51 साल के मिलिंद सोमन को हुआ ये कैसा प्यार

कुछ दिन पहले ही हमें पता चला कि हिंदी सिनेमा के बेहतरीन निर्देशक अनुराग कश्यप को उनकी बेटी की उम्र की लड़की से मोहब्बत हो गई है. लोगों को जानकर आश्चर्य तो हुआ ही होगा. लेकिन ये जानकर आपको और हैरानी होगी कि इस लिस्ट में अनुराग अकेले नहीं हैं. उनकी तरह 51 साल के मिलिंद सोमन को भी अपने से आधी उम्र की लड़की से प्यार हो गया है.

जी हां ये हरम नहीं कह रहे, खुद उनका इंस्टाग्राम अकाउंट कह रहा है. अब कहते हैं कि प्याउर अंधा होता है और अक्सरर प्याअर में पड़े लोग जाति, धर्म, भाषा, अमीरी-गरीबी या उम्र जैसी सीमाओं को नहीं मानते. हाल ही में इनके रिश्तेा की सामने आई खबरों ने कुछ ऐसा ही उदाहरण सामने रख दिया है. सिल्वेर स्क्री न की जिंदगी से जुड़ा एक और ऐसा ही जोड़ा सामने आया है.

रिपोर्ट्स की मानें तो 51 साल के एक्टसर-मोडल मिलिंद सोमन को अपने से कई साल छोटी लड़की से प्या र हो गया है. लड़की का नाम अंकिता कोनवार बताया जा रहा है. डायरेक्टहर अनुराग कश्य़प की तरह ही मिलिंद सोमन ने अपनी प्या र की इस कहानी को सोशल मीडिया पर ही जगजाहिर किया है. मिलिंद ने अंकिता के साथ कई फोटो शेयर किए हैं.

मिलिंद ने अपने इंस्टा ग्राम पर अंकिता के साथ एक फोटो शेयर करते हुए लिखा है, ‘ फॉरऐवर (हमेशा के लिए).’ वहीं एक दूसरे पोस्टल में मिलिंद ने फोटो शेयर करते हुए लिखा है, ‘इस व्यक्ति से प्यार है.’

Forever 🙂

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खबरों के अनुसार शादी पर बात करते हुए एक बार मिलिंद ने कहा था कि उनकी जिंदगी में चीजें बहुत ज्याप निर्धारित नहीं हैं और यही चीज उन्हें एक बहुत अच्छा बॉयफ्रेंड बनाती है, लेकिन यही चीज उन्हें  एक अच्छा पति नहीं बना पाती है.

हम आपको याद दिलाना चाहते हैं कि साल 2006 में मिलिंद ने फिल्मे ‘वैली ऑफ फ्लॉवर्स’ की अपनी फ्रेंच को-स्टामर मैलेन जाम्प नोई से शादी कर ली थी. पर, इन दोनों का साल 2009 में तलाक हो गया. इसके बाद वे एक्टवर सहाना गोस्वादमी को भी डेट कर रहे थे, जिनसे उनकी उम्र का अंतर भी 21 साल था. इस रिश्ते में भी मिलिंद 4 साल रहे थे.

अगर हिम्मती होगा सरपंच तो खुशहाल बनेगा गांव

महात्मा गांधी के कहे मुताबिक आजादी नीचे से शुरू होनी चाहिए. हर गांव में प्रजातंत्र होना चाहिए. मतलब पंचायत का राज. लेकिन इस राज की अहमियत तभी होगी, जब पंचायतों के पास पूरी सत्ता व ताकत होगी. वे अपने पैरों पर तभी खड़ी हो सकेंगी. इस के लिए उन्हें सरकार से माली मदद मिलती है. लेकिन जब ग्राम पंचायतों तक फंड ही नहीं पहुंचता है, तो क्या वे अपने बूते गांव के विकास के लिए कोई भी ठोस काम नहीं कर पाती हैं? क्या सरकारी योजनाओं के बिना भी या अपने सीमित साधनों से ग्राम पंचायतें गांव वालों की जिंदगी चमका सकती हैं? इस का जवाब है कि ऐसा हो सकता है. इस के लिए हम आप को ले चलते हैं हरियाणा के एक छोटे से गांव रत्ताखेड़ा में.

हरियाणा में पानीपतजींद रोड पर एक तहसील आती है सफीदों, जो अनाज मंडी के चलते पूरे हरियाणा में मशहूर है. यहां से तकरीबन 5 किलोमीटर दूर बसा गांव रत्ताखेड़ा बहुत छोटा सा गांव है. इस में तकरीबन 6 सौ घर हैं, जिन में से ज्यादातर पक्के हैं. कुछ ब्राह्मणों और जाटों के घर तो शहरों जैसी कोठियों को भी मात देते नजर आते हैं.

गांव में घुसते ही एक बड़ा सा मंदिर दिखाई देता है, जो गांव वालों ने चंदा इकट्ठा कर के बनवाया है. यह मंदिर इस गांव को भव्यता देता है, लेकिन मंदिर के ठीक पीछे एक तालाब है… कहने को तालाब है, पर है गंदे बदबूदार पानी का जलभराव, जिस के 3 ओर बने लोगों के घरों ने इस के आकार को और छोटा कर दिया है.

इस गांव की सरपंच पिंकी रानी अन्य पिछड़ा वर्ग के एक परिवार की बहू हैं. 23 साल की पिंकी रानी स्नातक हैं और जींद जिले में सब से कम उम्र की सरपंच बनने का रिकौर्ड उन के नाम है. जब वे सरपंच बनी थीं, तब उन की उम्र 21 साल और 4 महीने थी.

एक बेटे और एक बेटी की मां पिंकी रानी के पति संदीप कुमार उन के काम में मदद करते हैं. वे भी बीए पास हैं और उन्होंने 3 साल का होटल मैनेजमैंट का कोर्स किया है, लेकिन उन का धंधा है ट्रांसपोर्ट का.

चूंकि पिंकी रानी अन्य पिछड़ा वर्ग से हैं, इसलिए उन का घर गांव के बाहर की ओर है. घर पक्का है और उस में सुखसुविधाओं के सभी साधन मौजूद हैं, जैसे रसोई गैस, कूलर, फ्रिज, टैलीविजन वगैरह. इस के अलावा उन्होंने गायभैंसें भी पाल रखी हैं. घर में घुसते ही दाईं ओर एक कमरा बना रखा है, जिस में एक मेज और कुरसी बिछा कर दफ्तर बना रखा है.

