मुंबई पुलिस से नाखुश सुशांत के फैंस इस अंदाज में कर रहे हैं बिहार पुलिस की तारीफ, देखें Tweet

जैसा कि हम सब जानते हैं कि बॉलीवुड इंडस्ट्री के बेहतरीन एक्टर सुशांत सिंह राजपूत (Sushant Singh Rajput) ने 14 जून रविवार को अपने अपार्टमेंट में खुद को फांसी लगा ली थी. कुछ लोगों के अनुसार वे काफी समय से डिप्रेशन के शिकार थे और डिप्रेशन की वजह से उन्होनें आत्महत्या कर ली वहीं दूसरी तरफ कुछ लोगों को ये भी कहना है कि सुशांत सिंह राजपूत (Sushant Singh Rajput) ने बॉलीवुड इंडस्ट्री में हो रहे नेपोटिज्म (Nepotism) से तंग आकर खुद को मौत के हवाले कर दिया.

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बीते दिनों ही सुशांत सिंह राजपूत (Sushant Singh Rajput) के पिता केके सिंह ने सुशांत सिंह राजपूत की गर्लफ्रेंड रिया चक्रवर्ती (Rhea Chakraborty) के खिलाफ पटना के पुलिस स्टेशन में एफआईआर दर्ज कराई थी और तभी से बिहार पुलिस (Bihar Police) की एक टीम मुंबई पहुंच कर छानबीन कर रही है. खबरों की माने तो बिहार पुलिस को मुंबई पुलिस (Mumbai Police) का थोड़ा भी सहयोग नहीं मिल रहा लेकिन फिर भी बिहार पुलिस अपने अंदाज में सुशांत सिंह राजपूत केस को सुलझाने में लगी हुई है.

आपको बता दें कि महाराष्ट्र सरकार (Maharashtra Government) ने सुशांत सिंह राजपूत (Sushant Singh Rajput) का केस सीबीआई (CBI) को सौंपने से साफ इंकार कर दिया है को ऐसे में सुशांत के फैंस का मानना है कि इंडस्ट्री के कुछ बड़े लोगों ने महाराष्ट्र सरकार को खरीद लिया और ताकी इस केस में उनके नाम बाहर ना आ सके. बीते दिन से सोशल मीडिया पर इसी को लेकर कई हैशटैग्स ट्रेंड कर रहे हैं जिसमें से एक तो है #MahaGovtSoldOut. इस हैशटैग का मतलब है कि महाराष्ट्र सरकार पूरी तरह से बिक चुकी है.

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जिस तरह से बिहार पुलिस मुंबई में बिना किसी सहयोग के दिन रात एक कर इस केस को सुलझाने में लगी है उसे देख सुशांत सिंह राजपूत (Sushant Singh Rajput) के फैंस काफी खुश हैं और उन्होनें इसी को लेकर एक हैशटैग सोशल मीडिया पर ट्रेंड किया है जो कि #ThankYouBiharPolice है. वहीं दूसरी तरफ मुंबई पुलिस से नाखुश फैंस ने सोशल मीडिया पर लगातार #ShameOnMumbaiPolice हैशटैग इस्तेमाल कर रहे हैं.

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जैसा कि हम सब जानते हैं कि करोना वायरस (Corona Virus) जैसी महामारी के चलते लगाए गए लॉकडाउन (Lockdown) की वजह से पूरे देश में सब कुछ रुक सा गया था लेकिन अब जब से अनलॉक 2.0 (Unlock 2.0) और अनलॉक 3.0 (Unlock 3.0) की गाइडलाइंस सरकार द्वारा जारी की गई हैं उसे देख देश में काफी कुछ फिर से शुरू हो गया है और ये सब इसलिए शुरू हुआ है ताकी हमारे देश की बिगड़ी हुई अर्थव्यवस्था फिर से पटरी पर आ सके.

 

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Looking Forward to the new day.. Well I was, Early morning 😜😜🤪

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आपको बता दें कि जब से सरकार द्वारा नई गाइडलाइंस जारी हुई हैं तब से कुछ कुछ फिल्मों और सीरियल्स की शूटिंग भी शुरू हो गई है. इसी के चलते एकता कपूर (Ekta Kapoor) के पौपुलर सीरीयल ‘नागिन 5’ (Naagin 5) की भी शूटिंग शुरू हो गई है और इस बात की जानकारी हमें बेहद ही खूबसूरत एक्ट्रेस हिना खान (Hina Khan) ने सोशल मीडिया के जरिए फोटोज शेयर कर दी.

 

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She’s Coming 🐍

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हिना खान (Hina Khan) ने ‘नागिन 5’ के सेट से अपने ढ़ेर सारी फोटोज अपने औफिशियल इंस्टाग्राम अकाउंट (Official Instagram Account) पर शेयर करते हुए कैप्शन में लिखा,- “She’s Coming”. हिना खान (Hina Khan) की इन फोटोज और कैप्शन को देख इस बात का साफ अंदाजा लगाया जा सकता है कि वे एक बार फिर छोटे पर्दे पर दिखने के लिए बेहद ही एक्साइटिड हैं.

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Challenge Accepted @ektarkapoor #BeautifulTheWayWeAre #WomenEmpoweringWomen #WomenSupportingWomen #GirlsForGirls #LetsLiftEachOther

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हिना खान (Hina Khan) इंडस्ट्री की हॉट और बोल्ड एक्ट्रेसेस में से एक है जिन्हें उनके फैंस बेहद पसंद करते हैं. हिना खान के फैंस उनकी हर फोटो, हर वीडियो पर जमकर प्यार बरसाते हैं और हर बार की तरह इस बार भी उनकी लेटेस्ट फोटोज पर फैंस की काफी प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं. आपको बता दें कि एक ही दिन में उनकी नागिन 5 सेट की फोटोज को साढ़े 5 लाख से भी ज्यादा लाइक्स मिल चुके हैं.

 

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पैसे कम फिर भी नंबर ज्यादा

इस बात में कोई शक नहीं कि भारती खांडेकर के नंबर बहुत ज्यादा नहीं हैं, लेकिन उस के बारे में जानने के बाद लगता है कि वह किसी टौपर से कम नहीं.

मध्य प्रदेश के इंदौर में रहने वाली इस बेहद गरीब लड़की ने इस साल माध्यमिक शिक्षा मंडल के 10वीं बोर्ड के इम्तिहान में 68 फीसदी नंबर हासिल कर फर्स्ट डिविजन बनाई है, जो किसी भी मैरिट वाले छात्र को इस लिहाज से सबक है कि उस के पास खुद का कमरा होना तो दूर की बात है, खुद का कोई घर भी नहीं है.

दरअसल, भारती इंदौर के शिवाजी मार्केट इलाके के फुटपाथ पर पिछले 15 साल से रह रही थी. उस के पिता दशरथ खांडेकर ठेला चलाते हैं और मां पैसे वालों के घरों में  झाड़ूपोंछा लगाने का काम करती हैं. सिर ढकने के लिए मांबाप ने एक  झोंपड़ी तान ली, जिसे हटाने के लिए कभी नगरनिगम, तो कभी पुलिस वाले आ धमकते थे.

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देश के दूसरे करोड़ों  झोंपड़ों की तरह इस  झोंपड़े में भी बिजलीपानी की कोई सहूलियत नहीं थी. 5 सदस्यों वाले इस परिवार को अकसर खानेपीने के लाले पड़े रहते थे, सो अलग. इस पर भी भारी परेशानी की बात यह कि बारिश में  झोंपड़ा पानी से लबालब भर जाता था और गरमीसर्दी की मार बरदाश्त करना हर किसी के बस की बात नहीं.

मांबाप सुबह काम पर निकल जाते थे, तो भारती अपने 2 छोटे भाइयों की देखभाल में जुट जाती थी और वक्त मिलने पर ही अपने स्कूल अहल्या आश्रम जा पाती थी. उस के पास नई कौपीकिताबें खरीदने के पैसे नहीं होते थे, फिर यह सोचना तो बेमानी है कि उसे कहीं से कोचिंग या ट्यूशन मिलती होगी.

शाम को जब मांबाप काम से वापस आते थे, तब इस  झोंपड़े में चूल्हा जलता था और भारती को पढ़ने के लिए थोड़ा वक्त मिल पाता था, वह भी खंभे की रोशनी के नीचे. इस के बाद भी वह 68 फीसदी नंबर ले आई, तो उस की कहानी जान कर हर कोई हैरान रह गया.

क्या भारती जैसी जिंदगी, जिस में खानेपीने, रहने का भी ठिकाना न हो, में गुजर करते हुए बोर्ड के इम्तिहान में फर्स्ट डिविजन लाना वाकई मामूली बात है, इस का जवाब शायद ही कोई हां में दे.

भारती बताती है कि उसे जरा सी भी फुरसत मिलती थी, तो वह पढ़ने बैठ जाती थी. रात में वह नोट्स बनाती थी और दिन में कोर्स की किताबें पढ़ती थी. जैसे ही उस की कामयाबी की कहानी आम हुई, तो मध्य प्रदेश बाल आयोग ने पहल करते हुए प्रशासन को उस के लिए कुछ करने के लिए कहा.

नगरनिगम, इंदौर ने फुरती दिखाते हुए भारती को गरीबों के भले के लिए चलाई जा रही योजना के तहत एक फ्लैट बतौर इनाम दिया. जिंदगी में पहली बार पक्के मकान का मुंह देखने वाली भारती की खुशी का अब कोई ठिकाना नहीं है. अब वह आईएएस अफसर बनने का ख्वाब देख रही है, जो उस की मेहनत और लगन को देखते हुए नामुमकिन भी नहीं, क्योंकि अब कई हाथ उस की मदद को उठने लगे हैं.

लेकिन ऐसा तब हुआ, जब भारती ने खुद को साबित कर दिखाया और यह भी जता दिया कि आदमी अगर ठान ले तो नामुमकिन को भी मुमकिन बना सकता है. जरूरत बस हौसले की है, जो कोई दूसरा नहीं दे सकता. वह तो खुद अपने से पैदा करना पड़ता है.

भारती ने यह भी साबित कर दिया है कि अव्वल आने के लिए बहुत से साधन और सहूलियतें भी जरूरी नहीं.  बहुत सी कमियों में रहते हुए भी आप न केवल पढ़ाई, बल्कि जिंदगी की दौड़ में उन्हें भी पछाड़ सकते हैं, जिन के पास वह सबकुछ है, जिस से वे तेज दौड़ कर जीत सकते हैं, लेकिन उम्मीद के मुताबिक दौड़ नहीं पाते.

