भोजपुरी स्टार खेसारीलाल यादव और आकांक्षा पुरी का Viral Video, फैंस ने कहा ‘वल्गर’

Viral Video : ‘बिग बौस’ ओटीटी सीजन 2 (Bigg Boss OTT 2) में नजर आई ऐक्ट्रैस आकांक्षा पुरी (Akanksha Puri) इन दिनों काफी वायरल हो रही हैं. आप को बता दें कि आकांक्षा पुरी सलमान खान (Salman Khan) के पौपुलर शो ‘बिग बौस’ ओटीटी के सीजन 2 में कंटैस्टैंट के रूप में दिखाई दी थीं और अब वे भोजपुरी इंडस्ट्री में कदम रख चुकी हैं. आकांक्षा पुरी ने हाल ही में भोजपुरी के पौपुलर ऐक्टर खेसारीलाल यादव (Khesari Lal Yadav) के साथ एक म्यूजिक वीडियो किया है, जिसे लोगों ने खूब पसंद किया है.

आकांक्षा पुरी (Akanksha Puri) और खेसारीलाल यादव (Khesari Lal Yadav) के इस म्यूजिक वीडियो का नाम है ‘लटक जाइबा’ (Latak Jaiba) और इस वीडियो पर अब तक 59 मिलियन से भी ज्यादा व्यूज आ चुके हैं. आकांक्षा पुरी और खेसारीलाल यादव का एक वीडियो जम कर वायरल हो रहा है, जिसे कुछ लोग वल्गर भी कह रहे हैं और इस वीडियो के चलते लोग आकांक्षा पुरी को काफी बुरी तरह से ट्रोल कर रहे हैं.

 

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दरअसल, इस वायरल वीडियो में खेसारीलाल यादव (Khesari Lal Yadav) आकांक्षा पुरी (Akanksha Puri) को अप ने ऊपर बैठा कर जिम में पुलअप्स कर रहे हैं. ऐसे में कई फैंस ने तो उन्हें ट्रोल कर ऐसे कमैंट्स भी किए हैं कि ‘यह कौन सी ऐक्सरसाइज है?’

इस कंट्रोवर्सी के चलते खेसारीलाल यादव ने अभी तक कुछ नहीं कहा है, लेकिन हाल ही में हुए एक इंटरव्यू में आकांक्षा पूरी ने इस मामले में चुप्पी तोड़ी है.

आकांक्षा पुरी (Akanksha Puri) ने एक इंटरव्यू के दौरान कहा, “वे दोनों अब रुकने वाले नहीं हैं. दोनों की कंर्ट्रोवर्सी अब यों ही चलती रहेगी.”

आकांक्षा पुरी ने आगे कहा, “मीडिया वाले बारबार मुझे ही पकड़ रहे हैं. आप लोग उन्हें भी जा कर कुछ तो बोलिए. अभी तो सिर्फ एक ही गाना वायरल हुआ है. आगेआगे देखिए क्याक्या वायरल होता है.”

आप को बता दें कि आकांक्षा पुरी (Akanksha Puri) ने इस से पहले कई फिल्म्स और म्यूजिक वीडियोज में काम किया है, जिन में तमिल, मलयालम, कन्नड़ और हिंदी फिल्म्स भी शामिल हैं.

Live-In Relationship बम है या बर्फ

Live-In Relationship : इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक अपनी एक खास टिप्पणी में कहा है कि समाज में ‘लिवइन’ संबंधों को मंजूरी नहीं मिली है, लेकिन नौजवान पीढ़ी इन संबंधों की ओर खिंच रही है. अदालत के मुताबिक, अब समय आ गया है कि समाज में नैतिक मूल्यों को बचाने के लिए हमें कुछ रूपरेखा तैयार करनी चाहिए और समाधान निकालना चाहिए.

जस्टिस नलिन कुमार श्रीवास्तव ने कहा, “हम बदलते समाज में रहते हैं जहां परिवार, समाज या कार्यस्थल पर युवा पीढ़ी का नैतिक मूल्य और सामान्य आचरण बदल रहा है.”

अदालत ने इस टिप्पणी के साथ वाराणसी जिले के आकाश केशरी को जमानत दे दी.

आकाश केशरी के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) और अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति अधिनियम की विभिन्न धाराओं के तहत सारनाथ थाने में मामला दर्ज किया गया था.

अदालत ने कहा कि जहां तक ‘लिवइन संबंध’ का सवाल है, इसे कोई सामाजिक मंजूरी नहीं मिली है, लेकिन नौजवान लोग ऐसे संबंधों की ओर खिंचते हैं, क्योंकि वे अपने साथी के प्रति अपनी जिम्मेदारी से आसानी से बच सकते हैं.

लिवइन रिलेशनशिप एक तरह का ऐसा संबंध है, जहां 2 लोग एकसाथ रहते हैं और एक दूसरे के साथ भावनात्मक और शारीरिक संबंध बनाते हैं, लेकिन वे शादीशुदा नहीं होते हैं या उन में किसी भी तरह के औपचारिक संबंध में नहीं होते हैं. वे अपने संबंध को अपने तरीके से चलाते हैं और अपने फैसले लेते हैं.

लिवइन रिलेशनशिप के फायदे

-यह दोनों लोगों को अपने संबंध को अपने तरीके से चलाने की आजादी देता है.

-यह दोनों लोगों को एकदूसरे के साथ समय बिताने और एकदूसरे के साथ भावनात्मक और शारीरिक संबंध बनाने का मौका देता है.

-यह दोनों लोगों को अपने संबंध को अपने तरीके से खत्म करने की आजादी देता है.

लिवइन रिलेशनशिप के नुकसान

-यह दोनों लोगों को समाज में अलगथलग महसूस करा सकता है.

-यह दोनों लोगों को अपने संबंध को औपचारिक रूप से मंजूरी नहीं दिला सकता है.

आइए देखिए और समझिए कई चर्चित लोगों की लिवइन रिलेशनशिप :

सैफ अली खान और रोसा कैटरीना ने साल 2011 में लिवइन रिलेशनशिप में रहना शुरू किया था, लेकिन बाद में वे दोनों अलग हो गए.

करीना कपूर और सैफ अली खान ने साल 2007 में लिवइन रिलेशनशिप में रहना शुरू किया था और साल 2012 में शादी कर ली थी.

कोंकणा सेन शर्मा और रणवीर शौरी ने साल 2007 में लिवइन रिलेशनशिप में रहना शुरू किया था और साल 2010 में शादी कर ली थी. साल 2020 में उन का तलाक हो गया था.

नेहा धूपिया और रोहन रोशन ने साल 2008 में लिवइन रिलेशनशिप में रहना शुरू किया था, लेकिन बाद में वे दोनों अलग हो गए थे.

अनुराग कश्यप और कल्कि कोचलिन ने साल 2011 में लिवइन रिलेशनशिप में रहना शुरू किया था, फिर शादी की और साल 2015 में तलाक ले लिया था.

दरअसल, यह जानकारी सार्वजनिक रूप से मुहैया है और इन लोगों ने अपने रिश्तों के बारे में खुल कर बात की है.

Hindi Crime Story : बेरहमी से की दोस्त की हत्या, कट्टे में भरकर जंगल में फेंकी लाश

Hindi Crime Story : अपनी आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए शशिबाला ने पति इंद्रपाल के पैसे वाले दोस्त टिंकू की तरफ प्यार के कदम बढ़ा तो दिए लेकिन एक दिन हालात ऐसे हो गए कि दोनों ने इंद्रपाल को ही ठिकाने लगा दिया.  शशिबाला अपनी छोटी बहन सुषमा के साथ 20 मार्च, 2014 को दोपहर के समय उत्तरपूर्वी दिल्ली के थाना न्यू उस्मानपुर पहुंची. थानाप्रभारी महावीर सिंह से मुलाकात कर उस ने बताया कि उस का पति इंद्रपाल 18 मार्च से गायब है. हम ने सभी जगह देख लिया, लेकिन उन का कहीं भी पता नहीं चला.

‘‘वह कहां से लापता हुए हैं. ’’ थानाप्रभारी ने पूछा.

‘‘मैं उन्हें घर पर ही छोड़ कर गई थी. हम यहीं गौतम विहार की गली नंबर 5 में रहते हैं.’’ शशिबाला बोली.

‘‘जब उन्हें घर पर ही छोड़ कर गई थीं तो वह गायब कैसे हो गए?’’

‘‘साहब, न्यू उस्मानपुर के जयप्रकाशनगर में मेरी यह छोटी बहन सुषमा रहती है. होली के अगले दिन मैं बच्चों को ले कर इस के यहां होली मिलने चली गई थी. उस समय वह घर पर बैठे शराब पी रहे थे. जब मैं वापस आई तो वह नहीं मिले. कमरे पर ताला लगा था. मैं ने उन का फोन मिलाया, जो स्विच औफ मिला. तब मैं ने सोचा कि अपने यारदोस्तों के साथ कहीं खापी रहे होंगे. क्योंकि ऐसा वह अकसर करते रहते थे. लेकिन अब तक उन का कहीं पता नहीं चला तो मैं थाने आई हूं.’’ शशिबाला ने बताया.

शशिबाला से बातचीत करने के बाद थानाप्रभारी ने उस के पति इंद्रपाल की गुमशुदगी थाने में दर्ज करा कर जांच हेडकांस्टेबल श्रीपाल को सौंप दी. हेडकांस्टेबल श्रीपाल ने सब से पहले दिल्ली के समस्त थानों में इंद्रपाल के हुलिया के साथ उस की गुमशुदगी की सूचना वायरलेस से प्रसारित करा दी. गौतम विहार का इलाका हेडकांस्टेबल श्रीपाल की बीट में ही आता था, इसलिए उन्होंने इलाके के लोगों से उस के बारे में छानबीन शुरू की. इस में उन्हें पता चला कि वह यारदोस्तों के साथ शराब पीने का शौकीन था.

हेडकांस्टेबल श्रीपाल को यह भी जानकारी मिली कि इंद्रपाल ने 2 कमरे किराए पर ले रखे थे, जिन में से एक कमरा उस ने टिंकू नाम के युवक को दे रखा था. इंद्रपाल उस के साथ भी खातापीता था. इंद्रपाल के गायब होने के बाद टिंकू भी लापता था. उस के कमरे पर भी ताला लटका मिला. हेडकांस्टेबल श्रीपाल ने जो जांच की थी वह सब थानाप्रभारी को बता दी. एक की जगह 2 लोग गायब थे, इसलिए थानाप्रभारी को यह मामला संदिग्ध लगा. उन्होंने यह जानकारी अपने उच्चाधिकारियों को दे दी. डीसीपी के निर्देश पर एसीपी अमित शर्मा को नेतृत्व में एक पुलिस टीम बनाई गई, जिस में थानाप्रभारी महावीर सिंह, इंसपेक्टर जितेंद्र सिंह, एसआई पंकज तोमर, हेडकांस्टेबल श्रीपाल, प्रदीप शर्मा, कांस्टेबल अनिल कुमार, सोनू राठी, सचिन खोखर आदि को शामिल किया गया.

