रेटिंगः डेढ़ स्टार

निर्माताः प्रमोद गोरे, मनन संपत, रवींद्र ठाकुर

निर्देशकः विशाल मिश्रा

कलाकार: तारा अलीशा बेरी, राजेश शर्मा, कुणाल रौय कपूर और अन्य

सिनेमा धीरे-धीरे महानगरी से हटकर छोटे शहरों की तरफ बढ़ रहा है. इसी के मद्देनजर फिल्मकार विशाल मिश्रा ने अपनी फिल्म ‘मरूधर एक्सप्रेस’ की कहानी को नवाबी शहर लखनऊ की लड़की और औद्योगिक शहर कानपुर के लड़के बीच केंद्रित की है. फिल्मकार ने इन दोनो शहरों से लोगों को जोड़ने के लिए ‘मरूधर एक्सप्रेस’ ट्रेन के अलावा इन शहरों की जीवनशैली को भी पेश किया है, मगर वह एक अच्छी फिल्म बनाने में कामयाब न हो सके.

कहानीः

फिल्म की कहानी के केंद्र में उत्तर प्रदेश के कानपुर शहर निवासी मरूधर पांडे (कुणाल रौय कपूर) और लखनउ निवासी चित्रा त्रिपाठी (तारा अलीषा बेरी) के इर्द गिर्द घूमती है. बिजली विभाग में कार्यरत मरूधर एक उदास व हीनग्रंथि का शिकार सुस्त स्वभाव का लड़का है. जबकि चित्रा त्रिपाठी अपना ब्यूटी पार्लर खोलने का सपना देख रही हैं.

मरूधर के बेरंग जीवन को लेकर उसके रंगीन मिजाज और जिंदादिल पिता (राजेश शर्मा) को हमेशा चिंता सताती रहती है कि बिना किसी महत्वाकांक्षा और ख्वाहिश के उनका बेटा अपनी जिंदगी को किस तरह आगे बढ़ाएगा. इसी के चलते मरूधर के पिता उसे हर दिन डांटने के साथ ही अजीबो-गरीब तरकीबें बताते रहते हैं. मरूधर के पिता चाहते है कि वह जल्द से जल्द कोई लड़की पसंद कर शादी कर ले पर मरूधर चिकने घड़े की तरह है, उस पर उसके पिता की बातों का कोई असर नही होता. अचानक एक दिन मरूधर के पिता ऐलान कर देते हैं कि उसे लखनऊ लड़की देखने जाना है और वह उसे ना नहीं कहेगा. लखनऊ में खूबसूरत और बेबाक लड़की चित्रा त्रिपाठी को देखते ही मरूधर उसके साथ शादी के लिए हामी भर देते हैं. उधर मरूधर की सिधाई और मासूमियत से प्रभावित होकर चित्रा भी हामी भर देती है. मरूधर व चित्रा की शादी भी हो जाती है.

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शादी करके घर पहुंचते ही मरूधर के पिता उसके सामने एक अन्य शर्त रखते हुए कहते हैं कि मरूधर हर हाल में उन्हें एक साल के अंदर दादा बनाए. उधर मरूधर और चित्रा आपस में प्यार की तलाश के साथ सेक्सुअल परफौर्मेंस की चुनौतियों का सामना करते हैं. मरूघर के पिता उसे एक सप्ताह के लिए हनीमून मनाने नैनीताल भेजते हैं. नैनीताल के जिस होटल में दोनों रूकते हैं उसके मालिक के संग चित्रा कालेज दिनो में डेटिंग कर चुकी हैं पर होटल का यह मालिक ‘गे’ है. किंतु मरूधर व चित्रा के बीच गलत फहमी पैदा हो जाती है और सप्ताह की बजाय तीन दिन में ही दोनो नैनीताल से वापस आ जाते है. पर मरूधर कानपुर और चित्रा लखनऊ अपने घर चली जाती है.

उसके बाद कई घटनाक्रम तेजी से बदलते हैं. अंततः मरूधर व चित्रा एक हो जाते हैं. मरूधर चित्रा को ब्यूटी पार्लर भी खोल कर देता है.

लेखन व निर्देशनः

पटकथा लेखन,चरित्र चित्रण के साथ ही चरित्रों के अनुरूप कलाकारों के चयन में फिल्मकार विशाल मिश्रा बुरी तरह से चूक गए हैं. कहानी में दोहराव है. कहानी में बेवजह और बहुत ही बेतरतीब तरीके से ‘गे’ का मुद्दा जोड़ा गया है. फिल्म में रोमांस तो है ही नहीं.

अभिनयः

जहां तक अभिनय का सवाल है, तो मरूधर पांडे के किरदार में कुणाल रौय कपूर पूरी तरह से ‘मिसफिट’ हैं. कुणाल रौय कपूर कहीं से भी प्रभावित नहीं करते हैं. चित्रा त्रिपाठी के किरदार में आत्मविश्वास से लबालब तारा अलीशा बेरी ने बेहतरीन अभिनय किया है. राजेश शर्मा ओवर एक्टिंग करते नजर आते हैं.

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