मरूधर एक्सप्रेस रिव्यू: कमजोर पटकथा और निर्देशन

रेटिंगः डेढ़ स्टार

निर्माताः प्रमोद गोरे, मनन संपत, रवींद्र ठाकुर

निर्देशकः विशाल मिश्रा

कलाकार: तारा अलीशा बेरी, राजेश शर्मा, कुणाल रौय कपूर और अन्य

सिनेमा धीरे-धीरे महानगरी से हटकर छोटे शहरों की तरफ बढ़ रहा है. इसी के मद्देनजर फिल्मकार विशाल मिश्रा ने अपनी फिल्म ‘मरूधर एक्सप्रेस’ की कहानी को नवाबी शहर लखनऊ की लड़की और औद्योगिक शहर कानपुर के लड़के बीच केंद्रित की है. फिल्मकार ने इन दोनो शहरों से लोगों को जोड़ने के लिए ‘मरूधर एक्सप्रेस’ ट्रेन के अलावा इन शहरों की जीवनशैली को भी पेश किया है, मगर वह एक अच्छी फिल्म बनाने में कामयाब न हो सके.

कहानीः

फिल्म की कहानी के केंद्र में उत्तर प्रदेश के कानपुर शहर निवासी मरूधर पांडे (कुणाल रौय कपूर) और लखनउ निवासी चित्रा त्रिपाठी (तारा अलीषा बेरी) के इर्द गिर्द घूमती है. बिजली विभाग में कार्यरत मरूधर एक उदास व हीनग्रंथि का शिकार सुस्त स्वभाव का लड़का है. जबकि चित्रा त्रिपाठी अपना ब्यूटी पार्लर खोलने का सपना देख रही हैं.

मरूधर के बेरंग जीवन को लेकर उसके रंगीन मिजाज और जिंदादिल पिता (राजेश शर्मा) को हमेशा चिंता सताती रहती है कि बिना किसी महत्वाकांक्षा और ख्वाहिश के उनका बेटा अपनी जिंदगी को किस तरह आगे बढ़ाएगा. इसी के चलते मरूधर के पिता उसे हर दिन डांटने के साथ ही अजीबो-गरीब तरकीबें बताते रहते हैं. मरूधर के पिता चाहते है कि वह जल्द से जल्द कोई लड़की पसंद कर शादी कर ले पर मरूधर चिकने घड़े की तरह है, उस पर उसके पिता की बातों का कोई असर नही होता. अचानक एक दिन मरूधर के पिता ऐलान कर देते हैं कि उसे लखनऊ लड़की देखने जाना है और वह उसे ना नहीं कहेगा. लखनऊ में खूबसूरत और बेबाक लड़की चित्रा त्रिपाठी को देखते ही मरूधर उसके साथ शादी के लिए हामी भर देते हैं. उधर मरूधर की सिधाई और मासूमियत से प्रभावित होकर चित्रा भी हामी भर देती है. मरूधर व चित्रा की शादी भी हो जाती है.

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शादी करके घर पहुंचते ही मरूधर के पिता उसके सामने एक अन्य शर्त रखते हुए कहते हैं कि मरूधर हर हाल में उन्हें एक साल के अंदर दादा बनाए. उधर मरूधर और चित्रा आपस में प्यार की तलाश के साथ सेक्सुअल परफौर्मेंस की चुनौतियों का सामना करते हैं. मरूघर के पिता उसे एक सप्ताह के लिए हनीमून मनाने नैनीताल भेजते हैं. नैनीताल के जिस होटल में दोनों रूकते हैं उसके मालिक के संग चित्रा कालेज दिनो में डेटिंग कर चुकी हैं पर होटल का यह मालिक ‘गे’ है. किंतु मरूधर व चित्रा के बीच गलत फहमी पैदा हो जाती है और सप्ताह की बजाय तीन दिन में ही दोनो नैनीताल से वापस आ जाते है. पर मरूधर कानपुर और चित्रा लखनऊ अपने घर चली जाती है.

उसके बाद कई घटनाक्रम तेजी से बदलते हैं. अंततः मरूधर व चित्रा एक हो जाते हैं. मरूधर चित्रा को ब्यूटी पार्लर भी खोल कर देता है.

लेखन व निर्देशनः

पटकथा लेखन,चरित्र चित्रण के साथ ही चरित्रों के अनुरूप कलाकारों के चयन में फिल्मकार विशाल मिश्रा बुरी तरह से चूक गए हैं. कहानी में दोहराव है. कहानी में बेवजह और बहुत ही बेतरतीब तरीके से ‘गे’ का मुद्दा जोड़ा गया है. फिल्म में रोमांस तो है ही नहीं.

अभिनयः

जहां तक अभिनय का सवाल है, तो मरूधर पांडे के किरदार में कुणाल रौय कपूर पूरी तरह से ‘मिसफिट’ हैं. कुणाल रौय कपूर कहीं से भी प्रभावित नहीं करते हैं. चित्रा त्रिपाठी के किरदार में आत्मविश्वास से लबालब तारा अलीशा बेरी ने बेहतरीन अभिनय किया है. राजेश शर्मा ओवर एक्टिंग करते नजर आते हैं.

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कपिल देव के लुक में दिखे रणवीर सिंह, बर्थडे पर आया फर्स्ट लुक

बौलीवुड इंडस्ट्री के सबसे पौपुलर एक्टर रणवीर सिंह इस समय अपनी अप्कमिंग फिल्म ‘83’ की शूटिंग में लगे हुए हैं. आज रणवीर के बर्थ-डे के अवसर पर फिल्म के निर्माताओं ने ‘83’ का पहला लुक शेयर किया है जिसमें रणवीर सिंह हू-बहू कपिल देव लग रहे हैं. रणवीर ने इससे पहले “गल्ली बौय” “सिम्बा” “पद्मावत” जैसी सुपर-हिट फिल्मों में काम कर कई अवार्डस भी हासिल किए हैं.

रणवीर ने फिल्म ‘83’ में इस प्रकार खुद को कपिल देव के किरदार में ढ़ाल लिया है कि वे खुद पहचान में नहीx आ पा रहे हैं. फिल्म ‘83’ 1983 में हुए वर्ल्ड-कप पर आधारित है जिसमें रणवीर सिंह कपिल देव का किरदार निभाते नजर आएंगे. रणवीर सिंह इससे पहले कई सुपरहिट फिल्में देकर दर्शकों के फेवरेट बन गए है तो ये करना बिल्कुल गलत नही होगा की इस बार भी रणवीर अपनी एक्टिंग से दर्शकों का दिल जीतने वाले हैं.

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फिल्म ‘83’ में रणवीर सिंह के साथ उनकी पत्नी दीपिका पादुकोण भी नज़र आने वाली है जो कपिल देव की पत्नी का किरदार निभाती दिखाई देंगी. ‘रामलीला’, ‘बाजीराव मस्तानी’, ‘पद्मावत’ जैसी सुपर-डुपर हिट फिल्में देने के बाद रणवीर सिंह और दीपिका पादुकोण एक बार फिर से दर्शकों का दिल जीतने को तैयार है.

बता दें, फिल्म ‘83’ 10 अप्रैल 2020 को रिलीज होगी और इस फिल्म में रणवीर सिंह और दीपिका पादुकोण के अलावा पंजाब इंडस्ट्री के सुपर स्टार “एम्मी विर्क” और “हार्डी सन्धू” भी नज़र आने वाले हैं. फिल्म का निर्देशन कबीर खान जैसे डायरेक्टर द्वारा किया जा रहा है जिन्होनें ‘बजरंगी भाईजान’ और ‘टाइगर जिंदा है’ जैसी कई सफल फिल्में बनाई हैं.

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बजट: मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और अमित जोगी के तरकश के तीर

केंद्रीय बजट को लेकर मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने अपनी प्रतिक्रिया दी है. मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने इसे महंगाई बढ़ाने वाला बजट बताया है. उन्होंने कहा कि पेट्रोल डीजल में 1 रुपये की वृद्धि की गई है. इससे महंगाई बढ़ेगी. वहीं युवाओं के लिए रोजगार के ऐलान ना होने पर भी भूपेश बघेल ने सवाल उठाया है. उन्होंने कहा कि युवाओ को रोजगार के अवसर कैसे देंगे. इस पर कोई बात नहीं की गई है. वहीं किसानों के लिए ऊंट के मुंह में जीरा के बराबर राहत देने की बात कही गयी है, आय दुगना होने की बात केवल जुमलेबाजी साबित हुई है.

मुख्यमंत्री ने आगे कहा कि रेलवे को पीपीपी मौडल में ले जा रहे हैं, अब उसे प्राइवेट सेक्टर ले जाने के बाद लोगों से रोजगार छीना जाएगा. वहीं प्रत्येक घर में पानी पहुंचाने में भी स्टेट शेयर रहेगा, जबकि सड़क बनाने में 60-40 का रेशियो कर दिया गया है. उन्होंने बजट को निराशाजनक बताया है. पुराने बजट को ही बढ़ा कर ही प्रस्तुत किया गया है.

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भूपेश बघेल ने कहा कि हम लोग यह उम्मीद कर रहे थे आदिवासी अनुसूचित क्षेत्र में में 6 हजार की जगह 12 हजार राशि मिलेगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ. भूपेश बघेल ने मोदी पर तंज करते हुए कहा कि ये सरकार नाम बस बदलने में माहिर हैं. मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने कहा कि आवास योजना जो देश में लागू किया गया है 2022 तक सबको मकान देने की अगर बात कर रहे हैं तो राज्य सरकार को इसके लिए 7000 करोड़ देना पड़ेगा जबकि 100% केंद्र को दिया जाना चाहिए. भूपेश बघेल ने कहा कि प्रधानमंत्री जो 5 मिलियन डौलर इकोनामी बनना चाहते हैं इस दिशा में ऐसी कोई चीज दिखाई नहीं देती केवल जुमलेबाजी दिख रही है. 6000 की जगह 12000 प्रति किसान मिलना चाहिए था, जो लोग जंगल में रहते हैं उन्हें भी कुछ नहीं मिला.

जनता कांग्रेस जोगी सुप्रीमो अमित जोगी की 9 मांगे

2019-20 बजट पर छत्तीसगढ़ की ढाई करोड़ जनता की ओर से जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ (जे) की भारत सरकार को 9 मांगे रखते हुए कहा है-

– बजट सत्र में चर्चा के दौरान छत्तीसगढ़ के सांसद दरबारी नहीं बल्कि दमदारी से ढाई करोड़ छत्तीसगढ़ वासियों की बात रखें.

– बजट का सबसे बड़ा हिस्सा ‘कनेक्टिविटी’ के लिए रखा गया है, इसका लाभ छत्तीसगढ़ को मिले: जिस तरह रायगढ़ सांसद श्रीमती गोमती साय ने रायगढ़-जशपुर-रांची रेल्वे लाइन की मांग उठाई वैसे ही कांकेर सांसद श्री मोहन मंडावी और बस्तर सांसद श्री दीपक बैज को 6K रेल्वे लाइन (कुम्हारी-कांकेर-केशकाल-कोंडागाँव-केशलूर-कोंटा) की मांग उठानी चाहिए, इस से बस्तर न केवल विकास की मुख्यधारा से जुड़ेगा बल्कि नक्सलवाद भी कम होगा.

-बिलासपुर सांसद श्री अरुण साव और कोरबा सांसद श्रीमती ज्योत्सना महंत को हसदेव-अरपा नदी जोड़ो अभियान को स्वीकृति दिलाने पूरा प्रयास करना चाहिए ताकि वौटर-वे परिवहन के साथ साथ भीषण जल संकट से निपटा जा सके.

-राज्य सरकार की यूनिवर्सल हेल्थ स्कीम का जब कोई अतापता नहीं है और सरकारी अस्पतालों में मृत्यु दर तिगना हो गया है तो 5 लाख तक की स्वास्थ बीमा राशि वाली आयुष्मान भारत योजना को छत्तीसगढ़ में चालू करने की सहमति दें.

