एमी जैक्सन ने शेयर की टौपलेस फोटो, यूं दिखाया बेबी बंप

बौलीवुड और सोशल मीडिया क्वीन के नाम से मशहूर एक्ट्रेस एमी जैक्सन एक बार फिर फैंस को चौकाने आ गई है. हर बार की तरह एमी इस बार भी अपनी प्रेग्नेंसी फोटोज को लेकर चर्चाओं में हैं. एमी प्रेग्नेंसी के 33वें हफ्ते में है जिसके कारण से उनके शरीर में बदलाव आए है. इसके चलते उन्होने अपना नया फोटोशूट फैंस के साथ शेयर किया जिसमें वो काफी हौट लग रही है. इन फोटो की खास बात है की इसमें एमी टौपलेस है. इस खूबसूरत फोटो के जरिए एमी अपना बेबी बम्प बड़ी ही खूबसूरती के साथ फ्लौन्ट करती हुई नजर आ रही है. एमी ने जो बड़ा सा हैट पहन रखा है, वह यकीनन आपका ध्यान जरुर खींचेगा. एमी अपनी प्रेग्नेंसी पोटोज को लेकर काफी पौपुलर है, और फैंस भी उनकी फोटोज का वैट करते रहते हैं.

बगीचे के पीछे ही बिताई पूरी गरमी

इस फोटो को शेयर करते हुए एमी ने कैप्शन में लिखा है कि ग्रीस… नहीं मैं और मेरे बच्चे ने पूरे गर्मी को बगीचे के पीछे ही बिताया है…उसके छोटे से ही अपीयरेंस के इंतजार में हूं. अब मैं अपनी प्रेग्नेंसी के 33वें हफ्ते में हूं. इस दौरान मेरा बम्प, स्ट्रेच मार्क, वेट गेट सब कुछ देखने को मिला. इस कैप्शन को एमी ने #Motherhood के साथ शेयर किया है.

काले रंग की ड्रेस में भी दिखा चुकी है कमाल

इस कैप्शन को पढ़कर तो आप समझ ही गए होंगे कि एमी अपने पहले बच्चे के लिए कितनी एक्साइटेड है. इससे पहले एमी की कुछ और तस्वीरें तेजी से वायरल हुई थी, जिसमें वह काले रंग की खूबसूरत ड्रेस में अपना बेबी बम्प फ्लौन्ट कर रही थी. इस तस्वीर में एमी ने काले रंग की हैट पहनी हुई थी.

 

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Wurrrkin Mamma | thrilled to bitssss with these images from this fabulous female @samaramorrisphotographer

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बौयफ्रेंड से की सगाई

एमी ने दो महीने पहले ही लंदन में अपने बौयफ्रेंड George Panayiotou के साथ सगाई की थी. इतना ही नहीं एमी और उनके बौयफ्रेंड ने एक जाने माने मैगजीन के लिए फोटोशूट भी करवाया था.

डिलीवरी के 4 महीने बाद ही हौट अंदाज में नजर आईं सुरवीन चावला

बौलीवुड और ‘सेक्रेड गेम्स’ फेम स्टार एक्ट्रेस सुरवीन चावला हाल ही में मां बनी है. इस खुशी के पल को सुरवीन ने काफी अच्छे से एंजौय किया. अपनी डिलीवरी के बाद सुरवीन ने अपने बौडी पर भी काम करना शुरु कर दिया है. कुछ दिन पहले सुरवीन ने इंस्टाग्राम पर कुछ फोटोज शेयर की  जिसमें साफ दिख रहा है की उन्होंने फिर से बौडी को शैप मे लाना शुरु कर दिया है. बेटी के जन्म के कुछ दिनों बाद ही एक्ट्रेस स्लिम बौडी फ्लौन्ट करती दिखी. सरवीन की इन फोटोज को काफी शेयर किया जा रहा हैं. इन फोटोज में सुरवीन स्विमिंग पूल में काफी हौट अंदाज में नजर आई.

शैप में आई सुरवीन

प्रेग्नेंसी फिर डिलिवरी के बाद बौडी को शैप में लाना काफी मुस्किल होता है पर सुरवीन ने काफी जल्दी इस मेकओवर को कर लिया. सुरवीन ने इसी साल 15 अप्रैल को बेटी को जन्म दिया. सुरवीन ने बमुश्किल 3 से 4 महीने में खुद को शैप में लेकर आ गई. इस मेकओवर को फैंस खासा पसंद कर रहे हैं. सुरवीन चावला का ये ग्लैमरस अवतार उनके चाहने वालों को बहुत पसंद आ रहा है

 

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Yes that’s right !!! 🙌🏼

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सोशल मीडिया पर है काफी एक्टिव

सुरवीन सोशल मीडिया पर काफी एक्टिव रहती है, जिसके चलते वो अपने फैंस को अपने काम और लाइफ से रेगुलर अपडेट करती रहती हैं. इंस्टाग्राम पर सुरवीन के 1.4 मिलियन फौलोवर्स है. उनकी सभी फोटोज पर हजार से भी ज्यादा लाइक्स और कमेंट्स है.

सेक्रेड गेम्स 2′ का वेट कर रहे है फैंस

बता दें, सुरवीन चावला बहुत जल्द ‘सेक्रेड गेम्स 2’ में दिखाई देने वाली हैं. हाल ही में इसका प्रोमो रिलीज हुआ था. सुरवीन इससे पहले ‘सेक्रेड गेम्स’ के फस्ट सीजन में भी नजर आ चुकी है.

 

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Jojo is back! And so is Sacred Games with season 2! Releasing 15th August, only on Netflix! #SacredGames2 @netflix_in

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भ्रम भंग

लेखक- दिनेश पालीवाल

बहुत तेज रफ्तार से दौड़ती उस मोटरसाइकिल पर बीच में बैठी होने के बाद भी लतिका भय से कांप रही थी. भय कम हो जाए इस के लिए उस ने अभय की कमर कस कर पकड़ ली. अभय के साथ उस की मोटरसाइकिल पर वह पहली बार बैठी थी पर अब मन ही मन सोच रही थी कि आज किसी तरह बच जाए तो फिर कभी इस के साथ मोटरसाइकिल पर नहीं बैठेगी.

‘‘तुम गाड़ी धीरे नहीं चला सकते, अभय?’’ उस से सटी पीछे बैठी लतिका एक प्रकार से चिल्लाते स्वर में बोली.

हर हिचकोले के साथ लतिका से और अधिक सटने का प्रयत्न करता परमजीत हंसा और बोला, ‘‘डरो नहीं, डार्ल्ंिग, इस का अभय नाम यों ही नहीं है. इसे तो मौत का सामना करते हुए भी डर नहीं लगता.’’

‘‘लेकिन मैं लड़की हूं. इतनी तेज रफ्तार से डरती हूं. प्लीज, रोको न इसे वरना मैं चिल्लाने लगूंगी कि ये लोग मुझे जबरन कहीं भगाए लिए जा रहे हैं,’’ लतिका ने धमकी दी.

अपनी पीढ़ी की तरह रफ्तार और तेज रफ्तार जिंदगी तो लतिका को भी पसंद थी पर यह रफ्तार तो एकदम हवाई रफ्तार थी. इस में होने वाली दुर्घटना का मतलब था, शरीर का एकएक कीलकांटा बिखर जाना.

मोटरसाइकिल पर बैठेबैठे उसे याद आया कि फैसला करने में उस से गलती हो गई थी. कनक ठीक कहती थी कि ये लोग भरोसे के लायक नहीं हैं. तुम्हें अभय के प्रेम में पड़ने से पहले उस के बारे में ठीक से जान लेना चाहिए.

उस समय लतिका ने कनक की बातों पर इसलिए ध्यान नहीं दिया था क्योंकि कनक कभी खुद अभय की तरफ आकर्षित थी पर अभय ने उसे भाव नहीं दिया था क्योंकि वह एक साधारण नाकनक्श की लड़की थी.

लतिका उस के मुकाबले अपने को हर तरह से बेहतर पाती थी. शक्लसूरत में ही नहीं पढ़ाई में भी अंगरेजी से एम.ए. कर रही लतिका ने प्रथम वर्ष की परीक्षा में 75 प्रतिशत अंक पाए थे और कालिज के प्राध्यापकों ने उस की पीठ ठोंकी थी. प्रो. चोपड़ा तो उस से इतने प्रभावित हुए थे कि उन्होंने उसे एम.ए. फाइनल में एक पेपर के रूप में लघु शोध लिखने का महत्त्वपूर्ण काम भी सौंप दिया था और स्वयं ही उस के लिए एक उपयुक्त विषय का चुनाव किया था. विषय था फ्रांस की सुप्रसिद्ध उपन्यासकार  ‘साइमन बोऊवा की स्त्री स्वतंत्रता की अवधारणा और उन के उपन्यास.’ चोपड़ा साहब ने बोऊवा की एक खास पुस्तक ‘द सेकंड सेक्स’ अपने निजी पुस्तकालय से निकाल कर लतिका को पढ़ने को दी थी. यही नहीं उन्होंने खुद पत्र लिख कर लतिका को विश्वविद्यालय के केंद्रीय पुस्तकालय का सदस्य बना दिया था और इसी के बाद लतिका अपने इस महती कार्य में जुट गई थी.

