लेखक- डा. सत्यकुमार

आप के मित्रों में, संबंधियों में और पड़ोसियों में अनेक ऐसे व्यक्ति होंगे जिन को हर बात का ज्ञान होता है. ताल ठोंक कर वे अपनी बात कहते हैं और आप को पसोपेश में डाल देते हैं.

‘‘जी, हां, इन्हें ही मैं रायचंद कहता हूं. इन से आप पूछें या न पूछें, मांगें न मांगें, यह अपनी राय जरूर देंगे. उस शाम मैं उदास बैठा था. सीताराम आया तो मुंह से निकल गया, ‘‘पिताजी का पत्र आया है, माताजी अस्वस्थ हैं. सोचता हूं, घर का चक्कर लगा आऊं.’’

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