‘जिहाद’ के नाम पर पुलिसिया जुल्म

‘जिहाद’ शब्द किसी भी लिहाज से विलेन नहीं है, बल्कि अगर इस के मतलब पर बात की जाए तो पता चलेगा कि ‘जिहाद’ एक अरबी शब्द है, जिस का मतलब है किसी अच्छे मकसद के लिए जद्दोजेहद करना.

लेकिन इस बात को भी नहीं नकारा जा सकता है कि ‘जिहाद’ के नाम पर बहुत से भटके हुए मुस्लिम ने दुनिया में आतंक मचाया है, लेकिन साथ ही एक कड़वा सच यह भी है कि इस शब्द का सहारा ले कर पुलिस ने बहुत से मुस्लिमों पर जोरजुल्म भी किए हैं.

ऐसे ही एक मामले में महाराष्ट्र की अकोला कोर्ट ने ‘जिहाद’ के नाम पर

3 मुस्लिम नौजवानों को यह कहते हुए बरी कर दिया था कि ‘जिहाद’ शब्द के इस्तेमाल भर से किसी को आतंकी नहीं ठहराया जा सकता है.

अकोला की इस अदालत के स्पैशल जज एएस जाधव ने यह टिप्पणी गैरकानूनी गतिविधि रोकथाम कानून, शस्त्र अधिनियम और बांबे पुलिस ऐक्ट के तहत 3 आरोपियों के खिलाफ एक मामले में की थी.

यह मामला कुछ यों था कि अकोला जिले के पुसाद इलाके में 25 सितंबर, 2015 को बकरीद के मौके पर एक मसजिद के बाहर पुलिस वालों पर हुए हमले में 24 साल के अब्दुल रज्जाक और शोएब खान के साथसाथ 26 साल के सलीम मलिक को गिरफ्तार किया गया था. इन तीनों पर आईपीसी की अलगअलग धाराओं के तहत कई मामले दर्ज किए गए थे.

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इस मामले में पब्लिक प्रोसीक्यूटर

ने आरोप लगाए थे कि अब्दुल रज्जाक मसजिद पहुंचा, एक चाकू निकाला और उस ने ड्यूटी पर मौजूद 2 पुलिस वालों पर हमला कर दिया. उस ने हमले से पहले कहा था, ‘तुम ने गौहत्या कानून लागू किया इसलिए मैं तुम को जान से मार डालूंगा.’

एटीएस ने तो दावा किया था कि ये लोग मुस्लिम नौजवानों को आतंकी संगठनों में शामिल होने के लिए प्रभावित करने के आरोपी थे.

इस आरोप पर जज एएस जाधव ने कहा कि ऐसा लगता है कि आरोपी अब्दुल रज्जाक ने गौहत्या पर पाबंदी को ले कर हिंसा के जरीए सरकार और कुछ हिंदू संगठनों के खिलाफ अपना

गुस्सा जाहिर किया था. बेशक उस ने ‘जिहाद’ जैसे शब्द का इस्तेमाल किया होगा, लेकिन इस का मतलब यह नहीं है कि महज ‘जिहाद’ शब्द का इस्तेमाल करने से उसे आतंकवादी करार देना चाहिए.

कोर्ट ने तीनों आरोपियों को पुलिस वालों को चोट पहुंचाने के सिलसिले में अब्दुल रज्जाक को कुसूरवार ठहराते हुए 3 साल कैद की सजा सुनाई गई थी और चूंकि वह 25 सितंबर, 2015 से जेल में था और कैद में 3 साल गुजार चुका था, इसलिए अदालत ने उसे रिहा कर दिया.

यहां तो कोर्ट ने ‘जिहाद’ शब्द का मतलब बताते हुए इस केस में आरोपियों को एक तरह से बड़ी सजा मिलने से बचा लिया था, लेकिन बहुत से ऐसे मामले भी होते हैं जिन में पुलिस अपना पक्ष मजबूत करने के लिए लोगों पर झूठे आरोप भी लगा देती है.

यह मामला ‘जिहाद’ से तो जुड़ा नहीं है, पर है पूरी तरह से फर्जी. दरअसल, साल 2016 में 1 अक्तूबर को दिल्ली पुलिस ने नकली सिक्के बनाने के आरोप में दिल्ली के एक कारोबारी और दादरी के रहने वाले नरेश को गिरफ्तार किया था. बाद में नरेश ने जमानत पर जेल से बाहर आ कर दिल्ली पुलिस को बताया था कि उन का नकली सिक्के बनाने का कोई गैरकानूनी कारोबार नहीं है, बल्कि उन का तो बवाना इलाके में कैमिकल बनाने का धंधा है.

नरेश ने बताया कि 30 सितंबर को उन के घर समरपाल नाम का एक इंस्पैक्टर आया था और उन्हें पकड़ कर बवाना क्षेत्र में उन की कैमिकल फैक्टरी में ले गया था. वहां जा कर उस इंस्पैक्टर ने बताया कि इस फैक्टरी की पहली मंजिल पर नकली सिक्के बनते हैं.

उस ने इस मामले को रफादफा करने के एवज में नरेश से 25 लाख रुपए की घूस मांगते हुए धमकी दी कि अगर यह रकम नहीं दी गई तो उन्हें फंसा दिया जाएगा.

नरेश ने आगे बताया कि उन की फैक्टरी ग्राउंड फ्लोर और बेसमैंट में है. पहली मंजिल से उन का कोई लेनादेना नहीं है. लेकिन पुलिस ने उन की एक न सुनी और उन्हें पकड़ कर थाने ले गई.

इस दौरान पुलिस के जुल्म से तंग आ कर नरेश ने अपनी पत्नी से कह कर बैंक में रखे 9 लाख रुपए निकलवाए और पुलिस को दिए. इस के बाद भी पुलिस नहीं पसीजी और नरेश के साले के जरीए फिर से रुपए मांगे, लेकिन नरेश के पास और पैसे नहीं थे.

कारोबारी नरेश ने आगे बताया कि इंस्पैक्टर समरपाल ने उन पर नकली सिक्कों का कारोबार करने का केस बना कर जेल भिजवा दिया. उन्हें तकरीबन 42 दिनों तक दिल्ली की जेल में रहना पड़ा था.

नरेश की इस शिकायत पर पुलिस ने इंस्पैक्टर समरपाल के खिलाफ मामला दर्ज किया और उसे लाइन हाजिर भी किया. नरेश के आरोपों की हकीकत सामने आने के बाद इंस्पैक्टर समरपाल को बाद में सस्पैंड कर उस के खिलाफ केस दर्ज किया गया.

ऐसे न जाने कितने मामले होते हैं जहां पुलिस झूठे केस बना कर लोगों को सताती है, उन्हें पैसे से भी लूटती है. अगर मामला 2 धर्मों के लड़कालड़की के प्यार का हो तो उसे ‘लव जिहाद’ बनाने में देर नहीं लगाती है.

यह बात सितंबर, 2018 की है. उत्तर प्रदेश के मेरठ से पुलिस की गुंडागर्दी का एक वीडियो सामने आया था जिस में एक मुस्लिम लड़के से ताल्लुक होने पर कुछ पुलिस वालों ने हिंदू धर्म की छात्रा के साथ न सिर्फ बदतमीजी की थी, बल्कि उस पर अपने साथी छात्र के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने का दबाव भी बनाया था.

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पीडि़ता ने बताया कि वह अपने दोस्त के साथ उस के घर पढ़ने गई थी, जहां हिंदू संगठन के कुछ कार्यकर्ताओं ने पहुंच कर बवाल मचाया. इस के बाद वहां पहुंची पुलिस उन दोनों को अपने साथ ले गई थी.

पीडि़ता ने आगे बताया, ‘पुलिस मुझे और मेरे दोस्त को अलगअलग गाड़ी

में ले कर गई. मैं जिस गाड़ी में थी, उस में मौजूद पुलिस वालों ने मेरे साथ बदतमीजी की. मुझ पर मुस्लिम लड़के से रिश्ते होने का आरोप लगाया.

