चोटें मुझे रोक नहीं सकतीं : अखिल कुमार

27 मार्च, 1981 को उत्तर प्रदेश के फैजाबाद में जनमे बौक्सर अखिल कुमार ने हरियाणा राज्य में स्कूली लैवल पर पहला बौक्सिंग मुकाबला लड़ा था. साल 2005 में  ‘अर्जुन अवार्ड’ पाने वाले अखिल कुमार को उन के ‘ओपन गार्डेड’ बौक्सिंग स्टाइल के लिए जाना जाता है.

बौक्सिंग के लिए अपने जुनून पर अखिल कुमार ने इस खेल को ले कर एक बार कहा था, ‘‘जीत के लिए हो सकता है कि आप को अपने विरोधी को ज्यादा और जोर से मारना पड़ता हो, लेकिन चोट आप को भी लगती है… यानी जीत हो या हार, दोनों ही दर्द के साथ मिलती हैं.’’

बौक्सर अखिल कुमार ने हाल ही में प्रोफैशनल बौक्सिंग में धमाकेदार डैब्यू किया और आस्ट्रेलिया के मुक्केबाज टाई गिलक्रिस्ट को करारी शिकस्त दी.

पेश हैं, अखिल कुमार के साथ हुई बातचीत के खास अंश:

चोट की वजह से आप काफी समय से बौक्सिंग रिंग से बाहर रहे थे. इस जीत से आप का कितना मनोबल बढ़ा है?

चोटों से तो मेरा पुराना नाता रहा है, लेकिन चोटें मुझे रोक नहीं सकतीं. हर जीत से खिलाड़ी का मनोबल बढ़ता है. इस जीत से मैं ने देश को खुश होने का मौका दिया है और आगे भी देता रहूंगा.

प्रोफैशनल बौक्सिंग और एमेच्योर बौक्सिंग में आप कितना फर्क पाते हैं?

रिंग तो रिंग होता है. हां, इस में बौक्सिंग ग्लव्स का साइज थोड़ा छोटा होता है. ज्यादा तेज हिट लगती है. चोट मारने और खाने में मजा आता है. इस में रैफरी की भूमिका कम होती है, फाउल पंच ज्यादा लगते हैं.

पहले राउंड में मुझे कट लग गया था. थोड़ी सी झिझक हुई थी कि कहीं बाउट रुक न जाए. लेकिन बाद में मुकाबला मैं ने ही जीता.

प्रोफैशनल बौक्सिंग की ओर जाने की वजह?

प्रोफैशनल बौक्सिंग खेलने के लिए एक अलग तरह का टशन चाहिए. स्टाइल चाहिए. ये दोनों बातें मुझ में हैं. मेरे अंदर इच्छा थी, इसलिए मैं ने प्रोफैशनल बौक्सिंग को चुना.

प्रोफैशनल बौक्सिंग का भारत में कैसा भविष्य है?

भविष्य तो अच्छा है. आईपीएल ने भी तो क्रिकेट का कायाकल्प कर दिया है. वहां अच्छा खेलने वाले खिलाड़ी को नाम और दाम दोनों मिलते हैं. ऐसा ही कुछ प्रोफैशनल बौक्सिंग में भी देखने को मिलेगा.

यहां मैं एक बात और कहूंगा कि हरियाणा सरकार ने खेलों को बढ़ावा देने के लिए बहुत अच्छा काम किया है. इस से खिलाडि़यों का हौसला बढ़ता है.

आप ने ‘द्रोणाचार्य अवार्ड’ को ले कर एक बात कही थी कि अर्जुन द्रोणाचार्य बना रहे हैं. ऐसा कहने की वजह?

आज हो यह रहा है कि बहुत से खिलाड़ी कोच को ‘द्रोणाचार्य अवार्ड’ दिलाने के लिए सिफारिश करते हैं. ऐसी बातों की जांच होनी चाहिए, बहुतकुछ बाहर निकल कर आएगा. किस खिलाड़ी को किस कोच ने कब ट्रेनिंग दी, यह सब औनलाइन होना चाहिए. नैशनल कैंपों में राजनीति नहीं होनी चाहिए. अवार्ड या अवार्ड मनी देने की प्रक्रिया में पारदर्शिता बरतनी चाहिए. इस से खेलों में होने वाली खेमेबाजी को बढ़ावा नहीं मिलेगा.

एक बात और कहना चाहूंगा कि किस खिलाड़ी ने कितने मैडल जीते हैं, इस से?ज्यादा इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि उस खिलाड़ी में खूबियां कितनी हैं. खिलाड़ी को उस के स्टाइल से पहचाना जाना चाहिए.

आप की पत्नी पूनम भी बौक्सिंग कोच हैं. वे आप को क्या सलाह देती हैं?

जब पूनम मेरी गर्लफ्रैंड थी, तब भी वे मुझे गाइड करती थीं. मेरी डाइट को ले कर बहुत ज्यादा. वे मेरी जिंदगी में काफी बदलाव लाई हैं. पत्नी अच्छी सलाहकार हो, तो अच्छेअच्छे सीधे हो जाते हैं.

आप की 6 साल की बेटी है. क्या उन्हें भी बौक्सिंग खेलने के लिए बढ़ावा देंगे?

हर कोई चाहता है कि उस की संतान बहुत नाम कमाए. मैं इस खेल को बेटी पर थोपूंगा नहीं. अगर वह बड़ी हो कर चाहेगी तो देखेंगे.

वैसे, मेरे लिए शिक्षा ही सर्वोपरि है. आजकल तो लोग यह कहावत भी कहने लगे हैं कि खेलनेकूदने वाले भी नवाब बन सकते हैं. पर मेरा मानना है कि असली नवाब तो पढ़ाईलिखाई करने वाला ही होता है. खेलों में ही देख लो, बहुत से लोग अपनी पढ़ाईलिखाई की वजह से खेलों में ऊंचे पदों पर बैठे हैं, चाहे उन्होंने एक भी मैडल न जीता हो.

नए खिलाड़ियों को कोई संदेश?

खेल के साथसाथ अच्छी किताबें जरूर पढ़ें. नैतिक ज्ञान भी बहुत जरूरी है. लकड़हारे की कहानी ईमानदार होने की सीख देती है, पर आज लोग मतलबी ज्यादा हो गए हैं. खिलाड़ी को तो अपनी जिंदगी ऐसे जीनी चाहिए कि वह दूसरों के लिए मिसाल बने.