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केंद्रीय पुस्तकालय एक विशाल बगीचे के बीचोंबीच बना हुआ था. मुख्य गेट से उस तक आने के लिए जो पक्की सड़क बनी थी वह उस बगीचे के घने वृक्षों और ऊंची झाडि़यों से हो कर गुजरती थी. चूंकि वहां आम लोग नहीं आतेजाते थे और वाहनों को भी बाहर ही रोक दिया जाता था इसलिए वहां भीड़भाड़ नहीं रहती थी. ज्यादातर सन्नाटा पसरा रहता था, जिसे देख कर दिन में भी भय लगता था.

लतिका 1-2 बार अपने भय को कम करने के लिए कनक को साथ लाई थी, ‘यार, बगीचे में रास्ता बेहद सुनसान हो जाता है. डर लगता है कि कहीं कोई गुंडाबदमाश दबोच ले तो क्या होगा?’

‘शहर में अभय ही एक ऐसा गुंडा है जो हमेशा अपने कालिज की लड़कियों के साथ छेड़छाड़ करता रहता है,’ कनक बोली.

‘कौन अभय? वही जो फेडेड जींस और चमड़े की काली जैकेट पहने मोटरसाइकिल पर फर्राटे भरता घूमता रहता है?

‘हां, वही. और वह कभी मोटरसाइकिल पर अकेला नहीं चलता. हमेशा 3 लड़के उस के साथ होते हैं.’

‘कुछ भी हो, मुझ से तो वह बहुत तमीज से पेश आता है,’ लतिका ने उस का पक्ष लेते हुए कहा, ‘विभाग में आतेजाते जब भी वह सामने पड़ा उस ने मेरा रास्ता छोड़ दिया.’

‘तेरा भ्रम जल्दी भंग हो जाएगा लाड़ो,’ कनक भी हंस दी थी, ‘जब किसी से इश्क हो जाता है तो बुद्धि काम नहीं करती, तर्क के तीर तरकस में पड़े जंग खाते रहते हैं और वह अंधा बना प्रेम की तरफ दौड़ता चला जाता है.’

कनक की कही हुई सब बातें अचानक मोटरसाइकिल पर बैठी लतिका को याद आ गईं. कनक के समझाने के बाद भी वह अभय व उस के दोस्तों पर विश्वास कर के इस सुनसान इलाके में उन के साथ चली आई. अगर वे इस सुनसान इलाके में उस के साथ मनमानी करने लगें तो वह इन 2 राक्षसों का क्या कर लेगी?

यह सोचते ही भय और आतंक से किसी तरह साहस कर के पूछा ही लिया, ‘‘हम लोग आखिर जा कहां रहे हैं?’’

‘‘डरो नहीं, लतिका,’’ बहुत देर की खामोशी के बाद अभय बोला, ‘‘हम लोग तुम्हारे साथ ऐसा कुछ नहीं करेंगे जिस से तुम्हें किसी तरह का नुकसान पहुंचे. असल में तुम इस मोटरसाइकिल को जिस प्यार भरी नजरों से देखती

थीं, उसे देख कर ही मैं ने तय किया था कि एक दिन तुम्हें इस पर बैठा कर

सैर कराई जाए. आज तुम साथ आने को तैयार हो गईं तो हम इधर सैर को

आ गए.’’

‘‘लेकिन इस सुनसान इलाके में क्यों?’’ किसी तरह थूक निगल कर लतिका ने कहा. उसे अब अपने पर ही गुस्सा आ रहा था कि उस ने जरा भी बुद्धि से काम नहीं लिया जबकि रोज ही अखबारों में बलात्कार की घटनाएं वह पढ़ती है. यहां तक कि केंद्रीय पुस्तकालय तक आतेजाते भी कई बार लड़कियों के साथ छेड़छाड़ हुई है फिर यह तो एकदम सुनसान और एकांत स्थान है. यहां तो ये लोग कुछ भी कर सकते हैं उस के साथ.

इसी तरह के डरावने विचारों में डूबतीउतराती लतिका को अनायास ही अपने भाई नकुल के मनोविज्ञान में चल रहे शोध की याद आ गई. वह टीनएजर्स और बाल अपराधों के मनोविज्ञान पर शोध कर रहा है. उस के शोध को टाइप करते समय उन्हें पढ़ कर वह अकसर आश्चर्यचकित हो जाती है कि इतनी कम उम्र के लड़के बलात्कार का अपराध कर गुजरते हैं.

अचानक लतिका को लगा वह गलत फंस गई. उसे इन लोगों की बातों में नहीं आना चाहिए था. पुस्तकालय गई थी. भाई अब घर पर इंतजार कर रहा होगा पर अब वह क्या करे, कैसे बचे. कैसे सुरक्षित घर पहुंचे.

लतिका की जान में तब जान आई जब अभय की मोटरसाइकिल आ कर एक छोटी बस्ती में रुक गई. उस बस्ती के बाहर ही एक पुराना सा मकान था. उस के फाटक और टूटीफूटी चारदीवारी को अभय और परमजीत गौर से देखते रहे. फिर उस मकान के चारों तरफ एक चक्कर भी लगाया.

‘‘हम यहां क्यों आए हैं?’’ लतिका ने पूछा.

‘‘एक दोस्त को देखने आए हैं,’’ अभय बोला.

‘‘दोस्त को देखना है तो अंदर जा कर देखो. तुम तो इस मकान का बारबार चक्कर लगा रहे हो.’’

परमजीत बोला, ‘‘चलो, लतिका को योगी के घर ले कर चलते हैं.’’

‘‘यह योगी कौन है?’’ लतिका ने मुसकराने का प्रयास किया.

‘‘योगी, हमारा जिगरी दोस्त है और वह यहीं रहता है,’’ अभय ने कहा और मोटरसाइकिल एक सड़क पर दौड़ा दी.

लतिका को कुछ तसल्ली हुई कि चलो, यह जगह इन के लिए अनजान जगह नहीं है. यहां भी इन का एक दोस्त रहता है जिसे वह शक्ल से पहचानती है. नाम आज जान गई….अजीब नाम है…योगी.

बहुत आवभगत की योगी ने लतिका की. काफी अच्छा मकान था उस का. मां बहुत सरल स्वभाव की. एक छोटी बहन थी जो 10वीं कक्षा में पढ़ती थी. उस से देर तक लतिका बातें करती रही. चायनाश्ते के बाद वह अभय और परमजीत के साथ वापस लौटी.

अब उसे उतना डर नहीं लग रहा था. पर एक सवाल उस के दिमाग में बारबार उठ रहा था कि आखिर अभय और परमजीत उस पुराने मकान को क्यों चारों तरफ  से घूमघूम कर गौर से देख रहे थे? अगर उन्हें योगी से ही मिलना था तो सीधे उसी के घर क्यों नहीं चले गए?

अभय लतिका को ले कर सीधे उस के घर आया. नकुल बाहर ही बेचैनी से लतिका का इंतजार कर रहा था. उन लोगों के साथ लतिका को देख कर वह गुस्से को किसी तरह जज्ब किए रहा.

अभय और परमजीत को घर में बुला कर लतिका ने पानी पिलाया. नमकीन और मिठाई खाने को दी और अपने भाई से उस का परिचय कराया. जब अभय को विदा करने लगी तो वह बोला, ‘‘मैं नकुलजी को अच्छी तरह जानता हूं. ये कम उम्र के लड़कों और बच्चों के अपराधों पर शोध कर रहे हैं और उस के लिए अकसर बालसुधार गृह और जेल व पुलिस वालों के पास आतेजाते रहते हैं. आप के पिताजी एक इंजीनियरिंग कंपनी के उत्पाद बेचने के सिलसिले में दूसरे शहरों की यात्रा करते रहते हैं. घर की देखरेख और तुम्हारी रक्षा नकुलजी ही करते हैं. मां हैं नहीं इसलिए घरगृहस्थी का सारा काम तुम करती हो. तुम प्रोफेसर चोपड़ा की खास छात्रा हो. केंद्रीय पुस्तकालय में अपने लघु शोध के सिलसिले में कनक के साथ आतीजाती हो और कनक मुझे कोसती रहती है,’’ एक सांस में सब कह गया अभय.

‘‘अरे, तुम तो मेरा पूरा इतिहास जानते हो और यह भी कि तुम्हारे बारे में कनक मुझसे क्या कहती है.’’

रात को खाना खाते समय लतिका ने हमेशा की तरह भाई नकुल को सब बता दिया. हालांकि नकुल 2-3 साल ही लतिका से बड़ा था पर ज्यादातर बाहर रहने वाले पिता ने बेटी की सारी जिम्मेदारी बेटे को ही सौंप रखी थी. वह लतिका का भाई कम पिता अधिक था और उस के रहते लतिका भी अपने को बहुत सुरक्षित अनुभव करती थी.

नकुल को लतिका की चिंता भी बहुत रहती थी. अगर कालिज या पुस्तकालय से लौटने में उसे जरा भी देर हो जाती तो फौरन साइकिल से लतिका को खोजने निकल पड़ता था. कई बार लतिका उसे पुस्तकालय से आती हुई उन सुनसान रास्तों पर मिली है फिर दोनों भाईबहन पैदल ही साथसाथ आए हैं.

खाने के बाद जब लतिका अपने कमरे में पढ़ने चली गई तो कुछ देर बाद एक फाइल में कुछ कागज लिए नकुल उस के पास आया और उस के बिस्तर पर ही बैठ गया.

‘‘पहचानो इन चित्रों को. पुलिस के रिकार्ड से इन की फोटोकापी कराई है.’’

एकदम चौंक पड़ी लतिका, ‘‘अरे, यह तो अभय, परमजीत और योगी हैं. इन का रिकार्ड पुलिस में?’’ अचरज से उस की आंखें फैल गईं.

