चिंता की कोई बात नहीं

लेखक-प्रतिमा डिके

औसत से कुछ अधिक ही रूप, औसत से कुछ अधिक ही गुण, शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य, अच्छी शिक्षा, अच्छी नौकरी, अच्छा पैसा, मनपसंद पत्नी, समझदार, स्वस्थ और प्यारे बच्चे, शहर में अपना मकान.अब बताइए, जिसे सुख कहते हैं वह इस से अधिक या इस से अच्छा क्याक्या हो सकता है? यानी मेरी सुख की या सुखी जीवन की अपेक्षाएं इस से अधिक कभी थीं ही नहीं. लेकिन 6 माह पूर्व मेरे घर का सुखचैन मानो छिन गया.

सुकांता यानी मेरी पत्नी, अपने मायके में क्या पत्र लिखती, मुझे नहीं पता. लेकिन उस के मायके से जो पत्र आने लगे थे उन में उस की बेचारगी पर बारबार चिंता व्यक्त की जाने लगी थी. जैसे :

‘‘घर का काम बेचारी अकेली औरत  करे तो कैसे और कहां तक?’’

‘‘बेचारी सुकांता को इतना तक लिखने की फुरसत नहीं मिल रही है कि राजीखुशी हूं.’’

‘‘इन दिनों क्या तबीयत ठीक नहीं है? चेहरे पर रौनक ही नहीं रही…’’ आदि.

शुरूशुरू में मैं ने उस ओर कोई खास ध्यान नहीं दिया. मायके वाले अपनी बेटी की चिंता करते हैं, एक स्वाभाविक बात है. यह मान कर मैं चुप रहा. लेकिन जब देखो तब सुकांता भी ताने देने लगी, ‘‘प्रवीणजी को देखो, घर की सारी खरीदफरोख्त अकेले ही कर लेते हैं. उन की पत्नी को तो कुछ भी नहीं देखना पड़ता…शशिकांतजी की पसंद कितनी अच्छी है. क्या गजब की चीजें लाते हैं. माल सस्ता भी होता है और अच्छा भी.’’

कई बार तो वह वाक्य पूरा भी नहीं करती. बस, उस के गरदन झटकने के अंदाज से ही सारी बातें स्पष्ट हो जातीं.

सच तो यह है कि उस की इसी अदा पर मैं शुरू में मरता था. नईनई शादी  हुई थी. तब वह कभी पड़ोसिन से कहती, ‘‘क्या बताऊं, बहन, इन्हें तो घर के काम में जरा भी रुचि नहीं है. एक तिनका तक उठा कर नहीं रखते इधर से उधर.’’ तो मैं खुश हो जाता. यह मान कर कि वह मेरी प्रशंसा कर रही है.

लेकिन जब धीरेधीरे यह चित्र बदलता गया. बातबात पर घर में चखचख होने लगी. सुकांता मुझे समझने और मेरी बात मानने को तैयार ही नहीं थी. फिर तो नौबत यहां तक आ गई कि मेरा मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य भी गड़बड़ाने लगा.

अब आप ही बताइए, जो काम मेरे बस का ही नहीं है उसे मैं क्यों और कैसे करूं? हमारे घर के आसपास खुली जगह है. वहां बगीचा बना है. बगीचे की देखभाल के लिए बाकायदा माली रखा हुआ है. वह उस की देखभाल अच्छी तरह से करता है. मौसम में उगने वाली सागभाजी और फूल जबतब बगीचे से आते रहते हैं.

लेकिन मैं बालटी में पानी भर कर पौधे नहीं सींचता, यही सुकांता की शिकायत है, वह चाहे बगीचे में काम न करे. लेकिन हमारे पड़ोसी सुधाकरजी बगीचे में पूरे समय खुरपी ले कर काम करते हैं. इसलिए सुकांता चाहती है कि मैं भी बगीचे में काम करूं.

मुझे तो शक है कि सुधाकरजी के दादा और परदादा तक खेतिहर मजदूर रहे होंगे. एक बात और है, सुधाकरजी लगातार कई सिगरेट पीने के आदी हैं. खुरपी के साथसाथ उन के हाथ में सिगरेट भी होती है. मैं तंबाकू तो क्या सुपारी तक नहीं खाता. लेकिन सुकांता इन बातों को अनदेखा कर देती है.

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शशिकांत की पसंद अच्छी है, मैं भी मानता हूं. लेकिन उन की और भी कई पसंद हैं, जैसे पत्नी के अलावा उन के और भी कई स्त्रियों से संबंध हैं. यह बात भी तो लोग कहते ही हैं.

लेदे कर सुकांता को बस, यही शिकायत है, ‘‘यह तो बस, घर के काम में जरा भी ध्यान नहीं देते, जब देखो, बैठ जाएंगे पुस्तक ले कर.’’

कई बार मैं ने उसे समझाने की कोशिश की, लेकिन वह समझने को तैयार ही नहीं. मैं मुक्त मन से घर में पसर कर बैठूं तो उसे अच्छा नहीं लगता. दिन भर दफ्तर में कुरसी पर बैठेबैठे अकड़ जाता हूं. अपने घर में आ कर क्या सुस्ता भी नहीं सकता? मेरे द्वारा पुस्तक पढ़ने पर, मेरे द्वारा शास्त्रीय संगीत सुनने पर उसे आपत्ति है. इन्हीं बातों से घर में तनाव रहने लगा है.

ऐसे ही एक दिन शाम को सुकांता किसी सहेली के घर गई थी. मैं दफ्तर से लौट कर अपनी कमीज के बटन टांक रहा था. 10 बार मैं ने उस से कहा था लेकिन उस ने नहीं किया तो बस, नहीं किया. मैं बटन टांक रहा था कि सुकांता की खास सहेली अपने पति के साथ हमारे घर आई.

पर शायद आप पूछें कि यह खास सखी कौन होती है? सच बताऊं, यह बात अभी तक मेरी समझ में भी नहीं आई है. हर स्त्री की खास सखी कैसे हो जाती है? और अगर वह खास सखी होती है तो अपनी सखी की बुराई ढूंढ़ने में, और उस की बुराई करने में ही उसे क्यों आनंद आता है? खैर, जो भी हो, इस खास सखी के पति का नाम भी सुकांता की आदर्श पतियों की सूची में बहुत ऊंचे स्थान पर है. वह पत्नी के हर काम में मदद करते हैं. ऐसा सुकांता कहती है.

मुझे बटन टांकते देख कर खास सखी ऊंची आवाज में बोली, ‘‘हाय राम, आप खुद अपने कपड़ों की मरम्मत करते हैं? हमें तो अपने साहब को रोज पहनने के कपड़े तक हाथ में देने पड़ते हैं. वरना यह तो अलमारी के सभी कपड़े फैला देते हैं कि बस.’’

सराहना मिश्रित स्वर में खास सखी का उलाहना था. मतलब यह कि मेरे काम की सराहना और अपने पति को उलाहना था. और बस, यही वह क्षण था जब मुझे अलीबाबा का गुफा खोलने वाला मंत्र, ‘खुल जा सिमसिम’ मिल गया.

मैं ने बड़े ही चाव और आदर से खास सखी और उस के पति को बैठाया. और फिर जैसे हमेशा ही मैं वस्त्र में बटन टांकने का काम करता आया हूं, इस अंदाज से हाथ का काम पूरा किया. कमीज को बाकायदा तह कर रखा और झट से चाय बना लाया.

सच तो यह है कि चाय मैं ने नौकर से बनवाई थी और उसे पिछले दरवाजे से बाहर भेज दिया था. खास सखी और उस के पति ‘अरे, अरे, आप क्यों तकलीफ करते हैं?’ आदि कहते ही रह गए.

चाय बहुत बढि़या बनी थी, केतली पर टिकोजी विराजमान थी. प्लेट में मीठे बिस्कुट और नमकीन थी. इस सारे तामझाम का नतीजा भी तुरंत सामने आया. खास सखी के चेहरे पर मेरे लिए अदा से श्रद्धा के भाव उमड़ते साफ देखे जा सकते थे. खास सखी के पति का चेहरा बुझ गया.

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मैं मन ही मन खुश था. इन्हीं साहब की तारीफ सुकांता ने कई बार मेरे सामने की थी. तब मैं जलभुन गया था, आज मुझे बदला लेने का पूरापूरा सुख मिला.

कुछ दिन बाद ही सुकांता महिलाओं की किसी पार्टी से लौटी तो बेहद गुस्से में थी. आते ही बिफर कर बोली, ‘‘क्यों जी? उस दिन मेरी सहेली के सामने तुम्हें अपने कपड़ों की मरम्मत करने की क्या जरूरत थी? मैं करती नहीं हूं तुम्हारे काम?’’

‘‘कौन कहता है, प्रिये? तुम ही तो मेरे सारे काम करती हो. उस दिन तो मैं यों ही जरा बटन टांक रहा था कि तुम्हारी खास सहेली आ धमकी मेरे सामने. मैं ने थोड़े ही उस के सामने…’’

‘‘बस, बस. मुझे कुछ नहीं सुनना…’’

गुस्से में पैर पटकती हुई वह अपने कमरे में चली गई. बाद में पता चला कि भरी पार्टी में खास सखी ने सुकांता से कहा था कि उसे कितना अच्छा पति मिला है. ढेर सारे कपड़ों की मरम्मत करता है. बढि़या चाय बनाता है. बातचीत में भी कितना शालीन और शिष्ट है. कहां तो सात जनम तक व्रत रख कर भी ऐसे पति नहीं मिलते, और एक सुकांता है कि पूरे समय पति को कोसती रहती है.

अब देखिए, मैं ने तो सिर्फ एक ही कमीज में 2 बटन टांके थे, लेकिन खास सखी ने ढे…र सारे कपड़े कर दिए तो मैं क्या कर सकता हूं? समझाने गया तो सुकांता और भी भड़क गई. चुप रहा तो और बिफर गई. समझ नहीं पाया कि क्या करूं.

सुकांता का गुस्सा सातवें आसमान पर था. वह बच्चों को ले कर सीधी मायके चली गई. मैं ने सोचा कि 15 दिन में तो आ ही जाएगी. चलो, उस का गुस्सा भी ठंडा हो जाएगा. घर में जो तनाव बढ़ रहा था वह भी खत्म हो जाएगा. लेकिन 1 महीना पूरा हो गया. 10 दिन और बीत गए, तब पत्नी की और बच्चों की बहुत याद आने लगी.

सच कहता हूं, मेरी पत्नी बहुत अच्छी है. इतने दिनों तक हमारी गृहस्थी की गाड़ी कितने सुचारु रूप से चल रही थी, लेकिन न जाने यह नया भूत कैसे सुकांता पर सवार हुआ कि बस, एक ही रट लगाए बैठी है कि यह घर में बिलकुल काम नहीं करते. बैठ जाते हैं पुस्तक ले कर, बैठ जाते हैं रेडियो खोल कर.

अब आप ही बताइए, हफ्ते में एक बार सब्जी लाना क्या काफी नहीं है? काफी सब्जी तो बगीचे से ही मिल जाती है. जो घर पर नहीं है वह बाजार से आ जाती है. और रोजरोज अगर सब्जी मंडी में धक्के खाने हों तो घर में फ्रिज किसलिए रखा है?

लेकिन नहीं, वरुणजी झोला ले कर मंडी जाते हैं, तो मैं भी जाऊं. अब वरुणजी का घर 2 कमरों का है. आसपास एक गमला तक रखने की जगह नहीं है. घर में फ्रिज नहीं है, इसलिए मजबूरी में जाते हैं. लेकिन मेरी तुलना वरुणजी से करने की क्या तुक है?

बच्चे हमारे समझदार हैं. पढ़ने में भी अच्छे हैं, लेकिन सुकांता को शिकायत है कि मैं बच्चों को पढ़ाता ही नहीं. सुकांता की जिद पर बच्चों को हम ने कानवेंट स्कूल में डाला. सुकांता खुद अंगरेजी के 4 वाक्य भी नहीं बोल पाती. बच्चों की अंगरेजी तोप के आगे उस की बोलती बंद हो जाती है.

यदाकदा कोई कठिनाई हो तो बच्चे मुझ से पूछ भी लेते हैं. फिर बच्चों को पढ़ाना आसान काम नहीं है. नहीं तो मैं अफसर बनने के बजाय अध्यापक ही बन जाता. अपना अज्ञान बच्चों पर प्रकट न हो इसीलिए मैं उन की पढ़ाई से दूर ही रहता हूं. शायद इसीलिए उन के मन में मेरे लिए आदर भी है. लेकिन शकीलजी अपने बच्चों को पढ़ाते हैं. रोज पढ़ाते हैं तो बस, सुकांता का कहना है मैं भी बच्चों को पढ़ाऊं.

पूरे डेढ़ महीने बाद सुकांता का पत्र आया. फलां दिन, फलां गाड़ी से आ रही हूं. साथ में छोटी बहन और उस के पति भी 7-8 दिन के लिए आ रहे हैं.

मैं तो जैसे मौका ही देख रहा था. फटाफट मैं ने घर का सारा सामान देखा. किराने की सूची बनाई. सामान लाया. महरी से रसोईघर की सफाई करवाई. डब्बे धुलवाए. सामान बिनवा कर, चुनवा कर डब्बों में भर दिया.

2 दिन का अवकाश ले कर माली और महरी की मदद से घर और बगीचे की, कोनेकोने तक की सफाई करवाई. दीवान की चादरें बदलीं. परदे धुलवा दिए. पलंग पर बिछाने वाली चादरें और तकिए के गिलाफ धुलवा लिए. हाथ पोंछने के छोटे तौलिए तक साफ धुले लगे थे. फ्रिज में इतनी सब्जियां ला कर रख दीं जो 10 दिन तक चलतीं. 2-3 तरह का नाश्ता बाजार से मंगवा कर रखा, दूध जालीदार अलमारी में गरम किया हुआ रखा था. फूलों के गुलदस्ते बैठक में और खाने की मेज पर महक रहे थे.

इतनी तैयारी के बाद मैं समय से स्टेशन पहुंचा. गाड़ी भी समय पर आई. बच्चों का, पत्नी का, साली का, उस के पति का बड़ी गर्मजोशी से स्वागत किया. रास्ते में सुकांता ने पूछा, (स्वर में अभी भी कोई परिवर्तन नहीं था) ‘‘क्यों जी, महरी तो आ रही थी न, काम करने?’’

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मैं ने संक्षिप्त में सिर्फ ‘हां’ कहा.

बहन की तरफ देख कर (उसी रूखे स्वर में) वह फिर बोली, ‘‘डेढ़ महीने से मैं घर पर नहीं थी. पता नहीं इतने दिनों में क्या हालत हुई होगी घर की? ठीकठाक करने में ही पूरे 3-4 दिन लग जाएंगे.’’

मैं बिलकुल चुप रहा. रास्ते भर सुकांता वही पुराना राग अलापती रही, ‘‘इन को तो काम आता ही नहीं. फलाने को देखो, ढिकाने को देखो’’ आदि.

लेकिन घर की व्यवस्था देख कर सुकांता की बोलती ही बंद हो गई. आगे के 7-8 दिन मैं अभ्यस्त मुद्रा में काम करता रहा जैसे सुकांता कभी इस घर में रहती ही नहीं थी. छोटी साली और उस के पति इस कदर प्रभावित थे कि जातेजाते सालीजी ने दीदी से कह दिया, ‘‘दीदी, तुम तो बिना वजह जीजाजी को कोसती रहती हो. कितना तो बेचारे काम करते हैं.’’

सालीजी की विदाई के बाद सुकांता चुप तो हो गई थी. लेकिन फिर भी भुनभुनाने के लहजे में उस के कुछ वाक्यांश कानों में आ ही जाते. इसी समय मेरी बूआजी का पत्र आया. वह तीर्थयात्रा पर निकली हैं और रास्ते में मेरे पास 4 दिन रुकेंगी.

मेरी बूआजी देखने और सुनने लायक चीज हैं. उम्र 75 वर्ष. कदकाठी अभी भी मजबूत. मुंह के सारे के सारे दांत अभी भी हैं. आंखों पर ऐनक नहीं लगातीं और कान भी बहुत तीखे हैं. पुराने आचारव्यवहार और विचारों से बेहद प्रेम रखने वाली महिला हैं. मन की तो ममतामयी, लेकिन जबान की बड़ी तेज. क्या छोटा, क्या बड़ा, किसी का मुलाहिजा तो उन्होंने कभी रखा ही नहीं. मेरे पिताजी आज तक उन से डरते हैं.

मेरी शादी इन्हीं बूआजी ने तय की थी. गोरीचिट्टी सुकांता उन्हें बहुत अच्छी लगी थी. इतने बरसों से उन्हें मेरी गृहस्थी देखने का मौका नहीं मिला. आज वह आ रही थीं. सुकांता उन की आवभगत की तैयारी में जुट गई थी.

बूआजी को मैं घर लिवा लाया. बच्चों ने और सुकांता ने उन के पैर छुए. मैं ने अपने उसी मंत्र को दोहराना शुरू किया. यों तो घर में बिस्तर बिछाने का, समेटने का, झाड़ ू  लगाने का काम महरी ही करती है, लेकिन मैं जल्दी उठ कर बूआजी की चाकरी में भिड़ जाता. उन का कमरा और पूजा का सामान साफ कर देता, बगीचे से फूल, दूब, तुलसी ला कर रख देता. चंदन को घिस देता. अपने हाथ से चाय बना कर बूआजी को देता.

