कोरोना के नाम पर प्राइवेट पार्ट का भी टैस्ट

पूरे देश में कोरोना महामारी पूरी तरह से फैल चुकी है. सब से ज्यादा प्रभावित राज्य महाराष्ट्र इस से बुरी तरह जूझ रहा है, क्योंकि यहां कोरोना के 4 लाख से ज्यादा मरीज हैं और डेढ़ लाख ऐक्टिव हैं. ऐसे में कोरोना योद्धा कहलाए जाने वाले कर्मी जिन का हम ने थाली बजा कर सम्मान किया था, की करतूतें शर्मसार करने वाली हैं. जैसे कि महाराष्ट्र के अमरावती जिले में हुआ, जहां नाक और मुंह से सैंपल लेने के बाद एक महिला को कोरोना पौजिटिव रिपोर्ट बता कर दोबारा बुलाया और उस के प्राइवेट पार्ट का जबरन टैस्ट कर डाला.

भले ही जगहजगह कोरोना को ले कर लोगों को जागरूक किया जा रहा है, मुहिम चलाई जा रही है, घर पर रहने को कहा जा रहा है और कहा यह भी जा रहा है जब तक जरूरी न हो, घर से बाहर न निकलें. फिर भी ऐसी घटनाएं दिल को झकझोर जाती हैं.

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राज्य सरकार द्वारा लौकडाउन में ढील मिलने पर लोग अपने काम पर जा रहे हैं, सामाजिक दूरी जैसे नियमों का पालन कर रहे हैं, पर कोरोना मरीज मिलने पर सभी की टैस्टिंग की जा रही है. जरूरी हिदायतें दी जा रही हैं और घर पर ही क्वारंटीन होने को कहा जा रहा है जब तक स्थिति गंभीर न हो.

सुनने में तो यही आया है कि अभी तक कोरोना का टैस्ट मुंह और नाक से ही लिया जाता रहा है, पर कोरोना टैस्ट के नाम पर जबरन प्राइवेट पार्ट का टैस्ट करना लैब वाले को भारी पड़ गया. वजह, युवती ने थाने में शिकायत जो कर दी थी और वह पकड़ में आ गया.

28 जुलाई, 2020 को यह अजीबोगरीब मामला महाराष्ट्र के अमरावती में हुआ. यहां लैब में कोरोना टैस्ट के नाम पर लैब टैक्नीशियन ने करतूत ही कुछ ऐसी कर दी कि हर कोई सुन कर हैरान है. साथ ही, इनसानियत को शर्मसार करने वाली है कि कोरोना टैस्ट के नाम पर लैब वाला इतनी नीचता की हद तक भी जा सकता है.

कोरोना जांच कराने आई युवती की नाक से नहीं, बल्कि जबरन उस के प्राइवेट पार्ट से सेंपल लिया गया और उस में छेड़छाड़ की गई. पहले तो युवती समझ ही नहीं पाई कि क्या हो रहा है और टैस्ट का विरोध नहीं कर पाई. पर बाद में जानकारी मिलने पर वह समझ गई कि लैब कर्मी ने उसे झांसे में लिया है.

पीड़िता ने बताया कि स्वाब  लेने के बाद आरोपी ने उसे फिर से बुलाया और कहा कि तुम्हारी कोरोना रिपोर्ट पौजिटिव आई है, इसलिए उन्हें यूरिनल टैस्ट भी कराना होगा.

इस घटना की जानकारी पीड़िता ने सब से पहले अपने भाई को दी. शक होने पर भाई ने इस बारे में डाक्टरों से बातचीत की. डाक्टरों ने बताया कि कोरोना टैस्ट के लिए ऐसा कोई परीक्षण नहीं होता है. इस के बाद महिला ने बडनेरा पुलिस को सारी बात बताई. पुलिस ने आरोपी को गिरफ्तार कर लिया.

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पुलिस ने आरोपी टैक्नीशियन का नाम अल्पेश अशोक देशमुख बताया. उस के खिलाफ बलात्कार, एट्रोसिटी और आईटी ऐक्ट के तहत मामला दर्ज कर गिरफ्तार कर लिया. पुलिस अब यह जांच कर रही है कि आरोपी ने इस से पहले कितनी महिलाओं के साथ ऐसी हरकत की.

जानकारी के मुताबिक, 24 साला लड़की अमरावती में अपने भाई के साथ रहती है और एक मौल में जौब करती है. मौल में काम करने वाला एक मुलाजिम 24 जुलाई को कोरोना पौजिटिव पाया गया. उस कर्मचारी के कोरोना पौजिटिव पाए जाने के बाद 28 जुलाई को उस के साथ काम करने वाले सभी 20-25 कर्मचारियों को अमरावती के ट्रामा केयर टेस्टिंग लैब में कोरोना टेस्ट के लिए बुलाया गया था, जिस में यह महिला भी गई थी. लैब के टैक्नीशियन ने मौके का फायदा उठाते हुए महिला के साथ शर्मनाक घटना को अंजाम दिया.

राज्य की महिला एवं बाल विकास मंत्री यशोमति ठाकुर ने इस घटना पर हैरानी जताई और कहा कि टैक्नीशियन के खिलाफ कड़ी कार्यवाही की जाएगी.

आरोपी अल्पेश देशमुख की सोच वाकई शर्मसार करने वाली है. फिलहाल तो वह पुलिस के शिकंजे में है, पर अब तक न जाने कितनी औरतों व लड़कियों के साथ कोरोना टैस्ट के नाम पर ऐसा किया होगा, यह भी जांच का विषय है. वहीं उस के साथ काम करने वाले और भी लैब टैक्नीशियन होंगे, जो ऐसी घटनाओं को अंजाम देते होंगे.

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यह तो समय ही बताएगा कि अल्पेश के साथ कोर्ट क्या फैसला लेता है, पर सभी को ऐसी घटनाओं से सबक लेने की जरूरत है. ऐसा जानकारी की कमी के चलते हुआ. अगर जानकारी होती तो ऐसी घटना को अंजाम नहीं दिया जा सकता.
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फोटो सलाह – 1.कोरोना टैस्टिंग लैब में लड़की का टैस्ट
2. मुंह छिपाती लड़की

अनजाने पल: सावित्री से क्यों विमुख होना चाहता था आनंद?

अनजाने पल : भाग 4- सावित्री से क्यों विमुख होना चाहता था आनंद?

एक दिन जब मैं फैक्टरी से कार में लौट रही थी तो एक शराबी मेरी गाड़ी से टकरा कर गिर पड़ा. मैं ने गाड़ी रोकी और उसे अस्पताल ले गई. उस का इलाज करवाया. बाद में परिचय पूछने पर उस ने अपना नाम विकास बताया. उस ने बताया कि उस की पत्नी किरण कुछ दिनों पहले मर गई है. शादी हुए 2 साल ही हुए थे कि वह गुजर गई. उस के वियोग को सहन न कर पाने के कारण विकास ने शराब पीना शुरू कर दिया था.

विकास का भी कपड़े का व्यापार था. पर उस ने किरण के गुजर जाने के बाद उस की तरफ ध्यान नहीं दिया था. दुखी ही दुखियारे का दुख समझ सकता है. मैं ने विकास को सहारा दिया, उस के अंदर प्रेरणा जगाई. धीरेधीरे विकास मुझ से प्रेम करने लगा. उस ने शादी का प्रस्ताव रखा तो मैं झिझकी. तब उस ने कहा, ‘मुझे अपने पर विश्वास नहीं है. अगर तुम ने मुझे ठुकरा दिया तो मैं फिर से कहीं शराबी न बन जाऊं.’

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मैं ने सोचा, दिशाहीन चलती अपनी जीवननैया को अगर खेवैया मिल रहा हो तो इनकार नहीं करना चाहिए. हम दोनों को एकदूसरे की जरूरत भी थी ही.

पर मन ने सचेत किया, ‘आज इसे मेरी जरूरत है, कल जरूरत न पड़े तो आनंद की तरह ही दूध की मक्खी के समान फेंक दे तो…’

मैं ने उस के विवाह प्रस्ताव को ठुकरा दिया.

हम दोनों का व्यापार एकजैसा होने के कारण हम अकसर मिलते. परंतु विकास ने दोबारा मुझ से इस बारे में चर्चा नहीं की. हम दोनों होटल में व्यापार के सिलसिले में ही एक गोष्ठी में भाग लेने गए थे. विकास ने मुझे विचारों के घेरे से बाहर निकाला, ‘‘सावित्री, तुम ने कुछ भी नहीं खाया है. सारे लोग खा कर जा चुके हैं.’’

मैं ने कहा, ‘‘ओह, मुझे माफ कर दो, विकास. पुरानी यादों में मैं खो गई थी.’’

‘‘मैं समझ गया था. मैं ने उन लोगों से कह दिया है कि तुम्हारी तबीयत ठीक नहीं है. चलो, हम यहां से सीधे आनंद के पास चलते हैं.’’

‘‘अभी वे लोग हमें आनंद से मिलने देंगे?’’

‘‘कम से कम नीलिमा से तो मिल लोगी.’’

‘‘मैं तुम्हें परेशान नहीं करना चाहती, स्वयं ही चली जाऊंगी. तुम गोष्ठी में जाओ.’’

उस ने मेरी बात न मानी. अपने सहायक को सारी बातें समझा कर वह मेरे साथ चल पड़ा. उस ने अपने ड्राइवर से गाड़ी घर भेज देने को कह दिया.