-दुर्ग, बस्तर, सरगुजा और बिलासपुर संभागीय मुख्यालयों में भी रायपुर AIIMS की तर्ज़ पर सूपर स्पेशिएलिटी अस्पताल एवं मेडिकल कालेज खोले जाए, इसके लिए वहां के सांसदों को लड़ना चाहिए.

-100% FDI (विदेशी निवेश) को खनिज-आधारित उद्योग में अनुमति देना पर विचार करना छत्तीसगढ़ में फिर से ईस्ट इंडिया कम्पनी का राज लाएगा, इसका हम पुरज़ोर विरोध करेंगे.

-उपभोग-आधारित GST प्रणाली लागू होने से उत्पादन-आधारित छत्तीसगढ़ की अर्थव्यवस्था को जो हर साल 25,000 करोड़ का अतिरिक्त नुकसान हो रहा है, उसकी भरपाई केंद्र सरकार को करनी चाहिए.

-कम से कम 100 करोड़ की लागत वाले वृहद कृषि और वनोपज आधारित उद्योग भी आदिवासी-बाहुल्य क्षेत्रों में खोलने का बजट में प्रावधान होना चाहिए.

-व्यापारियों की मार्केट में पैसा की कमी दूर हो और युवाओं को स्वरोज़गार के अवसर मिले, इसके लिए बैंकों से ब्याज दर कम करने के लिए सरकार रिजर्व बैंक पर दबाव बनाए.

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ऐसे पाएं शाहिद कपूर का ‘कबीर सिंह’ लुक

सुपरहिट तेलुगू फिल्म ‘अर्जुन रेड्डी’ की औफिशियल हिंदी रीमेक कबीर सिंह ने बौक्स ऑफिस पर धमाल मचाया हुआ है. फिल्म कबीर सिंह के सिनेमा घरों में रिलीज होने के बाद से ही लोग फिल्म के अभिनेता व अभिनेत्रियों की एक्टिंग के साथ-साथ उनके लुक की भी खूब चर्चा कर रहे हैं. जहां एक तरफ लोग शाहिद कपूर की एक्टिंग की तारीफ करते नजर आ रहे है वहीं दूसरी तरफ उनका लुक भी लोगों को खासा पसंद आ रहा है. सोशल मीडिया पर बच्चों से लेकर यंग बौयज तक ‘कबीर सिंह’ के लुक को कौपी करते नजर आ रहे हैं. अगर आप भी ‘कबीर सिंह’ जैसा लुक चाहते हैं तो फौलो करें यह कुछ आसान टिप्स:-

  1. कबीर सिंह का बिना बियर्ड वाला लुक

अगर आप कबीर सिंह का बिना बियर्ड वाल लुक पसंद करते हैं तो इसके लिए आपको बौडी बनाने की जरूरत नहीं पड़ेगी. यदि आप स्लिम और फिट हैं तो आप पर यह लुक बहुत अच्छा लगेगा.

• इस लुक के लिए आपके बाल ज्यादा लंबे न हों. यदि आप बियर्ड ट्रिम करने के लिए ट्रिमर का इस्तेमाल करते हैं तो बियर्ड का साइज़ तीन ही रखें.
• मूवी में शाहिद बहुत ही सिंपल कपड़ों में नजर आए हैं. इस लुक के लिए शाहिद कपूर कभी डैनिम में नजर आए तो कभी प्लैन शर्ट में. इसलिए आपको बहुत ज्यादा महंगे या स्टाइलिश कपड़े खरीदने की जरूरत नहीं है. आप कोई भी डार्क प्लैन शर्ट और ट्राउजर पहन कर इस लुक को पूरा कर सकते हैं
• इस लुक की खास बात यह है कि इस लुक को जहां कामकाजी लोग ऑफिस में पहन सकते हैं, वहीं कालेज के स्टूडेंट भी इसे पहन कर तारीफ बटोर सकते हैं.

2. कबीर सिंह का बियर्ड लुक

‘कबीर सिंह’ का बियर्ड लुक सोशल मीडिया पर काफी चर्चे हो रहे हैं. युवा इस लुक को काफी पसंद कर रहे हैं. इस लुक के लिए जरूरी नहीं कि शाहिद कपूर कपूर की तरह आपका भी सिक्स पैक हो. लेकिन हां, अगर आपकी बौडी परफेक्ट शेप में है तो यह लुक आप पर बहुत अच्छा लगेगा.

 

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• इस लुक के लिए आपके बाल गर्दन से थोड़े ऊपर तक होने चाहिए, न ज्यादा छोटे न ज्यादा बड़े.
• बालों को सेट करने के लिए आप हैयरड्राइर और हैयर जैल का इस्तेमाल कर सकते हैं.

• बियर्ड यानी आपकी दाढ़ी की ग्रोथ ज्यादा होनी चाहिए, जिसे आप ट्रिमर की मदद से पर्फेक्ट शेप दे सकते हैं.

• इस लुक में शाहिद ज्यादातर टी-शर्ट में दिखे है. शाहिद कपूर ने फिल्म में फुल स्लीव टी-शर्ट पहना हुआ है जिस का नेक डिज़ाइन बटन वाला है. आप चाहें तो शर्ट भी पहन सकते हैं लेकिन शर्ट आपकी बौडी की फिटिंग का हो तो ज्यादा बेहतर लगेगा.

• इस लुक को पूरा करने के लिए आप शाहिद यानी ‘कबीर सिंह’ जैसा काला चश्मा लगाना न भूलें.

मैं ही दोषी हूं

‘‘मिश्राजी, अब तो आप खुश हैं न, आप का काम हो गया…आप का यह काम करवाने के लिए  मुझे काफी पापड़ बेलने पड़े,’’ शची ने मिठाई का डब्बा पकड़ते हुए आदतन कहा.

‘‘भाभीजी, बस, आप की कृपा है वरना इस छोटी सी जगह में बच्चों से दूर रहने के कारण मेरा तो दम ही घुट जाता,’’ मिश्राजी ने खीसें निपोरते हुए कहा.

शची की निगाह मिठाई से ज्यादा लिफाफे पर टिकी थी और उन के जाते ही वह लिफाफा खोल कर रुपए गिनने लगी. 20 हजार के नए नोट देख कर चेहरे की चमक दोगुनी हो गई थी.

शची के पति पल्लव ऐसी जगह पर कार्यरत थे कि विभाग का कोई भी पेपर चाहे वह ट्रांसफर का हो या प्रमोशन का या फिर विभागीय खरीदारी से संबंधित, बिना उन के दस्तखत के आगे नहीं बढ़ पाता था. बस, इसी का फायदा शची उठाती थी.

शुरू में पल्लव शची की ऐसी हरकतों पर गुस्सा हो जाया करते थे, बारबार मना करते थे, आदर्शों की दुहाई देते थे पर लोग थे कि उन के सामने दाल न गलती देख, घर पहुंच जाया करते थे और शची उन का काम करवाने के लिए उन पर दबाव बनाती, यदि उन्हें ठीक लगता तो वे कर देते थे. बस, लोग मिठाई का डब्बा ले कर उन के घर पहुंचने लगे…शची के कहने पर फिर गिफ्ट या लिफाफा भी लोग पकड़ाने लगे.

इस ऊपरी कमाई से पत्नी और बच्चों के चेहरे पर छाई खुशी को देख कर पल्लव भी आंखें बंद करने लगे. उन के मौन ने शची के साहस को और भी बढ़ा दिया. पहले अपना काम कराने के लिए लोग जितना देते शची चुपचाप रख लेती थी किंतु जब इस सिलसिले ने रफ्तार पकड़ी तो वह डिमांड भी करने लगी.

पत्नी खुश, बच्चे खुश तो सारा जहां खुश. पहले जहां घर में पैसों की तंगी के कारण किचकिच होती रहती थी वहीं अब घर में सब तरह की चीजें थीं. यहां तक कि बच्चों के लिए अलगअलग टीवी एवं मोटर बाइक भी थीं.

शची जब अपनी कीमती साड़ी और गहनों का प्रदर्शन क्लब या किटी पार्टी में करती तो महिलाओं में फुसफुसाहट होती थी पर किसी का सीधे कुछ भी कहने का साहस नहीं होता था. कभी कोई कुछ बोलता भी तो शची तुरंत कहती, ‘‘अरे, इस सब के लिए दिमाग लड़ाना पड़ता है, मेहनत करनी पड़ती है, ऐसे ही कोई नहीं कमा लेता.’’

कहते हैं लत किसी भी चीज की अच्छी नहीं होती और जब  यही लत अति में बदल जाती है तो दिमाग फिरने लगता है. यही शची के साथ हुआ. पहले तो जो जितना दे जाता वह थोड़ी नानुकुर के बाद रख लेती लेकिन अब काम के महत्त्व को समझते हुए नजराने की रकम भी बढ़ाने लगी थी. शची की समझ में यह भी आ गया है कि आज सभी को जल्दी है तथा सभी एकदूसरे को पछाड़ कर आगे भी बढ़ना चाहते हैं. और इसी का फायदा शची उठाती थी.

कंपनी को अपने स्टाफ के लिए कुछ नियुक्तियां करनी थीं. पल्लव उस कमेटी के प्रमुख थे. जैसा कि हमेशा से होता आया था कि मैरिट चाहे जो हो, जो चढ़ावा दे देता था उसे नियुक्तिपत्र मिल जाता था तथा अन्य को कोई न कोई कमी बता कर लटकाए रखा जाता था. एक जागरूक प्रत्याशी ने इस धांधली की सूचना सीबीआई को दे दी और उन्होंने उस प्रत्याशी के साथ मिल कर अपनी योजना को अंजाम दे दिया.

वह प्रत्याशी मिठाई का डब्बा ले कर पल्लव के घर गया. उस दिन शची कहीं बाहर गई हुई थी अत: दरवाजा पल्लव ने ही खोला. उस ने उन्हें अभिवादन कर मिठाई का डब्बा पकड़ाया और कहा, ‘‘सर, सेवा का मौका दें.’’

‘‘क्या काम है?’’ पल्लव ने प्रश्नवाचक नजर से उसे देखते हुए पूछा.

‘‘सर, मैं ने इंटरव्यू दिया था.’’

‘‘तो क्या तुम्हारा चयन हो गया है?’’

‘‘जी हां, सर, पर नियुक्तिपत्र अभी तक नहीं मिला है.’’

‘‘कल आफिस में आ कर मिल लेना. तुम्हारा काम हो जाएगा.’’

‘‘धन्यवाद, सर, लिफाफा खोल कर तो देखिए, इतने बहुत हैं या कुछ और का इंतजाम करूं.’’

‘‘अरे, इस की क्या जरूरत थी… जितना भी है ठीक है,’’ पल्लव ने थोड़ा झिझक कर कहा क्योंकि उन के लिए यह पहला मौका था…यह काम तो शची ही करती थी.

‘‘सर, यह तो मेरी ओर से आप के लिए एक तुच्छ भेंट है. प्लीज, एक बार देख तो लीजिए,’’ उस प्रत्याशी ने नम्रता से सिर झुकाते हुए कहा.

पल्लव ने रुपए निकाले और गिनने शुरू कर दिए. तभी भ्रष्टाचार निरोधक दस्ते के लोग बाहर आ गए और पल्लव को धरदबोचा तथा पुलिस कस्टडी में भेज दिया.

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शची जब घर लौटी तो यह सब सुन कर उस ने अपना माथा पीट लिया. उसे पल्लव पर गुस्सा आ रहा था कि उन्होंने उसी के सामने रुपए गिनने क्यों शुरू किए…लेते समय सावधानी क्यों नहीं बरती. थोड़ा सावधान रहते तो मुंह पर कालिख तो नहीं पुतती. लोग तो करोड़ों रुपए का वारान्यारा करते हैं पर फिर भी नहीं पकड़े जाते और यहां कुछ हजार रुपयों के लिए नौकरी और इज्जत दोनों जाती रहीं. इच्छाएं इस तरह उस का मानमर्दन करेंगी यह उस ने सोचा भी नहीं था.