और तो और, रोज दफ्तर जातेजाते सुकांता से पूछता, ‘‘बाजार से कुछ मंगाना तो नहीं है?’’ आते समय फल और मिठाई ले आता. दफ्तर जाने से पहले सुकांता को सब्जी आदि साफ करने या काटने में मदद करता. बूआजी को घर के कामों में मर्दों की यह दखल देने की आदत बिलकुल पसंद नहीं थी.

सुकांता बेचारी संकोच से सिमट जाती. बारबार मुझे काम करने को रोकती. बूआजी आसपास नहीं हैं, यह देख कर दबी आवाज में मुझे झिड़की भी देती. और मैं उस के गुस्से को नजरअंदाज करते हुए, बूआजी आसपास हैं, यह देख कर उस से कहता, ‘‘तुम इतना काम मत करो, सुकांता, थक जाओगी, बीमार हो जाओगी…’’

बूआजी खूब नाराज होतीं. अपनी बुलंद आवाज में बहू को खूब फटकारतीं, ताने देतीं, ‘‘आजकल की लड़कियों को कामकाज की आदत ही नहीं है. एक हम थे. चूल्हा जलाने से ले कर घर लीपने तक के काम अकेले करते थे. यहां गैस जलाओ तो थकान होती है और यह छोकरा तो देखो, क्या आगेपीछे मंडराता है बीवी के? उस के इशारे पर नाचता रहता है. बहू, यह सब मुझे पसंद नहीं है, कहे देती हूं…’’

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सुकांता गुस्से से जल कर राख हो जाती, लेकिन कुछ कह नहीं सकती थी.

ऐसे ही एक दिन जब महरी नहीं आई तो मैं ने कपड़ों के साथ सुकांता की साड़ी भी निचोड़ डाली. बूआजी देख रही हैं, इस का फायदा उठाते हुए ऊंची आवाज में कहा, ‘‘कपड़े मैं ने धो डाले हैं. तुम फैला देना, सुकांता…मुझे दफ्तर को देर हो रही है.’’

‘‘जोरू का गुलाम, मर्द है या हिजड़ा?’’ बूआजी की गाली दनदनाते हुए सीधे सुकांता के कानों में…

मैं अपना बैग उठा कर सीधे दफ्तर को चला.

बूआजी अपनी काशी यात्रा पूरी कर के वापस अपने घर पहुंच गई हैं. मैं शाम को दफ्तर से घर लौटा हूं. मजे से कुरसी पर पसर कर पुस्तक पढ़ रहा हूं. सुकांता बाजार गई है. बच्चे खेलने गए हैं. चाय का खाली कप लुढ़का पड़ा है. पास में रखे ट्रांजिस्टर से शास्त्रीय संगीत की स्वरलहरी फैल रही है.

अब चिंता की कोई बात नहीं है. सुख जिसे कहते हैं, वह इस के अलावा और क्या होता है? और जिसे सुखी इनसान कहते हैं, वह मुझ से बढ़ कर और दूसरा कौन होगा?      द्य

 

मंजिल

लेखिका- माया प्रधान

पूर्व कथा

पुरवा का पर्स चोर से वापस लाने में सुहास मदद करता है. इस तरह दोनों की जानपहचान होती है और मुलाकातें बढ़ कर प्यार में बदल जाती हैं. सुहास पुरवा को अपने घर ले जाता है. वह अपनी मां रजनीबाला और बहन श्वेता से उसे मिलवाता है. रजनीबाला को पुरवा अच्छी लगती है. उधर पुरवा सुहास को अपने पिता से मिलवाने अपने घर ले आती है तो उस के पिता सहाय साहब सुहास की काम के प्रति लगन देख कर खुश होते हैं.

सुहास की बहन श्वेता को देखने लड़के वाले आते हैं. इंजीनियर लड़के गौरव से श्वेता का विवाह तय हो जाता है. मिठाई  के डब्बे के साथ बहन की सगाई का निमंत्रण ले कर सुहास सहाय साहब के घर जाता है. घर पर बीमार सहाय साहब का हालचाल पूछने उन के मित्र आए होते हैं. सहाय साहब सुहास की तारीफ करते हुए सब को बताते हैं कि वह उस के लिए मोटरपार्ट्स की दुकान खुलवा रहे हैं. सुहास अपनी तारीफ सुन कर खुश होता है.

श्वेता की सगाई पर आए सहाय साहब के परिवार से मकरंद वर्मा परिवार के सभी सदस्य उत्साहपूर्वक मिलते हैं. दोनों परिवारवाले सुहास और पुरवा के रिश्ते से खुश थे.

समय तेजी से गुजरता रहा. सुहास व्यापार शुरू कर देता है, लेकिन कई बार काम के लिए बंध कर बैठना उस के लिए मुश्किल हो जाता क्योंकि किसी भी जगह जम कर रह पाना उस के स्वभाव में नहीं था.

अंतत: श्वेता के विवाह का दिन आ जाता है. उस दिन पुरवा का सजाधजा रूप देख कर सुहास दीवाना हो जाता है. पुरवा से शीघ्र विवाह करने के लिए सुहास दुकान पर मन लगा कर काम करने लगता है. यह सब देख सहाय साहब खुश थे. आखिरकार वह एक दिन वर्मा साहब के घर पुरवा का रिश्ता ले कर पहुंच जाते हैं. सभी की मौजूदगी और खुशी से पुरवासुहास का रिश्ता पक्का हो जाता है और शीघ्र ही धूमधाम से विवाह हो जाता है.

सुहागसेज पर दोनों हजारों सपने संजोते हैं और हनीमून पर ऊटी जाते हैं. वापस आने पर घर में सब उन का स्वागत करते हैं. इधर श्वेता से बात करने पर पुरवा को पता चलता है कि बड़े परिवार के कारण वह ससुराल में नाखुश है. उधर अपनी व्यवहारकुशलता से पुरवा ससुराल में जल्द ही सब से घुलमिल जाती है. अब आगे…

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गतांक से आगे…

पुरवा टोकती, ‘‘तुम दुकान पर क्यों नहीं जाते हो, मुझे भी अंधमहाविद्यालय जाना है.’’

‘‘पुरवा, दुकान और विद्यालय तो अपनी जगह पर स्थिर हैं, कहीं भाग नहीं जाएंगे पर यह सुनहरे दिन फिर कभी लौट कर नहीं आएंगे,’’ सुहास उसे बांहों में भर कर उत्तर देता.

पुरवा को लगता कि सुहास ठीक ही कह रहा है, यह नयानया उत्साह फीका पड़ने से पहले ही इन पलों को जी भर कर जी लेना चाहिए. उसे सुहास के प्यार पर गर्व होने लगता.

एक शाम सागर और बेला आ धमके और आते ही बेला सुहास के कमरे में पहुंच गई. सुहास उस समय शीशे के सामने संवरती हुई पुरवा के बालों में बड़े प्यार से ब्रश फेर रहा था.

‘‘वाह देवरजी वाह, यहां अचानक न आती तो आप का यह अनोखा प्यार कैसे देख पाती,’’ बेला ने अंदर आते हुए कहा.

सुहास लजा कर हंस दिया और बोला, ‘‘आइए भाभी, आज हम आप के घर ही आने वाले थे.’’

‘‘आप ने याद किया और हम हाजिर हो गए,’’ बेला ने मुसकरा कर कहा. पुरवा ने भी हंसने का प्रयास किया पर उस के चेहरे पर हल्का सा तनाव साफ दिखाई दे रहा था. बेला का यों निसंकोच उस के निजी कमरे में घुस आना उसे अच्छा नहीं लगा था. बेला ने इस तरफ ध्यान नहीं दिया और दोनों से ही हनीमून को ले कर चुहल करती रही.

सागर ड्राइंगरूम में ही बैठे थे अत: सब को वहीं जाना पड़ा. चाय के बीच अचानक सागर ने कहा, ‘‘सुहास, थोड़ा समय निकाल पाओगे क्या?’’

‘‘क्यों भाई साहब, कोई खास बात?’’ सुहास ने पूछा.

‘‘वह मेरे ताऊजी का छोटा बेटा है न तरुण, उसे कैंसर अस्पताल ले जाना है,’’ सागर ने उदासी से कहा.

‘‘अरे, उसे कैंसर है?’’ सुहास आश्चर्य से बोला.

‘‘है या नहीं, यही तो सही से मालूम नहीं पड़ रहा है. डाक्टर कहते हैं कि ठीक से पता चल जाए तो अभी इलाज संभव है. अभी तो उस की दशा देख कर डाक्टरों को कैंसर का शक है,’’ बेला ने भी बुझे स्वर में कहा.

‘‘मैं जरूर चलूंगा भाई साहब. आप जितना जल्दी हो सके उन्हें ले चलिए,’’ सुहास ने बहुत आतुरता से कहा.

पुरवा ने देखा कि सुहास कैसे दूसरों के दुख में व्याकुल हो उठता है. कुछ अच्छा लगा और कुछ उदास भी हो गई. इतनी देर से वह इस माहौल में अपनेआप को अपरिचित सा अनुभव कर रही थी. सागर व बेला के साथ सुहास घर से जो गया तो रात को ही वापस लौटा. पुरवा को उस समय उस का जाना बुरा नहीं लगा था, पर जब सारा दिन उस की प्रतीक्षा में बीत गया तो उस के मन में विचित्र सी खिन्नता भर गई. क्या सुहास समाजसेवा के आगे बाकी सारी जिम्मेदारियां भूल जाता है?

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कहां तो उस के प्यार में डूब कर वह अपनी दुकान पर जाना भी भूल गया था, कहां सारा दिन उस की याद भी नहीं आई. सुहास ने अपनी थकान जाहिर करते हुए उसे देखा और बोला, ‘‘बहुत देर हो गई न. अंकल का दुख देखा नहीं जा रहा था. सागर भैया के साथ मैं बराबर बना रहा तो उन सब को भी बहुत तसल्ली थी.’’

पुरवा चुपचाप उस के उतारे कपड़े तह करती रही और सुहास अपने वहां होने के महत्त्व पर भाषण देता रहा.

रात में सोने से पहले पुरवा ने कहा, ‘‘सुहास, तुम्हें कुछ समय अपने व्यापार को भी देना चाहिए. कोई भी काम नौकरों के भरोसे ठीक से नहीं होता है.’’

‘‘मुझे पता है पुरु. कल मैं दुकान पर भी जाऊंगा. अभी तो बस, हमारे प्यार की घड़ी को याद करने दो,’’ और इसी के साथ सुहास ने पुरवा को अपनी बांहों में खींच लिया.

एक दोपहर श्वेता अचानक ही अपना सूटकेस उठाए घर आ गई. रजनीबाला उसे देख कर खिल उठीं.

‘‘अरे श्वेता, अचानक…’’

‘‘हां,’’ श्वेता के चेहरे पर खीज भरी हुई थी. वह कुछ कहना चाह रही पर बिना कुछ कहे ही वह अपने पहले के कमरे में घुस गई. पुरवा मेज पर खाना लगा रही थी. श्वेता को विचित्र स्थिति में कमरे की तरफ जाते देखा तो पीछेपीछे हो ली और हंसते हुए बोली, ‘‘यह क्या ननद रानी, सूटकेस तो कोई भी नौकर अंदर रख देता, तुम तो हमें देखे बिना ही अंदर भाग आईं.’’

श्वेता बनावटी हंसी के साथ बोली, ‘‘नहीं भाभी, किसी के ऊपर गुस्सा चढ़ा हुआ था, सो इधरउधर कहीं ध्यान ही नहीं दिया.’’

‘‘अच्छा,’’ पुरवा ने प्यार से उस की ठुड्डी उठाई, ‘‘कहीं यह गुस्सा हमारे ननदोईजी पर तो नहीं है?’’

श्वेता हंस दी, तभी मां रजनी वहां आ गईं. पुरवा ने हंस कर कहा, ‘‘कल से मम्मी तुम्हें बहुत याद कर रही थीं. चाहत तुम्हें खींच ही लाई.’’

पुरवा ने मां के सामने प्यार की  चादर डाल स्थिति को सहज बना दिया था.

उस दिन बहुत कहने पर सुहास अपनी दुकान पर गया था. पुरवा ने उसे फोन किया और कहा, ‘‘सुहास, डाइनिंग टेबल पर खाना लग गया है और इत्तेफाक से श्वेता भी आई है. तुम भी आ जाओ.’’

सुहास के आसपास उस समय कोई नहीं था इसलिए परिहास करता हुआ बोला, ‘‘आखिर तुम भी हर पल मुझे देखे बिना रह नहीं सकतीं न?’’

श्वेता खाना खाते समय भी बहुत अनमनी रही. पुरवा ने मलाई कोफ्ते का डोंगा उस की तरफ बढ़ाते हुए कहा, ‘‘श्वेता, मुझे बहुत अच्छा खाना बनाना तो नहीं आता पर कोशिश की है, यह मलाई कोफ्ता बनाने की. जरा चख कर बताना कि अभी और क्या कमी है इस में.’’

श्वेता उस की इस बात पर शायद चिढ़ गई थी. एक कोफ्ता निकाल कर बोली, ‘‘बस यही तो कमी है मुझ में भाभी कि तुम्हारी तरह मैं लच्छेदार बातें नहीं कर पाती. तभी तो वहां मुझ में सभी मीनमेख निकालते रहते हैं.’’

सब ने एकसाथ श्वेता को देखा था. सुहास को शायद बुरा लगा था, झट से बोला, ‘‘श्वेता, वहां का गुस्सा तुम क्या पुरवा पर निकाल रही हो?’’

पुरवा ने हाथ से उसे रोका और बोली, ‘‘कहने दो सुहास, अपनों से ही मन का दुख कहा जाता है.’’

‘‘बस, यही तो…’’ श्वेता चिढ़ कर उठ गई, ‘‘हर समय बहुत अच्छे बने रहने का स्वांग, न मुझ से होता है न पसंद है.’’

श्वेता दनदनाती हुई कमरे में चली गई. रजनी ने क्रोध से पुकारा, ‘‘श्वेता यह क्या, खाने पर से ऐसे ही उठ कर जाते हैं?’’

बुरा तो पुरवा को भी लगा था पर उसे श्वेता के बचकाने स्वभाव के बारे में थोड़ाबहुत पहले से ही अंदाजा था.

‘‘असल में हम लोगों के लाड़प्यार ने ही इसे बिगाड़ दिया. इकलौती बेटी जो है, इसीलिए इस की हर बात हम दोनों तुरंत मान लेते थे,’’ मां रजनी ने पुरवा को जैसे सफाई दी. उन की आंखों में वेदना भी थी और ममता भी. बोलीं, ‘‘लगता है इस का जिद्दी स्वभाव ससुराल में भी इस के आड़े आ रहा है.’’

पुरवा और सुहास चुपचाप खाना खाते रहे. मां ने एक प्लेट में कुछ चीजें परोसीं और प्लेट ले कर श्वेता को मनाने चल दीं. सुहास धीरे से बोला, ‘‘अब भी तो बिगाड़ ही रही हो मां. ससुराल में कोई खाना ले कर यों पीछे थोड़े ही भागता होगा.’’

‘‘जानती हूं रे, पर मां का दिल मानता नहीं. जब तक वह नहीं खाएगी, मुझ से भी नहीं खाया जाएगा.’’

शाम को अचानक गौरव आ गया. मां खुश हो गईं और बोलीं, ‘‘हम लोग तुम्हें ही याद कर रहे थे बेटा. श्वेता तो बच्ची है, अभी तक नासमझ. आई है तब से तुम्हें फोन भी नहीं किया.’’

‘‘वह तो रूठती ही रहती है मम्मीजी, मैं मना लूंगा उसे,’’ उस ने हंस कर कहा.

पुरवा चाय की तैयारी करने लगी. गौरव श्वेता के कमरे में था. रजनी ने पुरवा से कहा, ‘‘कितना अच्छा लड़का ढूंढ़ा है पर जब देखो नादानियां दिखाती रहती है.’’

‘‘कुछ दिन में समझदार हो जाएगी, फिर नादानी नहीं करेगी,’’ पुरवा ने जैसे मां को सांत्वना देने के लिए हंस कर कहा.

‘‘तुम भी तो नई हो, पर कितनी समझदार हो,’’ मां ने कहा तो पुरवा गद्गद हो उठी. केतली में चाय का पानी डालते हुए वह बोली, ‘‘कभी ऐसी भूलचूक हो जाए मम्मीजी तो कान पकड़ लीजिएगा.’’

पुरवा फिर से यदाकदा अंध महाविद्यालय जाने लगी थी. मां ने भी आज्ञा दे दी थी कि यह तो समाज कल्याण का काम है, बंद मत करो. बहुत दिनों से पुरवा ने बस यात्रा नहीं की थी. उस दिन अपने पुराने रूट वाली बस में बैठी तो पुरानी यादों में खो गई. यादों की तंद्रा तो तब टूटी जब कानों में यह सुनाई पड़ा, ‘‘ए मिस्टर, आप ठीक से खड़े नहीं हो सकते?’’

