प्रीत किए दुख होए : भाग 4

पिछले अंकों में आप ने पढ़ा था:

काजल और सुंदर बचपन से एकदूसरे से प्यार करते थे. सुंदर ऊंची जाति का था और काजल दलित थी. सुंदर के पिता ने उसे मामा के पास भेज दिया. वहां सुंदर का शोषण हुआ. वह वापस आ गया. इसी बीच उस की मुलाकात मीनाक्षी से हुई. वह उसी की जाति की थी. काजल पढ़ाई में होशियार निकली और पढ़ने शहर जा पहुंची. मीनाक्षी सुंदर को चाहती थी.

अब पढ़िए आगे…

 यह बात सुंदर के भी कानों में पड़ी कि पूरे ही गांव का कायाकल्प हो रहा है और वह भी काजल की बदौलत. सुंदर पिंजरे में बंद पंछी की तरह तड़प उठा.

सुंदर की यह तड़प देख कर मीनाक्षी उस पर हंस पड़ती, ताने देती. एक बार तो सुंदर ने मीनाक्षी को पीट दिया क्योंकि उस ने काजल के लिए बेहूदा बात कही थी. लेकिन एक सच्ची प्रेमिका की तरह वह यह सब झेल गई और परिवार को इस की भनक तक न लगने दी.

‘‘सुंदर, तुम मेरी जान भी ले लोगे न तो भी मैं उफ न करूंगी,’’ रोने के बजाय मीनाक्षी ने बेबाक हो कर कहा था.

सुंदर घबराया और मीनाक्षी के पैर पकड़ लिए, ‘‘मुझे माफ कर दो. मेरे दिल को समझो. मैं अपना दिल काजल के नाम कर चुका हूं.’’

मीनाक्षी ने आंसू पोंछे, ‘‘अगर तेरा प्यारा सच्चा होगा तो तुझे मिल जाएगी काजल.’’ ‘‘नहीं मीनाक्षी, मैं इस जेल में बेकुसूर कैदी हूं. मुझे तुम आजाद कर दो. मीनाक्षी, तुम मेरी प्रेरणा हो तो मंजिल है काजल. मैं तुम्हारा बड़ा एहसानमंद रहूंगा, अगर मुझे मंजिल तक पहुंचाने में मदद कर दी.’’

‘‘जब कुदरत तेरे साथ होगा तो कोई रोक सकता है क्या?’’

‘‘चलो, अपने कमरे में. मां शायद इधर ही आ रही हैं,’’ दोनों अपनेअपने कमरे में चले गए.

कुछ दिन बाद सुंदर के कालेज में टूर का प्रोग्राम बना. सरकारी फंड से एकबस की गई. उस में पहले साल के सभी छात्रछात्राएं सवार हो शहर घूमने चले. गाइड के रूप में 2 टीचर साथ थे, जिन में एक मिश्राजी भी थे.

शहर घूमने के बाद तकरीबन 4 बजे बस जिले के राजकीय महाविद्यालय परिसर में रुक गई. सभी छात्रछात्राएं बाहर निकल कर घूमने लगे.

गाइड से सुंदर को पता चला कि वह जिले का सब से अच्छा कालेज है जहां टौपर छात्रछात्राएं ही पढ़ते हैं. उस ने अंदाजा लगाया कि हो सकता है कि काजल भी यहीं पढ़ती हो.

सुंदर काजल को ढूंढ़ने लगा. काजल अभीअभी क्लास में से बाहर निकली. सिक्योरिटी गार्ड भी पीछेपीछे था. सुंदर को गार्ड का पता नहीं था, सो उस ने धीरे से पुकारा, ‘‘काजल…’’

इतना सुनना था कि काजल दौड़ कर उस के गले लग गई.

‘‘तू ने मुझे भुला दिया काजल?’’

‘‘नहीं रे, कहां भूली हूं मैं? देख मेरी हालत. क्या ऐसी थी मैं?’’ और काजल ने सुंदर को जोर से भींच लिया.

सुरक्षा गार्ड ने देखा तो उस ने दौड़ कर सुंदर को पकड़ा और गेट के पास बने थाने में डीएसपी अंजन कुमार को सौंप दिया.

डीएसपी अंजन कुमार ने सुंदर की बेरहमी से पिटाई कर दी और थाने में बंद कर दिया. सारे छात्रछात्राएं धरने पर बैठ गए और नारेबाजी करने लगे.

मामला गंभीर होता देख कर डीएसपी अंजन कुमार ने सुंदर को छोड़ दिया और मिश्राजी ने राजकीय अस्पताल में उसे भरती करा दिया.

थाने में सुंदर की इतनी पिटाई की गई थी कि 3 महीने तक उसे अस्पताल में रहना पड़ा. मीनाक्षी कभीकभी अस्पताल आती तो उस पर ताना कसती, ‘‘दिल दिया, दर्द लिया. वही थी न तुम्हारी काजल…? अच्छी है तुम्हारी पसंद.’’

सुंदर कुछ नहीं बोला, बस सिसकता रहा. आखिर डाक्टरों के इलाज और मीनाक्षी की सेवा से वह घर जाने लायक हो गया. छुट्टी के दिन वह किसी की निगरानी न देख चुपके से अपने घर आ गया.

उधर मीनाक्षी अस्पताल पहुंची तो बिस्तर खाली देख बगल वाले से पूछा. पता चला कि सुंदर अभीअभी घर चला गया है. मीनाक्षी ने घर जा कर अपने पिता को बताया तो मिश्राजी के तनबदन में आग लग गई. उन्होंने प्रण किया कि चाहे जान चली जाए, सुंदर को मीनाक्षी से शादी करनी ही पड़ेगी.

उधर, डीएसपी अंजन कुमार भी काजल की चाहत में दीवाने हो गए थे.

कालेज में 15 दिन की छुट्टियां हुईं. काजल के मन में आया कि मां के साथ गांव घूम लिया जाए. दोनों मांबेटी गांव आ गईं. बदलाव देख कर वे दंग रह गईं.

काजल के कच्चे घर के बजाय वहां पक्का बड़ा घर बन गया था. ठेकेदार ने आ कर घर की चाबी देते हुए सारी बातें बताईं कि यह काजल का ही कमाल है.

बड़ा घर देख कर मांबेटी दोनों बड़ी खुश हुईं और ठेकेदार को चाय पिलाई. मां ने ठेकेदार से गांव का हालचाल पूछा, खासकर बाबू लोगों का.

‘‘गजब की खबर है. पंडित रमाकांत के बेटे सुंदर को 2 दिन पहले दूर गांव के कोई मिश्राजी मास्टर के हथियारबंद लोग अपहरण कर के ले गए. सभी बाबू लोगों ने मिश्राजी के यहां दबिश दे दी.

आखिरकार मिश्राजी ने हथियार डाल दिए और पंडित रमाकांत के बेटे सुंदर को मुखिया के हवाले कर दिया. चेतावनी देते हुए सभी लोग वापस गांव आ गए.

यह सुन कर काजल परेशान हो गई और छत पर टहलने लगी, तभी उस की नजर सड़क पर जाती अपनी सहेली ममता पर पड़ी, जो मुखियाजी की बेटी थी.

काजल ने ऊपर से ही अपनी सहेली ममता को अंदर आने का इशारा किया और दनदनाते हुए नीचे आ कर दरवाजा खोल दिया. दोनों सहेलियां गले मिलीं.

‘‘शहर में कैसी पढ़ाई चल रही है तुम्हारी?’’ ममता ने पूछा.

‘‘अच्छी, लेकिन तू बता कि उंगली में चमक रही अंगूठी कब से है? कहीं टांका भिड़ गया क्या?’’ काजल ने ममता से पूछा और अपनी परेशानी भूल गई.

‘‘अब समझ ही गई है तो कहना क्या?

‘‘मुझे क्यों भूल गई?’’

‘‘नहीं भूली काजल, चाहे जिस की कसम दे दो. लेकिन तुम तो जान रही हो न हमारी बिरादरी को. पापा मुखिया हैं. भी बदनाम हो जाते.’’

‘‘खैर, तू बस जीजाजी से मिलवा दे, ताकि मैं देख सकूं कि मेरी चालाक सहेली ने कैसी बाजीगरी दिखाई है.’’

‘‘अभी तो वे कालेज में होंगे. क्या तू चलेगी वहां?’’

‘‘तू साथ चलेगी तब न? मैं कैसे पहचानूंगी?’’

‘‘अभी चल. घर जा कर आना मुमकिन नहीं.’’