गांव में आज भी परदा प्रथा है, इसलिए शुरू में तो पिंकी रानी को गैर मर्दों से बातचीत करने में बड़ी दिक्कत हुई थी, पर ससुराल वालों की मदद से परदा प्रथा की ओट से बाहर निकली पिंकी रानी अब पहले के मुकाबले अपनी बात ढंग से रख पाती हैं. उन्होंने बताया कि मायके पक्ष में उन के मामा अपने गांव के सरपंच थे. उन्हें देख कर उन के मन में भी गांव की भलाई के काम करने की इच्छा जागी थी. ससुराल में आ कर उन का यह सपना पूरा हुआ.

अपनी ससुराल वालों के बारे में पिंकी रानी ने बताया, ‘‘जब मैं ने गांव में सरपंच का चुनाव लड़ने की इच्छा जताई, तो मेरे सासससुर ने कोई एतराज नहीं जताया. पति ने भी हर तरह से मेरी मदद की.

‘‘अगर गांव को नशामुक्त करने की बात लोगों तक पहुंचानी है, तो मैं सिर गर्व से ऊंचा कर के बोल सकती हूं कि मेरी ससुराल में कोई भी नशे का सेवन नहीं करता है. इन सब चीजों का समाज पर गहरा असर पड़ता है.’’

इस गांव की मूलभूत समस्याएं क्या हैं और उन को दूर करने के लिए पंचायत क्या करती है? इस सवाल पर पिंकी रानी ने बताया, ‘‘हमारे गांव का स्कूल 12वीं जमात तक का है, लेकिन अभी स्कूल में कमरे कम हैं. बरसात व गरमी के मौसम में बच्चों को परेशानी होती है. खेलकूद के सामान की भी कमी है. इस सब के बावजूद पिछले साल 12वीं जमात के सौ फीसदी बच्चे पास हुए थे.’’

इस गांव का स्कूल कहने को 12वीं जमात तक का है, लेकिन उस लैवल की सुविधाएं वहां नहीं दिखीं. इस को 12वीं जमात का बनाने की सब से अहम वजह यह थी कि गांव वाले अपनी बेटियों को 5 किलोमीटर दूर तहसील के स्कूल में पढ़ने के लिए नहीं भेजना चाहते थे.

एक और परेशानी यह है कि इस गांव में 2 तालाब हैं, लेकिन उन में गांव की गलियों का गंदा पानी आता है. लिहाजा, वहां गंदगी की भरमार रहती है.

जब सरपंच से इस बदहाली के बारे में पूछा गया, तो वे बोलीं, ‘‘इस गांव में पानी के निकास की सब से बड़ी समस्या है. इन तालाबों में गांव भर का गंदा पानी इकट्ठा होता रहता है और बीमारियां फैलने का डर रहता है.’’

रत्ताखेड़ा छोटा गांव है. इसे जींद के पुलिस सुपरिंटैंडैंट ने गोद लिया हुआ है. यह जाट व ब्राह्मण बहुल गांव है, पर इस में कुल 11 बिरादरी के लोग रहते हैं.

पिंकी रानी बताती हैं, ‘‘हमारी कोशिश रहती है कि गांव वालों के बीच कोई विवाद न हो, और अगर झगड़ा हो भी जाए तो हम उसे कोर्टकचहरी तक नहीं जाने देते हैं.’’

ग्राम पंचायत ने पूरे गांव में कूड़ेदान लगवाए थे. कुछ दिन तो लोगों ने उन में कूड़ा डाला, पर बाद में वही ढाक के तीन पात. अब तो कूड़ेदान ढूंढ़े नहीं मिलते हैं. यहां की सारी गलियां पक्की हैं. कम से कम ईंटों का खड़ंजा तो जरूर है. नालियां भी पक्की हैं. हर घर में शौचालय है. अगर कोई शौच के लिए बाहर जाता है, तो उस पर 11 सौ रुपए का जुर्माना लगाया जाता है. लेकिन चूंकि यहां पर सीवर सिस्टम नहीं है, इसलिए शौचालय की सफाई कराने में समस्या आती है.

इसी गांव के लगातार 2 बार पंचायत सदस्य रह चुके नरेश वशिष्ठ ने बताया, ‘‘साल 1977 में यह गांव पूरे जींद जिले में सफाई के मामले में फर्स्ट आया था. यहां की एकता ही इस गांव की मजबूती है.

‘‘स्कूल में फर्स्ट आने पर बच्चों को इनाम दिया जाता है. हमारे गांव में कुल 11 वार्ड हैं. सब से साफ वार्ड को भी अवार्ड दिया जाता है. गांव में कई चौपालें हैं. स्कूल व मंदिर में वाटर कूलर लगवाए गए हैं. एक छोटा सा पशु अस्पताल भी है. गलियों के खंभों पर एलईडी लाइटें लगवाई गई हैं.’’

खेतीकिसानी के बारे में सरपंच पिंकी रानी ने बताया, ‘‘तकरीबन हर घर में पशु पाले जाते हैं. ज्यादातर गायभैंसें होती हैं. जब से खेती में ट्रैक्टर का चलन बढ़ा है, तब से बैल वगैरह पालने का रिवाज खत्म हो गया है. हां, बुग्गी चलाने के लिए भैंसा पाला जाता है.

‘‘हमारे गांव में ज्यादातर पारंपरिक खेती होती है. गेहूं व धान ज्यादा उगाए जाते हैं. किसान ज्यादा फसल पाने के चक्कर में कैमिकल खाद का इस्तेमाल करते हैं. उन्हें आर्गेनिक खाद पर अभी तक यकीन नहीं हुआ है, पर धीरेधीरे जागरूकता आएगी.’’

रत्ताखेड़ा गांव के किसान भले ही अभी भी पारंपरिक खेती को अपना रहे हैं, लेकिन पानीपत जिले का सिवाह गांव खेतीबारी के नए तरीके ही नहीं अपना रहा है, बल्कि बढ़ते शहरीकरण की अच्छी बातों का दिल खोल कर स्वागत भी कर रहा है.

गांव सिवाह पानीपत जिले के बड़े गांवों में आता है. इस गांव में तकरीबन 10 हजार वोटर हैं और कुल आबादी तकरीबन 30 हजार है. इस पंचायत में 20 वार्ड हैं. यहां के सतवीर कादियान और बिजेंद्र सिंह कादियान का हरियाणा की राजनीति में दखल रहा है.

सतवीर कादियान ओम प्रकाश चौटाला की इंडियन नैशनल लोकदल सरकार में हरियाणा विधानसभा में स्पीकर पद पर रह चुके हैं और इफको के चेयरमैन भी रहे हैं. बिजेंद्र सिंह कादियान बंसीलाल की हरियाणा सरकार में पशुपालन मंत्रालय संभाल चुके हैं.

इस गांव में प्राइमरी और 12वीं जमात के मिला कर कुल 4 सरकारी स्कूल हैं और एक सरकारी कालेज भी है. नैशनल लैवल की पहलवानी कर चुके नौजवान सरपंच खुशदिल कादियान पिछले सवा साल से इस गांव की पंचायत को संभाल रहे हैं.

