घर में दफ्न 4 लाशें

घर में दफ्न 4 लाशें : भाग 3

नरेंद्र ने विजय के सामने ससुर की सारी संपत्ति की पोल खोल दी, जिस से उस के मन में भी लालच पैदा हो गया. नरेंद्र के इशारे पर उस ने हीरालाल की मंझली बेटी पार्वती पर निगाहें गड़ा दीं. लेकिन पार्वती समझदार थी. विजय के लाख कोशिश करने के बाद भी वह उस के प्रेम जाल में नहीं फंसी. यह बात नरेंद्र को पता चली तो उस के मन में हीरालाल की पूरी संपत्ति हड़पने का लालच आ गया.

संपत्ति के लालच में वह ससुर के साथसाथ बाकी लोगों को भी मौत के घाट उतारने के लिए षडयंत्र रचने लगा. लेकिन वह अपनी योजना में सफल नहीं हो पा रहा था. उसे पता लग गया था कि विजय पार्वती को पटाने में असफल रहा. इस पर उस ने विजय से कहा कि पार्वती ने यह बात अपने पापा को बता दी तो वह मोहल्ले में नहीं रह पाएगा.

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नरेंद्र की बात सुन विजय घबरा गया. इस के बाद विजय नरेंद्र की हां में हां मिलाने लगा. अपना अगला दांव चलते हुए नरेंद्र अपने घर पर विजय की दावत करने लगा. खातेपीते एक दिन नरेंद्र ने लालच दे कर विजय को अपनी योजना बता दी.

नरेंद्र ने विजय के साथ मिल कर 17 अप्रैल, 2019 को अपने ससुराल वालों की हत्या की योजना को अंतिम रूप दे दिया. योजना बन गई तो नरेंद्र बीवीबच्चों को अपने फूफा के घर देवरनियां, बरेली में छोड़ आया ताकि उन्हें उस की साजिश का पता न चल सके.

बीवीबच्चों को बरेली भेजने के बाद नरेंद्र अपनी योजना को अंजाम देने के लिए मौके की तलाश में लग गया. लेकिन उसे मौका नहीं मिल पा रहा था. नरेंद्र और विजय को यह भी डर था कि अगर किसी वजह से वह इस योजना में फेल हो गए तो न घर के रहेंगे न घाट के.

नरेंद्र को पता था कि उस की सास सुबहसुबह दूध लेने जाती है. उस वक्त ससुर और दोनों सालियां सोई रहती हैं. घर का गेट खुला रहता है. पड़ोसी भी सोए होते हैं. घटना को अंजाम देने के लिए नरेंद्र को यह समय ठीक लगा.

20 अप्रैल, 2019 को नरेंद्र गंगवार और विजय गंगवार सुबह जल्दी उठ गए और हेमवती के जाने का इंतजार करने लगे. उस दिन हेमवती सुबह के साढ़े 5 बजे बेटी पार्वती को साथ ले कर दूध लेने के लिए निकली. उन के घर से निकलते ही नरेंद्र विजय को साथ ले कर हीरालाल के घर में घुस गया.

लेकिन तब तक हीरालाल सो कर उठ चुके थे. सुबहसुबह उन दोनों को अपने घर में देख हीरालाल ने आने का कारण पूछा तो नरेंद्र ने कहा कि आज मैं आखिरी बार आप से पूछने आया हूं कि मेरे हिस्से की संपत्ति मुझे देते हो या नहीं.

सुबहसुबह दामाद के मुंह से ऐसी बात सुन कर हीरालाल का पारा चढ़ गया. दोनों के बीच विवाद बढ़ा तो योजनानुसार नरेंद्र ने वहीं रखी लकड़ी की फंटी से पीटपीट कर हीरालाल की हत्या कर दी. पिता के चीखने की आवाज सुन कर बेटी दुर्गा उन के बचाव में आई तो दोनों ने उसे भी फंटी से पीटपीट कर मार डाला.

दोनों को मौत की नींद सुलाने के बाद नरेंद्र और विजय हेमवती और पार्वती के आने का इंतजार करने लगे. जैसे ही उन दोनों ने घर में प्रवेश किया, दरवाजे के पीछे खड़े नरेंद्र और विजय ने उन्हें भी पीटपीट कर मार डाला.

सासससुर और दोनों सालियों की हत्या करने के बाद नरेंद्र और विजय ने चारों को घसीट कर एक कमरे में ले जा कर डाल दिया. कहीं कोई जिंदा तो नहीं रह गया, जानने के लिए दोनों ने एकएक कर सब की नब्ज चैक की.

जब उन्हें पूरा यकीन हो गया कि चारों की मौत हो चुकी है, तो दोनों ने मकान में फैले खून को धो कर साफ किया और घर के बाहर ताला डाल कर घर लौट आए. नरेंद्र और विजय ने चारों की हत्या तो कर दी, लेकिन समस्या थी लाशों को ठिकाने लगाने की. नरेंद्र जानता था कि लाशों को घर से बाहर ले जाना खतरे से खाली नहीं है.

सोचविचार कर दोनों ने तय किया कि बाजार से प्लास्टिक बैग ला कर लाशों को उस में लपेटा जाए और घर में गड्ढा खोद कर दफना दिया जाए. संभावना थी कि पौलीथिन में लिपटी होने से लाशों के सड़ने की बदबू बाहर नहीं आ पाएगी.

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20 अप्रैल, 2019 को ही नरेंद्र बाजार से पौलीथिन खरीद कर लाया. उसी रात दोनों ने हीरालाल के मकान में जा कर चारों लाशों को पैक कर दिया. अगले दिन 21 अप्रैल, 2019 को सुबह नरेंद्र विजय को साथ ले कर ससुर के घर गया. फिर अपनी योजना के मुताबिक दोनों ने जीने के नीचे गड्ढा खोदना शुरू किया.

कुछ पड़ोसियों ने नरेंद्र से हीरालाल के घर में अचानक काम कराने के बारे में पूछा तो नरेंद्र ने कहा कि ससुर मकान बेच कर कहीं दूसरी जगह चले गए. घर में रिपेयरिंग का काम चल रहा है. वैसे उस मोहल्ले में नरेंद्र से कोई ज्यादा मतलब नहीं रखता था.

नरेंद्र ने विजय के साथ मिल कर लगभग 6 घंटे में गहरा गड्ढा खोदा. उस के बाद दोनों ने प्लास्टिक की शीट में पैक चारों लाशें गड्ढे में डाल दीं. लाशों को गड्ढे में दफन कर दोनों ने वहां पर पक्का फर्श बना दिया. नरेंद्र ने हीरालाल के घर के मुख्य दरवाजे पर ताला डाल दिया.

हीरालाल के घर पर अचानक ताला पड़ा देख लोगों को हैरत जरूर हुई. किसी की समझ में नहीं आ रहा था कि हीरालाल रात ही रात में अपने परिवार को ले कर अचानक कहां गायब हो गए. लेकिन नरेंद्र से किसी ने भी पूछने की हिम्मत नहीं की थी.

अपने सासससुर और सालियों को ठिकाने लगा कर नरेंद्र अपने बीवीबच्चों को भी घर ले आया. घर आते ही लीलावती की नजर पिता के मकान की ओर गई, जहां पर ताला पड़ा था. लीलावती ने नरेंद्र से उन के बारे में पूछा, तो उस ने बताया कि उस के पिता अपना मकान बेच कर हल्द्वानी चले गए हैं. उन्होंने वहां पर अपना प्रौपर्टी का काम शुरू कर दिया है.

