उपहार

लेखक- आभा सिंह

शीली के लिए विभव से मिलना अचानक ही था. हां, वह जरूर उस के आने की राह तकता पार्क के किनारे खड़ा इंतजार कर रहा था. भूल गए अतीत को इस तरह इंतजार करता देख शीली को कितनी तकलीफ हुई थी.

स्कूटर रोक लेने का इशारा करता विभव उस के नजदीक ही चला आया. लुटेपिटे व्यक्तित्व और खंडित मनोशक्ति वाला विभव दीनहीन याचक बना खड़ा था. उस ने इस पुरुष से तो प्रेम नहीं किया था. विभव के कहे कुछ शब्दों को सुन कर ही उसे मचली आने लगी. नजरें नीची कर स्कूटर स्टार्ट कर वह चुपचाप घर चली आई. विभव पुकारता ही रह गया…

घर पहुंच कर शीली को लगा कि अब खुल कर सांस आई है. मुंहहाथ धो कर ताजादम हुई.

चाय का घूंट भरते ही दिन भर की थकान पल भर में गायब हो गई. थोड़ा सहज होते ही फिर उस के मन में उलझाने वाले सवाल उठने लगे कि विभव अब क्यों आया? क्यों पहले की तरह वह पार्क के किनारे खड़ा उस का इंतजार कर रहा था. क्या वह उसे अपने से कमतर आंक रहा था? उस ने क्या सोचा कि वह 8 वर्ष के अतीत को भूल कर उसे फिर अपना लेगी… दोस्ती कर लेगी…पर क्यों? माना कि तब मेरे मन के सारे कोमल भाव उसी के इर्दगिर्द उमड़घुमड़ कर स्नेह की वर्षा करते थे तो क्या अब भी विभव उसे उसी मोड़ पर खड़े देखना चाहता है जहां उसे छोड़ गया था… कैसा दोटूक जवाब दिया था जब शीली ने स्नेह में भर, उस से विवाह का प्रस्ताव रखा था. एक लिजलिजा सा कारण दे कर सारे संबंध तोड़ गया था.

‘तुम से शादी कैसे कर लूं, शीली… तुम तो मेरी प्रेरणा हो, मेरा स्नेह हो, मेरे जीवन का संबल हो. क्या घरेलू औरत बन कर खो नहीं जाओगी? सच शीली, मैं तो कल्पना भी नहीं कर सकता कि जब मैं आफिस से थकाहारा लौटूं तो तुम मसालों से गंधाती और बच्चों की चिल्लपों से घिरी दिखाई दो. छि:…शीली, यह काम तो कोई साधारण औरत ही कर देगी, इसी से तो नंदी से विवाह कर रहा हूं…तुम तो बस, मेरी प्रेरणा बनी रहो.’

शीली अवाक् विभव का मुंह ताकती रह गई, क्योंकि वह तो यही जानती थी कि वर्षों से चले आ रहे स्नेहबंधन की परिणति विवाह ही होती है. खुद के गढ़े गए तर्कों में छिपी विभव की सोच उसे घृणित लगी. विवाह एक से और स्नेह दूसरी से…ऐसा संबंध समाज की किस परिभाषा के अंतर्गत आता है. प्रेमिका…रखैल…

ये शब्द शीली के दिमाग में आते ही उस का पूरा बदन सिहर गया, रोएं खड़े हो गए.

उस दिन के बाद कितनी ही बार उस ने विभव को वहीं पार्क के किनारे खड़ा देखा. हर बार उस के मुंह से अनायास ही दगाबाज या धोखेबाज शब्द निकलता और वह स्कूटर मोड़ कर दूसरे रास्ते से चली जाती.

एक बार शीली ने विभव से दूर रहने का फैसला किया तो स्नेह के झूठे बिरवे को नोंचनोंच कर फेंक दिया. चूंकि मातापिता बेटी की दशा से परिचित थे इसलिए उन्होंने शीली को उच्च शिक्षा के लिए दिल्ली भेज दिया. दिल्ली में शीली की मौसी का घर था और उस की हमउम्र मौसेरी बहन भी थी. शीली के लिए अब दिन बिताना सहज होने लगा. मौसाजी ने एम.एससी. में शीली का एडमिशन करा दिया. विषय की गंभीरता और कैरियर बनाने की चाह ने शीली के अतीत पर पानी सा डाल दिया. कठिन मेहनत और लगन से उस का व्यक्तित्व बदलने लगा. अब वह अदम्य साहस और कर्मठता जैसे गुणों से लबरेज हो गई थी.

शीली की मेहनत ने परिणाम भी बहुत अच्छा दिया. एम.एससी. में फर्स्ट डिवीजन पा कर वह खुद भी चकित थी. मौसेरी बहन ने सुझाया कि पीएच.डी. भी कर लो. मातापिता से पूछने पर उन्होंने भी सहमति दे दी.

प्रो. प्रशांत के निर्देशन में शीली को पीएच.डी. करने की इजाजत मिल गई. शीली के अंदर कुछ करने की ललक से प्रो. प्रशांत बहुत प्रभावित थे. उन्होंने बहुत धीरज से शीली को काम का विषय समझाया. यही नहीं अपनी गाइडेंस में प्रशांत जैसाजैसा बताते गए शीली एक आज्ञाकारी बच्चे की तरह वैसावैसा करती गई. इस तरह 4 साल की लंबी और कठिन मेहनत से शीली की पीएच.डी. पूरी हो गई.

प्रो. प्रशांत खुश थे. कहां मिलते थे ऐसे छात्र. अधिकतर तो घोड़े पर सवार… खुद से कुछ करते न बनता. न ही करने की इच्छा रखते…बस, हर समय यही चाहत कि सारी विषयवस्तु तैयार मिल जाए और वे अपने नाम के साथ इस उपाधि को जोड़ते. कुछ तो इतना करना भी गवारा न करते, 4 साल यों ही गुजार देते और पीएच.डी. को अधूरा छोड़ देते.

शोध शिक्षकों के बारे में शीली ने भी बहुत कुछ सुन रखा था लेकिन प्रो. प्रशांत ऐसे न थे. 4 सालों में शीली ने कुछ कहने भर को भी हलकापन नहीं पाया उन के व्यक्तित्व में. साथी छात्र भी खुशमिजाज और सहयोग करने में कभी पीछे न रहने वाले थे.

शोध पूरा होने के बाद शीली अपने मातापिता के पास लौट आई और काम की तलाश करने लगी. उसे इस बात की खुशी है कि उस ने अपनी मेहनत के बल पर इस संस्थान में नौकरी पाई है. इस संस्थान में काम करने का मन उस ने इसीलिए बनाया कि यहां तनख्वाह ठीक थी और काम की शर्तें भी अनुकूल थीं.

शीली ने धीरेधीरे संस्थान के वातावरण में खुद को ढालना शुरू किया. वैसे कितनी ही बार स्त्री होने के नाते उस के काम करने की क्षमता पर उंगली उठाई गई जो उसे पसंद न आई थी फिर भी यहां का अपना काम उसे पसंद आ रहा था.

बीतते समय के साथ शीली के व्यक्तित्व से निरीहता गायब हो गई और आत्मविश्वास से भरी कर्मठता ने उसे ऊंचा, और ऊंचा उठने के हौसले दिए. तीखी धार सा निखरता उस का व्यक्तित्व आसपास की परिस्थितियों को छीलता और अपने लिए जगह बना लेता. वह संस्थान के सम्माननीय पद पर काम कर रही थी.

शीली को लगा कि आज विभव का मिलना उस के शांत जीवन में पत्थर मारने जैसा है. उसे फिर से विभव की बातें याद आने लगीं. कैसे बिना उस की इच्छा जाने वह कहे जा रहा था:

‘कितनी गलती पर था मैं? अपनी मूर्खता से तुम्हारा अपना दोनों का सर्वनाश कर दिया…नंदी को क्या कहूं…जेवर, कपड़ा, ईर्ष्या और अपशब्दों का पर्याय है वह. मन इन्हीं उलझावों में भटक कर रह गया है. तुम…तुम मेरी प्रेरणा बनी रहो, मैं बाकी जीवन जी लूंगा.’

हर बार विभव ने अपने ही जीने की रट लगाई है. उस के बारे में तो कभी सोचा ही नहीं. आखिर वह कैसे जी रही है? नहीं…नहीं, अब नहीं याद करना…न विभव को न उस की बातों को. उस की बातों में अब भी वही पुरानी कुटिल मानसिकता छिपी पड़ी है. उस ने जीवन में पहले एक प्रयोग किया और वह असफल रहा और अब इतने लंबे अरसे बाद एक और प्रयोग…नारी को क्या बेजान गुडि़या मान लिया जो ललक कर उस के नजदीक रहना चाहेगी. कापुरुष… नंदिनी से शादी इसलिए की, क्योंकि वह उस की तुलना में अमीर थी और अब फिर वैसे ही ओछे प्रयास…क्योंकि अब वह नंदिनी की तुलना में अधिक पढ़ीलिखी, अधिक दक्ष और अधिक कमाती है…उसे पहले भी जीवनसाथी नहीं चाहिए था और न ही अब…

शीली ने आज की घटना की उधेड़बुन से थके दिमाग को आंखें बंद कर दिलासा दी और करवट बदल कर सोने का यत्न करने लगी और कब उसे नींद आ गई पता ही न चला.

अगले दिन संस्थान जाते समय शीली सोच रही थी कि आज फिर विभव पार्क के किनारे खड़ा मिलेगा. उसे कुछ न कुछ उपाय जरूर सोच लेना है. यह रुटीन यों ही नहीं चल सकता. विभव का भरोसा नहीं, चोट खाया वह कहीं छिछोरेपन पर उतर आया तो? कुछ तो सोचना और करना ही होगा कि विभव वापस अपनी दुनिया में लौट जाए और वह चैन से जी सके.

काफी सोचविचार के बाद एक आइडिया उस के दिमाग में आया. वह लंच के समय सीट से उठी और बाजार चली गई. क्राफ्ट बनाने के सामान वाली दुकान पर दुकानदार को बहुत कुछ समझा कर अपना आर्डर दिया और वापस आ गई. शाम को घर लौटते समय अपना आर्डर लिया, उसे आकर्षक पैकिंग से पैक कराया और घर की तरफ चल दी.

शीली का अनुमान बिलकुल सही निकला. उस ने दूर से ही पार्क के किनारे खड़े विभव को देख लिया. एक घृणा की लहर उठी और उस के पूरे शरीर में फैल गई. अपने पर काबू कर उस ने अपना स्कूटर विभव के सामने रोका. उसे देख कर विभव की आंखों में चमक आ गई. शीली ने मन ही मन विभव को कोसा फिर झुक कर स्कूटर की डिक्की से पैकेट उठाया और विभव को थमा दिया.

‘‘यह क्या है?’’ कामयाबी की मुसकान के साथ विभव ने पूछा.

‘‘तुम्हारे और मेरे संबंधों को एक नाम,’’ शीली का उत्तर भावहीन था.

विभव ने खुशीखुशी पैकेट को खोला तो देखता ही रह गया. कांपते हाथों से बाहर निकाला तो वह तिनकों से बना छोटा सा ‘बिजूका’ था. सिर पर नन्ही सी रंगबिरंगी हांडी धरे, रंगीन परिधान पहने, लाललाल होंठों से हंसता…कालीकाली आंखें चमकाता…

विभव के चेहरे पर प्रश्नचिह्न का भाव उभरा तो वह तटस्थ हो गई. उस के चेहरे पर कोई भाव न था, न गम न खुशी.

‘‘विभव, यह बिजूका है, तिनकों से बना, मिट्टी का सिर, रंगीन कपड़ों से सजा…यह उस इनसान का प्रतीक है जो लालच में सबकुछ पा लेने की लालसा में सबकुछ गंवा देता है. भावनाओं की सचाई से अछूता…दिखावे की रंगीनी ओढ़े. अब क्या बचा है इस के जीवन में… जीवन भर मरुस्थल में खड़े रहने की सजा…निपट सूनेपन में अपने अरमानों के पक्षियों को इधरउधर बच कर भागते हुए देखते रहने के सिवा…’’

विभव ने धीरे से बिजूका पैकेट में रख दिया. पता नहीं वह उस में छिपे संदेश को कितना समझ पाया…न समझे, पर शीली के प्रशस्त मार्ग पर कांटा बन कर चुभे तो नहीं…

शीली कुछ न कह कर मुड़ गई. स्कूटर स्टार्ट किया और घर की ओर चल दी. उसे उम्मीद थी कि अब विभव पार्क के किनारे खड़ा कभी नहीं मिलेगा.

