दिशा की हौट फोटो पर टाइगर का ये कमेंट

टाइगर श्रौफ और दिशा पाटनी का रिश्ता किसी से छुपा नहीं है. सोशल मीडिया पर अक्सर दोनों की करीबी के चर्चे होते रहते हैं. दोनों न केवल सोशल मीडिया पर एक दूसरे की तस्वीरों पर कमेंट करते हैं बल्कि एक-दूसरे के साथ पब्लिकली दिखते भी हैं. दोनों की करीबी देख कर जैकी श्रौफ ने शादी के संकेत भी दे डाले हैं. दोनों को जैसे ही मौका मिलता है सोशल मीडिया पर एक दूसरे की खिंचाई करते दिखते हैं.

 

View this post on Instagram

 

Hello, Summer! ☀️ #MyCalvins @calvinklein

A post shared by disha patani (paatni) (@dishapatani) on

हाल ही में दिशा पाटनी ने अपने इंस्टा अकाउंट पर एक बिकनी तस्वीर शेयर की है, जिसमें वो काफी हौट दिख रही हैं. दिशा की इस तस्वीर पर काफी लोगों ने कमेंट किए, इनमें टाइगर श्रौफ भी शामिल हैं. टाइगर भी दिशा की खूबसूरती देख कर खुद को कमेंट करने से रोक ना सकें.

टाइगर ने फोटो पर कुछ और तो लिखा नहीं पर ढेरों इमोजी बना डालें. जिन्हें देख कर कोई भी समझ सकता है कि वो कहना क्या चाहते हैं.

आपको बता दें कि टाइगर और दिशा ने बागी-2 में एक साथ काम किया. फिल्म बौक्स औफिस पर सुपर हिट रही. दोनों की जोड़ी को दर्शकों ने काफी पसंद किया. इसके बाद भी फैंस इन्हें एक साथ बड़े पर्दे पर देखना चाहते हैं.

वैभव लक्ष्मी व्रत कथा कितनी हास्यास्पद

हिंदू देवियां पुस्तक प्रकाशकों के लिए विज्ञापन व प्रचार का काम भी करती हैं. एक उदाहरण छपा है साहित्य संगम, सूरत से प्रकाशित वैभव लक्ष्मी व्रत कथा की पुस्तक के पृष्ठ 19 पर. माजरा समझ में आ जाएगा. इस में शीला नाम की एक महिला को साक्षात लक्ष्मी मां ने कहा कि व्रत का उद्यापन होने पर उसे 7 कुंआरी कन्याओं को तिलक लगा कर साहित्य संगम प्रकाशन की ‘वैभव लक्ष्मी व्रत’ कथा की एकएक पुस्तक उपहार में देनी चाहिए. प्रकाशक महोदय से पूछा जा सकता है कि इस तरह का प्रचार लक्ष्मी मां से कराने के लिए खुद उन्होंने कितने व्रत रखे थे?

आप को शायद अब मेरे कहने का मंतव्य समझ में आ रहा होगा, व्रतउपवासों के मकड़जाल में फंसे हुए लोग इस बात की जहमत नहीं उठाते हैं कि जो व्रत वे रख रहे हैं उस की पुस्तिका को ढंग से पढ़ कर उस का मनन कर सकें. वैभव लक्ष्मी व्रत कथा शुरू से अंत तक सिर्फ भोलेभाले लोगों को दिग्भ्रमित करने के अलावा कुछ नहीं करती है.

शुक्रवार व्रत कथा : सच्चाई से दूर केवल कथा मात्र

अपनेआप में वैभव लक्ष्मी व्रत कथा केवल एक कथा भर है जिस में सचाई का तनिक भी अंश नहीं है. यह बात एक औसत स्तर का पाठक भी इस व्रत कथा की पुस्तिका को पढ़ कर समझ सकता है. कहानी की पात्र शीला नाम की एक महिला है, जो अपने पति की गलत आदतों के कारण आर्थिक परेशानियों से घिरी हुई है. शीला बहुत धार्मिक महिला है और हर रोज मंदिर जा कर पूजाआरती करती है. एक दिन उस के घर एक महिला आती है जो शीला के दुख का कारण पूछती है.

कथा के अनुसार यह महिला बदले हुए वेश में साक्षात लक्ष्मी माता होती है. शीला रोतेरोते अपनी कहानी बताती है. शीला की कहानी सुन कर वह महिला यानी लक्ष्मी माता उसे उस का दुख दूर करने का उपाय बताते हुए शुक्रवार व्रत रखने की विधि समझाती है. कथा अनुसार जैसे ही शीला 21 शुक्रवार का व्रत पूरा करती है, उस के  घर में धनधान्य की बहार आ जाती है. उस का पति सही रास्ते पर आ जाता है और उस का जीवन फिर से खुशियों से भर जाता है.

इस कथा को पढ़ कर कई सवाल उत्पन्न होते हैं जैसे कि क्या कोई देवी स्वयं आ कर अपने भक्त से यह कह सकती है कि तुम मेरी पूजा करो? यदि लक्ष्मी माता शीला से प्रसन्न हो कर उस के घर पर स्वयं आई थी तो फिर शीला को व्रत रखने की क्या आवश्यकता थी? क्या लक्ष्मी माता अपनी सेवा करवाए बिना अपने भक्तों के दुखों को दूर नहीं कर सकती? और सब से महत्त्वपूर्ण प्रश्न यह कि शीला के मात्र 21 शुक्रवार तक व्रत रखने से उस के सारे बिगड़े काम बन गए, जबकि इस देश में ऐसी करोड़ों शीलाएं हैं जो सैकड़ों शुक्रवारों का व्रत रख चुकी हैं लेकिन उन का कोई काम नहीं बना, ऐसा क्यों?

शीला कौन है

इस पुस्तिका के शुरू में लक्ष्मी के 6 विभिन्न स्वरूप दिए गए हैं जिस में हर स्वरूप के नीचे लिखा गया है कि ‘हे लक्ष्मी मां, आप जैसे शीला पर प्रसन्न हुईं वैसे ही सब पर प्रसन्न हों और सब की मनोकामना पूरी करें.’

यहां प्रश्न यह उठता है कि जिस शीला को इस पुस्तिका में इतना महिमामंडित किया गया है वह कौन है? यदि वह माता लक्ष्मी की इतनी अनन्य भक्त है तो उस का उल्लेख इस पुस्तिका के अलावा किसी भी अन्य पुस्तक या धर्मग्रंथ में क्यों नहीं मिलता जबकि हिंदू शास्त्रों और पुराणों में भगवान के अलावा उन के अनन्य भक्तों जैसे कि राम भक्त हनुमान, कृष्ण भक्त सुदामा, विष्णु भक्त प्रह्लाद आदि का विशद वर्णन मिलता है तो फिर लक्ष्मी भक्त शीला की प्रविष्टि इस पुस्तिका के अलावा कहीं और क्यों नहीं हो पाती?

वास्तविकता यह है कि शीला का प्रमाण किसी पौराणिक ग्रंथ में मिल ही नहीं सकता क्योंकि यह पात्र आधुनिक युग के पंडितों की उपज है. जैसा कि इस कथा के पृष्ठ संख्या 14 पर शीला के पति के वर्णन से पता चलता है कि उसे शराब, जुआ, रेस, चरस, गांजा आदि की लत लग गई थी, ये सभी बुराइयां आधुनिक युग की ही देन हैं अत: यह निश्चित है कि शीला का कोई पौराणिक महत्त्व नहीं है.

विरोधाभासों का दस्तावेज

शुक्रवार व्रत कथा प्रारंभ से अंत तक विरोधाभासों का एक दस्तावेज भर है. पुस्तिका में पृष्ठ संख्या 19 पर लक्ष्मी माता शीला से कहती हैं कि हर इनसान को अपने कर्म भुगतने ही पड़ते हैं. अर्थात देवी माता खुद कर्म की प्रधानता का संदेश दे रही हैं जबकि अगले ही पृष्ठ पर वे कहती हैं कि माता लक्ष्मी का व्रत रखने से तुम्हारी मनोकामना पूरी होगी. यह कैसी कर्मप्रधानता है जिस में कर्म का अर्थ केवल व्रत रखना है? पृष्ठ संख्या 17 पर व्रत रखने की विधि में बताया गया है कि सोने के गहनों की विधिविधान से पूजा करनी चाहिए. यहां यह बात समझ में नहीं आती है कि यदि व्यक्ति के पास सोना ही होगा तो उसे व्रत रखने की आवश्यकता ही क्या है? क्या लक्ष्मी माता सोनेचांदी की चमक के बिना प्रसन्न नहीं होतीं? क्या लक्ष्मी माता के पास खुद सोने की कमी है, जो उन्हें अपनी पूजन की थाली में सोने का गहना देखने का लालच है?

लाटरी और जुए का समर्थन

पुस्तिका के अंत में कुछ ऐसे कपोल कल्पित उदाहरण दिए गए हैं जो आप को लाफ्टर चैलेंज जैसी हंसी का एहसास करा सकते हैं. पहला ही उदाहरण नवसारी की किसी महिला (बिना नामपते वाली) का दिया गया है जिस में शुक्रवार व्रत रखने से उस की 50 हजार रुपए की लाटरी लग गई. क्या इस उदाहरण से आप को ऐसा नहीं लगता कि मानो साक्षात लक्ष्मी माता कह रही हों कि भविष्य में यदि लाटरी या जुआ खेलना हो तो उस से पहले मेरा व्रत रखना, तुम्हें अवश्य लाभ होगा.

क्या इस तरह के उदाहरण लोगों को जुए और लाटरी की लत के लिए प्रोत्साहित नहीं करते हैं? इस के अलावा और भी 6 उदाहरण इस पुस्तिका में दिए गए हैं जिन में बताया गया है कि शुक्रवार का व्रत रखने से किसी व्यक्ति के खोए हुए हीरे वापस मिल गए तो किसी की बेटी की शादी हो गई. परंतु एक बात सभी में समान है कि इन उदाहरणों में जितने भी भक्तों का जिक्र किया गया है उन में से किसी का भी पता नहीं दिया गया है.

विदेशी सप्ताह, भारतीय व्रत

मैं अकसर व्रत रखने वाली महिलाओं से यह प्रश्न करता हूं कि सोमवार से ले कर रविवार तक जो महिलाएं व्रत रखती हैं (धन्य हैं वे पंडित जिन्होंने हफ्ते का एक दिन भी खाली नहीं छोड़ा) उन का पौराणिक महत्त्व क्या है और ये व्रत कब से प्रचलन में हैं. सभी महिलाएं बिना सोचेसमझे कहती हैं कि ये व्रत भारतीय परंपरा में हजारों वर्षों से हैं.

यह बात समझ के परे है क्योंकि साप्ताहिक दिनों पर आधारित कैलेंडर, रोमन कैलेंडर है, भारतीय कैलेंडर चंद्रमा पर आधारित कैलेंडर है, जो तिथियों पर आधारित है और यही कारण है कि कोई भी भारतीय त्योहार दिन के हिसाब से नहीं आता, तिथियों के हिसाब से आता है.

भारत में अंगरेजी कैलेंडर की शुरुआत तब हुई होगी जब अंगरेजों ने भारत को गुलाम बनाया था क्योंकि उस से पहले सप्ताह के दिनों पर आधारित कैलेंडर की कल्पना भारत में नहीं की गई थी. इस से साफ है कि दिनों पर आधारित ये व्रत आधुनिक काल की देन हैं जिन का कोई भी पौराणिक महत्त्व नहीं है, क्योंकि किसी भी प्राचीन हिंदू धर्म ग्रंथ में इन व्रतों का कोई वर्णन नहीं मिलता है, फिर ये व्रत कैसे प्रचलन में आए, यह प्रश्न विचारणीय है.

इन तमाम बातों का निचोड़ यह है कि कोई भी व्रत, उपवास या पूजा आप को लखपति नहीं बना सकती है. लक्ष्मी की साधना साधनों से नहीं बल्कि कठिन परिश्रम से की जाती है.

इस दुनिया में करोड़ों लोग बिना लक्ष्मी की पूजा किए धनवान हैं क्योंकि वे अपना कर्म कर रहे हैं. वहीं, करोड़ों लोग ऐसे भी हैं जो लक्ष्मी की पूजा करते हुए भी गरीबी को भोग रहे हैं क्योंकि वे बिना कर्म किए लाटरी खोलने वाली लक्ष्मी में विश्वास करते हैं.

बच्चे की चाहत में

रोजाना की तरह 25 सितंबर, 2017 की सुबह भी मानव और शिवम की मां रजनी ने दोनों को तैयार कर के स्कूल भेजा था. स्कूल साढ़े 8 बजे शुरू होता था, इसलिए दोनों भाई 8 बज कर 10 मिनट पर घर से निकले थे. स्कूल से आ कर दोनों बच्चे खाना खाते थे और थोड़ी देर खेल कर सो जाते थे.

रजनी का पति अशोक अपना लंच बौक्स साथ ले जाता था. वह भवनों की मरम्मत के छोटेमोटे ठेके लिया करता था. सुबह का निकला अशोक दिन ढले ही घर लौटता था.

बच्चों के जाने के बाद रजनी ने घर के काम निपटाए, फिर बच्चों के लिए दोपहर का खाना तैयार किया. दोपहर को जब उन के आने का समय हो गया तो वह दरवाजे पर खड़ी हो कर उन का इंतजार करने लगी. जब बच्चे अपने आने के समय से भी आधा घंटा बाद तक नहीं आए तो रजनी को चिंता हुई.

परेशान हाल रजनी घर में ताला लगा कर बच्चों के स्कूल जा पहुंची. वहां मालूम पड़ा कि उस रोज मानव और शिवम स्कूल आए ही नहीं थे. यह सुन कर रजनी ठगी सी रह गई.

सुबह घर से स्कूल के लिए निकले बच्चे, वहां नहीं पहुंचे तो कहां चले गए. निस्संदेह यह चिंता की बात थी. उस का पति काम पर गया हुआ था, उस का फोन भी नहीं लग रहा था. रजनी अपने कुछ परिचितों के साथ बच्चों की तलाश के लिए निकली भी. लेकिन काफी कोशिशों के बाद भी बच्चों का कहीं कोई पता नहीं चला. आखिर थकहार कर उस ने थाने में उन के गुम होने की रिपोर्ट लिखा दी.

रजनी की शिकायत पर रोपड़ के थाना सिटी में बच्चों की गुमशुदगी की डीडीआर दर्ज कर ली गई. पुलिस ने बच्चों की तलाश को कोशिश भी की.

