चरम पर बेरोजगारी : काम न आया पाखंडी सरकार का जयजयकार

मामला : 01

(नौकरी नहीं मिलने से 3 युवकों ने की एकसाथ खुदकुशी)

पिछले दिनों राजस्थान में 3 युवकों ने नौकरी न मिलने से हताश हो कर एकसाथ आत्महत्या कर ली. तीनों युवक जान देने के लिए ट्रेन के आगे कूद गए. जिस से तीनों की मौके पर ही मौत हो गई. घटना के चश्मदीदों की मानें तो ट्रेन के आगे कूदने से पहले ये युवक कह रहे थे कि नौकरी तो लगेगी नहीं, तो फिर जीने का क्या मतलब? ऐसे जी कर क्या करेंगे?

घटना राजस्थान के अलवर जिले की है. यहां पर नौकरी न मिलने से हताश हो कर 5 दोस्तों ने एकसाथ जान देने का प्लान बनाया था. इस योजना के समय 2 युवा ट्रेन के आगे कूदने से डर गए और पीछे हट गए. वहीं 3 अन्य दोस्तों ने एकसाथ ट्रेन के आगे छलांग लगा दी. ये तीनों युवक शहर के एफसीआई गोदाम के पास ट्रेन के आगे कूद गए. ट्रेन के आगे कूदने से इन  की मौके पर ही मौत हो गई.

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बाकी जिन 2 दोस्तों ने मौके पर आत्महत्या न करने का फैसला लिया उन की जान बच गई. उन्होंने बताया कि नौकरी न लगने से सभी परेशान थे. सभी युवकों का मानना था कि नौकरी नहीं लगेगी ये तो तय है लेकिन बिना नौकरी के जीवन कैसे गुजरेगा? ऐसे में ज़िंदा रह कर क्या करेंगे? ट्रेन के आगे कूदने से जान गंवाने वाले युवकों में से एक सत्यनारायण मीणा ने घटना से कुछ घंटे पहले अपने फेसबुक अकाउंट पर आत्महत्या का वीडियो- ‘माही द किलर’ नाम से डाला था.

मामला : 02

(पति की बेकारी से परेशान पत्नी ने दी जान)

जयपुर के गांधी नगर रेलवे स्टेशन पर पिछले शुक्रवार की सुबह एक महिला ने चलती ट्रेन के आगे कूद कर आत्महत्या कर ली. ट्रेन की चपेट में आने पर महिला का शरीर 2 हिस्सों में बंट गया. घटना के बाद  स्टेशन पर हड़कंप मच गया. सूचना पर पहुंची पर पुलिस ने शव को कब्जे में ले कर इस की सूचना परिजनों को दी.

पुलिस के मुताबिक महिला का पति राजेश पिछले एक साल से बेरोजगार है. वह नौकरी की तलाश में हैं और घर का खर्च मरने वाली महिला शीतल के जिम्मे ही था. शीतल एक प्राईवेट कंपनी में नौकरी कर जैसेतैसे परिवार का खर्च उठा रही थी, लेकिन कोरोना के चलते लोकडाउन ने उस की यह नौकरी भी छीन ली. कामधंधे की बात को ले कर उन के बीच अकसर झगड़े हुआ करते थे. खुदकुशी के दिन की सुबह भी उन में कहासुनी हुई थी.

मामला : 03

(पति की बेकारी से तंग पत्नी ने की खुदकुशी की कोशिश)

अजमेर निवासी विनोद अपनी पत्नी और दो बच्चों के साथ गौतम नगर में किराये के मकान में रहता है. विनोद एक लंबे अरसे से बेरोजगार है. घर का खर्च चलाने में दिक्कत होने के कारण उस की पत्नी हमेशा तनाव में रहती थी. पिछले रविवार की सुबह विनोद किसी काम से घर के बाहर गया था और रंजना अपने दोनों बच्चों के साथ घर में ही थी.

इसी बीच उस ने कमरे के पंखे से लटक कर खुदकशी की कोशिश की. यह देख बच्चों ने शोर मचा दिया, जिस से आसपडोस के लोग जुट गए. उन्होंने तत्काल महिला को फंदे से उतार कर बचा लिया. महिला ने बताया कि पति की बेरोजगारी से तंग आ कर उस ने जान देने की कोशिश की थी. बेरोजगारी के अलावा पति से उसे किसी और तरह की कोई शिकायत नहीं है.

मामला : 04

(बेकारी की वजह से रिश्ता पहुंचा टूटने की कगार पर)

रोहित व रंजना की शादी दिसंबर 2018 में हुई थी. 6-7 माह तक पतिपत्नी का रिश्ता ठीक रहा. रोहित बेरोजगार है और पत्नी खर्चे के लिए पैसे मांगती है. बेरोजगारी के चलते वह पैसे नहीं दे पाता. इस से दोनों के बीच में कहासुनी और झगड़ा होता रहता है. झगड़े में कई बार रोहित अपनी पत्नी पर हाथ भी उठा चुका है.

परिजनों ने बातचीत से कई बार मामला शांत किया, लेकिन कुछ दिन सब ठीक रहता और फिर से वही स्थिति बन जाती. हालात ऐसे बन गए कि मामला थाने तक पहुंच गया. महिला थाने में जिला महिला संरक्षण एवं बाल विवाह निषेध अधिकारी पतिपत्नी के टूटते रिश्ते को जोड़ने का प्रयास कर रही है.

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बेकारी की वजह से रिश्ता टूटने की कगार पर पहुंचा यह अकेला ऐसा मामला नहीं है. इस तरह के हर दिन 4 से 5 केस पुलिस तक पहुंच रहे हैं. ये तो वे केस हैं जो कि घरों से बाहर रहे हैं. बहुत से केस तो घरों की चारदीवारी (परिवारों में आपसी बातचीत या पंचायतें हो रही हैं) में ही चल रहे हैं.

जयपुर जिला महिला संरक्षण एवं बाल विवाह निषेध अधिकारी सरिता लांबा की मानें तो कुल केस मेें 70 फीसदी केस बेरोजगारी की वजह से हैं. वहीं 20 प्रतिशत केस में पति द्वारा नशा करना वजह सामने आया है. कुछ केस दहेज या अवैध संबंधों के चलते हो रहे हैं. कुछ वैवाहिक संबंध दो माह भी ठीक से नहीं चल पाते. एक मामला पुलिस तक पहुंचने के बाद 50 प्रतिशत रिश्ते ही दोबारा जुड़ पाते हैं.सरिता लांबा के कहे अनुसार रिश्ते बिगड़ने की सब से बड़ी वजह बेरोजगारी रही है.

बेकारी से तंग युवाओं के अवसान का दौर

आज का युवा सड़कों पर उतर आया है तो उस के पीछे ठोस वजहें है. हालिया नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आंंकड़े भी यह दर्शाते हैं कि देश के युवाओं का दुर्दिन चल रहा है. तभी तो बेरोजगार युवा अवसाद में आ कर मौत को गले लगा रहा. लेकिन बदकिस्मती देखिए, लोकतांत्रिक परिपाटी के सब से बड़े संवैधानिक देश में युवा एक अदद नौकरी न मिलने के कारण अवसादग्रस्त हो रहे और सियासी व्यवस्था उन्हें सियासत की कठपुतली बना सर्कस में नचा रही है. इतना ही नहीं देश की युवा जमात भी सियासतदानों के बनाए मौत के कुएं में चक्कर काट रही है.  युवाओं को भी अपने मुद्दों का भान नहीं रहा. तभी तो वे राजनीति के भंवर में कठपुतली बन नाच रहे और सियासी दल उन का फायदा उठा रहे.

आज युवाओं की सब से बड़ी जरूरत क्या है ? उन्हें गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिले, बेहतर रोजगार के अवसर मुहैया हों, ताकि उन्हें मौत को गले न लगाना पडे. लेकिन देश के युवा भी गुमराह हो गए हैं. आज का युवा हर मायने में राजनीतिक दल का काम करने लगा है और राजनीतिक दल उन के कंधे पर सवार हो कर चैन की बंशी बजा रहे, जो कतई उचित नहीं. युवाओं की पहली प्राथमिकता शिक्षा और नौकरी है, फिर क्यों युवा उस मुद्दे को ले कर आंदोलित न हो कर राजनीतिक दलों का काम आसान कर रहे है.

एनसीआरबी के आंकड़ों के मुताबिक साल 2018 में औसतन प्रतिदिन 36 बेरोजगार युवाओं ने खुदकुशी की, जो किसान आत्महत्या से भी ज्यादा है. यह उस दौर में हुआ, जब देश के प्रधानसेवक भारत को न्यू इंडिया/डिजिटल इंडिया बनाने का दिवास्वप्न दिखा रहे थे. विश्वगुरु बनने की दिशा में बातों ही बातों में लफ्जाजियों का गोता लगाया जा रहा था. देश की अर्थव्यवस्था को 5 ट्रिलियन बनाने का संकल्प रोजाना दोहराया जा रहा था. 56 इंच की छाती पर गुमान यह कह कर किया जा रहा था कि भारत एक महाशक्ति बनने जा रहा है.

ऐसे में जब 21वीं सदी के भारत में डिजिटल इंडिया, स्टार्टअप इंडिया और स्किल इंडिया जैसे ढेरों सरकारी कार्यक्रम चल रहे हो, उस दौर में बेरोजगारी से तंग आ कर देश के युवा जान दे रहे हो तो फिर सरकारी नीतियों और उन की नीयत पर सवालिया निशान खड़े होना वाजिब है.

एनसीआरबी के आंंकड़े के मुताबिक साल 2018 में ऐसे मौत को गले लगाने वाले बेरोजगार हताश युवाओं की संख्या 12,936 रही. यानी औसतन हर 2 घंटों में 3 लोगों की जान बेरोजगारी ने ली. ऐसे में यह कहीं न कहीं संविधान के अनुच्छेद- 21 में मिले जीवन जीने की स्वतंत्रता का हनन करना है और इस के लिए दोषी पूरा का पूरा राजनीतिक परिवेश है.

