हर ओकेजन के लिए परफेक्ट हैं सूरज पंचोली के ये लुक्स

साल 2015 में फिल्म हीरो से अपना फिल्मी करियर की शुरूआत करने वाले एक्टर सूरज पंचोली बहुत ही तेजी से कामयाबी की सीढियां चढते दिखाई दे रहे हैं. अपनी पहली फिल्म के लिए सूरज ने “फिल्मफेयर अवार्ड बेस्ट न्यूकमर” भी हासिल किया. सूरज ना सिर्फ अपनी एक्टिंग के लिए जाने जाते हैं बल्कि उनके लुक्स भी आजकल के यूवाओं में काफी पौपुलर हैं. तो चलिए हम आपको दिखाते हैं सूरज पंचोली के कुछ ऐसे चुनिंदा लुक्स जिसे आप जरूर ट्राय करने पर मजबूर हो जाएंगे.

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प्रिंटिड शर्ट…

 

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आजकल प्रिंटिड शर्टस् का फैशन काफी ट्रेंड में है तो वही फैशन फौलो करते हुए सूरज पंचोली ने अपना एक लुक फैंस के साथ शेयर किया है जिसमे उन्होनें ग्रीन कलर की प्रिंटिड शर्ट के साथ व्हाइट कलर की जींस पहनी हुई है. आप सूरज का ये कैसुअल लुक अपनी डेली रूटीन और कौलेज में ट्राय कर सकते हैं.

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फंकी लुक…

 

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@jaywalking.in 🌋

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इस फंकी लुक में सूरज ने व्हाइट कलर की प्लेन टी शर्ट के ऊपर ब्लैक कलर की शर्ट कैरी की हुई है और साथ ही उन्होनें औरेंज कलर का ट्राउसर पहना हुआ है जो कि काफी फंकी लग रहा है. आप भी ये लुक अपने दोस्तों के साथ हैंगआउट करते समय ट्राय कर सकते हैं.

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ट्रेडिशनल वियर…

 

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The festive season cannot be complete without my favorite! @manishmalhotra05 ❤️✨🌟 Thank u soo much , love u always!!

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अपने इस ट्रेडिशनल वियर में सूरज ने व्हाउट कलर का कुर्ते पयजामा कैरी किया हुआ है. व्हाइट कलर के कुर्ते के ऊपर उन्होनें डार्क ब्लू कलर का लाइट प्रिंटिड बेस कोट पहना हुआ है कि काफी जच रहा है. आप भी ये लुक अपने किसी भी ट्रेडिशनल फैमिली फंक्शन में ट्राय कर सकते हैं.

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फोर्मल सूट…

 

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@filmfare #ButtonUP 💙

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इस फोर्मल वियर में सूरज पंचोली ने व्हाइट कलर की शर्ट और ब्लैक कलर का ट्राउसर पहना हुआ है और साथ ही उन्होनें व्हाइट शर्ट के ऊपर ब्लू कलर का वेलवेट कोट पहना हुआ है. आप ये आउटफिट अपने किसी भी फंक्शन में ट्राय कर सकको इम्प्रेस कर सकते हैं.

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Bigg Boss 13: कैप्टन बनते ही सिद्धार्थ करने लगे रश्मि से flirting, देखें वीडियो

जैसे जैसे बिग बौस सीजन 13 के दिन बीतते जा रहे हैं वैसे वैसे ही दर्शकों को कुछ ना कुछ नया देखने को मिस रहा है. हर बार की तरह इस बार भी बिग बौस का ये सीजन काफी रोमांचक होता जा रहा है और दर्शकों को खूब पसंद आ रहा है. बीते दिनों कैप्टेंसी टास्क के दौरान घर में खूब हंगामा होता नजर आया लेकिन आखिरकार कंटेस्टेंट सिद्धार्थ शुक्ला बन गए घर के नए कैप्टन. इसके तुरंत बाद सिद्धार्थ पारस छाबड़ा से कुछ डिस्कशन करते दिखाई दिए और उसके बाद उन्होनें घर के लोगों को काम बांटना शुरू किया.

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माहिरा शर्मा और पारस के बीच भी हुई कहासुनी…

इसी के चलते कई लोगो ने सिद्धार्थ को पारस के हाथों की कठपुतली तक कह दिया. बीते एपिसोड में राशनिंग टास्क में भी घरवालों के बीच काफी लड़ाई झगड़े हुए. इसी के चलते जहां एक तरफ असीम रियाज और पारस छाबड़ा के बीच काफी तू-तू-मैं-मैं हुई वहीं दूसरी तरफ माहिरा शर्मा और पारस के बीच कहासुनी होती दिखाई दी. लेकिन आज के एपिसोड में दर्शकों को कुछ ऐसा देखने को मिलेगा जिसकी शायद उन्हें बिल्कुल भी उम्मीद नही होगी.

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रश्मि देसाई संग फ्लर्ट करेंगे सिद्धार्थ शुक्ला…

बीते दिनों आपने देखा कि बिग बौस द्वारा दिए गए टास्क के चलते सिद्धार्थ शुक्ला और रश्मि देसाई ने सबके सामने जमकर रोमांस किया. आज के एपिसोड में भी सिद्धार्थ और रश्मि के बीच का प्यार उभर कर आने वाला है. सिद्धार्थ आज रश्मि से फ्लर्ट करते दिखाई देने वाले हैं. देखा जाए तो रश्मि देसाई जबसे घर में आई है, तबसे उन्होंने सिद्धार्थ से लड़ाई के अलावा कुछ भी नहीं किया और ना ही रश्मि ने कभी किसी मुद्दे पर कोई स्टैंड लिया.

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कहीं ये सब फुटेज पाने के लिए तो नहीं…

ऐसे में ये कहना बिल्कुल गलत नहीं होगा कि रश्मि देसाई ये सब सिर्फ और सिर्फ फुटेज पाने के लिए कर रही हैं या ये भी हो सकता है कि सिद्धार्थ और रश्मि दोनो मिलकर अपने पुराने गिले शिकवे भुला कर एक नई शुरूआत करना चाहते हों. हालांकि शुरूआत के दिनों में जब रश्मि सिद्धार्थ को टारगेट करती थी तो खुद शो के होस्ट सलमान खान ने भी माना था कि वह फुटेज के लिए ऐसा कर रही हैं.

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जेनेरेशन गैप

नई दिल्ली के हजरत निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन से स्पेशल राजधानी एक्सपे्रेस चली तो नीता अपने जीजाजी को नमस्कार कर अपनी सीट पर आ कर बैठ गई. एक हफ्ता पहले वह अपनी बीमार मां को देखने आई थी. मुंबई तक का सफर लंबा तो था ही, उस ने बैग से शरतचंद्र का उपन्यास ‘दत्ता’ निकाल लिया. सफर में किसी से ज्यादा बात करने की उस की आदत नहीं थी, सफर में उसे कोई अच्छा उपन्यास पढ़ना ही अच्छा लगता था.

नीता अपनी सीट पर बैठी सोच ही रही थी कि पता नहीं आसपास की खाली सीटों पर कौन लोग आएंगे, इतने में 7 युवा लड़के आ गए और सीट के नीचे अपना सामान रखने लगे.

उन लड़कों को देख कर नीता का दिमाग घूम गया, ऐसा नहीं कि लड़कों को देख कर उसे घबराहट हुई थी. वह 40 साल की आत्मविश्वास से भरी महिला थी. 18 साल की उस की एक बेटी और 15 साल का एक बेटा भी था. उसे यह घबराहट युवा पीढ़ी के तौरतरीकों से होती थी. उस ने सोचा कि अब मुंबई तक के सफर में उसे चैन नहीं आएगा. लड़के हल्लागुल्ला करते रहेंगे, न खुद आराम करेंगे न उसे करने देंगे.

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उन लड़कों ने अपना सामान रख कर आपस में बातें करनी शुरू कर दीं. नीता ने अपना चेहरा भावहीन बनाए रखा और अपने उपन्यास पर नजरें जमा लीं, लेकिन कानों में उन की बातें पड़ रही थीं. लड़के मुंबई कोई इंटरव्यू देने जा रहे थे. अब तक नीता खिड़की पर बैठी थी, पैर फैलाने की इच्छा हुई तो जैसे ही पैर आगे बढ़ाए उस की बर्थ पर बैठे लड़के तुरंत खड़े हो गए और बोले, ‘‘मैडम, आप आराम से बैठ जाइए.’’

नीता ने उन पर नजर डाले बिना गरदन हिला दी. पैर फै ला कर अपना दुपट्टा हलके से ओढ़ कर वह आंख बंद कर के लेट गई. आज की युवा पीढ़ी के लिए उस के मन में बहुत दिन से आक्रोश जमा होता जा रहा था. घर पर अकसर बच्चों से उस की बहस हो जाती है. उसे लगता है, बच्चे उस की बात नहीं समझ रहे हैं और बच्चों को लगता है मम्मी को समझाना मुश्किल है. बच्चों से वह हमेशा यही कहती, ‘मैं इतनी बूढ़ी नहीं हूं कि जवान बच्चों की बात न समझ सकूं लेकिन तुम लोग बात ही ऐसी करते हो.’