जानपहचान के लोग अब बेगाने हो गए थे. वास्तव में वह स्वयं सब से कतराने लगी थी. सब उस की अपनी वजह से हुआ था. पल्लव तो सीधेसीधे काम से काम रखने वाले थे पर उस की आकांक्षाओं के असीमित आकाश की वजह से पल्लव को यह दिन देखना पड़ा है.

शची ने यह सोच कर कि पैसे से सबकुछ संभव है, शहर का नामी वकील किया पर उस ने शची से पहले ही कह दिया, ‘‘मैडम, मैं आप को भुलावे में नहीं रखना चाहता. आप के पति रंगेहाथों पकड़े गए हैं अत: केस कमजोर है पर हां, मैं अपनी ओर से पूरी कोशिश करूंगा.’’

पल्लव अलग से परेशान थे क्योंकि उन की तबीयत ठीक नहीं चल रही थी. आश्चर्य तो शची को तब होता था जब उसे अपने पति से मिलने के लिए ही नजराना चुकाना पड़ता था.

‘‘तो क्या सारा तंत्र ही भ्रष्ट है. अगर यह सच है तो यह सब दिखावा किस लिए?’’ अपने वकील को यह बात बताई तो वह बोला, ‘‘मैडम, आज के दौर में बहुत कम लोग ईमानदार रह गए हैं. जो ईमानदार हैं उन्हें भी हमारी व्यवस्था चैन से नहीं रहने देती. आप जिन लोगों की बात कर रही हैं वे भी कहीं नौकरी कर रहे हैं, उन्हें भी अपनी नौकरी बचाने के लिए कुछ मामले चाहिए… अब उस में कौन सा मुरगा फंसता है यह व्यक्ति की असावधानी पर निर्भर है.’’

उधर पल्लव सोच रहे थे कि नौकरी गई तो गई, पूरे जीवन पर एक कलंक अलग से लग गया. जिन बीवीबच्चों के लिए मैं ने यह रास्ता चुना वही उसे अब दोष देने लगे हैं. शची तो चेहरे पर झुंझलाहट लिए मिलने आ भी रही थी पर बच्चे तो उन से मिलने तक नहीं आए थे. क्या सारा दोष उन्हीं का है?

कितने अच्छे दिन थे जब शची के साथ विवाह कर के वह इस शहर में आए थे. आफिस जाते समय शची उन से शाम को जल्दी आने का वादा ले लिया करती थी. दोनों की शामें कहीं बाहर घूमने या सिनेमा देखने में गुजरती थीं. अकसर वे बाहर खा कर घर लौटा करते थे. हां, उन के जीवन में परेशानी तब शुरू हुई जब विनीत पैदा हुआ. अभी विनीत 2 साल का ही था कि विनी आ गई और वे 2 से 4 हो गए लेकिन उन की कमाई में कोई खास फर्क नहीं आया.

हमेशा हंसने वाली शची अब बातबात पर झुंझलाने लगी थी. पहले जहां वह सजधज कर गरमागरम नाश्ते के साथ उन का स्वागत किया करती थी अब बच्चों की वजह से उसे कपड़े बदलने का भी होश नहीं रहता था. पल्लव समझ नहीं पा रहे थे कि क्या करें?

बच्चों को अच्छे स्कूल में दाखिल करवाने के लिए डोनेशन चाहिए था. उस स्कूल की मोटी फीस के साथ दूसरे ढेरों खर्चे भी थे…कैसे सबकुछ होगा? कहां से पैसा आएगा…यह सोचसोच कर शची परेशान हो उठती थी.

उन्हीं दिनों उन के एक मातहत का ट्रांसफर दूसरी जगह हो गया. उस ने पल्लव से निवेदन किया तो उन्होंने अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर उस का ट्रांसफर रुकवा दिया था. इस खुशी में वह मिठाई के साथ 2 हजार रुपए भी घर दे गया. अब शची उन से इस तरह के काम करवाने का आग्रह करने लगी थी. शुरू में तो वह झिझके भी पर धीरेधीरे झिझक दूर होती गई और वह भी अभ्यस्त हो गए थे. ऊपर की कमाई के पैसों से शची के चेहरे पर आई चमक उन्हें सुकून पहुंचा जाती थी…साथ ही बच्चों की जरूरतें भी पूरी होने लगी थीं.

खूब धूमधाम से उन्होंने पिछले साल ही विनी का विवाह किया था…विनीत भी इसी वर्ष इंजीनियरिंग कर जाब में लगा है. अच्छीभली जिंदगी चल रही थी कि एकाएक वर्षों की मेहनत पर ग्रहण लग गया.

तब पल्लव को भी लगने लगा था कि भ्रष्टाचार तो हर जगह है… अगर वह भी थोड़ाबहुत कमा लेते हैं तो उस में क्या बुराई है. फिर वह किसी से मांगते तो नहीं हैं, अगर कुछ लोग अपना काम होने पर कुछ दे जाते हैं तो यह तो भ्रष्ट आचरण नहीं हुआ. लगता है, उन के साथ किसी ने धोखा किया है या उन्हें जानबूझ कर फंसाया गया है.

कहते तो यही हैं कि लेने वाले से देने वाला अधिक दोषी है पर देने वाला अकसर बच निकलता है जबकि अपना काम निकलवाने के लिए बारबार लालच दे कर वह व्यक्ति को अंधे कुएं में उतरने के लिए प्रेरित करता है और प्यास बुझाने को आतुर उतरने वाला यह भूल जाता है कि कुएं में स्वच्छ जल ही नहीं गंदगी के साथसाथ कभीकभी जहरीली गैसें भी रहती हैं और अगर एक बार आदमी उस में फंस जाए तो उस से बच पाना बेहद मुश्किल होता है. बच भी गया तो अपाहिजों की तरह जिंदगी बितानी पड़ जाती है.

अब पल्लव को महसूस हो रहा था कि बुराई तो बुराई है. किसी के दिल को दुखा कर कोई सुखी नहीं रह सकता. उन्होंने अपना सुख तो देखा पर जिसे अपने सुखों में कटौती करनी पड़ी, उन पर क्या बीतती होगी…इस पर तो उन का ध्यान ही नहीं गया था.

मानसिक द्वंद्व के कारण पल्लव को हार्टअटैक पड़ गया था. सीबीआई ने अपने अस्पताल में ही उन्हें भरती कराया किंतु हालत सुधरने के बजाय बिगड़ती ही जा रही थी. शची, जो इस घटना के लिए, सारी परेशानी के लिए उन्हें ही दोषी मानती रही थी…उन की बिगड़ती हालत देख कर परेशान हो उठी.

पहले जब शची ने पल्लव की बिगड़ती हालत पर सीबीआई का ध्यान आकर्षित किया था तो उन में से एक ने हंसते हुए कहा था, ‘डोंट वरी मैडम, सब ठीक हो जाएगा. यहां आने पर सब की तबीयत खराब हो जाती है.’

उस समय उस की शिकायत पर किसी ने ध्यान नहीं दिया लेकिन दूसरे दिन जब वह मिलने गई तो पल्लव को सीने में दर्द से तड़पते पाया. शची से रहा नहीं गया और वह सीबीआई के सीनियर आफिसर के केबिन में दनदनाती हुई घुस गई तथा गुस्से में बोली, ‘आप की कस्टडी में अगर पल्लव की मौत हो गई तो लापरवाही के लिए मैं आप को छोड़ूंगी नहीं. आखिर कैसे हैं आप के डाक्टर जो वास्तविकता और नाटक में भेद नहीं कर पा रहे हैं.’

शची की बातें सुन कर वह सीनियर अधिकारी पल्लव के पास गया और उन की हालत देख कर उन्हें नर्सिंग होम में शिफ्ट कर दिया पर तब तक देर हो चुकी थी. डाक्टर ने पल्लव को भरती तो कर दिया पर अभी वह खतरे से खाली नहीं थे.

रोतेरोते शची की आंखें सूज गई थीं. कोई भी तो उस का अपना नहीं था. ऐसे समय बच्चों ने भी शर्मिंदगी जताते हुए आंखें फेर ली थीं. इस दुख की घड़ी में बस, उस की छोटी बहन विभा जबतब उस से मिलने आ जाया करती थी जो बहन को समझाबुझा कर कुछ खिला जाया करती थी.

शची टूट एवं थक चुकी थी. जाती भी तो जाती कहां? घर अब वीरान खंडहर बन चुका था. अत: वह वहीं अस्पताल में स्टूल पर बैठे पति को एकटक निहारती रहती थी. पल्लव को सांस लेने में शिकायत होने पर आक्सीजन की नली लगाई गई थी. सदमा इनसान को इस हद तक तोड़ सकता है, आज उसे महसूस हो रहा था. पति की हालत देख कर शची परेशान हो जाती पर कर भी क्या सकती थी. पल्लव की यह हालत भी तो उसी के कारण हुई है.

मन में हलचल मची हुई थी. तर्कवितर्क चल रहे थे. कभी पति को इतना असहाय उस ने महसूस नहीं किया था. दोनों बच्चे अपनीअपनी दुनिया में मस्त थे. पल्लव की गिरफ्तारी की खबर सुन कर उन दोनों ने अफसोस करना तो दूर, शर्मिंदगी जताते हुए किनारा कर लिया था पर बीमार पल्लव को देख कर रहा नहीं गया तो एक बार फिर उन की बीमारी के बारे में उस ने बच्चों को बताया.

विनी ने रटारटाया वाक्य दोहरा दिया था, ‘ममा, मैं नहीं आ सकती, डैड की वजह से मैं घर के सदस्यों से नजर नहीं मिला पा रही हूं…आखिर डैड को ऐसा करने की आवश्यकता ही क्या थी?’

आना तो दूर कुछ ऐसी ही प्रतिक्रिया विनीत की भी थी. शची समझ नहीं पा रही थी कि क्या करे. बच्चों के मन में पिता के प्रति बनी छवि ध्वस्त हो गई थी…पर क्या वह नहीं जानते थे कि पिता के इतने कम वेतन में तो उन की सुरसा की तरह नित्य बढ़ती जरूरतें व इच्छाएं पूरी नहीं हो सकती थीं.

शची को अपनी कोख से जन्मी संतानों से नफरत होने लगी थी. कितने स्वार्थी हो गए हैं दोनों…पिता तो पिता उन्हें मां की भी चिंता नहीं रही…उस मां की जिस ने उन के अरमानों को पूरा करने के लिए हर संभव प्रयास किए, उन्हीं के लिए गलत रास्ता अपनाया, हर सुखसुविधा दी…अच्छे से अच्छे स्कूल में शिक्षा दिलवाई, धूमधाम से विवाह किया…यहां तक कि दहेज में विनी को जब कार दी थी तब तो उस ने नहीं पूछा कि ममा, इतना सब कैसे कर पा रही हो.

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‘तुम बच्चों को क्यों दोष दे रही हो शची?’ उस के मन ने उस से पूछा, ‘उन्होंने तो वही किया जिस के वह आदी रहे थे… जैसे माहौल में तुम ने उन्हें पाला वैसे ही वह बनते गए. क्या तुम ने कभी किसी कमी का एहसास उन्हें कराया या तंगी में रहने की शिक्षा दी…पल्लव तो आदर्शवादी रहे थे, चोरीछिपे किए तुम्हारे काम से नाराज भी हुए थे तब तो तुम्हीं कहा करती थीं कि मैं सिर्फ वेतन में घर का खर्च नहीं चला सकती…तुम तो कुछ नहीं कर रहे हो, जो भी कर रही हूं वह मैं कर रही हूं…और हम मांग तो नहीं रहे…अगर थोड़ाबहुत कोई अपनी खुशी से दे जाता है तो आप को बुरा क्यों लगता है?’ अपनी अंतरात्मा की आवाज सुन वह बोल पड़ी, ‘पर मैं ऐसा तो नहीं चाहती थी.’