बेरोजगार युवा: सरकार की गलत नीतियों का नतीजा

हालिया दौर में भारत के पास जितना युवा धन है, उतना दुनिया के किसी भी मुल्क के पास नही है मगर सच्चाई यह भी है कि सब से ज़्यादा बेरोज़गार युवाओं का सैलाब भी हमारे ही मुल्क में है. यह सब कुछ वर्तमान सरकार की गलत नीतियों का नतीजा है. पिछले 60-70 सालों में बेरोज़गारी को ले कर जितनी बातें नहीं हुई हैं, उस से कहीं अधिक बीते 6 सालों से सुनाई पड़ रही है. सतासीन सरकार ने सत्ता हासिल करने के लिए युवाओं को हर साल 2 करोड़ रोज़गार गारंटी का वादा कर छला था.

आज मुल्क के कई संस्थानों का लगातार निजीकरण होना यह साबित करता है कि वर्तमान सरकार विफल है. इसी वजह से हर रोज़ लाखों की तादाद में युवाओं की नोकरियां दाव पर लगी रहती हैं. जिस से युवाओं में लगातार डिप्रेशन बढ़ रहा है. आज इन्हीं गलत नीतियों की वजह से इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल करने वाला युवा चपरासी की नौकरी भी करने को तैयार है. हद तो यह है कि वह भी उसे नहीं मिल रही है. इस से भी कहीं ज़्यादा चौंकाने वाले मामले  अनेक शहरों में उस वक्त सामने आएं, जब म्युनिसिपल कॉरपोरेशन में सफाई कर्मियों की नौकरी के लिए गैजुएट एवं पोस्ट गैजुएट के साथ इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल करने वाले युवाओं का तांता लग गया.

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जिस तरह से हर भरती पेपरलीक या कोर्ट के चक्कर में लंबित पड़ी है, उस से साफ़ है कि सरकार और सरकार में बैठे अधिकारी इन भर्तियो को ले कर संवेदनशील नही है. हर साल लाखोकरोड़ों की संख्या में इंटर, ग्रेजुएशन पास करने वाले बच्चे जब किसी सरकारी नौकरी की लिखित परीक्षा दे कर वापस अपने घर तक नही पहुंंच पाते तब तक परीक्षा संबंधी वेबसाइट पर पेपरलीक/परीक्षा स्थगित होने की जानकारी अपलोड कर दी जाती है.

भरती चाहे स्थगित हो अथवा कोर्ट में जाए पर इन सभी बातो का दुष्परिणाम अभ्यर्थी को ही भुगतना पड़ता है, वह अभ्यर्थी जो सालोसाल, दिनरात मेहनत कर के एक अदद सी नौकरी के सपने देखता है परन्तु उसे पेपर लीक/स्थगित होने से निराशा ही हाथ लगती है.

जिस युवाशक्ति के दम पर देश का मुखिया विश्वभर में इतराते घूमता है, देश की वही युवाशक्ति एक नौकरी के लिए दरदर भटकने को मजबूर है. ताजा रिपोर्टो के मुताबिक, जिन युवाओ के दम पर हम भविष्य की मजबूत इमारत की आस लगाए बैठे है, उस की नीव की हालत बेहद निराशाजनक है. 21वीं सदी में अत्याधुनिक टेक्नोलॉजी अपनाने के बाद भी देश एक ऐसा सिस्टम नही खड़ा कर पाया है जो एक भरती परीक्षा को सकुशल संपन्न करा सके. बेरोजगारी नाम का शब्द दरअसल देश का ऐसा सच है, जिस से राजनीतिज्ञों, खुद को देश का रहनुमा समझने वालो ने अपनी आंंखे मूंद ली हैं.

हद पर बेकारी का दर्द

सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी की ताजा रिपोर्ट में कहा गया है कि बीते साल अक्टूबर, 2019 में 40.07 करोड़ लोग काम कर रहे थे, लेकिन इस साल अगस्त माह में यह आंकड़ा 6.4 फीसदी घट कर 36.70 करोड़ रह गया. इस से पहले अंतररष्ट्रीय श्रम संगठन ने भी अपनी एक रिपोर्ट में देश में रोजगार के मामले में हालात बदतर होने की चेतावनी दी थी. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक बीते 6 सालों के दौरान रोजाना साढ़े 6 सौ जमीजमाई नौकरियां खत्म हुई हैं.

46 साल के अशोक कुमार एक निजी कंपनी में बीते 22 साल से काम कर रहे थे. लेकिन बीते साल नवंबर माह में एक दिन अचानक कंपनी ने खर्चों में कटौती की बात कह कर उन की सेवाएं खत्म कर दीं. अभी उन के बच्चे छोटेछोटे थे. महीनों नौकरी तलाशने के बावजूद जब उन को कहीं कोई काम हीं मिला तो मजबूरन वह अपनी पुश्तैनी दुकान में बैठने लगे. अशोक कहते हैं, “इस उम्र में नौकरी छिन जाने का दर्द क्या होता है, यह कोई मुझ से पूछे. वह तो गनीमत थी कि पिताजी ने एक छोटी दुकान ले रखी थी. वरना भूखों मरने की नौबत आ जाती.”

अशोक अब वहीं पूरे दिन बैठ कर परचून और घरेलू इस्तेमाल की दूसरी चीजें बेच कर किसी तरह अपने परिवार का गुजरबसर करते हैं. वह बताते हैं कि पहले वेतन अच्छा था. लिहाजा वह बड़े मकान में किराए पर रहते थे. बच्चे भी बढ़िया स्कूलों में पढ़ते थे. लेकिन एक झटके में नौकरी छिनने के बाद उन को अपने कई खर्चों में कटौती करनी पड़ी. पहले मकान छोटा लिया. फिर बच्चों का नाम एक सस्ते स्कूल में लिखवाया. अब हालांकि उन की जिंदगी धीरेधीरे पटरी पर आ रही है. लेकिन अशोक को अब तक अपनी नौकरी छूटने का मलाल रहता है.

जयपुर के एक छोटे कसबे के रहने वाले  हेमंत ने एक प्रतिष्ठित कालेज से बीए (आनर्स) की पढ़ाई करने के बाद नौकरी व बेहतर भविष्य के सपने देखे थे. लेकिन नौकरी की तलाश में बरसों एड़ियां घिसने के बाद उन का मोहभंग हो गया. आखिर अब वह अपने कसबे के बाजार ही में सब्जी की दुकान लगाते हैं. हेमंत बताते हैं, “कालेज से निकलने के बाद मैंने 5 साल तक नौकरी की कोशिश की. लेकिन कहीं कोई नौकरी नहीं मिली. जो मिल रही थी उस में पैसा इतना कम था कि आनेजाने का किराया व जेबखर्च भी पूरा नहीं पड़ता. यही वजह है कि मैंने सब्जी व फल बेचने का फैसला किया. कोई भी काम छोटाबड़ा नहीं होता.

सीएमआईई ने अपनी ताजा रिपोर्ट में कहा है कि नोटबंदी के बाद रोजगार में कटौती का जो सिलसिला शुरू हुआ था, वह अब कोरोनाकाल में चरम पर है. इस दौरान श्रम सहभागिता दर 48 फीसदी से घट कर तीन साल के अपने निचले स्तर 36.70 फीसदी पर आ गई है. यह दर काम करने के इच्छुक वयस्कों के अनुपात का पैमाना है. रिपोर्ट में बेरोजगारी दर में इस भारी गिरावट को अर्थव्यवस्था व बाजार के लिए खराब संकेत करार दिया गया है.

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बेरोजगारी पर अब तक जितने भी सर्वेक्षण आए हैं, उन में आंकड़े अलगअलग हो सकते हैं. लेकिन एक बात जो सब में समान है वह यह कि इस क्षेत्र में नौकरियों में तेजी से होने वाली कटौती की वजह से हालात लगातार बदतर हो रहे हैं. बीते दिनों अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय की ओर से प्रकाशित एक सर्वेक्षण में कहा गया था कि देश में विभिन्न क्षेत्रों में ज्यादातर लोगों का वेतन अब भी 8-10 हजार रुपए महीने से कम ही है. इस सर्वेक्षण रिपोर्ट में दावा किया गया था कि रोजगार के क्षेत्र में विभिन्न कर्मचारियों के वेतन में भारी अंतर है. इस खाई को पाटना जरूरी है. एक अन्य सर्वे में कहा गया है कि भारत में 14 करोड़ युवाओं के पास फिलहाल कोई रोजगार नहीं है.

बेअसर तालीथाली की प्रतिक्रांति

देश के बेरोजगार युवाओं द्वारा 5 सितंबर को शाम 5 बजे 5 मिनट तक बेरोज़गारी की थालीताली पीटने के देशव्यापी अभियान के बाद 9 सितंबर को रात्रि 9 बजे 9 मिनट तक अँधेरे के खिलाफ़ मशाल जला कर देशव्यापी विरोध प्रदर्शन किया गया. माना रहा है कि बेरोजगार युवाओं अपने हक की बात अर्थात नौकरी/नियुक्ति की तरफ सरकार का ध्यान आकर्षित कराने के लिए तालीथाली की प्रतिक्रांति को अंजाम दिया.

दरअसल, किसी भी समाज व देश की युवापीढ़ी क्रांति की बुनियाद होती है. जब युवा पीढ़ी ही अपने ढोंगी राजा के ढोंग में रंग कर उसी हथियार से क्रांति करने की राह पर आ जाएं तो समझा जाना चाहिए कि उसी रंग में रंग चुके है अर्थात मानसिक स्तर बराबर का हो चुका है.

मगर अफसोस, कुछ अरसे पहले देश व समाज के चुनिंदा बुद्धिजीवी व तार्किक लोग युवाओं के हकों अर्थात हर साल 2 करोड़ रोजगार के वादे को ले कर सरकार से सवाल कर रहे थे, उन को गालियां ये तालीथाली भक्त युवा ही दे रहे थे कि पहले वालों ने क्या कर दिया? मोदीजी के नेतृत्व में देश मजबूत किया जा रहा है तो तुम लोग देशद्रोह का कार्य कर रहे हो ?  तब कह रहे थे कि 70 साल के गड्ढे भरने में समय तो लगेगा ही. तुम वामपंथी/पाकपरस्त लोगों को जलन हो रही है. जब गरीब भातभात कर के भूख से मर रहे थे और लोग सवाल खड़ा कर रहे थे तो इन्हीं मोदीभक्त युवाओं द्वारा कहा जा रहा था कि देश को जबरदस्ती बदनाम किया जा रहा है.