सफलता न मिलने पर अगले दिन इस मामले में भादंवि की धारा 363 के अंतर्गत केस दर्ज कर लिया गया. साथ ही यह सूचना दूसरे थानों को भी दे दी गई. पुलिस ने बच्चों के फोटो और विवरण सहित इश्तिहार छपवा कर रोपड़ व आसपास के इलाके की दीवारों पर चिपकवा दिए.

जिले के एसएसपी कैप्टन राजबचन सिंह संधू ने इस मामले को गंभीरता से ले कर इस की जांच डीएसपी (एच) मनवीर सिंह बाजवा को सौंप दी. उन्होंने 2 दिन तक गहनता से जांच की. लेकिन सफलता नहीं मिली. अंतत: एसएसपी ने यह केस रोपड़ पुलिस की सीआईए ब्रांच के हवाले कर दिया.

सीआईए के इंचार्ज अतुल सोनी ने केस की फाइल हाथ में आते ही उस की स्टडी कर के एक अलग स्ट्रेट्जी बनाई. इस के तहत उन्होंने बच्चों की मां रजनी से विस्तृत बातचीत कर उस की जिंदगी का एकएक पन्ना खंगालने का प्रयास किया.

35 वर्षीय रजनी ने अपनी जिंदगी में इतने ज्यादा उतार चढ़ाव देखे थे जिन की कल्पना करना भी मुश्किल था. 16 साल की उम्र में उस की शादी बलवंत नामक शख्स से हो गई थी, जिस से उसे एक लड़की जिया पैदा हुई. लेकिन कुछ दिन बाद ही उस के पति की मौत हो गई. इस के बाद उस की शादी रमेश से कर दी गई. शादी के कुछ समय बाद रमेश की भी मृत्यु हो गई.

रजनी की तीसरी शादी बलदेव नाम के आदमी से हुई. बलदेव से उसे 2 लड़के हुए मानव और शिवम. बाद में बलदेव से रजनी का तलाक हो गया. थोड़े दिन बाद रजनी मनोज के संपर्क में आई, जो उसे उस के बच्चों सहित अपने साथ तो रखे रहा, लेकिन यह लिव इन रिलेशन की तरह था. मनोज ने उस के साथ वैवाहिक बंधन में बंधने से साफ इनकार कर दिया था.

रजनी की चौथी शादी अशोक कुमार उर्फ पिंटू से हुई. वह इस के लिए हर लिहाज से बेहतर साबित हुआ. उस ने रजनी की बेटी जिया की शादी करवाने में पूरा सहयोग दिया. साथ ही उस ने मानव और शिवम को पढ़ानेलिखाने का जिम्मा भी उठाया. वह अकसर रजनी से कहा करता था कि उसे दिनरात कितनी भी मेहनत क्यों न करनी पड़े, वह उस के बच्चों को जिंदगी में कोई कमी नहीं आने देगा. यही नहीं वह उन्हें पढ़ालिखा कर समाज में सलीके से जीने लायक भी बनाएगा.

मानव और शिवम से अशोक प्यार भी करता था. 24 मार्च, 2017 को मानव 9 वर्ष का हुआ तो उस ने खूब अच्छी तरह से उस का जन्मदिन मनाया. इसी तरह 20 जुलाई को 6 साल का होने पर उस ने शिवम का भी खूब अच्छे से जन्मदिन मनाया.

अपने बच्चों को सौतेले बाप का भरपूर प्यार मिलते देख रजनी बहुत खुश थी. वैसे भी वह सोचा करती थी कि इन 2 लड़कों के भविष्य पर ही ध्यान केंद्रित करेगी और आगे एक भी बच्चे के बारे में नहीं सोचेगी. यही वजह थी कि पति से संबंध बनाने में वह काफी सावधानी बरतती थी. सावधानी के लिए वह नलबंदी करवाने की इच्छुक थी.

इस संबंध में जब उस ने अशोक से बात की, तो वह भड़क उठा, ‘‘बच्चे चाहे 6 और हो जाएं, लेकिन मैं तुम्हें यह सब नहीं करने दूंगा. मुझे अपने खुद के बच्चे भी तो चाहिए.’’

‘‘तो मानव और शिवम किस के बच्चे हैं, ये भी तो तुम्हारे ही हैं.’’ रजनी ने भी थोड़ा खफा होते हुए कह दिया.

‘‘देखो, मेरी भावना को समझने की कोशिश करो. मानव और शिवम को मैं बाप का प्यार दे रहा हूं तो इस का यह मतलब नहीं है कि वह मेरे बच्चे हो गए.’’ अशोक ने कहा.

‘‘क्यों, ऐसे तो कल को तुम मुझ से भी कह दोगे कि तुम मुझे पति का प्यार दे रहे हो, लेकिन इस का मतलब यह नहीं कि मैं तुम्हारी पत्नी हो गई.’’ रजनी भी उसी अंदाज में बोली.

‘‘देखो, फालतू बहकीबहकी बातें मत करो. मैं ने तुम से प्यार किया है और बाकायदा शादी कर के तुम्हें पत्नी बनाया है.’’

‘‘जब मुझे हमेशा के लिए अपनी बना लिया तो मेरे बच्चे भी तुम्हारे हो गए. उन्हें अपनाने में अब कैसी हिचक?’’

‘‘रजनी, मैं ने तुम्हारे बच्चों को अपनाया हुआ है और उन का भविष्य बनाने में पीछे हटने वाला भी नहीं हूं. लेकिन इन के साथसाथ मुझे अपना खुद का बच्चा भी तो चाहिए. भले ही एक हो. उस के बाद तुम क्या, मैं ही अपनी नसबंदी करवा लूंगा. इस के लिए तुम्हें मुझे सहयोग देना ही पड़ेगा.’’ अशोक ने आखिर की 2 बातों पर जोर देते हुए कहा.

इस सब के लिए रजनी तैयार नहीं हुई.

उस का कहना था कि आज की महंगाई के दौर में 2 बच्चों का खर्च उठाना ही मुश्किल है. फिर लड़की की शादी पर उठाया गया कर्ज भी अभी पूरी तरह नहीं उतरा है. ऐेसे में 1 और बच्चा आ जाने से उन्हें कई किस्म की परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है. लिहाजा वह किसी भी कीमत पर अशोक से सहमत नहीं हुई.

‘‘इस बात को ले कर हम दोनों में थोड़ी बहुत तकरार जरूर रहने लगी थी, लेकिन मैं अशोक को अच्छी तरह जानती हूं. वह मुझे नुकसान पहुंचाने जैसा कभी कुछ नहीं करेगा.’’ रजनी ने अपने बयान में इंसपेक्टर अतुल सोनी को बताया.

अतुल सोनी ने यह बात एसएसपी संधू को बताई. इस पर उन्होंने इस मामले की गहराई में जाने का प्रयास करते हुए इंसपेक्टर सोनी को दिशानिर्देश दिया, ‘मेरा शक अशोक पर ही जा रहा है. तुम जरा इस के बारे में पता लगाने की कोशिश करो, मुखबिरों का भी सहारा लो.’

सोनी ने ऐसा ही किया. पता चला कि 25 सितंबर की शाम जब अशोक काम से लौटा था तो दोनों बच्चों के गुम हो जाने की बात सुन कर वह भी पत्नी और अन्य लोगों के साथ बच्चों की तलाश करने निकला था. यहां तक कि रिपोर्ट लिखवाने वह थाने भी आया था.

लेकिन इस के अगले दिन एफआईआर दर्ज हो जाने के बाद वह यह कहते हुए घर से चला गया था कि बच्चों के बारे में जानकारी हासिल करने के लिए वह एक तांत्रिक के पास जा रहा है.

उसी दिन थाना सिटी में एक अज्ञात फोन भी आया. फोन करने वाले ने बताया कि रजनी के बच्चों को उस के पूर्व प्रेमी मनोज ने अपहृत कर के मौत के घाट उतार दिया है. मनोज को थाना ला कर उस से इस संबंध में व्यापक पूछताछ की गई. लेकिन पूछताछ में वह निर्दोष पाया गया.

इंसपेक्टर अतुल सोनी ने एक पुलिस पार्टी अशोक के गांव बवैते जिला ऊना, हिमाचल प्रदेश भेज दी थी. यह पार्टी उस की तलाश में पूछताछ करते हुए एक तांत्रिक के यहां जा पहुंची. तांत्रिक ने पुलिस को बताया कि अशोक उस का जानकार है और वह उस के पास आया भी था.

उस ने पूछा था कि किसी ने उस की बीवी के पहले के 2 लड़कों का अपहरण कर के उन्हें मार डाला है. इस आरोप में कहीं वह तो नहीं फंस जाएगा? उस की इस बात से तांत्रिक इतना डर गया था कि उस ने अशोक को किसी तरह टरकाते हुए अपने यहां से भगा दिया था.

लेकिन घर वापस लौटने के बजाए अशोक भूमिगत हो गया था.

पुलिस ने उस की तलाश में छापेमारी करने के साथसाथ कई मुखबिर भी उस की खबर लाने के लिए लगा दिए थे. इन प्रयासों में पुलिस को सफलता भी मिली. 28 सितंबर को अशोक पुराना रोपड़ से पुलिस के हत्थे चढ़ गया. उस से पहला प्रश्न यही पूछा गया कि 25 सितंबर की सुबह वह कहां था?

उस ने बताया कि उस रोज वह सुबह साढ़े 8 बजे सनसिटी सोसाइटी जा कर अपने काम से लग गया था. उस के इस बयान की सत्यता की जांच करने के लिए जब सनसिटी के अधिकारियों से पूछताछ की गई तो पता चला कि उस रोज वह साढ़े 8 बजे नहीं, बल्कि दिन के साढ़े 10 बजे सनसिटी पहुंचा था. इस से पहले वह हमेशा सुबह के साढ़े 8 बजे वहां पहुंच जाता था. 25 सितंबर को वह पहली बार 2 घंटे देरी से आया था.

अशोक संदेह के दायरे में आ गया था. उसे सीआईए केंद्र के इंटेरोगेशन सैल में ले जा कर उस से अभी थोड़ी ही पूछताछ हुई थी कि उस ने दोनों हाथ जोड़ कर अपना गुनाह स्वीकार कर लिया. फिर बताया कि उस ने ही रजनी के दोनों बच्चों को मार कर उन के शव पानी में फेंक दिए थे, जिन्हें वह बरामद करवा सकता है.

पुलिस ने अशोक को विधिवत गिरफ्तार कर के हवालात में बंद कर दिया

अगले रोज उसे इलाका मजिस्ट्रेट के सामने पेश कर के 4 दिनों के कस्टडी रिमांड पर लिया गया. रिमांड की इस अवधि में सीआईए इंसपेक्टर अतुल सोनी के अलावा एसएसपी राजबचन सिंह सिंधू ने भी उस से व्यापक पूछताछ की. इस पूछताछ में अशोक ने जो कुछ बताया, उस से इस मामले की दर्दनाक दास्तान कुछ इस तरह सामने आई.

अशोक कुमार उर्फ पिंटू गांव बवैते में रहने वाले रामकिशन का बेटा था. गुजारे लायक पढ़लिख लेने के बाद एक रोज पिता से झगड़ा कर के वह रोपड़ चला आया.

उस वक्त उस की उम्र महज 13 वर्ष थी. 4 दिनों तक वह रोपड़ के रेलवे स्टेशन पर ही रुका रहा. फिर रोपड़ में किसी के यहां घरेलू नौकर बन गया. करीब 6-7 साल इसी तरह निकल गए. जिन के घर वह नौकरी करता था, उन का ठेकेदारी का काम था. नौकरी छोड़ कर अशोक भी स्वतंत्र रूप से यही काम करने लगा.

आगे के 5 सालों में उस ने ठेकेदारी का अपना अच्छा काम जमा लिया. रहने को उस ने बेला चौक एरिया में मकान ले लिया.

करीब 2 साल पहले की बात है. एक रोज अचानक उस की मुलाकात रजनी से हुई. उस ने एक दुकान पर कुछ सामान वगैरह खरीदा था, जिस की बिल अदायगी के लिए उस के पास पैसे कम पड़ रहे थे.

वह दुकानदार से बकाया पैसा अगले दिन दे जाने की बात कह रही थी. दूसरी ओर दुकानदार इस के लिए मना करते हुए उसे समझा रहा था कि वह फिलहाल उतना ही सामान ले जाए. जितने उस के पास पैसे हैं. वह थोड़ा रुखाई से भी पेश आ रहा था.

अशोक भी उसी दुकान पर कुछ खरीद रहा था. रजनी को देखते ही वह उस की ओर आकर्षित हो गया. उस ने उस के द्वारा खरीदे गए सामान का पूरा बिल चुकता कर दिया.

इस के बाद दोनों अकसर मिलने लगे. देखतेदेखते दोनों में प्यार हो गया. धीरेधीरे जिस्मानी ताल्लुक भी बन गए, जिस में रजनी ने पूरी तरह ऐहतियात बरती. एक रोज उस ने अशोक को अपनी पिछली जिंदगी के बारे में विस्तार से बता दिया. रजनी की दास्तान सुन कर अशोक को झटका लगा. उस की जिंदगी में पहले ही 4-4 मर्द आ चुके थे और वह 3 बच्चों की मां भी थी.

मगर अब तक वह उस के मोहपाश में बंध चुका था. उसे वह खूबसूरत भी लगती थी. आखिर उस ने मंदिर में रजनी से विवाह रचा लिया. उस के बच्चों का जिम्मा भी उस ने अपने ऊपर ले लिया.

विवाह के बाद अशोक को शारीरिक सुख देने में रजनी ने कोई कसर नहीं छोडी. मगर उसे गर्भ न ठहरे, इस की सावधानी भी वह रखे हुए थी. कुछ अरसा अशोक उस के दैहिक आकर्षण में इस कदर पागल रहा कि उस ने इस सब की ओर ज्यादा ध्यान नहीं दिया. मगर साल भर बीतते ही उस के मन में अपने खुद के बच्चे की इच्छा जागृत होने लगी.

रजनी और कोई बच्चा नहीं चाहती थी. वह सोचती थी कि महंगाई के इस दौर में ज्यादा बच्चें की परवरिश करना मुश्किल हो जाता है. वह अपनी जगह एकदम सही थी. लेकिन अशोक भावुकता में बह कर इस जिद पर अड़ गया कि रजनी से वह अपना खुद का बच्चा भी हासिल कर के रहेगा.

इस मुद्दे पर दोनों में झगड़ा रहने लगा. पहले रजनी रात में बच्चों का सुला कर अशोक के पास चली आया करती थी. मगर अब वह ज्यादातर बच्चों के साथ, उन के बीच में सोने लगी. बहरहाल वक्त आगे सरकता गया. इस दौरान अशोक के मन में यह बात घर करने लगी कि रजनी को केवल अपने बच्चों से प्यार है.

