Coronavirus की वजह से घर में कैद ‘कार्तिक’ ने किया कुछ ऐसा, क्या आ रही है ‘नायरा’ की याद?

पूरे वर्ल्ड में फैले कोरोना वायरस (Corona Virus) की वजह से भोरत में हुए लौकडाउन (Lockdown) की वजह से हर इंसान परेशान है. आम आदमी से लेकर बौलीवुड स्टार्स (Bollywood Stars) तक ने खुद को अपने-अपने घरों में कैद कर लिया है. भारत में लौकडाउन का कारण खुद के साथ साथ बाकी सब को बचाना भी है. ऐसे में कई बौलीवुड स्टार्स अपने-अपने घरों से फैंस के लिए वीडियोज बना कर सोशल मीडिया पर अप्लोड कर रहे हैं और साथ ही टिप्स दे रहे हैं कि घरों में रहकर कैसे खुद को एंटरटेंन कर सकते हैं.

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स्टार प्लस (Star Plus) का पौपुलर सीरियल ये रिश्ता क्या कहलाता है (Yeh Rishta Kya Kehelata Hai ) लंबे समय से दर्शकों का फेवरेट बना हुआ है और इसका कारण इस शो में लीड रोल निभा रहे आर्टिस्ट कार्तिक (Kartik) और नायरा (Naira) है. दरअसल दर्शकों को कार्तिक और नायरा की जोड़ी बेहद पसंद है. कार्तिक उर्फ मोहसीन खान (Mohsin Khan) और नायरा उर्फ शिवांगी जोशी (Shivangi Joshi) ने भी इन दिनों खुद को सेल्फ आइसोलेट कर रखा है और दोनों ही अपने-अपने घरों में कैद हैं.

ऐसे में कार्तिक (Kartik) यानि मोहसीन खान (Mohsin Khan) का एक वीडियो सोशल मीडिया पर काफी वायरल हो रहा है जिसमें वे एक अतरंगी काम कर रहे हैं जिसे देख आप भी हैरान रह जाएंगे. दरअसल इन दिनों हर कोई अपने घरों में रहकर परेशान हो गया है और ऐसे में कार्तिक अपने घर में बैठ कर एक मकड़ी से बात कर रहे हैं. जी हां, एक मकड़ी कार्तिक के घर की खिड़की पर आ बैठी जिससे कार्तिक बातचीत करने लग गए. कार्तिक यानी मोहसिन खान की ये हरकत देखकर हमें तो यहीं लगता है कि शायद उन्हें अपनी नायरा यानी शिवांगी जोशी की याद आ रही है. तभी तो उनकी याद में वो ऐसी हरकते करते दिखाई दे रहे हैं.

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सुनने में तो ये अजीब ही है लेकिन ये वीडियो इस बात का सबूत है कि लोगों का अपने घरों में टाइम बड़ी ही मुश्किल से कट रहा है. जहां एक तरफ कार्तिक अपने घर की मकड़ियों से बात कर रहे हैं तो वही दूसरी तरफ कार्तिक की को-स्टार नायरा यानि शिवांगी जोशी दूर पहाड़ो में अपना समय बिता रही है. शिवांगी ने अपने औफिशियल इंस्टाग्राम अकाउंट से अपनी फोटो शेयर की है जो कि टिहरी गढ़वाल, उत्तराखंड की है.

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#coronavirus: कोरोना से लड़ने के लिए भोजपुरी एक्ट्रेस अक्षरा सिंह ने दिए 1 लाख रुपए

कोरोना वायरस महामारी को लेकर दुनियाभर में लड़ाई जारी है. भारत में अभी 21 दिन का लौकडाउन चल रहा है. ऐसे में फिल्‍म इंडस्‍ट्री से जुड़े लोग भी मदद लेकर सामने आ रहे हैं. इसी में आज एक नाम अक्षरा सिंह का जुड गया है, जिन्‍होंने आज मुख्‍यमत्री राहत कोष में 1 लाख का चेक दिया है. उन्‍होंने इस चेक की तस्‍वीर भी साझा की है और कहा कि Covid-19 महामारी ने कई जिंदगियों को रोक कर रख दिया है. इस मुश्किल दौर में मैं बिहार के लोगों के लिए एक लाख रुपये डोनेट कर रही हूं. मेरी ओर से यह एक छोटी मदद है. आपको बता दें कि कोरोना महामारी में भोजपुरी इंडस्‍ट्री से मदद को आगे आने वाली पहली अभिनेत्री बन गई हैं अक्षरा सिंह. अब तक इस इंडस्‍ट्री से किसी अभिनेता, अभिनेत्री और अन्‍य लोगों ने कोई मदद नहीं की है.

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अक्षरा ने कहा कि बिहार में हालांकि अभी मामले कम हैं, लेकिन सरकार पूरी तरह से सजग है. मैं भी अपने लोगों के लिए कुछ करना चाहती हूं, इसलिए मैं अपनी ओर से छोटी सी मदद भेज रही हूं. मैं आशा करती हूं कि हम मिलकर लड़ेंगे और इस महामारी को जल्द ही खत्म कर देंगे. अक्षरा ने कहा कि घर में रहना और साफ सफाई रखना ही हमारे लिए विकल्‍प है. इसलिए सरकार के निर्देशों का पालन करें. हम कोरोना को हराने में जरूर होंगे कामयाब.

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वहीं, अक्षरा सिंह ने लोगों को घर से बाहर न निकलने की सलाह देते हुए अपने इंस्‍टाग्राम पर एक वीडियो भी पोस्‍ट किया है. इस वीडियो में वे सूर्य नमस्‍कार करती नजर आयी हैं और उन्‍होंने अपने चाहने वालों को भी इसे चाइलेंज दिया है. अक्षरा लॉकडाउन से पूर्व लोगों के बीच मास्‍क,सेनेटाइजर और ग्‍लव्‍स भी बांटे थे. उस दौरान उन्‍होंने लोगों से कोरोना से लड़ने के लिए भी जागरूक किया था.

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#Lockdown: लौक डाउन में फेल हो रही “औन लाइन शौपिंग”

लौक डाउन के 21 दिनों में जनता को घर से कम से कम निकलना पड़े इसको इंतजाम करने के लिए सरकारी और गैर सरकारी स्तर पर कई प्रयोग किये जा रहे है. सरकार की सोच है कि यह काम सफल होने से लोग घरों से कम निकलेंगे जिससे करोना वायरस के फैलने का खतरा कम होगा. सड़को पर सामान खरीदने के लिए जुटने वॉले लोगो को निकलने से रोका जा सकता है.

लखनऊ में सरकार ने ईजी डे, बिग बाजार, विशाल मेगा मार्ट, स्मार्ट बनिया, राउंड ओ क्लौक, फैमली बाजार, स्पेंसर, बिग बास्केट, ग्रॉफर, स्वगी, जोमैटो, अमेजन और फिल्पकार्ड को लोगो को औन लाइन समान पहुचने के लिए कहा है. औन लाइन डिलीवरी करने वाली यह सभी दुकानें एक सप्ताह से अधिक का समय सामान डिलीवरी करने में लगा रही है. इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि इनके पास ऐसी बड़ी व्यवस्था नही है जो इतनी बड़ी संख्या में लोगो तक माल पहुचा सके. ऐसे में घर और कालोनियों के खुली दुकानें मनमाने भाव मे समान बेच रही है. सरकार ने मूल्य सूची भी दुकानों पर लगवा दी है इसके बाद भी मुनाफाखोरी कम नही हो रही. सबसे बड़ी परेशानी फल और सब्जियों की आ रही है. गांवों के आसपास लगने वाली बाज़ारो को बंद कर दिया गया है. मंडियों में केवल थोक व्यापारी को ही जाने की अनुमति है. इसके अलावा वहां पुलिस की अपनी अलग मनमानी चल रही है. पुलिस की पिटाई को “सुताई” का नाम प्रचलित हो गया है.

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सरकारी स्तर पर प्रयास :

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने “डोर टू डोर डिलीवरी” के निर्देश दिए.

26 मार्च तक प्रदेश में 18570 मोबाइल वैन प्रदेश में डोर टू डोर डिलीवरी के लिए लागये गए .लखनऊ और कानपुर में बड़ी संख्या में मोबाइल में लगाई गई है. शहरों और गांव में अधिक से अधिक मोबाइल वैन लगाई जा रही है. जिससे वँहा के लोगो को ज्यादा मदद की जा सके.

इसी तरह पशुपालन विभाग के अंतर्गत पता चला है कि 700000 लीटर दूध का वितरण आधा किलो 1 किलो के पैकेट में बांटा गया जा रहा है. लगभग 1100000 दूध के पैकेट बांटे गए हैं जो कि प्रदेश में 8000 गाड़ियों के माध्यम से पहुंचाया जा रहा है और इसे और अधिक बढ़ाकर लगभग 20000 वाहनों से दूध का पैकेट बांटा जाएगा लगभग प्रदेश में 1500000 दूध के पैकेट बांटने की सरकार तैयारी पशुपालन विभाग कर रहा है. सरकारी सूत्रों से मिली जानकारी के हिसाब से सरकार कम से कम 3 माह का प्लान बना कर इस काम को कर रही है. सरकार ने अनाज के पैकेट बना कर लोगो तक पहुचने की व्यवस्था की है.

सरकार भले ही कह रही हो कि उसने लोगो तक सामान पहुचने की व्यवस्था कर ली हो पर सच्चाई यह है कि लोगो को अपनी जरूरत का सामान नही मिल रहा है. लखनऊ के गोमतीनगर जैसे पॉश इलाके में सरकार की “डोर टू डोर डिलिवरी” वाली गाड़िया नही पहुच पा रही है. यहां रहने वाली जूही सिंह कहती है ”सरकारी गाड़िया 3 दिन से एक बार भी यँहा नही आई हैं. प्रशासन ने जिन ऑन लाइन कम्पनियों के नम्बर जनता को बातए उनमें फोन करने पर जायदातर फोन रिसीव नही हो रहे या फिर कम्पनियों एक सप्ताह से 10 दिन का समय सामान पहुचने के बात रही है.”

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जिला प्रशासन का कहना है कि डोर टू डोर डिलीवरी वाली गाड़िया बराबर जा रही है. उनकी  संख्या और बढ़ाने का काम हो रहा. ऑन लाइन कम्पनियां भी तेजी से इस काम मे लगी है. इसके अलावा पुलिस भी इस काम मे मदद कर रही है.

#coronavirus: कोरोना महामारी में भी हंसी की फुलझड़ियां

बेशक चीन की देन कोरोना वायरस का नाम सुनते ही शरीर में झुरझुरी सी दौड़ जाती है. फिलहाल हालात बेकाबू से लगते हैं और जिस तरह लोग इस महामारी के खतरनाक असर को समझ नहीं पा रहे हैं, उस से तो आने वाले दिनों में कैसे हालात बनेंगे, उस की कल्पना भी नहीं की जा सकती है.

अब जबकि पूरा भारत लाकडाउन का दंश झेल रहा है, तो घर पर उस के साथी परिवार वाले तो हैं ही, पत्रिकाएं और पुस्तकें भी उसे सही राह दिखा रही हैं, फिर वे लोगों के घर में रखी हों या डिजिटल एडिशन ही सही.

सोशल मीडिया के जरिए सब हर तरह की जानकारी पा रहे हैं. इन में सच भी होता है तो अफवाहें भी. सरकार की तारीफ होती है तो उस की खिंचाई भी. लोगों की जान बचाते डाक्टरों के वायरल होते वीडियो होते हैं तो कहींकहीं पुलिस की ज्यादती या दूसरे लोगों की कालाबाजारी के चर्चे भी उघाड़ दिए जाते हैं.

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इन सब के बीच कुछ ऐसा मनोरंजन भी हो रहा है जो कोरोना की महामारी के डर के बावजूद घर बैठे लोगों के चेहरे पर मुसकान ले आता है. बहुत बार तो खिलखिलाहट भी. ऐसे ही चंद चुटकुले हैं जो सोशल मीडिया पर चकरघिन्नी की तरह घूम रहे हैं. इन में से कुछ खास इस तरह हैं :

कोरोना महामारी न फैले इसलिए एक बार एक आदमी वर्किंग फ्राम होम कर रहा था. उस का क्लाइंट किसी बात पर नाराज हो कर बोला, ‘मैं आप के काम से खुश नहीं हूं. आप अपने बौस से मेरी बात कराइए.’

इतना सुनते ही वह आदमी जोर से चिल्लाया, ‘अजी सुनती हो, ये जनाब तुम से बात करना चाहते हैं.’