यह सुन कर लीलावती चुप हो गई. मातापिता के बारे में नरेंद्र से ज्यादा पूछने की हिम्मत उस में नहीं थी. अगर नरेंद्र संपत्ति हड़पने के लिए मृत्यु प्रमाण पत्र बनवाने में जल्दबाजी न करता तो यह राज शायद राज ही बन कर रह जाता.

इस केस के खुलते ही पुलिस ने आरोपी नरेंद्र गंगवार और विजय गंगवार को भादंवि की धारा 302/201/120बी के तहत गिरफ्तार कर कोर्ट में पेश किया, जहां से दोनों को जेल भेज दिया था.

चारों शव पोस्टमार्टम के बाद पुलिस ने उन के रिश्तेदार दुर्गा प्रसाद को सौंप दिए. उन का दाह संस्कार बरेली के गांव पैगानगरी के पास भाखड़ा नदी किनारे किया गया.

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नरेंद्र गंगवार इतना शातिर दिमाग इंसान था कि इस केस में उस ने दुर्गा प्रसाद को भी फंसाने की कोशिश की. लेकिन सच्चाई सामने आते ही पुलिस ने उन्हें छोड़ दिया. हालांकि इस केस की रिपोर्ट दुर्गा प्रसाद की ओर से ही दर्ज कराई गई थी. पुलिस ने लीलावती से पूछताछ करने के बाद उसे छोड़ दिया. वह नरेंद्र के फूफा के साथ बहेड़ी चली गई थी.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

घर में दफ्न 4 लाशें : भाग 2

हीरालाल जिला बरेली के गांव पैगानगरी के रहने वाले थे. उन का परिवार सुखीसंपन्न था. गांव में उन की करीब 60 बीघा जुतासे की जमीन थी. उन की 3 बेटियां थीं.

लीलावती उर्फ लवली, पार्वती और सब से छोटी दुर्गा. पत्नी हेमवती सहित घर में कुल 5 सदस्य थे. हीरालाल की एक ही परेशानी थी कि उन का कोई बेटा नहीं था.

हीरालाल ने बेटे की चाह में काफी हाथपांव मारे. वह कई डाक्टरों और तांत्रिकों से मिले, लेकिन उन की बेटा पाने की इच्छा पूरी न हो सकी.

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अंतत: उन्होंने अपना पूरा ध्यान बेटियों की परवरिश में लगा दिया. बेटियां समझदार हुईं तो हीरालाल ने सोचा कि उन्हें अच्छी शिक्षा दिलानी चाहिए. लेकिन गांव में रहते यह संभव नहीं था.

सोचविचार के बाद हीरालाल ने सन 2007 में अपनी खेती की जमीन में से 44 बीघा जमीन बेच दी. उस पैसे को ले कर वह अपने परिवार के साथ रुद्रपुर की राजा कालोनी में आ बसे. वहीं उन्होेंने अपना मकान बना लिया.

रुद्रपुर आ कर हीरालाल ने अच्छी शिक्षा दिलाने के लिए तीनों बेटियों का अच्छे स्कूल में दाखिला करा दिया था.

बेटियों की तरफ से निश्चिंत हो कर हीरालाल ने बाकी बचे पैसों से प्रौपर्टी डीलिंग का काम शुरू कर दिया. जमीन के पैसों से उन्होंने घर के आसपास कई प्लौट खरीद कर डाल दिए. उसी दौरान हीरालाल की मुलाकात नरेंद्र गंगवार से हुई.

नरेंद्र रामपुर जिले के गांव खेड़ासराय का रहने वाला था. वह उसी मोहल्ले में किराए के मकान में रहता था और सिडकुल की एक फैक्ट्री में काम करता था. उस ने हीरालाल से एक प्लौट खरीदने की इच्छा जाहिर की.

हीरालाल ने उसे अपने घर के सामने पड़ा प्लौट दिखाया तो वह नरेंद्र को पसंद आ गया. नरेंद्र ने वह प्लौट खरीद लिया. प्लौट लेने के बाद नरेंद्र की हीरालाल से जानपहचान हो गई. वह उन के संपर्क में रहने लगा. इसी बहाने वह हीरालाल के घर भी आनेजाने लगा.

इसी बीच नरेंद्र की नजर हीरालाल के बड़ी बेटी लीलावती पर पड़ी. लीला देखनेभालने में सुंदर थी और उस समय पढ़ रही थी. वह जब भी हीरालाल के घर जाता तो उस की निगाहें लीला पर टिकी रहती थीं.

लीला नरेंद्र के बारे में पहले ही सब कुछ जान चुकी थी. जब उस ने नरेंद्र को अपनी ओर आकर्षित होते देखा तो उस के दिल में भी चाहत पैदा हो गई. जल्दी ही दोनों प्रेम की राह पर चल निकले.

लीला स्कूल जाती तो नरेंद्र घंटों उस की राह तकता रहता. उस के स्कूल जाने का फायदा उठा कर वह घर के बाहर ही मिलने लगा. प्रेम बेल फलीफूली तो मोहल्ले वालों की नजरों में किरकरी बन कर चुभने लगी.

दोनों की प्रेम कहानी हीरालाल के सामने जा पहुंची तो बेटी की करतूत सुन कर उन्हें बहुत दुख हुआ. हीरालाल ने लीला को समझाया और नरेंद्र के घर आने पर पाबंदी लगा दी. लेकिन मोबाइल फोन के होते नरेंद्र और लीला के मिलने में किसी तरह की अड़चन नहीं आई. दोनों चोरीछिपे मिलते रहे.

प्रेम कहानी के चलते लीला ने सन 2008 में घर वालों को बिना बताए नरेंद्र से लव मैरिज कर ली. नरेंद्र के साथ शादी करने के बाद लीला उस के साथ किराए के मकान में रहने लगी.

बेटी की इस करतूत से हीरालाल और उन की पत्नी हेमवती दोनों को ही आघात पहुंचा था. उन्होंने बेटी लीला से संबंध खत्म कर दिए.

लेकिन हेमवती मां थी. बच्चों के लिए मां का दिल कोमल होता है. लीलावती ने नरेंद्र से शादी कर भले ही अपनी दुनिया बसा ली थी, लेकिन मां होने के नाते हेमवती उस के लिए परेशान रहने लगी थी. जब उस से बेटी के बिना नहीं रहा गया तो वह पति को बिना बताए उस से मिलने लगी.

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जब कभी वह घर में कुछ अच्छा बनाती, तो चुपके से लीला को दे आती थी. साथ ही वह उस की आर्थिक मदद भी करने लगी थी. यह बात हीरालाल को भी पता चल गई थी. शुरूशुरू में तो इस बात को ले कर मियांबीवी में विवाद होने लगा. लेकिन हीरालाल भी दिल के कमजोर थे. बेटी की परेशानी को देखते हुए उन का दिल भी पसीज गया.

शादी के कुछ समय बाद ही हीरालाल ने नरेंद्र को अपने दामाद के रूप में स्वीकार कर लिया. हीरालाल और हेमवती दोनों को अपने घर ले आए. इस के बाद नरेंद्र और लीला हीरालाल के मकान में रहने लगे.

