनाडु में इस कथा के प्रति सम्मान जताना तमिल समुदाय और देश के आत्मसम्मान के लिए खतरनाक और अपमानजनक है. उन्होंने कहा कि दक्षिण में हिन्दी का प्रसार ब्राह्मणों के धर्मग्रंथों, रूढ़ियों तथा ‘मनुस्मृति’ को तमिल समाज पर थोपना है; जो कि तमिलों के लिए अपमानजनक है.

हिन्दी की अनिवार्य शिक्षा को लेकर द्रविड़ आंदोलन का दशकों लम्बा विरोध ब्राह्मणवाद, संस्कृत के प्रभुत्व और हिन्दू राष्ट्रवाद को बढ़ावा दिये जाने के खिलाफ वैचारिक लड़ाई पर आधारित था. दक्षिण भारतीयों ने हमेशा संस्कृत को ब्राह्मणवादी हिन्दू धर्मग्रंथों के प्रसार की सवारी के तौर पर ही देखा जो जातिगत एवं लैंगिक ऊंच-नीच की व्यवस्था को बनाये रखने का काम करती है. संस्कृत से नजदीकी को देखते हुए हिन्दी को भी जातिगत एवं लैंगिक शोषण की ‘पिछड़ी संस्कृति को बढ़ावा देनेवाली भाषा’ के तौर पर देखा गया.

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तमिलनाडु में हिन्दी का विरोध इस आधार पर भी है कि आधुनिक, उपयोगी और प्रगतिशील ज्ञान यानी विज्ञान, तकनीक और तार्किक विचारों को हासिल करने की दृष्टि से हिन्दी समर्थ भाषा नहीं है. भले ही तमिलनाडु अपने कुशल श्रमबल के लिए पर्याप्त अच्छी नौकरियां पैदा कर पाने में समर्थ नहीं हो पाया है, लेकिन अंग्रेजी शिक्षा में निवेश ने उनके अंतरराष्ट्रीय प्रवास को मुमकिन बनाया है. सर्वविदित है कि अंग्रेजी भाषा के ज्ञान के कारण ही भारतीय सॉफ्टवेयर कम्पनियां कम लागत वाले प्रोग्रामिंग पेशेवरों की मौजूदगी का फायदा उठा पायीं और वैश्विक बाजार में अपने लिए जगह बना सकीं. यहां से बड़ी संख्या में लोग अमेरिका और अन्य पश्चिमी देशों में गये हैं. भारत में आनेवाले धन (रेमिटेंसेज) के मामले में तमिलनाडु, केरल के बाद दूसरे स्थान पर आता है. राज्य की कुल आय में विदेशों से आनेवाले धन का योगदान 14 फीसदी है.

तमिलनाडु के लोगों की सोच के अनुसार हिन्दी उतनी पुरानी और समृद्ध भाषा नहीं है, जितनी तमिल और बांग्ला भाषाएं हैं. तमिल लोगों को यह भी लगता है कि हिन्दी की तुलना में अंग्रेजी समझना और सीखना ज्यादा आसान है. उनका कहना है कि आखिर वे अपने पास पहले से मौजूद एक आला दर्जे की भाषा को एक अविकसित और दोयम दर्जे की भाषा के लिए क्यों छोड़ दें?

Edited by – Neelesh Singh Sisodia

अनीता हसनंदानी का ये बोल्ड अंदाज देखकर आप रह जायेंगे दंग

टीवी और बौलीवुड एक्ट्रेस अनीता हसनंदानी हाल ही में वियतनाम गई थी. जहां से उन्होंने अपनी कुछ फोटोज शेयर की जिसे फैंस खासा पसंद कर रहें हैं. काले रंग की मोनोकिनी में अनीता काफी सेक्सी लगी. अनीता की इन तस्वीरों पर फैंस और सेलेब्स कमेंट्स की बरसात करने में लगे हुए हैं. अनीता वियतनाम में हर एक पल को खुलकर जीया. वियतनाम के समुंदर में अनीता ने खूब गोते लगाए. अनीता ने वियतनाम में कई फोटोज खिंचवाई.

फैन फौलोविंग

अनीता हसनंदानी की फैन फौलोविंग की बात करें तो अकेले इंस्टाग्राम पर 4.2 फौलोवर्स हैं. हाल ही में उनकी एक म्यूजिक वीडियों  ‘पीरह मेरी’ को लोगों ने काफी पसंद किया. अनीता अपने फैंस के लिए काफी फोटोज शेयर करती रहती है, शायद यही कारण है की उनके फैंस उनसे कनेक्ट फील करते हैं.

 

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Ok am shy … No mean comments pls ☺️🖤 📸 @rohitreddygoa 🥰

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Vishakha I’m gonna miss you!

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छोटे और बड़े पर अजमाया रंग

अनिता हस्सनंदनी का जन्म 14 अप्रैल, 1981 में हुआ. वैसे तो अनिता ने काफी सीरियल फिल्में की है पर उनको असल पहचान  बालाजी टेलिफिल्म्स के “काव्यांजलि” के ‘अंजलि नंदा’ किरदार से मिली. उन्होंने अपने कैरियर की शुरुवात बालाजी टेलीफिल्म्स के “कभी सौतन कभी सहेली” सीरियल से की. हिंदी फिल्म कृष्णा कौटेज में दमदार एक्टिंग करने वाली अनीता ने कन्नड़, तमिल और तेलुगु फिल्मों में भी सफल एक्टिंग किया.

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#Naagin3

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कुछ पोपुलर शोज

अनीता ने ‘कभी सौतन कभी सहेली’ (तनुश्री) ‘काव्यांजलि’ (अंजलि नंदा) ‘कयामाथ’ (स्वाति) ‘कसम से’ (स्वयं) ‘क्यूंकि सास भी कभी बहु थी’ (साँची) ‘क्या दिल में है’ (तपुर) ‘कहानी हमारे महाभारत की’ (द्रौपदी/ पाँचाली) ‘कौमेडी सर्कस का जादू’ (धारावाहिक मेजबान) ‘फीअर फ़ैक्टर- खतरों के खिलाडी’ (स्वयं) ‘अनहोनियों का अँधेरा’ (अनाहिता मालिक) ‘किचेन चैम्पियनशिप’ (स्वयं) ‘ये है मोहब्बते’ (शगुन) ‘नागिन 3’ (विशाखा) में अपनी एक्टिंग से सभी का दिल जीता.

 

 

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Mood 💭

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एंजेला क्रिस्लिनजकी का नया जलवा ‘‘परिया’’

अभिनेत्री और मौडल एंजेला क्रिस्लिनजकी निंरतर अपना जलवा दिखाती जा रही हैं.यूं तो एंजेला तीन तेलगू फिल्मों के अलावा एक हिंदी फिल्म ‘‘1921’’में अभिनय कर चुकी हैं,मगर उनके म्यूजिक वीडियो काफी पसंद किए गए. उनके पिछले म्यूजिक वीडियो ‘‘इश्क  का राजा’’को ‘यूट्यूब’पर 140 लाख से अधिक लोगों ने और ‘‘चन्न वी गवाह’’को यूट्यूब पर पच्चीस लाख से अधिक लोग देख चुके हैं. अब ‘‘चन्न वी गवाह’’के ही निर्देषक माधव महाजन के साथ एंजेला ने नया म्यूजिक वीडियो ‘‘परिया’’की शूटिंग की है.रिश्तों को लेकर बात करने वाला यह अति सुंदर गाना है. इसे चंडीग-सजय़ व आस पास के सुंदर इलाके में फिल्माया गया है. इस गाने में रिश्तों को लेकर बात करते हुए कहा गया है कि रिश्तें में किस तरह छोटी छोटी गलतफहमियां होती हैं और हम किस तरह इन्हें दूर करते हुए अपने प्यार के लिए लड़ सकते हैं.