बीमारी की बिसात

लेखक- मीरा जैन

पिछले एक सप्ताह से इस लाइन का मनन बेहद सत्यनिष्ठा के साथ कर रहा हूं, ठीक उसी तरह जैसे भक्त भगवान का करते हैं. इस लाइन को भूलना भी चाहूं तो बेचारे बिस्तर को 24 घंटे कष्ट दे रही हमारी श्रीमतीजी की गुब्बारे सी काया हमें भूलने नहीं देती है. इस लाइन को अभी से भूल गया तो आने वाले 3 सप्ताह का सामना कैसे करूंगा, क्योंकि डाक्टर ने कम से कम 4 सप्ताह तक उन्हें पूर्ण आराम की सलाह दी है और उन की संपूर्ण देखरेख की हिदायत मुझे दी है.

आप यह मत सोचिए कि उन्हें कोई गंभीर, खानपान से परहेज वाली बीमारी है. ऐसा बिलकुल नहीं है. उन्हें तो बस, काम से मुक्त आराम करने वाला प्रसाद के रूप में एक अचूक झुनझुना मिल गया है जिस का नाम है ‘स्लिप डिस्क.’

इस की प्राप्ति भी उन्हें कोई गृह कार्यों के बोझ तले दब कर नहीं हुई बल्कि अपनी ढोल सी काया को कमसिन बनाने के लिए की जा रही जीतोड़ उलटीसीधी एक्सरसाइज के कारण हुई है. वैसे तो इस प्रसाद को उन के साथसाथ मैं भी चख रहा हूं. लेकिन दोनों के स्वाद में जमीनआसमान का अंतर है. जहां श्रीमतीजी के सुखों का कारवां फैल कर दोगुना हो गया है वहीं हमारे घरेलू अधिकारों की अर्थी उठने के साथसाथ कर्तव्यों की फसलें सावन में हरियाली की तरह लहलहा रही हैं.

श्रीमतीजी अपनी रेपुटेशन एवं खुशनुमा दिनचर्या के लिए जिन्हें आधार मानती हैं वे मेरे लिए कर्तव्यों की फसल में खरपतवार के समान हैं. यानी उन का हालचाल पूछने व इधरउधर की सनसनीखेज खबरें बताने के लिए दिन भर थोक में आने वाली और श्रीमतीजी पर हम से कई गुना ज्यादा प्रेम बरसा कर हमदर्दी जताने वाली कोई और नहीं उन की प्रिय सहेलियां हैं.

बेमौसम सहेलियों की बाढ़ से घर की अर्थव्यवस्था निरंतर क्षतिग्रस्त होती जा रही है. मेरी समस्या असार्वजनिक होने के कारण दूरदूर तक मुआवजे की भी कोई उम्मीद नहीं है. कपप्लेट, गिलास और ट्रे के साथ मैं भी फुटबाल की तरह दिन भर इधर से उधर टप्पे खाता फिर रहा हूं.

फुटबाल के खेल में दोनों पक्ष गुत्थमगुत्था मेहनत करते हैं तब कहीं जा कर एक पक्ष को जीत नसीब होती है लेकिन यहां तो अंधेर नगरी चौपट राजा है, कमरतोड़ मेहनत भी हम करें और हारें भी हम ही. उधर हमारी श्रीमतीजी की पौबारह है. पांचों उंगली घी में और सिर कड़ाही में है. काम से परहेज किंतु कांवकांव से कोई परहेज नहीं.

अकेले में हलके से हिलना भी हो तो हमारी हाजरी लिफाफे पर टिकट की तरह बेहद जरूरी है. वहीं 4-6 ने आ कर जैसे ही बाहरी दुनिया का बखान शुरू किया नहीं कि यहांवहां की स्वादिष्ठ बातों का श्रवण कर बातबात पर स्ंिप्रग की भांति उन का उछलना तथा आहें भरभर कर प्रतिक्रिया जाहिर करते हुए कभी खिसियाना या कभी खीसें निपोरना देखने लायक होता है.

‘‘कल किटी पार्टी में किस ने किस की आरती उतारी, किस ने अध्यक्षा को अपने कोमल हाथों से चरण पादुकाएं पहनाईं, किस ने किस को मक्खन लगाया, पकवानों में कौनकौन से दुर्गुण थे, चाय के नाम पर गरम पानी पिलाया आदि.’’

यह देख हमारे आश्चर्य का ठिकाना न रहता कि एक से बढ़ कर एक जहर से लिपटे शब्दबाण हमारी श्रीमतीजी को घायल करने के बजाय इतना स्फूर्तिदायक बना देते जैसे वह अमृत का प्याला हों. वाह रे खुदा, तेरी खुदाई देख कर लगता है कि इन महिलाओं के लिए निंदा रस से बढ़ कर और कोई मिठाई नहीं है. इन की महफिल से जो परिचिता गायब है, समझ लो वही इन सब के हृदय में निंदा रस प्रज्वलित करने का माध्यम है और इस निंदा रस में डुबकी लगा कर उन सभी के चेहरे एकदम तरोताजा गुलाब की तरह खिल जाते हैं.

निंदा रस के टौनिक से फलती- फूलती इन महिलाओं को लगता है आज किसी की नजर लग गई क्योंकि कमरे के अंदर से आते हुए सभी का सुर अचानक एकदम बदल गया है. ऐसा लग रहा था मानो हमारे बेडरूम में विधानसभा या संसद सत्र चल रहा हो.

हम ने भीगी बिल्ली की तरह चुपके से अंदर झांका तो सभी की भवें अर्जुन के धनुष सी तनी हुई थीं. माथे पर पसीने की बूंदें रेंगती हुई, जबान कौवे की सी कर्कश, चेहरा तपते सूरज सा गरम और हाथ अपनी स्वामिनी के पक्ष में कला- बाजियां खाते इधरउधर डोल रहे थे.

सभी नारियों के तीनइंची होंठ एकसाथ हिलने के कारण अपने कानों व दिमाग की पूर्ण सक्रियता के बावजूद यह समझ नहीं पाए कि इस विस्फोटक नजारे के पीछे किस माचिस की तीली का हाथ है. वह तो भला हो गरमी की छुट्टियों का जिस की वजह से फिलहाल अड़ोसपड़ोस के मकान खालीपन का दुख झेल रहे हैं.

कोई घंटे भर की चांवचांव के बाद लालपीली, शृंगारिकाएं एकएक कर बाहर का रास्ता नापने लगीं. जब श्रीमतीजी इकलौती बचीं तब हम ने उन से व्यंग्यात्मक लहजे में पूछा, ‘‘आज क्या सामूहिक रूप से तबीयत गरम होने का दिन था?’’

‘‘यह सब तुम्हारी वजह से हुआ है.’’

‘‘क्या?’’ हमारा मुंह खुला का खुला रह गया.

‘‘और नहीं तो क्या…तुम आ कर इतना भी नहीं बता सकते थे कि मधु मेरी तबीयत देखने के बहाने अंदर आ रही है. हम उसी की बात कर रहे थे और वह कमरे के बाहर कान लगा कर खड़ी हो गई. फिर क्या, ये सब तो होना ही था. अब कोईर् नहीं आएगा मेरा हालचाल पूछने, पड़ी रहूंगी अकेली दिन भर टूटे हुए पत्ते की तरह.’’

इतना कहतेकहते नयनों से झरना फूट पड़ा. ऊपरी मन से हम भी श्रीमतीजी के असह्य दुख में शामिल हो उन्हें सांत्वना देने लगे.

‘‘कोई नहीं आता है तो न आए, मैं तो हूं, सात जन्मों तक तुम्हारी सेवा करने के लिए. मेरे रहते क्यों इतनी दुखी होती हो, प्रिय.’’

लेकिन हमारी इस सांत्वना से बेअसर श्रीमतीजी का बोझिल मन उन के आंसुओं में लगातार इजाफा कर रहा था. हम ने श्रीमतीजी को वहीं, उसी हाल में छोड़ कर पुरानी पेटी से चवन्नी ढूंढ़ घर के देवता को सवा रुपया चढ़ा, उन की चरण वंदना करते हुए कहा, ‘‘हे कुल के देवता, तुझे लाखलाख प्रणाम, जो तुम ने मेरे घर को सहेलियों की बाढ़ से समय पर बचा लिया. अगर इस बाढ़ पर अब शीघ्र अंकुश नहीं लगता तो अनर्थ हो जाता. श्रीमतीजी तो थोड़ी देर में रोधो कर चुप हो जाएंगी लेकिन मैं जितने दिनों दुकान के कर्ज को भरता, रोता ही रहता.’’

कोई नहीं

लेखक- मधुप चौधरी

दूसरी ओर से दिनेश की घबराहट भरी आवाज आई, ‘‘पापा, आप लोग जल्द चले आइए. बबिता ने शरीर पर मिट्टी का तेल उडे़ल कर आग लगा ली है.’’

‘‘क्या?’’ रामगोपाल को काठ मार गया. शंका और अविश्वास से वह चीख पडे़, ‘‘वह ठीक तो है?’’ और इसी के साथ उन की आंखों के सामने वे घटनाएं उभरने लगीं जिन की वजह से आज यह स्थिति बनी है.

रामगोपाल ने अपनी बेटी बबिता का विवाह 6 साल पहले अपने ही शहर में एक मध्यमवर्गीय परिवार में किया था. उन के समधी गिरधारी लाल भी व्यवसायी थे और मुख्य बाजार में उन की कपडे़ की दुकान थी, जिस पर वह और उन का छोटा बेटा राजेश बैठते थे.

बड़ा बेटा दिनेश एक फर्म में चार्टर्ड एकाउंटेंट था और अच्छी तनख्वाह पाता था. रामगोपाल की बेटी, बबिता भी कामर्स से गे्रजुएट थी अत: दोनों परिवारों में देखसुन कर शादी हुई थी.

रामगोपाल ने अपनी बेटी बबिता का धूमधाम से विवाह किया. 2 बेटों के बीच वही एकमात्र बेटी थी इसलिए अपनी सामर्थ्य से बढ़ कर दानदहेज भी दिया जबकि समधी गिरधारी लाल की कोई मांग नहीं थी. दिनेश की सिर्फ एक मांग फोरव्हीलर की थी, सो रामगोपाल ने उन की वह मांग भी पूरी कर दी थी.

शादी के कुछ दिनों बाद ही ससुराल में बबिता के आचरण और व्यवहार पर आपत्तियां उठनी शुरू हो गईं. इसे ले कर दोनों परिवारों में तनाव बढ़ने लगा. गिरधारी लाल के परिवार में बबिता समेत कुल 5 लोग थे. गिरधारी लाल, उन की पत्नी सुलोचना, दिनेश और राजेश तथा नई बहू बबिता.

सुलोचना पारंपरिक संस्कारयुक्त और धार्मिक प्रवृत्ति की महिला थीं. वह सुबह उठतीं, स्नान करतीं और घरेलू कामों में जुट जातीं. वह चाहती थीं कि उन की बहू भी उन्हीं संस्कारों को ग्रहण करे पर बबिता के लिए यह कठिन ही नहीं, दुष्कर काम था. वास्तविकता यह थी कि वह ऐसे संस्कारों को पोंगापंथी और ढोंग समझती थी और इस के खिलाफ थी.

बबिता आधुनिक विचारों की थी तथा स्वाधीन रहना चाहती थी. रात में देर तक टेलीविजन के कार्यक्रम देखती, तो सुबह साढे़ 9 बजे से पहले उठ नहीं पाती. और जब तक वह उठती थी गिरधारी लाल और राजेश नाश्ता कर के दुकान पर जा चुके होते थे. दिनेश भी या तो आफिस जाने के लिए तैयार हो रहा होता या जा चुका होता.

सास सुलोचना को अपनी बहू के इस आचरण से बहुत तकलीफ होती. शुरू में तो उन्होंने बहू को घर के रीतिरिवाजों को अपनाने के लिए बहुत समझाया, पर बाद में उस की हठवादिता देख कर उस से बोलना ही छोड़ दिया. इस तरह एक घर में रहते हुए भी सासबहू के बीच बोलचाल बंद हो गई.

घर में काम के लिए नौकर थे, खाना नौकरानी बनाती थी. वही जूठे बरतनों को मांजती थी और कपडे़ भी धो देती. बबिता के लिए टेलीविजन देखने और समय बिताने के सिवा कोई दूसरा काम नहीं था. उस की सास सुलोचना कुछ न कुछ करती ही रहती थीं. कोई काम नहीं होने पर पुस्तकें ले कर पढ़ने बैठ जातीं. वह इस स्थिति की अभ्यस्त थीं पर बबिता को यह भार लगने लगा. एक दिन हालात से ऊब कर बबिता अपने मायके फोन मिला कर अपनी मम्मी से बोली, ‘मम्मी, आप ने कहां, कैसे घर में मेरा विवाह कर दिया? यह घर है या जेलखाना? मर्द तो काम पर चले जाते हैं, यहां दिन भर बुढि़या गिद्ध जैसी आंखें गड़ाए मेरी पहरेदारी करती रहती है. न कोई बोलने के लिए है न कुछ करने के लिए. ऐसे में तो मेरा दम घुट जाएगा, मैं खुदकुशी कर लूंगी.’