जब हम अस्पताल पहुंचे तो नीलिमा बाहर ही खड़ी मिली. वह रो पड़ी थी. अश्रुपूरित नेत्रों से उस ने हम से जुदा होने के बाद की कहानी सुनाई. जब माया ने आनंद से विवाह किया तो नीलू बहुत खुश थी. माया उस से बहुत प्यार करती थी. आनंद भी बहुत खुश था.

परंतु नीलू को माया का धीरेधीरे आंनद के करीब आना अच्छा न लगा. वह थी भी जिद्दी. आनंद का प्यार उस के लिए कम होने पर वह सह नहीं पाई. माया को वह कभी आनंद के साथ कहीं न जाने देती और उस के करीब भी न जाने देती. इस बात को ले कर हर रोज झगड़ा होता, तकरार होती, परंतु अंत में जीत नीलू की ही होती.

जब माया का बेटा हुआ तो नीलू को बहुत अच्छा लगा, लेकिन माया गुड्डू को सदा नीलू से दूरदूर ही रखती. एक दिन गुड्डू पालने में सो रहा था. माया रसोई में खाना बना रही थी. अचानक वह जाग गया और रोने लगा.

नीलू अपने कमरे से भाग कर आई और गुड्डू को गोद में उठाना चाहा. वह नीचे गिरने को हुआ तो माया ने उसे उठा लिया. माया ने सोचा कि वह गुड्डू को पालने से नीचे गिराना चाह रही थी. नीलू ने कितना समझाने की कोशिश की, परंतु न तो वह समझी, न ही उस ने आनंद को समझाने का मौका दिया. आनंद के ऐसे कान भरे कि रात में उस ने नीलू को मारा भी.

इस घटना के बाद उस परिवार में एक दरार उत्पन्न हो गई, जो बढ़ती ही गई. ऐसे ही वातावरण में दुखी, तिरस्कृत, उपेक्षित, प्यार के लिए तरसतीबिलखती नीलू बड़ी होती गई. मुझे सोच कर हैरानी होती है कि आनंद ने अपने ही खून को इस तरह लाचार, विवश और दुखी क्यों बनाया?

इस घटना के बाद जब से आनंद का तबादला चेन्नई हुआ, तब से नीलू हर रोज यही सोचती कि उस की मां उसे दोबारा मिल जाए.

मैं ने अश्रुपूरित नेत्रों से बेटी को देखा. 9 साल की उम्र में उस ने क्याकुछ नहीं देखा और सहा था. आनंद और माया हर जगह गुड्डू को ले जाते और नीलिमा को घर पर छोड़ जाते. इस बार भी डिजनीलैंड से लौटते समय कार दुर्घटना में यह हादसा हो गया था. माया की मौत हो गई थी और आनंद भी बुरी तरह जख्मी हो जीवन व मृत्यु के बीच संघर्ष कर रहा था. गुड्डू को तनिक भी चोट नहीं आई थी.

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नीलिमा जब यह सब बता रही थी, उसी दौरान आनंद भी गुजर गया. उस से कुछ कहनेसुनने का मौका भी न मिला. मैं दोनों बच्चों को घर ले आई. विकास ने आनंद के अंतिम संस्कार में मेरी काफी मदद की. पूछताछ के दौरान पता चला कि माया का कोई रिश्तेदार नहीं था. मैं किस रिश्ते से बच्चे को यहां रखती. स्कूल में उस का क्या नाम देती. सोच में डूबी हुई थी कि नीलू अंदर आई. उस ने पूछा, ‘‘मां, क्या तुम गुड्डू की भी मां बनोगी?’’

मैं ने कहा, ‘‘मैं गुड्डू की मां ही तो हूं.’’

‘‘मैं ने आप को कितना गलत समझा था मां,’’ नीलू आत्मग्लानि से भर कर बोली.

‘‘मेरी भी तो कुछ गलती थी.’’

‘‘मैं ने आप से मिलने की बहुत कोशिश की, पर पिताजी और माया आंटी ने मौका ही नहीं दिया.’’

‘‘बेटी, जो गुजर गए, उन के बारे में अपशब्द नहीं कहते.’’

गुड्डू रोता हुआ वहां आया. 3 बरस का गोलमटोल गुड्डू बहुत प्यारा लगता था. तोतली जबान में जब उस ने पुकारा ‘दीदी’, तो नीलू ने उसे अपनी बांहों में समेटते हुए कहा, ‘‘गुड्डू, ये हमारी मां हैं.’’

मैं ने उसे गोद में ले कर पुचकारा. वह बहुत देर तक ‘मम्मीमम्मी’ कह कर रोता रहा. मैं सोचने लगी, जिस पति ने मुझे मेरी बेटी से इसलिए अलग किया था, क्योंकि उस के अनुसार, मुझ में ममता नहीं थी, स्नेह नहीं था, और अब समय का खेल देखिए उस के बच्चे मेरी गोद में आ गए.

इतने में विकास भीतर आया और बोला, ‘‘आज इन बच्चों की परवरिश के लिए पिता का स्थान मुझे दे सकोगी?’’

मैं ने कहा, ‘‘हमारे बच्चे होंगे तो क्या होगा?’’

‘‘सरकार के परिवार नियोजन का बोर्ड नहीं देखा. 2 बच्चे बस, 2 से अधिक नहीं. मैं ने औपरेशन करवा लिया है,’’ वह बोला.

‘‘अगर मैं विवाह से इनकार कर देती तो…तुम ने ऐसा क्यों किया?’’

‘‘तुम इनकार कर दो, तब भी ये बच्चे हमारे ही रहेंगे. इन बच्चों को हम ने साथसाथ ही पाया है. इसलिए मैं ने इन का संरक्षक बन कर जीवन गुजारने का निश्चिय कर लिया है.’’

इस से आगे मुझ में इनकार करने की शक्ति नहीं थी. परंतु मैं ने नीलिमा को बुला कर पूछा, ‘‘विकास अंकल को पापा कह सकोगी?’’

‘‘अगर गुड्डू के लिए तुम मां हो तो अंकल हम दोनों के पापा हुए न…’’

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हम उस अनजाने पल में एकदूसरे से पूरी तरह बंध चुके थे. मैं ने कृतज्ञताभरी दृष्टि से विकास की ओर देखा. मेरी नजरों में छिपी सहमति विकास की नजरों से छिप न सकी.

अनजाने पल : भाग 3- सावित्री से क्यों विमुख होना चाहता था आनंद?

मैंने फिर विनम्रता और स्नेह से कहा, ‘बेटी, मैं तबादले की कोशिश करूंगी. तब तक तुम मेरे साथ रहो. एक साल के भीतर हम यहीं आ जाएंगे.’

नीलिमा ने पलट कर पिता की ओर देखा, ‘क्यों, मंजूर है?’

आनंद बोला, ‘सोच लो. मैं वहां नहीं रहूंगा. तुम्हें घर में अकेले दीवारों से बातें करते हुए रहना पड़ेगा. फिर तुम्हारी मां के कथन में न जाने कितनी सचाई. बाद में मुकर जाए तो…’

मुझे आनंद पर बहुत क्रोध आया कि न जाने भाईबहन ने नीलिमा से मेरे विरुद्ध  क्या कुछ कह दिया था. वह बेचारी अपने नन्हे से मस्तिष्क में विचारों का बवंडर लिए चुप रह गई.

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मेरी ननद ने कहा, ‘अभी बच्ची को ले जाने की क्या जरूरत है. जब तबादला हो जाए तब देख लेंगे. अभी तो वह यहां बहुत खुश है.’ मुझे यह सलाह ठीक लगी. मैं अगली ट्रेन से ही दिल्ली लौट आई. मेरे मन में भी आगे के कार्यक्रमों के बारे में योजनाएं बनने लगी थीं. मैं ने लौटते ही अपने तबादले के बारे में सैक्रेटरी से अनुरोध किया तो उन्होंने कहा, ‘तुम्हारी प्रिंसिपल की नौकरी के लिए सिफारिश आई है. क्या यह सबकुछ छोड़ कर जयपुर जाना चाहोगी?’

मैं ने कहा, ‘परिवार की खुशी के लिए नारी को थोड़ा सा त्याग करना ही पड़ता है. तभी तो वह नारी होने का दायित्व निभा पाती है.’

मुझे लोगों ने बहुत समझाया, पर मैं टस से मस न हुई. लेकिन तबादले की अर्जी देते ही तो तबादला नहीं हो जाता. सरकारी विश्वविद्यालयों में प्रशिक्षकों का आदानप्रदान हो सकता है. यूनिवर्सिटी में उत्तरपुस्तिकाओं की जांच के दौरान मेरी रजनी से मुलाकात हुई. उस के पति का दिल्ली तबादला हो गया था और वह भी यहां आना चाहती थी. जयपुर कालेज से दिल्ली आने की उस की उत्सुकता देख मैं भी अत्यंत प्रसन्न हुई. हम दोनों ने ही आदानप्रदान के सारे कागजात जमा करवा दिए.

फिर मैं 4 दिनों की छुट्टी ले जयपुर गई. जयपुर से मेरे पति के पत्र नियमित रूप से नहीं आते थे. ननद तो कभी लिखती ही नहीं थी. मैं अपने खयालों में खोई हुई यह सोच भी नहीं पाई कि शायद वे लोग मुझ से कन्नी काट रहे हैं.