‘‘अच्छे लोग नहीं हैं ये पुलिस की नजरों में,’’ नकुल बोला, ‘‘अब तक कई अपराधों को अंजाम दे चुके हैं. अनेक लड़कियां इन की हवस का शिकार हुई हैं. ये पहुंच वाले बड़े लोगों के बिगड़ैल बेटे हैं. अभय तो शहर के प्रसिद्ध नेता का लड़का है. मेरी सलाह है कि तुम इन लोगों से दूर ही रहो. हम लोग इतने साधन संपन्न नहीं हैं कि इन का कुछ बिगाड़ पाएंगे.’’

‘‘जानते हो नकुल,’’ लतिका गंभीर स्वर में बोली, ‘‘मैं तुम्हें पापा के बराबर ही मान देती हूं. सवाल सिर्फ उम्र का नहीं है जिस तरह तुम मेरी रक्षा करते हो, मेरा खयाल रखते हो, मेरी चिंता करते हो, उस सब का महत्त्व मैं समझती हूं. कोई भी लड़की तुम्हारे जैसे भाई को पा कर धन्य हो सकती है. मैं ने आज तक कभी तुम्हारी सलाह की अनदेखी नहीं की. पर भैया, मैं अभय को पसंद करती हूं.’’

‘‘अभय के जाते समय जो चमक तुम्हारी आंखों में मैं ने देखी थी उसे देख कर ही मैं समझ गया था,’’ नकुल बोला, ‘‘इसलिए यह सच भी तुम्हारे सामने रखा है वरना यह रिकार्ड मेरे पास काफी दिनों से है और मैं ने तुम्हारे सामने नहीं रखा था.’’

‘‘ठीक है भाई, मैं सावधान रहूंगी,’’ लतिका ने कुछ सोच कर कहा.

इश्क एक अजीब तरह का बुखार है. आंखों से चढ़ता है और शरीर के सारे अंगप्रत्यंग को कंपकंपा देता है. इतना सब जानने, सुनने के बावजूद लतिका अभय की सूरत को दिलोदिमाग से निकाल नहीं पाती थी. शरीर इस कदर उत्तेजित हो जाता था कि वह अपने तनाव और उत्तेजना को शांत करने के लिए अनेक उपाय करती थी. फिर उस मुक्ति के बाद वह देर तक हांफती हुई बिस्तर पर निढाल पड़ी रहती थी.

दूसरे दिन सुबह लतिका कालिज जाने लगी तो नकुल ने नाश्ते की मेज पर उस से कहा, ‘‘देखो, गलत रास्ते पर तुम बहुत आगे निकल जाओ उस से पहले ही मैं ने तुम्हें आगाह कर दिया है. आशा है तुम मेरी बात मानोगी.’’

रात को जो कुछ अभय को ले कर सोते समय लतिका ने अपने शरीर के स्तर पर महसूस किया था, उस के बाद वह नकुल की बात को बहुत मन से नहीं मान पाई थी. अभय को ले कर उस के मन में अभी भी कहीं कमजोर भावना थी.

कालिज जाते समय लतिका ने जल्दीजल्दी अखबार की खास खबरों पर नजरें दौड़ाईं तो अचानक एक खबर पढ़ कर वह हड़बड़ा गई, ‘‘नकुल भाई, यह खबर पढ़ो.’’

शहर के पास वाले कसबे में एक एकांत मकान के बूढ़े पतिपत्नी की हत्या कर सारी जमापूंजी लूट ली गई.

‘‘बेचारे ये बूढ़े दंपती तो अब अकसर ही मारे जाते हैं. कभी उन के अपने ही बच्चे उन्हें जमीनजायदाद पर कब्जा पाने के लिए मार देते हैं तो कभी बदमाश, लुटेरे यह काम कर देते हैं,’’ नकुल बोला, ‘‘कोई खास बात नहीं है. अब तो यह रोज की बात हो गई है.’’

‘‘खास बात है, नकुल,’’ लतिका कुछ सोच कर बोली, ‘‘मैं कल इसी कसबे में अभय और परमजीत के साथ गई थी और जिस मकान का विवरण यहां छपा है उस मकान के सामने अभय और परमजीत बहुत देर तक न केवल रुके बल्कि उन्होंने मोटरसाइकिल से उस मकान के कई चक्कर भी लगाए थे.’’

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‘‘लेकिन हमारे पास पुलिस को देने के लिए सुबूत क्या है?’’ नकुल बोला, ‘‘फिर तुम खुद उन के साथ थीं. खामखा पुलिस तुम्हें भी लपेटेगी. इसलिए इस मामले में चुप रहना बेहतर होगा.’’

उस घटना के बाद काफी दिनों तक अभय, परमजीत और योगी कालिज में दिखाई नहीं दिए. अखबार में छपी वह घटना कुछ दिन चर्चा का विषय भी बनी रही पर जल्दी ही दूसरी घटनाओं की तरह वह भी भुला दी गई.

लतिका केंद्रीय पुस्तकालय आतीजाती रही. नोट्स लेती रही. प्रो. चोपड़ा के दिशा- निर्देशन में फ्रांस की महान उपन्यासकार बोऊवा के उपन्यासों और उन के समाजदर्शन, स्त्री की स्वतंत्रता संबंधी विचारों का मंथन करती रही. इस बीच वह चोपड़ा साहब से बोऊवा की पुस्तकों पर लंबी बहस भी करती रहती थी.

लतिका के प्रयास और मेहनत को देख कर प्रो. चोपड़ा बहुत खुश हो कर बोले, ‘‘पहले इस लघु शोध को पूरा कर लो. एम.ए. के बाद मैं तुम्हें इसी विषय पर दीर्घ शोध ग्रंथ लिखने का काम दूंगा.’’

‘‘धन्यवाद सर, आप ने मुझे इस योग्य समझा,’’ कह कर जब वह चोपड़ा साहब के बंगले से बाहर निकली तो कनक मुसकराई, ‘‘बूढ़े पर तो दिल नहीं आ गया मेरी गुल की बन्नो का?’’

‘‘कनक, मैं धर्मवीर भारती की कहानी की कुबड़ी नहीं हूं,’’ बेसाख्ता, ठहाका लगा कर लतिका हंसी, ‘‘तू जानती है कि मैं अपने मन में अभी भी अभय को पसंद करती हूं.’’

‘‘इस के बावजूद कि पास के कसबे में हुई बूढ़े दंपती की हत्या और लूट में पुलिस को उन लोगों पर ही संदेह है.’’

‘‘मेरा विश्वास है कि अंत में सब ठीक हो जाता है,’’ लतिका बोली.

‘‘क्यों जीते जी जलती आग में कूद कर जान देने पर उतारू है, लतिका.’’

बूढ़े दंपती की हत्या का मामला जब रफादफा हो गया तो अभय, परमजीत और योगी फिर कालिज में दिखाई देने लगे.

एक दिन लतिका को रास्ते में रोक कर अभय हंसहंस कर उस से बातें कर रहा था और वह भी उस की बातों में रुचि ले रही थी कि परमजीत निकट आया और बड़े आदर से उस ने लतिका को नमस्कार किया तो उसे अच्छा लगा. कोई कुछ भी कहे, ये लड़के उस से तो हमेशा ही तमीज से पेश आते हैं.

जब परमजीत जाने लगा तो अभय ने जेब से एक परची निकाल कर परमजीत को देते हुए कहा, ‘‘योगी को दे देना.’’

लतिका ने यह सोच कर ध्यान नहीं दिया कि लड़कों की आपस की बातों में वह क्यों पड़े.

कालिज के बाद जब वह चाय वगैरह पीने कैंटीन पहुंची तो एक सीट पर किसी लड़की से बात करते योगी को देखा. लेकिन वह जल्दी ही उठ गया और काउंटर पर जा कर चायनाश्ते के पैसे देने लगा. वह लड़की भी उस के साथ थी. दोनों कुछ जल्दी में थे.

लतिका ने देखा, पर्स निकालते समय योगी की जेब से एक कागज का टुकड़ा निकल कर गिरा है. वह लपक कर गई और झुक कर उसे उठा लिया. वेटर ने उस के लिए चाय, पानी और डोसा मेज पर लगा दिया था. वह उस परची को ले कर अपनी मेज पर आ गई. उसे यह पहचानते देर न लगी कि यह वही परची है जो अभय ने योगी को देने के लिए परमजीत को दी थी. परची में लिखा था:

‘‘रात 8 बजे के करीब सी.एल. से एक मुरगी निकलेगी. बाएं रास्ते से जाते समय आज उसे हलाल करना है.’’

डोसा खाती लतिका कई बार उस परची को पढ़ गई पर ‘मुरगी के हलाल’ करने का मतलब वह ठीक से समझ नहीं पाई. सी.एल. का मतलब भी उस की समझ में बहुत देर के बाद आया कि हो न हो यह सेंट्रल लाइब्रेरी की बात है. इतना समझ में आते ही वह एकदम हड़बड़ा गई. इस का मतलब मुरगी कोई और नहीं या तो खुद लतिका है या उस जैसी कोई अन्य लड़की, क्योंकि रात के 8 बजे तक लगभग सभी लड़कियां वहां से निकल आती हैं.

लतिका की समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे. वह अपने को बचाने के लिए आज पुस्तकालय न जाए पर जो हलाल होने वाली लड़की है उसे कैसे बचाए. फिर मन में एक फैसला ले कर वह वहां से चल दी.