पुलिस टीम सब से पहले गौतम विहार में उस कमरे पर गई, जहां इंद्रपाल और टिंकू रहते थे. पड़ोसियों ने बताया कि वे दोनों मंगलवार यानी 18 मार्च से दिखाई नहीं दिए हैं. इंसपेक्टर जितेंद्र सिंह ने इंद्रपाल की पत्नी शशिबाला से टिंकू के बारे में पूछा तो उस ने बताया कि टिंकू उसे कई दिनों से नहीं दिखा है. शशिबाला से टिंकू का मोबाइल नंबर ले कर जितेंद्र सिंह ने उसे अपने फोन से मिलाया तो उस का फोन नंबर स्विच औफ मिला. दोनों के ही फोन स्विच औफ मिलने की बात पुलिस के गले नहीं उतर रही थी. इंद्रपाल के लापता होने की जानकारी मिलने पर उस के चाचा दिनेश कुमार और चेचरा भाई संजय कुमार भी थाना न्यू उस्मानपुर पहुंच चुके थे. उन्होंने भी पुलिस पर इंद्रपाल का जल्द से जल्द पता लगाने का दबाव बनाया. पुलिस ने उन्हें किसी तरह समझाया.

जो 2 लोग गायब थे, पुलिस के पास उन के केवल फोन नंबर थे और वे भी बंद थे, इस के अलावा पुलिस के पास ऐसी कोई चीज नहीं थी, जिस से उन दोनों के बारे में कुछ पता चल सके. पूछताछ के लिए सिर्फ इंद्रपाल की पत्नी शशिबाला ही बची थी. इंसपेक्टर जितेंद्र सिंह ने शशिबाला से मालूमात की तो उस ने वही बातें उन के समने दोहरा दी, जो पहले थानाप्रभारी को बताई थीं. इंसपेक्टर जितेंद्र सिंह उस से पूछताछ कर रहे थे तो शशिबाला बोली, ‘‘साहब, अब मैं अपने गांव जाना चाहती हूं. मैं ने पति की गुमशुदगी की जो सूचना दर्ज कराई थी, उसे वापस लेना चाहती हूं. मैं पुलिस के किसी लफड़े में नहीं पड़ना चाहती. वह कहीं गए होंगे, अपने आप घर लौट आएंगे.’’ शशिबाला हापुड़ के पटना मुरादपुर गांव की रहने वाली थी.

शशिबाला के मुंह से यह बात सुन कर जितेंद्र सिंह चौंके कि पता नहीं यह कैसी औरत है जो पति के गुम हो जाने के बाद भी इस तरह की बातें कर रही है. उस ने एक बार भी पुलिस से यह नहीं कहा कि उस के पति का जल्द पता लगाया जाए. पति के गायब होने पर जिस तरह कोई महिला परेशान हो जाती है, ऐसी कोई परेशानी शशिबाला के चेहरे पर नहीं दिख रही थी. वह एमदम सामान्य थी. इस से इंसपेक्टर जितेंद्र सिंह को उस पर शक होने लगा. बहरहाल उन्होंने उस समय तो उस से कुछ नहीं कहा, लेकिन उस की गतिविधियों पर नजर रखने के लिए हेडकांस्टेबल श्रीपाल को लगा दिया.

23 मार्च को शशिबाला, उस की बहन सुषमा, बहनोई विक्रम फिर थाने आए. इंद्रपाल के रिश्तेदार भी उस समय थाने में ही थे. तभी सुषमा ने इंसपेक्टर जितेंद्र सिंह को बताया, ‘‘सर, कल रात शशिबाला उस के कमरे पर थी. रात करीब 8 बजे टिंकू भी उस के घर आया था. टिंकू ने शशिबाला से अलग में बात की थी. शशिबाला से बात कर के वह चला गया था. उस के चले जाने के बाद मैं ने शशिबाला से पूछा तो उस ने मुझे बताया कि टिंकू ने उस से कहा था कि वह पुलिस के पास चक्कर लगाने के बजाय अपने गांव चली जाए. इंद्रपाल अपने आप लौट आएगा.’’

सुषमा ने आगे कहा, ‘‘सर, मुझे टिंकू पर शक हो रहा है. आखिर वह इस तरह की बातें क्यों कर रहा है? इंद्रपाल जब टिंकू का दोस्त था तो इस परेशानी में उसे हमारा साथ देना चाहिए था, जबकि वह इधरउधर घूमता फिर रहा है.’’

सुषमा ने जैसे ही यह बात पुलिस से कही तो पास में खड़ी शशिबाला उस के कान में फुसफुसाते हुए बोली, ‘‘तुझे यह बात यहां कहने की क्या जरूरत थी?’’

चूंकि जिस दिन से इंद्रपाल गायब था उसी दिन से उस का दोस्त टिंकू भी गायब था. पुलिस को टिंकू की भी तलाश थी. उस के बारे में भी पुलिस को पता नहीं चल रहा था. इंसपेक्टर जितेंद्र सिंह ने सोचा कि कल जब टिंकू शशिबाला से मिला था तो उसे यह बात पुलिस को बता देनी चाहिए थी. लेकिन उस ने ऐसा नहीं किया. दूसरे सुषमा ने टिंकू वाली बात पुलिस को बताई तो शशिबाला उस के कान में खुसरफुसर क्यों कर रही थी? इस का मतलब यह हुआ कि शशिबाला और टिंकू की इस बीच फोन पर भी बातचीत होती रही होगी. इन सब बातों से शशिबाला पर इंसपेक्टर जितेंद्र सिंह का शक का दायरा बढ़ता जा रहा था.

पहले तो पुलिस यही समझ रही थी कि इंद्रपाल के साथ टिंकू भी गायब है, लेकिन अब यह बात साफ हो चुकी थी कि टिंकू कहीं और रह रहा है. वह कहां रह रहा है, इस बात को शशिबाला जरूर जानती होगी. इसलिए इंसपेक्टर जितेंद्र सिंह ने शशिबाला से ही टिंकू के बारे में पूछताछ की तो उस ने साफसाफ कह दिया कि उसे नहीं पता कि अब वह कहां रह रहा है?

जिस समय पुलिस शशिबाला से पूछताछ कर रही थी, सुषमा भी वहीं थी. तभी सुषमा के फोन की घंटी बजी. सुषमा ने काल रिसीव की तो दूसरी ओर से टिंकू की आवाज आई. सुषमा को पता था कि पुलिस टिंकू से पूछताछ करना चाहती है, इसलिए उस ने अपने फोन के स्पीकर पर हथेली रखी, ताकि उस की आवाज टिंकू तक न पहुंचे. फिर वह इंसपेक्टर जितेंद्र सिंह से आहिस्ता से बोली, ‘‘सर, टिंकू का फोन आया है.’’

जितेंद्र सिंह ने उस से धीरे से कहा, ‘‘उसे तुम किसी तरह शास्त्री पार्क बुला लो.’’

सुषमा ने ऐसा ही किया. उस ने टिंकू से बात करनी शुरू की तो टिंकू ने कहा, ‘‘सुषमा जी, मैं आप से एक जरूरी बात करना चाहता हूं.’’

सुषमा ने कहा, ‘‘ठीक है, तुम शास्त्री पार्क बस स्टौप पर आ जाओ. मैं भी वहीं पहुंच रही हूं.’’

इंसपेक्टर जितेंद्र सिंह ने सुषमा द्वारा टिंकू से कही गई बात सुन ली थी, इसलिए वह 2-3 पुलिसकर्मियों को साथ ले कर सुषमा के साथ शास्त्री पार्क बस स्टौप पर पहुंच गए. पुलिस टीम सादा लिबास में थी.

सुबह साढ़े 10 बजे के करीब वहां एक युवक पहुंचा. वह जैसे ही सुषमा से बात करने लगा तो पुलिस ने सोचा कि यही टिंकू होगा, उसे दबोच लिया. पूछताछ में उस ने अपना नाम टिंकू बताया. उसे ले कर पुलिस थाने पहुंची तो उस से पहले शशिबाला थाने से जा चुकी थी. वह वहां से क्यों और कहां गई, यह बाद की बात थी. उस से पहले इंसपेक्टर जितेंद्र सिंह ने टिंकू से इंद्रपाल के बारे में मालूमात की. टिंकू पहले तो उन के सामने झूठ बोलता रहा. लेकिन पुलिस की सख्ती के आगे उस का झूठ ज्यादा देर तक नहीं टिक सका. उस ने स्वीकार कर लिया कि उस ने इंद्रपाल की हत्या करने के बाद उस की लाश को तीसरे पुश्ते के पास डाल दिया है. टिंकू ने बताया था कि उस की हत्या 18 मार्च को ही कर दी गई थी.

उस की लाश को जंगल में डाले हुए 6 दिन हो गए थे. लाश को कहीं जंगली जानवर वगैरह न खा गए हों, इसलिए पुलिस टिंकू को साथ ले कर तीसरे पुश्ते की तरफ चल दी. पुलिस के साथ इंद्रपाल के चाचा और चचेरा भाई भी था. पुलिस तीसरे पुश्ते के पास यमुना खादर पहुंची और वहां टिंकू की निशानदेही पर झाडि़यों से प्लास्टिक का एक कट्टा बरामद किया. उस कट्टे का मुंह एक रस्सी से बंधा हुआ था. टिंकू ने बताया कि इंद्रपाल की लाश इसी कट्टे में है.

इंसपेक्टर जितेंद्र सिंह ने फोन कर के क्राइम इनवैस्टीगेशन टीम को भी वहां बुलवा लिया. क्राइम इनवैस्टीगेशन टीम के सामने जब उस कट्टे को खोला गया तो उस के अंदर रस्सी से लपेटा हुआ एक और कट्टा निकला. उस कट्टे को खोला गया तो उस में एक आदमी की लाश थी. लेकिन उस लाश का सिर गायब था. सिर के बारे में टिंकू से पूछा गया तो उस ने कहा कि सिर को जानवर खा गए होंगे. यह बात जितेंद्र सिंह के गले नहीं उतरी, क्योंकि जब प्लास्टिक के कट्टे रस्सी से बंद थे तो जानवर सिर कैसे खा सकते थे. इस का मतलब टिंकू उन से झूठ बोल रहा था. उन्होंने उस से सख्ती की तो उस ने बताया कि सिर पाइपलाइन के पास खादर में पानी के एक गड्ढे में डाल दिया था.

पुलिस वहां से एक-डेढ़ किलोमीटर दूर टिंकू की बताई जगह पर पहुंची. वहां गैस पाइपलाइन के पास पानी से भरे एक गड्ढे में एक पौलीथिन की थैली दिखाई दी. उस थैली को निकलवाया गया तो उस में सिर निकला. सुषमा और इंद्रपाल के रिश्तेदारों ने उस की पहचान इंद्रपाल के सिर के रूप में की. पुलिस ने इंद्रपाल के सिर और धड़ को कब्जे में ले कर पंचनामा करने के बाद उन्हें पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया और थाने लौट कर इंद्रपाल की गुमशुदगी के मामले को हत्या कर लाश को छिपाने की धाराओं में दर्ज कर लिया.