असल बात यह है कि जब कैग, सीवीसी, सीबीआई, ईडी आदि को हड़पा जा रहा था, तब ये युवा समझ रहे थे कि समस्याओं की जड़ यही है और इन के खत्म होने में ही भलाई है. जब सरकारी संस्थानों, ऐतिहासिक स्थलों के नाम बदले जा रहे थे तब इन युवाओं को लग रहा था कि अतिप्राचीन महान सांस्कृतिक विरासत को पुनर्जीवित किया जा रहा है और ऐसा रामराज्य स्थापित होगा कि डीजलपेट्रोल की महंगाई से भयमुक्त हो कर बंदरों की तरह हम खुद ही उड़ लेंगे. जब मी लार्ड अरूण मिश्रा जस्टिस बने तो लगा कि न्यायपालिका का भ्रष्टाचार मिटाया जा रहा है. जब रंजन गोगोई राज्यसभा के रंग में रंगे तो लगा कि दुग्गल साहब ने कहा कि राज्यसभा मे हमारा बहुमत नहीं है, शायद बहुमत का जुगाड़ कर के हमारी समस्याओं का समाधान किया जाएगा.

संसद के वित्तीय पावर को जीएसटी कौंसिल को ट्रांसफर किया गया तो इन्हीं युवाओं को लगा कि संसद में देशद्रोही विपक्ष सरकार को काम करने नहीं देते इसलिए कोई रास्ता खोजा जा रहा है. विपक्ष को व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी के इन्हीं होनहार युवाओं ने निपटाया है और आज हालात यह है कि सत्ता कह रही है संसद में विपक्ष सवाल पूछ कर क्या करेगा. वो फोटो याद है न जब देश के मुखिया ने संसद की सीढ़ियों को चूम कर ही संसद में प्रवेश किया था, मगर वो बात भूल गये कि गोडसे ने गांधी को खत्म करने के लिए भी पहले दंडवत प्रणाम किये थे.

जो पिछले 3 दशक से वैज्ञानिक सोच को मात देने के लिए चमत्कारिक, ढोंगी, अल्लादीन के चिराग पैदा हुए उन को बड़ा बनाने में भारत के युवाओं ने महत्वपूर्ण भागीदारी निभाई है. जितने भी सत्ताधारी लोग है उन की सोच को देखते हुए लग रहा है कि युवाओं ने देश की सत्ता चलाने के नौकर नियुक्त नहीं किये बल्कि अवतारी पुरुष पैदा किये है. साहब को सुन कर लगता था कि पढ़ालिखा होना जरूरी है मगर लाल जिल्द वाली पोटली लिए मैडम को देखा तो लगा कि पढ़ने का क्या फायदा.

जब स्वतंत्र निकाय को हड़पा जा रहा था तब भी राष्ट्रभक्त युवा खुश थे. पुलिस-सेना से ले कर न्यायपालिका तक का रंगरोगन किया जा रहा था तब भी खुश थे. जब सरकारी उपक्रमों का निजीकरण किया जा रहा था, जब सरकारी कर्मचारियों को कामचोर, भ्रष्ट, बेईमान कह कर निकाला जा रहा था तब भी मोदीभक्त युवा मौन समर्थक थे.

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जब अमेठी के एक युवा ने पकौड़े का ठेला लगाने के लिए लोन मांगा था तो बैंक ने कहा कि तुम्हारे पास कोई एसेट नहीं है, इसलिए लोन नहीं मिलेगा. अब उस युवा को कौन समझाए कि एसेट तो युवाओं की सोच थी जो चाचा नसीब वाले को भेंट कर दी थी, अब रोजगार किस से व किस तरह का मांग रहे हो.

5 सितंबर को तालीथाली बजा लेने व 9 सितंबर को दीयाबाती करने या अब अगले पड़ाव पर शंख बजा लेने से कुछ हासिल नहीं होगा. अमिताभ बच्चन ने भी खूब तालीथाली व शंख बजाया बावजूद कोरोना पॉजिटिव हो गए थे. देश के बेरोजगार युवा जिन से तालीथाली बजा कर रोजगार मांगने जा रहे है, दरअसल वे इस धंधे के ये माहिर खिलाड़ी है. युवाओं का मानसिक स्तर अपने हिसाब से सेट कर चुके है. अब युवा विरोध/आंदोलन/क्रांति नहीं करने वाले क्योंकि व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी ने इन की सोच का दायरा सीमित कर दिया है. अब ये तालीथाली बजाने लायक ही बचे है.

नौजवानों की उम्मीदें हेमंत सोरेन से

झारखंड के दूसरी बार मुख्यमंत्री बने युवा हेमंत सोेरेन से अगर किसी को बहुत ज्यादा उम्मीदें हैं, तो वे नौजवान और छात्र हैं, जो भाजपा राज में रोजगार और तालीम के बाबत हिम्मत हार चुके थे. इन्हीं नौजवानों के वोटों की बदौलत  झारखंड मुक्ति मोरचा यानी  झामुमो और कांग्रेस गठबंधन को विधानसभा चुनाव में बहुमत मिला है.

15 जनवरी, 2020 को रांची में हेमंत सोरेन से उन के घर मिलने वालों का तांता लगा हुआ था, जिन में खासी तादाद नौजवानों की थी. इन में एक ग्रुप ‘आल इंडिया डैमोक्रैटिक स्टूडैंट और्गेनाइजेशन’ का भी था.

इस ग्रुप की अगुआई कर रहे नौजवान शुभम राज  झा ने बताया कि 11वीं के इम्तिहान में मार्जिनल के नाम पर कई छात्रछात्राओं को फेल कर दिया गया है, जो सरासर ज्यादती वाली बात है.

शुभम राज  झा के साथ आए दिनेश, सौरभ, जूलियस फुचिक, घनश्याम, उषा और पार्वती ने बताया कि उन्हें मुख्यमंत्री से काफी उम्मीदें हैं कि वे उन की ऐसी कई परेशानियों को दूर करेंगे.

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हेमंत सोरेन को तोहफे में देने के लिए ये छात्र कुछ किताबें साथ लाए थे, क्योंकि मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के बाद ही उन्होंने कहा था कि उन्हें बुके नहीं, बल्कि बुक तोहफे में दी जाएं.

हेमंत सोरेन ने इन छात्रों की परेशानी संजीदगी से सुनी और तुरंत ही शिक्षा विभाग के अफसरों को फोन कर कार्यवाही करने के लिए कहा तो इन छात्रों के चेहरे खिल उठे कि अब एक साल बरबाद होने से बच जाएगा.

बातचीत में इन छात्रछात्राओं ने बताया कि उन्हें मुख्यमंत्री का किताबें व पत्रपत्रिकाएं पढ़ने और लाइब्रेरी खोलने का आइडिया काफी पसंद आया है और अब वे भी खाली समय में किताबें और पत्रपत्रिकाएं पढ़ेंगे.

नौजवानों पर खास तवज्जुह

मुख्यमंत्री बनते ही हेमंत सोरेन ने तालीम पर खास ध्यान देने की बात कही थी. यह बात किसी सुबूत की मुहताज नहीं कि  झारखंड तालीम के मामले में काफी पिछड़ा है. कई स्कूल तो ऐसे हैं, जहां या तो टीचर नहीं जाते या फिर छात्र ही जाने से कतराते हैं, क्योंकि स्कूलों में पढ़ाई कम मस्ती ज्यादा होती है.

हालात तो ये हैं कि झारखंड के 80 फीसदी स्कूलों की हालत हर लिहाज से बदतर है. चुनाव के पहले एक सर्वे में यह बात उजागर हुई थी कि कई स्कूलों के कमरे तो इतने जर्जर हो चुके हैं कि छात्रों को पेड़ों के नीचे बैठ कर पढ़ाई करनी पड़ रही है. ज्यादातर स्कूलों में शौचालय नहीं हैं और पीने के पानी तक का इंतजाम नहीं है.

इस बदहाली के बाबत जब हेमंत सोरेन से पूछा गया, तो उन्होंने बताया कि इस बदइंतजामी को वे एक साल में ठीक कर देंगे. पिछली भाजपा सरकार के कार्यकाल में स्कूलों और पढ़ाई की बुरी गत तो हुई है, जिसे जल्द ही दूर कर लिया जाएगा.

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इस के अलावा हेमंत सोरेन ने बताया कि नौजवानों को रोजगार मुहैया कराना हमारी प्राथमिकता है. इस बाबत भी कोई सम झौता नहीं किया जाएगा, क्योंकि एक वक्त में (जब  झारखंड बिहार में था) तब यहां के छात्र प्रतियोगी परीक्षाओं में टौप किया करते थे.

हेमंत सोरेन की लाइब्रेरी बनाने की मंशा यही है कि नौजवानों में किताबें और पत्रिकाएं पढ़ने की आदत फिर से बढ़े और वे तालीम में अव्वल रहें. वे कहते हैं कि इस में सभी को अपने लैवल पर सहयोग करना चाहिए. इस से राह आसान हो जाएगी.

इस में कोई शक नहीं कि न पढ़ना पिछड़ेपन की एक बड़ी वजह है, जिस पर हेमंत सोरेन का ध्यान शिद्दत से गया है.

अब देखना दिलचस्प होगा कि अपने इस मकसद में वे कितने कामयाब हो पाते हैं, लेकिन यह भी सच है कि बुके की जगह बुक का उन का आइडिया न केवल  झारखंड, बल्कि देशभर में पसंद किया जा रहा है.

दम तोड़ते सरकारी स्कूल

मध्य प्रदेश के सरकारी स्कूलों में पढ़ाईलिखाई की क्वालिटी बढ़ाने के लिए पिछले 15-20 सालों में नएनए प्रयोग तो खूब किए गए, पर इन स्कूलों में टीचरों की कमी दूर करने के साथ ही इन में पढ़ने वाले बच्चों की जरूरतों को पूरा करने की दिशा में कोई ठोस उपाय सरकारी तंत्र द्वारा नहीं किए गए.

नतीजतन, स्कूलों में पढ़ाईलिखाई का लैवल बढ़ने के बजाय दिनोंदिन गिरा है और छात्रों के मांबाप भी प्राइवेट स्कूलों की ओर खिंचे हैं.