लेटेलेटे नीता को याद आया कि पिछले महीने वह पार्लर में फेशियल करवा रही थी तो वहां पर 2 लड़कियां भी आई हुई थीं. उन के रंगढंग देख कर उसे बहुत गुस्सा आ रहा था. वे लगातार अपने मांबाप की सख्ती, शक्की स्वभाव और कम जेबखर्च का रोना रो रही थीं. फिर धीरेधीरे उन्होंने अपने दोस्त लड़कों की आशिकी, बेवफाई और प्यारमनुहार की चर्चा शुरू कर दी थी. घर आ कर भी काफी देर तक उस के दिमाग में उन लड़कियों के विचार घूमते रहे थे.

मुंबई में नीता अकसर संडे को अपने पति अमित के साथ घर से कुछ ही दूरी पर स्थित उपवन लेक पर शाम को टहलने जाती है. लेक के चारों तरफ घने पेड़ों की हरियाली देख कर उस का प्रकृतिप्रेमी मन खुश हो जाता है. वहां शाम होतेहोते सैकड़ों युवा जोड़े हाथों में हाथ डाले आते और करीब से करीबतर होते जाते. हर पेड़ के नीचे एक जोड़ा अपने में ही मस्त नजर आता. शाम गहराते ही उन की उन्मुक्तता बढ़ने लगती किंतु वाचमैन की बेसुरी सीटी चेतावनी की घंटी होती जो उन्हें सपने से यथार्थ में ले आती. कुछ बहुत ही कम उम्र के बच्चे होते, बराबर में स्कूल बैग रखे बहुत ही आपत्तिजनक स्थिति में आपस में खोए रहते. नैतिकता, संस्कार किस चिडि़या का नाम है आज का युवावर्ग नहीं जानता. कायदेकानून न मानने में ही उन्हें मजा आता है.

इसी प्रकार का मंथन करते हुए नीता भयभीत हो कर हाई ब्लडप्रेशर की शिकार हो जाती. उसे अपने युवा बच्चों की चिंता शुरू हो जाती. उस लेक पर जाना उसे बहुत अच्छा लगता था लेकिन वहां के माहौल से उस के मन में उथलपुथल मच जाती और उस की चिड़चिड़ाहट शुरू हो जाती. अमित माहौल को हलके ढंग से लेते, उसे समझाते भी लेकिन नीता का मूड मुश्किल से ठीक होता.

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अटेंडेंट ने आ कर कंबल आदि रखे तो नीता वर्तमान में लौटी. खाना टे्रन में ही सर्व होना था, वह घर से अपने खाने के लिए कुछ ले कर नहीं चली थी. हां, उस की मम्मी ने बच्चों की पसंद की बहुत सी चीजें साथ बांध दी थीं. खाना खा कर नीता लेट गई तो लड़के कुछ देर तो आपस में धीरेधीरे बातें करते रहे फिर नीता को सोता हुआ समझ कर धीरे से बोले, ‘‘चलो, हम लोग भी लेट जाते हैं, बातें करते रहेंगे तो मैडम डिस्टर्ब होंगी.’’

नीता की आंखें बंद थीं लेकिन वह सुन तो रही थी. वह थोड़ी हैरान हुई. लड़के चुपचाप अपनीअपनी बर्थ पर लेट गए, नीता भी सो गई. सुबह उठने पर पता चला कि टे्रन बहुत लेट है.  फे्रश हो कर वह आई तब तक चाय और नाश्ते की ट्रे आ गई. लड़के भी नाश्ता कर रहे थे. नाश्ता कर के नीता उपन्यास में लीन हो गई. बीचबीच में उन लड़कों की बातें सुनाई दे रही थीं. लड़के कभी फिल्मों की बातें कर रहे थे तो कभी अपने सीनियर्स की, कभी अपने घर वालों की. आपस में उन का हंसीमजाक चल रहा था. उपन्यास पढ़तेपढ़ते नीता थोड़ी असहज सी हो गई. उसे सिरदर्द शुरू हो गया था.

नीता को इसी बात का डर रहता था कि वह बाहर निकले और कहीं यह दर्द शुरू न हो जाए और अब दर्द बढ़ता जा रहा था. काफी समय से वह शारीरिक रूप से अस्वस्थ चल रही थी. आधे सिर का दर्द, हाई ब्लडप्रेशर और अब कुछ महीने से अल्सर की वजह से उस की तबीयत बारबार खराब हो जाती थी. नीता ने तुरंत उपन्यास बंद किया और उठ कर बैग में से अपनी दवा की किट निकालने की कोशिश की तो उसे चक्कर आ गया और वह ए.सी. में भी पसीनेपसीने हो गई. लड़के तुरंत सजग हुए, एक बोला, ‘‘मैडम, क्या आप की तबीयत खराब है?’’

नीता बोली, ‘‘हां, माइग्रेन का तेज दर्द है.’’

लड़के ने कहा, ‘‘आप के पास दवा है?’’

‘‘हां, ले रही हूं.’’

‘‘आप को और कुछ चाहिए?’’

‘‘नहीं, थैंक्यू,’’ कहतेकहते नीता ने दवा ली और लेट गई. सुबह के 9 बज रहे थे. एक लड़का बोला, ‘‘मैडम, हम सब ऊपर की बर्थ पर चले जाते हैं, आप आराम कर लीजिए,’’ और लाइट बंद कर के परदे खींच कर सब लड़के चुपचाप ऊपर चले गए. दवा के असर से नीता की भी आंख लग गई.

वह करीब 1 घंटा सोई रही, उठी तो लड़के ऊपर ही लैपटाप में अपना काम कर रहे थे. कोई चुपचाप पढ़ रहा था, उसे जागा हुआ देख कर लड़कों में से एक ने पूछा, ‘‘मैडम, अब आप कैसी हैं?’’

नीता ने पहली बार हलके से मुसकरा कर कहा, ‘‘थोड़ी ठीक हूं.’’

‘‘मैडम, चाय पीनी हो तो मंगा दें?’’

‘‘नहीं, अभी नहीं, थैंक्यू.’’

‘‘मैडम, सूरत आ रहा है, आप को कुछ चाहिए?’’

नीता ने फिर कहा, ‘‘नहीं.’’

सूरत स्टेशन आया, लड़के कुछ खानेपीने के लिए उतर गए. फिर एक लड़का वापस आया, ‘‘आप को फ्रूट्स चाहिए?’’

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‘‘हां,’’ नीता ने कहा और पर्स से पैसे निकालने लगी.

‘‘नहीं, नहीं, मैडम, रहने दीजिए, मैं ले आता हूं.’’

‘‘नहीं, नहीं, पैसे लोगे तभी मंगवाऊंगी,’’ नीता ने मुसकरा कर कहा.

लड़के ने पैसे ले लिए और हंस कर बोला, ‘‘अभी लाता हूं.’’

थोड़ी देर में सब वापस आ गए. लड़के ने नीता को पोलिथीन और बाकी पैसे पकड़ाए. नीता ने एक केला ले कर बाकी के उसी लड़के को दे कर कहा, ‘‘आप लोग भी खा लो.’’

‘‘नहीं, मैडम, हम ने तो स्टेशन पर पकौड़े खाए थे.’’

‘‘खा लो, फ्रूट्स ही तो हैं,’’ नीता ने फिर उपन्यास खोल लिया. उस का मन अचानक बहुत हलका हो चला था. तबीयत भी संभल गई थी. साढ़े 11 बजे मुंबई पहुंचने वाली टे्रन अब 5 बजे पहुंचने वाली थी.

आज पहली बार नीता को लग रहा था कि उस ने अपनी बेटी मिनी की बात मान कर मोबाइल रख लिया होता तो अच्छा होता. वह अमित को टे्रन लेट होने की खबर दे सकती थी. कहीं बेचारे स्टेशन पर आ कर न बैठ गए हों. ठाणे से मुंबई सेंट्रल आना- जाना आसान भी नहीं था. वह मोबाइल से दूर रहती थी, हाउसवाइफ थी, घर में लैंडलाइन तो था ही, बच्चे कई बार कहते कि मम्मी, आप भी मोबाइल ले लो तो वह यही कहती, ‘‘मुझे इस बीमारी का कोई शौक नहीं है, तुम लोगों की तरह हर समय कान में लगा कर रखने के अलावा भी मुझे कई काम हैं.’’

मिनी ने मुंबई से चलते समय कितना कहा था, ‘मम्मी, मेरा मोबाइल ले जाओ, आप सफर में होंगी तो हम आप से बात तो कर पाएंगे, आप का भी समय कट जाएगा, हमें भी आप के हालचाल मिल जाएंगे,’ लेकिन नीता नहीं मानी थी और आज पहली बार उसे लग रहा था कि मिनी ठीक कह रही थी.

