निसार और आयशा को यूट्यूब क्वीन चांदनी सिंह का साथ

जबकि उनके साथ यूट्यूब क्वीन चांदनी सिंह आकर्षक भूमिका में जलवा बिखेरने वाली हैं. साथ ही नवोदित अदाकारा आयशा कश्यप को सशक्त किरदार में इस फिल्म से लांच किया जा रहा है. अपनी प्रदर्शित फिल्म ‘‘कलाकंद’’ की सफलता से उत्साहित निसार खान का दावा है कि फिल्म ‘‘नकली नवाब’’ से वह दर्शकों पर अपने अभिनय की अमिट छाप छोड़ने वाले हैं. निसार खान कहते हैं-  ‘‘मुझे पूरा भरोसा है कि फिल्म ‘नकली नवाब’ बहुत ही बेहतरीन बनने वाली है. यह फिल्म दर्शकों के दिलों पर राज करेगी. मुझे सभी के प्यार व आषीर्वाद की कामना है.’’

चांदनी सिंह की बात की जाए तो वह सोशल और डिजिटल मीडिया में काफी पौपुलर हैं रूपहले पर्दे भी सिनेमा प्रेमी उन्हें बहुत पसंद करते हैं. अभिनय और डांस में खुद को प्रवीण मानने वाली आयशा कश्यप का दावा है कि उन्हें एक अच्छे मौके और बेहतरीन फिल्म का बेसब्री से इंतजार था, जो कि अब मिल गया. फिल्म ‘‘नकली नवाब’’की शूटिंग अगस्त माह में शुरू की जाएगी. फिल्म के निर्देशक शुभम सिंह,  संगीतकार छोटे बाबा तथा कलाकार हैं-ं उचयनिसार खान, चांदनी सिंह,आयशा कश्यप और अवधेष मिश्रा हैं. इस फिल्म में जबरदस्त अभिनय करके भोजपुरी सिनेमा जगत में मुकम्मल स्थान कायम किया हैं.

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सवालके जवाब में निसार खान कहते हैं-ं ‘‘मुझे पूरा भरोसा है कि फिल्म ‘नकली नवाब’ बहुत ही बेहतरीन बनने वाली है. यह फिल्म दर्शकों के दिलों पर राज करेगी. मुझे सभी के प्यार और आशीर्वाद की कामना है.’’

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चांदनी सिंह का गाना ‘‘मिलते मरद हमके..’’बना भोजपुरी का नंबर वन सौंग

जी हां! चांदनी सिंह के उपर फिल्माया गया गीम ‘‘मिलते मरद हमके भूल गईलू..’’ इस समय नंबर वन पर गाना बन गया है. इस गाने ने पिछले दिनों तक टाॅप पर रहे गीत ‘छलकत हमरो जवनियां से राजा..’ को भी पछाड़ दिया है. ‘मिलते मरद हमके भूल गईलू..’में यूट्यूब और डिजिटल की क्वीन चांदनी सिंह के साथ भोजपुरी सुपर स्टार खेसारी लाल यादव की जोड़ी है. इस गीत को खेसारीलाल यादव ने ही स्वरबद्ध किया है.

‘‘आदि शक्ति’’संगीत कंपनी इस अलबम को बाजार में लेकर आयी है. चांदनी सिंह के संगीत वीडियो को अब तक 28 करोड़ 70 लाख 77 हजार 67 लोगों ने देख चुके हैं. इससे पहले भोजपुरी के नंबर वन गीत ‘छलकत हमरो जवनियां से राजा’ को अब तक 28 करोड़ 69 लाख 66 हजार 38 लोग देख चुके हैं.इस गीत के वीडियो में पवन सिंह और काजल राघवानी हैं.

 

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Always Do Small Things With Great Love. #goodmorning

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Hi Friends

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आज स्थिति यह है कि हर डीजे और शादी ब्याह में चांदनी सिंह का यह गीत धूम मचा रहा है. चांदनी सिंह को हर तरफ से बधाई मिल रही हैं. लोग उनकी तारीफों के पुल बांध रहे हैं.

गौरतलब है कि पूरे विश्व में चांदनी सिंह के करोड़ों प्रशंसक हैं, जिन्हे उनके म्यूजिक वीडियो का बेसब्री से इंतजार रहता है. ‘‘मिलते मरद हमके भूल गईलू’’ के नंबर वन की पायदन पर पहुंचते ही चंदनी ने सभी का धन्यवाद अदा करते हुए कहती हैं- “मुझे इतना प्यार मिलेगा, इसकी मुझे उम्मीद नहीं थी.’’

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भोजपुरी सिनेमा में बदलाव की दिशा में सार्थक प्रयास ‘‘जमाई राजा’’

सबसे बड़ी बात यह है कि 19 जुलाई से मुंबई और गुजरात के सिनेमाघरों में प्रदर्शित भोजपुरी फिल्म ‘जमाई राजा’ को दर्शकों का भरपूर प्यार मिल रहा है. इस फिल्म में प्रमोद प्रेमी यादव और काजल यादव की जोड़ी है. दर्शकों की माने तो उन्हे फिल्म के गाने ज्यादा आकर्षित कर रहे हैं. फिल्म के निर्माता और निर्देशक अरूण तिवारी का दावा है कि उकनी फिल्म पूरे परिवार के साथ देखने लायक साफ सुथरी, पारिवारिक फिल्म है. इसी कारण ही बिहार के अलावा भी इसे राज्यों में भी इसे सफलता मिल रही है.

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उनके अनुसार उनकी तरफ से भोजपुरी फिल्मों में बदलाव लाने की पहल में सार्थक प्रयास है. ‘‘श्रीगणेशा प्रोड्क्शन’’ और धर्मराज शुक्ला प्रस्तुत भोजपुरी फिल्म ‘‘जमाई राजा’’के निर्माता निर्देशक अरूण तिवारी, सह निर्माता आषुतोश शुक्ला व संगीता राय, लेखक राजेश पांडेय, संगीतकार छोटेबाबा, गीतकार सुमित सिंह चन्द्रवंशी, विनय निर्मल और मुख्य कलाकार हैं-ं उचयप्रमोद प्रेमी यादव, काजल यादव, संजय पांडेय, हसीन खान, कुणाल तिवारी,राम तिवारी, संगीता तिवारी, विनोद मिश्रा अनीता सहगल, वसुंधरा,जे नीलम वषि-ुनवजयठ,रजनीष पाठक है.

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स्पेन की सड़कों पर पति को Kiss करती दिखी Tv की ये एक्ट्रेस

टीवी की एक्ट्रेस दृष्टि धामी इन दिनों अपने पति के साथ स्पेन में  वेकेशन इंजौय कर रही हैं. जिसकी फोटोज उन्होंने अपने इंस्टाग्राम अकाउंट पर शेयर की है. फोटोज में दोनों की कैमिस्ट्री और प्यार देखते ही बन रहा है. फैंस को सभी फोटोज काफी पसंद आ रही है पर एक फोटो ऐसी भी है जिसे फैंस कुछ ज्यादा ही पसंद कर रहे है. वायरल हो रही इस फोटो में दृष्टि अपने पति को किस करती नजर आ रही है. इस फोटो में दोनों काफी क्यूट लग रहे हैं.

स्पेन में मस्ती करती दृष्टि

दृष्टि ने अपनी कुछ फोटोज सोशल मीडिया पर शेयर की है जिनमें वह पति के साथ स्पेन की गलियों में मजे से घूमती नजर आ रही हैं. इस समय दृष्टि अपने पति के साथ स्पेन में वक्त बिता रही हैं. यहां पर दृष्टि काला चश्मा लगाकर पोज देती नजर आई. इस दौरान दृष्टि ने हाथ में जाम ले कर अपने पति के साथ खूब मस्ती की.

 

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Happy beach face !!! @khemkaniraj ♥️#formentere#beachlove#tan#sun#loveintheair !!!!