अकेली भारती ही नहीं, बल्कि देशभर के उस जैसे कई गरीब बच्चों ने इस साल के बोर्ड इम्तिहानों में ऐसा ही कारनामा कर दिखाया है, जिस से महसूस होता है कि अब पढ़ाईलिखाई पर अमीर और ऊंची जाति वाले बच्चों का पहले सा दबदबा नहीं रह गया है.

कर्णिका का कारनामा

जिस इम्तिहान में भारती फर्स्ट डिविजन में पास हुई है, उसी में इस बार राज्य में भोपाल की एक लड़की कर्णिका मिश्रा ने टौप किया. कर्णिका भोपाल के एक छोटे से स्कूल रीमा विद्या मंदिर में पढ़ती है. उस ने सौ फीसदी नंबर ला कर एक मिसाल बनाई है कि बिना पैसे के भी मैरिट में अव्वल आया जा सकता है.

जब कर्णिका महज 5 साल की थी, तब उस के पिता चल बसे थे, जिस से मां स्वाति और उस पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा था. एक समय ऐसा भी आया, जब इन मांबेटी को भूखे पेट सोना पड़ा या फिर पानी पी कर पेट भरना पड़ा.

ऐसे में स्वाति ने मामूली तनख्वाह वाली एक प्राइवेट नौकरी कर ली और मायके में अपनी मां के पास आ कर रहने लगीं. थोड़ा सा सहारा मिला तो कर्णिका को सम झ आ गया कि अब अगर कुछ बनना है, तो दिनरात पढ़ाई करने के सिवा कोई रास्ता नहीं. लिहाजा, उस ने खुद को पढ़ाई में  झोंक दिया. नतीजा सुखद आया और रिजल्ट वाले दिन मांबेटी की आंखों से खुशी के आंसू बहते रहे.

कर्णिका बताती है कि वह रोजाना 3-4 घंटे पढ़ती थी और उस का एक मकसद नौलेज हासिल करना भी था. वह अब पीएससी का इम्तिहान पास कर सरकारी अफसर बनना चाहती है.

यह जान कर हैरानी होती है कि मध्य प्रदेश में इस बार 10वीं बोर्ड के इम्तिहान में 15 छात्रों ने सौ फीसदी स्कोर किया, जिन में से आधे एससीबीसी और गरीब तबके के हैं. कमोबेश यही हालत दूसरे राज्यों के छात्रों की रही, जिन्होंने भारती और कर्णिका की तरह पढ़ाई की दौड़ और होड़ में कई अमीर बच्चों को पीछे छोड़ते हुए अपनी जगह मैरिट में बनाई.

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यह बदलाव एक बहुत बड़ा इशारा भी है कि गरीब और एससीबीसी के होनहार बच्चों को अब रोका नहीं जा सकता, जो अपनी लड़ाई पैसों व साधनों वाले बच्चों से लड़ कर जीत रहे हैं.

पैसा बनाम नंबर

हर कोई मानता और जानता है कि गरीब तबकों की बदहाली की सब से बड़ी वजह उन का अनपढ़ रहना है, जिस के चलते वे लंबे समय तक ऊंची जाति और रसूखदारों की गुलामी करते रहे.  हालांकि अभी भी वे पूरी तरह इस से आजाद नहीं हुए हैं, लेकिन बहुत धीरेधीरे ही सही हो तो रहे हैं, क्योंकि यह बात उन्हें सम झ आ रही है कि उन के शोषण की सब से बड़ी वजह उन्हें तालीम से दूर रखने की साजिश रही. इस के लिए दबंगों ने छलकपट, जुल्मोसितम और धार्मिक किताबों का सहारा लिया.

इस से छुटकारे के लिए अब अच्छी बात यह है कि वे अपने बच्चों को पढ़ा रहे हैं, जिस से न केवल उन की माली, बल्कि सामाजिक हालत भी सुधरी. हालांकि, उन के बच्चे भी उम्मीदों पर खरे उतर रहे हैं, जबकि उन के पास न तो पक्के मकान होते हैं, न कोचिंग और ट्यूशन के लिए पैसे. न लजीज पकवान उन्हें खाने को मिलते हैं, न नएनए फैशन वाले कपड़े और न बहुत सी किताबें उन के पास होती हैं. फिर यह सोचने की तो कोई वजह ही नहीं कि गेम खेलने के साथ पढ़ाई करने के लिए उन के पास कंप्यूटर और महंगे मोबाइल फोन होते हैं.

इन बच्चों की एकलौती पूंजी उन की कुछ बन जाने की बेचैनी और कशिश ही है, जो इन्हें जुनून से भर देती है और यह जुनून उन्हें पैसे वालों से नफरत करना नहीं सिखाता, बल्कि पढ़ाई के जरीए उन की बराबरी करने के लिए उकसाता है.

बोर्ड के कड़े इम्तिहान इस होड़ का सब से बड़ा और अच्छा पैमाना है. इन तबकों के एकाध बच्चे मैरिट में आते तो बात नजरअंदाज की जा सकती थी, लेकिन इन की बढ़ती तादाद उन कइयों के लिए चिंता का सबब हो सकती है, जो यह मान बैठे हैं कि तालीम, कामयाबी और छोटीबड़ी सरकारी नौकरियों पर उन का और उन के ही बच्चों का हक है.

बात चिंता की भी है 

दिक्कत तो यह है कि ये लोग पैसों से शौपिंग माल के आइटम की तरह मैरिट अपने बच्चों के लिए नहीं खरीद पा रहे हैं, जिन की परवरिश मुकम्मल ऐशोआराम में हो रही है. इन के बच्चे एक मांगते हैं, तो ये 4 तरह की किताबें खरीद कर उन्हें देते हैं. हर विषय की ट्यूशन और कोचिंग उन के लिए मुहैया है, फिर भी उन के बच्चे कर्णिका सरीखे सौ फीसदी नंबर नहीं ला पाते. हां, फुटपाथ पर रह रही भारती की बराबरी जरूर वे कर लेते हैं, तो बात साफ हो जाती है कि जिन 65-70 फीसदी नंबरों के लिए ये लाखों रुपए खर्च कर देते हैं, वे नंबर कोई भारती मुफ्त में ले आती है.

चिंता और डर की नई बात यह है कि समाज, राजनीति और सिस्टम को अपनी मुट्ठी में दबाए रखने वाले ये लंबरदार लोग कहीं खी झ कर सरकारी स्कूलों को बंद कराना ही शुरू न कर दें, क्योंकि गरीब बच्चे पढ़ते तो इन्हीं में हैं, जबकि इन के बच्चे ब्रांडेड एयरकंडीशंड महंगे और आलीशान इमारतों वाले स्कूलों में पढ़ते हैं, जिन में से कई की सालाना फीस ही लाखों रुपए में होती है.

इसे इत्तिफाक कम साजिश ज्यादा माना जाएगा कि ऐसा देशभर के राज्यों में हो भी रहा है कि तरहतरह के बहाने गढ़ कर बड़े पैमाने पर सरकारी स्कूल बंद कराए जा रहे हैं, जिस के पीछे असल मंशा यह है कि गरीब और एससीबीसी तबके के बच्चे पढ़ ही न पाएं.

इस में कोई शक नहीं कि सरकारी स्कूलों की पढ़ाई की क्वालिटी प्राइवेट स्कूलों के मुकाबले घटिया होती है और टीचर पढ़ाने के नाम पर रस्म सी अदा करते हैं. इस के बाद भी बच्चे अव्वल आ रहे हैं, तो यह उन की मेहनत और काबिलीयत ही है.

फरवरी महीने में मध्य प्रदेश सरकार ने कई सरकारी स्कूलों को बंद करने की पहल की थी. बहाना स्कूलों में कम होते दाखिले व पढ़ाई की क्वालिटी सुधारने का बनाया था. जब सरकार बदली तो यह पेशकश ठंडे बस्ते में चली गई, लेकिन सरकार बदली है अफसर नहीं, लिहाजा फिर से यह फाइल खोली जा सकती है.

एक एनजीओ की रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2012 से ले कर साल 2017 तक देशभर में डेढ़ लाख से भी ज्यादा स्कूल ऐसे ही बहाने बना कर बंद कर दिए गए थे. राजस्थान में ही तकरीबन 15,000 सरकारी स्कूल साल 2017 में वसुंधरा सरकार ने बंद करा दिए थे, जिस से तकरीबन ढाई लाख बच्चे पढ़ाई से दूर हो गए थे. बिहार,  झारखंड, ओडिशा और छत्तीसगढ़ में भी हजारों की तादाद में सरकारी स्कूल बंद हुए हैं, जिन की खोजखबर लेनेदेने वाला कोई नहीं, क्योंकि इन में गरीब और एससीबीसी तबके के बच्चे पढ़ते हैं.

साल 2015 में 10वीं की टौपर रही भोपाल की छात्रा नंदिनी का कहना है, ‘‘मैं भी इन्हीं अभावों में पढ़ी हूं और इस नतीजे पर पहुंची हूं कि पैसे वालों के बच्चे सहूलियतों के चलते यह मान बैठते हैं कि गरीब बच्चा उन के सामने नहीं टिकेगा, इसलिए वे फालतू कामों में ज्यादा समय बरबाद करते हैं. इस के उलट गरीब बच्चों को यह एहसास रहता है कि उन के पास केवल मेहनत है और वे समय का सही इस्तेमाल करते हैं.

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बकौल, नंदिनी इन बच्चों को मालूम रहता है कि जैसे भी हो पढ़ लो, तभी हालत सुधरेगी. आजकल मीडिया भी ऐसे बच्चों का खूब सपोर्ट करता है.

नंदिनी बताती है, ‘‘इस से हौसला बढ़ता है. खुद मेरा इंटरव्यू उस समय देश की नामी पत्रिका ‘सरिता’ में छपा था, तो मेरी कामयाबी देश के लाखों लोगों तक पहुंची थी.’’

ये भी हैं नंबरों अमीर

वह दौर कब का गया जब साल 2 साल में एकाध कोई एससीबीसी या गरीब घर का बच्चा बोर्ड इम्तिहान में अच्छे नंबर लाता था, तो हल्ला मच जाता था. अब तो यह हर साल की बात हो चली है कि इन तबकों के एकदो नहीं, बल्कि सैकड़ों गुदड़ी के बच्चे मैरिट लिस्ट में अपनी जगह बनाने लगे हैं.

इस साल भी इन बच्चों ने मेहनत कर बाजी मारी. आइए, उन में से कुछ की बात करते हैं, जिन्होंने कम पैसों में अपनी मार्कशीट को नंबरों से मालामाल कर दिया :

झारखंड में मनीष का  झंडा : इस साल  झारखंड बोर्ड के 10वीं के इम्तिहान में मनीष कुमार कटियार पूरे राज्य में अव्वल रहे हैं. लातेहर के नेतरहाट के स्कूल के छात्र मनीष के पिता देवाशीष भारती एक गरीब किसान हैं, जिन्हें उम्मीद थी कि बेटे का रिजल्ट अच्छा आएगा, लेकिन इतना अच्छा आएगा, इस की उम्मीद उन्हें क्या किसी को भी नहीं थी.