‘अरे नहीं, ऐसी बातें नहीं बोलते बेटी,’ उस तरफ से बबिता की मम्मी लक्ष्मी ने कहा, ‘यदि तुम्हारी सास तुम से बातें नहीं करती हैं तो अपने पति के आफिस जाने के बाद तुम यहां चली आया करो. दिन भर रह कर शाम को पति के लौटने के समय वापस चली जाना. ससुराल से मायका कौन सा दूर है. बस या टैक्सी से चली आओ. वे लोग कुछ कहेंगे तो हम उन्हें समझा लेंगे.’

यह सुनते ही बबिता की बाछें खिल गईं. उस ने झटपट कपडे़ बदले, पर्स लिया और अपनी सास से कहा, ‘मम्मी का फोन आया था, मैं मायके जा रही हूं. शाम को आ जाऊंगी,’ और सास के कुछ कहने का भी इंतजार नहीं किया, कदम बढ़ाती वह घर से निकल पड़ी.

इस के बाद तो यह उस की रोज की दिनचर्या हो गई. शुरू में दिनेश ने यह सोच कर इस की अनदेखी की कि घर में अकेली बोर होने से बेहतर है वह अपनी मां के घर घूम आया करे पर बाद में मां और पिताजी की टोकाटाकी से उसे भी कोफ्त होने लगी.

एक दिन बबिता ने उसे बताया कि वह गाड़ी चलाना सीखने के लिए ड्राइविंग स्कूल में एडमिशन ले कर आ रही है. उस ने दिनेश को एडमिशन का फार्म भी दिखाया. हुआ यह कि बबिता के बडे़ भाई नंद कुमार ने उस से कहा कि रोजरोज बस या टैक्सी से आनाजाना न कर के वह अपनी कार से आए और इस के लिए ड्राइविंग सीख ले. आखिर पापा ने दहेज में कार किसलिए दी है.

बबिता को यह बात जंच गई. पर दिनेश इस पर आगबबूला हो गया. अपनी नाराजगी और गुस्से को वह रोक भी नहीं पाया और बोल पड़ा, ‘तुम्हारे पापा ने कार मुझे दी है.’

‘हां, पर वह मेरी कार है, मेरे लिए पापा ने दी है.’

दिनेश बबिता का जवाब सुन कर दंग रह गया. उस ने अपने गुस्से पर काबू करते हुए विवाद को तूल न देने के लिए समझौते का रुख अपनाते हुए कहा, ‘ठीक है पर ड्राइविंग सीखने की क्या जरूरत है. गाड़ी पर ड्राइवर तो है?’

‘मुझे किसी ड्राइवर की जरूरत नहीं. मैं खुद चलाना सीखूंगी और मुझे कोई भी रोक नहीं सकेगा. मैं तुम्हारी खरीदी हुई गुलाम नहीं हूं.’

दिनेश ने इस के बाद एक शब्द भी नहीं कहा. बबिता को कुछ कहने के बजाय उस ने अपने पिता को ये बातें बता दीं. गिरधारी लाल ने तुरंत रामगोपाल को फोन मिलाया और उस से बबिता के व्यवहार की शिकायत की तो उधर से उन की समधिन लक्ष्मी का जवाब आया, ‘भाईसाहब, आप के लड़के से बेटी ब्याही है, कोई बेच नहीं दिया है जो उस पर हजार पाबंदियां लगा रखी हैं आप ने. यह मत करो, वह मत करो, पापामम्मी से बातें मत करो, उन के घर मत जाओ, क्या है यह सब? हम ने तो अपने ही शहर में इसीलिए बेटी की शादी की थी कि वह हमारे पास आतीजाती रहेगी, हमारी नजरों के सामने रहेगी.’

‘पर समधिनजी,’ फोन पर गिरधारी लाल ने जोर दे कर अपनी बात कही, ‘यदि आप की बेटी बराबर आप के घर का ही रुख किए रहेगी तो वह अपना घर कब पहचानेगी? संसार का तो यही नियम है कि बेटी जब तक कुंआरी है अपने बाप की, विवाह के बाद वह ससुराल की हो जाती है.’

‘यह पुरानी पोंगापंथी बातें हैं. मैं इसे नहीं मानती. रही बात बबिता की तो वह जब चाहेगी यहां आ सकती है और वह गाड़ी चलाना सीखना चाहती है तो जरूर सीखे. इस से तो आप लोगों के परिवार को ही फायदा होगा.’

गिरधारी लाल ने इस के बाद फोन रख दिया. उन के चेहरे पर चिंता की गहरी रेखा खिंच आई थीं. परिवार वाले चिंतित थे कि इस स्थिति का परिणाम क्या होगा?

दिनेश ने भी इस घटना के बाद चुप्पी साध ली थी. सास सुलोचना ने सब से पहले बहू से बोलना बंद किया था, उस के बाद गिरधारी लाल भी बबिता से सामना होने से बचने का प्रयत्न करते. राजेश को भाभी से बातें करने की जरूरत ही नहीं पड़ती थी. उस की जरूरतें मां, नौकर और नौकरानी से पूरी हो जाती थीं.

दिनेश और बबिता के बीच सिर्फ कभीकभार औपचारिक शब्दों का संबंध रह गया था. आफिस से छुट्टी के बाद वह ज्यादा समय बाहर ही गुजारता, देर रात में घर लौटता और खाना खा कर सो जाता.

इस बीच बबिता ने गाड़ी चलाना सीख लिया था. वह सुबह ही गाड़ी ले कर मायके चली जाती और रात में देर से लौटती. कभी उस का फोन आता, ‘आज मैं आ नहीं सकूंगी.’ बाद में इस तरह का फोन आना भी बंद हो गया.

कानूनी और सामाजिक तौर पर बबिता गिरधारी लाल के परिवार की सदस्य होने के बावजूद जैसे उस परिवार की ‘कोई नहीं’ रह गई थी. यह एहसास अंदर ही अंदर गिरधारी लाल और उन की पत्नी सुलोचना को खाए जा रहा था कि उन के बेटे का दांपत्य जीवन बबिता के निरंकुश एवं दायित्वहीन आचरण तथा उस के ससुराल वालों की हठवादिता से नष्ट हो रहा है.

आखिर एक दिन दिनेश ने दृढ़ स्वर में बबिता से कहा, ‘हम दोनों विपरीत दिशाओं में चल रहे हैं. इस से बेहतर है तलाक ले कर अलग हो जाएं.’

दिनेश को तलाक लेने की सलाह उस के पिता गिरधारी लाल ने दी थी. वह अपने बेटे के बिखरते वैवाहिक जीवन से दुखी थे. उन्होंने यह सलाह भी दी थी कि यदि बबिता उस के साथ अलग रह कर अपनी अलग गृहस्थी में सुखी रह सकती है तो वह ऐसा ही करे. पर दिनेश को यह प्रस्ताव स्वीकार नहीं था कि वह अपने मातापिता को छोड़ कर अलग हो जाए.

दिनेश के मुंह से तलाक की बात सुन कर बबिता सन्न रह गई. उसे जैसे इस प्रकार के किसी प्रस्ताव की अपेक्षा नहीं थी. इस में उसे अपना घोर अपमान महसूस हुआ.

मायके आ कर बबिता ने अपने मम्मीपापा और भाइयों को दिनेश का प्रस्ताव सुनाया तो सभी भड़क उठे. रामगोपाल को जहां इस चिंता ने घेर लिया कि इतना अच्छा घरवर देख कर और काफी दानदहेज दे कर बेटी की शादी की, वहां इतनी जल्दी तलाक की नौबत आ गई. समाज और बिरादरी में उन की क्या इज्जत रहेगी? पर लक्ष्मी काफी उत्तेजित थीं. वह चीखचीख कर बारबार एक ही वाक्य बोल रही थीं, ‘उन की ऐसी हिम्मत…उन्हें इस का मजा चखा कर रहूंगी.’

उधर बबिता के भाइयों नंद कुमार और नवल कुमार तथा उन की पत्नियों को दूसरी चिंता ने घेर लिया कि बबिता यदि उन के घर में आ कर रहने लगी तो भविष्य में वह पापामम्मी की संपत्ति में दावेदार हो जाएगी और उसे उस का हिस्सा भी देना पडे़गा. इसलिए दोनों भाइयों ने आपस में सुलह कर बबिता से कहा कि दिनेश ने तलाक की बात कही है तो तुम उसे तलाक के लिए आवेदन करने दो. अपनी तरफ से बिलकुल आवेदन मत करना.

‘भैया, मेरा भी उस घर में दम घुट रहा है,’ बबिता बोली, ‘मैं खुद तलाक लेना चाहती हूं और अपनी मरजी का जीवन जीना चाहती हूं. इस अपमान के बाद तो मैं हरगिज वहां नहीं रह सकती.’

नंद कुमार ने कठोर स्वर में कहा, ‘ऐसी गलती कभी मत करना. तुम खुद तलाक लेने जाओगी तो ससुराल से कुछ भी नहीं मिलेगा. दिनेश तलाक लेना चाहेगा तो उसे तुम्हें गुजाराभत्ता देना पडे़गा.’

‘गुजाराभत्ता की मुझे जरूरत नहीं,’ बबिता बोली, ‘मैं पढ़ीलिखी हूं, कोई नौकरी ढूंढ़ लूंगी और अपना खर्च चला लूंगी पर दोबारा उस घर में वापस नहीं जाऊंगी.’

‘नहीं, अभी तुम्हें वहीं जाना होगा और वहीं रहना भी होगा,’ इस बार नवल कुमार ने कहा.

बबिता ने आश्चर्य से छोटे भाई की ओर देखा. फिर बारीबारी से मम्मीपापा व भाभियों की ओर देख कर अपने स्वर में दृढ़ता लाते हुए वह बोली, ‘दिनेश ने तलाक की बात कह कर मेरा अपमान किया है. इस अपमान के बाद मैं उस घर में किसी कीमत पर वापस नहीं जाऊंगी.’

समझाने के अंदाज में पर कठोर स्वर में नंद कुमार ने कहा, ‘तुम अभी वहीं उसी घर में रहोगी, जब तक  कि तुम्हारे तलाक का फैसला नहीं हो जाता. तुम डरती क्यों हो? सभी तुम्हारे साथ हैं. शादी के बाद से कानूनन वही तुम्हारा घर है. देखता हूं, तुम्हें वहां से कौन निकालता है.’

बडे़ भैया की बातों में छिपी धमकी से आहत बबिता ने अपनी मम्मी की ओर इस उम्मीद से देखा कि वही उस की मदद करें. मम्मी ने बेटी की आंखों में व्याप्त करुणा और दया की याचना को महसूस करते हुए नंद कुमार से कहा, ‘बबिता यहीं रहे तो क्या हर्ज है?’

‘हर्ज है,’ इस बार दोनों भाइयों के साथ उन की पत्नियां भी बोलीं, ‘ब्याही हुई बेटी का घर ससुराल होता है, मायका नहीं. बबिता को अपने पति या ससुराल वालों से कोई हक हासिल करना है तो वहीं रह कर यह काम करे. मायके में रह कर हम लोगों की मुसीबत न बने.’

मां ने सिर नीचे कर लिया तो बबिता ने अपने पापा की ओर देखा. बेटी को अपनी ओर प्रश्नवाचक निगाहों से देख कर उन्हें मुंह खोलना ही पड़ा. उन्होेंने कहा, ‘तुम्हारे भाई लोग ठीक ही कह रहे हैं बबिता. बेटी का विवाह करने के बाद पिता समझता है कि उस ने एक बड़ी जिम्मेदारी से मुक्ति पा ली. पर इस के बाद भी उसे बेटी की चिंता ढोनी पडे़ तो उस के लिए इस से बड़ी दूसरी पीड़ा नहीं हो सकती.’

बबिता पढ़ीलिखी थी. उस में स्वाभिमान था तो अहंकार भी था. उस ने अपने भाइयों और मम्मीपापा की बातों का अर्थ समझ लिया था. इस के पश्चात उस ने किसी से कुछ नहीं कहा. वह उठी और चली गई. उस को जाते हुए किसी ने नहीं रोका.

अचानक फोन की घंटी फिर बजने लगी तो रामगोपालजी चौंके और लपक कर फोन उठा लिया.