अब पुलिस यह जानना चाह रही थी कि जिस इंद्रपाल के साथ टिंकू की गहरी दोस्ती थी, उसी इंद्रपाल के उस ने टुकड़े क्यों कर दिए? यह जानने के लिए पुलिस ने टिंकू से पूछताछ की तो इंद्रपाल की हत्या की जो कहानी सामने आई, उस की वजह उस की बीवी शशिबाला निकली. इंद्रपाल मूलरूप से उत्तर प्रदेश के हापुड़ जिले के कस्बा सिंभावली के नजदीक बसे गांव भगवानपुर का रहने वाला था. सन 1999 में उस की शादी जिला हापुड़ के ही गांव पटना मुरादपुर की रहने वाली शशिबाला से हुई थी. जिस दिन शशिबाला की शादी हुई थी, उसी दिन उस की छोटी बहन सुषमा की शादी विक्रम के साथ हुई थी. यानी दोनों बहनों की शादी एक ही मंडप के नीचे हुई थी.

शादी के 7 साल बाद भी शशिबाला जब मां नहीं बनी तो वह बहुत टेंशन में रहने लगी. इंद्रपाल भी परेशान रहता था. उस ने बीवी का इलाज करवाया. जिस की वजह से उस पर कुछ लोगों का कर्ज भी हो गया. वह गांव में खेतीकिसानी करता था. इस काम से उसे अपने ऊपर का कर्ज उतरने की कोई उम्मीद नहीं थी. इसलिए उस ने दिल्ली जा कर कमाने की सोची. उस के गांव के कई लड़के दिल्ली में काम करते थे, इसलिए वह भी दिल्ली आ गया. वह मामूली पढ़ालिखा था, इसलिए उसे उस की इच्छा के मुताबिक नौकरी नहीं मिली. तब उस ने मजबूरी में बेलदारी करनी शुरू कर दी. दिल्ली में इस काम के बदले उसे जो मजदूरी मिल रही थी, वह उस के हिसाब से अच्छी थी. इसलिए कुछ दिनों बाद ही वह पत्नी शशिबाला को भी दिल्ली लिवा लाया और उत्तरपूर्वी दिल्ली के न्यू उस्मानपुर में किराए पर कमरा ले कर रहने लगा.

शशिबाला पहली बार दिल्ली आई थी. यहां आ कर उस का भी मन लग गया. इसी बीच वह एक बेटी की मां बनी. मां बनने के बाद इंद्रपाल और शशिबाला की खुशी का ठिकाना न रहा. उन के दिन हंसीखुशी से गुजर रहे थे. इस के बाद शशिबाला एक और बेटी की मां बनी. 2 बच्चों के जन्म के बाद भी शशिबाला के हुस्न में जबरदस्त आकर्षण था. बल्कि इस के बाद तो उस के रूप में और भी निखार आ गया था. इंद्रपाल जिस ठेकेदार के साथ काम करता था, उस का नाम टिंकू था. टिंकू बिहार के जिला मुंगेर के पहाड़पुर गांव के रहने वाले मुदीन सिंह का बेटा था. बीए पास टिंकू 3 साल पहले काम की तलाश में दिल्ली आया था.

काफी कोशिश के बाद जब उस की कहीं नौकरी नहीं लगी तो उस ने कंस्ट्रक्शन कंपनियों में लेबर सप्लाई का काम शुरू कर दिया. कंस्ट्रक्शन ठेकेदारों के संपर्क में रहरह कर उसे भी मकान बनवाने के काम का अनुभव हो गया. फिर उस ने भी बिल्डिंग कंस्ट्रक्शन के ठेके लेने शुरू कर दिए. इंद्रपाल कुछ दिनों से टिंकू के साथ ही काम कर रहा था. करीब एक साल पहले की बात है. टिंकू का काम उस्मानपुर में चल रहा था. वह वहीं अपने रहने के लिए किराए का कमरा देख रहा था, ताकि अपने काम पर नजर रख सके. किराए के कमरे के बारे में उस ने इंद्रपाल से बात की. इंद्रपाल न्यू उस्मानपुर के गौतम विहार में पवन शर्मा के यहां रहता था. उस ने 2 कमरे किराए पर ले रखे थे.

उस ने टिंकू से कहा, ‘‘मेरे पास 2 कमरे हैं. चाहो तो तुम उन में से एक कमरा ले सकते हो. एक में मेरा परिवार रह लेगा.’’

टिंकू जब उस का कमरा देखने गया तो इंद्रपाल ने अपनी बीवी को बताया कि यह हमारे ठेकेदार हैं और इन्हें हमारा कमरा पसंद आ गया तो यह यहीं रहेंगे. ठेकेदार के घर आने पर शशिबाला ने उस की जम कर खातिरदारी की. 29 साल का टिंकू शशिबाला की मेहमाननवाजी से बहुत प्रभावित हुआ. उसे इंद्रपाल का कमरा भी पसंद आ गया तो अगले दिन से वह वहां रहने लगा. टिंकू कमरे पर अकेला रहता था. उस की आमदनी अच्छी थी, इसलिए वह जी खोल कर पैसे खर्च करता था. चूंकि शशिबाला बराबर वाले कमरे में रहती थी, इसलिए उस की बेटियों के लिए वह अकसर खानेपीने की चीजें लाता रहता था.

जिस की वजह से दोनों बच्चियां उस से घुलमिल गई थीं. कभीकभी वह शराब पीता तो इंद्रपाल को भी अपने कमरे पर बुला लेता था. फ्री में शराब मिलने पर इंद्रपाल की भी मौज आ गई थी. इंद्रपाल जो कमाता था, उस से उस के घर का गुजारा तो हो जाता था, लेकिन वह बीवीबच्चों की फरमाइशें पूरी नहीं कर पाता था. जबकि टिंकू बहुत ठाठबाट से रहता था. 32 साल की शशिबाला की भी कुछ ख्वाहिशें थीं. पति की कमाई से उसे ख्वाहिशें पूरी होती नजर नहीं आ रही थीं. इसलिए उस ने अपने कदम टिंकू की तरफ बढ़ा दिए.  टिंकू जवान और अविवाहित था. अनुभवी शशिबाला ने अपने हुस्न के जाल में उसे जल्द ही फांस लिया. उन दोनों के बीच अवैध संबंध बन गए. यह करीब एक साल पहले की बात है.

अपनी उम्र से छोटे टिंकू के साथ संबंध बन जाने के बाद शशिबाला को अपना 40 वर्षीय पति बासी लगने लगा. अब वह उस में ज्यादा दिलचस्पी नहीं दिखाती. इंद्रपाल सुबह का घर से निकलने के बाद शाम को ही लौटता था, जबकि टिंकू का जब मन होता घर आ जाता था. मौका मिलने पर वे अपनी हसरतें पूरी कर लेते. इस तरह दोनों का यह खेल चलता रहा. टिंकू अब शशिबाला को आर्थिक सहयोग भी करने लगा था. इस के अलावा वह उस के पसंद के कपड़े आदि भी खरीदवा देता. शशिबाला भी उस की खूब सेवा करती. पत्नी की बेरुखी को इंद्रपाल समझ नहीं पा रहा था.

वह पत्नी से इस की वजह पूछता तो वह उलटे उस पर झुंझला जाती. तब इंद्रपाल उस की पिटाई कर देता. अगर उस समय टिंकू घर पर होता तो बीचबचाव कर देता और नहीं होता तो शशिबाला को वह जम कर धुन डालता था. पति द्वारा आए दिन पिटने से शशिबाला आजिज आ चुकी थी. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि उसे पति की पिटाई से कैसे निजात मिले. टिंकू के सामने उस की प्रेमिका की पिटाई हो, यह बात उसे अच्छी नहीं लगती थी. शशिबाला चाहती थी कि वह हमेशा टिंकू के साथ ही पत्नी की तरह रहे. लेकिन इंद्रपाल के होते हुए ऐसा मुमकिन नहीं था.

इस बारे में उस ने टिंकू से भी बात की तो टिंकू ने उसे भरोसा दिलाया कि समय आने दो, सब कुछ ठीक हो जाएगा. शशिबाला जानती थी कि टिंकू जो कहता है, उस काम को पूरा जरूर कर देता है. इसलिए उसे विश्वास था कि वह पति से छुटकारा दिलाने का कोई न कोई रास्ता जरूर निकाल लेगा. होली के मौके पर टिंकू ने इंद्रपाल के बीवीबच्चों पर खूब खर्च किया. खानेपीने के सामान के अलावा उस ने बच्चों को भी रंग और उन की पसंद की पिचकारियां दिलवाईं. बड़ी हंसीखुशी से त्यौहार मनाया. इंद्रपाल को भी जम कर शराब पिलाई.18 मार्च, 2014 को इंद्रपाल का नशा उतरा तो किसी बात को ले कर उस की पत्नी से कहासुनी हो गई. उस समय दोनों बेटियां छत पर खेल रही थीं.

दोनों के बीच झगड़ा बढ़ा तो इंद्रपाल ने उस की पिटाई करनी शुरू कर दी. इत्तफाक से टिंकू उस समय कमरे पर ही था. शोरशराबा सुन कर टिंकू वहां पहुंच गया. उस ने जब इंद्रपाल को रोकना चाहा तो इंद्रपाल ने उल्टे उसे ही झटक दिया. इस पर टिंकू को भी गुस्सा आ गया. उस ने इंद्रपाल को जोर से धक्का दिया तो इंद्रपाल का सिर दीवार से टकरा गया. दीवार से सिर टकराने पर इंद्रपाल बेहोश हो कर नीचे गिर गया. यह देख कर टिंकू और शशिबाला घबरा गए. उन दोनों ने सोचा कि इंद्रपाल शायद मर चुका है. शशिबाला ने टिंकू से कहा, ‘‘अब सब कुछ तुम्हें ही संभालना है, मैं अभी अपनी बहन सुषमा के घर जा रही हूं. जब काम हो जाए तो फोन कर देना.’’

इंद्रपाल को ठिकाने लगाने का टिंकू के पास इस से अच्छा मौका नहीं था. उस ने उसी समय दोनों हाथों से उस का गला घोंट दिया. इस के बाद इंद्रपाल का शरीर ठंडा पड़ता गया. इंद्रपाल की हत्या के बाद उस के सामने इस बात की समस्या यह थी कि लाश को ठिकाने कहां लगाए. तब तक शशिबाला दोनों बेटियों को ले कर वहां से 200 मीटर दूर जयप्रकाश नगर में रहने वाली सुषमा के यहां चली गई थी. कुछ देर सोचने के बाद टिंकू ने नांगलोई के चंदन विहार में रहने वाले अपने दोस्त संदीप को फोन कर के कहा, ‘‘यार संदीप, इस समय मैं एक बड़ी मुसीबत में फंस गया हूं. तू इसी समय मेरे कमरे पर आ जा.’’