आवाज सुन कर पुरवा चौंक उठी. दरवाजे के पास की भीड़ में चेहरे दिखाई नहीं दे रहे थे, पर आवाज तो पहचानी हुई थी. पुरवा सोच में पड़ गई कि वह सुहास बस में क्या कर रहा है. इस समय तो उसे अपनी दुकान में होना चाहिए था.

बड़ी कठिनाई से जगह बनाती हुई पुरवा आगे बढ़ी तो देखा कि सुहास बेला के साथ बस के दरवाजे पर खड़ा है और एक नवयुवक से उलझ रहा है. शायद उस ने बेला के साथ कुछ शरारत की होगी. एकदम निकट पहुंच कर पुरवा ने आवाज दी तो सुहास चौंक पड़ा, ‘‘अरे, तुम.’’

‘‘हां,’’ पुरवा ने अधिक बात नहीं की, बस रुकी तो तीनों ही उतर गए. सुहास की गोद में बेला का बच्चा था. सफाई देता सा वह झट से बोला, ‘‘मैं दुकान के लिए निकलने ही वाला था कि सागर भैया का फोन आ गया. उन्हें जरूरी मीटिंग में जाना था और इसे आज डाक्टर के पास चेकअप के लिए ले जाना था.’’

पुरवा सोचने लगी कि अभी थोड़ी देर पहले ही तो वह सुहास को घर पर छोड़ कर आई थी. तब वह दुकान के कुछ काम के सिलसिले में किसी से मिलने जाने वाला था. इतनी जल्दी वह बेला को ले कर डाक्टर के पास भी चल दिया, उस ने लगभग 45 मिनट ही तो बस की प्रतीक्षा की थी, बसें भरी हुई आ रही थीं इसीलिए उस ने दो बसें छोड़ दी थीं. शायद सुहास दो बसें बदलता हुआ आया है तभी यहां दोनों की टक्कर हो गई.

जाने क्यों पुरवा के मन में कुछ चुभ सा रहा था. लाख मन को समझाया कि सुहास की इस सहायता करने वाली भावना के कारण ही तो वह स्वयं सुहास के जीवन में आई है, पर मन इसे सोच कर भी संतुष्ट नहीं हो पा रहा था. एक पत्नी का अधिकार निरंतर पुरवा के मन को भरमा रहा था, पर ऊपर से वह संयत बनी हुई खुद भी साथ चलने का आग्रह करने लगी थी. इस पर सुहास ने कहा, ‘‘तुम बहुत दिनों बाद अंध विद्यालय जा रही हो, वहीं जाओ, मैं इस बच्चे को दिखा कर और भाभी को बस में बैठा कर सीधा अपने काम पर चला जाऊंगा.’’

सुहास जैसेजैसे अपने काम की देखभाल करने लगा था पुरवा उतनी ही खुश रहने लगी थी. मां व पापा भी खुश हो कर कहते, ‘‘बहू के आने से सुहास का काम में भी मन लगने लगा है.’’

पुरवा एक अच्छी पत्नी की तरह सुहास का पूरा ध्यान रखती और घर की पूरी व्यवस्था संभालने के साथ मां व पापा का भी ध्यान रखती. कभी अपने मम्मीपापा के पास जाती तो उत्साह से भरी रहती. सहाय साहब भी यह जान कर संतुष्ट होते कि सुहास अब व्यापार की तरफ ध्यान देने लगा है.

एक दोपहर हाथ में अटैची उठाए हुए श्वेता फिर आ धमकी. रजनीबाला ने चौंक कर देखा और बोलीं, ‘‘कैसी हो श्वेता, सब ठीक तो है न?’’

मां के मुख से यह शब्द निकलते ही श्वेता उन के गले लग कर रोने लगी और बोली, ‘‘मैं वापस नहीं जाऊंगी मम्मी, अब की मुझे वापस भेजने की जिद मत करना.’’

तब तक पुरवा भी वहां आ गई थी और श्वेता को मां के गले से अलग करती हुई बोली, ‘‘चलो, अपने कमरे में चलो श्वेता, सब ठीक हो जाएगा.’’

उस समय किसी ने श्वेता से कोई प्रश्न नहीं किया. पुरवा भी समझ चुकी थी कि जब श्वेता क्रोध में होती है तब उस से कुछ भी कहनासुनना व्यर्थ होता है.

पुरवा तुरंत उस के लिए ठंडा जूस बना कर ले आई और बहुत प्यार से उस के आंसू पोंछती रही. मां बहुत परेशान थीं पर इस समय कुछ भी पूछना उन्हें भी उचित नहीं लग रहा था, अत: उस दिन श्वेता से किसी ने कोई प्रश्न नहीं पूछा और न ही श्वेता के ससुराल से कोई फोन आया.

पुरवा ने एकांत में सुहास से कहा, ‘‘गौरव का कोई फोन नहीं आया, कहीं उन से तो लड़ कर नहीं आई है श्वेता?’’

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सुहास उस दिन बहुत थका हुआ था. अपने व्यापार के सिलसिले में उस ने काफी भागदौड़ की थी. पुरवा की बात पर हंस कर बोला, ‘‘तुम चिंता मत करो, यह लड़की बचपन से ही थोड़ी नकचढ़ी है. कुछ दिनों में फिर शांत हो कर गौरव से दोस्ती कर लेगी.’’

2 दिन बीत गए थे. गौरव नहीं आया था और न ही उस का कोई फोन आया तो रजनीबाला को चिंता होने लगी. वह श्वेता से पूछतीं, ‘‘ऐसी क्या बात है जो न तू खुद फोन करती है और न गौरव का फोन आता है.’’

श्वेता नाश्ता करते हुए कहने लगी, ‘‘मम्मा, यह बताओ कि क्या अब मैं यहां रह नहीं सकती हूं?’’

‘‘यह तेरा घर है, तुझे रहने के लिए कौन मना कर रहा है,’’ रजनीबाला बोलीं, ‘‘लेकिन इस तरह से तेरा रूठ कर आना और उन लोगों की तरफ से भी सन्नाटा खिंचे रहना, यह परेशान तो करता ही है न.’’

‘‘तुम सब को परेशान होने की जरूरत नहीं है. हम पतिपत्नी आपस में ही निबट लेंगे,’’ श्वेता ने निश्चिंतता से कहा.

‘‘पर बिना आपस में मिले और बात किए कैसे निबट लोगी?’’ यह स्वर पापा का था जो बहुत देर से चुपचाप नाश्ता कर रहे थे. वह फिर बोले, ‘‘ठीक है, आज मैं गौरव को फोन कर के घर पर बुलाता हूं.’’

श्वेता शांत रही. सब को लगा कि शायद यही ठीक है.

शाम को 6 बजे गौरव आया तो श्वेता को छोड़ कर सभी अंदर ही अंदर यह सोच कर बहुत भयभीत थे कि पता नहीं श्वेता क्या गलती कर के आई है. गौरव के मन में क्या होगा, यह सब जानने की उत्सुकता भी थी और भय भी था पर ऊपर से सब शांत थे और गौरव का स्वागत करते हुए निरंतर हंसने का प्रयास कर रहे थे. पापा ने तुरंत कहा, ‘‘आओ बेटा गौरव, आओ. मैं ने सोचा कि आज सब एकसाथ ही रात्रिभोज पर गपशप करते हैं.’’

गौरव भी हंस दिया और बोला, ‘‘अच्छा है पापाजी, एकसाथ मिल कर बैठने से बड़ी से बड़ी परेशानियां और समस्याएं हल हो जाती हैं.’’

कुछ देर ड्राइंगरूम में इधरउधर की गपशप चलती रही. नौकर ट्राली में चाय ले कर आ गया था और पुरवा सब को चाय बना कर दे रही थी. पापा ने चाय पकड़ते हुए गौरव से कहा, ‘‘श्वेता हमारी इकलौती बेटी है, इसी से थोड़ी जिद्दी हो गई है. गौरव बेटा, उस की नादान बातों का बुरा मत माना करो.’’

यद्यपि श्वेता ने क्रोध से पापा की ओर देखा था. फिर भी वह बेटी की नादानियों की सफाई सी देते रहे. तब गौरव ने कहा, ‘‘पापाजी, मैं सब समझता हूं, मैं इसे बहुत प्यार भी करता हूं, पर इस के लिए मैं अपने बूढ़े मातापिता और भाईबंधु के परिवार को नहीं छोड़ सकता.’’

गौरव की बात सुन कर सभी अचानक चौंक पड़े थे. चाय बनाती पुरवा भी ठिठक गई थी, गौरव ने आगे कहा, ‘‘आप श्वेता से ही पूछिए कि इस ने मेरे साथ रहने की क्या शर्त रखी है.’’

गौरव के शब्दों में अथाह दुख था. वह बोला, ‘‘यह चाहती है कि मैं अपना अलग घर ले कर रहूं. एक ही शहर में पिता की उतनी बड़ी कोठी छोड़ कर मैं एक किराए का मकान लूं.’’

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श्वेता सिर झुकाए बैठी थी. मां ने कहा, ‘‘यह गलत है श्वेता, तुम्हें ऐसी बातें शोभा नहीं देती हैं.’’

‘‘लेकिन मैं उस भीड़ के साथ नहीं रह सकती, सब अपनीअपनी चलाते हैं, वहां मेरा अपना कुछ भी नहीं है.’’

‘‘अपने ससुराल वालों को भीड़ कहते हुए तुम्हें शर्म आनी चाहिए श्वेता. वे सब तुम्हारे सुखदुख के साथी हैं. अकेले की जिंदगी भी कोई जिंदगी है,’’ पापा ने क्रोध से कहा.

मां की आंखों में भी अपार दुख छा गया था. बोलीं, ‘‘ऐसा सोचना ही गलत है बेटा. अगर इसी तरह पुरवा भी सोचने लगे तो तुम्हें या हम सब को कैसा लगेगा.’’

मां की बात पर श्वेता और भी भड़क उठी, ‘‘भाभी, कैसे यह सब सोच सकती हैं. सुहास भैया कमाते ही क्या हैं जो वह अलग रहने की बात करेंगी.’’

श्वेता की बात पर अचानक ही वहां खामोशी छा गई थी. गौरव भी हैरान था और सुहास लज्जित हो उठा था. मां व पापा अपना क्रोध दबाने का प्रयास कर रहे थे. पुरवा वहां रुकी नहीं और सिर झुका कर अपने कमरे में चली गई.

-क्रमश:

प्रेग्नेंसी में खुद को ऐसे फिट रखती हैं एमी जैक्सन, शेयर की फोटोज

प्रेग्नेंसी में अपने आप को मेंटेन रखना आसान नहीं हैं पर एमी जैक्सन को देखकर ऐसा नहीं लगता. अक्षय कुमार और रजनीकांत स्टारर ‘2.0’ में रोबोट की भूमिका में नजर आईं एक्ट्रेस एमी जैक्सनसमय-समय पर अपनी प्रेग्नेंसी के बारे में फैंस को अपडेट करती रहती हैं. उनकी प्रेग्नेंसी की फोटोज देखकर आप दंग रह जायेंगे. हाल ही में एमी ने कुछ सेक्सी अंदाज में फोटोज शेयर की जिसे फैंस काफी पसंद कर रहें हैं. वो अपनी प्रेग्नेंसीको भरपूर एन्जौय कर रही हैं.

एक्सरसाइज रखे प्रेग्नेंसी में फिट

एक्सरसाइजसेशायद ही ऐसा कोई रोग हो जो भागता ना हो और खुद को स्लिम-ट्रिम रखने के लिए तो एक्सरसाइज से बेहतर कुछ और हो ही नहीं सकता. प्रेग्नेंसी के दौर में भी ये काफी मददगार है. एमी ने फोटो शेयर कर बताया है कि वो कैसे एक्सरसाइज से खुद को फिट रख रही है.एमी मां बनने को लेकर काफी एक्साइटेड हैं. वो इसके बारे में फैंस को समय-समय पर बताती रहती हैं. बता दे एमी 6 महीने की गर्भवती हैं. जल्दी ही वो अपने पहले बेबी को जन्म देने वाली हैं. फिलहाल एमी अपनी प्रेग्नेंसी के दूसरी तिमाही में हैं. इस दौरान एमी अपने बेबी के हरेक लम्हे को फोटो में कैद करके रख लेना चाहती हैं.

 

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Ready for a 🇬🇷 night at @thehartlounge 💃🏻

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Perks of a wallflower 🌸

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काफी खुश हैएमी

एमी अपनी प्रेग्नेंसी में हरेक सुबर का अच्छे से स्वागत करती हैं और उनकी ये हालिया फोटो इस बात का सबूत है.एमी जिंदगी के इस मोड़ पर भी ग्लैमरस लगना अच्छे से जानती है. कुछ दिन पहले एमी ने एक इंस्टाग्राम स्टोरी डाली जिसमें उन्होंने खुद को हौट मम्मी बता दिया.

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शादी के बिना बनी मां

बता दे की एमी ने अभी अपने बॉयफ्रेंड जॉर्ज पैनियोतो से सगाई की हैं. उनकी शादी में अभी कुछ समय हैं.

एक नंबर की बदचलन

लेखक- सुभाष चंदर

जुम्मन शेख की बीवी शकीना बेगम कभी दिन में, तो कभी रात में अपने एक आशिक से मिलने चली जाती और उस के साथ खूब गुलछर्रे उड़ाती. यह खबर बहुतों को मालूम थी. अगर किसी को नहीं पता थी तो वह था जुम्मन शेख, जिस का इस केस से सीधासीधा ताल्लुक था. पर यह बात उस तक पहुंचाने की हिम्मत कोई नहीं कर पा रहा था, क्योंकि जुम्मन शेख बड़े ही अक्खड़ दिमाग का आदमी था. यह भी पक्का था कि यह खबर मिलने के बाद जुम्मन शेख अपनी बीवी सकीना बेगम के आशिक को पाताल में से भी ढूंढ़ निकालेगा.

इसकी एक बड़ी वजह उन जवान या फिर रंगीनमिजाज मर्दों से ही जुड़ी थी जो खुद सकीना बेगम के चक्कर में थे और उन्हें इस बात का बेहद अफसोस था कि उन के होते हुए कोई और उस हसीन औरत को ले उड़ा था. उस औरत ने पराए महल्ले के मर्द पर नजर डाली थी, जो उन की खासी बेइज्जती थी.

यह मामला औरतों के डिपार्टमैंट ने संभाला. फातिमा बी तैयार हो गईं. वे दूर के रिश्ते में जुम्मन शेख की मौसी लगती थीं. उम्रदराज थीं. दमे की मरीज थीं. उन की जबान के चलने और खांसने की रफ्तार एकजैसी तेज थी. घर वाले उन से और वे घर वालों से तंग आ चुकी थीं. वे ऐसे नेक काम के लिए बिलकुल ठीक थीं.

फातिमा बी जुम्मन शेख की लकड़ी की दुकान पर जा पहुंचीं. जुम्मन शेख ने दुआसलाम की. फातिमा बी ने उस की बीवी सकीना बेगम के बांझ रह जाने पर अफसोस किया. कुछ डाक्टरों के पते भी बताए जिन के इलाज से शर्तिया बच्चे पैदा होते हैं. उस के बाद फातिमा बी जुम्मन शेख के कान के नजदीक गईं और कुछ फुसफुसाईं. वे कुछ देर तक फुसफुसाती ही रहीं. फुसफुस खत्म करने के बाद उन्होंने जुम्मन शेख के चेहरे के भावों की ओर गौर से देखा.

जुम्मन शेख की आंखों में लाली उतर आई थी. कुछ देर ऐसा ही रहा, फिर उस के मुंह से बोल फूटे, ‘‘नहीं, ऐसा नहीं हो सकता. सकीना ऐसा नहीं कर सकती.’’

फातिमा बी भौंचक्की रह गईं. उन्होंने फिर भी बुझती आंच में घी डालने की कोशिश की. वे बोलीं, ‘‘न बेटा, ज्यादा टाइम तक औलाद न होए तो कई बार औरत ऐसा कदम उठा लेती है.’’

‘‘बस खालाजान, आप आगे मत बोलना…’’ जुम्मन शेख भड़क उठा, फिर जाने क्या सोच कर शांत हुआ और बोला, ‘‘पहले यह बताओ कि यह बात आप को किस ने बताई?’’

‘‘रेहाना की अम्मी ने.’’

‘‘उन्हें?’’

‘‘उस के खसम यासीन ने…

पर क्यों?’’

‘‘कुछ नहीं, आप जाओ… मैं यासीन से बात करता हूं.’’

फातिमा बी के जाते ही जुम्मन शेख कुछ देर सोचता रहा, फिर यासीन की दुकान की ओर चला गया.

जुम्मन शेख ने मामले की पूछताछ की. यासीन ने डरते हुए बताया, ‘‘यह खबर मुझे शकील ने दी.’’

जुम्मन शेख शकील के पास

गया. उस ने रमजानी का नाम लिया. रमजानी ने बशीर का और बशीर ने बिंदा बनिए का.

बिंदा बनिए ने खास जानकारी दी कि उसे यह बात कल्लू रिकशे वाले ने बताई है. उसी ने अपनी आंखों से सकीना बेगम को रात को कहीं जाते देखा है.