कैंटीन से बाहर निकली तो शाम के 6 बज रहे थे. तेजतेज कदमों से वह केंद्रीय पुस्तकालय की तरफ चल दी. वहां तक पहुंचने में उसे आधा घंटा लगा. उस ने पहुंचते ही पुस्तकालय के सभी कमरों में एक बार घूम कर पढ़ रहे लड़केलड़कियों को देखा. उन में वह लड़की भी दिखाई दी जो योगी के साथ कैंटीन में थी. बेहद सुंदर चेहरेमोहरे की उस लड़की को देख कर वह सकुचाई कि कहीं यही तो वह मुरगी नहीं जिसे आज हलाल करने का इन लोगों ने इरादा बनाया है.

‘‘मैं यहां बैठ सकती हूं?’’

लतिका के इस सवाल को सुन कर लड़की ने एक बार को ऊपर निगाह उठा कर देखा और फिर पढ़ने में डूब गई.

‘‘आप का नाम पूछ सकती हूं?’’ लतिका ने पूछा.

‘‘क्यों?’’ मुसकरा दी वह.

‘‘इसलिए कि मैं तुम से कुछ कहना चाहती हूं.’’

‘‘पर मैं तो आप को जानती नहीं.’’

‘‘मुझे जानना जरूरी भी नहीं है,’’ लतिका बोली, ‘‘लेकिन आप का यहां से उठ कर अभी घर चले जाना ज्यादा जरूरी है.’’

इस से पहले कि वह लड़की और कोई सवाल पूछे लतिका ने धीरे से पर्स से कागज की वह परची निकाल कर उसे पढ़वा दी.

‘‘आप जिस लड़के के साथ कैंटीन में थीं उस की जेब से निकल कर यह परची गिरी है. उस के 2-3 साथी हैं, यह आप भी जानती होंगी.’’

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लड़की के काटो तो खून नहीं. चेहरा एकदम सफेद पड़ गया. डरीसहमी हिरनी की तरह वह लतिका को देखती रही फिर किसी तरह बोली, ‘‘तभी योगी का बच्चा मुझ से चिकनीचुपड़ी बातें करता रहा था. मुझे खूब नाश्ता कराया और कहा कि पुस्तकालय में देर तक पढ़ती हो तो भूख लग आती होगी, अच्छी तरह खापी कर जाओ.’’

वह एकदम उठ कर खड़ी हो गई, ‘‘किताबें रख कर आती हूं. मुझे डर लग रहा है. आप साथ चल सकती हैं?’’

‘‘बशर्ते इस परची का जिक्र कभी मुंह पर मत लाना और मेरे बारे में उन लोगों को न बताना कि मैं ने तुम्हें आज यहां से निकाल दिया.’’

घर आ कर लतिका ने सारी बात नकुल को बताई तो वह गंभीर हो कर बोला, ‘‘उस लड़की को बचाया तो अच्छा किया लेकिन अगर उस ने उन लोगों से कभी यह बात कह दी तो वे लोग तुम्हारी जान के दुश्मन हो जाएंगे.’’

एक दिन कालिज में लतिका को अभय ने एक परची थमाई और बोला, ‘‘मुझे एक काम से अभी जाना है. प्लीज, लतिका, इस परची को तुम परमजीत को दे देना. पता नहीं वह कालिज में कितनी देर बाद आए.’’

‘‘अभय, तुम्हारा कोई काम करने में मुझे खुशी होती है.’’

‘‘जानता हूं, इसलिए तुम पर विश्वास भी करता हूं और कभीकभी छोटा सा काम भी सौंप देता हूं,’’ कहता हुआ अभय मोटरसाइकिल स्टार्ट कर चला गया.

बहुत देर तक उस परची को लतिका पढ़ती रही पर वह कुछ समझ नहीं पाई. सिर्फ एक पता लिखा हुआ था और पते के अंत में 9 की संख्या लिखी हुई थी. उस ने उस पते को वैसा का वैसा ही अपने पास लिख लिया और कालिज के बाहर ही एक बैंच पर बैठी पढ़ती रही ताकि परमजीत को देख सके.

लगभग डेढ़ घंटे बाद परमजीत आया तो लतिका ने उसे वह परची दे दी. परमजीत ने परची पढ़ी और फाड़ कर फेंक दी. फिर देर तक हंसता हुआ उस से बातें करता रहा. जब वह उठ कर कक्षा में चली गई तो वह भी कहीं चला गया. उस के जाते ही लतिका लपकी हुई आई और उस ने परची के फटे सारे टुकडे सावधानी से बटोर लिए और एक कागज में पुडि़या बना कर अपने पास रख लिए.

घर आ कर उस ने वे सारे कागज के टुकड़े नकुल को दिए और उस में क्या लिखा था यह नकुल को पढ़ा दिया. नकुल सावधान हुआ. तुरंत लतिका को ले कर थाने गया और अपने उस नौजवान पुलिस अफसर से मिला जो शोध मेें उस की बहुत मदद कर रहा था.

लतिका से मिल कर उसे भी प्रसन्नता हुई और वह बोला, ‘‘आप च्ंिता न करें. आज मैं इन लड़कों को रंगेहाथ पकड़ूंगा. फिर भले ही मेरी नौकरी क्यों न चली जाए.’’

पुलिस अफसर ने सिपाहियों को सावधान किया. कुछ हथियार लिए. फिर सब को जीप में साथ ले कर वह उस पते पर पहुंच गया जो लतिका ने लिख रखा था. इस सब में 8 बज गए. दरवाजे में लगी घंटी बजाई तो देर तक दरवाजा नहीं खुला. आखिर कोई काफी कठिनाई से चलता हुआ गैलरी में आया और उस ने पूछा, ‘‘कौन?’’

‘‘पुलिस. दरवाजा खोलिए. आप से मिलना जरूरी है,’’ उस अफसर ने कहा.

बहुत समझाने पर उस बूढ़ी औरत ने दरवाजा खोला. पुलिस के साथ एक लड़की को देख कर वह महिला कुछ संतुष्ट हुई. लतिका ने तुरंत उस वृद्धा का हाथ पकड़ा और उसे भीतर ले जा कर सारी बात समझाई. फिर भी वह बूढ़ी महिला पुलिस की कोई मदद करने को तैयार नहीं हुई. उस का बारबार एक ही कहना था कि मैं ऐसा नहीं करूंगी. वे हत्यारे मुझे मार डालेंगे. पड़ोस के कसबे में भी एक बूढ़े दंपती को हत्यारों ने ऐसे ही मार डाला था. आप लोग यहां रहें जरूर पर मैं दरवाजा नहीं खोलूंगी, उन्हें अंदर नहीं आने दूंगी, वे मुझे मार डालेंगे.’’

बहुत देर तक समझानेबुझाने पर वह तैयार हुई कि दरवाजा खोल देगी पर वे लोग पिछले कमरे में जहां छिपें वहां से आने में कतई देर न करें वरना वे बदमाश उस की जान ले लेंगे.

रात लगभग 9 बजे घंटी बजी. सब सावधान हो गए.

बूढ़ी महिला फिर भय से कांपने लगी पर किसी तरह टसकती हुई दरवाजे तक पहुंची, ‘‘कौन है?’’

‘‘हम हैं, नानी, तुम्हारे पोते.’’ एक आवाज बाहर से आई. लतिका ने आवाज पहचान ली. यह अभय की आवाज थी. लतिका की भी आंखें भय से फैल गईं. अभी तक वह भ्रम में रही थी. अभय का जादू उस के सिर पर सवार था पर आज उस का भ्रम भंग हो गया.

दरवाजा खुलते ही अभय ने एकदम चाकू उस बूढ़ी औरत की गरदन पर रख दिया और बोला, ‘‘बुढि़या, जल्दी से हमें बता कि माल कहांकहां रखा है. अगर न बताया तो हम तुझे अभी मार देंगे. फिर सारे घर को खंगाल कर सब ले जाएंगे. पास के कसबे की घटना सुनी है कि नहीं तू ने? उन लोगों ने बताने में आनाकानी की तो हम ने उन्हें नरक में भेज दिया और सब ले लिया. तू भी अगर नरक में जाना चाहती है तो मत बता वरना चुपचाप साथ चल और सब माल हमारे हवाले कर दे.’’

बुढि़या को ले कर वे लोग आगे बढ़े ही थे कि झपट कर सारे सिपाही और पुलिस अफसर हथियार ताने पिछले कमरे से निकल कर वहां आ गए. उन के साथ लतिका व नकुल को देख कर अभय सकपका गया. परमजीत और योगी भागने की कोशिश करने लगे पर हथियारबंद सिपाहियों ने उन्हें पकड़ लिया और अभय को तुरंत हथकडि़यां पहना दीं.

अभय गरजा, ‘‘तुम ने अपनी मौत मोल ले ली, लतिका. हम देख लेंगे तुम्हें.’’

‘‘देख लेना बच्चू, पर पहले तो अपने दिए गए अभी हाल के बयान का यह टेप सुन लो जिस में तुम ने पास के कसबे के बूढ़े दंपती की हत्या की और लूट को स्वीकारा है,’’ पुलिस अफसर ने हंस कर कहा, ‘‘दूसरे, इस जगह वारदात करने के  इरादे से अपने ही हाथ के लिखे इस परचे को पढ़ो जिसे परमजीत ने फाड़ कर टुकड़ेटुकड़े कर वहीं फेंक दिया था.’’