‘‘तो चल.’’

काजल ने आननफानन कपड़े बदले और आटोरिकशा में सवार हो कर दोनों सहेलियां कालेज पहुंच गईं.

लंच की घंटी बजने में 10 मिनट की देरी थी, सो दोनों सहेलियां कालेज कैंपस में लगे नीम के घने पेड़ के नीचे इंतजार करने लगीं.

‘‘देख, जब घंटी बजेगी तब मैं क्लास के सामने जा कर खड़ी हो जाऊंगी. तब तक तुम मुझ पर ही नजर गड़ाए रखना. जैसे ही वे मिलेंगे, मैं उन्हें कालेज के पिछवाड़े में ले जाऊंगी. तुम तेजी से हमारे पीछे आना,’’ ऐसा कह कर ममता क्लास के सामने जा कर खड़ी हो गई.

घंटी बजी. वैसा ही हुआ. काजल ने तेजी से ममता का पीछा किया. वह ज्यों ही कालेज के पिछवाड़े की ओर मुड़ी कि उसे सांप सूंघ गया. ममता का वह मंगेतर कोई और नहीं, बल्कि काजल का सुंदर था.

‘‘रुक क्यों गई काजल, आओ न. मिलो तुम मेरे मंगेतर से,’’ यह कह कर ममता मुसकरा दी.

काजल की आंखों में खून उतर आया. वह बोली, ‘‘धोखेबाज, तो यही है तेरा असली रूप?’’

सुंदर कुछ बोलना चाह रहा था, लेकिन काजल अपनी रौ में थी, ‘‘मैं दलितों व कमजोर लोगों को समाज में इज्जत दिलाने की हसरत लिए चल रही थी और इस में तुम ने भी साथ देने की कसमें खाई थीं… कहां गया वह जज्बा?’’

ममता की समझ में कुछ नहीं आ रहा था. वह हैरानी से दोनों को देख रही थी.

काजल बोले जा रही थी, ‘‘तुम ऐसे इनसान हो, जो खुद अशुद्ध रह कर यजमानों का शुद्धीकरण कराते हैं और पंडित होने का ढोंग रचते हैं. क्या किया है तुम लोगों ने? दलितों और कमजोरों की जायदाद हड़प कर उन्हें बेघर कर गांव निकाले जाने की सजा दे दी है.

‘‘झूठ, फरेब व वादाखिलाफी कर तू ने मेरे दिल के टुकड़ेटुकड़े कर दिए. मैं कैसे और कहां जीऊंगी सुंदर? तेरे लिए मैं ने अपनी बिरादरी के ही होनहार, स्मार्ट डीएसपी का औफर ठुकराया. तू ने मुझे तो कहीं का न रखा.

‘‘कान खोल कर सुन ले. मेरी जिंदगी को हराम कर के तुम भी नहीं जी सकोगे. मेरी जगह तो अब गंगा की गोद में हैं. मैं चली,’’ और काजल बेतहाशा भागी. पास ही में गंगा नदी बहती थी.

‘‘काजल सुनो तो… रुको तो,’’ कह कर जब तक सुंदर पीछा करते हुए उसे पकड़ता, तब तक वह गंगा में कूद पड़ी.

सुंदर ने भी छलांग लगा दी. अब ममता को पूरी बात समझ में आई. उस ने इस घटना को वहां नहा रहे लड़कों को बताया. जो तैरना जानते थे, वे कूद पड़े.

सुंदर और काजल बीच गंगा में डूबतेउतरा रहे थे. कुछ लड़कों ने हिम्मत दिखाई और दोनों को बाहर निकाल लिया. सुंदर रोए जा रहा था, वहीं काजल बेहोश थी. कुछ लड़के दौड़ कर डाक्टर को बुला लाए. उन्होंने काजल की सांस चैक की जो धीमेधीमे डूबती जा रही थी. दोनों को तुरंत गाड़ी में लाद कर नर्सिंगहोम ले आए. पेट का पानी निकालने के बाद औक्सिजन लगा दी गई.

2 घंटे के इलाज के बाद काजल होश में आई. यह सब देख ममता के भी आंसू नहीं सूख रहे थे.

‘‘काजल, तू ने जरा भी बताया होता कि तुम सुंदर से बचपन से प्यार करती हो तो मैं इस दबंग समाज से लड़ जाती और तेरा ब्याह सुंदर से ही करवाती. लेकिन तू ने कभी इस बारे में बात नहीं की. मुझे माफ कर दे काजल,’’ और ममता ने सगाई की अंगूठी निकाल सुंदर को देते हुए कहा, ‘‘सुंदर, पहना दे काजल को.’’

सुंदर झिझका, लेकिन लड़कों के हुजूम में से एक ने हिम्मत दी, ‘‘पहना दे काजल भाभी को अंगूठी. मरते दम तक हम सब तेरे साथ हैं. भाभी होश में आ गई हैं. तेरी शादी अभी होगी. हमारे कुछ साथी जरूरी सामान व पंडित को लाने चले गए हैं. बस, आने की देरी है.’’

सुंदर ने काजल को वह अंगूठी पहना दी. सब ने तालियां बजाईं, तभी पंडितजी व सारा सामान आ गया.

ममता ने काजल को सजाया. तभी उन्हें भनक मिली कि मिश्राजी के गुंडों ने घेराबंदी कर दी है. लड़कों ने भी नर्सिंगहोम घेरे रखा. कोई अनहोनी न हो जाए, इसलिए ममता ने कोतवाली और अपने पिता को फोन कर दिया.

मुखियाजी ने तुरंत आ कर अपनी दोनाली तान दी, ‘‘बच्चो, हट जाओ. नादानी मत करो. मारे जाओगे. अंदर क्या हो रहा है?’’ मुखियाजी ने घुसने की कोशिश की. अंदर से शादी कराने के मंत्र सुनाई पड़ रहे थे.

‘‘सुन नहीं रहे हैं चाचा. अंदर सुंदर और काजल की शादी हो रही है,’’ एक लड़के ने बताया.

‘‘खबरदार मुखियाजी, एक भी गोली चली तो…’’ कोतवाली से डीएसपी अंजन कुमार ने आ कर अपनी रिवाल्वर मुखियाजी की कनपटी से सटा दी. तब तक एसटीएफ के जवानों ने भीड़ की कमान अपने हाथ में ले ली थी. मिश्राजी के गुरगे भाग चुके थे.

शोर सुन कर ममता बाहर आई और पिताजी को देख कर रो पड़ी, ‘‘अच्छे आए आप. कन्यादान तो आज आप को ही करना है. चलिए भीतर, कर दीजिए कन्यादान.’’

‘‘कन्यादान…? एक दलित लड़की का कन्यादान मैं करूं? दिमाग तो ठीक है तेरा,’’ मुखियाजी बोले.

‘‘हांहां, आप… आप दलित किसे कहते हैं? उसे जिस ने दलित घर में जन्म लिया है? लेकिन उस ने जन्म देते वक्त कहीं कोई निशान दिया कि मैं उसे दलित मान लूं? मैं और काजल दोनों बचपन की सहेलियां हैं. बताइए, क्या फर्क है हम दोनों में? यहां दलित के नाम पर नफरत के बीज बोने का हक किस ने किस को दिया?

‘‘सुंदर और काजल के बीच बचपन का प्यार है. हम सब जातिवाद के चक्कर में इसे नहीं पहचान सके. प्यार की कोई जाति नहीं होती. अब तो सरकार ने भी इसे मान लिया है,’’ इतना कह कर ममता ने उन के हाथ से बंदूक छीन ली और उसे दूर फेंक दिया.

मुखियाजी ने भी अपनी बेटी की सामने घुटने टेक दिए, ‘‘बेटी, आज तू ने बेटी की सही परिभाषा दे कर मुझे एहसानमंद कर दिया. तू ने मुझे आईना दिखा दिया है.’’

दोनों भीतर गए और पंडित ने मुखियाजी से कन्यादान कराया. सभी बाहर निकले. काजल की मांग में सिंदूर और सुंदर के सिर पर सेहरा देखते ही बनता था.

ममता काजल को संभाले खड़ी थी. मुखियाजी ठीक सुंदर के बगल में सीना ताने खड़े हुए थे. डीएसपी साहब भी सादा कपड़ों में काजल व ममता के बगल में खड़े थे.

मुखियाजी ने कहा, ‘‘बच्चो, इस समाज की बेहतरी का जिम्मा तुम्हारे ही कंधों पर है. ममता ने जो कहा, मैं तो उस से बड़ा प्रभावित हुआ और मान लिया.’’