इसी तरह घर पर बैठे 2 दोस्त फोन पर अपना दुखड़ा रो रहे थे. पहला दोस्त बोला, ‘मैं इस समय  स्टेज 3 में हूं. पहली स्टेज में बरतन मांजे, दूसरी स्टेज में खाना बनाया, तीसरी स्टेज में कपड़े धो रहा हूं. और तुम?’

दूसरा दोस्त ने सीना तान कर कहा, ‘मैं ने बेलन से मार खा ली मगर काम नही किया… भाई, कोरोना तो थोड़े दिन में चला जाएगा, मगर पत्नी को पता चल गया कि इस को यह सब आता है तो जिंदगीभर करना पड़ेगा.’

एक भाई ने तो अपनी भड़ास कुछ इस तरह निकाली, ‘इसी तरह लाकडाउन बढ़ता रहा और 24 घंटे मियांबीवी को साथ रहना पड़ा, तो वैज्ञानिकों से पहले कोई पति ही कोरोना वायरस का टीका बना देगा.’

कर्फ्यू लगने के बावजूद एक बंदा बाहर सड़क पर टहल रहा था कि पुलिस ने उस से पूछा, ‘कहां जा रहे हो मुंह उठाए…पता नही कर्फ्यू लगा है…’

उस आदमी ने दर्द को पीते हुए कहा, ‘जनाब, दर्द दूर करने की मलहम लेने जा रहा हूं, कर्फ्यू का पता तो पिछले चौक में ही लग गया…’

इसी तरह एक आदमी डाक्टर के पास गया और बोला, ‘डाक्टर साहब, मुझे बैठने मे काफी तकलीफ हो रही है.’

डाक्टर ने छूटते ही पूछा, ‘कर्फ्यू देखने गए थे क्या?’

उस आदमी ने हैरान हो कर पूछा, ‘आप ने कैसे पहचाना?’

‘क्योंकि आजकल ऐसे लोग ज्यादा दवा लेने आ रहे हैं,’ डाक्टर ने चुटकी ली.

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घर में बैठेबैठे पक चुके एक आदमी ने अपने दोस्त पर भड़ास निकाली, ‘बिलकुल रेलवे के डब्बे में बैठने जैसी फीलिंग आ रही है … सिर्फ टायलेट के लिए उठ कर जाना है और फिर वापस आ कर अपनी जगह पर बैठ जाना है.’

एक आदमी ने तो हद ही कर डाली और बोला, ‘वह दिन दूर नहीं जब लोग कहेंगे कि यह छोटा वाला तो कोरोना के चक्कर में पैदा हो गया.’

एक आदमी ने तो चेतावनी दे डाली, ‘अगर बीवी से लड़ाई भी हो जाए तो भी घर से बाहर नहीं निकले.. इज्जत ही सबकुछ नहीं होती, जान है तो जहान है…’

एक भाई ने तो ज्ञान की गंगा ही बहा दी, ‘नोटबंदी की अपार सफलता के बाद पेश है ‘घरबंदी’ और वह भी अपनी ही बंदी के साथ…’

एक कवि टाइप शादीशुदा मर्द ने घर से ही एक चेतावनी दे डाली, ‘हवा की लहर बन कर, तू मेरी खिड़की न खटखटा. मैं बंद कमरे में बैठा हूं… तूफान से सटा…’

दरअसल, यहां वह आदमी अपनी गर्लफ्रैंड को बता रहा है कि मिसकाल मत देना, बीवी पास ही बैठी है.

लाकडाउन के इस समय में समय का सदुपयोग करें. खुद को साफसुथरा रखें, टाइमपास के लिए अच्छी पत्रिकाएं पढ़ें, जागरूक बनें और मौका मिलते ही चेहरे पर मुसकान ले आएं.

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सरकार की लापरवाही: आम फैक्ट्री से लेकर बौलीवुड तक, भूखे रहने को मजबूर हैं ये दिहाड़ी मजदूर

सोमवती के होंठ सूख गए हैं, पैरों में छाले पङ गए हैं. दोनों बच्चे पारो और फेकन को 2 दिनों से खाना नहीं मिला है. उन के पैरों में भी छाले पङ गए हैं और भूख से छटपटा रहे हैं.

सोमवती कहती है,”इस से तो अच्छा है यह बीमारी हमें मार ही डाले. बच्चों को तड़पता देख कुछ समझ नहीं आ रहा क्या करें.”

पति राजभर की भी यही हालत है. जेब में 100-200 बचे हैं और उसे अपने परिवार के साथ बक्सर से राजस्थान लगभग 1,600 किलोमीटर तक पैदल ही चलना है.

राजस्थान का यह परिवार बिहार के बक्सर में एक आइसक्रीम फैक्ट्री में काम करता था. राजभर और सोमवती दोनों ही इस फैक्ट्री में पिछले 3 सालों से काम करते हैं और यहीं से मिले रोजाना पैसों से वे अपने परिवार का पेट पालते हैं.

1600 किलोमीटर पैदल चलने को मजबूर

कोरोना बीमारी से पूरे देश में लौक डाऊन होने की वजह से फैक्ट्री बंद हो गई तो उन्होंने और लोगों के साथ राजस्थान अपने गांव जाने की सोची.  कम पढेलिखे होने की वजह से उन्हें यह पता ही नहीं था कि न तो ट्रेन चल रही है न ही बस. रोड पर न गाङी चल रही न यातायात के अन्य कोई साधन.

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यहां उस के गांव के 14-15 लोग और थे. वे भी परेशान थे और गांव लौट जाना चाहते थे. कोई साधन न मिलता देख उन्होंने पैदल ही जाने फैसला किया. पर 1,600 किलोमीटर की दूरी तय करना इतना आसान भी नहीं. रास्ते में वे कहां रूकेंगे, कहां उन्हें भोजन मिलेगा इस की कोई गारंटी नहीं. पर जान है तो जहान है, यही सोच कर वे सब अपने गांव की ओर निकल पङे हैं.

दो जून की रोटी भी नसीब नहीं

इधर दिल्ली में रहने वाला राजेश बोतल में पानी भरभर कर घरघर पहुंचाने का काम करता है. अब कोरोना वायरस के कारण दिल्ली में कर्फ्यू है और वह निकल नहीं पा रहा. घर वाले भी उसे मना कर चुके हैं. अब उस के पास दो जून की रोटी की समस्या आ खङी हुई है.

यही हाल फेकनराम का है. वह बिहार का रहने वाला है और दिहाङी मजदूर है. बीते 4-5 सालों से वह देश की राजधानी दिल्ली और आसपास के इलाके में टेंट लगाने का काम करता है लेकिन बीते कुछ दिनों से सार्वजनिक कार्यक्रमों का आयोजन नहीं होने से उसे कोई काम नहीं मिल रहा.

भुखमरी की समस्या

कोरोना के कहर से दुनियाभर में घबराहट का माहौल है और लोगों के कामकाज पर गहरा असर पङा है. सामाजिक कार्यों से ले कर अन्य प्रकार के कार्यक्रम रद्द होने की वजह से दिहाङी मजदूरों के सामने भुखमरी की समस्या खङी हो गई है.

बिजनौर के रहने वाले अंबिका ने फोन पर बताया कि इस बीमारी के डर से वे और उन के साथ करीब 20-25 लोग दिल्ली से बिजनौर पैदल ही निकल पङे हैं. उन्हें पता है कि इसी में उन की जान बची रहेगी. मगर नोएडा पार करतेकरते कईयों की हालत पतली हो चुकी है और अभी उन्हें लगभग 250 किलोमीटर और चलना पङेगा.

दिल्ली का दर्द भी जुदा नहीं

दिल्ली में ऐसे कई दिहाङी मजदूर हैं जो दिल्ली छोङना चाहते हैं. हालांकि दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने सभी मजदूरों को आश्वस्त किया है कि उन्हें खाना मिलेगा पर बहुतों के पास दिक्कत यह है कि वे सरकारी रजिस्टर्ड मजदूर नहीं हैं और इन वजहों से उन्हें न तो सरकारी सुविधाओं से लाभ मिलेगा और न ही कोई सहायता ही उन तक पहुंच पा रही है.

हालांकि दिल्ली सरकार बारबार यह घोषणा कर रही है कि दिल्ली में किसी मजदूर को भूखे नहीं मरने दिया जाएगा और इस के लिए लगभग हर विधानसभा के विधायक को यह जिम्मेदारी सौंपी गई है कि वे कार्यकर्ताओं से बात कर हालात पर नजर रखें और परेशान लोगों तक जरूरी चीजें पहुंचाएं.

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बुराङी विधानसभा आम आदमी पार्टी के मीडिया प्रमुख संदीप भोनवाल ने बताया,”देखिए, यह सही है कि अभी हम मुश्किल दौर से गुजर रहे हैं और इस का सब से अधिक नुकसान दिहाङी मजदूरों को हो रहा है. पर सरकार के निर्देश पर बुराङी के 6 स्कूलों में राहत सामग्री और भोजन की व्यवस्था की गई है जो दिन में 12 बजे और शाम में 6 बजे जरूरतमंद लोगों को भोजन और जरूरत की चीजें दी जाएंगी.”

उन्होंने बताया,”बुराङी में काफी संख्या में मजदूर तबके के लोग रहते हैं जो दिल्ली के विभिन्न जगहों पर दिहाङी मजदूरी करते हैं अब सब बंद हो जाने के बाद इन के सामने खानेपीने की समस्या आ खङी हुई है और इसीलिए यहां कादीपुर, बुराङी, मुकुंदपुर व जहांगीरपुरी आदि के 6 स्कूलों में राहत शिविर लगाया गया है जहां जरूरतमंद लोगों को दोनों टाइम भोजन उपलब्ध कराया जाएगा.”

चक्का जाम, खाने के लाले

उधर, के कई अन्य जगहों से ट्रक चलाने वाले ड्राइवर व खलासियों की हालत भी पतली है. ट्रक अनलोड करने के बाद राज्य की सीमाएं सील हैं जिस की वजह से वे कहीं निकल नहीं पा रहे. सारे होटलमोटल बंद हैं और इन के जेब में पैसे तो हैं पर खाना देने वाला कोई नहीं.

इस की वजह से शहरों में जरूरी चीजों का भी अभाव हो गया है. आलू, प्याज, टमाटर की कीमतों में भारी इजाफा हो गया है.

मंडी में बुरा हाल

दिल्ली के आजादपुर सब्जी मंडी में काम करने वाले चंदन कुमार सिंह ने बताया,”अभी मंडी मात्र 3 घंटे यानी सुबह 6 बजे से 9 बजे तक ही खुली रहती है. इस को बढाया जाना चाहिए. साथ ही मंडी में जिन को सरकार ने पास दिया है वे तो आजा रहे हैं पर जिन गाड़ियों को पास नहीं मिला है उन की सैकड़ों गाङियां सङक पर खङी हैं. मंडी में केला व संतरा का काफी स्टौक है पर आवाजाही बंद होने अथवा सीमित होने से इन का सङने का डर है.”

बौलीवुड भी अछूता नहीं

उधर कोरोना वायरस से बौलीवुड भी परेशान है. यहां काम करने वाले मजदूरों की हालत पतली है और उन के सामने खानेपीने की समस्या मुंह बाए खड़ी है.

फेडरेशन औफ वेस्टर्न इंडिया सिने ऐंपलौइज (एफडब्ल्यूआईसी) के प्रमुख बीएन तिवारी ने इस पर सिने अभिनेताओं पर जम कर भड़ास निकाली है और कहा है कि ज्यादातर अभिनेता, डायरैक्टर दिनभर ट्विटर पर ट्वीट करते हैं पर मदद के नाम पर एक धेला भी मजदूरों के बने राहतकोष में नहीं देते.

उन्होंने सिने अभिनेता अमिताभ बच्चन और सलमान खान से मदद की गुहार लगाई है.

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सरकारी सहायता पर्याप्त नहीं

देश के कई जगहों में लौकडाऊन ने लोगों का जीना मुहाल कर दिया है और लोग अब केंद्र सरकार की अपर्याप्त मदद को ले कर उन्हें जम कर कोस रहे हैं.

वैसे भी पहले नोटबंदी और फिर जीएसटी से कई कंपनियों पर ताला लग चुका और अब यह कोरोना वायरस पर सरकारी उदासीनता से लोगों की रोजीरोटी पर खासा असर पङा है.

केंद्र सरकार ने महिलाओं के लिए भी धेला ही दिया और उन्हें जनधन खाते में महज 500-500 रूपए 3 महीने देने की घोषणा कर हाथ खङे कर दिए.