दिनेश की घबराहट भरी आवाज थी, ‘‘पापा, आप लोग जल्दी आ जाइए न. बबिता ने अपने शरीर पर मिट्टी का तेल उड़ेल कर आग लगा ली है.’’

रामगोपाल का सिर घूमने लगा. फिर भी उन्होंने फोन पर पूछा, ‘‘कैसे हुआ यह सब? अभी तो कुछ समय पहले ही वह यहां से गई है.’’

‘‘मुझे नहीं मालूम,’’ दिनेश की आवाज आई, ‘‘वह हमेशा की तरह आप के घर से लौट कर अपने कमरे में चली गई थी और उस ने भीतर से दरवाजा बंद कर लिया था. अंदर से धुआं निकलता देख कर हमें संदेह हुआ. दरवाजा तोड़ कर हम अंदर घुसे तो देखा, वह जल रही थी. क्या वहां कुछ हुआ था?’’

इस सवाल का जवाब न दे कर रामगोपाल ने सिर्फ इतना कहा, ‘‘हम लोग तुरंत आ रहे हैं.’’

लक्ष्मी ने बिस्तर पर लेटेलेटे ही पूछा, ‘‘किस का फोन था?’’

‘‘दिनेश का,’’ रामगोपाल ने घबराहट भरे स्वर में कहा, ‘‘बबिता ने आग लगा ली है.’’

इतना सुनते ही लक्ष्मी की चीख निकल गई. मम्मी की चीख सुन कर नंद कुमार और नवल कुमार भी वहां पहुंच गए.

नंद कुमार ने पूछा, ‘‘क्या हुआ है?’’

रामगोपाल ने जवाब दिया, ‘‘बबिता ने यहां से लौटने के बाद शरीर पर मिट्टी का तेल उड़ेल कर आग लगा ली है, दिनेश का फोन आया था,’’ इतना कह कर रामगोपाल सिर थाम कर बैठ गए, फिर बेटों की तरफ देख कर बोले, ‘‘ससुराल से अपमानित बेटी ने मायके में रहने की इजाजत मांगी थी. तुम लोगों ने अपने स्वार्थ के लिए उसे यहां रहने नहीं दिया. यहां से भी अपमानित होने के बाद उस ने आत्महत्या कर ली.’’

‘‘चुप कीजिए,’’ बडे़ बेटे नंद कुमार ने जोर से अपने पिता को डांटा, ‘‘आप ऐसा बोल कर खुद भी फंसेंगे और साथ में हम सब को भी फंसा देंगे. बबिता ने खुदकुशी नहीं की है, उसे मार डाला गया है. बबिता के ससुराल वालों ने दहेज के खातिर मिट्टी का तेल उडे़ल कर उसे जला डाला है.’’

रामगोपाल ने आशा की डोर पर झूलते हुए कहा, ‘‘चलो, पहले देख लें, शायद बबिता जीवित हो.’’

‘‘पहले आप थाने चलिए,’’ नंद कुमार ने फैसले के स्वर मेंकहा, ‘‘और तुम भी चलो, मम्मी.’’

रामगोपाल का परिवार जिस समय गिरधारी लाल के मकान के सामने पहुंचा, वहां एक एंबुलेंस और पुलिस की एक गाड़ी खड़ी थी. मकान के सामने लोगों की भीड़ जमा थी. जली हुई बबिता को स्ट्रेचर पर डाल कर बाहर निकाला जा रहा था. गाड़ी रोक कर रामगोपाल, लक्ष्मी, नंद कुमार तथा नवल कुमार नीचे उतरे. सफेद कपडे़ में ढंकी बबिता के चेहरे की एक झलक देखने के लिए रामगोपाल लपके पर नंद कुमार ने उन्हें रोक लिया.

थोड़ी देर बाद ही पुलिस के 4 सिपाही और एक दारोगा गिरधारी लाल, दिनेश, सुलोचना और राजेश को ले कर बाहर निकले. उन चारों के हाथों में हथकडि़यां पड़ी हुई थीं. दिनेश, बबिता को बचाने की कोशिश में थोड़ा जल गया था. रामगोपाल की नजर दामाद पर पड़ी तो जाने क्यों उन की नजर नीची हो गई.

शादी के 8 साल बाद पापा बना ये एक्टर, खुशी से चूम लिए बेटी के पैर

टीवी के पौपुलर एक्टर जय भानुशाली और एक्ट्रेस माही विज शादी के 8 साल बाद पैरेंट्स बन गए हैं. दोनों के घर एक नन्ही परी आई हैं. जय ने खुद इस खुशखबरी को इंस्टाग्राम के जरिए दी है. जय ने फोटो शेयर करते हुए लिखा, बेबी गर्ल आ गई है…थैंक्यू प्रिंसेस हमें अपने मम्मी-पापा चुनने के लिए.

माही का इमोशनल मैसेज…

वहीं माही ने जय भानुशाली की बेटी के पैर को चूमते हुए तस्वीर शेयर करते हुए लिखा, “Twinkle twinkle little star, we made a wish and here you are. तुमने हमें पूरा कर द‍िया शुक्र‍िया भगवान हर खुशी के लिए. मेरी जिंदगी बदल गई है”

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8 साल पहले हुई थी शादी…

जय और माही की शादी 2011 में हुई थी. दोनों पहले से ही दो बच्चों के पैरेंट्स हैं. जय और माही ने एक बेटा और बेटी को गोद लिया हुआ है. दोनों बच्चे अपने सगे माता-पिता के साथ रहते हैं, लेकिन उनकी पढ़ाई और बाकी जरूरतों का खर्च जय और माही उठाते हैं.

 

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Happy rakshabandhan @iamkhushiray @rajveercutestar @ijaybhanushali @manojray303 #siblings #love #babies #pure

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फैंस और दोस्त दे रहे हैं बधाई…

जय और माही के इस अनाउंसमेंट के बाद बधाइयों का तांता लग गया है. फैन्स और सेलेब्स सभी उन्हें बधाई दे रहे हैं.

दोनों की प्रोफेशनल लाइफ की बात करें माही ने सीरियल ‘लागी तुझसे लगन’ में नजर आई थीं. इस शो से वो काफी पौपुलर हो गई थीं. वहीं जय ‘सबसे बड़ा कलाकार’ में नजर आए थे. इसके बाद दोनों रिएलिटी शो ‘नच बलिए’ में भी नजर आ चुके हैं. इन द‍िनों जय ‘सुपर स्टार सिंगर’ शो को होस्ट कर रहे हैं.

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एडिट बाय- निशा राय

ब्लैक ड्रेस में पोल डांस कर छाई ये टीवी एक्ट्रेस, VIDEO हुआ वायरल

छोटे पर्दे की पौपुलर एक्ट्रेस आशका गोराडिया इन दिनों अपने लेटेस्ट फोटोशूट को लेकर काफी चर्चा में हैं. आशका ने कई सीरियल्स में काम किया है जिसे औडियंस ने काफी पसंद भी किया है जैसे कि, ‘लागी तुझसे लगन’, ‘सात फेरे’, ‘बालवीर’, ‘नागिन’, ‘नागिन 2’ आदि. आशका गोराडिया ‘बिग बौस’ सीजन 6, ‘खतरों के खिलाडी’ सीजन 4, ‘नच बलिए’, जैसे रिएलिटी शो करती भी नजर आईं. आशका एक्टर और मौडल होने के साथ-साथ एक बेहतरीन पोल डांसर भी हैं.

ब्लैक ड्रेस में आशका का पोल डांस…

हाल ही में आशका ने अपना एक लेटेस्ट फोटोशूट फैंस के साथ शेयर किया है और फैंस ने हर बार की तरह आशका के इस फोटोशूट को भी बेहद पसंद किया है. आशका गोराडिया अपने इस लेटेस्ट फोटोशूट में पोल डांस करती नज़र आ रही हैं. वे इस फोटोशूट में ब्लैक आउट-फिट पहने दिखाई दे रही हैं और काफी खूबसूरत भी लग रही हैं. आशका के फैंस ने उनके इस फोटोशूट को जमकर प्यार दिया है और बेहद अच्छे-अच्छे कमेंटस कर उनकी काफी तारीफ की है.

 

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Only Light 🌼

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वायरल हुआ वीडियो…

आशका गोराडिया ने इस फोटोशूट के साथ अपने फैंस के लिए एक वीडियो भी शेयर है जिसमें वे पोल डांस करती नज़र आ रही हैं. आशका ने अपने इस हौट अंदाज से सबका दिल जीत लिया और उनके इस फोटोशूट को देख ये कहना बिल्कुल गलत नहीं होगा कि उन्हे अपने फैंस को खुश करना और अपनी अदाओं से चौका देना बहुत अच्छे से आता है.

 

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#onelove #onelife #doitall 🎧 on please! Full screen 📺 please! . . I love reading your words!

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बता दें, आशका गोराडिया और टी.वी एक्टर रोहित बख्शी के ब्रेक-अप के बाद आशका अमेरिकन बिजनेसमैन बिजनेसमैन ब्रेंट गोबल के साथ रिलेशनशिप में आई थीं. आशका गोराडिया और ब्रेंट गोबल ने 1 दिसम्बर 2017 को चर्च में ईसाई रीती-रिवोजों के साथ शादी की और बाद में 3 दिसम्बर 2017 को दोनों ने हिंदु रीती-रिवाजों से भी शादी की.

Written by- Karan Manchanda

फिटनेस के मामले में दिशा पटानी से कम नहीं हैं टाइगर की बहन

बौलीवुड के सबसे फिट एक्टर टाइगर श्रौफ अपनी बौडी और फिजिक को लेकर फैंस के बीच काफी पौपुलर हैं लेकिन आपको जानकर हैरानी होगी कि फिटनेस के मामले में टाइगर की बहन कृष्णा श्रौफ भी कुछ कम नही हैं. कृष्णा अक्सर अपने औफिशियल सोशल मीडिया अकाउंट से अपनी लेटेस्ट फोटोज शेयर करती रहती हैं इन फोटोज साफ पता चलता है कि वे अपनी फिटनेस का काफी ध्यान रखती हैं.

 

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🌸

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भले ही पिता जैकी श्रौफ और भाई टाइगर श्रौफ की तरह कृष्णा ने अभी तक बौलीवुड इंडस्ट्री में कदम नहीं रखा है लेकिन फिर भी कृष्णा श्रौफ ने अपनी एक अलग ही फैन फोलोविंग बना रखी है. कृष्णा ने अपनी खूबसूरती और अदाओं से काफी लोगों को दीवाना किया हुआ है.

खबरों की माने तो ऐसा कोई दिन नहीं जाता जब कृष्णा श्रौफ हार्ड एक्सरसाइज ना करती हों या जिम ना जाती हों और शायद यही कारण हैं कि उनकी बौडी देख लड़के और लडकियां दोनो ही काफी इम्प्रेस होते हैं और उनसे इंस्पायर होकर उनकी तरह बौडी बनाना चाहते हैं.

मार्शल आर्ट्स में भी माहिर…

जैसा कि आप सब जानते हैं कि टाइगर श्रौफ एक बेहतरीन मार्शल आर्ट्स एक्सपर्ट हैं और वे चाहते हैं कि मार्शल आर्ट्स पूरी दुनिया में प्रोमोट हो सके जिसके लिए वे काफी मेहनत भी करते हैं. इस सिलसिले में कुछ दिन पहले टाइगर श्रौफ के साथ उनकी बहन कृष्णा श्रौफ भी मार्शल आर्ट्स को प्रोमोट करती नजर आई. दोनों ने अपने सोशल मीडिया अकाउंट से मार्शल आर्ट्स को काफी प्रोमोट किया.

 

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A-Team. 🦁🐯 @tigerjackieshroff #MMAMatrix #MixedMartialArts #PathOfTheWarrior #Dec1st @mmamatrixofficial

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दोस्तों के साथ करती हैं एन्जौय…

कृष्णा श्रौफ के पोस्ट देख एक और चीज सामने आई है कि जितनी मेहनत वे जिम में करती हैं उतने ही मजे वे अपने दोस्तो के साथ पार्टीज करने में भी करती हैं. कृष्णा श्रौफ का औफिशियल इंस्टाग्राम अकाउंट ऐसी फोटोज से भरा पड़ा है. हालांकि, बौलीवुड इंडस्ट्री में से कृष्णा श्रौफ के बहुत कम ही दोस्त हैं, उनके ज्यादातर दोस्त इंडस्ट्री के बाहर के ही हैं.