खुशदिल कादियान का मानना है कि पंचायत में हिस्सेदारी होने का मतलब है राजनीति में और ऊपर जाने का सपना देखना. अगर आप में अपने गांव व समाज के लिए कुछ करने का जज्बा है, तो इसे राजनीति की पहली सीढ़ी मानने में कोई बुराई नहीं है.

20 एकड़ जमीन के मालिक खुशदिल कादियान का सपना है कि उन का गांव पूरी तरह शौच मुक्त हो जाए. अभी इस गांव के 98 फीसदी घरों में शौचालय बन चुके हैं.

गांवों में हर घर में शौचालय बनाने की सरकारी मुहिम तो अच्छी है, पर हर गांव की समस्या यही है कि वहां सीवर नहीं है. औरतें और नई पीढ़ी तो इन शौचालयों का इस्तेमाल करती हैं, लेकिन पुरानी पीढ़ी के मर्द आज भी शौच के लिए बाहर जाते दिख जाते हैं. वैसे, जनस्वास्थ्य विभाग गांव में 22 किलोमीटर लंबी सीवरेज लाइन बिछाएगा.

कन्या भ्रूण हत्या को रोकने के लिए सरपंच खुशदिल कादियान एक मुहिम चला रहे हैं. उन्होंने बताया, ‘‘हमारे गांव के स्कूली बच्चे साल में 1-2 बार प्रभात फेरी लगाते हुए पूरे गांव में घूमते हैं. उन के हाथों में कन्या भ्रूण हत्या को रोकने से संबंधित स्लोगन लिखे बैनर होते हैं. बच्चों द्वारा समझाई गई बातों का बड़ों पर, खासकर औरतों पर अच्छा असर होता है.

‘‘इस के अलावा हम ने एक प्रशिक्षण केंद्र बनवाया है, जहां औरतों व लड़कियों को मुफ्त में सिलाई, कढ़ाई, ब्यूटीपार्लर, बुटिक व कंप्यूटर का 21 दिनों का कोर्स सिखाया जाता है. इस में पंजाब नैशनल बैंक की भी भागीदारी है.

‘‘ग्राम पंचायत समयसमय पर मैडिकल कैंप भी लगवाती है, ताकि गांव वालों को फायदा हो सके.’’

पिंकी देवी और खुशदिल कादियान दोनों पढ़ेलिखे और कम उम्र के सरपंच हैं. दोनों नई सोच का स्वागत करते हैं और इन का मकसद किसी भी तरह से गांव में आपसी भाईचारा बनाए रखना है.

ये दोनों सरपंच ‘छोटा परिवार सुखी परिवार’ की नीति पर अमल करते हैं. पिंकी रानी आगे भी पढ़ाई चालू रखना चाहती हैं. पहले वे लोगों से बात करने में झिझकती थीं, पर अब तो धड़ल्ले से भाषण देती हैं. वे अपने गांव रत्ताखेड़ा में अस्पताल बनवाना चाहती हैं, ताकि बीमार लोगों को 5 किलोमीटर दूर तहसील के अस्पताल में न जाना पड़े.

गठीले बदन के हैंडसम सरपंच खुशदिल कादियान अपने नाम की तरह खुशदिल मिजाज के हैं. उन की पत्नी मोनिका 12वीं पास हैं और घरेलू औरत हैं. खुशदिल कादियान के 2 बच्चे हैं, जिन्हें वे खूब पढ़ाना चाहते हैं. साथ ही, खुशदिल कादियान का सपना है कि गांव के सभी तालाब जिंदा रहें, जिस के लिए वे जोरशोर से काम भी करवा रहे हैं.

तालाबों की कमी में लोग अपने पशुओं को घरों पर नहलाते हैं. घर में एक पशु को नहलाने में तकरीबन 2 सौ लिटर पानी खर्च हो जाता है. तालाब में पशुओं को नहलाने से पानी की बचत होती है. लेकिन तालाबों में गांव का दूषित पानी नहीं जाना चाहिए व उन पर गैरकानूनी कब्जा भी नहीं होना चाहिए.

ऐसा नहीं है कि ये सरपंच सरकार से कोई उम्मीद नहीं रखते हैं, पर जब तक अपने लैवल पर काम हो रहा है, तो ये गांव की भलाई के लिए कोई भी ठोस कदम उठाने में देर नहीं लगाते हैं.

मसले ग्राम पंचायतों के

हमारे देश की तकरीबन 70 फीसदी आबादी गांवों में रहती है और पूरे देश में 2 लाख, 39 हजार से भी ज्यादा ग्राम पंचायतें हैं. अगर ग्राम पंचायत किसी गांव के विकास के लिए रीढ़ की हड्डी होती है, तो ग्राम प्रधान या सरपंच उस रीढ़ की हड्डी को अपने अच्छे कामों से मजबूती देता है.

ग्राम पंचायतें गांव की साफसफाई, रोशनी, सड़कों, दवाखानों, कुओं की सफाई और मरम्मत, सार्वजनिक जमीन, बाजार, मेलों व चरागाहों का इंतजाम करती हैं. वे जन्ममृत्यु का लेखाजोखा रखती हैं और खेतीबारी, उद्योगधंधों व कारोबार की तरक्की, बीमारियों की रोकथाम, श्मशान घाटों और कब्रिस्तानों की देखभाल भी करती हैं.

इस के अलावा ग्राम पंचायत के गांव में पेड़ लगाने, पशुवंश का विकास, गांव की हिफाजत के लिए ग्राम सेवक दल बनाना, सहकारिता का विकास, अकाल पीडि़तों की सहायता, पुलपुलियों को बनवाना, स्कूल व अस्पतालों का सुधार वगैरह ऐच्छिक कर्तव्य भी हैं.

मतलब, एक गांव की तरक्की में ग्राम पंचायत का अहम रोल होता है, लेकिन साल 1992 तक पंचायत ही गांव में महज एक ऐसी औपचारिक संस्था थी, जिस के हाथ में न तो कोई हक था और न ही पैसा, जबकि पंचायत राज बनाने के पीछे हमारे रहनुमाओं का सपना तो यह था कि ग्राम पंचायतें देश की सरकार की भागीदार बन कर अपने गांवों की तरक्की खुद करेंगी.

इसी बात के मद्देनजर देश के प्रधानमंत्री रह चुके राजीव गांधी ने पंचायती राज को मजबूत बनाने के लिए संविधान में 64वां संशोधन प्रस्ताव भी संसद में रखा था, पर वह पास नहीं हो सका था. हालांकि साल 1992 में संविधान में 73वां संशोधन किया गया था. इस में पंचायतों को स्वशासन की स्थानीय इकाई के रूप में बहुत सारे अधिकार देने की बात कही गई थी.