कामयाबी के बाद मनीष ने कहा कि वह आईएएस अफसर बनना चाहता है, ताकि सभी के लिए पक्के घर बनवा सके. इस से ही सम झा जा सकता है कि मनीष के दिल में कौन सी कसक है, जिस ने उसे टौपर बनने के लिए उकसाया.

मनीष के घर की माली हालत अच्छी नहीं है, लेकिन उस के हौसले बुलंद हैं. 500 में से 490 नंबर लाने वाला मनीष नहीं चाहता कि किसी भी बच्चे को पढ़ाई के लिए उस के जैसा संघर्ष करना पड़े.

वाराणसी की शान : उत्तर प्रदेश बोर्ड के रिजल्ट में हाईस्कूल में इस बार वाराणसी के गांव खरगपुर के धीरज पटेल ने जिले में टौप किया है. उस के पिता किराए का आटोरिकशा चलाते हैं. ऐसे में सहज सम झा जा सकता है कि धीरज ने किन मुश्किलों में पढ़ाई की होगी.

वाराणसी के ही अक्षय कुमार ने इस साल जिले में इंटर के इम्तिहान में टौप किया है. उस के पिता भोनू प्रसाद बुनकर हैं और पावरलूम चला कर जैसेतैसे घर चला पाते हैं, लेकिन अक्षय की कामयाबी ने उन्हें आस बंधाई है कि उन के दिन फिरेंगे और बेटे का आईएएस अफसर बनने का सपना भी इसी तरह पूरा होगा.

वाराणसी के रामनगर के विशेष सोनकर ने उत्तर प्रदेश बोर्ड के इम्तिहान में जिले में दूसरा नंबर हासिल किया है. जिस वक्त विशेष का रिजल्ट आया, तब उस के पिता कैलाश सोनकर और मां भागवती देवी बगीचे में जामुन बीनने गए थे, जिस से शाम को घर का चूल्हा जल सके.

विशेष के घर की माली हालत का अंदाजा लगाने के लिए इस से ज्यादा कुछ और कहने की जरूरत नहीं रह जाती.

वाराणसी के एससीबीसी और गरीब तबके के मैरिट में आए छात्रों की लिस्ट काफी लंबी है जिस में एक और नाम सविता बिंद का शुमार है. उस के पिता छब्बू बिंद बंटाई पर खेती करते हैं. इस से भी घरखर्च पूरा नहीं पड़ता, तो वे शादीब्याह में हलवाईगीरी करने लगते हैं.

बेटी ने जब जिले में टौप किया, तो उन की खुशी का ठिकाना नहीं रहा. इस की एक वजह यह भी है कि छब्बू खुद पढ़ नहीं पाए थे. अब सविता ने टौप कर के जता दिया है कि अनपढ़ मांबाप भी तालीम की अहमियत सम झने लगे हैं और अच्छी बात यह है कि उन की औलादें उन्हें निराश नहीं कर रहीं.

‘‘मम्मी, मैं पास हो गई,’’ वाराणसी के राजातालाब रानी बाजार की खुशबू मोदनवाल मारे खुशी के यह कहते हुए चिल्लाई, तब उस के पिता त्रिभुवन प्रसाद चक्की पर आटा पीसने के अपने रोजाना के काम को अंजाम दे रहे थे. उन्होंने दौड़ कर अपनी नन्ही परी को गले लगा लिया, क्योंकि खुशबू सिर्फ पास ही नहीं हुई थी, बल्कि उस का नाम भी टौप 10 में था.

इंटर की मैरिट में खुशबू से एक पायदान ऊपर रहे हर्ष कुमार पटेल के पिता पेशे से मिस्त्री हैं. ऊपर की 2 जगह घेर कर इन बच्चों ने इशारा कर दिया है कि गुजरा कल किसी का भी रहा हो, लेकिन आने वाला कल इन का है.

फिर जीते अजीत और आकाश : अगर वाराणसी के इन होनहारों को थोड़ी भी सहूलियतें मिली होतीं तो तय है कि वे और अव्वल आते. हालांकि अभी उन्होंने जो कर दिखाया, वह भी किसी से कम नहीं. न केवल इन्हें बल्कि सभी छात्रों को आगरा के अजीत सिंह से काफीकुछ सीखना चाहिए, जिस ने इस साल इंटरमीडिएट में उत्तर प्रदेश में 15वां स्थान हासिल किया है.

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अजीत के पिता गब्बर सिंह खेतिहर मजदूर हैं. लिहाजा, वे जैसेतैसे उसे पढ़ा पा रहे थे, लेकिन होनहार अजीत ने हार नहीं मानी और कुछ बन जाने की ख्वाहिश लिए वह दिनरात एक कर पढ़ता रहा. बिजली न होने के चलते अकसर उसे मोमबत्ती की रोशनी में पढ़ाई करनी पड़ती थी. इसी लगन और मेहनत का नतीजा था कि उसे हाईस्कूल में भी 86 फीसदी नंबर मिले थे. इस कामयाबी के बाद उस ने मुड़ कर नहीं देखा और इस बार वह आगरा में फर्स्ट और राज्य में 15वेें नंबर पर आया.

अजीत की तरह आगरा का ही आकाश कुशवाह भी मिलिट्री में जाना चाहता है, जिस ने इस साल हाईस्कूल में प्रदेशभर में 8वां नंबर हासिल किया. आकाश के पिता लाखन सिंह किसान हैं.

बिहार के ये होनहार : इस साल बोर्ड के मैट्रिक इम्तिहान में नंबर एक की पोजिशन पर आए हिमांशु राज के पिता सब्जी बेचते हैं. रोहतास के इस टौपर को सब से ज्यादा 96.2 फीसदी नंबर मिले हैं. हिमांशु सौफ्टवेयर इंजीनियर बनना चाहता है.

इसी इम्तिहान में दूसरे नंबर पर आए समस्तीपुर के  दुर्गेश कुमार के पिता मामूली किसान हैं. एक नंबर से टौप आने से पिछड़ गए दुर्गेश का सपना इंजीनियर बनने का है.

तीसरे नंबर पर रही अरवल की जूली कुमारी डाक्टर बनना चाहती है, लेकिन गरीबी का डर उसे सता रहा है. जूली के पिता मनोज सिन्हा शिक्षक हैं. उन की आमदनी इतनी नहीं है कि बेटी का दाखिला मैडिकल कालेज में करा सकें, इसलिए वे सरकार से मदद की आस लगाए बैठे हैं.

चौथे नंबर पर आए लखीसराय के सन्नू कुमार की हालत इन सब से ज्यादा खस्ता है. उस के पिता शंभू कुमार और मां पंचा देवी दोनों मजदूरी करते हैं. सन्नू कुमार की ख्वाहिश भी आईएएस अफसर बनने की है.

लाल राजस्थान के : 8 जुलाई को राजस्थान माध्यमिक शिक्षा बोर्ड के विज्ञान विषय का रिजल्ट देख कर हर कोई हैरान रह गया था, क्योंकि दूसरा नंबर बीकानेर के एक मामूली अनपढ़ किसान धर्मचंद्र शर्मा के बेटे अमित शर्मा के खाते में गया था. उस के घर की माली हालत इतनी खस्ता है कि वह प्रिंस स्कूल की मदद से पढ़ रहा था. 10वीं में भी अच्छे नंबर लाने वाले अमित को इस स्कूल ने मुफ्त पढ़ाई और होस्टल

मुहैया कराया था. 3 विषयों में 100 फीसदी नंबर लाने वाला अमित डाक्टर बनने का सपना पाले बैठा है. वह कहता है कि सपने पूरा करने के लिए दिनरात मेहनत करनी पड़ती है.

इसी कड़े मुकाबले वाले इम्तिहान में कोचिंग सिटी के नाम से मशहूर कोटा के प्रगति स्कूल के एक छात्र शोएब हुसैन ने भी 98.40 फीसदी नंबर ला कर सब को चौंका दिया था. शोएब के पिता निसार अहमद कारीगर हैं, जिन की आमदनी बहुत ज्यादा नहीं है. अपने छात्र की कामयाबी से खुश इस स्कूल के डायरैक्टर जे. मोहम्मद ने शोएब के छोटे भाईबहनों को मुफ्त पढ़ाई की पेशकश की है.

पुरानी मोहब्बत नई अंगड़ाई : भाग 4

3 साल पहले फिर से ताजा हुई निशा की अंशुल से पुरानी मोहब्बत दिनोंदिन परवान चढ़ती गई. वह अपनी मां से मिलने का बहाना बना कर अक्सर कंकरखेड़ा जाती और फिर कभी किसी होटल में तो कभी किसी दोस्त के घर पर अंशुल के गले का हार बन कर अपने पति को धोखा देती.

हालांकि हर घर में पतिपत्नी में छोटीमोटी बातों पर तकरार होती है, झगड़ा होता है यहां तक कि कभीकभी मारपीट तक हो जाती है. ऐसा ही रजत और निशा की जिदंगी में भी था. लेकिन जब से अंशुल उस की जिंदगी में आया था, तब से रजत का ऐसा हर व्यवहार उसे अपने ऊपर अत्याचार लगने लगा था. जब वह अंशुल से रजत के इस व्यवहार के बारे में बताती तो वह आग में घी डालने का काम करता.

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अब अक्सर ऐसा होने लगा कि जब भी रजत व निशा के बीच किसी बात को ले कर तकरार होती तो वह अकसर झगड़े में बदल जाती थी. धीरेधीरे रजत और निशा के बीच मनममुटाव झगड़े और मारपीट में बदलने लगे थे. जब भी ऐसा होता तो निशा अकसर मायके जाती और वहां अंशुल की बांहों का सहारा उसे दिलासा देता.

निशा के ऊपर अब अंशुल के प्यार की खुमारी इस कदर चढ़ चुकी थी कि वह रजत को छोड़ने का मन बना चुकी थी. अंशुल ने भी उसे अपनी बनाने को कह दिया था कि वह उसे भगा कर उस से शादी कर लेगा. ऐसा ही हुआ भी, निशा ने घर से भागने की पूरी तैयारी भी कर ली.

22 मार्च को लौकडाउन होने से पहले निशा ने 20 मार्च को फोन कर के इस योजना के तहत रात के समय अंशुल को अपने घर के पीछे बुलाया और कपड़ों से भरे 2-3 बैग छत से नीचे फेंक दिए. जिन्हें ले जा कर अंशुल ने अपने घर में रख लिया.