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लड़कों ने शायद नोट कर लिया था कि उस के पास मोबाइल नहीं है. एक लड़का बोला, ‘‘मैडम, आप चाहें तो हमारे फोन से अपने घर टे्रन लेट होने की खबर दे सकती हैं.’’

नीता ने संकोचपूर्ण स्वर में कहा, ‘‘नहीं, नहीं, ठीक है.’’

‘‘मैडम, आप को जो लेने आएगा उसे परेशानी हो सकती है, स्टेशन पर जल्दी ठीक से बताता नहीं है कोई.’’

बात तर्कसंगत थी, नीता को यही उचित लगा. उस ने एक लड़के का फोन ले कर अमित को टे्रन के लेट होने के बारे में बताया. बहुत बड़ा बोझ सा हट गया नीता के दिल से. अब अमित समय से घर से निकलेंगे, नहीं तो स्टेशन पर आ कर बैठे रहते.

नीता के मन में इस सफर में टे्रन के इतना लेट होने पर भी चिड़चिड़ाहट नहीं थी. वह चुपचाप मन ही मन आज के युवावर्ग के बारे में सोचती रही. हैरान थी अपनी सोच पर कि जमाना कितना बदल गया है, कितनी समझदार है आज की पीढ़ी. 2 पीढि़यों का यह अंतर क्या आज का है? यह तो सैकड़ों वर्ष बल्कि उस से भी पहले का है. अंतर बस यह है कि आज के बच्चे मुखर हैं. अपने हक के प्रति सचेत हैं, लेकिन इस के साथ ही वे बुद्धिमान भी हैं, अपने लक्ष्य पर निगाह रखते हैं और सफल भी होते हैं फिर चाहे वह कोई भी क्षेत्र क्यों न हो.

उस ने चुपचाप एक नजर सब लड़कों पर डाली, सब इंटरव्यू की तैयारी कर रहे थे, बीचबीच में हलका हंसीमजाक.

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नीता सोच रही थी यह एक्सपोजर का समय है जिस में बच्चे दुस्साहसी हैं तो जहीन भी हैं. बच्चों की जिन गतिविधियों से वह असंतुष्ट थी उन से अपने समय में वह भी दोचार हो चुकी थी. बचपन, जवानी, प्रौढ़ा और वृद्धावस्था की आदतें, स्वभाव, सपने, विचार हमेशा एक जैसे ही रहते हैं और इन के बीच जेनेरेशन गैप की दूरी भी सदैव बनी रहती है. समाज में तरहतरह के लोग तो पहले भी थे, आगे भी रहेंगे. नकारात्मक नजरिया रख कर तनाव में रहना कहां तक ठीक है?

नीता का मन पंख सा हलका हो गया. कई दिनों से मन पर रखा बोझ उतरने पर बड़ी शांति मिल रही थी. मुंबई सेंट्रल आ रहा था, वह अपना सामान बर्थ के नीचे से निकालने लगी तब उन्हीं लड़कों ने उस का सामान गेट तक पहुंचाने में उस की मदद करनी शुरू कर दी, टे्रन के रुकने पर वह उन्हें थैंक्यू और औल द बेस्ट कह कर उतर गई.

किसान का जीवन एक हवनशाला

भारत के गांवों में ज्यादातर लोग खेती पर ही निर्भर रहते हैं. हमारे देश के किसान कर्ज में ही जन्म लेते हैं और जिंदगीभर कर्जदार ही बने रहते हैं. किसान अपना खूनपसीना बहा कर अनाज पैदा करते हैं. पुराने समय में गांव के जमींदार लोग छोटेछोटे किसानों का खून चूस कर अपना पेट फुलाए बैठे रहते थे. तब सारा काम करने वाले किसानों को कपड़ा व भरपेट भोजन भी नहीं मिल पाता था. मीठू का पिता धनो किसान था. वह अपनी जिंदगी को किसी तरह चला रहा था. वह दिनभर हल चलाता रहता और शाम को घर आने पर उस की बीवी चुनियां उसे कुछ खाने को देती. खाने के बाद वह अपने बैलों को खिलानेपिलाने में लग जाता. शाम को उस की हुक्का पीने की आदत थी. चुनियां हुक्का भर कर देती थी. एक दिन शाम को गांव का सेठ उस के दरवाजे पर आ गया और उस से बोला, ‘‘क्यों रे धनो, मेरा हिसाब कब करेगा?’’

उस बेचारे का हुक्का पीना बंद हो गया. वह बोला, ‘‘मालिक, अभी तो खाने के लिए भी पैसा नहीं है, हिसाब कैसे चुकता करूं? पैसा होने पर सब चुका दूंगा.’’ सेठ धनो को उसी समय अपने आदमियों से बंधवा कर साथ ले गया और उसे मारपीट कर वापस भेज दिया. मार खा कर धनो अधमरा हो गया. मीठू अपने पिता की हालत देख कर बहुत परेशान हो गया. वह डाक्टर को बुलाने गया, लेकिन डाक्टर के आने तक धनो मर गया. पिता की मौत के बाद मीठू गांव छोड़ कर शहर चला गया. उसे वहां नौकरी मिल गई. पैसा कमा कर उस ने वहीं अपना घर बसा लिया. यह किसानों के जीवन की एक आम झलक है.

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सरकार द्वारा दिए गए अनुदान भी किसानों को नहीं मिल पाते हैं. सरकारी मुलाजिम सब खापी जाते हैं. ज्यादातर किसानों की सेहत दिनोंदिन गिरती जाती है. आखिर में वे भुखमरी या किसी बीमारी का शिकार हो कर  दुनिया से चले जाते हैं. वे खेत रूपी हवनशाला में अपनी जिंदगी को चढ़ा देते हैं. ज्यादातर किसान मवेशी भी पालते हैं. सुबह से ले कर शाम होने तक वे उन की देखभाल करते हैं और रात को जो कुछ रूखासूखा मिलता है, उसे खा कर सो जाते हैं. हमारे देश में कम जोत वाले किसानों को ज्यादा खराब समय बिताना पड़ता है. उन की सेहत तो ठीक रहती नहीं, उन्हें पेट भरने के लिए अलग से मजदूरी करनी पड़ती है.

किसानों के 3 तबके हैं. पहले तबके के किसानों के पास थोड़ी सी जमीन होती है. वे किसी तरह खेती कर के काम चलाने की कोशिश करते हैं. उन के पास काफी मात्रा में पूंजी व साधन नहीं होते हैं. वे खेती के अलावा मजदूरी भी कर लेते हैं. इस तबके के किसान जब बीमार पड़ते हैं, तो उन्हें गांव के महाजन से सूद पर पैसा लेना पड़ता है, जो जल्दी ही बढ़ कर बहुत ज्यादा हो जाता है. महाजन का कर्ज चुकाने के लिए ऐसे किसानों को अपनी जमीन तक बेचनी पड़ती है, लेकिन उस से भी वे पूरा कर्ज नहीं चुका पाते. उन का न तो ढंग से इलाज हो पाता है, न ही समय पर कर्ज दे पाते हैं. नतीजतन, सही इलाज न हो पाने के चलते किसान मर जाते हैं और उन के बच्चे कर्जदार बने रहते हैं.

दूसरे तबके के किसानों के पास कुछ जमीन और पूंजी होती है. पूंजी से वे मवेशी पालते हैं. वे लोग खेती करने के लिए एक जोड़ी बैल रखते हैं, जिस से हल चला कर समय पर खेती कर लेते हैं. इन की जिंदगी कुछ हद तक ठीक रहती है. इस तरह के किसान दूध भी बेचते हैं, जिस से नकद आमदनी भी होती है. ऐसे किसान पैसे कमाने के चक्कर में खुद दूध का इस्तेमाल नहीं करते. अच्छा भोजन न मिल पाने के चलते ये बीमारी से पीडि़त हो जाते हैं. ऐसी हालत में ये जमीन बेच कर अपना इलाज कराते हैं. मजबूरी में इन्हें काफी कम दामों पर जमीन बेचनी पड़ती है. तीसरे तबके के किसान ज्यादा पैसे वाले होते हैं. ये मजदूरों से जम कर काम लेते हैं और समय पर पैसा भी नहीं देते. ये इन किसानों को दुत्कारते और ताने देते रहते हैं. इन की हालत पहले और दूसरे तबके के किसानों से काफीबेहतर होती है.