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Give me some vitamin sea 🐬 #angelakrislinzki

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“The rest of the world was black and white, but we were in screaming color.” #angelakrislinzki

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ये भी पढ़ेंप्रेग्नेंसी में खुद को ऐसे फिट रखती हैं एमी जैक्सन, शेयर 

अभिनेत्री के तौर पर एंजेला इन दिनों काफी काम कर रही हैं.एक तरफ वह मोहित सूरी के निर्देषन में फिल्म‘‘मलंग’’में अभिनय कर रही हैं,तो दूसरी तरफ वह षर्मन जोषी के साथ वेब सीरीज कर रही हैं. एंजेला क्रिंस्लिनजकी कहती हैं-ंउचय‘‘मैंने अभिनय के अलावा कई तरह के नृत्य सीख रखे हैं.मु-हजये अलग अलग जाॅनर के गीतांे पर नृत्य करने में आनंद आता है.’’

Edited By – Neelesh Singh Sisodia

आशिक हत्यारा

लेखक- अशोक शर्मा 

राजकुमार गौतम अपनी खूबसूरत पत्नी और ढाई वर्षीय बेटी नान्या के साथ 4 महीने पहले ही थाणे

जिले के भादवड़ गांव में किराए पर रहने के लिए आया था. इस के पहले वह भिवंडी के अवधा गांव में रहता था. उस समय उस की पत्नी सपना लगभग 7 महीने की गर्भवती थी. दोनों का व्यवहार सरल और मधुर था. यही कारण था कि आसपड़ोस के लोगों में पतिपत्नी जल्दी ही घुलमिल गए थे.

वैसे बड़े महानगरों में रहने वाले लोग अपनी दोहरी जिंदगी जीते हैं. वे जल्दी किसी से घुलतेमिलते नहीं हैं. सभी अपने काम से मतलब रखते हैं. कौन क्या करता है, कैसे रहता है, इस से उन्हें कोई मतलब नहीं रहता. लेकिन राजकुमार और सपना अपने पड़ोसियों से घुलमिल कर रहते थे.

पतिपत्नी का दांपत्य जीवन अच्छी तरह से चल रहा था. करीब 2 महीने बाद सपना ने दूसरी बच्ची को जन्म दिया. बच्ची स्वस्थ और सुंदर थी, जिसे देख दोनों खुश थे.

2 बेटियों के जन्म के बाद दोनों कुछ दिनों तक कोई बच्चा नहीं चाहते थे. लिहाजा सपना ने डिलिवरी के बाद कौपर टी लगवा ली थी. लेकिन कौपर टी लगने के बाद सपना के पेट में अकसर दर्द रहने लगा था. यह दर्द कभीकभी असहनीय हो जाता था, जिस की वजह से वह बेहोश तक हो जाती थी. यह बात उस के पड़ोसियों को भी मालूम थी.

घटना 4 फरवरी, 2019 की है. उस समय दोपहर के लगभग 3 बजे का समय था, जब पड़ोसियों ने राजकुमार की ढाई वर्षीय बेटी नान्या के रोने की आवाज सुनी. रोने की आवाज पिछले 15-20 मिनट से लगातार आ रही थी. पड़ोसी राम गणेश से नहीं रहा गया तो वह राजकुमार के घर पहुंच गए.

उन्होंने घर का जो दृश्य देखा उसे देख कर उन के होश उड़ गए. वह चीखते हुए भाग कर बाहर आ गए और चीखचीख कर आसपड़ोस के लोगों को इकट्ठा कर लिया. लोगों ने चीखने की वजह पूछी तो उन्होंने बताया कि राजकुमार की पत्नी का किसी ने गला काट दिया है.

यह सुन कर जब लोग राजकुमार के घर में गए तो उस की पत्नी फर्श पर औंधे मुंह पड़ी थी. उस के गले के आसपास खून फैला हुआ था. उस की बेटी नान्या उस के पास बैठी अपने नन्हेनन्हे हाथों से मां को उठाने की कोशिश कर रही थी और दूसरी छोटी नवजात बच्ची बिस्तर पर पड़ी हाथपैर मार रही थी.

इस मार्मिक दृश्य को जिस ने भी देखा था, उस का कलेजा मुंह को आ गया. पड़ोसी दोनों बच्चियों को उठा कर घर से बाहर लाए. उन्होंने फोन कर के इस की जानकारी राजकुमार गौतम को दे दी और बेहोशी की हालत में पड़ी घायल सपना को उठा कर स्थानीय इंदिरा गांधी अस्पताल ले गए, जहां डाक्टरों ने सपना को मृत घोषित कर दिया. अस्पताल ने इस मामले की जानकारी पुलिस को दे दी.

वह इलाका शांतिनगर थाने के अंतर्गत आता था. यह सूचना पीआई किशोर जाधव को मिली तो वह एसआई संदीपन सोनवणे के साथ इंदिरा गांधी अस्पताल पहुंच गए. अस्पताल जा कर उन्होंने डाक्टरों से बात की. इस के अलावा वह उन लोगों से मिले, जो सपना को उपचार के लिए अस्पताल लाए थे.

मृतका के पति राजकुमार ने बताया कि उस की पत्नी की जान कौपर टी के कारण गई है. कौपर टी की वजह से उस की तबीयत ठीक नहीं रहती थी, जिस का इलाज चल रहा था. लेकिन कभीकभी दर्द जब असह्य हो जाता था, तब उस की सहनशक्ति जवाब दे देती थी. ऐसे में वह अपनी जान लेने पर आमादा हो जाती थी.

राजकुमार ने पत्नी की मौत की जो थ्यौरी बताई, वह टीआई के गले नहीं उतरी. उन्होंने यह तो माना कि तकलीफ में कभीकभी इंसान आपा खो बैठता है, लेकिन उस समय सपना की स्थिति ऐसी नहीं थी. डाक्टरों के बयानों से स्पष्ट हो चुका था कि आत्महत्या के लिए कोई अपना गला नहीं काट सकता.

मौत की सही वजह तो पोस्टमार्टम के बाद ही सामने आनी थी. लिहाजा टीआई किशोर जाधव ने सपना की संदिग्ध हालत में हुई मौत की जानकारी डीसीपी और एसीपी को देने के बाद लाश पोस्टमार्टम के लिए उसी अस्पताल की मोर्चरी में भिजवा दी.

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अस्पताल की काररवाई निपटाने के बाद पीआई किशोर जाधव सीधे घटनास्थल पर पहुंचे और वहां का बारीकी से निरीक्षण किया. घटनास्थल पर खून लगा एक स्टील का चाकू मिला, जिसे जाब्ते की काररवाई में शामिल कर के उन्होंने जांच के लिए रख लिया.

पीआई ने राजकुमार गौतम के बयानों के आधार पर सपना गौतम की मौत को आत्महत्या के रूप में दर्ज तो कर लिया था, लेकिन मामले की जांच बंद नहीं की थी. उन्हें सपना गौतम की पोस्टमार्टम रिपोर्ट का इंतजार था. किशोर जाधव को लग रहा था कि दाल में कुछ काला है.

पोस्टमार्टम और फोरैंसिक रिपोर्ट आई तो पीआई चौंके. चाकू पर फिंगरप्रिंट मृतका के बजाए किसी और के पाए गए. इस का मतलब था कि सपना की हत्या की गई थी.

मामले की आगे की जांच के लिए पीआई किशोर जाधव ने एक पुलिस टीम बनाई. इस टीम में सहायक इंसपेक्टर (क्राइम), कांस्टेबल रविंद्र चौधरी, गुरुनाथ विशे, अनिल बलबी, किरण पाटिल, विजय कुमार, श्रीकांत पाटिल आदि को शामिल किया गया.

टीम ने जांच शुरू कर दी. अपराध घर के अंदर हुआ था, इस का मतलब था कि अपराधी सपना का नजदीकी ही रहा होगा. इसलिए इंसपेक्टर राजेंद्र मायने ने संदेह के आधार पर सपना के पति राजकुमार गौतम से गहराई से पूछताछ की.

उन्होंने उस की कुंडली भी खंगाली. उस की अंगुलियों के निशान ले कर जांच के लिए भेज दिए गए. लेकिन उस के हाथों के निशानों ने चाकू पर मिले निशानों से मेल नहीं खाया. इस से पुलिस को राजकुमार बेकसूर लगा.