‘ठीक है, तुम ऐसा नहीं चाहती थीं पर क्या तुम्हें पता नहीं था कि जो जैसा करता है उस का फल उसे भुगतना ही पड़ता है.’

अपनी आत्मा के साथ हुए वादविवाद से अब शची को एहसास हो गया था कि उसी ने बुराई को प्रश्रय दिया था. पल्लव के विरोध करने पर तकरार होती पर अंतत: जीत उस की ही होती. पल्लव चुप हो जाते फिर घर में खुशी के माहौल को देख कर वह भी उसी के रंग में रंगते गए.

अगर वह पल्लव को मजबूर नहीं करती, उन की सीमित आय में ही घर चलाती और बच्चों को भी वैसी ही शिक्षा देती तो आज पल्लव का यह हाल न होता…कहीं न कहीं पल्लव के इस हाल के लिए वही दोषी है.

पल्लव ने उस की खातिर बुराई का मुखौटा तो पहन लिया था पर शायद मन के अंदर की अच्छाई को मार नहीं पाए थे तभी तो अपनी छीछालेदर सह नहीं पाए और बीमार पड़ गए पर अब पछताए होत क्या जब चिडि़यां चुग गईं खेत.

पल्लव की हिचकी ने उस के मन में चल रहे अंधड़ को रोका. उन्हें तड़पते देख कर वह डाक्टर को बुलाने भागी और जब तक डाक्टर आए तब तक सब समाप्त हो चुका था. उस की आकांक्षाओं के आकाश ने उस का घरसंसार उजाड़ दिया था.

खबर सुन कर विभा भागीभागी आई और उसे देखते ही शची चीत्कार कर उठी, ‘‘पल्लव की मौत के लिए मैं ही दोषी हूं…मैं ही उन की हत्यारिन हूं… पल्लव निर्दोष थे…मेरी गलती की सजा उन्हें मिली…’’

शची का मर्मभेदी प्रलाप सुन कर विभा समझ नहीं पा रही थी कि कैसे उसे संभाले. सचाई का एहसास एक न एक दिन सब को होता है पर यहां देर हो गई थी.

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नुस्खे सरकारी दफ्तर में फतह पाने के

‘‘जीवन में मृत्यु निश्चित है’’ -इस उक्ति में संशोधन करते हुए आधुनिक अर्थशास्त्र के प्रवर्तक कहे जाने वाले एडम स्मिथ ने कहा था, ‘‘जीवन में मृत्यु और कर, दो ऐसी चीजें हैं जो अपरिहार्य हैं और इन से बचा नहीं जा सकता.’’ यदि एडम स्मिथ आज के युग में होता तो वह तीसरी अपरिहार्यता या विवशता की ओर भी अवश्य ही संकेत करता और यह तीसरी अपरिहार्य वस्तु होती—आम आदमी द्वारा सरकारी दफ्तरों में जाने की जानलेवा विवशता.

हम तो कहते हैं कि आप के दुश्मन को भी सरकारी दफ्तर में न जाना पड़े. पर इस के बावजूद शायद यह प्रकृति की विवशता है कि आप जिस से मुक्ति चाहते हैं उस से बचा नहीं जा सकता. जन्म से पहले ही प्रसव के लिए भावी माता ने सरकारी अस्पताल में नाम लिखवा रखा हो तो आश्चर्य की बात नहीं. फिर जन्म के पंजीयन से ले कर मृत्यु तक आप को सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटने ही काटने हैं.

यह तो सरकार की कृपा ही है कि आप को अपनी मृत्यु का भी खुद ही पंजीयन नहीं करवाना पड़ता. पर मृत्यु का पंजीयन कराना आप के उत्तराधिकारियों के लिए आवश्यक है. इस बात की सूचना आएदिन समाचारपत्रों और टेलीविजन द्वारा दी जाती है. पर इस के बावजूद आप ने अकसर समाचारपत्रों में पढ़ा होगा कि अमुकअमुक की मृत्यु के बाद भी उस के नाम सरकारी आदेश जारी होते रहे. उस का राशन भी लिया जाता रहा और वह सरकारी कागजों में बाकायदा जीवित रहा.

यदि आप भूल से बीच के किसी माह की पेंशन नहीं लेते हैं और यह गलती बाद के कुछ महीनों की पेंशन लेने के बाद सामने आती है तो आप को यह प्रमाणपत्र भी देना होगा कि आप 6 माह पूर्व भी जीवित थे. आप चाहे आज जिंदा हों, पर इस से पूर्व भी आप जीवित थे, इस के पुख्ता प्रमाण के बिना आप के कागज आगे नहीं सरकेंगे.

हमारे देश में हर छोटी से छोटी बात को ले कर शास्त्र लिख दिए गए हैं, संहिताएं बना दी गई हैं, मृतक के क्रियाकर्म का विधान तक गरुड़ पुराण में बता दिया गया है पर खेद है कि हमारे विद्वान बुद्धिजीवी आप को अभी तक यह नहीं बता पाए हैं कि सरकारी दफ्तर में आप कैसे प्रवेश करें और किस तरीके से व्यवहार करें.

इसीलिए सरकारी दफ्तर या संस्थान में आप की कदमकदम पर फजीहत होती है. आप को बारबार अपमानित होना पड़ता है. ऐसी स्थिति से बचने के लिए हम आप को कुछ गुर बता रहे हैं. इन गुरों को गांठ बांध लें. हमारा विश्वास है कि वक्तबेवक्त ये आप के काम आएंगे.

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पापी पेट का सवाल है

सरकारी दफ्तर एक ऐसा युद्धक्षेत्र है जहां सभी आप के दुश्मन हैं. वहां आप का कोई सगासंबंधी हो, तो भी वह आप की तरफ नजर उठा कर भी नहीं देखेगा. कारण यह कि वहां जो दावत होती है उस में आप की भूमिका सक्रिय न हो कर निश्चेष्ट होती है, क्योंकि वहां आप ही को खाया जाता है. जब आप खाद्य पदार्थ हैं तो ‘घोड़ा घास से यारी करेगा तो खाएगा क्या’ वाली उक्ति पूर्ण रूप से चरितार्थ होती है.

फिर जो काम पैसा करता है वह काम आप के सगे पिताजी भी नहीं कर सकते. कहा भी गया है, ‘दादा बड़ा न भैया, सब से बड़ा रुपैया.’ इसलिए जब आप सरकारी दफ्तर में घुसें तो अपनेआप को भामाशाह समझें. इसी में आप का हित है. वहां कृपणता के लिए तनिक भी स्थान नहीं है. आप कितने भी गरीब क्यों न हों, आप से यह उम्मीद की जाती है कि आप सरकारी दफ्तर में जा कर वहां के कर्मचारियों की गरीबी दूर करें. आखिर पापी पेट का सवाल है.

आप को यह नहीं भूलना चाहिए कि सरकारी कर्मचारियों के भी बालबच्चे हैं. और फिर उन्हें वेतन मिलता ही कितना है? और भला आज के महंगाई के युग में मात्र वेतन से किस का काम चलता है? यदि आप को यहां कुछ प्राप्त करना है तो पहले दीजिए. गांधीजी का उठा हुआ हाथ हर दफ्तर के आगंतुकों को कम से कम 5 रुपए देने का तो स्पष्ट निर्देश देता ही है.

आप ने उन के 3 बंदरों की भी कहानी सुनी होगी. यदि आप को उन के संकेतों का अर्थ ज्ञात नहीं तो हम बता देते हैं. आप सरकारी कर्मचारियों की बुराइयों और कमजोरियों की ओर न देखें. उन के बारे में कुछ कहें नहीं और उन के बारे में कुछ सुनें भी नहीं.

सरकारी दफ्तर में सब से अधिक महत्त्वपूर्ण जीव है, लिपिक यानी बाबू. उस का पेट अजगर की तरह होता है. वह बहुत ही मुश्किल से हिल पाता है अर्थात आप के लिए कुछ कर पाना उस के लिए एक कठिन तपस्या है. चपरासी वहां गणेशजी का जीवित रूप है जिसे प्रसन्न किए बिना आज तक कोई भी व्यक्ति कुछ पा नहीं सका है. उसे नाराज कर कोई भी व्यक्ति सुख की नींद नहीं सो सका है.

सरकारी दफ्तर में बाबू ही सबकुछ करता है. वही मिसिलों का नियामक है, उन्हें चलाता है. अफसर तो मात्र दस्तखत करता है. वह यदि चाहे तो भी अपने बाबू के विरुद्ध नहीं जा सकता, क्योंकि वह भी बाबू पर ही निर्भर करता है. वह जल में रह कर मगर से वैर नहीं कर सकता. इसलिए बाबू ने जो कह दिया या लिख दिया, वही अंतिम है. उस के विरुद्ध न कोई अपील है और न कोई फरियाद.

चपरासी इसी बाबू का दायां हाथ है. मिसिल ढूंढ़ने का सारा उत्तरदायित्व उसी का है. इसलिए मिसिल का मिलना उस की कृपा पर निर्भर करता है. यह कृपा बिकती है. बाजार की हर चीज की तरह यह खरीदी जा सकती है, बशर्ते कि आप की जेब में पैसा हो.

जब भी आप सरकारी दफ्तर में जाएं तो आप को चाहिए कि आप झुक कर चलें, चाहे आप की लंबाई के कारण आप को गरदन झुकाने में कष्ट ही क्यों न हो. कारण यह कि सरकारी दफ्तर में काम करवाना तो एक तपस्या है. यहां का नारा है, ‘‘जो हम से टकराएगा, चूरचूर हो जाएगा.’’

इसलिए याद रखिए कि यहां सभी पूज्य हैं और वंदनीय हैं. आप यहां किसी की उपेक्षा न करें, पता नहीं कब किस से आप का काम पड़ जाए. इसलिए नई बहू की तरह आप सभी का पालागन करें.

सरकारी दफ्तर में जा कर आप किसी के सामने बैठने की जुर्रत न करें. यों तो आप को कोई कुरसी वहां मिलेगी ही नहीं, पर अगर मिल भी जाए तो आप उस पर बैठ न जाएं, आगंतुक को बाबू के सामने खड़े रह कर ही बात करनी होती है. आप इस भ्रम में न रहें कि आप उस के वेतन से कहीं अधिक आयकर देते हैं. वहां तो बड़ा वही है और बड़ों के सामने बैठा नहीं जाता. चपरासी को आप वहां ‘साहबजी’ बोलिए, बाबू को ‘जैसी हुजूर की आज्ञा.’

याद रखिए, इन लोगों का काटा हुआ पानी भी नहीं मांगता. ये आप को वह पटकनी दे सकते हैं जो आप उम्र भर नहीं भूल सकेंगे. जानबूझ कर की गई इन की कोई भी करतूत आप के लिए जान का जंजाल बन जाएगी. ये लोग पूरे घाघ होते हैं. आप जैसे परम सयाने इन से रोज ही टकराते हैं और उन का वही हाल होता है जो पत्थर से टकराने पर होता है. ये पत्थर हैं जो पसीजते नहीं.

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सहनशील और धैर्यवान बनिए

सरकारी दफ्तर में जाने से पहले आप को अत्यंत सहनशील और धैर्यवान होना चाहिए. दफ्तर में आप को कितना भी अपमानित किया जाए, आप मुसकराते ही रहें. यदि दोपहर से कुछ पहले आप वहां पहुंचें. तो संबंधित अमले को दोपहर के खाने के लिए अवश्य आमंत्रित करें.

यदि दफ्तर में बाबू अपनी कुरसी पर नहीं है तो व्यर्थ में शोर न करें. आप कल फिर आ जाइए. दफ्तर कल भी खुलेगा.