पूरी भीड़ ने एक सुर में कहा, ‘हां.’

सरपंच ने कहा, ‘‘मुखियाजी, हम दलित बस्ती के हैं. इसे सही माने में दलित बस्ती बनाएंगे और सब को समान अधिकार दिलाएंगे. जिन बाबू लोगों के पास दलितों की जमीन, मकान वगैरह कब्जे में हैं, उसे कागज समेत वापस करवाएंगे और तमाम दलितों को भी वह सहूलियतें दिलाएंगे, जो बाबू लोगों को मिली हुई हैं.’’

तभी झाड़ी में से एक दनदनाती गोली मुखियाजी के सीने पर जा लगी. वे कटे पेड़ की तरह गिरे और मर गए. एसटीएफ के जवानों ने खदेड़ कर गोली चलाने वाले को पकड़ लिया और डीएसपी के सामने खड़ा कर दिया. उस ने तुरंत एक थप्पड़ में ही कबूल कर लिया कि उसे मारना था सुंदर को, धोखे से गोली लग गई मुखियाजी को.

सुंदर, काजल व ममता दहाड़ें मार कर मुखियाजी की लाश पर गिरे. ममता रोतेरोते बेहोश हो गई.

डीएसपी अंजन कुमार ने लाश को तत्काल पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया और खुद 4-5 जवानों के साथ भीड़ को काबू करने में लगे रहे. ममता जब होश में आई, तो रोरो कर कहने लगी, ‘‘आज मेरा कन्यादान होना था. अब कब होगा कन्यादान? कौन करेगा कन्यादान?’’

डाक्टर दिलासा देते हुए बोला, ‘‘बेटी, मैं करूंगा यह कन्यादान. मेरा आशीर्वाद है तुझे.’’

तभी लोगों ने देखा कि काजल ने डीएसपी के पैर पकड़ लिए.

‘‘काजल,’’ उन्हें हैरानी हुई और पैर हटा लिए, ‘‘कुछ कहना है?’’

‘‘हां.’’

‘‘तो कहो, सब के सामने.’’

‘‘सर, आप भी मुझ से प्यार करते थे न?’’

‘‘बिलकुल, पर अब तुम मेरी बहन हो गई हो. बोलो, कौन सा बलिदान करूं मैं? मेरी बड़ी हसरत थी कि तुम कुछ कहो और मैं उस पर अमल करूं?’’

‘‘मेरी गुजारिश है कि आप ममता की मांग भर दें. एक डीएसपी भाई का यह नायाब तोहफा होगा एक गरीब बहन को.’’

काजल ने ममता को खड़ा कर के पूछा, ‘‘ममता, मेरी सहेली, डीएसपी वर पसंद हैं न तुझे? बोल बहन.’’

ममता ने बुझी आंखों से डीएसपी को देखा और उन के सीने से लग गई.

डीएसपी ने ममता की मांग भर दी. पंडितजी ने विधिविधान से मंत्र पढ़े और डाक्टर ने कन्यादान किया. भीड़ ने तालियां बजा कर जोड़े का स्वागत किया.

मुखिया मर्डर केस में अदालत ने मास्टर मिश्रा को 20 साल की कैद और हत्यारे को फांसी की सजा सुनाई.

VIDEO : रोज के खाने में स्वाद जगा देंगे ये 10 टिप्स

ऐसे ही वीडियो देखने के लिए यहां क्लिक कर SUBSCRIBE करें गृहशोभा का YouTube चैनल.

लौकडाउन स्पेशल : शिकार

महेंद्र थाने में आ कर बैठा ही था कि एक सिपाही ने उसे खबर दी, ‘‘साहब, निजामुद्दीन से अहमदाबाद आने वाली ‘राजधानी ऐक्सप्रैस’ ट्रेन में एक आदमी बेहोशी की हालत में मिला है.’’

यह सुन कर महेंद्र को आज से एक साल पहले की घटना याद आ गई. तब उस की बेरावल रेलवे स्टेशन पर आरपीएफ के थानेदार के रूप में नईनई पोस्टिंग हुई थी.

एक दिन की बात है. सुबहसुबह थाने के एक सिपाही ने आ कर बताया, ‘साहब, राजकोट से सोमनाथ आने वाली पैसेंजर ट्रेन में एक लड़की बेहोश पड़ी मिली है.’

यह सुन कर महेंद्र तुरंत उस सिपाही के साथ चल पड़ा. उस ने देखा कि इंजन से पीछे वाले डब्बे में एक लड़की, जिस की उम्र 22-23 साल होगी, ऊपर वाली बर्थ पर बेहोशी की हालत में पड़ी थी.

महेंद्र के साथ गए सिपाही रामलाल ने कहा, ‘साहब, मुझे तो मामला जहरखुरानी का लगता है. इस के पास कोई सामान भी दिखाई नहीं दे रहा है.’

ये भी पढ़ें- तृष्णा: भाग-1

महेंद्र ने रामलाल से कहा, ‘इसे तुरंत डाक्टर के पास ले जाओ और होश में आने पर मुझे बताना.’

दिन के तकरीबन 10 बजे रामलाल ने बताया, ‘साहब, उस लड़की को होश आ गया है और अब वह ठीक है.’

महेंद्र ने रामलाल से कहा, ‘उस लड़की को थाने ले आओ.’

जब वह लड़की थाने आई, तो बेहतर दिख रही थी.

महेंद्र ने पूछा, ‘क्या नाम है तुम्हारा?’

उस लड़की ने बताया, ‘मेरा नाम राजबाला है और मैं राजस्थान के भरतपुर इलाके की रहने वाली हूं.’

यह पूछने पर कि यहां और इस हालत में वह कैसे पहुंची, तो उस ने बताया कि वह प्रेमी के साथ घर से भाग कर आई है, लेकिन उस के प्रेमी ने रास्ते में उसे नशीली दवा खिला दी और उस के जेवर व पैसे ले उड़ा.

महेंद्र ने उस लड़की के मातापिता का मोबाइल नंबर पूछा, तो उस ने कहा, ‘साहब, उन्हें मत बताइए. मैं खुद ही अपने घर चली जाऊंगी.’

पता नहीं उस की बातों में क्या जादू था कि महेंद्र उस की बात मान गया.

उस लड़की ने कहा, ‘मेरे सिर में अभी भी थोड़ा दर्द है. आराम कर के मैं अपने घर चली जाऊंगी.’

महेंद्र ने रामलाल से कहा, ‘इसे मेरे रैस्टहाउस में लिटा दो. बाद में किसी ट्रेन में बिठा देना.’

महेंद्र अपने काम में लग गया, लेकिन उस के मन में राजबाला के प्रति काम भावना जाग गई थी. रात को तकरीबन 8 बजे वह अपने रैस्टहाउस में पहुंचा, तो राजबाला पलंग पर बैठी थी.

महेंद्र ने पूछा, ‘कैसी तबीयत है?’

उस ने बताया, ‘पहले से ठीक है.’

महेंद्र ने कहा, ‘रुको, मैं तुम्हारे लिए खानेपीने का इंतजाम करता हूं.’

इस के बाद महेंद्र ने बाहर आ कर एक सिपाही को बुलाया और उस लड़की के लिए खाना और अपने लिए शराब मंगाई. महेंद्र ने एक सिपाही के घर पर बैठ कर पहले जम कर शराब पी और वहीं बैठ कर खाना खाया.

ये भी पढ़ें- इज्जत : भाभी ने दिए दोनों लड़कों को मजे

रात के तकरीबन साढ़े 11 बजे महेंद्र अपने रैस्टहाउस में पहुंचा, तो देखा कि राजबाला खाना खा कर सो चुकी थी.

एक तो शराब का नशा, ऊपर से एक जवान लड़की का शबाब… महेंद्र ने आते ही दरवाजा बंद किया और राजबाला पर झपट पड़ा.

अचानक हुई इस हरकत से वह जाग गई, लेकिन महेंद्र उसे कहां छोड़ने वाला था. वह रोतीगिड़गिड़ाती रही, पर महेंद्र पर इस का कोई असर न हुआ. वह उस पर छाता गया और अपनी मंजिल पा कर ही उस से अलग हुआ.

वह बेचारी महेंद्र से अलग हो कर एक कोने में जा कर रोने लगी. महेंद्र अपनी हवस मिटाने के बाद सो गया.