सबकुछ देख कर परमजीत और योगी तो लगभग गिड़गिड़ाने लगे पर अभय के चेहरे पर जरा भी शिकन नहीं थी, ‘‘तुम चाहे जो कर लो इंस्पेक्टर, हमारा बाप नेता है. वह घुड़क  देगा तो तुम्हारे सारे होश ठिकाने लग जाएंगे.’’

‘‘वह सब तो अब अदालत में देखेंगे. फिलहाल तो तुम पुलिस के साथ थाने की हवालात में चलो,’’ पुलिस अफसर उन्हें साथ ले गया.

जाते समय लतिका और नकुल से बोला, ‘‘तुम लोग फ्रिक मत करना. डरने की जरूरत नहीं है. ऐसे जाने कितने अपराधियों को मैं ने सीधा किया है.’’

फिर अनायास ही लतिका का हाथ पकड़ कर धीरे से दबाया और कहा, ‘‘धन्यवाद देना चाहता हूं आप को. आप मदद न करतीं तो ये लोग कभी रंगेहाथों न पकड़े जाते.’’

कुछ दिनों बाद पुलिस अफसर लतिका और नकुल से मिलने उन के घर आया तो लतिका के पिता भी घर पर ही थे. खूब सत्कार किया उन का. फिर किसी तरह अपने संकोच को भूल कर पुलिस अफसर ने लतिका के पिता से कुछ कहने का साहस बटोरा, ‘‘मेरे मांबाप नहीं हैं. इसलिए यह बात मुझे ही आप से करनी पड़ रही है. अगर आप लोगों को एतराज न हो तो मैं लतिका जैसी बहादुर युवती से शादी करना चाहूंगा.’’

‘‘आप ने तो हम लोगों के मन की बात कह दी, इंस्पेक्टर,’’ बहुत खुश हुए लतिका के पिता, ‘‘अब विश्वास हो गया कि मेरी बेटी इस कांड के बाद सुरक्षित रह सकेगी वरना हम लोग भयभीत थे कि बदमाशों को सजा दिलवा कर कहीं हम लोग जान न गंवा बैठें.’’

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‘‘जिम्मेदार नागरिकों के प्रति कुछ हमारी भी जिम्मेदारियां हैं, सर,’’ अफसर ने कहा तो सब मुसकराने लगे और लतिका लजा कर भीतर चली गई.           द्य

भूत की व्यथा

लेखक-  प्रियदर्शी खैरा

मैं ने आवाज की दिशा में देखा तो वहां कोई नहीं था. अंधेरा होने लगा था. मैं मंत्रालय में भूत की कल्पना कर सिहर उठा. लोकतांत्रिक व्यवस्था में मंत्रालय एक महत्त्वपूर्ण स्थान होता है, जहां वर्तमान राजामहाराजा  अपने मंत्रियों एवं कारिंदों के साथ बैठ कर राजकाज चलाते हैं. यहां का दरबारे-आम और दरबारे-खास चिट पद्धति अथवा पहुंच पद्धति से चलता है. पहले इन्हें सचिवालय कहते थे. अब मंत्रालय के नाम से जाना जाता है. नाम क्रांति से ले कर कार्य क्रांति तक की संस्कृति का विकास यहीं से हुआ है.

यहां की तख्तियों पर नाम बदलते रहते हैं, किंतु पदनाम स्थायी होते हैं. देश एवं प्रदेश की राजधानियों के ये दर्शनीय

स्थल होते हैं. इन के बाहर

का वातावरण हराभरा और स्वास्थ्यवर्धक रखा जाता है. ताकि यहां से बाहर आ कर आदमी चैन की सांस ले सके.

नया आदमी इन के अंदर आ कर इन की भूलभुलैया में रास्ता भटक जाता है और पुराना आदमी अपने नियत रास्ते पर अनवरत आताजाता रहता है, यही इस स्थान की मूल विशेषता है.

मुझे लगा कोई भूत रास्ता भटक कर मंत्रालय में आ गया है. तभी फिर आवाज आई, ‘‘डरिए नहीं, मैं भी सरकारी कर्मचारी था. मुझे मरे 20 साल हो गए, घर में पत्नी और 2 बच्चे छोड़ कर मरा था. वे 3 से 10 हो गए पर आज तक पेंशन नहीं मिली. आप क्या पेंशन देखते हैं?’’

‘‘नहीं भाई, मुख्य मार्ग से जुलूस निकल रहा था, रास्ता बंद था, इसलिए यहां से आ गया,’’ मैं ने उत्तर दिया.

‘‘देखो मियां, चिडि़या देख के पहचान लेता हूं, क्यों डर रहे हो. चूना है क्या?’’ उस ने बड़ी आत्मीयता से पूछा.

अब ये तंबाकू मांगेगा, फिर चाय की पूछेगा. कैसा भूत है जो चाय भी पीता  है, तंबाकू भी खाता है, मैं सोच रहा था, फिर पूछा, ‘‘भूत भाई, चूने का क्या करोगे?’’

‘‘कुछ नहीं, फाइल में लगाएंगे. आज ही काम मिला है. ‘नाट अप्रूव्ड’ में ‘नाट’ पर लगाना है. आप की कोई फाइल दबानी हो तो बताएं. स्टोर में फेंक आऊंगा, कभी नहीं मिलेगी,’’ उस ने कहा.

मुझे उस की बातों में मजा आने लगा. पूछा, ‘‘क्या चौकीदार नहीं देखता?’’

एक जोरदार ठहाके की आवाज आई, ‘‘भूत को कौन देखेगा. क्या तुम मुझे देख पा रहे हो? यहां तो कई भूत सक्रिय हैं. तभी तो फाइलें दबती और उड़ती हैं. पर फाइलों के भूत हमेशा जिंदा रहते हैं, मरने पर भी नहीं छोड़ते.’’

फाइलों की महिमा से कौन परिचित नहीं होगा. मंत्रालय फाइलों के माध्यम से ही चलता है.

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मैं सोचने लगा जब ईसवी सन 3000 में ऐसे भवन

इतिहास की वस्तु हो जाएंगे

तब इतिहासविद अलगअलग शासनकाल की अपनीअपनी दृष्टि से व्याख्या करेंगे. खुदाई में मिले फाइलों के अवशेषों की इस शोध में विशेष

भूमिका रहेगी. भविष्य में ये फाइलें ऐतिहासिक महत्त्व

की दस्तावेज होंगी. इसलिए इन्हें   राष्ट्रीय   अभिलेखागारों में सुरक्षित रखने की आवश्यकता है. इस में लिखी गई टिप्पणियों पर शोध होगा एवं उन के शब्दार्थ व भावार्थ पर बहसें होंगी कि कौन सी फाइल कितने शासनकालों में चलती हुई सद्गति को प्राप्त हुई, निर्णयों  को किनकिन तत्त्वों ने प्रभावित किया, किस प्रकार निर्णय बदले गए आदि से शासन की विचारधारा संबंधी नतीजे निकाले जाएंगे. अत: यह आवश्यक है कि फाइलें कागजों पर नहीं स्थायी प्रकृति की प्लास्टिक पर अमिट स्याही से लिखी जाएं, जिस से हम आने वाली पीढि़यों को ऐतिहासिक धरोहरें सौंप सकें.

तभी भूत की आवाज ने मेरा ध्यान भंग किया, ‘‘क्या सोच रहे हो मियां, ड्रेस से तो नेता लग रहे हो, ट्रांसफर केस है क्या?’’

भूत मुझे जरूरत से ज्यादा चालाक लगा, धीरेधीरे अपनी औकात दिखा रहा था. मैं ने सहमते हुए कहा, ‘‘नहीं, भूत भाई, यों ही निकल रहा था. रास्ते में आप टकरा गए.’’

‘‘टकराए कहां मियां, हम तो भूत हैं, हम से कौन टकराएगा. हम जब जिंदा थे तब किसी ने हम से टकराने की जुर्रत नहीं की. यूनियन के लीडर थे. बड़ेबड़े अफसरों को छठी का दूध याद दिला दिया. वह भी क्या दिन थे. अफसर भी दमदार होते थे, आज जैसे ट्रांसफर पोस्टिंग के लिए नहीं घूमते थे.’’

थोड़ी देर की खामोशी के बाद फिर आवाज आई, ‘‘आप तो पहुंचे हुए नेता लग रहे हैं, सर.’’

‘‘नहीं, विधायक हूं,’’ मैं ने संक्षिप्त उत्तर दिया.

‘‘यही तो, मेरी नजर धोखा नहीं खाती श्रीमान. मेरा पेंशन केस निबटवा दें. जनरल केटेगरी का भूत हूं, बच्चे की नौकरी नहीं लगी, कुछ हेल्प कीजिए, पूरी फेमिली परेशान है,’’ भूल का याचनापूर्ण स्वर सुनाई दिया.

‘‘तुम भूत हो, सबकुछ कर सकते हो, खुद क्यों नहीं करते?’’ मैं ने प्रश्न किया.

‘‘सर, फाइल उड़ाना अलग बात है, काम कराना अलग. मैं यहीं रहा हूं, सब समझता हूं पर क्या करूं, भूत हूं, बेबस हूं, यहां जिंदों के काम नहीं होते, भूतों के क्या होंगे?’’ भूत बेबसी से बोला.

‘‘अरे, भूत तो कहीं भी जा सकता है, फाइल में घुस जाओ और निबटवा लो…’’ मैं ने सुझाव दिया.

‘‘क्या बताऊं सर, भूत तो हवा है और हवा में वजन नहीं होता. एक बार फाइल में घुस गया तो फाइल उड़ गई, फिर से फाइल बनने में 2 वर्ष लग गए…’’ भूत ने व्यथा सुनाई.