23 वर्षीय संदीप भी मूलरूप से टिंकू के ही गांव का रहने वाला था. वह 3 साल पहले ही दिल्ली आया था. फिलहाल वह टिंकू के साथ ही राजमिस्त्री का काम कर रहा था. दोस्त टिंकू की परेशानी की बात सुन कर संदीप तुरंत अपने कमरे से निकल गया और रात करीब 8 बजे टिंकू के कमरे पर पहुंच गया. उस समय तक टिंकू लाश को ठिकाने लगाने के लिए बाजार से गंडासा और प्लास्टिक के कुछ खाली कट्टे, रस्सी खरीद लाया था. संदीप कमरे पर पहुंचा तो टिंकू ने कहा, ‘‘यार, यह अपनी पत्नी से झगड़ रहा था, मैं ने बीचबचाव किया तो इस का सिर दीवार से लग गया और इस का काम तमाम हो गया. अब यह मुसीबत गले पड़ी है तो इसे ठिकाने लगाना भी जरूरी है. इसी के लिए मैं ने तुझे बुलाया है.’’

ऐसी मुसीबत से बाहर निकालने में संदीप ने उस का साथ देने की हामी भर दी. टिंकू ने इंद्रपाल की लाश ठिकाने लगाने की योजना पहले ही बना रखी थी. उसी योजना के अनुसार उस ने सब से पहले गंडासे से इंद्रपाल की गरदन काट कर धड़ से अलग की. सिर को उस ने एक बड़ी सी पौलीथिन थैली में रख लिया.  धड़ को प्लास्टिक के कट्टे में भर कर कट्टे को रस्सी से अच्छी तरह लपेट दिया. फिर उस कट्टे को दूसरे कट्टे में रखा और उसे अच्छी तरह बांध दिया. लाश की अच्छी तरह पैकिंग करने के बाद अब वह रास्तों के सुनसान होने का इंतजार करने लगा. आधी रात के बाद धड़ वाले कट्टे को टिंकू ने अपने कंधे पर रखा और सिर वाली थैली संदीप ने ले ली. दोनों साढ़े 3 पुश्ता से होते हुए मेन रोड पर पहुंचे. फिर वहां से वे खादर की तरफ उतर कर गैस पाइपलाइन से थोड़ा आगे चल कर पानी के गड्ढे में सिर वाली थैली डाल दी.

धड़ वाला कट्टा उन्होंने तीसरे पुश्ते के पास डाल दिया. लाश को ठिकाने लगाने के बाद संदीप रात में ही नांगलोई लौट गया और टिंकू अपने कमरे पर लौट आया. कमरे में खून फैला हुआ था. टिंकू ने रात में ही खून को साफ किया. उस के कपड़ों पर खून के जो छींटे आ गए थे, उन्हें भी उस ने साफ किए. सुबह होने पर करावलनगर चला गया. करावल नगर में जिस जगह उस का काम चल रहा था, वहीं पर उस ने अपना सामान वगैरह रख दिया और वहीं रहने लगा. उधर शशिबाला छोटी बहन सुषमा के कमरे पर गई तो उस ने शशिबाला से पूछा कि जीजू कहां हैं, वह क्यों नहीं आए?

तब शशिबाला ने उस से यह कह दिया कि वह घर पर बैठ कर ही खापी रहे हैं. शशिबाला की बुआ विनोद नगर में रहती थीं. उन से मिले हुए उसे काफी दिन हो गए थे. वह सुषमा के साथ उन से मिलने के लिए चली गई. वहां से वह उसी इलाके में रहने वाली चचेरी बहन संगीता के यहां भी गईं. अगले दिन बुआ के घर से लौटते समय सुषमा ने कहा, ‘‘दीदी, जीजू से नहीं मिली हूं, चलो पहले तुम्हारे कमरे पर चलते हैं. जीजू से मिल कर फिर तुम मेरे साथ ही मेरे कमरे पर चलना.’’

‘‘उन से क्या मिलेगी. शराब पी कर कहीं घूमफिर रहे होंगे. फिर भी जब तेरा मन उन से मिलने को हो रहा है तो तू चल.’’ कहते हुए शशिबाला अपने कमरे पर गई तो वहां ताला लगा था. ताला देखते ही वह सुषमा से बोली, ‘‘मैं कह रही थी न कि वह कहीं घूमफिर रहे होंगे. तू ही देख, कमरे को बंद कर के पता नहीं कहां चले गए. मुझे लगता है शराब पी कर कहीं पड़े होंगे.’’

सुषमा को क्या पता था कि जिस जीजा से वह मिलने की इच्छा जता रही है, उस का काम तमाम हो चुका है और बहन उसे बेवकूफ बना रही है. खैर, बहन के कमरे का ताला बंद होने पर सुषमा बहन और उस के बच्चों को अपने कमरे पर ले आई. शशिबाला उस दिन सुषमा के यहां रही. अगले दिन भी इंद्रपाल का पता नहीं चला तो सुषमा ने उस की सूचना थाने में दर्ज कराने को कहा. बहन के दबाव डालने पर शशिबाला ने 20 मार्च, 2014 को पति की गुमशुदगी थाने में दर्ज करा दी. इस के बाद पुलिस मामले की छानबीन में लग गई. उस बीच टिंकू और शशिबाला की फोन पर बातें होती रहीं.

जब उसे पता चला कि पुलिस बहुत सक्रिय हो गई है तो टिंकू ने 22 मार्च को सुषमा के कमरे पर पहुंच कर शशिबाला से मुलाकात की और उस से कहा कि वह पुलिस से काररवाई बंद करने की बात कह कर अपने गांव चली जाए. बाद में जब मामला शांत हो जाएगा तो वह उसे वहां से बुला लाएगा, फिर कहीं दूसरी जगह रहा जाएगा. शशिबाला को उस का सुझाव पसंद आ गया और वह अगले दिन 23 मार्च की सुबह ही सुषमा और उस के पति को ले कर थाने पहुंच गई. लेकिन इत्तफाक से उसी समय थाने में सुषमा के मोबाइल पर टिंकू का फोन आ गया तो पुलिस टिंकू तक पहुंच गई. टिंकू से पूछताछ के बाद पुलिस टीम ने 24 मार्च को संदीप और शशिबाला को भी गिरफ्तार कर लिया. पुलिस ने टिंकू की निशानदेही पर हत्या में प्रयुक्त गंडासा और कपड़े आदि भी बरामद कर लिए.

पुलिस ने तीनों अभियुक्तों को कड़कड़डूमा न्यायालय में अतिरिक्त सत्र दंडाधिकारी शरद गुप्ता की कोर्ट में पेश किया. जहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया. मामले की विवेचना इंसपेक्टर जितेंद्र सिंह कर रहे हैं.

 —कथा पुलिस सूत्रों और जनचर्चा पर आधारित.

Family Problem : मेरा छोटा भाई अपनी पत्‍नी के बहकावे में आ कर मेरे ऊपर हाथ उठाने लगा है.

Family Problem : अगर आप भी अपनी समस्या भेजना चाहते हैं, तो इस लेख को अंत तक जरूर पढ़ें..

सवाल –

मैं मुजफ्फरनगर का रहने वाला हूं और मेरे घर में मैं, मेरी पत्नी, मेरा छोटा भाई, उस की पत्नी और मेरे मांबाप रहते हैं. शादी से पहले हम दोनों भाइयों में बेहद प्यार था और हम हर चीज मिल कर करते थे. हम दोनों के बीच का प्यार देख कर हमारे मांबाप भी काफी खुश होते थे. मेरी शादी हुई जिस के बाद से उस का मेरे प्रति बरताव थोड़ा बदल गया, लेकिन फिर भी मैं उस से उतना ही प्यार करता रहा. मेरे छोटे भाई की शादी भी अभी कुछ समय पहले ही हुई है, लेकिन उस की शादी होते ही वह पूरी तरह से बदल गया है. ऐसा लगता है कि वह एक नया इनसान ही बन गया है. पहले वह मेरी बहुत इज्जत करता था, लेकिन अब इज्जत तो छोड़ो वह मुझ से सीधे मुंह बात तक नहीं करता. हद तो तब हुई जब उस की और मेरी किसी बात पर बहस हुई और उस दौरान उस ने मेरे ऊपर हाथ उठा दिया. मुझे काफी गुस्सा आया और बुरा भी लगा, लेकिन मैं ने समझदारी दिखाई और उसे कुछ नहीं कहा. मुझे ऐसा लगता है कि वह अपनी पत्नी की बातों में आ कर ऐसा कर रहा है. मुझे क्या करना चाहिए?

जवाब –

अकसर ऐसा देखा गया है कि पत्नियों के आने से भाइयों का एकदूसरे के प्रति प्यार कम हो जाता है. इस की वजह यह भी है कि शादी के बाद हर इनसान अपने ऊपर अपने परिवार की जिम्मेदारी महसूस करने लगता है और जब वह अपनी जिम्मेदारी पूरी नहीं कर पाता है, तो निराश हो जाता है.

जैसा कि आप ने बताया कि आप के छोटे भाई ने आप के ऊपर हाथ उठाया है, तो मुझे ऐसा लगता है कि यह फैसला उस ने इतनी आसानी से नहीं लिया होगा, बल्कि जरूर उस के दिल या दिमाग में कोई ऐसी बात चल रही होगी जिस को ले कर उस ने आप के ऊपर हाथ उठा दिया. आप ने अपनी समझदारी दिखाई और शांत रहे. इस से पता चलता है कि आप अपने भाई से कितना प्यार करते हैं.

आप एक बार अपने छोटे भाई के साथ अकेले में बैठिए और उस से पूछिए कि उसे कोई तकलीफ तो नहीं है या उस के साथ ऐसी कोई बात तो नहीं हुई जो उसे अंदर ही अंदर बेचैन कर रही है. हो सकता है उस की पत्नी ने उस से आप के या अपनी पत्नी के बारे में कुछ ऐसा कह दिया हो जो पूरी तरह से गलत हो या सिर्फ एक गलतफहमी हो.

आप अपने छोटे भाई को समझाइए कि कोई भी बात हो वह आप से शेयर करे ताकि किसी गलतफहमी की वजह से एक हंसताखेलता परिवार बरबाद न हो.

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Casting Couch : ‘दंगल’ एक्ट्रेस फातिमा ने शेयर किए फिल्म इंडस्ट्री के डार्क सीक्रेट्स

Casting Couch : हर इंडस्ट्री के अपने ही कुछ ऐसे राज होते हैं जो कि सामने नहीं आते, लेकिन उन के बारे में भनक सब को होती है, फिर चाहे वह बौलीवुड इंडस्ट्री हो या कोई और. जैसा कि आप सब जानते हैं कि फिल्म इंडस्ट्री से जुड़े डाक्र सीक्रेट्स आएदिन सामने आते ही रहते हैं और इन डार्क सीक्रेट्स में से सब से बड़ा सीक्रेट है कास्टिंग काउच (Casting Couch). ऐसा माना जाता है कि ज्यादातर लड़कियों को इस इंडस्ट्री में कदम रखने के लिए कास्टिंग काउच का सामना करना पड़ता है.