‘मेरा नकाब उतरवाया गया और गाड़ी में बैठे पुलिस वाले ने मेरा

वीडियो बनाया और मेरे खिलाफ

गंदी भाषा का इस्तेमाल किया…

‘जब मुझे थाने ले जाया गया तो वहां पुलिस वालों ने मुझ पर लड़के के खिलाफ केस दर्ज कराने के लिए कहा. मैं ने उन से कहा कि हमारे बीच कोई गलत संबंध नहीं हैं, इसलिए मैं ऐसा नहीं कर सकती. इस के बाद पुलिस वालों ने कहा कि हम तुम्हें कुछ नहीं कहेंगे, बस तुम लड़के के खिलाफ केस दर्ज करा दो, क्योंकि वह मुस्लिम है…

‘जब मेरे घर वाले वहां पहुंचे तो पुलिस ने उन से भी मेरे दोस्त के खिलाफ केस करने के लिए कहा, लेकिन मेरे घर वालों ने भी इनकार कर दिया.’

इस पूरे वाकिए पर एडीजी कानून व्यवस्था आनंद कुमार ने पुलिस वालों की इस हरकत को घोर गैरजिम्मेदाराना बताते हुए कहा कि पुलिस वालों ने न सिर्फ मारपीट की है, बल्कि खुद ही वीडियो बना कर वायरल भी किया है.

आरोपी 3 पुलिस वालों को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया गया, जबकि होमगार्ड के एक जवान को नौकरी से बरखास्त कर दिया गया.

जैसा इन मामलों में हुआ है, वैसा होना नहीं चाहिए और अगर यह साबित हो जाए कि पुलिस ही मामले को तोड़मरोड़ कर धार्मिक या सामाजिक उन्माद फैलाने का काम कर रही है, तो उस पर कड़ी कार्यवाही होनी चाहिए.

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ड्यूटी से निलंबित या लाइन हाजिर कर देना कोई सजा नहीं है, बल्कि यह तो उन्हें एक तरह से मदद पहुंचाई जाती है कि मामला ठंडा होने के बाद ड्यूटी पर बहाली हो जाएगी. पुलिस जनता की हिफाजत और समाज में शांति बनाए रखने के लिए बनाई गई है, उसे अपनी हद का पता होना चाहिए, तभी लोग उस की इज्जत करेंगे, नहीं तो बीच चौराहे पर तलवार निकाल कर लोहा लेने को मजबूर हो जाएंगे.

(कहानी सौजन्य मनोहर कहानी)

‘बाड़ों’ में बसते बाहरी मजदूर

लेखक-अनिल अनूप

जैसे यहां की साइकिल इंडस्ट्री में तो वे उतने ज्यादा नहीं हैं, जितने हौजरी में या लोहे के पुरजे वगैरह बनाने में, पर वे रिकशा चलाने वालों में भारी बहुमत में हैं, तो ठेलारेहड़ी, छोटी दुकान लगाने के मामले में एकदम कम हैं. दिल्ली की तरह यहां की दुकानों में सहायक के तौर पर बाहरी मजदूरों को रखने का चलन अभी ज्यादा नहीं हुआ है.

दिल्ली से पंजाब की तरफ रेल या बस से आगे बढि़ए तो 2 चौंकाने वाली बातें दिखती हैं. दोनों तरफ दूरदूर तक धान के लहलहाते खेत और उन की खुशबू यह भरम पैदा कर सकती है कि कहीं हम धान उगाने, भात खाने वाले प्रदेश में तो नहीं पहुंच गए हैं.

गेहूं और रबी के इलाके का यह सीन चौंकाता है. जगहजगह पंप से पानी सींचते, खाद छींटते, धान रोपतेकाटते लोगों पर भी गौर करिएगा तो वे भी पंजाब और हरियाणा के लंबेतगड़े जैसे लोग नहीं लगेंगे. धान के खेत तो दिल्ली से बाहर निकलते ही शुरू हो जाते हैं पर असली ‘धनहर’ इलाका पानीपत, करनाल, अंबाला से शुरू होता है और हरियाणा के बाद पूरे पंजाब में यह नजारा दिखता है.

लुधियाना के आसपास बाहरी मजदूरों के ‘क्वार्टर’ मुरगी के दड़बों जैसे होते हैं. 7 या 8 फुट लंबे और इतने ही चोड़े कमरों की कतारें इन जैसे मजदूरों के लिए बनवा दी गई हैं. ये ‘क्वार्टर’ भी ऐसे ही 2 कतार वाले होते हैं. बीच में थोड़ी आंगननुमा लंबी खाली जगह होती है. 2 दर्जन कमरों के लिए एक हैंडपंप, एक शौचालय बना होता है. ‘क्वार्टर’ ज्यादा हैं तो उसी हिसाब से इन ‘सुविधाओं’ की तादाद भी ज्यादा होती है. अगर जगह कम पड़ रही हो तो कमरों को 2-3 मंजिल तक ऊपर उठा दिया जाता है.

लुधियाना की बाबा दीप सिंह कालोनी, जिसे लोकल लोग ‘भैया कालोनी’ कहते हैं, में ऐसे 108 कमरों के तिमंजिले ‘बाड़े’ हैं.

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बीएमएस के लोकल मजदूर नेता रामकृष्ण आजाद ने बताया कि कंगनवाल रोड पर 422 कमरों का ‘बाड़ा’ पूरे शहर में सब से बड़ा ‘बाड़ा’ है.

बाबा दीप सिंह कालोनी, कंगनवाल रोड, गिल रोड, इंडस्ट्रियल एरिया, ट्रांसपोर्ट नगर, सिमराला चौक, फोकल पौइंट, हीरा नगर, मोती नगर, भगत सिंह कालोनी, शेरपुर, मुसलिम कालोनी वगैरह में ऐसे ही ‘बाड़े’ बने हैं.

‘बाड़ा’ या ‘बाड़’ शब्द हिंदी में एकदम अलग मतलब बताता है. पंजाबी में मजदूरों वाली इस तरह की रिहाइश को ‘बाड़ा’ या ‘बाड़’ कहते हैं.

यह शब्द आज पहली बार सामने नहीं आया है. जब खुद पंजाब के लोगों ने पिछली सदी के आखिर और इस सदी की शुरुआत में दक्षिणपश्चिम में बनने वाली नहरों से जुड़ी कालोेनियों में रहना शुरू किया था, तो वे खुद भी उन्हें ‘बाड़ा’ ही कहा करते थे. बाहरी मजदूर इन्हें ‘क्वार्टर’ कहते हैं.

और जब वे लोग ‘क्वार्टर’, ‘ड्यूटी’, ‘ओवरटाइम’, ‘लंच’, ‘औफ’ जैसे शब्द कहते हैं तो इन का सिर्फ एक साधारण मतलब नहीं रहता. उस मतलब में तो इन 6-7 लोगों वाले एक कमरे को ‘क्वार्टर’ नहीं कहा जा सकता. इन शब्दों के जरीए ये लोग एक सांस्कृतिक फासले को भरने की कोशिश भी करते हैं. यह फासला शहरगांव, बिहारपंजाब, अमीरगरीब, वाला तो है ही, अपने गांव के बड़े लोगों और अपने बीच के फर्क का भी है.

इन शब्दों को अगर वे उन के सही मतलब में समझते तो उन को पाने की कोशिश भी करते. न्यूनतम मजदूरी, महंगाई भत्ता, प्रोविडैंट फंड, ईएसआई, ग्रैच्यूटी, बोनस, छुट्टियां जैसी बुनियादी बातों की परवाह भी उन्हें नहीं होती. लुधियाना जैसे शहर में, जिसे ‘पंजाब का मैनचैस्टर’ कहा जाता है, संगठित क्षेत्र में सालों से काम करने के बावजूद यह हालत थी.

गांव में मजदूरों से मिलने के बाद लुधियाना का उन का पता और पहुंचने का निर्देश लेने के बावजूद उन्हें ढूंढ़ लेना आसान नहीं था. कभी लोधियों के 2 सामंतों द्वारा सतलुज के पास बसाई गई लोधियान बस्ती आज पंजाब ही नहीं, बल्कि पूरे उत्तरपश्चिमी भारत में दिल्ली के बाद सब से बड़ा शहर बन गई है और 14 लाख बाहरी मजदूरों के चलते पंजाब में उत्पादन का सब से बड़ा ठिकाना. इस में बड़ेबड़ों को जब अपनी पहचान बनाने के लिए मशक्कत करनी पड़ती है तो फिर अनपढ़, पिछड़े, कमजोर, बाहरी मजदूरों को कौन पूछता है.