कालाधन रोकने के लिए नोटबंदी कानून

मारे देश में न्यायपालिका का बुनियादी सिद्धांत है कि सौ अपराधी छूट जाएं, लेकिन एक भी निरपराध को सजा न हो. यह मुहावरा कानून के क्षेत्र में बहुत सुननेपढ़ने को मिलता है, लेकिन क्या वास्तविकता में ऐसा है? देखा जाए तो इस सिद्धांत के विपरीत सरकार द्वारा बनाए गए कानून ही कितने निरपराधियों को अपराधी घोषित कर के उन्हें दंड का भागी बना देते हैं, जिस के परिणामस्वरूप बेगुनाहों को कितनी मानसिक, आर्थिक और सामाजिक यातनाओं से गुजरना पड़ता है, यह सिर्फ भुक्तभोगी ही बता सकता है.

आइए, जानते हैं किन कानूनों के तहत निरपराधियों को बिना किसी अपराध के अपराधियों के समान दंड भुगतना पड़ा.

8 नवंबर, 2016 की रात 8 बजे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अचानक राष्ट्र को संबोधन कर के कालेधन पर नियंत्रण करने के उद्देश्य से पूरे देश में 500 और 1000 रुपए के नोटों को बंद करने का ऐलान किया था. इस की वजह से अरबों निरपराधों को सजा भुगतनी पड़ी.

प्रधानमंत्री ने स्वयं स्वीकार किया है कि देश में 5 लाख के अंदर ही ऐसे लोग होंगे, जिन के पास कालाधन है. फिर उन लोगों पर सीधी काररवाई न कर के ऐसा करने से निर्दोष जनता को भी इन के लपेटे में आ कर इस का खामियाजा भुगतना पड़ा. इस के तहत देश के प्रत्येक नागरिक को मानसिक, शारीरिक और आर्थिक यंत्रणा से गुजरना पड़ा, यह सर्वविदित है. इस के कुछ उदाहरण हैं

घोषणा के तुरंत बाद ही बैंकों के बाहर लोगों की लंबीलंबी कतारें लग गईं. सागर जिले में नोट बदलने के लिए बैंक की कतार में लगे सेवानिवृत्त कर्मचारी विनोद पांडेय (70 साल) चक्कर खा कर गिर पड़े. उन्हें हार्टअटैक की गंभीर हालत में अस्पताल ले जाया गया, जहां चिकित्सकों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया.

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मुरैना जिले में नए नोट के अभाव में दवा न खरीद पाने की वजह से एक महिला ने फांसी लगा कर जान दे दी. इसी तरह न जाने कितने लोग समय से पैसा न मिलने से डाक्टर को दिखाने अस्पताल नहीं जा सके. अस्पताल से भी दवा न मिलने की वजह से उन्होंने दम तोड़ दिया.

भोपाल में 13 नवंबर, 2016 की शाम रातीबड़ शाखा के 45 साल के वरिष्ठ कैशियर पुरुषोत्तम व्यास बैंक के काउंटर पर कैश गिन रहे थे. इसी दौरान अचानक वह टेबल पर बेहोश हो कर गिर गए. काम का अधिक बोझ होने की वजह से दिल का दौरा पड़ने से उन की मौत हो गई. उस दिन नोटबंदी की वजह से रविवार को भी बैंक खुले थे. सुबह से ही बैंक के बाहर लंबीलंबी लाइनें लगी थीं.

बुलंदशहर, खुर्जा कोतवाली नगर क्षेत्र में रिक्शा चलाने वाला एक युवक 500-500 के 4 नोट बदलने के लिए बैंक के 4 दिनों से चक्कर लगा रहा था. बैंक की लाइन में लगने के बाद भी न तो नोट ही बदले जा सके और न ही वह रिक्शा चला सका. घर में पैदा हुए आर्थिक संकट से मजबूर हो कर उस ने फांसी लगा कर आत्महत्या कर ली.

बरनाला में नोटबंदी का असर शादियों पर भी देखने को मिला. शादीविवाहों के सीजन में ज्वैलरी, मैरिज पैलेस, होटल, कपड़े की दुकानों, ब्यूटीपार्लर व कैटरिंग की बहुत डिमांड होती है. विवाह वाले घर में खुशी का माहौल होता है और इस खुशी में लोग ज्यादा से ज्यादा पैसे खर्च करते हैं. परंतु 5001000 रुपए की नोटबंदी ने विवाहों का पूरा मजा ही किरकिरा कर दिया.

ये नोटबंदी नहीं, कामबंदी थी, भुखमरी जैसे हालात थे.कई कारखाना मालिकों का कहना था कि कारीगरों को वेतन देने के लिए उन के पास पैसे कम पड़ रहे थे. नतीजतन कारीगरों की छंटनी हुई या फिर उन्हें छुट्टी पर भेजा गया. कारीगरों को दिहाड़ी मिलने में दिक्कत तो हो ही रही थी, साथ ही अगर कोई काम दे भी दे तो मजदूरी 500 और 1000 के पुराने नोटों में दे रहा था.

मजदूरों का कहना था कि सरकार को इस फैसले पर अमल करने से पहले उन के बारे में सोचना चाहिए था. ज्यादातर मजदूरों का अपना बैंक खाता नहीं था और वे इस के लिए भी दूसरों पर निर्भर थे. वे डाकघरों के जरिए अपना पैसा घर भेजते थे.

महिलाओं के लिए दहेज उत्पीड़न विरोधी एकाधिकार कानून

सरकार द्वारा बनाए गए दहेज उत्पीड़न विरोधी कानून की धारा 498ए के तहत किसी विवाहित महिला के मजिस्ट्रैट जज के सामने इतना कहने मात्र से कि उसे ससुराल वालों ने दहेज के लिए प्रताडि़त किया है या किसी प्रकार की यातना दी है तो बिना किसी जांचपड़ताल के ही महिला की ससुराल वालों को तुरंत जेल में डाल दिया जाएगा.

धारा 498ए निर्दोष वरपक्ष के लोगों को परेशान करने का सब से आसान तरीका है. अनेक मामलों में पति के साथसाथ उस के अशक्त दादादादी, विदेश में दशकों से रहने वाली उन की बहनों तक को भी गिरफ्तार किया गया है. इस कानून का पत्नियों द्वारा जम कर दुरुपयोग किया जा रहा है. असंतुष्ट पत्नियां इसे कवच के बजाय अपने पतियों के विरुद्ध हथियार के रूप में इस्तेमाल करती हैं. यह वरपक्ष के लोगों को डराने वाला शस्त्र बन गया है. इस के कुछ उदाहरण देखें

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के जानकीपुरम सेक्टर-सी के रहने वाले पुष्कर सिंह को दहेज कानून की धारा 498, 323 और 508 के तहत जेल जाना पड़ा. उन की पत्नी विनीता ने शादी के 2 साल बाद उन के परिवार के खिलाफ दहेज के रूप में 14 लाख रुपए मांगने का झूठा मुकदमा दर्ज कराया था. इस मुकदमे के चलते उन का पूरा परिवार तबाह हो गया. आर्थिक तंगी के शिकार हो गए. उन का मकान तक बिक गया, जिस की वजह से 6 फरवरी, 2008 को पुष्कर ने फांसी का फंदा गले में डाल कर खुदकुशी कर ली.

मुंबई के किशोर वर्मा की शादी दिल्ली की मीरा से सन 2011 में हुई थी. शादी के कुछ दिनों बाद ही मीरा ने किशोर से दिल्ली में रहने की जिद की. उन के न मानने पर विनीता ने पति और उस के घर वालों पर दहेज उत्पीड़न का झूठा मुकदमा दर्ज करा दिया. मुकदमा वापस लेने के लिए मीरा 25 लाख रुपए मांग रही थी.

महिलाओं के लिए बलात्कार विरोधी एकाधिकार कानून

बलात्कार मामले में भी स्त्रियों का एकाधिकार कानून होने के कारण उन के द्वारा कितने ही बेगुनाहों पर झूठे आरोप लगा कर उन्हें दंड के साथसाथ मानसिक रूप से प्रताडि़त किया गया.

अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश निवेदिता अनिल शर्मा ने रेप केस के एक आरोपी को बरी करते हुए कहा भी है कि महिलाओं की सुरक्षा के लिए जो कानून बना है, उन में से कुछ का महिलाओं द्वारा अपने स्वार्थ के लिए दुरुपयोग हो रहा है. कुछ उदाहरण इस तरह हैं

सौफ्टवेयर कर्मचारी आलोक वर्मा का कहना है कि वह देश के नए बलात्कार विरोधी कानून के बेगुनाह पीडि़त हैं. 29 साल के आलोक को तब अपनी नौकरी गंवानी पड़ी, जब उन की प्रेमिका के मातापिता ने उन के खिलाफ यौन उत्पीड़न का झूठा आरोप दर्ज करा दिया. उन्हें नई नौकरी मिलने में महीनों लग गए और उन की प्रतिष्ठा पर जो दाग लगा, वह अब तक नहीं छूटा है. आज भी उसे के पिता का सिर शर्म से झुका है.

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बुरहानपुर जिले के परेठा गांव के 38 साल के जनशिक्षक रामलाल अखंडे पर गांव की एक महिला ने बलात्कार का झूठा मामला दर्ज करा दिया था. आरोप लगने के बाद रामलाल के लिए सब कुछ बदल गया. उन्हें जो लोग सम्मान से देखा करते थे, उन की ही नजरों में अब उन के लिए घृणा टपक रही थी.

8 अप्रैल, 2016 आकाश ने हाल ही में अपनी कंपनी शुरू की थी. बड़े जतन से वह अपने सपने को पूरा करने की कोशिश कर रहे थे. अपने सभी कर्मचारियों को आकाश परिवार के सदस्य की तरह मानते थे. लेकिन अचानक कुछ ऐसा हुआ, जिस ने आकाश के कैरियर और प्रतिष्ठा को बरबाद कर के रख दिया. औफिस की एक महिला कर्मचारी ने आकाश पर बलात्कार का आरोप लगा दिया. दरअसल, वह लड़की आकाश को पसंद करती थी. आकाश के मना करने पर उसे पाने की चाहत में उस लड़की ने यह घिनौना कदम उठाया.

संदेह के आधार पर गिरफ्तारी

कानून के अनुसार, यदि पुलिस को किसी पर शक हो कि उस ने गंभीर अपराध, जैसे कि हत्या, यौन अपराध, दंगाफसाद इत्यादि को अंजाम दिया है तो ऐसे व्यक्ति को केवल शक के आधार पर बिना वारंट के गिरफ्तार किया जा सकता है, क्योंकि इस प्रकार के अपराध में पुलिस द्वारा तुरंत काररवाई करनी जरूरी होती है. इस मामले में पुलिस मजिस्ट्रैट की आज्ञा के बिना ही चार्ज ले सकती है.

इस कानून के तहत पुलिस ने अपना काम जल्दी समाप्त करने के लिए या वास्तविक अपराधी द्वारा मोटी रकम मिलने के कारण निरपराध लोगों को अपराधी घोषित कर के गिरफ्तार करने का कार्य किया है, जो उस के स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का हनन है. बाद में उसे इतनी शारीरिक यंत्रणा दी जाती है कि वह निरपराधी होते हुए भी अपराध कबूल कर लेता है, इस का ज्वलंत उदाहरण है

16 सितंबर, 2017 गुरुग्राम रायन इंटरनैशनल स्कूल में प्रद्युम्न हत्याकांड के कुछ ही घंटे बाद हरियाणा पुलिस ने शक के आधार पर बस कंडक्टर अशोक को आरोपी बना दिया था. उसे हिरासत में इतनी शारीरिक यंत्रणा दी गई कि वह हत्या का जुर्म कबूल करने के लिए मजबूर हो गया. लेकिन कुछ दिनों बाद अशोक ने कहा कि उसे फंसाया जा रहा है. उस ने हत्या नहीं की है. वकील ने भी पुलिस पर अशोक को टौर्चर करने और हिरासत के दौरान नशे के इंजेक्शन देने का दावा किया है.

उधर हरियाणा पुलिस की इस काररवाई पर प्रद्युम्न के घर वालों को भरोसा नहीं था, इसलिए उन्होंने सीबीआई जांच की मांग की. 15 सितंबर को केस सीबीआई को सौंप दिया गया. हत्याकांड के ठीक 2 महीने बाद सीबीआई ने उसी स्कूल में पढ़ने वाले सीनियर छात्र को आरोपी बताया. सीबीआई के मुताबिक, आरोपी छात्र ने एग्जाम और पीटीएम टलवाने के लिए प्रद्युम्न की हत्या की थी.