जुम्मन शेख ने बिंदा बनिए को आंखें तरेर कर देखा. उस के बाद वह अपनी दुकान पर आया. वहां बोरों के ढेर के नीचे से बड़ा वाला छुरा निकाला. उंगली पर लगा कर उस की धार चैक की. धार कुंद हो रही थी. फिर उस ने पत्थर से घिसघिस कर धार पैनी की. इस के बाद वह कल्लू रिकशे वाले की तलाश में निकल गया.

रात हो चुकी थी. कल्लू अपने रिकशे पर ही बार सजाए बैठा था. रिकशे की सीट पर वह खुद जमा था. देशी

दारू की बोतल, पानी का जग और प्लेट में चखने के नाम पर नमक और मिर्च सजी थी.

कल्लू को नशा चढ़ रहा था, पर जुम्मन शेख को देखते ही कल्लू के नशे के झाग झटके से नीचे बैठ गए. उस ने भाग निकलने के लिए रास्ता खोजना चाहा, पर जुम्मन शेख ने इस का

मौका नहीं दिया. उस ने छुरा निकाला और कल्लू रिकशे वाले की गरदन पर रख दिया और सर्द आवाज में बोला, ‘‘सच्चीसच्ची बता कि बात क्या है, वरना इस छुरे से अभी तेरी गरदन रेत दूंगा, समझ गया न…’’

गरदन पर छुरा रखा हो तो किसी को भी बात समझ में आ सकती है. कल्लू को भी आ गई. वह मिमियाते हुए बोला, ‘‘हुजूर, मेरी कुछ गलती नहीं है. मैं ने कुछ नहीं किया.’’

जुम्मन शेख गरजा, ‘‘कहता है, तू ने कुछ नहीं किया. मेरी इज्जत मिट्टी में मिला दी. बता, ऐसा झूठ बोलने की तेरी हिम्मत कैसे हुई, वरना यहीं काट दूंगा,’’ कह कर छुरे का दबाव उस की गरदन पर बढ़ा दिया.

डर के मारे कल्लू के पाजामे से दोनों पैग बाहर निकल आए. माहौल में शराब की बदबू फैल गई.

‘‘हुजूर, मैं ने भाभी को परसों रात कब्रिस्तान की तरफ जाते देखा था. सच बोल रहा हूं,’’ कल्लू ने एक सांस में सबकुछ बक दिया.

इतना सुनते ही जुम्मन शेख ने छुरा कल्लू के गले से हटाया और बोला, ‘‘सुन बे, अगर यह बात झूठ निकली तो तू कल का सूरज नहीं देखेगा.’’

घर आ कर सकीना बेगम ने खाने के लिए पूछा. जुम्मन शेख ने उस की ओर ऐसी नजरों से देखा कि उस की आगे पूछने की हिम्मत ही नहीं पड़ी. कुछ देर बाद ही जुम्मन शेख को नींद आ गई.

लेकिन महल्ले वाले नहीं सोए थे.

वे रातभर शोरशराबे का, सकीना बेगम के रोनेचीखने वगैरह का इंतजार करते रहे, पर उन्हें निराशा ही हाथ लगी.

पर तमाशा कहां से होता… जुम्मन शेख तो मुंह अंधेरे ही घर से निकल गया था. पहले वह पास के गांव में रहने वाले अपने बड़े भाई से मिल कर आया. उस के बाद शहर में रहने वाले अपने छोटे भाई के पास चला गया. उसी के साथ अम्मी भी रहती थीं, जबकि अब्बू अब नहीं रहे थे.

जुम्मन शेख अम्मी से मिला और जाते ही उन से लिपट गया. फिर वह बहुत देर तक रोता रहा. अम्मी हैरान सी उसे देखती रहीं.

रोने का कार्यक्रम खत्म करने के बाद अम्मी को सलाम कर के जुम्मन शेख तेज कदमों से बाहर निकल आया.

इस के बाद जुम्मन शेख अब्दुल कय्यूम एडवोकेट के दरबार में हाजिरी देने गया. उन के कान में जाने क्याक्या फुसफुसाया, फिर उस की जेब ने इस सारी कार्यवाही का जुर्माना भरा जो पूरे 2,000 रुपए था.

इस के बाद जुम्मन शेख अपने गांव की ओर बढ़ गया. अब तक रात हो चुकी थी. 11 बजे होंगे. कायदे से उसे घर जाना चाहिए था, पर वह घर नहीं गया. फैसला लिया कि वह आज रात दुकान में ही रहेगा.

दुकान से उस का घर ज्यादा दूरी पर भी नहीं था. वैसे भी उस के घर से जिसे भी कब्रिस्तान की ओर जाना होता, उसे दुकान के सामने से ही हो कर जाना पड़ा. सो, उस ने दुकान में एक ऐसी जगह तलाशी जहां से वह अपने घर पर नजर रख सकता था. दुकान की बाहरी तरफ लकडि़यों का ढेर था. वह उस में कहीं छिप कर बैठ गया.

जुम्मन शेख ने सोचना शुरू किया कि अगर कल्लू की बात सच निकली तो आज उसे किस का बैंड बजाना पड़ेगा. सकीना बेगम का तो नंबर पहला था

ही, पर पहेली यह थी कि उस का

वह आशिक कौन होगा जो उस के

हाथों मरेगा?

सवाल यह भी था कि सकीना बेगम कब आएगी, आएगी भी या नहीं? इंतजार करतेकरते 2 घंटे हो गए.

तभी कुत्तों के भूंकने की आवाज आई. जुम्मन शेख ने उस दिशा में नजर दौड़ाई तो देखा कि एक साया उस के घर से निकल कर इधरउधर देख रहा है. वह समझ गया कि सकीना बेगम ही होगी.

जब वह साया दुकान के सामने से गुजरा तो कुल्हाड़ी पर जुम्मन शेख के हाथ इतनी बुरी तरह कस गए कि उस की हथेली की हड्डी तक चसक उठी.

सकीना बेगम दुकान के पास आ कर ठिठकी, फिर आगे बढ़ गई. उस की मंजिल कब्रिस्तान की तरफ थी. वह इधरउधर देखते हुए आगे बढ़ रही थी. जैसेजैसे वह आगे बढ़ रही थी, उसी हिसाब से जुम्मन शेख का गुस्सा भी अपने कदम आगे बढ़ा रहा था.

न जाने किस तरह जुम्मन शेख अपनेआप पर काबू रख पाया था, वरना उस का कम से कम 4-5 बार मन किया कि वह इस बेवफा औरत के अपनी कुल्हाड़ी से वैसे ही 2 टुकड़े कर दे जैसे भारी लकडि़यों के करता है. उस के दांत कसमसा रहे थे, उसे इंतजार था तो बस सकीना बेगम के किसी घर में घुसने का.

जुम्मन शेख छिपताछिपाता उस का पीछा कर रहा था. वह हर तरफ से चाकचौबंद था. उस के हाथ में कुल्हाड़ी थी, पाजामे की अंटी में चाकू भी था. बस, दुश्मन की पहचान होने भर की देर थी, हलाल करने की तैयारी पूरी थी.

सकीना बेगम आगे बढ़ रही थी. चलतेचलते वह ठिठकी. जुम्मन शेख ने देखा कि मकान बशीरे का था. ‘हुम्म… तो यह बशीरे का कियाधरा है…’ उस ने सोचा. वह उस को मारने के तरीके पर विचार कर ही रहा था कि सकीना बेगम आगे चल दी.

अगला घर नवाजू का था. वह वहां भी ठिठकी.

जुम्मन शेख ने मन में कुछ हिसाब लगाया. नवाजू पर तो कुल्हाड़ी ही इस्तेमाल करनी पड़गी, वह मोटा भैंसा चाकूवाकू से कहां मरेगा, लेकिन सकीना बेगम आगे बढ़ गई.

अब तो जुम्मन शेख को पक्का यकीन हो गया कि हो न हो, सकीना बेगम ने जिस से टांका भिड़ाया है,

वह रियाजू ही है. कमबख्त… इतनी खूबसूरत बीवी के होते हुए, अपने से बड़ी उम्र की औरत पर फिसला. उस ने अंटी के चाकू को सहलाया ही था कि सकीना बेगम आगे बढ़ गई. वह थोड़ा रुकी, इधरउधर देखा, फिर सीधे कब्रिस्तान के खुले गेट में घुस गई.

सकीना बेगम गेट के अंदर जा चुकी थी. जुम्मन शेख लोहे के गेट के पीछे छिप कर खड़ा हो गया. उसे इंतजार था कि कब वह नसीमू आए और वह उस को खुदागंज पहुंचा दे.

पर वहां कोई नहीं दिखाई दिया. वहां कब्रें थीं, उन में शांति से सोए मुरदे थे, कुछ झाड़झंखाड़ भी थे, पर आदम जात कहीं नहीं दिखा.

‘फिर सकीना बेगम इतनी रात में कब्रिस्तान में क्या करने आई है? क्या वह बेवफा नहीं है? क्या वह किसी आशिक से मिलने नहीं आई है? फिर वह यहां क्यों आई है?’ जुम्मन शेख का दिल धक से रह गया. तो इस का मतलब सकीना बेगम डायन… चुड़ैल… आगे वह सोच नहीं पाया.

तभी खटखट की आवाजें आईं. उस ने गौर से देखा कि सकीना बेगम जमीन पर उकड़ूं बैठ कर कुछ खोद रही है. अब तो उस का कलेजा मुंह को आ गया, ‘इस का मतलब उस का शक सही है… वह पक्की चुड़ैल है. कब्रिस्तान से मुरदे उखाड़ कर उन को खाती है. डर के मारे उस की धड़कनें बंद होतेहोते बचीं. झुरझुरी सी हो आई, पर उस ने किसी तरह मन कड़ा किया और सकीना ‘चुड़ैल’ की आगे की कार्यवाही देखने लगा. लगा कि कुछ ही देर में सकीना

के हाथों में मुरदा होगा, पर निराशा ही हाथ लगी.

सकीना ने कुछ मिट्टी खोदी और हाथ में रखे रूमाल में बांधी. उस के बाद दियासलाई जलाई. अगरबत्ती सुलगाई और फिर वह अगरबत्ती उस कब्र पर रख दी. जुम्मन शेख पहचान गया कि यह मजार तो पीर बाबा का था.

जुम्मन शेख की समझ में कुछ नहीं आया. यह कैसी चुड़ैल है जो कब्र खोदती है, पर मुरदे नहीं खाती. उस की मिट्टी रूमाल में भरती है. खोदी हुई कब्र पर अगरबत्ती जलाती है. चुड़ैल भला अगरबत्ती क्यों जलाएगी?

तभी सकीना बेगम खड़ी हो गई और मजार पर सिर झुकाने के बाद वापस जाने लगी. जुम्मन शेख चौकन्ना हो गया. डर था कि कहीं वह देख न ले.

जब सकीना बेगम उस के पास से गुजरी तो उस का दिल धड़धड़ बज

रहा था. जब वह और नजदीक आई तो उस ने जोर से आवाज दी, ‘‘सकीना… सुनो तो…’’

सकीना बेगम डर के मारे ठिठक गई. उस ने सोचा कि कब्रिस्तान का कोई जिन जाग गया है. वह थरथर कांपने लगी.

जुम्मन शेख उस की हालत समझ गया. वह बोला, ‘‘सकीना, डरो मत, मैं… हूं… जुम्मन, तुम्हारा शौहर.’’

सकीना बेगम ने शौहर की आवाज पहचानी, पर शक फिर भी था. उस ने मुड़ कर देखा तो सच में जुम्मन शेख ही था. उस की जान में जान आई.

कुछ कहने से पहले ही जुम्मन शेख ने अपनी बेगम के हाथ थाम लिए. आंखों में प्यार भर कर वह बोला, ‘‘सच बताऊं बेगम, मैं तुम्हें मारने आया था,’’ कह कर उस ने दूर पड़ी कुल्हाड़ी दिखाई, अंटी में लगा चाकू दिखाया.

‘‘पर, मेरा कुसूर क्या है?’’ सकीना बेगम की आंखें हैरानी और दुख से फैल गईं. जुम्मन शेख ने कल्लू रिकशे वाले से ले कर महल्ले में फैली सारी बात बताई.

सकीना बेगम ने नाराजगी दिखाई लेकिन जुम्मन शेख के माफी मांगने पर वह मान गई.

उस के बाद जुम्मन शेख को कुछ याद आया. वह बोला, ‘‘तुम रात को कब्रिस्तान में क्यों आती हो? और यह मिट्टी खोदने और मजार पर अगरबत्ती जलाने का क्या चक्कर है?’’

अब सकीना बेगम ने जो बताया, उस से जुम्मन शेख का तो माथा ही घूम गया. वह बोली, ‘‘मैं मुल्ला बदरूद्दीन के पास गई थी. वह झाड़फूंक करता है. मैं ने उस से पूछा कि हमारे घर आलौद क्यों नहीं हो रही है?’’

जुम्मन शेख तुनक कर बोला, ‘‘हम्म, तो यह सारा खेल उस मरदूद का शुरू किया हुआ है. खैर, तुम आगे बताओ. उस से तो मैं बाद में निबटूंगा.’’

सकीना बेगम आगे बोली, ‘‘मुल्ला ने बताया था कि मेरे ऊपर किसी जिन का साया है. वही मेरे मां बनने में रोड़े अटका रहा है. उस के लिए उस ने मुझ से 5,000 रुपए लिए. एक तावीज दिया और कहा था कि मैं हफ्ते में 2 दिन आधी रात को कब्रिस्तान जाऊं. पीर बाबा की कब्र से मिट्टी खोद कर उस में तावीज गाड़ दूं. अगली बार आऊं तो निकाल लूं.

‘‘3 दिन पहले मैं ने तावीज गाड़ा था और आज निकाल लिया. यह देखो,’’ कह कर उस ने रूमाल में बंधी मिट्टी और उस में पड़ा तावीज दिखा दिया.

यह सुन कर और तावीज को देख कर जुम्मन के तनबदन में आग लग गई. वह भनभना कर बोला, ‘‘उस मौलवी ने तो मेरा घर बरबाद कर देना था. या तो मैं तुम्हें तलाक दे देता या फिर तुम्हारा कत्ल करता. उस के बाद फांसी चढ़ जाता. अब मैं उसे छोड़ूंगा नहीं.’’

‘‘अरे… अरे… पर, क्या करोगे उस का?’’

‘‘मैं उस को तावीज की तरह जमीन में गाड़ दूंगा और फिर निकालूंगा भी नहीं. बस सुबह हो जाने दो,’’ कह कर जुम्मन शेख सकीना बेगम के साथ घर को चल दिया.

अगले दिन सुबहसवेरे जुम्मन शेख लाठी ले कर मुल्ला बदरूद्दीन के घर पहुंच गया.

मुल्लाजी अपनी बैठक में मजमा लगाए बैठे थे. किसी को भूत भगाने का नुसखा बता रहे थे. जुम्मन को देखते ही वे चौंके, फिर घबराए. उठने की कोशिश की, पर जुम्मन के लट्ठ ने उन्हें उठने न दिया. पहले लट्ठ ने ‘आह’ निकाली, दूसरे ने ‘हाय मर गया’ की आवाज निकाली, तीसरे में वे ‘बचाओबचाओ’ की गुहार करने लगे.

महल्ले में भीड़ जमा हो गई. जुम्मन शेख ने गरज कर कहा, ‘‘बदरूद्दीन, अब भी वक्त है, बता दे कि तू ने मेरे खिलाफ यह साजिश क्यों की, वरना तुझे जिंदा नहीं छोडं़ूगा,’’ कह कर उस ने लट्ठ उठाया ही था कि बदरूद्दीन मिमियाता हुआ बोला, ‘‘मेरी जान बख्श दो. मैं ने कुछ नहीं किया. यह सब हकीमजी का कियाधरा है. उन्होंने ही मुझ से यह सब खेल करने को कहा था. इस के लिए मुझे 5,000 रुपए भी दिए थे,’’ कह कर वे रोने लगे.

यह सब सुनते ही जुम्मन शेख का माथा ठनक गया. इस का मतलब असली गुनाहगार हकीम है. उसे तो सबक ही सिखाना पड़ेगा. वह हकीम के दवाखाने की ओर बढ़ा. कहना न होगा कि महल्ले की भीड़ उस के पीछे थी.

हकीम ने पहले जुम्मन शेख को देखा, फिर भीड़ देखी. वह अंदर की ओर भाग लिए. पर जुम्मन उन से ज्यादा फुर्तीला था, उन्हें वहीं थाम लिया. पहले उन का थप्पड़ों से स्वागत किया, फिर लातों का इस्तेमाल करते हुए उन्हें बाहर ले आया. हकीम ने ‘बचाओबचाओ’ का शोर मचाना शुरू किया, पर किसी ने उसे नहीं बचाया.

जब मारतेमारते जुम्मन शेख के हाथपैर थक गए तो उस ने लाठी उठाई और दहाड़ कर बोला, ‘‘हकीम के बच्चे, अगर जिंदा रहना चाहता है तो सब के सामने बता कि तू ने यह साजिश क्यों रची थी, वरना तुझे तेरे तावीज के साथ यहीं गाड़ दूंगा.’’

हकीम साहब समझ गए कि खेल खत्म हो गया. उन्होंने कराहतेकराहते

जो बताया, वह सुन कर भीड़ भी हैरान रह गई.