प्राइवेट स्कूलों में आज भी काबिल टीचर मुहैया नहीं हैं. इस की वजह उन को मिलने वाली तनख्वाह है. सरकारी स्कूलों में पढ़ाने वाले टीचरों को जहां आज 50,000 रुपए से 70,000 रुपए तक मासिक तनख्वाह मिलती है, वहीं इस की तुलना में प्राइवेट स्कूलों में पढ़ा रहे टीचर बमुश्किल 10,000 रुपए से 15,000 रुपए मासिक कमा रहे हैं.

पढ़ेलिखे नौजवान भी टीचिंग जौब में आना चाहते हैं. वे शिक्षक पात्रता परीक्षा पास कर सरकारी स्कूलों में सिलैक्ट हो जाते हैं और जो परीक्षा पास नहीं कर पाते, तो वे प्राइवेट स्कूलों में नौकरी करने लगते हैं.

नरसिंहपुर जिले के आदित्य पब्लिक स्कूल में इंगलिश पढ़ाने वाले सचिन नेमा बताते हैं कि वे साल 2011 की शिक्षक पात्रता परीक्षा 2 अंक से पिछड़ने के चलते प्राइवेट स्कूल में 15,000 रुपए मासिक तनख्वाह पर 5 पीरियड पढ़ाते हैं. इस के अलावा स्कूल मैनेजमैंट द्वारा उन्हें छात्रों के मांबाप से मेलजोल करने का ऐक्स्ट्रा काम भी दिया जाता है.

प्राइवेट स्कूलों में पढ़ाने का तरीका रटाने वाला हो गया है. छोटेछोटे बच्चों को भारी होमवर्क दिया जाता है, जिसे बच्चों के मांबाप ही ज्यादा करते हैं.

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साहित्यकार और शिक्षाविद डाक्टर सुशील शर्मा कहते हैं कि प्राइवेट स्कूलों में भी अब पढ़ाईलिखाई के बेहतर रास्ते नहीं हैं. उन्होंने निजी तौर पर शहर के कई प्राइवेट स्कूलों में जा कर यह देखा है कि वहां बच्चों को हर बात रटाई जा रही है. इन स्कूलों में ट्रेनिंग पाए टीचरों की कमी इस की खास वजह है.

काम का बोझ

शिक्षा संहिता के नियमों के मुताबिक और शिक्षा के अधिकार अधिनियम के प्रावधानों के तहत राष्ट्रीय महत्त्व के काम चुनाव और जनगणना को छोड़ कर टीचरों की सेवाएं गैरशिक्षकीय कामों में नहीं ली जा सकतीं, पर अधिनियम को धता बताते हुए टीचरों से बेगारी कराई जा रही है. वोटर लिस्ट अपडेट करने से ले कर बच्चों के जाति प्रमाणपत्र बनवाने तक का काम टीचरों को करना पड़ता है.

पिछले साल मध्य प्रदेश के सिंगरौली जिले में सरकार द्वारा कराए जा रहे सामूहिक विवाह आयोजन में बाकायदा कलक्टर के निर्देश पर जिला शिक्षा अधिकारी ने 28 टीचरों की ड्यूटी पूरी, दाल, सब्जी परोसने में लगा दी.

इसी तरह विभिन्न जिलों में गांवों व शहरों को बाह्य शौच मुक्त (ओडीएफ) करने के लिए वार्डवार्ड जा कर खुले में शौच करने वाले लोगों को रोकने में टीचरों की ड्यूटी लगाई गई.

मध्य प्रदेश के ही 83,969 प्राइमरी स्कूल पढ़ाईलिखाई की क्वालिटी में भारी कमी, टीचरों के खाली पदों पर भरती न होने और बुनियादी जरूरतों की कमी में दम तोड़ते नजर आ रहे हैं.

प्रदेश के सरकारी स्कूल केवल सरकारी योजनाओं का ढिंढोरा पीटते नजर आ रहे हैं. एयरकंडीशंड कमरों में बैठे अफसर व मंत्री सरकारी स्कूलों में नए प्रयोग कर पढ़ाईलिखाई को गड्ढे की ओर ले जा रहे हैं.

टीचर भी हैं कुसूरवार

पढ़ाईलिखाई की क्वालिटी में भारी गिरावट के लिए सरकारी नीतियों के साथ टीचर भी कम कुसूरवार नहीं हैं. छात्र पढ़ाईलिखाई करने के लिए स्कूल जाते हैं, लेकिन वहां टीचर ही नदारद रहते हैं.

मध्य प्रदेश में साल 2018 के हाईस्कूल इम्तिहान में 30 फीसदी से कम रिजल्ट देने वाले स्कूलों में पढ़ाने वाले टीचरों का सरकार द्वारा इम्तिहान लिया गया. इस इम्तिहान में ज्यादातर टीचर फेल हो गए.

बाद में इन टीचरों को इम्तिहान का एक और मौका दिया गया, जिस में किताब खोल कर इम्तिहान का प्रश्नपत्र हल करने को कहा गया. इस के बावजूद प्रदेश के 16 फीसदी टीचर इस में फेल हो गए.

दक्षिण कोरिया पर दांव

पिछले कुछ सालों में दिल्ली की केजरीवाल सरकार ने सरकारी स्कूलों की तसवीर बदलने का काम किया है, पर मध्य प्रदेश सरकार के अफसरों को दक्षिण कोरिया की शिक्षा पद्धति रास आ रही है. वहां की शिक्षा पद्धति को देखने प्रदेश सरकार के शिक्षा विभाग के अफसर, बाबू और प्रिंसिपलों के दल 3 बार दक्षिण कोरिया की यात्रा का मजा लूट चुके हैं.

कभी टीचर रहे भाजपा के पूर्व विधायक मुरलीधर पाटीदार ने इस यात्रा पर सवाल खड़े किए हैं. उन का कहना है कि प्रदेश के स्कूलों में टीचरों की कमी दूर करने और स्कूलों में बुनियादी समस्याओं को हल करने में बजट का रोना रोने वाले अफसर करोड़ों रुपए दक्षिण कोरिया की यात्रा पर खर्च कर चुके हैं, जबकि दक्षिण कोरिया की जिस शिक्षा पद्धति को लागू करने की बात कही जा रही है, वह तो हमारे प्रदेश में बहुत पहले से ही चल रही है.

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जब से देश में शिक्षा के अधिकार अधिनियम के तहत 5वीं और 8वीं जमात की बोर्ड परीक्षाओं को खत्म कर हर बच्चे को अगली जमात में पास करने का नियम बना है, छात्रों की दिलचस्पी पढ़ने में और टीचरों की दिलचस्पी पढ़ाने में नहीं रह गई है. आज किसी भी टीचर, मुलाजिम, अफसर के बच्चे इन सरकारी स्कूलों में नहीं पढ़ रहे हैं, जिस से सरकारी स्कूलों पर किसी का कंट्रोल भी नहीं रह गया है.

प्राइवेट स्कूलों की मनमानी

प्राइवेट स्कूल तालीम को प्रोडक्ट की तरह बेच रहे हैं. नया शिक्षा सत्र शुरू होते ही प्राइवेट स्कूल वाले मांबाप की जेब हलकी करने में लग जाते हैं. इस के लिए उन्होंने अनेक तरीके खोज लिए हैं. पहले मनमाने तरीके से स्कूल की फीस बढ़ा दी जाती है और हर स्कूल अपनी अलगअलग किताबें चलाते हैं.

कोर्स की किताबों और यूनिफौर्म पर दुकानदारों से बाकायदा कमीशन तय कर लेते हैं, जिस के चलते दुकानदरों द्वारा मनमाने दामों पर इन्हें बेच कर मांबाप की जेब ढीली की जाती है.

यहां तक कि स्कूल का नाम और मोनोग्राम छपी कौपियों की भी मांबाप से मनमानी कीमत वसूल की जाती है. अगर वे बिना मोनोग्राम की कौपी खरीद कर बच्चों को दे भी देते हैं, तो स्कूल में इन कौपियों को नकार दिया जाता है और बच्चों को परेशान किया जाता है.

अनेक प्राइवेट स्कूल वाले अपने यहां बाकायदा काउंटर लगा कर बस्ता समेत पूरा कोर्स बेचने का धंधा भी करते हैं, जिस में कौपी, किताब समेत स्टेशनरी का पूरा सामान खुलेआम बेचा जाता है. इन प्राइवेट स्कूलों द्वारा दाखिले के समय पर भी डोनेशन के नाम पर मांबाप से मोटी रकम वसूल की जाती है.

प्राइवेट स्कूलों पर शिक्षा विभाग के अफसरों का कोई कंट्रोल नहीं रहता है, क्योंकि नामीगिरामी प्राइवेट स्कूलों का संचालन विधायक, सांसदों के अलावा बड़ेबड़े उद्योगपतियों द्वारा किया जा रहा है.

बस्ते का बढ़ता बोझ

स्कूली बच्चों की पीठ पर बस्ते के बो झ को कम करने के लिए भारत सरकार के मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा अक्तूबर, 2018 में नई गाइडलाइन जारी की गई है, जिस के मुताबिक क्लास के आधार पर बच्चों के बस्ते का वजन तय किया गया है.

मसलन, पहली और दूसरी जमात के लिए बस्ते का वजन डेढ़ किलो, तो तीसरी से 5वीं जमात के बच्चों के बस्ते का वजन 2 से 3 किलो है. 6वीं और 7वीं जमात के लिए 4 किलो और 8वीं, 9वीं जमात के लिए साढ़े 4 किलो और 10वीं जमात के लिए 5 किलो वजन तय किया गया है.

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दरअसल, बच्चों की पीठ पर लदे बस्ते का बो झ सरकार द्वारा तय सिलेबस के बोझ से सीधा संबंध रखता है. हमारे सिलेबस की यही खामी है कि यह बच्चों की उम्र व दिमागी सोच के मुताबिक तय नहीं है. कम उम्र के बच्चोंको कई विषयों के ज्यादा सिलेबस को पढ़ना पड़ता है.

उत्कृष्ट विद्यालय नरसिंहपुर के टीचर डाक्टर अशोक उदेनियां मानते हैं कि स्कूली सिलेबस बनाने वाली समिति में यूनिवर्सिटी के कुलपति, कालेज के प्रिंसिपल और प्रोफैसर होते हैं, जो स्कूली बच्चों का सिलेबस तैयार करते हैं. इन्हें स्कूली बच्चों के मनोविज्ञान और गांवदेहात के इलाकों के हालात का कोई खास तजरबा नहीं होता है.