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Sunset !!!!!! ♥️

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दृष्टि का कैरियर

दृष्टि  ने अपने कैरियर की शुरुआत “दिल मिल गए”  से  की. इसके बाद वो “गीत हुई सबसे पराई” और“मधुबाला” सीरियल के लिए जानी जाती है. रियलिटी शो “झलक दिखला जा” के 6Th सीजन की दृष्टि विजेता है. वो अखरी बार सिल सिला बदलते रिश्तों का में नजर आई थी. जिसके कारण वो काफी सुर्खियों में भी थी.

 

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Bora bora !!!!!

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दृष्टि ने मेरी इमाक्यूलेट गर्ल्स हाईस्कूल बोरीवली, मुंबई से अपनी स्कूलिंग कम्प्लिट की इसके बाद उन्होंने मिथीबाई कॉलेज, मुंबई से नागरिक सास्त्र (Civics) में अपना ग्रेज्युएशन पुरा किया. फिर एंक्टिग और मौडलिंग में उन्होंने अपना हाथ आजमाया जिसमें वो पुरी तरह सफल हुई.

‘‘गो सेलेब क्लब’’के साथ संगीतकार प्यारेलाल की अद्भुत म्यूजिकल नाइट्स”

‘‘गो सेलेब क्लब’’ के बैनर के तहत आयोजित किया गया यह संगीत का शो हाउस फुल रहा. सच्चे संगीत प्रेमियों के लिए यह एक शानदार अनुभव रहा. 2013 में औन लाइन आर्टिस्ट बुकिंग पोर्टल के रूप में शुरू किए गए ‘‘गो सेलब’’ को लेकर इसके संस्थापक चिराग शाह के दिमाग में एक नई आइडिया आयी और उन्होने इसे इंटरटेनमेंट क्लब के रूप में ‘गो सेलेब क्लब’ बनाकर सदस्यता अभियान शुरू किया, जिसका सदस्य पूरे देश में कहीं भी रहने वाला इंसान बन सकता है. इस क्लब ने अपने सदस्यों को मनोरंजन की सभी जरुरतें पूरी करने की पेशकश की. यह ऐसा क्लब है, जिसके मनोरंजन कार्यक्रम केवल मुंबई या गुजरात के किसी एक शहर में नहीं बल्कि देश के अलग अलग शहरों में होते रहेंगे. इसी के तहत हाल ही में गुजरात के चार शहरों सूरत, बड़ोदरा, राजकोट और अहमदाबाद में अपने समय की मशहूर संगीतकार जोड़ी लक्ष्मीकांत प्यारेलाल जोड़ी के प्यारेलाल के नेतृत्व में संगीत के भव्य कार्यक्रम आयोजित किए गए.

जी हां! ‘‘गो सेलेब क्लब’’, भारत का पहला मल्टीसिटी सदस्यता पर आधारित मूवेबल क्लब है. जो भारतीय मनोरंजन इंडस्ट्री का गेम चेंजर बनने के लिए तैयार है. इसका हालिया सफल संगीत शो, संगीत उद्योग की दिग्गज संगीतकार जोड़ी लक्ष्मीकांत प्यारेलाल के प्यारेलाल साथ गुजरात में चार शहर टूर रहा. जिसमें खुद अनुभवी संगीतकार प्यारेलाल ने मंच पर प्रस्तुति देकर दर्शकों को मन्त्र गुग्ध कर दिया. यह जिंदगी में एक बार

आने वाला ऐसा मौका था, जब गुजरात के लोग इस शानदार प्रदर्शन के साक्षी रहे. संगीतकार प्यारेलाल के इस आर्केस्ट्रा ग्रुप के साथ विश्व प्रसिद्ध ‘सैंड आर्टिस्ट’ नितीश भारती ने यात्रा की. नितीश भारती ने रेत कला के माध्यम से दोनों की संगीतमय कहानी को बताया. इस इवेंट को गुजरात में लोगों ने बहुत सराहा.

‘‘गो सेलेब क्लब’’के संस्थापक चिराग षाह कहते हैं-ंउचय ‘‘यह कई शोज में से एक है. अभी कई अन्य शो होने वाले हैं.’’

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बारिश के मौसम में ‘बसंती’ बनीं भोजपुरी एक्ट्रेस मोनालिसा फोटो वायरल

भोजपुरी इंडस्ट्री की सबसे पौपुलर और हौट एक्ट्रेस मोनालिसा अपनी लाजवाब एंक्टिग और डांस के कारण सभी के दिलों पर राज करती है. एक्स बिग बौस कंटेस्टेंट के रुप में भी मोनालिसा काफी पौपुलर है. इस पौपुलेरिटी के चलते ही वो समय समय पर वो अपने फैंस के लिए फोटोज शेयर करती रहती हैं. मोनालिसा सोशल मीडिया पर काफी एक्टिव रहती है.

इसी के चलते मोनालिसा ने हाल ही में अपनी कुछ फोटोज शेयर की है जो काफी वायरल हो रही है.मौनसून स्पेशल  इस फोटोशूट में वो काफी अच्छी लग रही है. गार्डन में मोनालिसा की ये हंसती मुस्कुराती फोटोज सोशल मीडिया में तेहलका मचा रही है. फैंस इस फोटोज को काफी पसंद कर रहे हैं.

येलो वन पीस बिखेरे रंग

येलो वन पीस ड्रेस में वो काफी क्यूट के साथ साथ अपनी हौटनेस का तड़का लगा रही हैं. उनकी सभी फोटोज में वो डिफ्रेंट पोज में नजर आ रही है. अब तक इन फोटोज को 74 हजार लोगों ने लाइक कर चुका हैं और ये आकड़ा बढ़ता जा रहा हैं.

बता दे की इस समय मोनालिसा टीवी पर डायन के रोल में नजर आ रही हैं. उनका ये किरदार उनके चाहने वालों को बहुत पसंद आ रहा हैं. इस शो में उनका रोल मोहाना का है. इस रोल के चलते उनके घर घर में पहचान मिल गई हैं. यू तो वो भोजपुरी की सुपर स्टार है पर छोटे परदे से मिली ये पहचान कही उनको जल्द ही बौलीवुड में एंट्री ना दिला दे.

“हुक्का बार” :संसद से सड़क तक चर्चे

जी हां! यह काम कर रही है फिल्में, मनोरंजन और समाज को शिक्षा देने के नाम पर सिनेमा यही कर रहा है .जिसका बड़ा उदाहरण है अक्षय कुमार की फिल्म, खिलाड़ी 786 जिसमें अक्षय कुमार नाच नाच कर हुक्का बार की बड़ाई कर रहे हैं.

हमारे नगर और गांव कस्बे तक अब नशे के सारे सामान मौजूद हैं .सरकार चाहे जो भी कहे, जैसा भी करें, जैसी भी तलवारें  भांजती रहे. मगर धीरे धीरे युवा वर्ग के खून में नशे की लत लगाना जारी है .इस पर हमारी सरकार ने नियम कानून कायदे तो बहुत सारे बना दिए हैं. मगर होता जाता कुछ नहीं,निर्विघ्न गति से नशे का यह कारोबार नेताओं और अफसरों के संरक्षण में जारी है. आजकल हुक्का बार का नया शगल शुरू हुआ है. देश का ऐसा कोई शहर नहीं होगा जहां हुक्का बार ना हो ऐसे में युवा पीढ़ी किस दिशा में जा रही है इसका सहज ही अनुमान लगा सकते हैं. इस संदर्भ में महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि बीच बीच में पुलिस एक्शन जारी रहता है ,मगर फिर भी एक जगह से हुक्का बार जब बंद हो जाता है तो दूसरी जगह प्रारंभ हो जाता है. आप आश्चर्य कर सकते हैं कि हुक्का बार के इस नशे में उच्च एवं निम्न दोनों ही वर्ग के लोग संलिप्त हैं. दरकार है दृढ़ इच्छाशक्ति और संस्कार की जो युवाओं को न समाज से मिल रहा है न परिवार में. आज हम यहां प्रस्तुत कर रहे हैं हमारे देश में एक नवीन तरह का मस्ती भरा हुक्का बार नशे का कारोबार. जो है युवा पीढ़ी के लिए जहर  सामान.