सुबह तकरीबन 9 बजे एक सिपाही ने महेंद्र को जगाया. वह अधनंगी हालत में बिस्तर पर पड़ा था. महेंद्र ने जागते ही उस लड़की के बारे में पूछा, तो सिपाही ने कहा, ‘मुझे तो कुछ नहीं मालूम साहब. रात को वह इसी कमरे में ही तो सोई थी. जब आप सुबह से नहीं दिखे, तो मैं आप को देखने चला आया.’

अचानक महेंद्र का ध्यान हाथों पर गया, तो चौंक गया. उस की दोनों अंगूठियां और घड़ी गायब थी. पैंट में रखा पर्स भी नदारद था. अलमारी खुली पड़ी थी. वहां जा कर देखा, तो 50 हजार रुपए भी गायब थे.

महेंद्र ने अपना सिर पकड़ लिया. उसे समझ में आ गया कि उस ने उस लड़की का नहीं, बल्कि उस लड़की ने उस का शिकार किया था.

मछलियों का शिकार बने मगरमच्छ

यह देह व्यापार और ब्लैकमेलिंग का वैसा और कोई छोटामोटा मामला नहीं है, जिस में लोगों को पता चल जाए कि पकड़े गए लोगों के नाम, वल्दियत और मुकाम क्या हैं, बल्कि इस हाईप्रोफाइल मामले की हैरतअंगेज बात यह है कि इस में उन औरतों के नाम और पहचान उजागर हो जाना है, जो अपने हुस्न के जाल में मध्य प्रदेश के कई नेताओं और आईएएस अफसरों को फंसा कर करोड़ों रुपए कमा चुकी हैं.

खूबसूरत, स्टायलिश, सैक्सी और जवान औरत किसी भी मर्द की कमजोरी हो सकती है, लेकिन जब वे मर्द अहम ओहदों पर बैठे हों तो चिंता की बात हो जाती है. क्योंकि इन की न केवल समाज में इज्जत और रसूख होता है, बल्कि ये वे लोग हैं जो सरकार की नीतियांरीतियां बनाते हैं.

इन के कहने पर करोड़ों का लेनदेन होता है. सूटबूट में चमकते दिखने वाले इन खास लोगों में बस एक बात आम लोगों जैसी होती है, वह है जवान औरत का चिकना शरीर देखते ही उस पर बिना सोचेसमझे फिसल जाना.

ये भी पढ़ें- पहलवान का वार: भाग 1

फिसल तो गए, लेकिन अब इन का गला सूख रहा है. नींद उड़ी हुई है और हलक के नीचे निवाला भी नहीं उतर रहा. वजह यह डर है कि खुदा न खास्ता अगर नाम और रंगरलियां मनाते वीडियो उजागर और वायरल हो गए तो कहीं मुंह दिखाने के काबिल नहीं रह जाएंगे.

जांच एजेंसियां यह भी पूछेंगी कि इन बालाओं पर लुटाने के लिए ढेर सारी रकम आई कहां से थी और ब्लैकमेलिंग से बचने के लिए इन्हें कैसे उपकृत किया गया. यानी ब्लैकमेलिंग की रकम का बड़ा हिस्सा एक तरह से सरकार दे रही थी.

यह है मामला

इंदौर नगर निगम के एक इंजीनियर हरभजन सिंह ने 17 सितंबर, 2019 को पुलिस में रिपोर्ट लिखाई कि 2 औरतें उसे ब्लैकमेल कर रही हैं. पुलिस ने एफआईआर दर्ज कर मामले की जांच शुरू कर दी. इंजीनियर हरभजन से भोपाल की आरती दयाल की दोस्ती थी. आरती एक एनजीओ चलाती है. इस ने कृषि, ग्रामीण व पंचायत विभाग से एनजीओ के नाम पर मोटी फंडिंग ली थी.

बल्लभ भवन के ग्राउंड फ्लोर पर बैठने वाले एक आईएएस, भोपाल-इंदौर में कलेक्टर रहे एक आईएएस के अलावा और कई अफसर और नेताओं से उस के नजदीकी संबंध थे. सबंध भी इतने गहरे कि भोपाल व इंदौर में कलेक्टर रह चुके एक आईएएस अफसर ने तो उसे मीनाल रेजिडेंसी जैसे पौश इलाके में एक महंगा फ्लैट दिला दिया था. यह आईएएस अफसर भोपाल और इंदौर के कलेक्टर भी रह चुके हैं.

आरती इस अफसर को ब्लैकमेल कर रही थी, जिस से पीछा छुड़ाने के लिए इस अफसर ने उसे होशंगाबाद रोड पर एक प्लौट भी दिलाया था. आरती ने इस के बाद भी उस का पीछा छोड़ा या नहीं, यह तो वही जाने लेकिन आरती ने दूसरा शिकार हरभजन सिंह को बनाया.

ये भी पढ़ें- मौत की छाया: भाग 1

उस ने हरभजन की दोस्ती नरसिंहगढ़ की 18 साल की छात्रा मोनिका यादव से करा दी. कम उम्र में ही दुनियादारी में माहिर हो गई मोनिका ने हरभजन को अपना दीवाना बना लिया, जिस के चलते हरभजन उस का भजन करने लगा और आरती उतारने के लिए एक दिन उसे एक होटल के कमरे में ले गया.

मोनिका और उस की गुरुमाता आरती ने प्यार के इस पूजापाठ को कैमरे में कैद कर लिया ताकि सनद रहे और वक्त जरूरत काम आए. उधर मोनिका के गुदाज बदन और नईनई जवानी का रस चूस रहे हरभजन को पता ही नहीं चला कि सैक्स करते वक्त वह कैसा लगता है और कैसीकैसी हरकतें करता है.

यह सब मोनिका और आरती ने उसे चलचित्र के जरिए दिखा कर अपनी दक्षिणा, जिसे ब्लैकमेलिंग कहते हैं, मांगी तो वह सकपका उठा.

बेचारा साबित हो गया हरभजन 8 महीने ईमानदारी से पैसे देता रहा. लेकिन हद तब हो गई जब इन दोनों ने एक बार में ही 3 करोड़ रुपए की मांग कर डाली. इस भारीभरकम मांग से उस के सब्र का बांध टूट गया तो उस ने इंदौर के पलासिया थाने में रिपोर्ट दर्ज करा दी.

पुलिस को मामला इतना दिलचस्प लगा कि उस ने बिना हेलमेट वालों के चालान वगैरह बनाने जैसा अपना पसंदीदा काम एक तरफ रखते हुए तुरंत काररवाई शुरू कर दी.

ऐसे मौकों पर पुलिस जाने क्यों समझदार हो जाती है. उस ने प्लान बनाया और मोनिका व आरती को रकम की पहली किस्त 50 लाख रुपए लेने इंदौर बुलाया. ये दोनों इंदौर पहुंचीं तो विजय नगर इलाके में इन्हें यू आर अंडर अरेस्ट वाला फिल्मी डायलौग मारते हुए गिरफ्तार कर लिया.

2-2 श्वेताएं

जिसे पुलिस कहानी का खत्म होना मान रही थी, दरअसल वह कहानियों की शुरुआत थी. पूछताछ में आरती ने बताया कि ब्लैकमेलिंग के इस खेल में और भी महिलाएं शामिल हैं, जिन में से 2 के एक ही नाम हैं यानी श्वेता जैन. पहली श्वेता जैन 39 साल की है. वह भाजपा में सक्रिय है. इस ने अपने हुस्नजाल में एक पूर्व सीएम को फंसाया, जिस ने उसे भोपाल के मीनाल रेजिडेंसी में एक फ्लैट दिलवाया था.

ये भी पढ़ें- मकड़जाल में फंसी जुलेखा: भाग 1

यह बुंदेलखंड, मालवा-निमाड़ के एक पूर्वमंत्री की भी करीबी है. इन्हीं संबंधों का फायदा उठा कर इस ने एक एनजीओ को फंडिंग भी कराई थी. इसे सागर के एक कलेक्टर के संग उन की पत्नी ने पकड़ा था. उस के पति का नाम विजय जैन है. जबकि दूसरी श्वेता जैन के पति का नाम स्वप्निल जैन है.

48 साल की यह श्वेता भोपाल की सब से महंगी टाउनशिप रिवेरा में रहती है. तलाकशुदा आरती ने बड़ी शराफत और पूरी ईमानदारी से बताया कि वह छतरपुर की रहने वाली है और वहां भी 10 लोगों को ब्लैकमेल कर चुकी है. यानी यह उस का फुलटाइम जौब है.