जयपुर पहुंचने पर पता चला कि ननद को कैंसर था. जब तक पता चला, काफी देर हो चुकी थी. उन की देखभाल के लिए माया नाम की 20-21 वर्षीय नर्स रख ली गई थी. मैं ने पति से पूछा, ‘मुझे सूचना क्यों नहीं दी, क्या मैं इतनी गैर हो गई थी?’

आनंद ने कहा, ‘पता नहीं, तुम छुट्टी ले कर आतीं या नहीं. और इस बीमारी में इलाज भी काफी दिनों तक चलता रहता है.’

मैं ने उस समय भी यही सोचा कि शायद उस ने मेरे बारे में ठीक ही निर्णय लिया होगा. मैं ने अपने तबादले के बारे में उस से जिक्र किया तो वह बोला, ‘इस समय तुम्हारा तबादला कराना ठीक नहीं होगा. दीदी बहुत बीमार हैं. माया उन की देखभाल अच्छी तरह कर ही लेती है. वह इलाज के बारे में सबकुछ जानती भी है. नीलू भी उस से काफी हिलमिल गई है.’

‘मेरे आने से इस में क्या रुकावट आ सकती है?’

‘डाक्टरों का कहना है कि दीदी महीने, 2 महीने से ज्यादा रहेंगी नहीं. फिर मैं भी जयपुर में रहना नहीं चाहता. मेरा अगला तबादला जहां होगा, तुम वहीं आ जाना. यही ठीक रहेगा.’

मैं समझ ही नहीं पाई कि वह मुझ से पीछा छुड़ाना चाह रहा है या मेरी भलाई चाहता है. मैं नीलू से जब भी कुछ बोलना चाहती, वह  ‘मां, मुझे परेशान मत करो’, कह कर भाग जाती.

माया दिल की अच्छी लगती थी, देखने में भी सुंदर थी. नीलू से वह बहुत प्यार करती थी. परंतु मैं ने पाया कि वह मेरे पति और बेटी के कुछ ज्यादा ही करीब है. वातावरण कुछ बोझिल सा लगने लगा. ननद मुझ से ठीक तरह से बोलती ही नहीं थी. वह बोलने की स्थिति में थी भी नहीं, क्योंकि काफी कमजोर और बीमार थी.

मैं वहां 2 दिनों से ज्यादा रुक न पाई. जाने से पहले मैं ने रजनी को अपनी मजबूरी बताते हुए फोन कर दिया था.

जब दिल्ली लौटी तो मन में दुविधा थी, ‘क्या मुझे जबरदस्ती वहां रुक जाना चाहिए था. पर किस के लिए रुकती? सब तो मुझे अजनबी समझते थे.’ कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था.

मुश्किल से 10 दिन बीते होंगे कि आनंद का पत्र आया. ‘दीदी की मृत्यु उसी दिन हो गई थी, जिस दिन तुम दिल्ली लौटी. मैं ने यहां से तबादले के लिए अर्जी भेजी है. आगे कुछ नहीं लिखा था. मैं ने संवेदना प्रकट करते हुए जवाब भेज दिया. इस के बाद एक महीना बीत गया. आनंद ने मेरे किसी भी पत्र का जवाब नहीं दिया.

मैं ने चिंतातुर जब बैंक मुख्यालय को फोन किया तो पता चला कि आनंद 15 दिन पहले ही तबादला ले कर मुंबई जा चुका है. उस ने जाने की मुझे कोई खबर नहीं दी थी.

मेरा मन आनंद की तरफ से उचट गया. मुझे मर्दों से नफरत सी होने लगी. इस प्रकार मुझ से दूरी बनाए रखने का क्या कारण हो सकता है, मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा था.

मैं ने अभी तक अपनी घर की स्थिति के बारे में पिताजी को कुछ नहीं बताया था. सोचा, उन्हें क्यों परेशानी में डालूं. मां तो थी नहीं. पिताजी वैसे भी व्यापार के सिलसिले में हमेशा ही दौरे पर रहते थे. अभी मैं सोच ही रही थी कि पिताजी से मिल आऊं कि आनंद का पत्र आ गया. पत्र देख कर मेरा मन आनंदित हो गया.

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बड़े ही उत्साह से मैं ने पत्र खोला. अब तो मैं नौकरी छोड़ कर भी अपनी बच्ची और पति के पास लौटने के लिए बेताब हो रही थी. कितनी अजीब होती है नारी, अपनी अस्मिता के लिए संघर्ष करते हुए परिवार से अलग हुई थी. अब उसी प्रकार परिवार से जुड़ने के लिए सबकुछ छोड़ने को उद्यत हो गई. लेकिन पत्र पढ़ते ही मेरा चेहरा फक पड़ गया. ऐसा लगा, मानो हजारों बरछियां शरीर को छलनी कर रही हों. बड़े ही अनुनयविनय से कड़वी दवा पर मीठी टिकिया का लेप चढ़ा कर पत्र भेजा था. सारांश यही था कि वह माया से विवाह करना चाहता है. माया के गर्भ में उस का बच्चा है. वह मुझ से तलाक चाहता है.

मेरी समझ में सारी बातें आ गईं. मुझ से अलगाव रखना, चिट्ठी न लिखना और खिंचेखिंचे रहने के पीछे क्या कारण था. यह मैं समझ गई. उस कायर की दुर्बलता पर मुझे हंसी आई. साफसाफ कह देता तो क्या मैं मुकर जाती.

मुझे नीलिमा के लिए डर लगने लगा था. परंतु उस ने लिखा था, नीलिमा माया से बहुत प्यार करती है. इसलिए वह  हमारे साथ ही रहेगी. मैं ने अपने दिल को कठोर बना कर तलाक के कागजों पर हस्ताक्षर कर दिए, कानूनी कार्यवाही के बाद 4 वर्षों में तलाक भी हो गया. मैं पिता के पास चेन्नई लौट आई.

मैं ने व्यापार में पिताजी का हाथ बंटाने का निश्चय कर लिया. दिल्ली की नौकरी से भी इस्तीफा दे दिया. चेन्नई में हमारी कंपनी खूब अच्छी चल रही थी. मैं ने पूरी निष्ठा से अपने को काम में समर्पित कर दिया. पर पिताजी वह सदमा झेल न पाए. तलाक होने के 2 महीने बाद ही हृदयगति रुक जाने से उन की मृत्यु हो गई.

मेरी जिंदगी की गाड़ी मंथर गति से आगे बढ़ने लगी. मैं कई मर्दों से व्यापार के दौरान मिलती. परंतु किसी से भी व्यापारिक चर्चा के अलावा कोई बात न करती. लोग मुझ से कहते भी कि तुम दोबारा विवाह क्यों नहीं कर लेतीं. परंतु मैं ने पुनर्विवाह न करने का दृढ़ संकल्प कर लिया था.

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जानें आगे क्या हुआ कहानी के अगले भाग में…

अनजाने पल : भाग 2- सावित्री से क्यों विमुख होना चाहता था आनंद?

मैं दंग रह गई. थोड़ी देर बाद पूछा, ‘आप वहां क्यों नहीं रहेंगे? हमारी बच्ची की देखभाल भी वहां ढंग से हो जाएगी. मैं भी उसे ज्यादा समय दे पाऊंगी.’

‘क्या तुम सोचती हो कि मैं तुम्हारे टुकड़ों पर पलूंगा. मैं मर्द हूं. याद नहीं है, मैं ने तुम्हारे पिताजी से क्या कहा था?’

‘भला उसे मैं भूल सकती हूं. तुम ने पिताजी से कितने आक्रोश में कहा था कि मैं चाहे मिट जाऊं, परंतु दूसरों के टुकड़ों पर नहीं पल सकता. मेरे बाजुओं की ताकत पर भरोसा हो तो अपनी लड़की का हाथ मेरे हाथ में दें. अपनी खुद्दारी पर बहुत गर्व था न तुम्हें?’

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‘था नहीं, आज भी है.’

‘लेकिन हम, तुम अलग तो नहीं हैं न.’

‘स्त्रीपुरुष का अस्तित्व अलग है और अलग ही रहेगा.’

‘तो तुम ने मुझे नौकरी करने के लिए मजबूर क्यों किया?’

‘अब भी मैं तुम्हें नौकरी करने से नहीं रोकता. बस, यही कहता हूं कि घर और बच्ची का ध्यान रखो. पीएचडी वगैरह की आवश्यकता नहीं है. तुम्हारी जितनी तनख्वाह है, उतनी ही काफी है. महत्त्वाकांक्षाओं का कभी अंत नहीं होता.’

‘लेकिन मेरे इतने दिनों की मेहनत पर पानी फिर जाएगा. मुझे नहीं लगता कि बच्ची को होस्टल भेजने और तुम्हारी इस लैक्चरबाजी में कोई संबंध है.’

‘है, तभी तो कह रहा हूं. मेरी बेटी होस्टल नहीं जाएगी. तुम पीएचडी छोड़ कर उस की परवरिश करो, नहीं तो मैं उसे अपनी बहन के पास जयपुर भेज दूंगा. फिर अपना तबादला भी वहीं करा लूंगा.’

‘नीलिमा केवल तुम्हारी बेटी नहीं है, उस पर मेरा भी उतना ही अधिकार है, जितना कि तुम्हारा. उस के संबंध में मुझे भी निर्णय लेने का पूरा अधिकार है.’