बेरोजगारी का आलम

देश में बेरोजगारी का हाल यह है कि महाराष्ट्र में 8,000 कौंस्टेबलों की भरती के लिए 12,00,000 अर्जियां आई हैं. सरकार तो चाहती थी कि उन का एग्जाम भी औनलाइन हो जिस में इन अधपढ़े नौजवानों को किसी साइबर कैफे में जा कर सैकड़ों घंटे और सैकड़ों रुपए बरबाद करने ही थे और सरकार के पास मनमाने ढंग से फैसले करने का हक रहता. हो सकता है अब कागजपैन पर ही कौंस्टेबलों का एग्जाम हो.

कौंस्टेबलों का वेतन कोई ज्यादा नहीं होता. काम के घंटे बहुत ज्यादा होते हैं. वर्षों तक अफसरों की चाकरी करनी पड़ती है. रहने की सुविधा बहुत ही घटिया होती है, पर फिर भी नौकरी लग जाने पर रोब भी रहता है और ऊपरी कमाई भी होती है, इसीलिए 12 लाख दांव लगा रहे हैं.

इस तरह की भरतियों में सरकारी आदमियों की खूब मौज होती है. अर्जी देने वालों को लूटने का सिलसिला चालू हो जाता है. तरहतरह के सर्टिफिकेट औनलाइन एप्लीकेशन के साथ लगवाए जाते हैं जिन्हें जमा करने में खर्च होता है. जो रिजर्व कोटों से होते हैं उन्हें एससी, ओबीसी का सर्टिफिकेट बनवा कर लाने के लिए चक्कर काटने पड़ते हैं.

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अर्जी ढंग से गई या नहीं, यह पता करना भी मुश्किल होता है. उस के बाद एकदम चुप्पी छा जाती है. महीनों पता ही नहीं चलता कि इन भरतियों का क्या हुआ. जिस ने अर्जी दी, वह आराम से बैठ कर सपने देखने लगता है जबकि उसे यह मालूम ही नहीं होता कि औनलाइन गड़बडि़यों का धंधा अलग चालू हो गया है.

अगर गलती से इंटरव्यू और फिजिकल का बुलावा आ जाए तो खुशी तो होती है पर लाखों की रिश्वत की मांग आने लगती है. देश में कानून बनाए रखने के लिए जो बेईमानी भरती

में हाती है वह अपनेआप में एक अचंभा है. इस बेईमानी पर वे मंत्री चुप रहते हैं जो दिन में 10 बार में सच बोलने की कसम खाते हैं. उन्हीं कौंस्टेबलों के बल पर देश में हिंदूहिंदू, मुसलिममुसलिम किया जाता है. सरकार अगर उछलती है तो उन कौंस्टेबलों के बल पर जिन के वीडियो जामिया और उत्तर प्रदेश में गाडि़यों, स्कूटरों को तोड़ते हुए खूब वायरल हुए हैं. यही कौंस्टेबल सड़क चलतों से मारपीट कर सकते हैं, ये सरकार के असल हाथ हैं पर इन की भरती बेहद घिनौनी है.

महाराष्ट्र में औनलाइन एग्जाम को न करने की जो अपील की जा रही है वह सही है, क्योंकि चाहे औनलाइन में स्काइप से फोटो चालू रहे, बेईमानी की गुंजाइश कई गुना है. कौंस्टेबलों की भरती साफसुथरी हो, यह देश की जनता की आजादी के लिए जरूरी है. उन्हें निचले पद पर तैनात अदना आदमी न सम झें, असल में वही सरकार की आंख व हाथ हैं. अगर दलितों, पिछड़ों, मुसलिमों को अपनी जगह बनानी है तो जम कर इस भरती में हिस्सा लेना चाहिए और पुलिस फोर्स को भर देना चाहिए, ताकि उन पर जुल्म न हों.

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किसान हुए बेहाल

आम आदमी की जरूरत की चीजों जैसे प्याज, आलू, दूध के दाम बढ़ने पर सरकार लगातार मौसम को दोष दे रही है. कभी कहते हैं कि सूखा पड़ गया है तो कभी कहते हैं कि बेमौसम की बारिश हो गई. पर जिस भी किसान को जिस आलू से 5 रुपए किलो न मिलते हों और प्याज से 2 रुपए किलो न मिलते हों वह आलू बाजार में 30 रुपए से 50 रुपए और प्याज 75 से 125 रुपए तक हो जाए, एक बड़ी बेवकूफी और साजिश का नतीजा होने के अलावा कुछ और नहीं.

बेवकूफी यह है कि पिछले 2 सालों में भारतीय जनता पार्टी ने किसानों के युवा बच्चों को बड़ी गिनती में भगवा दुपट्टे पहना कर सड़कों पर दंगे करवाने के लिए उतार दिया है. किसानी दोस्तों के साथ नहीं की जाती. यह उबाऊ होती है. मेहनत का काम होती है. जिन लड़कों के पास पहले बाप के साथ खेत पर काम करने के अलावा कुछ और नहीं होता था, उन्हें चौराहे पर खड़ा कर के हिंदू राष्ट्र बनाने के भाषण देने पर लगा दिया है. वे ट्रकों में बैठ कर सैकड़ों मीलों दूर मंदिरों में घंटे बजाने भी जाने लगे और भगवा आंदोलन में भी.

बाप बेचारा बेटे को पाले भी, जेबखर्च का पैसा भी दे और खेत पर काम भी करे. पहले जब 12-13 साल के लड़के किसान का हाथ बंटाने आ जाते थे, आज खेतों में सफेद बालों वाले कमर तोड़ते आदमीऔरत नजर आते हैं.

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साजिश यह है कि जरा सी फसल कम होने पर दाम 4-5 गुना तक बढ़ सकते हैं. किसान से हमेशा की तरह पुराने दामों पर माल खरीद कर गांवों, कसबों और शहरों के गोदामों में भरा जाने लगा है. व्यापारीआढ़ती जानते हैं कि किसान निकम्मा होने लगा है और न वह कम फसल होने पर फसल जमा कर के रख सकता है, न उस के पास फसल बढ़ाने का तरीका है. वह यह भी जानता है कि उस का थोड़ा पढ़ालिखा बेटा तो हिंदू धर्म को बचाने में लगा है, खेत की फसल से उसे क्या लेनादेना?

व्यापारीआढ़ती का बेटा पढ़ कर बाप को कंप्यूटर चलाना सिखाता है, किसान का बेटा बाप को मुसलमान और दलित से नफरत का पाठ पढ़ाने लगा है या गांव में अपनी जाति का मंदिर बनाने के लिए उकसाने लगा है.

देश की उपजाऊ जमीन पर अब पूजापाठी नारों की फसल लहलहा रही है. भला आलूप्याज की क्या औकात कि वे मुकाबला कर सकें.

मजहब गरीबों का सब से बड़ा दुश्मन

बिहार में बहुत ज्यादा गरीबों की हालत कमोबेश वही है, जो आजादी के पहले थी. आज भी निहायत गरीब रोटी, कपड़ा, मकान, तालीम और डाक्टरी सेवाओं जैसी बुनियादी जरूरतों से कोसों दूर है. समाज में पंडेपुजारियों, मौलाना और नेताओं के गठजोड़ ने आम लोगों को धार्मिक कर्मकांड, भूतप्रेत, यज्ञहवन के भरमजाल में उल झा कर रख दिया है.

पंडेपुजारियों द्वारा दलित और कमजोर तबके के बीच इस तरह का माहौल बना दिया है कि ये लोग अपना कामकाज छोड़ कर धार्मिक त्योहारों, पूजापाठ, पंडाल बनवाने के लिए चंदा करने, नाचगाने, यज्ञहवन कराने में अपने समय को गंवा रहे हैं. कसबों और गांवों में भी महात्माओं के प्रवचन, रामायण कथा पाठ, पुत्रेष्टि यज्ञ समेत कई तरह के धार्मिक आयोजन आएदिन कराए जाते हैं. इन कार्यक्रमों का फायदा साधुसंन्यासी, पंडेपुजारी वगैरह उठाते हैं.

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गांवों में यज्ञ का आयोजन किया जाता है. उस यज्ञ की शुरुआत जलभरी रस्म के साथ होती है. नदी से हजारों की तादाद में लड़कियां और औरतें सिर पर मिट्टी के बरतन में नदी का जल ले कर कोसों दूरी तय कर आयोजन की जगह तक पहुंचती हैं. इस काम में ज्यादातर लड़कियां और औरतें दलित और पिछड़ी जाति की होती हैं और साथ में घोड़े और हाथी पर सवार लोग अगड़ी जाति के होते हैं.

जहां पर यह यज्ञ होता है, वहां अगलबगल के गांव के दलित और पिछड़ी जाति के लोग अपना सारा कामधंधा छोड़ कर इन कार्यक्रमों में बिजी रहते हैं यानी अगड़े समुदाय के लोग मंच संचालन, पूजापाठ और यज्ञहवन कराने में और दलित व पिछड़े तबके के लोग यज्ञशाला बनाने, पानी का इंतजाम करने यानी शारीरिक मेहनत वाला काम करते हैं.

दलित और पिछड़े तबके के बच्चे अपनी पढ़ाईलिखाई छोड़ कर इन्हीं कार्यक्रम में बिजी रहते हैं. गांव में भी अगड़े समुदाय के बच्चे पढ़ाई में लगे रहते हैं. इन कार्यक्रमों में करोड़ों रुपए पानी की तरह बहाए जाते हैं.

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हर गांवकसबे में शिव चर्चा की बाढ़ सी आ गई है. औरतें, मर्द अपने घर का काम छोड़ कर शिव चर्चा में हिस्सा लेते हैं. इन लोगों द्वारा अपने घरों में शिव चर्चा कराने की परंपरा का प्रचलन जोरों पर है. इन्हें नहीं मालूम कि बेटे की नौकरी उस की मेहनत से मिली है, न कि ‘ओम नम: शिवाय’ का जाप करने से. अगर जाप करने से ही सारा काम होने लगे, तो कामधंधा, पढ़ाईलिखाई छोड़ कर लोग जाप ही करते रहें.