गनीमत रही कि इस हत्या की जांच सीबीआई के पास चली गई, वरना बेचारा कंडक्टर बेगुनाह हो कर भी जिंदगी भर जेल में सड़ता रहता. उस का परिवार जिल्लत की जिंदगी जीने को मजबूर हो जाता. दूसरी ओर असली आरोपी मजे से स्कूल जाता और फिर ऐसी किसी घटना को अंजाम देता.

यह मामला बहुत गंभीर है. हर मामले में तो सीबीआई जांच होती नहीं. कानून के रखवाले ही बिक जाएंगे तो फिर इंसाफ कहां से मिलेगा? इस में सरकार द्वारा शक के आधार पर गिरफ्तारी कानून पर प्रश्नचिह्न खड़ा होता है. दुख इस बात का है कि ऐसे कितने ही केस होंगे, जिन में पुलिस की गलती या फिर लालच की सजा की कीमत किसी बेगुनाह ने जेल में जिंदगी बिता कर चुकाई होगी. यह कैसा कानून है कि करे कोई और भरे कोई.

न्याय मिलने में विलंब

निरपराधी को संदेह के आधार पर गिरफ्तार कर के कारावास में डाल दिया जाता है, फिर न्याय मिलने में इतना विलंब हो जाता है कि तब तक बेगुनाह व्यक्ति की मानसिक, शारीरिक और आर्थिक स्थिति तहसनहस हो चुकी होती है.

कारावास से निकलने के बाद वह लाखों लोगों के सवालों के घेरे में आ जाता है और सामान्य जीवन जीने में उसे सालों लग जाते हैं. आरुषि हत्याकांड के निरपराधी तलवार दंपति इस का ज्वलंत उदाहरण हैं.

आरुषि हत्याकांड में आरुषि के मातापिता राजेश और नूपुर तलवार को सीबीआई कोर्ट ने 26 नवंबर, 2013 में उम्रकैद की सजा सुनाई थी. इस के बाद से ही वे गाजियाबाद की डासना जेल में बंद थे, लेकिन तलवार दंपति की याचिका पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 12 अक्तूबर, 2017 गुरुवार को 9 साल पुराने आरुषि-हेमराज हत्याकांड में उन्हें निर्दोष बता कर तत्काल रिहा करने का आदेश दे दिया.

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कोर्ट के सामने सीबीआई उन्हें अपराधी साबित नहीं कर पाई. जस्टिस पी.के. नारायण ने फैसला सुनाते हुए कहा, ‘किसी को केवल शक के आधार पर हत्यारा कह देना गलत है. सीबीआई के पास ऐसा कोई ठोस सबूत नहीं है, जिस की वजह से तलवार दंपति की याचिका रद्द की जा सके. इसीलिए उन्हें बरी किया जाता है.

अब सवाल यह उठता है कि यदि तलवार दंपति अपराधी नहीं हैं तो उन्हें न्याय मिलने में विलंब होने के कारण लगभग 4 सालों तक जेल की यातना क्यों सहनी पड़ी? जिस से उन को मानसिक, शारीरिक और आर्थिक यंत्रणा से गुजरना पड़ा. एक तो उन्हें बेटी को खोने का दुख, ऊपर से हत्या का लांछन झेलने के दुख ने उन्हें जीते जी मार दिया.

एक प्रतिष्ठित डाक्टर दंपति बेटी की हत्या के इतने सालों बाद की प्रक्रिया से प्रभावित हो कर दोबारा से पहले जैसा जीवन पुनर्स्थापित कर पाएंगे? सरकार के पास इस का जवाब क्या है?

हमारे देश के अंधे कानून की नीति से जनता का विश्वास उठ गया है, इसीलिए सही अपराधी को सजा देने के लिए बहुत से लोग कानून को हाथों में ले कर स्वयं ही उसे सजा देने पर मजबूर हो जाते हैं. इस पर बहुत सारी फिल्में बनी हैं, लेकिन सरकार के कानों पर जूं तक नहीं रेंगती.

कई बार तो यह देखा गया है कि कई निरपराधी हत्या के झूठे आरोप में उम्रकैद की सजा काटने के बाद जेल से बाहर आ कर असली अपराधी की हत्या कर देता है और कानून से पूछता है कि क्या उसे इस अपराध की दोबारा सजा मिल सकती है?

क्या उस निरपराध को कानून उस की जेल में बीती जिंदगी वापस लौटा सकता है? कानून हमारे मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए बनाए गए हैं, लेकिन जब रक्षक ही भक्षक बन जाएं तो हमारी सुरक्षा की जिम्मेदारी कौन लेगा? आखिर कब इस अंधे कानून का

अंत होगा और निरपराध को सुरक्षा प्रदान होगी? ?

लापता क्रिप्टोकरेंसी की लुटेरी महारानी

बिटकौइन के मुकाबले नई क्रिप्टोकरेंसी वनकौइन इजाद कर धोखाधड़ी करने वाली बुल्गारिया की एक संभ्रांत महिला रुजा इग्नातोवा पर चार बिलियन डालर घोटाले का आरोप है. वह दुनिया भर के दर्जनों देशों के लोगों से लाखों-करोड़ों रुपे, डौलर, यूरो या पौंड की मुद्राओं में पैसे बटोर कर फरार हो चुकी है. डिजिटल जमाने की इस ठगी के शिकार होने वालों में भारतीय भी हैं. अमेरिका समेत भारत की पुलिस को भी उसकी तलाश है.

दिल्ली के कनाट प्लेस इलाके में एक कैंटिन चलाने वाला 25 वर्षीय रामनरेश अप्रैल 2015 में बिहार से आया था. मैट्रिक पास ग्रामीण युवक को उसके ही गांव के जान-पहचान वाले की मदद से कैंटिन में हेल्पर का काम मिल गया था. वह अधिक से अधिक पैसा कमाना चाहता था. इसके लिए  किसी भी तरह का काम करने को इच्छुक था. उसे कोई भी मोटा-महीन काम करने से जरा भी संकोच नहीं था. एक दिन उसे पार्ट टाइम पैसा कमाने के बारे में जानकारी मिली. कैंटिन में अक्सर चाय पीने आने वाले एक युवक ने उसे औनलाइन मल्टी लेवल मार्केटिंग बिजनेस और क्रिप्टोक्वाइन के बारे में समझाया कि कैसे वह उसके जरिए डाॅलर में पैसे कमाकर रातोंरात अमीर बन सकता है. इसके लिए तीन तरह के स्कीमों में 4000, 6000 या फिर 8000 रुपये नगद का भुगतान कर एक मल्टीनेशनल कंपनी के वेबपोर्टल का मेंबर बनना था.

मेंबर बनते ही उसके नाम से खुले आईडी अकाउंट में क्रमशः 50, 75 या 100 डौलर आ जाने वाले थे. वह रकम तब डालर के रुपये में वैल्यू के हिसाब से जमा की गई राशि से कुछ अधिक ही  थी. उसने तुरंत दो मेंबरशिप ले ली. एक अपनी और दूसरी पत्नी के नाम आईडी बना डाले. बदले में उसे जमा की गई रकम के कमीशन के चेक भी मिल गए. उसे कंपनी के हजारों करोड़ डौलर से अधिक मल्टीनेशनल बिजनेस से जुड़े विभिन्न देशों के हजारों लोगों की मोटी आमदनी के बारे बताया गया. साथ ही समय-समय पर महंगी गाड़ियां, बाइक, फ्लैट या इलेक्टाॅनिक गजेट व घरेलू सामानों के उपहार मिलने की भी बात कही गई. यह सब उसके लिए किसी सपने से कम नहीं था. इसे पाने के लिए वह जीतोड़ मेहनत करने से पीछे नहीं हटने वाला था.

वह कंपनी के नियम और शर्तों का पालन करते हुए ज्यादा से ज्यादा लोगों को मेंबर बनाने में जुट गया. हर नए मेंबर से उसे कमीशन की आमदनी होने लगी. वह कमीशन की राशि काटकर कंपनी के पोर्टल पर पैसे जमा कर दिया करता था. कंपनी द्वारा होने वाली उसकी आमदनी का शुरूआती जरिया यही था. अतिरिक्त मोटी आमदनी के लिए तबतक इंतजार करना था, जबतक कि उसके आईडी आकाउंट में 500 डालर जमा नहीं हो जाते. वह बड़ी राशि सीधे उसके बैंक आउंट में ट्रांस्फर होने वाले थे. मेंबरशिप का पैसे जमा करते ही आईडी अकाउंट में 72 घंटे के भीतर आमदनी की राशि जुड़ने लगी. वह उन पैसों का अपने बैंक खाते में ट्रांस्फर होने का इंतजार करने लगा. बताया गया था कि टैक्स कटकर आमदनी की रकम स्वतः उसके खाते में आ जाएगी.

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रामनरेश को आनलाइन काम करने की एक छोटी ट्रेनिंग मिली, लेकिन पोर्टल में दिए गए नियम और शर्तें अंग्रेजी में होने के कारण ठीक से नहीं समझ पाया. इसकी उसने जरूरत भी नहीं समझा और अपने दोस्त की बातों पर भरोसा कर कंपनी का सेल्स एजेंट बन गया. इस काम में दोस्त को सीनियर मानकर उसके बताए तरीके पर मेंबर बनाने लगा.

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कुछ महीने में ही रामनरेश ने 200 से अधिक मेंबर बना लिए. सीनियर से मिली जानकारी के हिसाब से उसकी आईडी के खाते में 500 डालर से अधिक आ जाने चाहिए थे, जो 325 पर आकर ही अटक गया था. इस बारे में उसे सीनियर से पूछने पर मालूम हुआ कि ऐसा उसके द्वारा चेन सिस्टम के पिरामिड रूल को फाॅलो नहीं करने के कारण हुआ.

मल्टी लेवल मार्केटिंग यानी कि एमएलएम के अनुसार उसकी आईडी के दोनों साइड से मेंबर बनने चाहिए थे. उसे बनाए मेंबर पर भी मेंबरशिप के लिए दबाव बनाना चाहिए था. खैर, उसे पोजेटिव बने रहकर मेंबरशिप पर ध्यान देना होगा. फिलहाल उसे कमीशन की ही आमदनी होने वाली है. एक डांट के साथ आश्वासन भी मिला कि उसकी मेहनत बेकार नहीं जाएगी. काफी कम समय में टार्गेट पूरा करने पर वह कंपनी द्वारा दिल्ली के किसी फाईव स्टार होटल में सम्मानित किया जा सकता है. हो सकता है लैपटाॅप, एप्पल का स्मार्टफोन या बाईक गिफ्ट में मिले. वह खुश हो गया और नए जोश के साथ मेंबर बढ़ाने में जुट गया.

करीब डेढ़ साल गुजर गए. अमीर बनने का सपना संजोए रामनरेश के बैंक खाते में न तो एक रुपया ट्रांसफर हुआ, और न ही उसे कोई गिफ्ट मिला. धीरे-धीरे मेंबर बनने भी बंद हो गए. कमीशन की आय तक रूक गई. एक दिन उसे पता चला कि वेबसाइट ही ब्लाॅक हो गई है. उसके जैसे हजारों लोगों के पैसे डूब गए. उस दौरान उसने करीब 10 लाख रुपये कंपनी को दे दिए थे. उसे घर बैठे पार्ट टाइम बिजनेस बताने वाला दोस्त दूसरी कंपनी की मार्केटिंग में लग गया था. हालांकि रामनरेश घाटे में नहीं रहा. उसने भी इस दौरान तीन लाख रुपये के करीब कमाई कर ली थी.

फरीदाबाद के रहने वाले अखिलेश को भी ऐसी ही मार्केटिंग का बेहद कड़वा अनुभव है. उसे बड़ा नुकसान उठाना पड़ा. कंपनी के नाम अलग थे. बदले हुए नियम और शर्तों के मुताबिक मेंबरशिप की राशि के बराबर सोने के सिक्के मिलने थे. उसने अधिक कमीशन पाने के लिए अपने पैसे लगाकर दर्जनों मेंबर बनाए. अपनी चेन पूरी करने की लालच में करीब 15 लाख रुपये कंपनी को दे दिए. बाद में पता चला कि सिक्के असली नहीं थे, बल्कि वर्चुअल करेंसी काॅइन थी. नतीजा उसके हाथ कुछ नहीं आया और पोर्टल की साइट ही बंद हो गई.