इसी संशोधन के तहत संविधान में जोड़ी गई धारा 243 में ग्राम सभा यानी गांव के तमाम लोगों की खुली बैठक को कानूनी रूप दिया गया, लेकिन पंचायती राज से जो फायदे गांव वालों को होने चाहिए थे, उन की बात तो अभी सपना ही लगती है.

यही वजह है कि पंचायतें केंद्र व राज्य सरकारों से मिलने वाली मदद को गांव में बांटने वाली संस्था बन गई हैं. शायद बड़े नेता नहीं चाहते हैं कि ग्राम पंचायतों के हक बढ़ें और वे अपने स्तर पर गांवों का विकास कर सकें, उन के लिए योजनाएं बना कर हर काम पर निगरानी रखें.

हो यह रहा है कि संविधान में पंचायतों की व्यवस्था होने के बावजूद आज भी गांव वाले अपने विकास के छोटे से छोटे काम के लिए केंद्र सरकार व राज्य सरकारों का मुंह ताकते हैं. सरकारें उन पर लुभावनी योजनाएं लाद देती हैं. दुख की बात तो यह है कि उन योजनाओं से गांव वालों का कैसे फायदा होगा, यह बात भी सलाह के रूप में उन से नहीं पूछी जाती है.

इस सब का नतीजा है कि ग्राम पंचायतें बड़ी सरकारों की योजनाओं को लागू करने की एजेंसियां बन कर रह गई हैं. कोढ़ पर खाज होती है नौकरशाही, जिस के सामने गांव वाले अपनी भलाई के लिए मिलने वाले पैसे को पाने के लिए हाथ जोड़े खड़े रहते हैं. इसी वजह से भ्रष्टाचार फैलता है और पंचायतों तक पहुंचने वाला फंड उस के असली हकदार तक पहुंचता ही नहीं है.

पंचायत ने संवारे, ये गांव हैं न्यारे

पंचायत की मजबूत अगुआई और गांव वालों की मेहनत के दम पर भारत के कई गांव दुनियाभर में मिसाल बन कर सामने आए हैं. उन में से एक है महाराष्ट्र में सूखे की मार झेलने वाले अहमदनगर जिले का गांव हिवरे बाजार.

70 के दशक में हिवरे बाजार अपने ‘हिंद केसरी’ पहलवानों के लिए मशहूर था, लेकिन वहां के सूखे ने पहाडि़यों को मानो बंजर बना दिया था. उजाड़ पहाड़, पानी को तरसते खेत, वहां के लोगों की यही दास्तान थी. लेकिन इस गांव के लोगों और पंचायत के कामकाज का ही नतीजा है कि आज यह गांव अलग ही इबारत लिख रहा है.

गांव में घुसते ही लगेगा कि आप किसी दूसरी दुनिया में आ गए हैं. पक्की और चौड़ी सड़कें, पक्के मकान, साफसुथरी नालियां, पेड़पौधों के तो कहने ही क्या. तभी तो इस गांव को देखने का टिकट लगता है.

साल 1989 से पहले ऐसे हालात नहीं थे. तब इस गांव के ज्यादातर नौजवान बेरोजगार थे. गांव में कच्ची शराब की भट्ठियां थीं. गुटबाजी पसरी हुई थी. इस बात से नाराज कुछ नौजवानों ने इस गांव को सुधारने का बीड़ा उठाया और अपने एक साथी पोपटराव पवार को एक साल के लिए गांव का सरपंच बना दिया.

पोपटराव पवार ने गांव वालों के साथ मिल कर गांव की भलाई के फैसले लेने शुरू किए. गांव व आसपास के इलाकों में तकरीबन 2 हजार वाटरशैड बनाए गए, जहां बारिश का पानी इकट्ठा हुआ और पानी का लैवल बढ़ने से वहां का इलाका हराभरा हो गया.

आज इस गांव के हर घर में शौचालय है. पेड़ों की कटाई पर सख्त पाबंदी है. शराबबंदी लागू है. धुआं देने वाले पारंपरिक चूल्हे पूरी तरह से हटा दिए गए हैं. इस आदर्श गांव को कई अवार्ड भी मिल चुके हैं.

इसी तरह राजस्थान के राजसमंद जिले का एक गांव पिपलांत्री भी अपनेआप में एक मिसाल है. इस गांव की पंचायत के लोग बेटी के पैदा होने पर 111 पेड़ लगा कर बेटियों के साथसाथ आबोहवा को बचाने की अनोखी मुहिम छेड़े हुए हैं.

पेड़ लगाने के साथसाथ बेटी के बेहतर भविष्य के लिए गांव के लोग आपस में चंदा इकट्ठा कर के 21 हजार रुपए जमा करते हैं और 10 हजार रुपए लड़की के मांबाप से लेते हैं. 31 हजार रुपए की यह रकम लड़की के नाम 20 साल के लिए बैंक में फिक्स डिपौजिट में जमा कर दी जाती है.

लड़की के मातापिता को एक शपथपत्र पर दस्तखत कर के देना होता है कि बेटी की पढ़ाईलिखाई का पूरा इंतजाम किया जाएगा. 18 साल की होने के बाद ही बेटी की शादी की जाएगी. परिवार का कोई भी सदस्य कन्या भ्रूण हत्या में शामिल नहीं होगा. बेटी के जन्म के बाद जो पौधे लगाए गए हैं, उन की देखभाल की जाएगी.

साल 2006 से शुरू हुई यह परंपरा आज भी कायम है. अब तक लाखों पेड़ लगाए जा चुके हैं. साल 2004 में पिपलांत्री ग्राम पंचायत को राष्ट्रपति पुरस्कार भी मिल चुका है.

हरियाणा के जींद जिले के गांव बीबीपुर की पंचायत ने अपने अनूठे कामों से देशविदेश में नाम कमाया है. ‘सैल्फी विद डौटर’ से सुर्खियों में आए इस गांव के सुनील जागलान, जो पहले यहां के सरपंच भी थे, ने कन्या भ्रूण हत्या के खिलाफ मुहिम चलाई थी.

गौरतलब है कि ग्राम पंचायत बीबीपुर द्वारा महिलाओं के सशक्तीकरण को ले कर कई बड़े आयोजन कराए जा चुके हैं. हरियाणा सरकार ने इस पंचायत को एक करोड़ रुपए का इनाम दिया था और इसे 2 बार नैशनल लैवल का अवार्ड भी मिल चुका है.

अब सुनील जागलान द्वारा ‘बीबीपुर मौडल औफ वीमन इंपावरमैंट ऐंड विलेज डेवलपमैंट’ नाम की मुहिम चलाई गई है, जिस के सौ सूत्रीय कार्यक्रम की जानकारी भारत के राष्ट्रपति को दी गई. अब राष्ट्रपति द्वारा गोद लिए गए सौ गांवों में बीबीपुर गांव का यह मौडल लागू किया जाएगा.