आप को बता दें कि कास्टिंग काउच का मतलब है कि फिल्म में मौका पाने के लिए एक्ट्रेसेस को फिल्म के डायरैक्टर, प्रोड्यूसर, कास्टिंग डायरैक्टर या एक्टर के साथ सैक्स करना पड़ता है और जैसा वे कहें वैसा करना पड़ता है. इसी के चलते मशहूर और फिल्म ‘दंगल’ (Dangal) से बौलीवुड इंडस्ट्री में अपनी पहचान बनाने वाली एक्ट्रेस फातिमा सना शेख (Fatima Sana Shaikh) ने कास्टिंग काउच को ले कर एक खुलासा किया है कि उन्हें भी कास्टिंग काउच का सामना करना पड़ा था.

एक मीडिया एजेंसी को इंटरव्यू देते हुए एक्ट्रेस फातिमा सना शेख (Fatima Sana Shaikh) ने बताया, “मुझे साउथ इंडस्ट्री से एक फिल्म के लिए औफर आया जिस के लिए मैं ने अपना पोर्टफोलियो भेजा. ऐसे में कास्टिंग एजेंट ने मुझे कौल पर पूछा कि तुम सबकुछ करने के लिए तैयार रहोगी न ?”

इस का जवाब देते हुए फातिमा ने कहा, “मैं मेहनत करूंगी और रोल के लिए जो भी जरूरी होगा, वह करूंगी.”

फातिमा ने आगे बताया कि कास्टिंग एजेंट ने बारबार एक ही सवाल किया, लेकिन उन्होंने उस का जवाब नहीं दिया. इसी के चलते फातिमा ने बताया कि उन्हें लगता था कि साउथ इंडस्ट्री में काम करने से बौलीवुड में आसानी से कदम रखा जा सकता है.

एक्ट्रेस फातिमा सना शेख (Fatima Sana Shaikh) ने एक और खुलासा करते हुए बताया कि कास्टिंग एजेंट्स नए एक्टर्स को मौका देने के लिए उन से उन की कमाई का एक हिस्सा भी मांगते हैं और कई बार तो वे पहले ही अपना हिस्सा ले लेते हैं. इसी इंटरव्यू में उन्होंने एक और किस्सा याद करते हुए बताया कि एक बार वे साउथ फिल्म के औडिशन के लिए गईं जहां एक कमरे में फिल्म के प्रोड्यूसर भी थे और इसी के चलते प्रोड्यूसर ने उन से कहा कि आप को कुछ लोगों से मिलना होगा. फातिमा ने बताया कि उन्होनें साफतौर पर कुछ नहीं कहा, लेकिन उनका मतलब वे समझ गई थीं.

आपको बता दें कि एक्ट्रेस फातिमा सना शेख (Fatima Sana Shaikh) ने फिल्म ‘चाची 420’ (Chachi 420), ‘वन 2 का 4’ (One 2 Ka 4) और ‘इश्क’ (Ishq) में चाइल्ड आर्टिस्ट के रूप में काम किया था और फिल्म ‘दंगल’ (Dangal) में उन्होंने पहलवान ‘गीता फोगाट’ (Geeta Phogat) का किरदान निभाया था.

फातिमा ने फिल्म ‘ठग्स औफ हिंदुस्तान’ (Thugs Of Hindostan) और ‘सैम बहादुर’ (Sam Bahadur) जैसी फिल्मों में भी काम किया है.

Hindi Story : दो पहलू – आखिर नीरा अपनी सास से क्यों चिढ़ती थी

Hindi Story : सास की कर्कश आवाज कानों में पड़ी तो नीरा ने कसमसा कर अंगड़ाई ली. अधखुली आंखों से देखा, आसमान पर अभी लाली छाई हुई है. सूरज अभी निकला नहीं है, पर मांजी का सूरज अभी से सिर पर चढ़ आया है. न उन्हें खुद नींद आती है और न  किसी और को सोने देती हैं. एक गहरी खीज सी उभर आई उस के चेहरे पर.

परसों उस की नींद जल्दी टूट गई थी. लेटेलेटे कमर दर्द कर रही थी. वह उठ गई और अपने लिए चाय बनाने लगी. खटरपटर सुन कर मांजी की नींद टूट गई. बोल पड़ीं, ‘‘इतनी जल्दी क्यों उठ गई, बहू. कौन सा लंबाचौड़ा परिवार है जिस के लिए तुम्हें खटना पड़ेगा.’’

गुस्से से नीरा का तनबदन सुलग उठा था. आखिर यह चाहती क्या हैं? जल्दी उठो तो मुश्किल, देर से उठो तो मुश्किल. बोलने का बहाना भर चाहिए इन्हें.

अभी तो उसे यहां आए मुश्किल से 2 माह हुए  हैं, पर लगता है कि मानो दो युग ही गुजर गए हैं. अभी दीपक को वापस आने में पूरे 4 माह और हैं. कैसे कटेगा इतना लंबा समय? शुरू से ही संयुक्त परिवार के प्रति एक खास तरह की अरुचि सी थी उस के अंदर.

मातापिता ने भी उस के लिए वर देखते समय इस बात का खास खयाल रखा था कि लड़का चाहे उन्नीस हो, पर वह मांबाप से दूर नौकरी करता हो. उसे सास, ननदों के संग न रहना पड़े. आखिर काफी खोजबीन के बाद उन्हें इच्छानुसार दीपक का घर मिल गया था.

दीपक का परिवार भी छोटा सा था. मां, बाप और छोटी बहन. वह घर से अलग, दूसरे शहर में एक कालिज में अध्यापक था. सौम्य और सुदर्शन व्यक्तित्व वाले दीपक को सब ने पहली नजर में ही पसंद कर लिया था. शादी के बाद नीरा 8-10 दिन ससुराल रही थी.

इन चंद दिनों में ही सब का थोड़ाबहुत  स्वभाव उस के आगे उजागर हो गया था. बाबूजी गंभीर स्वभाव के अंतर्मुखी व्यक्ति थे. ज्यादा बोलते या बतियाते नहीं थे, पर उन की कसर मांजी पूरी कर देती थीं. मांजी जरा तेजतर्रार थीं. सारा दिन बकझक करना उन की आदत थी. ननद सिम्मी एक प्यारी सी हंसमुख लड़की थी. उस की हमउम्र थी.

मांजी हर बात में नुक्ताचीनी कर के बोलने का कोई न कोई बहाना ढूंढ़ लेती थीं. पर उन की इस आदत पर न कोई ध्यान देता था और न उन की बातों को गंभीरता से लेता था. बाबूजी निरपेक्ष से बस हां, हूं करते रहते थे. 10 दिन बाद ही दीपक नौकरी पर वापस गया, तो वह भी साथ चली गई थी.

दीपक को कालिज के पास ही मकान मिला हुआ था. नीरा ने सुघड़ हाथों से जल्दी ही अपनी गृहस्थी जमा ली. दीपक भी अपने पिता की ही तरह धीर, गंभीर था. नीरा कई बार सोचती कि एक ही परिवार में कैसा विरोधाभास है? कोई इतना बोलने वाला है और कोई इस कदर अंतर्मुखी. अभी उस की शादी को 3 माह ही हुए थे कि दीपक को विश्वविद्यालय की ओर से 6 माह के प्रशिक्षण के लिए जरमनी भेजने का प्रस्ताव हुआ. नीरा भी बहुत खुश थी.

दीपक उसे बांहों में समेट कर बोला था, ‘‘नीरू, तुम्हारे कदम बड़े अच्छे पड़े. बड़े दिनों का अटका काम हो गया. 6 माह तुम मां और बाबूजी के पास रह लेना. उन का भी बहू का चाव पूरा हो जाएगा.’’

नीरा जैसे आसमान से गिरी. इस ओर तो उस ने ध्यान ही नहीं दिया था. अचानक उस की आंखें भर आईं और वह बोली, ‘‘नहीं, मैं तुम्हारे बिना वहां अकेली नहीं रह सकती. मुझे भी अपने साथ ले चलो.’’

‘‘नहीं, नहीं, नीरू, यह संभव नहीं है. मैं फैलोशिप पर जा रहा हूं. वहां होस्टल में रह कर कुछ शोधकार्य करना है. तुम वहां कहां रहोगी? 6 माह का समय होता ही कितना है? पलक झपकते समय निकल जाएगा.’’

फिर तो सब कुछ आननफानन में हो गया. एक माह के अंदर ही दीपक जरमनी चला गया. उसे मांजी और बाबूजी के पास छोड़ते समय वह बोला था, ‘‘नीरू, मां की जरा ज्यादा बोलने की आदत है. वैसे दिल की वह साफ हैं. उन की बातों को दिल पर न लाना. तुम्हें पता तो है कि वह सारा दिन बोलती रहती हैं. तुम बस हां, हूं ही करती रहना.’’

दीपक की बात उस ने गांठ बांध ली थी. मांजी कुछ भी कहतीं, वह अपना मुंह बंद ही रखती. मांजी की बातों को कड़वे घूंट की तरह गटक जाती. पर उन का छोटीछोटी बातों पर हिदायतें देना और टोकना उसे सख्त नागवार गुजरता. सिम्मी न होती तो उस का समय बीतना और मुश्किल हो जाता. वही तो थी जिस के साथ हंस कर वह बोलबतिया लेती थी. वही उसे खींच कर कभी फिल्म दिखाने ले जाती तो कभी खरीदारी के लिए.

दीवार घड़ी ने टनटन कर के 6 बजाए तो वह चौंक पड़ी. अभी मांजी को बोलने का एक और विषय मिल जाएगा. वह न जाने किन सोचों में डूब गई. जल्दी से उठी और दैनिक कृत्यों से निवृत्त हो कर रसोई में जा कर आटा गूंधने लगी. बाबूजी और सिम्मी, दोनों 8 बजे घर से निकल जाते थे.

तभी सिम्मी आ कर जल्दी मचाने लगी, ‘‘भाभी, जल्दी नाश्ता दो, आज मेरा पहला घंटा है.’’

नीरा के कुछ बोलने से पहले ही मांजी बोल पड़ीं, ‘‘जरा जल्दी उठ जाया करो, बहू, मैं तो गठिया के मारे उठ नहीं पाती हूं. अब सब को देर हो जाएगी. हम तो सास के उठने से पहले ही मुंहअंधेरे सारा काम कर लेते थे. क्या मजाल जो सास को किसी बात पर बोलने का मौका मिले.’’

‘‘हो गया तुम्हारा भाषण शुरू?’’ बाबूजी गुस्से से बोले, ‘‘अभी सिर्फ 7 बजे हैं और सिम्मी को जाने में पूरा एक घंटा बाकी है.’’

‘‘तुम चुप रहो जी,’’ मांजी बोलीं, ‘‘पहले बेटी को सिर चढ़ाया, अब बहू को माथे पर बिठा लो.’’

नीरा चुपचाप परांठे सेकती रही. सिम्मी बोली, ‘‘कभी मां मौनव्रत रखें तो मजा ही आ जाए.’’

नीरा के होंठों पर मुसकान आ गई. सिम्मी पर भी मांजी सारा दिन बरसती ही रहती थीं. कालिज से आने में जरा देर हो जाए तो मांजी आसमान सिर पर उठा लेती थीं. प्रश्नों की बौछार सी कर देतीं, ‘‘देर क्यों हुई? घर पर पहले बताया क्यों नहीं था?’’ आदि.