जब तक उस के बच्चे जिंदा हैं, वह मन से उस की नहीं हो सकती. लिहाजा उस ने दोनों बच्चों को मारने की योजना बना ली.

इस योजना के तहत 25 सितंबर, 2017 की सुबह वह घर से पैदल निकला और सिविल हास्पीटल के पिछली तरफ रहने वाले अपने दोस्त सद्दाम हुसैन की स्प्लेंडर मोटरसाइकिल ले कर मानव और शिवम के स्कूल की ओर जाने वाले रास्ते पर रुक गया. थोड़ी देर में उसे दोनों बच्चे पैदल आते दिखाई दे गए.

अशोक ने उन्हें यह कह कर मोटरसाइकिल पर बिठा लिया कि आज वह उन्हें मछलियां दिखाने नदी पर ले जाएगा और बोटिंग भी करवाएगा, इसलिए स्कूल से छुट्टी.

बच्चे खुश हो गए. अशोक इन्हें मोटरसाइकिल पर बिठा कर रोपड़ के साथ लगते सतलुज नदी के एक किनारे पर ले गया. नदी के उत्तर दिशा की तरफ बने बांध के पास ले जा कर उस ने दोनों बच्चों को पानी में फेंक दिया. बाद में उस ने उस जगह से करीब 100 कदम की दूरी पर जंगल में बच्चों के स्कूल बैग छिपा दिए.

पूछताछ के दौरान अशोक की निशानदेही पर पुलिस ने दोनों बच्चों के शवों के अलावा उन के स्कूल बैग भी बरामद कर लिए. कस्टडी रिमांड की समाप्ति पर पुलिस ने अशोक को फिर से अदालत पर पेश कर के न्यायिक हिरासत में जेल भिजवा दिया. फिलहाल, वह पटियाला की केंद्रीय जेल में बंद था.?

   — कथा पुलिस सूत्रो पर आधारित

न करें सेना का इस्तेमाल

लड़ाई की लाठियां बजाना आसान है पर देशों के लिए लड़ाई उतनी ही महंगी होती है जितनी 2 किसानों के लिए जो खेत की हदबंदी पर झगड़ रहे हों. भारतीय सेना पर देश को भरोसा है पर यह भरोसा तभी तक कायम रह सकता है जब तक देश सेना को खासा पैसा देता रहे. खाली पेटों से लड़ाइयां नहीं लड़ी जातीं. देश की जातिप्रथा का छिपा मतलब हमेशा यही रहा है कि पिछड़ों व दलितों को हमेशा खाली हाथ रखो ताकि वे कभी भी पंडों, बनियों, राजपूतों के खिलाफ न खड़े हो सकें.

भारत पाकिस्तान दोनों की सेनाओं के साथ यही हाल है. पाकिस्तान के पास भारत से कम पैसा है पर उसे लगातार अमेरिका, सऊदी अरब, चीन से पैसा मिलता आया है. भारत के नेताओं की अकड़ कुछ ज्यादा रही है और इसलिए सैनिक सहायता हमेशा न के बराबर मिली है. सेना के लिए देश को पेट काट कर सामान खरीदना पड़ा है और अगर राफेल हवाई जहाज यूपीए सरकार ने पहले नहीं खरीदे और मोदी सरकार ने भी आखिर में फैसला किया तो इसलिए कि पैसा दिख नहीं रहा था.

सेना की अपनी जानकारी के हिसाब से पिछले 1 साल में वायु सेना ने अरबों रुपए की लागत के 16 हवाईजहाज दुर्घटनाओं में तकनीकी खराबियों की वजह से खो दिए. इन में 2 मिग बाइसन, 2 जगुआर, 2 मिग 27, मिराज हैलीकौप्टर, 2 हौक, कई ट्रांसपोर्ट हवाईजहाज शामिल हैं. इतने हवाईजहाजों का गिरना और उन में सैनिकों का बिना युद्ध के मरना एक खतरे की घंटी है. मिगों को तो उड़ते ताबूत कहा जाने लगा है. ये रूसी विमान बनावट में ही कमजोर हैं पर चूंकि दूसरे देशों से अच्छे मिल ही नहीं रहे, इन्हें खरीदना पड़ रहा है.

भारत पुराने हवाई जहाज कैरियर व पनडुब्बियां ही खरीद पा रहा है. अब पुराने मिग 29 खरीदने की बात चल रही है. सैनिकों की राइफलें पुरानी हैं. अभी अमेठी में राइफल कारखाने का उद्घाटन करते हुए नरेंद्र मोदी ने यह बात मानी है. सैनिकों के वेतनों व पैंशनों का मामला अटका रहता है. उन्हें अच्छा खाना नहीं मिल पाता. छावनियों की शक्लों को देखें तो पता लग जाएगा कि ज्यादातर बिल्डिंगें अंगरेजों के जमाने की हैं.

एक गरीब देश के लिए सेना पर खर्चा करना आसान नहीं है. उत्तर कोरिया ने इसी वजह से अमेरिका से समझौता किया. जर्मनी और जापान ने दूसरे विश्वयुद्ध के बाद जम कर विकास किया क्योंकि सेना पर खर्च नहीं किया. हमारे यहां सोशल मीडिया पर हल्ला मचाया जा रहा है मार दो, जला दो, खात्मा कर दो, बिना यह सोचे कि इस की कीमत क्या है. मोदी कहते हैं घर में घुसघुस कर मारेंगे, पर किसलिए और किस कीमत पर.

हम देश में गाय को बचाने पर ज्यादा खर्च करने लगे हैं, मंदिरों, कुंभों, आश्रमों, पूजाओं पर भयंकर खर्च कर रहे हैं पर सेना के लिए जेब खाली है. अगर जेब में पैसे नहीं, जो पाकिस्तान के पास भी नहीं, तो लोगों का खयाल रखें. उन्हें लड़ाई के लिए न उकसा कर काम के लिए तैयार करें. सरकार अपनी फाइलों की सुरक्षा करे, धर्म की सुरक्षा के नाम पर सेना का इस्तेमाल करना बंद कर दे तो ठीक रहे.

उत्तर प्रदेश, बिहार और लोकसभा चुनाव साल 2019 के आम चुनाव बिहार व उत्तर प्रदेश के लिए काफी अहमियत रखते हैं. देश के सब से ज्यादा गरीब यहीं बसते हैं और गंगा नदी के बावजूद सदियों से उन की बीमारी, गरीबी, भूख, टूटे मकानों में कोई फर्क नहीं आया है. पगपग पर बिखरे मंदिरों के बावजूद यहां के लोगों की फटेहाल हालत दूर से दिख जाती है.

अगर रेल से सफर कर रहे हों तो गांव के बाद गांव और शहर के बाद शहर कूड़े के बीच बेतरतीब मकान दिखेंगे और उन के बीच आदमी जानवरों की तरह रहते दिखेंगे. ये राज्य वही हैं जहां से मुगलों ने 250 साल राज किया. इन्हीं 2 राज्यों का गुणगान हर शास्त्र में है पर इन की गरीबी यहां से आने वाले प्रधानमंत्रियों, मंत्रियों, राष्ट्रपतियों के होते दूर नहीं हुई. वजह साफ है. ये दोनों राज्य गलत नेताओं को चुनते रहे हैं और जब भी उन्होंने सही नेता चुन लिया तो वह बिगड़ते देर नहीं लगाता.

यह बिगड़ना भ्रष्टाचार नहीं है. भ्रष्टाचार से तो थोड़ा सा नुकसान होता है, कुछ सौ करोड़ों का. असल नुकसान उस निकम्मेपन से होता है जो यहां के नेता अपने लोगों पर थोपते हैं. चुनाव में जो भी जीते उस से यही उम्मीद की जाती है कि वह नौकरी लगवा दे, ठेका दिलवा दे. इस के लिए उस की पूजा की जाती है, जैसे गंगा जमुना मैयाओं की की जाती है. मेहनत करना न नेता जानते हैं, न बताना चाहते हैं. घोर ब्राह्मणवादी सोच इतनी गहरी है कि चाहे समाजवादी लालू प्रसाद यादव का राष्ट्रीय जनता दल हो या अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी या फिर मायावती की बहुजन समाज पार्टी, सब को मंदिरों और पूजा की लगी रहती है.

नरेंद्र मोदी ने गुजरात छोड़ कर यों ही बनारस को चुनाव लड़ने के लिए नहीं अपनाया है. यहीं तो बिहार व उत्तर प्रदेश का दिल है जो आज भी पुरानी सोच, जातिवाद, पाखंड का जहरीला खून दोनों राज्यों में बहाता है. न भाजपा, न कांग्रेस इस सोच या इस तरह की राजनीति को बदलने की बात भी कर रही हैं जो यहां के लोगों को बदबूदार दलदल से निकालने की हो. उलटे भाजपा तो फिर अयोध्या में राम मंदिर का मामला उठा कर दलदल में धकेलने की बात कर रही है.

इन दोनों राज्यों ने पिछले 20-25 सालों में कई तरह की सरकारें देखी हैं पर सब का रवैया एक ही सा है. इन्हीं दोनों राज्यों के लोग दुनियाभर में जा कर नाम और पैसा कमाते हैं पर यहां अपने देश, अपने राज्य में नेताओं की सड़ी सोच की वजह से सड़ी जिंदगी जीने को मजबूर हैं. ये नेता लखनऊ और पटना में ही नहीं हैं, हर गांव में हैं. एक और चुनाव इन दोनों राज्यों की हालत नहीं बदलेगा. अगर यही लोग रहे तो पक्का है कि तीर्थों का उद्धार होगा, जनता को पाताल में ही जगह मिलेगी.

एसिड हमले की कहानी बताएगी दीपिका पादुकोण की ‘छपाक’

‘पद्मावत’ की सक्सेस बाद हर किसी को दीपिका पादुकोण के नए प्रोजेक्ट का बेसब्री से इंतजार था. कुछ महीने पहले ही दीपिका ने घोषणा की थी कि उन्होंने एक महिला क्रेन्द्रित फिल्म छपाक के लिए मेघना गुलजार से हाथ मिलाया है. ‘राजी ‘फेम डायरेक्टर मेघना गुलजार की इस फिल्म की कहानी एडिस सर्वाइवर लक्ष्मी अग्रवाल की जिंदगी पर आधारित है. दीपिका ने कुछ देर पहले इस फिल्म से अपना फर्स्ट लुक शेयर किया है. जो अब तेजी से वायरल हो रहा है.

वायरल हुआ पहला लुक…

सामने आए लुक में दीपिका को देखकर साफ पता चल रहा है कि लक्ष्मी ने अपनी जिंदगी में आने वाली दिक्कतों का कैसे हंसकर सामना किया है. इस फिल्म में दीपिका के अलावा विक्रांत मैसी भी महत्वपूर्ण भूमिका अदा करने वाले है. छपाक के फर्स्ट लुक के साथ ही दीपिका ने इस बात की भी घोषणा कर दी है कि ये फिल्म अगल साल 10 जनवरी को रिलीज होगी. दीपिका के इस लुक को उनके फैंस और दोस्त काफी पसंद कर रहे हैं.

मालती होगा दीपिका का नाम…

फिल्म के पहले लुक को अपने ट्विटर अकाउंट पर साझा करते हुए दीपिका ने कैप्शन में लिखा है कि ‘एक किरदार जो कि मेरे साथ हमेशा रहेगा….मालती’. दीपिका के इस कैप्शन से अंदाजा लगाया जा रहा है कि फिल्म छपाक में दीपिका के किरदार का नाम मालती होगा.

15 साल की उम्र में हमले का शिकार हुई थी लक्ष्मी…

बात की जाए लक्ष्मी की तो आपको बता दें कि 15 साल की उम्र में उनपर एक शख्स ने एसिड से हमला कर दिया था क्योंकि उन्होंने उस शख्स के साथ शादी करने से मना कर दिया था. इस घटना ने ना सिर्फ लश्र्मी को और भी मजबूत बना दिया बल्कि उन्होंने स्टॉप सेल एसिड नाम की संस्था बनाकर एसिड से होने वाले हमलों और उसकी ब्रिकी के खिलाफ जमकर आवाज उठाई.

साल 2014 में मिशैल ओबामा ने लक्ष्मी को इंटरनेशल वुमेन ऑफ करेज अवॉर्ड से सम्मानित किया था. मिली जानकारी के मुताबिक फिल्म छपाक की शूटिंग दिल्ली से शुरु होगी। आपको दीपिका का लुक कैसा लगा ये हमे जरूर बताइएगा.

किसके चौकीदार हैं साहेब?

2014 के चायवाले ने 2019 में खुद को चौकीदार घोषित कर दिया है. वजह है लोकसभा चुनाव. पिछली बार तो वह खुद ही चायवाला बना, बाकी सबको बनाने की कोशिश नहीं की, मगर इस बार तो वह न सिर्फ खुद चौकीदार बन गया, बल्कि पूरे देश को चौकीदार बनाने की मुहिम में लग गया है, मगर चौकीदार किसका बनना है, मालिक कौन है, चौकीदारी किस चीज की करनी है, किससे करनी है, यह बातें साफ नहीं बता रहा है.

हरदोई के बसरी गांव का किसान मुछई कह रहा है हमारे पास क्या धरा है जो हमें चौकीदार रखना पड़े? बित्ते भर का खेत है, कभी कुछ उग जाता है, कभी खाली पड़ा रहता है. उसके लिए चौकीदार रखें तो क्यों रखें और रख भी लें तो उसे पगार कहां से दें? खुद खाने के लाले पड़े हैं, बच्चे भूखे मर रहे हैं, बीवी बिना इलाज मर गयी. हम तो उन 15 लाख रुपयों की बाट ही जोहते रहे गये जो साहेब ने भेजने को कहा था. 15 लाख आते तो जिन्दगी में अच्छे दिन आते. अब मुछई को कौन समझाये कि 15 लाख और अच्छे दिन की बात तो बस सपनों के सौदागर का झुनझुना था, अब उसी झुनझुने से चौकीदार…चौकीदार… का शोर निकल रहा है.