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लेकिन कुलमिला कर सभी तबकों के किसानों की हालत खराब है. चूंकि तीसरे तबके के किसान खुद खेतों में काम नहीं करते हैं, इसलिए उन की फसल अच्छी नहीं हो पाती, जिस के चलते उन की घरगृहस्थी डूबने लगती है. आज किसानों को नएनए तरीके से खेती करनी पड़ रही है. इस के लिए उन्हें काफी पैसों की जरूरत होती है. जब समय पर पैसा नहीं जुट पाता है, तो किसान अपनी जमीन बेच कर पैसों का इंतजाम करते हैं. खेती के लिए हर किसान के पास अपने साधन होने बेहद जरूरी हैं, लेकिन सभी तबकों के किसानों के सामने पैसों की कमी की समस्या बनी रहती है. माली तंगी के चलते किसानों की हालत दिनोंदिन बिगड़ती जा रही है, जिस की वजह से हमारे देश के किसान मेहनती होते हुए भी कामयाब नहीं हो पाते हैं. सरकार किसानों को अनुदान के रूप में जो खादबीज देती है, वह भी उन्हें समय पर नहीं मिल पाता है और खेत खाली पडे़ रहते हैं.

आमतौर पर अनुदान की चीजों को बेच कर सरकारी मुलाजिम अपनी जेबें भर लेते हैं. बेचारे किसान दिनभर चिलचिलाती धूप, बरसात और ठंड सहने को मजबूर होते हैं. आमतौर पर भारतीय किसान बहुत ही मेहनती होते हैं. वे अपनी मेहनत के बल पर हम लोगों को अनाज मुहैया कराते हैं. वे खुद मामूली जिंदगी बिताते हैं, जिस के जरीए दूसरों का पेट भरते हैं. इस तरह यह सच ही कहा गया है कि भारत के किसान दूसरों की भलाई करतेकरते खुद को हवनशाला में झोंक देते हैं.

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महाराष्ट्र: शरद पवार ने उतारा भाजपा का पानी

कोई नैतिकता, कोई आदर्श, कोई नीति और सिद्धांत नहीं है. जी हां! एक ही दृष्टि मे यह स्पष्ट होता चला गया की महाराष्ट्र में किस तरह मुख्यमंत्री पद और सत्ता के खातिर देश के कर्णधार, आंखो की शरम भी नहीं रखते.

इस संपूर्ण महाखेल मे एक तरह से भारतीय जनता पार्टी के वर्तमान शीर्षस्थ  मुखिया, प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदर दास मोदी और गृहमंत्री अमित शाह का शरद पवार ने अपनी सधी हुई चालो से देश के सामने पानी उतार दिया है और क्षण-क्षण की खबर रखने वाली मीडिया विशेषता: इलेक्ट्रौनिक मीडिया सब कुछ समझ जानकर के भी सच को बताने से गुरेज करती रही है.

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नि:संदेह सत्तासीन मोदी और शाह को यह शारदीय करंट कभी भुला नहीं जाएगा क्योंकि अब जब अजित पवार उप मुख्यमंत्री की शपथ अधारी गठबंधन मे भी ले रहे हैं तो यह दूध की तरह साफ हो जाता है की शरद पवार की सहमति से ही अजीत पवार ने देवेंद्र फडणवीस के साथ खेल खेला था.

भूल गये बहेलिए को !

बचपन में एक कहानी, हम सभी ने पढ़ी है, किस तरह एक बहेलिया पक्षी को फंसाने के लिए दाना देता है और लालच में आकर पक्षी बहेलीए के फंदे में फंस जाता है महाराष्ट्र की राजनीतिक सरजमी में भी विगत दिनों यही कहानी एक दूसरे रूपक मे, देश ने देखी. पक्षी तो पक्षी है, उसे कहां बुद्धि होती है. मगर, हमारे देश की राजनीतिक पार्टियां और उनके सर्वे सर्वा भी ‘पक्षी’ की भांति जाल में फंस जाएंगे, तो यह शर्म का विषय है. शरद पवार नि:संदेह राजनीतिक शिखर पुरुष है और यह उन्होंने सिध्द भी कर दिया.

इस मराठा क्षत्रप में सही अर्थों में नरेंद्र मोदी और अमित शाह की युति को धोबी पछाड़ मारी है.

शरद पवार जानते थे की अमित शाह बाज नहीं आएंगे और सत्ता सुंदरी से परिणय के पूर्व या बाद में बड़ा  खेल खेलेंगे, इसलिए उन्होंने सधी हुई चाल से भतीजे  अजीत पवार को 54 विधायकों के लेटर के साथ फडणवीस के पास भेजा. जानकार जानते हैं की जैसे बहेलिए ने पक्षी फंसाने दाने फेंके थे और पक्षी फस गए थे देवेंद्र फडणवीस और सत्ता की मद में आकर भाजपा का शीर्ष नेतृत्व उस जाल में फस गया. देश ने देखा की कैसे शरद पवार की पॉलिटेक्निकल गेम में फंसकर बड़े-बड़े नेताओं का पानी उतर गया.

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इतिहास में हुआ नाम दर्ज

महाराष्ट्र के राज्यपाल के रूप में भगत सिंह कोशियारी और देवेंद्र फडणवीस का इस तरह महाराष्ट्र की राजनीति और इतिहास में एक तरह से नाम दर्ज हो गया. यह साफ हो गया कि 5 वर्षों तक महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री रहे देवेंद्र फडणवीस कितने सत्ता के मुरीद हैं की उन्होंने रातों-रात सरकार बनवाने में थोड़ी भी देर नहीं की और जैसी समझदारी की अपेक्षा थी वह नहीं दिखाई.

देश ने पहली बार देखा एक मुख्यमंत्री कैसे 26/11 के शहीदों की शहादत के कार्यक्रम मे अपने उपमुख्यमंत्री अजीत पवार का इंतजार पलक पावडे बिछा कर कर रहे हैं. सचमुच सत्ता की चाहत इंसान से क्या कुछ नहीं करा सकती. इस तरह महाराष्ट्र के सबसे अल्प समय के मुख्यमंत्री के रूप में देवेंद्र फडणवीस का नाम दर्ज हो गया. मगर जिस तरह उनकी भद पिटी वह देश ने होले होले मुस्कुरा कर देखी.

मराठा क्षत्रप शरद भारी पड़े

महाराष्ट्र के राजनीतिक परिदृश्य में शरद पवार की धमक लगभग चार दशकों से है. यही कारण है की देश भर में शरद पवार की ठसक देखते बनती है. उन्हें काफी सम्मान भी मिलता है. क्योंकि शरद पवार कब क्या करेंगे कोई नहीं जानता. राजनीति की चौपड़ पर अपनी सधी हुई चाल के कारण वे एक अलग मुकाम रखते हैं.

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सन 78′ में जनता सरकार के दरम्यान 38 वर्षीय शरद पवार ने राजनीति का सधा हुआ  दांव चला था की मुख्यमंत्री बन गए थे. उन्होंने इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, जैसी शख्सियतो के साथ राजनीति की क, ख, ग खेली और सोनिया गांधी के रास्ते के पत्थर बन गए थे समय बदला दक्षिणपंथी विचारधारा को रोकने उन्होंने कांग्रेस के साथ नरम रुख अख्तियार किया है और एक अजेय योद्धा के रूप में विराट व्यक्तित्व के साथ मोदी के सामने खड़े हो गए हैं देखिए आने वाले वक्त में क्या वे विपक्ष के सबसे बड़े नेता पसंदीदा विभूति बन कर प्रधानमंत्री पद के दावेदार भी बनेंगे या फिर…

फिर से दिखेगा भुपेन्द्र विजय सिंह का जलवा, पढ़ें खबर

अपनी भोजपुरी फिल्मों गदर, पाकिस्तान में जय श्रीराम तथा तीन बुड़बक के जरिये खुब चर्चा बटोरने वाले फिल्मकार भुपेन्द्र विजय सिंह की फिल्म मिशन पाकिस्तान जल्द रिलीज होने वाली है और उनके द्वारा प्रस्तुत फिल्म देवरा रिक्शावाला पिछले दिनों रिलीज हुई थी.

उनके फैन्स ये जानना चाहते हैं कि भुपेन्द्र विजय सिंह की कंपनी राजपूत फिल्म फैक्ट्री द्वारा निर्मित अगली फिल्म कौन सी होगी जिसके बाद एक फैन के सवाल का जवाब देते हुये भुपेन्द्र विजय सिंह ने संकेत दिया कि आपकी इच्छा सोच रहा हूं पूरी कर दूंं.

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भुपेन्द्र विजय सिंह यह भी कहते हैं कि एक दो प्रोजेक्ट मेरे पास हैं लेकिन वे कांसेप्ट लेबल पर हैं और अभी तो मैने कास्टिंग के बारे में भी नहीं सोचा है. भुपेन्द्र विजय सिंह इस दिनों राजनिती में व्यस्त हैं. और उनके पोस्ट पर दिये जवाब के बाद से ग्लैमर वर्ल्ड में यह चर्चा तेज हो गयी कि भुपेन्द्र विजय सिंह अपनी कंपनी राजपूत फिल्म फैक्ट्री के जरिये नयी फिल्म जल्द ही बना सकते हैं.