 

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Putting up with each other’s shit since ‘98. 🤦🏻‍♀️ #nonewfriends #Goa2k18 🌴💦

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बता दें, कृष्णा श्रौफ ने अब तक बौलीवुड इंडस्ट्री में कदम इसलिए नही रखा क्योंकि उनको एक्टिंग से ज्यादा डायरेक्शन में इंट्रेस्ट है और शायद तभी कृष्णा अपने भाई टाइगर श्रौफ की फिल्म ‘मुन्ना माइकल’ में असिस्टेंट डायरेक्टर का काम करती नजर आई थीं. कृष्णा अपने पिता जैकी श्रौफ की काफी लाडली हैं और जैकी अपनी बेटी की हर इच्छा पूरी करने की कोशिश भी करते हैं.

Written by- Karan Manchanda

हर किसान की पहुंच में हो ट्रैक्टर

लेखक-भानु प्रकाश राणा

अगर आप के पास ट्रैक्टर है तो वह आप के लिए यह एक अच्छी आमदनी का जरीया भी बनता है क्योंकि ज्यादातर किसानों के पास ट्रैक्टर या अन्य कृषि यंत्र नहीं होते हैं, जबकि आज जुताई का काम हो, गहाई का काम हो या खेत बोआई का काम हो, ज्यादातर खेती के काम कृषि यंत्रों पर ही आधारित हैं, इसलिए ऐसे किसान, जिन के पास ये साधन नहीं?हैं, वे खेती का काम ऐसे लोगों से ही कराते हैं जिन के पास यंत्रों की सुविधा हो.

अगर आप भी चाहते हैं कि किसी दूसरे किसान की तरह आप के पास भी ऐसी सुविधाएं हों, ट्रैक्टर हो, कृषि यंत्र हों, जिन से खेती का काम आसान हो सके, कमाई का जरीया बन सके तो आज देश में अनेक?ट्रैक्टर कंपनियां मौजूद हैं जिन के बनाए?ट्रैक्टरों की अलगअलग खूबियां?हैं, इसलिए अगर आप ट्रैक्टर खरीदना चाहते?हैं तो ट्रैक्टर खरीदने से पहले अपनी जरूरतें देखें और उसी के मुताबिक आगे कदम बढ़ाएं.

ट्रैक्टर खरीदने के लिए आप को लोन भी पास कराना होगा. इस के लिए यहां हम आप को?ट्रैक्टर खरीदने के बारे में कुछ जानकारी दे रहे?हैं जो आप के लिए फायदेमंद रहेगी.

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एसबीआई से ले सकते हैं ‘स्त्री शक्ति ट्रैक्टर लोन’ : अगर आप खेतीबारी से जुड़ा कोई काम करते?हैं और ट्रैक्टर खरीदना चाहते?हैं तो आप एसबीआई यानी भारतीय स्टेट?बैंक से लोन ले सकते?हैं. अन्य बैंक भी इस तरह के लोन उपलब्ध कराते हैं, लेकिन एसबीआई की?ट्रैक्टर खरीदने के लिए यह खास स्कीम है.

‘स्त्री शक्ति ट्रैक्टर लोन’, जिसे एसएसटीएल भी कह सकते?हैं के तहत आप

को अपने परिवार की किसी महिला को कर्ज

के लिए सहआवेदक बनाना होगा. इस स्कीम में आप ट्रैक्टर के अलावा दूसरे कृषि यंत्रों के लिए भी लोन ले सकते हैं.

ट्रैक्टर खरीदने के लिए किसान की सालाना आमदनी कम से कम डेढ़ लाख रुपए होनी चाहिए और किसान के पास कम से कम 2 एकड़ जमीन भी होनी चाहिए, जिस से बैंक आप पर भरोसा कर सके कि आप?ट्रैक्टर का लोन समय पर चुका सकते हैं.

इस के अलावा कोई भी व्यक्ति, स्वयंसहायता समूह या संस्था भी एसएसटीएल स्कीम के तहत लोन ले सकते हैं. बैंक द्वारा लोन देने का मकसद यही है कि किसान कृषि यंत्रों के माध्यम से खेती कर के नियमित आमदनी कर सकें और समय पर बैंक को लोन वापस

कर सकें.

महिला आवेदक क्यों जरूरी?: बैंक का ऐसा मानना है कि पुरुषों के मुकाबले महिला लोन चुकाने के मामले में ज्यादा जिम्मेदार होती हैं. इसी के चलते बैंक ने महिलाओं को प्राथमिकता दी है और ऐसे लोन पर ब्याज भी कम लगाया है.

कितना मिल सकता है लोन : मोटेतौर पर माना जाए कि अगर ट्रैक्टर की कीमत 5 लाख रुपए तक है तो आप को

4.25 लाख रुपए तक का लोन मंजूर हो सकता है. मतलब, ट्रैक्टर की कुल रकम का 80 से

85 फीसदी तक लोन मिल सकता?है. बाकी

15-20 फीसदी रकम आप को अपने पास से देनी होगी. ट्रैक्टर खरीदने के बाद उस का बीमा भी कराना जरूरी होगा.

जरूरी दस्तावेज

* आप का और सहआवेदक महिला का पासपोर्ट साइज फोटो.

* दोनों के पहचानपत्र. पता का प्रूफ दस्तावेज (वोटरकार्ड, आधारकार्ड, पैनकार्ड वगैरह हो सकते?हैं.)

* खेती के कागजात.

* बैंक पासबुक की स्टेटमैंट.

* आप की आमदनी की जानकारी.

* सहआवेदक महिला से आप का?क्या संबंध?है, उस की भी जानकारी देनी होगी.

ये सब जरूरी कागजात आप को पूरे करने होंगे.

अगर बैंक आप से ‘स्त्री शक्ति ट्रैक्टर लोन’ के लिए जमीन के कागज गिरवी रखने को कहता है या आप अपनी जमीन के कागज बैंक के पास गिरवी रखते हैं. इस से आप को कम ब्याज पर लोन मिलेगा.

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क्या हैं लोन की ब्याज दरें : अगर आप ‘स्त्री शक्ति ट्रैक्टर लोन’ लेना चाहते हैं, वह भी बिना जमीन को गिरवी रखे तो आप को तय ब्याज दर से 1.75 फीसदी अधिक ब्याज चुकाना पड़ेगा.

अगर आप बैंक के पास जमीन गिरवी रख कर ‘स्त्री शक्ति ट्रैक्टर लोन’ चाहते हैं तो आप को 1.75 फीसदी ब्याज की जगह 1.5 फीसदी ब्याज ही चुकाना पड़ेगा.

कितने समय में वापसी : अगर आप जमीन गिरवी रखे बिना लोन लेना चाहते?हैं तो आप को यह कर्ज 36 महीने में वापस करना होगा और अगर आप जमीन गिरवी रख कर लोन लेना चाहते?हैं तो आप को इसे चुकाने के लिए 48 महीने का समय मिलेगा. मतलब, बैंक के पास जमीन गिरवी रखने पर आप को अधिक छूट मिलेगी.

ट्रैक्टर खरीदने के बाद आप को एक महीने का समय ग्रेस पीरियड के?रूप में भी मिलता?है. इस का मतलब यह है कि एक महीने तक आप को लोन की किस्त चुकाने से?छूट दी जा सकती है.

अब बात आती है कि आप को कौन सा ट्रैक्टर खरीदना है, यह आप को अपनी जरूरत के हिसाब से तय करना है. आजकल बाजार में अनेक ब्रांड के ट्रैक्टर मौजूद हैं. हरेक की अपनी खूबियां हैं. यहां हम आयशर 551 ट्रैक्टर के बारे में कुछ जानकारी दे रहे?हैं.

आयशर 551 ट्रैक्टर

यह ट्रैक्टर 49 हौर्सपावर का?है और इस में 3300 सीसी का इंजन लगा है. 3 सिलैंडर, डायरैक्ट इंजैक्शन, वाटर कूल इंजन?है. इस ट्रैक्टर से 10-12 टन की ट्रौली और भारी कृषि यंत्रों से आसानी से काम लिया जा सकता है. जैसे 2 एमबी रिवर्सिएबल प्लाऊ, पावर हैरो,

7 फुटा रोटावेटर, कल्टीवेटर, स्पे्रयर आदि इस से चला सकते हैं.

यह ट्रैक्टर 1,700 किलोग्राम तक वजन उठा सकता?है. विशेष परिस्थितियों में यह वजन 1850 किलोग्राम तक भी हो सकता?है. इस में मल्टी डिस्क ब्रैक हैं जो औयल में डूबे रहते हैं. पडलिंग और धान की खेती में यह ट्रैक्टर तेजी और असरदार तरीके से काम करते?हैं. इस का रखरखाव का खर्चा भी कम है और ब्रेक की उम्र भी लंबी होती है.

मल्टी?स्पीड पीटीओ इंजन आरपीएम कम होने पर भी पीटीओ पर ज्यादा आरपीएम देता है. यह हर इंप्लीमैंट के लिए अनुकूल है. जहां अलगअलग पीटीओ स्पीड की जरूरत होती?है जैसे थ्रैशर, वाटरपंप, आल्टरनैटर आदि.

इस ट्रैक्टर में वाटर सैपरेटर भी लगा है. अगर किसी वजह से डीजल में पानी मिला है तो उस को वह डीजल से अलग कर देता है और ट्रैक्टर की इंजन टंकी में 48 लिटर तक डीजल भरा जा सकता है. इस ट्रैक्टर में सभी डिजिटल मीटर लगे हुए?हैं जिस से ट्रैक्टर किस स्पीड पर कितने आरपीएम पर चल रहा है, कितनी तेल खपत हुई है, यह सब पता चलता है.

इस ट्रैक्टर में पावर स्टेयरिंग भी है, जिसे आसानी से घुमाया जा सकता?है. इस ट्रैक्टर में

8 गियर आगे लगते हैं और 2 रिवर्स गियर हैं. इस में 12 वोल्ट की बैटरी लगी है. साथ ही, इस में मोबाइल चार्ज करने की सुविधा भी है.

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ड्राइवर के बैठने की सीट सुविधानुसार आगेपीछे की जा सकती?है. सीट के पीछे पानी की बोतल रखने की जगह दी गई है. सुरक्षा के लिहाज से ट्रैक्टर के अगले हिस्से में वजनी मजबूत बंपर लगा?है.

अधिक जानकारी के लिए आप आयशर कंपनी के फोन नंबर 022-40375754 पर बात कर सकते हैं.                                       ठ्ठ

‘देवों के देव महादेव’ के स्टाइल नही हैं किसी से कम, देखें फोटोज

सीरियल ‘देवों के देव महादेव’ से फेमस हुए और फिल्म ‘उरी’ मे अपनी एक्टिंग से सभी का दिल जीतने वाले एक्टर मोहित रैना उन एक्टर्स में से एक है जो सोशल मीडिया पर काफी पौपुलर है. आए दिन सोसल मीडिया पर अपनी फोटोज शेयर करने वाले मोहित अपने लुक्स से काफी चर्चाओं में रहते है. कभी वो छोटे बाल कटा लेते है तो कभी बड़े बाल में नजर आते है, वो क्लीन सेविंग में भी काफी अच्छे लगते है पर इन दिनों मोहित अपनी बड़ी दाढ़ी वाले लुक में काफी पसंद किए जा रहे है. इस लुक में वो काफी लोगों के दिलों को छू रहे है. इसलिए आज  हन लेकर आए है उनके कुछ चुनिंदा लुक जो आपको काफी पसंद आएंगे और अगर आप भी बड़ी दाढ़ी के सात कुछ अच्छा ट्राय करना चाहते है तो इनके स्टाइल को जरुर ट्राय करें.

बड़ी दाढ़ी के साथ ट्राय करें लाइट कलर के कपड़ें

अगर आपकी भी बड़ी दाढ़ी है और आप कपड़ें ट्राय करने में काफी चूजी है तो आपको लाइट कलर्स जरुर ट्राय करना चाहिए. मोहित के इस लुक को अगर देखें तो पता चलेगा की लाइट कलर्स के कपड़ें काफी एलिगेंट लुक देते है. ग्रे पेंट के साथ ग्रे शर्ट साश में उसमें पर्पल कलर प्रिंट काफी अच्छा लग रहा है. इस लुक में मोहित की दाढ़ी काफी अच्छी लग रही है.

 

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Perfect is never . Live now ❤️

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लाइट पिंक कलर भी है बौय्स की पसंद

लाइट कलर आपकी पर्सनालिटी को काफी अच्छा बनाती है और जब अपने बड़ी दाढ़ी वाला लुक लिआ हो तो ये और भी जरुरी हो जाता है की आप उसे हाईलाइट करें. मोहित के इस लुक में उन्होंने लाइट पिंक कलर की शर्च ट्राय की है साथ में वाइट टी-शर्ट और वाइट सूज इस पुरे लुक को काफी सिंपल और एट्रेक्टिव बना रहा है.