देशभर में अखिलेश और रामनरेश जैसे ठगे जाने वालों की फेहरिश्त लंबी है. वे शहरों-महानगरों के अलावा गांव-कस्बे तक हो सकते हैं. सभी ‘कौईन’ को डाॅलर और फिर रुपया में बदलने के चक्कर में अपने और दूसरों के लाखो रुपये गंवा चुके हैं. बाद में पता चला कि उनकी सारी कमाई एक विदेशी महिला ने हड़प ली है. क्रिप्टोकरेंसी की वर्चुअल करेंसी का खेल उसी ने खेला था. इतना ही नहीं उसने ’वनकौइन’ के नाम से फर्जी डिजिटल करेंसी तक इजाद कर ली थी. उसके द्वारा लोगों को डौलर, पौंड, यूरो या रुपे में निवेशकर मोटा मुनाफा कमाने के सपने दिखाए गए थे. उसने विभिन्न देशों में इसके प्रमोटर बना लिए थे, जो वेबपोर्टलों के जरिए एमएलएम के हिस्सेदार थे.

वह महिला है बुल्गारिया की 36 वर्षीया डा. रुजा इग्नातोवा, जो खुद को क्रिप्टोकरेंसी की महारानी कहा करती थीं. उसने लोगों को यह कहकर धोखा दिया था कि उन्होंने डिजिटल करेंसी या कहें वर्चुअल करेंसी ‘बिटकौइन’ के मुकाबले वनकौइन के नाम से एक नई क्रिप्टोकरेंसी ईजाद की है. यही नहीं, उसने लोगों को इस करेंसी में लाखों करोड़ों डाॅलर और यूरो करेंसी निवेश करने के लिए भी राजी कर लिया था. फिर अचानक गायब हो गईं. उसे अंतिम बार एक सार्वजनिक कार्यक्रम के दौरान मई 2017 में देखा गया था.

रुजा ने फर्जी डिजिटल करेंसी बनाकर ये काम आखिर किया कैसे? वह अचानक कहां गायब हो गई? इन दिनों कहां छिपी है? ये सवाल किसी गहरे रहस्य से कम नहीं हैं. उसे तलाशने की कोशिश विदेशी मीडिया के अलावा कई देशों की पुलिस भी कर रही है. यहां तक कि भारतीय पुलिस भी उसे पोंजी स्कीम चलाने के अपराध का अभियुक्त बना चुकी है. उसके खिलाफ आरोप पत्र तैयार किया गया है. उसपर 11 जुलाई 2017 से ही डिजिटल मुद्रा निवेश योजना की धोखाधड़ी का आरोप लगा हुआ है. नवी मुंबई पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा द्वारा लगाई गई चार्जशीट में वनकाॅइन से जुड़े दर्जनों प्रमोटर शामिल हैं. पुलिस उनपर नकेल कसने की कोशिश में है. यह पहल तब हुई थी जब मुंबई पुलिस ने अप्रैल 2017 में एक प्रमोशन प्रोग्राम के दौरान ऐसे ही एक ग्रुप को गिरफ्तार किया था.

भारत दुनिया भर के कई देशों में से एक है, जिसमें कानून प्रवर्तक एजेंसियां वनकॅाइन के खिलाफ जांच में जुटी है. आरोपी रुजा को सार्वजनिक तौर पर मकाऊ में देखा गया था. तब वहां उसका भव्य जन्म दिन मनाया गया था. मुंबई पुलिस इस मामले में जांच के परिणाम स्वरूप करीब 30 लोगों को आरोपी बना चुकी है. हालांकि जांचकर्ताओं को इसमें शामिल कुछ लोगों के साथ धोखाधड़ी के बारे में बात करने में मुश्किल आ रही है. कारण सभी पोंजी स्कीम के तहत आते हैं. एक सीनियर कानून प्रवर्तक अधिकारी के अनुसार इस तरह की स्कीम में निवेशक अपराधियों के साथ-साथ पीड़ित भी बन जाते हैं. इसलिए उनपर कार्रवाई करना आसान नहीं होता है.

क्रिप्टोकरेंसी की महारानी रुजा का जाल

बात जून 2016 के शुरुआती दिनों की है. एक बिजनेस वुमन डॉक्टर रुजा इग्नातोवा लंदन के मशहूर वेम्बली अरेना में अपने हजारों चाहने वालों के सामने स्टेज पर नमूदार हुई थी. तब लोग उसकी खूबसूरती और लटके-झटके को हसरत भरी निगाहों से देखते ही रह गए. उसने हमेशा की तरह महंगा बॉलगाउन पहन रखा था. कानों में हीरे के लंबे-लंबे झूलते हुए झुमके चमक बिखेर रहे थे. होठों पर चटख सुर्ख लिपस्टिक लगी थी. इस लुक में उसकी उम्र का अंदाजा लगाना सहज नहीं था कि वह 36 साल की है. उसकी एक-एक चाल, बोलने की शैली और अदाओं से संभ्रांतता झलक रही थी.   वह पूरे जोश में थी. हाथ में माइक थामे स्टेज पर झूमती हुई अपने चाहने वालों को रुजा ने इस आयोजन का खास मकसद बताया था. उसने छोटे से अभिभाषण में वनकाॅइन की खूबियां गिनावाते हुए कहा था कि उसने एक ऐसी डिजिटल करेंसी इजाद की है, जो बहुत जल्द ही दुनिया की सबसे बड़ी क्रिप्टोकरेंसी बनने वाली है. आने वाले दिनों में सारी दुनिया में हर कोई इसी वर्चुअल करेंसी के सहारे पैसे का भुगतान करेगा. औनलाइन ट्रांजेक्शन में वहकाॅइन का ही सिक्का चलेगा, क्योंकि यह काफी सुरक्षित और आसानी से इस्तेमाल की जाने वाली करेंसी है.

उपस्थित लोग उसकी बातों पर आखिर क्यों नहीं भरोसा करते? उसने दावे के साथ कहा था कि भले ही दुनिया की पहली क्रिप्टोकरेंसी बिटकॉइन भले ही आज सबसे ज्यादा जानी-पहचानी जाती हो, लेकिन अब इससे अच्छी नई करेंसी वनकाॅइन आ गई है. इसके आगे बिटकाॅइन नहीं टिकने वाली है. रुजा ने समझाया था कि वनकौइन, बिटकौइन की खामियों को खत्म करने वाली अद्भुत डिजिटल करेंसी है. आने वाले दिनों में कोई भी बिटकौइन का जिक्र तक नहीं करेगा. इसका प्रमाण है कि दुनिया भर में लोग वनकॉइन को एक नई क्रांति मान कर इसमें पैसा लगा रहे थे.

इस लुभावने दावे का जबरदस्त असर हुआ. रुजा की सभी तरह की मीडिया में जबरदस्त तारीफ हुई. उसने जैसा चाहा था वैसा ही परिणाम आया. इस बारे में बीबीसी को मिले दस्तावेजों के मुताबिक 2016 के पहले छह महीने में ही ब्रिटेन के नागरिकों ने वनकौइन में करीब 3 करोड़ यूरो का निवेश कर दिया था. इसमें 20 लाख यूरो तो महज एक हफ्ते में ही निवेश किए जा चुके थे. रुजा ने वनकौइन को लेकर वेम्बले में हुए भव्य कार्यक्रम के बाद तो जैसे निवेश के लिए लोगों को एक तरह से राजी करते हुए जाल बिछाकर दाना डाल दिया था.

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प्राप्त जानकारी के अनुसार अगस्त 2014 से मार्च 2017 के बीच दुनिया भर के कई देशों से करीब चार अरब यूरो का निवेश वनकौइन में किया गया था. इसमें भारत, पाकिस्तान, नेपाल, बांग्ला देश और ब्राजील, दक्षिण अफ्रीकी देशों से लेकर हौन्गकौन्ग, नौर्वे, क्यूबा, यमन यहां तक कि फिलस्तीन जैसे देशों के नागरिक भी शामिल थे. हैरत की बात यह थी कि वनकॉइन में धड़ाधड़ निवेश कर रहे लोग इससे की जा रही धोखाधड़ी से अनभिज्ञ थे.

बिटकौइन बनाम वनकौइन 

कुछ लोग काफी समय से एक ऐसी करेंसी विकिसत करने की कोशिश में लगे थेे, जिस पर किसी सरकार की पाबंदी नहीं हो. इसी सिलसिले में डिजिटल करेंसी बिटकाॅइन इजाद किया गया. इसे सुरक्षित होने और इसमें किसी भी तरह की जालसाजी की संभावना नहीं पाए जाने के प्रति लोगों को आश्वस्त किया गया. टेक्नोलौजी के जमाने में एक खास तरह के डेटाबेस पर आधारित बिटकौइन ने लोगों के इस डर को खत्म कर दिया था.

करेंसी की दुनिया में तकनीकी तौर पर इसे ब्लौकचेन कहते हैं. ये एक बड़ी सी डायरी की तरह होता है. एक ब्लौकचेन उसके मालिक के पास होता है, लेकिन इससे अलग इस ब्लॉकचेन की कई कौपी होती हैं. हर बार जब भी किसी और को एक भी बिटकौइन भेजा जाता है, तो इसका लेखा-जोखा सभी बिटकॉइन मालिकों के पास मौजूद बिटकौइन रिकौर्ड बुक में दर्ज हो जाता है. इस रिकौर्ड में कोई भी किसी भी तरह का बदलाव नहीं कर सकता. यहां तक कि इस ब्लौकचेन का मालिक या फिर इस रिकॉर्ड बुक को तैयार करने वाला भी इसमें कोई बदलाव नहीं कर सकता.

इसके पीछे जटिल गणित काम करता है, जिसे हर कोई आसानी से नहीं समझ सकता है. इस कारण इसे पूरी तरह से सुरक्षित समझना एक भूल हो सकती है. इसकी खामियां भी है. इसकी न केवल कौपी हो सकती है, बल्कि इसे हैक भी किया जा सकता है. या फिर इनका दो बार इस्तेमाल तक हो सकता है. इन खामियों के बावजूद कारोबार की दुनिया में बिटकौइन एक तरह की क्रांतिकारी डिजिटल करेंसी मानी गई, जिसके इस्तेमाल की मान्यता भारत में भी है. हालांकि इसे प्रतिबंधित कर दिया था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने 4 मार्च को इसके इस्तेमाल की कानूनी मान्यता दे दी है. इस तहर के क्रिप्टोकरेंसी में तमाम बैंकों और राष्ट्रीय मुद्रा को पीछे छोड़ने की क्षमता के कारण इसकी बदौलत निवेशकों को फोन पर ही बैंकिंग की सुविधा मिलने लगी. कारोबारियों को किसी भी करेंसी में पैसे के  लेन-देन की सहुलियत मिल गई. इस पंक्ति के लिखे जाने तक एक बिटकौइन की कीमत 5,11,272 रुपया थी. डा. रुजा ने इसी मौके को भुनाने का मन बनाया था और लोगों को सपने बेचने की योजना बना डाली.

इसके लिए रुजा की कंपनी को एक ऐसे शख्स की तलाश थी, जो ब्लौकचेन तैयार कर सके. उनकी कंपनी ने ब्लौकचेन बनाने में माहिर एक साफ्टवेयर डेवलपर ब्योन बियर्क से संपर्क किया. अक्टूबर 2016 में बियर्क के पास एक फोन आया. फोन करने वाले ने इन्हें नौकरी की पेशकश की. इस ऑफर में बियर्क को रहने के लिए घर, कार और सालाना ढाई लाख पौंड की तनख्वाह का प्रस्ताव दिया गया. फोन करने वाले ने अपनी कंपनी के बारे में बताया कि ये पूर्वी यूरोपीय देश बुल्गारिया की एक क्रिप्टोकरेंसी स्टार्ट-अप है. कंपनी को एक तजुर्बेकार टेक्निकल चीफ की जरूरत है.

ब्योर्न बियर्क उस नौकरी की पेशकश करने वाले से जब पूछा कि कंपनी में उसका काम क्या होगा, तब जवाब मिला कि कंपनी के लिए ब्कौचेन तैयार करनी है. कपंनी के कार्य के बारे में बताया गया कि वह एक क्रिप्टोकरेंसी कंपनी है, जो पिछले कुछ ही समय से काम कर रही है. कंपनी का नाम वनकॉइन बताया गया. यह सुनते ही ब्योर्न बियर्क ने नौकरी की ये पेशकश ठुकरा दी.

उन्हीं दिनों गलास्गो की रहने वाली जेन मेकएडम को उसके एक दोस्त ने वनकाॅइन के बारे में बताया. जेन ने अपना कंप्यूटर ऑन किया और दोस्त द्वारा भेजे गए एक लिंक पर क्लिक कर वनकौइन के औनलाइन वेबिनार सेमिनार को देखा. करीब सवा घंटे के वीडियो में उसने क्रिप्टोकरेंसी के बारे में जाना. साथ ही वह डा. रुजा के व्यक्तित्व से काफी प्रभावित हो गई. उसने महसूस किया कि उसकी भी किस्मत बदल सकती है. सेमिनार में सभी लोग बहुत खुश थे. सभी अपने अनुभव सुनाते हुए एक ही बात बता रहे थे कि कैसे उनकी किस्मत बदल सकती है. वीडियो में यह भी कहा गया कि वह बहुत खुशकिस्मत हैं कि उसे इससे जुड़ने का अवसर मिला है.