ज्यादातर पते किसी किराना दुकानदार या गली के डाक्टर के मारफत के होते हैं जिन की सेवाएं वे मजदूर लेते हैं. ये दुकानदारडाक्टर भी नाम और चेहरे, दोनों को एकसाथ देखे बगैर मजदूर को नहीं पहचान सकते हैं.

अपनी फैक्टरियों का पता ये लोग देते नहीं. सो, दुकानदारडाक्टर को भी जब तक मजदूर के मूल जिले, उस के गांव, उस के समूह, उस के काम के बारे में न बताया जाए, वे भी कोई मदद करने की हालत में नहीं रहते. जब इतने सारे ब्योरे और बैकग्राउंड बताने पर उस को सही पते का अंदाजा होता है तो वह आप को किसी ‘बाड़े’ में भेज देगा या भिजवा देगा.

उस ‘बाड़े’ में अपने मजदूर का कमरा पता करने के लिए आप को फिर से यह सारी मशक्कत करनी पड़ती है. उस के कमरे में पहुंचते ही कई धारणाएं एकसाथ ढह जाती हैं. ठीकठाक कमाई करता बाहरी मजदूर हर महीने अपने गांव में जितनी औसत रकम (8,000 रुपए से 12,000 रुपए) भेजता है, उस से किसी को भी यह लगेगा कि वह कम से कम इस की दोगुनी रकम कमाता ही होगा. परदेश में रहना, खानापहनना,  आनाजाना, लेनदेन सब लगा ही रहता है और आदमी लाख कम खर्च करे, 8-10 हजार रुपए से कम में क्या रहेगा.

अपनी कमाई और रहने के बारे में ये लोग गांव में कुछ ऐसा ही बताते भी हैं. पर वहां पहुंचते ही लगा कि अपनी कमाई के बारे में डींग हांकने का हक सिर्फ शहरी और पढ़ेलिखे लोगों को ही नहीं है, गांव में कमाई और काम के बारे में शेखी बघारने के पीछे भी कहीं न कहीं गांव के बड़े लोगों से फासले को कम कर के दिखाने की सोच भी काम करती है.

उस कमरे में जब बैठने को कहा जाता है तो यह समझना मुश्किल हो जाता है कि कहां और कैसे बैठा जाए. नीचे कुछ भी नहीं बिछा होता. जहांतहां मुड़ी पड़ी बोरियां होती हैं या टाट, पैकिंग के काम आने वाली पल्ली.

पूरे के पूरे ‘बाड़े’ (2 से 3 दर्जन कमरों वाले) में 2-3 से ज्यादा खाट नहीं होंगी. कपड़ों के नाम पर जितने आदमी उतनी जोड़ी लुंगी और एकाध और कपड़ा. उन्हीं में से एक पहनना, एक ओढ़नाबिछाना. रोज नहाते समय पहले वाले कपड़े को पानी में खंगाल लेना.

बैठने के साथ ही जब आप परिचित हो कर कमरे में रहने वालों की संख्या और किराए के बारे में पूछेंगे तो मालूम होगा कि किराया है 3 से साढ़े 3 सौ रुपए. 60 वाट के बल्ब से ऊपर का बल्ब लगे, पंखा लगे तो 200 रुपए महीना ऊपर से. रहने के मामले में लालाजी को बताएंगे कि 3-4 लोग रहेंगे, पर रहेंगे 6-7 लोग जिस से प्रति व्यक्ति किराया कम पड़े.

इतने लोग तो कमरे में सो भी नहीं सकते. इस का सीधा सा जवाब होता है कि बाहर या छत पर सो जाते हैं. हवा भी लगती है. शिफ्ट ड्यूटी होती है तो सर्दियों में भी दिक्कत नहीं रहती.

सुबह ही पेट भर लेना

मुरगे के बांग देने के साथ ही उठ जाना है. रोटी बना लेनी है. जितने आदमी, उतने चूल्हे. नहाधो कर भरपेट खा लेना है. 4-6 रोटी साथ ले लेनी है. ‘लंच’ के समय छोले, सब्जी कुछ ले कर रोटी खा लेते हैं. दूध कोई नहीं लेता. महीने में एकाध बार मांसमछली हो गई तो बहुत है. देर रात को घर लौटने पर भात या खिचड़ी बनती है. जितना खाया गया, खा लिया बाकी नाली या कुत्ते को दे दिया. 12-14 घंटे काम की थकान सब भुला देती है.

अब हर ‘बाड़े’ में 1-2 परिवार भी दिखने लगे हैं. अपने गांवों के मजदूरों वाले गिल रोड के ‘बाड़े’ में भी एक परिवार स्थायी रूप से रहता है, पर वह पूर्वी उत्तर प्रदेश का है और परिवार का मुखिया फल का ठेला लगाता है.

पूरे लुधियाना शहर के सारे बाहरी मजदूर इसी तरह नहीं रहते. कुछ छोटे प्लाट ले कर मकान बना कर भी रहने लगे हैं. कुछ ने झुग्गियां डालनी शुरू कर दी हैं. कुछ मालिकों की फैक्टरियोंदुकानों में भी रह लेते हैं, पर ज्यादातर ‘बाड़ों’ में ही रहते हैं. अनुपात और तादाद के हिसाब से देखें तो जमीन ले कर बसने वालों में पूर्वी उत्तर प्रदेश, मैदानी दक्षिणी बिहार वाले लोग ज्यादा निकलेंगे. झुग्गियों में राजस्थानी मजदूर होंगे जो आमतौर पर परिवार के साथ ही घर से निकलते हैं. ‘बाड़े’ या ‘क्वार्टर’ में ज्यादातर बिहारी रहते हैं.

ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो मानते हैं कि जिस दिन इन ‘बाड़ों’ में ज्यादा परिवार और उन के साथ बकरीसूअर जैसे जानवर भी आएंगे उसी दिन ये महामारियों का डेरा बन जाएंगे. अभी तो सफाईनाली, फ्लशशौचालय, स्नानघर वगैरह का इंतजाम न होने पर भी सिर्फ अकेले मर्दों के रहने से थोड़ीबहुत राहत रहती है. दिनभर घर खाली हो, ‘बाड़ा’ खाली हो तो हवासूरज ही बहुत सफाई कर देते हैं.

बाबा दीप सिंह कालोनी के जिस 108 कमरों वाले ‘बाड़े’ की चर्चा पहले की गई है उस में तकरीबन 425 लोग थे. चारों ओर से घिरे इस ‘बाड़े’ की छत पर 10 शौचालय और 10 हैंडपंप थे. खुला होने से मजदूर शौच वगैरह के लिए बाहर भी जा सकते थे.

इंडस्ट्रियल एरिया में बने 300 कमरों से ज्यादा का ‘बाड़ा’ जवाहर बिल्डिंग, जो मुश्किल से 500 वर्ग गज के प्लाट पर बना होगा, मजदूरों के सुबह काम पर निकलतेनिकलते कीचड़ से पूरा सन जाता है जिस में मलमूत्र, कचरा तो होता ही है, रात में बचे खाने का भी अपना हिस्सा रहता है. इस में चार पैसे का डीडीटी पाउडर कौन डालेगा, कोई नहीं जानता.

आप चाहे जिस ‘बाड़े’ में जाइए, जिस बस्ती में जाइए, इन कमरों के मालिक नहीं मिलेंगे. ये अकसर बड़े लोग हैं जिन्होंने बाड़ों का चार्ज आमतौर पर किराना वालों, राशन वालों को सौंप दिया है और वे हर महीने उन्हीं से पूरी रकम वसूल लेते हैं.

किराना वालों का लालच यह होता है कि जो ‘बाड़ा’ उन के कंट्रोल में रहता है उस के सभी किराएदारों को उन की दुकान से ही राशन और दूसरा सामान लेना होता है. इस में गड़बड़ का मतलब है अगले ही दिन कमरा छोड़ना.