आपने देखा सोफिया का लव मेकिंग वीडियो

मशहूर मॉडल से ‘नन’ बनकर और फिर शादी करने वालीं बिग बॉस की एक्स कंटेस्टेंट सोफिया हयात अपने बयानों और नये-नये फोटोशूट्स को लेकर हमेशा ही चर्चाओं में बनी रहती हैं. हम आपको बता रहे हैं कि इस बार उन्होंने अपने पति के साथ एक लवमेकिंग वीडियो शेयर किया है.

सोफिया ने, अपने पति व्लाद स्टैन्श्यू से हिंदू रीति से और इजिप्ट रीति-रिवाजों के साथ भी शादी की थी. सोफिया ने अपना ये नया वीडियो अपने इंस्टाग्राम पर शेयर करते हुए लिखा है कि ‘’मेरा नया म्यूजिक वीडियो और गाना ओम शांति ओम रिलीज और पूरा वीडियो एक्सक्लूसिवली मेरे यूट्यूब चैनल पर देख सकते हैं. इस गाने को यू-ट्यूब पर देखकर ओम शांति ओम की पूरी कहानी देख सकते हैं.’’

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इससे पहले भी सोफिया इस तरह के इंटीमेट तस्वीरें अपने ‌इंस्टाग्राम अकाउंट पर शेयर कर चुकी हैं और वे ऐसा करती रहती हैं. हम आपको बता देना चाहते हैं कि सोफिया अपने पति से 10 साल बड़ी हैं. उनके पति व्लाद स्टैन्श्यू एक आर्किटेक्ट हैं.

हम आपको याद दिलाना चाहते हैं कि कुछ दिन पहले सोशल मीडिया पर कुछ तस्वीरें शेयर कर सोफिया ने बताया था कि वे मां बन गई हैं. साथ ही अब वे अपने पति के साथ मिलकर लोगों को सेक्स की शिक्षा देंगी.

सोफिया ने कुछ दिन पहले अपने पैरों में स्वातिक का टैटू गुदवाया था। जिसके लिए उनकी काफी निंदा हुई थी.

फिल्म रिव्यू : बैंक चोर

इन दिनों एक नए किस्म का सिनेमा बनने लगा है. फिल्मकार चाहते हैं कि दर्शक अपना दिमाग, अपना विवेक सब कुछ घर पर रखकर उनकी फिल्म देखने आएं और उनकी वाहवाही करते हुए चले जाएं, जो कि नामुमकिन सा है. यही वजह है कि हास्य व रोमांचक फिल्म ‘‘बैंक चोर’’ दर्शकों को आकर्षित करने या हंसाने की बजाय बोर करती है.

फिल्म की कहानी तीन बैंक चोरों के इर्द गिर्द घूमती है. एक महाराष्ट्रियन युवक चंपक (रितेश देशमुख) दो दिल्ली के युवकों गेंदा (विक्रम थापा) और गुलाब (भुवनेश अरोड़ा) के साथ बैक में चोरी करने जाता है. फिर एक आफिसर अमजद खान (विवेक ओबेराय), एक टीवी रिपोर्टर गायत्री गांगुली ( रिया चक्रवर्ती), एक दूसरे गैंग का चोर (साहिल वैद्य) के अलावा सिक्यूरिटी फोर्स, अलार्म, टीवी कैमरा और अनावश्यक गीत संगीत के माध्यम से लोगों को हंसाने की कहानी है.

मगर फिल्म का एक भी सीन ऐसा नहीं है, जहां दर्शक को हंसी आ सके. हर किरदार वही घिसे पिटे व सुने सुनाए जोक्स ही सुनाता है. इंटरवल से पहले दर्शक सोचने पर मजबूर हो जाता है कि वह कहां फंस गया. इंटरवल के बाद फिल्म सधती हुई नजर आती है, मगर कुछ समय बाद बिखर जाती है. इतना ही नहीं फिल्म का क्लायमेक्स बहुत निराश करता है.

पटकथा लेखक बलजीत सिंह मारवाह ने पटकथा लेखन में बहुत लापरवाही बरती है. बम्पी का निर्देशन भी उत्साहित नहीं करता. परिणामतः रितेश देशमुख व विवेक ओबेराय जैसे प्रतिभाशाली कलाकार भी फिल्म को संभाल नहीं पाते.

दो घंटे 6 मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘‘बैंक चोर’’ का निर्माण ‘वाय एफ’ फिल्मस के बैनर तले किया गया है. निर्देशक बम्पी हैं. कलाकार हैं-रितेश देशमुख, विवेक ओबेराय, भुवनेश अरोड़ा, विक्रम थापा  व अन्य.

जातिवाद की आग में सुलगता सहारनपुर

उत्तर प्रदेश में सहारनपुर में दलितठाकुरों के बीच दंगों ने एक बार फिर हिंदू समाज में हजारों सालों से फैली छूतअछूत और भेदभाव की सड़ीगली, बदबूदार गंद को गंगायमुना की ऊपरी सतह पर ला दिया है. कांग्रेस राज के बाद दलितों की नेता मायावती और पिछड़ों के नेता मुलायम सिंह यादव व अखिलेश यादव को उत्तर प्रदेश की गद्दी मिली थी, तो उस से लगा था कि सत्ता की झाड़ू से समाज का यह कोढ़ का रोग अब खत्म हो जाएगा और सभी जातियां सत्ता का स्वाद चख कर अपने समय का इंतजार करना भी सीख जाएंगी और एकदूसरे को सही ढंग से सहने का रास्ता भी अपनाने लगेंगी.

जाति का पौराणिक जहर, अफसोस है, इतना गहरा है कि मायावती के 4 बार के शासन या यादवों के 4 बार के शासन के बावजूद इस से पैदा मनमुटाव वहीं का वहीं है, जहां महात्मा गांधी और भीमराव अंबेडकर ने छोड़ा था. अब जब भारतीय जनता पार्टी को एक बार फिर बिना दलितों, मुसलिमों और यादवों के राज करने का मौका मिला है, दंगे उभरने लगे हैं और डर है कि ये पूरे देश में न फैल जाएं. भारतीय जनता पार्टी के कट्टर समर्थक समझने लगे हैं कि शंबूक और एकलव्य का समय लौट आया है और सेवकों को पैर की जूती बन कर ही रहना होगा.