फिलहाल इस मुद्दे पर भुपेन्द्र जी खुल कर कुछ नहीं बोलते हैं मगर इतना जरुर कहते हैं कि थोड़ा इंतजार का मजा लिजिये. फिलहाल हम तो यही चाहेंगे कि भुपेन्द्र विजय सिंह का जलवा जल्द फिर देखने को मिले. उन्हे अग्रीम बधाई तो दी ही जासकती है.

आपको बता दें कि भुपेन्द्र विजय सिंह की फिल्में सामाजिक सरोकार तो दर्शाती हीं है साथ ही लोगों का खुब मनोेरंजन भी करती हैं. गदर और पाकिस्तान में जयश्रीराम , ज़िद्दी आशिक़ , जान तेरे लिए, 3 बुड़बक, जान कह दा ना, विधायक जी को  दर्शकों से मिले प्यार से रोमांचित भुपेन्द्र विजय सिंह कहते हैं ये फिल्में राजपूत फिल्म फैक्ट्री की काफी महत्वपूर्ण फिल्म थीं जिसमें काफी महत्वपूर्ण चीजें बताई गई हैं, जिसे सभी को सुनना और उस पर विचार करना चाहिए. मैं बहुत आभारी हूं कि दर्शकों ने मेरी  फिल्मों को इतना प्यार किया. मेरे लिए बहुत खुशी की बात है, लेकिन उससे भी अच्छी बात यह है कि सामाजिक मुद्दों से जुड़ी मेरी फिल्में मैसेज के साथ बहुत सारे लोगों तक पहुंची.

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अपने किरदारों को जितना प्रभावशाली बना सकूं उतना अच्छा है: राजकुमार राव

चाहे जो भी किरदार हो राजकुमार राव उसे बेहतरीन ढंग से निभाते हैं और कभी भी दर्शकों को निराश नहीं करते. किसी फिल्म को साइन करने से पहले राजकुमार राव ये जरूर देखते हैं कि फिल्म में उनकी भूमिका चुनौतीपूर्ण और प्रभावशाली होनी चाहिए. एफटीआईआई के पूर्व छात्र होने के नाते, राजकुमार को ऐसी कहानियां पसंद आती हैं जो उन्हें सोचने पर मजबूर कर दे.

मैं एक लालची अभिनेता भी हूं…

राजकुमार राव कहते हैं, “मैं वास्तव में कुछ और नहीं देखता, और जब आप ऐसा करते हैं, तो यह जरुरी नहीं है कि आपको मुख्य भूमिका मिलेगी. हां, मैं एक लालची अभिनेता भी हूं, और एक कहानी में सबसे प्रभावशाली हिस्सा करना पसंद करूंगा. लेकिन, मुझे पता है कि यह हर बार नहीं हो सकता है. इसलिए, जब आपको वह नहीं मिलेगा, तो आप काम करना बंद नहीं करेंगे. मैं अपने किरदार को सबसे ज्यादा प्रभावशाली कैसे बनाऊ इस बारे में सोचता हूं.”

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मुझे पता है कि मैं आज कहां से कहां पहुंचा हूं…

 

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Made in China meets Housefull this diwali.. Have a Barfilicious diwali! ❤❤ @kritisanon

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बहुमुखी प्रतिभा के धनी, अभिनेता ने अपनी प्रतिभा के दम पर भारतीय सिनेमा में अपना सफर शुरू किया. अपने अभिनय को बार-बार साबित करने के बाद राजकुमार, देश के सबसे बड़े फिल्म निर्माताओं की पसंद बन गए हैं. राजकुमार राव कहते हैं, “मुझे पता है कि मैं आज कहां से कहां पहुंचा हूं. इसलिए हर बार जब मैं कुछ और महसूस करता हूं, तो मैं अपने सफर को पीछे मुड़कर देखता हूं और मेरा हृदय तुरंत कृतज्ञता से भर जाता है.

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हमेशा खुद को चुनौतियां देता रहूंगा…

 

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Miliye Raghu Mehta se kal. #MadeInChina trailer out tomorrow. #IndiaKaJugaad

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राव कहते हैं, “लोगों को हंसाना मुश्किल है, दर्शक बहुत ही नम्र हैं जो उन्हें “बरेली की बर्फी”, “स्त्री” और “न्यूटन” में मेरी परफौर्मेंस पसंद आई. अब स्लाइस औफ लाइफ वाली फिल्म “मेड इन चाइना” को भी उन्होंने प्यार दिया. मैं एक एक्टर के तौर पर हमेशा खुद को चुनौतियां दूंगा और अपने काम से औडियंस को एंटरटेन करता रहूंगा”.

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सनी लिओनी बनीं फेसबुक पर ‘मोस्ट एंगेजिंग एक्ट्रेस औफ बौलीवुड’, पढ़ें खबर

फेसबुक पर 23 मिलीयन फौलोवर्स रही सनी लिओनी फेसबुक पर बौलीवुड की ‘मोस्ट एंगेजिंग अदाकारा’ बन गयी हैं. अपने सोशल मीडिया अपडेट्स और ट्रेंडी लुक्स की वजह से सनी ने अपने चाहनेवालों का ध्यान आकर्षित किया हैं. और वह फेसबुक पर सबसे ज्यादा एंगेजिंग एक्ट्रेस बन गयी हैं.

सनी लिओनी के बाद प्रतिभाशाली अभिनेत्री अनुष्का शर्मा दूसरे स्थान पर हैं. 9.8 मिलीयन फोलोवर्स रही अनुष्का शर्मा के पिछले दिनों अपने पती के साथ के फोटोज और अपडेट्स की वजह से वह अपने चाहनेवोलों में काफी चर्चा में रहीं. और इसिलिए बाकी बौलीवूड एक्ट्रेस को पिछे छोडकर दूसरे नंबर पर रही मोस्ट एंगेजिंग अदाकारा बन गयी हैं. यह आंकड़े अमरिका की मीडिया टेक कंपनी स्कोर ट्रेंड्स इंडिया द्वारा प्रमाणित और संशोधित किए गए हैं.

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अपनी दुबई टूर के फोटो और वीडियो, अपने परिवार के साथ पोस्ट किए हुए फोटोज, अपने स्टाइलिश फोटोशूट्स और डान्स रिहर्सल्स के वीडियोज की वजह से सनी लिओनी ने अपने प्रशंसकों का ध्यान फेसबुक पर अपनी तरफ आकर्षित किया हैं. और सनी को स्कोर ट्रेंड्स के 100 अंक प्राप्त कर वह नंबर वन एंगेजिंग एक्ट्रेस बनी हैं. वही 73.22 अंकों के साथ दूसरे स्थान पर रही अनुष्का की भूतान ट्रिप की तस्वीरों ने उनके प्रशंसंकों का ध्यान आकर्षित किया.

फेसुबक पर 40 मिलीयन फौलोवर्स रही प्रियंका चोपडा 60.72 अंकों के साथ तिसरे स्थान पर हैं. पिछले दिनों दिल्ली आईं प्रियंका के कम अपडेट्स ने उन्हें तिसरे स्थान पर रखा. वहीं, फेसबुक पर 14 मिलीयन फौलोवर्स रहीं, कैटरीना कैफ का वोग मैगजिन के लिए किया हौट फोटोशूट उनके चाहनेवालों को काफी पसंद आया. और 58.42 अंकों के साथ वह चौथे स्थान पर हैं. 23 मिलीयन फोलोवर्स रहीं सोनाक्षी सिन्हा के दबंग टूर के अपडेट्स ने उन्हें लोकप्रियता में पांचवे स्थान पर लाया हैं.

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स्कोर ट्रेंड्स इंडिया के सह-संस्थापक अश्वनी कौल ने खुलासा किया की, “फेसबुक विश्लेषण के अलावा हम मीडिया का विश्लेषण करने के लिए 14 भारतीय भाषाओं में उपलब्ध 600 से अधिक समाचार स्रोतों से डेटा एकत्रित करतें हैं. इनमें ट्विटरप्रिंट प्रकाशनसोशल मीडिया पर रहीं वायरल खबरें ब्रौडकास्ट और डिजिटल प्लेटफौर्म शामिल हैं. विभिन्न परिष्कृत एल्गोरिदम तब डेटा की प्रक्रिया संसाधित करने और बौलीवुड हस्तियों के स्कोर और रैंकिंग पर पहुंचने में सहायता करते हैं.”

भोजपुरी फिल्‍म ‘अगुआ’ में दिखेगा इस एक्टर जलवा, पढ़ें खबर

प्रोड्यूसर अनिल काबरा की भोजपुरी फिल्‍म ‘अगुआ’ की शूटिंग आज से मुंबई के पनवेल स्थित गुप्‍ता स्‍टूडियो में शुरू हो गई है. इस फिल्‍म में अभिनेता अमरीश सिंह भी मुख्‍य भूमिका में नजर आने वाले हैं. बताया जा रहा है कि फिल्‍म में अमरीश सिंह का किरदार बेहद अहम है. फिल्‍म भोजपुरी समाज में दो परिवार के बीच रिश्‍ते कराने वाले को अगुआ कहते हैं. इस यूनिक कंसेप्‍ट पर यह फिल्‍म बन रही है. इसमें अमरीश सिंह का किरदार काफी अहम है. फिल्‍म के निर्देशक रितेश ठाकुर हैं.