उसी दौरान नरेंद्र कई बार हीरालाल के साथ उन के गांव पैगानगरी भी गया था. गांव में हीरालाल का मकान था. साथ ही उन की 16 बीघा जमीन भी थी, जिसे उन्होंने बंटाई पर दे रखा था. उस जमीन से उन्हें हर साल इतना रुपया मिल जाता था कि उन के परिवार की जरूरतें पूरी हो जाती थीं, प्रौपर्टी खरीदबेच कर जो कमाते थे वह अलग था.

ससुर के साथ रहते हुए नरेंद्र उन की एकएक बात अपने दिमाग में बैठा लेता था. मातापिता के घर पर रहते हुए लीलावती 2 बेटियों और 2 बेटों की मां बनी.

हीरालाल के घर पर रहते हुए नरेंद्र नौकरी के साथसाथ उन के काम में भी हाथ बंटाने लगा था. हालांकि नरेंद्र के चारों बच्चों का खर्च हीरालाल ही उठाते थे. इस के बावजूद वह अपने खर्च के लिए हीरालाल से पैसे ऐंठता रहता था.

अभी हीरालाल की 2 बेटियां शादी के लिए बाकी थीं. वह चाहते थे कि दोनों बेटियां बड़ी की तरह कोई कदम न उठाएं. यही सोच कर वह टाइम से उन की शादी कर देना चाहते थे.

लेकिन जब से नरेंद्र दामाद बन कर घर में आया था, सालियों को फूटी आंख नहीं देखना चाहता था. वह तेजतर्रार और चालाक था. लीला से शादी कर के उस की निगाह हीरालाल की संपत्ति पर जम गई थी.

उसी दौरान उस ने हीरालाल पर दबाव बनाना शुरू किया कि उस के हिस्से की संपत्ति उस के नाम करा दें. लेकिन हीरालाल ने साफ कह दिया कि जब तक दोनों बेटियां विदा नहीं हो जातीं, वह अपनी संपत्ति का बंटवारा नहीं करेंगे.

हीरालाल जब नरेंद्र की हरकतों से परेशान हो गए तो उन्होंने नरेंद्र के प्लौट पर मकान बनवा दिया. इस के बाद नरेंद्र अपने बीवीबच्चों को साथ ले कर नए मकान में चला गया.

हीरालाल ने सोचा था कि नरेंद्र अपने घर जाने के बाद सुधर जाएगा. लेकिन घर आमनेसामने होने की वजह से उस के बीवीबच्चे तो हीरालाल के घर पर पड़े ही रहते थे, वह भी आ कर बदतमीजी पर उतर आता था. लेकिन ससुर होने के नाते हीरालाल सब कुछ सहन करते रहे.

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उसी दौरान नरेंद्र ने अपने मकान में विजय नाम का एक किराएदार रख लिया. विजय गंगवार जिला बरेली के गांव दमखोदा का रहने वाला था. नरेंद्र विजय गंगवार से पहले से ही परिचित था. सो दोनों में खूब पटने लगी. विजय गंगवार कुंवारा था.

जानें आगे क्या हुआ अगले भाग में…

घर में दफ्न 4 लाशें : भाग 1

25 अगस्त, 2020 को नरेंद्र गंगवार अपने ससुर हीरालाल के पैतृक गांव पैगानगरी पहुंचा. यह गांव बरेली जिले की तहसील मीरगंज में आता है. गांव के दुर्गाप्रसाद नरेंद्र को जानते थे, इसलिए वह उन्हीं से मिला. नरेंद्र के ससुर हीरालाल दुर्गाप्रसाद के नाना थे.

पैगानगरी में हीरालाल की 16 बीघा जमीन थी जो उन्होंने बटाई पर दे रखी थी. वह खेती की पैदावार का हिस्सा लेने गांव आते रहते थे. नरेंद्र बटाई का हिस्सा लेने आया था. साथ ही उसे इस से भी बड़ा एक और काम था. दुर्गा प्रसाद नरेंद्र को जानते थे. वह कई बार अपने ससुर के साथ गांव आया था.

इस पर नरेंद्र ने कहा, ‘‘दुर्गा प्रसादजी, बहुत दुखद खबर है. आप के नाना हीरालालजी अब इस दुनिया में नहीं रहे. 22 अप्रैल, 2020 को हीरालालजी और उन की मंझली बेटी दुर्गा ने जहर खा कर आत्महत्या कर ली थी. लौकडाउन के चलते हम किसी को उन की मृत्यु की खबर नहीं दे पाए.

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कोरोना महामारी के चलते मैं ने अपनी बीवी लीलावती, किराएदार विजय व अन्य लोगों के सहयोग से उन का दाहसंस्कार करा दिया था.

बाद में पति के वियोग में उन की पत्नी हेमवती भी बेटी पार्वती को ले कर कहीं चली गईं. मैं ने और लीलावती ने उन्हें सब जगह ढूंढा, लेकिन उन का कहीं पता न चल सका.’’

हीरालाल की मृत्यु की खबर सुन कर दुर्गा प्रसाद को झटका लगा.

दुर्गाप्रसाद के पास गांव के कई लोग बैठे थे. यह खबर सुन कर सब हैरत में रह गए. उन्हें विश्वास नहीं हो रहा था कि जो इंसान अपनी औलादों के सुनहरे भविष्य के लिए गांव छोड़ शहर जा बसा था, वह कायरों की तरह आत्महत्या कर लेगा.

हीरालाल की मृत्यु की खबर सुन कर गांव के लोग तरहतरह की बातें करने लगे. दुर्गाप्रसाद और गांव वालों की समझ में यह बात नहीं आ रही थी कि जब पति और बेटी खत्म हो गई तो हेमवती को छोटी बेटी को ले कर कहीं जाने की क्या जरूरत थी? गांव में उस के पति की 16 बीघा जमीन थी, जिस के सहारे आराम से दोनों की जिंदगी चल जाती. गांव में उन का अपना मकान भी था.

नरेंद्र ने अपने आने का मकसद बताते हुए कहा, ‘‘ससुर के घर के पास ही मेरा भी मकान है. उन के मकान पर एकमात्र बची उन की बेटी लीलावती का मालिकाना हक है. मैं उस मकान को लीलावती के नाम कराना चाहता हूं, लेकिन इस के लिए मुझे हीरालालजी के मृत्यु प्रमाण पत्र की जरूरत है. आप लोग उन के परिवार के लोग हो, आप यह काम करा सकते हैं.’’

नरेंद्र की बात सुन कर दुर्गा प्रसाद का दिमाग घूम गया. उन्हें नरेंद्र की बात में कुछ झोल नजर आया. दुर्गा प्रसाद ने उसी समय हीरालाल के बटाईदार कुंवर सैन के घर जा कर उन्हें सारी बात बताई और नरेंद्र की बातों पर शक जाहिर किया.

कुंवर सैन ने उसे बटाई का हिस्सा देने से साफ मना कर दिया. साथ ही दुर्गा प्रसाद ने लिखित में कुछ देने से भी इनकार कर दिया. नरेंद्र खाली हाथ लौट गया.

नरेंद्र की बातों पर शक हुआ तो दुर्गा प्रसाद हीरालाल के बटाईदार कुंवर सैन को साथ ले कर 27 अगस्त, 2020 को उन की मौत की सच्चाई जानने के लिए रुद्रपुरट्रांजिट कैंप पहुंचे. वहां हीरालाल के घर पर ताला लगा मिला.

उन्होंने पड़ोसियों से उन के बारे में जानकारी लेनी चाही तो पता चला कि हीरालाल के घर पर पिछले 15 महीने से ताला लटका हुआ है. इस दौरान उन्होंने कभी भी हीरालाल और उन के परिवार वालों को आतेजाते नहीं देखा.