हकीम साहब रोतेरोते बोले, ‘‘सकीना मेरे पास दवा लेने आती थी. उसे देख कर मेरी नीयत खराब हो गई थी. मैं ने उसे छेड़ने की कोशिश की तो सकीना मेरे मुंह पर थप्पड़ मार कर चली गई. यह सब देख कर मैं गमक गया. फिर मैं ने बेइज्जती का बदला लेने के लिए यह साजिश रची.’’

हकीम साहब चुप हुए ही थे कि जुम्मन शेख दहाड़ उठा, ‘‘पूरी बात बता, क्या साजिश रची थी? जल्दी बोल वरना…’’

हकीम साहब घबरा गए. वे बोले, ‘‘मैं ने… मैं ने मुल्ला बदरूद्दीन को पटाया. उसे समझाया कि वह सकीना बेगम को रात को कब्रिस्तान में जाने को कहे, ताकि जब यह बात तुम्हें पता चले तो तुम उसे मार दोगे या तलाक दे दोगे. मेरा बदला पूरा हो जाएगा.’’

हकीम साहब की बातें सुन कर भीड़ भड़क उठी. बशीरन बूआ चिल्लाईं, ‘‘इतनी बड़ी साजिश. कीड़े पड़ेंगे तेरे बदन में.’’

फिर वे भीड़ की ओर देख कर बोलीं, ‘‘देखते क्या हो रे, मारो इस मरदूद को.’’

फिर क्या था, जुम्मन शेख एक तरफ हो गया, भीड़ ने उस का अधूरा काम संभाल लिया. पहले मर्दों ने हाथ सेंके, फिर औरतों ने चप्पलों से सुताई की.

सब से ज्यादा मजा आखिर में आया. बुंदू कहीं से हज्जाम को पकड़ लाया. उस ने हकीम साहब के सिर पर उस्तरा फिरा दिया. शकील ने उन का मुंह काला किया. इस के बाद उन्हें गधे पर बिठा कर सारे महल्ले का चक्कर लगवाया गया. जुम्मन शेख अब संतुष्ट था.

उसी रात को जुम्मन शेख अपनी बीवी सकीना बेगम के साथ पलंग पर बैठा था. जुम्मन शेख भावुक होते हुए बोला, ‘‘सकीना, अगर मैं शक में पड़ कर तुम्हें मार देता तो…

सकीना बेगम बोली, ‘‘तो क्या हुआ, मैं चुड़ैल बन जाती और तुम्हारा खून चूसती?’’ कह कर वह हंस पड़ी.

उस के हंसते ही जुम्मन शेख घबरा कर उठा और पलंग से लटके पैरों को उलटपलट कर देखने लगा.

सकीना चौंक कर बोली, ‘‘क्या… क्या देख रहे हो जी?’’

जुम्मन बोला, ‘‘देख रहा हूं, कहीं तुम्हारे पैर उलटे तो नहीं हैं.’’

यह सुनते ही सकीना बेगम ने बड़ी जोर का ठहाका लगाया.

शर्मनाक: राजस्थान बन रहा रेपिस्थान

राजस्थान में जिस तरह से रेप के मामले सामने आ रहे हैं, उस से राज्य की नईनवेली सरकार की कलई खुल गई है. प्रदेश के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत एक महीने तक अपने बेटे को चुनाव जिताने में लगे रहे और प्रदेश की इज्जत लुट गई. इस दौरान सरकार तो सो ही रही थी, जिस राजस्थान पुलिस के जिम्मे प्रदेश की सुरक्षा है, वह भी पूरी तरह से नकारा निकली.

चुनाव का सहारा ले कर कोई केस दर्ज नहीं किया गया. थानागाजी में हुए गैंगरेप और वीडियो बना कर वायरल करने जैसी खौफनाक वारदातों को भी गंभीरता से नहीं लिया गया.

आंकड़ों की बात की जाए तो अप्रैलमई महीने में ही राज्य में गैंगरेप के 12 बड़े मामले सामने आए, जिन में अबलाओं के साथ कई दरिंदों ने एकसाथ दरिंदगी की. लेकिन राजस्थान सरकार और उस की पुलिस की नाकामी का आलम यह रहा कि केवल 3 मामलों में ही कार्यवाही हुई.

12 अप्रैल, 2019. बाड़मेर में एक महिला स्वास्थ्य कर्मचारी (एएनएम) के साथ रेप करने का मामला सामने आया, लेकिन चुनाव के चलते इस को दबा दिया गया और मुकदमा ही दर्ज नहीं किया गया.

12 अप्रैल, 2019. गुजरात से अजमेर घूमने आई एक औरत को रात में एक आटोरिकशा वाला रामगंज में अपने घर ले गया और उस के साथ गैंगरेप किया. इस मामले में शामिल 8 दरिंदों पर कोई कार्यवाही नहीं हुई.

18 अप्रैल, 2019. जैसलमेर के नोखा कसबे के पांचू थाना इलाके में 18 साल की एक लड़की को चाकू दिखा कर उठा लिया गया और उस का गैंगरेप कर डाला.

19 अप्रैल, 2019. नागौर की एक गौशाला के मालिक पर रेप का मामला दर्ज हुआ. बताया गया कि रेप के चलते पीडि़ता ने सुसाइड करने की कोशिश की. 26 अप्रैल, 2019. अलवर के थानागाजी में एक विवाहिता का उस के पति के सामने

5 दरिंदों ने गैंगरेप कर उस के 11 वीडियो वायरल किए गए. 6 दिन बाद मामला दर्ज हुआ और 6 मई, 2019 को वहां चुनाव निबटने के बाद राज्य सरकार को होश आया.

29 अप्रैल, 2019. जैसलमेर के ही नोखा कसबे में परिवार वाले वोट देने गए हुए थे कि एक 14 साल की नाबालिग से दरिंदों ने गैंगरेप कर डाला.

29 अप्रैल, 2019. दौसा जिले में महज 7 साल

की एक बच्ची को टौफी देने के नाम पर ले जा कर रेप

किया गया.

1 मई, 2019. चित्तौड़गढ़ में एक 5 साल की मासूम बच्ची को झाडि़यों में ले जा कर उस का रेप कर डाला.

1 मई, 2019. जोधपुर में बोरानाडा इलाके में

16 साल की एक किशोरी का सुनसान इलाके में रेप कर दिया.

2 मई, 2019. जोधपुर के बोरानाडा इलाके में एक विवाहिता से रेप किया गया. उस की बेटी से छेड़छाड़ की गई और बेटे का धर्म बदलने की कोशिश की गई.

7 मई, 2019. सीकर में रात को छत पर सो रही एक नवविवाहिता से उसी मकान में रंगरोगन करने वालों ने गैंगरेप कर डाला.

7 मई, 2019. जोधपुर में करवड़ इलाके में एक नाबालिग को घर से भगा कर ले गए और उस का देह शोषण किया गया.

7 मई, 2019. जयपुर के बगरू थाना क्षेत्र में छीतरोली में 14 साल की नाबालिग से रेप किया गया और उस का वीडियो बना कर ब्लैकमेल किया गया.

7 मई, 2019. जयपुर की एक लड़की, जो पुष्कर घूमने गई थी, के साथ गाइड ने ही होटल में ले जा कर रेप किया.

7 मई, 2019. नागौर जिले के मकराना क्षेत्र में कूकड़ोद में औरत के घर पहुंच कर 2 नौजवानों ने गैंगरेप किया. वीडियो भी बनाया गया. वायरल करने के बाद इस का खुलासा हुआ.

9 मई, 2019. जैसलमेर की नोखा तहसील में शौच करने के बाद लौट रही एक विवाहिता को कुछ दरिंदे उठा ले गए और उस के साथ सामूहिक बलात्कार कर डाला. उस के साथ कई शहरों में 4 दिनों तक गैंगरेप करने के बाद उस के पिता के घर पर पटक दिया गया.

10 मई, 2019. श्रीगंगानगर में स्कूल की गाड़ी चलाने वाले ने ही 6 साल की मासूम के साथ रेप करने की कोशिश की. बच्ची ने स्कूल जाने से मना किया, तब मामला सामने आया.

10 मई, 2019. प्रदेश के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के गृह जिले जोधपुर में रातानाड़ा में एक औरत के साथ एक आदमी ने रेप कर डाला. पुलिस ने मामला दर्ज ही नहीं किया.

इतना ही नहीं, इसी दौरान प्रदेश में ऐसे 40 मामले सामने आए, जिन में औरतों की इज्जत तारतार हो गई. मुख्यमंत्री अशोक गहलोत जब अपने बेटे के लिए प्रचार कर ‘वैभव’ बचाने में लगे थे, तब थानागाजी में एक औरत की जिंदगी का ‘वैभव’ ही सरेराह लुट रहा था.

गंभीर बात यह है कि प्रदेश में पहले चरण की वोटिंग 29 अप्रैल को होने वाली थी, इसलिए पुलिस ने गैंगरेप की घटना में एफआईआर भी दर्ज नहीं की.

नेता हनुमान बेनीवाल और पूर्व आईपीएस पंकज चौधरी का दावा है कि गैंगरेप के जो मामले एसपी तक पहुंचते हैं, वे डीजीपी के भी ध्यान में होते हैं. इन दोनों ने इस मामले की गंभीरता को देखते हुए मुख्यमंत्री अशोक गहलोत से इस्तीफा देने की मांग की.

सब से बड़ी बात यह है कि रेप, गैंगरेप और अपहरण की सब से ज्यादा वारदातें प्रदेश के मुख्यमंत्री और गृह मंत्री अशोक गहलोत के गृह राज्य में हुई हैं. महज एक पखवारे में बलात्कार की 40 घटनाएं.

जिस तरह ऐसी चौतरफा घटनाएं हुई हैं, उस के हिसाब से लग रहा है कि प्रदेश पर वहशी दरिंदों का कब्जा हो गया है. सरकार बस नाम की है.

एक पखवारे में प्रदेश की 40 बेटियों की इज्जत लूटी गई तो क्या इस बारे में राजस्थान के मुख्यमंत्री की कोई नैतिकता नहीं बनती है? गृह मंत्रालय उन के पास है और नीचे से ऊपर तक पूरा तंत्र है जो हर घटना की रिपोर्टिंग करता है. साथ ही, सरकारी खुफिया तंत्र है जो गृह मंत्री व मुख्यमंत्री तक सूचनाएं पहुंचाता है. मामला गंभीर है और नीचे से ऊपर तक पूरी सरकार सवालों के घेरे में है.

दरअसल, अनुभव व ऊंची पढ़ाई के नाम पर इस देश के नौजवानों के साथ बहुत बड़ा खेल खेला गया है. सामाजिक तानेबाने के जानकार, जमीनी हकीकत की पहचान रखने वाले व रोजरोज

की समस्याओं से जूझ कर तपे हुए व व्यवस्था में बदलाव लाने का जोश रखने वाले नौजवानों को कभी सत्ता में नहीं आने दिया गया, इसलिए हजारों सालों से चली आ रही गुलामी की सोच में कोई बड़ा बदलाव नहीं आ सका है.

हमारे धर्मग्रंथ भी बलात्कारों से भरे पड़े हैं, मगर वे बहुतों के आदर्श भी हैं, क्योंकि उन को श्राप, नियोग वगैरह अलग नाम दिए गए थे और संविधान में हम ने बलात्कार लिख कर बहुत बड़ी क्रांति कर दी. ऐसा हमें सत्ता पर कब्जा कर के बैठे एलीट क्लास वालों ने बताया है इसलिए हम भी इस भ्रांति को क्रांति समझ बैठे हैं और जब भी ऐसी घटनाएं घटती हैं तो हम इन के सामने गिड़गिड़ाते नजर आते हैं और हमारे बीच से ही कुछ लोग इंसाफ दिलवाने की दुकान खोल कर इसी ग्रुप में जा कर शामिल हो जाते हैं.

हर जज, सांसद, विधायक, मंत्री, मुख्यमंत्री, राज्यपाल समेत तमाम बड़े पदों पर बैठे लोगों के चरित्र की अगर ईमानदारी के साथ जांच की जाए तो जिस तरह आजकल बाबा जेलों में जा रहे हैं, उसी तरह से ऐसे 90 फीसदी लोग यौन शोषण करने या संरक्षण देने की एवज में जेलों की तरफ जाते नजर आएंगे.

भांग लोटे में नहीं, बल्कि पूरे कुएं में घुली हुई है और चंद ईमानदार लोगों को देख कर जनता खुश हो रही है कि इस देश में बराबरी का समाज बनाने की जंग लड़ी जा रही है.

देश के चीफ जस्टिस पर यौन शोषण के आरोप लगे और उसी पीठ ने महिला को बिना निष्पक्ष जांच के झूठा करार दे दिया और आप उम्मीद कर रहे हैं कि इन घटनाओं में इंसाफ मिलेगा.

भारत का पूरा इतिहास खंगाल कर देख लीजिए, राजशाही, धर्मशाही, लोकशाही वगैरह में कुछ हट कर नजर नहीं आएगा. पहले मंदिरों में देवदासियों के नाम पर शोषण होता था और अब जिस तरह इन धर्मगुरुओं की करतूतें सामने आ रही हैं, उस के हिसाब से तो अब गुफाओं में आशीर्वाद के नाम से शोषण हो रहा है.

एक आसाराम के खिलाफ बोलने या गवाही देने वाले कितने लोगों की हत्या कर दी गई, आप जानते ही होंगे. हर डाल पर आसाराम बैठा है, हर गांव में अपराध का टापू बना हुआ है. एक टापू या एक अपराध को ले कर इतने क्रांतिकारी मत बनिए कि सारी ताकत एक पर ही खत्म हो जाए. हमें बीचबीच में ऐसी इंसाफ वाली क्रांतियां करते रहना है, इसलिए पुलिस कौंस्टेबल व एसआई को कोस कर आगे बढि़ए.

अपने जुल्मी व गुलाम इतिहास को हम गौरवशाली बताते हैं. अपने कलंकित वर्तमान पर हमें शर्म आती नहीं है. हम पुरानी व्यवस्था को रौंद कर नई व्यवस्था खड़ी करने का माद्दा नहीं रखते हैं. हम रोज जलालत भरी जिंदगी जी रहे हैं. इनसान कीड़ेमकोड़ों की तरह मर रहे हैं.

3 साल की, 5 साल की, 8 साल तक की बच्चियों के साथ दरिंदगी होती है, मगर हमारा खून नहीं खौलता है. हम आजादी के 72 साल तक व्यवस्था के बदलाव को रोक कर बैठे सत्ताधारियों के सामने गिड़गिड़ाते रहे हैं.

पूरे सिस्टम को ही जंग लगा हुआ है. चेहरे बदलने से कुछ नहीं होने वाला. जवाबदेही व पारदर्शिता के नारे के साथ सुशासन का पिटारा ले कर अशोक गहलोत मुख्यमंत्री की कुरसी पर बैठे हैं. आप खुद देख लीजिए इन की जवाबदेही व पारदर्शिता.

अब बौलीवुड पर JCB मीम्स का कहर, ये हीरोज हुए शिकार

पिछले कुछ दिनों से JCB मशीन सोशल मीडिया पर छाई हुई है. दरअसल, #JCBKiKhudayi के साथ जेसीबी पर इतने मीम बन गए है कि बाकी सभी टौपिक फीके पड़ गए हैं. और अब तो बौलीवुड सेलेब्स भी जेसीबी मीम्स के कहर का शिकार हो गए हैं. जी हां, शाहरुख खान, आमिर खान, शाहिद कपूर, सलमान खान और रणवीर सिंह सहित कई सेलेब्स को इन मीम्स का हिस्सा बनाया गया है. ये मीम तेजी से वायरल हो रहे हैं, जिनमें से कुछ हम आपके लिए लेकर आए हैं. इन मीम्स को देखकर आप भी अपनी हंसी रोक नहीं पाएंगे.

क्या है पूरा मामला
भारत में कहीं भी कोई कंस्ट्रक्शन का काम होता है, तो जेसीबी की मशीन खुदाई का काम करती है. इस मशीन को देखने के लिए कई लोगों की भीड़ इक्ट्ठा हो जाती है. इसी बात को लेकर पिछले काफी समय से सोशल मीडिया पर जोक्स बनाए जा रहे थे लेकिन किसी वजह से ज्यादा वायरल नहीं हुए थे. लेकिन जब सनी लियोनी ने जेसीबी के साथ पोज दिए तो रातों रात इसे सुर्खियां मिल गई और इस पर कई मीम बन गए.

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जेसीबी कंपनी ने कहा फैंस को थैंक्यू…

जेसीबी के लिए लोगों का ये प्यार देखकर कंपनी भी खुद को रोक नहीं पाई और औफिशियली अपने फैंस को थैंक्यू कहा है. JCB कम्पनी ने एक वीडियो पोस्ट करते हुए लिखा- “आज हम भारत में JCB के प्रति दिखाए गए प्यार से बेहद खुश हैं. भारतीयों ने #JCBKiKhudai पूरे देश में ट्रेंड करा दिया. आप सब के उत्साह और समर्थन के लिए हमारे ग्राहकों और प्रशंसकों को धन्यवाद”

बता दें कि इस वायरल हुए वीडियो और मीम्स का असर देशभर में तब फैलता दिखाई दिया जब छत्तीसगड़ में एक शादी के दौरान दुल्हा घोड़े की बजाए JCB पर एंट्री करता नजर आया.