इस से मुनाफाखोरी की गुंजाइश काफी बढ़ जाती है. जिस 108 कमरे वाले ‘बाड़े’ का जिक्र पहले किया गया है वहां कुल 413 लोग रहते मिले और सिर्फ इन सब की खरीदारी से ही कितना मुनाफा एक जगह से होता होगा, यह समझा जा सकता है.

20 साल पहले यहां वही चावल 9 रुपए किलो था जो वैसे साढ़े 7-8 रुपए में मिल रहा था. आज बाजार में चावल 28-30 रुपए किलो है तो यहां 35 रुपए से कम नहीं है. खुले बाजार में जब मिट्टी का तेल 8 रुपए लिटर था तो यहां 10 रुपए लिटर. आज यह भी 65 रुपए लिटर है जो एक हफ्ते चल जाता है. शायद ही किसी मजदूर का राशनकार्ड बना दिया, तो राशन की दुकान से कंट्रोल रेट पर सामान लेने का सवाल ही पैदा नहीं होता.

आप को याद होगा कि कोलकाता में ओवरब्रिज के गिरने से 22 लोगों के मरने की खबर आई थी. मरने वालों में ज्यादातर मजदूर थे. उन में से एक उत्तर प्रदेश का बाशिंदा शंकर पासवान भी था. वह होली पर अपने घर इसलिए नहीं गया था, ताकि कुछ दिन और काम कर के बेटी की शादी के लिए कुछ पैसे जमा कर सके.

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यह हमारे देश के मजदूरों की आम कहानी है. कभी खदानों में दब कर उन के मरने की खबर आती है, कभी कारखानों में अपंग हो जाने की, तो कभी फुटपाथ पर रईसों की गाडि़यों से कुचलने की. जब मजदूरों का गुस्सा फूटता है, तो सिर्फ मुआवजे का ऐलान होता है.

कहने को तो मुआवजा मरने वाले के पविर वालों के सहारा के लिए होता है, लेकिन आज यह हकीकत में मजदूरों के बुनियादी सवालों से पीछा छुड़ाने का जरीया बन गया है. किसी हादसे के बाद नेताओं की भाषणबाजी होती है और मुआवजे की रकम सौंपते वक्त फोटो खिंचवा कर वे पुण्य कमाने की मुद्रा में आ जाते हैं.

क्या मजदूर होने का इतना ही मतलब है? क्या मजदूर सिर्फ दूसरों को सेवाएं मुहैया कराने के लिए ही हैं? क्या मजदूरों और उन की मजदूरी के प्रति समाज या राज्य की कोई जिम्मेदारी नहीं होती है?

मार्क्स और एंजेल्स जैसे सुलझे हुए लोगों ने पूंजीवादी सामाजिक ढांचे का ब्योरा देते हुए कहा था कि मजदूरों को मिलने वाली न्यूनतम मजदूरी उन के वजूद को बनाए रखती है, मतलब उन्हें जिंदगी जीनेभर की तनख्वाह मिलती है. वे मजदूर बने रहते हैं और एक वर्ग के लिए सुविधाओं का उत्पादन करते रहते हैं.

जब समाजवादी सोच वाले समाज को बनाने की सोची गई, तो इस संबंध को खत्म करने की बात सामने आई और दुनियाभर में मजदूरों ने अपने हित के लिए क्रांतिकारी संघर्ष किए. उन्होंने काम के घंटे को तय कराया, अपने परिवार के लिए पढ़ाईलिखाई, सेहत और घर की मांग की, यूनियन बनाने और हड़ताल करने का हक हासिल किया.

भारत में भी आजादी के बाद समाजवादी ढांचे को स्वीकार किया गया और सार्वजनिक उपक्रमों के जरीए मजदूरों के हितों को सुरक्षित करने की कोशिश की गई, पर यह अधूरी थी.

आजादी के बाद राज्य द्वारा जिस मात्रा में सार्वजनिक क्षेत्रों में रोजगार बनाए गए, उस से कई गुना ज्यादा यहां की आबादी बेरोजगार थी, जो अपनी जीविका के लिए असंगठित क्षेत्रों में जाने को मजबूर हुई.

90 के दशक तक आतेआते देश में मजदूरों का सवाल धीरेधीरे सीन से बाहर होता चला गया. अब चुनावों में भी मजदूरों के हितों की बात राजनीतिक दलों के घोषणापत्रों में नहीं होती है. अब तो संगठित क्षेत्रों में भी मजदूरों की हालत अच्छी नहीं रह गई है.

ठेके पर मजदूर उसी तरह से रखे जाते हैं जैसे दास युग में दासों को जीने भर कर खाना मिलता था. ठेके ने श्रम के प्रति जाहिर की जाने वाली उस नैतिक जिम्मेदारी को खत्म कर दिया है, जिस के तहत मजदूर और उस के परिवार के लिए पढ़ाईलिखाई, सेहत और घर के लिए न्यूनतम व्यवस्था की बात थी.

आज मजदूर बेहद ही खतरनाक हालात में काम करने के लिए मजबूर हैं, पर उन के लिए जीवन की आधारभूत संरचनाओं और सुरक्षा की कोई वैधानिक व्यवस्था नहीं है.

वैश्वीकरण के दौर में सारी चीजें चमक रही हैं, लेकिन मजदूरों के चेहरे से लोच गायब हो रही है. बाजार ने मजदूरी और मजदूरों की अहमियत को अपने इश्तिहारों से ढक लिया है. आज भी मजदूर अपनी बुनियादी जरूरतों और हकों के लिए जद्दोजेहद कर रहे हैं.

आज एक ओर भवन निर्माण, सड़क निर्माण, छोटीबड़ी प्राइवेट फैक्टरियों, मिलों और खदानों में बहुत बड़ी तादाद में लोग ठेके पर मजदूरी करने के लिए मजबूर हैं, तो वहीं दूसरी ओर महानगरों में दूसरों के घरों, गलियों, नालियों में दिहाड़ी पर काम करने को मजबूर हैं.

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मनरेगा एक अच्छी कोशिश कह सकते है, लेकिन यह तब तक एकांगी है, जब तक इस के लाभ के रूप में मजदूर अपनी वास्तविक हैसियत से बाहर नहीं निकल जाते हैं. यह तभी मुमकिन है, जब उन के लिए न्यूनतम मजदूरी के अलावा पढ़ाईलिखाई, सेहत, घर व सुरक्षा की गारंटी भी हो.                द्य

 

टीवी के महादेव की स्टाइलिश पेंट करें ट्राय

टीवी के महादेव और नच बलिए फेम स्टार सौरभ राज जैन इन दिनों अपने डांस मुव्स से लोगों के दिल जीतने में लगे है. नच बलिए में सौरभ अपनी पत्नी रिधिमा के साथ आएं है. देवों के देव महा देव से घर-घर  में जगह बनाने वाले सौरभ ने टीवी पर कई सारे धार्मिक सीरियल में काम किया है पर फैंस को नच बलिए के जरिएं सौरभ का एक अलग साइड देखने को मिल रहा हैं जिसे फैंस काफी पसंद कर रहे हैं. आप को जानकर हैरानी होगी पर सौरभ की शादी को 9 साल हो चुके. उनकी और पत्नी रिधिमा की लव स्टोरी की शुरुआत 2007 में हुई और फिर शादी. सौरभ ट्विन्स बेबिज के पिता है. रील लाइफ में माइथोलोगिकल रोल निभाने वाले सौरभ असल जिंदगी में काफी स्टाइलिश और फैशनेबल है. सौरभ को हमेशा कुछ अलग और हटके ट्राय करने का शौक है अब उनकी डिजाइनर पेंट्स को ही ले लिजिए.

आज हम सौरभ के कुछ डिजाइनर पेंट लुक लेकर आए है जिसे ट्राय कर आप स्टाइल आइकन बन सकते है.

गोल्डन एमरोडरी पेंट

ब्लेक पेंट पर गोल्डन एमरोडरी वाली इस पेंट का लुक काफी रिच है. सौरभ ने इस पेंट के साथ मस्टड येलो जैकेट अदर ब्लेक टी-शर्ट इस पुरे लुक को कम्प्लिट कर रहा है. इस लुक को किसी भी पार्टी या टेडिशनल इवेंट पर ट्राय कर सकते है.