अमरीश सिंह ने इस फिल्‍म को खास बताया है और कहा कि उनकी इच्‍छा थी कि वे अनिल काबरा की फिल्‍मों में काम करें, जो इस फिल्‍म से पूरी हो रही है. फिल्‍म की पटकथा काफी स्‍ट्रांग है, जो उन्‍हें बेहद पसंद आई है. यह एक बेहद सामाजिक और पारिवारिक फिल्‍म है.

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फिल्‍म हर वर्ग के दर्शकों को पसंद आने वाली हैं. उन्‍होंने कहा कि फिल्‍म ‘अगुआ’ भोजपुरी में अपने तरीके का एक अलग सब्‍जेक्‍ट है, जो दर्शाता है कि भोजपुरी फिल्‍मों में भी विविधताएं आने लगी हैं. यहां भी कंसेप्‍ट पर काम हो रहा है.

उन्‍होंने अपनी आगामी रिलीज होने वाली फिल्‍म ‘लव मैरेज’ का जिक्र करते हुए कहा कि दर्शकों को अब फिल्मी कंटेंट चाहिए. यही वजह है कि अब एक जैसी फिल्‍में नहीं चल रही हैं और न मेकर ऐसी फिल्‍में बना रहे हैं.

‘लव मैरेज’ के बाद अब फिल्‍म ‘अगुआ’ भी कंटेंट बेस्‍ड है और मुझे पूरी उम्‍मीद है कि दोनों ही फिल्‍में दर्शकों को खूब पसंद आएंगी. फिल्‍म ‘अगुआ’ के पीआरओ संजय भूषण पटियाला ने बताया कि यह फिल्‍म बौक्‍स औफिस पर इतिहास बनाएगी.

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कर्णफूल

जब मैं अपने कमरे के बाहर निकली तो अन्नामां अम्मी के पास बैठी उन्हें नाश्ता करा रही थीं. वह कहने लगीं, ‘‘मलीहा बेटी, बीबी की तबीयत ठीक नहीं हैं. इन्होंने नाश्ता नहीं किया, बस चाय पी है.’’

मैं जल्दी से अम्मी के कमरे में गई. वह कल से कमजोर लग रही थीं. पेट में दर्द भी बता रही थीं. मैं ने अन्नामां से कहा, ‘‘अम्मी के बाल बना कर उन्हें जल्द से तैयार कर दो, मैं गाड़ी गेट पर लगाती हूं.’’

अम्मी को ले कर हम दोनों अस्पताल पहुंचे. जांच में पता चला कि हार्टअटैक का झटका था. उन का इलाज शुरू हो गया. इस खबर ने जैसे मेरी जान ही निकाल दी थी. लेकिन यदि मैं ही हिम्मत हार जाती तो ये काम कौन संभालता? मैं ने अपने दर्द को छिपा कर खुद को कंट्रोल किया. उस वक्त पापा बहुत याद आए.

वह बहुत मोहब्बत करने वाले, परिवार के प्रति जिम्मेदार व्यक्ति थे. एक एक्सीडेंट में उन का इंतकाल हो गया था. घर में मुझ से बड़़ी बहन अलीना थीं, जिन की शादी हैदराबाद में हुई थी. उन का 3 साल का एक बेटा था. मैं ने उन्हें फोन कर के खबर दे देना जरूरी समझा, ताकि बाद में शिकायत न करें.

मैं आईसीयू में गई, डाक्टरों ने मुझे काफी तसल्ली दी, ‘‘इंजेक्शन दे दिए गए हैं, इलाज चल रहा है, खतरे की कोई बात नहीं है. अभी दवाओं का असर है, सो गई हैं. इन के लिए आराम जरूरी है. इन्हें डिस्टर्ब न करें.’’

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मैं ने बाहर आ कर अन्नामां को घर भेज दिया और खुद वेटिंगरूम में जा कर एक कोने में बैठ गई. वेटिंगरूम काफी खाली था. सोफे पर आराम से बैठ कर मैं ने अलीना बाजी को फोन मिलाया. मेरी आवाज सुन कर उन्होंने रूखे अंदाज में सलाम का जवाब दिया.मैं ने अपने गम समेटते हुए आंसू पी कर अम्मी के बारे में बताया तो सुन कर वह परेशान हो गईं. फिर कहा, ‘‘मैं जल्द पहुंचने की कोशिश करती हूं.’’

मुझे तसल्ली का एक शब्द कहे बिना उन्होंने फोन कट कर दिया. मेरे दिल को झटका सा लगा. अलीना मेरी वही बहन थीं, जो मुझे बेइंतहा प्यार करती थीं. मेरी जरा सी उदासी पर दुनिया के जतन कर डालती थीं. इतनी चाहत, इतनी मोहब्बत के बाद इतनी बेरुखी… मेरी आंखें आंसुओं से भर आईं.

पापा की मौत के थोड़े दिनों बाद ही मुझ पर कयामत सी टूट पड़ी थी. पापा ने बहुत देखभाल कर मेरी शादी एक अच्छे खानदान में करवाई थी. शादी हुई भी खूब शानदार थी. बड़े अरमानों से ससुराल गई. मैं ने एमबीए किया था और एक अच्छी कंपनी में जौब कर रही थी. जौब के बारे में शादी के पहले ही बात हो गई थी.

उन्हें मेरे जौब पर कोई ऐतराज नहीं था. ससुराल वाले मिडिल क्लास के थे, उन की 2 बेटियां थीं, जिन की शादी होनी थी. इसलिए नौकरी वाली बहू का अच्छा स्वागत हुआ. मेरी सास अच्छे मिजाज की थीं और मुझ से काफी अच्छा व्यवहार करती थीं.

कभीकभी नादिर की बातों में कौंप्लेक्स झलकता था. आखिर 2-3 महीने के बाद उन का असली रंग खुल कर सामने आ गया. उन के दिल में नएनए शक पनपने लगे. नादिर को लगता कि मैं उस से बेवफाई कर रही हूं. जराजरा सी बात पर नाराज हो जाता, झगड़ना शुरू कर देता.

इसे मैं उस का कौंप्लेक्स समझ कर टालती रहती, निबाहती रही. लेकिन एक दिन तो हद ही हो गई. उस ने मुझे मेरे बौस के साथ एक मीटिंग में जाते देख लिया. शाम को घर लौटी तो हंगामा खड़ा कर दिया. मुझ पर बेवफाई व बदकिरदारी का इलजाम लगा कर गंदेगंदे ताने मारे.

कई लोगों के साथ मेरे ताल्लुक जोड़ दिए. ऐसे वाहियात इलजाम सुन कर मैं गुस्से से पागल हो गई. आखिर मैं ने एक फैसला कर लिया कि यहां की इस बेइज्जती से जुदाई बेहतर है.

मैं ने सख्त लहजे में कहा, ‘‘नादिर, अगर आप का रवैया इतना तौहीन वाला रहा तो फिर मेरा आप के साथ रहना मुश्किल है. आप को अपने लगाए बेहूदा इलजामों की सच्चाई साबित करनी पड़ेगी. एक पाक दामन औरत पर आप ऐसे इलजाम नहीं लगा सकते.’’

मम्मीपापा ने भी समझाने की कोशिश की, लेकिन वह गुस्से से उफनते हुए बोला, ‘‘मुझे कुछ साबित करने की जरूरत नहीं है, सब जानता हूं मैं. तुम जैसी आवारा औरतों को घर में नहीं रखा जा सकता. मुझे बदचलन औरतों से नफरत है. मैं खुद ऐसी औरत के साथ नहीं रह सकता. मैं तुझे तलाक देता हूं, तलाक…तलाक…तलाक.’’

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और कुछ पलों में ही सब कुछ खत्म हो गया. मैं अम्मी के पास आ गई. सुन कर उन पर तो जैसे आसमान टूट पड़ा. मेरे चरित्र पर चोट पड़ी थी. मुझ पर लांछन लगाए गए थे. मैं ने धीरेधीरे खुद को संभाल लिया. क्योंकि मैं कुसूरवार नहीं थी. यह मेरी इज्जत और अस्मिता की लड़ाई थी.

20-25 दिन की छुट्टी करने के बाद मैं ने जौब पर जाना शुरू कर दिया. मैं संभल तो गई, पर खामोशी व उदासी मेरे साथी बन गए. अम्मी मेरा बेहद खयाल रखती थीं. अलीना आपी भी आ गईं. हर तरह से मुझे ढांढस बंधातीं. वह काफी दिन रुकीं. जिंदगी अपने रूटीन से गुजरने लगी.