इस की एक बड़ी वजह यह है कि हिंदू समाज में सुधारों की बात पिछले 30-40 सालों में बिलकुल बंद हो गई है. समाज सुधार की जगह घड़ी की सूइयां उलटी घूम रही हैं और पूरा समाज, चाहे ऊंची जातियों का हो या दूसरी जातियों का, अपनेअपने दड़बों में बंद ही नहीं हो रहा, बल्कि दड़बों को किले बना रहा है. जिस खिचड़ी को बनाने की कोशिश की गई थी, जिस में एक जाति का दूसरी से फर्क ही न पता चले, उस का सपना टूट गया है और उत्तर प्रदेश ने दिखा दिया है कि इस देश में पैदा होते ही जाति का ठप्पा लगा है तो लगा है, वोटिंग मशीनों से नहीं जाने वाला.

भारतीय जनता पार्टी ने ऊंची सवर्ण जातियों के 10-15 प्रतिशत वोटों के साथ 35-40 प्रतिशत और जनता को लुभा तो लिया, पर बाकी को बुरी तरह नाराज कर के. पार्टी ने खुद चाहे ऐसी कोई बात नहीं करी हो या कही हो, जिस से निचलापिछड़ा या मुसलिम कोई नाराज हुआ हो, पर पार्टी के हर मुखर वर्कर का चालचरित्र तो पार्टी बदल नहीं सकती. चौराहों पर क्या बोला जा रहा है, कैसे बरताव करा जा रहा है, किस तरह की गालियां दी जा रही हैं, इसे पार्टी कंट्रोल नहीं कर सकती. चौराहों पर वही बोला जा रहा है, जो सदियों से बोला गया है.

भारतीय जनता पार्टी ने पिछले 5 दशकों में संस्कृति, संस्कार, महान धर्म का ढिंढोरा इतना पीटा है कि उस से सदियों से सताए लोगों में एक बार फिर डर पैदा हो गया है और राज करने वालों के मन में फिर से गरूर खड़ा हो गया है. मध्य प्रदेश में माओवादियों, गुजरात में पटेलों, हरियाणा में जाटों, सहारनपुर में दलितों का डर व गुस्सा उसी की निशानी है. इन सब जगह पुराने ऊंचे और पिछड़ों में से अब पैसा कमा कर बन रहे नए सवर्ण ग्रंथों को बिना पढ़ेसमझे खंगाल रहे हैं कि उन का समाज में तो ऊंचा, सेवा करवाने का जन्मजात हक है ही.

यह पार्टी के लिए भारी मुश्किल है कि जिस बड़ी लहर पर चढ़ कर वह सत्ता में आई है, वही सदियों के कूड़ेकरकट को भी तट पर छोड़ रही है और यह कूड़ाकरकट देश व समाज को काले रंग में पोत रहा है.

सहारनपुर के दंगे समाज के कोढ़ के पहले निशान हैं. यदि सही इलाज नहीं किया गया तो ये और उभरेंगे. इस का इलाज पुलिस या सेना तो है ही नहीं. इस का इलाज दलितों, यादवों और दूसरी छोटी जातियों को अपनेअपने छोटे भुलाए गए देवता देना भी नहीं है. इस का इलाज मुसलिमों को परमानैंट सामाजिक दुश्मन बना कर खड़ा कर देना भी नहीं है. उन से चुनाव जीते जा सकते हैं, राज किया जा सकता है, पर लगातार उस विकास की सीढि़यां चढ़ना आसान नहीं है, जिस के नाम पर चुनाव जीता गया. विकास के लिए तो जीतोड़ मेहनत करनी होगी और यह मंत्रों, हवनों और पाठों में नहीं दिखती.

नीची मेहनतकश जातियों ने अपनी मेहनत से देश और समाज को हमेशा बहुतकुछ दिया है. अमीरों की शानशौकत के पीछे उन्हीं का चुप रह कर कम ले कर काम कर के रहने की आदत है. आज के युग में जब समाज की ठेकेदारी खत्म होने लगी है, झुनझुनों से या डराने से काम नहीं चलेगा. कांग्रेस पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश, झारखंड, छत्तीसगढ़ में इसीलिए बहुत पहले विदा हो गई थी, क्योंकि वह उसी रास्ते पर चल रही थी, जिस पर आज भाजपा चल रही है. अब कांग्रेस की जगह भारतीय जनता पार्टी ने ले ली है. पर हां, वह कांग्रेस से भी काफी कम लेनदेन में भरोसा करती है.

देश को बनाना है तो सब को साथ ले कर चलना होगा, सब को भरोसा देना होगा कि मेहनत से देश बनेगा और मेहनत का फायदा सब को ही होगा. हर समय सरकारी ताकत के तेवर दिखाने वाली सरकार तो कभी भी कमजोरों को मना न पाएगी. जब अमीर डर कर रहे तो आम गरीबों का तो कहना ही क्या है. यह सरकार कभी काले धन, कभी नोटबंदी, कभी जीएसटी, कभी राष्ट्रभक्ति का नाम ले कर, कभी पैसे वालों को तो कभी सोचने वालों को डराधमका कर राज कर रही है.

सहारनपुर, हरियाणा और गुजरात की घटनाएं गरीबों को डरा रही हैं. दलितों पर हमले सिर्फ जाति के नाम पर हों, यही गलत है. इसे ठीक करना सामाजिक नेताओं, अखबारों, स्कूलों, विचारकों आदि का काम है. अफसोस है, इन सब को सरकार ने हाशिए पर खड़ा कर दिया है. सरकार और उस की कट्टर फौज ने समाज का पूरा ठेका ले लिया है. कुछ बोलने वाले विकास का गायत्री मंत्र गागा कर मुक्ति का रास्ता दिखाने के हकदार बन गए हैं.

फिर भी उम्मीद है कि सब से ऊपर देश रहेगा. एक देश, एक लोग, एक सोच, एक रास्ता और एक रंग. लोकतंत्र का रंग अब हर सोच पर चढ़ चुका है. दूसरे रंग चढ़ाओगे तो फीके पड़ जाएंगे. चुनाव परिणाम भी बता रहे हैं कि सुनामी उतनी ऊंची नहीं है जितनी दिख रही है. शीतल जल की धारा भी साथ बह रही है. यह देश आज नहीं तो कल चेतेगा. नई सोच, सच की सही परख करेगा. हरेक को बराबरी का, इज्जत का, बढ़ने का हक मिलेगा.

लड़की को शराब पिलाकर उसके साथ लड़कों ने किया ये काम, देखिए वीडियो

अभी हाल ही में लड़कियों के साथ कुछ ऐसी घटनायें हुई हैं, जिसे हमारा सभ्‍य समाज कभी भी सही नहीं मानता है. बता दें कि  अभी हाल ही में नए साल के सेलिब्रेशन के दौरान बेंगलुरु और दिल्ली से महिलाओं के साथ छेड़छाड़ की जैसी घटनाएं सामने आईं थीं, जिसने पूरे देश को सोचने पर मजबूर कर दिया गया था कि ऐसा कैसे हो गया. जहां पर पढ़े-लिखे लोग महिला सुरक्षा को लेकर बड़ी-बड़ी बाते करते हैं.