कोर्ट ने पूछा, क्यों न दोबारा चुनाव कराया जाए

दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ (डूसू) चुनाव के नियमों की अनदेखी कर सार्वजनिक संपत्तियों को गंदा करने के मामले में हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है. हाईकोर्ट ने इस चुनाव में जीतने वाले उम्मीदवारों को नोटिस जारी कर यह बताने के लिए कहा है कि क्यों न परिणाम रद्द कर चुनाव दोबारा से कराया जाए.

कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश गीता मित्तल व न्यायमूर्ति सी. हरि शंकर पीठ ने 12 सितंबर को हुए चुनाव को रद्द करने और इसे नये सिरे से कराने की मांग को लेकर दाखिल जनहित याचिका पर दिया है. याचिका में कहा गया है कि चुनाव में छात्रों ने नियम कानून की अनदेखी कर बड़े पैमाने पर सार्वजनिक संपत्तियों पर पोस्टर, बैनर व पेंट से गंदा कर दिया है. ऐसे में चुनाव रद्द किए जाएं, ताकि इन छात्रों को सबक मिले. पीठ ने दिल्ली सरकार, उपराज्यपाल, दिल्ली पुलिस, मेट्रो प्रबंधन, उत्तरी और दक्षिणी दिल्ली नगर निगम को नोटिस जारी कर जवाब देने को कहा है.

हाईकोर्ट ने चुनाव में हारने वाले उम्मीदवारों को भी नोटिस जारी कर जवाब देने को कहा है. हाईकोर्ट ने साहिल शर्मा की ओर से दाखिल याचिका पर नोटिस जारी किया है. अगली सुनवाई 20 सितंबर को होगी. हाईकोर्ट ने पहले भी इस मामले में छात्र नेताओं को नोटिस जारी कर यह बताने के लिए कहा था कि क्यों न उनके खिलाफ कार्रवाई की जाए. सुनवाई के दौरान पीठ ने कहा कि नियमों की अनदेखी करने वालों के खिलाफ एक बार कार्रवाई करने के बाद वे भविष्य में दोबारा गलती नहीं करेंगे.

शौचालय : पिछड़ों और दलितों के बीच एक नई खाई

देशभर में शौचालयों का जम कर निर्माण हो रहा है और खुले में शौच को बंद कराने में सरकार जुटी है, पर सरकार शौचालयों के लिए जरूरी सीवर लाइनों और चालू पानी के पाइपों की ओर कोई ध्यान नहीं दे रही. यह साफ है कि नीति निर्धारक सोच रहे हैं कि शौचालयों को साफ करने के लिए दलित तो हैं ही.

तमिलनाडु में रामेश्वरम में एक स्कूल में शौचालय तो बनवा लिया गया, पर उसे साफ करने के लिए कोई नहीं मिला, तो दलित छात्रों को ही सैप्टिक टैंक में उतरने को मजबूर किया गया. वहां पैदा हुई विषैली मिथेन गैस से वे छात्र बीमार हो गए. यह सारे देश में हो रहा है. हर रोज नाले साफ करते हुए दलितों की मौत की खबरें छपती हैं.

असल में शौचालयों ने पिछड़ों व दलितों के बीच एक नई खाई पैदा कर दी है. भाजपा सरकार ने घरों में शौचालय बनाने पर मजबूर तो कर दिया, पर उन को साफ करने के लिए उसी घर के लोग तैयार नहीं हैं. जहां सैप्टिक टैंक बने हैं, वहां तो कठिनाई है ही, पर जहां केवल ड्राई लैट्रिन हैं, वहां मुसीबत और ज्यादा है. खुले में शौच का निबटान प्रकृति करती थी, पर घर, दफ्तर या स्कूल में बना शौचालय यदि सीवर से नहीं जुड़ा, तो उसे साफ कौन करे?

सारे देश में दलितों को इस काम में लगाया जा रहा है और इस से दलितपिछड़ा भेदभाव हर रोज बढ़ रहा है. दलित अब वह कोई काम करने को खुद ब खुद तैयार नहीं, जो पहले ऊंची सवर्ण जातियां नहीं करती थीं. पिछड़े 50 साल पहले ऐसे काम दलितों से कराते नहीं थे, क्योंकि उन की हैसियत ही नहीं थी. अब ऊंचे सवर्ण तो पाइप से आए पानी और गंद ले जाने वाले सीवर का सुख भोग रहे हैं, पर पिछड़ों को सवर्णों की तरह दलितों का मैला साफ करने की सेवा चाहिए. क्योंकि खेती, नौकरियों और छोटे धंधों से उन की आमदनी बढ़ गई है.

आज का दलित यह करने को तैयार नहीं है तो उसे अब मजबूर किया जा रहा है. हिंदू समाज में यह दोफाड़ तो हमेशा ही था, पर अब शौचालयों के कारण और अधिक सुर्ख होने लगा है. और जब तक लाखों गांवों के करोड़ों घरों तक अच्छेबड़े सीवर और बहते पानी के पाइपों का इंतजाम नहीं हो जाता, यह होता रहेगा. गांवगांव में दलितपिछड़ा झगड़ा बढ़ता रहेगा.

जैसे आज का पिछड़ा झाड़ू उठाने तक को तैयार नहीं है, वहीं आज का दलित मरे जानवर और ऊंचों के शौच को उठाने को तैयार नहीं है. राजनीति में जो नई करवट आई है, वह शौचालयों जैसी छोटी चीज से आ रही है और फिलहाल न ऊंचोंपिछड़ों के नेता इस का दूरगामी परिणाम देख पा रहे हैं, न दलितों के नेता इस की गहराई समझ पा रहे हैं.

शौच प्रकृति की देन है, पर सफाई करना तो हरेक को खुद सीखना होगा. पर यह पाठ पढ़ाए कौन?

अंधभक्ति और अय्याशी का बाजार

राजस्थान के दूसरे सब से बड़े शहर जोधपुर की सेंट्रल जेल की बैरकों में सैकड़ों कैदी हैं. लेकिन सलाखों के पीछे अक्सर चहलकदमी करने वाले एक कैदी को दूसरे कैदी और जेल के कर्मचारी कुछ अलग ही निगाहों से देखते हैं. जेल मैन्युअल के हिसाब से यूं तो उस के पास भी जरूरत की चीजों के रूप में एक बाल्टी, मग्गा, थाली, कटोरी और गिलास है, लेकिन उस की दिनचर्या दूसरों से अलग है.

इस कैदी का नाम है आसाराम बापू. इस नौटंकीबाज कैदी के कारनामे जेल का हर कैदी जानता है, जेल प्रशासन भी. इस के बावजूद वह चाहता है कि जेल में भी उसे भगवान माना जाए. उसे पूजा जाए और हर कोई उस के इशारों पर नाचे.