सिम्मी झल्ला कर कहती, ‘‘बस भी करो मां, जरा सी देर क्या हो गई, तूफान मचा दिया. मैं कोई बच्ची नहीं हूं जो खो जाऊंगी. आजकल अतिरिक्त कक्षाएं लग रही हैं, इस से  देर हो जाती है. तुम्हें तो बोलने का बहाना भर चाहिए.’’

बेटी के बरसने पर मांजी थोड़ी नरम पड़ जातीं, फिर धीमे स्वर में बड़बड़ाने लगतीं. सिम्मी तो बेटी है. मांजी से तुर्कीबतुर्की सवालजवाब कर लेती है पर वह तो बहू है. उसे अपने होंठ सी कर रखने पड़ते हैं. बिना बोले यह हाल है. जो कहीं वह भी सिम्मी की तरह मुंहतोड़ जवाब देने लगे तो शायद मांजी कयामत ही बरपा कर दें. मांजी और बाबूजी का दिल रखने के लिए ही तो वह यहां रह रही है. वरना क्या इतने दिन वह अपने मायके में नहीं रह सकती थी?

बाबूजी और सिम्मी चले गए. वह भी रसोई का काम निबटा कर नहाधो कर आराम कर रही थी. पड़ोस से कुंती की मां आई हुई थीं. वह चाय बनाने लगी. बाहर महरी ने टोकरे में बरतन धो कर रखे थे. कांच का गिलास निकालने लगी तो जाने कैसे गिलास हाथ से छूट कर टूट गया.

मांजी बोल पड़ीं, ‘‘बहू, ध्यान से बरतन उठाया करो. महंगाई का जमाना है. इतने पैसे नहीं हैं जो रोजरोज गिलास खरीद सकें. जब अपनी गृहस्थी जमाओगी तब पता चलेगा.’’

बाहर वालों के सामने भी मांजी चुप नहीं रह सकतीं. नीरा की आंखों में क्रोध और क्षोभ के आंसू आ गए. चाय दे कर वह अपने कमरे में आ कर लेट गई. उस ने कभी अपने मांबाप की नहीं सुनी और यहां दिनरात मांजी की उलटीसीधी बातें सुननी पड़ती हैं.

रात खाने के समय नीरा ने देखा कि दही अभी ठीक से जमा नहीं है. मांजी का बोलना फिर शुरू हो गया, ‘‘तुम ने बहुत ठंडे या बहुत गरम दूध में खट्टा डाल दिया होगा, तभी तो नहीं जमा दही. अगर ध्यान से जमातीं तो क्या अब तक दही जम न जाता? दीपक को तो दही बहुत पसंद है. पता नहीं तुम वहां भी दही ठीक से जमा पाती होगी या नहीं.’’

बाबूजी बोल पड़े, ‘‘ओह हो, अब चुप भी रहोगी या बोलती ही जाओगी? तरी वाली सब्जी है. दही बिना कौन सा पहाड़ टूट रहा है? तुम्हें खाना हो तो हलवाई से ले आता हूं. बहू पर बेकार में क्यों नाराज हो रही हो?’’

मांजी खिसिया कर बोलीं, ‘‘लो और सुनो. बाप और बेटी पहले ही एक ओर थे. अब बहू को और शामिल कर लो गुट में.’’

नीरा शर्म से गड़ी जा रही थी. मांजी के तो मुंह में जो आया बोलने लगती हैं. किसी का लिहाज नहीं.

खाना खा कर वह कमरे में आई तो उस के मन में क्रोध भरा था. अब वह यहां हरगिज नहीं रह सकती. 2 माह जैसेतैसे काट लिए हैं पर अब और नहीं रहा जाता. उस की सहनशक्ति अब खत्म हो गई है. हर बात में टोकाटाकी, भाषणबाजी. आखिर कहां तक सुन सकती है वह? कभी कपड़ों में नील कम है तो कभी बैगन ठीक से नहीं भुने हैं, कभी चाय में पत्ती ज्यादा है तो कभी सब्जी में नमक कम. बिना वजह छोटीछोटी बातों में लंबाचौड़ा भाषण झाड़ देती हैं. बरदाश्त की भी हद होती है. अब वह यहां और नहीं रहेगी. वह उठ कर भैया को खत लिखने लगी. मायके में जा कर दीपक को भी पत्र डाल देगी कि भैया लेने आ गए थे, सो उन के साथ जाना पड़ा उसे.

सुबह मांजी की आवाज कानों में पड़ी, ‘‘उठो बहू, सुबह हो गई है.’’ वह उठने लगी तो उसे अचानक चक्कर सा आ गया. उस ने उठने की कोशिश की तो कमजोरी के कारण उठा न गया. हलकी झुरझुरी सी चढ़ रही थी. सारा बदन टूट रहा था.

वह फिर लेट गई और बोली, ‘‘मांजी, मेरी तबीयत ठीक नहीं है.’’

‘‘क्या हुआ तबीयत को?’’ यह कहती मांजी उस के कमरे में आ गईं. माथे पर हाथ रखा तो वह चौंक गईं. उन के मुंह से हलकी सी चीख निकल गई.

‘‘अरे, तुम्हारा माथा तो भट्ठी सा तप रहा है, बहू,’’ फिर वहीं से वह चिल्लाईं, ‘‘सुनो जी, जरा जल्दी इधर आओ.’’

‘‘अब क्या आफत है?’’ बाबूजी भुनभुनाते हुए कमरे में आ गए.

‘‘बहू को तेज बुखार है. जल्दी से जरा डाक्टर को बुला लाओ.’’

बाबूजी तुरंत कपड़े पहन कर डाक्टर को लेने चले गए.

मांजी नीरा के सिरहाने बैठ कर उस का माथा दबाने लगीं. ठंडेठंडे हाथों का हलकाहलका दबाव, नीरा को बड़ा भला लग रहा था. कुछ ही देर में बाबूजी डाक्टर को ले कर आ गए.

डाक्टर नीरा की अच्छी तरह जांच कर के बोले, ‘‘दवाएं मैं ने लिख दी हैं. इस हालत में अधिक तेज कैप्सूल तो दिए नहीं जा सकते.’’

‘‘किस हालत में?’’ मांजी पूछ बैठीं.

‘‘यह गर्भवती हैं,’’ डाक्टर बोला, ‘‘बुखार ठंड से चढ़ा है. तुलसीअदरक की चाय भी पिलाती रहें. 2-1 दिन में बुखार उतर जाएगा.’’

मांजी के आगे एक नया रहस्य खुला. नीरा ने तो इस बारे में उन्हें बताया ही नहीं था. वह बड़बड़ाने लगीं, ‘‘अजीब लड़की है, यह. अरे, मैं सास सही, पर सास भी मां होती है. मैं तो इस से सारा काम कराती रही और इस ने कभी बताया तक नहीं कि कुछ खास खाने का मन कर रहा है. ये आजकल की बहुएं भी बस घुन्नी होती हैं. एक हमारा जमाना था. हमें बाद में पता चलता था और सास को पहले से ही खबर हो जाती थी. अब बताओ, मैं ने तो कभी इस से यह भी नहीं पूछा कि क्या खाने की इच्छा है?’’

‘‘तो अब पूछ लेना. काफी वक्त पड़ा है. इस समय बहू को सोने दो,’’ बाबूजी बोले और कमरे से बाहर चले गए.

रात मांजी अपनी खाट नीरा के कमरे में ही ले आईं. रसोई का काम सिम्मी को सौंप दिया था इसलिए अब मांजी का आक्रोश  उस पर बरसता.

‘‘इतनी बड़ी हो गई है, पर खाना बनाने की अक्ल नहीं आई, गोभी में पानी तैर रहा है. और दाल इतनी गाढ़ी है कि गुठलियां बन गई हैं. दस बार कहा है कि जरा अपनी भाभी के साथ हाथ बंटाया करो. कुछ सीख जाओगी. पर…’’

‘‘ओहो मां, शुरू हो गईं तुम? एक तो खाना बनाओ, ऊपर से तुम्हारा भाषण सुनो. मुझ से खाना बनवाना है तो चुपचाप खा लिया करो, वरना खुद करो.’’

मांजी बड़बड़ाने लगीं, ‘‘इन बच्चों को तो समझाना भी मुश्किल है.’’

मांजी 2-2 घंटे बाद अदरकसौंफ वाला दूध ले कर नीरा के पास आ जातीं. खुद अपने हाथों से उसे दवा देतीं. रात भर माथा छूछू कर उस का बुखार देखतीं.

अपने प्रति मांजी को इतना चिंतित देख नीरा हैरान थी. बड़बोली मांजी के अंदर उस की इतनी फिक्र है और उस के प्रति इतना प्रेम है, आज तक कहां समझ पाई थी वह? वह तो मांजी के बोलने और टोकने पर ही सदा खीजती  रही.

नीरा 4-5 दिन बुखार की चपेट में रही. मांजी बराबर उस के सिरहाने बनी रहीं. उसे दवा, दूध, चाय, खिचड़ी आदि सब अपने हाथ से देती थीं. कई बार नीरा को लगता जैसे उस की मां ही सिरहाने बैठी हैं. उस का बुखार उतर गया था, पर मांजी उसे अभी जमीन पर पांव नहीं रखने देती थीं कि कहीं कमजोरी से दोबारा बुखार न चढ़ जाए.

दोपहर पड़ोस से रम्मो चाची उस का हाल पूछने आई थीं. उस के माथे पर हाथ रख कर बोलीं, ‘‘माथा तो ठंडा पड़ा है, बुखार तो नहीं है.’’

नीरा ने जवाब दिया, ‘‘हां, अब कल से बुखार नहीं है.’’

बाद में मांजी और रम्मो चाची बाहर आंगन में बैठ कर बातें करने लगीं.

रम्मो चाची बोलीं, ‘‘आजकल की बहुएं भी फूल सी नाजुक होती हैं.  हम भी तो इस भरी सर्दी में काम करते हैं, पर हमें तो कभी ताप नहीं चढ़ता. ये तो बस छुईमुई सी है,’’ फिर फुसफुसा कर बोलीं, ‘‘अरे, बहू को बुखार भी है या यों ही बहाना किए पड़ी है. आजकल की बहुएं तो तुम जानो, ऐसी ही होती हैं.’’

तभी मांजी का तीव्र स्वर सुनाई दिया, ‘‘बस, बस, रम्मो. तुम्हारा दिमाग भी कभी सीधी राह पर नहीं चला. तुम ने कभी अपनी बहुओं के दुखदर्द को समझा नहीं. तुम्हें तो सब कुछ बहाना लगता है. यह मत भूलो कि बहुएं भी हाड़मांस की बनी हैं. मैं ने तो नीरा और सिम्मी में कभी फर्क नहीं माना है. तुम भी अगर यह बात समझ लो तो तुम्हारे घर की रोज की चखचख खत्म हो जाए.’’

रम्मो चाची खिसियानी सी हो गईं, ‘‘मैं ने जरा सा क्या बोला, तुम ने तो पूरी रामायण बांच दी. यों ही बात से बात निकली थी तो मैं बोल पड़ी थी.’’