भोपाल पुलिस ने भी सड़क चलते वाहन चालकों को बख्शते हुए इन श्वेताओं को गिरफ्तार कर लिया. ये दोनों भी बड़ी शानोशौकत वाली निकलीं. सागर की रहने वाली श्वेता जैन के यहां से पुलिस ने 14 लाख 17 हजार रुपए बरामद किए.

यह श्वेता एक इलैक्ट्रिक कंपनी की भी मालकिन निकली. इस के पास से 2 महंगी कारें मर्सिडीज और औडी भी मिलीं. इस श्वेता ने सन 2013 में सागर विधानसभा से चुनाव लड़ने के लिए भाजपा से टिकट भी मांगा था. लेकिन भाजपा के ही एक बड़े नेता ने उस का टिकट कटवा दिया था. इस के बावजूद भी उस के भाजपा नेताओं से अच्छे और गहरे संबंध थे.

दूसरी श्वेता (स्वप्निल वाली) के पास से भी एक औडी कार मिली. यह भी पता चला कि वह मूलत: जयपुर की रहने वाली है और उस का पति पेशे से थेरैपिस्ट है, जिसे अकसर पब पार्टियों में देखा जाता है.

इस श्वेता ने एक पूर्व सांसद की सीडी बनवा कर 2 करोड़ रुपए वसूले थे. भाजपा के एक कद्दावर नेता ने तो ब्लैकमेलिंग पर चुनाव के पहले इसे दुबई भेज दिया था, जहां से वह 10 महीने बाद लौटी थी. फिलहाल 3 कलेक्टरों के तबादलों में इस की अहम भूमिका रही थी.

इन दोनों को भाजपा विधायक बृजेंद्र सिंह ने मकान किराए पर दिया था. इस के पहले ये एक दूसरे भाजपा विधायक दिलीप सिंह परिहार के मकान में किराए पर रहते थे. इस मकान में इन दिनों भोपाल की सांसद साध्वी प्रज्ञा भारती रह रही हैं.

पूरी छानबीन का सार यह रहा कि दोनों खूबसूरत श्वेताओं के पास बेशुमार दौलत और जायदाद है. साथ ही ऐशोआराम के तमाम सुखसाधन भी मौजूद हैं.

ये भी पढ़ें- कुंवारा था, कुंवारा ही रह गया: भाग 1

2-2 मास्टरमाइंड

इतना होने के बाद और भी महिलाओं के नाम सामने आए, इन में से असली मास्टरमाइंड कौन है, यह तय होना अभी बाकी है. कुछ लोग सागर वाली श्वेता को ही मास्टरमाइंड  मान रहे हैं तो कुछ की नजर में असली सरगना बरखा भटनागर है.

बरखा अपने पहले पति को तलाक दे चुकी है और उस ने दूसरी शादी अमित सोनी से की है. अमित सोनी कभी कांगे्रस के आईटी सेल से जुड़ा था और सन 2015 में बरखा भी कांग्रेस में आ गई थी.

ये दोनों भी एक एनजीओ चलाते हैं जो एग्रीकल्चर से जुड़े प्रोजेक्ट लेता है. सन 2014 में बरखा का नाम देह व्यापार के एक मामले में आया था. तब से वह सक्रिय राजनीति से अलग हो गई थी. इसी दौरान उस की मुलाकात श्वेता जैन से हुई थी.

बरखा वक्तवक्त पर कई कांग्रेसी दिग्गजों के साथ अपने फोटो सोशल मीडिया पर शेयर करती रहती थी. वर्तमान में 2 मंत्रियों और एक पूर्व प्रदेश अध्यक्ष से इस के अच्छे संबंध हैं. अपनी पहुंच के चलते इस ने एनजीओ के लिए काफी डोनेशन भी लिया था. सागर वाली श्वेता को एक बार सागर में एक कलेक्टर साहब की पत्नी ने रंगेहाथों पकड़ा था.

नरसिंहगढ़ निवासी बीएससी में पढ़ रही मोनिका यादव को आरती ने गिरोह में शामिल किया था, जो जवान थी और जल्द ही अफसरों और नेताओं को अपने हुस्न जाल में फंसाने में माहिर हो गई थी. कई नेताओं के यहां भी उस का आनाजाना था. आरती ने ही इसे अपने साथ जोड़ा था.

इन पर नकाब क्यों

जब राज खुलने शुरू हुए तो यह भी पता चला कि इन पांचों की तूती प्रशासनिक गलियारों में भी बोलती थी. इन के कहने पर तबादले होते थे, नियुक्तियां भी होती थीं और ठेके भी मिलते थे. ये 3 पूर्व मंत्रियों सहित 7 आईएएस अफसरों को ब्लैकमेल कर रही थीं, वह भी पूरी दिलेरी से.

हाल तो यह भी था कि इन के पकड़े जाने के बाद कई अफसर पुलिस हेड क्वार्टर फोन कर पुलिस अधिकारियों के सामने गिड़गिड़ा रहे थे कि उन का नाम सामने न आए. इन के मोबाइलों में कइयों की ब्लू फिल्में हैं.

ये भी पढ़ें- कहानी एक शिवानी की: भाग 1

लेकिन पुलिस उन के नाम उजागर नहीं कर रही है. आमतौर पर जैसा कि ऊपर बताया गया है कि ऐसे मामलों में पुलिस महिलाओं के नाम छिपाती है और पुरुषों के उजागर कर देती है. पर यह मामला ऐसा है जिस में महिलाओं के नाम और फोटो उजागर किए गए लेकिन उन महापुरुषों के नहीं, जिन की वजह से रायता फैला.

पुलिस इन सफेदपोशों के चेहरों पर क्यों नकाब ढके हुए है, यह बात भी उजागर है कि कथित आरोपी महिलाओं को उस ने गुनहगार मान कर उन की जन्म कुंडलियां मीडिया के जरिए बांच दीं, लेकिन अय्याश और रंगीनमिजाज नेताओं और अफसरों को वह बचा रही है.

जबकि जनता को पूरा हक है कि वह इन के बारे में जानें. ऐसा होगा, ऐसा लग नहीं रहा क्योंकि सरकार नहीं चाहती कि इन सफेदपोशों की बदनामी हो.

महज हरभजन द्वारा दर्ज कराई गई एफआईआर पर सारी काररवाई होना पुलिस की नीयत और मंशा को शक के कटघरे में खड़ी कर रही है. जिनजिन रसूखदारों के साथ इन के आपत्तिजनक फोटो व वीडियो मिले हैं, उन के नाम उजागर हों तो समझ आए कि वाकई ये ब्लैकमेलर हैं.

ये भी पढ़ें- पैसों की बेजा मांग, स्कूल संचालक की हत्या!

कहानी सौजन्य-मनोहर कहानियां

प्रीत किए दुख होए : भाग 3

पिछले अंकों में आप ने पढ़ा था:

काजल और सुंदर स्कूल के दिनों से ही एकदूसरे से प्यार करते थे. सुंदर चूंकि ऊंची जाति का था और काजल दलित थी इसलिए सुंदर के पिता ने उसे मामा के पास भेज दिया. वहां सुंदर का खूब शोषण हुआ. इधर काजल पढ़ाई में तेज होने के चलते आगे बढ़ती गई. इसी बीच सुंदर की जिंदगी में मीनाक्षी आई जिस के पिता उन दोनों का रिश्ता कराना चाहते थे.

अब पढि़ए आगे…

 ‘‘तेरी भलाई इसी में है कि तू मीनाक्षी के संग जोड़ी जमा और पढ़लिख. मैट्रिक पास करा दिया न? सैकंड डिवीजन ही सही.

‘‘कल कालेज चलना मेरे साथ. दाखिला करा दूंगा,’’ कह कर आंखें तरेरते हुए मिश्राजी वहां से चले गए.

उस दिन भी सुंदर ने खाना नहीं खाया. सब ने लाख कोशिश की, पर बेकार गया.

मीनाक्षी सुंदर को समझाती, ‘‘घोड़े हो गए हो पूरे 6 फुट के. मन के मुताबिक नतीजा नहीं लाया तू?’’

‘‘नहीं मीनाक्षी, इस बार या तो फर्स्ट आऊंगा या फिर जान दे दूंगा,’’ सुंदर ने पूरे भरोसे के साथ कहा.

‘‘बाप रे…’’ मीनाक्षी ने मुंह पर हाथ रख लिया, ‘‘तू इतना बुजदिल है… जब मैं साथ रहूंगी तो जान कैसे देगा? मैं क्या तमाशा देखूंगी? मैं भी…’’ सुंदर ने अपने हाथों से उस के मुंह को बंद कर दिया.