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कल हमेशा रहेगा- अंतिम भाग

लेखिका- सुजाता वाई ओवरसियर

मम्मीपापा के दबाव में आ कर वेदश्री ने डा. साकेत से शादी करने का फैसला ले लिया. वह इस बात से दुखी थी कि अभि को यह बात कैसे समझाएगी. लेकिन बहते हुए आंसुओं को रोक कर उस ने एक निर्णय ले ही लिया कि वह अभि से मिलने आखिरी बार जरूर जाएगी.

वेदश्री की बातें सुनने के बाद अभि तय नहीं कर पा रहा था कि वह किस तरह अपनी प्रतिक्रिया दर्शाए. वह श्री को दिल से चाहता था और अपनी जिंदगी उस के साथ हंसीखुशी बिताने का मनसूबा बना रहा था. उस का सपना आज हकीकत के कठोर धरातल से टकरा कर चकनाचूर हो गया था और वह कुछ भी करने में असमर्थ था.

उस ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि उस की अपनी गरीबी और लाचारी उस की जिंदगी से इस कदर खिलवाड़ करेगी. यदि वह अमीर होता तो क्या मानव के इलाज के लिए अपनी तरफ से योगदान नहीं देता? श्री उस के लिए सबकुछ थी तो उस के परिवार का हर सदस्य भी तो उस का सबकुछ था.

अब समय मुट्ठी से रेत की तरह सरक गया था. समय पर अब उस का कोई नियंत्रण नहीं रहा था. अब तो वह सिर्फ श्री और साकेत के सफल सहजीवन के लिए दुआ ही कर सकता था.

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अपना हृदय कड़ा कर और आवाज में संतुलन बना कर अभिजीत बोला, ‘‘श्री, मैं तुम्हारी मजबूरी समझ सकता हूं पर तुम से तो मैं यही कहूंगा कि हमें समझदार प्रेमियों की तरह हंसीखुशी एकदूसरे से अलग होना चाहिए. प्यार कोई ऐसी शै तो है नहीं कि दूरियां पैदा होने पर दम तोड़ दे. प्यार किया है तो उसे निभाने के लिए शादी करना कतई जरूरी नहीं. प्लीज, तुम मेरी चिंता न करना. मैं अपनेआप को संभाल लूंगा पर तुम वचन दो कि आज के बाद मुझे भुला कर सिर्फ साकेत के लिए ही जिओगी.’’

आंखों में आंसू लिए भारी मन से दोनों ने एकदूसरे से विदा ली.

‘‘श्री, आज का दिन यहां खत्म हुआ तो क्या हुआ? याद रखना, कल फिर आएगा और हमेशा आता रहेगा… और हर आने वाला कल तुम्हारी जिंदगी को और कामयाब बनाए, यही मेरी दुआ है.’’

मंगलसूत्र पहनाते समय साकेत की उंगलियों ने ज्यों ही वेदश्री की गरदन को छुआ, उस के सारे शरीर में सिहरन सी भर गई. सप्तपदी की घोषणा के साथसाथ शहनाई का उभरता संगीत हवा में घुल कर वातावरण को और भी मंगलमय बनाता गया. एकएक फेरे की समाप्ति के साथ उसे लगता गया कि वह अपने अभिजीत से एकएक कदम दूर होती जा रही है. आज से अभि उस से इस एक जन्म के लिए ही नहीं, बल्कि आने वाले सात जन्मों के लिए दूर हो गया है. अब उस का आज और कल साकेत के साथ हमेशा के लिए जुड़ गया है.

फेरों के खत्म होते ही मंडप में मौजूद लोगों ने अपनेअपने हाथों के सारे फूल एक ही साथ नवदंपती पर निछावर कर दिए. तब वेदश्री ने अपने दिल में उमड़ते हुए भावनाओं के तूफान को एक दृढ़ निश्चय से दबा दिया और सप्तपदी के एकएक शब्द को, उस से गर्भित हर अर्थ हर सीख को अपने पल्लू में बांध लिया. उस ने मन ही मन संकल्प किया कि वह अपने विवाहित जीवन को आदर्श बनाने का हरसंभव प्रयास करेगी क्योंकि वह इस सच को जानती थी कि औरत की सार्थकता कार्येषु दासी, कर्मेषु मंत्री, भोज्येशु माता और शयनेशु रंभा के 4 सूत्रों के साथ जुड़े हर कर्तव्यबोध में समाई हुई है.

सुहाग सेज पर सिकुड़ी बैठी वेदश्री के पास बैठ कर साकेत ने कोमलता से उस का चेहरा ऊपर की ओर इस तरह उठाया कि साकेत का चेहरा उस की आंखों के बिलकुल सामने था. वह धड़कते हृदय से अपने पति को देखती रही, लेकिन उसे साकेत के चेहरे पर अभि का चेहरा क्यों नजर आ रहा है? उसे लगा जैसे अभि कह रहा हो, ‘श्री, आखिर दिखा दिया न अपना स्त्रीचरित्र. धोखेबाज, मैं तुम्हें कभी क्षमा नहीं करूंगा.’ और घबराहट के मारे वेदश्री ने अपनी पलकें भींच कर बंद कर लीं.

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‘‘क्या हुआ, श्री. तुम्हारी तबीयत तो ठीक है न?’’ साकेत उस की हालत देख कर घबरा गया.

‘‘नहींनहीं…बिलकुल ठीक हूं…आप चिंता न करें…पहली बार आज आप ने मुझे इस तरह छुआ न इसलिए पलकें स्वत: शरमा कर झुक गईं,’’ कह कर वह अपनी घबराहट पर काबू पाने का निरर्थक प्रयास करने लगी.

मन में एक निश्चय के साथ श्री ने अपनी आंखें खोल दीं और चेहरा उठा कर साकेत को देखने लगी.

‘‘अब मैं ठीक हूं, साकेत. पर आप से कुछ कहना चाहती हूं…प्लीज, मुझे एक मौका दीजिए. मैं अपने मन और दिल पर एक बोझ महसूस कर रही हूं, जो आप को हकीकत से वाकिफ कराने के बाद ही हलका हो सकता है.’’

‘‘किस बोझ की बात कर रही हो तुम? देखो, तुम अपनेआप को संभालो, और जो कुछ भी कहना चाहती हो, खुल कर कहो. आज से हम नया जीवन शुरू करने जा रहे हैं और ऐसे में यदि तुम किसी भी बात को मन में रख कर दुखी होती रहोगी तो मुझे अच्छा नहीं लगेगा.’’

‘‘साकेत, मैं ने आप से अपनी जिंदगी से जुड़ा एक गहरा राज छिपा कर रखा है और यह छल नहीं तो और क्या है?’’ फिर वह अभिजीत और अपने रिश्ते से जुड़ी हर बात साकेत को बताती चली गई.

‘‘साकेत, मैं आप को वचन देती हूं कि मैं अपनी ओर से आप को शिकायत का कोई भी मौका नहीं दूंगी,’’ अपनी बात खत्म करने के बाद भी वह रो रही थी.

‘‘गलत बात है श्री, आज का यह विशेष अवसर और उस का हर पल, हमारी जिंदगी में पहली और आखिरी बार आया है. क्या इन अद्भुत पलों का स्वागत आंसुओं से करोगी?’’ साकेत ने प्यार से उस का चेहरा अपने हाथों में ले लिया.

‘‘रही बात तुम्हारे और अभिजीत के प्रेम की तो वह तुम्हारा अतीत था और अतीत की धूल को उड़ा कर अपने वर्तमान को मैला करने में मैं विश्वास नहीं रखता…भूल जाओ सबकुछ…’’

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वह रात उन की जिंदगी में अपने साथ ढेर सारा प्यार और खुशियां लिए आई. साकेत ने उसे इतना प्यार दिया कि उस का सारा डर, घबराहट, कमजोर पड़ता हुआ आत्मविश्वास…उस प्यार की बाढ़ में तिनकातिनका बन कर बह गया.

वसंत पंचमी का शुभ मुहूर्त वेदश्री के जीवन में एक कभी न खत्म होने वाली वसंत को साथ ले आया जिस ने उस के जीवन को भी फूलों की तरह रंगीन बना दिया क्योंकि साकेत एक अच्छे पति होने के साथ ही एक आदर्श जीवनसाथी भी साबित हुए.

पहले दिन से ही श्री ने अपनी कर्तव्यनिष्ठा द्वारा घर के सभी सदस्यों को अपना बना लिया. समय के पंखों पर सवार दिन महीनों में और महीने सालों में तबदील होते गए. 5 साल यों गुजर गए मानो 5 दिन हुए हों. इन 5 सालों में वेदश्री ने जुड़वां बेटियां ऋचा एवं तान्या तथा उस के बाद रोहन को जन्म दिया. ऋचा व तान्या 4 वर्ष की हो चली थीं और रोहन अभी 3 महीने का ही था. साकेत का प्यार, 3 बच्चों का स्नेह और परिवार के प्रति कर्तव्यनिष्ठा, यही उस के जीवन की सार्थकता के प्रतीक थे.

साकेत की दादी दुर्गा मां सुबह जल्दी उठ जातीं. उन के स्नान से ले कर पूजाघर में जाने तक सभी तैयारियों में श्री का सुबह का वक्त कब निकल जाता, पता ही नहीं चलता. उस के बाद मांबाबूजी, साकेत तथा भैयाभाभी बारीबारी उठ कर तैयार होते. फिर अनिकेत और आस्था की बारी आती. सभी के नहाधो कर अपनेअपने कामों में लग जाने के बाद श्री अपना भी काम पूरा कर के दुर्गा मां की सेवा में लग जाती.

अनिकेत एवं आस्था तो भाभी के दीवाने थे. हर पल उस के आगेपीछे घूमते रहते. उन की हर जरूरत का खयाल रखने में श्री को बेहद सुख मिलता. श्री एवं अनिकेत दोनों की उम्र में बहुत फर्क नहीं था. अनिकेत ने एम.बी.ए. की डिगरी प्राप्त की थी. अब वह अपने पिता एवं बड़े भाई के व्यवसाय में हाथ बंटाने लगा था लेकिन अपनी हर छोटीबड़ी जरूरतों के लिए श्री पर ही निर्भर रहता. वह उस से मजाक में कहती भी थी, ‘अनिकेत भैया, अब आप की भाभी में आप की देखभाल करने की शक्ति नहीं रही. जल्दी ही हाथ बंटाने वाली ले आइए वरना मैं अपने हाथ ऊपर कर लूंगी.’

आस्था का कहना था कि ‘जिस घर में इतनी प्यारी भाभी बसती हों उस घर को छोड़ कर मैं तो कभी नहीं जाने वाली,’ फिर भाभी के गले में बांहें डाल कर झूल जाती.

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वेदश्री के खुशहाल परिवार को एक ही ग्रहण वर्षों से खाए जा रहा था कि विश्वा भाभी की गोद अब तक खाली थी. वैसे भैयाभाभी दोनों शारीरिक रूप से पूर्णतया स्वस्थ थे पर भाभी के गर्भाशय में एक गांठ थी जो बारबार की शल्यक्रिया के बाद भी पनपती रहती थी. भाभी को गर्भ जरूर ठहरता, पर गर्भ के पनपने के साथ ही साथ वह गांठ भी पनपने लगती जिस की वजह से गर्भपात हो जाता था.

बारबार ऐसा होने से भाभी के स्वास्थ्य पर गहरा असर पड़ता जा रहा था. इसी बात का गम उन्हें मन ही मन खाए जा रहा था. श्री हमेशा भाभी से कहती, ‘भाभी, मैं आप से उम्र में बहुत छोटी हूं और उम्र एवं रिश्ते के लिहाज से बड़ी भाभी, मां समान होती हैं. आप मुझे अपनी देवरानी समझें या बेटी, हर लिहाज से मैं आप को यही कहूंगी कि आप इस बात को कभी मन पर न लें कि आप की अपनी कोई संतान नहीं है मैं अपने तीनों बच्चे आप की गोद में डालने को तैयार हूं. आप को मुझ पर भरोसा न हो तो मैं कानूनी तौर पर यह कदम उठाने को तैयार हूं. बच्चे मेरे पास रहें या आप के पास, रहेंगे तो इसी वंश से जुडे़ हुए न.’’

सुन कर भाभी की आंखों में तैरने वाला पानी उसे भीतर तक विचलित कर देता. मांबाबूजी श्री के इन्हीं गुणों पर मोहित थे. उन्हें खुशी थी कि घरपरिवार में शांति एवं खुशी का माहौल बनाए रखने में छोटीबहू का योगदान सब से ज्यादा था. बड़ी बहू भी उस की आत्मीयता में सराबोर हो कर अपना गम भुलाती जा रही थी. तीनों बच्चों को वह बेहद प्यार करती. श्री घर के कार्य संभालती और भाभी बच्चों को. घर की चिंताओं से मुक्त पुरुष वर्ग व्यापार के कार्यों में दिनरोज विकास की ओर बढ़ता जा रहा था.

‘‘श्री,’’ विश्वा भाभी ने उसे आवाज दी.

‘‘जी, भाभी,’’ ऋचा के बाल संवारते हुए श्री बोली और फिर हाथ में कंघी लिए ही वह ड्राइंगरूम में आ गई, जहां विश्वा भाभी, मांजी एवं दादीमां बैठी थीं.

‘‘आज हमें एक खास जगह, किसी खास काम के लिए जाना है. तुम तैयार हो न?’’ भाभी ने पूछा.

‘‘जी, आप कहें तो अभी चलने को तैयार हूं लेकिन हमें जाना कहां होगा?’’

‘‘जाना कहां है यह भी पता चल जाएगा पर पहले तुम यह तसवीर देखो,’’ यह कहते हुए भाभी ने एक तसवीर उस की ओर बढ़ा दी. तसवीर में कैद युवक को देखते ही वह चौंक उठी. अरे, यह तो सार्थक है, अभि का दूसरा भांजा…प्रदीप का छोटा भाई.

‘‘हमारी लाडली बिटिया की पसंद है….हमारे घर का होने वाला दामाद,’’ भाभी ने खुशी से खुलासा किया.

‘‘सच?’’ उसे अपने कानों पर विश्वास नहीं हो रहा था. फिर तो जरूर अभि से भी मिलने का मौका मिलेगा.

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घर के सभी लोगों ने आस्था की पसंद पर अपनी सहमति की मोहर लगा दी. सार्थक एक साधारण परिवार से जरूर था लेकिन एक बहुत ही सलीकेदार, सुंदर, पढ़ालिखा और साहसी लड़का है. अनिकेत के साथ ही एम.बी.ए. कर के अब बहुराष्ट्रीय कंपनी में उच्च पद पर कार्यरत है.

उन की सगाई के मौके पर एक विशाल पार्टी का आयोजन होटल में किया गया. साकेत व वेदश्री मुख्यद्वार पर खड़े हो कर सभी आने वाले मेहमानों का स्वागत कर रहे थे. जब सार्थक के साथ अभि, उस की बहन और बहनोई ने हाल में प्रवेश किया तो श्री व साकेत ने बड़ी गर्मजोशी से उन का स्वागत किया.

अभि ने वर्षों बाद श्री को देखा तो बस, अपलक देखता ही रह गया. एक बड़े घराने की बहू जैसी शान उस के अंगअंग से फूट रही थी. साकेत के साथ उस की जोड़ी इतनी सुंदर लग रही थी कि अभि यह सोचने पर मजबूर हो गया कि उस ने वर्षों पहले जो फैसला श्री की खुशी के लिए लिया था, वह उस की जिंदगी का सर्वोत्तम फैसला था.

अभि ने अपनी पत्नी भव्यता से श्री का परिचय करवाया. भव्यता से मिल कर श्री बेहद खुश हुई. वह खुश थी कि अभि की जिंदगी की रिक्तता को भरने के लिए भव्यता जैसी सुंदर और शालीन लड़की ने अपना हाथ आगे बढ़ाया था. उन की भी एक 2 साल की प्यारी सी बेटी शर्वरी थी.

श्री ने बारीबारी से सार्थक के मम्मीपापा तथा अभि की मां के पैर छुए और उन का स्वागत किया. वे सभी इस बात से बेहद खुश थे कि उन का रिश्ता श्री के परिवार में होने जा रहा है. अभि की मम्मी बेहद खुश थीं, उन्होंने श्री को गले लगा लिया.

साकेत को अपनी ओर देखते हुए पा कर श्री ने कहा, ‘‘साकेत, आप अभिजीत हैं. सार्थक के मामा.’’

‘‘अभिजीत साहब, आप से दोबारा मिल कर मुझे बेहद प्रसन्नता हुई है,’’ कह कर साकेत ने बेहद गर्मजोशी से हाथ मिलाया.

‘‘दोबारा से आप का क्या तात्पर्य है, साकेत’’ श्री पूछे बिना न रह सकी.

‘‘श्री, तुम शायद नहीं जानती कि हमारा मानव इन्हीं की बदौलत दोनों आंखों से इस संसार को देखने योग्य बना है.’’