‘‘तो फिर काम पूरा करने वाले के सिर पर क्यों नहीं सवार हो जाते?’’ मैं ने रास्ता सुझाया.

‘‘न बाबा न, एक भूत से इस तरह की गलती हो गई थी. फाइल निबटवाने के चक्कर में नेताजी के सिर पर सवार हो गया था. फाइल तो निपटी नहीं, लौट कर आया तो उन के संस्कार साथ ले आया. यहां आ कर यमराज की कुरसी पर दावा ठोक दिया. भूततंत्र में प्रजातंत्र की मांग करने लगा.

हवाई क्रांति की बात उठने लगी. भूतलोक में बवंडर मच गया. यमराज ने बड़ेबड़े आदमी उतारने वाले भूत बुलाए, पर नहीं उतरा. फिर एक सयाना भूत आया, उस ने उसे कुरसी दिखाई. कुरसीमंत्र फूंका, जब से वह भूत उसी कुरसी के चक्कर लगा रहा है.

‘‘एक और मजेदार केस है. एक भूत अफसर को लग गया. लौट के आया तो अंगरेजी बोलने लगा. अब छोटे भूतों पर रौब झाड़ता है, बड़ों की चमचागीरी करता रहता है. एक दिन तो हद ही हो गई. यमराज को पारब्रह्म परमेश्वर कह दिया…’’ कह कर भूत हंसा फिर बोला, ‘‘आप ही कुछ कीजिए न, सर.’’

‘‘बताओ, मैं क्या कर सकता हूं,’’ मैं ने पूछा.

‘‘आप सबकुछ कर सकते हैं, सर. आप महान हैं. बेटे को अनुकंपा नियुक्ति दिला दें. मैं उसे 10 वर्ष का छोड़ के मरा था, अब 30 साल का हो गया है, उम्र निकल जाएगी. अनुकंपा नियुक्ति की फाइल 10 साल से चर्चा में उलझी है,’’ भूत घिघियाता हुआ बोला.

‘‘ठीक है, देखूंगा. एक बात बताओ. यहां तो बहुत से भूत होंगे,’’ मैं ने पूछा.

‘‘बहुत सारे, सर. जगह कम पड़ गई है. कुछ भूतों को नई जगह शिफ्ट कर रहे हैं. साइट सलेक्शन की फाइल महाभूत के यहां 2 साल से पेंडिंग में है. छोटे भूतों ने आपत्ति की है कि वे नई जगह नहीं जाएंगे,’’ भूत ने राज की बात बताई.

‘‘भूत हड़ताल पर जा रहे हैं क्या?’’ मैं ने पूछा.

‘‘सर, धीरे बोलिए, महाभूत का चमचा मेरे पीछे ही खड़ा है. आप को नहीं दिखेगा. नमकमिर्च लगा कर चुगली कर देगा. वैसे यहां हड़ताल पर प्रतिबंध है, महाभूत का बड़ा आतंक है. कहीं किसी जिले में पटक दिया

तो मैं कहीं का नहीं रहूंगा,’’ भूत फुसफुसाया.

‘‘यहां ऐसी क्या खास बात है?’’ मैं ने पूछा.

‘‘सर, यहां अच्छी सुविधा है, जिलों के बड़ेबड़े भूत भी राजधानी के छोटे भूतों को सलाम करते हैं. जिला पंचायत के अध्यक्ष और मंत्री में अंतर तो स्पष्ट है. यहां काम करने के लिए वाइड फील्ड है, कहीं भी बेटिंग करो,’’ भूत ने समझाया.

‘‘तुम्हारे यहां राजनीति के क्या हाल हैं?’’ मैं ने उत्सुकता से पूछा.

तभी पत्ते खड़खड़ाए. भूत की डूबती हुई आवाज आई, ‘‘मृत्युलोक की राजनीति का असर अब यहां भी पड़ रहा है. राजनीति पर फिर कभी चर्चा करेंगे. महाभूत का बुलावा आया है, मेरा काम करा दें, सर. यह भूत आप का गुलाम हो जाएगा…’’

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मैं मन ही मन मुसकरा रहा था. भूत को क्या बेवकूफ बनाया? भूत भी विधायक के नाम पर पानीपानी हो गया.    द्य

सोशल मीडिया पर Viral हुआ अंगद हसीजा का न्यूड फोटोशूट

टीवी एक्टर अंगद हसीजा का  हाल ही में एक फोटोशूट सामने आया है जिसके बाद फीमेल फैंस की धड़कने बढ़ गई है. इस फोटोशूट की खास बाद है की अंगद इसमें न्यूड है. टीवी और फिल्मी दुनिया की कई हसीनाओं ने अब तक अपने बोल्ड और न्यूड फोटोशूट के जरिए इंटरनेट की दुनिया में खूब तहलका मचाया है लेकिन  बहुत ही कम देखने को मिला है कि कोई मेल एक्टर ऐसा करें. ज्यादा से ज्यादा मेल मौडल्स आपको ऐसा करते हुए नजर आ जाएंगे लेकिन टीवी के इक्का-दुक्का कलाकार ही ऐसा करने की हिम्मत जुटा पाते है.

बेड से लेकर बाथ टब तक

अंगद इस फोटोज में न्यूड है और बेड पर बैठकर फोटो क्लिक करवाते हुए नजर आ रहे है. बाथटब में अंगद आराम तो फरमा वाली इस फोटो में वो काफी हौट नजर आ रहे है. इन फोटोज में अंगद का टैटू फ्लौन्ट करते हुए नजर आ रहे है. बता दे की अंगद को टैटू का काफी शौक है अपने गर्दन के नीचे उन्होंने तलवार वाला टैटू बनवाया है. अंगद टैटू के इतने शौकीन है कि गर्दन के साथ-साथ उन्होंने अपने बाइसेप्स पर भी मंत्र लिखवा लिया है.

 

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Do what makes your soul shine 🍀💚 #goodmorning #goodday #goodvibes #gratitude #nature #spirituality #angadhasija

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कैंडिड फोटोज का है शौक

अंगद को कैंडिड फोटोज क्लिक करवाने का काफी शौक है. अंगद ने जहां अपनी अदाकारी से लाखों-करोड़ों फीमेल फैंस के दिलों में जगह बना लिया है वहीं अपनी स्माइल से भी वह लोगों का दिल चुरा ही चुके हैं.

‘बिदाई’ सीरियल से मिली पहचान 

अंगद ने छोटे पर्दे  पर अपनी शुरुआत स्टार प्लस के सीरियल ‘बिदाई’ से  की जिसमें उनके कैरेक्टर ‘आलेख’ को लोगों ने काफी सराहा. इस  सीरियल में अंगद मेंटली इल पेशेन्ट की भूमिका में नजर आए थे. अपनी कमाल की एक्टिंग और कैमेरा टाइमिंग के कारण ही अंगद को इसके बाद काफी सीरियल्स में काम मिला जिसमें ‘ये रिश्ता क्या कहलाता हैं’, ‘फुलवा’, ‘प्रीत से बांधी ये डोर’ और अमृतमंथन  जैसे कई सीरियल्स में नजर आए.

पूर्व विदेश मंत्री सुषमा स्वराज के निधन पर बौलीवुड स्टार्स ने दी श्रद्धांजलि

6 अगस्त को जहां एक और कश्मीर को लेकर दिन तक लोग खुशियां बना रहे थे वही रात आने तक ये खुशियां गम में तब्दील हो गई. देर रात आई इस खबर ने मानों देश को जगा दिया- “पूर्व विदेश मंत्री सुषमा स्वराज नहीं रही”. उनके निधन से पुरा देश दुखी है. मंगलवार रात को कार्डियक अरेस्ट का अटैक पड़ने के बाद उन्हें एम्स में भर्ती कराया गया था. अस्पताल में इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई. सुषमा के निधन के बाद से ही पूरे देश में शोक की लहर छा गई है. सुषमा स्वराज के जाते ही भारत ने एक नायाब हीरा खो दिया. इस दुख की घड़ी में  बौलीवुड स्टार्स ने भी सुषमा स्वराज के प्रति अपने प्यार को दिखाते हुए भावभीनी श्रद्धांजलि दी.

अमिताभ बच्चन का ट्वीट

अमिताभ बच्चन ने लिखा, यह मेरे लिए एक अत्यंत दुखद समाचार है. हमने एक बहुत ही प्रबल राजनीतिज्ञ, एक मिलनसार व्यक्तिव, एक अद्भुत प्रवक्ता को खो दिया है. मैं उनकी आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना करता हूं.

हेमा मालिनी का ट्वीट

हेमा मालिनी ने भी सुषमा स्वराज की एक फोटो शेयर करते हुए लिखा- सुषमा स्वराज जी अब हमारे बीच नहीं रहीं. यह हमारे देश के लिए एक बड़ा नुकसान है. वह मेरी बहुत अच्छी दोस्त, एक शानदार विचारक और पथप्रदर्शक थीं.

सुषमा के काम की तारीफ करते हुए हेमा मालिनी ने आगे लिखा, उन्होंने हमेशा जनता के लिए काम किया है. वह लगों के दुख को बहुत अच्छे से समझती थीं. अमिताभ और हेमा मालिनी के अलावा करण जौहर, यामी गौतम, अदनान सामी, रकुल प्रीत सिंह और दिव्यांका त्रिपाठी ने भी इस दुखद घटना पर अपने विचार व्यक्त किए हैं.