तब पुलिस ने उस के दोस्तों की जांच की. जांच में पता चला कि राजकुमार का एक दोस्त विकास चौरसिया उस की गैरमौजूदगी में भी उस के घर आता था. विकास पान की एक दुकान पर काम करता था और राजकुमार के गांव का ही रहने वाला था. दोनों के बीच अच्छी दोस्ती थी. पुलिस ने विकास का फोन नंबर सर्विलांस पर लगा दिया और उस की तलाश शुरू कर दी.

वह अपने घर से गायब था. उस की तलाश के लिए पुलिस ने मुखबिर भी लगा दिए. एक मुखबिर की सूचना पर विकास को भिवंडी के सोनाले गांव से हिरासत में ले लिया गया. पुलिस ने विकास से सपना की हत्या के संबंध में पूछताछ की तो वह खुद को बेकसूर बताता रहा. लेकिन सख्ती करने पर उस ने हत्या का जुर्म कबूल कर लिया. उस ने हत्या की जो कहानी बताई, वह चौंकाने वाली निकली.

25 वर्षीय राजकुमार गौतम उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले के गांव कारमियां शुक्ला का रहने वाला था. उस के पिता गौतमराम गांव के एक साधारण किसान थे. गांव में उन की थोड़ी सी काश्तकारी थी, जिस में उन की गृहस्थी की गाड़ी चलती थी.

परिवार की आर्थिक स्थिति अच्छी न होने के कारण राजकुमार गौतम की कोई खास शिक्षादीक्षा नहीं हो पाई थी. जब वह थोड़ा समझदार हुआ तो उस ने रोजीरोटी के लिए मुंबई की राह पकड़ ली. उस के गांव के कई लोग रहते थे. मुंबई से करीब सौ किलोमीटर दूर तहसील भिवंडी के अवधा गांव में उन्हीं के साथ रह कर वह छोटामोटा काम करने लगा.

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भिवंडी का अवधा गांव पावरलूम कपड़ों और कारखानों का गढ़ माना जाता है. राजकुमार गौतम ने भी पावरलूम कारखाने में काम कर कपड़ों की बुनाई का काम सीखा और मेहनत से काम करने लगा. जब वह कमाने लगा तो परिवार वालों ने उस की शादी पड़ोस के ही गांव की लड़की सपना से कर दी. यह सन 2016 की बात है.

राजकुमार गौतम खूबसूरत सपना से शादी कर के बहुत खुश था. वह शादी के कुछ दिनों बाद ही सपना को अपने साथ मुंबई ले गया. किराए का कमरा ले कर वह पत्नी के साथ रहने लगा. शादी के करीब डेढ़ साल बाद सपना ने एक बेटी को जन्म दिया, जिस का नाम नान्या रखा गया.

इसी दौरान राजकुमार की विकास चौरसिया से मुलाकात हो गई. विकास चौरसिया पान की एक दुकान पर काम करता था. दोनों एक ही गांव के रहने वाले थे, इसलिए उन के बीच जल्द ही दोस्ती हो गई.

20 वर्षीय विकास एक महत्त्वाकांक्षी युवक था. वह जो भी कमाता था, अपने खानपान और शौक पर खर्च करता था. राजकुमार गौतम ने जिगरी दोस्त होने की वजह से विकास की मुलाकात अपनी पत्नी से भी करवा दी थी. राजकुमार ने पत्नी के सामने विकास की काफी तारीफ की थी.

पहली मुलाकात में ही विकास सपना का दीवाना हो गया था. उस ने अपनी बेटी नान्या का जन्मदिन मनाया तो विकास चौरसिया को खासतौर पर अपने घर बुलाया. तब राजकुमार और सपना ने विकास की काफी आवभगत की थी. इस आवभगत में राजकुमार गौतम की सजीधजी बीवी सपना विकास के दिल में उतर गई.

वह जब तक राजकुमार के घर में रहा, उस की निगाहें सपना पर ही घूमती रहीं. जन्मदिन की पार्टी खत्म होने के बाद विकास चौरसिया सब से बाद में अपने घर गया था. उस समय उस ने नान्या को एक महंगा गिफ्ट दिया था. यह सब उस ने सपना को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए किया था.

सपना की छवि विकास की नसनस और आंखों में कुछ इस तरह से समा गई थी कि उस का सारा सुखचैन छिन गया. उस का मन किसी काम में नहीं लग रहा था. सोतेजागते उसे बस सपना ही दिख रही थी. वह उस का स्पर्श पाने के लिए तड़पने लगा था.

राजकुमार को अपनी दोस्ती पर पूरा विश्वास था. लेकिन विकास दोस्ती में दगा करने की फिराक में था. वह तो बस उस की पत्नी सपना का दीवाना था. वह सपना का सामीप्य पाने के लिए मौके की तलाश में रहने लगा था.

इसीलिए मौका देख कर वह राजकुमार के साथ चाय पीने के बहाने अकसर उस के घर जाने लगा था. वह सपना के हाथों की बनी चाय की जम कर तारीफ करता था. औरत को और क्या चाहिए. विकास चौरसिया को यह बात अच्छी तरह मालूम थी कि औरत अपनी तारीफ और प्यार की भूखी होती है. जो विकास ने सोचा था, वैसा ही कुछ हुआ भी. इस तरह दोनों में बातचीत का सिलसिला शुरू हो गया.

धीरेधीरे दोनों एकदूसरे के काफी करीब आ गए थे. विकास बातचीत के बीच कभीकभी सपना से भद्दा मजाक भी कर लेता था, जिसे सुन कर सपना का चेहरा लाल हो जाता था और वह उस से नजरें चुरा लेती थी.

कुछ दिनों तक तो विकास राजकुमार के साथ ही उस के घर जाता था, लेकिन बाद में वह राजकुमार के घर पर अकेला भी आनेजाने लगा. वह चोरीछिपे सपना के लिए कीमती उपहार भी ले कर जाता था. उपहारों और अपनी लच्छेदार बातों में उस ने सपना को कुछ इस तरह उलझाया कि वह अपने आप को रोक नहीं पाई और परकटे पंछी की तरह उस की गोदी में आ गिरी. सपना को अपनी बांहों में पा कर विकास चौरसिया के मन की मुराद पूरी हो गई.

एक बार जब मर्यादा की कडि़यां बिखरीं तो बिखरती ही चली गईं. अब स्थिति ऐसी हो गई थी कि बिना एकदूसरे को देखे दोनों को चैन नहीं मिलता था. उन्हें जब भी मौका मिलता, दोनों अपनी हसरतें पूरी कर लेते. सपना और विकास चौरसिया का यह खेल बड़े आराम से लगभग एक साल तक चला. इस बीच सपना फिर से गर्भवती हो गई.

पहली बार सपना जब गर्भवती हुई थी तो वह अपनी डिलिवरी के लिए अपने गांव चली गई थी. इस बार सपना ने गांव न जा कर अपनी डिलिवरी शहर में ही करवाने का फैसला कर लिया था.

जब सपना की डिलिवरी के 3 महीने शेष रह गए तो राजकुमार अवधा गांव का कमरा खाली कर भादवड़ गांव पहुंच गया और भिवंडी के इंदिरा गांधी अस्पताल में सपना की डिलिवरी करवाई. डिलिवरी के बाद सपना ने पति की सहमति से कौपर टी लगवा ली. यह कौपर टी सपना को रास नहीं आई. इसे लगवाने के बाद सपना को दूसरे तरह की समस्याएं आने लगीं.

सपना की डिलिवरी के 25 दिनों बाद एक दिन दोपहर 2 बजे विकास चौरसिया मौका देख कर राजकुमार गौतम के घर पहुंच गया. उस समय सपना की बेटी नान्या घर के दरवाजे पर खेल रही थी. घर में घुसते ही उस ने दरवाजा बंद कर लिया. उस समय सपना अपने बिस्तर पर लेटी अपनी छोटी बेटी को दूध पिला रही थी. विकास के अचानक आ जाने से सपना उठ कर बैठ गई.