 

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ब्लेक विद वाइट टेक्शचर पेंट

टीवी के महादेव असल जिंदगी में कितने फैशनेबल है इसका एक एक्जाम्पल ओर देखिएं. इस ब्लेक एंड वाइट प्रिंटेड पेंट के साथ औरेंज टी-शर्ट और वाइट जैकेट इस पुरे लुक को परफेक्ट लुक बना रहे है. इस लुक को आप किसी भी टाइम में ट्राय कर सकते है.

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चेक प्रिंटेड पेंट  

चेक प्रिंट हमेशा ट्रेंड में रहता है पर ज्यादातर चेक प्रिंट शर्ट में देखने को मिलता है. सौरभ की ये चेक प्रिंट पेंट काफी क्लासी लग रहा हैं. इस पेंट को आप फोर्मल और केजुअल दोनों में ट्राय कर सकते हैं. सौरभ ने इस प्रिंटेड पेंट के साथ ग्रे टी-शर्ट पहनी है जो काफी अच्छी लग रही हैं.

 

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तो ये है सौरभ की कुछ फैशनेबल पेंट लुक जो ना सिर्फ काफी रेयर है बल्कि इसे ट्राय करने पर आप काफी स्टाइलिश लगेंगे.

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छत्तीसगढ़ : दंतैल हाथी गणेशा जंजीर तोड़ भागा !

रेसक्यू करने वाली टीम ने गणेशा को रायगढ़ वन प्रांतर से बड़ी जद्दोजहद के पश्चात बेहोश करके काबू में किया था और रायगढ़ के बहेरामार से लाकर उसे कुदमुरा वन परिक्षेत्र जिला कोरबा में रखा गया था . इसी बीच 24 -25 जुलाई की रात्रि 12:00 बजे जैसे ही उसका नशा कमतर हुआ गणेशा भयंकर हो उठा और हाथ पैर पटकने लगा उसकी ताकत का अंदाजा वन विभाग अमला लगा नहीं पाया था यही कारण है कि यह खतरनाक दंतैल हाथी जिसने 9 लोगों की कुचलकर हत्या कर दी है ने बड़े बड़े सांकल जंजीरों को देखते ही देखते तोड़कर फेंक दिया और वन विभाग के अमले की घिग्घी बंध गई. वह अपनी जान बचाकर इघर उधर भागे, ऐसी हालत में आप समझ सकते हैं कि वन विभाग की क्या दुर्गति हुई होगी.
और इस खतरनाक गणेशा हाथी के वन विभाग कैद से भाग खड़े होने से समीपस्थ गांव में पुन: हंगामाखेज स्थिति पैदा हो गई है लोग भयभीत हैं.

भयंकर शक्तिशाली ज़िद्दी और गुस्सैल है गणेशा !

छत्तीसगढ़ के रायगढ़,अंबिकापुर और कोरबा जिला के जंगलों में स्वच्छंद विचरण करने वाला यह गणेशा हाथी जंगल में अकेला ही स्वच्छंद घूमता रहता है. आमतौर पर हाथी समूह में रहते हैं मगर गणेशा अकेला ही कहीं भी निकल पड़ता है और अगर कोई उसके आसपास भी फटक गया तो उसे दौड़ा कर मारता है वन अधिकारी एम. वेंकटरमन (आई एफ एस ) बताते हैं गणेशा ने अभी तक आधा दर्जन से ज्यादा करीब 9 लोगो को कुचल कुचल कर हत्या की है. यह सभी आदिवासी समुदाय से ताल्लुक रखते थे और जंगल के बीच गांव में रहते थे.
रायगढ़, कोरबा जिले के निवासी थे और सरकार ने उन्हें चार-चार लाख रूपय मुआवजा दिया है .

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आईएफएस प्रणव मिश्रा के अनुसार गणेशा युवा है और बिगड़ेल भी. यह छुप कर खड़ा हो जाता है और राहगीरों पर अचानक हमला करके उन्हें खेत कर देता है . यही कारण है कि छत्तीसगढ़ सरकार ने गणेशा को पकड़ कर उसके रेस्क्यू को मंजूरी दी तांकि तीन जिलों के रहवासियों को राहत मिल सके. मगर बीती रात्रि गणेशा के जिद्दी तेवर, उसकी असीम ताकत के सामने छत्तीसगढ़ का वन अमला बौना दिखाई पड़ा.

कुमकी हाथियों के सहयोग से….

लगभग दो दिनों तक वन विभाग का अमला गणेशा को अपनी गिरफ्त में लेने के लिए जूझता रहा .कोरबा से रायगढ़ पहुंचे गणेशा को बहेरामार के जंगल में देखा गया तब टरेकयूलाइन करने की प्रक्रिया शुरू हो सकी गणेशा को काबू करने के लिए तीन कुमकी हाथी जो प्रशिक्षित हैं का सहयोग लिया गया. आगे वन विभाग के परांगत अमले ने उसे नशे का इंजेक्शन दिया तब गणेशा ठंडा पड़ने लगा तो 2 जेसीबी की मदद से उसे ट्रक पर चढ़ाया गया और रायगढ़ से कोरबा जिला के कुदमूरा में चारों पैरों में बड़े-बड़े साकंर लगाकर बांध,काबू में करके सरगुजा के अभ्यारण भेजने की प्रक्रिया प्रारंभ की गई . प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार ट्रक मे ही जैसे ही गणेश को कुछ होश आना शुरू हुआ उसने वही तोड़फोड़ और चिघांड शुरू कर दी . वन अमले ने उसे कुदमुरा के रेस्ट हाउस में लाकर रखा जहां रात्रि को वह बड़ी-बड़ी जंजीर तोड़कर भाग निकला.

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अभी गणेशा हाथी औपरेशन गणेशा को विफल कर के कोरबा जिला से पुणे जाएगा जिला की और आगे बढ़ रहा है इधर वन अधिकारियों ने पुनः औपरेशन गणेशा की तैयारी शुरू कर दी है. देखना होगा आगे चलकर क्या गणेशा को वन विभाग अभ्यारण कब भेज पाता है मगर तब तक कोरबा रायगढ़ जिला के लोगों में हाथी को लेकर दहशत कायम रहेगी

ममता की ओर झुकते नीतीश?

इस बीच ऐसी अटकलें भी तेज हुई थीं कि नीतीश कुमार पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी सरकार की बहुत ज्यादा बुराई करने को ले कर अजय आलोक से नाराज थे.

अजय आलोक ने पार्टी की राज्य इकाई के प्रमुख वशिष्ठ नारायण सिंह को संबोधित करते हुए अपने इस्तीफे में लिखा था, ‘मैं आप को पत्र लिख कर यह सूचित कर रहा हूं कि मैं पार्टी प्रवक्ता के पद से इस्तीफा दे रहा हूं क्योंकि मुझे लगता है कि मैं पार्टी के लिए अच्छा काम नहीं कर रहा हूं. मैं यह अवसर देने के लिए आप का और पार्टी का धन्यवाद करता हूं लेकिन कृपया मेरा इस्तीफा स्वीकार करें.’

बता दें कि अपने एक ट्वीट में अजय आलोक ने पहले भी जद (यू) के उपाध्यक्ष प्रशांत किशोर की कंपनी के ममता बनर्जी के लिए चुनाव प्रचार की कमान संभालने पर सवाल उठाए थे.

अजय आलोक पटना के मशहूर डाक्टर गोपाल प्रसाद सिन्हा के बेटे हैं. आलोक अपने कालेज के दिनों से राजनीति में सक्रिय थे. उन्होंने साल 2012 में जद (यू) को जौइन किया था.

सांसद के घर कुर्की का आदेश

वाराणसी. इन लोकसभा चुनावों में उत्तर प्रदेश की घोसी लोकसभा सीट से बहुजन समाज पार्टी के नेता अतुल राय सांसद बने थे, लेकिन लोकसभा चुनाव के दौरान एक छात्रा ने उन पर यह कहते हुए रेप का आरोप लगाया था कि अतुल ने उसे अपनी पत्नी से मिलाने के लिए अपने आवास पर बुलाया था और इस के बाद रेप किया था.