सोशल मीडिया पर ‘मैं भी चौकीदार’ के लिए सिर-फुटव्वल शुरू हो चुकी है. सुषमा स्वराज, राजनाथ सिंह, अमित शाह, निर्मला सीतारमण जैसे धुरंधरों समेत पूरी मोदी-कैबिनेट चौकीदार बन गयी है. पांच साल तक चोरों की फौज तैयार करते रहे, जनता का पैसा देश से बाहर भेजते रहे और अब चौकीदार बन गये. कोई पूछे कि अब किस बात की चौकीदारी भाई! माल तो सारा मोदी, माल्या, चौकसी ले उड़े!
राहुल बाबा बिना लाग-लपेट के खरी बात कहते हैं कि- ‘चौकीदार चोर है’. उनकी बात में दम है. भाजपा नेत्री पंकजा मुंडे ने जब मारे उत्साह के साहेब के ट्वीट पर ट्वीट किया कि- ‘मैं भी चौकीदार’ तो एक मीडियाकर्मी ने तुरंत पूछ लिया- ‘तो चिक्की कौन खाया?’ अब पंकजा मुंडे चुप हैं. 206 करोड़ रुपये की चिक्की जो आदिवासी बच्चों के लिए खरीदी गयी थी, आखिर कहां गयी, इसका जवाब चौकीदारनी के पास नहीं है.

प्रियंका गांधी वाड्रा ने तो स्पष्ट कह दिया है- ‘चौकीदार तो अमीरों के होते हैं.’ सच बात है. अब गरीब आदमी को चौकीदार की क्या जरूरत? अमीरों को ही अपने धन की रक्षा के लिए चौकीदार रखने होते हैं. अब प्रधानमंत्री पद पर बैठा व्यक्ति अगर चौकीदार बना है तो जाहिर है देश के सबसे बड़े अमीरों का ही बना होगा. और देश के सबसे बड़े अमीर कौन हैं, ये कौन नहीं जानता. ट्विटर पर एक यूजर जसवीर सिंह ग्रोवर ने तो पूछ भी लिया है कि- ‘कृपया मोदी जी से उनको नौकरी देने वाले का नाम उजागर करने को कहा जाए.’ वहीं एक अन्य यूजर सौरभ सिंह इस मुहिम से झल्लाए हुए हैं. वे कहते हैं, ‘ये प्रधानमंत्री पद की घोर बेइज्जती है.’ एक फेसबुक यूजर इदरिस शेख कहते हैं, ‘वह सिर्फ प्रधानमंत्री पद की बेइज्जती कर रहे हैं. इससे भी ज्यादा वह सिर्फ भारतीयों की भावनाओं से खेल रहे हैं. वह अच्छी तरह जानते हैं कि अगर वह सभी भारतीयों को चौकीदार बना देंगे तो कोई भी उनसे सवाल नहीं करेगा.’

जनता तो भोली है, वह क्या जाने चौकीदार बनने के खेल में क्या क्या खेल हो गये और क्या क्या हो रहे हैं. बड़े चौकीदार के लेफ्टिनेंट ने तो पांच साल में 50 हजार रुपये से 80 करोड़ रुपये बना लिये, वाह री चौकीदारी का कमाल! इससे बेहतरीन नौकरी तो हो ही नहीं सकती. इतना मुनाफा अमित शाह के बेटे जय शाह की कम्पनी उसी हालत में कमा सकती है, जब चोरों ने चोरी का माल वहां जमा किया हो. राहुल गांधी को शाहजादा बोलने वाले शाह के जादे से ये गुप्त रहस्य जानने की जरूरत है कि बाप के चौकीदार होने पर क्या-क्या फायदे किस-किस तरह से उठाये जा सकते हैं.

बहनजी का तो जवाब नहीं, उन्होंने तो चौकीदार को खूब पटक-पटक कर धोया है. साहेब चौकीदार बने तो बहनजी ने ट्वीट किया, ‘राफेल सौदे की गोपनीय फाइल चौकीदार के रहते अगर चोरी हो गयी तो गम नहीं, लेकिन देश में रोजगार की घटती दर और बढ़ती बेरोजगारी, गरीबी, श्रमिकों की दुर्दशा, किसानों की बदहाली के सरकारी आंकड़े पब्लिक नहीं होनी चाहिए. वोट और इमेज की खातिर उन्हें छिपाये रखना है. क्या देश को ऐसा ही चौकीदार चाहिए?’

मोदी के ‘मैं भी चौकीदार’ कैंपेन पर सबसे बड़ा सवाल एक मां ने उठाया है. नाम बदलने में माहिर प्रधानमंत्री की इस नई मुहिम पर सबसे तीखा सवाल जेएनयू से लापता हुए छात्र नजीब अहमद की मां फातिमा नफीस ने पूछा है. उन्होंने ट्वीट करके प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से पूछा है, ‘अगर आप चौकीदार हैं तो मेरा बेटा कहां है?’ उन्होंने पूछा है, ‘एबीवीपी के आरोपी गिरफ़्तार क्यों नहीं किये जा रहे हैं? मेरे बेटे की तलाश में देश की तीन टॉप एजेंसी विफल क्यों हो गयी हैं?

देश की जनता पहली बार एक ऐसा लोकसभा चुनाव देख रही है, जिसमें देश का प्रधान नेता नाम बदलने की कलाबाजियां दिखाने में मशगूल है. जिसमें जनता से जुड़े मुद्दे नदारद हैं. बिजली, पानी, रोटी, रोजगार, गरीबी, बेरोजगारी, दवा, अस्पताल, शिक्षा किसी मुद्दे पर कोई बात ही नहीं हो रही है. बात हो रही है तो बस चौकीदारी की. आन्दोलन चल रहा है सबको चौकीदार बनाने का. उधर असल चौकीदारों की जमात सोच रही है कि ये सारे बड़े लोग अगर चौकीदार बन गये तो हमारी नौकरियों का क्या होगा? बड़ी मुश्किल से तो एक नौकरी मिली थी, किसी तरह रो-रोकर गुजारा चल रहा था, अब क्या मोदी जी ये नौकरी भी खा जाएंगे.

जनता का समय

23 मई को जनता का फैसला सुनाए जाने तक कम से कम सरकारी विज्ञापनों के खोखले वादों से तो छुटकारा मिलेगा. चुनाव आयोग की आदर्श आचार संहिता लागू होने के पहले के सप्ताहों में सरकार ने जिस तरह विज्ञापनबाजी की है वह अभूतपूर्व है. उस ने समाचारपत्रों में एक एक दिन में 10-10, 12-12 पृष्ठों के विज्ञापन छपवा कर जनता पर मानसिक प्रहार किया है. विरोधी दलों के पास तो सरकारी खजाना नहीं था,  सो, वे बेचारे मन मसोस कर रह गए.

अब 60 दिनों तक जो सरकारी शांति रहेगी, वह जनता को मौका देगी कि वह, क्या सही था क्या गलत था, का फैसला कर सके. 2014 में हिंदूवादी लहर बनाने के साथ ‘अच्छे दिन आने वाले हैं’, ‘15 लाख रुपए खाते में आएंगे’, ‘भ्रष्टाचारमुक्त भारत बनाएंगे’, ‘सब का साथ सब का विकास’ आदि नारों और नरेंद्र मोदी के नए तरीके के धुआंधारी भाषणों के बल पर जीत कर आई भारतीय जनता पार्टी से जनता को उम्मीदें थीं. भाजपा के कट्टर हिंदू तेवरों से जो डरे थे वे भी एक नए तरह के बेहतर शासन की उम्मीद कर रहे थे.

चुनाव आयोग के मौडल कोड औफ कंडक्ट लागू होने के बाद के ये 60 दिन तय करेंगे कि 2019 में अब जनता का फैसला क्या है? जनता हमेशा सही होती है, यह जरूरी नहीं. जनता ने खुशी खुशी से हमारे ही देश में भी और कई दूसरे देशों में भी बेईमानों, झूठों, विघटनकारियों को चुना है. कितने ही परिपक्व लोकतंत्र गलत नेताओं के हाथों में सौंपे जा चुके हैं. कितने ही देशों में जनता ने तानाशाहों को खुशी खुशी वोट दिया है. जनता ने धार्मिक, देशप्रेम, बराबरी के नारों में उलझ कर गलत सरकारें बनाई हैं.

भारत का लोकतंत्र कोई अलग नहीं है. यहां का मतदाता जाति, धर्म, वर्ग, वर्ण, पैसे, रिश्वत के आधार पर वोट देता है. ज्यादातर मामलों में उसे मालूम ही नहीं है कि सही क्या है, गलत क्या है. जनता की राय सही हो, यह कोई गारंटी नहीं है. वहीं, इस के अलावा कोई और उपाय भी नहीं है सरकारें बनाने का. राजाओं के दिन लद गए हैं और सभी लड़ाकू राजा अच्छे प्रबंधक साबित नहीं होते.

अच्छे वक्ता अच्छे शासक नहीं होते. अच्छे शासक पूरी बात साफ शब्दों में कह सकें, जरूरी नहीं. जनता को तो उसी आधार पर वोट देना होगा जो वह सुनेगी, देखेगी या महसूस करेगी. ये 60 दिन जनता के लिए मनन करने के हैं. पर जनता में सही फैसला लेने की क्षमता हो, यह जरूरी नहीं.

भाजपाई तीर…

भारतीय जनता पार्टी समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के गठबंधन होने के बाद भी उन पार्टियों पर ऐसे तीर नहीं छोड़ रही जैसे कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी पर छोड़ रही है. जिन्हें जातिवादी और विभाजक कह कह कर गालियां दी जाती थीं उन पर भाजपा की ट्रौल फौज चुप है और रातदिन केवल राहुल गांधी और सोनिया गांधी का मखौल उड़ाने की कोशिशें हो रही हैं. हालांकि, ये कोशिशें अब अपने खिसकते समर्थकों को बचाने के लिए हैं, दूसरों को भाजपा में लाने के लिए नहीं.

मायावती और अखिलेश का प्रभाव केवल उत्तर प्रदेश में है. दलित होने के कारण दूसरे राज्यों में मायावती इक्कादुक्का विधायकों या कौर्पोरेशनों में 5-7 पार्षदों को ही जिता पाती हैं. देशभर के दलितों में वे गहरी पैठ नहीं बना पाईं. दूसरे राज्यों में दलित या तो राज्य तक सीमित रहने वाली पार्टी को वोट देते हैं या फिर कांग्रेस से जुड़े हैं.

उत्तर प्रदेश में दम ठोकने वाली समाजवादी पार्टी का भी यही हाल है. मुलायम सिंह ने कभी इसे उत्तर प्रदेश से बाहर नहीं फैलाया और उन का समर्थन कई राज्यों में कांग्रेस के साथ है, तो कई राज्यों में किसी स्थानीय पार्टी के साथ.

उत्तर प्रदेश अकेला राज्य है जहां दलितों व पिछड़ों की पार्टियां हैं और दोनों ने कईकई बार राज भी किया है. प्रदेश में कांग्रेस को सत्ता में या उस के करीब भी आए अरसा हो चुका है.

मायावती और अखिलेश यादव के खिलाफ सोशल मीडियाई मोर्चा न खोलना भाजपा के लिए संकट पैदा करेगा क्योंकि 80 सीटों पर मुख्य मुकाबला तो उन्हीं के गठबंधन से है. चुनावी नतीजों के बाद उन्हीं से मिलना न पड़े, इस के लिए उन पर हमला न किया जाए, चुनावी जंग में यह भी संभव नहीं है.

यह देश ऐसा है जहां वक्त पर गधे को बाप बनाना बुद्धिमानी मानी जाती है और जहां पौराणिक गाथाओं में दुश्मनों को पटाना या वक्त पर जी हुजूरी करना धर्मयुत है. अमृतमंथन में भी यही हुआ था जिस में विष्णु के 2 अवतार बने थे- कश्यप व मोहिनी. तीसरे अवतार शिव ने जहर पिया था. अब जहां अवतारों ने पहले दस्युओं के साथ काम करने पर और बाद में उन्हें धोखा देने पर मुहर लगा दी हो, वहां उन को हजारों साल बाद पूजने वाले कैसे गलत हो सकते हैं?

सत्ता के अमृतमंथन में कब, किस की जरूरत पड़ जाए, यह नहीं कहा जा सकता. इसलिए मायावती और अखिलेश यादव फिलहाल भाजपा की ट्रौल आर्मी की गोलियों से बचे हैं. आने वाले दिनों में पता चलेगा कि मोहिनी अवतार बन कर अमृत का घड़ा धोखे से छीन कर कैसे देवताओं के हाथों में आता है. पुराणों में ब्लूप्रिंट तैयार है.

बेरोजगारी बेलगाम?

राष्ट्रीय सैंपल सर्वे औफिस आजकल विवादों के तूफान में घिरा है क्योंकि उस की रिपोर्ट, जिसे मोदी सरकार जारी करने से कतरा रही है, कहती है कि युवाओं में 2011-12 के मुकाबले 2017-18 तक बेरोजगारी में 3 गुना वृद्धि हो गई है. करोड़ों नौकरियां पैदा कर के देश में सब का विकास करने का वादा कर के जीती भाजपा के लिए ये आंकड़े शर्मिंदगी पैदा करने वाले हैं, इसलिए वह इन्हें जारी करने में हिचकिचा रही है. सर्वे औफिस कहता है कि ये आंकड़े सरकार की अनुमति के बिना जारी किए जा सकते हैं.

देश में युवाओं में बेकारी तेजी से बढ़ रही है. गांवों में युवाओं की तादाद बहुत ज्यादा है. वे थोड़ाबहुत पढ़ कर बेरोजगार बने हुए हैं. वे सब सरकारी नौकरी चाहते हैं क्योंकि उन्होंने और उन के मातापिताओं ने देखा है कि पढ़लिख कर सरकारी बाबू बन कर लोग दिनभर मौज उड़ाते हैं और शाम को रिश्वत का पैसा घर लाते हैं. गांवों के आज के युवा न खेतों में काम करना चाहते हैं न कारखानों में.

खेतों और कारखानों में काम भी अब कम हो गया है. पहले नोटबंदी ने मारा, फिर जीएसटी ने. ऊपर से चाइनीज सामान बाजार में छा गया, क्योंकि उस के लिए विदेशी मुद्रा विदेशों में काम कर रहे भारतीय मजदूर अपने डौलर व दिरहम हवाईजहाज भरभर कर भेज रहे हैं. नई तकनीकों की वजह से खेतों और कारखानों में नौकरियां कम होने लगी हैं.

रिपोर्ट कहती है कि बेकारी का आंकड़ा जो अब है वह 45 सालों में सब से ज्यादा है. रेलवे क्लर्कों या पटवारियों की कुछ ही नौकरियों के लिए लाखों आवेदन मिलते हैं. सरकार के लिए तो आवेदन सिर्फ कागज भर होता है पर जिस ने आवेदन किया होता है वह रातदिन इसी का सपना देखता रहता है और उस का किसी और काम में मन नहीं लगता. वह परिवार व देश पर बोझ होता है और सरकार के लिए मात्र एक गिनती.