स्टार्स के ट्वीट्स देख के ये साफ है की सभी को स्वराज सुषमा के अचानक चले जाने का काफी दुख है. अब होगा भी क्यों नहीं… यह बात तो सब जानते हैं कि, अपने कार्यकाल में सुषमा ने हर किसी की मदद की है. एक विदेश मंत्री के रुप में उनके किए हुए कामों को देश ही नहीं पूरे विश्व में सरहना दिलवाई. जाते जातो भी सुषमा स्वराज का आखिरी ट्वीट देश को समर्पित था. ऐसी महान देश भक्त का यूं चले जाना काफी दुखद हैं.

43 की उम्र में भी इतने स्टाइलिश हैं राजीव खंडेलवाल

राजीव खंडेलवाल एक कमाल के एक्टर और साथ-साथ छोटे पर्दे के उन स्टार्स में शामिल है जो बड़ती उम्र में भी काफी स्मार्ट होते जा रहे हैं. राजीव हमेशा कुछ नया ट्राय करते है. अपने कैरियर के शुरुआत में उन्होंने  कई सारे सीरियल्स में अपनी एक्टिंग से घर घर में वो जगह बनाई जो आज भी लोगों के जहन में उनको नाम बनाए रखती है. राजीव ने फिल्मों मे भी ट्राय किया जिसमें वो पूरी तरह से तो सफल नही हुए पर लोगों ने उनको इस में भी काफी सराहा. 43 साल की उम्र मे भी राजीव ने खुद को काफी मेंटेंन करके रखा हैं. इसलिए आज हम लेकर आए है उनके कुछ खास स्टाइलिंश लुक जिसे  ट्राय कर आप भी काफी स्टाइलिंस लग सकते हैं.

औफिस में ट्राय करें ये लुक

औफिस जाने वाले लोगों के लिए रोजाना एक समस्या सामने आती हैं की आज क्या पहना जाए और जब कोई स्पेशियल मिटिंग हो तो ये बात और भी ज्यादा जरुरी हो जाती हैं. राजीव ने इस लुक में पर्पल  कलर की शर्ट के साथ उसी शैड की टाई का यूज किया है वो काफी अच्छा लग रहा हैं साथ में उनके ब्राउन सूट और ब्लैक शूज इस पुरे लुक को कम्प्लीट कर रहा हैं.

 

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प्रिंटेड शर्ट के साथ सादा अपर

राजीव के इस लुक में कमाल बात ये है की ट्रेंड से हटकर एक नई स्टाइल में सामने आए हैं. राजीव ने प्रिंटेड इन शर्ट के साथ औवर स्वेटर पहना है जो काफी अच्छा लग रहा हैं अगर आप औफिस में कुछ अलग पहनकर जाना चाहते है तो ये लुक आपके लिए परफेक्ट हैं.

 

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पौलका डोट टी-शर्ट के साथ सूट

राजीव के इस लुक में वो काफी कूल नजर आ रहे है. इस लुक में उन्होंने टी-शर्ट के साथ जो सूट काफी अच्छे तरीके से कैरी किया हैं. जो उनके काफी प्रजेंटेबल बना रहा हैं.

 

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जल्द नजर आएंगे बेव सीरिज में 

आपको बता दे की राजीव खंडेलवाल जल्द ही Alt balaji की वेब सीरिज में नजर आने वाले  हैं जिसे लेकर  फैंस काफी उत्सुक है.

वरदी वाले कातिलों को 20 साल बाद सजा

वाकिआ 8 नवंबर, 1996 का है. गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश में एक ऐनकाउंटर की गूंज सुनाई दी. पुलिस की बहादुरी पर सभी को नाज हो रहा था. इस मुठभेड़ को भोजपुर थाने में तैनात पुलिस वालों, थाना प्रभारी लाल सिंह, सबइंस्पैक्टर जोगेंद्र, कांस्टेबल सुभाष, सूर्यभान और रणवीर ने अपनी जान पर खेल कर अंजाम दिया था.दरअसल, जोकुछ सामने आया, उस के मुताबिक, उस शाम पुलिस कुछ आरोपियों को ले कर जा रही थी, तभी उन्हें एक ईंख के खेत के नजदीक  4 बदमाश नजर आए. उन की हरकत ठीक नहीं लग रही थी. लिहाजा, उन्होंने पोजीशन ले ली और अपनी जान की परवाह किए बगैर बहादुरी का परिचय दे कर जवाबी फायरिंग की.

कुछ देरे तक तो दोनों तरफ से फायरिंग होती रही, उस के बाद गोलियों की तड़तड़ाहट बंद हुई. तब तक पुलिस चारों बदमाशों को ढेर कर चुकी थी. उन में से 2 ईख के खेत में और 2 रास्ते में पड़े थे. ऐनकाउंटर में मारे गए बदमाशों के पास से पुलिस को तमंचे भी मिले. मारे गए बदमाश कौन थे, इस की शिनाख्त नहीं हो सकी थी. बहादुरी और सटीक निशानेबाजी का आलम यह था कि जान पर खेलने वाले एक भी पुलिस वाले के जिस्म पर खरोंच तक नहीं आई थी.

पूरे पुलिस महकमे में बहादुर पुलिस वालों के चर्चे थे. यह तय हो गया था कि इस के एवज में उन्हें मैडल के साथसाथ तरक्की यानी प्रमोशन भी मिलेगी. क्योंकि ऐसी बहादुरी दिखाने वालों को अकसर समय से पहले ही तरक्की मिल जाती है.

जब पोल खुली तो…

 उस ऐनकाउंटर में शामिल पुलिस वालों ने भले ही सभी की आंखों में धूल झोंक दी थी और वे अपनी पीठ थपथपा रहे थे, लेकिन एक दिन बाद ही उन की कहानी में कई छेद नजर आए. मारे गए नौजवान, जिन्हें पुलिस ने शातिर बदमाश बताया था, उन की शिनाख्त हुई, तो हर कोई पुलिस की हैवानियत पर दंग रह गया.

इन नौजवानों में प्रवेश, जसवीर, अशोक और जलादुद्दीन शामिल थे. सभी का ताल्लुक गरीब परिवारों से था और वे कोई पेशेवर बदमाश नहीं, बल्कि फैक्टरी में दिहाड़ी मजदूर थे. ऐसे चश्मदीद भी मिल गए, जिन्होंने पुलिस को इन नौजवानों को खेतों में खींच कर ले जाते हुए देखा था. वे खाकी वरदी में छिपे ऐसे शैतान थे, जो तरक्की पाने की चाह में कुछ भी करने को तैयार हो गए थे.

पोल खुलते ही जनता का गुस्सा भड़क गया और लोग सड़कों पर आ गए. आरोपी पुलिस वालों के खिलाफ हत्या व साजिश का मुकदमा दर्ज हुआ, तो वे फरार हो गए. बाद में उन की गिरफ्तारी हुई, लेकिन जमानत पर आ कर मजे से नौकरी करने लगे.

लंबी चली कानूनी लड़ाई

 मारे गए नौजवानों के परिवार वालों को पुलिस जांच पर भरोसा नहीं था. उन्होंने इस की जांच सीबीआई से कराने की पुरजोर मांग की. उन की मांग पर ऐनकाउंटर की जांच 7 अप्रैल, 1997 को सीबीआई के सुपुर्द कर दी गई.

सीबीआई ने आरोपी पुलिस वालों के खिलाफ 10 सितंबर, 2001 को चार्जशीट अदालत में दाखिल कर दी. सीबीआई ने जांच में पाया कि तरक्की के लालच में नौजवानों की हत्याएं की गई हैं. पुलिस वालों के खिलाफ पैरवी करने वाले सीनियर वकील राजन दहिया ने इसे हीनियस क्राइम बताया.

पुलिस वालों ने अपने पक्ष में कुछ लोगों के फर्जी शपथपत्र तक अदालत में दाखिल कर दिए, पर हालात उन के खिलाफ थे. उन के खिलाफ 112 लोगों की गवाही हुई.

इस बीच आरोपी थाना प्रभारी रूटीन प्रक्रिया में तरक्की पा कर सीओ तक बन गया. सभी रिटायर हो गए. इस बीच एक आरोपी सिपाही रणवीर की मौत हो गई.

स्पैशल जज राजेश चौधरी ने सुबूतों और गवाहों के बयानों के आधार पर आखिरकार सभी आरोपी पुलिस वालों को उम्रकैद की सजा सुनाई. साथ ही, उन पर 5 लाख, 20 हजार रुपए का जुर्माना भी लगाया. जुर्माने की रकम में से आधी रकम मारे गए नौजवानों के परिवार वालों को दी जाएगी.

मिलती सजा ए मौत

 जिन के बेटे मारे गए, उन का 20 साल का सफर बहुत मुश्किल भरा रहा, परंतु उन्होंने इंसाफ की चाह में हार नहीं मानी. प्रवेश की मां शीला अब बुजुर्ग हो चली हैं, लेकिन खाकी के दर्द को नहीं भूलतीं. उन्होंने ठान लिया था कि कातिलों को सजा दिला कर ही दम लेंगी.

इस दौरान उन के पति की भी मौत हो गई. 8 बीघा जमीन और एक प्लाट भी बिक गया. पुलिस वालों ने समझौते के लिए उन्हें रुपए देने का भी लालच दिया, लेकिन इस बूढ़ी मां ने इंसाफ की जंग जारी रखी.