ऐशोआराम की जिंदगी जीने वाले आसाराम बापू पर 3 साल पहले जब अपने  एक भक्त की मासूम बेटी की अस्मत रौंदने का आरोप लगा था तो भक्तों की ताकत और बेशुमार दौलत के गुरूर में यकीनन उस ने सोचा होगा कि वक्त के साथ गुबार ठंडा हो जाएगा. और अगर नहीं हुआ तो वह अपनी ताकत, रसूख और दौलत के बूते पर इसे दबा देगा. लेकिन बाजी पलट गई और यह स्वयंभू भगवान कानून के शिकंजे में फंस गया. ऐशपरस्त जिंदगी के आदी रहे, इस पाखंडी के चेहरे पर 3 साल सलाखों के पीछे रह कर अब बेबसी की झटपटाहट साफ झलकने लगी है. भविष्य को ले कर उस के चेहरे पर उदासी  का साया होता जरूर है, लेकिन भक्तों के रूप में अपने चेले चेलियों को देख कर उस की आंखें में चमक आ जाती है कि उस का वह बाजार अभी जिंदा है, जिस ने धर्म के चोले में उसे नायक बनाया.

भक्ति के नाम पर लोग अब भी कामधाम छोड़ कर उस वक्त सड़कों पर एकत्र हो जाते हैं, जब आसाराम को जेल से अदालत लाया ले जाया जाता है. आसाराम के लिए यही बड़ी खुशी की बात है कि उस का भक्ति बाजार आबाद है. दरअसल, धर्म के नाम पर अरबों का साम्राज्य खड़े करने वाले आसाराम की जब यौन शोषण की घिनौनी करतूत उजागर हुई थी तो वह पूरी बेशर्मी पर उतर आया था. उस ने अपनी सोच यह कह कर उजागर की कि ‘ताली एक हाथ से नहीं बजती’ ऐसी घटिया मानसिकता वाले बाबा ने न जाने कितनी तालियां बजाई होंगी.

जानकार बताते हैं कि आसाराम गजब के किरदार निभाना जानता है. बस अब उस की सब से बड़ी ख्वाहिश यही है कि किसी तरह जेल से बाहर आ जाए. यह बात अलग है कि तमाम जतन कर लेने के बाद भी अदालतें उसे जमानत नहीं दे रहीं.

अपनी बीमारी को ले कर वह कई बार नौटंकी कर चुका है. इतना ही नहीं उस ने जांच करने वाले चिकित्सकों को भी चकमा देने की कोशिश की. यकीनन वह सामदाम दंड भेद का इस्तेमाल कर के बौलीवुड गया होता तो उसे कादर खान सरीखा रोल जरूर मिल गया होता. उसे जेल से निकलने की जल्दी कुछ इस कदर है कि उस ने अदालत में जेल प्रशासन का झूठा पत्र तक पेश करवा दिया था. लेकिन जांच में पोल खुल गई और मुकदमा भी दर्ज हो गया. अंधभक्तों को आसाराम पर लगा आरोप भले ही झूठा लगे, लेकिन कानून की नजर में गंभीर अपराध है. इसलिए माननीय अदालत उस के अपराध के मद्देनजर अभी उसे जमानत देने के मूड में नहीं हैं.

गुजरे 3 सालों आसाराम जमानत पाने के लिए कई बार तिकड़म भिड़ा चुका है. कभी वह कहता है कि चक्कर आते हैं, कभी नींद न आने की बात कहता है तो कभी कोई बीमारी बताता है. अलगअलग विधाओं के आधा दर्जन से ज्यादा डाक्टर दिल्ली से ले कर जोधपुर तक उस के विभिन्न टैस्ट कर चुके हैं, लेकिन बीमारी किसी की पकड़ में नहीं आती. जाहिर है यह बहानेबाजियां अदालत को चकमा देने के लिए की जाती हैं. जेल प्रशासन को भी उस के इस तरह के ढोंग की आदत पड़ चुकी है. अदालत के आदेश पर आसाराम ने जेल में धार्मिक पुस्तकें और पूजा सामग्री जरूर हासिल कर ली है. वह आए दिन धार्मिक आडंबर दिखाने की कोशिश करता है. लेकिन उस की कोई युक्ति काम नहीं आ रही. कोई चमत्कार या तंत्रमंत्र होता तो वह सलाखों के पीछे ही क्यों जाता.

हालांकि बाबा के अंधभक्त उसे आज भी अपना भगवान ही मानते हैं. उसे पुलिस, जेल, कानून और मीडिया सब खलनायक नजर आते हैं. यह समझने में शायद उसे वक्त लग जाए कि यदि वह वास्तव में सही आचरण वाला कोई करामाती शख्स होता तो सलाखों के पीछे नहीं जाता.

आसाराम के भक्त जेल प्रशासन और स्थानीय पुलिस के लिए मुसीबत का सबब बने हुए हैं. दरअसल आसाराम को जब भी जेल से पेशी पर अदालत ले जाया जाता है, तो नजारा देखने वाला होता है. जेल और अदालत के बीच करीब ढाई किलोमीटर का फासला है. सड़कों के दोनों तरफ सुबह से ही आसाराम के भक्तों की भारी भीड़ जमा हो जाती है. इन में महिलाएं अधिक होती हैं.

यह संख्या कभी सैकड़ों तो कभी हजारों में होती है. भीड़ के मद्देनजर रास्ते का ट्रैफिक रोकना पड़ता है. अतिरिक्त पुलिस बल भी तैनात करना पड़ता है. इस का प्रभाव पूरे शहर पर पड़ता है और लोग जाम से जूझते हैं. आसाराम को एक वज्र वाहन से जेल से अदालत ले जाया जाता है. आगेपीछे पुलिस की गाडि़यां होती हैं.

भक्त घंटों इंतजार करते हैं. स्थिति तब हास्यास्पद होती है जब जाली के पीछे से देखते हुए आसाराम उन की तरफ आशीर्वाद की मुद्रा में हाथ हिलाता है. इतना ही नहीं महिलाएं ‘बापू…बापू…’ कहते हुए वाहन के पीछे दौड़ने लगती हैं. कोई रोती है तो कोई हाथ जोड़ती है. कोईकोई व्यक्ति तो सड़क पर ही दंडवत हो जाता है. आए दिन होने वाला यह अजीब तमाशा हर किसी को हैरान करता है.