धर्म का महिमामंडन

इन धार्मिक आयोजनों के उद्घाटन समारोहों में नीतीश कुमार, रामविलास पासवान, लालू प्रसाद यादव, उपेंद्र कुशवाहा, सुशील कुमार मोदी समेत दूसरे नेता, जो अन्य पिछड़ा वर्ग और दलित समाज से आते हैं, शिरकत करते हैं, इस का महिमामंडन करते हैं. वे ब्राह्मणवादी व्यवस्था की जड़ों में खादपानी देने का काम अपनी कुरसी बचाए रखने के लिए गाहेबगाहे करते रहते हैं.

पंडेपुरोहितों द्वारा लोगों के दिमाग में भर दिया गया है कि उन की गरीबी की वजह पिछले जन्म में किए गए पाप हैं. अगर इस जन्म में अच्छा काम करोगे यानी पंडेपुजारियों और धर्म पर खर्च करोगे, तो अगले जन्म में स्वर्ग मिलेगा.

बच्चों की जन्मपत्री, कुंडली, उन के बड़े होने पर मुंडन, उस से बड़े होने पर शादीब्याह, नए घर में प्रवेश करने पर, किसी की मौत होने पर इन ब्राह्मणों को आज भी इज्जत के साथ बुलाया जाता है और दानदक्षिणा भी दी जाती है. ये लोग मजदूर तबके की कमाई का एक बड़ा हिस्सा बिना मेहनत किए किसी परजीवी की तरह सदियों से लोगों को जाहिल बना कर लूटते रहे हैं.

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गुलाम बनाने की साजिश ‘शोषित समाज दल’ के राष्ट्रीय अध्यक्ष रह चुके रघुनीराम शास्त्री ने बताया कि हमारे लिए मुक्ति का मार्ग धर्मशास्त्र और मंदिरमसजिद नहीं हैं, बल्कि ऊंची पढ़ाईलिखाई, रोजगार अच्छा बरताव और नैतिकता है. तीर्थयात्रा, व्रत, पूजापाठ और कर्मकांड में कीमती समय बरबाद करने की जरूरत नहीं है. धर्मग्रंथों का अखंड पाठ करने, यज्ञ में आहुति देने, मंदिरों में माथा टेकने से हमारी गरीबी कभी दूर नहीं होगी.

भाग्य और ईश्वर के भरोसे नहीं रहें. आप अपना उद्धार खुद करें. जो धर्म हमें इनसान नहीं सम झता, वह धर्म नहीं अधर्म है. जहां ऊंचनीच की व्यवस्था है, वह धर्म नहीं, बल्कि गुलाम बनाने की साजिश है.

स्वर्ग का मजा

पेशे से इंजीनियर सुनील कुमार भारती ने बताया कि सभी धर्म गरीबों को महिमामंडित करते हैं, पर वे गरीबी खत्म करने की बात नहीं करते हैं. कोई फतवा या धर्मादेश इस को खत्म करने के लिए क्यों नहीं जारी किया जाता?

इस धार्मिकता की वजह से साधुओं, फकीरों, मौलवियों, पंडेपुजारियों, पादरियों की फौज मेहनतकश लोगों की कमाई पर पलती है. परलोक का तो पता नहीं, पर इन धार्मिक जगहों के लाखों निकम्मे और कामचोर इस लोक में ही स्वर्ग का मजा ले रहे हैं.

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नोटबंदी, GST और 370 हटानाः दिखने में अच्छे, असल में बेहद नुकसानदेह

शुरू में तो गरीबों को लगा कि जो मंच पर कहा गया है वही सच है कि अमीर लोगों के घरों से कमरे भरभर कर नोट निकलेंगे, काले धन का सफाया हो जाएगा, अमीरों का पैसा सरकारी खजाने से हो कर गरीबों तक आ जाएगा. पर ऐसा कुछ नहीं हुआ और गरीबों को न सिर्फ लाइनों में खड़ा होना पड़ा, अपनी दिहाडि़यों का नुकसान करना पड़ा और उसी वजह से आज सारे उद्योगधंधे बंद होने के कगार पर आ गए हैं.

चतुर नेता वही होता है जो अपनी एक गलती को छिपाने के लिए दूसरी बड़ी गलती करे और फिर तीसरी. हर गलती का सुहावना रूप भी हो जो दिखे, नीचे चाहे भयंकर सड़न और बदबू हो. जीएसटी भी ऐसा ही था, नए टैक्स भी ऐसे ही थे और कश्मीर में की गई आधीअधूरी कार्यवाही भी ऐसी रही.

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तीनों एक से बढ़ कर एक. दिखने में अच्छे, पर असल में बेहद नुकसानदेय.

नोटबंदी के बाद नोटों की कुल गिनती बाजार में कम होने के बजाय बढ़ गई है. 3 साल बाद भी भारतीय रिजर्व बैंक से छपे नोटों की गिनती बढ़ रही है जबकि सरकार हर भुगतान औनलाइन करने को कह रही है. लोग अब अपना पैसा नकदी में रखने लगे हैं. उन्हें तो अब बैंकों पर भी भरोसा नहीं है. जिस काले धन को निकालने के कसीदे पढ़े गए थे और भगवा सोशल मीडिया ने झूठे, बनावटी किस्से और वीडियो रातदिन डाले थे, वे सब अब दीवाली के फुस पटाखे साबित हुए हैं.

अब पैसा धन्ना सेठ नहीं रख रहे, क्योंकि 2000 रुपए के नोटों को नहीं रखा जा रहा है. यह आम आदमी रख रहा है, गरीब रख रहा है, 2000 रुपए के नोट जो पहले 38 फीसदी थे अब घट कर 31 फीसदी रह गए हैं. साफ है कि लोग 500 और 100-200 रुपए के नोट रख रहे हैं. ये गरीब हैं. ये जोखिम ले रहे हैं कि उन के नोट चोरी हो जाएं, गल जाएं, जल जाएं, पर ये बैंक अकाउंट में नहीं रख रहे.

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जीएसटी का भी यही हुआ है. ‘एक देश एक टैक्स’ के नाम पर लोगों को जी भर के बहलाया गया. पूजापाठी जनता जो सोचती है कि उस के सारे दुखों को दूर करने का मंत्र मंदिर या उस के पंडों के पास है, इस पर खूब खुश हुई. अब एकएक कर के सख्त जीएसटी कानून में ढीलें देनी पड़ रही हैं.

इस साल निर्मला सीतारमन ने अमीरों पर 7 फीसदी का टैक्स बढ़ाया था. 3 महीने में उन की हेकड़ी निकल गई और टैक्स वापस ही नहीं लिया गया कुछ छूट और दे दी गई.

‘एक देश एक संविधान एक कानून’ के नाम पर कश्मीर के बारे में अनुच्छेद 370 और 35ए को संविधान से लगभग हटाया गया, पर क्या हुआ? न कश्मीरी लड़कियां देश के बाकी हिस्से के तैयार बैठे भगवाई सोशल मीडिया रणबांकुरों को मिलीं, न ही कश्मीर में जमीन के प्लाट. उलटे देश अरबों रुपए खर्च कर के एक विशाल जेल चला रहा है जहां खाना भी कैदियों को नहीं दिया जा रहा. जो किया गया और जैसे किया गया, उस से साफ है कि 2 पीढ़ी तक तो कश्मीरी भारत को अपना नहीं समझेगा, दूसरे दर्जे का नागरिक बन कर रहना पड़ेगा. आखिर इसी देश का हिंदू सवर्ण भी तो 2000 साल गुलाम बन कर रहा है, कभी शकों का, कभी हूणों का, कभी लोधियों का, कभी मुगलों का और आखिर में अंगरेजों का.

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आज भी देश का पिछड़ा और दलित वर्ग दूसरे दर्जे का नागरिक है. इन में अब कश्मीरी भी शामिल हो गए हैं.

आतंकवादी सीमा के बाहर से नहीं आ रहे. वे छत्तीसगढ़ के जंगलों में भी नहीं हैं. वे नक्सलबाड़ी में भी नहीं हैं और न ही दिल्ली की जानीमानी संस्था जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में हैं. वे हमारे देश के सैकड़ों थानों में हैं, पुलिस की वरदी में. उत्तर प्रदेश के पिलखुआ के इलाके के एक थाने में एक सिक्योरिटी गार्ड की घंटों की पिटाई के बाद हुई मौत का समाचार तो यही कहता है कि घरघर, महल्लेमहल्ले में यदि किसी आतंकवादी से डर लगना चाहिए तो वह खाकी वरदी में आने वाले से लगना चाहिए.

इस गार्ड प्रदीप तोमर को पुलिस चौकी में बुलाया गया था पूछताछ के लिए. प्रदीप तोमर अपने 10 साल के बेटे को साथ ले गया था. बेटे को बाहर बैठा कर अंदर चौकी में 8-10 पुलिस वालों ने घंटों उसे मारापीटा और उस पर पेचकशों से हमला किया. दर्द से कराहते प्रदीप तोमर को पानी तक नहीं दिया गया और तब तक मारा गया जब तक वह मर नहीं गया. उस की लाश पर पिटाई और पेचकशों के निशान मौजूद थे.

इन आतंकवादियों को पूरे शासन के सिस्टम का बचाव मिलता है. कोई किसी को 4 थप्पड़ मार दो तो पुलिस वाले पिटने वाले और पीटने वाले दोनों के लिए 10 दिन की रिमांड ले लेते हैं, पर यहां एक आदमी को वहशियाना तरीके से मारने के बाद सिर्फ सस्पैंड किया गया है. 10-20 दिन में जब लोग इस मामले को भूल जाएंगे, ये पुलिसकर्मी नए शिकार की तलाश में लग जाएंगे पूरी वरदी में.

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हिंदी फिल्म ‘दृश्यम’ में इसी तरह की एक महिला आईजी और उस के पुलिसकर्मियों की क्रूरता को अच्छीखासी तरह दिखाया गया था और फिल्म बनाने वाले ने सिर्फ नौकरी से निकलने की सजा दिखाई थी. जेल में पुलिस वाले जाएं, यह तो हम क्या, दुनिया के किसी देश में नहीं दिखाया जा सकता. यही तो पुलिस वालों को आतंकवादी बनाता है.