जसवीर को खो चुका उस का परिवार उस दिन को नहीं भूला, जब उन्होंने बेटे का फोटो बदमाश के रूप में देखा था. इंसाफ की आस में जसवीर की मां ब्रह्मकौर की मौत हो गई. उस के भाई वीर सिंह को जुदाई आज भी दर्द देती है.

इसी तरह ऐनकाउंटर में मारा गया अशोक अपने घर का एकलौता चिराग था. उस के पिता किशन सिंह की साल 2008 में मौत हो गई, लेकिन मां शीला ने जंग जारी रखी. इस के लिए उन्हें अपनी जमीन तक बेचनी पड़ी.

5 भाइयों में दूसरे नंबर के जलालुद्दीन के परिवार को भी इंसाफ के लिए सब्र करना पड़ा. उस के पिता मंसूर की इस बीच मौत हो गई. उस की मां शरीफन ने सबकुछ बेच कर मुकदमा लड़ा.

तरक्की की चाह में आरोपी पुलिस वाले वह कर बैठे, जो उन्हें नहीं करना चाहिए था. इस की उन्हें भारी कीमत चुकानी पड़ी. महकमे की बदनामी करा कर उन की अपनी इज्जत तो खराब हुई ही, साथ ही वे सलाखों के पीछे भी पहुंच गए.

इस केस को लड़ने वाले सीनियर वकील राजन दहिया का कहना है कि पीडि़तों को इंसाफ मिला है. इस से समाज में एक संदेश भी जाएगा कि कानून सब के लिए बराबर है.

(कहानी सौजन्य मनोहर कहानी) 

मेरा देवर मेरे साथ जबरदस्ती करता है, मैं क्या करुं?

सवाल
मैं 23 साल की हूं. शादी को 2 साल हुए हैं. मैंने 6 महीने पहले अपने देवर के साथ कई बार हमबिस्तरी की, पर अब नहीं करना चाहती. अब देवर जबरदस्ती करता है. मैं उसे कैसे रोकूं?

जवाब

आप ने अपनी मरजी से भूखे को लजीज खाने का चसका लगा दिया और अब उस के आगे से प्लेट हटा रही हैं. ऐसे में वह झपट्टा मारेगा ही. अब बेहतर यही है कि उसे ऐसा मौका ही न दें कि वह खींचातानी कर सके. उस से अकेले में कतई न मिलें. यकीनन वह खुद चोर है, इसलिए किसी से नहीं कहेगा.

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कश्मीर : काला दिवस या फिर …!

कश्मीर में सन्नाटा है. जम्मू और लद्दाख में पटाखे छूट रहे हैं. आवाम खुशियां मना रहा है. लोगों के रोंगटे खड़े हो गए हैं और कश्मीर मसले पर दुनिया विशेषकर पाकिस्तान अमेरिका हतप्रभ है. 370 धारा और कश्मीर…. भारत के कोने कोने में सदैव चर्चा का विषय रहे. विगत 40 वर्षों से कश्मीर में आग के शोले उठते रहे जो बुझाए नहीं बुझ रहे थे. इसके पीछे सीधे-सीधे पाकिस्तान का हाथ था. भारत का अभिन्न अंग कश्मीर सिर्फ नाम का था. यह एक बड़ी त्रासदी थी ट्रेजेडी थी. जिसे भारतवासी मुंह छुपाकर मानने को विवश थे.

संविधान और तत्कालीन परिस्थितियों ने कश्मीर को भारत का “लाड़ला अतिथि” बना रखा था. जिसके हर नाज- नखरे, खून- खराबा सहता भारत आथित्य में लगा हुआ था. मगर अब नरेंद्र दामोदरदास मोदी के साहसिक कदम से परिस्थितियां बिल्कुल बदल गई है . कश्मीर अब भारत का विधिवत अभिन्न अंग बन गया है यह एक ऐतिहासिक मौका है…।

कश्मीर में घनघोर अंधेरा है !

हमारा देश एक विचित्र स्थिति में रहा .देश एक, मगर संविधान दो ! देश एक मगर झंडे दो !! देश एक मगर नागरिकता दो !!!

जी हां यह स्थिति पीड़ादायक थी .कश्मीर अखंड भारत का हिस्सा रहा है किसी दूसरी दुनिया से अचानक तो टपका नहीं है.फिर ऐसी परिस्थितियां क्यों कर रही ? आजादी के पश्चात राजनीतिक मजबूरियों के चलते यह सब करना पड़ा सहना पड़ा. मगर कब तलक….!

इसी विचारधारा के तहत प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की व्यवस्था से लोग खफा थे. और अपनी आवाज बुलंद करते रहे.
धारा 370 खत्म करने और जम्मू कश्मीर को सहसा केंद्र शासित प्रदेश घोषित करते ही जहां जम्मू के नागरिकों में खुशी व्याप्त हो गई मिठाई,फटाके चलने लगे वहीं कश्मीर में भयंकर अंधेरा व्याप्त हो गया. 43 विधानसभा क्षेत्रों में बंटा कश्मीर का राजनीतिक ड्रामा खत्म हो गया. महबूबा मुफ्ती, फारूक अब्दुल्ला, परिवार का खेल खत्म होने से सन्नाटा पसर गया. वहीं कश्मीर जो राज्य का मात्र 17 फ़ीसदी भूभाग है, मे रहस्यमय सन्नाटा , अंधेरा, उजाले में भी देखा जा सकता है… केंद्र सरकार के साहसी फैसले से कश्मीर पर मानो बिजली गिर गई है .इन पंक्तियों के लिखे जाने वक्त तलक एक शब्द समर्थन में नहीं फूटा है. जो बताता है यह सन्नाटा एक तूफां का संकेत है. जिसे साहस, समझदारी से हैंडल करना केंद्र सरकार की जवाबदारी और जवाबदेही दोनों है.

भाजपा और सरकार की जय जय…

कश्मीर के बहुप्रतीक्षित मसले पर ब्रह्मास्त्र चला कर जहां भाजपा ने अपने एक बहुत पुराने इरादे को पूरा कर दिया. वहीं केंद्र सरकार नरेंद्र दामोदरदास मोदी और अमित शाह की साख देश दुनिया में बढ़ गई.
नि:संदेह 370 धारा का मसला बहुत कठिन और पेचीदा था. जब भाजपा और उसके गणमान्य नेता धारा 370 की समाप्ति की बातें करते थे तब कांग्रेस और उनके विरोधी विद्रूष मुस्कान बिखेर चैलेंज किया करते थे कि ऐसा नहीं हो सकता .आज की परिस्थितियों में कश्मीर के दिग्गज नेता फारूक अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती ने भी कल्पना नहीं की थी की केंद्र सरकार आनन-फानन में ऐसा कर गुजरेगी मगर ऐसा हो गया क्योंकि एक मुहावरा है न… ‘मोदी है तो मुमकिन है !!’

आप तो ऐतिहासिक पुरुष बन गए

जी हां! यह सच है कि नरेंद्र दामोदरदास मोदी और अमित शाह भारतीय इतिहास में अपना नाम लिखाने में कामयाब हो गए हैं .आजादी के 72 वर्षों के इतिहास काल में फिर एक ऐसा मौका आया है जब देश रुक गया है और सरकार अपने भविष्य की ओर तक रहा है.

धारा 370 और कश्मीर मसले पर आमूल चूल करने वाला फैसला कोई मामूली बात नहीं है.
मगर जिस धैर्य और साहस का परिचय नरेंद्र मोदी और अमित शाह की युति ने दिया है वह अद्भुत है. इस पेचीदा मसले पर एक एक करके विजय प्राप्त करना यह दिखाता है की राजनीति भी एक अद्भुत खेल है. जिसमे पग- पग पर कांटे हैं,रहस्य है रोमांच है.
कश्मीरी पंडितों के लिए अविस्मरणीय पल बन गया यह मौका. वही लद्दाख जो लंबे समय से स्वायत्ता मांग रहा था उसकी मांग पूरी हुई. बेहद नफसत के साथ केंद्र सरकार ने एक नासूर का इलाज किया है यही कारण है कि मायावती, अरविंद केजरीवाल जैसे धुर विरोधियों ने भी धारा 370 कश्मीर मसले पर नरेंद्र मोदी का खुलकर साथ दिया.

कांग्रेस “दिवालियेपन” की ओर…

नरेंद्र मोदी अमित शाह के राजनीतिक मास्टर स्ट्रोक के खेल में सबसे बड़ी क्षति अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की हुई. जिसके राज्यसभा के मुख्य सचेतक ने आलाकमान को धत्ता बता राज्यसभा सांसद पद से ही इस्तीफा दे दिया और व्हीप भी जारी नहीं की.
यही नहीं गुलाब नबी आजाद ने कांग्रेस के पैरों में खूब कुल्हाड़ी चलाई. राज्य सभा में उन्होंने कहा अमित शाह की कार्यवाही मानो बम चलाने जैसी है यह संविधान का मर्डर है !
आजाद जैसे परिपक्व राजनेता का यह बेहद बचकाना बयां है . कांग्रेस पार्टी का यह स्टैंड उसे नेस्तनाबूद करेगा क्योंकि देश की आवाम धारा 370 के खिलाफ खड़ी है और कश्मीर में ताजा हवा देशवासियों को मुफीद है. ऐसे में धारा के विपरीत चलना कांग्रेस की छवि, लोकप्रियता को चोटिल करेगा. राहुल गांधी, प्रियंका, सोनिया गांधी का मौन यह बता रहा है की उनके हाथ-पांव भी बंधे हुए हैं और देश की आवाम की भावना को महसूस कर रहे हैं मगर मन से कसक है.

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