इस वीडियो में दिखाया गया है कि लड़की ने छोटे कपड़े पहने हैं और तीन लड़कों के बीच में बिल्कुल अकेली है. वो लड़कों के साथ शराब पी रही है. साथ ही लड़की ने सिगरेट भी पी. यही नहीं वो लड़कों के साथ गाने पर थिरकी भी. आखिर वह बेहोश हो जाती है और फिर लड़कों ने उसके साथ कुछ ऐसा किया जो आपके लिए अंदाजा लगाना भी मुश्किल है. इसके लिये आपको यह वीडियो देखना पड़ेगा.

इस वी‌ड‌ियो को सिनेमॉन्क्ज नाम के चैनल ने ‘द ईजी गर्ल’ के नाम से अपलोड किया है.

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कमरे में बुलाया और बना डाला लड़की का MMS, आप भी देखिए

बचपन से हमारे माता पिता हमें एक ही बात सिखाते हैं कि कभी हमसे कुछ छुपाना नहीं, कभी भी कुछ गलत न करना. लेकिन अनजाने में आकर हमसे भूल हो ही जाती है. हम अपने पेरेंट्स से छुपा कर अपनी अलग दुनिया बसाने की सोचते हैं.

हम किसी और को अपना दिल दे बैठते हैं, किसी पर इतना विश्वास कर लेते हैं की हमे उसके सिवाए कुछ और दिखता ही नही. हमारी दुनिया उस इंसान तक ही सीमित रहती है. लेकिन किसी पर अंधा विश्वास करना भी गलत है.
क्यूंकि कब कोई हमारी फीलिंग्स के साथ खेल जाए हमे पता नहीं चलता. फिर आखिर में हमारे पास रोने और पछताने के अलावा कुछ और नहीं बचता.

कुछ ऐसा ही हुआ इस लड़की के साथ. एक लड़के ने इस लड़की का ऐसा एमएमएस बना दिया, जिसे देखकर आप दंग रह जाएंगे.

वीडियो : बाथरूम में नहा रही थी मॉडल, जबरदस्ती घुसे शाहरुख खान

अक्सर हमें लगता है कि ऐसी अजीब हरकत सिर्फ हम आम लोग ही करते हैं लेकिन ऐसा नहीं है. हमारे बॉलीवुड के स्टार्स को जब मस्ती चढ़ती है तब उनको भी कुछ ऐसी ही अजीब हरकते सूझती हैं. अब आप शाहरुख खान को ही ले लीजिये, इनकी फैली हुई बाहों के लाखों दीवाने हैं, लेकिन इन्होनें कुछ ऐसा किया की इनके फैन्स भी चौंक गये.

दरअसल एक पुराना वीडियो सामने आया है, जिसमें शाहरुख खान एक नहाती हुई लड़की के बाथरुम मे घुस गये, इतना नहीं शाहरुख खान का ये वीडियो सोशल मीडिया पर एक बार फिर से वायरल हो रहा है.

आईये देखते हैं पूरा वीडियो और जानते हैं इस वीडियो के पीछे की पूरी कहानी.

वीडियो के मुताबिक शाहरुख खान कहीं बाहर से आते हैं. अचानक से वॉशरुम में घुसते हैं तो एक लड़की नहा रही होती है. शाहरुख खान बाथरुम की शीशे की दीवार के पास जाते हैं और लड़की को शीशे के अंदर से देखने लग जाते हैं.
अचानक से पता नहीं शाहरुख खान को क्या होता हैं वे बाथरुम का शीशा खोलकर लड़की के पास चले जाते हैं. अंदर जाने के बाद शाहरुख खान मॉडल से शॉवर छीन लेते हैं और बाहर आपके अपने फेस पर मारते हुऐ अवार्ड्स की अनाउंमेंट करने लग जाते हैं.

दरअसल ये वीडियो एक अवार्ड शो के लिये बनाया गया था. जो एक बार फिर से वायरल हो रहा है.

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फिल्म रिव्यू : फुल्लू

ट्विंकल खन्ना, अक्षय कुमार और आर बालकी औरतों द्वारा माहवारी के दौरान सैनेटरी नैपकीन के उपयोग को रेखांकित करने वाली अपनी फिल्म ‘‘पैडमैन’’ लेकर आते, उससे पहले ही निर्देशक अभिषेक सक्सेना सैनेटरी नैपकीन पर हास्य व्यंग युक्त फिल्म ‘‘फुल्लू’’ लेकर आ गए. मगर औरतें सैनेटरी पैड का उपयोग करने की बजाय कपड़ों का उपयोग क्यों करती हैं? के सवाल के साथ औरतों को माहवारी के दौरान सैनेटरी नैपकीन के उपयोग की वकालत करने वाली फिल्म ‘‘फुल्लू’’ अपने इस मकसद में सफल नजर नही आती. यह फिल्म नारी उत्थान व नारी स्वास्थ्य से जुड़े मुद्दों पर भी बहुत सतही स्तर पर ही बात करती है. जबकि इस तरह के संदेश को शहर व गांव हर जगह पहुंचाने की जरुरत है.

यह कहानी है उत्तर भारत के एक गांव में रहने वाले फुल्लू (शरीब हाशमी) की. जो कि अपनी मां (नूतन सूर्य) और बहन तारा के साथ रहता है. फुल्लू नाम के अनुरूप काफी भोला है. वह कोई काम धाम नहीं करता. जबकि मां गूदड़ी सिलकर बेचती रहती है. फुल्लू अपनी मां के लिए शहर से कपड़ों की कतरने लाकर देता रहता है, जिसकी गूदड़ी सिलकर वह बेचती है. फुल्लू गांव भर की औरतों के लिए शहर से सामान लाकर देता रहता है और दिन भर मटरगश्ती करता रहता है. उसकी मां उसे ताने मारती रहती है. वह कहती है कि उसका बेटा निकम्मा और मौगा हो गया है. वह चाहती है कि फुल्लू शहर जाकर कुछ काम करके चार पैसे कमाकर लाए.

गांव की एक औरत की सलाह पर फुल्लू की मां उसका ब्याह बिगनी (ज्योति सेठी) से करा देती है कि शादी के बाद फुल्लू जिम्मेदारी का अहसास कर सुधर जाएगा. मगर वह तो दिन रात अपनी पत्नी के साथ कमरे में ही घुसा रहता है. एक दिन उसकी पत्नी बताती है कि उसे खरिस हो गयी है. डाक्टर की सलाह पर दवा ली है और फिटकरी से धोया भी है. इसी बीच शहर में दवा की दुकान पर जब फुल्लू गांव की मास्टरनी व कुछ दूसरी औरतों के लिए सामान लेने पहुंचता है, तो उसे वहां मौजूद डाक्टरनी से पता चलता है कि उसके गांव की मास्टरनी ने उससे दवाई नहीं बल्कि सैनेटरी पैड मंगवाया है. जो कि औरतों के लिए बहुत जरुरी है.