विधानसभा में गूंजा हुक्का बार का मामला

आप देखिए! हुक्का बार किस तरह  युवा पीढ़ी को बर्बाद कर रहा है. और शासन-प्रशासन हक्का-बक्का उसे देख रहा है. शायद यही कारण है की छत्तीसगढ़ की विधानसभा में बीते दिनों यह मामला जोर-शोर से उठा. इससे पता चलता है कि हुक्का बार किस तरह लोगों का जीवन बर्बाद कर रहा है. छत्तीसगढ़ के शिक्षाविद  प्रथम बार विधायक बने शैलेष पांडेय ने हुक्का बार में युवकों के नशाखोरी के मुद्दे पर सरकार का ध्यान आकर्षित किया.

मजे की बात यह है कि छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की सरकार है और कांग्रेस के विधायक  हुक्का बार का मामला उठाते हैं. आप समझ सकते हैं कि विधायक के क्षेत्र में हुक्का बार चल रहा है और वे अहसाय देख रहे हैं न उन की कलेक्टर सुनता, न पुलिस कप्तान. ऐसे में उन्होंने मामला विधानसभा में उठाया. जिसके बाद  बिलासपुर पुलिस हरकत में आई, और तारबाहर पुलिस ने टेलीफोन एक्सचेंज रोड स्थित कोयला हुक्का बार में छापा मारा, और डेढ़ दर्जन युवक व आधा दर्जन युवतियों को हिरासत में लिया, और पुलिस  बार संचालक के खिलाफ मामला दर्ज कर कार्रवाई कर रही है.

कोयला  हुक्का बार में पुलिस ने जब दबिश दी, तो यहां हुक्के की कश लगा रहा एक युवक सामने आया और युवती का बर्थडे पार्टी मनाने की जानकारी देने लगा. पुलिस ने युवकों के नाम और पते दर्ज किए. बार में मौजूद आधा दर्जन युवतियों से पुलिस ने नाम पूछा तो युवतियों ने महिला पुलिस अधिकारी द्वारा युवतियों से पूछताछ करने की बात कहते हुए नाम बताने से इनकार कर दिया. जिसके बाद महिला पुलिसकर्मी ने युवतियों का नाम और पता दर्ज किया.पुलिस बार संचालक रविन्द्र देवांगन के खिलाफ पुलिस ने कोकपा एक्ट के तहत अपराध दर्ज किया.

शहर शहर पहुंचा हुक्का बार

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर,बिलासपुर  सहित  कई शहरों  के पाश इलाके में लंबे समय से से अवैध हुक्का बार का संचालन किया जा रहा है . कोरबा के सिटी सेंटर में विगत दिनों अवैध हुक्का बार पकड़ाया.इसी तरह उरगा क्षेत्र के एक होटल में एक भाजपा नेता के पुत्र  को  पकड़ा गया. हालात इतने बदतर है कि पुलिस ने जब चाय की दुकान में चल रहे कथित अवैध हुक्काबार में छापामार कार्रवाई की तो उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गई. यहां नशा करने वालों में नाबालिग तक शामिल मिले .

दरअसल, चाय दुकान केवल नाम मात्र की ही चाय दुकान थी जबकि इसकी आड़ में वहां  अवैध हुक्का बार खोल रखा था. जहां अमीर घरानों की बिगड़ैल औलाद अपनी नशे की लत को पूरा किया करते थे. नशा करने वालों में युवा और नाबालिगों के अलावा लड़किया भी शामिल है. एके-47, पिस्टल जैसे कई आकर्षक लाइटर हथियारों की शक्ल में इन अवैध् हुक्का बारों में युवाओ को आकर्षित कर रहे है. पुलिस ने मौके से पकडे गए किशोरों को उनके अभिभावकों की उपस्थिति में समझाईश देकर छोड़ दिया है. दरअसल आवश्यकता है छत्तीसगढ़ में भी हुक्का बार पर सरकार प्रतिबंध लगा दे.

नाबालिगों पर भी हुक्का बार का नशा तारी

हुक्का बार का गुलाबी धुआं हमारी युवा पीढ़ी को बुरी तरह बर्बाद कर रहा है आखिर यह हुक्का बार आया कहां से याद करें एक फिल्म आई थी खिलाड़ी 786 इसमें अक्षय कुमार पर एक गाना फिल्माया गया है, “-तेरी अखियों का वार,  जैसे शेर का शिकार, तेरा प्यार, तेरा प्यार हुक्का मार! ”

इस तरह के गाने हमारी युवा पीढ़ी को बर्बाद कर रहे हैं मगर सेंसर बोर्ड और सरकार कुंभकरणी निद्रा में है ऐसे ही कुछ गाने हैं फिल्में है जिन्होंने युवा पीढ़ी को हुक्का बार की तरफ आकर्षित किया है. हुक्का बार में तंबाकू के कई  फ्लेवर होते हैं ई हुक्का, ई सिगरेट होता है. शहर के पॉश इलाके मॉल पब होटल यहां तक कि छुपकर कर आवासीय परिसरों में भी हुक्का बार चल रहे हैं. हुक्के की ऐसी दीवानगी शुरू हो गई है कि फ्लेवर्ड हुक्का भी परोसा जा रहा है पुलिस  छापा मारती है तो छात्र-छात्राएं, नाबालिक के साथ युवक युवतियां भी पकड़े जा रहे हैं. एक पुलिस अधिकारी ने बताया कि छत्तीसगढ़ में हुक्का बार को लेकर के कोई कानून नहीं है परिणाम स्वरूप युवक-युवतियों को समझाइश देकर छोड़ना हमारी मजबूरी है इसलिए छत्तीसगढ़ सरकार को चाहिए कि जिस तरह पंजाब, हरियाणा, महाराष्ट्र में हुक्का बार पूरी तरीके से अवैध करार दिए गए हैं. छत्तीसगढ़ में भी नया कानून लाकर इसे प्रतिबंधित कर दिया जाना चाहिए.

संस्कार, इच्छाशक्ति और हुक्का बार!

दरअसल आज जो नशे का चलन बढ़ा है उसके पीछे दृढ़ इच्छाशक्ति की कमी, संस्कार की कमी है परिवार में बच्चों को जब अच्छे संस्कार नहीं मिलते तो वह नशे के जाल में फंसकर भटकते चले जाते हैं. पुलिस अधिकारी इंद्र भूषण सिंह बताते हैं हुक्का बार दरअसल सिनेमाई दुनिया की हमारे समाज को दी गई गंदगी है एक तरह से अय्याशी और वेश्यावृत्ति के अड्डे बन चुके हैं.

सरकार एक तरफ नियम कानून कार्य बना करके अपना पिंड छुड़ा रही है दूसरी तरफ चाहती है कि हमारे पास करोड़ों करोड़ों रुपए देश की जनता से आता जाए इसके लिए शराब और नशे के सारे सामान को समाज को बेचने का ठेका दे रही है सवाल है जब सरकार के निर्माण के पीछे मंशा यह है कि समाज को दिशा देने का काम किया जाएगा तब लगातार युवा पीढ़ी नशे में उसकी गिरफ्त में कैसे आते जा रही है आज का दोषी कौन है?

चाहत

लेखक- जसविंदर शर्मा

यह सुन कर मैं पसोपेश में पड़ गया कि अपनी पत्नी को साथ ले कर जाना ठीक रहेगा कि नहीं. रमण हमारे इलाके का ही है. उस का गांव मेरे गांव से 3 किलोमीटर दूर है. इधर कई साल से हमारा मिलनाबोलना तकरीबन बंद ही था. अब मैं प्रमोशन ले कर उस के औफिस में उस के शहर में आ गया तो हमारे संबंध फिर से गहरे होने लगे थे. पिछले 20 सालों में हमारे बीच बात ही कुछ ऐसी हो गई थी कि हम एकदूसरे को अपना मुंह दिखाना नहीं चाहते थे.