यह जान कर दुर्गा प्रसाद और कुंवर सैन को हैरानी हुई, क्योंकि नरेंद्र ने उन्हें बताया था कि हीरालाल ने जहर खा कर आत्महत्या कर ली थी. लेकिन उस के पड़ोसियों को इस की जानकारी नहीं थी.

नरेंद्र का झूठ सामने आया तो दुर्गा प्रसाद और कुंवर सैन समझ गए कि हीरालाल की संपत्ति हड़पने की मंशा के चलते नरेंद्र ने ही कोई चक्रव्यूह रच कर उन्हें मौत के घाट उतार दिया होगा.

हीरालाल के परिवार के साथ किसी अनहोनी की आशंका को देखते हुए दुर्गा प्रसाद और कुंवर सैन उसी दिन ट्रांजिट कैंप थाने पहुंच गए. उन्होंने यह बात थानाप्रभारी ललित मोहन जोशी को बताई.

मामला एक ही परिवार के 4 लोगों के लापता होने का था, इसलिए जोशीजी ने इसे गंभीरता से लिया. दुर्गाप्रसाद और कुंवर सैन से जरूरी जानकारी ले कर जोशी ने उन्हें घर भेज दिया. फिर थानाप्रभारी जोशी ने इस मामले की सच्चाई जानने के लिए गुप्तरूप से जांचपड़ताल करानी शुरू की. सादे कपड़ों में जा कर उन्होंने नरेंद्र गंगवार को कब्जे में लिया, ताकि वह फरार न हो सके.

थानाप्रभारी ललित मोहन जोशी ने नरेंद्र से हीरालाल और उन के परिवार के सदस्यों के बारे में कड़ी पूछताछ की. पूछताछ में नरेंद्र शुरूशुरू में इधरउधर की कहानी गढ़ता रहा. लेकिन जब पुलिस की सख्ती बढ़ी तो उस का धैर्य जवाब दे गया. उस के बाद उस ने अपनी ससुराल वालों की हत्या की बात स्वीकार कर ली. उस ने यह काम अपने किराएदार विजय की मदद से किया था.

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नरेंद्र गंगवार ने बताया कि 20 अप्रैल, 2019 को सुबह साढ़े 5 बजे उस ने विजय के साथ मिल कर सासससुर और 2 सालियों को डंडे से मार कर मौत के घाट उतारा था. फिर गड्ढा खोद कर उन की लाशों को उन्हीं के मकान में दफन कर दिया था.

नरेंद्र द्वारा 4 लोगों की हत्या कर घर में ही दफनाने वाली बात सामने आई तो थानाप्रभारी भी आश्चर्यचकित रह गए. उन्होंने इस की जानकारी अपने उच्चाधिकारियों को दे दी. साथ ही तत्परता दिखाते हुए थानाप्रभारी ने नरेंद्र के सहयोगी उस के किराएदार विजय को अपनी हिरासत में ले लिया.

अधिकारियों ने थाना ट्रांजिट कैंप के साथसाथ थाना पंतनगर, थाना रुद्रपुर और थाना किच्छा से भी पुलिस टीम बुला ली. देखतेदेखते आजादनगर की मुख्य सड़क पुलिस छावनी में तब्दील हो गई.

आजादनगर के आसपास के लोग इतनी पुलिस को देख हैरत में पड़ गए. एसएसपी दिलीप सिंह व आईजी (कुमाऊं) अजय कुमार रौतेला भी घटनास्थल पर पहुंच गए थे.

पुलिस ने नरेंद्र की निशानदेही पर मजिस्ट्रैट की मौजूदगी में 4 मजदूरों को लगा कर खुदाई शुरू कराई. लगभग 2 घंटे बाद पुलिस लाश तक पहुंची. साढ़े 4 फीट की गहराई में एक के ऊपर एक 4 लाशें पड़ी मिलीं, जो प्लास्टिक बैग में पैक थीं.

इस हृदयविदारक दृश्य को देख लोगों के होश उड़ गए. किसी को विश्वास नहीं हो रहा था कि जो उन के सामने है वह सच है. पुलिस ने प्लास्टिक बैग को खोल कर लाशों की जांचपड़ताल की. लाशों को देख कर पुलिस हैरान थी, क्योंकि सभी लाशें अच्छी हालत में थीं.

पुलिस को उम्मीद थी कि 15 महीनों के लंबे अंतराल के दौरान लाशें कंकाल में बदल गई होंगी. लेकिन ऐसा कुछ नहीं था. उसी गड्ढे से पुलिस ने लकड़ी के डंडे के आकार की एक फंटी बरामद की. नरेंद्र ने उसी फंटी से चारों को मारने की बात स्वीकार की.

घटनास्थल पर पहुंची फोरैंसिक टीम ने सैंपल एकत्र किए, जिन्हें जांच के लिए सुरक्षित रख लिया गया.

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पुलिस ने चारों लाशें कब्जे में ले कर पोस्टमार्टम के लिए भेज दीं. मामले की गंभीरता को देखते हुए 4 डाक्टरों के पैनल से लाशों का पोस्टमार्टम कराया गया. साथ ही वीडियोग्राफी भी कराई गई. यह कुमाऊं का पहला ऐसा सनसनीखेज  मामला था, जिस ने पूरे प्रदेश में तहलका मचा दिया था.

जानें आगे क्या हुआ अगले भाग में…

जिंदगी बदगुमां नहीं : जिंदगी भी अजब रंग दिखाती है

मैं अपने पड़ोसी से प्यार करती हूं और हमारे बीच कई बार सेक्स भी हो चुका है, मैं क्या करूं?

सवाल-

मैं 19 साल की हूं और अपने पड़ोस के एक 25 साल के लड़के से प्यार करती हूं. हमारे बीच कई बार जिस्मानी रिश्ता बन चुका है. पर पिछले कुछ दिनों से वह लड़का मुझे कई बार दूसरी लड़की के साथ दिखाई दिया है, जो बड़ी चालू किस्म की है.

मैं जब लड़के को टोकती हूं तो वह कहता है कि वे दोनों बस अच्छे दोस्त हैं. कहीं वह लड़का मेरा फायदा तो नहीं उठा रहा है?

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जवाब-

उस लड़के ने आप की मरजी के बगैर तो संबंध नहीं बनाए न? जो भी हुआ, दोनों की रजामंदी से हुआ. फिर अब उस की दूसरी लड़की से दोस्ती पर आप तिलमिला क्यों रही हैं?

आजकल के प्यार में अकसर ऐसा ही होता है कि आशिक और माशूका शादी समेत दूसरे बड़े-बड़े वादे करते हैं, लेकिन जिस्मानी संबंध लगातार बनने के बाद उन्हें सब फुजूल लगने लगता है.

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आप उस लड़के से दोटूक बात करें. अगर वह आप से शादी के लिए राजी हो तो ठीक, नहीं तो आप अपने करियर पर ध्यान देते हुए उसे भूल जाएं.

सेक्स या मुहब्बत

सच्चे प्रेम से खिलवाड़ करना किसी बड़े अपराध से कम नहीं है. प्रेम मनुष्य को अपने अस्तित्व का वास्तविक बोध करवाता है. प्रेम की शक्ति इंसान में उत्साह पैदा करती है. प्रेमरस में डूबी प्रार्थना ही मनुष्य को मानवता के निकट लाती है.