योजना यह थी कि अगले दिन निशा घर से कुछ गहने व नकदी ले कर किसी बहाने खाली हाथ निकल जाएगी और फिर अंशुल उसे कहीं ले जाएगा, जहां दोनों शादी कर लेंगे. लेकिन अगले ही दिन जनता कर्फ्यू का ऐलान हो गया और उस के अगले ही दिन देश भर में लौकडाउन लग गया. फलस्वरूप दोनों की योजना पूरी नहीं हो सकी.

कुछ दिनों बाद निशा ने अंशुल को फोन कर दोबारा कहा कि वह बहुत परेशान है. आ कर उसे ले जाए. इस के बाद अंशुल ने कहा कि रजत को मार देता हूं, जिस के जवाब में निशा ने कहा कि तुम्हें जो करना है करो, लेकिन मुझे यहां से ले जाओ. उस के बाद अंशुल और निशा ने मिल कर रजत की हत्या की योजना बनाई.

इसी योजना को पूरा करने के लिए अंशुल ने पहले एक तमंचे का इंतजाम किया. उस के बाद उस ने किसी ऐसे साथी का साथ लेने का फैसला किया जो हिम्मत वाला हो. इस काम के लिए उस ने अपहरण केस में अपने साथी कपिल जाट को साथ रखने का फैसला किया.

उस ने वाहन के लिए सैनिक विहार में रहने वाले अपने दोस्त इशांत दत्ता से झूठ बोल कर 28 मई को उस की स्पलेंडर बाइक ले ली. उसी सुबह वह पहले तड़के दबथुआ गया और वहां से कपिल जाट को साथ ले कर गंगानगर पहुंचा.

गंगानगर में मोटरसाइकिल पर सवार होने के दौरान ही अंशुल ने कपिल को बताया था कि उसे अपनी प्रेमिका के पति का काम तमाम करना है. हालांकि कपिल ने इस बात पर ऐतराज भी किया था कि अगर ऐसा काम करना ही था तो उसे पहले बताना चाहिए था, फिर कारगर योजना बना कर काम करते. लेकिन अंशुल ने उसे समझा दिया कि उस ने पूरी प्लानिंग कर ली है, बस वह बाइक चला ले गोली मारने का काम वह कर लेगा.

दूसरी तरफ निशा अंशुल को पहले ही बता चुकी थी कि रजत अपने औफिस में काम करने वाली लड़की के साथ 8 से साढ़े 8 बजे के करीब घर से निकलता है. इसीलिए अंशुल कपिल जाट के साथ 8 बजे ही गली के बाहर कुछ दूरी बना कर रजत के बाहर आने का इंतजार करने लगा.

रजत जैसे ही सुषमा के साथ स्कूटी ड़्राइव करते हुए अपने औफिस के लिए चला तो अंशुल ने उस की स्कूटी का पीछा शुरू कर दिया. करीब 2 किलोमीटर पीछा करने के बाद मौका देख कर स्कूटी को ओवरटेक कर के रोका, फिर रजत को 2 गोली मार कर कपिल के साथ फरार हो गया.

रजत की हत्या के बाद अंशुल सीधे अपने घर पहुंचा. कपिल को उस ने कहीं छोड़ दिया था. दूसरी तरफ पड़ोस में रहने वाले निशा के घर वालों को जब पता चला कि उन के दामाद रजत की किसी ने हत्या कर दी है तो उस के घर में रोनापीटना शुरू हो गया. पता चलने पर अंशुल कालोनी के कुछ लोगों के साथ निशा के परिजनों को सांत्वना देने पहुंचा.

जब निशा के घर वाले रजत के घर जाने की चर्चा करने लगे तो हमदर्दी दिखाते हुए अंशुल अपनी कार से उन्हें रजत के घर ले गया. निशा के परिजनों के साथ उस ने भी पारिवारिक सदस्य की तरह ही शोक व्यक्त किया. अंशुल के वहां आने से निशा इस बात को बखूबी समझ गई थी कि अंशुल ने अपना काम न सिर्फ सफाई से किया है बल्कि वह सुरक्षित भी है.

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अंशुल ने खेला सेफ गेम

इस दौरान अंशुल ने किसी को भी शक नहीं होने दिया. अगले दिन सुबह ही अंशुल ने इशांत दत्ता की मोटरसाइकिल उसे वापस लौटा दी. अंशुल निश्चिंत था कि उस ने रजत की हत्या इतनी सफाई से की है कि पुलिस के हाथ उस की गरदन तक नहीं पहुंचेंगे.

लेकिन हर अपराधी से कहीं न कहीं चूक होती है. अंशुल की चुगली सीसीटीवी कैमरों ने कर दी. पुलिस ने घटनास्थल से ले कर कई किलोमीटर तक करीब 40 सीसीटीवी कैमरों से कडि़यां जोड़ते हुए वारदात में शामिल उस बाइक को खोज निकाला. इस तरह अंशुल बावरा, कपिल जाट तथा निशा तीनों पुलिस के चंगुल में फंस गए.

पुलिस ने हत्या में प्रयुक्त बाइक पहले ही बरामद कर ली थी बाद में अंशुल से पूछताछ के बाद हत्या में इस्तेमाल तमंचा भी बरामद कर लिया गया. पुलिस ने अंशुल के घर से ही निशा के कपड़ों से भरे बैग भी बरामद कर लिए.

दरअसल, पुलिस ने जिन 20 नंबरों की सीडीआर खंगाली थी, उन में एक नंबर रजत की पत्नी निशा सिवाच का भी था. सीडीआर में पता चला कि रजत की हत्या से पहले निशा एक नए नंबर पर लगातार 2 महीने तक बातचीत कर रही थी.

पुलिस ने जब उस नंबर की आईडी निकलवाई तो पता चला वह निशा की मां के नाम पर है. हालांकि यह नंबर 21 अप्रैल को बंद हो गया था. पता चला कि 2 महीने पहले निशा ने अपनी मम्मी की आईडी पर नया सिम ले कर अंशुल को दिया था.

21 अप्रैल को अंशुल इस सिम को निशा को दे कर चला गया था, जिस के बाद वह एक्टिव नहीं था. दरअसल, इस नंबर को निशा ने अपनी मां के नाम से ले कर अंशुल को इसलिए दिया था ताकि वे दोनों इसी नंबर पर बात करते रहें और निशा जब घर से भागे और पुलिस उस के मोबाइल की काल डिटेल्स निकाले तो कहीं भी अंशुल का नंबर ट्रेस न हो.

पुलिस ने जिस वक्त निशा को गिरफ्तार कर के जेल भेजा था वह साढ़े 3 माह की गर्भवती थी. रजत के कत्ल और अंशुल से निशा के नाजायज रिश्तों की कहानी सामने आने पर रजत के घर वाले चाहते हैं कि निशा की कोख में पल रहे बच्चे का डीएनए टेस्ट कराया जाए.

यदि बच्चा रजत का है तो वे अपना लेंगे. हालांकि परिवार ने रजत निशा की 5 साल की बेटी को अपने पास ही रखा है. दूसरी तरफ निशा के पिता बेटी की करतूत से बेहद शर्मिदा हैं और कहते हैं कि वे उस की पैरवी नहीं करेंगे.

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यह अंशुल की अपने प्यार को पाने के लिए रची गई खूनी साजिश थी, जिस ने उसे सलाखों के पीछे पहुंचा दिया है.

– कथा पुलिस व आरोपियों से हुई पूछताछ पर आधारित

पुरानी मोहब्बत नई अंगड़ाई : भाग 3

इशांत से पूछताछ के बाद यह बात तो साफ हो गई कि उस की बाइक अंशुल बावरा नाम का उस का दोस्त ले कर गया था. अब पुलिस के राडार पर अंशुल बावरा आ गया. इशांत दत्ता से अंशुल बावरा की सारी जानकारी और पता हासिल करने के बाद पुलिस ने अपना जाल बिछा दिया.

अगले 24 घंटे में पुलिस ने अंशुल को भी हिरासत में ले लिया, जिस के बाद पुलिस ने सुषमा से उस की शिनाख्त कराई तो उस ने बता दिया कि जिन लोगों ने रजत के ऊपर हमला किया था, उन में से एक की कदकाठी बिल्कुल अंशुल के हुलिए से मेल खाती है.

इस के बाद पुलिस ने जब अंशुल से अपने तरीके से पूछताछ की तो कुछ घंटों की मशक्कत के बाद वह टूट गया. उस ने कबूल कर लिया कि उस ने सरधना के दबथुआ में रहने वाले अपने एक दोस्त कपिल जाट के साथ मिल कर रजत की हत्या की थी.

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अंशुल ने यह भी मान लिया कि उस ने सैनिक विहार निवासी अपने दोस्त इशांत से झूठ बोल कर उस की बाइक से वारदात को अंजाम दिया था. घटना के वक्त बाइक के पीछे लगी नंबर प्लेट को उस ने मोड़ कर ऊपर की तरफ कर दिया था ताकि किसी को नंबर पता न चल सके.

घटना के बाद जब वे लोग पल्लवपुरम के पास पहुंचे तो उस ने नंबर प्लेट सीधी कर दी. इसी के बाद एक जगह लगे सीसीटीवी कैमरे में बाइक का नंबर आ गया होगा.

इस से साफ हो गया कि रजत की हत्या करने में इशांत दत्ता उर्फ ईशू शामिल नहीं था. अब सवाल था कि आखिर अंशुल बावरा ने रजत की हत्या क्यों की. जब इस बारे में पूछताछ हुई तो पुलिस के पांव तले की जमीन खिसक गई. क्योंकि पिछले 2 हफ्ते से वह इस हत्याकांड के सुराग तलाशने में दूसरे जिलों तक हाथपांव मार रही थी, उसे क्या पता था कि रजत का कातिल उस के घर में ही छिपा बैठा था.

अंशुल से पूछताछ में पता चला कि उस ने रजत की पत्नी निशा के कारण रजत की हत्या को अंजाम दिया था. अब कपिल जाट के अलावा रजत की पत्नी भी उस की हत्या में वांछित हो गई.

पुलिस ने कोई भी कदम उठाने से पहले रजत के परिवार वालों को विश्वास में लेना जरूरी समझा, इसलिए उन्होंने रजत के पिता जोगेंद्र सिंह और उस के कजिन रजपुरा के प्रधान विपिन चौधरी को बुला कर अंशुल बावरा से हुई पूछताछ के बारे में बताया.