औनलाइन सेमिनार में डा. रुजा के बारे में जबरदस्त तरीके से बताया गया था. रुजा ने औक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से पढ़ाई की थी. उन्होंने कोन्सतान्ज से पीएच-डी की डिग्री हासिल की थी. उन्होंने मैकिन्से एंड कंपनी में मैनेजमेंट सलाहकार के तौर पर काम भी किया था. सबसे बड़ी बात यह थी कि इस सेमिनार को जानी-मानी पत्रिका दी इकॉनोमिस्ट द्वारा आयोजित किया गया था, जिसमें  डॉ. रुजा को कंफ्रेंस के जरिए ऑनलाइन दिखाया गया था.

वीडियो देखने के बाद जेन डॉ.रुजा के सशक्त महिला के किरदार से बेहद प्रभावित हो गई थी. यहां तक कि उसने तुरंत वनकॉइन में एक हजार यूरो निवेश करने का फैसला भी कर लिया था. ये बहुत ही आसान था. इसके लिए आॅनलाइन एक वनकॉइन टोकन खरीदने की जरूरत थी, जो  वनकॉइन करेंसी में बदल जाएगा और आईडी अकाउंट में आ जाएगा. उन्हें बताया गया कि एक दिन ऐसा आएगा जब जेन अपने खरीदे गए वनकॉइन को यूरो और पाउंड में तब्दील कर देगी, जो जमा की गई रकम से कहीं ज्यादा होगी. जेन मैकएडम को लगा कि ये तो पैसे कमाने का शानदार और आसान तरीका है. इस बेहतरीन क्रिप्टोकरेंसी में निवेश के लिए शायद एक हजार यूरो कम हैं. यह उसकी जिंदगी में काफी बदलाव लाने का मौका मिला है.

उत्साही जेन को देख कर प्रमोटर ने बताया कि सबसे छोटा पैकेज 140 यूरो का था. लेकिन, उनके पास तो एक लाख 18 हजार यूरो तक के पैकेज भी हैं. यानी वह छप्परफाड़ मुनाफा कमा सकती है. एक हफ्ते बाद ही जेन मैकएडम ने पांच हजार यूरो का टाइकून पैकेज खरीद लिया. जल्द ही ऐसा समय भी आया जब जेन ने न केवल अपने दस हजार यूरो वनकॉइन में लगा ही दिए, बल्कि अपने दोस्तों और परिवार के सदस्यों के भी करीब ढाई लाख यूरो का निवेश इस नई क्रिप्टोकरेंसी में कर दिया था.

उसके बाद वह बार-बार वनकॉइन की वेबसाइट देखने लगी. जैसे ही उनके वनकाॅइन की कीमत बढ़ती, वह जबरदस्त खुशी महसूस करती. जल्द ही जेन के वनकॉइन की कीमत एक लाख पाउंड पहुंच गई. यानी उनके निवेश से दस गुना ज्यादा रिटर्न मिलने वाला था. इस रकम को देख कर जेन छुट्टियों पर जाने और ढेरसारी शॉपिंग करने की योजनाएं बनाई. उसी साल के आखिर में एक अजनबी ने इंटरनेट के माध्यम से जेन मैकएडम से संपर्क किया. उसने कहा कि वह लोगों की मदद करना चाहता है. उसने जेन से यह भी कहा कि उसने वनकॉइन के बारे में गहराई से पड़ताल की है और अब उनलोगों से बात करना चाहता है, जिन्होंने  इसमें निवेश किया है.

जेन ने बड़ी अनिच्छा से उस व्यक्ति से स्काइप के जरिए बात करने के लिए हामी भरी. उनकी बातचीत सहजता और शांतिपूर्ण ढंग से शुरू हुई, लेकिन बहुत जल्द ही वे एक-दूसरे पर तीखी टिप्पणियां करने लगे, जो चिल्लाने के मुकाबले से कम नहीं थे. हालांकि उस अजनबी से हुई बातचीत ने जेन की जिंदगी को एक नई दिशा में मोड़ दिया. अजनबी का नाम टिमोथी करी था. वह बिटकॉइन में दिलचस्पी रखने वाला व्यक्ति था. वह क्रिप्टोकरेंसी की जमकर वकालत करता था. उसका कहना था कि वनकॉइन की वजह से क्रिप्टोकरेंसी बदनाम हो जाएंगी. यही कारण था कि उसने जेन मैकएडम को दो टूक शब्दों में कहा था कि वनकॉइन असल में एक घोटाला है. उसने काफी कड़े शब्दों में गाली देते हुए कहा था कि यह दुनिया का सबसे बड़ा घोटाला है. यही नहीं उसने ये भी कहा कि वह इस बात को साबित भी कर सकता है. इस पर जेन भड़क गई थी और उन्होंने तीखे लहजे में कहा,‘‘ ठीक है, फिर तुम मुझे साबित कर के दिखाओ.’’

उसके बाद कुछ हफ्तों तक टिमोथी करी ने जेन को डिजिटल करेंसी के बारे में ढेर सारी जानकारियां भेजी. उन्हें बताया कि क्रिप्टोकरेंसी कैसे काम करती है. टिमोथी ने इस संबंध में जेन को कई लिंक, लेख, यू-ट्यूब वीडियो और दूसरी सामग्री भेजे. टिमोथी ने जेन का संपर्क क्रिप्टोकरेंसी के एक्सपर्ट ब्योर्न बियर्क से कराया. ब्योर्न एक ब्लॉकचेन के डेवेलपर हैं. उन्होंने ही जेन को बताया कि वनकॉइन के पास कोई ब्लॉकचेन नहीं है.

जेन मैकएडम अब अपने पैसे डूबने की आशंका से डर गई थी. उन्हें टिमोथी की भेजी सारी जानकारी पढ़ने-सुनने और समझने में करीब तीन महीने का समय लग गया. क्रिप्टोकरेंसी की तमाम जानकारियां मिलने के बाद जेन ने अपने वनकॉइन ग्रुप के लीडर से पूछा कि क्या वनकाॅइन की कोई ब्लॉकचेन है? या फिर नहीं है. शुरू में तो उसे ये बताया गया कि उसे इस बारे में जानने की जरूरत ही नहीं है, लेकिन, जब जेन ने जोर देकर ये बात जाननी चाही, तो उसे आखिर में इसकी हकीकत का पता चला. इस सच के बारे में जेन को अप्रैल 2017 में एक वॉयसमेल के जरिए मालूम हुआ. वह वाॅयस मेल था-‘‘ ठीक है… जेन! वे ये जानकारी लोगों को नहीं देना चाहते, क्योंकि इस बात का डर है कि जहां पर ब्लॉकचेन को रखा गया है, उसे कोई खतरा नहीं हो. इसके अलावा, एक एप्लिकेशन के तौर पर इसे किसी सर्वर की जरूरत नहीं है…. … तो, हमारी ब्लॉकचेन तकनीक असल में एक एसक्यूएल सर्वर है, जिसका अपना डेटाबेस है.’’

इस जानकारी के मिलने पर जेन को टिमोथी और ब्योर्न बियर्क की मदद से यह भी मालूम हुआ कि कोई मानक एसक्यूएल सर्वर डेटाबेस के आधार पर असल में कोई क्रिप्टोकरेंसी विकसित ही नहीं की जा सकती. क्योंकि इस डेटाबेस का मैनेजर कभी भी इसके भीतर जाकर बदलाव कर सकता है. यह जानकारी जेन के लिए सदमे जैसी थी. उन्होंने बताया कि ‘‘मैंने तो ऐसा सोचा ही नहीं था. ये क्या हो गया?… और मेरे पांव सुन्न हो गए. मैं जमीन पर गिर पड़ी.’’

जेन, टिमोथी और ब्योर्न की सभी बातों का एक ही मतलब था कि वनकॉइन की वेबसाइट पर बढ़ रहे नंबरों का कोई मतलब नहीं था. वे केवल आंकड़े भर थे, जिन्हें वनकॉइन का कोई कर्मचारी कहीं दूर बैठकर कंप्यूटर पर टाइप कर रहा था. जेन और उन के दोस्तों, परिजनों ने अपनी पैसे की फिक्र को दूर करने के बजाय, अपनी सारी रकम, यानी करीब ढाई लाख यूरो वनकॉइन में झोंक दिए थे.

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लापता हो गई रुजा

जेन मैकएडम भले ही वनकाॅइन के जरिए ठगी की कड़वी सच्चाई को जान चुकी थी, लेकिन वनकॉइन के अधिकतर निवेशकों को इसकी हकीकत के बारे में नहीं मालूम था. दूसरी तरफ वनकॉइन की मार्केटिंग के लिए डॉ. रुजा पूरी दुनिया की सैर कर रही थीं. वह पूरी दुनिया में सपने बेचकर पैसा कमाने में लगी हुई थी. मकाऊ से लेकर दुबई और सिंगापुर तक. उन्हें देखने के लिए बड़े-बड़े स्टेडियम भर जाते थे. उसका आकर्षण ही ऐसा था कि नए-नए निवेशक वनकॉइन में पैसे लगाने के लिए तुरंत तैयार हो जाते थे. यह कहें कि वनकॉइन का तेजी से विस्तार हो रहा था. रुजा अपनी इस कमाई से नई-नई संपत्तियां खरीद रही थी. उन्होंने बुल्गारिया की राजधानी सोफिया और काला सागर के किनारे स्थित शहर सोजोपोल में लाखों डॉलर की संपत्ति खरीदी थी. अपने खाली समय में में रुजा अपनी महंगी और आलीशान याट, द डेविना में बड़ी-बड़ी दावतें देती थीं. जुलाई 2017 में हुई ऐसी ही एक पार्टी में अमरीकी पॉप स्टार बेब रेक्चा ने भी एक निजी कार्यक्रम पेश किया था.

रुजा की बेहद कामयाबी का राज जल्द ही लोगों की निगाह में आ गया. हजारों निवेशकों को उसके द्वारा किए गए निवेश को लेकर चिंता गहराने लगी. नतीजा वनकॉइन के साम्राज्य में मुश्किलों का तूफान उमड़ने लगा. वनकॉइन के क्वाइन को असली नकदी में बदलने के लिए एक एक्सचेंज खोलने का वादा किया गया था. लेकिन, उसमें बार-बार देर हो रही थी. यूरोपीय निवेशकों की चिंताएं बढ़ने का यही कारण भी था.

पुर्तगाल की राजधानी लिस्बन में रुजा को अक्टूबर 2017 में एक कार्यक्रम में आना था. लेकिन, समय की बेहद पाबंद डॉ. रुजा नहीं आईं. इस सम्मेलन में शामिल हुए एक प्रतिनिधि ने बताया कि वह रास्ते में हैं. जबकि किसी को भी उसके बारे नहीं पता था कि वह कहां है. आयोजक और दूसरे प्रतिनिधियों द्वारा उसे बार-बार फोन कॉल किए जा रहे थे. मैसेज भेजे जा रहे थे. उन्हें कोई जवाब नहीं मिल पा रहा था. सोफिया स्थित वनकॉइन के मुख्यालय , जहां पर उनकी मौजूदगी लोगों में एक खौफ पैदा करती थी, के अधिकारियों को भी नहीं पता था कि रुजा कहां हैं? कुल मिलाकर डॉ. रुजा गायब हो गई थीं. कुछ लोगों को ये डर था कि या तो रुजा को बैंकों ने अगवा कर लिया है, या फिर उसे मार दिया गया है. उन्हें बताया गया था कि क्रिप्टोकरेंसी की इस क्रांति से बैंकों को ही सब से ज्यादा खतरा है. जबकि हकीकत ये थी कि डॉ. रुजा अंडरग्राउंड हो गई थीं.

डा.रुजा के अंडरग्राउंड होने की वजह थी उसके खिलाफ एफबीआई को मिली शिकायतें. एफबीआई के दस्तावेजों के अनुसार लिस्बन के सम्मेलन में नहीं शामिल होने के मात्र दो हफ्ते बाद रुजा रियान एयर की एक फ्लाइट से सोफिया से एथेंस के लिए रवाना हुई थी. उसके बाद उसके बारे में कोई जानकारी नहीं मिली. वह आखिरी बार था, जब रुजा को किसी ने देखा या उसके बारे में सुना था.