‘इस निर्णय की हकदार तुम तभी बन सकती हो, जब उस का भला चाहो. मां हो कर अगर अपनी प्रतिष्ठा, यश और पदवी के लिए तुम उसे होस्टल भेजने पर उतारू हो जाओ तो ऐसे में तुम उस हक से वंचित हो जाती हो.’

मेरे क्रोध का पारावार न रहा. मैं भी बहुतकुछ बोल गई. आनंद ने भी बहुतकुछ कहा. बात बढ़ती ही चली गई. इतने में नीलिमा दौड़ती हुई आई और लगभग चीखती हुई बोली, ‘बंद करो यह झगड़ा. नहीं रहना मुझे अब इस घर में. मैं आंटी के पास जयपुर जाऊंगी.’

मेरा कलेजा मुंह को आ गया. ऐसा लगा, जैसे किसी ने छाती पर गोली दाग दी हो. मैं एकदम से पलट कर अपने कमरे में चली गई. मन में विचार उठा, ‘क्या अपनी पहचान बनाना गुनाह है? क्या मैं ने कोई गलती की है? मुझे पीएचडी नहीं करनी चाहिए क्या?’

मन ने झकझोरा, ‘नहीं, गलती मर्दों की है. पति का अहं मेरी पदोन्नति स्वीकार नहीं कर पाता. वह आखिर शाखा अधिकारी है और अगर मैं पिं्रसिपल बन गई तो उस को समाज में वह इज्जत नहीं मिलेगी, जो मुझे मिलेगी. वह मुझ से जलता है. मैं हार मानने से रही. नीलिमा अभी बच्ची है. एक दिन वह मां का प्यार जरूर महसूस करेगी,’ विचारों के सागर में गोते लगातेलगाते कब आंख लग गई, पता ही न चला.

सुबह उठी तो कुछ अजीब सी मायूसी ने घेर लिया. आनंद को नजदीक न पा कर जल्दी से उठ कर ड्राइंगरूम में पहुंची. घर की निस्तब्धता भयानक लगने लगी.

‘नीलिमा,’ मैं ने आवाज दी. लेकिन मेरी आवाज गूंजती हुई कानों में टकराने लगी. दिल धड़कने लगा. सहसा मेज पर रखी हुई चिट्ठी ने ध्यान आकर्षित किया. धड़कते दिल से उठा कर उसे पढ़ने लगी. उस में लिखा था, ‘मैं नीलिमा को ले कर जयपुर जा रहा हूं, उस की मरजी से ही यह सब हो रहा है. कभी हमारे लिए वक्त निकाल सको तो जयपुर पहुंच जाना. आनंद.’

इस के बाद बहुतकुछ हो गया. नीलिमा ने मुझे समझने या समझाने का मौका ही नहीं दिया. इतने समय बाद उसे देख कर पुराने जख्म हरे हो गए. मैं सोचने लगी, ‘आनंद अस्पताल में क्या कर रहा है? कैसी विचित्र परिस्थिति है, कैसा अजीब संगम. क्या कहूंगी आनंद से, क्या वह मुझे पहचानेगा? क्या मुझे उस से मिलना चाहिए? कुछ समझ में ही नहीं आ रहा था कि क्या करूं.

मैं जब विकास से मिली तो बड़ी परेशानी में थी. उस ने देखते ही कहा, ‘‘क्या हुआ. एक तो देर से आई हो… फिर इतनी घबराहट. सबकुछ ठीक तो है न. कोई बुरी खबर है क्या?’’

मैं ने मुसकराते हुए अपने विचारों को झटकने का प्रयास किया. हम होटल के अंदर गए. मन में विचारों का बवंडर उठ रहा था, ‘क्या विकास को सबकुछ बता दूं, क्या वह समझ पाएगा? आनंद से मिलने कैसे जाऊं? विकास से क्या कहूं?’ कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था.

अचानक मेरे कंधे पर हाथ रख कर विकास ने ही कहा, ‘सवि, मैं कुछकुछ समझ रहा हूं. समस्या क्या है, साफसाफ कहो?’

मेरी आंखों में आंसू आ गए. मैं ने विकास को सबकुछ बता दिया. उस ने मुसकराते हुए कहा, ‘इतनी सी बात के लिए परेशान हो. गोष्ठी खत्म होने के बाद उस से जा कर मिल लो. मैं भी साथ चलूंगा.’

उस ने इतनी आसानी से कह दिया, पर मैं अपने को संभाल नहीं पा रही थी. भोजन के दौरान स्मृतिपटल पर चलचित्र की तरह बीते दिन फिर से उभर आए….

अपनी पीएचडी की समाप्ति पर प्रफुल्लचित, उत्साहित मैं जयपुर चल पड़ी. मन मुझे दोषी ठहराने लगा. मैं ने इन 6 महीनों में उन लोगों की कोई खोजखबर नहीं ली थी. उन लोगों ने भी मुझे कोई पत्र नहीं लिखा था. मैं सोचने लगी कि मेरी बेटी नीलिमा को भी क्या मेरी याद कभी नहीं आई होगी. पर मैं ने ही कौन सा उसे याद किया. पीएचडी की तैयारी इतनी अजीब होती है कि व्यक्ति सबकुछ भूल जाता है. परंतु इस में गलती ही क्या है? आनंद भी जब कंपनी की तरफ से ट्रेनिंग के लिए 6 महीने के लिए विदेश गया था तो उस ने भी तो कोई खोजखबर नहीं ली थी.

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मैं भी तो व्यस्त थी. आनंद मेरी मजबूरी जरूर समझ गया होगा. मैं जब घर जाऊंगी तो वे लोग बहुत खुश होंगे. सहर्ष मेरा स्वागत करेंगे. मन में आशा की किरण जागी, लेकिन तुरंत ही निराशा के बादलों ने उसे ढक दिया, ‘क्या सचमुच वे मेरा स्वागत करेंगे? मुझे अगर घर में प्रवेश ही नहीं करने दिया तो?’ संशय के साथ ही मैं ने जयपुर पहुंच कर ननद के घर में प्रवेश किया.

ननद विधवा हो गई थी. अपना कोई नहीं था. नीलिमा से उसे बहुत प्यार था. बहुत रईस भी थी, इसलिए बड़ी शान से रहती थी. घर में नौकरचाकरों की कमी नहीं थी. मैं ने डरतेडरते भीतर प्रवेश किया. आनंद बाहर बरामदे में खड़ा था. उस ने मुझे देखते ही व्यंग्यभरी मुसकराहट के साथ कहा, ‘मेमसाहब को फुरसत मिल गई.’

मैं ने जबरदस्ती अपने क्रोध को रोका और मुसकराते हुए अंदर प्रवेश किया. अंदर से ननद की कठोर व कर्कश आवाज ने मुझे टोका, ‘जिस परिवार से तुम ने 6 महीने पहले रिश्ता तोड़ दिया था, अब वहां क्या लेने आई हो?’

‘मैं ने…मैं ने कब रिश्ता तोड़ा था?’

ननद बोली, ‘जब बच्ची को मेरे सुपुर्द कर दिया तो क्या संबंध तोड़ना नहीं हुआ?’

मैं ने हैरान हो, बरबस अपनी भावनाओं को काबू में रखते हुए, कहा, ‘दीदी, मैं आप से अपना अधिकार जताने या लड़ने नहीं आई हूं. नीलिमा कानूनन आज भी मेरी ही बेटी है. मैं केवल उसे लेने आई हूं.’

सफर की थकान और मई की लू के थपेड़ों ने मुझे पहले ही पस्त कर दिया था. ऊपर से आनंद के शब्दों ने मुझे और भी व्यथित कर दिया. उस ने बेरुखी से कहा, ‘नीलिमा को ले जाने का खयाल अपने दिल से निकाल दो. वह तुम से कोई संबंध रखना ही नहीं चाहती.’

मैं ने आपा खोते हुए कहा, ‘क्या रिश्ते कच्चे धागों के बने होते हैं, जो इतनी जल्दी टूट जाते हैं?’

इतने में नीलिमा बाहर आई. मैं ने सोचा था कि वह मुझ से गले मिलेगी, रोएगी. अगर वह मुझे कोसती, रूठती, रोती, कुछ भी करती तो मैं खुश हो जाती. परंतु उस की बेरुखी ने मुझे परेशान कर दिया.

उसी ने कहा, ‘मां, क्या लेने आई हो यहां?’

‘शुक्र है, तुम मुझे अब भी मां तो मानती हो. मैं तुम्हारे पास आई हूं. मेरी पीएचडी पूरी हो गई है. जून से मुझे प्रिंसिपल का पद मिल जाएगा. कालेज के कैंपस में ही हमारा घर होगा. तुम्हें वहां बहुत अच्छा लगेगा. अब हम साथसाथ रहेंगे.’

‘पिताजी हमारे साथ नहीं चलेंगे. और मैं उन के बगैर रह नहीं सकती. क्या आप हमारे साथ यहां नहीं रह सकतीं?’

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मैं कुछ भी न कह पाई. मेरा वजूद मुझे नौकरी छोड़ने से रोक रहा था. मैं तबादले की कोशिश करने को तैयार थी. प्रिंसिपल का पद छोड़ने को भी तैयार थी, परंतु नौकरी छोड़ कर बैठे रहना मुझे मंजूर नहीं था. अगर मर्द का अहं इतना तन जाए तो नारी ही क्यों झुके? हम दोनों ने अपनेअपने अहं के चलते बच्ची के भविष्य की बात सोची ही नहीं.