देश में बढ़ते अपराधों, गौरक्षकों, मंदिरों में पूजापाठ के पीछे यही बेकारी है. बैठे ठाले युवा कहीं से भी पैसा जुटाना चाहते हैं और वे कुछ भी कर लेते हैं. शिक्षा ने उन्हें थोड़ा समझदार बना दिया है, लेकिन इतना नहीं कि वे खुद अपने बल पर कारखाने खड़े कर सकें.

सरकार सफाई दे रही है कि नौकरियां हैं पर कम पैसे वाली हैं. यह बड़ी लचर दलील है. नौकरी वह होती है जो संतोष दे, घर चलाने के लायक हो और नौकरी पाने के बाद युवा किसी और सपने की आरे न भटके. सरकार इन युवाओं को नौकरी नहीं दे सकती क्योंकि उस ने तो मान लिया है कि नौकरी भाग्य से मिलती है, पूजापाठ से मिलती है, हिंदू धर्म की रक्षा से मिलती है, गांधी परिवार को दोष देने से मिलती है. अमित शाह और नरेंद्र मोदी के बयानों को सुन लें, तो कहीं काम की कहानी नहीं मिलेगी, सिर्फ मंदिर, कुंभ, नर्मदा यात्रा, संतोंमहंतों की बातें मिलेंगी.

चुनाव से एकदम पहले आए आंकड़े विपक्षियों के लिए सुखद हैं पर बेकारी की समस्या का हल उन के पास भी नहीं है.

सोशल मीडिया और झूठ

फेसबुक, ट्विटर, व्हाट्सऐप ने झूठ का प्रचार करने में धर्मों को भी मात दे दी है. हर धर्म को अपने झूठ को ही अंतिम सत्य साबित करने में 100-200 या इस से भी ज्यादा साल लगे हैं, पर इन हाईटैक कंपनियों ने झूठ को सच मानने की आदत कुछ सालों में ही डलवा दी.

धर्मों की खबर फैलाने में लंबा समय लगता था. जिस ने झूठ गढ़ा उसे अपने आसपास के 10-20 लोगों को झूठ दूत बना कर दूसरी जगह भेजना पड़ता था, जिस में महीनों लगते थे. लेकिन आज के टैक प्लेटफौर्मों पर झूठ तैयार करो, और घंटों में दुनिया के कोनेकोने में पहुंचा दो. अगर वहां झूठ को सच मानने वाले मिले तो वह वायरल हो कर कुछ ही दिनों में सदासदा के लिए सच बन जाता है.

फर्क यह रहा है कि धार्मिक झूठ ने पक्की जमीन ली थी. उसे जिस ने माना अंतिम सत्य मान लिया और उसे झूठ कहने वाले का सिर काट दिया या अपना कटवा लिया. पर झूठ को झूठ नहीं माना. लेकिन हाईटैक झूठ की पोल तेजी से खुलने लगी और अब फेसबुक, ट्विटर, व्हाट्सऐप के लिए खतरे की घंटी बज रही है कि उन पर भरोसा किया जाए या नहीं.

अमेरिकी चुनाव में डोनाल्ड ट्रंप ने सोशल मीडिया का जम कर फायदा उठाया क्योंकि वहां के गोरों को डर था कि काले, भूरे, सांवले, पीले लोग उन के देश पर कब्जा न कर लें. भारत में 2014 में विकास और अच्छे दिनों के पीछे दलितों, पिछड़ों की बढ़ती तादाद और ताकत डरा रही थी. दोनों जगह चुनावों में इस स्पैशल मीडिया पर जम कर झूठ फेंका गया. अब टैक कंपनियां थोड़ी सावधान हुई हैं. फेसबुक ने अब संदेश पढ़ने शुरू कर दिए हैं और उस ने उन के अकाउंट बंद करने भी शुरू कर दिए हैं जो भ्रामक झूठ या घृणा फैलाने में माहिर हैं. मतलब यह है कि अब फेसबुक की चिट्ठी डाकिया पढ़ने लगा है और यदि उसे लगे कि उस में गलत बातें हैं तो वह चिट्ठी दबा सकता है और भेजने वाले या पाने वाले को बैन कर सकता है.

फेसबुक, ट्विटर, व्हाट्सऐप और गूगल अब सरकारों से ज्यादा ताकतवर हो गए हैं. वे पार्टियों के ऊपर हैं. वे जनता के अकेले मार्गदर्शक हैं जबकि उन्हें जनता के भले की नहीं, अपने पैसों की चिंता है. वे पैसा मिले तो हर झूठ को फैला देंगे, न मिले तो सच को झूठों के अंबार के नीचे दबा देंगे.

लोग इस की भारी कीमत चुकाने लगे हैं. आज अज्ञान और गलत ज्ञान जम कर फैल रहा है जबकि विज्ञान पिछड़ रहा है. नतीजा यह है कि लोग चुटकुलों से जीवन जीना सीख रहे हैं, पोर्न से साथी बना रहे हैं, मोबाइल के कैमरे से खींची अंतरंग तसवीरों को इन टैक प्लेटफौर्मों से फैलाने की धमकियां दे कर अपनी बात मनवा रहे हैं. इन का असर गलत सरकार चुनने से ले कर घर, परिवार और संबंधों में गलतफहमी पैदा करने तक पर पड़ रहा है.

जारी है सजा

पूर्व कथा

श्रीमान गोयल की रंगीनमिजाजी के चलते उन के बेटेबहुएं साथ नहीं रहते. पति से बहुत ही लगाव रखती व उन की खूब इज्जत करती श्रीमती गोयल के पास पति की गलत आदतोंबातों को सहने के अलावा चारा न था, जबकि उन के बच्चे पिता की गंदी हरकतों से बेहद क्रोधित रहते थे. उन के अपने बच्चों पर श्रीमान गोयल की छाया न पड़े, इसलिए वे मातापिता से अलग रहते हैं. लेकिन उन में मां की ममता में कोई कमी न थी. वे मां को बराबर पैसे भेजते रहते हैं ताकि उन के पिता, उन की मां को तंग न करें. उधर, श्रीमती गोयल का अपनी नई पड़ोसन शुभा से संपर्क हुआ तो उन्हें लगा कि गैरों में भी अपनत्व होता है. जबतब दोनों में मुलाकातें होती रहतीं और श्रीमती गोयल उन्हें पति का दुखड़ा सुना कर संतुष्ट हो लेतीं. शुभा के पूछने पर श्रीमती गोयल ने बताया, ‘‘गोयल साहब औरतबाज हैं, इस सीमा तक बेशर्म भी कि बाजारू औरतों के साथ मनाई अपनी रासलीला को चटकारे लेले कर मुझे ही सुनाते रहते हैं,’’ श्रीमती गोयल पति के साथ इस तरह जीती रहीं जैसे पड़ोसी. ऐसा बदचलन पड़ोसी जो जब जी चाहे, दीवार फांद कर आए और उन का इस्तेमाल कर चलता बने. श्रीमती गोयल सोचती हैं कि शायद ऐसा पति ही उन के जीवन का हिस्सा था, जैसा मिला है उसी को निभाना है. श्रीमती गोयल न जाने कौन सा संताप सहती रहीं जबकि उन का पति क्षणिक मौजमस्ती में मस्त रहा. कुछ भी गलत न करने की कैसी सजा वे भोग रही हैं वहीं, कुकर्म करकर के भी श्रीमान गोयल बिंदास घूम रहे हैं. लेकिन…

ऐयाश बाप को उन के पुत्र इसलिए पैसा देते हैं कि वे घर से बाहर बाहरवालियों पर लुटाएं और मां को तंग न करें. लेकिन जब मां की आंखें हमेशा के लिए बंद हो जाती हैं तब…

गतांक से आगे…

अंतिम भाग

बातों का सिलसिला चल निकलता तो उन का रोना भी जारी रहता और हंसना भी.

‘‘आप के घर का खर्च कैसे चलता है?’’

‘‘मेरे बच्चे मुझे हर महीने खर्च भेजते हैं. बाप को अलग से देते हैं ताकि वे मुझे तंग न करें और जितना चाहें घर से बाहर लुटाएं.’’

मैं स्तब्ध थी. ऐसे दुराचारी पिता को बच्चे पाल रहे हैं और उस की ऐयाशी का खर्च भी दे रहे हैं.

अपने बच्चों के मुंह से निवाला छीन कर कौन इनसान ऐसे बाप का पेट भरता होगा जिस का पेट सुरसा के मुंह की तरह फैलता ही जा रहा है.

‘‘आप लोग इतना सब बरदाश्त कैसे करते हैं?’’

‘‘तो क्या करें हम. बच्चे औलाद होने की सजा भोग रहे हैं और मैं पत्नी होने की. कहां जाएं? किस के पास जा कर रोएं…जब तक मेरी सांस की डोर टूट न जाए, यही हमारी नियति है.’’

मैं श्रीमती गोयल से जबजब मिलती, मेरे मानस पटल पर उन की पीड़ा और गहरी छाप छोड़ती जाती. सच ही तो कह रही थीं श्रीमती गोयल. इनसान रिश्तों की इस लक्ष्मण रेखा से बाहर जाए भी तो कहां? किस के पास जा कर रोए? अपना ही अपना न हो तो इनसान किस के पास जाए और अपनत्व तलाश करे. मेकअप की परत के नीचे वे क्याक्या छिपाए रखने का प्रयास करती हैं, मैं सहज ही समझ सकती थी. जरूरी नहीं है कि जो आंखें नम न हों उन में कोई दर्द न हो, अकसर जो लोग दुनिया के सामने सुखी होने का नाटक करते हैं ज्यादातर वही लोग भीतर से खोखले होते हैं.

इसी तरह कुछ समय बीत गया. मुझ से बात कर वे अपना मन हलका कर लेती थीं.

उन्हीं दिनों एक शादी में शामिल होने को मुझे कुल्लू जाना पड़ा. जाने से पहले श्रीमती गोयल ने मुझे 5 हजार रुपए शाल लाने के लिए दिए थे. मैं और मेरे पति लंबी छुट्टी पर निकल पड़े. लगभग 10 दिन के बाद हम वापस आए.

रात देर से पहुंचे थे इसलिए खाना खाया और सो गए. अगले दिन सुबह उठे तो 10 दिन का छोड़ा घर व्यवस्थित करतेकरते ही शाम हो गई. चलतेफिरते मेरी नजर श्रीमती गोयल के घर पर पड़ जाती तो मन में खयाल आता कि आई क्यों नहीं आंटी. जब हम गए थे तो उन्होंने सफर के लिए गोभी के परांठे साथ बांध दिए थे. गरमगरम चाय और अचार के साथ उन परांठों का स्वाद अभी तक मुंह में है. शाम के बाद रात और फिर दूसरा दिन भी आ गया, मैं ने ही उन की शाल अटैची से निकाली और देने चली गई, लेकिन गेट पर लटका ताला देख मुझे लौटना पड़ा.

अभी वापस आई ही थी कि पति का फोन आ गया, ‘‘शुभा, तुम कहां गई थीं, अभी मैं ने फोन किया था?’’

‘‘हां, मैं थोड़ी देर पहले सामने आंटी को शाल देने गई थी, मगर वे मिलीं नहीं.’’

वे बात करतेकरते तनिक रुक गए थे, फिर धीरे से बोले, ‘‘गोयल आंटी का इंतकाल हुए आज 12 दिन हो गए हैं शुभा, मुझे भी अभी पता चला है.’’

मेरी तो मानो चीख ही निकल गई. फोन के उस तरफ पति बात भी कर रहे थे और डर भी रहे थे.

‘‘शुभा, तुम सुन रही हो न…’’

ढेर सारा आवेग मेरे कंठ को अवरुद्ध कर गया. मेरे हाथ में उन की शाल थी जिसे ले कर मैं क्षण भर पहले ही यह सोच रही थी कि पता नहीं उन्हें पसंद भी आएगी या नहीं.

‘‘वे रात में सोईं और सुबह उठी ही नहीं. लोग तो कहते हैं उन के पति ने ही उन्हें मार डाला है. शहर भर में इसी बात की चर्चा है.’’

धम्म से वहीं बैठ गई मैं, पड़ोस की बीना भी इस समय घर नहीं होगी…किस से बात करूं? किस से पूछूं अपनी सखी के बारे में. भाग कर मैं बाहर गई और एक बार फिर से ताले को खींच कर देखने लगी. तभी उधर से गुजरती हुई एक काम वाली मुझे देख कर रुक गई. बांह पकड़ कर फूटफूट कर रोने लगी. याद आया, यही बाई तो श्रीमती गोयल के घर काम करती थी.

‘‘क्या हुआ था आंटी को?’’ मैं ने हिम्मत कर के पूछा.

‘‘बीबीजी, जिस दिन सुबह आप गईं उसी रात बाबूजी ने सिर में कुछ मार कर बीबीजी को मार डाला. शाम को मैं आई थी बरतन धोने तो बीबीजी उदास सी बैठी थीं. आप के बारे में बात करने लगीं. कह रही थीं, ‘मन नहीं लग रहा शुभा के बिना.’ ’’

आंटी का सुंदर चेहरा मेरी आंखों के सामने कौंध गया. बेचारी तमाम उम्र अपनेआप को सजासंवार कर रखती रहीं. चेहरा संवारती रहीं जिस का अंत इस तरह हुआ. रो पड़ी मैं, सत्या भी जोर से रोने लगी. कोई रिश्ता नहीं था हम तीनों का आपस में. मरने वाली के अपने कहां थे हम. पराए रो रहे थे और अपने ने तो जान ही ले ली थी.

दोपहर को बीना आई तो सीधी मेरे पास चली आई.

‘‘दीदी, आप कब आईं? देखिए न, आप के पीछे कैसा अनर्थ हो गया.’’

रोने लगी थी बीना भी. सदमे में लगभग सारा महल्ला था. पता चला श्रीमान गोयलजी तभी से गायब हैं. डाक्टर बेटा आ कर मां का शव ले गया था. बाकी अंतिम रस्में उसी के घर पर हुईं.

‘‘तुम गई थीं क्या?’’

‘‘हां, अमेरिका वाला बेटा भी आजकल यहीं है. तीनों बेटे इतना बिलख रहे थे कि  क्या बताऊं आप को दीदी. गोयल अंकल ने यह अच्छा नहीं किया. गुल्लू तो कह रहा था कि बाप को फांसी चढ़ाए बिना नहीं मानेगा लेकिन बड़े दोनों भाई उसे समझाबुझा कर शांत करने का प्रयास कर रहे हैं.’’