 

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Relax and Recharge . weekend vibes

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ब्राउन कलर शेड देते है टफ लुक

अगर आप कुछ फंकी ट्राय कर कर के बोर हो गए है और कुछ अलग ट्राय करना चाहते है तो ब्राउन कलर को अपने लुक का हिस्सा जरुर बनाएं. ब्राउन कलर आपको एक टफ लुक देगा. इस लुक में मोहित ने ब्राउन चेक शर्ट के साथ ओवर कोट पहना है जो लाइट ब्राउन कलर का है. इस ओवर कोट ने इस स्टाइल में जान डाल दी है साथ में मोहित की दाढ़ी काफी जच रही है.

 

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Dear Monday I think you should take a holiday .

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फैसले

लेखक-संगीता बवेजा

‘‘नानी, जैसे फिल्मों में दिखाते हैं वैसे ही मां भी दुलहन बनेंगी?’’ उस ने फिर पूछा.

‘‘मुझे नहीं पता,’’ मीना ने नाती को टालते हुए कहा.

4 वर्ष का सौरभ दुनियादारी से तो बेखबर था लेकिन जो कुछ घर में हो रहा था उसे शायद वह सहजता से स्वीकार नहीं कर पा रहा था. स्वीकार तो घर में कोई नहीं कर पा रहा था लेकिन इस के सिवा दूसरा रास्ता भी नजर नहीं आ रहा था. मीना रोने लगी तो सौरभ उन के नजदीक खिसक आया और उन के आंसू पोंछता हुआ बोला, ‘‘नानी, रोओ मत. अब मैं आप से कुछ नहीं पूछूंगा. बस, एक बात और बता दो, जिन से मम्मी की शादी हो रही है वह कौन हैं?’’

मीना स्वर को संयत करती हुई बोलीं, ‘‘वह तेरे पापा हैं.’’

‘‘अच्छा, मैं अब पापामम्मी दोनों के साथ रहूंगा,’’ सौरभ खुशी से उछल पड़ा तो मीना उस का चेहरा देखती रह गईं.

अंजली अपनी मां और बेटे की बातें बगल के कमरे में बैठी सुन रही थी. उस के हाथ का काम छूट गया और वह बिस्तर पर निढाल सी लेट गई. अतीत की काली परछाइयां जैसे उस के चारों ओर मंडराने लगी थीं.

5 साल पहले भी घर में उस की शादी की तैयारियां चल रही थीं. तब अंजली के मन में उत्साह था. आंखों में भविष्य के सुनहरे सपने थे. तब गाजेबाजे के साथ वह विवेक की पत्नी बन अपने ससुराल पहुंची. जहां सभी ने खुले दिल से उस का स्वागत किया था. विवेक अपने मातापिता का इकलौता लड़का था. शादी के दूसरे दिन विवेक के 10-12 दोस्त उन्हें बधाई देने आए थे. नए जोडे़ को ले कर सब दोस्त मजाक कर रहे थे. उन्हीं में एक ऐसा भी दोस्त था, जिसे देख कर अंजली सहज नहीं हो पा रही थी, क्योंकि जितने समय सब बैठे थे उस की दोनों आंखें उसे घूरती ही रहीं.

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‘विवेक, मुझे तो तुझ से जलन हो रही है,’ सब के बीच सूरज बोला, ‘तू इतनी सुंदर बीवी जो ले कर आया है. अब मेरे नसीब में जाने कौन है?’ सूरज ने नजरें अंजली पर जमाए हुए कहा तो सब हंस पडे़.

‘चिंता मत कर, तुझे अंजली भाभी से भी ज्यादा खूबसूरत बीवी मिलेगी,’ दोस्तों के बीच से एक दोस्त की आवाज सुनाई दी तो सूरज ने नाटकीय अंदाज में अपने दोनों हाथ ऊपर हवा में लहरा दिए. एक बार फिर जोर से हंसी के फौआरे फूट पडे़.

चायनाश्ते के बाद जब सब दोस्त जाने लगे तो सूरज अंजली के करीब आ कर बोला, ‘मुझे अच्छी तरह पहचान लीजिए, भाभी जान. मैं विवेक का बहुत करीबी दोस्त हूं सूरज और आप चाहें तो आप का भी करीबी बन सकता हूं.’

अंजली उस के इस कथन से सकपका गई और एक देवर की अपनी नई भाभी से चुहलबाजी समझ कर चुप रह गई.

सूरज अब अकसर घर आने लगा. वह बात तो विवेक से करता पर उस की निगाहें अंजली पर ही टिकी रहतीं. अंजली ने कई बार विवेक को इशारों से समझाने की कोशिश भी की पर वह अपनी दोस्ती के आगे किसी को न तो कुछ समझता था और न समझाने का मौका देता था.

एक दिन सूरज किसी फिल्म की 3 टिकटें ले आया और विवेक व अंजली को ले जाने की जिद करने लगा. अंजली ने फिल्म देखने न जाने के लिए सिर दर्द का बहाना भी किया लेकिन उस के आगे उस की एक न चली.

अंजली को फिल्म देखने जाना ही पड़ा. इंटरवल से पहले तो सब ठीक था. विवेक उन दोनों के बीच में बैठा था. अंजली ने चैन की सांस ली लेकिन इंटरवल में जब वे लोग ठंडा पी कर लौटे तो अंजली को बीच की सीट पर बैठना पड़ा और वह विवेक से कुछ कहती इस से पहले फिल्म शुरू हो गई. सूरज ने मौका मिलते ही अंजलि को परेशान करना शुरू कर दिया. उस की आंखें तो सामने परदे पर थीं लेकिन हाथ और पैर अकसर अंजली से टकराते रहे. अंजली ने जब उसे घूर कर देखा तो वह अंजान बना फिल्म देखने लगा. किसी तरह फिल्म देख कर वह घर पहुंची तो उस ने मन में निश्चय किया कि आज की घटना वह विवेक से नहीं बल्कि अपनी सास को बताएगी.

अगले दिन विवेक के जाने के बाद अंजली अपनी बात कहने के लिए सास के पास गई. पर वहां कमरे में सामान फैला देख वह बोली, ‘मम्मीजी, आप कहीं जा रही हैं क्या?’

‘हां बहू, मैं और विवेक के पिताजी सोच रहे थे कि तुम घर संभाल रही हो तो हम दोनों कहीं घूम आएं. बहुत दिनों से हरिद्वार जाने की सोच रहे थे,’ अंजली की सास के स्वर में शहद की मिठास थी.

‘कितने दिनों के लिए आप लोग जा रहे हैं?’  अंजली ने झिझकते हुए पूछा.

‘3-4 दिन तो लग ही जाएंगे.’

‘आप लोग रास्ते में मुझे मेरी मां के घर छोड़ देंगे?’ अंजली ने हिम्मत बटोर कर पूछा.

‘बेटी, तेरे ही सहारे तो मैं निश्ंिचत हो कर जा रही हूं और फिर विवेक का खयाल कौन रखेगा?’ अंजली की सास ने कहा.

घर में अकेले रहने की कल्पना मात्र से अंजली का मन घबरा रहा था पर वह करे भी तो क्या. सोचा, चलो मांजी को हरिद्वार से लौटने पर सब बात बता देगी. यह सोच कर अंजली फिर अपने काम में लग गई. यथासमय सासससुर के हरिद्वार जाने के बाद अंजली डाक्टर के पास नर्सिंग होम चली गई क्योंकि कुछ दिन से उसे ऐसा लग रहा कि  शायद उस के व विवेक के प्यार का बीज उस के अंदर पनपने लगा है. घर में किसी से कुछ कहने से पहले वह डाक्टर की सहमति चाहती थी इसलिए आज रिपोर्ट लेने चली गई.

‘मुबारक हो अंजली, तुम मां बनने वाली हो,’ डाक्टर ने मुसकरा कर अंजली के हाथ में रिपोर्ट पकड़ा दी, ‘घर से तुम्हारे साथ कौन आया है?’

‘धन्यवाद, डाक्टर, मैं अकेली आई हूं. कुछ खास बात है तो मुझे बताइए,’ अंजली ने कहा.

‘नहीं, कुछ खास बात नहीं है,’ डाक्टर बोली, ‘मैं तो बस, इतना कहना चाहती थी कि तुम्हारे घर वालों को अब तुम्हारा खास खयाल रखना चाहिए.’

घर जातेजाते अंजली सोच रही थी कि आज जब विवेक घर आएंगे तो उन्हें यह खास खबर बताऊंगी. सुन कर कितने खुश होंगे वह. यह सोचते हुए अंजली विवेक के आने का इंतजार कर रही थी कि दरवाजे की घंटी बज उठी.

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अंजली ने लपक कर दरवाजा खोला तो सामने सूरज खड़ा था.

‘कैसी हो भाभी…जान?’ सूरज ने कुटिल हंसी के साथ पूछा.

अंजली दरवाजा कस कर पकडे़ हुए बोली, ‘मांबाबूजी घर पर नहीं हैं. आप फिर कभी आइएगा.’ लेकिन सूरज दरवाजे को ठेल कर जबरदस्ती अंदर घुस आया.

‘मैं जानता हूं कि वे लोग हरिद्वार गए हैं, पर तुम मुझे जाने को क्यों कह रही हो,’ अंजली को सिर से पैर तक घूरते हुए सूरज बोला, ‘कितने दिन बाद तो आज यह मौका हाथ लगा है. इसे यों ही क्यों गंवाने दें.’

‘तुम क्या अनापशनाप बके जा रहे हो?’ सूरज को बीच में टोकते हुए अंजली बोली, ‘तुम्हें शरम आनी चाहिए, मैं तुम्हारे अजीज दोस्त की बीवी हूं.’

सूरज उस की इस बात पर ठठा कर हंसते हुए बोला, ‘तुम्हें पता है अंजली, आज तक मैं ने विवेक की हर चीज शेयर की है तो बीवी क्यों नहीं, तुम चाहो तो सब हो सकता है और विवेक को कानोंकान खबर भी नहीं होगी.’

‘तुम अभी दफा हो जाओ मेरे घर से,’ अंजली चीखते हुए बोली, ‘मैं तुम्हें और बरदाश्त नहीं कर सकती. आज मैं विवेक को सब सचाई बता कर रहूंगी.’

‘तुम समझने की कोशिश करो अंजली, तुम्हारे लायक सिर्फ मैं हूं, विवेक नहीं, जो मुझ से हर लिहाज में उन्नीस है,’ कहतेकहते सूरज ने अंजली का हाथ पकड़ अपनी तरफ खींचा तो ‘चटाक’ की आवाज के साथ अंजली ने सूरज के गाल पर तमाचा जड़ दिया.

‘मैं सिर्फ और सिर्फ अपने पति से प्यार करती हूं और अब तो उस के बच्चे की मां भी बनने वाली हूं,’ फुफकार हुए अंजली बोली और सूरज को दरवाजे की ओर धकेल दिया.

‘तुम ने मेरा प्रस्ताव अस्वीकार कर बहुत बड़ी भूल की है अंजली. तुम्हें तो मैं ऐसा मजा चखाऊंगा कि भूल कर भी तुम मुझे कभी भुला नहीं पाओगी,’ जातेजाते सूरज उसे धमकी दे गया.

अंजली का शरीर गुस्से से कांप रहा था. उसे अपनी खूबसूरती और शरीर दोनों से घृणा होने लगी, जिसे सूरज ने छूने की कोशिश की थी. जो हुआ था उस के बारे में सोचतेसोचते अंजली परेशान हो गई. बुरेबुरे खयाल उस के मन में आने लगे कि आज तक तो विवेक आफिस से सीधे घर आते थे फिर आज देर क्यों? इसी उधेड़बुन में अंजली बैठी रही. रात 9 बजे विवेक घर आया.

‘आज बहुत देर कर दी आप ने,’ अंजली ने दरवाजा खोलते ही सामने खड़े विवेक को देख कर पूछा.

‘तुम्हारे लिए तो अच्छा ही है,’ विवेक ने चिढ़ कर कहा.

‘क्या मतलब?’ अंजली हैरानी से बोली.

‘तुम मां बनने वाली हो?’ विवेक ने गुस्से में पूछा.

‘जी, आप को किस ने बताया?’

‘तुम यह बताओ कि बच्चा किस का है?’ चिल्ला कर बोला विवेक.

‘किस का है, क्या मतलब? यह हमारा बच्चा है,’ अंजली विवेक को घूर कर बोली.

‘खबरदार, जो अपने पाप को मेरा नाम देने की कोशिश भी की. मैं सब जानता हूं, तुम कहांकहां जाती हो?’