इस से पहले कि सपना कुछ कह पाती विकास ने उस के बगल में बैठ कर बच्ची का माथा चूमा और सपना को बांहों में लेते हुए उस से शारीरिक संबंध बनाने के लिए जिद करने लगा, जिस के लिए सपना तैयार नहीं थी.

सपना ने विकास को काफी समझाने की कोशिश की और कहा, ‘‘देखो, अभी मैं उस स्थिति में नहीं हुई हूं कि तुम्हारी यह इच्छा पूरी कर सकूं. आज तक मैं ने कभी तुम्हारी बातों से कभी इनकार नहीं किया है. आज मैं बीमार हूं, ऊपर से कौपर टीम लगवाई है. अभी तुम जाओ, जब मैं ठीक हो जाऊंगी तो आना.’’

लेकिन वासना के भूखे विकास पर सपना की बातों का कोई असर न हुआ. वह उस के साथ जबरदस्ती करने पर उतारू हो गया और उस पर भूखे भेडि़ए की तरह टूट पड़ा. इस के पहले कि वह अपने मकसद में कामयाब होता, सपना नाराज हो गई और उस ने अपने ऊपर से विकास को नीचे फर्श पर धक्का दे दिया. फिर उठ कर वह उसे अपने घर से बाहर जाने के लिए कहने लगी.

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सपना के इस व्यवहार और वासना के उन्माद में वह अपना होश खो बैठा. वह सीधे सपना की किचन में गया और वहां से स्टील का चाकू उठा लाया. उस चाकू से उस ने सपना का गला काट दिया. सपना के गले से खून निकलने लगा और वह फर्श पर गिर पड़ी.

सपना के गले से बहते खून को देख कर विकास चौरसिया की वासना का उन्माद काफूर हो गया. वह डर कर वहां से चुपचाप निकल गया. उस के जाने के बाद दरवाजे पर खेल रही नान्या घर के अंदर आई और मां को उठाने लगी थी. सपना के न उठने पर वह उस से लिपट कर रोने लगी.

विकास चौरसिया से विस्तृत पूछताछ करने के बाद पुलिस ने उसे न्यायालय में पेश कर न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया.

राजकुमार गौतम को जब यह मालूम पड़ा कि उस की पत्नी का आशिक और हत्यारा और कोई नहीं, बल्कि उस का अपना जिगरी दोस्त था तो उसे इस बात का अफसोस हुआ कि विकास जैसे आस्तीन के सांप को घर बुला कर उस ने कितनी बड़ी गलती की थी.

कथा लिखे जाने तक अभियुक्त विकास चौरसिया थाणे की तलौजा जेल में था. मामले की जांच इंसपेक्टर राजेंद्र मायने कर रहे थे.

 

मोदी की जीत में मुद्दे गुम

4 विधानसभाओं और कितने ही उपचुनावों की हार ही नहीं देशभर में बढ़ती बेकारी, धौंसबाजी के मामले, नोटबंदी के असर के बाद लग रहा था कि नरेंद्र मोदी जैसेतैसे चुनावों में जगह बना पाएंगे. उन्होंने कांग्रेस को ही नहीं, नवीन पटनायक और ममता बनर्जी को भी पटकनी दे कर साबित कर दिया कि भाजपा का रथ जगन्नाथ पुरी के रथों की तरह सब को एक बार फिर रौंदने की ताकत रखता?है.

नरेंद्र मोदी के पिछले 5 साल कोई बहुत खास नहीं थे, पर इतना जरूर खास रहा कि उन्होंने अपने को लगातार आम जनता से जोड़े रखा. वे लगातार अपने वोटरों व भक्तों से ही नहीं दूसरों से भी बहुत ही ढंग से बोलते रहे, बात करते रहे. लोगों को शायद लगा कि वे उन के आसपास ही कहीं हैं. दूसरी ओर कांग्रेस के राहुल गांधी हों या ममता बनर्जी, मायावती, अखिलेश यादव और तेजस्वी यादव, वे उस तरह अपने लोगों से बात न कर सके जैसे नरेंद्र मोदी माहिर हैं.

यही नहीं, भारतीय जनता पार्टी की एक बड़ी फौज है जो कंप्यूटरों पर बैठ कर मोदी की बातों को जनता तक पहुंचाती है तो दूसरों की जम कर खिंचाई भी कर लेती है. राहुल गांधी को तो लगातार निशाने पर रखा और जवाब में कांग्रेस ने तुर्कीबतुर्की जवाब देना सही नहीं समझा. जहां मोदी के चाहने वाले हर तरह की भाषा इस्तेमाल कर सकते थे, वहीं दूसरे दलों के लिए काम करने वाले या तो मोदी की शिकायतें करते नजर आए या अपने 2-4 कामों का गुणगान. उन्हें लोगों से बात करने की कला ही नहीं आती है. यही वह कला है जिस के सहारे गांवों, छोटे शहरों, कसबों के चौराहों पर बोलने वाले इलाके के चौधरी बात करते हैं, फिर नेता बनते हैं.

नरेंद्र मोदी की सरकार इस बार भारी बहुमत से जीती यह थोड़े अचरज की बात है क्योंकि इस बार कम से कम उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी ने एकसाथ चुनाव लड़ा था. इसी तरह बिहार में राष्ट्रीय जनता दल और कांग्रेस वाले साथ थे. मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ में कांग्रेस विधानसभाओं में जीत कर आई थी पर इन सब जगह एक पार्टी के वोटरों ने अपनी पार्टी के साथ आई नई पार्टी को वोट देने की जगह भाजपा को वोट देना ठीक समझा, क्योंकि यह पक्का लग रहा था कि उन के वोटों से जीता सांसद उन के काम करा पाएगा, यह पक्का नहीं है.

हमारे देश में वोट काम पर कम चेहरों पर ज्यादा पड़ते रहे हैं. पहले जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के चेहरों पर पड़े, फिर एक बार अटल बिहारी वाजपेयी के चेहरे पर. पर जब 2004 में अटल बिहारी वाजपेयी के सामने सोनिया गांधी का चेहरा आया तो वह हावी हो गया. इस बार और 2014 में नरेंद्र मोदी के सामने राहुल गांधी जैसों का चेहरा फीका था.

रही बात नीतियों की तो उन की कौन परवाह करता है? इस देश की जनता को अपने वोट से ज्यादा अपने भाग्य की फिक्र होती है. सरकार ने कब कौन से लड्डू दिए हैं? फसल अच्छी हुई तो अनाज ज्यादा, जेब में 4 पैसे आ गए. खराब हुई तो थोड़ा हाहाकार. सरकार का भला क्या दोष? वह भगवान के ऊपर थोड़े ही है? नीतियां चाहे कोई भी हों, नाम तो हो.

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यही वजह है कि नवीन पटनायक को ओडिशा में विधानसभा में अच्छी सीटें मिल गईं पर लोकसभा में चोट पहुंची.

भारतीय जनता पार्टी की जीत के चाहे कुछ भी माने हों, इस का असर देश के रोजमर्रा के काम पर भी पड़ेगा. अब चूंकि देश में 1947 से 1977 तक जैसे एक पार्टी का राज बन गया है, देश के लोगों की सुध लेने वाला अपने ही कामों में फंसा रहेगा. नरेंद्र मोदी को सलाह देने वालों में से कोई भी अब उन्हें कह नहीं सकेगा कि उन का कोई कदम किस तरह पूरा सही नहीं है. सब हां में हां मिलाएंगे.

उन के अपने मंत्री ही नहीं, टीवी, अखबार, सोशल मीडिया हर कोई अलग बात कहने से कतराएगा क्योंकि जनता ने कह दिया है कि सही हैं तो नरेंद्र मोदी. नरेंद्र मोदी की अपनी पार्टी भारतीय जनता पार्टी वैसे ही भारीभरकम है. इस में दिग्गज नेता नहीं हैं, पर रसूखदार लोग हैं. वे अपना वजन कब कहां डालेंगे कहा नहीं जा सकता.

नरेंद्र मोदी को पहले 5 सालों में कई नई बातें सीखनी पड़ीं, बहुतों की सुनी होगी. अब उन्हें कोई सलाह देने की हिम्मत न करेगा. अब उन्हें अपनी बात पर ही, अपने फैसले पर ही देश चलाना होगा. यह काम आसान नहीं होता.