उस पीडि़ता का कहना है कि अतुल राय ने उसे जान से मारने की धमकी भी दी, जबकि अतुल राय का कहना है कि वह छात्रा उन के औफिस आ कर चुनाव लड़ने के नाम पर चंदा लेती थी और चुनाव में उम्मीदवार बनने के बाद उन्हें ब्लैकमेल करने की कोशिश की गई.

छात्रा के आरोप के बाद न्यायिक मैजिस्ट्रेट ने अतुल राय की गिरफ्तारी के आदेश दे दिए थे. वे जमानत के लिए हाईकोर्ट तक गए, लेकिन उन्हें जमानत नहीं मिली, तो वे फरार हो गए जिस के चलते 14 जून को पुलिसप्रशासन ने उन के घर पर कुर्की का नोटिस लगा दिया.

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बिजली के बहाने भिड़ंत

भोपाल. मध्य प्रदेश में बिजली की कटौती को ले कर विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी के एक नेता का सोशल मीडिया पर लंगर डाल कर बिजली गुल करने वाले लड़कों की भरती का इश्तिहार सामने आने से कांग्रेस और उस में तकरार और ज्यादा बढ़ गई.

दरअसल, दमोह जिले के मीडिया प्रभारी मनीष तिवारी ने 12 जून को सोशल मीडिया पर एक पोस्ट डाला था, ‘विज्ञापन-बिजली गोल कराने वाले लड़कों की आवश्यकता है. नोट-लंगर डालने में ऐक्सपर्ट हों. संपर्क करें बीजेपी दमोह.’

इस मसले पर प्रदेश कांग्रेस कमेटी अध्यक्ष के मीडिया समन्वयक नरेंद्र सलूजा ने कहा, ‘प्रदेश में भाजपा के लोग बिजली गुल कराने की एक बड़ी साजिश चला रहे हैं. बिजली गुल कराने के लिए टीम लगाई जा रही है.’

 राजस्थान कांग्रेस में रार

जयपुर. राजस्थान में सत्ता का सुख भोग रही कांग्रेस पार्टी में खेमेबंदी अब खुल कर सामने आ रही है. इस खेमेबाजी की एक तरफ वहां के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत हैं, तो दूसरी तरफ उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट.

दरअसल, दौसा जिले के भंडाना इलाके में मंगलवार, 11 जून को सचिन पायलट के पिता व केंद्रीय मंत्री रह चुके राजेश पायलट की पुण्यतिथि पर कराई गई एक प्रार्थना सभा में सरकार के 15 मंत्रियों समेत 62 विधायक पहुंचे थे, लेकिन मुख्यमंत्री नहीं आए थे. उन्होंने ट्विटर के जरीए राजेश पायलट को श्रद्धांजलि दी थी.

इस के ठीक एक दिन बाद जब अशोक गहलोत जयपुर में एमएसएमई के एक पोर्टल की शुरुआत कर रहे थे तो कई बड़े मंत्री जयपुर में होने के बावजूद वहां नहीं गए थे.

कैप्टन ने कन्नी काटी

चंडीगढ़. पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुआई में शनिवार, 15 जून को हुई नीति आयोग की बैठक में भाग लेने नहीं गए.

कैप्टन अमरिंदर सिंह के बैठक में शामिल न होने की वजह उन का बीमार होना बताई गई, जबकि वे पूरा एक हफ्ता हिमाचल प्रदेश में अपने फार्महाउस पर छुट्टियां बिता कर पंजाब लौटे थे.

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के बाद कैप्टन अमरिंदर सिंह देश के ऐसे दूसरे मुख्यमंत्री थे जो इस खास बैठक में शामिल होने नहीं गए.

गरमाई धरने की सियासत

बैंगलुरु. जेएसडब्लू जमीन सौदे में धांधली का आरोप लगाते हुए कर्नाटक भाजपा के अध्यक्ष और मुख्यमंत्री रह चुके बीएस येदियुरप्पा और दूसरे नेताओं ने 14 जून को बैंगलुरु में पूरी रात धरनाप्रदर्शन किया जिस से एचडी कुमारस्वामी की राज्य सरकार कठघरे में आ गई.

यह मामला जेएसडब्लू स्टील कंपनी की बेल्लारी में 3,667 एकड़ जमीन की बिक्री का है. भाजपा ने आरोप लगाया कि जेएसडब्लू को सस्ती दर पर जमीन अलौट करने का फैसला सरकार ने जानबूझ कर किया है. ऐसा कर के सरकार अपनी झोली भरने का काम करना चाहती है, क्योंकि उसे राज्य में अपनी सरकार गिरने का डर है.

केजरीवाल ने उठाया मुद्दा

नई दिल्ली. दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने 15 जून को नीति आयोग की बैठक में दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा देने का मुद्दा उठाया. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हुई इस बैठक में उन्होंने कहा, ‘दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा दिया जाए जिस का वादा सालों से किया जा रहा है लेकिन लगातार केंद्र सरकारें इनकार करती रही हैं.’

आम आदमी पार्टी ने हालिया लोकसभा चुनाव में भी दिल्ली को पूर्ण राज्य बनाने का मुद्दा उठाया था. उस का कहना है कि केंद्र की दखलअंदाजी की वजह से वह अपनी योजनाओं को असरदार तरीके से लागू करने में कामयाब नहीं हो पा रही?है.

 मूर्ति पर हुई गिरफ्तारी

हैदराबाद. मंगलवार, 17 जून को कांग्रेस के सांसद रह चुके 2 बड़े नेताओं वी. हनुमंथा राव, हर्ष कुमार और उन के समर्थकों को तब गिरफ्तार कर लिया गया जब वे शहर के पंजागुट्टा चौराहे पर भीमराव अंबेडकर की मूर्ति लगाने की कोशिश कर रहे थे.

दरअसल, अप्रैल महीने में ग्रेटर हैदराबाद  नगरनिगम ने ‘अंबेडकर जयंती’ से एक दिन पहले ‘जय भीम सोसाइटी’ द्वारा अंबेडकर की मूर्ति को स्थापित किए जाने के बाद उस जगह से हटा दिया था. बाद में वह मूर्ति टूटीफूटी हालत में कूड़े में मिली थी, जिस का दलित संगठनों ने कड़ा विरोध जताया और इस के जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्यवाही की मांग की.

ग्रेटर हैदराबाद नगरनिगम के अधिकारियों ने कहा कि मूर्ति को बिना इजाजत लिए लगाया गया था, इसलिए हटा दिया गया.

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नेता के सामने पी लिया जहर

मुंबई. 15 जून को महाराष्ट्र के ऊर्जा राज्यमंत्री एमएम येरावर के सामने एक किसान ने जहर पी कर जान देने की कोशिश की. दरअसल, बुलढाणा में एक कार्यक्रम के दौरान ऊर्जा राज्यमंत्री मंच पर मौजूद थे, तभी ईश्वर खारटे नाम के एक किसान ने वहां सब के सामने कीटनाशक पी कर जान देने की कोशिश की.

अस्पताल ले जाए गए ईश्वर खारटे का आरोप है कि उस के दादा ने साल 1980 में बिजी के कनैक्शन के लिए अर्जी लगाई थी पर उन्हें अब तक कनैक्शन नहीं मिला है, जबकि संबंधित अधिकारी का कहना है कि ईश्वर खारटे ने बकाया जमा नहीं किया है, इसलिए उन्हें कनैक्शन नहीं मिला है.              द्य

 

TV की ये हौट एक्ट्रेस पहुंची यूरोप, बिकिनी में दिखाए जलवे

वेब सीरिज माया फेम स्टार शमा सिकंदर इस समय यूरोप के क्रोएटिया शहर में वेकेशन एंजौय कर रही है. शमा ने अपने औफिशिल इंस्टाग्राम अकाउंट से वेकेशन की फोटोज शेयर की जिसे उनके फैंस खासा पसंद कर रहे हैं. शमा की सेक्स अपील किसी से छुपी नहीं हैं. अपने बौल्ड एटिट्यूड के कारण हमेशा सुर्खियों में पहने वाली शमा सभी फोटोज में काफी सेक्सा लग रही हैं. कुछ घंटे पहले शमा ने अपने वेकेशन के एक सेल्फी वीडियों को इंस्टाग्राम स्टोरी पर पोस्ट किया है. जिसमें उन्होंने वाइट बिकिनी के साथ वाइट श्रग पहना है जिसनें वो किसी परी से कम नहीं लग रही.