‘‘आज तो बोल दिया, आगे से मेरी बहू के बारे में यों न बोलना,’’ मांजी के अंदर अब भी आक्रोश था.

नीरा लेटीलेटी हैरानी से मांजी की बातें सुन रही थी. सचमुच वह मांजी को जान ही कहां पाई? दीपक ठीक ही कहते थे, ‘मुंह से मांजी चाहे बकझक कर लें पर मन तो उन का साफ पानी सा निर्मल है.’ इस बीमारी में उन्होंने उस का जितना खयाल रखा, उस की अपनी मां भी शायद इस तरह न रख पातीं.

और फिर मांजी सिर्फ उसी को तो नहीं बोलतीं. सिम्मी और बाबूजी भी मांजी की टोकाटाकी से कहां बच पाते हैं? यह तो मांजी का स्वभाव ही है. वैसे इस उम्र में आ कर औरतें अकसर इस स्वभाव की हो ही जाती हैं. उस की मां भी तो कितना बोलती हैं.

पर फर्क सिर्फ यह है कि वह मां हैं और यह सास हैं. उन का कहा वह इस कान से सुन कर उस कान से निकाल देती थी और सासू मां का कहा गांठ बांध कर रख लेती है. अभी तक उस ने सिक्के के एक ही पहलू को देखा था, दूसरा पहलू तो अब देखने को मिला जिस में ममता और प्रेम भरा है.

नीरा उठी. मेज पर रखे भैया को लिखे खत को उठाया और उस के टुकड़ेटुकड़े कर दिए. मायके जाने का विचार उस ने छोड़ दिया. दीपक के आने तक वह मांजी के साथ ही रहेगी. मांजी का दूसरा ममतापूर्ण और करुणामय रूप देख कर अब इस घर से जाने की इच्छा ही नहीं उसे.

लेखक- कमला चमोला

Health Benefits : इलैक्ट्रोलाइट वाटर पीने के फायदे

Health Benefits : आज के समय में हर इंसान खुद को फिट रखने के लिए बहुत सी चीजें ट्राई करता है फिर चाहे वह जिम जाना हो या फिर अपने खानपान में बदलाव लाना हो.

आजकल बाजार में नौर्मल वाटर के साथ साथ ब्लैक वाटर, इलैक्ट्रोलाइट वाटर, और भी कई तरीके के वाटर मिलते हैं जो हमें फिट रखने के लिए बनाए गए हैं. जैसाकि आप सब को पता है कि पानी पीना हमारे शरीर के लिए कितना फायदेमंद है पर जब नौर्मल वाटर के साथसाथ और भी ज्यादा फायदेमंद वाटर मिलने लग जाए तो इस से अच्छी और क्या बात हो सकती है.

किसे जरूरी किसे नहीं

ज्यादातर क्रिकेटर्स और स्पोर्ट्समैन इलैक्ट्रोलाइट वाटर और ब्लैक वाटर पीना ज्यादा पसंद करते हैं ताकी वे खुद को और भी ज्यादा फिट रख सकें और अपना स्टैमिना बढ़ा सकें.

आज हम आप को बताएंगे कि इलैक्ट्रोलाइट वाटर पीने के कितने फायदे हैं और इलैक्ट्रोलाइट वाटर और नौर्मल वाटर में कितना अंतर है.

इलैक्ट्रोलाइट वाटर में अलग से इलैक्ट्रीकली चार्ज्ड इलैक्ट्रोलाइट्स और मिनरल्स डाले जाते हैं जोकि हमारे शरीर के लिए बेहद फायदेमंद होते हैं. इस प्रकार का पानी उन लोगों के लिए सब से अच्छा है जो ज्यादा ऐक्सरसाइज करते हैं, क्योंकि इस में हमारे शरीर में मौजूद सब से आम इलैक्ट्रोलाइट्स ज्यादा क्वांटिटी में होते हैं. ये इलेक्ट्रोलाइट्स सोडियम, पोटैशियम, क्लोराइड, फौस्फेट, कैल्सियम, मैग्नीशियम और बाइकार्बोनेट हैं.

गजब के हैं फायदे

कुछ ब्रैंड्स कार्ब्स के साथसाथ मिनरल्स की क्वांटिटी का खास खयाल रखते हैं और अपने पानी को स्पोर्ट्स ड्रिंक के रूप में बेचते हैं, जबकि कई ब्रैंड्स केवल स्वाद का ध्यान रख इसे तैयार करते हैं.

इलैक्ट्रोलाइट वाटर आप के ब्लड प्रेशर को कंट्रोल करने में, आप की बौडी में फ्लूइड बैलैंस कंट्रोल करने के साथसाथ मसल्स को भी स्ट्रौंग बनाने में फायदेमंद है.

किसी भी चीज़ की आदत डालना या किसी भी चीज को जरूरत से ज्यादा लेना भी गलत साबित हो सकता है तो आप को इस बात का खास खयाल रखना चाहिए कि इलैक्ट्रोलाइट वाटर भी आप को ज्यादा नहीं पीना चाहिए और इस प्रकार का पानी उन लोगों के लिए है जो हैवी ऐक्सरसाइज करते हैं या फिर स्पोर्ट्सपर्सन हैं.

Honey Trap : सोशल मीडिया पर डाक्टर को ठगा

Honey Trap : आरोपियों ने अपने अपराध को अंजाम देने के लिए एक शातिर योजना बनाई थी. उन्होंने सोशल मीडिया पर डाक्टर को अपना निशाना बनाया और उन्हें अपने जाल में फंसाया.

आरोपियों ने डाक्टर को यह यकीन दिलाया कि वे दिल्ली पुलिस में हैं और उन्हें अपनी सेवाओं के लिए पैसे देने होंगे. डाक्टर ने आरोपियों की बातों पर यकीन कर लिया और उन्हें तकरीबन 9 लाख रुपए दे दिए. पर जब डाक्टर को यह एहसास हुआ कि वे ठगी के शिकार हो गए हैं, तो उन्होंने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई. पुलिस ने आरोपियों की तलाश शुरू की और आखिरकार उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया.

आरोपियों की पहचान तिलक नगर के बाशिंदे 42 साल के नीरज त्यागी उर्फ धीरज उर्फ धीरू, कराला के रहने वाले 32 साल के आशीष माथुर और खरखौदा, हरियाणा के रहने वाले 30 साल के दीपक उर्फ साजन के रूप में हुई थी.

पुलिस ने आरोपियों के पास से हैड कांस्टेबल की पूरी वरदी और दिल्ली पुलिस के 3 पहचानपत्र, एक कार और 3 मोबाइल फोन बरामद किए.

आरोपी नीरज त्यागी और दीपक उर्फ साजन के खिलाफ पहले से ही बिंदापुर थाने में प्रेमजाल में फंसा कर वसूली करने का मामला दर्ज है.

हनी ट्रैप की शुरुआत का सटीक समय नहीं बताया जा सकता है, क्योंकि यह एक तरह की धोखाधड़ी है, जो अलगअलग रूप में और अलगअलग समयों में हुई है.

हालांकि, यह कहा जा सकता है कि हनी ट्रैप की शुरुआत प्राचीनकाल में हुई थी, जब लोगों को औरतों के बहाने से लुभाने और उन से फायदा उठाने के लिए अलगअलग तरीकों का इस्तेमाल किया जाता था.

दरअसल, आधुनिक समय में हनी ट्रैप की शुरुआत 60 के दशक में हुई थी, जब अमेरिकी और सोवियत जासूसों ने अपने फायदे की जानकारी हासिल करने के लिए इस तरीके का इस्तेमाल करना शुरू किया था.

इंटरनैट और सोशल मीडिया के आने के साथ हनी ट्रैप की शुरुआत और भी आसान हो गई है और अब यह एक आम तरह की धोखाधड़ी बन गई है, जो दुनियाभर के देशों में होती है.

कुछ दिलचस्प बातें

* 60 के दशक में अमेरिकी और सोवियत जासूसों ने हनी ट्रैप का इस्तेमाल करना शुरू किया था.

* 80 के दशक में हनी ट्रैप का इस्तेमाल व्यावसायिक जासूसी में किया जाने लगा था.

* 90 के दशक में इंटरनैट के आने के साथ हनी ट्रैप औनलाइन हो गई और यह और भी आसान हो गई.

हनी ट्रैप की कुछ घटनाएं

मध्य प्रदेश के इंदौर में हनी

ट्रैप का एक मामला सामने आया, जिस में एक औरत ने कई मर्दों को अपने जाल में फंसा कर उन से पैसे ऐंठे. इस मामले में पुलिस ने कई आरोपियों को गिरफ्तार किया था.

इसी तरह दिल्ली में भी हनी ट्रैप का एक मामला सामने आया था, जिस में एक औरत ने एक मर्द को अपने प्रेमजाल में फंसा कर उसे पैसे देने के लिए मजबूर किया था. इस मामले में पुलिस ने आरोपी औरत को गिरफ्तार किया था.

मुंबई में हनी ट्रैप का एक मामला सामने आया, जिस में एक औरत ने कई मर्दों को अपने प्रेमजाल में फंसा कर उन से पैसे ऐंठे. इस मामले में पुलिस ने कई आरोपियों को गिरफ्तार किया.

हनी ट्रैप के प्रकार

औनलाइन हनी ट्रैप : औनलाइन हनी ट्रैप में आरोपी सोशल मीडिया या औनलाइन डेटिंग प्लेटफार्म का इस्तेमाल कर के पीडि़त को अपने प्रेमजाल में फंसाता है.

औफलाइन हनी ट्रैप : औफलाइन हनी ट्रैप में आरोपी किसी पीडि़त से निजीतौर पर मिलता है और उसे अपने जाल में फंसाता है.

कौरपोरेट हनी ट्रैप : कौरपोरेट हनी ट्रैप में आरोपी किसी कंपनी के शख्स को अपने जाल में फंसाता है और उस से कारोबारी जानकारी हासिल करता है.

हनी ट्रैप के लक्षण

* अगर कोई किसी अनजान शख्स से अचानक मिलता है और उस के साथ बहुत जल्दी गहरे संबंध बनाने की कोशिश करता है, तो यह हनी ट्रैप का एक लक्षण हो सकता है.

* अगर कोई किसी के प्रति बहुत ज्यादा प्यार और आकर्षण दिखाता है, तो यह हनी ट्रैप का एक लक्षण हो सकता है.

* यदि कोई किसी की निजी जानकारी मांगता है, जैसे कि पता, फोन नंबर या बैंक खाते से जुड़ी जानकारी, तो यह हनी ट्रैप का एक लक्षण हो सकता है.

बचाव के कानूनी उपाय

* अगर आप हनी ट्रैप के शिकार हुए हैं, तो तुरंत ही पुलिस थाने में अपनी शिकायत दर्ज करें.

* हनी ट्रैप से संबंधित कानूनी सलाह लेने के लिए किसी माहिर वकील से बात करें.

* आप औनलाइन हनी ट्रैप के शिकार हुए हैं, तो साइबर सैल में शिकायत दर्ज करें.