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अनजाने पल : भाग 1- सावित्री से क्यों विमुख होना चाहता था आनंद?

औटो चेन्नई के अडयार स्थित पुष्पा शौपिंग कौंप्लैक्स से गुजर रहा था कि तभी नीलिमा पर नजर पड़ी. 3-4 बरस के एक लड़के का हाथ थामे वह दुकान से निकल रही थी. मैं अपनी उत्सुकता रोक न पाई. मातृत्व मानो बांध तोड़ कर छलछलाने को बेताब हो गया था.

मैं ने औटो रुकवाया और उसे पैसे दे कर उतर गई. धीरेधीरे उस के पास पहुंची और आवाज दी, ‘‘नीलिमा.’’

वह एकाएक चौंक कर मुड़ी, फिर तेजी से मुझ से लिपट गई और फूटफूट कर रोने लगी. भय से सिमट कर वह लड़का भी रोने लगा. मेरे शरीर के निस्तब्ध तार नीलिमा के स्पर्श से झनझना उठे. रोमरोम में एक अजीब सा आनंद समाने लगा. इतने बरसों बाद जिसे पाया था, उसे अपने से अलग करने का मन ही नहीं हो रहा था.

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काफी देर रोने के बाद जब उस ने आवाज सुनी, ‘दीदी, मुझे डर लग रहा है, पिताजी के पास चलो.’ तभी वह संभली. आंसू पोंछ कर मेरी ओर देखा और मुसकराई. फिर बोली, ‘‘मां, हम यहां मलर अस्पताल में हैं. पिताजी 5वीं मंजिल पर कमरा नंबर 18 में हैं. देर हो रही है, मैं जाती हूं. हो सके तो शाम को आ जाइएगा. यह मेरा भाई अभय है,’’ फिर अपने भैया के कंधे पर हाथ रख वह मेरी नजरों से ओझल हो गई.

नीलिमा का आकर्षण इतना था कि मैं यह भूल ही गई कि मुझे विकास से सवेरा होटल में मिलना है. मैं सोचने लगी कि कहां मुझ से नफरत करने वाली उस दिन की गोरीचिट्टी खूबसूरत नीलू और कहां आज की दुख और वेदना का बोझ ढोए बचपन में ही प्रौढ़ता लिए यह नीलिमा. मैं ने शौपिंग कौंप्लैक्स से विकास को सूचना भिजवाई कि 15 मिनट में मैं आ रही हूं और जल्दी से औटो ले कर चल पड़ी.

अनायास मेरी आंखों में आनंद का चेहरा घूम गया. मेरे मांबाप ने उस का लंबा कद, गोरा रंग, मस्तीभरी जवानी और आकर्षक व्यक्तित्व देख कर मेरा विवाह उस से तय किया था. मैं ने हिंदी साहित्य में एमफिल किया था और एक कालेज में पढ़ाती थी. आनंद बैंक में अफसर था. हम दोनों ने एकदूसरे को पसंद कर के शादी की थी. शादी के तुरंत बाद उस का तबादला दिल्ली हो गया, इसलिए हम लोग वहां चले गए. शादी होते ही मैं ने नौकरी छोड़ दी थी, हालांकि आनंद को यह अच्छा नहीं लगा था. परंतु मैं तबादले के झमेलों में पड़ना नहीं चाहती थी.

दिल्ली जैसे महानगर में खर्चे तो बढ़ते ही जाते हैं, एक दिन आनंद ने ही बात छेड़ी, ‘सावित्री, सारा दिन घर में बैठे तुम्हें घुटन महसूस नहीं होती? मेरा दोस्त कह रहा था कि कालेज में हिंदी प्राध्यापक की जगह खाली है. कहो तो बात चलाऊं?’

मैं ने कहा, ‘वैसे मेरी नौकरी करने की अभी इच्छा नहीं है. घर पर भी तो बहुत सारे काम होते हैं. बुनाई, कढ़ाई आदि सीख रही हूं. ढंग से खाना बनाना भी तो अभी ही सीख रही हूं.’

आनंद को मेरी बात अच्छी नहीं लगी. उस ने कहा, ‘अभी तो हमारे बच्चे भी नहीं हैं. इतनी शिक्षा हासिल करने के बाद तुम्हारा इस तरह घर में बैठे रहना मुझे अच्छा नहीं लगता. फिर महंगाई भी कितनी है…तुम हाथ बंटाओगी तो हम घर के लिए कुछ चीजें खरीद सकेंगे.’ आनंद की बात उस समय मुझे भी अच्छी लगी. उसी ने दौड़धूप कर मुझे श्रीराम कालेज में नौकरी दिलाई.

दिन गुजरते गए. 8-9 वर्षों बाद ही नीलिमा का जन्म हुआ था. उस के जन्म के बाद से सबकुछ बदल गया. आनंद को बेटी से बहुत अधिक लगाव था. जब तक वह 5 साल की हुई, तब तक मेरी सास हमारे साथ रहीं. अकेली विधवा सास का हमें बहुत अधिक सहारा था. मेरी और पति की तनख्वाह से गृहस्थी की गाड़ी मौज से चल रही थी.

मैं ने पीएचडी के लिए रजिस्ट्रेशन करवा लिया था. कालेज में प्रिंसिपल की जगह खाली होने वाली थी. मेरी पीएचडी के खत्म होने में 6 महीने बाकी थे, इसलिए पूर्व प्रिंसिपल ने मेरी सिफारिश की थी. मैं जीजान से पीएचडी की समाप्ति में लगी थी. अचानक मेरी सास गुजर गईं.

आनंद को मां की मृत्यु से ज्यादा बेटी का अकेलापन खटकने लगा. उस ने मां की तेरहवीं होते ही कहा, ‘मैं चाहता हूं कि तुम नौकरी छोड़ दो. जब नीलू बड़ी हो जाए तो फिर नौकरी कर लेना.’

मैं चौंकी. फिर स्थिति को संभालते हुए कहा, ‘ऐसा कैसे हो सकता है, हम ऐशोआराम की जिंदगी के आदी हो चुके हैं. मेरी तनख्वाह नहीं होगी तो दिल्ली जैसे शहर में तुम्हारे अकेले की तनख्वाह से गुजरबसर कैसे होगी?’

‘कम से कम पीएचडी छोड़ दो. देर से घर आओगी तो नीलिमा बहुत दुखी हो जाएगी. वह दिनभर अकेली कैसे रह पाएगी.’

‘उसे तुम क्यों नहीं संभाल लेते. 4 महीने में मेरी थीसिस पूरी हो जाएगी. फिर जल्दी ही मैं प्रिंसिपल का पद संभाल लूंगी. कालेज की तरफ से वहीं घर भी मिल जाएगा. फिर नीलू की परवरिश में कोई बाधा नहीं आएगी.’

आनंद उस समय खामोश रह गया. परंतु उस के मन में ज्वालामुखी ने धधकना आरंभ कर दिया. मैं ने नीलू को कालेज के पास शिशु सदन में छोड़ना शुरू कर दिया. मैं रोज सवेरे उसे छोड़ आती और शाम को आनंद उसे ले आता.

मुझे थीसिस का काम खत्म कर लौटने में रात को देर हो जाती. नीलिमा उदास रहने लगी थी. उस की खामोशी मुझे कभीकभी बहुत अखरती, परंतु मैं अपनी थीसिस अधूरी नहीं छोड़ सकती थी.

हम दोनों के बीच अकसर मनमुटाव होता. वह अकसर कहता, ‘मांबाप के रहते दिनभर बच्ची इस प्रकार अनाथों की तरह रहे, मुझे अच्छा नहीं लगता.’

मैं तपाक से उत्तर देती, ‘तो मैं क्या करूं? यह तो होता नहीं कि कोई उचित सुझाव दो, बस सदा कोसते ही रहते हो.’

बात जब बहुत बढ़ जाती तो वह कहता, ‘तुम अपनी थीसिस को अपनी बेटी की परवरिश से ज्यादा जरूरी समझती हो? कैसी मां हो?’

कहती, ‘तुम मुझ से जलते हो. तुम्हारा अहं इस बात की इजाजत नहीं देता कि मैं तुम से ऊंचे पद पर पहुंचूं. तभी तुम मुझे ताने देते रहते हो. यह मत भूलो कि मुझे नौकरी पर जाने को मजबूर तुम ने ही किया था.’

नीलिमा ही सदा हम दोनों के आपसी झगड़ों में बीचबचाव करती. वह सदा एक ही बात कहती, ‘मैं ने तो कभी कोई शिकायत नहीं की. मुझे ले कर आप लोग क्यों लड़ते रहते हैं.’

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वैसे नीलिमा चिड़चिड़ी सी रहती, बातबात पर जिद करती. ऊपर से आनंद उसे मेरे विरुद्ध हमेशा कुछ न कुछ कह कर भड़काता रहता. मुझे घर के माहौल में घुटन सी होने लगती. परंतु थीसिस अधूरी छोड़ने के लिए मैं कतई तैयार न थी. मेरी बच्ची मेरे जिगर का टुकड़ा थी, उस के रोने की आवाज मुझे परेशान कर देती.