रमण और मैं 10वीं क्लास तक एक ही स्कूल में पढ़े थे. यह तो लाजिम ही था कि हमें एक ही कालेज में दाखिला लेना था, क्योंकि 30 मील के दायरे में वहां कोई दूसरा कालेज तो था नहीं. हम दोनों रोजाना बस से शहर जाते थे.

रमण अघोषित रूप से हमारा रिंग लीडर था. वह हम से भी ज्यादा दिलेर, मुंहफट और जल्दी से गले पड़ने वाला लड़का था.

पढ़ाई में वह फिसड्डी था, पर शरीर हट्टाकट्टा था उस का, रंग बेहद गोरा.

बचपन से ही मुझे कहानीकविता लिखने का चसका लग गया था. मजे की बात यह थी कि जिस लड़की सुमन के प्रति मैं आकर्षित हुआ था, रमण भी उसी पर डोरे डालने लगा था. हमारी क्लास में सुमन सब से खूबसूरत लड़की थी.

हम लोग तो सारे पीरियड अटैंड करते, मगर रमण पर तो एक ही धुन सवार रहती कि किसी तरह जल्दी से कालेज की कोई लड़की पट जाए. अपनी क्लास की सुमन पर तो वह बुरी तरह फिदा था. खैर, हर वक्त पीछे पड़े रहने के चलते सुमन का मन किसी तरह पिघल ही गया था.

सुमन रमण के साथ कैफे जाने लगी थी. इस कच्ची उम्र में एक ही ललक होती है कि विपरीत लिंग से किसी तरह दोस्ती हो जाए. आशिकी के क्या माने होते हैं, इस की समझ कहां होती है. रमण में यह दीवानगी हद तक थी.

एक दिन लोकल अखबार में मेरी कहानी छपी. कालेज के इंगलिश के लैक्चरर सेठ सर ने सारी क्लास के सामने मुझे खड़ा कर के मेरी तारीफ की.

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मैं तो सुमन की तरफ अपलक देख रहा था, वहीं सुमन भी मेरी तरफ ही देख रही थी. उस समय उस की आंखों में जो अद्भुत चमक थी, वह मैं कई दिनों तक भुला नहीं पाया था. पता नहीं क्यों उस लड़की पर मेरा दिल अटक गया था, जबकि मुझे पता था कि वह मेरे दोस्त रमण के साथ कैफे जाती है. रमण सब के सामने ये किस्से बढ़ाचढ़ा कर बताता रहता था.

सुमन से अकेले मिलने के कई और मौके भी मिले थे मुझे. कालेज के टूर के दौरान एक थिएटर देखने का मौका मिला था हमें. चांस की बात थी कि सुमन मेरे साथ वाली कुरसी पर थी. हाल में अंधेरा था. मैं ने हिम्मत कर के उस का हाथ अपने हाथ में ले लिया तो बड़ी देर तक उस का हाथ मेरे हाथ में रहा.

रमण से गहरी दोस्ती होने के बावजूद बरसों तक मैं ने रमण से सुमन के प्रति अपना प्यार छिपाए रखा. डर था कि क्या पता रमण क्या कर बैठे. कहीं कालेज आना न छोड़ दे. सुमन के मामले में वह बहुत संजीदा था.

एक दिन किसी बात पर रमण से मेरी तकरार हो गई. मैं ने कहा, ‘क्या हर वक्त ‘मेरी सुमन’, ‘मेरी सुमन’ की रट लगाता रहता है. यों ही तू इम्तिहान में कम नंबर लाता रहेगा तो वह किसी और के साथ चली जाएगी.’

रमण दहाड़ा, ‘मेरे सिवा वह किसी और के बारे में सपने में भी नहीं सोच सकती.’

मैं ने अनमना हो कर यों ही कह दिया, ‘कल मैं तेरे सामने सुमन के साथ इसी कैफे में इसी टेबल पर कौफी पीता मिलूंगा.’

हम दोनों में शर्त लग गई.

मैं रातभर सो नहीं पाया. सुमन ने अगर मेरे साथ चलने से मना कर दिया तो रमण के सामने मेरी किरकिरी होगी. मेरा दिल भी टूट जाएगा. मगर मुझे सुमन पर भरोसा था कि वह मेरा दिल रखेगी.

दूसरे दिन सुमन मुझे लाइब्रेरी से बाहर आती हुई अकेली मिल गई. मैं ने हिम्मत कर के उस से कहा कि आज मेरा उसे कौफी पिलाने का मन कर

रहा है.

मेरे उत्साह के आगे वह मना न कर सकी. वह मेरे साथ चल दी. थोड़ी देर बाद रमण भी वहां पहुंच गया. उस का चेहरा उतरा हुआ था. खैर, कुछ दिनों बाद वह बात आईगई हो गई.

सुमन और मेरे बीच कुछ है या हो सकता है, रमण ने इस बारे में कभी कल्पना भी नहीं की थी और उसे कभी इस बात की भनक तक नहीं लगी.

कालेज में छात्र यूनियन के चुनावों के दौरान खूब हुड़दंग हुआ. रमण ने चुनाव जीतने के लिए दिनरात एक कर दिया. वह तो चुनाव रणनीति बनाने में ही बिजी रहा. वह जीत भी गया.

चुनाव प्रचार के दौरान मुझे सुमन के साथ कुछ पल गुजारने का मौका मिला. न वह अपने दिल की बात कह पाई और न

ही मेरे मुंह से ऐसा कुछ निकला. दोनों सोचते रहे कि पहल

कौन करे.

जब कभी कहीं अकेले सुमन के साथ बैठने का मौका मिलता तो हम ज्यादातर खामोश ही

बैठे रहते.

एक दिन तो रमण ने कह ही दिया था कि तुम दोनों गूंगों की अपनी ही

कोई भाषा है. सचमुच सच्चे प्यार में चुप रह कर ही दिल से सारी बातें करनी होती हैं.

मैं एमए की पढ़ाई करने के लिए यूनिवर्सिटी चला गया. रमण ने बीए कर के घर में खेती में ध्यान देना शुरू कर दिया. साथ में नौकरी के लिए तैयारी करता रहता.

मैं महीनेभर बाद गांव आता तो फटाफट रमण से मिलने उस के गांव में चल देता. वह मुझे सुमन की खबरें देता.

रमण को जल्दी ही अस्थायी तौर पर सरकारी नौकरी मिल गई. सुमन भी वहीं थी. सुमन के पिता को हार्टअटैक हुआ था, इसीलिए सुमन को जौब की सख्त जरूरत थी.

काफी अरसा हो गया था. सुमन से मेरी कोई मुलाकात नहीं हुई. मौका पा कर मैं उस के कसबे में चक्कर लगाता, उस कैफे में कई बार जाता, मगर मुझे सुमन का कोई अतापता न मिलता.

मेरी हालत उस बदकिस्मत मुसाफिर की तरह थी, जिस की बस उसे छोड़ कर चली गई थी और बस में उस का सामान भी रह गया था.

संकोच के मारे मैं रमण से सुमन के बारे में ज्यादा पूछताछ नहीं कर सकता था. रमण के आगे मैं गिड़गिड़ाना नहीं चाहता था. मुझे उम्मीद थी कि अगर मेरा प्यार सच्चा हुआ तो सुमन मुझे जरूर मिलेगी.

सुमन को तो उस की जौब में पक्का कर दिया गया. उस में काम के प्रति लगन थी. रमण को 6 महीने बाद निकाल दिया गया.

रमण को जब नौकरी से निकाला गया, तब वह जिंदगी और सुमन के बारे में संजीदा हुआ. उस के इस जुनून से मैं एक बार तो घबरा गया.