यह जानकारी मिलने के बाद उन्होंने पुलिस को निशा को हिरासत में ले कर पूछताछ करने की अनुमति दे दी. महिला पुलिस के सहयोग से उसी दिन निशा को भी हिरासत में ले लिया गया. दूसरी ओर एक टीम पहले ही कपिल जाट की गिरफ्तारी के लिए भेज दी गई थी, उसे भी रात होतेहोते पुलिस ने धर दबोचा. इस के बाद तीनों आरोपियों को आमनेसामने बैठा कर पूछताछ की गई.

जो कहानी पुलिस के सामने आई, उसे जानने के बाद सभी के होश उड़ गए, क्योंकि निशा की 7 साल पुरानी एक प्रेम कहानी ने जो अंगड़ाई ली थी, उस ने उस की जिंदगी में खूनी रंग भर दिए. खास बात यह कि खून के रंग भरने वाली चित्रकार वही थी.

निशा का पहला प्यार था अंशुल

कंकरखेड़़ा के श्रद्धापुरी का रहने वाला अंशुल बावरा (37) पहले से शादीशुदा और 2 बच्चों का पिता था और दूध की डेयरी चलाता था. निशा का परिवार लंबे समय से उस के पड़ोस में ही रहता था. निशा को अंशुल ने अपनी आंखों के सामने जवान होते देखा था. निशा को वह उसी वक्त से पसंद करता था जब वह किशोरावस्था में थी. ऐसा नहीं था कि उस का प्यार एकतरफा था.

रजत दबंग किस्म का फैशनपरस्त और चकाचौंध भरी जिंदगी जीने वाला नौजवान था. कोई भी लड़की उस की तरफ आकर्षित हो सकती थी. निशा भी अंशुल की तरफ आकर्षित थी और मन ही मन उसे पसंद भी करती थी.

पड़ोस में रहने के कारण निशा बदनामी के डर से अंशुल से ज्यादा तो नहीं मिल पाती थी लेकिन जब भी दोनों की बातचीत होती तो उस से दोनों को ही यह आभास हो गया था कि वे एकदूसरे को पसंद करते हैं. दबी जबान से दोनों ने एक दूसरे से यह बात कह भी दी थी.

लेकिन इसी दौरान एक ऐसी घटना घटी, जिस की वजह से अंशुल और निशा के प्यार ने परवान चढ़ने से पहले ही दम तोड़ दिया. हुआ यह कि साल 2011 में नोएडा के एक व्यवसायी के अपहरण और उस से फिरौती वसूलने के आरोप में अंशुल को नोएडा पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया. इस मामले में उसे 6 साल जेल में गुजारने पड़े.

जब 2017 में अंशुल जेल से बाहर आया तो उसे पता चला कि उस की माशूका निशा की शादी हो चुकी है. उस ने निशा के बारे में अपनी कालोनी के लड़कों से जानकारी हासिल करने के बाद किसी तरह उस का मोबाइल नंबर भी प्राप्त कर लिया. 3 साल पहले अंशुल ने निशा के नंबर पर फोन किया तो पहले वह अंजान नंबर देख कर सकपका गई. लेकिन जब उसे पता चला कि फोन करने वाला अंशुल है तो उस की जान में जान आई.

अंशुल ने पहली बार की बातचीत में ही निशा के सामने अपने दिल की शिकायत दर्ज करा दी. उस ने निशा से शिकायत भरे लहजे में कहा, ‘‘यार मैं ने तो तुम्हें अपने मन के मंदिर में बसा कर जीवन भर साथ निभाने के सपने देखे थे, किस्मत ने मेरे जीवन के साथ थोड़ा खिलवाड़ क्या किया कि तुम ने मुझे भुला ही दिया. मेरा इंतजार किए बिना घर बसा लिया.’’

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निशा के पास कोई जवाब तो था नहीं, लिहाजा उस दिन उस ने सिर्फ यही कहा कि वह अपनी मम्मी से मिलने के लिए घर आएगी तब उस के साथ विस्तार से बात करेगी. उस दिन के बाद निशा और अंशुल की हर रोज फोन पर बातें होने लगीं.

कुछ दिन बाद जब वह कंकरखेड़ा अपने मायके गई तो लंबे अरसे बाद अंशुल से मुलाकात हुई. अंशुल ने खूब गिलेशिकवे किए और बताया कि झूठे मुकदमे में फंसा कर उसे जेल भेज दिया गया था. जेल में वह हर दिन उसे याद कर के अपना वक्त गुजारता था.

अंशुल की इस बात ने निशा को भावुक कर दिया, वह सोचने लगी कि उस ने तो अंशुल को जेल जाने के बाद ही भुला दिया था जबकि वह अपने प्यार की खातिर उसे 7 साल बाद भी नहीं भुला पाया.

निशा जब कालेज में पढ़ती थी, तब उस की जानपहचान रजत से हुई थी. कालेज के दिनों में दोनों के बीच इश्क शुरू हुआ और कालेज की पढ़ाई खत्म होतेहोते इश्क इस तरह परवान चढ़ा कि दोनों ने लव मैरिज कर ली.

रजत जाट परिवार से था जबकि निशा वैश्य परिवार की थी. रजत का परिवार बिरादरी से बाहर निशा से उस की शादी के लिए तैयार नहीं था, लेकिन रजत ने परिवार के विरुद्ध जा कर निशा से शादी की. शादी के कुछ दिन तक वह परिवार से अलग रहा, लेकिन परिवार का एकलौता लड़का होने की वजह से घर वालों ने निशा से शादी को मंजूरी दे दी.

शादी के एक साल बाद ही निशा ने एक प्यारी सी बेटी को जन्म दिया, जो अब करीब 5 साल की है. रजत की मां स्वास्थ्य विभाग में नौकरी करती थीं, जो कुछ दिन पहले ही रिटायर हुई हैं. हांलाकि रजत के पिता के पास काफी जमीनजायदाद थी, लेकिन इस के बावजूद 3 साल पहले रजत ने बिजली विभाग में संविदा पर सुपरवाइजर की नौकरी जौइन कर ली थी.

कुछ ही दिन पहले निशा दोबारा गर्भवती हुई थी. अतीत के तमाम खुशनुमा लम्हों के बावजूद 3 साल पहले जब अंशुल दोबारा निशा की जिदंगी में आया तो वह सब कुछ भूल कर फिर से उस के आगोश में समा गई.

पुराने प्यार ने ऐसी अंगड़ाई ली कि निशा यह भी भूल गई कि वह एक बेटी की मां है और उस ने उस शख्स से शादी की है जिस ने उस के प्यार की खातिर अपने परिवार से बगावत कर दी थी.

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जानें आगे क्या हुआ अगले भाग में…

पुरानी मोहब्बत नई अंगड़ाई : भाग 2

इस आशंका के पीछे एक अहम कारण यह भी था क्योंकि पूछताछ में पता चला था कि उत्तराखंड के युवक से सुषमा की 10 दिन बाद ही शादी होनी थी. एक तरफ पुलिस टीमों ने क्राइम ब्रांच की मदद से कब्जे में ली गईं सभी सीसीटीवी कैमरों की फुटेज देखने का कामशुरू कर दिया, दूसरी तरफ पुलिस ने रजत व उस के कुछ करीबी दोस्तों के साथ सुषमा के मोबाइल नंबरों की सीडीआर निकलवा ली. इन सीडीआर की जांचपड़ताल कर के यह देखा जाने लगा कि रजत का ज्यादा संपर्क किस से था.

पुलिस की नजर में शुरुआती जांच में ही सुषमा सब से ज्यादा संदिग्ध नजर आ रही थी. इसलिए पुलिस ने सुषमा और उस के एक भाई को पूछताछ के लिए हिरासत में ले लिया.

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वारदात के दूसरे ही दिन रजत की पत्नी निशा भी थाने पहुंच गई. उस ने पुलिस के सामने ही सुषमा पर अपने भाइयों के साथ मिल कर रजत की हत्या का आरोप लगाया. उस ने सुषमा से जिस तरह के सवालजवाब किए, उस से भी पुलिस को लगने लगा कि कहीं न कहीं रजत और सुषमा के बीच असामान्य रिश्ते थे.

हालांकि सुषमा अभी तक केवल यही कह रही थी औफिस में एक कर्मचारी के नाते ही वह रजत के साथ आतीजाती थी. इस से ज्यादा उन के बीच कोई रिश्ता नहीं था. लेकिन निशा इस बात पर जोर दे रही थी कि जब रजत पर हमला हुआ तो उस ने हत्यारों से मुकाबला क्यों नहीं किया.

सुषमा का कहना था कि गोली चलते ही वह डर गई थी. उस समय उस में कुछ भी सोचने समझने की शक्ति नहीं रह गई थी. पुलिस को सुषमा व उस के भाई पर शक होने का एक मजबूत आधार यह भी था कि जब सीसीटीवी फुटेज देखी गई तो उस में एक हत्यारोपी पैर में चप्पल पहने नजर आया. जब पुलिस सुषमा के भाई को पकड़ कर थाने लाई तो उस ने ठीक वैसी ही चप्पल पहनी हुई थी.

सुषमा का भाई योगेश (परिवर्तित नाम) गुड़गांव की एक प्राइवेट कंपनी में काम करता था और लौकडाउन के चलते छुट्टी पर घर आया हुआ था. जब पुलिस ने उसे पूछताछ के लिए उठाया तो उस वक्त उस के पैर में वैसी ही चप्पल थी. सुषमा व उस के भाइयों पर शक का एक दूसरा आधार ये भी था कि सुषमा ने रजत से 8 हजार रुपए उधार लिए थे.

हालांकि जब पुलिस ने सुषमा से पूछताछ की तो उस ने इस बात से साफ इनकार किया कि उस का रजत से कोई लेनदेन का हिसाब था. लेकिन जब निशा ने लेनदेन की बात बताई तो सुषमा ने माना कि उस ने रजत से 8 हजार रुपए उधार लिए थे, जिस में से 2 हजार चुकता कर दिए थे.

अब पुलिस को लगने लगा कि हो न हो कोई ऐसी कहानी जरूर है, जिसे सुषमा छिपा रही है. लग रहा था कि उस के भाइयों ने ही रजत की हत्या की है. क्योंकि सुषमा काफी दिनों से रजत को गांव के बाहर से स्कूटी पर बैठा कर औफिस ले जा रही थी.

कातिलों की टाइमिंग भी एकदम परफेक्ट थी, जैसे ही वह रजत को ले कर गांव से निकली कातिलों ने पीछा शुरू कर दिया और सब से हैरानी की बात ये थी कि कातिलों ने सुषमा को छुआ तक नहीं. जबकि रजत को 2 गोली मारी और फरार हो गए.