गुल्लू अमेरिका में जा कर बस जाना ज्यादा बेहतर समझता था, इसीलिए साथ ले जाने को मां के कागजपत्र सब तैयार किए बैठा था. वह नहीं चाहता था कि मां इस गंदगी में रहें. घर का सारा वैभव, सारी सुंदरता इसी गुल्लू की दी हुई थी. सब से छोटा था और मां का लाड़ला भी.

हर सुबह मां से बात करना उस का नियम था. आंटी की बातों में भी गुल्लू का जिक्र ज्यादा होता था.

‘‘तुम चलोगी मेरे साथ बीना, मैं उन के घर जा कर उन से मिलना चाहती हूं.’’

‘‘इसीलिए तो आई हूं. आज तेरहवीं है. शाम 4 बजे उठाला हो जाएगा. आप तैयार रहना.’’

आंखें पोंछती हुई बीना चली गई. दिल जैसे किसी ने मुट्ठी में बांध रखा था मेरा. नाश्ता वैसे ही बना पड़ा था जिसे मैं छू भी नहीं पाई थी. संवेदनशील मन समझ ही नहीं पा रहा था कि आखिर आंटी का कुसूर क्या था, पूरी उम्र जो औरत मेहनत कर बच्चों को पढ़ातीलिखाती रही, पति की मार सहती रही, क्या उसे इसी तरह मरना चाहिए था. ऐसा दर्दनाक अंत उस औरत का, जो अकेली रह कर सब सहती रही.

‘एक आदमी जरा सा नंगा हो रहा हो तो हम उसे किसी तरह ढकने का प्रयास कर सकते हैं शुभा, लेकिन उसे कैसे ढकें जो अपने सारे कपड़े उतार चौराहे पर जा कर बैठ जाए, उसे कहां कहां से ढकें…इस आदमी को मैं कहांकहां से ढांपने की कोशिश करूं, बेटी. मुझे नजर आ रहा है इस का अंत बहुत बुरा होने वाला है. मेरे बेटे सिर्फ इसलिए इसे पैसे देते हैं कि यह मुझे तंग न करे. जिस दिन मुझे कुछ हो गया, इस का अंत हो जाएगा. बच्चे इसे भूखों मार देंगे…बहुत नफरत करते हैं वे अपने पिता से.’

गोयल आंटी के कहे शब्द मेरे कानों में बजने लगे. पुन: मेरी नजर घर पर पड़ी. यह घर भी गोयल साहब कब का बेच देते अगर उन के नाम पर होता. वह तो भला हो आंटी के ससुर का जो मरतेमरते घर की रजिस्ट्री बहू के नाम कर गए थे.

शाम 4 बजे बीना के साथ मैं डा. विजय गोयल के घर पहुंची. वहां पर भीड़ देख कर लगा मानो सारा शहर ही उमड़ पड़ा हो. अच्छी साख है उन की शहर में. इज्जत के साथसाथ दुआएं भी खूब बटोरी हैं आंटी के उस बेटे ने.

तेरहवीं हो गई. धीरेधीरे सारी भीड़ घट गई. आंटी की शाल मेरे हाथ में कसमसा रही थी. जरा सा एकांत मिला तो बीना ने गुल्लू से मेरा परिचय कराया. गुल्लू धीरे से उठा और मेरे पास आ कर बैठ गया. सहसा मेरा हाथ पकड़ा और अपने हाथ में ले कर चीखचीख कर रोने लगा.

‘‘मैं अपनी मां की रक्षा नहीं कर पाया, शुभाजी. पिछले कुछ हफ्तों से मां की बातों में सिर्फ आप का ही जिक्र रहता था. मां कहती थीं, आप उन्हें बहुत सहारा देती रही हैं. आप वह सब करती रहीं जो हमें करना चाहिए था.’’

‘‘जिस सुबह आप कुल्लू जाने वाली थीं उसी सुबह जब मैं ने मां से बात की तो उन्होंने बताया कि बड़ी घबराहट हो रही है. आप के जाने के बाद वे अकेली पड़ जाएंगी. ऐसा हो जाएगा शायद मां को आभास हो गया था. हमारा बाप ऐसा कर देगा किसी दिन हमें डर तो था लेकिन कर चुका है विश्वास नहीं होता.’’

दोनों बेटे भी मेरे पास सिमट आए थे. तीनों की पत्नियां और पोतेपोतियां भी. रो रही थी मैं भी. डा. विजय हाथ जोड़ रहे थे मेरे सामने.

‘‘आप ने एक बेटी की तरह हमारी मां को सहारा दिया, जो हम नहीं कर पाए वह आप करती रहीं. हम आप का एहसान कभी नहीं भूल सकते.’’

क्या उत्तर था मेरे पास. स्नेह से मैं ने गुल्लू का माथा सहला दिया.

सभी तनिक संभले तो मैं ने वह शाल गुल्लू को थमा दी.

‘‘श्रीमती गोयल ने मुझे 5 हजार रुपए दिए थे. कह रही थीं कि कुल्लू से उन के लिए शाल लेती आऊं. कृपया आप इसे रख लीजिए.’’

पुन: रोने लगा था गुल्लू. क्या कहे वह और क्या कहे परिवार का कोई अन्य सदस्य.

‘‘आप की मां की सजा पूरी हो गई. मां की कमी तो सदा रहेगी आप सब को, लेकिन इस बात का संतोष भी तो है कि वे इस नरक से छूट गईं. उन की तपस्या सफल हुई. वे आप सब को एक चरित्रवान इनसान बना पाईं, यही उन की जीत है. आप अपने पिता को भी माफ कर दें. भूल जाइए उन्हें, उन के किए कर्म ही उन की सजा है. आज के बाद आप उन्हें उन के हाल पर छोड़ दीजिए. समयचक्र कभी क्षमा नहीं करता.’’

‘‘समयचक्र ने हमारी मां को किस कर्म की सजा दी? हमारी मां उस आदमी की इतनी सेवा करती रहीं. उसे खिला कर ही खाती रहीं सदा, उस इनसान का इंतजार करती रहीं, जो उस का कभी हुआ ही नहीं. वे बीमार होती रहीं तो पड़ोसी उन का हालचाल पूछते रहे. भूखी रहतीं तो आप उसे खिलाती रहीं. हमारा बाप सिर पर चोट मारता रहा और दवा आप लगाती रहीं…आप क्या थीं और हम क्या थे. हमारे ही सुख के लिए वे हम से अलग रहीं सारी उम्र और हम क्या करते रहे उन के लिए. एक जरा सा सहारा भी नहीं दे पाए. इंतजार ही करते रहे कि कब वह राक्षस उन्हें मार डाले और हम उठा कर जला दें.’’

गुल्लू का रुदन सब को रुलाए जा रहा था.

‘‘कुछ नहीं दिया कालचक्र ने हमारी मां को. पति भी राक्षस दिया और बेटे भी दानव. बेनाम ही मर गईं बेचारी. कोई उस के काम नहीं आया. किसी ने मेरी मां को नहीं बचाया.’’

‘‘ऐसा मत सोचो बेटा, तुम्हारी मां तो हर पल यही कहती रहीं कि उन के  बेटे ही उन के जीने का सहारा हैं. आप सब भी अपने पिता जैसे निकल जाते तो वे क्या कर लेतीं. आप चरित्रवान हैं, अच्छे हैं, यही उन के जीवन की जीत रही. बेनाम नहीं मरीं आप की मां. आप सब हैं न उन का नाम लेने वाले. शांत हो जाओ. अपना मन मैला मत करो.

‘‘आप की मां आप सब की तरफ से जरा सी भी दुखी नहीं थीं. अपनी बहुओं की भी आभारी थीं वे, अपने पोतेपोतियों के नाम भी सदा उन के होंठों पर होते थे. आप सब ने ही उन्हें इतने सालों तक जिंदा रखा, वे ऐसा ही सोचती थीं और यह सच भी है. ऐसा पति मिलना उन का दुर्भाग्य था लेकिन आप जैसी संतान मिल जाना सौभाग्य भी है न. लेखाजोखा करने बैठो तो सौदा बराबर रहा. प्रकृति ने जो उन के हिस्से में लिखा था वही उन्हें मिल गया. उन्हें जो मिला उस का वे सदा संतोष मनाती थीं. सदा दुआएं देती थीं आप सब को. तुम अपना मन छोटा मत करो… विश्वास करो मेरा…’’

मेरे हाथों को पकड़ पुन: चीखचीख कर रो पड़ा था गुल्लू और पूरा परिवार उस की हालत पर.

समय सब से बड़ा मरहम है. एक बुरे सपने की तरह देर तक श्रीमती गोयल की कहानी रुलाती भी रही और डराती भी रही. कुछ दिनों बाद उन के बेटों ने उस घर को बेच दिया जिस में वे रहती थीं.

श्रीमान गोयल के बारे में भी बीना से पता चलता है. बच्चों ने वास्तव में पिता को माफ कर दिया, क्या करते.

उड़तीउड़ती खबरें मिलती रहीं कि श्रीमान गोयल का दिमाग अब ठीक नहीं रहा. बाहर वालियों ने उन का घर भी बिकवा दिया है. बेघर हो गया है वह पुरुष जिस ने कभी अपने घर को घर नहीं समझा. पता नहीं कहां रहता है वह इनसान जिस का अब न कोई घर है न ठिकाना. अपने बच्चों के मुंह का निवाला जो इनसान वेश्याओं को खिलाता रहा उस का अंत भला और कैसा होता.

एक रात पुन: गली में चीखपुकार हुई. श्रीमान गोयल अपने घर के बाहर खड़े पत्नी को गालियां दे रहे थे. भद्दीगंदी गालियां. दरवाजा जो नहीं खोल रही थीं वे, शायद पागलपन में वे भूल चुके थे कि न यह घर अब उन का है और न ही उन्हें सहन करने वाली पत्नी ही जिंदा है.

चौकीदार ने उन्हें खदेड़ दिया. हर रोज चौकीदार उन्हें दूर तक छोड़ कर आता, लेकिन रोज का यही क्रम महल्ले भर को परेशान करने लगा. बच्चों को खबर की गई तो उन्होंने साफ कह दिया कि वे किसी श्रीमान गोयल को नहीं जानते हैं. कोई जो भी सुलूक चाहे उन के साथ कर सकता है. किसी ने पागलखाने में खबर की. हर रात  का तमाशा सब के लिए असहनीय होता जा रहा था. एक रात गाड़ी आई और उन्हें ले गई. मेरे पति सब देख कर आए थे. मन भर आया था उन का.

‘‘वह आंटीजी कैसे सजासंवार कर रखती थीं इस आदमी को. आज गंदगी का बोरा लग रहा था…बदबू आ रही थी.’’

आंखें भर आईं मेरी. सच ही कहा है कहने वालों ने कि काफी हद तक अपने जीवन के सुख या दुख का निर्धारण मनुष्य अपने ही अच्छेबुरे कर्मों से करता है. श्रीमती गोयल तो अपनी सजा भोग चुकीं, श्रीमान गोयल की सजा अब भी जारी है.

32 सालों बाद पकड़ा गया आफताब उर्फ नाटे

अपराध के सारे दरवाजों की चाबियां भले ही अपराधियों के पास हों, लेकिन मुख्य चाबी पुलिस के पास होती है, जिस से पुलिस उन तक पहुंच ही जाती है. कुछ ऐसा ही 32 सालों से फरार चल रहे हत्या के शातिर अपराधी मौलाना करीम उर्फ आफताब उर्फ नाटे के साथ भी हुआ. इस अपराधी ने कानून के रखवालों को न जाने किसकिस घाट का पानी पिलाया था.

लेकिन क्राइम ब्रांच के तेजतर्रार इंसपेक्टर अनिरुद्ध सिंह ने फिल्मी स्टाइल में उसे कानून के शिकंजे में जकड़ ही लिया. दरअसल, हाईकोर्ट में दायर एक याचिका के आधार पर हाईकोर्ट ने पिछले महीने इलाहाबाद कोतवाली पुलिस को दायराशाह अजमल के रहने वाले हत्या के मामले में सजायाफ्ता फरार आरोपी आफताब उर्फ नाटे को अदालत में पेश करने के आदेश दिए थे.

नाटे को पकड़ने के लिए कोतवाली पुलिस ने काफी प्रयास किए थे, लेकिन उस तक पहुंच नहीं सकी. पुलिस ने नाटे के घर वालों से उस के बारे में पूछा तो पता चला कि पत्नी और बेटे पर भी तेजाब फेंक कर उस ने उन की हत्या करने की कोशिश की थी. इस घटना का भी मुकदमा दर्ज था. इस के बाद से वह घर से भागा तो लौट कर नहीं आया.

सीजेएम और जिला अदालत से भी उस की गिरफ्तारी के आदेश जारी हुए थे. पुलिस उसे गिरफ्तार नहीं कर पाई तो उसे वांटेड और भगोड़ा घोषित कर दिया गया था. 60 साल से अधिक उम्र होने की वजह से पुलिस को जरा भी उम्मीद नहीं थी कि नाटे पकड़ा भी जा सकता है. इस के बावजूद पुलिस ने उस का पीछा नहीं छोड़ा था.

पुलिस को लगता था कि वह किसी अन्य शहर में नाम बदल कर रह रहा होगा. इतनी अधिक उम्र होने और 32 साल बीत जाने के बाद उस की शक्लसूरत भी बदल गई होगी, जिस से उसे पहचानना भी आसान नहीं होगा.

हाईकोर्ट ने जो आदेश दिया था, पुलिस ने उस के बारे में अपना पक्ष रखा था, लेकिन अदालत ने सुनवाई के लिए 20 अगस्त, 2017 की तारीख दे दी थी. हाईकोर्ट हर हाल में आफताब उर्फ नाटे अदालत में पेश कराना चाहता था, जबकि पुलिस इस मामले से पीछा छुड़ाने के लिए अपना पक्ष रखने के लिए मजबूती से तैयारी कर रही थी.

हाईकोर्ट के आदेश पर ही एडीजी एस.वी. सावंत ने 27 जुलाई, 2017 को एसपी सिद्धार्थ शंकर मीणा को 12 हजार के ईनामी फरार चल रहे हत्यारोपी आफताब उर्फ नाटे को गिरफ्तार करने के आदेश दिए तो सिद्धार्थ शंकर मीणा थोड़ा चिंता में पड़ गए कि 32 साल से फरार चल रहे शातिर अपराधी नाटे को कैसे गिरफ्तार किया जाए?