याद रखिए कि किसी बाबू की अनुपस्थिति में उस का काम कोई दूसरा बाबू कदापि नहीं करेगा. वह काम जानता हो, तो भी एकदूसरे की रोजीरोटी का खयाल रखना भी इन का दायित्व है. अफसर के पास जा कर यह कहने की भयावह गलती आप न करें कि बाबू अपनी जगह पर नहीं है. यदि वह कहीं गया है तो इंतजार कीजिए. हो सकता है कि उसे कोई निजी, पर जरूरी काम हो.

क्या वह अपना जरूरी काम दफ्तर के समय में नहीं निबटा सकता? आखिर सभी दफ्तर 5 बजे बंद जो हो जाते हैं, इसलिए अपना काम करवाने वह इसी बीच तो जाएगा. अब हर छोटेमोटे काम के लिए वह आकस्मिक अवकाश तो लेगा नहीं.

इसी प्रकार यदि वह दोपहर के भोजन के बाद देर से आता है या घंटों चायपान में मशगूल है तो आप को इसे सहन करना चाहिए. जीवन की हमारी सभी भागदौड़ इस पेट के लिए ही तो है. यदि वह दिन भर खाता है या चरता है तो आप को कष्ट नहीं होना चाहिए.

उस का चायपान भी आप के हित में है. वह आप का काम भी तो सुस्ती भगा कर ही करेगा. बिना पान खाए भी वह काम नहीं कर सकता. इसलिए बेहतर यही है कि आप पानदान और सिगरेट की डब्बी अपने साथ ले कर जाएं, इस में भी आप का ही भला है.

यदि वह अपने साथियों से गप भी मार रहा है तो आप चुप रहें. यदि चालू मसलों पर दफ्तर के समय में संगीसाथियों से बहस नहीं होगी तो भला कब होगी? 5 बजे के बाद तो सभी को अपनेअपने घर की ओर भागने की जल्दी होती है. यह भी स्वाभाविक है कि सवेरे दफ्तर आने में कभी उसे देर हो जाए. उस समय भी बेहतर यही होगा कि आप कहें, ‘‘क्षमा कीजिए, मैं जरा जल्दी ही आ गया था.’’

यदि वह सो रहा हो तो उसे जगाने का साहस आप न करें. चुपचाप बैठ कर उस के जागने की प्रतीक्षा करें. रात में न तो मच्छर सोने देते हैं और न बच्चे. कभी बच्चों की बीमारी नींद में बाधा डालती है तो कभी गरमी. अब आप ही बताइए कि दफ्तर के वातानुकूलित कमरे में क्या नींद नहीं आएगी?

दफ्तर में ही बाबू अपने दोस्तों, रिश्तेदारों और परिचितों से टेलीफोन द्वारा संपर्क कर पाता है. आप को यह कहने का हक नहीं है कि वह फोन पर गपशप कर रहा है. घंटों फोन करते रहना उस का अधिकार है. फोन पर कही जाने वाली उस की बातें आप को कितनी ही व्यर्थ क्यों न लगें, उस के लिए उन का महत्त्व है. इसलिए आप उसे रोकिएटोकिए नहीं.

‘गरीबी हटाओ’ नारे के संबंध में भी तो यही हुआ है. जबजब यह नारा लगाया गया है तबतब हर बार कर्णधारों और कर्मचारी वर्ग की ही गरीबी दूर हुई है. गरीबों की गरीबी हटने के अभी तक तो कोई आसार दिखाई नहीं देते. बाद की बाद में देखी जाएगी.

यों कहने को तो बहुत कुछ है पर फिर भी समझदार आदमी के लिए इतने ही गुर बहुत हैं. याद रखिए, दफ्तरों से आप का वास्ता तो रोजरोज ही पड़ेगा. यदि आप इन सिद्धांतों पर अमल करेंगे तो सरकारी दफ्तर में जा कर भी सही- सलामत लौटेंगे. हां, जेब कुछ हलकी जरूर हो जाएगी, वरना वहां आप को ऐसेऐसे कटु अनुभव होंगे कि आप सरकारी दफ्तर में जाना तो एक ओर रहा, सरकारी दफ्तर की ओर पांव कर के भी नहीं सोना चाहेंगे.

सरकारी दफ्तर एक अनिवार्य बुराई है. आप का और सरकारी दफ्तर का अस्तित्व एकदूसरे पर आधारित है. कहना चाहिए कि अन्योन्याश्रित है. आप हैं इसलिए सरकारी दफ्तर और सरकारी दफ्तरों के लोग हैं. वे लोग हैं और सरकारी दफ्तर हैं, इसीलिए तो आप हैं. यह तो चोलीदामन का साथ है.

यह संबंध एक बार स्थापित तो होना ही है. और एक बार स्थापित हो गया तो फिर अनंत काल तक यह संबंध बना ही रहता है. आप को तो इस अनचाहे रिश्ते को निभाना ही है. बेहतर है कि इसे हंस कर ही निभाएं. जब ओखली में सिर आ ही गया है तो फिर मूसल से क्या डरना.

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अपनी दफ्तर की यात्रा को आप कंटकाकीर्ण क्यों बनाते हैं? थोड़ी सी उदारता, तनिक सी कृत्रिम हंसी इसे सुखद बना देगी. अंत भला तो सब भला. जिन की कृपा से अच्छा फल मिलता हो, उन की कृपा तो आप अर्जित कर ही सकते हैं और करनी चाहिए. इस के लिए आप को तन, मन और धन से सदा तत्पर रहना चाहिए.

शिवेंद्र प्रसाद गर्ग ‘सुमन’

मेरे बेटे को ज्यादा पसंद करती हैं एकता- तुषार कपूर

फिल्म ‘मुझे कुछ कहना है’ से फिल्म इंडस्ट्री में प्रवेश करने वाले तुषार कपूर की पहली फिल्म काफी सफल रही. इसके बाद उन्होंने कई फिल्में की, जो असफल साबित हुई. करीब दो वर्षों तक उन्हें असफलता मिलती रही, लेकिन फिल्म ‘खाकी’ से उनका करियर ग्राफ फिर चढ़ा और उन्होंने कई सफल फिल्में जैसे, ‘क्या कूल है हम’, ‘गोलमाल’, ‘शूट आउट एट लोखंडवाला’ आदि की. उनका मानना है कि उन्होंने हमेशा अलग-अलग फिल्मों में अभिनय करने की कोशिश की, जिसमें कुछ सफल तो कुछ असफल रही. इस जर्नी को वे एन्जौय करते है. उन्हें अभिनय में किसी भी चुनौती से डर नहीं लगता. शांत और हंसमुख स्वभाव के तुषार कपूर सिंगल फादर भी है. उनकी वेब सीरीज ‘बू..सबकी फटेगी’ रिलीज पर है. उनसे मिलकर हुई बातचीत के कुछ अंश आपके सामने पेश हैं.

प्र. इसमें काम करने की ख़ास वजह क्या है?

वेब वर्ल्ड के लिए ये कौन्सेप्ट बहुत नया है क्योंकि आजकल वेब सीरीज में डार्क सीरिस, वायलेंस, रियलिज्म, क्राइम ,एक्शन आदि कहानियां दिखाई जा रही है. सभी लोग एक ही दिशा में कहानी बनाने की कोशिश कर रहे है. लोगों को मनोरंजन और तनाव मुक्त कहानियां देखने की इच्छा होती है और वे तो आती ही नहीं जिसे अधिक से अधिक लोग देख सकें. ऐसे में मेरे लिए ये अच्छी बात है कि मुझे कौमेडी में लोग पसंद करते है और मुझे वैसी ही कौमेडी करने का मौका मिल रहा है. उम्मीद है कि नए दर्शक इससे जुड़ सकेंगे.

प्र. वेब सीरीज में आज़ादी है, इसलिए उसका फायदा उठाकर निर्माता या निर्देशक वैसी ही सेक्स, वायलेंस, क्राइम आदि दिखाते है, क्या उन्हें इसे बनाते समय ध्यान रखने की जरुरत नहीं है? आपकी सोच क्या है?

सभी के लिए ये दायित्व है कि सेंसरशिप न होने के बावजूद वे इसका ध्यान रखें, ताकि पूरा परिवार देख सके और इसका फायदा इसे बनाने वाले सभी को होगा. क्रिएटिव फ्रीडम को किसी भी गलत तरीके से पेश करने की जरुरत नहीं. हां इतना जरुर है जहां जिसे दिखाने की जरुरत है उसे अवश्य दिखाना चाहिए नहीं तो कहानी का फ्लेवर नष्ट हो जाएगा.

प्र. फिल्म गोलमालमें कौमेडी को लोगों ने सराहा और आप खुद भी अपनी प्रतिभा को जान पाए उसका कितना फायदा अभी भी आपको मिल रहा है?

मैंने कई कौमेडी की फिल्में की और लोगों ने पसंद किया. इससे मेरा काम करना और अधिक आसान हो गया है लेकिन मैं हर तरह की फिल्मों में काम करना पसंद करता हूँ.

प्र. आपने कौमेडी को अपनाया, क्या आपको ये नहीं लगता कि आपकी पोटेंशियल का पूरा यूज़ नहीं हुआ है?

औफकोर्स नहीं हुआ है. मैंने दूसरी तरह की फिल्में भी की है लेकिन लोग उसे भूल जाते है. असल में गोलमाल की सीरीज का प्रभाव बहुत लम्बे समय तक दर्शकों पर रहा है. देखा जाए तो मैंने नौन कौमेडी फिल्में कौमेडी फिल्मों से अधिक की है.

प्र. क्या आप टाइपकास्ट के शिकार हुए?

मैं टाइपकास्ट का शिकार हुआ हूं क्योंकि जब आप किसी एक भूमिका में काम कर सफल होते हैं तो लोग आप पर पैसा लगाने से कतराते नहीं. ऐसा सभी कलाकारों के साथ होता है लेकिन अपनी संतुष्टि के लिए अलग-अलग भूमिका निभानी पड़ती हैं. ये जरुरी भी है क्योंकि लोग अलग भूमिका में देखकर अचंभित हो जाते है. कमर्शयली भी इसके फायदे होते है.

प्र. आपके पिता जितेन्द्र हिंदी सिनेमा जगत के एक सफल अभिनेता हैं, क्या आप उनकी किसी फिल्म की रीमेक में काम करना चाहते हैं?

मैं उनकी फिल्म ‘फ़र्ज़’ की अगर रिमेक बने, तो उसमें काम करना पसंद करूंगा.

प्र.आप सिंगल फादर बने हैं, फादरहुड को कैसे एन्जौय कर रहे हैं?

मैंने सही समय में ये निर्णय लिया और सिंगल पिता बना. मेरे लाइफ में एक बदलाव की जरुरत थी जिसे मैंने किया. सभी माता-पिता के लिए लाइफ पार्टनर से अधिक कीमती उसके बच्चे होते है. अगर मुझे दूसरा बच्चा भी मिलता है,फिर भी लक्ष्य मेरे लिए पूरी जिंदगी लक्ष्य ही रहेगा.

 

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Hello June!!!!!☀️

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प्र.आपके पिता के साथ जो सम्बन्ध था और आज आप भी पिता बन चुके हैं, किस तरह का रिलेशन आपका अपने बच्चे के साथ है?

आज पिता पुत्र के सम्बन्ध में काफी बदलाव आया है. पहले पिता खाने को बेटे के पास टेबल तक पहुंचाता था, पर आज के पिता उसके खान-पान से लेकर खेलकूद, कहानियां हर चीज में उसके साथ भागीदार बनते है. तब मां की जिम्मेदारी अधिक होती थी.

प्र. आपने एकता कपूर और करण जौहर से बच्चे के लिए सेरोगेसी का सहारा लिया, एडौप्शन का क्यों नहीं ? क्या एडौप्शन के कानून सख्त हैं?

एडौप्शन को सख्त बनाने का मुख्य उद्देश्य बच्चे की सुरक्षा को ध्यान में रखना है, क्योंकि कई ऐसी घटनाएं है जहां बच्चे को अडौप्ट करने के कुछ दिनों बाद गलत व्यवहार लोग करते है इसलिए ऐसा कठिन कानून है. बच्चे के साथ किसी के प्रकार का सम्बन्ध को जोड़ने के लिए उसके बायोलौजिकल माता-पिता का होना जरुरी नहीं.

प्र. लक्ष्य के लिए आपकी सोच क्या है?

मैं अपने बच्चे की प्रतिभा के आधार पर आगे बढ़ने में विश्वास रखता हूं. केवल अधिक नंबर लाना मेरे लिए जरुरी नहीं. अगर उसे अभिनय की इच्छा मन से है तो मैं उसमें भी सपोर्ट करूंगा.

 

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#threescompany #famjam #glamazonshot #ishaanandwedding

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प्र. आप बहन के तौर पर एकता कपूर में ख़ास क्या देखते हैं?

वह बहुत ही अच्छी बहन है. अभी तो वह मुझसे अधिक मेरे बेटे को पसंद करती है और उसे ही इस परिवार का पहला बच्चा मानती है. वह एक इमोशनल लड़की है. उसे मैं बहुत सराहता हूं.

प्र. कोई सोशल वर्क जिसे आप करना चाहे?

मैं जानवरों के कल्याण और क्लाइमेट चेंज के लिए काम करता हूं जिसे मैं ट्वीटर के सहारे करता हूं, जिसमें जानवरों के चमड़े से बने समान को खरीदने से मना करता हूँ. इसके अलावा साफ-सफाई पर काम करना पसंद करता हूं.

प्र. आगे कौन सी फिल्में हैं?

‘मारीच’ आगे आने वाली थ्रिलर फिल्म है. इसके अलावा फिल्म ‘लक्ष्मी बौम्ब’ के लिए मैंने प्रोडक्शन में थोडा हाथ बटाया है. ये मेरा पहला प्रोडक्शन होगा. मेरा उद्देश्य है कि मैं मनोरंजन को ध्यान में रखकर फिल्में बनाऊं जिसे अधिक से अधिक लोग देख सकें.

प्र. कोई सुपर पावर मिलने पर देश में क्या बदलना चाहते हैं?

मैं अपने देश में किसानों की दुर्गति को ख़त्म करना चाहता हूं.

एडिट बाय- निशा 

यूपी में दो बहनों ने आपस में रचाई शादी

हमारे समाज में एलजीबीटी समुदाय के लोगों को हमेशा एक अलग ही नजरिये से देखा जाता है. जैसे की वह इस समाज का हिस्सा ही नहीं हों. अधिकार की लड़ाई लड़ते लड़ते आज इनके लिए कानून तो बन गया है लेकिन कई अधिकारों से यह अभी भी वंचित है. हमारे समाज में समलैंगिक रिश्तों का मजाक बनाया जाता क्योंकि वह समाज के विरुद्ध है अलग है. इसलिए ऐसे रिश्ते समाज के सामने नहीं आते. लेकिन आपको यह जान कर हैरानी होगी वाराणसी में दो मौसेरी बहनों ने हिम्मतभरा फैसला लेते हुए अपने परिवार की मर्जी के खिलाफ एक-दूसरे के साथ शादी के बंधन में बंध गई.

शादी के लिए दोनों मंदिर पहुंचीं जहां पुजारी ने दोनों के शादी के लिए साफ मना कर दिया. लेकिन दोनों पंडित के मानने तक वहीं मंदिर में बैठ गई. दबाव के कारण पंडित को हां कहना पड़ा.

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मंदिर में रचाई शादी
मंदिर के पुजारी ने दोनों की रस्में पूरी करवाई. दोनों ने एक दूसरे को माला पहना कर जयमाला की रस्म पूरी की. इसके बाद दोनों ने एक दूसरे को मंगलसूत्र पहनाया और फिर एक दूसरे की मांग में सिंदूर लगाकर दोनों शादी के बंधन में बंध गए. शादी के बाद दोनों वहां से चले गए. लेकिन मंदिर के बाहर भीड़ लग गई. जिसके बाद वहां के लोगों ने पुजारी को सुनाना शुरू कर दिया.

कैसे बना इनके बीच संबंध
मंदिर के पुजारी ने मीडिया को बताया कि इन दोनों युवतियों में से एक कानपुर की तो दूसरी वाराणसी की रहने वाली है. कानपुर वाली युवती अपनी मौसी के यहां रहकर पढ़ाई करती थी. इसी दौरान उसका और उसकी मौसेरी बहन के बीच प्रेम संबंध बन गया और दोनों ने शादी करने का फैसला कर लिया.

सोशल मीडिया पर वायरल हुई तस्वीरें
दोनों ने जब अपनी शादी की फोटो सोशल मीडिया पर पोस्ट की तो इनकी फोटो सोशल मीडिया पर वायरल हो गई. फोटो में दोनों ने जीन्स टौप गले में फूलों की माला और सिर पर लाल चुनरी डाले हुए हैं. वाराणसी में यह पहला समलैंगिक विवाह है जिसकी तस्वीरें सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रही हैं. इस विवाह को देख कर लोग तरह तरह की बातें कर रहे हैं.

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किसी का कहना है ऐसी लड़कियां समाज में रहने लायक नहीं है. तो कोई इसे समाज के नियमों को तोड़ने कि बात कर रहा हैं. कई लोगों ने इसे बौलीवुड से भी जोड़ा है उनका कहना है बौलीवुड में ऐसी फिल्में बनाई जाती है जिस कारण बच्चें गलत दिशा कि तरफ बढ़ रहे हैं. यह आने वाली पीढ़ियों के लिए सही नहीं है. दूसरी तरफ दोनों बहनों कि यह अनोखी शादी सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बनी हुई हैं.

जानें कैसे एक्ट्रेस बनीं राजस्थान की ये डेंटिस्ट

राजस्थान के श्रीगंगानगर की रहने वाली डेंटिस्ट मोनिका रावण ने साल 2015 में अपना करियर बदलने का फैसला किया और बौलीवुड एक्ट्रैस बनने की ठानी. उनकी फिल्म वन डे जस्टिस डिलिवर रिलीज हो चुकी है. हाल ही में हमने उनसे एक खास बातचीत की है जिसमें डा. मोनिका ने दावा किया है कि वह बतौर एक्ट्रैस अपने करियर को काफी एन्जौय कर रही हैं. पेश है उनसे हुई एक्सक्लूसिव बातचीत के अंश..

अपनी अब तक की यात्रा को किस तरह से देखती हैं?
– मैं श्रीगंगानगर, राजस्थान की रहने वाली हूं. यहां पर अभी भी लोग दकियानूसी है. वहां पर पढ़ाई के अलावा कुछ और करने के बारे में सोचते ही नही हैं. वहां एक ही सोच है कि लड़का इंजीनियर बनेगा, लड़की डौक्टर बनेगी. राजस्थान में माता पिता अपने बच्चे की कुछ ज्यादा ही केयर करते हैं. इसीलिए वह अपने बच्चों से वही काम करवाना पसंद करते हैं जो उन्हे ज्यादा सुरक्षित नजर आता है. इसी के चलते मैं ने बीडीएस की डिग्री हासिल कर डेन्टिस्ट बनीं और मैंने श्री गंगानगर में अपना हौस्पिटल खोला. जबकि मैं बचपन से डांस सीखती रही हूं. डाक्टरी करते समय मुझसे लोग कहा करते थे कि मुझे फिल्मों में हीरोईन बनना चाहिए. मैंने हौस्पीटल खोलने के बाद फिर से डांस व गिटार बजाना सीखना शुरू किया. 2014 में मुझसे किसी ने कहा कि मैं एक पंजाबी फिल्म के लिए औडीशन दे दूं, तो अपने पिता को मनाकर उनके साथ औडीशन देने चली गई. अमृत पाल व कई दूसरे कलाकारों के साथ पंजाबी फिल्म ‘‘आजादी द फ्रीडम’’ की. उसके बाद मैं वापस अपने हौस्पीटल नहीं जा पाई. इस पंजाबी फिल्म को काफी पसंद किया गया. उसके बाद मैंने कई पंजाबी म्यूजिक वीडियो किए. फिर कुछ राजस्थानी फिल्म ‘‘ट्रक ड्राइवर’ की, पर राजस्थानी फिल्म अब तक रिलीज नही हो पाई. इसके बाद मैं मुंबई आ गई और 2017 में मैने हिंदी फिल्म ‘‘विराम’’ की, जिसमें उर्मिला महंता, नरेंद्र -हजया भी थे. टीसीरीज के ‘अर्जियां’ सहित कई म्यूजिक एल्बम किए. उसके बाद टीवी पर ‘बनो धीत’ का कैम्पेन किया. कैंसर अवेयरनेस कैंपेन किए. पंजाबी म्यूजिक अल्बम भी किए. अब मेरी फिल्म ‘वन डे जस्टिस डिलिवर’’ रिलीज हो रही है.

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फिल्म ‘‘वन डे जस्टिस डिलिवर’’ क्या है?
– मैं इसे क्राइम थ्रिलर फिल्म मानती हूं, जिसमें देश की कानून व्यवस्था पर कुछ सवाल उठाए गए हैं. मैंने इसमें टाइटल ट्रैक किया है. यह मेरे लिए अहम है.  मुझे अनुपम खेर व ईशा गुप्ता के साथ स्क्रीन शेअर करने का अवसर मिला.

पर इस तरह फिल्म में महज एक गाना या छोटे किरदार निभाने से करियर आगे जा
सकता है?
– मैं स्टार डौटर नहीं हूं. मैंने किसी फिल्मी परिवार में जन्म नहीं लिया है. इसलिए जो भी मौका मिले,उसे पकड़ लेना चाहिए. हर मौका ईश्वर देता है. मेरे लिए यह बड़ा मौका है. मैने पहले भी हीरोईन के तौर पर पंजाबी, राजस्थानी सिनेमा के अलावा हिंदी फिल्म ‘विराम’ कर चुकी हूं. इसके अलावा अभी भी हीरोइन यानी कि लीड एक्ट्रैस के तौर पर फिल्म कर रही हूं. मैं अपने कदम पीछे लेने में यकीन नही करती.

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स्टार डौटर न होने का खामियाजा आपको भुगतना पड़ रहा है?
– मैं किसी भी स्टार बेटी के खिलाफ नहीं हूं. मै ये नहीं कहती कि उनकी जिंदगी बहुत आसान है. बल्कि हम सभी को यहां मेहनत कर दर्शकों के बीच अपनी पहचान बनानी पड़ती है. मैं अपने करियर को एन्जौय कर रही हूं. आज भी मुझे औडीशन देने में मज़ा आता है. मुझे मुंबई की सड़कों और कौन सही व कौन गलत है, यह जानने में दो साल का वक्त लग गया.

अपने संघर्ष को लेकर क्या कहेंगी?
– मेरा यहां कोई गौड फादर नहीं है. तो मैने औडीशन देकर ही फिल्में पाईं है. मेरा तीन साल का संघर्ष बहुत आसान नहीं रहा. पर मैं लक्की रही कि मुझे सही लोग ही मिले.

इसके बाद क्या कर रही हैं?
– मैं एक सुपर नेचुरल पावर पर आधारित फिल्म कर रही हूं, पर इसका नाम व अन्य विस्तृत जानकारी फिलहाल अभी नहीं दे पाउंगी. एक मराठी फिल्म में हीरोइन बनकर आने वाली हूं.