एक दिन मैं ने छुट्टी ले ली. घर में उस की पसंद की खीर बनाई और आलू की टिकियां. ये दोनों चीजें उसे बहुत अच्छी लगती थीं. वह स्कूल से घर आई. मैं बड़े प्यार से उसे मेज के पास ले गई. उस ने मेज पर रखी चीजें एकएक कर खोलीं, फिर बंद कर दीं. मैं खुशीखुशी उस की प्रतिक्रिया का इंतजार करने लगी. जब वह कुछ न बोली तो मैं ने ही कहा, ‘चल नीलू, आज मैं तुझे स्वयं हाथ से खिलाती हूं.’

‘क्यों? आज मुझ से इतनी हमदर्दी क्यों?’ उस के शब्द शूल की तरह मेरे हृदय को भेद गए? ‘बेटी, कैसी बात करती है. मैं ने तेरी पसंद की चीजें बनाई हैं. देख…खीर, आलू की गरमगरम टिकिया.’

‘मुझे भूख नहीं है.’

‘क्या हुआ, मुझ से नाराज है?’

‘अगर तुम मुझे हर रोज इस प्रकार खाना खिलाओगी तो मैं आज खाने को तैयार हूं.’

मैं चुप हो गई, क्या जवाब देती. आखिर उसी ने चुप्पी तोड़ी, ‘बोलो, जवाब दो. क्या हर रोज घर पर रह सकती हो?’

‘तब तो मुझे नौकरी छोड़नी पड़ेगी. और नौकरी छोड़ दूं तो हम तुम्हें वह सुख और आराम नहीं दे पाएंगे, जो तुम्हें आज मिल रहा है. देखो, तुम्हारे पास टीवी है, एसी है, कितने खिलौने हैं, अच्छे स्कूल में पढ़ती हो, क्या ये सब तुम्हें खोना अच्छा लगेगा?’

‘लेकिन पिताजी तो कहते हैं कि तुम्हें नौकरी करने की जरूरत नहीं है.’

‘वे तो यों ही कहते हैं. तुम जब बड़ी हो जाओगी, तभी ये बातें समझ पाओगी.’

‘क्या पता. लेकिन मुझे कुछ अच्छा नहीं लगता. तुम्हारा हर रोज देर से आना, फिर रात को तुम्हारा और पिताजी का झगड़ा…’ यह कहतेकहते उस की आंखों से आंसू झरने लगे.

मैं ने बच्ची को आलिंगन में भींच लिया. फिर कहा, ‘कहो तो तुम्हें होस्टल भेज दें. वहां तुम्हें खूब सारी सहेलियां मिलेंगी. खूब मजा आएगा.’

उस ने कुछ जवाब नहीं दिया. उस रात मैं ने आनंद से इस बात का जिक्र किया. मुझे तो आश्चर्य होता था कि उस व्यक्ति से मैं ने शादी कैसे की? वह कितना बदल गया गया था. कठोर हृदयहीन और अहंकारी. उस ने गुस्से से लगभग चीखते हुए कहा, ‘कैसी मां हो. बच्ची को अपने से अलग करना चाहती हो?’

मैं बोली, ‘मैं उसे अलग कहां कर रही हूं. आजकल तो सभी बच्चों को होस्टल भेजते हैं. एक साल में मेरा काम हो जाएगा. फिर पिं्रसिपल बन जाने पर कालेज के कैंपस में ही घर मिल जाएगा. नीलू को फिर घर ले आएंगे.’

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आनंद ने तपाक से उत्तर दिया, ‘औरों की बात छोड़ो. सोसाइटी में झूठी शान बघारने के लिए लोग बच्चों को होस्टल भेजते हैं. हमें इस की जरूरत नहीं है. और यह खयाल दिल में फिर कभी मत लाना कि मैं कालेज कैंपस में तुम्हारे साथ रहूंगा.’

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कोरोना महामारी: मोदी सरकार के लिए आपदा में अवसर का मौका

लेखक- सोनाली ठाकुर

कोरोना महामारी में लॉकडाउन लगने के बाद प्रवासी मजदूरों को उनको घर भेजने में राज्य और केंद्र सरकार में सियासी उठा-पठक के बीच रेलव ने बताया कि श्रमिक ट्रेनों से रेलवे ने 428 करोड़ रूपए कमाए. दरअसल, ये आंकड़े आरटीआई कार्यकर्ता अजय बोस की याचिका पर रेलवे ने दिए थे. इन आंकड़ों से पता चलता है कि 29 जून तक रेलवे ने 428 करोड़ रुपये कमाए और इस दौरान 4,615 ट्रेनें चलीं. इसके साथ ही जुलाई में 13 ट्रेनें चलाने से रेलवे को एक करोड़ रुपये की आमदनी हुई.

हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिये इंडियन चैंबर ऑफ कॉमर्स (ICC) के 95 वें सालाना कार्यक्रम को संबोधित किया था. जिसे संबोधित करते हुए पीएम मोदी ने इस आपदा को अवसर में बदलने वाली बात कही थी. जिस तरह इस महामारी के बीच सरकार ने गरीब मजदूरों से 428 करोड़ रुपए की कमाई की उससे साफ जाहिर होता है कि उन्होंने इस आपदा को अवसर में बदलने वाली बात को सिर्फ कहा ही नहीं अपनाया भी है.

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अब तक दो महीनें से ज्यादा का समय बीत चुका है जब वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 20 लाख करोड़ रुपए के पैकेज का ऐलान किया था. साथ ही प्रवासी मजदूरों और किसानों के लिए 30 हजार करोड़ के अतिरिक्त फंड की सुविधा की बात कही थी. इस फंड में उन्होंने प्रवासी मजदूरों को दो महीनों के लिए बिना राशन कार्ड के मुफ्त अनाज देने की बात कही. जिसमें मजदूरों पर 3500 करोड़ रुपए का खर्च बताया गया. जिसके तहत आठ करोड़ प्रवासी मजदूरों के लाभान्वित होने की बात कही गई. लेकिन ये सभी बड़े-बड़े वादे जमीनी स्तर पर खोखले नजर आ रहे है. देखा जाए तो, यह आर्थिक पैकेज दर दर की ठोकरें खा रहे मजदूरों और अपना सबकुछ गंवा चुके किसानों के साथ एक क्रूर और भद्दा मजाक से ज्यादा कुछ नहीं है.

अन्य देशों के मुकाबले भारत का आर्थिक पैकेज बेहद कमजोर कोरोना काल के तहत अगर हम अन्य देशों की अर्थव्यवस्थाओं से भारत की अर्थव्यवस्थाओं के आकार के अनुपात में आर्थिक पैकेज की बात करें तो जिस तरह वहां की सरकारों ने अपनी जनता को इस महामारी मे आर्थिक तंगी से बचाया है. उसके मुकाबले हमारा आर्थिक पैकेज बेहद कमजोर है.

अमेरिका

वैश्विक स्तर पर अमेरिका ने सबसे बड़ा आर्थिक पैकेज अपनी अर्थव्यवस्था के लिए जारी किया है. अमेरिका ने करीब 30 करोड़ लोगों के लिए 2 ट्रिलियन डॉलर यानी कुल 151 लाख करोड़ रुपये का राहत पैकेज जारी किया है. यह भारत के कुल बजट के लगभग 5 गुना ज्यादा है. ये पैकेज के तहत अमेरिका के आम नागरिकों को डायेरेक्ट पेमेंट के तहत मदद दी जाएगी.

जर्मनी

इसके अलावा जर्मनी ने कोरोना वायरस के आर्थिक प्रभाव को कम करने के लिए हर परिवारों को प्रति बच्चा 300 यूरो (यूएस $ 340) देने का एलान किया है. जिसे सितंबर और अक्टूबर में दो किस्तों में भुगतान किया जाएगा.

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ब्रिटेन

ब्रिटेन में कोरोना वायरस के चलते कई कंपनियों को वित्तीय दबाव में काम करना पड़ रहा था. ऐसे में ब्रिटेन की सरकार ने उन कर्मचारियों के वेतन का 80 फीसदी हिस्सा कंपनियों को देने की घोषणा की, जिन्हें नौकरी से नहीं निकाला जाएगा. यह फैसला वित्तीय दबाव झेल रही कंपनियों द्वारा कर्मचारियों को नौकरी से न निकालने के चलते लिया गया है.

जापान

जापान प्रत्येक निवासी को एक लाख येन (930 डॉलर) यानी करीब 71,161 रुपये का नकद भुगतान प्रदान करेगा. प्रभावितों लोगों और परिवारों को तीन बार यह राशि प्रदान करने की प्रारंभिक योजना है. आबे ने कहा, हम सभी लोगों को नकदी पहुंचाने के लिए तेजी से आगे बढ़ रहे हैं

इसे देख साफ जाहिर होता है कि सरकार का दिया ये आर्थिक पैकेज नाकाम व्यवस्था व लचर सिस्टम को साफ तौर से दर्शाता है. लॉकडाउन के चलते अपनी रोजीरोटी व जमा-पूंजी गंवा चुके देश के मजदूर पहले ही इस सिस्टम की जानलेवा मार झेल रहे है. जिससे दिखता है कि गरीब लाचार मजदूर की जिंदगी का देश के सिस्टम में कोई मोल नहीं है.