मुहब्बत के अस्तित्व पर सेक्स का कब्जा

आज प्रेम के मानदंड तेजी से बदल रहे हैं. त्याग, बलिदान, निश्छलता और आदर्श में खुलेआम सेक्स शामिल हो गया है. प्रेम की आड़ में धोखा दिए जाने वाले उदाहरणों की शृंखला छोटी नहीं है और शायद इसी की जिम्मेदारी बदलते सामाजिक मूल्यों और देरी से विवाह, सच को स्वीकारने पर डाली जा सकती है. प्रेम को यथार्थ पर आंका जा रहा है. शायद इसी कारण प्रेम का कोरा भावपक्ष अस्त हो रहा है यानी प्रेम की नदी सूख रही है और सेक्स की चाहत से जलराशि बढ़ रही है.

विकृत मानसिकता व संस्कृति

आज के मल्टी चैनल युग में टीवी और फिल्मों ने जानकारी नहीं मनोरंजन ही परोसा है. समाज द्वारा किसी भी रूप में भावनाओं का आदर नहीं किया जाता. प्रेम का मधुर एहसास तो कुछ सप्ताह तक चलता है. अब तन के उपभोग की अपेक्षा है.

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क्षणिक होता मुहब्बत का जज्बा

प्रेम अब सड़क, टाकीज, रेस्तरां और बागबगीचों का चटपटा मसाला बन गया है. वर्तमान प्रेम क्षणिक हो चला है, वह क्षणभर दिल में तूफान ला देता है और अगले ही पल बिलकुल खामोश हो जाता है. युवा आज इसी क्षणभर के प्रेम की प्रथा में जी रहे हैं. एक शोध के अनुसार, 86% युवाओं की महिला मित्र हैं, 92% युवक ब्लू फिल्म देखते हैं, तो 62% युवक और 38% युवतियों ने विवाहपूर्व शारीरिक संबंध स्थापित किए हैं.

यही है मुहब्बत की हकीकत

एक नई तहजीब भी इन युवाओं में गहराई से पैठ कर रही है, वह है डेटिंग यानी युवकयुवतियों का एकांत मिलन. शोध के अनुसार, 93% युवकयुवतियों ने डेटिंग करना स्वीकार किया. इन में से एक बड़ा वर्ग डेटिंग के समय स्पर्श, चुंबन या सहवास करता है. इस शोध का गौरतलब तथ्य यह है कि अधिकांश युवक विवाहपूर्व यौन संबंधों के लिए अपनी मंगेतर को नहीं बल्कि किसी अन्य युवती को चुनते हैं. पहले इस आयु के युवाओं को विवाह बंधन में बांध दिया जाता था और समय आने तक जोड़ा दोचार बच्चों का पिता बन चुका होता था.

अमीरी की चकाचौंध में मदहोश प्रेमी

मृदुला और मनमोहन का प्रेम कालेज में चर्चा का विषय था. दोनों हर जगह हमेशा साथसाथ ही दिखाई देते थे. मनमोहन की आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी नहीं थी. वह मध्यवर्गीय परिवार से था, लेकिन मृदुला के सामने खुद को थोड़ा बढ़ाचढ़ा कर दिखाने की कोशिश में रहता था. वह मृदुला को अपने दोस्त की अमीरी और वैभव द्वारा प्रभावित करना चाहता था. दूसरी ओर आदेश पर भी अपना रोब गांठना चाहता था कि धनदौलत न होने पर भी वह अपने व्यक्तित्व की बदौलत किसी खूबसूरत युवती से दोस्ती कर सकता है. लेकिन घटनाचक्र ने ऐसा पलटा खाया कि जिस की मनमोहन ने सपने में भी कल्पना नहीं की थी. उस की तुलना में अत्यंत साधारण चेहरेमुहरे वाला आदेश अपनी अमीरी की चकाचौंध से मृदुला के प्यार को लूट कर चला गया.

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मनमोहन ने जब कुछ दिन बाद अपनी आंखों से मृदुला को आदेश के साथ उस की गाड़ी से जाते देखा तो वह सोच में पड़ गया कि क्या यह वही मृदुला है, जो कभी उस की परछाईं बन उस के साथ चलती थी. उसे अपनी बचकानी हरकत पर भी गुस्सा आ रहा था कि उस ने मृदुला और आदेश को क्यों मिलवाया. कालेज में मनमोहन की मित्रमंडली के फिकरों ने उस की कुंठा और भी बढ़ा दी.

प्रेम संबंधों में पैसे का महत्त्व

प्रेम संबंधों के बीच पैसे की महत्ता होती है. दोस्ती का हाथ बढ़ाने से पहले युवक की आर्थिक स्थिति को ध्यान में रख कर निर्णय लेना चाहिए. प्रेमी का यह भय सही है कि यदि वह अपनी प्रेमिका को महंगे उपहार नहीं देगा तो वह उसे छोड़ कर चली जाएगी. कोई भी युवती अपने प्रेमी को ठुकरा कर एक ऐसा नया रिश्ता स्थापित कर सकती है, जिस का आधार स्वाभाविक प्यार न हो कर केवल घूमनेफिरने और मौजमस्ती करने की चाह हो. युवकों को पैसे के अनुभव के बावजूद अपनी प्रेमिकाओं और महिला मित्रों को प्रभावित करने के लिए हैसियत से ज्यादा खर्च करना होगा.

प्रेम में पैसे का प्रदर्शन, बचकानी हरकत

छात्रा अरुणा का विचार है कि अधिकतर युवक इस गलतफहमी का शिकार होते हैं कि पैसे से युवती को आकर्षित किया जा सकता है. यही कारण है कि ये लोग कमीज के बटन खोल कर अपनी सोने की चेन का प्रदर्शन करते हैं. सड़कों, पान की दुकानों या गलियों में खड़े हो कर मोबाइल पर ऊंची आवाज में बात करते हैं या गाड़ी में स्टीरियो इतना तेज बजाते हैं कि राह चलते लोग उन्हें देखें.

हैसियत की झूठी तसवीर पेश करना घातक

अरुणा कहती है कि कुछ लोग प्रेमिका से आर्थिक स्थिति छिपाते हैं तथा अपनी आमदनी, वास्तविक आय से अधिक दिखाने के लिए अनेक हथकंडे अपनाते हैं. इसी संबंध में उन्होंने अपने एक रिश्तेदार का जिक्र किया जो एक निजी कंपनी में नौकरी करते थे. विवाह के तुरंत बाद उन्होंने पत्नी को टैक्सी में घुमाने, उस के लिए ज्वैलरी खरीदने तथा उसे खुश रखने के लिए इस कदर पैसा उड़ाया कि वे कर्ज में डूब गए.

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कर्ज चुकाने के लिए जब उन्होंने कंपनी से पैसे का गबन किया तो फिर पकड़े गए. परिणामस्वरूप अच्छीखासी नौकरी चली गई. इतना ही नहीं, पत्नी भी उन की ऐसी स्थिति देख कर अपने मायके लौट गई. अगर शुरू से ही वह चादर देख कर पैर फैलाते, तो यह नौबत न आती.

समय के साथ बदलती मान्यताएं

मीनाक्षी भल्ला जो एक निजी कंपनी में कार्यरत हैं, का कहना है कि प्यार में प्रेमीप्रेमिका दोनों ही जहां एकदूसरे के लिए कुछ भी कर गुजरने की भावना रखते हैं, वहीं अपने साथी से कुछ अपेक्षाएं भी रखते हैं.