देश की जनता ने नरेंद्र मोदी को एक मजबूत नेता मान कर चुना है और उन्हें वह मजबूती हर कदम पर दिखानी होगी. देश की जो समस्याएं मुंह खोले खड़ी हैं, उन के जवाब उन्हें अकेले ढूंढ़ने होंगे. भारतीय जनता पार्टी इस जीत को अहंकार न समझ ले, तानाशाही न समझ ले, इस पर रोक लगाने का काम नरेंद्र मोदी को ही करना होगा.

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अब तक नरेंद्र मोदी के सामने संसद में कई मजबूत अच्छे नेता थे, कई मुख्यमंत्री अपनी खास पहचान रखते थे. अब उन्होंने सब का मुंह बंद करा दिया है. वे अगर कहीं संसद में लोकसभा में जीत कर या पहले से राज्यसभा में हैं भी तो उन की आवाज में वह तेजी नहीं रहेगी. वे खिसियाए से रस्म अदा करते नजर ही आएंगे.

नरेंद्र मोदी ने एक बड़ा काम किया है. अखिलेश यादव, मायावती, अरविंद केजरीवाल, लालू प्रसाद यादव के बेटे को पूरा सबक सिखा दिया. पार्टियों की यह मेढकीय भीड़ देश को खराब कर रही थी. पश्चिम बंगाल की ममता बनर्जी, हरियाणा का चौटाला परिवार शायद अब राजनीति की धूल में खो जाएं. यह जरूरी है. देश में सामने वाली पार्टी मजबूत होनी चाहिए, बंटी हुई नहीं.                द्य

बौलीवुड में मराठी एक्टर्स के साथ होता है भेदभाव – स्मिता तांबे

यह हास्य व्यंग प्रधान वेब सीरीज लोगों के घरों के अंदर काम करने वाली बाई की कहानी है,जो सोशल मीडिया पर स्टार बन जाती है.इसमें स्मिता तांबे ने शीला का मुख्य किरदार निभाया है. स्मिता तांबे का मानना है कि मराठी भाषीयों को अंडरस्टीमेट नहीं किया जाना चाहिए.

स्मिता तांबे ने 2009 में मराठी भाषा की फिल्म ‘‘जोगवा’’में अभिनय किया था और इसके लिए उन्हे अर्वाड मिल गया था.उसके बाद से स्मिता तांबे ने ‘देवूल’, ‘तुकाराम’,‘72 माइल्सः एक प्रवास’,‘महागुरू’, ‘बायोस्कोप’, ‘गणवेश’जैसी कुछ सफल मराठी भाषी फिल्मों,अंतरराष्ट्रिय स्तर पर प्रशंसित अंग्रेजी भाषा की फिल्म ‘‘उमरीका’’के अलावा ‘‘सिंघम रिटर्न’’,‘‘अजी’’, ‘‘रूख’’, ‘‘नूर’’ व ‘‘डबल गेम’’ जैसी हिंदी फिल्में कर चुकी हैं.इन दिनों वह एक मराठी भाषा की फिल्म ‘‘सावत’का निर्माण व उसमें अभिनय कर रही हैं.

स्मिता तांबे को मराठी फिल्मों में स्टार माना जाता है.स्मिता तांबे ने मराठी फिल्मों में बतौर हीरोईन  कई स्ट्रांग किरदार निभाए हैं. मगर हिंदी फिल्मों में उन्हे हमेशा छोटे किरदारों से ही संतुष्ट होना पड़ा है.सिर्फ स्मिता तांबे ही नहीं लगभग हर मराठी भाषी कलाकार के साथ ऐसा होता आया है.

हाल ही में ‘‘माई नेम इज शीला’’के प्रमोशन के दौरान जब  स्मिता तांबे से हमारी एक्सक्लूसिब बातचीत हुई,तो हमने उनसे हिंदी फिल्मों में महाराष्ट्यिन कलाकारों के संग भेदभाव को लेकर सवाल किया,जिसका उन्होने बड़ी बेबाकी से जवाब दिया.

प्रस्तुत है स्मिता तांबे के संग हुई एक्सक्लूसिब बातचीत के अंश…

सवाल: आपको पहली बार कब लगा कि अभिनय के क्षेत्र में आगे बढ़ा जाना चाहिए?

-यूं तो में कौलेज दिनो से ही नाटकों में अभिनय करती आयी हूं. मैंने कईमराठी के टीवी सीरियल भी किए. फिर मैंने 2009 में मराठी फिल्म‘‘जोगवा’’ की, जिसके लिए पुरस्कार भी मिला.इस फिल्म के सेट पर मुझे अहसास हुआ कि यह ऐसा माध्यम है,जो सिर्फ मनोरंजन का साधन नहीं,बल्कि एक साधना है.इस फिल्म में अभिनय करते हुए अभिनय तथा फिल्म माध्यम को देखने का मेरा नजरिया ही बदल गया.अब तक मैं बीस से अधिक फिल्में कर चुकी हूं. इन दिनों तीन मराठी फिल्में,‘पंगा’जैसी हिंदी फिल्म के अलावा हिंदी की तीन वेब सीरीज कर रही हूं.

सवाल: सिर्फ आप ही नहीं किसी भी मराठी भाषी कलाकार को हिंदी फिल्मों में वह सफलता नहीं मिल रही है,जो मिलनी चाहिए.इसकी क्या वजह आपकी समझ में आ रही है?

-मुझे ऐसा लगता है कि अब धीरे धीरे यह परिदृश्य बदल रहा है.यदि आप पूरी समाज व्यवस्था देख लो,यदि कोई गुजराती या दक्षिण भारतीय मुंबई आता है,तो मुंबई में रह रहे मध्यम व निम्न मध्यम वर्गीय महाराष्ट्यिन परिवार की औरतें उनके यहां मेड बर्तन मांजने या कपड़े धोने का काम करने वाली बाई बनकर रह जाती हैं.जबकि यहॉं के जो निवासी हैं, सामाजिक व आर्थिक स्थितियां बदलने के साथ ही वह धीरे धीरे मुंबई से दूर टिटवाला या अंबरनाथ जैसे उपनगरों में जाकर रहने को मजबूर हो गए.तो मराठी कलाकारों के लिए हिंदी फिल्मों में उसी तरह के किरदार लिखे गए. मराठी भाषी कलाकार मेहनती हैं .हमारी फिल्म इंडस्ट्री बहुत बड़ी है.मराठी फिल्मों में स्टार बनने के बावजूद उन्हे हिंदी फिल्मों में काम करने के लिए शून्य से शुरूआत करनी होती है.और उस वक्त उन्हें हिंदी फिल्मों में बड़े किरदार दिए नहीं जाते.

आप यदि मेरे करियर का ग्राफ देखोगे,मैने जिस तरह से विविध प्रकार के स्ट्ंाग किरदार मराठी फिल्मों में निभाए हैं,मैने कई मराठी फिल्मों में अमन प्रोटोगौनिस्ट के किरदार निभाए हैं.यदि आप मेरा वह अनुभव जोडे़गे,तो मुझे हिंदी फिल्मों में किसी अन्य उंचे मुकाम पर होना चाहिए था.तो अब मुझे यह याद रखना पड़ेगा कि जब हम हिंदी फिल्मों में काम करें, तो मराठी फिल्मों में मिली सफलता व शोहरत का बोझ लेकर न आएं.

हिंदी में मेरी एक अलग यात्रा है.और मुझे लग रहा है कि दुनिया छोटी होती जा रही है.बंगला या दक्षिण की किसी भी भाषा की हीरोईन को अब हिंदी की वेब सीरीज में याद किया जा रहा है. इससे अब पूरा परिदृश्य बदलेगा. अब मैं भी हिंदी की इस वेब सीरीज ‘‘माई नेम इज शीला’’में मेन किरदार निभा रही हूं. मुझे अलग अलग भाषाओं में काम करना है और मुझे यकीन है कि मुझे ऐसा अवसर अवश्य मिलेगा.इसके अलावा हर कलाकार को किरदारों का चयन करते समय काफी सतर्क रहना होगा.यह उनकी व्यक्तिगत जिम्मेदारी बनती है. मैं अपना कंफर्ट जोन तोड़कर काम कर रही हूं. मेरी राय में बिना कंफर्ट जोन तोड़े आप आगे नहीं बढ़ सकते.