सरकार ने मनरेगा की मज़दूरी में प्रभावी अधिक वृद्धि की अधिसूचना जारी की थी. ऐसा हर साल किया जाता है. लेकिन, ये बढ़ी हुई मज़दूरी उन ग़रीबों के लिए बेकार है, जो लॉकडाउन के शिकार हुए हैं. इस महामारी में जिस तरह प्रवासी मजदूरों ने रोजगार और राशन ना होने पर पलायन किया था इससे सरकार की नाकामी साफ बयां पहले ही हो गई थी.

सरकार ने राहत पैकेज के नाम पर लोगों को केवल वादे दिए है, जमीनी स्तर पर इन योजनाओं का कोई ब्यौरा नहीं हैं कि सरकार ने कितना खर्च किया है. इतना ही नहीं सरकार ने अपने राहत कोष में जमा होने वाली राशि का जिक्र जरूर किया लेकिन इसका कितना फीसदी मजदूरों और बेरोजगारी दर को कम करने के लिए इस्तेमाल किया गया. इसकी कोई जानकारी नहीं है. सरकार केवल योजनाओं को अमीलीजामा पहनाने का काम कर रही हैं.

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गहरी पैठ

अगर लद्दाख की सीमा पर शांति हो जाती है तो यह बहुत ज्यादा राहत की बात होगी. चीन और भारत का असली सीमा का जो भी दावा है, वह लड़ाई से तय हो ही नहीं सकता तो उस बारे में लड़ने से फायदा क्या है? अब भारत और चीन फिलहाल अपनीअपनी जगह से 1.8 किलोमीटर पीछे हटने को तैयार हो गए हैं और अपने इलाकों में कम सैनिक रखने को भी राजी हो गए हैं ताकि 6 जून वाली झड़प फिर से नहीं हो जाए.

सीमा पर आज इसी इलाके में दोनों ने 25,000 के करीब सैनिक तैनात कर रखे हैं और दोनों ने टैंकों, तोपों, हवाईजहाजों को तैयार कर रखा है. जरा सी चिनगारी से पूरी तरह आग भड़क सकती है. सीमा पर तैनात सेनाओं के कमांडरों की आपसी सहमति से यह तय हुआ है कि दोनों के सैनिक बेबात आपस में न उलझें.

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चीन के लिए यह युद्ध इतना महंगा नहीं है क्योंकि जो भी टैंक, तोपें, हवाईजहाज चीन ने सीमा पर लगाए हैं ज्यादातर उस के अपने बनाए हैं. भारत को हर चीज खरीदनी पड़ रही है. हमें तो बुलैटप्रूफ जैकेट भी खरीदनी पड़ती है और उन पर मोटा मुनाफा विदेशी सैनिक सामान बनाने वाले कमाते हैं. हमारी हालत ऐसी नहीं है कि हम मनचाहा पैसा सैनिक विवाद में हंस कर खर्च कर सकें. कुरबानी देने को देश की तैयारी है पर बेमतलब की झड़पों की वजह से करोड़ोंअरबों खर्च करना सही नहीं होगा.

यह अफसोस की बात है कि हम जिस चीन को मनाने में इतनी कोशिश कर रहे थे, कभी चीनी राष्ट्रपति को झूला झुलाने तो कभी प्राचीन धरोहरों की सैर कराने की कवायद हुई, उस चीन ने हमारी एक न सुनी और अपने सैनिकों को सीमा पर जमा ही नहीं कर दिया बल्कि उन्हें उस जमीन पर भेज दिया जो हम कहते हैं हमारी ही है.

अब हमें भी बराबरी की तैयारी करने में लगना पड़ रहा है. देशभर के गरम इलाकों के आदी सैनिक इस बार पूरी सर्दी कंपकंपाती, खून जमा देने वाली बर्फ में बिताएंगे, यह पक्का है. हिमालय की चोटियों पर देश की रक्षा बहुत जोखिम का काम है और जानलेवा है. रूस की सर्दी ने उसे कई बार अपने दुश्मनों से बचाया था. नेपोलियन और हिटलर ने रूस पर हमला किया था और उसे हरा सा दिया था कि सर्दी आ गई जिस में फ्रांस और जरमनी के सैनिक जम गए. अगले 5-6 महीने हिमालय के इन इलाकों को बर्फ से ढक कर रखेंगे और हमारे गरमी के आदी जवान चीनी दुश्मन के साथ बर्फ के दुश्मन से भी लड़ेंगे. इस समय यह समझौता जो कमांडरों ने किया है और आज जहां हैं वहां से पीछे जाना मंजूर किया है, एक तरह से अच्छा है. पर दूसरी नजर में यह भारत के लिए सही नहीं साबित होगा क्योंकि अब एक नई लाइन औफ एक्चुअल कंट्रोल बन गई है जो चीनी मनसूबों पर बनी है.

गनीमत यही है कि देश में होहल्ला नहीं मचाया जा रहा है क्योंकि सारा देश तो कोविड 19 से ज्यादा परेशान है. सीमा पर सहीगलत कदम उठाने की छूट तो एक जने को दे रखी है.

कोरोना के कारण हुए लौकडाउन ने गरीबों की सवारी साइकिल को एक नई जान दी है. दिल्ली में साइकिल की बिक्री बढ़ती नजर आ रही है. यह कुछ दिन का फैशन है या लंबे समय तक चलेगा, अभी पता नहीं है, पर लोगों और शहरों, गांवों की सेहत के लिए अच्छा है.

कोरोना के डर से शासन ने पब्लिक वाहनों पर सवारियों को आधा या एकतिहाई कर दिया है. लोग खुद भी अब भरे हुए वाहन में सटसट कर बैठने से कतरा रहे हैं. ऐसे में 2-3 किलोमीटर का सफर या तो बाइक पर करो या साइकिल पर. साइकिल ज्यादा अच्छी है क्योंकि बाइक का खर्च पैट्रोल के दाम बढ़ने से और ज्यादा भी हो गया है और उसे पार्क करने की जगह भी नहीं मिलती.

साइकिल का चलन गरीब और अमीर की बराबरी का एक बढि़या कदम है. हमारे देश में हर कोशिश की जाती है कि किसी तरह ऊंचेनीचे का भेदभाव बना रहे. जब गरीब लोग पैदल चलने को ही मजबूर थे, जब साहब लोग ठाठ से साइकिल पर सिर ऊंचा कर चलते थे. तब घोड़ों की जगह साइकिलों ने ली थी. फिर साइकिलें बहुत लोग खरीदने लगे तो ऊंचे लोगों ने बसें या मोटरकार अपना लीं. बाद में स्कूटर आ गए तो साइकिल और मोटरकार के बीच वालों की मौज आ गई. तब मिलने वाली मोटरसाइकिलों से स्कूटर काफी अच्छे थे.

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अब साइकिल का फिर चलन दिल्ली, मुंबई, कोलकाता जैसे शहरों में बढ़ जाए तो बड़ी खुशी होगी. अगर साइकिलों पर फैसले लेने वाले चलेंगे तो सड़कें भी ठीक होंगी, पेड़ भी लगेंगे, पानी का इंतजाम भी होगा. साइकिलों में भी नईनई तकनीक आएगी. दुनियाभर में साइकिल किराए पर देने जाने वाली बड़ी कंपनियां भी बनी हैं पर ज्यादातर दिवालिया हो गई हैं फिर भी नए तरीकों से नई कंपनियां आ रही हैं. अब कोशिश यह है कि आप साइकिल खरीदें नहीं, किराए की साइकिल एक जगह लें दूसरी जगह छोड़ दें, टैक्सी की तरह चालक बिना वाहन.

दिल्ली में भी इस के प्रयोग हो रहे हैं पर नाक ऊंची रखने वाले दिल्ली वाले अब तक तो उसे अपना नहीं पाए हैं. कोरोना की मार शायद दिल्ली वालों को सुधार दे.

साइकिलों का फायदा है कि इन्हें दूसरीतीसरी मंजिलों पर भी लिफ्टों से ले जाया जा सकता है. यूरोप में कई होटलों तक ने साइकिल स्टैंड कार पार्किंग में बना रखे हैं. गरीबअमीर में बराबरी की निशानी इस से ज्यादा क्या होगी.

सरकार को चाहिए कि साइकिल को बढ़ावा देने के लिए इस पर सारे टैक्स माफ कर दे. यह सामाजिक बराबरी के लिए भी जरूरी है, आबोहवा बचाने के लिए भी. बोनस में साइकिल पर चलने वाले ज्यादा तंदुरुस्त रहते हैं. साइकिल सिर्फ सवारी हो, अमीर या गरीब की नहीं.

‘यारा’ फिल्म रिव्यू: काम न आया विद्युत जामवाल का एक्शन, जानें कैसी है फिल्म?

रेटिंग: एक स्टार

निर्माता: तिग्मांशु धूलिया और अजुरे इंटरटेनमेंट

निर्देशक: तिगमांशु धुलिया

 कलाकार: विद्युत जामवाल, श्रुति हासन, अमित साध, विजय वर्मा‌, केनी

ओटीटी प्लेटफॉर्म: Zee5

अवधि: 2 घंटे 10 मिनट

2011 की फ्रेंच फिल्म ‘ए गैंग स्टोरी’ (A Gang Story) का हिंदी रीमेक है ‘यारा’ (Yaara). इस फिल्म को रीमेक करने की तिग्मांशु धुलिया (Tigmanshu Dhulia) को जरूरत क्यों पड़ी, यह समझ से परे है? ‘यारा’ एक अपराध प्रधान नाटकीय फिल्म है, जिसकी कहानी भारत व नेपाल सीमा पर कार्यरत चार दोस्तों यानी  कि चौकड़ी गैंग के उतार-चढ़ाव की अति घटिया कहानी है.