वह सजायाफ्ता मुजरिम था और उसे आजीवन कारावास की सजा हो चुकी थी. जमानत पर बाहर आने के बाद सन 1985 से कानून की आंखों में धूल झोंक कर वह फरार चल रहा था. पुलिस ने उस के बारे में बहुत पता किया था, लेकिन उस के बारे में पता नहीं कर पाई थी.

एडीजी के आदेश के बाद सिद्धार्थ शंकर मीणा ने नाटे की गिरफ्तारी के लिए एक टीम गठित की, जिस में क्राइम ब्रांच के इंसपेक्टर अनिरुद्ध सिंह, इंटेलीजेंस विंग के प्रभारी नागेश सिंह, एसआई बृजेश कुमार सिंह, ओमशंकर शुक्ल, स्वाट टीम प्रभारी शत्रुघ्न मिश्र, सिपाही हशमत अली, अजय कुमार, संजय कुमार सिंह, शशिप्रकाश, बालगोविंद, रिजवान, आशीष मिश्र, रविंद्र सिंह और सुनील यादव को शामिल किया.

इंसपेक्टर अनिरुद्ध सिंह अपनी अनोखी कार्यशैली के लिए विभाग में मशहूर हैं, इसीलिए एसपी साहब ने उन्हें टीम में शामिल किया था. उन्होंने उन्हीं के कंधों पर सजायाफ्ता फरार चल रहे शातिर अपराधी आफताब उर्फ नाटे को जल्द से जल्द गिरफ्तार करने की जिम्मेदारी डाल दी थी.

26 एनकाउंटर कर चुके और तमिल फिल्म में अभिनय कर चुके इंसपेक्टर अनिरुद्ध सिंह ने अपने हिसाब से नाटे के बारे में पता लगाना शुरू किया. उन्होंने अपने कुछ विश्वस्त साथियों की मदद से उस की तलाश तेजी से शुरू कर दी. उन की मेहनत रंग लाई और उन्हें पता चला कि नाटे बड़े ही गुपचुप तरीके से अपने घर वालों के संपर्क में है.

लेकिन जब उन्होंने घर वालों से पूछताछ की तो सब साफ मुकर गए कि उस के बारे में उन्हें किसी भी प्रकार की जानकारी है. उन का कहना था कि उन का उस से किसी भी तरह का कोई संबंध नहीं है, क्योंकि वह उन पर तेजाब फेंक कर भागा था. वह जब से गया है, लौट कर नहीं आया है.

घर वाले भले ही आफताब उर्फ नाटे से संबंध होने से मना कर रहे थे, लेकिन अनिरुद्ध सिंह को उन की बातों पर यकीन नहीं हो रहा था. उन्होंने नाटे की पत्नी सलमा बेगम का मोबाइल नंबर पता करा कर उसे सर्विलांस पर लगवा दिया. आखिर उन्हें पता चल गया कि 11 अगस्त, 2017 को आफताब उर्फ नाटे इलाहाबाद से लगे कौशांबी में एक प्रोग्राम में आ रहा है.

फिर क्या था, बड़ी ही गोपनीयता से वह कौशांबी पहुंच गए और उस जगह को चारों ओर से घरे लिया, जहां नाटे को कार्यक्रम करना था. लेकिन नाटे उन्हें चकमा दे कर निकल गया.

लेकिन अनिरुद्ध सिंह हार मानने वालों में नहीं थे. उन्होंने नाटे के घर वालों के फोन नंबर सर्विलांस पर लगवा ही रखे थे.

इस से उन्हें नाटे के एक पुराने साथी नवाब के बारे में पता चला. नवाब उन्हें काम का आदमी लगा. वह उस के सहारे नाटे तक पहुंच सकते थे, क्योंकि नवाब उस के हर काम का राजदार था. उस के साथ किए गए गुनाहों में भी वह साझीदार था.

अनिरुद्ध सिंह ने नवाब को पकड़ा. पहले तो वह नाटक कहता रहा कि वह नाटे को नहीं जानता, लेकिन जब उन्होंने नाटे के साथ मिल कर किए गए उस के गुनाहों का पिटारा खोला तो उस के पास सच्चाई उगल देने के अलावा कोई चारा नहीं बचा. उस ने नाटे के बारे में सब कुछ बता दिया.

फरार चल रहा आफताब उर्फ नाटे कोतवाली इलाके में किराए पर कमरा ले कर अकेला ही रहता था. उसे लोग मौलाना करीम के नाम से जानते थे. उस ने दर्जन भर शागिर्द बना रखे थे, जो उस के लिए ग्राहक ढूंढ कर लाते थे. उसे लोग भूतप्रेत के डाक्टर के रूप में जानते थे. वह गंडाताबीज देने, भूतप्रेत भगाने के नाम पर लोगों को ठगता था.

जबकि यह कोई नहीं जानता था कि यह वही आफताब उर्फ नाटे है, जिस ने 32 साल पहले इसी थाने के नखासकोना के रहने वाले मोहम्मद अजमत की गोली मार कर हत्या की थी. इस अपराध में उसे आजीवन कारावास की सजा हुई थी. हाईकोर्ट में अपील करने के बाद उसे जमानत मिली तो वह फरार हो गया था.

इस बार अनिरुद्ध सिंह शातिर अपराधी आफताब उर्फ नाटे को भागने का कोई मौका नहीं देना चाहते थे. उन्होंने सिपाही हशमत अली, अजय कुमार, संजय कुमार सिंह, शशिप्रकाश, बालगोविंद, रिजवान, आशीष मिश्र, रविंद्र सिंह और सुनील यादव की एक टीम बना कर नाटे की गिरफ्तारी की पूरी योजना बना डाली.

योजना के अनुसार, अनिरुद्ध सिंह को मरीज बन कर मौलाना करीम उर्फ आफताब उर्फ नाटे के पास जाना था. उन के वहां पहुंचते ही टीम के सिपाहियों ने आम कपड़ों में उस के कमरे को चारों ओर से घेर लेना था, ताकि वह किसी भी तरह भाग न सके.

योजना के अनुसार, 24 अगस्त की सुबह अनिरुद्ध सिंह मरीज बन कर मौलाना करीम उर्फ आफताब उर्फ नाटे के कमरे पर पहुंचे. उन के साथ आम कपड़ों में इंटेलीजेंस विंग के प्रभारी नागेश सिंह भी आए थे. अनिरुद्ध सिंह पागलों जैसी हरकत कर रहे थे, ताकि नाटे को उन पर शक न हो. पहले तो वह उन की झाड़फूंक के लिए तैयार ही नहीं हुआ, लेकिन काफी सिफारिश के बाद किसी तरह तैयार हो गया.

दूसरी ओर उन के साथ आए सिपाहियों ने कमरे को चारों ओर से घेर लिया था. उसी बीच उन्होंने साथ लाए नवाब से कन्फर्म कर लिया कि यही आफताब उर्फ नाटे है. अनिरुद्ध सिंह पागलों की ऐक्टिंग करते हुए आफताब से बातें करने लगे तो वह उन के चेहरे पर मोरपंख फेरते हुए मंत्र पढ़ कर फूंक मारने लगा.

इस के बाद काले कपड़े में लिपटा एक ताबीज उन के हाथों पर रखा. तभी उन के हावभाव से शातिर दिमाग आफताब उर्फ नाटे को लगा कि मामला कुछ गड़बड़ है. उस ने अनिरुद्ध से गाड़ी में बैठने को कहा तो उन्होंने गाड़ी में बैठने से मना कर दिया. इस से नाटे को लगा कि यह तो पुलिस वाला है.

अब नाटे किसी तरह वहां से निकलने की कोशिश करने लगा. वह निकल पाता, उस के पहले ही अनिरुद्ध सिंह ने उसे पकड़ कर कहा, ‘‘मियां, अब तुम्हारा खेल खत्म हो चुका है. आफताब उर्फ नाटै उर्फ मौलाना करीम, तुम ने पुलिस को बहुत छकाया है, अब तुम जेल में चल कर वहीं अपनी यह नौटंकी करना.’’

‘‘साहब, आप को कोई गलतफहमी हुई है. मैं आफताब नहीं, मौलाना करीम हूं. सालों से भूतप्रेत से परेशान लोगों की सेवा कर रहा हूं. पता नहीं, आप किस आफताब को ढूंढ रहे हैं.’’ मौलाना करीम ने कहा.

लेकिन अनिरुद्ध सिंह ने आफताब की बात पर ध्यान दिए बगैर साथ आए पुलिस वालों को इशारा किया तो उन्होंने नवाब को ला कर उस के सामने खड़ा कर दिया.

नवाब को देखते ही मौलाना करीम का पसीना छूट गया. नवाब की ओर इशारा करते हुए अनिरुद्ध सिंह ने कहा, ‘‘अब क्या कहोगे मौलाना करीम, इसे तो पहचानते ही हो, यह तुम्हारा साथी नवाब ही है न?’’

मरता क्या न करता. बचने का कोई रास्ता न देख मौलाना करीम ने असलियत स्वीकार करते हुए कहा, ‘‘हां, मैं ही आफताब उर्फ नाटे हूं, जो जमानत मिलने के बाद 32 सालों से फरार चल रहा है. आखिर आप ने मुझे पकड़ ही लिया.’’

32 सालों से फरार चल रहे शातिर अपराधी आफताब उर्फ नाटे उर्फ मौलाना करीम के पकड़े जाने से पुलिस विभाग खुश हो उठा था, क्योंकि एक तरह से उस की इज्जत बच गई थी. विस्तार से पूछताछ के बाद आफताब उर्फ नाटे को अदालत में पेश किया गया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. 32 सालों की फरारी के दौरान आफताब उर्फ नाटे कहां और किस तरह रहा, इस बीच जुर्म की उस ने जो कहानियां रचीं, वह कुछ इस तरह सामने आईं—

करीब 62 साल का आफताब उर्फ नाटे उत्तर प्रदेश के जिला इलाहाबाद की कोतवाली के मोहल्ला दायराशाह अजमल का रहने वाला था. उन दिनों उस का भरापूरा परिवार था. तब उस की उम्र 30 साल रही होगी. वह इधरउधर काम कर के परिवार को पाल रहा था. आफताब से बड़ा एक भाई था, जिस की पहले ही हत्या हो गई थी. उस की पत्नी और बच्चे भी उसी के साथ रहते थे.

आफताब उर्फ नाटे जिस मोहल्ले में रहता था, उसी मोहल्ले में उस के घर से थोड़ी दूरी पर उस की बहन का भी परिवार रहता था. उस की भी जिम्मेदारी उसी पर थी. वह जब भी घर से निकलता, बहन का हालचाल लेने उस के घर जरूर जाता. उस की एक भांजी थी आयशा, जिसे वह बहुत मानता था.

आयशा बहुत खूबसूरत थी. लड़के उस पर जान छिड़कते थे. उन्हीं में एक नखासकोना का रहने वाला मोहम्मद अजमत भी था. वह आयशा से प्यार करता था. आयशा भी उसे चाहती थी. उन के प्यार की चर्चा भी मोहल्ले में होने लगी थी. जब यह खबर आफताब तक पहुंची तो उसे बहुत गुस्सा आया.

उस ने यह बात आयशा से पूछी तो उस ने डर की वजह से सच्चाई बताने के बजाय अजमत पर दोष मढ़ते हुए कहा कि वह जब भी घर से निकलती है, वह उसे छेड़ता है. आयशा की इस बात ने आग में घी का काम किया. जवान भांजी की इज्जत को ले कर आफताब गुस्से में पागल हो उठा.

आफताब ने आव देखा न ताव, कहीं से पिस्टल की व्यवस्था की और अजमत के घर पहुंच गया. उस ने अजमत को आवाज दी तो वह बाहर आ गया. आफताब को वह पहचानता था. वह कुछ कहता, उस के पहले ही उसे मौका दिए बगैर आफताब उर्फ नाटे ने उस पर गोली चला दी. गोली सीने में लगी, जिस से अजमत की तुरंत मौत हो गई. आफताब तुरंत भाग निकला.

दिनदहाड़े हुई इस हत्या से मोहल्ले में सनसनी फैल गई. पुलिस ने लाश कब्जे में ले कर पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दी और आफताब के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज कर उस की तलाश शुरू कर दी. वह ज्यादा दिनों तक पुलिस से बच नहीं पाया. उस ने पुलिस के सामने अपना अपराध स्वीकार भी कर लिया.

पुलिस ने उसे अदालत में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. उस पर मुकदमा चला. अदालत ने उसे दोषी मानते हुए सन 1983 में आजीवन कारावास की सजा सुनाई. उस ने इस सजा के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील की, जहां से 2 सालों बाद सन 1985 में उसे जमानत मिल गई.

जेल से बाहर आते ही वह फरार हो गया. फरार होने के बाद शातिर आफताब उर्फ नाटे नाम बदल कर मौलाना करीम बन गया. फरारी के दौरान वह मुंबई, सूरत, अजमेर और फर्रुखाबाद जैसे शहरों की मसजिदों और दरगाहों में छिपता रहा.

वह दरगाहों पर आने वाले श्रद्धालुओं से खुद को तांत्रिक बताता था. ऐसा कह कर वह भूतप्रेत भगाने और गंडाताबीज बना कर देने के नाम  पर पैसे ऐंठता था.

कातिल से मौलाना बना पाखंडी करीम सब से ज्यादा ठगी का शिकार उन मुसलिम महिलाओं को बनाता था, जो पति द्वारा छोड़ी हुई होती थीं. उन्हें भावनाओं के भंवरजाल में फांस कर तंत्रमंत्र के नाम पर उन से मोटी रकम वसूलता था. ग्राहकों को फंसाने के लिए उस ने शागिर्द बना रखे थे. होने वाली कमाई से वह उन्हें भी हिस्सा देता था.

मजे की बात यह थी कि जिनजिन शहरों में वह रहा, उस ने वहांवहां शागिर्द बना लिए थे. यही शागिर्द उस के सिद्ध मौलाना होने का प्रचार कर पीडि़त महिलाओं को उस तक ले आते थे. यही नहीं, झांसा दे कर उस ने तलाक पीडि़त 39 मुसलिम महिलाओं का हलाला के नाम पर यौनशोषण भी किया था.

कई लोग हलाला के नाम पर महिलाओं की मजबूरी का फायदा उठाते हुए उन के साथ एक रात गुजारते हैं. इसी का फायदा आफताब उर्फ नाटे उर्फ मौलाना करीम ने भी उठाया था. इस तरह उस ने लोगों को धोखा तो दिया ही, साथ ही लाखों रुपए भी ऐंठे. इस के लिए उस ने अपना एक नेटवर्क तैयार कर रखा था.