मल्टी लेवल मार्केटिंग की काली दुनिया

यह सारा मामला मल्टी लेवल मार्केटिंग की काली दुनिया से जुड़ा हुआ है. इंटरनेट के आने से इसका फैलाव काफी दूर-दूर तक हो चुका है. नेटवर्किंग और टेक्नोलाॅजी ने सारी बाध्यताएं खत्म कर दी है. जेना की तरह इगोर अल्बर्ट्स भी वनकाॅइन से जुड़े रहे हैं. वे मल्टी लेवल मार्केटिंग के धुरंधर माने जाते हैं. इस धंधे में उसने काफी धन कमाया है. वे नीदरलैंड के एम्सटर्डम के बाहरी हिस्से में स्थित बेहद पॉश इलाके में एक विशाल मकान में रहते हैं. उनकी कोठी के सामने 10 फुट ऊंचा लोहे का फाटक लगा है. इस पर इगोर और उनकी पत्नी एंड्रिया का नाम खुदा हुआ है. साथ ही लिखा है, ‘पता नहीं कौन सा ख्वाब पूरा हो.’ कोठी के बाहर महंगी कारें मासेराती और एस्टन मार्टिन खड़ी रहती है. यह सब उसने मल्टी लेवल मार्केटिंग से ही अर्जित की है. एक समय में इगोर अल्बर्ट्स की परवरिश एक गरीब मुहल्ले में हुई थी. उस के बाद वे नेटवर्क मार्केटिंग या मल्टीलेवल मार्केटिंग के कारोबार से जुडकर खूब कमाई की. ढेर सारे पैसे कमाए. उसका दावा है कि उसने पिछले तीस सालों में मल्टी लेवल मार्केटिंग से करीब 10 करोड़ यूरो कमाए हैं.

मल्टी लेवल मार्केटिंग के काम करने का तरीका अनोखा है, जिसे गैरकानूनी करार नहीं दिया जा सका है. इसकी शुरूआत सामान्यतः हेल्थ-वेल्थ सुधारने वाली विटामिन या दूसरी हर्बल की दवाइयों से हुई. उसे सीधे बेचने के बजाय पहले दो लोगों को बेची जाती है. बिक्री से मार्केटिंग कंपनी और उत्पादक को मुनाफे के कुछ पैसे मिल जाते हैं. फिर दोनों व्यक्ति मार्केटिंग की चेन बनते हैं. वे जो भी बेचते हैं, उसका एक हिस्सा कंपनी को मिल जाता है. वे टीम की डाउनलाइन कहलाते हैं. इसी तरह से दोनों दो-दो और लोगों को अपने साथ जोड़ते हैं. फिर ये चारों भी अपने साथ दो-दो और लोगों को जोड़ लेते हैं. इस तरह से ये कड़ी बढ़ती चली जाती है. बहुत जल्द ही ये सिलसिला काफी बड़ा बन जाता है. उदाहरण के तौर पर वह इतना बड़ा बन सकता है कि 25-30 कड़ियों बाद दिल्ली जैसे महानगर के हजारों नागरिक दवाई की गोलियां बेचते नजर आ सकते हंै. इस सिलसिला या डाउनलाइन को शुरू करने वाले को सभी की बिक्री में से एक हिस्सा मिलता रहता है.

मल्टी लेवल मार्केटिंग अवैध नहीं मान गई है. इस धंधे में एमवे और हर्बालाइफ जैसी बड़ी कंपनियां इसी कारोबारी तरीके से अपने कारोबार का विस्तार कर चुकी है. परंतु हां, मल्टीलेवल मार्केटिंग विवादास्पद भी है. क्योंकि, आम-तौर पर बहुत कम लोग ही सारा मुनाफा हड़प लेते हैं. बहुतों को नुकसान होता है और वे हाथ मलते रह जाते हैं. ऐसी मार्केटिंग में मुनाफे के बड़े-बड़े वादे किए जाते हैं और अधिकाधिक बिक्री का दबाव बनाया जाता है. यही इसकी बदनाम का कारण भी है. कई मामले में जब सारा पैसा केवल दूसरे लोगों को इस कड़ी से जोड़ कर ही कमाया जाता है, तो ये अवैध हो जाता है. इसे ही पिरामिड योजना के नाम से जाना जाता है.

इगोर अल्बट्र्स जब मई 2015 में ऐसी ही एक मार्केटिंग के तौर स्थापित हो चुके थे, तब उन्हें दुबई में वनकॉइन के एक कार्यक्रम में आमंत्रित किया गया था. दुबई में इगोर की मुलाकात काफी  लोगों से हुई थी. सभी नई डिजिटल करेंसी से काफी धन कमाने का इरादा रखते थे. वहीं डॉ. रुजा ने भी इगोर को प्रभावित किया. वहां वह एक राजकुमारी के लिबास में शामिल हुई थीं. उन्होंने लोगों को एक वित्तीय क्रांति के सपने दिखाए. इगोर को रुजा की स्कीम पसंद आई और नए मिशन की तैयारी में जुट गया. उन्होंने अपनी सेल्स टीम को निर्देश दिया कि उसके द्वारा किए जा रहे काम को रोककर केवल वनकॉइन बेचना शुरू करे. इगोर अपनी टीमों के साथ दीवानों की तरह काम करते हुए पहले महीने में ही शून्य से 90 हजार यूरो की रकम बना ली.

रुजा को इगोर जैसे मार्केटिंग करने वालों की ही तलाश रहती थी, ताकि उसे बड़ी-बड़ी डाउनलाइन या टीमों वाले मल्टीलेवल मार्केटिंग के कारोबारियों को अपने धंधे में शामिल कर सके.   उनके जरिए रुजा के लिए फर्जी सिक्के की मार्केटिंग करना और उसको बेच पाना बहुत आसान था. इस योजना के बारे में एफबीआई ने दावा किया है कि रुजा कुछ खास लोगों के बीच ही मल्टी लेवल मार्केटिंग से गठजोड़ करती थी. उसकी वनकॉइन की कामयाबी का यही राज था. ये केवल एक फर्जी क्रिप्टोकरेंसी भर नहीं थी, बल्कि पुराने तौर-तरीके वाली पिरामिड योजना थी. इसका उत्पाद   वनकॉइन का फर्जी डिजिटल सिक्का था.

बहुत जल्द ही इगोर अल्बर्ट्स वनकॉइन बेचकर हर महीने दस लाख यूरो से भी अधिक कमाई करने लगा. जल्द ही वह नेटवर्क मार्केटिंग का सबसे बड़ा उत्पाद बन गया. इस बारे में इगोर अल्बर्ट्स  का कहना है कि बहुत कम समय में यह लोकप्रिय हो गया. कोई और कंपनी तो इसके आस-पास भी नहीं पहुंच सकी. इगोर अल्बर्ट्स पत्नी एंड्रिया सिम्बाला के साथ मिलकर वनकॉइन बेचे. उन्होंने जो कमाई की उसका 60 फीसद हिस्सा नकद में भुगतान किया गया. अंतिम दिनों में ये रकम हर महीने करीब बीस लाख यूरो के आस-पास थी. बाकी का भुगतान उन्हें वनकॉइन के तौर पर किया जा रहा था. इगोर ने बिल गेट्स से भी धनी बनने का गणित बिठाया था. इसके लिए उसने एंड्रिया से 10 करोड़ सिक्के जुटाने के लिए कहा था. क्योंकि 10 करोड़ सिक्के 10 करोड़ यूरो में तब्दील होने वाले थे. खैर इगोर का भी यह सपना जेना की तरह चूर हो गया.

इगोर ने भी कंपनी से ब्लॉकचेन होने का सबूत मांगा था. उन्हें भी कोई सबूत मिला और दिसंबर 2017 में उसने वनकॉइन का साथ छोड़ दिया. इस मामले में इगोर खुद को मुजरिम नहीं मानता, क्योंकि उन्होंने इतने सारे लोगों को ऐसे सिक्के में निवेश करने के लिए राजी किया, जो असल में था ही नहीं. जबकि इसके जरिए खूब पैसा भी कमाया. इसके विपरीत  जेन के दिल पर बहुत बड़ा बोझ है, क्योंकि उन्होंने वनकॉइन बेच कर मात्र तीन हजार यूरो ही कमाए. इनमे 1800 यूरो उन्हें नकद मिले. इस रकम को भी उन्होंने वनकॉइन खरीदने में खर्च कर दिए. भारत में ऐसी मार्केटिंग करने वालों को तो पता ही नहीं होता है कि उसका सरगना कौन है. वे इगोर या उसके नीचे काम करने वाले सेल्स के लोगों से जुड़े होते हैं. उनकी वेबसाइटें खुलती-बंद होती रहती हैं. लोग जितना कमाते हैं उतना ही दूसरों का पैसा गंवा देते हैं.

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वनकाॅइन की कार्पोरेट बुनावट

वनकॉइन की कॉरपोरेट बुनावट जितनी पेचीदा थी, रुजा उतनी ही निर्भिक. उसने बुल्गारिया की राजधानी सोफिया के बीचो-बीच एक विशाल संपत्ति खरीदी थी. तकनीकी रूप से इस संपत्ति पर वन प्रॉपर्टी नाम की कंपनी का मालिकाना हक था. वन प्रॉपर्टी की मालिक एक और कंपनी थी, जिसका नाम रिस्क लिमिटेड था. इस रिस्क लिमिटेड की मालकिन रुजा थीं. जबकि उन्होंने ये कंपनी पनामा के रहने वाले किसी गुमनाम व्यक्ति के नाम कर दी थी. मजे की बात ये है कि कंपनी तो पनामा के उस अनजान शख्स के नाम हो गई, मगर इसका प्रबंधन पेरागॉन नाम की कंपनी के पास था. पेरागॉन की मालकिन एक और कंपनी थी, जिसका नाम था आर्टेफिक्स. उसकी मालकिन रुजा की मां वेस्का थीं. फिर 2017 में आर्टेफिक्स को 20 साल के आस-पास की उम्र के एक अनजान शख्स को बेच दिया गया था. एक फ्रेंच पत्रकार मैक्सिम ग्रिम्बर्ट ने कई महीनों तक वनकॉइन की कॉरपोरेट संरचना को समझने की कोशिश की. उन्होंने इससे जुड़ी अधिक से अधिक कंपनियों के नाम और बैंक के खातों का पता लगाने की कोशिश की. रुजा के आसानी से छिप जाने या लापता होने के लिए इतना ही काफी है. इस मामले की तह में जाने के प्रयास में जुटे बीबीसी के पत्रकार और मनीलैंड के विशेषज्ञों के अनुसार अक्सर ऐसे फर्जीवाड़े करने वाले ब्रितानी कंपनियों को ही तरजीह देते हैं. क्योंकि उन्हें खड़ी करना आसान होता है और वो कानूनी रूप से वैध भी लगती हैं.

बहरहाल, अमेरिका के डिपार्टमेंट ऑफ जस्टिस का दावा है कि उसके पास इस घोटाले का पूर्वी यूरोप के संगठित आपराधिक गिरोहों के अहम लोगों और रुजा के भाई कॉन्सटैंटिन इग्नातोव से ताल्लुक के सबूत हैं. रुजा के लापता होने के बाद वनकॉइन को चलाने का काम उसके भाई कॉन्सटैंटिन ने अपने हाथ में ले लिया था. कॉन्सटैंटिंन इग्नातोव 6 मार्च 2019 को वनकाॅइन से जुड़ी कुछ बैठकों में शामिल होने के लिए अमेरिका आया था. उस दिन वह लॉस एंजेलेस हवाई अड्डे पर मौजूद था. हवाई अड्डे पर बुल्गारिया वापस जाने की फ्लाइट पकड़ने का इंतजार कर रहा था. उसके विमान पर सवार होने से पहले ही एफबीआई के एजेंटों ने उसे अपनी गिरफ्त में ले लिया. उसपर वनकॉइन के फर्जीवाड़े के आरोप लगाए गए. उसी समय अमरीकी अधिकारियों ने डॉक्टर रुजा पर उन की गैरमौजूदगी में डिजिटल फर्जीवाड़े, सुरक्षा के फर्जीवाड़े और मनी लॉन्डरिंग के अभियोग भी लगाए. हैरत की बात यह है कि रुजा के भाई की गिरफ्तारी और उसके फरार घोषित होने के बावजूद वनकॉइन के काम का सिलसिला जारी है. वनकॉइन के दफ्तर में चहल-पहल बनी हुई है.