अब तक वह सुमन को शर्तिया तौर पर अपना मानता था, मगर अब उसे लगने लगा था कि अगर उसे ढंग की नौकरी नहीं मिली तो सुमन भी उसे नहीं मिलेगी.

इसी दौरान मैं ने सुमन से उस के औफिस जा कर मिलना शुरू कर दिया था. मैं उसे साहित्य के क्षेत्र में अपनी उपलब्धियां बताता. उसे खास पत्रिकाओं में छपी अपनी रोमांटिक कविताएं दिखाता.

रमण ने सुमन को बहुत ही गंभीरता से लेना शुरू कर दिया था. रमण मुझे कई कहानियां सुनाता कि आज उस ने सुमन के साथ फलां होटल में लंच किया और आज वे किसी दूसरे शहर घूमने गए. सुमन के साथ अपने अंतरंग पलों का बखान वह मजे ले कर करता.

पहले रमण का सुमन के प्रति लापरवाही वाला रुख मुझे आश्वस्त कर देता था कि सुमन मुझे भी चाहती है, मगर अब रमण सच में सुमन से प्यार करने लगा था. ऐसे में मेरी उलझनें बढ़ने लगी थीं.

फिर एक अनुभाग में मुझे और रमण को नियुक्ति मिली. रमण खुश था कि अब वह सुमन को प्रपोज करेगा तो वह न नहीं कहेगी. मैं चुप रहता.

मैं सोचने लगा कि अब अगर कुछ उलटफेर हो तभी मेरी और सुमन में नजदीकियां बढ़ सकती हैं. हमारा औफिस सभी विभागों के बिल पास करता था. यहां प्रमोशन के चांस बहुत थे. मैं विभागीय परीक्षाओं की तैयारी में जुट गया.

एक दिन मैं और रमण साथ बैठे थे, तभी अंदर से रमण के लिए बुलावा

आ गया.

5 मिनट बाद रमण मुसकराता हुआ बाहर आया. उस ने मुझे अंदर जाने को कहा. अंदर जिला शिक्षा अधिकारी बैठे थे. वे मुझे अच्छी तरह से जानते थे. मेरे बौस ने ही सारी बात बताई, ‘बेटा, वैसे तो मुझे यह बात सीधे तौर पर तुम से नहीं करनी चाहिए. कौशल साहब को तो आप जानते ही हैं. मैं इन से कह बैठा कि हमारे औफिस में 2 लड़कों ने जौइन किया है. इन की बेटी बहुत सुंदर और होनहार है. ये करोड़पति हैं. बहुत जमीन है इन की शहर के साथ.

‘ये चाहते हैं कि तुम इन की बेटी को देख लो, पसंद कर लो और अपने घर वालों से सलाह कर लो.

‘रमण से भी पूछा था, मगर उस ने कोई संतोषजनक जवाब नहीं दिया. अब तुम्हें मौका मिल रहा है.’

रमण से मैं हर बार उन्नीस ही पड़ता था. बारबार कुदरत हमारा मुकाबला करवा रही थी. एक तरफ सुमन थी और दूसरी तरफ करोड़ों की जायदाद.

घरजमाई बनने के लिए मैं तैयार नहीं था और सुमन से इतने सालों से किया गया प्रेम…

फिर पता चला कि शिक्षा अधिकारी ने रमण के मांबाप को राजी कर लिया है. रमण ने अपना रास्ता चुन लिया था. सुमन से सारे कसमेवादे तोड़ कर वह अपने अमीर ससुराल चला गया था. मैं प्रमोशन पा कर दिल्ली चला गया था.

सुमन का रमण के प्रति मोह भंग हो गया था. सुमन ने एक दूसरी नौकरी ले ली थी और 2 साल तक मुझे उस का कोई अतापता नहीं मिला.

बहन की शादी के बाद मैं भी अखबारों में अपनी शादी के लिए इश्तिहार देने लगा था. सुमन को मैं ने बहुत ढूंढ़ा. इस के लिए मैं ने करोड़पति भावी ससुर का औफर ठुकरा दिया था. वह सुमन भी अब न जाने कहां गुम हो गई थी. उस ने मुझे हमेशा सस्पैंस में ही रखा. मैं ने कभी उसे साफसाफ नहीं कहा कि मैं क्या चाहता हूं और वह पगली मेरे प्यार की शिद्दत नहीं जान पाई.

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अखबारों के इश्तिहार के जवाब में मुझे एक दिन सुमन की मां द्वारा भेजा हुआ सुमन का फोटो और बायोडाटा मिला. मैं तो निहाल हो गया. मुझे लगा कि मुझे खोई हुई मंजिल मिल गई है. मैं तो सरपट भागा. मेरे घर वाले हैरान थे कि कहां तो मैं लड़कियों में इतने नुक्स निकालता था और अब इस लड़की के पीछे दीवाना हो गया हूं.

शादी के बाद भी लोग पूछते रहते थे कि क्या तुम्हारी शादी लव मैरिज थी या अरैंज्ड तो मैं ठीक से जवाब नहीं दे पाता था. मैं तो मुसकरा कर कहता था कि सुमन से ही पूछ लो.

सुमन से शादी के बाद रमण के बारे में मैं ने कभी उस से कोई बात नहीं की. सुमन ने भी कभी भूले से रमण का नाम नहीं लिया.

वैसे, रमण सुंदर और स्मार्ट था. सुमन कुछ देर के लिए उस के जिस्मानी खिंचाव में बंध गई थी. रमण ने उस के मन को कभी नहीं छुआ.

जब रमण ने सुमन को बताया होगा कि उस के मांबाप उस की सुमन से शादी के लिए राजी नहीं हो रहे हैं तो सुमन ने कैसे रिएक्ट किया होगा.

रमण ने यह तो शायद नहीं बताया होगा कि करोड़पति बाप की एकलौती बेटी से शादी करने के लिए वह सुमन को ठुकरा रहा है. मगर जिस लहजे में रमण ने बात की होगी, सुमन सबकुछ समझ गई होगी. तभी तो वह दूसरी नौकरी के बहाने गायब हो गई.

इन 2 सालों में सुमन ने मेरे और रमण के बारे में कितना सोचाविचारा होगा. रमण से हर लिहाज में मैं पहले रैंक पर रहा, मगर सुंदरता में वह मुझ से आगे था.

आज रमण के बेटे की सगाई का समाचार पा कर मैं सोच में था कि रमण के घर जाएं या नहीं.

सुमन ने सुना तो जाने में कोई खास दिलचस्पी भी नहीं दिखाई. उसे यकीन था कि अब रमण का सामना करने में उसे कोई झेंप या असहजता नहीं होगी. इतने सालों से रमण अपने ससुराल में ही रह रहा था. सासससुर मर चुके थे. इतनी लंबीचौड़ी जमीन शहर के साथ ही जुट गई थी. खुले खेतों के बीच रमण की आलीशान कोठी थी. खुली छत पर पार्टी चल रही थी.

रमण ने सुमन को देख कर भी अनदेखा कर दिया. एक औपचारिक सी नमस्ते हुई. अब मैं रमण का बौस था, रमण के बेटे और होने वाली बहू को पूरे औफिस की तरफ से उपहार मैं ने सुमन के हाथों ही दिलवाया.

पहली बार रमण ने हमें हैरानी से देखा था, जब मैं और सुमन उस के घर के बाहर कार से साथसाथ उतरे थे. वह समझ गया था कि हम मियांबीवी हैं.

दूर तक फैले खेतों को देख कर मेरे मन में आया कि ये सब मेरे हो सकते थे, अगर उस दिन मैं जिला शिक्षा अधिकारी की बात मान लेता.

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उस शाम सारी महफिल में सुमन सब से ज्यादा खूबसूरत लग रही थी. शायद उसे देख कर रमण के मन में भी आया होगा कि अगर वह दहेज के लालच में न पड़ता तो सुमन उस की हो सकती थी. चलो, जिस की जो चाहत थी, उसे मिल गई थी.