‘आप यह सब क्या अनापशनाप बोले जा रहे हैं. आज हुआ क्या है आप को? कहीं सूरज…’

अंजली की बात बीच में काटते हुए विवेक फिर दहाड़ा, ‘देखा, चोर की दाढ़ी में तिनका. अपनेआप जबान खुलने लगी. हां, सूरज ने ही मुझे सारी सचाई बताई है. उसी ने तुम्हें हमेशा किसी के साथ देखा है और आज तुम ने सूरज के सामने सचाई स्वीकार की थी और सूरज ने मुझे यह भी बताया है कि तुम अपने आशिक के बच्चे की मां बनने वाली हो जिसे तुम मेरा नाम दोगी.’

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‘बस कीजिए, आप. इतना विश्वास है अपने दोस्त पर और अपनी बीवी पर जरा सा भी नहीं. आप क्या जानें सूरज की सचाई को. जबकि हकीकत यह है कि उस ने मुझे हमेशा गंदी नजरों से देखा और आज उस ने मेरे साथ जबरदस्ती करने की कोशिश भी की. अंजली अपनी बात अभी कह भी नहीं पाई थी कि विवेक का करारा तमाचा अंजली के गाल पर पड़ा और कमरे में सन्नाटा छा गया.’

‘देखा, जब अपना मैला दामन दूसरों को दिखने लगा तो तुम ने दूसरों पर कीचड़ उछालना शुरू कर दिया. हां, मुझे सूरज पर विश्वास है, तुम पर नहीं. तुम्हें यहां आए 6 महीने भी नहीं हुए और सूरज के साथ मैं ने 6 सालों से कहीं ज्यादा समय बिताया है. अब जब तुम्हारी असलियत जाहिर हो चुकी है तो मैं तुम्हें बरदाश्त नहीं कर सकता. मैं कल सुबह तुम्हें तुम्हारे घर छोड़ कर आऊंगा और तलाक लूंगा,’ इतना कह कर विवेक अपने कमरे में जाने को मुड़ा तो अंजली उसे खींच कर अपने सामने खड़ा कर गरजते हुए बोली, ‘मैं नहीं जानती कि सूरज ने क्या झूठी कहानी आप को सुनाई है. अब मैं भी आप के साथ नहीं रहना चाहूंगी लेकिन मैं इतना आप को बता दूं कि विज्ञान ने बहुत तरक्की कर ली है. मैं चाहूं तो आप को प्रमाण दे सकती हूं कि मेरी कोख में आप का बच्चा है पर उस से कोई फायदा नहीं है, क्योंकि उस प्रमाण को सूरज फिर झूठा बना सकता है.’

रात भर अंजली सो न सकी. सुबह होते ही वह उठी और अपना सामान ले कर मायके चल दी. विवेक को पता भी नहीं चला.

मायके में मांबाबूजी को अपनी आप- बीती सुना कर अंजली ने ठंडी सांस ली. बाबूजी गुस्से से तमतमा उठे, ‘विवेक की यह मजाल कि फूल सी नाजुक और गंगा सी पवित्र बेटी पर लांछन लगाता है. मैं उस नवाबजादे को छोडूंगा नहीं.’

‘आप शांत रहिए और कुछ समय बीतने दीजिए. शायद विवेक को खुद अपनी गलती का एहसास हो जाए अन्यथा हम दोनों इस की ससुराल चलेंगे,’ मां ने बाबूजी को शांत करते हुए कहा.

लेकिन वहां से न कोई आया न ही उन्होंने अंजली के मांबाप से कोई बात की. बल्कि उन की पहल को ठुकराते हुए विवेक ने तलाक के कागज अंजली को भिजवाए तो पत्थर सी बनी अंजली ने यह सोच कर चुपचाप कागजों पर हस्ताक्षर कर दिए कि जहां एक बार बात बिगड़ गई वहां दोबारा सम्मान और प्यार पाने की उम्मीद नहीं की जा सकती.

धीरेधीरे समय बीतता गया. सौरभ का जन्म हो गया. अंजली ने कई बार नौकरी करने की जिद की पर बाबूजी ने हमेशा यह कह कर मना कर दिया कि तुम अपना बच्चा संभालो. मैं अभी इतना कमाता हूं कि तुम्हारा भरणपोषण कर सकूं.

एक दिन बाबूजी अंजली को समझाते हुए बोले, ‘बेटी, जिंदगी बहुत बड़ी होती है. मैं सोचता हूं कि तेरी शादी कहीं और कर दूं.’

‘बाबूजी, शादीविवाह से मेरा विश्वास उठा चुका है,’ अंजली बोली, ‘अब तो सौरभ के सहारे मैं पूरा जीवन काट लूंगी.’

‘बेटी, आज तो हम हैं लेकिन कल जब हम नहीं रहेंगे तब तुम किस के सहारे रहोगी?’ बाबूजी ने समझाया.

‘क्या मैं अपना सहारा स्वयं नहीं बन सकती? मैं क्यों दूसरों में अपना सहारा ढूंढ़ने के लिए कदम आगे बढ़ाऊं और फिर गिरूं.’

‘पांचों उंगलियां एकसमान नहीं होतीं,’ बाबूजी समझाते हुए बोले, ‘जीतेजी तुम्हारा सुखीसंसार देखने की हार्दिक इच्छा है वरना मर कर भी मुझे चैन नहीं मिलेगा. क्या मेरी इतनी सी इच्छा तुम पूरी नहीं करोगी?’

बाबूजी के इस कातर स्वर से अंजली पिघल गई पर दृढ़ स्वर में बोली, ‘ठीक है बाबूजी, मैं शादी करूंगी पर उस व्यक्ति से जो मुझे सौरभ के साथ अपनाएगा.’

सुन कर बाबूजी थोड़ा विचलित तो हुए पर प्रत्यक्ष में बोले, ‘ठीक है जिन से तुम्हारी शादी की बात चल रही है उन से मैं तुम्हारी बातें कह दूंगा पर सौरभ को हम शादी के कुछ समय बाद भेजेंगे.’

‘‘अंजली बेटी, तुम तैयार नहीं हुई,’’ मीना ने कमरे में प्रवेश करते हुए कहा तो अंजली अपनी यादों से वापस लौट आई. बेटी की भीगीभीगी आंखें देख मीना का मन भी भीग उठा.

कोर्ट में रजिस्ट्रार के सामने अमित और अंजली दोनों ने हस्ताक्षर किए. अमित के चेहरे पर परिपक्वता थी फिर भी चेहरे की गरिमा अलग थी. उन का व्यक्तित्व विशिष्ट था.

सौरभ को कुछ दिन बाद भेजने की बात कह बाबूजी रोतेबिलखते सौरभ को ले कर भीतर कमरे में चले गए और अपने घर से विदा हो अंजली एक बार फिर अनजान लोगों के बीच आ गई.

अमित की दोनों बेटियां सुमेधा और सुप्रिया गुडि़यों जैसी थीं. सौरभ से उम्र में कुछ बड़ी थीं जो जल्दी ही अंजली से घुलमिल गईं. 2 महीने बीततेबीतते अंजली ने अमित से कहा, ‘‘मैं सौरभ को यहां लाना चाहती हूं.’’

‘‘हां, इस बारे में हम शाम को बात करेंगे,’’ अमित झिझकते हुए इतना कह कर आफिस चले गए.

शाम को सब बैठे टेलीविजन देख रहे थे तो अमित की मां बोलीं, ‘‘बहू, मुझे जल्दी से अब पोते का मुंह दिखाना.’’

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‘‘सौरभ भी आप का पोता ही है मांजी.’’ जाने कैसे हिम्मत कर अंजली कह गई.

यह सुनते ही अमित और उस की मां का चेहरा उतर गया.

एक पल बाद ही अमित की मां बोलीं, ‘‘लेकिन मैं अपने पोते अपने खून की बात कर रही थी बहू.’’

‘‘क्या मैं सुमेधा और सुप्रिया को अपना नहीं मानती, तो फिर सौरभ को अपनाने में आप को क्या दिक्कत है?’’ अंजली विनम्रता से बोली.

‘‘बहू, मैं ने तो शुरू में ही तुम्हारे बाबूजी को मना कर दिया था कि सौरभ को हम नहीं अपनाएंगे,’’ अमित की मां ने कहा तो अंजली यह सुन कर अवाक् रह गई.

‘‘चलिए, मैं मान लेती हूं कि आप ने बाबूजी से यह बात कही होगी जो उन्होंने मुझे नहीं बताई पर मैं अपने बच्चे के बिना नहीं रह सकती,’’ अंजली ने कहा.

‘‘देखो बहू, मैं इस बारे में सोच भी लेती पर अब जिंदा मक्खी निगल तो नहीं सकती न. मुझे सचाई का पता चल चुका है. मैं सौरभ को नहीं अपना सकती, जाने किस का गंदा खून है.’’

‘‘मांजी’’ अंजली ने चिल्ला कर उन की बात बीच में काट दी, ‘‘आप को मेरे या सौरभ के बारे में ऐसी बातें कहने का कोई हक नहीं है.’’

‘‘तुम क्या हक दोगी और अपने बारे में क्या सफाई दोगी?’’ अमित की मां तल्ख शब्दों में बोलीं, ‘‘तुम्हारे बारे में हमें सबकुछ पता है. मैं सब जान कर भी खामोश हो गई कि चलो, इनसान से गलती हो जाती है और सौरभ कौन सा मेरे घर आएगा पर अब तुम्हारी यह जिद नहीं चलेगी.’’

‘‘मांजी, यह मेरी जिद नहीं, मेरा हक है. मेरे मां होने का हक है,’’ अंजली भी उसी तरह तल्ख लहजे में बोली, ‘‘सौरभ विवेक का ही बेटा है और कौन किस का बेटा है यह एक मां ही जानती है और मैं नहीं चाहती कि हमारी भूल की सजा मेरा बेटा भुगते. वो यहां जरूर आएगा और मेरे साथ ही रहेगा.’’

अंजली का यह फैसला सुन कर अमित की मां गरज उठीं.

‘‘इस घर में सौरभ नहीं आएगा और अगर सौरभ इस घर में आएगा तो मैं इस घर में नहीं रहूंगी.’’

‘‘आप इस घर से क्यों जाएंगी. ये आप का घर है, आप शौक से रहिए. इस घर के लिए अभी मैं अजनबियों सी हूं, मैं ही चली जाऊंगी. पहले भी मेरी भावनाओं के साथ खिलवाड़ हुआ था, आज फिर हो रहा है. पहले सूरज खिलाड़ी था और आज आप हैं जो स्वयं एक मां हैं. क्या आप अपने बच्चों से दूर रह सकती हैं?’’ अंजली अमित की मां का सामना करते हुए बोली.

‘‘पहली शादी टूट चुकी है. दूसरी हुई है तो निबाह ले मूरख वरना दुनिया थूथू करेगी,’’ अमित की मां ने कटाक्ष किया.

‘‘मैं ने आज तक अमित से या आप से यह नहीं पूछा कि इन की पहली पत्नी ने इन्हें क्यों तलाक दे दिया पर अब सोच सकती हूं कि अमित के तलाक में भी आप का ही हाथ रहा होगा.’’

मां और पत्नी के बीच बढ़ती तकरार को देख कर अमित मां को उन के कमरे में ले गए और अंजली पैर पटकती हुई अपने कमरे में लौट आई.

अंजली को लगा कि एक बार फिर उसे ससुराल की दहलीज लांघनी होगी पर इस बार वह अपने पैरों पर खड़ी हो अपना सहारा स्वयं बनेगी. बाबूजी ने झूठ बोल उस का संसार बसाना चाहा पर सौरभ की कीमत दे कर वह बाबूजी की इच्छा पूरी नहीं कर पाएगी. उस की आंखें नम हो आईं. उसे अपनी तकदीर पर रोना आ गया.

तभी अमित कमरे में प्रवेश करते हुए बोले, ‘‘क्या सोच रही हो अंजली? शायद, घर वापस जाने की सोच रही हो?’’

‘‘जी,’’ छोटा सा उत्तर दे अंजली फिर खामोश हो गई.

‘‘मैं ने तो तुम से जाने को नहीं कहा,’’ अमित ने कहा तो अंजली रुखाई से बोली, ‘‘लेकिन आप ने अपनी मां का या मेरी बातों का कोई विरोध भी तो नहीं किया. क्या आप सुमेधा और सुप्रिया के बिना रह सकते हैं?’’ इतना कहतेकहते अंजली रो पड़ी.

‘‘ठीक है, हम जाएंगे और अपने बेटे सौरभ को ले कर आएंगे,’’ अमित की बात सुन सहसा अंजली को विश्वास नहीं हुआ. वह चकित सी अमित को देख रही थी तो अमित हंस पड़े.