ट्विटर पर फूटा इमरान हाशमी का गुस्सा, Lockdown को लेकर कही ये बड़ी बात

जैसा कि हम सब जानते हैं कि भारत में कोरोना वायरस (Corona Virus) का प्रभाव बढ़ते जा रहा है और यहां तक की भारत सरकार (Indian Government) ने इस खतरनाक बिमारी को देखते हुए 21 दिन तक भारत लौकडाउन करने का ऐतिहासिक निर्णय लिया है. ऐसे में 14 अप्रैल तक पूरे देश में कर्फ्यू लगा रहेगा और सभी अपने घर से तभी निकल सकते हैं जब उन्हें किसी बहुत जरूरी चीज की जरूरत होगी जैसे कि दूध, दवाई, सब्जी, आदी.

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ट्विटर के जरिए दिखाया गुस्सा…

देश के ऐसे हालातों को देख सभी बौलीवुड एकटर्स सोशल मीडिया के जरिए अपनी-अपनी प्रतिक्रियाएं दे रहे है. हाल ही में बौलीवुड एक्टर इमरान हाशमी (Emraan Hashmi) ने ट्विटर के जरिए कोरोना वायरस पर अपना गुस्सा जाहिर करते हुए एक ट्वीट किया है जिसमें उन्होनें लिखा है कि,- “And all this because some person thousands of miles away wanted to have a freakish culinary experience like eating a BAT”.

चमगादड़ों के कारण फैला कोरोना वायरस…

इमरान हाशमी (Emraan Hashmi) के इस ट्वीट से साफ पता चल रहा है कि वे इस बिमारी को लेकर काफी गुस्से में हैं. इमरान के इस ट्वीट का मतलब ये है कि,- “हमारे देश में इस तरह के हालत इस लिए हैं क्योंकि यहां से हजारों मील दूर कुछ लोग चमगादड़ को खाने का अजीब अनुभव करना चाहते थे”. खबरों की माने तो कोरोना वायरस (Coronavirus) चमगादड़ों (Bats) के कारण ही फैला है.

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हजारों लोग गवा चुके हैं अपनी जान…

कोरोना वायरस जैसी बिमारी लोगों से ही लोगों में फैल रही है यानि की ऐसे व्यक्ति के संपर्क में आते ही जो कोरोना संक्रमित है हमें भी ऐसी बिमारी लग सकती है. आपको बता दें, यह बिमारी अब तक 180 से भी ज्यादा देशों में फैल चुकी है और अब तक हजारों की तादात में लोग इस बिमारी के कारण अपनी जान गवा बैठे हैं.

#lockdown: इस लौक डाउन में क्या कर रहीं है भोजपुरी एक्ट्रेसेस

कोरोना (Corona) के कहर कहर के चलते देश भर में लगाये गये लौक डाउन (Lockdown) के चलते सभी लोग अपने ही घरों में कैद हो कर रह गए हैं चाहे वह नौकरीपेशा व्यक्ति हो या मजदूर. इसके चपेट में आने से बचने का केवल यही एक तरीका बचा है की हम सोशल डिस्टेन्स का ख्याल रखें. फिर ऐसे में सेलिब्रिटीज कैसे पीछे रहें आखिर अपनी जान तो सभी को प्यारी होती है. भोजपुरी (Bhojpuri) से जुड़े ऐसे ही एक्टर्स क्या कर रहें है उससे जुडी तस्वीरें इन सेलेब्रेटीज द्वारा अपने  सोशल मीडिया एकाउंट पर शेयर की जा रहीं हैं. जिसमें कोई घर में काम करता नजर आ रहीं है तो कोई खेलती हुई. कोई घर में योगा और वर्कआउट करती नजर आ रही है तो कोई कोरोना से बचने की अपील कर  रहीं है. ऐसे में भोजपुरी से जुड़े कुछ फेमस हिरोंइनों के सोशल मीडिया एकाउंट पर शेयर की गई तस्वीरों की पड़ताल कर यह जाननें की कोशिश की वह लौक डाउन के बीच क्या कर रहीं हैं आइये जानते हैं कुछ ऐसे ही ऐक्ट्रेस के रूटीन के बारें में.

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भोजपुरी सिनेमा में अपने खूबसूरती और सोख व चंचल अदाओं से तहलका मचाने वाली मोनालिसा (Monalisa) नें बड़े ही खबसूरत अंदाज में अपने बेडरूम में बेड पर लेट कर किताब पढ़ते हुए की तस्वीर शेयर की है और लिखा की इस तूफ़ान में घर ही आश्रय है, मेरे अपने सबसे अच्छे दोस्त के साथ. “किताब” (Home Is A Shelter From Storms… All Sorts Of Storms 🙏🙏🙏… #self #quarantine with my best friend #book #stayhome #staysafe #homesweethome).

 

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Staying safe….& enjoying my leisure time!!😘 #stayhome #besafeeveryone #hometime❤️ #coronavirusoutbreak⚠️ #bealeart

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भोजपुरी अभिनेत्री कनक पाण्डेय (Kanak Pandey) नें अपने घर में अकेले ही कैरम खेलते की तस्वीर शेयर की है. जिसमें उन्होंने लिखा है “सुरक्षित रहना …. और मेरे खाली समय का आनंद लेना !!”. (Staying safe….& enjoying my leisure time!! #stayhome #besafeeveryone #hometime #coronavirusoutbreak  #bealeart).

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वहीं रानी चटर्जी (Rani Chatterjee) नें इन्स्टाग्राम पर एक तस्वीर शेयर की है जिसमें वह बहुत ही निराले अंदाज में नजर आ रहीं हैं. उन्होंने इस तस्वीर के कैप्शन में लिखा है #wearefirefighter #gocoronago “ चाहे कुछ भी हो जाए घर से बाहर नहीं जाउगी”. i love my family i love my india .. #goodmorning #instapost #love #lifestyle #athom.

 

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भोजपुरी के खुबसूरत हीरोइनों में शुमार अक्षरा सिंह (Akshara Singh) अभी हाल ही में लोगों को कोरोना से बचाव के लिए हाथ धोने के तरीकों के बारे में बतातीं नजर आई थी. एक बार वह फिर इस लौक डाउन के बीच लोगों से कोरोना से बचे रहने की अपील करती हुई नजर आ रहीं हैं. अक्षरा सिंह ने अपने इन्स्टाग्राम एकाउंट पर एक वीडियो शेयर किया है जिसमें उन्होंने अपने मुहं पर मास्क लगा रखा है और हाथ में एक तख्ती है. जिस पर हैज टैग के निशाँ के साथ लिखा है “जनता कर्फ्यू हम सब घर पर रहेंगे धन्यवाद उन सबों को जो हमारा जीवन बचानें के लिए काम कर रहें हैं. घर पर रहें सुरक्षित रहें”.

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Day first #🤣 #21days #challenge #corona ab bas bhi karona 🤯 take care guys be safe n be healthy #🦋

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ऐक्ट्रेस काजल राघवानी (Kajal Raghwani) ने एक फोटोपोस्ट कर उसके कैप्सन में लिखा है “पहला दिन” “इक्कीस दिन चैलेन्ज” “कोरोना अब बस करो ना”  (Day first #🤣 #21days #challenge #corona ab bas bhi karona 🤯 take care guys be safe n be healthy).

अभिनेत्री पूनम दूबे (Poonam Dubey) ने अपने घर से ही वर्कआउट की वीडियो शेयर की है और उसके कैप्सन में लिखा है घर में रहें सुरक्षित रहें और जो आपको पसंद हो वो करें. जैसे की मै घर का काम, वर्कआउट , टीवी देखना, मम्मी के साथ खूब सारी बातें, भाई के साथ खेलना और बहुत सारी मस्ती. लेकिन प्लीज घर पर ही रहें. #isolation #quarantine #familytime #stayawayfromcoronavirus

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#coronavirus कोरोना: क्या कर रही हैं घर पर ये 6 महिला खिलाड़ी

भारतीय फुटबाल टीम की कप्तान रह चुकी सोना चौधरी अब गुरुग्राम में रहती हैं. कोरोना के चलते पूरे देश में लाकडाउन हो चुका है. फोन पर सोना से बातचीत की तो उन्होंने कुछ खास बातें बताई कि किस तरह हम घर पर रह कर इस महामारी से बचने के साथसाथ कुछ ऐसे काम भी कर सकते हैं, जिन्हें सामान्य दिनों में सोचते भी नहीं हैं.

सोना चौधरी के 2 बेटे हैं जो अभी स्कूल में ही पढ़ते हैं. वे अपने दोनों बेटों से घर के ऐसे काम कराती हैं, जो उन्हें क्रिएटिव तो बनाते ही हैं, साथ ही उन की कसरत भी हो जाती है.

सोना चौधरी बताती हैं, “मैं उन से डस्टिंग कराती हूं, साथ ही दूसरे छोटेमोटे काम भी कराती हूं. उन्हें कुकिंग का शौक है तो खाना बनाने को कह देती हूं. उन के साथ मैं भी बिजी रहती हूं.

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“इस से बच्चों में अपना काम खुद करने की भावना पनपती है और यह भेदभाव भी खत्म होता है कि सिर्फ लड़कियां ही घर के काम कर सकती हैं या उन्हें ही ये काम करने चाहिए.”

मास्टर्स एथलेटिक्स में भारत का दुनियाभर में नाम रोशन करने वाली नीलू मिश्रा उत्तर प्रदेश में लोगों को इस बीमारी से जागरूक कर रही हैं.

‘नीलू वाराणसी’ के नाम से मशहूर नीलू मिश्रा का कहना है, “जैसा कि आप जानते हैं कि यह वायरस खांसी, छींक और छूने से एक इनसान से दूसरे इनसान में फैलता है, इसलिए मास्क का इस्तेमाल करें. लोगों से हाथ न मिलाएं और गले भी न मिलें. अपने आसपास और घर में साफसफाई रखें.

प”हर 15 मिनट में कम से कम एक घूंट कुनकुना पानी पीते रहें. अपने हाथों को कम से कम 20 सैकंड तक रगड़ कर साबुन से धोएं. गंदे हाथों से अपने नाक और मुंह को न छुएं और न ही गंदे हाथों से कुछ खाएं. आइसक्रीम, कोल्ड ड्रिंक, बर्फ, बाजार की लस्सी, ठंडी छाछ और दूसरी ठंडी चीजों के सेवन से बचें.

“भीड़भाड़ वाली जगहों पर जाने से बचें. सर्दी, खांसी, कफ, बुखार होने वाले मरीज को डाक्टर के पास तुरंत जाने की सलाह दें.

“घर पर रोजाना स्किपिंग जैसी कसरत करें और ज्यादा से ज्यादा बिजी रहें. अच्छा साहित्य पढ़ें और कोई भी क्रिएटिव काम करें.”

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बिकिनी एथलीट मधुप्रिया झा ने कहा, “इस लाकडाउन समय में हमें अपने इम्यून सिस्टम को बेहतर बनाने पर जोर देना चाहिए. इस के लिए स्क्वाट, प्लैंक, माउंटेन क्लाइंब एक्सरसाइज, बर्पीज, जंपिंग जैक, लंजीज करनी चाहिए. अपनी उम्र का खयाल रखते हुए ही ये कसरतें करनी चाहिए.

“इस के अलावा आप के घर में स्टेयर्स हैं तो उन का भी इस्तेमाल किया जा सकता है. अगर आप को शीर्षासन करना आता है तो वह बहुत अच्छी कसरत है.”

भारतीय महिला पहलवान पूजा ढांडा का मानना है, “सब से पहले आप मन से पाजिटिव रहिए. अब जबकि घर पर रहना है तो वर्कआउट जरूर करें. आप ऐसे काम भी कर सकते हैं जिस में आप की कैलोरी बर्न हों. बाकी जो भी दिशानिर्देश प्रशासन ने दिए हैं उन का सख्ती से पालन करें. तन और मन से फिट रहें और इस महामारी का डट कर सामना करें.”

भारतीय इंटरनेशनल कबड्डी टीम की सदस्य रही कई मैडल जीत चुकी सुमन शौकीन दहिया का मानना है कि संकल्प और संयम ही इस बड़ी मुसीबत का इलाज है. घर के ऐसे काम खुद कीजिए जिन से खुद ब खुद कसरत हो जाए.

इंटरनेशनल शूटर वर्षा तोमर ने तो अपना पूरा घर खुद सेनेटाइज किया है. उन के मुताबिक कपड़े धोना भी एक अच्छी कसरत है. दिन में वे किताबें पढ़ती हैं और शाम को छत पर वर्कआउट करती हैं. इस में स्टेयर्स बड़ी अहम होती हैं. उन से स्टेमिना बढ़ता है.

वर्षा ने बताया, “यह समय घर के बच्चों के साथ गुजारने के लिए सब से बढ़िया है. मैं ने अपने भतीजेभतीजियों के साथ मिल कर बालकनी की दीवार ही पोत डाली है.”

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