बिकिनी में नजर आए शमा

शमा ने समुंदर के बीचों बीच ही खूब सारी फोटोज क्लिक करवाई. उनकी वेकेशन की फोटोज बेहद ही खूबसूरत है और ये सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल भी हो रही है. इस वेकेशन में शमा ने अलग अलग बिकिनी को ट्राय किया है जिसमें काफी कमाल लग रही हैं. ब्लेक एंड वाइट पुलका डोट बिकिनी  हो या फिर पिंक, शमा सभी आउटफिट में कमाल के पोज दिए. जिसके पोस्ट करते है इन फोटोज ने सोशल मीडिया में तहलका मचा दिया हैं.

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शमा की हौटनेस औवरलोडेड

शमा की हौटनेस और बौल्डनेस को सोशल मीडिया पर काफी पसंद किया जाता है. “सेक्सोहोलिक” नाम की शोर्ट फिल्म में शमा के बौल्ड सीन की लोगों ने काफी पसंद किया. फिर उनकी बेव सीरिज “माया” ने सेक्स अपील क्वीन के नाम से उनको फैमस कर दिया.

 

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Trust the Wait. Embrace the Uncertainty. Enjoy the beauty of becoming….#abdilkisunn

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कई अवार्ड्स है शमा के नाम

शमा पहली बार पौपुलर शो “ये मेरी लाइफ है” (2003-2005) में लीड रोल ‘पूजा मेहता’ के रूप में टीवी पर काफी लोगों के दिल में जगह बनाई. 12th गोल्ड अवार्ड्स में ‘क्रिटिक्स’ चौइस “बेस्ट एक्ट्रेस” (2005), सोनी टीवी का “बेस्ट फेस” (2005), इंडियन टेलीविजन अकादमी अवार्ड्स ‘जीआर 8! फेस औफ़ द ईयर “(2004), और” बेस्ट डेब्यूट “(2004) कुछ ऐसे अवार्ड है जिससे उन्होंने अपने नाम किए. शमा ने बाद में धूमकेड (2008) में ‘जिया’ की लीड रोल में आई. बच्चों के कार्यक्रम बाल वीर (2012-2016) में उन्हें ‘भयंकर परी’ के रूप में देखा गया था.

मैं एक 49 साल के आदमी से प्यार करती हूं पर वो शादी करने से मना करता है

सवाल

मेरी उम्र 24 साल है और मैं एक 49 साल के आदमी से प्यार करती हूं. वह भी मुझे चाहता है, पर शादी करने से मना करता है. मैं क्या करूं?

जवाब

वह आदमी आप से प्यार नहीं करता, बस मुफ्त के मजे लूट रहा है. वैसे भी बेमेल प्यार की उम्र ज्यादा नहीं होती. कुछ साल बाद जब वह बूढ़ा हो कर ढीला पड़ जाएगा और आप की ख्वाहिश पूरी नहीं कर पाएगा, तब आप क्या करेंगी? बेहतरी इसी में है कि उस से दूरी बना कर अपनी उम्र वाले किसी अच्छे लड़के से शादी कर घरगृहस्थी बसा लें.

हां, अगर उस आदमी की सेहत अच्छी हो और ठीकठाक पैसा हो तो उस पर शादी के लिए दबाव बनाएं, क्योंकि आप अपना सबकुछ उसे सौंप चुकी हैं.

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जरा संभल कर, अब सड़क पर ट्रैफिक रूल तोड़ेंगे तो लगेगा भारी जुरमाना

बिना हेल्मेट बाइक चलाना, बगैर सीट बेल्ट लगाए चलना, ओवरस्पीड और ओवरलोड जैसे तमाम ट्रैफिक रूल्स तोड़ने पर भारी जुरमाना लगाया जा सकता है. इस में ड्राइविंग लाइसेंस को निरस्त करने तक का प्रावधान है.
केंद्र सरकार ने सङक सुरक्षा और जरूरी एहतियात को देखते हुए नियम सख्त कर दिए हैं और लोकसभा ने ‘मोटर यान (संशोधन) विधेयक-2019’ को मंजूरी दे दी गई है, जिस में परिवहन व्यवस्था को सुदृढ़ बनाने एवं सड़क सुरक्षा के क्षेत्र में काफी सख्त प्रावधान रखे गए हैं .

राज्यों के अधिकार में दखल नहीं

विधेयक पर चर्चा करते हुए केंद्रीय़ सङक एवं परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने कहा,”सरकार का मोटर यान संशोधन विधेयक के माध्यम से राज्यों के अधिकार में दखल देने का कोई इरादा नहीं है. इस के प्रावधानों को लागू करना राज्यों की मरजी पर निर्भर है और केंद्र की कोशिश राज्यों के साथ सहयोग करने, परिवहन व्यवस्था में बदलाव लाने और दुर्घटनाओं को कम करने की है.”

सख्त प्रावधान

इस विधेयक को ध्वनिमत से मंजूरी दे दी गई है. विधेयक में सड़क सुरक्षा के क्षेत्र में काफी सख्त प्रावधान रखे गये हैं. मसलन :
* किशोर नाबालिगों द्वारा वाहन चलाना.
* बिना लाइसेंस खतरनाक ढंग से वाहन चलाना.
* शराब पी कर गाड़ी चलाना.
* निर्धारित सीमा से तेज गाड़ी चलाना.
* निर्धारित मानकों से अधिक लोगों को बैठाना.
* अधिक माल लाद कर गाड़ी चलाना
* रैड लाइट जंप करना.
* बारबार लेन तोड़ना
* आपातकालीन वाहन जैसे ऐंबुलेंस अथवा 100 नंबर के वाहन को रास्ता नहीं देना आदि.

जुरमाने के साथ सजा भी

इन नियमों के उल्लंघन पर कड़े जुरमाने का प्रावधान किया गया है.
विधेयक में किए गए प्रावधान 18 राज्यों के परिवहन मंत्रियों की सिफारिशों पर आधारित हैं. इन सिफारिशों की संसद की स्थायी समिति ने भी जांचपरख की है.
विधेयक में तेज गाड़ी चलाने पर भी जुरमाना लगाने का प्रावधान किया गया है. बिना बीमा पौलिसी के वाहन चलाने पर भी जुरमाना रखा गया है. बिना हेलमेट वाहन चलाने पर जुरमाना एवं 3 माह के लिए लाइसेंस निलंबित किया जाना आदि शामिल हैं.

पहले क्या अब क्या

ट्रैफिक नियम तोड़ने पर पहले कितना था जुरमाना और अब कितना लगेगा, जानिए :
पहले अब
सामान्य चलान 100 500
बगैर ड्राइविंग लाइसेंस गाङी चलाना 500 5000
तेज स्पीड 400 1000 से 2000
खतरनाक ड्राइविंग 1000 5000
नशा कर के गाङी चलाना 2000 10000
सीट बेल्ट न लगाना 100 1000
बिना हेल्मेट बाइक चलाना 100 1000 व 3 महीने लाइसेंस सस्पेंड
ओवरलोड 100 3000 व 3 महीने लाइसेंस सस्पेंड
आपातकालीन वाहनों को रास्ता न देना 00 10000

हिट ऐंड रन पर सरकार का मुआवजा

हिट ऐंड रन के मामले में मृतक के परिजनों को सरकार की ओर से 2 लाख रूपए दिया जाएगा. पहले 25,000 रूपए का प्रावधान था.

इस के साथ ही थर्ड पार्टी इंश्योरेंस पर देनदारी की सीमा को समाप्त किया जाएगा.
इस से पहले 2016 में तैयार प्रस्ताव में मौत होने पर 10 लाख और घायल होने पर 5 लाख रूपए का प्रावधान था.