सवाल: आपको नहीं लगता कि मराठी में स्टार होने के बावजूद हिंदी के विशाल दर्शक वर्ग तक पहुंचने के लालच में हिंदी फिल्मों में जो भी काम मिल जाए,कलाकार कर लेता है?

-ऐसा होता है.मगर ‘कुछ भी मिल जाए,कर लो’की सोच बहुत घातक है.आप जो भी कर रहे हैं,उसको लेकर आपका कलाकार के तौर पर कंविंस होना जरुरी है.मसलन-‘माई नेम इज शीला’कर रही हूं ,तो क्यों कर रही हूं,यह सोचा है.मुझे पता है कि मैं क्या कर रही हूं. पर हमें नहीं पता होता कि किस वक्त किसकी क्या जरुरत है.उसके अपने हालात क्या हैं? मेरे लिए एक सवाल यह भी है कि यह किसने तय किया है कि यही मेरा पायदान है?यह हमने ही बनाया है,किसी अन्य ने नहीं. मुझे ऐसा खुद स्मिता को अपने अंदर झॉंक कर ऐसा लग रहा है कि मैं अपना कंफर्ट जोन तोड़कर बाहर निकल रही हूं. मुझे मेरा चेहरा दिखता है.मुझे लगता है कि अब कलाकार के तौर पर मैं यह किरदार करना चाहती हूं. यह एक्सरसाइज करना चाहती हूं.

सवाल: क्या सामाजिक राजनैतिक स्थितियों के ही चलते महाराष्ट्नि किसी बड़े ओहदे तक नहीं पहुंच पा रहे हैं?

-ऐसा न कहें.बड़े बड़े ओहदे पर मराठी लोग हैं.पुलिस विभाग हो या ब्यूरोके्रट्स हों, हर जगह मराठी भाषीयों की उपस्थिति अच्छी है. ओलंपिक में साझी को देख लो.पोलीटीशियन को देख लें.मराठी लोग कई जगहों पर बहुत अच्छा काम कर रहे हैं.

सवाल: महाराष्ट्नि दादर व गिरगांव जैसे दक्षिण मुंबई इलाके से निकलकर मुंबई के आउट स्कर्ट टिटवाला या विरार की तरफ बढ़ गए.इसकी वजहें क्या रहीं?

-इसकी वजह सामाजिक उथलपुथल रहीं.पहले कपड़े की मिले मुंबई सेंट्ल से दादर के बीच में थी.इन मिलों के बंद होने से करीबन तीस हजार मिल मजदूर बेरोजगार हो गए.उसके बाद दादर जैसे इलाके में खुद को सर्वाइव करना मुश्किल हो गया.इसलिए इन्हे आउट स्कर्ट में जाना पडा.

मगर उसी वक्त में विजय तेंदुलकर जैसे लेखक भी आगे बढ़े. इनके नाटकों को लोगों  ने सबसे ज्यादा पसंद किया.कई मराठी लेखक पैदा हुए. इनके जिंदा होने की वजह से ही मराठी थिएटर जिंदा है.मराठी थिएटर का मुकाबला किसी भी भाषा का थिएटर नहीं कर सकता. मेरा मानना है कि मराठी भाषीयों को अंडरस्टीमेट नहीं किया जाना चाहिए.

शान्तिस्वरुप त्रिपाठी

चिंता की कोई बात नहीं

लेखक-प्रतिमा डिके

औसत से कुछ अधिक ही रूप, औसत से कुछ अधिक ही गुण, शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य, अच्छी शिक्षा, अच्छी नौकरी, अच्छा पैसा, मनपसंद पत्नी, समझदार, स्वस्थ और प्यारे बच्चे, शहर में अपना मकान.अब बताइए, जिसे सुख कहते हैं वह इस से अधिक या इस से अच्छा क्याक्या हो सकता है? यानी मेरी सुख की या सुखी जीवन की अपेक्षाएं इस से अधिक कभी थीं ही नहीं. लेकिन 6 माह पूर्व मेरे घर का सुखचैन मानो छिन गया.

सुकांता यानी मेरी पत्नी, अपने मायके में क्या पत्र लिखती, मुझे नहीं पता. लेकिन उस के मायके से जो पत्र आने लगे थे उन में उस की बेचारगी पर बारबार चिंता व्यक्त की जाने लगी थी. जैसे :

‘‘घर का काम बेचारी अकेली औरत  करे तो कैसे और कहां तक?’’

‘‘बेचारी सुकांता को इतना तक लिखने की फुरसत नहीं मिल रही है कि राजीखुशी हूं.’’

‘‘इन दिनों क्या तबीयत ठीक नहीं है? चेहरे पर रौनक ही नहीं रही…’’ आदि.

शुरूशुरू में मैं ने उस ओर कोई खास ध्यान नहीं दिया. मायके वाले अपनी बेटी की चिंता करते हैं, एक स्वाभाविक बात है. यह मान कर मैं चुप रहा. लेकिन जब देखो तब सुकांता भी ताने देने लगी, ‘‘प्रवीणजी को देखो, घर की सारी खरीदफरोख्त अकेले ही कर लेते हैं. उन की पत्नी को तो कुछ भी नहीं देखना पड़ता…शशिकांतजी की पसंद कितनी अच्छी है. क्या गजब की चीजें लाते हैं. माल सस्ता भी होता है और अच्छा भी.’’

कई बार तो वह वाक्य पूरा भी नहीं करती. बस, उस के गरदन झटकने के अंदाज से ही सारी बातें स्पष्ट हो जातीं.

सच तो यह है कि उस की इसी अदा पर मैं शुरू में मरता था. नईनई शादी  हुई थी. तब वह कभी पड़ोसिन से कहती, ‘‘क्या बताऊं, बहन, इन्हें तो घर के काम में जरा भी रुचि नहीं है. एक तिनका तक उठा कर नहीं रखते इधर से उधर.’’ तो मैं खुश हो जाता. यह मान कर कि वह मेरी प्रशंसा कर रही है.

लेकिन जब धीरेधीरे यह चित्र बदलता गया. बातबात पर घर में चखचख होने लगी. सुकांता मुझे समझने और मेरी बात मानने को तैयार ही नहीं थी. फिर तो नौबत यहां तक आ गई कि मेरा मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य भी गड़बड़ाने लगा.

अब आप ही बताइए, जो काम मेरे बस का ही नहीं है उसे मैं क्यों और कैसे करूं? हमारे घर के आसपास खुली जगह है. वहां बगीचा बना है. बगीचे की देखभाल के लिए बाकायदा माली रखा हुआ है. वह उस की देखभाल अच्छी तरह से करता है. मौसम में उगने वाली सागभाजी और फूल जबतब बगीचे से आते रहते हैं.

लेकिन मैं बालटी में पानी भर कर पौधे नहीं सींचता, यही सुकांता की शिकायत है, वह चाहे बगीचे में काम न करे. लेकिन हमारे पड़ोसी सुधाकरजी बगीचे में पूरे समय खुरपी ले कर काम करते हैं. इसलिए सुकांता चाहती है कि मैं भी बगीचे में काम करूं.

मुझे तो शक है कि सुधाकरजी के दादा और परदादा तक खेतिहर मजदूर रहे होंगे. एक बात और है, सुधाकरजी लगातार कई सिगरेट पीने के आदी हैं. खुरपी के साथसाथ उन के हाथ में सिगरेट भी होती है. मैं तंबाकू तो क्या सुपारी तक नहीं खाता. लेकिन सुकांता इन बातों को अनदेखा कर देती है.

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शशिकांत की पसंद अच्छी है, मैं भी मानता हूं. लेकिन उन की और भी कई पसंद हैं, जैसे पत्नी के अलावा उन के और भी कई स्त्रियों से संबंध हैं. यह बात भी तो लोग कहते ही हैं.