व्यापार बनता आज का प्रेम

इस प्रकार के रवैए ने प्यार को एक प्रकार का व्यापार बना दिया है. जितना पैसा लगाओ, उतना लाभ कमाओ. कुछ मित्रों का अनुभव तो यह है कि जो काम प्यार का अभिनय कर के तथा झूठी भावुकता दिखा कर साल भर में भी नहीं होता, वही काम पैसे के दम पर हफ्ते भर में हो सकता है. अगर पैसे वाला न हो तो युवती अपना तन देने को तैयार ही नहीं होती.

नोटों की ऐसी कोई बौछार कब उन के लिए मछली का कांटा बन जाए, पता नहीं चलेगा. ऐसी आजाद खयाल या बिंदास युवतियों का यह दृष्टिकोण कि सच्चे आशिक आज कहां मिलते हैं, इसलिए जो भी युवक मौजमस्ती और घूमनेफिरने का खर्च उठा सके, आराम से बांहों में समय बिताने के लिए जगह का इंतजाम कर सके, उसे अपना प्रेमी बना लो.

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अगर आपकी भी ऐसी ही कोई समस्या है तो हमें इस ईमेल आईडी पर भेजें- submit.rachna@delhipress.biz

सब्जेक्ट में लिखें-  सरस सलिल-व्यक्तिगत समस्याएं/ Personal Problem

मरवाही : भदेस राजनीति की ऐतिहासिक नजीर

राजनीति में कहा जाता है, सब कुछ संभव है .मगर छत्तीसगढ़ के बहुप्रतीक्षित और बहुप्रतिष्ठित “मरवाही उपचुनाव” में सत्तारूढ़ कांग्रेस के मुखिया भूपेश बघेल ने जिस राजनीति का चक्रव्यू बुना है, वैसा शायद इतिहास में कभी नहीं देखा गया . आज हालात यह है कि अमित जोगी का मामला देश के उच्चतम न्यायालय में पहुंच चुका अगर यहां अमित जोगी को किंचित मात्र भी राहत मिल जाती है तो यह मामला देश भर में चर्चा का विषय बनने के साथ मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की कार्यशैली पर भी एक प्रश्नचिन्ह बन कर खड़ा हो सकता है.

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यह शायद छत्तीसगढ़ की राजनीति में अपने आप में एक नजीर बन जाएगा, क्योंकि चुनाव को  भदेस करने का काम आज तलक किसी भी सत्ता प्रतिष्ठान ने नहीं किया था. सनद रहे, मरवाही विधानसभा अनुसूचित जनजाति प्रत्याशी के लिए सुरक्षित है और विधानसभा उप चुनाव इसलिए हो रहा है क्योंकि पूर्व मुख्यमंत्री अजीत प्रमोद कुमार जोगी का देहांत हो चुका है. अजीत जोगी कभी यहां से कांग्रेस से विधायक हुआ करते थे, बाद में जब उन्होंने अपनी पार्टी बनाई तो उन्होंने मरवाही से चुनाव लड़ा और जीता. मगर कभी भी उनके आदिवासी होने पर कम से कम कांग्रेस पार्टी ने  प्रश्नचिन्ह नहीं खड़ा किया था. आज छत्तीसगढ़ की  राजनीति में तलवारें कुछ इस तरह भांजी जा रही है कि  कांग्रेस पार्टी भूल गई है कि अजीत जोगी कभी कांग्रेस में अनुसूचित जनजाति के सर्वोच्च नेता हुआ करते थे.

राजनीतिक मतभेदों के कारण उन्होंने जनता कांग्रेस जोगी का गठन किया और 2018 के चुनाव में ताल ठोकी थी. मगर उनके देहावसान के पश्चात उनके सुपुत्र और जनता कांग्रेस जोगी के अध्यक्ष अमित जोगी ने यहां ताल ठोकी तो कांग्रेस का पसीना निकलने लगा. अमित जोगी ने नाजुक माहौल को महसूस किया और अपनी पत्नी डाक्टर ऋचा ऋचा जोगी का भी यहां से नामांकन दाखिल कराया. मगर राजनीति की एक काली मिसाल यह की अमित जोगी व उनकी धर्मपत्नी ऋचा जोगी दोनों के जाति प्रमाण पत्र और नामांकन खारिज कर दिए गए. और प्रतिकार ऐसा कि जिन लोगों ने अमित जोगी का आशीर्वाद लेकर डमी रूप में फॉर्म भरा था उनका भी चुन चुन करके नामांकन रद्द कर दिया गया ताकि कोई भी जोगी समर्थक निर्दलीय भी चुनाव मैदान में रहे ही नहीं.

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सभी मंत्री और विधायक झोंक दिए !

कभी छत्तीसगढ़ में कांग्रेस पार्टी डॉ रमन सिंह सरकार पर चुनाव के समय सत्ता के दुरुपयोग की तोहमत लगाया करती थी. और यह सच भी हुआ करता था. भाजपा  हरएक चुनाव में पूरी  ताकत लगाकर कांग्रेस पार्टी को हराने का काम करती थी, तब कांग्रेस के छोटे बड़े नेता, भाजपा  पर खूब लांछन लगाते और आज जब कांग्रेस पार्टी स्वयं सत्ता में आ गई है तो मरवाही के प्रतिष्ठा पूर्ण चुनाव में अपने सारे मंत्रियों संसदीय सचिवों, विधायक को चुनाव मैदान में उतार दिया है. स्वयं मुख्यमंत्री भूपेश बघेल चुनाव पर  पल पल की निगाह रखे हुए थे, ऐसे में जनता कांग्रेस जोगी के अध्यक्ष और मरवाही उपचुनाव में प्रत्याशी अमित जोगी रिचा जोगी को जिस तरह चुनाव से बाहर किया गया. वह अपने आप में एक गलत परंपरा बन गई है और यह इंगित कर रही है कि चुनाव किस तरह सत्ता दल के लिए प्रतिष्ठा पूर्व बन जाता है और सत्ता का दुरुपयोग “खुला खेल फर्रुखाबादी” होता है .

भूपेश बघेल का चक्रव्यूह

दरअसल, अजीत जोगी के जाति के मामले को लेकर भारतीय जनता पार्टी के शासनकाल के 15 वर्ष में डॉ रमन सिंह सरकार नहीं कर पाई वह काम चंद दिनों में भूपेश बघेल सरकार ने कर दिखाया. कुछ नए नियम कायदे बनवाकर भूपेश बघेल ने पहले अजीत प्रमोद कुमार जोगी के कंवर जाति प्रमाण पत्र को निरस्त करवाया इस आधार पर अमित जोगी का भी प्रमाण पत्र निरस्त होने की कगार पर पहुंच गया जिसका परिणाम अब सामने आया है.