अलीना आपी ने इस विपत्ति से निकलने में बड़ी मदद की. मैं काफी हद तक सामान्य हो गई थी. उस दिन छुट्टी थी, अम्मी ने दो पुराने गावतकिए निकाले और कहा, ‘‘ये तकिए काफी सख्त हो गए हैं. इन में नई रुई भर देते हैं.’’

मैं ने पुरानी रुई निकाल कर नीचे डाल दी. फिर मैं ने और अलीना आपी ने रुई तख्त पर रखी. हम दोनों रुई साफ कर रहे थे और तोड़ते भी जा रहे थे. अम्मी उसी वक्त कमरे से आ कर हमारे पास बैठ गईं. उन के हाथ में एक प्यारी सी चांदी की डिबिया थी. अम्मी ने खोल कर दिखाई, उस में बेपनाह खूबसूरत एक जोड़ी जड़ाऊ कर्णफूल थे. उन पर बड़ी खूबसूरती से पन्ना और रूबी जड़े हुए थे. इतनी चमक और महीन कारीगरी थी कि हम देखते रह गए.

आलीना आपी की आंखें कर्णफूलों की तरह जगमगाने लगीं. उन्होंने बेचैनी से पूछा, ‘‘अम्मी ये किसके हैं?’’

अम्मी बताने लगीं, ‘‘बेटा, ये तुम्हारी दादी के हैं, उन्होंने मुझ से खुश हो कर मुझे ये कर्णफूल और माथे का जड़ाऊ झूमर दिया था. माथे का झूमर तो मैं ने अलीना की शादी पर उसे दे दिया था. अब ये कर्णफूल हैं, इन्हें मैं मलीहा को देना चाहती हूं. दादी की यादगार निशानियां तुम दोनों बहनों के पास रहेंगी, ठीक है न.’’

अलीना आपी के चेहरे का रंग एकदम फीका पड़ गया. उन्हें जेवरों का शौक जुनून की हद तक था, खास कर के एंटीक ज्वैलरी की तो जैसे वह दीवानी थीं. वह थोड़े गुस्से से कहने लगीं, ‘‘अम्मी, आप ने ज्यादती की, खूबसूरत और बेमिसाल चीज आपने मलीहा के लिए रख दी. मैं बड़ी हूं, आप को कर्णफूल मुझे देने चाहिए थे. ये आप ने मेरे साथ ज्यादती की है.’’

अम्मी ने समझाया, ‘‘बेटी, तुम बड़ी हो, इसलिए तुम्हें कुंदन का सेट अलग से दिया था, साथ में दादी का झूमर और सोने का एक सेट भी दिया था. जबकि मलीहा को मैं ने सोने का एक ही सेट दिया था. इस के अलावा एक हैदराबादी मोती का सेट था. उसे मैं ने कर्णफूल भी उस वक्त नहीं दिए थे, अब दे रही हूं. तुम खुद सोच कर बताओ कि क्या गलत किया मैं ने?’’

अलीना आपी अपनी ही बात कहती रहीं. अम्मी के बहुत समझाने पर कहने लगीं,  ‘‘अच्छा, मैं दादी वाला झूमर मलीहा को दे दूंगी, तब आप ये कर्णफूल मुझे दे दीजिएगा. मैं अगली बार आऊंगी तो झूमर ले कर आऊंगी और कर्णफूल ले जाऊंगी.’’

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अम्मी ने बेबसी से मेरी तरफ देखा. मेरे सामने अजीब दोराहा था, बहन की मोहब्बत या कर्णफूल. मैं ने दिल की बात मान कर कहा, ‘‘ठीक है आपी, अगली बार झूमर मुझे दे देना और आप ये कर्णफूल ले जाना.’’

अम्मी को यह बात पसंद नहीं आई, पर क्या करतीं, चुप रहीं. अभी ये बातें चल ही रहीं थीं कि घंटी बजी. अम्मी ने जल्दी से कर्णफूल और डिबिया तकिए के नीचे रख दी.

पड़ोस की आंटी कश्मीरी सूट वाले को ले कर आई थीं. सब सूट व शाल वगैरह देखने लगे. हम ने 2-3 सूट लिए. उन के जाने के बाद अम्मी ने कर्णफूल वाली चांदी की डिबिया निकाल कर देते हुए कहा, ‘‘जाओ मलीहा, इसे संभाल कर अलमारी में रख दो.’’

मैं डिबिया रख कर आई. उस के बाद हम ने जल्दीजल्दी तकिए के गिलाफ में रुई भर दी. फिर उन्हें सिल कर तैयार किया और कवर चढ़ा दिए. 3-4 दिनों बाद अलीना आपी चली गईं. जातेजाते वह मुझे याद करा गईं, ‘‘मलीहा, अगली बार मैं कर्णफूल ले कर जाऊंगी, भूलना मत.’’

दिन अपने अंदाज में गुजर रहे थे. चाचाचाची और उन के बच्चे एक शादी में शामिल होने आए. वे लोग 5-6 दिन रहे, घर में खूब रौनक रही. खूब घूमेंफिरे. मेरी चाची अम्मी को कम ही पसंद करती थीं, क्योंकि मेरी अम्मी दादी की चहेली बहू थीं. अपनी खास चीजें भी उन्होंने अम्मी को ही दी थीं. चाची की दोनों बेटियों से मेरी खूब बनती थी, हम ने खूब एंजौय किया.

नादिर की मम्मी 2-3 बार आईं. बहुत माफी मांगी, बहुत कोशिश की कि किसी तरह इस मसले का कोई हल निकल जाए. पर जब आत्मा और चरित्र पर चोट पड़ती है तो औरत बरदाश्त नहीं कर पाती. मैं ने किसी भी तरह के समझौते से साफ इनकार कर दिया.

अलीना बाजी के बेटे की सालगिरह फरवरी में थी. उन्होंने फोन कर के कहा कि वह अपने बेटे अशर की सालगिरह नानी के घर मनाएंगी. मैं और अम्मी बहुत खुश हुए. बडे़ उत्साह से पूरे घर को ब्राइट कलर से पेंट करवाया. कुछ नया फर्नीचर भी लिया. एक हफ्ते बाद अलीना आपी अपने शौहर समर के साथ आ गईं. घर के डेकोरेशन को देख कर वह बहुत खुश हुईं.

सालगिरह के दिन सुबह से ही सब काम शुरू हो गए. दोस्तोंरिश्तेदारों सब को बुलाया. मैं और अम्मी नाश्ते के बाद इंतजाम के बारे में बातें करने लगे. खाना और केक बाहर से आर्डर पर बनवाया था. उसी वक्त अलीना आपी आईं और अम्मी से कहने लगीं, ‘‘अम्मी, ये लीजिए झूमर संभाल कर रख लीजिए और मुझे वे कर्णफूल दे दीजिए. आज मैं अशर की सालगिरह में पहनूंगी.’’

अम्मी ने मुझ से कहा, ‘‘जाओ मलीहा, वह डिबिया निकाल कर ले आओ.’’ मैं ने डिबिया ला कर अम्मी के हाथ पर रख दी. आपी ने बड़ी बेसब्री से डिबिया उठा कर खोली. लेकिन डिबिया खुलते ही वह चीख पड़ीं, ‘‘अम्मी कर्णफूल तो इस में नहीं है.’’

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अम्मी ने झपट कर डिबिया उन के हाथ से ले ली. वाकई डिबिया खाली थी. अम्मी एकदम हैरान सी रह गईं. मेरे तो जैसे हाथोंपैरों की जान ही निकल गई. अलीना आपी की आंखों में आंसू आ गए थे. उन्होंने मुझे शक भरी नजरों से देखा तो मुझे लगा कि काश धरती फट जाए और मैं उस में समा जाऊं.

अलीना आपी गुस्से में जा कर अपने कमरे में लेट गईं. मैं ने और अम्मी ने अलमारी का कोनाकोना छान मारा, पर कहीं भी कर्णफूल नहीं मिले. अजब पहेली थी. मैं ने अपने हाथ से डिबिया अलमारी में रखी थी. उस के बाद कभी निकाली भी नहीं थी. फिर कर्णफूल कहां गए?

एक बार ख्याल आया कि कुछ दिनों पहले चाचाचाची आए थे और चाची दादी के जेवरों की वजह से अम्मी से बहुत जलती थीं. क्योंकि सब कीमती चीजें उन्होंने अम्मी को दी थीं. कहीं उन्होंने ही तो मौका देख कर नहीं निकाल लिए कर्णफूल. मैं ने अम्मी से कहा तो वह कहने लगीं, ‘‘मुझे नहीं लगता कि वह ऐसा कर सकती हैं.’’

फिर मेरा ध्यान घर पेंट करने वालों की तरफ गया. उन लोगों ने 3-4 दिन काम किया था. संभव है, भूल से कभी अलमारी खुली रह गई हो और उन्हें हाथ साफ करने का मौका मिल गया हो. अम्मी कहने लगीं, ‘‘नहीं बेटा, बिना देखे बिना सुबूत किसी पर इलजाम लगाना गलत है. जो चीज जानी थी, चली गई. बेवजह किसी पर इलजाम लगा कर गुनहगार क्यों बनें.’’