इस से भी मजेदार बात यह थी कि शहर से भागते समय उस ने किसी वजह से अपनी पत्नी और बेटे पर भी तेजाब फेंक दिया था. संयोग से उन पर तेजाब ठीक से नहीं पड़ा था. लेकिन बाद में उस ने शागिर्दों को घर भेज कर अपने किए की माफी मांग ली थी और खर्चे के लिए पैसे भी भिजवाने लगा था. पत्नी ने उसे माफ कर के अपना लिया था. यह बात सिर्फ आफताब, उस के शागिर्द और पत्नी जानती थी.

बात आफताब उर्फ नाटे की फरारी के 4 सालों बाद की है. फरार होने के बाद आफताब सीधे मुंबई गया. वहां कुछ दिनों रह कर वह सूरत चला गया. वहां की दरगाहों पर कई सालों तक रह कर वह सन 1989 में इलाहाबाद आ गया. वह घर जा नहीं सकता था, क्योंकि पुलिस उसे कभी भी गिरफ्तार कर सकती थी, इसलिए घर जाने के बजाय वह इलाहाबाद के कुख्यात अपराधी चांदबाबा से जा मिला.

चांदबाबा गुंडा तो था ही, उस का चूड़ी और रंगों का बड़ा कारोबार था. यह कारोबार तो मात्र दिखावा था, असली धंधा तो गुंडई थी. आफताब चांदबाबा के साथ जुड़ गया, क्योंकि उसे पता था कि जब तक उस के सिर पर चांदबाबा का हाथ रहेगा, उस का कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता.

चांदबाबा ने अपराध और कारोबार से अकूत संपत्ति अर्जित की थी. जुर्म की सीढि़यों के सहारे वह सत्ता के गलियारों में पहुंचने का ख्वाब देखने लगा था. सन 1989 में इलाहाबाद पश्चिमी विधानसभा से माफिया डौन अतीक अहमद ने चुनाव लड़ने का ऐलान किया तो चांदबाबा उन्हें चुनौती देते हुए उन के सामने उतर आया.

चुनाव में अतीक अहमद जीते. इस चुनाव के कुछ महीने बाद चांदबाबा की गोली मार कर हत्या कर दी गई. आफताब उर्फ नाटे चांदबाबा के चूड़ी और रंगों के कारोबार में हिस्सेदार था. उस ने भी चांदबाबा के चुनाव में अहम भूमिका निभाई थी. चांदबाबा की हत्या के बाद आफताब को लगा कि अब इलाहाबाद में रहना ठीक नहीं है, इसलिए वह भाग निकला.

हाईकोर्ट ने अभियुक्त आफताब उर्फ नाटे को कोर्ट में पेश करने के लिए आईजी इलाहाबाद को कई बार नोटिस भेजी. आईजी ने उसे पकड़वाने के लिए 12 हजार रुपए का ईनाम भी घोषित किया, लेकिन वह पकड़ा नहीं जा सका. पुलिस जब भी आफताब के घर वालों से पूछताछ करती, वे कह देते कि उन्हें उस के बारे में कोई जानकारी नहीं है, उस से उन का कोई संबंध नहीं है.

इस बार हाईकोर्ट ने आफताब को कोर्ट में पेश करने की 20 अगस्त, 2017 की तारीख तय कर दी. हाईकोर्ट का नोटिस मिलने के बाद पुलिस को लगा कि अब इज्जत का सवाल बन गया है. इज्जत बचाने के लिए पुलिस उस की तलाश में जीजान से जुट गई. उसी का नतीजा था कि आखिर 32 सालों बाद पुलिस ने आफताब उर्फ नाटे को पकड़ ही लिया.

—कथा में परवीन बदला नाम है. कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

कांग्रेस मतलब गांधी परिवार

देश में चुनावी शतरंज बिछ चुकी है। इस बार का लोकसभा चुनाव खुले तौर पर भाजपा और कांग्रेस के इर्द-गिर्द ही दिखायी दे रहा है। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी जहां प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी सरकार के बीते पांच साल के कामकाज की धज्जियां उड़ाते हुए जगह-जगह जम कर बरस रहे हैं, वहीं नरेन्द्र मोदी प्रियंका गांधी वाड्रा के सक्रिय राजनीति में उतरने से बौखलाये हुए हैं। इसमें दोराय नहीं है कि प्रियंका के सक्रिय राजनीति में उतर पड़ने से इस बार कांग्रेस पूरे दमखम के साथ चुनावी मैदान में ताल ठोंकती नजर आ रही है। कांग्रेसियों का उत्साह आसमान पर है और यही वजह है कि कांग्रेस किसी गठबंधन में बंधे बिना अपने दम पर चुनाव लड़ने और जीतने का दावा कर रही है। व्यंग्य बाण छोड़ने में माहिर नरेन्द्र मोदी ने हालांकि प्रियंका पर अभी तक सीधे तौर पर कोई टिप्पणी नहीं की है, मगर कांग्रेस पर वंशवाद का आरोप उन्होंने जरूर जड़ दिया है। वही पुराना घिसा-पिटा आरोप। कांग्रेस मतलब गांधी परिवार। वंशवाद का आरोप कांग्रेस पर लम्बे समय से लगता आ रहा है मगर कांग्रेस पर इसका कोई असर नहीं होता। अब ये आलोचना की बात हो या प्रशंसा की, मगर सच्चाई यही है कि आज ‘कांग्रेस मतलब गांधी-परिवार’, बिल्कुल ‘ठंडा मतलब कोकाकोला’ की तर्ज पर। आज इस परिवार के बिना कांग्रेस की कल्पना नहीं की जा सकती है। यह परिवार कांग्रेस से जब-जब अलग हुआ, कांग्रेस कमजोर हुई और कार्यकर्ताओं में बिखराव पैदा हुआ है। विपक्ष यह सोच कर वंशवाद का हो-हल्ला मचाता है कि शायद कुछ असर हो जाए और पुराने कांग्रेसी नेताओं के खून में उबाल आ जाये और गांधी परिवार के खिलाफ पार्टी के भीतर विरोध के अंकुर फूट जाएं, मगर विपक्ष का दांव हमेशा खाली ही जाता है क्योंकि कांग्रेस और गांधी एक सिक्के के दो पहलू हो चुके हैं।

हालांकि एक वक्त था जब कांग्रेस और गांधी अलग-अलग थे। कांग्रेस और गांधी परिवार को एक करने का श्रेय जाता है इंदिरा गांधी को। वह वक्त था देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की मृत्यु के बाद का। जब तक नेहरू जिन्दा थे, तब तक सरकार पर उनका एकछत्र राज था। उनके आगे कांग्रेस का वही हाल था, जो आज मोदी के आगे भाजपा का है। लेकिन नेहरू ने अपनी बेटी इंदिरा को सक्रिय राजनीति से हमेशा दूर रखा था। यही कारण था कि उनकी मौत के बाद भारत की राजनीति में एक शून्य पैदा हो गया। तब शुरू हुई नेहरू के उत्तराधिकारी की खोज। उस वक्त इंदिरा गांधी कहीं किसी गिनती में नहीं थीं। तब के. कामराज कांग्रेस अध्यक्ष हुआ करते थे। वे तमिलनाडु से थे और दक्षिण भारत की निचली जाति के प्रभावशाली नेता माने जाते थे। मगर उनके दिमाग में भी इंदिरा का नाम दूर-दूर तक नहीं था। नेहरू के बाद प्रधानमंत्री पद के जो दो मजबूत दावेदार थे वह थे – मोरारजी देसाई और लाल बहादुर शास्त्री। मोरारजी देसाई को ज्यादातर कांग्रेसी पसन्द नहीं करते थे क्योंकि वे बड़े जिद्दी और अड़ियल किस्म के व्यक्ति थे, जबकि उनके विपरीत लाल बहादुर काफी शान्त और सौम्य थे। तब कांग्रेसी नेताओं ने एकमत से प्रधानमंत्री के रूप में लालबहादुर शास्त्री को चुना, बिल्कुल वैसे ही जैसे सोनिया गांधी ने मनमोहन सिंह को चुना था। मगर शास्त्री जी मनमोहन सिंह नहीं बन पाये। यह कहानी कभी आगे, पहले इंदिरा की बात करें कि कैसे उनकी एंट्री कांग्रेस में हुई और कैसे आने वाले सालों में कांग्रेस और गांधी परिवार एक दूसरे के पर्यायवाची हो गये।

दरअसल लालबहादुर शास्त्री ने ही पहली बार इंदिरा गांधी को अपने कैबिनेट में जगह दी थी। शास्त्रीजी इंदिरा की तेजी को समझते थे और जानते थे कि बाहर रह कर वह ज्यादा खतरनाक साबित होंगी, लिहाजा अपनी कैबिनेट में शामिल करके उन्होंने इंदिरा को कम महत्व वाले सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय का मंत्री बना दिया। मगर इंदिरा को यह पद भाया नहीं। वे भीतर ही भीतर अपने समर्थकों को एकजुट करने में लगी रहीं।

उसी दौरान शास्त्री जी चाहते थे कि वह तीन मूर्ति भवन स्थित प्रधानमंत्री आवास में शिफ्ट हो जाएं, जहां जवाहरलाल नेहरू बतौर प्रधानमंत्री रहा करते थे, लेकिन इंदिरा ने इसमें अडंÞगा लगा दिया। वे चाहती थीं कि तीन मूर्ति भवन स्थायी तौर पर नेहरू के नाम का स्मारक घोषित हो जाए और आखिर में उन्हीं की जीत हुई। तीन मूर्ति भवन नेहरू और उनके वंशजों के नाम हो गया। उसके बाद इंदिरा की असल सियासत तीन मूर्ति से ही चलने लगी और ये परम्परा अब तक बरकरार है।

इंदिरा गांधी पार्टी के अन्दर अपनी ताकत बढ़ा रही थीं और लालबहादुर शास्त्री अकेले पड़ते जा रहे थे। तब शास्त्रीजी ने पहली बार प्रधानमंत्री कार्यालय यानी पीएमओ खोला, जिसमें ईमानदार, विश्वासपात्र और काबिल अफसरों की टीम को देश चलाने के लिए रख लिया। पीएमओ का काम नाजुक और नीतिगत मसलों पर प्रधानमंत्री को सलाह देना था। शास्त्रीजी के इस पीएमओ वाले नये तजुर्बे ने इंदिरा के इशारे पर चल रहे कांग्रेसी नेताओं की चालें फेल कर दीं।

शास्त्रीजी की मौत के बाद कांग्रेस में फिर उत्तराधिकार की तलाश शुरू हुई। इस बार मोरारजी देसाई किसी भी कीमत पर प्रधानमंत्री बनना चाहते थे। लेकिन तब तक इंदिरा गांधी काफी अनुभवी हो चुकी थीं। कांग्रेस अध्यक्ष के. कामराज ने जब प्रधानमंत्री पद के लिए इंदिरा का नाम आगे किया तो मोरारजी देसाई और इंदिरा गांधी के बीच चुनाव की नौबत आ गयी और अन्तत: कांग्रेस संसदीय दल के सांसदों ने इंदिरा को चुना और इंदिरा पहली बार देश की प्रधानमंत्री बनीं। तब तक इंदिरा की उम्र 49 साल पार कर चुकी थी। अपनी मन्जिल तक पहुंचने में इंदिरा को लम्बा वक्त लग गया, मगर उनकी पोती प्रियंका गांधी वाड्रा ने राजनीति की शुरुआत सत्ताइस साल की उम्र में कर दी थी, हालांकि यह राजनीति वे लगातार पर्दे के पीछे रह कर करती रहीं। सक्रिय राजनीति में वह अब उतरी हैं, 47 की उम्र में।

अगर कांग्रेस अध्यक्ष और प्रधानमंत्री पद के लिए नेहरू-गांधी परिवार की समय सीमा निकालें तो आजादी के 70 साल में 53 साल तक इस परिवार का किसी न किसी पद पर या फिर दोनों पदों पर एक साथ कब्जा रहा है। वर्ष 1960 के दशक में नेहरू और इंदिरा (पिता-पुत्री), फिर 1970 के दशक में इंदिरा-संजय (मां-छोटे बेटे) और 1980 के दशक में इंदिरा-राजीव (मां-बड़े बेटे)। हालांकि बीच का कुछ वक्त था जब बाहरी व्यक्ति इन पदों पर सुशोभित हुए मगर उनसे पार्टी और कार्यकर्ताओं को उतनी मजबूती नहीं मिल पायी, जितनी गांधी परिवार के सदस्यों से मिलती है।

गांधी परिवार के बाहर से पहली बार किसी ने कांग्रेस को चलाया तो वो थे पीवी नरसिम्हा राव। राव ने 1996 तक कांग्रेस पार्टी और इसकी सरकार चलायी। 1996 से 1998 तक कांग्रेस के प्रमुख रहे गांधी परिवार के वफादार सीताराम केसरी पार्टी को साथ नहीं बांध सके थे और 1998 में कांग्रेस के विभाजन के बाद पार्टी की खस्ता हालत को देखते हुए सोनिया गांधी को न चाहते हुए भी कांग्रेस की मदद के लिए आगे आना पड़ा। सोनिया गांधी ने कांग्रेस की कमान इसलिए संभाली क्योंकि उनके परिवार के बिना पार्टी डूब रही थी और पार्टी के बिना उनके परिवार की श्रेष्ठता और प्रासंगिकता खतरे में पड़ गयी थी। दरअसल कांग्रेस कार्यकर्ता गांधी परिवार के बिना कांग्रेस की कल्पना ही नहीं करते हैं। यही वजह है कि जब जब गांधी परिवार से बाहर के व्यक्ति ने पार्टी चलानी चाही, फेल हुआ। मनमोहन सिंह स्पष्ट तौर पर सोनिया की कठपुतली थी, इसलिए ही दस साल तक प्रधानमंत्री पद पर आसीन रहे। मनमोहन सिंह की कलम से सोनिया के फैसले ही लिखे जाते रहे, इसमें कोई दोराय नहीं है, यदि वे ऐसा नहीं करते तो नरसिम्हा राव और सीताराम केसरी की भांति ही नकार दिये जाते। यह बात पार्टी के तमाम धुरंधर नेता भलीभांति समझते हैं कि पार्टी और कार्यकर्ताओं को सिर्फ और सिर्फ गांधी परिवार ही एकजुट रख सकता है। यही वजह है कि शीर्ष पद के लिए कोई दावेदारी पार्टी नहीं उभरती। तो अगर पूरी पार्टी एक परिवार के नेतृत्व में एकजुटता के साथ रहे, इसमें बुराई क्या है?

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें