औरों से आगे: भाग 2

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लेखक- प्रसून भार्गव

अम्मां सन्न रह गई थीं. जब उन का मौन टूटा तो मुंह से पहला वाक्य यही निकला था, ‘‘आज तुम्हारे पिताजी जिंदा होते तो क्या घर में ऐसा होता? उन्हें बहुत दुख होता. जमाने की हवा है. मैं तो तभी जान गई थी जब तुम ने इसे बाहर पढ़ने भेजा. लड़कियों की अधिक स्वतंत्रता अच्छी नहीं.’’

यह अम्मां की विशेषता थी कि उन्हें हर बात पहले से ही पता रहती थी. पर वह घटना घटने के बाद ही कहती थीं. अम्मां ही क्या, कई लोग इस में माहिर होते हैं.

अम्मां के प्रतिकूल रवैए से बड़े भैया का मन भी अशांत हो उठा था. किसी ने सपने में भी नहीं सोचा था कि वैश्य परिवार की लाड़ली, भोलीभाली एवं प्रतिभाशाली कन्या ऐसा कदम उठाएगी, जबकि परिवार के लोग घरवर खोजने में लगे थे.

वह तो एकाएक विस्फोट सा लगा. पर जब शुद्ध दक्षिण भारतीय राघवन से परिचय हुआ तो उस सौम्यसुदर्शन चेहरे के सम्मोहन ने कहीं सब के मन को छू लिया. सभी को लगा कि लड़का लाखों में एक है.

अम्मां ने कहा, ‘‘हिंदी तो ऐसे बोलता है, जैसे हमारे बीच ही रहता आया हो.’’

अम्मां का अनुकूल रुख देख कर बड़े भैया भी बदले थे. भाभी तो ऐसे अवसरों पर सदा तटस्थ रहती थीं. फिर भी बेटी को मनचाहा घरवर मिल रहा था, इस बात की अनुभूति उन के तटस्थ चेहरे को निखार गई थी. वह मन की प्रसन्नता मन तक ही रख कर अम्मां और भैया के सामने कुछ कहने का दुस्साहस नहीं कर पा रही थीं. बस, दबी जबान से इतना ही कहा, ‘‘आजकल तो वैश्यों में कितने ही अंतर्जातीय विवाह हो रहे हैं और सभी सहर्ष स्वीकार किए जा रहे हैं. जाति की संकुचित भावना का अब उतना महत्त्व नहीं है, जितना 15-20 वर्ष पहले था.’’

इतना सुनते ही अम्मां और भैया साथसाथ बोल उठे थे, ‘‘तुम्हारी ही शह है.’’

उस के बाद जब तक विवाह नहीं हुआ, भाभी मौन ही रहीं. वैसे यह सच था कि भाभी के बढ़ावे से ही कनु ने जाति से बाहर जाने की जिद की थी. सम्मिलित परिवार में रहीं भाभी नहीं चाहती थीं कि उन की बेटी सिर्फ आदर्श बहू बन कर रह जाए. वह चाहती थीं कि वह स्वतंत्र व्यक्तित्व की स्वामिनी बने.

कनु और राघवन विवाह के अवसर पर फुजूलखर्ची के खिलाफ थे. इसलिए बहुत सादी रीति से ब्याह हो गया, जो बाद में सब को अच्छा लगा.

जैसेजैसे समय बीतता गया, राघवन का सभ्य व्यवहार, दहेज विरोधी सुलझे विचार और स्वाभिमानी व्यक्तित्व की ठंडी फुहार तले भीगता सब का मन शांत व सहज हो गया था. दोनों परिवारों में आपसी सद्भाव, प्रेम व स्नेह के आदानप्रदान ने प्रांतीयता व भाषा रूपी भेदभावों को पीछे छोड़, कब स्वयं को व्यक्त करने के लिए नई भाषा अपना ली, पता ही नहीं लगा. वह थी, हिंदी, अंगरेजी, तमिल मिश्रित भाषा.

हमारे परिवार में भी तमिल समझने- सीखने की होड़ लग गई थी. यह जरूरी भी था. एक भाषाभाषी होने पर जो आत्मीयता व अपनेपन के स्पर्श की अनुभूति होती है, वह भिन्नभिन्न भाषाभाषी व्यक्तियों के साथ नहीं हो पाती. संभवत: यही कारण है कि अंतर्जातीय विवाहों में दूरी का अनुभव होता है. भाषा भेद हमारी एकता में बाधक है. नहीं तो भारत के हर प्रांत की सभ्यता व संस्कृति एक ही है. प्रांतों की भाषा की अनेकता में भी एकता गहरी है या शायद विशाल एकता की भावना ने रंगबिरंगी हो भिन्नभिन्न भाषाओं के रूप में प्रांतों में विविधता सजा दी है.

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कनु के ब्याह के बाद स्मिता का ब्याह गुजराती परिवार में हुआ. मझली भाभी व भैया के लाख न चाहने पर भी वह ब्याह हुआ. सब से आश्चर्यजनक बात यह थी कि किसी को उस विवाह पर आपत्ति नहीं हुई. जैसे वह रोज की सामान्य सी बात थी. साथ ही रिंकू के लिए वर खोजने की आवश्यकता नहीं है, यह भी सोच लिया गया.

अनिल व स्मिता को जैसे एकदूसरे के लिए ही बनाया गया था. दोनों की जोड़ी बारबार देखने को मन करता था.

अम्मां इस बार पहले से कुछ अधिक शांत थीं. अनिल डाक्टर था, इसलिए आते ही अम्मां की कमजोर नब्ज पहचान गया था. जितनी देर रहता, ‘अम्मांअम्मां’ कह कर उन्हें निहाल करता रहता.

एक बार जब अम्मां बीमार पड़ीं, तब ज्यादा तबीयत बिगड़ जाने पर अनिल सारी रात वहीं कुरसी डाले बैठा रहा. सवेरे आंख खुलने पर अम्मां ने आशीर्वादों की झड़ी लगा दी थी. बेटी से ज्यादा दामाद जिगर का टुकड़ा बन चला था. अम्मां ने अनिल के पिता से बारबार कहा था, ‘‘हमारी स्मिता के दिन फिर गए, जो आप के घर की बहू बनी. हमें गर्व है कि हमें ऐसा हीरा सा दामाद मिला.’’

अनिल के मातापिता ने अम्मां का हाथ पकड़ कर गद्गद कंठ से सिर्फ इतना ही कहा, ‘‘आप घर की बड़ी हैं. बस, सब को आप का आशीर्वाद मिलता रहे.’’

सुखदुख में जाति भेद व भाषा भेद न जाने कैसे लुप्त हो जाता है. सिर्फ भावना ही प्रमुख रह जाती है, जिस की न जाति होती है, न भाषा. और भावना हमें कितना करीब ला सकती है, देख कर आश्चर्य होता था.

अब रिंकू का ब्याह था. घर के कोनेकोने में उत्साह व आनंद बिखरा पड़ा था. जातीयविजातीय अपनेअपने तरीके से, अपनीअपनी जिज्ञासा लिए अनेक दृष्टिकोणों से हमारे परिवार को समझने का प्रयास कर रहे थे. रिंकू बंगाली परिवार में ब्याही जा रही थी. कहां शुद्ध शाकाहारी वैश्य परिवार की कन्या रिंकू और कहां माछेर झोल का दीवाना मलय. पर किसी को चिंता नहीं थी, अम्मां उत्साह से भरी थीं. उन की बातों से लगता था कि उन्हें अपने विजातीय दामादों पर नाज है. अम्मां का उत्साह व रवैया देख कर जातीय भाईबंधु, जो कल तक अम्मां को ‘इन बेचारी की कोई सुनता नहीं’ कह कर सहानुभूति दर्शा रहे थे, अब चकित हो पसोपेश में पड़े क्या सोच रहे थे, कह पाना मुश्किल था. रिंकू का विवाह सानंद संपन्न हो गया. वह विदा हो ससुराल चली गई.