सालगिरह का दिन बेरंग हो गया. किसी का दिल दिमाग ठिकाने पर नहीं था. अलीना आपी के पति समर भाई ने सिचुएशन संभाली, प्रोग्राम ठीकठाक हो गया. दूसरे दिन अलीना ने जाने की तैयारी शुरू कर दी. अम्मी ने हर तरह से समझाया, कई तरह की दलीलें दीं, समर भाई ने भी समझाया, पर वह रुकने के लिए तैयार नहीं हुईं. मैं ने उन्हें कसम खा कर यकीन दिलाना चाहा, ‘‘मैं बेकुसूर हूं, कर्णफूल गायब होने के पीछे मेरा कोई हाथ नहीं है.’’

लेकिन उन्हें किसी बात पर यकीन नहीं आया. उन के चेहरे पर छले जाने के भाव साफ देखे जा सकते थे. शाम को वह चली गईं तो पूरे घर में एक बेमन सी उदासी पसर गईं. मेरे दिल पर अजब सा बोझ था. मैं अलीना आपी से शर्मिंदा भी थी कि अपना वादा निभा न सकी.

पिछले 2 सालों में अलीना आपी सिर्फ 2 बार अम्मी से मिलने आईं, वह भी 2-3 दिनों के लिए. आती तो मुझ से तो बात ही नहीं करती थीं. मैं ने बहन के साथ एक अच्छी दोस्त भी खो दी थी. बारबार सफाई देना फिजूल था. खामोशी ही शायद मेरी बेगुनाही की जुबां बन जाए. यह सोच कर मैं ने चुप्पी साध ली. वक्त बड़े से बड़ा जख्म भर देता है. शायद ये गम भी हलका पड़ जाए.

मामूली सी आहट पर मैं ने सिर उठा कर देखा, नर्स खड़ी थी. वह कहने लगी, ‘‘पेशेंट आप से मिलना चाहती हैं.’’

मैं अतीत की दुनिया से बाहर आ गई. मुंह धो कर मैं अम्मी के पास आईसीयू में पहुंच गई. अम्मी काफी बेहतर थीं. मुझे देख कर उन के चेहरे पर हलकी सी मुसकराहट आ गईं. वह मुझे समझाने लगीं, ‘‘बेटी, परेशान न हो, इस तरह के उतारचढ़ाव तो जिंदगी में आते ही रहते हैं. उन का हिम्मत से मुकाबला कर के ही हराया जा सकता है.’’

मैं ने उन्हें हल्का सा नाश्ता कराया. डाक्टरों ने कहा, ‘‘इन की हालत काफी ठीक है. आज रूम में शिफ्ट कर देंगे. 2-4 दिन में छुट्टी दे दी जाएगी. हां, दवाई और परहेज का बहुत खयाल रखना पड़ेगा. ऐसी कोई बात न हो, जिस से इन्हें स्ट्रेस पहुंचे.’’

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शाम तक अलीना आपी भी आ गईं. मुझ से बस सलामदुआ हुई. वह अम्मी के पास रुकीं. मैं घर आ गई. 3 दिनों बाद अम्मी भी घर आ गई. अब उन की तबीयत अच्छी थी. हम उन्हें खुश रखने की भरसक कोशिश करते रहे. एक हफ्ता तो अम्मी को देखने आने वालों में गुजर गया.

मैं ने औफिस जौइन कर लिया. अम्मी के बहुत इसरार पर आपी कुछ दिन रुकने को राजी हो गईं. जिंदगी सुकून से गुजरने लगी. अब अम्मी हलकेफुलके काम कर लेती थीं. अलीना आपी और उन के बेटे की वजह से घर में अच्छी रौनक थी.उस दिन छुट्टी थी, मैं घर की सफाई में जुट गई. अम्मी कहने लगीं, ‘‘बेटा, गाव तकिए फिर बहुत सख्त हो गए हैं. एक बार खोल कर रुई तोड़ कर भर दो.’’

अन्नामां तकिए उठा लाईं और उन्हें खोलने लगीं. फिर मैं और अन्नामां रुई, तोड़ने लगीं. कुछ सख्त सी चीज हाथ को लगीं तो मैं ने झुक कर नीचे देखा. मेरी सांस जैसे थम गईं. दोनों कर्णफूल रुई के ढेर में पड़े थे. होश जरा ठिकाने आए तो मैं ने कहा, ‘‘देखिए अम्मी ये रहे कर्णफूल.’’

आपी ने कर्णफूल उठा लिए और अम्मी के हाथ पर रख दिए. अम्मी का चेहरा खुशी से चमक उठा. जब दिल को यकीन आ गया कि कर्णफूल मिल गए और खुशी थोड़ी कंट्रोल में आई तो आपी बोलीं, ‘‘ये कर्णफूल यहां कैसे?’’

अम्मी सोच में पड़ गईं. फिर रुक कर कहने लगीं, ‘‘मुझे याद आया अलीना, उस दिन भी तुम लोग तकिए की रुई तोड़ रहीं थीं. तभी मैं कर्णफूल निकाल कर लाई थी. हम उन्हें देख ही रहे थे, तभी घंटी बजी थी. मैं जल्दी से कर्णफूल डिबिया में रखने गई, पर हड़बड़ी में घबरा कर डिबिया के बजाय रुई में रख दिए और डिबिया तकिए के पीछे रख दी थी.

‘‘कर्णफूल रुई में दब कर छिप गए. कश्मीरी शाल वाले के जाने के बाद डिबिया तो मैं ने अलमारी में रखवा दी, लेकिन कर्णफूल रुई  में दब कर रुई के साथ तकिए में भर गए. मलीहा ने तकिए सिले और कवर चढ़ा कर रख दिए. हम समझते रहे कि कर्णफूल डिबिया में अलमारी में रखे हैं. जब अशर की सालगिरह के दिन अलीना ने तुम से कर्णफूल मांगे तो पता चला कि उस में कर्णफूल है ही नहीं. अलीना तुम ने सारा इलजाम मलीहा पर लगा दिया.’’

अम्मी ने अपनी बात खत्म कर के एक गहरी सांस छोड़ी. अलीना के चेहरे पर फछतावा था. दुख और शर्मिंदगी से उन की आंखें भर आईं. वह दोनों हाथ जोड़ कर मेरे सामने खडी हो गईं. रुंधे गले से कहने लगीं, ‘‘मेरी बहन मुझे माफ कर दो. बिना सोचेसमझे तुम पर दोष लगा दिया. पूरे 2 साल तुम से नाराजगी में बिता दिए. मेरी गुडि़या, मेरी गलती माफ कर दो.’’

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मैं तो वैसे भी प्यारमोहब्बत को तरसी हुई थी. जिंदगी के रेगिस्तान में खड़ी हुई थी. मेरे लिए चाहत की एक बूंद अमृत के समान थी. मैं आपी से लिपट कर रो पड़ी. आंसुओं से दिल में फैली नफरत व जलन की गर्द धुल गई. अम्मी कहने लगीं, ‘‘अलीना, मैं ने तुम्हें पहले भी समझाया था कि मलीहा पर शक न करो. वह कभी भी तुम से छीन कर कर्णफूल नहीं लेगी. उस का दिल तुम्हारी चाहत से भरा है. वह कभी तुम से छल नहीं करेगी.’’

आपी बोलीं, ‘‘अम्मी, आप की बात सही है, पर एक मिनट मेरी जगह खुद को रख कर सोचिए, मुझे एंटिक ज्वैलरी का दीवानगी की हद तक शौक है. ये कर्णफूल बेशकीमती एंटिक पीस हैं, मुझे मिलने चाहिए. पर आप ने मलीहा को दे दिए. मुझे लगा कि मेरी इल्तजा सुन कर वह मान गई, फिर उस की नीयत बदल गई. उस की चीज थी, उस ने गायब कर दी, ऐसा सोचना मेरी खुदगर्जी थी, गलती थी. इस की सजा के तौर पर मैं इन कर्णफूल का मोह छोड़ती हूं. इन पर मलीहा का ही हक है.’’

मैं जल्दी से आपी से लिपट कर बोली, ‘‘ये कर्णफूल आप के पहनने से मुझे जो खुशी होगी, वह खुद के पहनने से नहीं होगी. ये आप के हैं, आप ही लेंगी.’’

अम्मी ने भी समझाया, ‘‘बेटा जब मलीहा इतनी मिन्नत कर रही है तो मान जाओ, मोहब्बत के रिश्तों के बीच दीवार नहीं आनी चाहिए. रिश्ते फूलों की तरह नाजुक होते हैं, नफरत व शक की धूप उन्हें झुलसा देती है, फिर खुद टूट कर बिखर जाते हैं.’’

मैं ने खुलूसे दिल से आपी के कानों में कर्णफूल पहना दिए. सारा माहौल मोहब्बत की खुशबू से महक उठा.???

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