एतराज

लेखक- अशरफ खान

अभी जमाल बैठा प्रिंसिपल साहब से बातें कर ही रहा था कि एक 10-11 साल का बच्चा वहां आया और उसे कहने लगा, ‘‘जमींदार साहब ने आप को बुलाया है.’’

यह सुन कर जमाल ने हैरानी से प्रिंसिपल साहब की तरफ देखा.

‘‘इस गांव के जमींदार बड़े ही मिलनसार इनसान हैं… जब मैं भी यहां नयानया आया था तब मुझे भी उन्होंने बुलाया था. कभीकभार वे खुद भी यहां आते रहते हैं… चले जाइए,’’ प्रिंसिपल साहब ने कहा तो जमाल उठ कर खड़ा हो गया.

जब जमाल जमींदार साहब के यहां पहुंचा तो वे बड़ी गर्मजोशी से मिले. सुर्ख सफेद रंगत, रोबीली आवाज के मालिक, देखने में कोई खानदानी रईस लगते थे. उन्होंने इशारा किया तो जमाल भी बैठ गया.

‘‘मुझे यह जान कर खुशी हुई कि आप उर्दू के टीचर हैं, वरना आजकल तो कहीं उर्दू का टीचर नहीं होता, तो कहीं पढ़ने वाले छात्र नहीं होते…’’

जमींदार साहब काफी देर तक उर्दू से जुड़ी बातें करते रहे, फिर जैसे उन्हें कुछ याद आया, ‘‘अजी… अरे अजीजा… देखो तो कौन आया है…’’ उन्होंने अंदर की तरफ मुंह कर के आवाज दी.

एक अधेड़ उम्र की औरत बाहर आईं. वे शायद उन की बेगम थीं.

‘‘ये नए मास्टर साहब हैं जमाल. हमारे गांव के स्कूल में उर्दू पढ़ाएंगे,’’ यह सुन कर जमींदार साहब की बेगम ने खुशी का इजहार किया, फिर जमाल से पूछा, ‘‘घर में और कौनकौन हैं?’’

जमाल ने कम शब्दों में अपने बारे में बताया.

‘‘अरे, कुछ चायनाश्ता लाओ…’’ जमींदार साहब ने कहा.

‘‘नहीं, इस की कोई जरूरत नहीं है,’’ जमाल बोला.

‘‘ऐसा कैसे हो सकता है… आप के प्रिंसिपल साहब भी कभीकभार यहां आते रहते हैं और हमारी मेहमाननवाजी का हिस्सा बनते हैं.’’

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‘‘जी, उन्होंने ऐसा बताया था,’’ जमाल ने कहा.

कुछ देर बाद वे चायनाश्ता ले कर आ गईं… जमाल ने चाय पी और उठ कर खड़ा हो गया, ‘‘अच्छा, अब मुझे इजाजत दीजिए.’’

‘‘हां, आते रहना.’’

जमाल दरवाजे के पास था. उन लोगों ने आपस में खुसुरफुसुर की और जमींदार साहब ने उसे आवाज दी, ‘‘अरे बेटा, सुनो… आज रात का खाना तुम हमारे साथ यहीं पर खाना.’’

‘‘नहीं… नहीं… आप परेशान न हों. चची को परेशानी होगी,’’ जमाल ने जमींदार साहब की बेगम को चची कह कर मना करना चाहा.

‘‘अरे, इस में परेशान होने की क्या बात है… तुम मेरे बेटे जैसे ही हो.’’

जमाल रात के खाने पर आने का वादा कर के चला गया.

जब जमाल रात को खाने पर दोबारा वहां पहुंचा तो जमींदार साहब और उन की बेगम उस के पास बैठे हुए थे. इधरउधर की बातें कर रहे थे. इतने में अंदर जाने वाले दरवाजे पर दस्तक हुई…

चची ने दरवाजे की तरफ देखा और उठ कर चली गईं… लौटीं तो उन के हाथ में खाने की टे्र थी.

जमाल का खाना खाने में दिल नहीं लग रहा था. रहरह कर उस की बेचैनी बढ़ती जा रही थी… आखिर दरवाजे की उस ओर कौन था? बहरहाल, किसी तरह खाना खाया और थोड़ी देर के बाद वह वहां से चला आया.

उस दिन रविवार था. जमाल बैठा बोर हो रहा था.

‘क्यों न जमींदार साहब की तरफ चला जाया जाए,’ उस ने सोचा.

जमाल तेज कदमों से लौन पार करता हुआ अंदर जा रहा था. उस की आहट पा कर एक लड़की हड़बड़ा कर खड़ी हो गई… वह क्यारियों में पानी दे रही थी. जमाल उसे गौर से देखता रहा. वह सफेद कपड़ों में थी. वह भी उसे देखती रही.

‘‘जमींदार साहब हैं क्या?’’ जमाल ने पूछा तो कोई जवाब दिए बगैर वह अंदर चली गई.

कुछ देर बाद जमींदार साहब अखबार लिए बाहर आए, ‘‘आओ बेटा, आओ…’’

जमाल उन के साथ अंदर दाखिल हो गया. उन के हाथ में संडे मैगजीन का पन्ना था. उन्होंने जमाल के सामने वह अखबार रखते हुए कहा, ‘‘देखो, इस में मेरी बहू की गजल छपी है…’’

जमाल ने गजल को सरसरी नजरों से देखा, फिर नीचे नजर दौड़ाई तो लिखा था, शबीना अदीब.

जमाल को उस लड़की के सफेद लिबास का खयाल आया. उस ने जमींदार साहब की आंखों में देखा. शायद वे उस की नजरों का मतलब समझ गए थे. उन्होंने नजरें झुका लीं और फिर उन्होंने जोकुछ बताया था, वह यह था:

शबीना जमींदार साहब की छोटी बहन हसीना की बेटी थी. शबीना की पैदाइश के वक्त हसीना की मौत हो गई थी और बाप ने दूसरा निकाह कर लिया था. सौतेली मां का शबीना के साथ कैसा बरताव होगा, यह सोच कर जमींदार साहब ने उसे अपने पास रख लिया था.

अदीब जमींदार साहब का बेटा था. शबीना और अदीब ने अपना बचपन एकसाथ गुजारा था, तितलियां पकड़ी थीं और जब दोनों ने जवानी की दहलीज पार की तो उन का रिश्ता पक्का कर दिया गया था.

उन की नईनई शादी हुई थी. अदीब ने आर्मी जौइन की थी. कोई जाने की इजाजत नहीं दे रहा था, लेकिन वह सब को मायूसी के अंधेरे में छोड़ कर चला गया. एक दिन वह वतन की हिफाजत करतेकरते शहीद हो गया.

शबीना पर गमों का पहाड़ टूट पड़ा. आंसू थे कि थमने का नाम नहीं ले रहे थे. फिर उस ने खुद को पत्थर बना लिया और कलम उठा ली, अपना दर्द कागज पर उतारने के लिए या अदीब का नाम जिंदा रखने के लिए.

अब जमाल अकसर जमींदार साहब के यहां जाता था. दिल में होता कि शबीना के दीदार हो जाएं… उस की एक झलक देख ले… लेकिन, वह उसे दोबारा नजर नहीं आई.

एक दिन जमाल उन के यहां बैठा हुआ था. जमींदार साहब किसी काम से शहर गए हुए थे. जमाल और उन की बेगम थे. वह बात का सिरा ढूंढ़ रहा था. आज जमाल उन से अपने दिल की बात कह देना चाहता था.

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‘‘चची, आप मुझे अपना बेटा बना लीजिए,’’ जमाल ने हिम्मत जुटाई.

‘‘यह भी कोई कहने की बात है…

तू तो है ही मेरा बेटा…’’ उन्होंने हंस

कर कहा.