‘‘अभि, तुम ने मुझ से यह राज क्यों छिपाए रखा?’’ यह कहतेकहते श्री की आंखें छलक आईं. वह अपनेआप को कोसने लगी कि क्यों इतनी छोटी सी बात उस के दिमाग में नहीं आई….मानव की आंखें और प्रदीप की आंखों में कितना साम्य था? उन की आंखों का रंग सामान्य व्यक्ति की आंखों के रंग से कितना अलग था. तभी तो मानव की सर्जरी में इतना अरसा लग गया था. क्या प्रदीप की आंख न मिली होती तो उस का भाई…इस के आगे वह सोच ही नहीं पाई.

‘‘श्री, आज के इस खुशी के माहौल में आंसू बहा कर अपना मन छोटा न करो. यह कोई इतनी बड़ी बात तो थी नहीं. हमें खुशी इस बात की है कि मानव की आंखों में हमें प्रदीप की छवि नजर आती है…वह आज भी जिंदा है, हमारी नजरों के सामने है…उसे हम देख सकते हैं, छू सकते हैं, वरना प्रदीप तो हम सब के लिए एक एहसास ही बन कर रह गया होता.’’

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श्री ने मानव को गले लगा लिया. उस की भूरी आंखों में उसे सच में ही प्रदीप की परछाईं नजर आई. उस ने प्यार से भाई की दोनों आखोंं पर चुंबनों की झड़ी सी लगा दी, जैसे प्रदीप को धन्यवाद दे रही हो.

साकेत, अभि की ओर मुखातिब हुआ, ‘‘अभिजीत साहब, हम आप से तहेदिल से माफी मांगना चाहते हैं, उस खूबसूरत गुनाह के लिए जो हम से अनजाने में हुआ,’’ उस ने सचमुच ही अभि के सामने हाथ जोड़ दिए.

‘‘किस बात की माफी, साकेतजी?’’ अभि कुछ समझ नहीं पाया.

‘‘हम ने आप की चाहत को आप से हमेशाहमेशा के लिए जो छीन लिया…यकीन मानिए, यदि मैं पहले से जानता तो आप दोनों के सच्चे प्यार के बीच कभी न आता.’’

आप अपना मन छोटा न करें, साकेतजी. आप हम दोनों के प्यार के बीच आज भी नहीं हैं. मैं आज भी वेदश्री से उतना ही प्यार करता हूं जितना किसी जमाने में किया करता था. सिर्फ हमारे प्यार का स्वरूप ही बदला है.

‘‘वह कैसे?’’ साकेत ने हंसते हुए पूछा. उस के दिल का बोझ कुछ हलका हुआ.

‘‘देखिए, पहले हम दोनों प्रेमी बन कर मिले, फिर मित्र बन कर जुदा हुए और आज समधी बन कर फिर मिले हैं…यह हमारे प्रेम के अलगअलग स्वरूप हैं और हर स्वरूप में हमारा प्यार आज भी हमारे बीच मौजूद है.’’

‘‘श्री, याद है, मैं ने तुम से कहा था, कल फिर आएगा और हमेशा आता रहेगा?’’

श्री ने सहमति में अपना सिर हिलाया. वह कुछ भी बोलने की स्थिति में कहां थी.

सार्थक एवं आस्था ने जब एकदूसरे की उंगली में सगाई की अंगूठी पहनाई तो दोनों की आंखों में एक विशेष चमक लहरा रही थी, जैसे कह रही हों…

‘आज हम ने अपने प्यार की डोर से 2 परिवारों को एक कभी न टूटने वाले रिश्ते में हमेशा के लिए बांध दिया है…कल हमेशा आता रहेगा और इस रिश्ते को और भी मजबूत बनाता रहेगा, क्योंकि कल हमेशा रहेगा और उस के साथ ही साथ सब के दिलों में, एकदूसरे के प्रति प्यार भी.

अब कंगना से डरा ये एक्टर, सता रहा है ‘रेप’ केस का डर

बौलीवुड के खेल बड़े निराले हैं. आज अर्श पर तो कल फर्श पर. कभी सुपरस्टार माधुरी दीक्षित की फिल्म ‘सैलाब’ में हीरो बने हैंडसम आदित्य पंचोली आज एक ऐसे अनजाने डर में जी रहे हैं जिस ने उन की रातों के नींदें हराम कर दी हैं. कौन लाया है आदित्य पंचोली की शांत जिंदगी में यह सैलाब?

कंगना ने उड़ाई नींद…

उस इनसान का नाम है कंगना राणावत, जो फिलहाल सिल्वर स्क्रीन की क्वीन हैं और जब बड़े परदे पर तलवार उठाती हैं तो झांसी की रानी बन जाती हैं. निजी जिंदगी में भी कंगना दूसरों की साथ लोहा लेने में पीछे नहीं हटती हैं, फिर चाहे वह सैफ अली खान हों या करन जौहर. आलिया भट्ट हों या वरुण धवन.
कंगना राणावत जब बौलीवुड में अपना नाम कमाने आई थीं तब ऐसा माना गया था कि आदित्य पंचोली ने उन की मदद की थी. इस हद तक कि बाद में उन दोनों के अफेयर के रंगीन परचे तक छपने लगे थे. आदित्य पंचोली की पत्नी जरीना वहाब ने तो यह भी डंके की चोट पर कहा है कि आदित्य पंचोली और कंगना राणावत के बीच साढ़े 4 साल तक डेटिंग का चक्कर चला था.

बौलीवुड गौसिप के मुताबिक इन दोनों का रिश्ता ठीक चल रहा था लेकिन अचानक कुछ ऐसा हुआ कि इस में दरार आ गई. ब्रेकअप के बाद दोनों के बीच काफी झगड़ा हुआ. कंगना ने आदित्य पंचोली पर शारीरिक हिंसा और मारपीट करने का आरोप लगाया था. फिर खबर आई कि आदित्य पंचोली ने कुछ दिन पहले कंगना राणावत के खिलाफ मानहानि की शिकायत दर्ज कराई. लेकिन अब आदित्य पंचोली को एक डर बारबार सताने लगा है कि कंगना राणावत उन को रेप के झूठे केस में फंसा सकती हैं.

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आदित्य को ‘फेक’ रेप केस का डर…

खुद पर कोई आंच न आए इस लिहाज से आदित्य पंचोली ने गुरुवार, 30 मई को मुंबई के वर्सोवा पुलिस स्टेशन में कंगना राणावत और उन के वकील रिजवान सिद्दीकी के खिलाफ एक शिकायत दर्ज कराई जिस में कहा गया है कि आदित्य पंचोली को डर है कि उन्हें ‘फेक’ रेप केस में फंसाया जा सकता है और इसलिए वे पुलिस के पास आए हैं.

मामला इतना ही नहीं है. इस से पहले आदित्य पंचोली ने आरोप लगाया था कि रिजवान सिद्दीकी ने उन्हें कंगना के खिलाफ मानहानि का मामला वापस लेने के लिए कहा था और अगर वे ऐसा नहीं करते हैं तो उन पर रेप का केस कर दिया जाएगा.

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कंगना और रंगोली के खिलाफ एक्शन की मांग…

अपने पक्ष को और मजबूत करने के लिए आदित्य पंचोली ने पुलिस के सामने एक वीडियो भी पेश किया जिस में कथिततौर पर रिजवान सिद्दीकी उन्हें रेप केस की धमकी देते दिखाई दे रहे हैं और इसी वजह से आदित्य पंचोली ने पुलिस से रिजवान सिद्दीकी, कंगना राणावत और उनकी बहल रंगोली चंदेल के खिलाफ तुरंत और सख्त एक्शन लिए जाने की मांग की है.

अब कौन किस के खिलाफ साजिश रच रहा है या झूठे मामले में फंसाने की कोशिश कर रहा है, यह तो आने वाला समय ही बताएगा, पर फिलहाल तो आदित्य और कंगना का मामला ऐसा ‘हौट केक’ बना हुआ है, जिस पर पहली छुरी किस की पड़ेगी, इस पर सभी की निगाहें टिकी हैं.

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आखिर क्यों ‘सेक्रेड गेम्स’ के ‘गायतोंडे’ को हुई थी ये परेशानी?

पिछले साल जुलाई महीने में रिलीज हुई नेटफ्लिक्स की बोल्ड वेब सीरीज ‘सेक्रेड गेम्स’ ने दर्शकों से खूब वाहवाही लूटी थी. इस की कहानी मुंबई के अंडरवर्ल्ड के इर्दगिर्द घूमी थी जिस में मुंबई का डॉन बना गणेश एकनाथ गायतोंडे (नवाजुद्दीन सिद्दीकी) मुंबई पुलिस के एक सिख इंस्पेक्टर सरताज सिंह (सैफ अली खान) को फोन कर के टिप देता है कि 25 दिन में मुंबई तबाह हो जाएगी. उस के बाद कहानी दिलचस्प मोड़ लेती हुई एक ऐसे अंजाम पर खत्म होती हैं जहां उस का दूसरा पार्ट बनना पक्का था. अब दूसरा पार्ट भी आ रहा है.

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इस वेब सीरीज में नवाजुद्दीन सिद्दीकी ने गजब का काम किया था. परदे पर निभाए गए उस के किरदार का खौफ दर्शकों को भी महसूस हुआ था. वह जिस बेरहमी से अपने दुश्मनों पर गोली चलता था उसी बेरहमी से वह औरतों के साथ सेक्स भी करता था, फिर चाहे वह कोई धंधे वाली ही क्यों न हो.
दर्शकों को लुभाने के लिए सेक्स करने वाले सीन भी इस वेब सीरीज में जबरदस्त तरीके से फिल्माए गए थे. नवाजुद्दीन बिना किसी प्रोटेक्शन के इतनी सारी औरतों के साथ हमबिस्तर होता है कि वह सेक्स से जुडी बीमारी का शिकार हो जाता है. उस के पेशाब से खून निकलने लगता है. पूरे बदन पर लाल रंग के चकत्ते पड़ जाते हैं. एक तरह से वह मौत के मुंह में चला जाता है.

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वेब सीरीज में तो नवाजुद्दीन बच जाता है, पर हर कोई उस की तरह ऐसी बीमारी से बच जाए, यह जरूरी तो नहीं है. हमारे देश में बहुत से ऐसे लोग हैं जो घर में पत्नी के होते हुए बाहर गंदी बीमारियों से घिरीं देह धंधे वालियों के जिस्म से अपनी हवस पूरी करते हैं, वह भी बिना किसी प्रोटेक्शन के.
इन बदनाम गलियों में जाने वाले बहुत से लोग सिगरेटशराब जैसे नशे के भी आदी हो जाते हैं. सिगरेट तो उन के गुरदों पर बुरा असर डालती है.
क्या आप भी पेशाब में खून आने की समस्या से तो पीड़ित नहीं हैं? अगर ऐसा है तो सावधान हो जाइए क्योंकि ब्रिटेन में गुरदों के कैंसर के बारे में जागरुकता फैलाने वाले एक संगठन ने दावा किया है कि अगर आप को पेशाब में खून दिखाई देता है, चाहे एक बार भी, तो यह कैंसर का लक्षण हो सकता है.
इस संगठन का कहना है कि सिगरेट पीने और मोटापे की वजह से गुरदों के कैंसर का जोखिम बढ़ता है लेकिन बीमारी का जल्दी पता चलने से मौत की दर में गिरावट आ सकती है.

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अगर आप को पेशाब में खून दिखाई दे, भले ही एक बार ही, तो तुरंत अपने डॉक्टर को बताएं. वैसे भी अगर कोई आदमी बिना प्रोटेक्शन के किसी अनजान साथी के साथ सेक्स करता है तो उसे सेक्स से जुड़ी और भी कई बीमारियां हो सकती हैं जो उन के लिए जी का जंजाल बन जाती हैं. बहुत से लोग तो डर और झिझक के मारे डॉक्टर के पास भी नहीं जाते हैं और बीमारी को खतरनाक रूप धर लेने देते हैं. कुछ लोग तो झोलाछाप डॉक्टरों के चंगुल में फंस कर अपनी सेहत और पैसे का दोहरा नुकसान करा बैठते हैं. लिहाजा, इस तरह के मामलों में बिलकुल भी लापरवाही नहीं बरतनी चाहिए. किसी अनजान साथी के साथ सेक्स के दौरान प्रोटेक्शन अपनाएं और खुद को गायतोंडे बनने से बचाएं.

वंश बेल

पूर्व कथा

रामलीला मैदान में आयोजित कार्यक्रम के दौरान एक स्त्री महाराजजी के आगे ‘बेटा’ न होने का दुखड़ा रोती है तो वह उसे गुरुमंत्र और कुछ पुडि़या देते हैं. कार्यक्रम की समाप्ति पर महाराज विदेशी कार में अपने पूरे काफिले के साथ आश्रम चले जाते हैं. थोड़ी देर आराम करने के बाद अपने खास सेवकों के साथ कार्यक्रम की चर्चा करते हैं तभी एक सेवक कहता है कि गुरुजी इस वंशबेल को बढ़ाने के लिए कोई उत्तराधिकारी तो होना ही चाहिए. लोग कहते हैं कि यदि बेटा होने की कोई दवाई या मंत्र होता तो क्या महाराज का कोई बेटा नहीं होता. उन की बातें सुन कर महाराज दुखी हो जाते हैं. अत: सभी शिष्य मिल कर महाराज के दूसरे विवाह की योजना बनाते हैं. कुछ दिनों के बाद उन के शिष्य एक स्त्री के बारे में अफवाह फैला देते हैं कि एक गर्भवती स्त्री को उस के शराबी पति ने घर से निकाल दिया है और अब वह महाराज की शरण में है. एक दिन सभा के दौरान भक्तों की चुनौती पर महाराज उसे अपनाने को तैयार हो जाते हैं लेकिन जब यह बात महाराज की पहली पत्नी सावित्री को पता चलती है तो वह तिलमिला जाती है. महाराज अपनी दूसरी नवविवाहिता पत्नी सुनीता के साथ दूसरे आश्रम में रहने लगते हैं. सावित्री की नाराजगी दूर करने के लिए उस को ‘गुरु मां’ का दरजा दे देते हैं. कुछ महीनों के बाद सुनीता के गर्भवती होने की खबर पा कर महाराजजी उसे डाक्टर के पास ले जाते हैं और उस के गर्भस्थ शिशु का लिंगभेद जानने के लिए अल्ट्रासाउंड करने को कहते हैं तभी सुनीता, डाक्टर और महाराज के बीच हुई सारी बातें सुन लेती है. अब आगे…

अंतिम भाग

गतांक से आगे…

सुनीता से यह सब सहा नहीं गया और वह बेहद विचलित हो उठी.

महाराज का असली रूप देख कर उस का मन घृणा से भर

उठा. वह चाहती तो थी कि उसी समय उस कमरे में जा कर उन दोनों को खूब खरीखरी सुना दे लेकिन महाराज का पद, पैसा, प्रतिष्ठा देख कर वह रुक गई. वह जान गई थी कि महाराज और उन के सेवक उसे क्षण भर में ही मसल कर रख देंगे. महाराज कोई न कोई आरोप लगा कर उसे लांछित और प्रताडि़त कर सकते हैं, क्योंकि अपनी छवि और प्रतिष्ठा को बनाए रखने के लिए वह किसी भी हद तक जा सकते हैं. हार कर वह पुन: बाहर बैठ गई.

तब तक महाराज बाहर आ चुके थे. सुनीता को देखते ही उन्होंने कुटिल मुसकान उस पर डाली.

सुनीता बडे़ सधे कदमों से उन तक पहुंची और बोली, ‘‘क्या कहा डाक्टर ने, सब ठीक तो है न?’’

‘‘हां, सब ठीक है,’’ वह थोड़ा चिंतित हो कर बोले, ‘‘यहां की मशीनें इतनी आधुनिक नहीं हैं… कहीं और चल कर दिखाएंगे.’’

‘‘आज तो मैं बहुत थक चुकी हूं. थोड़ा आराम करना चाहती हूं…आप कहें तो आश्रम चलें?’’ सुनीता ने स्वयं पर नियंत्रण रखते हुए बेहद विनम्रता से पूछा.

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‘‘हांहां, क्यों नहीं,’’ कहतेकहते महाराज बाहर आ गए. तब तक उन की विदेशी कार पोर्च में आ चुकी थी. सेवकों ने द्वार खोला और वह उस में मुसकराते हुए प्रवेश कर गए. सुनीता ज्यों ही उन के पास आ कर बैठी, कार चल पड़ी.

कार आश्रम में आ गई. सुनीता फौरन महाराजजी के लिए ठंडा पानी ले कर आई. वह जानती थी कि इस समय महाराजजी निजी कमरे में विश्राम करते हैं और उस के बाद भक्तों की भीड़ लग जाती है. फिर कुछ सोचते हुए वह महाराज के पास जा कर बैठ गई और उन के घुंघराले बालों में हाथ फेरते हुए बेहद मुलायम स्वर में बोली, ‘‘आज मैं आप को कहीं नहीं जाने दूंगी. आप के भोजन की व्यवस्था भी यहीं कर देती हूं. मेरा भी तो मन करता है कि अपने महाराजजी, अपने पति परमेश्वर को अपने सामने बैठा कर भोजन कराऊं.’’