आतंकवादियों और पुलिस वालों के आतंक के पीछे सोच एक ही है. आतंकवादी भी तो यही कहते हैं कि वे जुल्म ढहाने वाली सरकार के खिलाफ काम कर रहे हैं. वे लुटेरे नहीं, डाकू नहीं, जनता को बचाने के लिए हत्याएं कर रहे हैं. पुलिस वाले भी यही कहते हैं कि वे जनता को बचाने के लिए चोरउचक्कों से जबरदस्ती उगलवाते हैं और कभीकभी कस्टोडियल डैथ हो जाए तो क्या हो गया?

जैसे आजकल नाथूराम गोडसे को पूजा जाने लगा है, वैसे ही आतंकवादियों को हो सकता है कभी पूजा जाने लगे. पुलिस वालों को तो वहशीपन के बावजूद इज्जत और पैसा दोनों एकदम मिल जाते हैं न.

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भारत में हर साल बर्बाद किया जाता है इतना भोजन, वहीं 82 करोड़ लोग सोते हैं भूखे

कुछ दिनों पहले ही एक ऐसी सूची जारी की गई जिसने भारत को शर्मिंदा कर दिया. भारत एशिया की तीसरी बड़ी अर्थव्यवस्था है और दक्षिण एशिया की सबसे बड़ी लेकिन ग्लोबल हंगर इंडेक्स में भारत दक्षिण एशिया में भी सबसे नीचे है. वैश्विक भुखमरी सूचकांक यानी ग्लोबल हंगर इंडेक्स (जीएचआई) में दुनिया के 117 देशों में भारत 102वें स्थान पर रहा है.

यह जानकारी साल 2019 के इंडेक्स में सामने आई है. वेल्थहंगरहिल्फे एंड कन्सर्न वल्डवाइड द्वारा तैयार की गई इस रिपोर्ट के मुताबिक भारत दुनिया के उन 45 देशों में शामिल है जहां ‘भुखमरी काफी गंभीर स्तर पर है.’ साल 2015 में भूखे भारतीयों की संख्या 78 करोड़ थी और अब 82 करोड़. यानी जिस आंकड़े को घटना चाहिए वो बढ़ रहे हैं.

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जीएचआई में भारत का खराब प्रदर्शन लगातार जारी है. साल 2018 के इंडेक्स में भारत 119 देशों की सूची में 103वें स्थान पर था. इस साल की रिपोर्ट में कहा गया है कि 2017 में इस सूचकांक में भारत का स्थान 100वां था लेकिन इस साल की रैंक तुलनायोग्य नहीं है.

वैश्विक भुखमरी सूचकांक लगातार 13वें साल तय किया गया है. इसमें देशों को चार प्रमुख संकेतकों के आधार पर रैंकिग दी जाती है – अल्पपोषण, बाल मृत्यु, पांच साल तक के कमजोर बच्चे और बच्चों का अवरुद्ध शारीरिक विकास.

इस सूचकांक में भारत का स्थान अपने कई पड़ोसी देशों से भी नीचे है. इस साल भुखमरी सूचकांक में जहां चीन 25वें स्थान पर है, वहीं नेपाल 73वें, म्यांमार 69वें, श्रीलंका 66वें और बांग्लादेश 88वें स्थान पर रहा है. पाकिस्तान को इस सूचकांक में 94वां स्थान मिला है. जीएचआई वैश्विक, क्षेत्रीय, और राष्ट्रीय स्तर पर भुखमरी का आकलन करता है. भूख से लड़ने में हुई प्रगति और समस्याओं को लेकर हर साल इसकी गणना की जाती है.

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जीएचआई को भूख के खिलाफ संघर्ष की जागरूकता और समझ को बढ़ाने, देशों के बीच भूख के स्तर की तुलना करने के लिए एक तरीका प्रदान करने और उस जगह पर लोगों का ध्यान खींचना जहां पर भारी भुखमरी है, के लिए डिजाइन किया गया है.इंडेक्स में यह भी देखा जाता है कि देश की कितनी जनसंख्या को पर्याप्त मात्रा में भोजन नहीं मिल रहा है. यानी देश के कितने लोग कुपोषण के शिकार हैं.

ये तो रही महज आंकड़ों की बात. अब हम कुछ जमीनी स्तर पर भी इसकी पड़ताल कर लें. भारत में भले ही विकास के नए आयामों को छू रहा है लेकिन विश्व पटल में ऐसे आंकड़े हमारी सारे किए कराए पर पानी फेर देते हैं. भले ही आप अमेरिका के ह्यूस्टन की तस्वीर देखकर ये सोच रहे हों कि विदेशों में भी भारत का डंका बज रहा है. लेकिन वहीं आप का देश भुखमरी में एशिया में सबसे नीचे हैं. आप उन देशों से भी पीछे हैं तो किसी भी तरह भारत से मुकाबले करने के काबिल है ही नहीं.

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भारत 2010 में 95वें नंबर पर था और 2019 में 102वें पर आ गया. 113 देशों में साल 2000 में जीएचआई रैंकिंग में भारत का रैंक 83वां था और 117 देशों में भारत 2019 में 102वें पर आ गया.

एक तरफ तो ये आंकड़ा और दूसरी तरफ एक और आंकड़ा देखिए. संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों के मुताबिक भारत में 40 फ़ीसदी खाना बर्बाद हो जाता है. इन्हीं आंकड़ों में कहा गया है कि यह उतना खाना होता है जिसे पैसों में आंके तो यह 50 हज़ार करोड़ के आसपास पहुंचेगा. विश्व खाद्य संगठन की एक रिपोर्ट के अनुसार दुनिया का हर 7वां व्यक्ति भूखा सोता है.

विश्व भूख सूचकांक में भारत का 67वां स्थान है. देश में हर साल 25.1 करोड़ टन खाद्यान्न का उत्पादन होता है लेकिन हर चौथा भारतीय भूखा सोता है. इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में हर साल 23 करोड़ टन दाल, 12 करोड़ टन फल और 21 करोड़ टन सब्जियां वितरण प्रणाली में खामियों के कारण खराब हो जाती हैं.

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जमीन से बेदखल होते गरीब और आदिवासी

देश के कुदरती संसाधनों यानी जल, जंगल, जमीन पर सभी नागरिकों का समान हक है. कहने को यह बात बड़ी अच्छी लगती है, मगर असलियत में हो क्या रहा है, इस समझने के लिए हाल ही में राजस्थान में घटे 2 मामले काफी हैं:

मामला 1

झुंझुनूं के गुढ़ा उदयपुरवाटी गांव में 25 सदस्यों की वन विभाग की टीम बाबूलाल सैनी के घर में पहुंचती है और घर को हटाने की तैयारी करती है.

बाबूलाल का यहां टीनशैड का पुश्तैनी मकान है, जो उसे अपने बापदादा से विरासत में मिला है.

जोरआजमाइश के बीच बाबूलाल खुद को तेल डाल कर आग के हवाले कर देता है. गंभीर हालत में वह झुंझुनूं के एक अस्पताल से होते हुए जयपुर अस्पताल में भरती हो जाता है.

बाबूलाल का भाई मोतीलाल कहता है कि उन को पहले कोई कानूनी नोटिस नहीं दिया गया.

मामला 2

नागौर के राउसर की बंजारा बस्ती को हटाने के लिए जेसीबी समेत भारी पुलिस व प्रशासनिक अमला मौके पर पहुंचता है. जेसीबी चला कर कच्चेपक्के मकानों को तोड़ दिया जाता है.

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इस दौरान बस्ती के तमाम लोगों व प्रशासनिक अमले के बीच झड़प शुरू हो जाती है. नतीजतन, जेसीबी चालक के सिर पर चोट लगने से उस की मौके पर ही मौत हो जाती है.

इस देश में विकास के नाम पर 14 राज्यों में करोड़ों आदिवासियों को उन जमीनों से खदेड़ कर फेंका गया है, जिन पर वे सैकड़ों साल से रह रहे थे.

हाल ही में उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जिले में 10 आदिवासियों को भी गुंडों ने इसीलिए मार दिया था.

राजस्थान में पिछले दिनों शेखावटी इलाके में एक किसान ने खुद पर तेल छिड़क कर इसलिए आग लगा ली थी, क्योंकि 3 पीढ़ी जिस जमीन पर रहती आई थीं, उस को अवैध कब्जा बता कर प्रशासन तोड़ने पहुंच गया था.

नागौर में 25 अगस्त, 2019 को जिस बस्ती वालों को उजाड़ा गया, उन के उस पते पर वोटर आईडी कार्ड, आधारकार्ड बने हुए थे. बिजली विभाग के दिए कनैक्शन थे. ‘स्वच्छ भारत मिशन’ के तहत सरकार ने शौचालय बनवाए थे.

मतलब, उस पते पर हर वह दस्तावेज बना हुआ था, जो भारत के नागरिक के पास होता है, फिर यह गैरकानूनी कब्जा कैसे हो गया? अगर यह गैरकानूनी कब्जा था तो गांव के सरपंच, पटवारी, तहसीलदार, एसडीएम, डीएम, बिजली विभाग के एईएन, बीडीओ वगैरह इस के जिम्मेदार व कुसूरवार हैं.

बात सिर्फ यह नहीं है कि यह अवैध कब्जा था, बल्कि असल बात भूमाफिया व अधिकारियों की मिलीभगत की है. नागौर शहर की आधी से ज्यादा सरकारी जमीन पर भूमाफिया का कब्जा है और उस को हटाने का कोर्ट का आदेश भी है, मगर अधिकारी उन का हरमुमकिन बचाव कर रहे हैं, क्योंकि बात हिस्सेदारी की है.

आजादी से पहले इस देश में हर नागरिक को सरकारी जमीन पर रहने का हक था. आजादी के बाद हुई पहली पैमाइश में जहांजहां भी लोग स्थायी रूप से रह रहे थे, उसे आबादी भूमि दर्ज कर के तत्कालीन स्थायी आवास करने वाली जनसंख्या को आवास का अधिकार तो दे दिया, पर इन दिनों घुमक्कड़ रह कर जिंदगी बिताने वाली बंजारा, गाडि़या लोहार, बागरिया, कंजर, नाथ, जोगी, सपेरा जैसी अनेक जातियों को आवास के लिए किसी न किसी सरकारी जमीन पर ही बसना पड़ा.

लोकतंत्र में लोक जब जातिधर्म में बिखर जाता है, तो गुंडेमवाली जोरजुल्म करने लग जाते हैं. विधायकों, सांसदों, मंत्रियों की जमीनों की जांच की जाए तो 99 फीसदी के फार्महाउस, बंगले गैरकानूनी कब्जे की जमीन पर मिलेंगे.