सीसीटीवी फुटेज का सहारा

पुलिस की कई टीमें अलगअलग बिंदुओं पर रजत हत्याकांड की गुत्थी सुलझाने में लगी थीं. मोबाइल की काल डिटेल्स व दोस्तों से पूछताछ में यह भी पता चला कि रजत की कई अन्य लड़कियों से भी दोस्ती थी. काल डिटेल्स से पुलिस को कुछ और क्लू भी मिले.

इस दौरान पुलिस ने एफआईटी से ले कर रजपुरा तक 42 सीसीटीवी की फुटेज देखने का काम पूरा कर लिया. फुटेज में बाइक सवार तो मिले, पर उन की पहचान नहीं हो पाई. सुषमा से कातिलों के बारे में जितनी भी जानकारी मिली थी, उस के आधार पर पुलिस ने उन के स्केच तैयार कर लिए.

पुलिस और क्राइम ब्रांच की टीमें 2 हफ्तों तक सीसीटीवी फुटेज खंगालते हुए हर संदिग्ध से पूछताछ करती रहीं. पुलिस ने एफआईटी से सीसीटीवी को आधार बना कर भी बदमाशों की तलाश की. सीसीटीवी की फुटेज देख कर लग रहा था कि बदमाश गंगानगर से अम्हेड़ा होते हुए सिखेड़ा की तरफ गए थे और सिवाया टोलप्लाजा होते हुए मुजफ्फरनगर की तरफ निकल गए थे. आशंका थी कि शूटर मुजफ्फरनगर क्षेत्र के हो सकते हैं. पुलिस और क्राइम ब्रांच की टीम इस आधार पर भी मामले की पड़ताल करती रही.

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पुलिस ने दोनों शूटरों के स्केच के आधार पर जेल में बंद बदमाशों से भी पहचान कराने की कोशिश की.

2 सप्ताह की जांच में एक बात साफ हो गई थी कि सुषमा या उस के परिवार के लोग कुछ बातों को ले कर संदिग्ध जरूर लग रहे थे, लेकिन उन के खिलाफ अभी तक ऐसा कोई ठोस सबूत या आधार सामने नहीं आया था कि उन्हें गिरफ्तार किया जाता. इसलिए पुलिस उन्हें पूछताछ के लिए थाने बुलाती तो रही लेकिन इस के साथ दूसरी दिशा में भी अपनी जांच आगे बढ़ाती रही.

दरअसल, पुलिस जब सीसीटीवी की जांच कर रही थी, तो उन्हें घटनास्थल से पल्लवपुरम तक के सीसीटीवी कैमरे में एक ऐसी बाइक दिखी, जिस में मुंह पर गमछा बांधे 2 सवार बैठे थे, बाइक भी एक जैसी थी बस फर्क इतना था कि वह बाइक जब घटनास्थल पर दिखी तो उस की नंबर प्लेट इस तरह मुड़ी हुई थी कि सीसीटीवी में उस का नंबर नहीं दिख रहा था.

लेकिन पल्लवपुरम के बाद जब वो बाइक दिखी तो उस की नंबर प्लेट एकदम सीधी थी और उस का नंबर भी साफ दिख रहा था. क्राइम ब्रांच की टीम ने जब जांच अधिकारी बृजेश शर्मा को उस बाइक का नंबर निकाल कर दिया तो शर्मा ने तत्काल बाइक के नंबर को ट्रेस करवा कर उस के मालिक का पता निकलवा लिया.

पता चला वह बाइक कंकरखेड़ा के सैनिक विहार में रहने वाले इशांत दत्ता के नाम थी. लंबी कवायद के बाद पुलिस को एक बड़ा सुराग मिला था इसलिए पुलिस ने तत्काल एक पुलिस टीम को भेज कर इशांत दत्ता को थाने बुलवा लिया.

सीसीटीवी में जो स्पलेंडर बाइक दिखाई दे रही थी, उसी नंबर प्लेट की बाइक इशांत के घर पर खड़ी थी. पुलिस उसे भी अपने साथ थाने ले आई. थाने में इशांत दत्ता से पूछताछ का सिलसिला शुरू हुआ.

इशांत नौकरीपेशा युवक था, जब पुलिस ने उसे बताया कि 29 मई को उस की बाइक का इस्तेमाल रजत सिवाच की हत्या करने में हुआ था, तो इशांत ने बिना एक पल गंवाए बता दिया कि उस से एक दिन पहले कंकरखेड़ा के श्रद्धापुरी में रहने वाला उस का दोस्त अंशुल उस की बाइक यह कह कर ले गया था कि उसे किसी काम से मुजफ्फरनगर जाना है 1-2 दिन में बाइक लौटा देगा.

चूंकि लौकडाउन के कारण इशांत को कहीं नहीं जाना था, इसलिए उस ने अपनी बाइक अंशुल को दे दी और अंशुल वादे के मुताबिक 2 दिन बाद उस की बाइक वापस लौटा गया. इशांत ने बताया कि उसे नहीं मालूम कि अंशुल ने उस की बाइक का इस्तेमाल किसी गलत काम में किया है.

इशांत था बेकसूर

पुलिस को पहले तो इशांत की बातों पर यकीन नहीं हुआ, लेकिन उस के मोबाइल की लोकेशन को ट्रेस करने के बाद यह बात साफ हो गई कि उस दिन वह अपने घर पर ही था. पुलिस ने पुख्ता यकीन करने के लिए आसपड़ोस के लोगों से भी इस बात की पुष्टि कर ली. उस दिन इशांत अपने घर पर ही था.

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समाज की पंगु सोच को कंधे पर उठाया

बचपन में जब मैं अपने मामा के गांव रेलगाड़ी से जाता था, तो वे गांव से 3 किलोमीटर दूर पैदल रेलवे स्टेशन पर मुझे और मां को लेने आते थे. इस के बाद हम तीनों पैदल ही गांव की तरफ चल देते थे. पर कुछ दूर चलने के बाद मामा मुझे अपने एक कंधे पर बिठा लेते थे.

चूंकि मामा तकरीबन 6 फुट लंबे थे, तो उन के कंधे से मुझे पतली सी सड़क से गुजरते हुए आसपास की हरियाली और खेतखलिहान दिखते थे. उस सफर का रोमांच ही अलग होता था. खुशी और डर के मारे मेरी आंखें फट जाती थीं.

तब मामा जवान थे और मैं दुबलपतला बालक. मामा को शायद ही कभी मेरा बोझ लगा हो. पर हाल ही में एक ऐसा वाकिआ हुआ है, जिस ने पूरे समाज पर जिल्लत का बड़ा भारी बोझ डाल दिया है.

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मध्य प्रदेश का झाबुआ इलाका आदिवासी समाज का गढ़ है. वहां से सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हुआ है, जिस में एक औरत को सजा के तौर पर अपने पति को कंधे पर बिठा कर पूरे गांव में घुमाना पड़ा. उसे सजा क्यों मिली? दरअसल, उस औरत पर आरोप लगा था कि उस का किसी पराए मर्द के साथ चक्कर चल रहा था.

वीडियो में दिखा कि एक औरत अपने पति को उठा कर चल रही थी और पीछेपीछे गांव वाले. एक जगह जब वह औरत थक गई, तो उसे छड़ी से पीटा भी गया.

ऐसा पहली बार नहीं हुआ है जब किसी औरत को सरेआम बेइज्जत किया गया हो, वह भी एकतरफा फैसला सुना कर. दुख की बात तो यह थी कि उस औरत का मुस्टंडा पति इस बात की खिलाफत तक नहीं कर पाया.

पिछले साल का जुलाई महीने का एक और किस्सा देख लें. देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के वाइब्रैंट गुजरात के बनासकांठा जिले के दंतेवाड़ा तालुका के 12 गांवों में ठाकोर तबके की खाप पंचायत ने एक अजीबोगरीब प्रस्ताव पास किया था, जिस में ठाकोर समाज की कुंआरी लड़कियों को मोबाइल फोन रखने की मनाही कर दी गई. यह भी ऐलान किया कि जो भी लड़की मोबाइल फोन के साथ पकड़ी जाएगी, उस के पिता पर खाप पंचायत जुर्माना लगाएगी.

सवाल यह है कि मोबाइल फोन रखने की मनाही सिर्फ लड़कियों के लिए ही क्यों? लड़कों पर यह पाबंदी क्यों नहीं? क्या मोबाइल फोन रखने से सिर्फ लड़कियां ही बिगड़ती हैं?

आज कोरोना महामारी के बाद जब से स्कूल बंद हुए हैं, तब से बहुत से स्कूल बच्चों को औनलाइन क्लास की सुविधाएं दे रहे हैं, ताकि कल को अगर सरकार इम्तिहान लेने का नियम बना देगी, तो बच्चों को परेशानी न हो. ऐसे में स्कूल जाने वाली कुंआरी लड़कियों के पास अगर मोबाइल फोन नहीं होगा, तो क्या वे पढ़ाईलिखाई में पिछड़ नहीं जाएंगी?

एक और मामला साल 2018 का है. राजस्थान के बूंदी जिले में अंधविश्वास के चलते एक 6 साल की मासूम बच्ची को 9 दिनों तक सामाजिक बहिष्कार का दर्द झेलना पड़ा.

बूंदी जिले के एक गांव हरिपुरा के बाशिंदे हुक्मचंद रैगर ने बताया कि 2 जुलाई को उन की 6 साल की बेटी खुशबू अपनी मां के साथ स्कूल में दाखिले के लिए गई थी. वहां पर दूध पिलाने के लिए बालिकाओं की लाइन लग रही थी. इसी दौरान अचानक खुशबू का पैर टिटहरी नाम के एक पक्षी के अंडे पर पड़ गया, जिस से अंडा फूट गया.

इस घटना को अनहोनी मानने के बाद गांव में तुरंत पंचपटेलों ने बैठक बुलाई और मासूम खुशबू को समाज से बाहर करने का फरमान सुना दिया. खुशबू के अपने घर के अंदर घुसने तक पर रोक लगा दी गई. उसे खाना खाने और पीने के पानी के लिए भी अलग से बरतन दिए गए.

पंचपटेलों के फरमान के चलते पिता 9 दिन अपने बेटी को ले कर घर के बाहर बने बाड़े में रहा था. पिता के मुताबिक, इस दौरान पंचपटेलों ने शराब की बोतल व चने भी मंगवाए थे.

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जब इस मामले की जानकारी तहसीलदार व थाना प्रभारी को मिली, तो उन्होंने पंचपटेलों को इकट्ठा किया. इस के बाद सरकारी अफसरों की मौजूदगी में गांव वालों ने मासूम खुशबू को 9 दिन बाद अपने रीतिरिवाजों को निभाते हुए घर के अंदर दाखिल करवाया. इस से पहले गांव में चने बांटे गए और परिवार के जमाई को तौलिया भेंट किया गया.