‘‘तुम्हारा तो सबकुछ है. तुम ऐसा क्यों करोगी?’’

‘‘जब तुम नहीं तो कौन है मेरा?’’ मीनाक्षी की आंखों में आंसू आ गए.

‘‘मीनाक्षी, ऐसे सपने मत पालो. रास्ते का ठीकरा किसी का भविष्य नहीं हो सकता. मैं गरीब पूजापाठ कराने वाले बाबूजी का बेटा हूं. तेरी जैसी अमीरी मेरे पास नहीं है. तेरे लिए तो शहजादों की कतार लगी है.’’

मिश्राइन दूसरे कमरे से दोनों की बातें सुन रही थीं. वे बाहर निकल आईं, ‘‘तू ही तो एक सूरमा बचा है काजल के लिए? अरे पोथीपतरे वाले, तेरे मन में यह सब कैसे घुस गया है? दलित अछूत होते हैं, इतना भी नहीं पता?’’

‘‘पता है, लेकिन आप को भी पता होगा कि ये सब दीवारें कब की गिर चुकी हैं. पूरे देश में उदाहरण भरे पड़े हैं कि अच्छेअच्छों व बड़ेबड़ों ने भी इसे स्वीकारा है और दूसरी जाति में शादी कर इसे साबित भी कर दिया है.

‘‘मांजी, वह दिन दूर नहीं जब जातिवाद भूल कर सब आपस में मिल कर एक हो जाएंगे. समाज में बढ़ती गरीबी, बेरोजगारी, दहेज प्रथा के खात्मे के लिए यह जरूरी हो गया है कि 2 परिवार मिलें, शादी करें और एकदूसरे के बोझ को हलका करें. मास्टरजी तो जानते ही होंगे…’’ सुंदर बोला.

‘‘बस, भाषण बंद कर. मुझे तुम से बहस नहीं करनी,’’ मांजी पैर पटकते हुए वहां से चली गईं.

मीनाक्षी ने जोर से ताली बजाई, ‘‘मां को हरा दिया सुंदर, शाबाश. इस बार तू इम्तिहान को भी हरा दे.’’

‘‘ऐसा ही होगा मीनाक्षी, ऐसा ही होगा इस बार,’’ और सुंदर एकदम चुप हो गया.

मिश्राइन ने मिश्राजी को सारी बातें बताईं.

‘‘बोलो, मैं क्या करूं?’’ मिश्राजी ने पूछा.

‘‘करना क्या है… दोनों के पैरों में जल्दी ही बेडि़यां डाल दो.’’

‘‘यह मुमकिन है क्या? मीनाक्षी और सुंदर अभी नाबालिग हैं. सब्र करो. सब्र का फल मीठा होता है.’’

‘‘अगर चिडि़या पिंजरे से फुर्र हो गई तो?’’ मिश्राइन ने सवाल किया.

मिश्राजी कुछ नहीं बोले. वे कमरे में सोने चले गए. मिश्राराइन झुंझला गईं और पैर पटक कर बोलीं, ‘‘ऐसा ही होगा एक दिन. तुम ख्वाब देखते रह जाओगे.’’

इधर काजल का मानना था कि सुंदर क्लास में उस से पीछे है. उसे पता नहीं था कि सुंदर ने भी मैट्रिक का इम्तिहान दिया था और सैकंड क्लास से पास भी हुआ था. बड़ी मुश्किल से मास्टरजी ने उस का दाखिला गांव के निकट के कालेज में करा दिया था और उस ने काजल के नतीजे के बराबर तो नहीं, उस के पास आने की कसम खाई थी.

काजल ने मुख्यमंत्री से 25 हजार रुपए का चैक ले तो लिया, लेकिन सुंदर से आगे रहना उसे गवारा नहीं था इसलिए उस ने कहीं दाखिला नहीं लिया.

खुद डीईओ साहब ने कोशिश की, तो काजल की मां ने कहा, ‘‘मैं अकेली रह लूंगी लेकिन साहब, शहर की कहानियां सुनसुन कर तो मेरा कलेजा मुंह को आ जाता है. वहां गुंडे सरेआम लड़कियों को उठा लेते हैं. 5 साल की बच्ची से भी बलात्कार कर हत्या करने से नहीं हिचकते भेडि़ए. साहब, मेरी फूल सी बेटी इन सब का शिकार होने नहीं जाएगी शहर.’’

‘‘देखिए, माना कि शहर में यह सब होता है लेकिन जरूरी तो नहीं कि काजल के साथ भी हो. उस पर भी कलक्टर की देखरेख रहेगी. ऊपर से मुख्यमंत्री का दबाव पड़ रहा है. दाखिला तो कराना ही होगा.

‘‘रही बात सिक्योरिटी की तो एसपी से कह कर इसे सिक्योरिटी दी जाएगी. वहां रहने को होस्टल है. इस के लिए सबकुछ मुफ्त रहेगा. चाहे तो आप भी साथ में रह सकती हैं. मेरा भी घर बहुत बड़ा है.

‘‘मेरा एकलौता बेटा अंजन कुमार ट्रेनी डीएसपी है. उस की भी निगरानी रहेगी. काजल मेरे पास बेटी बन कर रहेगी. हम भी आप की ही बिरादरी के हैं.’’

‘‘आप का बेटा… कुंआरा है क्या अभी?’’ काजल की मां की उत्सुकता जागी.

‘‘हां, है तो… लेकिन अभी ट्रेनी है.

2 महीने बाद उस की पोस्टिंग कहीं भी डीएसपी की पोस्ट पर हो जाएगी.’’

‘‘तो ऐसा कीजिए न साहब, आप काजल को बेटी बना ही लीजिए.’’

मां का मकसद ट्रेनी डीएसपी से काजल की शादी कराना था.

‘‘देखिए, जमाना एडवांस चल रहा है. आजकल शहरों में पहले दोस्ती, फिर सगाई और फिर… समझ रही हैं न आप. मेरा भी लालच इतना ही है कि ऐसी सुघड़, सुंदर व मेधावी लड़की अपनी बिरादरी में खोजे नहीं मिलेगी.’’

‘‘मां…’’ यह सुन कर काजल चीख उठी, ‘‘कहा न कि मैं दाखिला नहीं लूंगी और न ही शादी ही करूंगी, बस.’’

‘‘मैं कैसे समझूं कि गांव की लड़कियां शहर की लड़कियों से कम होती हैं? सोच लीजिएगा. एक मौका तो दूंगा ही.

‘‘और हां, दाखिला तो लेना ही पड़ेगा. यह सरकारी आदेश है,’’ इतना कह कर वे चले गए.

उस रात काजल ने सपना देखा कि सुंदर की दूसरी जगह शादी हो गई है और वह सुहागरात में उस का नाम ले कर फूटफूट कर रो रहा है.

सपने में ही काजल की चीख निकल गई और नींद टूट गई. मां ने उसे बांहों में भर लिया.

काजल ने फफकते हुए कहा, ‘‘मां, सुंदर ने शादी कर ली है.’’

‘‘पगली, सपने भी कहीं सच होते हैं भला. सो जा. शादी होगी तो तेरा क्या? हम दलित हैं और वे लोग ऊंची जाति के हैं. वे लोग हमें अछूत मानते हैं.’’

इसी तरह 2 महीने बीत गए. डीएसपी अंजन कुमार की पोस्टिंग भी राजकीय महाविद्यालय गेट के पास बने थाने में थाना इंचार्ज के रूप में हुई.

डीएम की चिट्ठी का हवाला देते हुए डीईओ ने डीएसपी अंजन कुमार को लिखा कि नंदीग्राम की एकमात्र छात्रा काजल का दाखिला कल तक करा दिया जाए, क्योंकि उसी के लिए कालेज में सीट रिजर्व रखी गई है. उस के रहने, आनेजाने पर सिक्योरिटी गार्ड की तैनाती का भी आदेश दिया गया.

डीएसपी ने अपने डीईओ पिता से भी काजल की चर्चा सुनी थी, इसलिए वे खुद को रोक नहीं सके और शाम को  तकरीबन 4 बजे फोर्स ले कर नंदीग्राम पहुंच गए.

2 घरों के बाद ही काजल का घर था. अंजन कुमार ने सांकल बजाई. काजल ने दरवाजा खोला. अंजन कुमार समझ गए कि यही काजल है.

‘‘आप की मां कहां हैं?