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राजस्थान का ही हाल देखा जाए तो आधी आबादी वन भूमि, गोचर, पहाड़ी, पड़त, बंजर वगैरह इलाकों में रहती है और हजारों सालों से रह रही है. आजादी के बाद भूसुधार अधिनियम लागू करना था, मगर तत्कालीन राजारजवाड़ों से निकले नेताओं की हठ के चलते ठीक से लागू नहीं हो पाया.

निजी कंपनियों को ये ही जमीनें कौडि़यों के भाव में दी जा रही हैं. जगहजगह भूमाफिया ने सरकारी जमीनों पर कब्जा कर रखा है, जिस में नेताओं का संरक्षण व हिस्सेदारी शामिल है.

आजादी के बाद राजस्थान के तत्कालीन किसान नेताओं ने टेनेंसी ऐक्ट के जरीए किसानों को खेती वाली जमीन का मालिक जरूर बना दिया, मगर उन के घरों के संबंध में ठोस कानून नहीं बन पाए.

वजह यह है कि मुख्यधारा से कटी भारत के वनों पर आश्रित एक बड़ी आबादी को देश की सर्वोच्च अदालत में अपना आशियाना बचाने की लड़ाई लड़नी पड़ रही है.

हाल ही में अनुसूचित जनजाति एवं अन्य परंपरागत वनवासी (वनाधिकारों की मान्यता) अधिनियम, 2006 की संवैधानिकता को चुनौती देने वाली एक याचिका पर सुनवाई के बाद सर्वोच्च अदालत ने वनों पर आश्रित आदिवासी समुदायों को अतिक्रमणकारी घोषित करते हुए वनभूमि से बेदखल करने का फरमान सुनाया था.

संसद में 18 दिसंबर, 2006 को अनुसूचित जाति एवं अन्य परंपरागत वनवासी (वनाधिकारों की मान्यता) अधिनियम, 2006 सर्वसम्मति से पास किया गया था. एक साल बाद 31 दिसंबर, 2007 को इसे लागू करने की अधिसूचना जारी की गई थी.

इस से पहले भारत में वनों के संबंध में साल 1876 से साल 1927 के बीच पास किए गए भारतीय वन कानूनों के प्रावधानों को ही लागू किया जाता था. एक लंबे वक्त तक साल 1927 का वन कानून ही भारत का वन कानून रहा.

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हालांकि ऐसे किसी भी कानून का पर्यावरण और वन सरंक्षण से कोई सरोकार नहीं था, लेकिन फिर भी पर्यावरण और वन संरक्षण के नाम पर जहांतहां इस का बेजा इस्तेमाल किया जाता रहा. भारत सरकार की टाइगर टास्क फोर्स ने भी यह माना है कि वन संरक्षण के नाम पर गैरकानूनी और असंवैधानिक रूप से जमीनों का अधिग्रहण किया जा रहा है.

दलितों की बदहाली

सुप्रीम कोर्ट भी किस तरह दलितों को जलील करता है इस के उदाहरण उस के फैसलों में मिल जाएंगे. देशभर में दलितों को बारबार एहसास दिलाया जाता है कि संविधान में उन्हें बहुत सी छूट दी हैं पर यह कृपा है और उस के लिए उन्हें हर समय नाक रगड़ते रहनी पड़ेगी. महाराष्ट्र म्यूनिसिपल टाउनशिप ऐक्ट में यह हुक्म दिया गया है कि अगर दलित या पिछड़ा चुनाव लड़ेगा तो उस को अपनी जाति का सर्टिफिकेट नौमिनेशन के समय या चुने जाने के 6 महीने में देना होगा.

यह अपनेआप में उसी तरह का कानून है जैसा एक जमाने में दलितों को घंटी बांध कर घूमने के लिए बना था ताकि वे ऊंची जातियों को दूर से बता सकें कि वे आ रहे हैं. यह वैसा ही है जैसा केरल की नीची जाति की नाडार औरतों के लिए था कि वे अपने स्तन ढक नहीं सकतीं ताकि पता चल सके कि वे दलित अछूत हैं. दोनों मामलों में इन लोगों से जी भर के काम लिया जा सकता था पर दूरदूर रख कर.

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कानून यह भी कहता है कि हर समय अपना जाति प्रमाणपत्र रखो. क्यों? ब्राह्मणों को तो हर समय या कभी भी अपना जाति सर्टिफिकेट नहीं चाहिए होता तो पिछड़े दलित ही क्यों लगाएं? क्यों वे कलेक्टर, तहसीलदार से अपना सर्टिफिकेट बनवाएं? उन्होंने किसी आरक्षित सीट के लिए कह दिया कि वे पिछड़े या दलित हैं तो मान लिया जाए. आज 150 साल की अंगरेजी पढ़ाई, बराबरी के नारों के बावजूद भी क्यों जाति का सवाल उठ रहा है? क्या पढ़ेलिखे विद्वानों के लिए 150 साल का समय कम था कि वे जाति का सवाल ही नहीं मिटा सकते थे? जब हम मुगलों और ब्रिटिशों के राज से छुटकारा पा सकते थे तो क्या दलित पिछड़े के तमगों से नहीं निकल सकते थे?

यहां तो उलट हो रहा है. शंकर देवरे पाटिल के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने उस कानून को सही ठहराया है जिस ने यह जबरन कानून थोप रखा है कि आरक्षित सीट पर खड़े होना है तो सर्टिफिकेट लाओ. यह अपमानजनक है. यह दलितों, पिछड़ों को एहसास दिलाने के लिए है कि वे निचले, गंदे, पैरों की धूल हैं. यह बराबरी के सिद्धांत के खिलाफ है.

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दलितों और पिछड़ों को जो भी छूट मिले उन्हें बिना किसी प्रमाणपत्र लटकाए मिलनी चाहिए. अगर ऊंची जाति का कोई उस का गलत फायदा उठाए तो उस के लिए सजा हो, दलित पिछड़े के लिए नहीं. वैसे भी ऊंची जाति का कोई दलित पिछड़े को दोस्त तक नहीं बनाता, वह उन की जगह कैसे लेगा? ऊंची जातियों का आतंक इतना है कि नीची जाति वाले तो हर समय चेहरे पर ही वैसे ही अपने सर्टिफिकेट गले में लटकाए फिरते हैं. नरेंद्र मोदी कहते रहें कि हिंदू आतंकवादी नहीं हैं पर लठैतों के सहारे दलितों और पिछड़ों पर जो हिंदू आतंक 150 साल में नई हवा के बावजूद भी बंद नहीं हुआ, वह सुप्रीम कोर्ट की भी मोहर इसी आतंकवाद की वजह से पा जाता है.

गरीबी बनी एजेंडा

राहुल गांधी का नया चुनावी शिगूफा कि यदि वे जीते तो देश के सब से गरीब 20 फीसदी लोगों को 72,000 रुपए साल यानी 6,000 रुपए प्रति माह हर घर को दिए जाएंगे, कहने को तो नारा ही है पर कम से कम यह राम मंदिर से तो ज्यादा अच्छा है. भारतीय जनता पार्टी का राम मंदिर का नारा देश की जनता को, कट्टर हिंदू जनता को भी क्या देता? सिर्फ यही साबित करता न कि मुसलमानों की देश में कोई जगह नहीं है. इस से हिंदू को क्या मिलेगा?

लोगों को अपने घर चलाने के लिए धर्म का झुनझुना नहीं चाहिए चाहे यह सही हो कि पिछले 5,000 सालों में अरबों लोगों को सिर्फ और सिर्फ धर्म की खातिर मौत की नींद सुलाया गया हो. लोगों को तो अपने पेट भरने के लिए पैसे चाहिए.

यह कहना कि सरकार इस तरह का पैसा जमा नहीं कर सकती, अभी तक साबित नहीं हुआ है. 6,000 रुपए महीने की सहायता देना सरकार के लिए मुश्किल नहीं है. अगर सरकार अपने सरकारी मुलाजिमों पर लाखों करोड़ रुपए खर्च कर सकती है, उस के मुकाबले यह रकम तो कुछ भी नहीं है. यह कहना कि इस तरह का वादा हवाहवाई है तो गलत है, पर सवाल दूसरा है.

सवाल है कि देश की 20 फीसदी जनता को इतनी कम आमदनी पर जीना ही क्यों पड़ रहा है? इस में जितने नेता जिम्मेदार उस से ज्यादा वह जाति प्रथा जिम्मेदार है जिस की वजह से देश की एक बड़ी आबादी को पैदा होते ही समझा दिया जाता है कि उस का तो जन्म ही नाली में कीड़े की तरह से रहने के लिए हुआ है. उन लोगों के पास न घर है, न खेती की जमीन, न हुनर, न पढ़ाई, न सामाजिक रुतबा. वे तो सिर्फ ऊंची जातियों के लिए इतने में काम करने को मजबूर हैं कि जिंदा रह सकें.

देश का ढांचा ही ऐसा है कि इन गरीबों की न आवाज है, न इन के नेता हैं जो इन की बात सुना सकें. उन को समझाने वाला कोई नहीं. गनीमत बस यही है कि 1947 के बाद बने संविधान में इन्हें जानवर नहीं माना गया.

1947 से पहले तो ये जानवर से भी बदतर थे. अमेरिका के गोरे मालिक अपने नीग्रो काले गुलामों की ज्यादा देखभाल करते थे, क्योंकि वे उन के लिए काम करते थे और बीमार हो जाएं या मर जाएं तो मालिक को नुकसान होता था. हमारे ये गरीब तो किसी के नहीं हैं, खेतों के बीच बनी पगडंडी हैं जिस की कोई सफाई नहीं करता. हर कोई इस्तेमाल कर के भूल जाता है.

इन को 72,000 रुपए सालाना दिया जा सकता है. कैसे दिया जाएगा, पैसा कहां से आएगा यह पूछा जाएगा, पर कम से कम इन की बात तो होगी. ऊंची जातियों के लिए यह झकझोरने वाली बात है कि 25 करोड़ लोग ऐसे हैं जो आज इस से भी कम में जी रहे हैं. क्यों, यह सवाल तो उठा है. असली राष्ट्रवाद यही है, मंदिर की रक्षा नहीं.

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