हनी ट्रैप में लड़कियां और लड़के दोनों ही शामिल हो सकते हैं. हालांकि, ज्यादातर मामलों में लड़कियां ही हनी ट्रैप के लिए इस्तेमाल की जाती हैं, लेकिन यह जरूरी नहीं है कि हर बार ऐसा ही हो. कुछ मामलों में लड़के भी हनी ट्रैप में शामिल हो सकते हैं.

हनी ट्रैप में शामिल होने वाले के लिए उस के लिंग या उम्र की कोई अहमियत नहीं है. यह एक ऐसी धोखाधड़ी है, जिस में कोई भी शामिल हो सकता है और किसी को भी अपना शिकार बना सकता है. ऐसे शातिर लोग अमीरों को फांसते हैं. वे लड़की को आगे रख कर अपने शिकार को गुमराह करते हैं और उन से फायदा उठाते हैं.

Family Story : वसीयत

Family Story : सो एक पढ़ालिखा नौजवान था. उसे इसी साल नौकरी मिल गई थी. उस ने तय किया कि वह अपना 23वां जन्मदिन मनाने के लिए गांव जाएगा.

गांव में अब सोम के लिए अपना कहने को बस एक चाचाजी ही रह गए थे. वह शुक्रवार की शाम को दफ्तर से सीधा बसअड्डे गया था. गांव और चाचाजीइसी खुशी में डूब कर सोम खुशीखुशी गांव की बस में बैठ गया.

4 घंटे का सफर तय कर के सोम गांव में चुका था. वहां कर उस का मन हराभरा हो गया.

इस बार सोम 7-8 महीने बाद गांव आया था. गांव की सड़क पर उसे कुछ जानेपहचाने से चेहरे दिखाई दिए. सोम ने बहुत इज्जत के साथ उन्हें नमस्ते किया, मगर वे सभी उसे अजीब सी नजरों से घूरते रहे.

उन को नजरअंदाज कर सोम कुछ आगे बढ़ा, तो फिर से वही बात हुई. सोम ने एक परिचित से खुद ही आगे बढ़ कर पूछ लिया कि आखिर माजरा क्या है?

‘‘अपने रंगीनमिजाज चाचाजी के पास जाओ, तब मालूम होगा,’’ उस आदमी ने सोम को टका सा जवाब दिया और आगे बढ़ गया.

सोम हैरत में था. यह कैसी पहेली थी, वह समझ ही नहीं पा रहा था.

यही सोचतेसोचते सोम घर भी गया. चाचाजी आराम से नीम की छांव तले खाट पर अखबार पढ़ रहे थे.

चाचाजी को देखते ही सोम का मन अपार स्नेह से भर उठा. उस ने चाचाजी के पैर छुए, तभी एक औरत कमरे से बाहर आई. एकदम चाचाजी की हमउम्र. वह अनजान थी, फिर भी सोम ने उन्हें नमस्ते किया.

सोम सवालिया निगाहों से उस औरत को देखता रहा, तभी चाचाजी ने उस की उत्सुकता को शांत कर दिया, ‘‘बेटे सोम, ये आप की चाची हैं उमा. हम दोनों ने 3 दिन पहले ही मंदिर में ब्याह कर लिया है.’’

अपनी हैरानी को दबा कर सोम ने बहुत ही आदर से उन को दोबारा नमस्ते किया. वे खूब हंसमुख थीं.

आशीर्वाद देती रहीं. सोम अब एकदम खामोश हो गया. पलभर के भीतर ही वह समझ गया कि इतनी देर पहले तक रास्ते में हरेक उसे इस तरह से घूर क्यों रहा था.

मतलब, चाचाजी तो बेचारे बुरे फंस गए. 10 बीघा खेत. अलग से 3 बीघा में आम का बाग. इन नईनवेली चाचीजी ने तो चाचाजी को बेवकूफ बना दिया है.

सोम आगे कुछ और सोचता कि एक मधुर आवाज आई, ‘‘सोम बेटा, यह लो शरबत पी लो.’’

सोम थका हुआ तो था ही, वह उस शरबत को गटागट पी गया. उस ने इतना बेहतरीन और लाजवाब शरबत आज तक नहीं पिया था.

चाचीजी ने एक गिलास और दिया. सोम वह भी पी गया.

‘‘शुक्रिया चाचीजी,’’ सोम ने इस शब्द को चबा कर कहा, मगर वे तो इतनी सरल कि तब भीखुश रहो बेटाकह कर भीतर चली गईं.

कुछ पल के लिए एकदम सन्नाटा सा छा गया था. सोम मन ही मन हिसाब लगा रहा था कि चाचीजी ने भी बढि़या हाथ मारा है. करोड़ों के मालिक हैं चाचाजी. उसी पल सोम के मन में एक दूसरा विचार भी कौंध गया. ऐसा विचार जो आज तक सोम के मन में नहीं आया था.

आज जिंदगी में पहली बार सोम इस खेत और बगीचे में अपने हिस्से को भी गिनने लगा था.

मतलबी सोम सब भूल गया था. चाचाजी का इतना त्याग, ऐसा बलिदान, उसे इस समय कुछ याद नहीं रहा. एक कार हादसे में सोम के मातापिता और चाचीजी नहीं रहे थे.

स्कूल से लौट कर आया सोम सब जानने के बाद अपने चाचाजी से लिपट गया था.

‘‘चाचाजी, अब आप एक और चाची तो नहीं लाओगे …?’’ 10 साल का सोम अपने 40 साल के चाचाजी से भीख मांग रहा था.

‘‘नहीं बेटा, मैं कभी नहीं करूंगा दूसरी शादी,’’ कह कर चाचाजी ने सोम को अपनी गोद में भर लिया था.

उस दिन के बाद से सोम के लिए माता और पिता दोनों चाचाजी हो गए थे. सोम ने होस्टल में पढ़ने की जिद की, तो चाचाजी ने 10वीं जमात के बाद उस की यह तमन्ना पूरी करने में भी कोई कसर नहीं छोड़ी थी. अब तक भी उस की बेरोजगारी में उस के बैंक खाते में चाचाजी ही रुपए भेजते थे.

मगर, शहर का पानी पी कर सोम मतलबी सा हो गया था. अब वह अपनी यारीदोस्ती में मगन रहता था.

अपनी नौकरी में वह बिजी रहता था. यह सोच कर कि चाचाजी के साथ तो पूरा का पूरा गांव है, अब उन की परवाह क्या करना?

आज सोम को अपने हिस्से की जायदाद भी चाची की झोली में जाती दिख रही थी.

इतनी देर में नई चाजीजी खूब सारा नाश्ता ले कर गईं.

‘‘कल आप का जन्मदिन है सोम, आज से ही हम लोग जश्न शुरू करते हैं,’’ कह कर चाचीजी उस की प्लेट
में गुलाबजामुन, पकौड़े रखने लगीं.

सोम को तो इस धोखे से सदमा सा लग गया था कि तभी चाचीजी ने एक फाइल चाचाजी को थमा दी.

‘‘अरे हां सोम बेटा, यह लो जमीन के सारे कागज. सारी जायदाद और मकान, सब तुम को दे दिया है बेटे. मुझे तो उमा ने सहारा दे दिया है. वे एक कारोबारी हैं.

3-4 महीने से गांव में सर्वे कर रही थीं. हम को ऐसा लगा मानो कुदरत ने मिला दिया हो.

‘‘गांव वाले विरोध कर रहे हैं, मगर हम शादी के बंधन में बंध गए हैं,’’ सोम अपने चाचाजी की बात सुन रहा था.

चाचाजी आगे बताने लगे, ‘‘तुम्हारी चाची उमा कन्नड़ हैं और एकदम स्वाभिमानी. अब 3-4 दिन के बाद मैं भी इस के साथ कर्नाटक जा रहा हूं. जिस गांव ने हमें 3 दिन भी सहन नहीं किया, वहां आगे भी कौन सा संबंध रखा जाएगा, यह मैं जानता हूं.

‘‘तुम्हारी चाची ने ही कहा है कि उन के पास अपने कारोबार से कमाया हुआ इतना पैसा है कि एक पाई भी किसी से नहीं चाहिए. यह संभालो अपनी विरासत,’’ कह कर चाचाजी ने सोम को एक गुलाबजामुन खिला दिया.

सोम ने यह सुना, तो वह शर्म से पानीपानी हो गया.

उमा चाची, आप तो बहुत महान हो,’ सोम ने मन ही मन कहा.

‘‘बेटा, अभी तो एक मैनेजर है, जो सब देखभाल कर रहा है. आगे भी सब हो जाएगा. अगर चाहो तो नौकरी की जगह अपनी जमीन भी संभाल सकते हो,’’ उमा चाची ने बाहर कर सोम से कहा.

उमा चाची की यह बात सुन कर सोम का मन हुआ कि उन के पैरों की धूल को माथे पर सजा ले.

इस के बाद चाचाचाची बैंगलुरु चले गए और वहीं बस गए.

सोम आज भी हर साल 3-4 बार उन से मिलने जरूर जाता है. उस ने उमा चाची से स्वाभिमान और सचाई का अनूठा सबक सीखा है.

Social Problem : एक दबंग मुझे धमकी दे रहा है कि मैं बच्चों को पढ़ाना छोड़ दूं.

Social Problem : अगर आप भी अपनी समस्या भेजना चाहते हैं, तो इस लेख को अंत तक जरूर पढ़ें..

सवाल –

मैं 22 साल की एक गरीब परिवार की लड़की हूं और अपने महल्ले के बच्चों को ट्यूशन पढ़ा कर परिवार की माली मदद करती हूं. चूंकि मैं मेधावी छात्रा रही हूं, इसलिए मेरे पास कई बच्चे ट्यूशन पढ़ने के लिए आते हैं. इस से पास के ही एक ट्यूशन सैंटर, जो किसी दबंग का है, ने मुझे धमकी दी है कि मैं बच्चों को ट्यूशन पढ़ाना छोड़ दूं. इस धमकी से मेरे परिवार वाले डर गए हैं, पर मैं पैसा कमाने का यह मौका नहीं छोड़ना चाहती हूं. मैं क्या करूं?

जवाब –

आप उस दबंग शख्स से आसानी से नहीं निबट पाएंगी, क्योंकि आप की वजह से उस का धंधा मारा जा रहा है. इस के लिए आप को आसपास के लोगों का समर्थन जुटाना होगा और धमकी देने पर उस की रिपोर्ट भी पुलिस में दर्ज करानी होगी.

आप मेधावी हैं और अब हिम्मती भी बनिए. फिल्मसुपर थर्टी’ (Super 30) तो आप ने देखी ही होगी. उस में भी कोचिंग माफिया की चालबाजियां बताई गई हैं. आनंद कुमार की तर्ज पर आप डटी रहिए. जिन बच्चों को आप पढ़ाती हैं, उन के मांबाप को सारी बातें बता कर उन से मदद मांगें. आज डर कर आप ट्यूशन पढ़ाना बंद कर देंगी, तो ऐसे गुंडों को शह ही मिलेगी

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