जेल के गेट से ले कर अदालत तक ऐसा ही होता है. पुलिस अधिकारी कहते हैं कि कानून व्यवस्था बनाए रखना हमारी जिम्मेदारी है, इसलिए फोर्स लगानी पड़ती है. दूसरी तरफ जेल अधीक्षक विक्रम सिंह कहते हैं कि ‘आशाराम हमारे लिए आम कैदियों की तरह ही हैं, उसे कोई विशेष सुविधा नहीं दी जा रही.’

आसाराम के भक्त कब धरना प्रदर्शन करें और जाम लगा दें इस बात को कोई नहीं जानता, क्योंकि अक्सर वह ऐसा करते रहते हैं. वह हाथों में नारे लिखी तख्तियां और आसाराम की तस्वीरें लिए होते हैं. साथ ही ये लोग धर्म के साथ देशभक्ति का तड़का लगाने की भी कोशिश करते हैं. तख्तियों पर लिखा होता है, ‘साधु संतों का अपमान नहीं सहेगा हिंदुस्तान’, ‘हिंदू उदार हैं, लेकिन मूर्ख और कायर नहीं’, ‘संत का निदंक महाहत्यारा’, ‘संत की रक्षा देश की सुरक्षा’, ‘नहीं सहेंगे बापू का अपमान, दे देंगे हम अपनी जान’, ‘हिंदुस्तान पुकारता है बचाओ संतों की आनबानशान’, ‘सांच को आंच नहीं, झूठ के पैर नहीं होते’, ‘देशवासियों समय रहते जागो.’

ऐसा करने वाले महिला व पुरुषों के सिर पर लंबी टोपियां लगी होती हैं, जिन पर लिखा होता है ‘बापू जी निर्दोष हैं’, ‘सब का मालिक एक है.’ यह सब देख कर आसाराम की आंखों में जरूर चमक आ जाती है.

ऐसे भक्तों ने जेल की बाहरी दीवारों पर भी ऐसी तमाम बातें लिख डाली हैं. बाबा के अंधभक्तों की चाहत देखिए. वे चाहते हैं कि आसाराम को नाम ले कर न पुकारा जाए बल्कि आपसी वार्तालाप में भी उसे बापू कह कर संबोधित किया जाए. आसाराम और उस के बेटे का अंजाम क्या होगा. यह तो अभी कोई नहीं जानता, लेकिन इतना सब होने पर भी अंधभक्तों की भक्ति जरूर चौंकाने का काम करती है.

लखनऊ सेंट्रल : अति कमजोर पटकथा

यह कहानी है मुरादाबाद के उभरते हुए गायक किशन मोहन गेहरोत्रा (फरहान अख्तर) की. वह अपने सपनों को पूरा करने के लिए मुरादाबाद से दिल्ली जाते हैं. जहां वह अपना नया संगीत एलबम खुद बनाना चाहते हैं. उनका मानना है कि ‘शहर छोटे होते हैं, सपने नहीं’. लेकिन उनके सपने बहुत जल्द टूट जाते हैं. उनके साथ कई घटनाएं तेजी से घटती हैं और अंततः उन्हें एक आईएएस आफिसर की हत्या के जुर्म में आजीवन जेल हो जाती है. किशन को मुरादाबाद जेल में रखा जाता है, जहां से वह भागने का असफल प्रयास करते हैं.

18 माह बाद उन्हें लखनऊ सेंट्रल जेल भेज दिया जाता है. जहां उन्हें उम्मीद की किरण उस वक्त नजर आती है, जब राज्य के मुख्यमंत्री (रवि किशन) ऐलान करते हैं कि हर जेल का एक संगीत का बैंड होगा और उनके बीच प्रतिस्पर्धा होगी. एक एनजीओ कार्यकर्ता गायत्री (डायना पेंटी) से प्रोत्साहन पाकर जेल के कैदियों को अपने साथ जोड़कर संगीत का ‘लखलऊ सेंट्ल’ नामक अपना बैंड बनाते हैं, जिसमें विक्टर (दीपक डोबरियाल), पंडित जी (राजेश शर्मा) और परविंदर (गिप्पी ग्रेवाल) शामिल हैं.

इस म्यूजिकल बैंड को बनाने के पीछे किशन की अपनी अलग योजना है. इस बैंड से जुड़े पांचों कैदियों का मकसद जेल तोड़कर भागना है. वैसे किशन के बैंड को जेलर श्रीवास्तव (रोनित राय) के विरोध का भी सामना करना पड़ता है. मगर किशन को बार बार मुख्यमंत्री का सहयोग मिलता है. मुख्यमंत्री की मदद से बैंड के कुछ सदस्यों को कुछ दिनों के लिए पैरोल पर अपने घर जाने की सुविधा मिलती है.

जब यह अपने घर पहुंचते हैं, तो इन्हें अहसास होता है कि परिवार के लोग उन्हें स्वीकार नहीं करना चाहते. बहरहाल अंत में प्रतियोगिता होती है, जिसमें किशन के बैंड को विजयी घोषित किया जाता है. उसके बाद नाटकीय ढंग से वह इंसान अदालत में आता है, जिसकी गवाही पर किशन को सजा हुई थी. अदालत में कहता है कि उसने दबाब में किशन के खिलाफ झूठी गवाही दी थी, किशन तो पूरी तरह से निर्दोष है और किशन को रिहा कर दिया जाता है.

फिल्म की शुरुआत उम्मीदे जगाती है, मगर जैसे जैसे यह फिल्म आगे बढ़ती है, वैसे वैसे बिखरती और जबरन कहानी बुनी गयी लगने लगती है. इंटरवल के बाद तो पूरी कहानी को टीवी सीरियल की तरह खींचा गया है. फिल्म का क्लायमेक्स भी गड़बड़ है. एक वाक्य में कहें तो फिल्म की कहानी, पटकथा सहित सब कुछ बहुत कमजोर है. फिल्म को बेवजह लंबा खींचा गया है. इस लंबाई को एडीटिंग टेबल पर कसने की जरूरत थी. कम से कम इसे बीस मिनट काटा जाना चाहिए था. फिल्म का गीत संगीत भी कमजोर है.

कहानी में कुछ भी नयापन नहीं है. इसी तरह की कहानी पर कुछ दिन पहले एक फिल्म ‘कैदी बैंड’ भी आ चुकी है, जिसे दर्शकों ने सिरे से नकार दिया था. वास्तव में फिल्म ‘कैदी बैंड’ और ‘लखनऊ संट्रेल की कहानी, विषयवस्तु, पात्रों की कैदी बनने की कहानी वगैरह सब कुछ एक जैसी ही है. फिल्म में मनोरंजन, रोमांस, इमोशंस का घोर अभाव है.

जहां तक अभिनय का सवाल है, तो फरहान अख्तर निजी जीवन में अपनी संस्था ‘मर्द’ के तहत म्यूजिकल कंसर्ट करते रहते हैं, जहां वह खुद गाते हैं. उसी को लोकप्रिय करने के लिए वह फिल्मों में भी गायक के ही किरदार में नजर आने लगे हैं. पर परफार्मेंस में कुछ नया नहीं कर रहे हैं. पिछली फिल्म ‘रौकऔन 2’ में भी उन्होंने काफी निराश किया था और अब ‘‘लखनऊ सेंट्ल’’ में भी निराश करते हैं. दीपक डोबरियाल, गिप्पी ग्रेवाल की प्रतिभा को जाया किया गया है. डायना पेंटी ठीक ठाक लगी हैं. रोनित राय सहज लगे हैं, पर वह इस तरह के किरदार कई फिल्मों में पहले भी निभा चुके हैं. रवि किशन की वजह से फिल्म में ह्यूमर आता है. फिल्म के कैमरामैन ने अच्छा काम किया है.

दो घंटे 27 मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘‘लखनऊ सेंट्रल’’ का निर्माण निखिल अडवाणी, मोनिशा अडवाणी, मधु भोजवानी के साथ ‘वायकाम 18’ ने किया है. फिल्म के निर्देशक रंजीत तिवारी, लेखक रंजीत तिवारी व असीम अरोड़ा, कैमरामैन तुषार कांति रे तथा के कलाकार हैं फरहान अख्तर, डायना पेंटी, गिप्पी ग्रेवाल, दीपक डोबरियाल, इनामुल हक, रोनित राय, राजेश शर्मा, रवि किशन आदि.

भोजपुरी गीतों में मिठास है : रितेश पांडे

भोजपुरी गायन की बदौलत जिन गायकों ने भोजपुरी फिल्मों में अपना एक अलग मुकाम हासिल किया, वही फिल्मों में बतौर हीरो आने के बाद धीरेधीरे गायन से दूर होते गए. लेकिन भोजपुरी गायक रितेश पांडे ने भोजपुरी गायन से न केवल शोहरत बटोरी, बल्कि वे आज भोजपुरी फिल्मों के सुपरस्टार भी बन चुके हैं. इस के बावजूद उन्होंने भोजपुरी गायन को न केवल अपनी प्राथमिकता में रखा, बल्कि वे हर साल भोजपुरी के कई सुपरहिट गीत देते रहे हैं. इस समय उन के पास भोजपुरी की कई फिल्में भी हैं.

बिहार के सासाराम जिले के करगहर इलाके के रहने वाले रितेश पांडे से एक लंबी बातचीत हुई. पेश हैं, उसी के खास अंश:

आप का भोजपुरी गायन और फिल्मों में आना कैसे हुआ?

मेरे पिताजी पेशे से टीचर हैं और वे बनारस में पढ़ाते थे. मेरी पढ़ाईलिखाई उन्हीं के साथ बनारस में पूरी हुई. इस दौरान मैं स्कूल के कार्यक्रमों में हिस्सा लिया करता था. वहीं से मेरा गायन की तरफ रुझान बढ़ता गया और मैं ने महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ से बैचलर औफ म्यूजिक की डिगरी ली.

इस के बाद मैं ने भोजपुरी गायन में जाने का फैसला किया और अपने पहले म्यूजिक अलबम ‘तेरी नजर’ से कैरियर की शुरुआत की. इस के बाद मेरे दूसरे अलबम ‘कड़ुआ तेल’ को लोगों ने इतना ज्यादा पसंद किया कि मुझे भोजपुरी के सुपरहिट गायकों की कतार में खड़ा कर दिया.

आप के सब से ज्यादा पसंद किए जाने वाले गीत कौन से हैं?

सब से ज्यादा पसंद किया जाने वाला मेरा गीत ‘जा ऐ चंदा ले आवा खबरिया’ रहा. इस के बाद मैं ने कई अलबमों में अपने सुर दिए, जिन में ‘दर्द दिल के’, ‘मारता लाइन रे’, ‘जहिया गईलू तू भईल जियल मुश्किल’, ‘कमर तोहार चाकर’, ‘लपलप करे कमरिया’, ‘कड़ुआ तेल’, ‘पश्चिम टोला’, ‘पलानी में जवानी रोअता’, ‘काटल जाई चानी’, ‘हसुआ धराई जनि’, ‘सोनार राजाजी’, ‘खरिहानी में…’ खास रहे.

भोजपुरी फिल्मों में आने का श्रेय क्या आप के गायन को जाता है?

जी हां, मेरा भोजपुरी फिल्मों में आने का सारा श्रेय गायन को ही जाता है. मैं तो यही कहूंगा कि भोजपुरी सिनेमा में जितने भी सुपरस्टार हुए हैं, उन में से ज्यादातर का बैकग्राउंड भोजपुरी गायन ही रहा है.

फिल्मकार रितेश कुमार ठाकुर और डायरैक्टर विष्णु शंकर बेलू फिल्म ‘बलमा बिहार वाला-2’ का औफर ले कर मेरे पास आए थे. यह फिल्म सुपरडुपर हिट रही थी.

इस फिल्म की कामयाबी के बाद मेरे पास कई फिल्मों के औफर आए, लेकिन मैं ने फिल्म की कहानी को प्राथमिकता में रखा.

आप की नई आने वाली फिल्म ‘इंडिया वर्सेज पाकिस्तान’ की क्या खासीयत है?

भारत पाकिस्तान संबंधों पर बनी अब तक की सभी फिल्मों से अलग हट कर इस फिल्म की कहानी है. इस में मैं ने भारतीय सेना के मेजर का किरदार निभाया है.

आप की कौन कौन सी फिल्में आने वाली हैं?

मेरी 2 फिल्में बन कर तैयार हैं, जिन में से ‘नाचे नागिन गलीगली’ का ट्रेलर भी लौंच हो चुका है. यह फिल्म मारधाड़ व रोमांस से भरपूर है. दूसरी फिल्म ‘सिंदूर की सौगंध’ है.

इस के अलावा मेरी एक और फिल्म ‘वंदेमातरम’ है, जिस में तनुश्री ने काम किया है. इस के अलावा तनुश्री के साथ एक और फिल्म आ रही है ‘दरार-2’, जो एक पारिवारिक फिल्म है.

आप को कौन कौन सी हीरोइनों के साथ काम करना अच्छा लगता है?

मैं ने जिन हीरोइनों के साथ काम किया है, उन में पाखी हेगड़े, माही खान, प्रियंका पंडित, कनक पांडे, निधि झा व तनुश्री खास हैं. इन हीरोइनों की एक खासीयत है कि ये अपने साथी कलाकार को हमेशा आगे बढ़ने में मदद करती हैं.

भोजपुरी के दो मतलब वाले बेहूदा गीतों पर आप क्या कहेंगे?

भोजपुरी के दो मतलब वाले गीतों में ही इस की मिठास छिपी है. लेकिन जो लोग भोजपुरी में बेहूदगी परोस कर इसे बदनाम करते हैं, वे ज्यादा दिनों तक भोजपुरी सिनेमा व गायन के क्षेत्र में टिक नहीं पाए.

आप ने खुद को फिल्मों और गायन में एकसाथ कैसे बनाए रखा?

फिल्मों और गायन में एकसाथ समय दे पाना थोड़ा मुश्किल है. मगर मैं उतनी ही फिल्में कर रहा हूं, जिस से मेरे भोजपुरी गायन पर कोई बुरा असर न पड़े.

आप अपने चाहने वालों को कुछ कहना चाहेंगे?

मैं ‘सरस सलिल’ पत्रिका के जरीए अपने चाहने वालों से इतना ही कहना चाहूंगा कि वे अपना प्यार और दुलार इसी तरह मुझ पर बनाए रखें, जिस से मैं आप लोगों के लिए हर बार कुछ नया कर पाऊं.

मैं अपनी पत्नी से प्यार नहीं करता. एक और लड़की है, मैं उस से शादी करना चाहता हूं. बताएं कि यह कैसे संभव है.

सवाल
26 वर्षीय विवाहित युवक हूं. विवाह को 5 वर्ष हो चुके हैं. 3 वर्ष का बेटा और 8 महीने की बेटी है. मेरी पत्नी के घर वालों ने उस की शिक्षा को ले कर झूठ बोला था. हम से कहा गया था कि लड़की बीए पास है, जबकि वह सिर्फ 10वीं कक्षा पास है. वह न तो मुझे ठीक से प्यार करती है और न ही बच्चों की परवरिश ठीक से कर पाती है. जिस रिश्ते की बुनियाद ही झूठ पर रखी गई हो वह रिश्ता कितने दिन टिक सकता है? मैं पत्नी को नहीं चाहता. एक और लड़की है जो हर तरह से मेरे लिए उपयुक्त है. मैं उस से शादी करना चाहता हूं. बताएं कि यह कैसे संभव है?

जवाब
रिश्ता तय होने से पहले आप को लड़की के बारे में सारी तहकीकात करनी चाहिए थी पर आप ने ऐसा नहीं किया. अब शादी के 5 साल बीत जाने और 2 बच्चों का पिता बनने के बाद पत्नी की खामियां देख रहे हैं. आप मानते हैं कि आप की बीवी अपने बच्चों की सही परवरिश नहीं कर सकती. ऐसे में बच्चों के प्रति आप की जिम्मेदारी बढ़ गई है. मगर बजाय इस ओर ध्यान देने के आप किसी लड़की के प्रेम में पड़े हैं और उस से शादी के सपने देख रहे हैं. आप को समझना चाहिए कि एक पत्नी के होते हुए दूसरा विवाह गैरकानूनी होगा. अत: किसी मुगालते में न रहें. पत्नी से तालमेल बैठाने और घरपरिवार को संभालने का प्रयास करें.

ताड़ी और नीरा के बीच लटकी ताड़ीबंदी

प्रदेश में ताड़ी पर रोक लगाने का मामला तुगलकी फरमान साबित हो कर रह गया है. पिछले साल अप्रैल महीने में सरकार ने बड़े ही तामझाम के साथ शराब के साथ ही ताड़ीबंदी का भी ऐलान किया था.

सरकार ने दावा किया था कि नशीली ताड़ी पर रोक लगेगी और उस की जगह नीरा को बढ़ावा दिया जाएगा. नीरा को बेचने के लिए कई पौइंट भी बनाए गए और लाइसैंस भी बांटे गए.

18 मार्च, 2017 को नीरा नियमावली लागू की गई. नियमावली बनने के इतने महीने गुजरने के बाद भी हालत यह है कि ताड़ और खजूर से पैदा होने वाले कुल रस का एक फीसदी हिस्सा भी इस्तेमाल नहीं हो पा रहा है. राज्य के 12 जिलों में ही कुल 74 फीसदी ताड़ और 70 फीसदी खजूर के पेड़ हैं. उन से रोजाना ताड़ और खजूर का 7 करोड़ लिटर रस जमा होना चाहिए था, पर महज 30 हजार लिटर रस ही जमा हो पा रहा है और उसी रस का नीरा बन रहा है.

शाही मौसम यानी अप्रैल से अगस्त महीने के बीच ताड़ या खजूर के एक पेड़ से रोजाना 10 लिटर रस मिलता है. इस से साफ हो जाता है कि ताड़ और खजूर का 99 फीसदी रस या तो ताड़ी के रूप में बाजार में बिक रहा है या बरबाद हो रहा है.

उद्योग विभाग से मिली जानकारी के मुताबिक, अभी नीरा बनाने और बेचने का काम टैस्टिंग के दौर से गुजर रहा है. फिलहाल तो नालंदा में नीरा की बौटलिंग हो रही है और एक सौ स्टालों पर इसे बेचा जा रहा है. सब से ज्यादा 55 स्टौल नालंदा में ही हैं. वैशाली में भी एक प्लांट लगाया जा रहा है. गया और भागलपुर में भी प्लांट लगाने की योजना को मंजूरी दे दी गई है, पर वहां अभी काम शुरू नहीं हो सका है.

एक प्लांट रोजाना 10 हजार लिटर नीरा को निखारता है. नालंदा के प्लांट पर 5 करोड़, 56 लाख रुपए और हाजीपुर के प्लांट पर 4 करोड़, 20 लाख रुपए खर्च किए गए हैं. नीरा को 25 रुपए प्रति लिटर की दर से बेचना है और ताड़खजूर के गुड़ की कीमत 150 रुपए प्रति किलो तय की गई है. नीरा से जैम, पेड़ा, लड्डू, आइसक्रीम, जैली, हलवा बनाने की योजना है. इस के साथ ही ताड़ और खजूर के पत्तों से चटाई, खिलौने और झाड़ू बनाने की भी योजना है.

राज्य में सभी 38 जिलों में ताड़ और खजूर से रस उतारने के लिए 67 हजार, 280 लोगों को ट्रेंड किया गया है. सरकार उन्हीं 12 जिलों पर सब से ज्यादा नजर गड़ाए हुए है, जहां सब से ज्यादा ताड़ और खजूर के पेड़ हैं. ताड़ी की खपत के मामले में समूचे देश में बिहार चौथे नंबर पर है. पहले नंबर पर आंध्र प्रदेश, दूसरे नंबर पर असम और तीसरे नंबर पर झारखंड आता है.

ताड़ का पेड़ 25 साल पुराना होने पर ही नीरा और ताड़ी दे सकता है. इस के बारे में कहा जाता है कि कोई ताड़ के पेड़ को लगाता है, तो उस का बेटा ही ताड़ी पी पाता है. ताड़ के पेड़ आमतौर पर 45 से 50 फुट ऊंचे होते हैं. ताड़ी पर रोक लगाने से राज्य के 20 लाख पासी और ताड़ी के कारोबार से जुड़े परिवारों पर रोजीरोटी का संकट पैदा हो गया है.

साल 2011 की जनगणना के मुताबिक, राज्य में पासी जाति की आबादी 8 लाख, 80 हजार, 738 है, जबकि साल 1991 की जनगणना में इस जाति की आबादी 5 लाख, 89 हजार, 12 थी. ताड़ या खजूर के पेड़ से निकलने वाले रस को अगर सूरज उगने से पहले उतार लिया जाता है, तो उसे नीरा कहा जाता है और उस में नशा नहीं होता है, जबकि सूरज निकलने के बाद अगर रस को उतारा जाए, तो वही ताड़ी में बदल जाता है और वह काफी नशीला हो जाता है.

विरोधी दलों के नेताओं का मानना है कि ताड़ी पीने से कई फायदे होते हैं. उन का दावा है कि ताड़ी शराब नहीं, बल्कि जूस है. आंखों की रोशनी कम होने पर डाक्टर ताड़ी पीने की सलाह देते हैं.

गौरतलब है कि बिहार में देशी और विदेशी शराब के साथ ताड़ी पर भी पूरी तरह से पाबंदी है. राज्य में प्रति व्यक्ति प्रति सप्ताह ताड़ी की खपत 266 मिलीलिटर है.

बिहार राज्य के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार कहते हैं कि ताड़ी पर राजनीति करने वाले भ्रम फैला कर केवल अपनी राजनीति चमकाने में लगे हुए हैं. सरकार को ताड़ी को पेड़ से उतारने और उस के कारोबार में लगे लोगों का पूरा ख्याल है. सरकार ने ताड़ी पर रोक लगाई है, नीरा पर नहीं.

सुधा ब्रांड के बूथों पर नीरा की खरीदबिक्री हो रही है और इस के अलावा नीरा को बेचने के लिए कई पौइंट बनाए गए हैं. इस से इस धंधे में लगे लोगों का मुनाफा बढ़ जाएगा.

गौरतलब है कि साल 1991 में मुख्यमंत्री रहे लालू प्रसाद यादव ने ताड़ी से टैक्स और लाइसैंस फीस खत्म कर दी थी.

ताड़ी में नशा बढ़ाने के लिए उस में यूरिया और मैनड्रैक्स मिला दिया जाता है. इसे रोकने के लिए ही ताड़ी पर पाबंदी लगाई गई है. ताड़ के फल से जो रस निकलता है, वह हांड़ी (लबनी) में टपने के साथ ही फर्मंटेशन शुरू कर देता है, जिस से अलकोहल की मात्रा बढ़ने लगती है.

अगर हांड़ी में चूना डाल दिया जाए, तो फर्मंटेशन नहीं हो पाता है. फर्मलीन को भी हांड़ी में डाल देने से तकरीबन 40-45 घंटे तक फर्मंटेशन नहीं होता है.

ताड़ी को मैडिसिनल भी माना जाता है. कहा जाता है कि इसे पीने से पेट साफ रहता है और पाचन संबंधी बीमारियां ठीक होती हैं. ताड़ी में चीनी की मात्रा ईख से कहीं ज्यादा होती है.

एक रेलगाड़ी न बुलाती है न सीटी बजाती है

पटना में एक ऐसी रेलगाड़ी चल रही है, जो रेलगाड़ी के मकसद को पूरा नहीं कर पा रही है. पटना के बाशिंदों के लिए मुसीबत बन चुकी इस रेलगाड़ी का नाम है, ‘पटनादीघा घाट पैसेंजर ट्रेन. यह रेलगाड़ी रोज 7 किलोमीटर का 2 फेरा लगाती है. 3 डब्बों की यह रेलगाड़ी पटना वालों को सुविधा कम देती है, मुसीबत ज्यादा पैदा कर रही है.

20 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से पटना जंक्शन और दीघा घाट के बीच चलने वाली इस रेलगाड़ी की वजह से रोज हजारों लोग लंबे ट्रैफिक जाम को झेलते हैं.

पटना जंक्शन से यह सुबह 7 बज कर 55 मिनट पर खुलती है. इस में 20-25 से ज्यादा सवारियां नहीं होती हैं. ज्यादातर बेटिकट ही होते हैं, क्योंकि इस में टिकट चैक करने वाला कोई नहीं होता है.

5 मिनट में रेलगाड़ी अपने पहले स्टौपेज आर. ब्लौक पहुंचती है. उस के बाद पुराने सचिवालय हाल्ट पर रुकती है. 8 बज कर 10 मिनट पर हड़ताली मोड़ पहुंचती है. वहां से पुनाईचक हाल्ट, इंद्रपुरी, राजीवनगर हौल्ट पर रुकती हुई साढ़े 8 बजे दीघा पहुंचती है.

दीघा हाल्ट के पास न कोई प्लेटफार्म है और न ही कोई बोर्ड है. प्लेटफार्म तकरीबन 4 सौ मीटर आगे है और वहां तक ट्रेन पहुंच ही नहीं सकती है, क्योंकि ट्रैक पर मिट्टी और कचरा भरा हुआ है.

पटनादीघा घाट रेलवे ट्रैक तकरीबन डेढ़ सौ साल पुराना है. अंगरेजों ने दीघा के एफसीआई गोदाम तक अनाज की ढुलाई के लिए इसे बिछाया था. पिछले काफी सालों से ट्रैक बेकार पड़ा हुआ था, जिस से उस पर काफी कब्जा हो गया था.

जब लालू प्रसाद यादव रेल मंत्री बने थे, तो साल 2004 में उन्होंने पटना जंक्शन से दीघा घाट तक के बीच 7 किलोमीटर की दूरी को तय करने के लिए पैसेंजर ट्रेन शुरू करवाई थी.

इस रेलगाड़ी को चलाने से रेलवे को रोजाना 35 हजार रुपए खर्च करने पड़ते हैं और इस से होने वाली आमदनी के नाम पर महज 500-600 रुपए ही रेलवे की झोली में आते हैं.

इस तरह हर महीने तकरीबन साढ़े 10 लाख रुपए इस पर खर्च होता है और उस के बाद 15 हजार रुपए रेलवे के पास आते हैं. इस में एक लोको पायलट, एक असिस्टैंट पायलट और एक गार्ड की ड्यूटी लगी होती है.

पटना जंक्शन से दीघा घाट के बीच इस ट्रेन को 9 रेलवे क्रौसिंग से गुजरना पड़ता है. इस दौरान रेलवे क्रौसिंग को बंद किया जाता है, जिस से उस के दोनों छोर पर लंबा जाम लग जाता है.

साल 2010 में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने रेलवे को प्रस्ताव भेजा था कि रेलवे ट्रैक की जमीन को फोर लेन सड़क बनाने के लिए दे दिया जाए, जिस से पटना को जाम की समस्या से निजात मिलेगी और पटना से दीघा घाट तक की दूरी लोग काफी कम समय में तय कर सकेंगे.

इस प्रस्ताव पर पूर्वमध्य रेलवे और बिहार सरकार के बीच सहमति भी बन चुकी है और जमीन को ट्रांसफर करने के लिए नापजोख का काम भी हो चुका है. रेलवे ने जमीन के लिए 10 करोड़ रुपए का आकलन किया है.

पूर्वमध्य रेलवे ने पूरा लेखाजोखा बना कर रेलवे बोर्ड को भेज दिया है, लेकिन मामला अभी फाइलों में ही दबा पड़ा है.

4 अगस्त को पटना हाईकोर्ट ने पटना दीघा घाट रेलगाड़ी को चलाने पर सवालिया निशान लगाते हुए रेलवे से जवाब तलब किया है. जस्टिस रविरंजन और एस. कुमार की खंडपीठ ने रेलवे से इस बारे में पूरी जानकारी देने को कहा है.

खाप पंचायत की तरह फैसला सुनाती सरकार

खाप पंचायतें कैसे अपने फैसले थोपती हैं- जो कह दिया मान लो वरना बिरादरी से बाहर. अगर गांव के मुखिया, पंडित, मौलवी ने सहीगलत सोच पर किसी को पीटने, किसी को जुर्माना भरने, किसी का धंधा बदलवाने का चौपाल पर बैठ कर फैसला कर लिया तो कर लिया. जिस ने रोना है, रोए. कोई कुछ नहीं कर सकता.

हमारी लोकतांत्रिक वोटों से चुनी जनप्रिय सरकार अब इसी तरह बरताव करती नजर आती है. हम ने फैसले कर लिए, अब तुम को पड़ता खाता है तो जिंदा रहो वरना मरखप जाओ, नर्क में जाओ. कीचड़ में सड़ो. देश में रहना है तो रहो, वरना दफा हो जाओ. कहने को वित्त मंत्री अरुण जेटली इस तरह की बात दिवालिया होने की कगार पर बैठे धंधों के मालिकों को कह रहे थे कि नए कानून के मुताबिक उन का धंधा लगातार नुकसान में चल रहा है, तो उसे बंद कर दें, पर यह सरकार की असल मंशा को जाहिर करता है.

अब सरकार कहती है हम ने फैसले बंद कमरे में करने हैं और राजतंत्र की तरह मुनादी करानी है. जिसे नहीं मंजूर वह धंधा ही नहीं जिंदगी भी छोड़ने को आजाद है. हमें ऊंचनीच से मतलब नहीं. गाय को बचाने, नोटबंदी, जीएसटी के मामलों में सरकार ने पूरी तरह खाप पंचायती धौंस जमाई है. देश ने इसे मान लिया है, क्योंकि वोटतंत्र तो देश में है, पर लोकतंत्र अभी तक कुछ दिल्ली की कुछ सड़कों तक ही है.

वैसे भी हर गांवकसबे में अकसर नेता, थानेदार, पंडे, मौलवी की ही चलती है. वहां सुनवाई के नाम पर अदालतें चाहे हों, पर ये सब जानते हैं कि अदालत जब तक आखिरी फैसला देगी, तब तक परेशान के बच्चे बूढ़े हो चुकेंगे और परेशान या तो श्मशान में फुंक चुका होगा या कहीं 6 गज नीचे दबा होगा.

खाप पंचायतों की तरह सरकारी फैसले जनता की राय पर नहीं, सरकारी कमेटियां तय करती जा रही हैं. उन पर लागू करने से पहले राय नहीं ली जाती. अच्छाबुरा नहीं सोचासमझा जाता. नोटबंदी का फैसला लिया, बिना किसी की खास राय लिए. 50 दिन सारा देश परेशान रहा. आज भी लोगों को संदूकों से पुराने नोट मिलते हैं, काले धन के नहीं, शुद्ध कमाई के जो सरकार ने चोरी कर लिए, खाप पंचायत की तरह जुर्माना लगा दिया बिना कुसूर के. सरकार की जनता से बातचीत बंद हो गई है. अब एकतरफा प्रवचन दिए जाते हैं. हर चुनावी सभा, 15 अगस्त के भाषण, मन की बात, लोकसभा में बयान सब एकतरफा हैं. हमारे पास 70 परसैंट जमीन का राज है तो हम चाहे जो कर लें, यह खुद कानून मंत्री रवि शंकर प्रसाद कहते हैं. लोकतंत्र का मतलब होता है एक परसैंट की भी बात सुनी तो जाएगी. यहां 60 परसैंट भी बेकार हैं, क्योंकि वोटतंत्र 40 परसैंट वालों को 80 परसैंट सीटें दिला देता है.

इस का बेहद नुकसान हो रहा है. विकास और अच्छे दिनों की बातें तो बंद हो ही गई हैं, अब बोलने की व अदालतों की आजादी भी छिन सकती है. पूरा देश इस तरह के माहौल में जा सकता है जैसा दिल्ली वाले जहर से भरती हवा में महसूस करते हैं. अब फेफड़े ही नहीं, दिमाग भी जहर से भर रहा है. गनीमत है सुप्रीम कोर्ट कहींकहीं सरकार की मनमानी पर ब्रेक लगा रहा है. अभी निजता पर जो फैसला दिया सरकार के इस दावे को नकार कर दिया कि नागरिक के बदन पर राजा की तरह सरकार का ही हक है.

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