‘‘पड़ोस में गई हैं. वे अभी आ जाएंगी,’’ इतना कह कर काजल ने एक कुरसी निकाली और अंजन कुमार को बिठा दिया.

अंजन कुमार ने पूछा, ‘‘क्या तुम्हीं काजल हो?’’

काजल ने हां में सिर हिलाया और जेब पर लगी नेमप्लेट से समझ गई कि यही डीईओ साहब के बेटे हैं जिन से उस की शादी की बात उन्होंने मां से छेड़ी थी.

तभी काजल की मां भी आ गईं और हाथ जोड़ कर खड़ी हो गईं.

‘‘देखिए, काजल के दाखिले के लिए राजकीय महाविद्यालय में सीट खाली छोड़ी गई है. डीएम ने डीईओ को और डीईओ ने यह काम थाना इंचार्ज डीएसपी अंजन कुमार यानी मुझे सौंप दिया है.

‘‘कल हम सुबह साढ़े 9 बजे गाड़ी ले कर आएंगे और आप दोनों को महाविद्यालय चलना होगा. इस में आनाकानी की कोई गुंजाइश नहीं है. बस, मैं यही कहने आया था,’’ कह कर वे उठ खड़े हुए.

‘‘अगर मैं दाखिला न लूं तो?’’ काजल ने कहा.

‘‘तो कल मैं वारंट भी साथ ही ले कर आऊंगा. और… आप सोच लेना,’’ डीएसपी अंजन कुमार ने कहा.

डीएसपी अंजन कुमार की छाती को बेधते हुए काजल ने सिर्फ इतना ही कहा, ‘‘थैंक यू सर.’’

डीएसपी अंजन कुमार दिल पर पड़े जख्म को सहलाते हुए अपने थाने लौट गए.

दूसरे दिन काजल का दाखिला हो गया और चल पड़ा नया सैशन. सभी प्रोफैसरों को गाइड किया गया था कि वे काजल पर खास नजर रखें.

काजल भी हर सब्जैक्ट को आसानी से समझ लेती थी. उस ने भी ठान लिया था कि सुंदर मास्टर मिश्राजी की बेटी के साथ मगन है तो वह क्यों उस के नाम की माला जपे? अगर वह दलित है तो ठीक है, कुदरत ने उसे किसी से कम भी नहीं बनाया है.

देखभाल के लिए सिक्योरिटी गार्ड मिलने से काजल को घर से कालेज आनेजाने में कोई डर नहीं था. उस की मां भी खुश थीं.

चूंकि काजल होस्टल में रहती थी, वह भूल गई अपने गांव को. उसे क्या पता था कि उस का पुराना घर तोड़ कर सरकार वहां नई इमारत बना रही है. पूरे गांव का कायाकल्प हो रहा है.

(क्रमश:)

 क्या सुंदर गांव में जा कर काजल से मिल पाया? क्या मिश्राजी सुंदर को अपना दामाद बनाना चाहते थे? पढ़िए अगले अंक में…

यहां पढ़ें

प्रीत किए दुख होए (पहला भाग)

प्रीत किए दुख होए (दूसरा भाग)

आड़ी टेढ़ी राहों पर नहीं मिलता प्यार : भाग 1

आगरा के गांव खुशहालपुर के रहने वाले जगदीश यादव बरहन तहसील में वकालत करते थे. उन की 3 बेटियां नीलम, पूनम और नूतन के अलावा 2 बेटे हैं मानवेंद्र और राघवेंद्र. जगदीश यादव बेटे मानवेंद्र और 2 बेटियों पूनम व नीलम की शादी कर चुके थे. शादी के लिए अब बेटी नूतन और बेटा राघवेंद्र ही बचे थे. दोनों पढ़ाई कर रहे थे. सभी कुछ ठीक चल रहा था कि परिवार में अचानक ऐसा जलजला आया कि सब कुछ खत्म हो गया.

जगदीश यादव की होनहार बेटी नूतन ने टूंडला से इंटरमीडिएट पास करने के बाद आगरा के बैकुंठी देवी कालेज में दाखिला ले लिया. अपने ख्वाबों को अमली जामा पहनाने के लिए उस ने खुद को किताबों की दुनिया में खपा दिया था लेकिन इसी बीच एक दिन रिश्ते के चाचा धनपाल यादव से उस की मुलाकात हो गई. कहा जाता है कि धनपाल और जगदीश यादव के परिवार के बीच बरसों पुरानी रंजिश चली आ रही थी. जब नूतन और धनपाल की मुलाकात हुई तो नूतन को लगा कि यदि बातचीत शुरू की जाए तो दोनों परिवारों के रिश्तों में फिर से मिठास आ सकती है.धनपाल शादीशुदा था.

ये भी पढ़ें- सोशल मीडिया: महिलाएं- झूठ के धंधे का फंदा

अपनी पत्नी और 2 बेटों के साथ वह खुशहालपुर में ही रहता था. नूतन उसे चाचा कहती थी और पढ़ाई के दौरान आने वाली परेशानियों को भी उस से शेयर करती थी. खूबसूरत नूतन स्वभाव से शालीन और कम बात करने वाली लड़की थी. चाचा धनपाल का सहानुभूति वाला व्यवहार उसे अच्छा लगता था और वह धीरेधीरे कथित चाचा के नजदीक आने लगी.

धीरेधीरे जगदीश यादव के घर में भी सब को पता चल गया कि धनपाल नूतन के सहारे सालों से चली आ रही रंजिश को खत्म करना चाहता है. इसलिए नूतन के साथ उस के मेलजोल को नूतन के घर वालों ने ज्यादा गंभीरता से नहीं लिया. नूतन 20 साल की थी और अपना अच्छाबुरा समझ सकती थी.

वहीं दूसरी ओर धनपाल की पत्नी सरोज को धनपाल और नूतन की नजदीकियां रास नहीं आ रही थीं. वह पति से मना करती थी कि वह नूतन से न मिला करे. इस के बजाय वह अपनी दूध की डेरी पर ध्यान दे लेकिन धनपाल ने पत्नी की बात पर ध्यान नहीं दिया. धीरेधीरे वह नूतन की आर्थिक मदद भी करने लगा था. हालांकि नजदीकियों की शुरुआत चाचाभतीजी के रिश्ते से ही हुई थी, पर बाद में यह रिश्ता कोई दूसरा ही रूप लेने लगा.

ये भी पढ़ें- दोस्त दोस्त ना रहा!

नूतन से बढ़ रही नजदीकियों को ले कर धनपाल को पत्नी की खरीखोटी सुननी पड़ती थी, जिस से उस का पत्नी के साथ न सिर्फ झगड़ा होता था बल्कि दोनों के बीच दूरियां भी बढ़ रही थीं. उधर नूतन अपने भविष्य को संवारते हुए एमए की डिग्री लेने के बाद आगरा कालेज से कानून की पढ़ाई करने लगी.

नहीं मानी पत्नी की बात

कथित भतीजी नूतन के ख्वाबों को पूरा करने की धुन में धनपाल उर्फ धन्नू अपने डेरी के व्यवसाय को भी बरबाद कर बैठा. वह हर कदम पर नूतन के साथ था. घर पर पत्नी की कलह से तंग आ कर उस ने अपना आशियाना खेत में बना लिया था. वह नूतन की पढ़ाई का पूरा खर्चा उठा रहा था. नूतन के एलएलबी पास कर लेने पर वह बहुत खुश हुआ. इस के बाद उस ने एलएलएम किया.

एलएलएम करने के बाद नूतन ने कोचिंग करने के लिए दिल्ली के एक कोचिंग सेंटर में दाखिला ले लिया. होस्टल में रह कर वह प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करने लगी. नूतन के दिल्ली जाने के बाद धनपाल का मन नहीं लग रहा था.

उस के पास रिवौल्वर का लाइसैंस था. अपनी दूध डेयरी बंद कर वह दिल्ली में किसी नेता के यहां सुरक्षा गार्ड की नौकरी करने लगा. उस ने यह नौकरी सन 2015 से 2018 तक की. नौकरी के बहाने वह दिल्ली में रहा. दिल्ली में चाचाभतीजी की मुलाकातें जारी रहीं.

आशिकी का यह पागलपन धनपाल को किस ओर ले जा रहा था, यह बात वह समझ नहीं पाया. अपने से 10-12 साल छोटी कथित भतीजी के इश्क में वह एक तरह से अंधा हो चुका था. लेकिन दूसरी ओर इस सब के बावजूद नूतन का पूरा ध्यान अपने लक्ष्य पर था. वह कुछ बनना चाहती थी, जो उसे सफलता की ऊंचाइयों तक ले जाए.