दूसरे दिन मन का कुतूहल जब प्रश्न बन कर अम्मां के आगे आया तो पहले तो अम्मां ने टालना चाहा, लेकिन राकेश, विवेक, कनु, राघवन, स्मिता, अनिल सभी उन के पीछे पड़ गए, ‘‘अम्मां, सचसच बताइएगा, अंतर्जातीय विवाहों को आप सच ही उचित नहीं समझतीं या…’’

प्रश्न पूरा होने से पहले ही अम्मां सकुचाती सी बोल उठीं, ‘‘मेरे अपने विचार में इन विवाहों में कुछ भी अनुचित नहीं. पर हम जिस समाज में रहते हैं, उस के साथ ही चलना चाहिए.’’

‘‘पर अम्मां, समाज तो हम से बनता है. यदि हम किसी बात को सही समझते हैं तो उसे दूसरों को समझा कर उन्हें भी उस के औचित्य का विश्वास दिलाना चाहिए न कि डर कर स्वयं भी चुप रह जाना चाहिए.’’

अब स्मिता को बोलने का अवसर भी मिल गया था, ‘‘अम्मां, जातिभेद प्रकृति की देन नहीं है. यह वर्गीकरण तो हमारे शास्त्रों की जबरदस्ती की देन है. लेकिन अब तो हर जाति का व्यक्ति शास्त्र के विरुद्ध व्यवसाय अपना रहा है. अंतर्मन सब का एक जैसा ही तो है. फिर यह भेद क्यों?’’

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राकेश ने अम्मां को एक और दृष्टिकोण से समझाना चाहा, ‘‘अम्मां, हम लोगों में शिक्षा की प्रधानता है. और शिक्षित व्यक्ति ही आगे बढ़ सकता है, ऐसा करने से हम आगे बढ़ते हैं. हमें जाति से जरा भी नफरत नहीं है. आप ऐसा क्यों सोचती हैं?’’

सब बातों में इतने मशगूल थे कि पता ही नहीं लगा, कब भैयाभाभी इत्यादि आ कर खड़े हो गए थे.

अम्मां कुछ देर चुप रहीं, फिर बोलीं, ‘‘सच है, यदि हमारे परिवार की तरह ही हर परिवार अंतर्जातीय विवाहों को स्वीकार करे तो किसी हद तक तलाक व दहेज की समस्या सुलझ सकती है और बेमानी वैवाहिक जिंदगी जीने वालों की जिंदगी खुशहाल हो सकती है.’’ अम्मां के पोतेपोतियों ने उन्हें झट चूम लिया. एक बार फिर हमें गर्व की अनुभूति ने सहलाया, ‘हमारी अम्मां औरों से आगे हैं.’

जानलेवा गेम ब्लू व्हेल : भाग 3

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गेम खेलने वाले एक छात्र ने बताया कि जब उसे ब्लू व्हेल गेम का पता चला तो इस के लिए ब्लू व्हेल लिख कर इंटरनेट पर सर्च किया. इस कोशिश में एक वीडियो आया, जिस में कलाई काट कर ब्लू व्हेल या एफ 57 का निशान बनाना था. खेलने का मन हुआ तो उस ने अपनी कलाई काट ली. दूसरे दिन उस ने अपने दोस्तों को दिखा कर कहा कि यह टास्क सिर्फ मैं पूरा कर सकता हूं. तुम सब डरपोक हो. जोश में आ कर उस के 5 दोस्तों ने कलाई पर वैसे ही कट बना लिए.

जानलेवा औनलाइन गेम ब्लू व्हेल चैलेंज सन 2013 में रशिया में लौंच हुआ था. इसे द ब्लू व्हेल गेम भी कहते हैं. इस की शुरुआत फिलिप बुदेइकिन नामक 21 साल के युवा ने की थी. वह साइकोलौजी का छात्र था, लेकिन यूनिवर्सिटी से निकाल दिया गया था. बाद में फिलिप को 16 युवाओं को आत्महत्या के लिए उकसाने के जुर्म में गिरफ्तार कर लिया गया. उसे 3 साल की सजा सुनाई गई. अभी वह जेल में है. गिरफ्तारी के बाद जब उस से यह गेम बनाने का कारण पूछा गया तो उस का जवाब था कि मैं समाज में कचरे को साफ करना चाहता हूं.

फिलिप की जगह बाद में दूसरे लोगों ने यह काम संभाल लिया. इस ग्रुप से जुडे़ लोग ऐसे बच्चों की तलाश में रहते हैं, जो सोशल मीडिया पर टौर्चर, हिंसा या अपवाद का कंटेंट शेयर करते हैं. संपर्क के बाद गेम में शामिल करने के लिए वाट्सऐप, फेसबुक या मैसेंजर का इस्तेमाल किया जाता है.

इस गेम को डाउनलोड नहीं किया जा सकता, क्योंकि यह कोई सौफ्टवेयर या एप्लीकेशन नहीं है. इस गेम को खेलने के लिए एक लिंक होता है, जो भी यूजर इस लिंक को ऐक्टिव करता है, वह एडमिन के शिकंजे में आ जाता है.

ऐसे दिया जाता है टास्क

50 दिन के गेम में रोजाना एक टास्क दिया जाता है. शुरुआती टास्क अपेक्षाकृत आसान होते हैं. जैसे सुबह 4 बजे उठना या रात भर जागना. 49 टास्क तक आतेआते चैलेंज इतने मुश्किल हो जाते हैं कि खेलने वाले की जान तक चली जाती है. इन में एडमिनिस्टे्रेटर को फोटो प्रूफ भी देने होते हैं. मसलन इस में शरीर पर कट लगाना, हाथ की नसें काट लेना, ब्लेड या चाकू से कलाई पर व्हेल का निशान बनाना, शरीर में सुइयां चुभाना जैसी चीजें शामिल होती हैं. कोई लड़का या लड़की 49वें टास्क तक भी चलता रहे तो 50वां टास्क होता है खुद की जान ले लो.

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यह गेम भारत समेत चीन, अमेरिका, फ्रांस, इंगलैंड, पश्मिची यूरोप एवं कई अन्य देशों में करीब 150 से ज्यादा लोगों की जान ले चुका है. कुछ समय पहले रशियन पुलिस ने 17 साल की एक लड़की को गिरफ्तार किया था. पुलिस ने उसे ब्लू व्हेल औनलाइन गेम की मास्टरमाइंड बताया. एक समाचार एजेंसी ने रूस की इंटीरियर मिनिस्ट्री के कर्नल इरिना वौक के हवाले से कहा था कि आरोपी लड़की गेम बीच में छोड़ने वालों को जान से मारने की धमकी और उन के परिवार की हत्या जैसी धमकियां दे कर मासूमों को खुदकुशी करने के लिए मजबूर करती थी.

रशियन पुलिस को उस लड़की के कमरे से हौरर किताबें, डरावनी पेंटिंग, सुसाइड के लिए मजबूर करने वाले फोटो, डीवीडी और विवादित उपन्यास मिले थे, साथ ही साइकोलौजी के छात्र फिलिप बुदेइकिन के फोटो भी मिले थे. रूस की पुलिस के मुताबिक पहले इस लड़की ने खुद गेम खेला था, लेकिन उस ने आखिरी टास्क पूरा करने के लिए सुसाइड नहीं किया. इस के बाद वह गेम की एडमिनिस्ट्रेटर बन गई.

भारत सहित दुनिया के कई देशों में चिंता का कारण बन रहा ब्लू व्हेल गेम गूगल पर आजकल काफी सर्च किया जा रहा है. गूगल ट्रेंड रिपोर्ट्स में बताया गया है कि ब्लू व्हेल गेम सर्च में 3 महीने से भारत टौप पर है. कुछ समय पहले कोलकाता गूगल सर्च में टौप पर था. इस के बाद पहले स्थान पर कोच्चि आ गया है. तिरुवनंतपुरम दूसरे और कोलकाता तीसरे नंबर पर है. भारत में दिल्ली, गुड़गांव, मुंबई व भोपाल 32वें स्थान पर हैं. इस गेम को खोजने वालों में सितंबर के पहले सप्ताह में  राजस्थान 7वें नंबर पर था.

भारत सरकार की चिंता

ब्लू व्हेल गेम को ले कर भारत सरकार काफी चिंतित है. कई राज्य सरकारों ने भी चिंता जताई है. केंद्र सरकार ने 11 अगस्त को इस गेम पर रोक लगाते हुए सभी इंटरनेट कंपनियों गूगल, फेसबुक, वाट्सऐप, इंस्टाग्राम, माइक्रोसौफ्ट, याहू आदि को निर्देश जारी कर कहा था कि ये कंपनियां इस गेम को अपने प्लेटफौर्म से हटा दें.

केंद्र सरकार का मानना है कि आने वाले समय में साइबर हमला और इस तरह के लिंक बड़ी चुनौती बन सकते हैं. केंद्र सरकार की साइबर अपराध से संबंधित संस्था सीईआरटी भी इस गेम के बारे में जांच कर रही हैं. पुलिस की साइबर सेल को भी अलर्ट किया गया है.

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कई राज्य सरकारों ने विद्यार्थियों के घर वालों और टीचर्स के लिए गाइडलाइन जारी की है. विभिन्न राज्यों की पुलिस ने भी ऐतिहासिक कदम उठाए हैं. राजस्थान के पुलिस महानिदेशक अजीत सिंह ने सभी पुलिस अधीक्षकों को ब्लू व्हेल गेम की रोकथाम के लिए स्कूल कालेजों में व्यापक जागरूकता अभियान चलाने के निर्देश दिए हैं. कई जगह अदालतों में याचिकाएं दायर कर इस गेम पर रोक लगाने की मांग की गई है.

इतना सब कुछ होने के बावजूद अभी तक यह गेम युवाओं की जान ले रहा है. बच्चों को इस से बचाने के लिए अभिभावकों को खासतौर से सतर्क रहने की जरूरत है. ब्लू व्हेल गेम विरोधी वीडियो भी यूट्यूब पर आ गए हैं. न्यूज प्रोड्यूसर ख्याली चक्रवर्ती के ब्लू व्हेल विरोधी वीडियो को हफ्तेभर में ही 1 करोड़ 30 लाख से ज्यादा हिट मिले हैं. सायकोलौजी की पढ़ाई करने वाली ख्याली ने इस गेम की रिसर्च करने के बाद वीडियो बना कर यूट्यूब पर डाला है.

सर्वोच्च न्यायालय का आदेश

‘ब्लू व्हेल गेम’ जैसे जानलेवा खेल से लोगों का चिंतित होना स्वाभाविक ही है. ब्लू व्हेल पर बैन लगाने के लिए मदुरै के 73 साल के अधिवक्ता एन.एस. पोन्नैया ने 15 सितंबर को सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर की है, जिस में कहा गया है कि यह गेम अब तक 200 लोगों की जान ले चुका है, लेकिन केंद्र सरकार ने इस से निपटने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाया है. केंद्र सरकार को चाहिए कि वह इस गेम के विरोध में जागरूकता अभियान चलाए. इसी बीच कोलकाता हाईकोर्ट में ऐसी ही एक याचिका दायर की गई है. वहां के हाईकोर्ट ने इस संबंध में पश्चिम बंगाल सरकार को निर्देश भी जारी कर दिए हैं.

सर्वोच्च न्यायालय ने भी पोन्नैया की याचिका के आधार पर केंद्र सरकार को 3 सप्ताह में जवाब देने को कहा है, साथ ही कोर्ट ने इस मामले में अटार्नी जनरल के.के. वेणुगोपाल से इस मामले में सहयोग करने को कहा है.

कहांकहां बना ब्लू व्हेल गेम मौत की वजह   

वेनेजुएला : 26 अप्रैल को एक 15 साल के बच्चे ने कथित तौर पर इस खेल के लिए जान दे दी.

ब्राजील : क्रिशियन सोशल पार्टी के पास्टर ने दावा किया कि उस की भतीजी ने इस खेल के चलते अपनी जान दे दी. एक 15 साल की छात्रा को जान देने के ठीक पहले बचा लिया गया. उस के हाथ पर व्हेल के शेप में कई कट्स लगे थे.

एक 17 सल के बच्चे ने खुदकुशी की कोशिश से पहले फेसबुक पर लिखा- ‘ब्लेम इट औन द व्हेल’ यानी इस का दोष ‘व्हेल’ पर लगाया जाए.

अर्जेंटीना : एक 16 साल के बच्चे ने फाइनल स्टेज के लिए अपनी जान दे दी, वहीं  एक 14 साल के बच्चे को अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा.

इटली : मार्च में अखबारों में इस खेल की चर्चा हुई. इसे असली रूसी खेल करार देते हुए इस के नियमों के बारे में बताया गया. कुछ दिनों बाद एक टीनएजर की खुदकुशी को इस खेल से जोड़ कर देखा गया.

कीनिया : नैरोबी में एक स्टूडेंट ने 3 मई को फांसी लगा कर खुदकुशी कर ली.

पुर्तगाल : 18 साल की एक लड़की को रेलवे लाइन के पास पाया गया, उस के हाथ पर कई चोटें पाई गईं. उस ने बताया कि उसे किसी ब्लू व्हेल नाम के शख्स ने उकसाया था.

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सऊदी अरब : 5 जून को एक 13 साल के बच्चे ने अपने प्ले स्टेशन के तारों से खुद की जान लेने की कोशिश की. सऊदी में इस खेल का यह पहला मामला था.

चीन : एक 10 साल की बच्ची ने खेल के चलते खुद को नुकसान पहुंचाया और एक सुसाइड ग्रुप भी बनाया. वहां इस खेल पर कड़ी नजर रखी जा रही है.

रूस : मार्च, 2017 में प्रशासन ने इस खेल से जुड़े मामलों की जांच शुरू की. फरवरी में 15 साल के 2 बच्चों ने साइबेरिया में एक इमारत से कूद कर जान दे दी. ऐसा कदम उठाने से पहले उन्होंने सोशल मीडिया पर एक व्हेल की फोटो शेयर करते हुए कैप्शन दिया.

कहानी सौजन्य-मनोहर कहानियां

जानलेवा गेम ब्लू व्हेल : भाग 2

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बताया गया कि मनप्रीत ने ब्लू व्हेल गेम का टास्क पूरा करने के लिए यह कदम उठाया था. उस ने 9वीं कक्षा में पढ़ने वाले अपने दोस्त को मैसेज भेजा था कि गेम का टास्क पूरा करने के लिए मैं बिल्डिंग से कूद रहा हूं. हो सकता है मनप्रीत से पहले भी ब्लू व्हेल गेम के चक्कर में किसी बालक या युवा ने अपनी जान गंवाई हो, लेकिन ज्यादा चर्चा न होने से ऐसी कोई घटना उभर कर सामने नहीं आई.

इस के बाद तो ऐसा सिलसिला शुरू हुआ कि रोजाना किसी न किसी राज्य से इस तरह की खबरें आने लगीं. हालांकि आधिकारिक तौर पर केंद्र सरकार के पास अभी तक कोई ऐसा आंकड़ा नहीं है, जिस से यह पता चल सके कि इस गेम के चक्कर में कितने युवाओं की जान जा चुकी है और कितने ऐसे युवा हैं, जिन की जान बचा ली गई है.

जुलाई के चौथे सप्ताह में केरल के तिरुवंतपुरम में 11वीं कक्षा में पढ़ने वाले एक छात्र मनोज ने संदिग्ध हालत में खुदकुशी कर ली. उस का शव कमरे में पंखे से लटका हुआ मिला. घर वालों का कहना है कि ब्लू व्हेल गेम ने उन के बेटे की जान ले ली. पिछले कई महीनों से उस के व्यवहार में बदलाव आ गया था.

कुछ महीने पहले मनोज ने इस गेम के बारे में अपनी मां अनु को बताया था, बाद में वह झूठ भी बोलने लगा था. मनोज कब्रिस्तान जैसी जगहों पर अकेला चला जाता था. उस के शरीर पर कई तरह के निशान बने हुए थे. वह रातरात भर जागता और सुबह 5 बजे सोता था. पुलिस ने उस के मोबाइल की जांच की.

अगस्त के दूसरे सप्ताह में पश्चिम बंगाल में बेस्ट मिदनापुर के आनंदपुर कस्बे में रहने वाले अंकन डे का शव बाथरूम में पाया गया. अंकन ने अपने सिर को प्लास्टिक बैग से ढका हुआ था और बैग को गर्दन के पास कस कर बांधा हुआ था. उस की मौत दम घुटने से हुई थी. 10वीं कक्षा के छात्र अंकन के दोस्तों ने बाद में बताया कि वह ब्लू व्हेल गेम खेल रहा था.

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दिल्ली में भी दस्तक

अगस्त के तीसरे सप्ताह में दिल्ली के द्वारका में रहने वाले 17 साल के किशोर की जान उस की मां की सतर्कता से बच गई. बच्चे ने इस गेम के आधे पौइंट पार कर लिए थे. अगले चरण में उस ने गेम के निर्देश के तहत अपने चेहरे पर ज्योमेट्री बौक्स के टूल से जख्म बना लिए थे. मां ने साइकियाट्रिस्ट डाक्टरों की मदद ली. अब इस किशोर की हालत स्थिर है. इस से पहले उस का व्यवहार बदल गया था और वह अकेला रहने लगा था. पूछने पर सही जवाब भी नहीं देता था.

अगस्त के चौथे सप्ताह में उत्तर प्रदेश के शहर हमीरपुर में 13 साल के पार्थ ने पंखे से लटक कर फांसी लगा ली. घर वाले उसे अस्पताल भी ले गए, लेकिन उस की जान नहीं बचाई जा सकी. वह जयपुरिया स्कूल में 7वीं कक्षा में पढ़ता था. बताया गया कि ब्लू व्हेल गेम का टास्क पूरा करने के लिए उस ने यह कदम उठाया था. अपनी जान देने से पहले वह मोबाइल मे ब्लू व्हेल गेम खेल रहा था. इस दौरान वह अचानक कमरे में गया और बैड के ऊपर कुर्सी रख कर अंगौछे के सहारे पंखे से लटक गया.

ब्लू व्हेल बन गया फांसी

अगस्त महीने के ही आखिरी दिनों में तमिलनाडु के मदुरै में ब्लू व्हेल गेम खेल रहे 19 साल के विग्नेश ने फांसी लगा कर अपनी जान दे दी. वह बीकौम द्वितीय वर्ष का छात्र था. उस ने सुसाइड नोट में लिखा कि ब्लू व्हले गेम नहीं, बल्कि खतरा है. एक बार इस में घुसने के बाद निकल नहीं सकते. उस ने अपने हाथ पर व्हेल का निशान भी बनाया था. मां ने जब इस निशान के बारे में पूछा तो विग्नेश ने कहा था कि चिंता मत करो.

विग्नेश की मौत के दूसरे दिन अगस्त के आखिर में पुडुचेरी की सैंट्रल यूनिवर्सिटी में पढ़ने वाले 23 साल के एमबीए के छात्र शशि कुमार वोरा ने हौस्टल के कमरे में फांसी लगा कर अपनी जीवनलीला समाप्त कर ली. वह मूलत: असम का रहने वाला था. उस ने ब्लू व्हेल गेम की चुनौती पूरी करते हुए आत्महत्या की थी. पुलिस ने वोरा के मोबाइल फोन की जांच करने के बाद इस बात की पुष्टि की थी कि आत्महत्या करने से पहले वह ब्लू व्हेल गेम खेल रहा था.

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अगस्त महीने के आखिरी दिन ही गुजरात के बनासकांठा में ब्लू व्हेल गेम खेलते हुए एक युवक ने साबरमती नदी में छलांग लगा कर आत्महत्या कर ली.

20 साल के अशोक मुलाणा ने अपनी जान देने से पहले फेसबुक पर एक वीडियो मैसेज पोस्ट किया, जिस में उस ने कहा कि मैं जिंदगी से परेशान हो गया हूं. मेरा शिकार ब्लू व्हेल गेम ने किया है, इसलिए सुसाइड कर रहा हूं, मेरे परिवार में किसी की कोई गलती नहीं है.

अशोक 4 बहनों का एकलौता भाई था. उस के पिता परथीभाई की मौत हो चुकी थी. वह 3 महीने से नौकरी पर भी नहीं जा रहा था. दूसरी ओर पुलिस ने इस युवक के ब्लू व्हेल गेम का शिकार होने की बात से इनकार किया है.

सितंबर के पहले दिन असम के गुवाहाटी में एक लड़के ने खुद को काट लिया. नौगांव में 5वीं कक्षा में 2 बच्चों की अपने हाथ की कलाई पर व्हेल बनाने की कोशिश करते समय खून बहने पर बचा लिया गया. जोरहाट में एक छात्र ने फेसबुक पोस्ट कर ब्लू व्हेल की एडवांस स्टेज पर पहुंचने की पोस्ट डाली. इस के बाद वह लापता हो गया.

सितंबर के पहले सप्ताह में ही मध्य प्रदेश के दमोह में सात्विक नाम का छात्र ब्लू व्हेल गेम की आखिरी स्टेज का चैलेंज पूरा करने के लिए टे्रन के आगे घुटने टेक कर बैठ गया. इस से उस के परखच्चे उड़ गए. वह विज्ञान का 11वीं का छात्र था. जहां सात्विक की मौत हुई, वहां से कुछ ही दूरी पर लगे सीसीटीवी कैमरे में इस घटना के कुछ फुटेज पुलिस ने देखे. पुलिस ने सात्विक के मोबाइल की भी जांच की. बताया गया कि घटना से कुछ दिनों पहले से वह हर जगह मोबाइल ले कर जाता था. वह ब्लू व्हेल गेम खेलने की वजह से काफी परेशान था. उस ने दोस्तों से कहा था कि मेरे पास वक्त कम है.

हिमाचल प्रदेश के सोलन में सितंबर के दूसरे सप्ताह में ब्लू व्हेल गेम का पहला मामला सामने आया. इस का पता तब चला, जब एक निजी स्कूल में छठी कक्षा में पढ़ने वाले बच्चे के घर वालों ने उस की कलाई पर ब्लेड के कट के निशान देखे. पूछने पर बच्चे ने बताया कि स्कूल के दूसरे छात्र भी इस गेम को खेल रहे हैं. गेम के टास्क के तहत उस ने कलाई पर कट लगाए हैं. खुद के पास मोबाइल न होने के कारण वह दोस्त के मोबाइल से और कैफे में जा कर यह खतरनाक गेम खेलता था.

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उत्तर प्रदेश में पसरे पांव

उत्तर प्रदेश के हमीरपुर में ब्लू व्हेल से दूसरी मौत सितंबर के दूसरे सप्ताह में हुई. इस घटना में 21 साल के दीपक वर्मा ने अपने घर की दूसरी मंजिल की छत से नीचे छलांग लगा दी थी. दूसरी घटना में लखनऊ के पौश इलाके इंदिरा नगर में 14 साल के आदित्यवर्द्धन ने अपने घर पर कमरे में फांसी लगा ली थी. दोस्तों ने बताया कि आदित्य 2 सप्ताह से मोबाइल पर ब्लू व्हेल गेम खेल रहा था.

कानपुर में एक छात्र की जान अध्यापकों की सतर्कता से बच गई. बर्रा के जरौली स्थित सरदार पटेल इंटर कालेज में 11वीं में पढ़ने वाला 16 साल का छात्र इस गेम के चक्कर में फंस कर क्लास में बैठा सुसाइड नोट लिख रहा था, तभी एक टीचर की नजर उस पर पड़ गई. कई दिनों से इस छात्र को गुमशुम देख कर शिक्षक उस पर नजर रखे हुए थे.

अभी 14 सितंबर को पता चला कि छत्तीसगढ़ के बालोद में एक साथ 6 छात्र ब्लू व्हेल गेम के चक्कर में फंस कर अपनी कलाई काट बैठे. जांच में पता चला कि इन में से एक ही छात्र गेम खेलता था, बाकी को उसी ने चैलेंज दिया था. इन सभी छात्रों के हाथों पर ब्लेड से काटने के निशान मिले.

जानें आगे क्या हुआ अगले भाग में…

कहानी सौजन्य-मनोहर कहानियां

औरों से आगे: भाग 1

लेखक- प्रसून भार्गव

‘‘अंतर्जातीय विवाहों से हमारे आचारविचार में छिपी संकीर्णता खत्म हो जाती है. अंधविश्वासों व दकियानूसीपन के अंधेरे से ऊपर उठ कर हम एक खुलेपन का अनुभव करते हैं. विभिन्न प्रांतों की संस्कृति तथा सभ्यता को अपनाकर भारतीय एकता को बढ़ावा देते हैं…’’ अम्मां किसी से कह रही थीं.

मैं और छोटी भाभी कमरे से निकल रहे थे. जैसे ही बाहर बरामदे में आए तो देखा कि अम्मां किसी महिला से बतिया रही हैं. सुन कर एकाएक विश्वास होना कठिन हो गया. कल रात ही तो अम्मां बड़े भैया पर किस कदर बरस रही थीं, ‘‘तुम लोगों ने तो हमारी नाक ही काट दी. सारी की सारी बेटियां विजातियों में ब्याह रहे हो. तुम्हारे बाबूजी जिंदा होते तो क्या कभी ऐसा होता. उन्होंने वैश्य समाज के लिए कितना कुछ किया, उन की हर परंपरा निभाई. सब बेटाबेटी कुलीन वैश्य परिवारों में ब्याहे गए. बस, तुम लोगों को जो अंगरेजी स्कूल में पढ़ाया, उसी का नतीजा आज सामने है.

‘‘अभी तक तो फिर भी गनीमत है. पर तुम्हारे बेटेबेटियों को तो वैश्य नाम से ही चिढ़ हो रही है. बेटियां तो परजाति में ब्याही ही गईं, अब बेटे भी जाति की बेटी नहीं लाएंगे, यह तो अभी से दिखाई दे रहा है.’’

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बड़े भैया ने साहस कर बीच में ही पूछ लिया था, ‘‘तो क्या अम्मां, तुम्हें अपने दामाद पसंद नहीं हैं?’’

‘‘अरे, यह…यह मैं ने कब कहा. मेरे दामाद तो हीरा हैं. अम्मांअम्मां कहते नहीं थकते?हैं, मानो इसी घर के बेटे हों.’’

‘‘तो फिर शिकायत किस बात की. यही न कि वह वैश्य नहीं हैं?’’

2 मिनट चुप रह कर अम्मां बोलीं, ‘‘सो तो है. पर ब्राह्मण हैं, बस, इसी बात से सब्र है.’’

‘‘अगर ब्राह्मण की जगह कायस्थ होते तो?’’

‘‘न बाबा न, ऐसी बातें मत करो. कायस्थ तो मांसमछली खाते हैं.’’

धीरेधीरे घर के अन्य सदस्य भी वहां जमा होने लगे थे. ऐसी बहस में सब को अपनाअपना मत रखने का अवसर जो मिलता था.

‘‘क्या मांसमछली खाने वाले आदमी नहीं होते?’’ छोटे भैया के बेटे राकेश ने पूछा.

अम्मां जैसे उत्तर देतेदेते निरुत्तर होने लगीं. शायद इसीलिए उन का आखिरी अस्त्र चल गया, ‘‘मुझ से व्यर्थ की बहस मत किया करो. तुम लोगों को न बड़ों का अदब, न उन के विचारों का आदर. चार अक्षर अंगरेजी के क्या पढ़ लिए कि अपनी जाति ही भूलने लगे.’’

ऐसे अवसरों पर मझले भैया की बेटी स्मिता सब से ज्यादा कुछ कहने को उतावली दिखती थी, जो समाजशास्त्र की छात्रा थी. आखिर वह समाज के विभिन्न वर्गों को भिन्नभिन्न नजरिए से देखसमझ रही थी.

भैया भले ही कम डरते थे, पर भाभियां तो अपनेअपने बेटेबेटियों को आंखों के इशारों से तुरंत वहां से हटा कर दूसरे कामों में लगा देने को उतारू हो जाती थीं. जानती?थीं कि आखिर में उन्हें ही अम्मां की उस नाराजगी का सामना करना पड़ेगा. भाभियों के डर को भांपते हुए मैं ने सोचा, ‘आज मैं ही कुछ बोल कर देखूं.’

‘‘अम्मां, यह तो कोई बात न हुई कि उत्तर देते न बन पड़ा तो आप ने कह दिया, ‘व्यर्थ की बहस मत करो.’ राकेश ने तो सिर्फ यही जानना चाहा है कि क्या मांसमछली खाने वाले भले आदमी नहीं होते?’’

अम्मां हारने वाली नहीं थीं. उन्हें हर बात को अपने ही ढंग से प्रस्तुत करना आता था. हारी हुई लड़ाई जीतने की कला में माहिर अम्मां ने झट बात बदल दी, ‘‘अरे, दुनिया में कुछ भी हो, मुझे तो अपने घर से लेनादेना है. मेरे घर में यह अधर्म न हो, बस.’’

मेरा समर्थन पा कर राकेश फिर पूछ बैठा, ‘‘अम्मां, जो लोग मांसमछली खाते हैं, उन्हें आप वैश्य नहीं मानतीं. यदि कोई दूसरी जाति का आदमी वैश्य जैसा रहे तो आप उसे क्या वैश्य मान लेंगी?’’

‘‘फिर वही बहस. कह दिया, हम वैश्य हैं.’’

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कमरे में बैठी अपने स्कूल का पाठ याद करती रीना दीदी की 6 वर्षीय बेटी बोल उठी, ‘‘नहीं, नानीजी, हम लोग हिंदुस्तानी हैं.’’

अम्मां ने उसे पास खींच कर पुचकारा. फिर बोलीं, ‘‘हां बेटा, हम हिंदुस्तानी हैं.’’

अम्मां को समझ पाना बहुत कठिन था. कभी तो लगता था कि अम्मां जमाने के साथ जिस रफ्तार से कदम मिला कर चल रही हैं वह उन की स्कूली शिक्षा न होने के बावजूद उन्हें अनपढ़ की श्रेणी में नहीं रखता. औरों से कहीं आगे, समय के साथ बदलतीं, नए विचारों को अपनातीं, नई परंपराओं को बढ़ावा देतीं, अगली पीढ़ी के साथ ऐसे घुलमिल जातीं मानो वह उन्हीं के बीच पलीबढ़ी हों.

लेकिन कभीकभी जब वह अपने जमाने की आस्थाओं की वकालत कर के उन्हें मान्यता देतीं, अतीत की सीढि़यां उतर कर 50 वर्ष पीछे की कोठरी का दरवाजा खोल देतीं और रूढि़वादिता व अंधविश्वास की चादर ओढ़ कर बैठ जातीं तो हम सब के लिए एक समस्या सी बन जाती. शायद हर मनुष्य दोहरे व्यक्तित्व का स्वामी होता है या संभवत: अंदर व बाहर का जीवन अलगअलग ढंग से जीता है.

पिताजी उत्तर प्रदेश के थे और इलाहाबाद शहर में जन्मे व पलेबढ़े थे. बाद में नौकरी के सिलसिले में उन्होंने अनेक बार देशविदेश के चक्कर लगाए थे. कई बार अम्मां को भी साथ ले गए. लिहाजा, अम्मां ने दुनिया देखी. बहुत कुछ सीखा, जाना और अपनी उम्र की अन्य महिलाओं से ज्ञानविज्ञान व आचारविचारों में कहीं आगे हो गईं.

पिताजी विदेशी कंपनी में काम करते थे. ऊंचा पद, मानमर्यादा और हर प्रकार से सुखीसंपन्न, उच्चविचारों व खुले संस्कारों के स्वामी थे. अम्मां उन की सच्ची जीवनसंगिनी थीं.

वर्षों पहले हमारे परिवार में परदा प्रथा समाप्त हो गई थी. स्त्रीपुरुष सब साथ बैठ कर भोजन करते थे. यह सामान्य सी बात थी, पर 35-40 वर्ष पूर्व यह हमारे परिवार की अपनी विशेषता थी, जिसे कहने में गर्व महसूस होता था. हमें लगता था कि हमारी मां औरों से आगे हैं, ज्यादा समझदार हैं. परदा नहीं था, पर इस का तात्पर्य यह नहीं था कि आदर व स्नेह में कमी आ जाए.

भाभियों को घूमनेफिरने की पूरी स्वतंत्रता थी. यहां तक कि उन का क्लब के नाटकों में भाग लेना भी मातापिता को स्वीकार था.

इतना सब होते हुए भी अपने समाज के प्रति पिताजी कुछ ज्यादा ही निष्ठावान थे. ऐसा नहीं था कि वह देश या अन्य जातियों के प्रति उदासीन थे, पर शादीब्याह के मामले में उन्हें अंतर्जातीय विवाह उचित नहीं लगे. हम सब को भी उन्हीं के विचारों के फलस्वरूप अपने समाज के प्रति आस्था जैसे विरासत में मिली थी. शायद अम्मां ने तो कभी अपना विचार या अपना मत जानने की कोशिश नहीं की.

समय के साथ सभी मान्यताएं बदल रही थीं. फिर भी मेरा मन मानता था, ‘यदि आज पिताजी जिंदा होते तो शायद उन की पोतियां स्वयं वर चुन कर गैरजाति में न ब्याही जातीं.’ लेकिन यह भी लगता?था, ‘यदि उन्हें दुख होता तो यह उन की संकीर्णता का द्योतक होता है,’ और हो सकता है, जिस रफ्तार से वह समय के साथसाथ चले और समय के साथसाथ बदलने की वकालत करते रहे थे, शायद ऐसे विवाहों को सहर्ष स्वीकर कर लेते.

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आज वह नहीं हैं. अम्मां का अपना मत क्या है, वह स्वयं नहीं जानतीं. जो हो रहा?है, उन्हें कहीं अनुचित नहीं लग रहा. परंतु पिताजी का खयाल आते ही इन विवाहों को ले कर उन का मन कहीं कड़वा सा हो जाता है. प्रतिक्रियास्वरूप उन के अंतर्मन का कहीं कोई कोना उन्हें कचोटने लगता है. शायद वह उन की अपनी प्रतिक्रिया भी नहीं है, बल्कि पिताजी के विचारों के समर्थन का भावनात्मक रूप है.

5-6 बरस पहले कनु का सादा सा ब्याह और अब रिंकू के ब्याह का उत्सव कैसा विपरीत दृश्य था. कनु ने जब कहा था, ‘‘मैं सहपाठी राघवन से ब्याह करूंगी और वह भी अदालत में जा कर.’’

जानें आगे क्या हुआ कहानी के अगले भाग में…

अनोखा बदला: भाग 2

पहला भाग पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें- अनोखा बदला: भाग 1

मधुरा ने विवेक के सामने अपनेआप को संयत रखा और उत्पल को खोजना शुरू किया. पुराने संपर्कों के माध्यम से मधुरा ने आसानी से उत्पल की आईडी खोज निकाली. उस ने उत्पल से कांटैक्ट किया.

अपने सर्किल में बाहुबली की छवि बनाता जा रहा उत्पल मधुरा की आवाज सुन कर रो पड़ा. दोनों के बीच बातें फिर से शुरू हो गईं.

उत्पल अब तक कुंआरा था. मधुरा की जगह किसी और को देने के बारे में वह सोच भी नहीं पाता था. बस जिस्मानी जरूरत जब बहुत ज्यादा आवाज देने लगती तो निराशा में पैसों के बल पर अपना बिस्तर रातभर के लिए सजा लेता था, लेकिन जो खालीपन उस के दिल में था, उस का इलाज वह कैसे करता?

मधुरा ने उस को अपनी सारी कहानी धीरेधीरे सुनानी शुरू कर दी. बाद में उस ने अपनी बहन और मां को भी सबकुछ बता दिया. वे भी सन्न रह गईं, मगर मधुरा के मना करने के चलते किसी ने विवेक से कुछ नहीं कहा.

समय बीतता रहा. एक दिन विवेक ने मधुरा के सामने प्रस्ताव रखा कि अपनी शादी की छठी सालगिरह किसी दूसरे शहर में चल कर मनाई जाए. मधुरा राजी हो गई. दोनों अपने बेटे को ले कर होटल में पहुंचे.

खास मौके के लिए मधुरा भी सजीधजी और ज्यादा खूबसूरत लग रही थी. रात पिंकू को जल्दी सुला कर विवेक ने मधुरा को अपनी बांहों में भर लिया और चूमने लगा, तभी कमरे का दरवाजे झटके से खुला और 4 नकाबपोश अंदर घुस आए.

मधुरा की चीख निकल गई. शोर से पिंकू भी जाग कर रोने लगा, लेकिन बदमाशों ने उन सब को गन पौइंट पर ले कर लूटपाट शुरू कर दी.

रुपयों से भरा पर्स, मोबाइल फोन वगैरह अपने बैग में भरने के बाद 3 बदमाश एक तरफ खड़े हो गए.

विवेक को लगा कि अब वे लोग चले जाएंगे, लेकिन चौथे ने मधुरा का हाथ पकड़ा और उसे अपने सीने से लगा लिया.

विवेक बौखला कर चिल्ला उठा. वह मधुरा को ले कर काफी पजेसिव था, भले ही उस का खुद का स्वभाव कैसा भी हो.

मधुरा उस बदमाश के चंगुल से छूटने के लिए छटपटाने लगी. विवेक उसे बचाने के लिए आगे बढ़ा तो बाकी 2 बदमाशों ने उसे पकड़ कर बांध दिया और मुंह में कपड़ा ठूंस दिया. एक बदमाश पिंकू को अपनी गोद में ले कर दूसरे कमरे में चला गया.

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मधुरा कहती रही, ‘‘मैं अपने गहने खुद तुम्हें दे दूंगी, मुझे छोड़ दो,’’ लेकिन उसे पकड़े बदमाश के कानों में कोई आवाज मानो जा ही नहीं रही थी. वह मधुरा को खींचता हुआ बाथरूम में ले गया.

अंदर से मधुरा के रोनेचिल्लाने की आवाजें आती रहीं. विवेक अपने बंधनों में मजबूर कसमसाता, आंसू बहाता रहा.

आधा घंटे बाद बाथरूम का दरवाजा खुला और मधुरा के साथ अंदर गया बदमाश अपने कपड़ों को थामे बाहर आया और आननफानन उन्हें पहन कर साथियों के साथ भाग गया.

उन बदमाशों के जाने के बाद होटल का कोई स्टाफ वहां आया तो उस ने विवेक के बंधन खोले.

विवेक बेतहाशा भाग कर बाथरूम के अंदर गया. वहां मधुरा जमीन पर बेहाल मिली. उस का सारा मेकअप बिखर चुका था और कपड़े यहांवहां बिखरे पड़े थे. विवेक उस से लिपट कर बैठ गया और रोने लगा.

पूरे होटल का स्टाफ बाहर जमा हो चुका था और दूसरे लोगों की भीड़ थी. मैडिकल जांच, पुलिस, मीडिया का दौर शुरू हो गया. अंदाजन पुलिस ने कुछ गिरफ्तारियां भी कीं, लेकिन असली मुजरिम उस की पकड़ में नहीं आ सके.

धीरेधीरे विवेक अवसाद में जाने लगा. बारबार थाने के चक्कर लगाने में उस की माली हालत बिगड़ने लगी. कई बार तो नौकरी पर भी बन आती. कुछ दिनों तक खूब शोर करने के बाद मीडिया भी अचानक शांत होता गया.

इसी बीच एक दिन मधुरा को उलटियां आने लगीं. चैकअप करने के बाद डाक्टर ने बताया कि बच्चा ठहर गया है. विवेक अपनी नसबंदी करा चुका था. वह समझ गया कि यह बच्चा उसी बदमाश लुटेरे का है.

विवेक ने बच्चे को गिराने की बात की तो मधुरा ने यह कह कर एतराज जताया कि यह बच्चा उस का अंश है, चाहे जैसे भी पेट में आया हो.

जचगी का समय नजदीक आतेआते उन का घर कलह से भरने लगा और आखिरकार आपसी समझौते के आधार पर उन्होंने तलाक ले लिया.

पिंकू को मां के साथ रहने की इजाजत मिल गई. मधुरा उसे ले कर मायके चली आई और वहीं बच्चे को जन्म दिया.

इस के कुछ महीने बाद मधुरा ने उत्पल से शादी कर ली. सुहागरात के समय मधुरा सेज पर लेटी थी और उत्पल प्यार से उस का सिर सहला रहा था. पास ही पालने में उस का नवजात बेटा सोया था.

उत्पल ने मधुरा से कहा, ‘‘यह मेरा बच्चा है, लेकिन तुम्हारा पहला बेटा पिंकू भी मेरे लिए बेटे जैसा ही रहेगा… उसे मैं कभी पराया नहीं समझूंगा.’’

मधुरा ने मुसकरा कर उत्पल की ओर देखा और उसे अपने बगल में लिटा कर बत्ती बुझा दी.

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दरअसल, यह सब उन दोनों का ही प्लान था जो मधुरा ने विवेक की धोखेबाजी का बदला लेने के लिए बनाया था. उस रात होटल में उत्पल ही अपने साथियों के साथ मधुरा व विवेक के कमरे में घुसा था और मधुरा के साथ बलात्कार करने का नाटक किया, जबकि बाथरूम में मधुरा उसे संबंध बनाने में पूरा सहयोग दे रही थी और विवेक को तड़पाने के लिए चिल्ला रही थी.

इस मामले का उत्पल और उस के दोस्तों से दूरदूर तक कोई लिंक नहीं होने के चलते पुलिस ने जांच उधर मोड़ी ही नहीं. होटल के 1-2 कर्मचारी, जो उत्पल के इस प्लान को जानते थे, वे उस के जानने वाले थे इसलिए उन्होंने अपना मुंह नहीं खोला.

मधुरा के मांबाप को इस सारे प्लान के बारे में कुछ पता नहीं था, पर अब उन्हें उत्पल की जाति या ठेकेदारी नजर नहीं आ रही थी. उन की अपनी नजरों में मधुरा अब दूषित हो चुकी थी और ऊंची जाति का अहम तो ऐसा है कि घर की बेटीबहू को त्याग देना आम बात है.

विवेक अब अकेला है और अंदर से काफी टूट चुका है. कल तक उस के अगलबगल घूमने वालियां फिलहाल उसे भाव नहीं दे रहीं. विवेक अपने बेटे से भी कम ही मिल पाता है. उसे उस की करनी की भरपूर सजा मिल गई है, वहीं मधुरा अब संतुष्ट है और नए परिवार के साथ जिंदगी को नए सिरे से शुरू कर चुकी है.

अनोखा बदला: भाग 1

मधुरा के मांबाप को उत्पल का ठेकेदार परिवार से होना नहीं सुहाया था. उन की नजर में ठेकेदारी गुंडों का काम था. मधुरा उन्हें समझाती रह गई कि अगर उत्पल को गुंडई ही दिखानी होती तो वह उसे कब का उठा कर ले गया होता. अपराधियों और पुलिस से ले कर जिले के नेताओं तक के बीच उस के बापदादा का बढि़या उठनाबैठना था.

एक सरकारी दफ्तर में क्लर्क मधुरा के पिता उत्पल से कहां तक लड़ते? वैसे भी मधुरा के पिता पंडित थे और उत्पल पिछड़ी जाति का था और तभी वह ठेकेदारी का काम भलीभांति कर सकता था.

उत्पल दिल का बहुत अच्छा था. पढ़ाई के दिनों में कंप्यूटर हार्डवेयर ट्रेनिंग सैंटर में हुई मधुरा और उस की भेंट ने उन्हें देखतेदेखते कैसे जोड़ दिया, उन को खुद भी पता नहीं चला था. उस ने मधुरा को केवल मन से अपनाया था, तन से वे दोनों बिलकुल दूर थे, मगर मधुरा के पिता नहीं माने और उस की शादी अपने ही दफ्तर के एक साथी के बेटे विवेक से करा दी जो किसी प्राइवेट स्कूल में टीचर था.

उत्पल छटपटा कर रह गया, लेकिन उस ने मधुरा की शादी में कोई खलल नहीं डाला. मधुरा ने अपनी मां की खुदकुशी की धमकी के चलते उत्पल से वादा जो ले लिया था कि वह कोई गलत कदम नहीं उठाएगा.

ससुराल आने के बाद मधुरा को विवेक का बरताव भी अच्छा लगने लगा. दिनभर के सीधेसरल स्वभाव और रात को बिस्तर पर मधुरा के जिस्म का तारतार झनझना देने वाला विवेक मधुरा को उस का बीता कल भुलाने में बहुत मददगार रहा था.

इस के अलावा आम लड़कियों की तरह मधुरा ने भी अपने पति से अपने प्रेमी का कभी कोई जिक्र नहीं किया.

शादी के 2 साल बाद मधुरा और विवेक के प्यार की निशानी पिंकू के आने के बाद मधुरा की जिंदगी खुशियों से भर चुकी थी. हां, कभीकभार उत्पल जब सपनों में आ जाता तो मधुरा जाग कर सिसक जरूर पड़ती थी.

उस दिन विवेक का जन्मदिन था. उन दोनों को अपने नए फ्लैट में शिफ्ट हुए 6 महीने ही हुए थे. भाइयों में रोजरोज होने वाले झगड़ों के चलते विवेक के पिता ने जायदाद का बंटवारा कर दिया था, जिस से मिले रुपयों से विवेक ने अपने पिता का घर छोड़ नया फ्लैट ले लिया था.

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मां की बीमारी के चलते मधुरा मायके गई हुई थी लेकिन विवेक के जन्मदिन पर अचानक आ कर उसे सरप्राइज देना था.

बीती रात विवेक ने बहुत ही उदास लहजे में कह दिया था, ‘तुम्हारे बिना मुझे मेरा जन्मदिन मरणदिन सा लगेगा.’

पिंकू को शाम तक के लिए अपनी छोटी बहन को सौंप कर मधुरा दोपहर को ही अपने फ्लैट पर आ गई. हाथ में केक का डब्बा और मिठाई थी.

डुप्लीकेट चाबी से दरवाजा खोल मधुरा अंदर दाखिल हुई. उस ने सोच रखा था कि जैसे ही विवेक घर आएगा, वह केक और मिठाई के साथ उस के सामने तैयार मिलेगी.

मधुरा अपने कमरे की तरफ बढ़ी, लेकिन नजदीक जातेजाते अंदर से आ रही कुछ आवाजों ने उसे चौंका दिया. एक आवाज विवेक की थी और दूसरी भी किसी जानीपहचानी औरत की.

‘विवेक आज जल्दी घर आ गया क्या? और शायद किसी को बुला भी रखा है,’ मधुरा ने सोचा, लेकिन मन के किसी कोने ने उसे अपनी पदचाप छिपा कर ही आगे बढ़ने की सलाह दी. उस ने ऐसा ही किया.

खिड़की से कमरे के अंदर झांकते ही मधुरा का सिर चकरघिन्नी की तरह नाचने लगा. बिस्तर पर विवेक अपने स्कूल की ही एक शादीशुदा महिला टीचर नलिनी के संग मधुरा के विश्वास को भी बुरी तरह मसल रहा था.

तकरीबन 40 साला नलिनी विवेक से कम से कम 5 साल बड़ी थी और अकसर उन के?घर आती थी. वह ऐसी निकलेगी, यह मधुरा ने सपने में भी नहीं सोचा था. उस के मुंह से कोई आवाज न निकल सकी. उस का बदन जैसे सुन्न पड़ गया था. आंसू बहाती फटीफटी आंखों से वह सारा मंजर देखती रही.

‘‘साइज… स्टैमिना… विवेक… उफ… तुम मुझे… पागल बना कर मानोगे अपने प्यार में…’’ धौंकनी की तरह चलती सांसों के बीच नलिनी किसी तरह बोल पा रही थी. उस की उंगलियां विवेक की शर्ट चीरफाड़ कर उस की पीठ में घुसने को उतावली लग रही थीं.

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विवेक भी सुपरफास्ट ट्रेन बनता चला गया. जल्दी ही मिलीजुली तेज सिसकारियों का दौर शुरू हुआ और फिर सबकुछ शांत पड़ गया.

‘‘समीज तो पसीने से पूरी भीग गई तुम्हारी. थोड़ी देर पंखे के नीचे सूखने के लिए डाल दो…’’ विवेक ने शरारत भरे लहजे में कहा. उस का संकेत समझ नलिनी ने उसे प्यार से गाल पर थपकी दी और कोई तौलिया मांगा. विवेक ने सीधे खूंटी पर टंगा मधुरा का तौलिया उतार कर उसे दे दिया.

मधुरा का रोमरोम जल रहा था. वह चुपचाप वहां से निकल गई. खिड़की पर लगे परदे और अपने उन्माद में डूबे होने के चलते वे दोनों उसे देख नहीं पाए थे.

मधुरा कालोनी के पार्क में जा कर बैठ गई. केकमिठाई के डब्बे रास्ते में कहांकहां छूटते गए, उसे कोई होश नहीं था. घंटे बीतते रहे, शाम हो आई. इस बीच कई बार विवेक का फोन भी आ कर मिस होता रहा. हर रिंग मधुरा को विवेक के आज दिखे नए रूप की धमक लग रही थी. मधुरा ने वापस अपने मायके की बस पकड़ ली.

मायके पहुंचने के बाद रात को नींद मधुरा की आंखों से दूर ही रही. विवेक से एक बार बात हुई भी तो उस से तबीयत खराब होने की बात कह कर पीछा छुड़ा लिया. शुक्र था कि विवेक की अपनी सास या साली से कोई बात नहीं हुई, वरना मधुरा के आज फ्लैट पर आने का राज खुल जाता.

मधुरा रो रही थी और अपने मांबाप को कोस रही थी. उसे आज उत्पल की याद फिर से बहुत ज्यादा सताने लगी. वह फैसला नहीं ले पा रही थी कि आखिर करे तो क्या करे?

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जानें आगे क्या हुआ कहानी के अगले भाग में

तुम बहुत याद आओगे इरफान

अपने दमदार अभिनय से लोगों को दीवाना बनाने वाले बौलीवुड (Bollywood) एक्टर इरफान खान (Irrfan Khan) अब हमारे बीच नहीं रहे. मुंबई के एक अस्पताल में उन का इंतकाल हुआ तो बौलीवुड के साथसाथ उन के चाहने वाले को सहसा यकीन ही नहीं हो रहा कि अब वे हमारे बीच नहीं रहे. वे बङे और छोटे परदे के बेताज बादशाह रहे थे. उन्होंने 30 से अधिक हिंदी फिल्मों में अभिनय किया था. उन्होंने फिल्म ‘ए माइटी हार्ट’ (The Mighty Heart), ‘स्लमडौग मिलेनियर’ (Slumdog Millionaire) व ‘द अमेजिंग स्पाइडरमैन’ (The Amazing Spiderman) जैसी फिल्मों में भी काम किया और खूब शोहरत बटोरी.

बेहतरीन कलाकार थे इरफान

इरफान खान को उन के बेहतरीन अदाकारी के लिए साल 2011 में भारत सरकार द्वारा ‘पद्मश्री’ से भी सम्मानित किया गया था. इस के साथ ही साल 2012 में फिल्म पान सिंह तोमर में बेहतरीन अदाकारी के लिए श्रेष्ठ अभिनेता पुरस्कार भी दिया गया. महज 54 साल की उम्र में इरफान का निधन होना किसी सदमे से कम नहीं है.

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इरफान खान की तबीयत अचानक खराब होने की वजह से उन्हें मुंबई के कोकिलाबेन अस्पताल के आईसीयू में ऐडमिट किया गया था. उन्हें कोलन इंफेक्शन की वजह से भरती कराया गया था.

सदमे में प्रशंसक

इरफान खान की मौत की खबर ट्विटर पर फिल्म निर्माता सुजीत सरकार ने शेयर की. उन्होंने लिखा, “मेरे प्रिय मित्र इरफान, आप लड़े, लड़े और लड़े. मुझे आप पर हमेशा गर्व रहेगा.. हम फिर से मिलेंगे… इरफान खान को सलाम.”

इस से पहले इरफान के प्रवक्ता के हवाले से कहा गया था,”हां, यह सही है कि इरफान खान को कोलोन इन्फैक्शन के कारण मुंबई स्थित कोकिलाबेन (अस्पताल) के आईसीयू में भरती कराया गया है.

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इरफान खान बेहद कम शब्दों में अपनी बात कहते थे. 2018 में जब कैंसर से लङते हुए उन्होंने कहा था कि मैं हार गया तो लोगों की आंखें नम हो गई थीं पर इस के बाद वे स्वस्थ हो गए थे पर अब जब उन की मौत की खबर आई तो सहसा किसी को यकीन ही नहीं हुआ कि इरफान खान अब हमारे बीच नहीं रहे.

इरफान को उन के दमदार अभिनय और जिंदादिली के लिए हमेशा याद किया जाएगा.

इस Bhojpuri एक्ट्रेस को है दुल्हन बनने का शौंक, शेयर की ऐसी Photos

साल 2016 में भोजपुरी सुपरस्टार पवन सिंह (Pawan Singh) के साथ अपने फिल्मी करियल की शुरूआत करने वाली एक्ट्रेस निधी झा (Nidhi Jha) आज लाखों दिलों की जान बन चुकी है. निधी झा ने भोजपुरी फिल्म ‘गदर’ (Gadar) से फिल्मों में डेब्यू किया था और तभी से वे लोगों के दिलों में बस्ती चली गई और आज वे भोजपुरी इंडस्ट्री (Bhojpuri Industry) की जानी मानी एक्ट्रेसेस में से एक हैं.

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I’m a Barbie girl in a barbie world 💜

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भोजपुरी फिल्मों के साथ साथ निधी झा (Nidhi Jha) ने पौपुलर टेलिवीजन सीरियल्स जैसे कि बालिका बधु (Balika Vadhu), सपने सुहाने लड़कपन के (Sapne Suhane Ladakpan Ke), क्राइम पैट्रोल (Crime Patrol), अदालत (Adalat) जैसे कई सीरियल्स में काम किया है. ऐसा देखनें में आया है कि भोजपुरी एक्ट्रेस निधी झा सोशल मीडिया पर काफी एक्टिव रहती हैं और एक्टिव रहने के साथ साथ वे अपने नए-नए लुक्स अपने फैंस के साथ शेयर करती रहती हैं.

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It is better to be hated for what you are than to be loved for what you are not!

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फैंस भी निधी झा के हर लुक को काफी प्यार देते हैं और जमकर उनकी तारीफ करते हैं. आज जो हम आपको निधी झा (Nidhi Jha) के लुक्स दिखाने जा रहे हैं उन्हें देख कर ऐसा लगता है कि निधी को दुल्हन की तरह सजने संवरने का काफी शौंक है. जी हां उन्होने अपने कई फोटोशूट्स दुल्हन का गेट-अप कैरी किए हुए करवाए हैं.

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इन फोटोज के देख ये कहना बिल्कुल गलत नहीं होगा कि निधी झा दुल्हन के गेट-अप में सचमुच कयामत बरसाती हैं. वैसे तो उनका हर लुक ही काबिल-ए-तारीफ होता है लेकिल उनकी इन नई नवेली दुल्हन बनी फोटोज ने तो जैसे लोगों के दिल ही जीत लिए हों. निधी की इन खूबसूरत फोटोज को देख कोई भी उनके प्यार में पड़ने से खुद को रोक नहीं पाएगा.

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“Being someone’s first love may be great, but to be their last is beyond perfect.”❤️

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