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आज मुख्यमंत्री बन चुके भूपेश बघेल और कभी पूर्व मुख्यमंत्री रहे अजीत प्रमोद कुमार जोगी का  आपसी द्वंद्व छतीसगढ़ की जनता ने चुनाव से पहले लंबे समय तक देखा है. जब भूपेश बघेल कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष रहे अजीत जोगी ने कांग्रेस को उसके महत्वपूर्ण नेताओं को   राजनीति की चौपड़ पर हमेशा  घात प्रतिघात करके जताया  कि वे छत्तीसगढ़ के राजनीति के नियंता हैं. मगर अब परिस्थितियां बदल चुकी हैं छत्तीसगढ़ में भूपेश बघेल मुख्यमंत्री है, ऐसे में भूपेश बघेल ने  यह चक्रव्यूह  बुना और दिखा दिया कि सत्ता को  कैसे साधा और निशाना लगाया जाता है. यहां अजीत जोगी और भूपेश बघेल में अंतर यह है कि अजीत जोगी  के राजनीतिक दांव में एक नफासत हुआ करती थी. विरोधी बिलबिला जाते थे और अजीत जोगी पर दाग नहीं लगता था.अब परिस्थितियां बदल गई हैं अमित जोगी और ऋचा जोगी  नामांकन खारिज के मामले में सीधे-सीधे भूपेश बघेल सरकार कटघरे में है. अमित जोगी अब देश की उच्चतम न्यायालय में अपना मामला लेकर पहुंच चुके हैं आने वाले समय में ऊंट किस करवट बैठेगा यह देश और प्रदेश की जनता देखने को उत्सुक है.

रेलवे के निजीकरण से किसान मजदूर के बेटे निराश

22 साल के रंजन का चयन रेलवे में टैक्नीशियन पद के लिए जनवरी में हुआ था. आईटीआई करने के बाद 3 साल की कड़ी मेहनत करने के बाद आए इस रिजल्ट से वह काफी खुश था.

रंजन के पिता साधारण किसान हैं. उन्होंने रोजमर्रा की जरूरी चीजों में कटौती कर के रंजन को पढ़ने के लिए खर्च दिया. रंजन का रिजल्ट आने के बाद परिवार में खुशी का माहौल था. आखिर हो भी क्यों नहीं, परिवार वालों में उम्मीद की किरण जगी थी कि अब घर में खुशियाली आएगी. दोनों बेटियों की शादी अब अच्छे घर में हो जाएगी.

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रंजन की तरह अभिषेक, राहुल और संजय का भी चयन रेलवे में ड्राइवर पद के लिए हुआ. सभी एक ही कमरे में रह कर पटना में तैयारी करते थे. वे सभी किसान मजदूर के बेटे हैं.

बिहार के साधारण किसान मजदूर के बेटों को अगर सब से ज्यादा सरकारी नौकरी मिलती थी तो वह था रेलवे महकमा, जिस में फोर्थ ग्रेड से ले कर रेलवे ड्राइवर, टैक्नीशियन, टीटी और स्टेशन मास्टर पद की नौकरी लगती थी.

रेलवे ने बिहार के किसान मजदूर तबके के मेधावी लड़कों को देशभर में सब से ज्यादा नौकरी दी, जिस से लोगों के हालात में काफी सुधार हुआ.

पर रेलवे के निजीकरण की चर्चा सुनते ही किसान मजदूरों के 3-4 साल से तैयारी कर रहे नौजवानों के होश उड़ गए हैं. वे निराश हो गए हैं. जिन का चयन हो गया है यानी रिजल्ट आ गया है, वे भी उलझन में पड़ गए हैं कि उन्हें जौइन कराया जाएगा या नहीं.

रंजन, जिस का टैक्नीशियन का रिजल्ट आया है, बताता है कि अब कहना मुश्किल है कि हम लोगों का क्या होगा? वह अब किसी प्राइवेट डाक्टर के रह कर कंपाउंडर का काम सीखना चाहता है.

रवींद्र, आलोक, आदिल जैसे दर्जनों छात्रों ने बताया कि वे लोग आईटीआई करने के बाद 3 साल से रेलवे की तैयारी कर रहे थे. उन्हें पूरी उम्मीद थी कि रेलवे में नौकरी जरूर लग जाएगी. वे लोग आपस मे क्विज करते थे. उस क्विज करने वालों में से 32 लोगों की नौकरी लग गई. रेलवे के नीजिकरण की चर्चा जब से सुनी है, उन्हें समझ में नहीं आ रहा है कि वे क्या करेंगे. आखिर में वे लोग भी लुधियाना, सूरत जैसे शहरों की प्राइवेट फैक्टरियों में वही काम करने के लिए मजबूर हो जाएंगे, जो काम अनपढ़ लोग करते हैं. उन के मांबाप तो यही सोंचेंगे कि उन की मेहनत की कमाई अपनी पढ़ाई पर ऐसे ही उड़ा दी. उन को देश के इन हालात के बारे में जानकारी थोड़े है.

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हमारा हक के राष्ट्रीय प्रचारक प्रकाश कुमार ने बताया कि अब दिमाग से हटा दीजिए और भूल जाइए कि अब देश के किसान मजदूरों के बेटों को रेलवे में सरकारी नौकरी मिलेगी. भारतीय रेल जो देश का सब से बड़ा सार्वजनिक उद्यम और सब से बड़ा नियोक्ता था, आज मोदी सरकार उसे खंडखंड कर दिया है और उस का निजीकरण करने का पूरा मैप बन चुका है.

रेलवे की 2 बड़ी परीक्षाएं 2020 में होने वाली थीं. आरआरबीएनटीपीसी एग्जाम, जिस में 35,208 भरतियों के लिए 1.25 करोड़ से ज्यादा औनलाइन आवेदन आए थे. आरआरसी ग्रुप डी एग्जाम में एक लाख से ज्यादा सीटें बताई गई थीं. यह इस एक्जाम के बाद होना था.

रेलवे मंत्रालय ने 109 रूटों पर 151 प्राइवेट ट्रेन चलाने के लिए योजना बनाई है. पूरे देश के रेलवे नैटवर्क को 12 क्लस्टर में बांटा गया है. इन्हीं 12 क्लस्टर में 151 प्राइवेट ट्रेनें चलेंगी. इन ट्रेनों में रेलवे सिर्फ ड्राइवर और गार्ड देगा यानी अब नए पदों की जरूरत ही खत्म कर दी गई है.

लोगों की आंखों में धूल झोंक कर निजीकरण करने पर सरकार तुल गई है. जिस तरह से एयरपोर्ट को एकएक कर अडाणी के हवाले किया जा रहा है, प्राइवेट सैक्टर को अपनी ही ट्रेन रेक तैयार करने की इजाजत दी जाएगी. निजी औपरेटरों को मार्केट के मुताबिक किराया तय करने की इजाजत दी जाएगी. वे इन गाड़ियों को अपनी सुविधा के हिसाब से विभिन्न श्रेणियों की बोगियां लगाने के साथसाथ रूट पर उन के ठहराव वाले स्टेशन का भी चयन कर सकेंगे.

फिलहाल तो मेक इन इंडिया की बात की जा रही है, लेकिन बाद में प्राईवेट आपरेटर जहां से भी चाहेंगे अपनी ट्रेन हासिल कर सकेंगे. रेलवे से ट्रेन खरीदना उन के लिए जरूरी नहीं होगा. यह इन के करार में साफतौर पर लिखा हुआ है. दूसरी सब से बड़ी बात है कि संचालन में निजी ट्रेन को वरीयता मिलने से सामान्य ट्रेनों की लेटलतीफी बेहद बढ़ जाएगी जिस से जनता परेशान होगी और इस का कुसूरवार रेलवे को बना कर और रूट को भी प्राइवेट कर दिया जाएगा.