किशोर उम्र को गाङी चलाने देने पर अभिभावक भी दोषी

किशोर द्वारा गाड़ी चलाते हुए सड़क पर कोई अपराध करने की स्थिति में गाड़ी के मालिक अथवा अभिभावक को दोषी माना जाएगा और वाहन का पंजीकरण निरस्त कर दिया जाएगा.

मालूम हो कि देश में सड़कों पर बढती दुर्घटनाओं से जानमाल दोनों की छति होती है और देश को इस से करोड़ों का नुकसान होता है.
ऐसे में सरकार की कोशिश यह भी होनी चाहिए कि इस सख्त नियम के साथसाथ भ्रस्टाचार में लिप्त रहने वाले पुलिसकर्मियों पर भी सख्त काररवाई करे ताकि नियम तोड़ने वालों पर शिकंजा कसा जा सके.

 

पुराने नोट

लेखक- सुरेश सौरभ

‘‘यह बुढि़या भी बड़ी अजीब थी. जाने कहांकहां का… जाने क्यों ये चिथड़ेगुदड़े संभाल कर रखे हुए थी,’’ भुनभुनाते हुए सुमन अपनी मर चुकी सास के पुराने बक्से की सफाई कर रही थी.

तभी सुमन की नजर बक्से के एक कोने में मुड़ेतुड़े एक तकिए पर पड़ी जिस के किनारे की उखड़ी सिलाई से 500 का एक पुराना नोट बत्तीसी दिखाता सा झांक रहा था.

सुमन ने बड़ी हैरत से उस तकिए को उठाया, हिलायाडुलाया, फिर किसी अनहोनी के डर से जल्दीजल्दी उस तकिए की सिलाई उधेड़ने लगी.

अब सुमन के सामने 1000-500 के पुराने नोटों का ढेर था. वह फटी आंखों से उसे हैरानी से देखे जा रही थी. थोड़ी देर तक उस का दिमाग शून्य पर अटक गया, फिर उस की चेतना लौटी.

सुमन ने फौरन आवाज लगाई, ‘‘अरे भोलू के पापा, जल्दी आओ… जरा सुनो तो…’’

‘‘क्या आफत आ गई. अभी खाना दे कर गई है और पुकारने लगी है. यह औरत जरा भी सुकून से खाना नहीं खाने देती है,’’ पति झुंझलाया.

‘‘अरे, जल्दी आओ,’’ सुमन ने दोबारा कहा.’

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‘‘पता नहीं, कोई सांपबिच्छू तो नहीं है…’’ बड़बड़ाता हुआ पति वहां पहुंचा. सुमन सिर पर हाथ रखे अपने सामने 1000-500 के पुराने नोटों के ढेर को बड़ी हैरानी से देख रही थी.

पति ने यह नजारा देखा तो उस के भी होश उड़ गए. सारा गुस्सा ठंडा हो गया. फिर अटकतेअटकते वह बोला, ‘‘यह सब क्या है सुमन…’’

‘‘तुम्हारी मां ने बड़े अरमान से हमारी गरीबी दूर करने के लिए ये पैसे जोड़जोड़ कर अपने तकिए में रखे थे. लेकिन 2 साल पहले बेचारी मरते समय यह राज हमें न बता पाई. दिल में यही अरमान रहे होंगे कि बहू, बेटे और उन के बच्चों की इन रुपयों से गरीबी दूर हो जाएगी. पर हाय रे नोटबंदी का दानव मेरी सासू मां के सारे अरमानों को खा गया.’’

यह देख पति भारी मन से बोला, ‘‘अम्मां को मैं ही दवादारू के लिए थोड़ेबहुत पैसे देता रहता था, पर मुझे क्या पता था कि वे हमारी गरीबी दूर के लिए पैसे जोड़ रही थीं.’’

सुमन डबडबाई आंखों से बोली, ‘‘सचमुच अम्मां का दिल बहुत बड़ा था.’’

पति ने कहा, ‘‘हां, शायद हम लोगों से भी

ज्यादा बड़ा…’’

सुमन बोली, ‘‘आप सही कहते हो.’’

अब वहां वे दोनों फूटफूट कर रोने लगे, जिसे सिर्फ घर की दीवारें ही सुन पा रही थीं.

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नरेंद्र मोदी की सरकार ने सोचा था कि वह नोटबंदी से अमीरों का काला धन निकालेगी, पर यहां तो गोराचिट्टा धन एक रात में काला हो गया था.   द्य

ट्राय करें टीवी के राम “गुरमीत सिंह” के लौंग हेयर लुक

गुरमीत सिंह हिंदी सिनेमा के उन एक्टर में से एक है जिन्होंने छोटे पर्दे से बड़े पर्दे पर छलांग लगाई है. छोटे पर्दे के कैरियल में घर घर में जगह बनाई. यू तो उन्होंने अपने एक्टिंगद कैरियर की शुरुआत साल 2004 मे आए सीरियल “ये मेरी लाइफ है” से की पर उनको साल 2008 में आए “रामायण” से असल पहचान मिली. इसी सीरियल में  उनको अपनी जीवनसाथी भी मिली. गुरमीत सिंह की फैन फौलोविंग केवल लड़कियों तक ही सिमित नहीं हैं, लड़के भी उनको काफी फोलो करतो है. गुरमीत ने अपने हेयर स्टाइल को अलग लुक देते हुए बालों को बढ़ाया हैं. जिसको उनके फैंस खासा पसंद कर रहे हैं. इसलिए आज हम उनके लोंग हेयर लुक को लेकर आए है. तो अगर आप भी लौंग हेयर्स को शोक रखते है पर उसके साथ कैसे कपड़ो को ट्राय किया जाए नहीं पता तो आप गुरमीत के स्टाइल को जरुर फौलो करें.

कलरफुल एमरोडरी शर्ट विद लौंग हेयर

ब्लू शर्ट पर कलरफुल एमरोडरी वाले इस स्टाइल में गुरमीत काफी अच्छे लग रहे हैं. आउटर शर्ट के साथ अंदर वाइट टी-शर्ट और वाइट शूज इस पुरे लुक को कौम्प्लिमेंट दे रहे हैं. अगर आप भी कुछ फंकी ट्राय करना चाहते है तो इसको जरुर ट्राय करें.

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ब्लू स्ट्रीप इन वाइट शूट

अगर आप रौयल दिखना चाहते है और अपनी वाइफ या गर्लफ्रेंड के साथ कुछ मेजिंग ट्राय करना चाहते है तो इस लुक को जरुर ट्राय करें. लाइट क्रिमिश पिंक शर्ट के साथ वाइट शूट काफी अच्छा लग रहा है. ब्राउन शूज और गुरमीत के लौंग हेयर्स इस पुरे लुक को चारचांद लगा रहे हैं.

चेक टू पीस शूट भी है फैशन में  

चेक प्रिंट की बात ही अलग है इसे आप किसी औकेजन पर पहन सकते है. फोर्मल हो या पार्टी, चेक प्रिंट सभी के लिए परफेक्ट साबित होता है. ब्लूइश ब्लेक और वाइट चेक सूट में गुरमीत काफी क्लासी लग रहे है. इस लुक को आप किसी पार्टी में जरुर ट्राय कर सकते है.

 

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Suit game on strong . . 📸 @anurag_kabburphotography @pure_by_punitarora @simrankhera5 Assisted by @Neesthasugla

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ट्रेंडिंग में है फ्लावर प्रिंट शर्ट

फ्लावर प्रिंट शर्ट काफी ट्रेंड में है. लोैंग हेयर के साथ इसको कौम्बिनेशन काफी अच्छा लगता है. गुरमीत के इस लुक को आप कैजुअली ट्राय कर सकते हैं.

 

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Happy Sunday guys!! . . . . . . . . . #happysunday #fashion #photooftheday #gurmeetchoudhary

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तो ये थे गुरमीत के 4 लोंग हेयर लुक जिसे आप ट्राय कर स्टाइलिश बन सकते हैं. एक बात यहां गौर करने वाली है की गुरमीत के सभी लुक्स में हेयर स्टाइल अलग है. तो आप जब भी इन लुक्स को ट्राय के तो हेयर स्टाइल पर जरुर ध्यान दे.

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