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कहानी:

फ्रेंच फिल्म ‘द गैंग स्टोरी’ की रीमेक फिल्म ‘यारा’ की कहानी के केंद्र में 4 दोस्त हैं .बचपन में फागुन और मितवा राजस्थान से भागते हैं .चमन (संजय मिश्रा)  उन्हें भारत नेपाल सीमा पर तस्कर गिरोह से जोड़ देते हैं.जहां बचपन में ही फागुन, मितवा ,रिजवान और बहादुर स्मगलिंग करना शुरू करते हैं. बड़े होने पर फागुन (विद्युत जामवाल), मितवा (अमित साध), रिजवान (विजय वर्मा) और बहादुर (केनी सुमंतरी )पटना बैंक लूटने जाते हैं. कार चमन चला रहे थे. पुलिस मुठभेड़ में चमन मारे जाते है. पर यह चारों दोस्त बैंक से लूटी रकम लेकर वहां से भागने में सफल हो जाते हैं. अब स्मगलिंग के साथ साथ नक्सलियों को हथियार बेचने लगते हैं. नक्सली सुकन्या (श्रुति हासन) को फागुन दिल दे बैठा है. एक रात जब यह चारों सुकन्या के साथियों के साथ गांव में थे, तभी पुलिस आ जाती है. कई लोग मारे जाते हैं. फागुन, मितवा, रिजवान और बहादुर गिरफ्तार हो जाते हैं. सभी को अलग-अलग जेल में रखा जाता है. सबसे पहले मितवा जेल से छूटता है और वह भारत से बाहर जाकर शकील के लिए काम करने लगता है. शकील, फकीरा के लिए काम कर रहा है, जो कभी फागुन की चौकड़ी गैंग के साथ था.जेल से निकलने के बाद रिजवान, फागुन, बहादुर नई पहचान के साथ उद्योगपति बन गए हैं. 20 वर्ष गुजर जाते हैं.

अचानक मितवा फिर भारत पहुंचता है और सीबीआई उसे गिरफ्तार कर लेती है.शकील को भी मितवा की तलाश है. रिजवान, फागुन व बहादुर दोस्ती निभाते हुए सीबीआई के चंगुल से मितवा को छुड़ा लेते हैं .शकील से दुश्मनी हो जाती है. परिणामत: सुकन्या, रिजवान व बहादुर मारे जाते हैं, पर अंतत फागुन फ्रांस जाकर शकील व फकीरा को मार देता है.

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लेखन व निर्देशन :

फ्रेंच फिल्म का भारतीय करण करते हुए इसकी कहानी, पटकथा व संवाद तिगमांशु धुलिया ने ही  लिखी है, जो कि अतीत घटिया है. इस तरह की कहानी पर हजारों फिल्में बन चुकी हैं. कहानी में नयापन नहीं लेखन व निर्देशन बहुत स्तरहीन है.’यारा’ देखकर कहीं से भी यह अहसास नहीं होता कि यह फिल्म तिगमांशु धुलिया ने निर्देशित की  है, जिन्होंने कभी ‘हासिल’ या ‘पान सिंह तोमर’ जैसी यादगार फिल्में निर्देशित कर चुके हैं. ‘यारा’ एक अपरिपक्व निर्देशन और लेखन वाली फिल्म है.फिल्म अपराध कथा है, पर कहीं कोई रोमांच पैदा नहीं होता. विद्युत जामवाल जैसे एक्शन स्टार के बावजूद फिल्म में एक भी सही ढंग का एक्शन दृश्य नहीं है. कहानी पूरी तरह चूं-चूं का मुरब्बा बना दी गयी है. गैंगवार, सेक्स, स्मगलिंग, हिंसा,  नक्सलवाद सहित कई मसाले डाले गए हैं, मगर किसी को भी सही ढंग से कहानी का हिस्सा नहीं बनाया गया है.फिल्म में रोमांस भी ढंग से नहीं उभरता. गाने भी घटिया हैं.

अफसोस की बात है कि एक दृश्य में फिल्मकार ने रिजवान के किरदार को एक पुरानी फिल्म के अमिताभ बच्चन के किरदार की नकल करते हुए भी दिखा दिया, वह भी अति घटिया स्तर की मिमिक्री.

फिल्म में कहीं भी एक्साइटमेंट नहीं है. फिल्म अति बोरियत के अलावा कुछ नहीं है. बतौर निर्देशक तिग्मांशु धूलिया एक साधारण स्तर की गैंगस्टर व अपराध फिल्म देने में भी बुरी तरह से विफल रहे हैं.

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अभिनय:

फिल्म में विद्युत जामवाल ,विजय वर्मा ,अमित साध, श्रुति हासन जैसे कलाकार है, पर किसी की भी अभिनय क्षमता प्रभावित नहीं करती. यह चरित्र चित्रण की कमी के साथ-साथ निर्देशन क्षमता का अभाव के कारण किसी की भी अभिनय प्रतिभा उभर नहीं पायी. विद्युत जामवाल ने क्या सोचकर यह फिल्म की, यह तो  वही जाने.

क्या सच में सुशांत के लिए तांत्रिक बुलाती थीं रिया चक्रवर्ती? कंगना रनौत ने कही ये बात

बॉलीवुड इंडस्ट्री (Bollywood Industry) के बेहद ही टेलेंटिड एक्टर सुशांत सिंह राजपूत (Sushant Singh Rajput) अब हमारे बीच नहीं रहे और यह बात जितनी बार सुनो उतनी ही बार सबका दिल उदास हो जाता है. इतना टेलेंटिड और हंसमुख इंसान आखिर कैसे खुद को मौत के हवाले कर सकता है. हालांकि अब ऐसा लग रहा है कि सुशांत सिंह राजपूत (Sushant Singh Rajput) केस धीरे धीरे सुलझता हुआ दिखाई दे रहा है.

 

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That ray of sunshine today , pure hope for mankind today #rheality #keepthefaith 🌤 Fav 📸 – @siddharth_pithani 🌤

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पिछले कुछ समय से सुशांत सिंह राजपूत (Sushant Singh Rajput) के फैंस औप घरवाले इस केस में सीबीआई (CBI) जांच की मांग कर रहे थे लेकिन हाल ही में महाराष्ट्र सरकार ने इस केस को सीबीआई पर छोड़ने से साफ इंकार दिया. ऐसे में कई लोगों ने ये सवाल भी उठाए कि आखिर क्यों इस केस को सीबीआई के हवाले नहीं किया जा रहा.

 

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Still struggling to face my emotions.. an irreparable numbness in my heart . You are the one who made me believe in love, the power of it . You taught me how a simple mathematical equation can decipher the meaning of life and I promise you that I learnt from you every day. I will never come to terms with you not being here anymore. I know you’re in a much more peaceful place now. The moon, the stars, the galaxies would’ve welcomed “the greatest physicist “with open arms . Full of empathy and joy, you could lighten up a shooting star – now, you are one . I will wait for you my shooting star and make a wish to bring you back to me. You were everything a beautiful person could be, the greatest wonder that the world has seen . My words are incapable of expressing the love we have and I guess you truly meant it when you said it is beyond both of us. You loved everything with an open heart, and now you’ve shown me that our love is indeed exponential. Be in peace Sushi. 30 days of losing you but a lifetime of loving you…. Eternally connected To infinity and beyond

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आपको बता दें कि हाल ही में सुशांत सिंह राजपूत (Sushant Singh Rajput) के पिता केके सिंह ने सुशांत की गर्लफ्रेंड रिया चक्रवर्ती (Rhea Chakraborty) के खिलाफ एफआईआर दर्ज की है. सुशांत के पिता का ये कहना है कि रिया की नज़र सिर्फ और सिर्फ सुशांत के पैसों पर थी. इसी के साथ ही सुशांत की बहन मीतू सिंह (Meetu Singh) ने भी कई ऐसी बातों का खुलासा किया जिसे सुन सभी लोग हैरान रह गए.

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मीतू सिंह के अनुसार रिया चक्रवर्ती (Rhea Chakraborty) अपनी मां के साथ मिलकर सुशांत के ईलाज के नाम पर घर पर तांत्रिक बुलाया करती थीं और जब भी घर पर तांत्रिक आता था तब सुशांत के सभी दोस्तों को घर से जाने को बोल दिया जाता था. इस खबर के सामने आते ही इंडस्ट्री की बोल्ड एक्ट्रेस कंगना रनौत (Kangana Ranaut) ने एक ट्वीट करते हुए लिखा है कि, “सुशांत ने रिया से पहले भी कई लोगों को डेट किया है और ये भी फैक्ट रहा है कि वो हर रिश्ते से बाहर निकलकर आया है…लड़की कभी भी उसकी कमजोरी नहीं रही है, वो काफी कॉन्फिडेंट था और अचानक से पिछले साल मई में ही उसने रिया को अपना सब कुछ दे दिया, क्यों? क्योंकि वो काला जादू करती थी. कम ऑन…ये बहुत दुर्भाग्य की बात कि ऐसे साइंस और स्पेस की बातें करने वाले इंसान के मर्डर को लव सेक्स और धोखा जैसे प्राइम टाइम गॉसिप में बदला जा रहा है.”

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