लेदे कर सुकांता को बस, यही शिकायत है, ‘‘यह तो बस, घर के काम में जरा भी ध्यान नहीं देते, जब देखो, बैठ जाएंगे पुस्तक ले कर.’’

कई बार मैं ने उसे समझाने की कोशिश की, लेकिन वह समझने को तैयार ही नहीं. मैं मुक्त मन से घर में पसर कर बैठूं तो उसे अच्छा नहीं लगता. दिन भर दफ्तर में कुरसी पर बैठेबैठे अकड़ जाता हूं. अपने घर में आ कर क्या सुस्ता भी नहीं सकता? मेरे द्वारा पुस्तक पढ़ने पर, मेरे द्वारा शास्त्रीय संगीत सुनने पर उसे आपत्ति है. इन्हीं बातों से घर में तनाव रहने लगा है.

ऐसे ही एक दिन शाम को सुकांता किसी सहेली के घर गई थी. मैं दफ्तर से लौट कर अपनी कमीज के बटन टांक रहा था. 10 बार मैं ने उस से कहा था लेकिन उस ने नहीं किया तो बस, नहीं किया. मैं बटन टांक रहा था कि सुकांता की खास सहेली अपने पति के साथ हमारे घर आई.

पर शायद आप पूछें कि यह खास सखी कौन होती है? सच बताऊं, यह बात अभी तक मेरी समझ में भी नहीं आई है. हर स्त्री की खास सखी कैसे हो जाती है? और अगर वह खास सखी होती है तो अपनी सखी की बुराई ढूंढ़ने में, और उस की बुराई करने में ही उसे क्यों आनंद आता है? खैर, जो भी हो, इस खास सखी के पति का नाम भी सुकांता की आदर्श पतियों की सूची में बहुत ऊंचे स्थान पर है. वह पत्नी के हर काम में मदद करते हैं. ऐसा सुकांता कहती है.

मुझे बटन टांकते देख कर खास सखी ऊंची आवाज में बोली, ‘‘हाय राम, आप खुद अपने कपड़ों की मरम्मत करते हैं? हमें तो अपने साहब को रोज पहनने के कपड़े तक हाथ में देने पड़ते हैं. वरना यह तो अलमारी के सभी कपड़े फैला देते हैं कि बस.’’

सराहना मिश्रित स्वर में खास सखी का उलाहना था. मतलब यह कि मेरे काम की सराहना और अपने पति को उलाहना था. और बस, यही वह क्षण था जब मुझे अलीबाबा का गुफा खोलने वाला मंत्र, ‘खुल जा सिमसिम’ मिल गया.

मैं ने बड़े ही चाव और आदर से खास सखी और उस के पति को बैठाया. और फिर जैसे हमेशा ही मैं वस्त्र में बटन टांकने का काम करता आया हूं, इस अंदाज से हाथ का काम पूरा किया. कमीज को बाकायदा तह कर रखा और झट से चाय बना लाया.

सच तो यह है कि चाय मैं ने नौकर से बनवाई थी और उसे पिछले दरवाजे से बाहर भेज दिया था. खास सखी और उस के पति ‘अरे, अरे, आप क्यों तकलीफ करते हैं?’ आदि कहते ही रह गए.

चाय बहुत बढि़या बनी थी, केतली पर टिकोजी विराजमान थी. प्लेट में मीठे बिस्कुट और नमकीन थी. इस सारे तामझाम का नतीजा भी तुरंत सामने आया. खास सखी के चेहरे पर मेरे लिए अदा से श्रद्धा के भाव उमड़ते साफ देखे जा सकते थे. खास सखी के पति का चेहरा बुझ गया.

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मैं मन ही मन खुश था. इन्हीं साहब की तारीफ सुकांता ने कई बार मेरे सामने की थी. तब मैं जलभुन गया था, आज मुझे बदला लेने का पूरापूरा सुख मिला.

कुछ दिन बाद ही सुकांता महिलाओं की किसी पार्टी से लौटी तो बेहद गुस्से में थी. आते ही बिफर कर बोली, ‘‘क्यों जी? उस दिन मेरी सहेली के सामने तुम्हें अपने कपड़ों की मरम्मत करने की क्या जरूरत थी? मैं करती नहीं हूं तुम्हारे काम?’’

‘‘कौन कहता है, प्रिये? तुम ही तो मेरे सारे काम करती हो. उस दिन तो मैं यों ही जरा बटन टांक रहा था कि तुम्हारी खास सहेली आ धमकी मेरे सामने. मैं ने थोड़े ही उस के सामने…’’

‘‘बस, बस. मुझे कुछ नहीं सुनना…’’

गुस्से में पैर पटकती हुई वह अपने कमरे में चली गई. बाद में पता चला कि भरी पार्टी में खास सखी ने सुकांता से कहा था कि उसे कितना अच्छा पति मिला है. ढेर सारे कपड़ों की मरम्मत करता है. बढि़या चाय बनाता है. बातचीत में भी कितना शालीन और शिष्ट है. कहां तो सात जनम तक व्रत रख कर भी ऐसे पति नहीं मिलते, और एक सुकांता है कि पूरे समय पति को कोसती रहती है.

अब देखिए, मैं ने तो सिर्फ एक ही कमीज में 2 बटन टांके थे, लेकिन खास सखी ने ढे…र सारे कपड़े कर दिए तो मैं क्या कर सकता हूं? समझाने गया तो सुकांता और भी भड़क गई. चुप रहा तो और बिफर गई. समझ नहीं पाया कि क्या करूं.

सुकांता का गुस्सा सातवें आसमान पर था. वह बच्चों को ले कर सीधी मायके चली गई. मैं ने सोचा कि 15 दिन में तो आ ही जाएगी. चलो, उस का गुस्सा भी ठंडा हो जाएगा. घर में जो तनाव बढ़ रहा था वह भी खत्म हो जाएगा. लेकिन 1 महीना पूरा हो गया. 10 दिन और बीत गए, तब पत्नी की और बच्चों की बहुत याद आने लगी.

सच कहता हूं, मेरी पत्नी बहुत अच्छी है. इतने दिनों तक हमारी गृहस्थी की गाड़ी कितने सुचारु रूप से चल रही थी, लेकिन न जाने यह नया भूत कैसे सुकांता पर सवार हुआ कि बस, एक ही रट लगाए बैठी है कि यह घर में बिलकुल काम नहीं करते. बैठ जाते हैं पुस्तक ले कर, बैठ जाते हैं रेडियो खोल कर.

अब आप ही बताइए, हफ्ते में एक बार सब्जी लाना क्या काफी नहीं है? काफी सब्जी तो बगीचे से ही मिल जाती है. जो घर पर नहीं है वह बाजार से आ जाती है. और रोजरोज अगर सब्जी मंडी में धक्के खाने हों तो घर में फ्रिज किसलिए रखा है?

लेकिन नहीं, वरुणजी झोला ले कर मंडी जाते हैं, तो मैं भी जाऊं. अब वरुणजी का घर 2 कमरों का है. आसपास एक गमला तक रखने की जगह नहीं है. घर में फ्रिज नहीं है, इसलिए मजबूरी में जाते हैं. लेकिन मेरी तुलना वरुणजी से करने की क्या तुक है?

बच्चे हमारे समझदार हैं. पढ़ने में भी अच्छे हैं, लेकिन सुकांता को शिकायत है कि मैं बच्चों को पढ़ाता ही नहीं. सुकांता की जिद पर बच्चों को हम ने कानवेंट स्कूल में डाला. सुकांता खुद अंगरेजी के 4 वाक्य भी नहीं बोल पाती. बच्चों की अंगरेजी तोप के आगे उस की बोलती बंद हो जाती है.

यदाकदा कोई कठिनाई हो तो बच्चे मुझ से पूछ भी लेते हैं. फिर बच्चों को पढ़ाना आसान काम नहीं है. नहीं तो मैं अफसर बनने के बजाय अध्यापक ही बन जाता. अपना अज्ञान बच्चों पर प्रकट न हो इसीलिए मैं उन की पढ़ाई से दूर ही रहता हूं. शायद इसीलिए उन के मन में मेरे लिए आदर भी है. लेकिन शकीलजी अपने बच्चों को पढ़ाते हैं. रोज पढ़ाते हैं तो बस, सुकांता का कहना है मैं भी बच्चों को पढ़ाऊं.