सभी लोग जानते हैं कि निजी उद्यमियों का मकसद केवल फायदा कमाना होता है और जिन्हें जिस क्षेत्र से फायदा नहीं होता वे वहां काम बंद कर देते हैं. पूरी दुनिया में रेलवे निजीकरण से राष्ट्रीयकरण की ओर लौट रहा है, लेकिन भारत में अडाणी जैसे पूंजीपतियों को फायदा पहुंचाने के लिए सरकार जुटी हुई है. रेलवे में रोजगार देने की बात तो दूर जिन को रोजगार मिला हुआ है, उन का भी छीना जाएगा. टिकट की कीमत आईआरसीटीसी तय करता है. ट्रेन की सफाई का काम, पैंटीकार का काम, टिकट बिक्री इंटरनैट का काम प्राइवेट तौर पर ही होता है.

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गरीबों को 32,000 करोड़ की सब्सिडी खत्म. सरकार कोई भी ट्रेन आने वाले समय में नहीं चलाएगी. केवल प्राइवेट कंपनी ही ट्रेन चलाएगी. रेल यात्री भाड़ा में जबरदस्त बढ़ोतरी होगी. रेल कर्मी और सीनियर सिटीजन की छूट खत्म, जैसे तेजस में बच्चों को भी छूट नहीं है.

देशभर में रेलवे में 70 रेल मंडल है. इन में रेल कर्मचारियों के लिए बनी कालोनी की जमीन को फिर से नए निर्माण के नाम पर बिक्री के आदेश हो गए हैं. इस से रेल कर्मचारियों में अब आक्रोश गहराता जा रहा है. इस का रेलवे मजदूर संघ विरोध कर रहा है, लेकिन सरकार के कानों पर जूं नहीं रेंग रही है. यह साफ हो गया है कि सरकार किसी भी हालत में बड़े बदलाव की तैयारी में है.

कोरोना की वजह बेरोजगार युवा और रेलवे यूनियन के लोग भीड़भाड़ जैसे आंदोलन नहीं कर सकते. कोरोना काल में ही रेलवे का निजीकरण करना सरकार के लिए आसान होगा.

Bigg Boss 14 के सभी फ्रेशर्स ने चुना अपना सीनियर, 3 ग्रुप्स में बंटा पूरा घर

जैसे जैसे दिन बीत रहे हैं वैसे वैसे ही टीवी के सबसे पौपुलर रिएलिटी शो बिग बॉस के सीजन 14 (Bigg Boss 14) में एंटरटेनमेंट भी बढ़ता जा रहा है. बिग बॉस 14 किसी ना किसी बात को लेकर सुर्खियों में आने लगा है और तो और तूफानी सीनियर्स यानी कि सिद्धार्थ शुक्ला (Siddharth Shukla), हिना खान (Hina Khan) और गौहर खान (Gauhar Khan) खूब मेहनत कर इस सीजन को और भी ज्यादा इंटरस्टिंग बनाने में लगे हुए हैं.

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हाल ही में हुए इस सीजन के दूसरे ‘वीकेंड के वार’ (Weekend Ka Vaar) में खूब धमाल होता नजर आया और साथ ही सलमान खान (Salman Khan) ने सभी कंटेस्टेंट को शो के अंदर सही चलने की नसीहत भी दी. बीते सोमवार के एपिसोड में सलमान खान ने पूरे घर को 3 ग्रुप्स में बांट दिया. इस दौरान सलमान खान ने सीनियर्स को उन कंटेस्टेंटस को नाम लेने को कहा जिन्हें वो शो में आगे बढ़ता देखना चाहते हैं.

ऐसे में सीनियर्स ने रुबीना दिलाइक (Rubina Dilaik), पवित्रा पुनिया (Pavitra Punia), अभिनव शुक्ला (Abhinav Shukla) और जान कुमार सानू (Jaan Kumar  Sanu) का नाम लिया. इसके बाद सभी कंटेस्टेंटस को अपना अपना सीनियर चुनने का कहा. इस दौरान रुबीना दिलाइक, अभिनव शुक्ला, जैस्मिन भसीन (Jasmin Bhasin) और निशांत मलकानी (Nishant Malkani) ने हिना खान को, राहुल वैद्य (Rahul Vaidya) और जान कुमार सानु ने गौहर खान को और पवित्रा पुनिया, निक्की तम्बोली (Nikki Tamboli) और एजाज खान (Eijaz Khan) ने सिद्धार्थ शुक्ला को चुना.

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बात करें आने वाले एपिसोड की आने वाले एपिसोड में खूब धमाल होता नजर आने वाला है और इस धमाल के बीच सीनियर्स में खींचातानी भी होती दिखाई देने वाली है. अपनी अपनी टीमों को लेकर फ्रेशर्स के साथ साथ सीनियर्स में भी लड़ाई होने वाली है. इस दौरान गौहर गुस्से में कहती हैं इस घर में रूल्स की कोई अहमियत है, तो दिखाइए बिग बॉस. आने वाला एपिसोड खूब हंगामों से भरा होने वाला है.

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सारा गुरपाल की आंखें देख फैंस को मिली राहत, इंस्टाग्राम पर शेयर की बोल्ड फोटोज

टेलीविजन इंडस्ट्री का सबसे पौपुलर रिएलिटी शो बिग बॉस के सीजन 14 (Bigg Boss 14) से इविक्ट हुई पहली कंटेस्टेंट सारा गुरपाल (Sara Gurpal) इन दिनों काफी सुर्खियों में हैं. आपको बता दें कि शो के अंदर सारा गुरपाल (Sara Gurpal) की आंखों में कंटेस्टेंट निक्की तम्बोली (Nikki Tamboli) के तेज तर्रार नाखून लग गए थे जिसकी वजह से सारा को काफी परेशानी हुई थी और तो और इस वजह से सारा के लिए बिग बॉस (Bigg Boss) के घर में डाक्टर्स को भी बुलाना पड़ा था.

 

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#Saragurpal who was recently evicted from #BiggBoss14 on her way back home. #viralbhayani @viralbhayani

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पंजाबी सिंगर सारा गुरपाल (Sara Gurpal) बिग बॉस के घर से निकलते ही अपने होमटाउन चंडीगढ़ के लिए रवाना हो गई थीं और उनकी आंखों के नीचे लगे निशान साफ दिखाई दे रहे थे. हाल ही में सारा गुरपाल (Sara Gurpal) ने अपने औफिशियल इंस्टाग्राम अकाउंट से कुछ फोटोज शेयर की है जिसे देखने के बाद उनके फैंस ने राहत की सांस ली है क्योंकि इन फोटोज में सारा की आंखें बिल्कुल ठीक दिखाई दे रही हैं.

 

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I’m walkin’ on sunshine. #Saragurpal#SaraKehndi#Sarains

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इन फोटोज में सारा गुरपाल (Sara Gurpal) बेहद खूबसूरत लग रही हैं और तो और उनका ये अंदाज फैंस को बेहद पसंद आ रहा है. इन फोटोज के साथ सारा ने कैप्शन में लिखा है कि, “I’m walkin’ on sunshine.” इन फोटोज को देख फैंस सारा की खूब तारीफ तारीफ कर रहे हैं. सारा की इन फोटोज में वे अपने घर की बालकनी में खड़ी सनबाथ के मजे ले रही हैं.

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आपको बता दें कि सारा गुरपाल (Sara Gurpal) को बिग बॉस के घर से बेघर करने का फैसला तूफानी सीनियर सिद्धार्थ शुक्ला (Siddharth Shukla) ने लिया था और हिना खान (Hina Khan) और गौहर खान (Gauhar Khan) भी इस फैसले में सिद्धार्थ शुक्ला के साथ हो गए थे.

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