सैनीटरी पैड से खरिस नहीं होती. माहवारी के दिनो में इंफेक्शन नहीं होता है. अब फुल्लू के जीवन का एकमात्र मकसद अपनी मां, बहन व गांव की औरतों के लिए सस्ते दाम वाली सैनेटरी पैड बनाना है. शहर जाकर सैनेटरी पैड बनाने वाली कंपनी में नौकरी करने की जुगत में काफी परेशानी उठाता है. बड़ी मुश्किल से एक महिला पत्रकार की मदद से उसे नौकरी मिलती है. वह वहां पर काम करते हुए सैनेटरी पैड बनाना सीखता है और फिर अपने गांव आकर घर के अंदर सैनेटरी पैड बनाना शुरू करता है. फुल्लू सवाल उठाता है कि औरतें सैनेटरी पैड का उपयोग करने की बजाय कपड़ों का उपयोग क्यों करती हैं? जो कि बाद में इंफेक्शन पैदाकर कई बीमारियों को जन्म देता है. इस बीच उसकी पत्नी गर्भवती है, पर बच्चे को जन्म देने से पहले ही मर जाती है. लेकिन तमाम विराधों व उपहासों के बावजूद फुल्लू सस्ता सैनेटरी पैड बनाने में कामयाब होता है.

सस्ते बजट में बनायी गयी फिल्म ‘‘फुल्लू’’ नेक इरादे से बनायी गयी है, मगर कहानीकार व निर्देशक ने पूरी फिल्म को चौपट कर दिया. फिल्म अवसाद से भरी हुई है. फिल्म के कई घटनाक्रम अतिबनावटी हैं. फिल्म मनोरंजन की बजाय बोर करती है. फिल्म का क्लायमेक्स बहुत ही ज्यादा घटिया  है. फिल्म में बेवजह के गाने भरे गए हैं.

फुल्लू का पात्र मासूम है, मगर किरदार को गति नहीं मिलती. फिल्म की गति भी धीमी है. फिल्म में बार बार मां का अपने बेटे फुल्लू को झिड़कते रहना, उसे निकम्मा कहना अजीब सा लगता है. सैनेटरी नैपकीन का विरोध करने वाली बहन तारा का फेशियल करने वाली बात गले नहीं उतरती. पूरी फिल्म शरीब हाशमी के ही कंधों पर है, पर कमजोर पटकथा व निर्देशन के चलते 20 मिनट बाद ही फिल्म हांफने लगती है. उसके बाद रोते रोते किसी तरह फिल्म खत्म होती है. लेखक व निर्देशक ने फिल्म के किसी भी पात्र का चरित्र चित्रण सही ढंग से नहीं किया है. फुल्लू की पत्नी बिगनी के हिस्से भी कुछ करने के लिए नही है. शरीब हाशमी के अभिनय में नवीनता नजर नहीं आती.

96 मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘‘फुल्ल’’ का निर्माण पुष्पा चौधरी व अनमोल कपूर ने किया है. निर्देशक अभिषेक सक्सेना हैं.

वीडियो : अपने कपड़े उतारकर मरीजों का इलाज करती है ये लेडी डॉक्टर

धरती पर डॉक्टर को भगवान का रूप माना जाता हैं, डॉक्टरों को लेकर समाज में एक छवि बनी हुई हैं. लेकिन, अब ये छवि धीरे-धीरे समाप्त होती जा रही हैं. इलाज के रोज नये-नये तरीके आ रहे हैं. पश्चिमी देशों में चिकित्सीय सुविधायें काफी अच्छी हैं. हालांकि, इसके साथ ही वहां नई-नई बीमारियां सामने आ रही हैं. जिनके इलाज के लिए अलग-अलग तौर-तरीके अपनाये जा रहे हैं. मेडिकल साइंस लगातार तरक्की कर रहा हैं लेकिन, हमारे देश में अस्पतालों की स्थिति को देखकर कहा जाता हैं कि भगवान न करे कि किसी को भी अस्पताल जाना पड़े.

डॉक्टर का जिक्र होने पर आपके मन एक छवि बनती हैं. सफ़ेद कोट पहने हुए एक शख्स जिसके गले में स्टेथोस्कोप लटकता रहता हैं. लेकिन, ये फीमेल डॉक्टर इस छवि के एकदम विपरीत हैं. वह अपने कपड़े उतारकर मरीजों का इलाज करती है.

जी हां, हम आपको ऐसे ही एक डॉक्टर के बारे में बताने जा रहे है. जिससे मिलने के लिए लोग कतार लगाए खड़े रहते हैं. हो भी क्यों न ये डॉक्टर लोगों का बिना कपड़े पहने इलाज जो कर रही है. अमेरिका के न्यूयॉर्क में रहने वाली 24 वर्षीय साराह व्हाइट एक डॉक्टर हैं. यह एक मनोचिकित्सक है. ये डॉक्टर अस्तपाल में आए पुरुषों का इलाज करते वक्त निर्वस्त्र हो जाती हैं.

सराह व्हाइट का ये वीडियो तेजी से सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा हैं. वो अपने मरीजों खासकर पुरुष मरीजों का इलाज करते वक्त अपने सारे कपड़े उतार देती हैं. साराह का दावा हैं कि वो इस थेरेपी के जरिये मर्दों की यौन कुंठा बाहर निकालती हैं.

इलाज का ये तरीका मरीजों को खूब पसंद आ रहा हैं. यह डॉक्टर मरीजो की थेरेपी करती है जो मरीजो को काफी पसंद आ रही है और वह एक सेशन की कीमत 7000 रुपए लेती है. यह खबर जबसे फैलने लगी है, उसके बाद से इलाज करवाने के लिए भीड़ जमा होनी शुरू हो गयी है. इस फीमेल डॉक्टर ने इलाज करने का एक नया तरीका अपनाया है.

साराह के मुताबिक वह दुनिया के महान चिकित्सक फ्रायड की थ्योरी के अनुरुप इलाज कर रही हैं. आपको बता दें कि साराह निर्वस्त्र थेरेपी से इलाज ऑनलाइन करती हैं. मरीजों के इलाज के लिए वह वेबकैम का इस्तेमाल करती हैं. मरीज से बात करते-करते वो अपने सारे कपड़े उतार देती हैं. वो दावा करती हैं कि मर्दों के अंदर दबी हुई यौन कुंठा को बाहर निकालती हैं. इस थेरेपी के जरिये वह मरीजों के साथ बहुत जल्द अंतरंग संबंध बना लेती हैं. जिसके कारण मरीज खुलकर अपनी दबी हुई इच्छाओं को जाहिर करते हैं.

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