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आप फिल्मों से जुड़ने की इच्छुक लड़कियों से क्या कहना चाहेंगी?
– मैं तो पूरे देश के हर माता पिता से कहना चाहूंगी कि वे अपने बच्चों की प्रतिभा को पहचानें और बच्चे की प्रतिभा को पहचान कर उसी दिशा में उसे आगे भेजने के लिए प्रोत्साहित करें. मुझे अपने डौक्टरी पेशे के प्रति गर्व है. मैं सम्मानित महसूस करती हूं कि मैं डेन्टिस्ट हूं, भले ही मैं अभिनय कर रही हूं मगर यदि मैंने डौक्टरी की पढ़ाई में जो समय लगाया, वह समय बौलीवुड में संघर्ष करने में बिताए होते, तो शायद आज किसी अन्य मुकाम पर होती.

शौक?
– नई-नई भाषाएं सीखना और डांस करना.

किस तरह के किरदार निभाना चाहती हैं?
– फिलहाल मैं इस मुकाम पर नही हूं कि मैं अपनी पसंद लोगों पर थोप सकूं. मेरे पास जो औफर आते हैं, उसमें से जो बेहतर होता है वे स्वीकार कर लेती हूं. मेरा मकसद अपनी हर फिल्म के माध्यम से समाज को एक अच्छा संदेश देना होता है. फिल्म ‘वन डे जस्टिस डिलिवर’ से सभी लोगों को अच्छा संदेश मिलेगा. मुझे गंदा संदेश देने वाले या एडल्ट वेब सीरीज नहीं करनी है.

एक रात की उजास

शाम ढलने लगी थी. पार्क में बैठे वयोवृद्घ उठने लगे थे. मालतीजी भी उठीं. थके कदमों से यह सोच कर उन्होंने घर की राह पकड़ी कि और देर हो गई तो आंखों का मोतियाबिंद रास्ता पहचानने में रुकावट बन जाएगा. बहू अंजलि से इसी बात पर बहस हुआ करती थी कि शाम को कहां चली जाती हैं. आंखों से ठीक से दिखता नहीं, कहीं किसी रोज वाहन से टकरा गईं तो न जाने क्या होगा. तब बेटा भी बहू के सुर में अपना सुर मिला देता था.

उस समय तो फिर भी इतना सूनापन नहीं था. बेटा अभीअभी नौकरी से रिटायर हुआ था. तीनों मिल कर ताश की बाजी जमा लेते. कभीकभी बहू ऊनसलाई ले कर दोपहर में उन के साथ बरामदे मेें बैठ जाती और उन से पूछ कर डिजाइन के नमूने उतारती. स्वेटर बुनने में उन्हें महारत हासिल थी. आंखों की रोशनी कम होने के बाद भी वह सीधाउलटा बुन लेती थीं. धीरेधीरे चलते हुए एकाएक वह अतीत में खो गईं.

पोते की बिटिया का जन्म हुआ था. उसी के लिए स्वेटर, टोपे, मोजे बुने जा रहे थे. इंग्लैंड में रह रहे पोते के पास 1 माह बाद बेटेबहू को जाना था. घर में उमंग का वातावरण था. अंजलि बेटे की पसंद की चीजें चुनचुन कर सूटकेस में रख रही थी. उस की अंगरेज पत्नी के लिए भी उस ने कुछ संकोच से एक बनारसी साड़ी रख ली थी. पोते ने अंगरेज लड़की से शादी की थी. अत: मालती उसे अभी तक माफ नहीं कर पाई थीं. इस शादी पर नीहार व अंजलि ने भी नाराजगी जाहिर की थी पर बेटे के आग्रह और पोती होने की खुशी का इजहार करने से वे अपने को रोक नहीं पाए थे और इंग्लैंड जाने का कार्यक्रम बना लिया था.

उस दिन नीहार और अंजलि पोती के लिए कुछ खरीदारी करने कार से जा रहे थे. उन्होंने मांजी को भी साथ चलने का आग्रह किया था लेकिन हरारत होने से उन्होंने जाने से मना कर दिया था. कुछ ही देर बाद लौटी उन दोनों की निष्प्राण देह देख कर उन्हें अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हुआ था. उस से अधिक आश्चर्य उन्हें इस बात पर होता है कि इस भयंकर हादसे के 7 साल बाद भी वह जीवित हैं.

उस हादसे के बाद पोते ने उन्हें अपने साथ इंग्लैंड चलने का आग्रह किया था पर उन्होंने यह सोच कर मना कर दिया कि पता नहीं अंगरेज पतोहू के साथ उन की निभ भी पाएगी कि नहीं. लेकिन आज लगता है वह किसी भी प्राणी के साथ निबाह कर लेंगी. कोई तो होता, उन्हें आदर न सही, उलाहने ही देने वाला. आज इतना घोर एकांत तो नहीं सहना पड़ता उन्हें. पोते के बच्चे भी अब लगभग 6-7 साल के होंगे. अब तो संपर्क भी टूट गया. अचानक जा कर कैसे लाड़प्यार लुटाएंगी वह. उन बच्चों को भी कितना अस्वाभाविक लगेगा यह सब. इतने सालों की दूरियां पाटना क्या कोई आसान काम है. उस समय गलत फैसला लिया सो लिया. मालतीजी पश्चात्ताप की माला फेरने लगीं. उस समय ही क्यों, जब नीहार और अंजलि खरीदारी के लिए जा रहे थे तब वह भी उन के साथ निकल जातीं तो आज यह एकाकी जिंदगी का बोझ अपने झुके हुए, दुर्बल कंधों पर उठाए न घूम रही होतीं.

अतीत की उन घटनाओं को बारबार याद कर के पछताने की आदत ने मालतीजी को घोर निराशावादी बना डाला था. शायद यही वजह थी जो चिड़चिड़ी बुढि़या के नाम से वह महल्ले में मशहूर थीं. अपने ही खोल में आवृत्त रह कर दिन भर वह पुरानी बातें याद किया करतीं. शाम को उन्हें घर के अंदर घुटन महसूस होती तो पार्क में आ कर बैठ जातीं. वहां की हलचल, हंसतेखेलते बच्चे, उन्हें भावविभोर हो कर देखती माताएं और अपने हमउम्र लोगों को देख कर उन के मन में अगले नीरस दिन को काटने की ऊर्जा उत्पन्न होती. यही लालसा उन्हें देर तक पार्क में बैठाए रखती थी.

आज पार्क में बैठेबैठे उन के मन में अजीब सा खयाल आया. मौत आगे बढ़े तो बढ़े, वह क्या उसे खींच कर पास नहीं बुला सकतीं, नींद की गोलियां उदरस्थ कर के.

इतना आसान उपाय उन्हें अब तक भला क्यों नहीं सूझा? उन के पास बहुत सी नींद की गोलियां इकट्ठी हो गई थीं.

नींद की गोलियां एकत्र करने का उन का जुनून किसी जमाने में बरतन जमा करने जैसा था. उन के पति उन्हें टोका भी करते, ‘मालती, पुराने कपड़ों से बरतन खरीदने की बजाय उन्हें गरीबों, जरूरतमंदों को दान करो, पुण्य जोड़ो.’

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वह फिर पछताने लगीं. अपनी लंबी आयु का संबंध कपड़े दे कर बरतन खरीदने से जोड़ती रहीं. आज वे सारे बरतन उन्हें मुंह चिढ़ा रहे थे. उन्हीं 4-6 बरतनों में खाना बनता. खुद को कोसना, पछताना और अकेले रह जाने का संबंध अतीत की अच्छीबुरी बातों से जोड़ना, इसी विचारक्रम में सारा दिन बीत जाता. ऐसे ही सोचतेसोचते दिमाग इतना पीछे चला जाता कि वर्तमान से वह बिलकुल कट ही जातीं. लेकिन आज वह अपने इस अस्तित्व को समाप्त कर देना चाहती हैं. ताज्जुब है. यह उपाय उन्हें इतने सालों की पीड़ा झेलने के बाद सूझा.

पार्क से लौटते समय रास्ते में रेल लाइन पड़ती है. ट्रेन की चीख सुन कर इस उम्र मेें भी वह डर जाती हैं. ट्रेन अभी काफी दूर थी फिर भी उन्होंने कुछ देर रुक कर लाइन पार करना ही ठीक समझा. दाईं ओर देखा तो कुछ दूरी पर एक लड़का पटरी पर सिर झुकाए बैठा था. वह धीरेधीरे चल कर उस तक पहुंचीं. लड़का उन के आने से बिलकुल बेखबर था. ट्रेन की आवाज निकट आती जा रही थी पर वह लड़का वहां पत्थर बना बैठा था. उन्होंने उस के खतरनाक इरादे को भांप लिया और फिर पता नहीं उन में इतनी ताकत कहां से आ गई कि एक झटके में ही उस लड़के को पीछे खींच लिया. ट्रेन धड़धड़ाती हुई निकल गई.

‘‘क्यों मरना चाहते हो, बेटा? जानते नहीं, कुदरत कोमल कोंपलों को खिलने के लिए विकसित करती है.’’

‘‘आप से मतलब?’’ तीखे स्वर में वह लड़का बोल पड़ा और अपने दोनों हाथों से मुंह ढक फूटफूट कर रोने लगा.

मालतीजी उस की पीठ को, उस के बालों को सहलाती रहीं, ‘‘तुम अभी बहुत छोटे हो. तुम्हें इस बात का अनुभव नहीं है कि इस से कैसी दर्दनाक मौत होती है.’’ मालतीजी की सर्द आवाज में आसन्न मृत्यु की सिहरन थी.

‘‘बिना खुद मरे किसी को यह अनुभव हो भी नहीं सकता.’’

लड़के का यह अवज्ञापूर्ण स्वर सुन कर मालतीजी समझाने की मुद्रा में बोलीं, ‘‘बेटा, तुम ठीक कहते हो लेकिन हमारा घर रेलवे लाइन के पास होने से मैं ने यहां कई मौतें देखी हैं. उन के शरीर की जो दुर्दशा होती है, देखते नहीं बनती.’’

लड़का कुछ सोचने लगा फिर धीमी आवाज में बोला,‘‘मैं मरने से नहीं डरता.’’

‘‘यह बताने की तुम्हें जरूरत नहीं है…लेकिन मेरे  बच्चे, इस में इस बात की भी कोई गारंटी नहीं है कि पूरी तरह मौत हो ही जाए. हाथपैर भी कट सकते हैं. पूरी जिंदगी अपाहिजों की तरह गुजारनी पड़ सकती है. बोलो, है मंजूर?’’

लड़के ने इनकार में गरदन हिला दी.

‘‘मेरे पास दूसरा तरीका है,’’ मालतीजी बोलीं, ‘‘उस से नींद में ही मौत आ जाएगी. तुम मेरे साथ मेरे घर चलो. आराम से अपनी समस्या बताओ फिर दोनों एकसाथ ही नींद की गोलियां खाएंगे. मेरा भी मरने का इरादा है.’’

लड़का पहले तो उन्हें हैरान नजरों से देखता रहा फिर अचानक बोला, ‘‘ठीक है, चलिए.’’

अंधेरा गहरा गया था. अब उन्हें बिलकुल धुंधला दिखाई दे रहा था. लड़के ने उन का हाथ पकड़ लिया. वह रास्ता बताती चलती रहीं.

उन्हें नीहार के हाथ का स्पर्श याद आया. उस समय वह जवान थीं और छोटा सा नीहार उन की उंगली थामे इधरउधर कूदताफांदता चलता था.

फिर उन का पोता अंकुर अपनी दादी को बड़ी सावधानी से उंगली पकड़ कर बाजार ले जाता था.

आज इस किशोर के साथ जाते समय वह वाकई असहाय हैं. यह न होता तो शायद गिर ही पड़तीं. वह तो उन्हेें बड़ी सावधानी से पत्थरों, गड्ढों और वाहनों से बचाता हुआ ले जा रहा था. उस ने मालतीजी के हाथ से चाबी ले कर ताला खोला और अंदर जा कर बत्ती जलाई तब उन की जान में जान आई.

‘‘खाना तो खाओगे न?’’

‘‘जी, भूख तो बड़ी जोर की लगी है. क्योंकि आज परीक्षाफल निकलते ही घर में बहुत मार पड़ी. खाना भी नहीं दिया मम्मी ने.’’