इतना कह कर सुनीता उन से लिपट गई. इस से पहले कि महाराज कुछ कहते सुनीता ने जानबूझ कर अपनी साड़ी का पल्लू गिरा कर अपने दोनों वक्षों में महाराज के मुंह को छिपा लिया. सुनीता के गुदाज और गोरे बदन की भीनीभीनी खुशबू में महाराज धीरेधीरे डूबने लगे. उन्होंने सुनीता को कस कर अपने बाहुपाश में जकड़ लिया. सुनीता ने उन की कमजोर नस को दबा रखा था और जानबूझ कर अपने शरीर को उन के शरीर के साथ लपेट लिया. इस से पहले कि महाराज उस के तन से कपड़े अलग करते उस ने महाराज की आंखों में झांकते हुए कहा, ‘‘अब तो मैं आप के बच्चे की मां बनने जा रही हूं. मैं ने आज तक आप से कभी कुछ नहीं मांगा…’’

‘‘तो तुम्हें क्या चाहिए रानी?’’ महाराज ने उस के कपोलों पर चुंबन अंकित कर के पूछा.

‘‘मैं भला क्या चाहूंगी… सभी सुखसुविधाएं तो आप की दी हुई हैं, पर थोडे़ से पैसे और अपने रहनसहन के लिए हर बार आप के सामने प्रार्थना करनी पड़ती है, जो मुझे अच्छा नहीं लगता. आप तो हमेशा बाहर ही रहते हैं और मैं…’’ सुनीता ने जानबूझ कर अपना वाक्य अधूरा छोड़ दिया.

‘‘तो ठीक है. मेरे कमरे के सेफ में कुछ रुपए रखे रहते हैं. मैं उस की चाबी तुम को दे देता हूं. बस, अब तो खुश हो न,’’ कह कर महाराज उस के आगोश में सिमट कर लेट गए.

शाम को जब महाराजजी आश्रम की गतिविधियों को देखने के लिए वहां से जाने लगे तो सुनीता ने खुद ही बात शुरू कर दी :

‘‘महाराज, अब तो आप पिता बनने वाले हैं. आज मैं इनाम लिए बिना नहीं मानूंगी.’’

‘‘इनाम?’’ महाराज चौंक कर उसे देखने लगे.

‘‘क्यों…क्या आप को बच्चे की खुशी नहीं है.’’

‘‘हां, खुशी तो है पर पता नहीं बेटा होगा या…’’ महाराज कुछ सोचते हुए बोले.

‘‘आप को क्या चाहिए…बेटा या बेटी?’’

‘‘बेटा…पहले तो बेटा ही होना चाहिए,’’ महाराज तपाक से बोले.

‘‘तो फिर बेटा ही होगा,’’ कह कर सुनीता हंसने लगी.

‘‘और अगर बेटी हुई तो?’’

‘‘फिर आप जैसा चाहेंगे वैसा ही होगा. मैं आप की पत्नी हूं. मेरा सुख तो आप के साथ ही है. आप नहीं चाहेंगे तो बेटी पैदा नहीं होगी. मैं बस, आप को सुखी और खुश देखना चाहती हूं,’’ कह कर वह उन्हें प्यार से देखने लगी.

इधर महाराज को 6 दिन के लिए एक विशेष शिविर में भाग लेने मध्य प्रदेश जाना पड़ गया. सुनीता को तो ऐसे मौके की ही तलाश थी. इसी बीच सुनीता ने अपने रहने के स्थान पर अभूतपूर्व परिवर्तन कर दिया. इतालवी झूमर व लाइटें, बेहद खूबसूरत नक्काशीदार पलंग, शृंगार की मेज पर विदेशी इत्र एवं पाउडर, गद्देदार सोफे और इंच भर धंसता कालीन…यह सबकुछ इसलिए कि सुनीता चाहती थी कि महाराज जब वापस यहां आएं तो बस, यहीं के हो कर रह जाएं.

उस दिन शाम को जब महाराज शिविर से लौट कर थकेहारे आए तो सुनीता बेहद आकर्षक बनावशृंगार के साथ आभूषणों से लदी खूबसूरत कपड़ों में महाराज का स्वागत करने के लिए आगे बढ़ी. वह उसे देखते ही रह गए. उन्होंने कल्पना भी नहीं की थी कि सुनीता इतनी खूबसूरत भी हो सकती है.

‘‘बहुत थक गए होंगे आप,’’ महाराज के एकदम पास आ कर सुनीता बोली, ‘‘पहले फ्रैश हो जाइए, तब तक मैं चाय ले कर आती हूं.’’

सुनीता जब तक चाय ले कर आई तब तक महाराज आसपास की वस्तुओं को बडे़ ध्यान से देखते रहे. उन की आंखों की भाषा को पढ़ते हुए वह बोली, ‘‘अब यह मत कहिएगा कि इतना सामान कहां से लिया और महंगा है. आप कमाते किस लिए हैं…उस भविष्य के लिए जो आप ने देखा ही नहीं या उस वर्तमान के लिए जो आप जी नहीं पा रहे हैं. बस, सुबह से शाम तक आश्रम और साधकों को लुभाने के लिए सफेद कुर्ताधोती या गेरुए वस्त्र. इस से बाहर भी कोई दुनिया है,’’ इतना कह कर सुनीता उन्हें प्यार से सहलाने लगी, ‘‘अच्छा, अब आप स्नान कर लीजिए. मैं अपने हाथ से आप के लिए खाना लगाती हूं. बहुत हो गया सेवकों के हाथ से खाना खाते हुए,’’ सुनीता ने अलमारी से एक सिल्क का कुरता निकाला और महाराज को पकड़ा दिया.

‘‘अरे, यह सब?’’ आश्चर्य और प्रसन्नता से उन्होंने पूछा.

‘‘क्यों, अच्छा नहीं है क्या? यहां पर आप कोई महंत या महात्मा तो हैं नहीं. मैं जैसा चाहूंगी वैसा आप को रखूंगी,’’ कह कर उस ने महाराज के गालों पर चुंबन अंकित कर दिया.

महाराज आज सुबह बहुत ही तरोताजा लग रहे थे. कमरे के साथ लगे लान में वह अखबार पढ़ रहे थे. तभी सुनीता चाय की ट्रे करीने से सजा कर उन के पास ले आई और महाराज की तरफ तिरछी नजर से देखते हुए बोली, ‘‘आज तो आप बहुत ही फ्रेश लग रहे हैं. कैसी लगी आप को मेरी पसंद और घर का बदला हुआ स्वरूप?’’

‘‘घर से ज्यादा तो तुम्हारे बदले हुए रूप ने मुझे प्रभावित किया है,’’ महाराज ने शरारत भरी नजरों से सुनीता को देखते हुए कहा, ‘‘आज मैं सचमुच तुम्हारी पसंद से बहुत खुश हूं. तुम मुझे पहले क्यों नहीं मिलीं.’’

‘‘महाराजजी, मेरा बस चले तो आश्रम की व्यवस्था और सुंदरता की कायापलट कर दूं. इतनी दूरदूर से लोग आप से मिलने आते हैं. उन्हें भी सुखसुविधाएं मिलनी चाहिए. आते ही ठंडा पानी, बैठने के लिए आरामदायक स्थान और भोजन आदि की व्यवस्था…आप का भी मान बढे़गा और लोग भी खुशीखुशी आएंगे.’’

‘‘पर इस के लिए इतना धन चाहिए कि…’’

‘‘आप को धन की क्या कमी है, महाराज,’’ सुनीता बीच में बात काटते हुए बोली, ‘‘लक्ष्मी तो आप पर विशेष रूप से मेहरबान है.’’

महाराज अपनी प्रशंसा सुन कर मुसकराने लगे…फिर बोले, ‘‘अच्छा, मैं अपनी समिति के सदस्यों और अंतरंग सेवकों से सलाह ले लूं.’’

‘‘अंतरंग सदस्यों से? महाराज, यह आश्रम आप का है. सलाह सब की लें पर निर्णय आप का ही होना चाहिए. यदि हर काम उन से सलाह ले कर करेंगे तो देखना एक दिन सब आप को लूट खाएंगे. आप तो बस, अपना निर्णय सुनाइए.’’

‘‘सुनीता, इस आश्रम के नियमों में तो मैं कोई परिवर्तन नहीं कर सकता हूं, हां, शहर के दूसरी तरफ मुझे एक भक्त ने 2 बीघा जमीन दान मेें दी है. तुम उस पर जैसा चाहो वैसा करो. उस के डिजाइन, रखरखाव में जैसा परिवर्तन चाहोगी वैसा कर सकती हो. तुम चाहोगी तो कुछ सेवक भी वहां नियुक्त कर दूंगा.’’

सुनीता को तो जैसे मनचाही खुशी मिल गई.

महाराज तैयार हो कर आश्रम जाने लगे तो सुनीता सहमे स्वर में बोली, ‘‘कल मैं आप के पीछे आप की आज्ञा के बिना पास के क्लीनिक में गई थी. बाकी तो सब ठीक है पर महाराज, बडे़ खेद के साथ कहना पड़ रहा है कि गर्भस्थ शिशु लड़की ही है.’’

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‘‘लड़की…ओफ,’’ महाराज ने ऐसे कहा जैसे कुछ जानते ही न हों.

‘‘मैं जानती थी कि आप को यह सुन कर दुख होगा क्योंकि आप बेटा चाहते हैं, इसलिए मैं ने डाक्टर को कह दिया कि हमें लड़की नहीं चाहिए. डाक्टर ने कहा है कि इस काम के लिए कुछ दिन और इंतजार करना पडे़गा और 5 हजार रुपए का खर्चा आएगा.’’

सुनीता अच्छी तरह जानती थी कि यदि खुद उस ने ऐसा नहीं कहा तो किसी दिन वह स्वयं उसे किसी न किसी बहाने किसी बडे़ क्लीनिक या अस्पताल में ले जाएंगे. तब वह दीनहीन बन कर अपना सर्वस्व समाप्त कर लेगी.

महाराज ने सोचा भी नहीं था कि इतनी आसानी से सुनीता गर्भपात के लिए तैयार हो जाएगी. उन्होंने एक भेदभरी नजर से उस को देखा फिर अंक में भर कर बोले, ‘‘तुम दुख न मनाओ…हां, अपना ध्यान रखना. मैं तुम जैसी पत्नी को पा कर धन्य हो गया हूं.’’

धीरेधीरे समय बीतता गया. महाराज से अति निकटता प्राप्त करने का सुनीता ने कोई भी अवसर नहीं गंवाया. नए आश्रम की बागडोर भी महाराज ने उसे दे दी, जैसा कि वह चाहती थी. इतना ही नहीं दिनप्रतिदिन उस के चेहरे पर निखार आता गया और वह नएनए गहनों में इठलाती, इतराती घूमती रहती.

एक दिन वही हुआ जो होना था. दोपहर को सुनीता अपने कमरे में बैठी फोन पर बात कर रही थी कि तभी महाराज तेजी से आए और सेफ की चाबियां मांगने लगे.

‘‘क्यों, ऐसा क्या हो गया आज. आप 2 मिनट विश्राम तो कीजिए,’’ कह कर वह तेजी से स्थिति को भांप गई और फोन को पास ही में रख कर खड़ी हो गई.

‘‘होना क्या था. मेरा एक 10 लाख का चेक बैंक से वापस आ गया है. समझ में नहीं आता कि ऐसा कैसे हो गया जबकि बैंक में बैलेंस भी था.’’

‘‘इतने बडे़ अमाउंट का चेक आप ने किसे दे दिया? आप ने तो कभी बताया ही नहीं.’’

‘‘यह सब बताने का समय मेरे पास नहीं है. पैसा आज न दिया तो मेरे हाथ से बहुत बड़ी जमीन निकल जाएगी.’’

‘‘पर सेफ में इतने रुपए कहां हैं,’’ सुनीता ने कहा.

‘‘क्यों?’’ महाराज की भौंहें तन गईं. 20 लाख से अधिक रकम होनी चाहिए वहां तो.

‘‘महाराजजी, आप को याद नहीं कि आप से पूछ कर ही तो यहां की साजसज्जा और अपने लिए रुपए लिए थे…और फिर नए आश्रम का काम भी तो…’’

‘‘सुनीता,’’ महाराज अपने क्रोध को नियंत्रित न कर पाए, ‘‘मैं कल उस आश्रम में भी गया था. वहां सब मिला कर 5 लाख से ऊपर खर्च नहीं हुए होंगे.’’

‘‘तो मैं ने कौन से अपने लिए रख लिए हैं. सबकुछ तो आप के सामने है. तब तो आप की जबान मेरी तारीफ करते नहीं थकती थी और अब…’’ सुनीता तुनक कर बोली.

‘‘अब समझ में आया कि इन सारे खर्चों की आड़ में तुम ने मेरा काफी पैसा ले लिया है,’’ कह कर महाराजजी तेजी से सेफ खोल कर देखने लगे. वहां केवल 50 हजार रुपए कैश रखे थे. वह माथा पकड़ कर वहीं बैठ गए फिर तेज स्वर में बोले, ‘‘सचसच बताओ, सुनीता, तुम ने ये सारे रुपए कहां रखे हैं. एक तो मेरा सारा बैंक का रुपया सावित्री ने न जाने कहांकहां खर्च कर दिया और ऊपर से तुम ने.’’

‘‘सावित्री…ये सावित्री कौन है?’’

‘‘सावित्री, मेरी पत्नी… तुम नहीं जानतीं क्या?’’

‘‘तो मैं कौन हूं? आप ने कभी बताया नहीं कि आप ने दूसरा विवाह भी किया है. मुझे भी धोखे में रखा है.’’

‘‘तो तुम उसी धोखे का बदला ले रही हो मुझ से? जितना मानसम्मान, धन, ऐश्वर्य मैं ने तुम को दिया है तुम्हें सात जन्मों में भी नसीब न होता.’’

‘‘आप की पत्नी होने से तो अच्छा था मेरे पिता कोई अंधा, बहरा, लूलालंगड़ा दूल्हा ढूंढ़ देते तो मैं खुद को ज्यादा तकदीर वाली समझती.’’

‘‘मैं ने इतनी मेहनत से जो पैसा जमा किया है अब समझ में आया, तुम ने क्या किया.’’

‘‘मेहनत से या लोगों को बेवकूफ बना कर. आप महात्मा हैं या ढोंगी. अपना स्वार्थ सिद्ध करने के लिए कैसा घिनौना खेल खेल रहे हैं,’’ सुनीता का स्वर जरूरत से ज्यादा तेज हो गया, ‘‘लोगों को पुत्र होने के मंत्र और भस्म देते हैं. जरा स्वयं पर भी तो उसे आजमाइए तो पता चले. आप की जानकारी के लिए बता दूं कि स्त्री केवल एक उपजाऊ भूमि होती है. और बेटा या बेटी पैदा करने के लिए जिस बीज की जरूरत होती है वह पुरुष के पास होता है, स्त्री के पास नहीं… तुम दोष स्त्री को देते हो. मैं इन सारे तथ्यों को लोगों को बताऊंगी ताकि लोगों के विश्वास को धक्का न पहुंचे, जो अपना एकएक पैसा जोड़ कर बड़ी श्रद्धा से आप के चरणों में भेंट चढ़ाते हैं.

‘‘आप ने सारे तथ्यों को छिपा कर मुझ से विवाह किया. मुझे पहले ही मालूम होता कि आप विवाहित और 3 लड़कियों के पिता हैं तो मैं कभी भी विवाह न करती और आप ने मुझ से केवल इसीलिए विवाह किया कि मैं बेटा पैदा कर सकूं. आप के शिष्यों ने पता नहीं क्याक्या झूठ बोल कर मेरे गरीब मातापिता को भ्रम में रखा और जब तक मुझे सचाई का पता चलता, बहुत देर हो चुकी थी.

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‘‘जिस औरत ने मुझे सहारा दिया और मुसीबत के क्षणों में मेरा साथ दिया, जिस के कहने पर यह सारा प्रेम प्रपंच रचा गया वह आप के पीछे खड़ी है. मैं तो एक साधारण औरत ही थी.’’

महाराज ने पीछे मुड़ कर देखा तो उन की पत्नी सावित्री खड़ी थी. महाराज एकदम अचंभित से हो गए.

सावित्री उन्हें तीखी नजरों से देखने लगी, ‘‘महाराज, जिस तरह आप ने लोगों से धन जमा किया है, हम ने भी उसी प्रकार आप से ले लिया है. आप जहां शिकायत करना चाहें करें पर इतना ध्यान जरूर रखें कि आप के कारनामे सुनने के लिए बाहर समाचारपत्र और टीवी चैनल वाले आप का इंतजार कर रहे हैं.’’

महाराज को ऐसा कोई रास्ता नहीं मिल रहा था कि वह बाहर जा सकें. खिड़की का परदा हटा कर देखा तो आश्रम के बाहर हजारों व्यक्तियों की भीड़ उमड़ पड़ी थी जो काफी गुस्से में थी.

सावित्री ने सुनीता के सिर पर हाथ रख कर कहा, ‘‘अब तुम मेरे संरक्षण में हो. तुम्हें घबराने की कोई जरूरत नहीं है. जिस इनसान को भीड़ से बचने की चिंता है वह हमारा कुछ नहीं बिगाड़ सकता.’

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