‘‘चची, मुझे अपने अदीब की जगह दे दीजिए. मेरा मतलब है कि शबीना का हाथ मेरे हाथ…’’ जमाल का इतना कहना था कि उन्होंने जमाल की आंखों में देखा.

‘‘अगर आप को कोई एतराज न

हो तो…’’

‘‘मुझे एतराज है,’’ इस से पहले कि वे कोई जवाब देतीं, इस आवाज के

साथ शबीना खड़ी थी, किसी शेरनी की तरह बिफरी हुई… फटीफटी आंखों से देखती हुई…

‘‘आप ने ऐसा कैसे सोच लिया… अदीब की यादें मेरे साथ हैं. वे मेरे जीने का सहारा हैं… मैं यह साथ कैसे छोड़ सकती हूं… मैं शबीना अदीब थी, शबीना अदीब हूं… शबीना अदीब रहूंगी. यही मेरी पहचान है… मैं इसी पहचान के साथ ही जीना चाहती हूं…’’ अपना फैसला सुना कर वह अंदर कमरे में जा चुकी थी.

जमाल ने चची की आंखों में देखा तो उन्होंने नजरें झुका लीं. जमाल उठ कर बाहर चला आया.

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कुछ दिनों के बाद जमाल शहर जाने वाली बस के इंतजार में बसस्टैंड पर खड़ा था. इतने में एक बस वहां आ कर रुकी. उस ने अलविदा कहती नजरों से गांव की तरफ देखा और बस में सवार हो गया. उस ने नौकरी छोड़ दी थी.   द्य

आ बैल मुझे मार

लेखक- रंजीत कुमार मिश्र

बात शायद आप की भी समझ में नहीं आ रही है. दरअसल, हम अपनी ही बात कर रहे हैं. चलिए, आप को पूरा किस्सा सुना देते हैं.

तकरीबन 2 हफ्ते पहले हम अपनी खटारा मोटरसाइकिल पर शहर से बाहर रहने वाले एक दोस्त से मिल कर वापस लौट रहे थे. शाम हो गई थी और अंधेरा भी घिर आया था. हम जल्दी घर पहुंचने के चक्कर में खूब तेज मोटरसाइकिल चला रहे थे.

अचानक हम ने सड़क के किनारे एक आदमी को पड़े देखा. पहले तो हमें लगा कि कोई नशेड़ी है जो सरेआम नाली में पड़ा है, लेकिन नजदीक पहुंचने पर हमें उस के आसपास खून भी दिखा. लगता था कि किसी ने उस को अपनी गाड़ी से टक्कर लगने के बाद किनारे लगा दिया था.

पहले तो हम ने भी खिसकने की सोची. यह भी दिमाग में आया कि इस लफड़े में पड़ना ठीक नहीं, लेकिन ऐन वक्त पर दिमाग ने खिसकने से रोक दिया.

हम ने उस आदमी को उठा कर अच्छी तरह से किनारे कर दिया. उस के सिर में गहरी चोट लगी थी. खून रुक नहीं रहा था. शायद उस के हाथ की हड्डी भी टूट गई थी.

गनीमत यह थी कि वह आदमी जिंदा था और धीरेधीरे उस की सांसें चल रही थीं. हम ने भी उसे बचाने की ठान ली और आतीजाती गाडि़यों को रुकने के लिए हाथ देने लगे.

बहुत कोशिश की, पर कोई गाड़ी  नहीं रुकी. परेशान हो कर जैसे ही हम ने हाथ देना बंद किया, वैसे ही एक टैक्सी हमारे पास आ कर रुकी. शायद वह भी हमारी तरह अपने खालीपन से परेशान था. जो भी हो, उस ने हमें बताया कि शहर तक जाने के लिए वह दोगुना किराया लेगा और मुरदे के लिए तिगुना.

हम ने बड़े सब्र के साथ बताया कि यह मुरदा नहीं, जिंदा है और हमारी यह पूरी कोशिश होगी कि इसे बचाया जा सके. हम ने उस से यह भी कहा कि वह जख्मी को टैक्सी में ले कर चले, जबकि हम अपनी खटारा मोटरसाइकिल से पीछेपीछे आएंगे. हमारे लाख समझाने पर भी टैक्सी वाला उसे अकेले टैक्सी में ले जाने को तैयार नहीं हुआ.

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अब हम ने सिर पर कफन बांध

लिया था, सो खटारा मोटरसाइकिल

को अच्छी तरह से तालों से बंद किया और टैक्सी में बैठ गए. थोड़ी देर

में जख्मी को साथ ले कर सरकारी अस्पताल पहुंच गए.

बड़ी मुश्किल से हम वहां डाक्टर ढूंढ़ पाए, पर उस ने भी जख्मी को भरती करने से साफ इनकार कर दिया. हम से कहा गया कि यह पुलिस केस है. पुलिस को बुला कर लाओ, तब देखेंगे.

हम ने फोन मांगा, तो डाक्टर ने फोन खराब होने का बहाना बना दिया. तब हम ने थाने का रास्ता पूछा.

जब हम थाने पहुंचे तो पूरा थाना खाली पड़ा था. महज एक सिपाही

कोने में खड़ा था. हम ने उसे जल्दीजल्दी पूरा हाल बताया और साथ में चलने

को कहा.

वह थोड़ी देर कुछ सोचता रहा, फिर बोला, ‘‘देखिए, थोड़ी देर रुक जाइए. अभी साहब लोग अंदर वाले कमरे में बिजी हैं, क्योंकि एक मुजरिम से पूछताछ हो रही है. वे आ जाएंगे, तभी कोई फैसला लेंगे.’’

हम अभी उसे आदमी की जान की कीमत समझाने की कोशिश कर ही रहे थे कि अंदर वाले कमरे से 3-4 पुलिस वाले पसीना पोंछते हुए बाहर आए. उन के चेहरे से लग रहा था कि वे मुजरिम से अपने तरीके से पूछताछ कर के निकले हैं.

हम वरदी पर सब से ज्यादा सितारे लगाए एक पुलिस वाले के पास फुदक कर पहुंचे और अपनी बात कहने की कोशिश की. ठीक से बात शुरू होने से पहले ही उस ने एक जोर की उबासी ली और हम से कहा कि अपनी रामकहानी जा कर हवलदार को सुनाओ और रिपोर्ट भी लिखवा दो. उस के बाद देखा जाएगा कि क्या किया जा सकता है.

हम भाग कर हवलदार साहब के पास गए और जख्मी का इलाज कराने की अपील की.

हवलदार ने पूछा, ‘‘आप का क्या लगता है वह?’’

‘‘जी, कुछ नहीं.’’

‘‘तो मरे क्यों जा रहे हैं आप? देखते नहीं, हम कितना थक कर आ रहे हैं.

2 मिनट का हमारा आराम भी आप से बरदाश्त नहीं होता क्या?’’

‘‘देखिए हवलदार साहब, आप का यह आराम उस बेचारे की जान भी ले सकता?है. आप समझते क्यों नहीं…’’

‘‘आप क्यों नहीं समझते. मरनाजीना तो लगा रहता है. जिस को जितनी सांसें मिली हैं, उतनी ही ले पाएगा.

‘‘और आप से किस ने कहा था कि मौका ए वारदात से उसे हिलाने के लिए. बड़े समझदार बने फिरते हैं, सारा सुबूत मिटा दिया. गाड़ी का नंबर भी नोट नहीं किया. अब कैसे पता चलेगा कि उसे कौन साइड मार कर गया था. पता लग जाता तो केस बनाते.’’

हम भी तैश में आ गए, ‘‘आप को सुबूतों की पड़ी है, जबकि यहां किसी भले आदमी की जान पर बनी है. आप की ड्यूटी यह है कि पहले उसे बचाएं. सारे कानून आम आदमी की सहूलियत के लिए बनाए गए हैं, न कि उसे तंग करने के लिए.’’