कितने शर्म की बात है कि एक मासूम बच्ची को किसी पक्षी का अंडा फोड़ने की इतनी बड़ी सजा दी गई. वह भी तब जब उस लड़की ने जानबूझ कर ऐसा नहीं किया था. उस से तो जैसे महापाप हो गया. फिर तो उन पंचपटेलों को भी इस पाप का भागीदार होना चाहिए, जिन्होंने लड़की के पिता से शराब की डिमांड की. शराब पीना भी तो एक सामाजिक बुराई है, पर पंचपटेलों को सजा देने का जोखिम कौन उठाए?

समाज में ऐसे किस्सों की कोई कमी नहीं है, जहां नाक के सवाल पर औरतों और मासूम बच्चियों को मर्द समाज के बचकाने फैसलों का शिकार बनना पड़ता है. बचकाने क्या तानाशाही फैसले ही कहिए.

इस में जाति का दंभ बहुत अहम रोल निभाता है. दूसरी जाति की तो बात ही छोड़िए, अपनी जाति के लोग खाप के नाम पर मासूमों पर तरहतरह से जुल्म ढाते हैं. किसी ने परिवार के खिलाफ जा कर प्रेम विवाह क्या कर लिया, उसे मार दिया जाता है. अगर परिवार वाले मान भी जाएं, तो समाज के ठेकेदार उन्हें उकसा कर अपराध करने के लिए मजबूर कर देते हैं. पगड़ी उछलने की दुहाई दे कर उन से अपनों का ही बलिदान मांगते हैं. परिवार वाले गुस्से में कांड कर के जेल पहुंच जाते हैं और जाति के ये सर्वेसर्वा किसी दूसरे शिकार की टोह में निकल पड़ते हैं.

और अगर जाति के साथ दूसरे धर्म का नाता भी जुड़ जाता है, तो फिर बात दंगे तक पहुंच जाती है. उत्तर प्रदेश के जौनपुर में तो 2 समुदायों के बच्चों के बीच मवेशी चराने के दौरान हुए मामूली से झगड़े ने सांप्रदायिक रूप ले लिया था.

भारत में ऐसे विवादों का भुगतभोगी एससी समाज ही रहा है. वह आज भी अपनी पहचान तलाश रहा है. वोटों के लिए तो नेता उन्हें अपने गले से लगा लेते हैं, उन के झोंपड़ों में जा कर रोटी खा लेते हैं, पर जब अपने समाज पर आंच की बात आती है, तो उन को दूध में पड़ी मक्खी की तरह बाहर निकाल कर फेंक देते हैं.

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एसटी समुदाय भी कमोबेश ऐसे ही हालात में जी रहा है. वह तो भला हो कि झाबुआ वाले कांड में सताई गई औरत आदिवासी समाज से थी, जो अपने तन और मन से बहुत मजबूत होती हैं और इसलिए उस ने अपने पति को कंधे पर बिठा कर पूरा गांव घुमा दिया, वरना किसी शहरी और ऊंची जाति की औरत में ऐसा करने का माद्दा शायद ही दिखता.

पुरानी मोहब्बत नई अंगड़ाई : भाग 1

निशा छत पर टकटकी लगाए रजत को उस वक्त तक देखती रही जब तक वह गली के नुक्कड़ पर नहीं पहुंच गया. गली के नुक्कड़ पर सुषमा स्कूटी लिए खड़ी थी.

रजत के पास आते ही सुषमा स्कूटी से उतर गई और रजत ने स्कूटी थाम ली. ड़्राइविंग सीट पर पर वह खुद बैठा, जबकि सुषमा पीछे की सीट पर बैठ गई. रजत ने एक नजर गली में मकान की छत पर खड़ी निशा को देखा और हाथ हिला कर ‘बाय’ करते हुए स्कूटी आगे बढ़ा दी.

उत्तर प्रदेश के मेरठ में रजपुरा गांव का रहने वाला रजत सिवाच उर्फ मोनू (27) मंगलपांडे नगर के बिजलीघर में सुपरवाइजर की नौकरी करता था. पिछले 4 साल से वह संविदा पर काम कर रहा था. सुषमा (परिवर्तित नाम) भी मंगलपांडे नगर के बिजली घर में ही काम करती थी.

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एक तो रजत और सुषमा के घर एकडेढ़ किलोमीटर के दायरे में थे, दूसरा उन का दफ्तर भी एक ही था. यहां तक कि दोनों का ड्यूटी का समय भी एक ही रहता था, इसलिए पिछले कुछ महीने से दोनों एक ही वाहन से आते जाते थे. कभी रजत अपनी बाइक से जाता तो वह सुषमा को उस के घर से साथ ले लेता था और अगर सुषमा को अपनी स्कूटी ले जानी होती तो वह रजत को अपने साथ ले लेती थी.

29 अप्रैल, 2020 की सुबह भी ऐसा ही हुआ. रजत की मोटरसाइकिल के गियर में कुछ खराबी आ गई थी, इसलिए पिछले एक सप्ताह से रजत सुषमा के साथ उस की स्कूटी से बिजली घर जा रहा था.

उस दिन सुबह करीब सवा 8 बजे वह सुषमा की स्कूटी पर उसे पीछे बैठा कर बिजली घर जा रहा था. जब वह मवाना रोड पर विजयलोक कालोनी के सामने एफआईटी के पास पहुंचा तो अचानक पीछे से तेजी से आए स्पलेंडर बाइक सवार 2 युवकों ने अपनी बाइक स्कूटी के सामने अड़ा दी. सब कुछ इतनी तेजी से हुआ कि रजत को ब्रेक लगा कर स्कूटी रोकनी पड़ी. वह गुस्से से चिल्लाया, ‘‘ओ भाई, होश में तो है भांग पी रखी है क्या?’

बाइक पर सवार दोनों युवकों ने रूमाल बांध कर मास्क पहना हुआ था इसलिए उन्हें पहचान पाना मुश्किल था.

इस से पहले कि सुषमा और रजत कुछ समझते बाइक सवार युवकों में से एक बाइक से उतरा और कमर में लगा रिवौल्वर निकाल कर तेजी से स्कूटी के पास जा कर रजत के जबड़े पर पिस्टल सटा कर गोली चला दी. इतना ही नहीं, उस ने एक गोली और चलाई जो रजत के भेजे में घुस गई.

एक के बाद एक 2 गोली लगते ही रजत स्कूटी से नीचे गिर गया. उस के शरीर से खून का फव्वारा छूट पड़ा. सब कुछ इतनी तेजी से अचानक हुआ था कि सुषमा कुछ भी नहीं समझ पाई, न ही उस की समझ में यह आया कि क्या करे. जब माजरा समझ में आया तो उस के हलक से चीख निकल गई और वह मदद के लिए चिल्लाने लगी. इतनी देर में वारदात को अंजाम दे कर दोनों बाइक सवार फरार हो गए.

दिनदहाड़े भरी सड़क पर हुई इस वारदात के कुछ ही देर बाद राहगीरों की भीड़ एकत्र हो गई, लोगों में दहशत थी. जिस जगह ये वारदात हुई थी वह इलाका रजत के घर से मात्र 2 किलोमीटर की दूरी पर था. बदहवास सी सुषमा ने सब से पहले अपने मोबाइल से रजत के पिता जोगेंद्र सिंह को फोन किया.

जोगेंद्र सिंह ने तुरंत अपने भतीजे विपिन को फोन कर के ये बात बताई और परिवार के सदस्यों के साथ घटनास्थल की तरफ दौड़ पड़े.

परिवार का एकलौता बेटा था रजत

रजत के ताऊ का लड़का विपिन चौधरी रजपुरा गांव का प्रधान है. जैसे ही उसे अपने चाचा से रजत के ऊपर गोली चलने की सूचना मिली तो वह लोगों को साथ ले कर कुछ मिनटों में ही विजयलोक कालोनी के पास पहुंच गया.

विपिन चौधरी के पहुंचने से पहले ही रजत की मौत हो चुकी थी. जिस जगह घटना घटी थी, वह इलाका गंगानगर थाना क्षेत्र में आता था. लिहाजा विपिन चौधरी ने तुरंत गंगानगर थाने के एसएचओ बृजेश शर्मा को फोन कर के अपने भाई के साथ घटी घटना की सूचना दे दी.

सुबह का वक्त ऐसा होता है जब रात भर की गश्त और निगरानी के बाद पुलिस नींद की उबासी में होती है. फिर भी पुलिस को घटनास्थल पर आने में मुश्किल से 10 मिनट का समय लगा.

घटना की सूचना मिलते ही एएसपी (सदर देहात) अखिलेश भदौरिया, एसपी देहात अविनाश पांडे, फोरैंसिक टीम और क्राइम ब्रांच की टीम के अफसरों को ले कर मौके पर पहुंच गए. थोड़ी देर बाद एसएसपी अजय साहनी भी घटनास्थल पर पहुंच गए.

पुलिस अधिकारियों ने घटना को ले कर सब से पहले वारदात की प्रत्यक्षदर्शी सुषमा से जानकारी ली, उस के बाद रजत के घर वालों के बयान दर्ज किए गए. लेकिन किसी ने भी यह नहीं बताया कि रजत की किसी से कोई दुश्मनी थी.

वहां पहुंची रजत की मां और पत्नी निशा दहाड़े मारमार कर रो रही थीं, जिस से माहौल बेहद गमगीन हो गया था. एसएसपी के निर्देश पर लिखापढ़ी कर के रजत के शव को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया गया.

पुलिस के साथ थाना गंगानगर पहुंचे परिवार वालों की तहरीर पर एएसपी अखिलेश भदौरिया ने अज्ञात हत्यारों के खिलाफ भादंसं की धारा 302 के तहत हत्या का मुकदमा दर्ज करवा दिया. इस केस की जांच का काम एसएचओ बृजेश कुमार शर्मा को सौंपा गया. एसएसपी अजय साहनी ने गंगानगर पुलिस की मदद के लिए क्राइम ब्रांच की टीम को भी लगा दिया.

उसी शाम को पोस्टमार्टम के बाद रजत का शव उस के घर वालों को सौंप दिया गया. परिजनों ने उसी शाम रजत के शव का अंतिम संस्कार कर दिया.

इस दौरान जांच अधिकारी बृजेश शर्मा ने उस इलाके का फिर से निरीक्षण किया, जहां वारदात हुई थी. वारदात के बाद हत्यारे जिस दिशा में भागे थे, संयोग से वहां कई सीसीटीवी कैमरे लगे थे.

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जांच अधिकारी के आदेश पर पुलिस ने उन सभी सीसीटीवी कैमरों की फुटेज अपने कब्जे में ले ली.