‘‘लेकिन आप की मां,’’ अंजली ने शंका जाहिर की.

‘‘अरे हां, मैं तो भूल ही गया था, अभी आया,’’ कह कर अमित मुड़ने को हुए तो अंजली ने टोका, ‘‘आप कहां जा रहे हैं?’’

‘‘अपनी मां को घर से निकालने,’’ अमित ने हंस कर कहा.

‘‘जी’’ किसी बच्चे की तरह चौंक कर अंजली फिर बोली, ‘‘जी.’’

‘‘अरे भई, उन्होंने ही तो अभी कहा था कि इस घर में या तो सौरभ रहेगा या वह रहेंगी. कल जब सौरभ आ रहा है तो जाहिर है वह यहां नहीं रहेंगी,’’ अमित ने कहा.

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‘‘लेकिन मैं ऐसा भी नहीं चाहती. आखिर वह आप की मां हैं,’’ अंजली अटकते हुए बोली.

‘‘मेरी मां हैं तभी तो उन्हें उन के भाई के यहां कुछ दिन छोड़ने के लिए जा रहा हूं. तुम चिंता मत करो. वह भी अपने बच्चे से अलग होंगी तभी तुम्हारी ममता को समझ पाएंगी. धीरेधीरे सब ठीक हो जाएगा,’’ कह कर अमित बाहर निकल अपनी मां के कमरे की ओर मुड़ गए.

सुखदुख के मिलेजुले भाव ले वह अमित और उन की मां की उठती आवाजों को सुनती रही. बहस का अंत अमित के पक्ष में आतेआते अंजली का मस्तक अमित के लिए श्रद्धा से झुक गया.     द्य

मशहूर संगीतकार खय्याम का 92 साल की उम्र में निधन

उन्हे 21 दिन से फेफड़े के इंफेक्शन के चलते अस्पताल में भर्ती किया गया था. 16 अगस्त को उन्हें आईसीयू में भर्ती किया गया था. सोमवार की सुबह से ही उनकी हालत बिगड़ने लगी थी. अंततः सोमवार रात 9: 30 बजे कार्डिएक अरेस्ट के चलते 92 साल की उम्र में उनका निधन हुआ.

खय्याम का पूरा नाम मोहम्मद जहुर ‘खय्याम‘ हाशमी है. उनका जन्म अविभाजित पंजाब के नांवाशहर जिले के राहोन मे हुआ था. आजादी के बाद वह भारत आ गए. जबकि उनका पूरा परिवार, बहन वगैरह पाकिस्तान में ही रहे. उन्होने 17 साल की उम्र में लुधियाना से संगीत की दुनिया में कदम रखा था. मजेदार बात यह है कि खय्याम साहब संगीतकार की बजाय अभिनेता बनना चाहते थे. वह लाहौर फिल्मों में अभिनेता बनने के लिए ही गए थे, मगर लाहौर में बाबा चिष्ती से संगीत की शिक्षा ग्रहण की थी. 1943 में वह लुधियाना आ गए थे. बाद में उन्होने पंडित अमर नाथ से भी संगीत सीखा. बीस साल की उम्र में यानी कि 1947 में उन्होंने फिल्म ‘‘रोमियो एंड ज्यूलिएट’ मे गीत गाया. फिर 1948 में ‘हीर रांझा’ में  संगीतकार शर्माजी वर्माज जोड़ी के शर्मा जी बनकर संगीत दिया. 1950 में फिल्म ‘बीवी’ और 1951 में फिल्म ‘प्यार की बाते’ ‘ में अपने नाम से संगीत दिया. मगर 1953 में फिल्म ‘‘फुटपाथ’ में संगीतकार के रूप में उन्होने अपना नाम खय्याम कर लिया था.

बतौर संगीतकार खय्याम को 1958 में पहचान मिली राज कपूर और माला सिन्हा अभिनीत फिल्म ‘‘फिर सुबह होगी’ से. इस फिल्म का गीत ‘‘वह सुबह कभी तो आएगी’ आज भी लोगों की जुबां पर है. उसके बाद से वह लगातार संगीत जगत में हावी रहे. उन्होने ‘‘शोला और शबनम’, ‘आखिरी खत’, ‘प्यासा दिल’, ‘कभी कभी’, ‘त्रिषूल’, ‘खानदान’,‘नूरी’, ‘थोड़ी सी बेवफाई’ ‘बाजार’’, ‘आहिस्ता आहिस्ता‘, ‘रजिया सुल्तान‘, ‘बेपनाह‘ सहित पचास से अधिक चर्चित और शानदार फिल्मो में सगीत दिया.

1981 में प्रदर्शित बौलीवुड फिल्म ‘‘उमराव जान’’ ने बाक्स औफिस पर धमाल मचाने के साथ खय्याम को संगीतकार के रूप में एक नया मुकाम दिलाया. इस फिल्म के गाने आज भी इंडस्ट्री और संगीत प्रेमियों के दिलों में जगह बनाए हुए हैं. इस फिल्म के लिए उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार के साथ ही फिल्मफेअर पुरस्कार से भी नवाजा गया था.

गैर फिल्मी गीत भी लोकप्रियः

संगीतकार खय्याम के सिर्फ फिल्मी ही नहीं गैर फिल्मी गीत भी काफी लोकप्रिय हैं. जिनमें ‘पांव पड़ूं तोरे‘,  ‘बृज में लौट चलो‘  और ‘गजब किया तेरे वादे पर एतबार किया ‘का समावेश है. उन्होंने 1971 में मीना कुमारी की कविताओं के अलबम को भी संगीत से संवारा था, जिन्हे खुद मीना कुमारी ने गाया था.

राजेश खन्ना ने उपहार में दी कार 

1967 में राजेश खन्ना ने फिल्म ‘‘आखिरी खत’’ से बौलीवुड में कदम रखा था. इस फिल्म को संगीत से खय्याम ने संवारा था. फिल्म के संगीत को काफी सराहा गया.उसके बाद आठ साल तक खय्याम साहब ने फिल्मी दुनिया से सन्यास ले लिया था. जब उन्होंने वापसी की तो राजेश खन्ना की फिल्म ‘‘मजनून’’ को खय्याम ने संगीत से संवारा था,  जिससे खुश होकर राजेश खन्ना ने खय्याम साहब को कार उपहार में दी थी. मगर यह फिल्म आज तक प्रदर्शित नहीं हो पायी.

बेटे के लिए बने फिल्म निर्माताः

खय्याम साहब ने अपने इकलौटे बेटे स्व.प्रदीप खय्याम को बतौर अभिनेता बौलीवुड में लौंच करने के लिए 1990 में ‘‘जाने वफा’’ नामक फिल्म का निर्माण किया था और इसे संगीत से भी संवारा था. इस फिल्म में स्व.प्रदीप खय्याम के अलावा रति अग्निहोत्री, फारूख शैख, शफी इनामदार, प्रदीप कुमार इफ्तकार ने भी अभिनय किया था. मगर इस फिल्म ने बौक्स आफिस पर पानी नहीं मांगा और प्रदीप खय्याम का अभिनय कैरियर डूब गया. उसके बाद प्रदीप ने दो तीन फिल्मों में बतौर सहायक संगीतकार खय्याम साहब के साथ काम किया था.

बेटे की मौत से टूट गए थेः

2012 अचानक अपने इकलौटे बेटे प्रदीप खय्याम की मौत से खय्याम साहब टूट गए थे. फिर भी 2014 में उन्होंने प्रेमचंद की कहानी पर बनी फिल्म‘बाजार ए हुश्न’ और 2016 में ‘गुलाम बंधू’को संगीत से संवारा. नब्बे साल की उम्र में अपनी चल और अचल संपत्ति का बनाया ट्रस्ट अपने 89 साल पूरे होने पर खय्याम साहब व उनकी पत्नी ने अपनी सारी चल व अचल संपत्ति का ‘‘खय्याम केपीजे ट्रस्ट’’ नामक ट्रस्ट बना दिया था. इस ट्रस्ट में अनूप जलोटा, तलत अजीज व राज शर्मा ट्रस्टी हैं.

‘‘फेडरेशन आफ वेस्टर्न इंडिया सिने इंम्पलाइज’ को दिया डेड़ लाख का चेक खय्याम और उनकी पत्नी जगजीत कौर ने 2016 में ट्रस्ट बनाने के बाद से फिल्म इंडस्ट्री के जरूरतमंदों के लिए डेड़ लाख का चेक अपने ‘खय्याम केपीजे चैरिटेबल ट्रस्ट’ की तरफ से ‘फेडरेशन औफ वेस्टर्न इंडिया सिने इम्पलाइज’ को हर साल देते आ रहे थे. 2018 में डेड़ लाख का चेक देते हुए खय्याम साहब ने कहा था- ‘‘हमें फिल्म इंडस्ट्री ने इतना कुछ दिया है कि अब हम लोगों ने सोचा अब फिल्म इंडस्ट्री को वापस किया जाए. इसीलिए यह कदम उठाया है. हम लोग चाहते हैं कि अन्य लोग आगे आएं और फिल्म इंडस्ट्री की भलाई के लिए कुछ करें. हम रहें या ना रहें, लेकिन हमारा ट्रस्ट चलता रहेगा. यह ट्रस्ट  लोगों की मदद करता रहेगा.

हमारे निधन के बाद हमारी पूरी चल अचल संपत्ति को बेचकर नगद राशि के रूप में बदलकर ट्रस्ट के नाम पर बैंक में फिक्स डिपोजिट किया जाएगा. इससे जो फायदा होगा उसमें से 5 लाख रूपए प्रधानमंत्री कोश में, पांच लाख रूपए मुख्यमंत्री कोश में और इंडस्ट्री के जरूरतमंद लोगों को एक लाख रूपए की जीवन में एक बार मदद करेगा.’’

खय्याम की चंद लोकप्रिय फिल्मेंः

‘आखिरी रात‘ के गीतकार कैफी आजमी थे. इसके गीत ‘बहारों मेरा जीवन भी सवारो ‘को लता मंगेशकर ने गाया था. जबकि भूपेन्द्र सिंह से बतौर पाष्र्व गायक करियर की शुरूआत की थी. खय्याम ने अमिताभ बच्चन की फिल्म ‘कभी कभी‘ को संगीत दिया था. इस फिल्म को सर्वश्रेठ गीतकार, सर्वश्रेठ संगीतकार, सर्वश्रे ठ पाष्र्व गायक के तीन फिल्मफेयर अवार्ड्स मिले.

रेखा के करियर की सफलतम व यादगार फिल्म ‘उमराव जान‘ के संगीतकार खय्याम थे. मजेदार बात यह है कि पहले इस फिल्म के संगीतकार कोई और थे पर खय्याम को मौका मिला. इस फिल्म ने खय्याम को सर्वश्रेठ संगीतकार का राष्ट्रीय और फिल्मफेअर पुरकार दिला दिया.

‘फिर सुबह होगी‘ के लिए गीतकार साहिर लुधियानवी ने खय्याम का नाम सु-हजयाया था. इस फिल्म के गाने ‘चीन ओ अरब हमारा‘ और डुएट ‘वो शाम कभी तो आएगी’ काफी लोकप्रिय हुए. फिल्म ‘बाजार‘ के कई गाने लोकप्रिय हुए. लेकिन जिस गाने को लोगों ने सबसे ज्यादा पसंद किया वह था ‘करोगे याद तो हर बात‘ था. यह गाना नसीरुद्दीन शाह और स्मिता पाटिल पर फिल्माया गया था.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्वीट कर कहां

खय्याम के निधन पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्वीटर पर श्रद्धांजलि देते हुए दुख व्यक्त किया. उन्होने ट्वीटर पर लिखा- ‘‘सुप्रसिद्ध संगीतकार खय्याम साहब के निधन से अत्यंत दुख हुआ है. उन्होंने अपनी यादगार धुनों से अनगिनत गीतों को अमर बना दिया. उनके अप्रतिम योगदान के लिए फिल्म और कला जगत हमेशा उनका ऋणी रहेगा. दुःख की इस घड़ी में मेरी संवेदनाएं उनके चाहने वालों के साथ हैं.

लता मंगेशकर ने कहा

प्रसिद्ध गायिका लता मंगेशकर ने भी महान संगीतकार के निधन पर शोक व्यक्त किया. उन्होंने अपनी भावनाएं जाहिर करते हुए ट्वीट किया- ‘महान संगीतकार और बहुत ही नेक दिल इंसान खय्याम साहब आज हमारे बीच नहीं रहे. यह सुनकर मुझे इतना दुख हुआ है जो मैं बयां नहीं कर सकती. खय्याम साहब के साथ संगीत के एक युग का अंत हुआ है. मैं उनको विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करती हूं‘.

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