‘‘अच्छा, तो अब आप ही हम पर तोहमत लगा रहे हैं कि हम आप को तंग कर रहे हैं.’’

‘‘जी नहीं, हमारी ऐसी मजाल कहां कि हम आप को…’’

‘‘अच्छाअच्छा चलेंगे. जहां आप ले चलिएगा, वहां भी चलेंगे. बस, जरा यहां साहब का राउंड आने वाला है, उस को थोड़ा निबटा लें. उस के बाद चलते हैं. तब तक आप हमें कहानी सुनाइए कि क्या हुआ था और आप उसे कहां से ले कर आए हैं?’’

‘‘जी, हम उसे हाईवे पर सुलतानपुर चौक के पास से ले कर आए हैं और…’’

‘‘रुकिएरुकिए, क्या कहा आप ने? सुलतानपुर चौक. अरे, तो आप यहां हमारा टाइम क्यों खराब कर रहे हैं? वह इलाका तो सुलतानपुर थाने में आता है. आप को वहीं जाना चाहिए था.’’

‘‘लेकिन, वह यहां के अस्पताल में भरती होने जा रहा है. आप एफआईआर तो लिखिए.’’

‘‘अरे साहब, आप भी न… देखिए तो, कितनी मेहनत से आज कई एफआईआर की किताबें कवर लगा कर तैयार की हैं, राउंड के लिए. आप इसे खराब क्यों करना चाहते हैं?’’ इतना कह कर हवलदार एक सिपाही की ओर मुंह कर के फिर चिल्लाया, ‘‘अबे गोपाल, आज रमुआ नहीं आया था क्या रे? देख तो ठीक से झाड़ू तक नहीं लगी दिखती है. डीसीपी साहब देखेंगे तो क्या सोचेंगे कि हम लोग कितने गंदे रहते हैं.’’

हमें खीज तो बहुत आ रही थी, मगर क्या कर सकते थे? मन मार कर सब्र किए उन की अपनी वरदी के लिए वफादारी को देखते रहे. हम भी कुछ देर तक कोशिश करते रहे शांत रहने की, लेकिन उन के रवैए से हमारा खून खौलने लगा और हम भड़क उठे, ‘‘आप का यह राउंड किसी की जान से ज्यादा जरूरी है क्या?

‘‘अगर राउंड के समय डीसीपी साहब को सैल्यूट मारने वाले 2 आदमी कम हो जाएंगे तो क्या भूकंप आ जाएगा? आप भी कामचोर हैं. जनता के पैसे से तनख्वाह ले कर भी काम करने में लापरवाही करते हैं.’’

दारोगा बाबू को इस पर गुस्सा आ गया और वे चिल्ला कर बोले, ‘‘अबे धनीराम, बंद कर इसे हवालात के अंदर. इतनी देर से चबरचबर किए जा रहा है. डाल दे इस पर सुबूत मिटाने का इलजाम. और अगर गाड़ी ठोंकने वाला न पकड़ा जाए, तो बाद में वह इलजाम भी इसी पर डाल देना. हमें हमारा काम सिखाता है. 2 दिन अंदर रहेगा, तो सारी हेकड़ी हवा हो जाएगी.’’

सचमुच हमारी हेकड़ी इतने में ही हवा होने लगी. कहां तो किसी की जान बचाने के लिए मैडल मिलने की उम्मीद कर रहे थे और कहां हथकड़ी पहनने की नौबत आ गई.

हम ने घिघियाते हुए कहा, ‘‘हेंहेंहें… आप भी साहब, बस यों ही नाराज हो जाते हैं. हम लोग तो सेवक हैं आप के. गुस्सा थूक दीजिए और जब मरजी आए चलिए, न मरजी आए तो न चलिए. रिपोर्ट भी मत लिखिए, मरने दीजिए उस को यों ही… हम चलते हैं, नमस्ते.’’

हम जान बचा कर भागने की फिराक में थे कि अगर अपनी जान बची, तभी तो दूसरों को बचाने की कोशिश कर सकेंगे. इतने में डीसीपी साहब थाने में दाखिल हो गए.

हुआ यह कि डीसीपी साहब ने हम से आने की वजह पूछ ली. खुन्नस तो खाए हुए थे ही, सो हम ने झटपट पूरी कहानी सुना दी.

उन्होंने पूरे थाने को जम कर लताड़ा और दारोगा बाबू को हमारे साथ जाने को कहा. सुलतानपुर थाने को भी खबर कर अस्पताल पहुंचने का निर्देश देने को कहा. अभी उन का जनता और पुलिस के संबंधों पर लैक्चर चल ही रहा था कि हम चुपके से सरक गए.

हम दारोगा बाबू और हवलदारजी के साथ अस्पताल पहुंचे, जहां वह घायल बेचारा एक कोने में बेहोश पड़ा था.

हम चलने लगे तो दारोगा ने कहा, ‘‘कहां चल दिए आप? अभी तो आप ने मधुमक्खी के छत्ते में हाथ डाला है. उस का डंक नहीं भुगतेंगे?

‘‘अब यह मामला कानून के लंबे हाथों में पहुंच गया है, तो सरकारी हो गया. आप का काम तो अभी शुरू ही हुआ है.

‘‘आप बैठिए इधर ही, इसे होश में आने के बाद इस का बयान लिया जाएगा. तब तक आप अपना बयान लिखवा कर टाइम पास कीजिए. उस के बाद ही हम मिल कर सोचेंगे कि आप का क्या करना है.

‘‘अगर गाड़ी वाला गलती से पकड़ा गया, तो समझिए कि आप को कोर्ट में हर पेशी पर गवाही के लिए आना होगा. आज की दुनिया में भलाई करना इतना आसान थोड़े ही रह गया है.’’

‘‘मेरे बाप की तोबा हवलदार साहब, अगर मैं ने दोबारा कभी ऐसी गलती की तो… अभी तो मुझे यहां से जाने दीजिए, बालबच्चों वाला आदमी हूं. बाद में जब बुलाइएगा, तभी मैं हाजिर हो जाऊंगा,’’ कहते हुए हमारा दिमाग चकराने लगा.

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इतनी देर में ही डाक्टर साहब बाहर निकल आए और आते ही उन्होंने ऐलान किया कि मरीज को होश आ गया है. कोई एक पुलिस वाला जा कर उस का बयान ले सकता है.

दारोगा बाबू हवलदार साहब को हमारे ऊपर निगाह रखने की हिदायत दे कर अंदर चले गए.

उस आदमी का अंदर बयान चल रहा था और बाहर बैठे हम सोच रहे थे कि वह अपनी जान बचाने के लिए किस तरह से हमारा शुक्रगुजार होगा. कहीं लखपति या करोड़पति हुआ, तो अपने वारेन्यारे हो जाएंगे.

20-25 मिनट बाद दारोगा बाबू वापस आए और हमें घूरते हुए हवलदार से बोले, ‘‘धनीराम, हथकड़ी डाल इसे और घसीटते हुए थाने ले चल. वहां इस के हलक में डंडा डाल कर उगलवाएंगे कि इस जख्मी के 50,000 रुपए इस ने कहां छिपा रखे हैं.

‘‘उस ने बयान दिया है कि किसी ने उसे पीछे से गाड़ी ठोंक दी थी और उस के पैसे भी गायब हैं.

‘‘मैं ने इस का हुलिया बताया, तो उस ने कहा कि ऐसा ही कोई आदमी टक्कर के बाद सड़क पर उसे टटोल रहा था. खुद को बहुत चालाक समझता है.

‘‘यह सोचता है कि इसे बचाने

की इतनी ऐक्टिंग करने से हम पुलिस वाले इस पर शक नहीं करेंगे. बेवकूफ समझता है यह हम को. ले चल इसे, करते हैं खातिरदारी इस की.’’

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देखते ही देखते हमारे हाथों में हथकड़ी पड़ गई और हम अपने सदाचार का मातम मनाते हुए पुलिस वालों के पीछे चल पड़े.

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