एक पुरानी कहावत है कि हत्या जैसे हर अपराध के पीछे मुख्य रूप से 3 कारण होते है जर, जोरू और जमीन. यानी वारदात के पीछे या तो कोई पुरानी रंजिश हो सकती है, जिस की संभावना ना के बराबर थी. क्योंकि रजत के परिवार ने अपने बयान में साफ कर दिया था कि न तो उन की, न ही उन के बेटे की किसी से कोई रंजिश थी और न ही इस की संभावना थी.

वैसे भी रजत के बारे में अभी तक जो जानकारी सामने आई थी, उस के मुताबिक वह हंसमुख और मिलनसार प्रवृत्ति का लड़का था. वह केवल अपने काम से काम रखता था.

एक आशंका यह भी थी परिवार की कोई जमीनजायदाद या प्रौपर्टी का कोई मामला हो. लेकिन परिवार ने बताया कि उन के परिवार में प्रौपर्टी से जुड़ा हुआ कोई विवाद नहीं है.

रजत अपने परिवार का एकलौता बेटा था. उस के पिता के नाम काफी संपत्ति थी, ऐसे में संपत्ति के लिए भी उस की हत्या हो सकती थी.

इस के अलावा तीसरा अहम बिंदु था प्रेम प्रसंग. हत्या को जिस तरह से अंजाम दिया गया था, उस से इस बात की आशंका ज्यादा लग रही थी कि इस वारदात के पीछे कोई प्रेम त्रिकोण हो सकता है.

पुलिस उलझी जांच में

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जिस वक्त रजत की हत्या हुई, उस वक्त वह अपनी दोस्त सुषमा के साथ औफिस जा रहा था. यह भी पता चला कि दोनों अक्सर साथ ही दफ्तर आतेजाते थे. जांच अधिकारी बृजेश शर्मा के मन में अचानक सवाल उठा कि कहीं ऐसा तो नहीं कि रजत और सुषमा के बीच कोई ऐसा संबध हो, जिस की वजह से रजत की हत्या कर दी गई हो.

जानें आगे क्या हुआ अगले भाग में…

पुरानी मोहब्बत नई अंगड़ाई

विकास दुबे एनकाउंटर : कई राज हुए दफन

आखिरकार एक तथाकथित ऐनकाउंटर में उत्तर प्रदेश एसटीएफ द्वारा गैंगस्टर विकास दुबे के साथ ही एक गहरे सच की भी हत्या कर दी गई. अपराध, राजनीति, कारोबार और पुलिस के नैक्सस के भंडाफोड़ का जो खतरा विकास दुबे की गिरफ्तारी के बाद से लगातार कई सफेदपोशों और खाकीधारियों के सिर पर मंडरा रहा था, वह विकास दुबे की हत्या के साथ ही खत्म हो गया है.

विकास दुबे की गिरफ्तारी के बाद से ही न जाने कितने सफेदपोशों का ब्लडप्रैशर बढ़ गया था. ऐनकाउंटर से पहले ही अपने बयान में उस ने कई नेताओं, कारोबारियों और पुलिस वालों के नाम बताए थे, जिन्होंने उस की बिठूर से उज्जैन तक पहुंचने में मदद की थी.

अपने विरोधियों को ठिकाने लगाने में विजय दुबे का इस्तेमाल करने वाले नेताओं, कारोबारियों, पुलिस वालों का नाम खुलता तो राजनीति, कारोबार और प्रशासन की दुनिया में भूचाल आ जाता.

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हमें पता है कि सोहराबुद्दीन शेख और तुलसीराम प्रजापति का इस्तेमाल किस तरह से हरेन पंड्या समेत कितने लोगों को ठिकाने लगाने में किया गया था और जब सोहराबुद्दीन और तुलसीराम प्रजापति गिरफ्तार होने के बाद सत्ताधारी सफेदपोशों के लिए खतरा बन गए तो उन्हें नकली ऐनकाउंटर में ढेर कर दिया गया.

विकास दुबे उत्तर प्रदेश का सोहराबुद्दीन शेख और तुलसीराम प्रजापति था, जिस का इस्तेमाल तमाम सत्ताधारी दल करते आए हैं. बस, फर्क इतना था कि विकास दुबे के पास ब्राह्मण का ऐक्स फैक्टर था, जो वंचित तबके से होने के नाते सोहराबुद्दीन शेख और तुलसीराम प्रजापति के पास नहीं था.

पर सवाल उठता है कि जो गैंगस्टर लगातार कई राज्यों की पुलिस को छकाता हुआ उज्जैन के महाकाल मंदिर में सरैंडर करता है, ताकि उस का ऐनकाउंटर न हो सके, वह भला पुलिस कस्टडी से भाग कर अपने ऐनकाउंटर को न्योता क्यों देगा?

पुलिस की ऐनकाउंटर थ्योरी इतनी हास्यास्पद और लचर है कि इस पर रत्तीभर भी यकीन नहीं किया जा सकता. उत्तर प्रदेश एसटीएफ गाड़ी पलटने की बात कह रही है. गाड़ी पलटने पर बुरी तरह घायल आदमी कैसे भाग सकता है? लेकिन पुलिस की थ्योरी है तो कुछ भी हो सकता है.

पुलिस कह रही है कि गाड़ी पलटी और वही गाड़ी पलटी, जिस में गैंगस्टर विकास दुबे बैठा हुआ था. गाड़ी पलटने के बाद बुरी तरह जख्मी गैंगस्टर ने पुलिस की रिवाल्वर छीन कर भागने की कोशिश की, सरैंडर करने के लिए कहने पर पुलिस पर फायरिंग की और जवाबी कार्यवाही में मारा गया. पुलिस के मुताबिक गोली उस के पेट में लगी थी.

लेकिन, किसी भागते आदमी के पेट में गोली कैसे लग सकती है? वहीं, उत्तर प्रदेश पुलिस कह रही है तो हो भी सकता है. सवाल तो यह भी उठ रहा है कि गिरफ्तार करने के बाद पुलिस ने इतने शातिर अपराधी को हथकड़ी क्यों नहीं पहनाई थी?

गाड़ी का भी गजब कनैक्शन था. फरीदाबाद से गिरफ्तार गैंगस्टर विकास दुबे के गुरगे प्रभात मिश्रा का ऐनकाउंटर जब उत्तर प्रदेश एसटीएफ ने किया था, तब भी पुलिस की गाड़ी पंचर हो गई थी और जब पुलिस ने गैंगस्टर विकास दुबे का ऐनकाउंटर किया तो ऐनकाउंटर से पहले उस की गाड़ी पलट गई. उत्तर प्रदेश पुलिस की यह कहानी हिंदी फिल्मों से नकल कर के गढ़ी गई लगती है.

विकास दुबे की गिरफ्तारी के बाद से ही समाज के कई तबकों में नाखुशी थी. लोगों को ‘इंसाफ’ नहीं ‘बदला’ चाहिए था. ऐनकाउंटर का बदला ऐनकाउंटर. और सोशल मीडिया पर लगातार इस को ले कर लिखा जा रहा था.

इस से पहले हैदराबाद में पशु डाक्टर के साथ गैंगरेप के तथाकथित 4 आरोपियों को पुलिस ने क्राइम सीन क्रिएट करने के दौरान ही नकली ऐनकाउंटर में मार डाला था और सोशल मीडिया पर उस ऐनकाउंटर के समर्थन में साधारण जन से ले कर बुद्धिजीवी लोग तक न सिर्फ खड़े थे, बल्कि इस के लिए पुलिस की पीठ थपथपा रहे थे.

यह सीधेसीधे न्याय व्यवस्था का नकारापन है. हो सकता है, न्याय व्यवस्था में कुछ खामियां हों, लेकिन भ्रष्टाचारी पुलिस तंत्र द्वारा ऐनकाउंटर में हत्या करने को तो सही नहीं ठहराया जा सकता है न.

ये वही पुलिस वाले थे, जिन की आंखों के सामने गैंगस्टर विकास दुबे ने साल 2001 में राज्यमंत्री संतोष शुक्ला की हत्या की थी और सभी पुलिस वाले कोर्ट में बयान से मुकर गए थे.

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ये वही पुलिस वाले थे, जो 2 जुलाई को 8 पुलिस वालों द्वारा गैंगस्टर के हाथों ऐनकाउंटर कराने के लिए विकास दुबे के मुखबिर बने हुए थे.

ये वही पुलिस वाले थे, जिन्होंने पावर हाउस फोन कर के बिठूर गांव और आसपास के इलाके की लाइट कटवाई थी.

इन पुलिस वालों ने अपराधी विकास दुबे का ऐनकाउंटर नहीं, बल्कि न्याय व्यवस्था और सच का ऐनकाउंटर किया है.

सुबह साढ़े 6 बजे ‘आज तक’ चैनल बताता है कि विकास दुबे कानपुर के पास टोल तक पहुंच गया है, साथ ही ‘आज तक’ ने यह भी बताया कि यहां पर मीडिया वालों की गाडि़यां रोक दी गई हैं. इस के बावजूद ‘आज तक’ की गाड़ी आगे निकली.

विकास दुबे वाली गाड़ी ने उसे ओवरटेक किया. उस के एक घंटे बाद खबर आई कि आगे विकास की गाड़ी पलट गई. स्पीड से चलती गाड़ी ने एक ही पलटा खाया. उस में सवार पुलिस वालों और विकास ने थोड़ीबहुत चोट खाई और डेढ़ घंटे बाद फिर खबर आई कि विकास पुलिस वालों का हथियार छीन कर भागा. ऐसे में जो होता है, वही हुआ. विकास मारा गया.

विकास दुबे मामले में सुप्रीम कोर्ट में एक वकील घनश्याम उपाध्याय ने याचिका दायर की है. उस में कहा गया है कि मीडिया रिपोर्ट से लग रहा है कि विकास दुबे ने महाकाल मंदिर में गार्ड को खुद ही जानकारी दी.

मध्य प्रदेश पुलिस को विकास दूबे ने खुद ही गिरफ्तारी दी, ताकि मुठभेड़ से बच सके. याचिका में आशंका जताई गई थी कि उत्तर प्रदेश पुलिस विकास का ऐनकाउंटर कर सकती है.

याचिका में मामले की जांच सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में सीबीआई से कराने की मांग की गई है. इस में कहा गया है कि  विकास दुबे का घर, शौपिंग माल व गाडि़यां तोड़ने पर उत्तर प्रदेश पुलिस के खिलाफ एफआईआर दर्ज हो. मामले की जांच के लिए समय सीमा तय की जाए. यह तय किया जाए कि पुलिस विकास दुबे का ऐनकाउंटर न कर सके और उस की जान बचाई जा सके.

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