पूरे डेढ़ महीने बाद सुकांता का पत्र आया. फलां दिन, फलां गाड़ी से आ रही हूं. साथ में छोटी बहन और उस के पति भी 7-8 दिन के लिए आ रहे हैं.

मैं तो जैसे मौका ही देख रहा था. फटाफट मैं ने घर का सारा सामान देखा. किराने की सूची बनाई. सामान लाया. महरी से रसोईघर की सफाई करवाई. डब्बे धुलवाए. सामान बिनवा कर, चुनवा कर डब्बों में भर दिया.

2 दिन का अवकाश ले कर माली और महरी की मदद से घर और बगीचे की, कोनेकोने तक की सफाई करवाई. दीवान की चादरें बदलीं. परदे धुलवा दिए. पलंग पर बिछाने वाली चादरें और तकिए के गिलाफ धुलवा लिए. हाथ पोंछने के छोटे तौलिए तक साफ धुले लगे थे. फ्रिज में इतनी सब्जियां ला कर रख दीं जो 10 दिन तक चलतीं. 2-3 तरह का नाश्ता बाजार से मंगवा कर रखा, दूध जालीदार अलमारी में गरम किया हुआ रखा था. फूलों के गुलदस्ते बैठक में और खाने की मेज पर महक रहे थे.

इतनी तैयारी के बाद मैं समय से स्टेशन पहुंचा. गाड़ी भी समय पर आई. बच्चों का, पत्नी का, साली का, उस के पति का बड़ी गर्मजोशी से स्वागत किया. रास्ते में सुकांता ने पूछा, (स्वर में अभी भी कोई परिवर्तन नहीं था) ‘‘क्यों जी, महरी तो आ रही थी न, काम करने?’’

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मैं ने संक्षिप्त में सिर्फ ‘हां’ कहा.

बहन की तरफ देख कर (उसी रूखे स्वर में) वह फिर बोली, ‘‘डेढ़ महीने से मैं घर पर नहीं थी. पता नहीं इतने दिनों में क्या हालत हुई होगी घर की? ठीकठाक करने में ही पूरे 3-4 दिन लग जाएंगे.’’

मैं बिलकुल चुप रहा. रास्ते भर सुकांता वही पुराना राग अलापती रही, ‘‘इन को तो काम आता ही नहीं. फलाने को देखो, ढिकाने को देखो’’ आदि.

लेकिन घर की व्यवस्था देख कर सुकांता की बोलती ही बंद हो गई. आगे के 7-8 दिन मैं अभ्यस्त मुद्रा में काम करता रहा जैसे सुकांता कभी इस घर में रहती ही नहीं थी. छोटी साली और उस के पति इस कदर प्रभावित थे कि जातेजाते सालीजी ने दीदी से कह दिया, ‘‘दीदी, तुम तो बिना वजह जीजाजी को कोसती रहती हो. कितना तो बेचारे काम करते हैं.’’

सालीजी की विदाई के बाद सुकांता चुप तो हो गई थी. लेकिन फिर भी भुनभुनाने के लहजे में उस के कुछ वाक्यांश कानों में आ ही जाते. इसी समय मेरी बूआजी का पत्र आया. वह तीर्थयात्रा पर निकली हैं और रास्ते में मेरे पास 4 दिन रुकेंगी.

मेरी बूआजी देखने और सुनने लायक चीज हैं. उम्र 75 वर्ष. कदकाठी अभी भी मजबूत. मुंह के सारे के सारे दांत अभी भी हैं. आंखों पर ऐनक नहीं लगातीं और कान भी बहुत तीखे हैं. पुराने आचारव्यवहार और विचारों से बेहद प्रेम रखने वाली महिला हैं. मन की तो ममतामयी, लेकिन जबान की बड़ी तेज. क्या छोटा, क्या बड़ा, किसी का मुलाहिजा तो उन्होंने कभी रखा ही नहीं. मेरे पिताजी आज तक उन से डरते हैं.

मेरी शादी इन्हीं बूआजी ने तय की थी. गोरीचिट्टी सुकांता उन्हें बहुत अच्छी लगी थी. इतने बरसों से उन्हें मेरी गृहस्थी देखने का मौका नहीं मिला. आज वह आ रही थीं. सुकांता उन की आवभगत की तैयारी में जुट गई थी.

बूआजी को मैं घर लिवा लाया. बच्चों ने और सुकांता ने उन के पैर छुए. मैं ने अपने उसी मंत्र को दोहराना शुरू किया. यों तो घर में बिस्तर बिछाने का, समेटने का, झाड़ ू  लगाने का काम महरी ही करती है, लेकिन मैं जल्दी उठ कर बूआजी की चाकरी में भिड़ जाता. उन का कमरा और पूजा का सामान साफ कर देता, बगीचे से फूल, दूब, तुलसी ला कर रख देता. चंदन को घिस देता. अपने हाथ से चाय बना कर बूआजी को देता.

और तो और, रोज दफ्तर जातेजाते सुकांता से पूछता, ‘‘बाजार से कुछ मंगाना तो नहीं है?’’ आते समय फल और मिठाई ले आता. दफ्तर जाने से पहले सुकांता को सब्जी आदि साफ करने या काटने में मदद करता. बूआजी को घर के कामों में मर्दों की यह दखल देने की आदत बिलकुल पसंद नहीं थी.

सुकांता बेचारी संकोच से सिमट जाती. बारबार मुझे काम करने को रोकती. बूआजी आसपास नहीं हैं, यह देख कर दबी आवाज में मुझे झिड़की भी देती. और मैं उस के गुस्से को नजरअंदाज करते हुए, बूआजी आसपास हैं, यह देख कर उस से कहता, ‘‘तुम इतना काम मत करो, सुकांता, थक जाओगी, बीमार हो जाओगी…’’

बूआजी खूब नाराज होतीं. अपनी बुलंद आवाज में बहू को खूब फटकारतीं, ताने देतीं, ‘‘आजकल की लड़कियों को कामकाज की आदत ही नहीं है. एक हम थे. चूल्हा जलाने से ले कर घर लीपने तक के काम अकेले करते थे. यहां गैस जलाओ तो थकान होती है और यह छोकरा तो देखो, क्या आगेपीछे मंडराता है बीवी के? उस के इशारे पर नाचता रहता है. बहू, यह सब मुझे पसंद नहीं है, कहे देती हूं…’’

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सुकांता गुस्से से जल कर राख हो जाती, लेकिन कुछ कह नहीं सकती थी.

ऐसे ही एक दिन जब महरी नहीं आई तो मैं ने कपड़ों के साथ सुकांता की साड़ी भी निचोड़ डाली. बूआजी देख रही हैं, इस का फायदा उठाते हुए ऊंची आवाज में कहा, ‘‘कपड़े मैं ने धो डाले हैं. तुम फैला देना, सुकांता…मुझे दफ्तर को देर हो रही है.’’

‘‘जोरू का गुलाम, मर्द है या हिजड़ा?’’ बूआजी की गाली दनदनाते हुए सीधे सुकांता के कानों में…

मैं अपना बैग उठा कर सीधे दफ्तर को चला.

बूआजी अपनी काशी यात्रा पूरी कर के वापस अपने घर पहुंच गई हैं. मैं शाम को दफ्तर से घर लौटा हूं. मजे से कुरसी पर पसर कर पुस्तक पढ़ रहा हूं. सुकांता बाजार गई है. बच्चे खेलने गए हैं. चाय का खाली कप लुढ़का पड़ा है. पास में रखे ट्रांजिस्टर से शास्त्रीय संगीत की स्वरलहरी फैल रही है.

अब चिंता की कोई बात नहीं है. सुख जिसे कहते हैं, वह इस के अलावा और क्या होता है? और जिसे सुखी इनसान कहते हैं, वह मुझ से बढ़ कर और दूसरा कौन होगा?      द्य

 

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