‘‘आज तो 10वीं बोर्ड का परीक्षाफल निकला है.’’

‘‘जी, मेरे नंबर द्वितीय श्रेणी के हैं. पापा जानते हैं कि मैं पढ़ने में औसत हूं फिर भी मुझ से डाक्टर बनने की उम्मीद करते हैं और जब भी रिजल्ट आता है धुन कर रख देते हैं. फिर मुझ पर हुए खर्च की फेहरिस्त सुनाने लगते हैं. स्कूल का खर्च, ट्यूशन का खर्च, यहां तक कि खाने का खर्च भी गिनवाते हैं. कहते हैं, मेरे जैसा मूर्ख उन के खानदान में आज तक पैदा नहीं हुआ. सो, मैं इस खानदान से अपना नामोनिशान मिटा देना चाहता हूं.’’

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किशोर की आंखों से विद्रोह की चिंगारियां फूट रही थीं.

‘‘ठीक है, अब शांत हो जाओ,’’ मालती सांत्वना देते बोलीं, ‘‘कुछ ही देर बाद तुम्हारे सारे दुख दूर हो जाएंगे.’’

‘…और मेरे भी,’ उन्होंने मन ही मन जोड़ा और रसोईघर में चली आईं. परिश्रम से लौकी के कोफ्ते बनाए. थोड़ा दही रखा था उस में बूंदी डाल कर स्वादिष्ठ रायता तैयार किया. फिर गरमगरम परांठे सेंक कर उसे खिलाने लगीं.

‘‘दादीजी, आप के हाथों में गजब का स्वाद है,’’ वह खुश हो कर किलक रहा था. कुछ देर पहले का आक्रोश अब गायब था.

उसे खिला कर खुद खाने बैठीं तो लगा जैसे बरसों बाद अन्नपूर्णा फिर उन के हाथों में अवतरित हो गई थीं. लंबे अरसे बाद इतना स्वादिष्ठ खाना बनाया था. आज रात को कोफ्तेपरांठे उन्होेंने निर्भय हो कर खा लिए. न बदहजमी का डर न ब्लडप्रेशर की चिंता. आत्महत्या के खयाल ने ही उन्हें निश्चिंत कर   दिया था.

खाना खाने के बाद मालती बैठक का दरवाजा बंद करने गईं तो देखा वह किशोर आराम से गहरी नींद में सो रहा था. उन के मन में एक अजीब सा खयाल आया कि सालों से तो वह अकेली जी रही हैं. चलो, मरने के लिए तो किसी का साथ मिला.

मालती उस किशोर को जगाने को हुईं लेकिन नींद में उस का चेहरा इस कदर लुभावना और मासूम लग रहा था कि उसे जगाना उन्हें नींद की गोलियां खिलाने से भी बड़ा क्रूर काम लगा. उस के दोनों पैर फैले हुए थे. बंद आंखें शायद कोई मीठा सा सपना देख रही थीं क्योंकि होंठों के कोनों पर स्मितरेखा उभर आई थी. किशोर पर उन की ममता उमड़ी. उन्होंने उसे चादर ओढ़ा दी.

‘चलो, अकेले ही नींद की गोलियां खा ली जाएं,’ उन्होंने सोचा और फिर अपने स्वार्थी मन को फटकारा कि तू तो मर जाएगी और सजा भुगतेगा यह निरपराध बच्चा. इस से तो अच्छा है वह 1 दिन और रुक जाए और वह आत्महत्या की योजना स्थगित कर लेट गईं.

उस किशोर की तरह वह खुशकिस्मत तो थी नहीं कि लेटते ही नींद आ जाती. दृश्य जागती आंखों में किसी दुखांत फिल्म की तरह जीवन के कई टुकड़ोंटुकड़ों में चल रहे थे कि तभी उन्हें हलका कंपन महसूस हुआ. खिड़की, दरवाजों की आवाज से उन्हें तुरंत समझ में आया कि यह भूकंप का झटका है.

‘‘उठो, उठो…भूकंप आया है,’’ उन्होंने किशोर को झकझोर कर हिलाया. और दोनों हाथ पकड़ कर तेज गति से बाहर भागीं.

उन के जागते रहने के कारण उन्हें झटके का आभास हो गया. झटका लगभग 30 सेकंड का था लेकिन बहुत तेज नहीं था फिर भी लोग चीखते- चिल्लाते बाहर निकल आए थे. कुछ सेकंड बाद  सबकुछ सामान्य था लेकिन दिल की धड़कन अभी भी कनपटियों पर चोट कर रही थी.

जब भूकंप के इस धक्के से वह उबरीं तो अपनी जिजीविषा पर उन्हें अचंभा हुआ. वह तो सोच रही थीं कि उन्हें जीवन से कतई मोह नहीं बचा लेकिन जिस तेजी से वह भागी थीं, वह इस बात को झुठला रही थी. 82 साल की उम्र में निपट अकेली हो कर भी जब वह जीवन का मोह नहीं त्याग सकतीं तो यह किशोर? इस ने अभी देखा ही क्या है, इस की जिंदगी में तो भूकंप का भी यह पहला ही झटका है. उफ, यह क्या करने जा रही थीं वह. किस हक से उस मासूम किशोर को वे मृत्युदान करने जा रही थीं. क्या उम्र और अकेलेपन ने उन की दिमागी हालत को पागलपन की कगार पर ला कर खड़ा कर दिया है?

मालतीजी ने मिचमिची आंखों से किशोर की ओर देखा, वह उन से लिपट गया.

‘‘दादी, मैं अपने घर जाना चाहता हूं, मैं मरना नहीं चाहता…’’ आवाज कांप रही थी.

वह उस के सिर पर प्यार भरी थपकियां दे रही थीं. लोग अब साहस कर के अपनेअपने घरों में जा रहे थे. वह भी उस किशोर को संभाले भीतर आ गईं.

‘‘तुम्हारा नाम क्या है?’’

‘‘उदय जयराज.’’

अभी थोड़ी देर पहले तक उन्हें इस परिचय की जरूरत महसूस नहीं हुई थी. मृत्यु की इच्छा ने अनेक प्रश्नों पर परदा डाल दिया था, पर जिंदगी के सामने तो समस्याएं भी होती हैं और समाधान भी.

ऐसा ही समाधान मालतीजी को भी सूझ गया. उन्होंने उदय को आदेश दिया कि अपने मम्मीपापा को फोन करो और अपने सकुशल होने की सूचना दो.

उदय भय से कांप रहा था, ‘‘नहीं, वे लोग मुझे मारेंगे, सूचना आप दीजिए.’’

उन्होेंने उस से पूछ कर नंबर मिलाया. सुबह के 4 बज रहे थे. आधे घंटे बाद उन के घर के सामने एक कार रुकी. उदय के मम्मीपापा और उस का छोटा भाई बदहवास से भीतर आए. यह जान कर कि वह रेललाइन पर आत्महत्या करने चला था, उन की आंखें फटी की फटी रह गईं. रात तक उन्होेंने उस का इंतजार किया था फिर पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराई थी.

उदय को बचाने के लिए उन्होेंने मालतीजी को शतश: धन्यवाद दिया. मां के आंसू तो रुकने का नाम ही नहीं ले रहे थे.

‘‘आप दोनों से मैं एक बात कहना चाहती हूं,’’ मालतीजी ने भावनाओं का सैलाब कुछ थमने के बाद कहा, ‘‘देखिए, हर बच्चे की अपनी बौद्घिक क्षमता होती है. उस से ज्यादा उम्मीद करना ठीक नहीं होता. उस की बुद्घि की दिशा पहचानिए और उसी दिशा में प्रयत्न कीजिए. ऐसा नहीं कि सिर्फ डाक्टर या इंजीनियर बन कर ही इनसान को मंजिल मिलती है. भविष्य का आसमान हर बढ़ते पौधे के लिए खुला है. जरूरत है सिर्फ अच्छी तरह सींचने की.’’

अश्रुपूर्ण आंखों से उस परिवार ने एकएक कर के उन के पैर छू कर उन से विदा ली.

उस पूरी घटना पर वह पुन: विचार करने लगीं तो उन का दिल धक् से रह गया. जब उदय अपने घर वालों को बताएगा कि वह उसे नींद की गोलियां खिलाने वाली थीं, तो क्या गुजरेगी उन पर.

अब तो वह शरम से गड़ गईं. उस मासूम बचपन के साथ वह कितना बड़ा क्रूर मजाक करने जा रही थीं. ऐन वक्त पर उस की बेखबर नींद ने ही उन्हें इस भयंकर पाप से बचा लिया था.

अंतहीन विचारशृंखला चल पड़ी तो वह फोन की घंटी बजने पर ही टूटी. उस ओर उदय की मम्मी थीं. अब क्या होगा. उन के आरोपों का वह क्या कह कर खंडन करेंगी.

‘‘नमस्ते, मांजी,’’ उस तरफ चहकती हुई आवाज थी, ‘‘उदय के लौट आने की खुशी में हम ने कल शाम को एक पार्टी रखी है. आप की वजह से उदय का दूसरा जन्म हुआ है इसलिए आप की गोद में उसे बिठा कर केक काटा जाएगा. आप के आशीर्वाद से वह अपनी जिंदगी नए सिरे से शुरू करेगा. आप के अनुभवों को बांटने के लिए हमारे इष्टमित्र भी लालायित हैं. उदय के पापा आप को लेने के लिए आएंगे. कल शाम 6 बजे तैयार रहिएगा.’’

‘‘लेकिन मैं…’’ उन का गला रुंध गया.

‘‘प्लीज, इनकार मत कीजिएगा. आप को एक और बात के लिए भी धन्यवाद देना है. उदय ने बताया कि आप उसे नींद की गोलियां खिलाने के बहाने अपने घर ले गईं. इस मनोवैज्ञानिक तरीके से समझाने के कारण ही वह आप के साथ आप के घर गया. समय गुजरने के साथ धीरेधीरे उस का उन्माद भी उतर गया. हमारा सौभाग्य कि वह जिद्दी लड़का आप के हाथ पड़ा. यह सिर्फ आप जैसी अनुभवी महिला के ही बस की बात थी. आप के इस एहसान का प्रतिदान हम किसी तरह नहीं दे सकते. बस, इतना ही कह सकते हैं कि अब से आप हमारे परिवार का अभिन्न अंग हैं.’’

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उन्हें लगा कि बस, इस से आगे वह नहीं सुन पाएंगी. आंखों में चुभन होने लगी. फिर उन्होंने अपनेआप को समझाया. चाहे उन के मन में कुविचार ही था पर किसी दुर्भावना से प्रेरित तो नहीं था. आखिरकार परिणाम तो सुखद ही रहा न. अब वे पापपुण्य के चक्कर में पड़ कर इस परिवार में विष नहीं घोलेंगी.

इस नए सकारात्मक विचार पर उन्हें बेहद आश्चर्य हुआ. कहां गए वे पश्चात्ताप के स्वर, हर पल स्वयं को कोसते रहना, बीती बातों के सिर्फ बुरे पहलुओं को याद करना.

उदय का ही नहीं जैसे उन का भी पुनर्जन्म हुआ था. रात को उन्होंने खाना खाया. पीने के पानी के बरतन उत्साह से साफ किए. हां, कल सुबह उन्हेें इन की जरूरत पड़ेगी. टीवी चालू किया. पुरानी फिल्मों के गीत चल रहे थे, जो उन्हें भीतर तक गुदगुदा रहे थे. बिस्तर साफ किया. टेबल पर नींद की गोलियां रखी हुई थीं. उन्होंने अत्यंत घृणा से उन गोलियों को देखा और उठा कर कूड़े की टोकरी में फेंक दिया. अब उन्हें इस की जरूरत नहीं थी. उन्हें विश्वास था कि अब उन्हें दुस्वप्नरहित अच्छी नींद आएगी.

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