धनपाल ने भी उस से कह दिया था कि चाहे जितना पैसा खर्च हो वह उस की पढ़ाई में हर तरह से मदद करेगा. आखिर नूतन की मेहनत रंग लाई और न्याय विभाग में उस का सहायक अभियोजन अधिकारी के पद पर सेलेक्शन हो गया, जिस की ट्रेनिंग के लिए उसे मुरादाबाद भेजा गया.

ये भी पढ़ें- शर्मनाक: रिमांड होम अय्याशी के अड्डे

नूतन की ऊंचे पद पर नौकरी लगने पर धनपाल खुश था. उसे लगने लगा कि नूतन की पोस्टिंग के बाद वह पढ़ाई आदि से मुक्ति पा लेगी. तब दोनों अपने जीवन को सही दिशा देने के बारे में सोचेंगे. लेकिन यह उस के लिए केवल खयाली पुलाव बन कर रह गया.

नूतन की सोच कुछ अलग थी. अभी तो उसे केवल सहायक अभियोजन अधिकारी का पद मिला था. जबकि उसे बहुत आगे जाना था. खूब लिखपढ़ कर वह जज बनने का सपना देख रही थी. वह इस सच्चाई से अनभिज्ञ थी कि अधिकतर सपने टूटने के लिए ही होते हैं.

ट्रेनिंग के बाद नूतन की बतौर सहायक अभियोजन अधिकारी पहली पोस्टिंग एटा जिले की जलेसर कोर्ट में हुई. नौकरी मिल जाने पर नूतन और उस के परिवार के लोग बहुत खुश थे. कथित चाचा धनपाल भी बहुत खुश था. अब उस के दिल में एक कसक यह रह गई थी कि क्या नूतन समाज के सामने उस का हाथ थामेगी?

धनपाल आशा-निराशा के बीच झूल रहा था. उसे लगता था कि वह नूतन के साथ अपनी दुनिया बसाएगा और उसे सरकारी अधिकारी पत्नी का पति होने का गौरव प्राप्त होगा. पर खुशियां कब किसी की सगी होती हैं, वह तो हवा की तरह उड़ने लगती हैं.

अगले भाग में जानिए क्या हुआ धनपाल और नूतन का…

कहानी सौजन्य- मनोहर कहानियां…

Lockdown 3.0 में Richa Chadha नें बेली डांस कर बनाया फैन्स को दीवाना, देखें Video

Lockdown का तीसरा चरण बीतनें वाला है और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी नें 18 मई तक Lockdown 4.0 के लागू करने का सन्देश दे दिया है ऐसे में  कई मामलों में छूट के बावजूद भी फिल्म इंडस्ट्री को राहत मिलती नहीं नजर आ रही है. ऐसे में घरों में रह रहे एक्टर और ऐक्ट्रेस भी खुद को अलग अलग तरीकों से व्यस्त रखनें की कोशिश कर रहें हैं.

 

View this post on Instagram

 

Dance warm up . . . Today in an interview I got asked why people don’t know that I am a trained kathak dancer, or why I don’t dance in many films…My response to that was I am learning a new art form to satisfy my creative urges… with no goal in mind… One must just learn without expectations… without thinking about how that learning could come in handy in a film, or at a family gathering, or anything for that matter… Who knows ? Looking at a beautiful painting could make me a better actor, reading amazing poetry and literature could make me a better actor, learning how to sing has definitely made me a better actor… it’s nice to do things just for the sake of experience! After all what is life if not a series of experiences? Inspiration can come from anywhere ! #lifelessons #RichaChadha #tribalFusion #dance #bellydance #learning #lockdown #Quarantine #actorslife

A post shared by Richa Chadha (@therichachadha) on

इसी कड़ी में Bolllywood ऐक्ट्रेस ऋचा चड्ढा (Richa Chadha) का एक वीडियो सुर्खियों में है जिसमें वह बेली डांस सीखती नजर आ रहीं हैं. इस वीडियो में वह पूरी तरीके से सामनें से नहीं दिख रहीं हैं बल्कि उनके पीछे की दीवार में लगे सीसे में उनके द्वारा किये जा रहे बेली डांस के स्टेप्स को देखा जा सकता है.

ऋचा चड्ढा (Richa Chadha) ने इन्स्टाग्राम पर शेयर किये वीडियो के कैप्शन में लिखा की “आज इंटरव्यू में मैंने पूछा कि लोगों को ये क्यों नहीं पता कि मैं कथक डांसर भी हूं या क्यों मैंने कई फिल्मों में डांस नहीं किया. उस पर मेरी प्रतिक्रिया थी कि मैं अब एक नई कला सीख रही हूं. (Today in an interview I got asked why people don’t know that I am a trained kathak dancer, or why I don’t dance in many films…My response to that was I am learning a new art form to satisfy my creative urges… ),

 

View this post on Instagram

 

Don’t talk about it, be about it. . . . To all it may concern !

A post shared by Richa Chadha (@therichachadha) on

उन्होंने आगे लिखा की ‘दिमाग में बिना किसी उद्देश्य के, बिना किसी अपेक्षा के सीखना चाहिए. बिना यह सोचे कि फिल्म में वह सीख कैसे काम आ सकती है.. या एक परिवार की सभा में, या कहीं भी जहां ये काम आ सकती है. (with no goal in mind… One must just learn without expectations… without thinking about how that learning could come in handy in a film, or at a family gathering, or anything for that matter…).

ऋचा चड्ढा (Richa Chadha) बौलीवुड की उन ऐक्ट्रेस में शुमार हैं जिन्हें बहुत जल्दी ही फिल्मों से सफलता मिल गई थी. उन्होंने पहली बार साल 2012 में आई फिल्म ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ (Gangs of Wasseypur) से सफलता का स्वाद चखा था. इस फिल्म में ऋचा चड्ढा (Richa Chadha) नें नगमा खातून का किरदार निभाया था जिसे दर्शकों नें काफी पसंद किया था. इसके बाद वह ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर-2’ (Gangs of Wasseypur 2) में भी नज़र आईं. ऋचा नें ‘ओये लक्की-लक्की ओये’ (Oye Lucky Lucky Oye) से बौलीवुड में डेब्यू किया था.

Lockdown के बीच सलमान और जैकलीन का ‘Tere Bina’ सौंग हुआ रिलीज, देखें Video

Lockdown के बीच बौलीवुड (Bollywood) में इन दिनों सन्नाटा छाया हुआ है. फिल्म इंडस्ट्री में सभी तरह के फिल्मों और वीडियो सौंग की शूटिंग बंद है. ऐसे में बौलीवुड (Bollywood) फिल्म इंडस्ट्री के भाईजान यानी सलमान खान (Salman Khan) नें अपने फैंस के लिए एंटरटेनमेंट का एक जबरदस्त तड़का दिया है.

उन्होंने अपने फार्म हाउस में रहते हुए जैकलीन फर्नांडीज (Jacqueline Fernandez) के साथ “तेरे बिना” (Tere Bina) नाम से एक रोमांटिक वीडियो सौंग (Romantic Video Song) रिलीज किया है जो लोगों को काफी पसंद आ रहा हैं. गाने में सलमान खान (Salman Khan) और जैकलीन फर्नांडीज (Jacqueline Fernandez) के केमेस्ट्री को भी खूब पसंद किया जा रहा है.

गाने की पूरी शूटिंग सलमान ने सरकार द्वारा जारी किए गए सभी आवश्यक दिशा-निदेशों को पूरा करते हुए अपने पनवेल वाले फार्म हाउस पर ही पूरी की हैं. पनवेल फार्म पर फिल्माए गए इस गाने को पहले किसी फिल्म के लिए लिखा गया था जो उस फिल्म में फिट नहीं बैठा था. तो सलमान खान (Salman Khan) नें इसे Lockdown के दौरान इसे शूट कर रिलीज करने का प्लान किया. इस गाने को बेहद कम संसाधनों में महज 4 दिन में ही पूरा किया गया है. इस वीडियो सौंग को सलमान खान (Salman Khan)  के औफिसियल यूट्यूब चैनल पर ही रिलीज किया गया है. जिसे चौबीस घंटों के भीतर 10 मिलियन के करीब देखा जा चुका है.

ये भी पढ़ें- Erotic Model पूनम पांडे ने गिरफ्तार होने की खबरों के चलते ये Video किया शेयर

सबसे बड़ी बात है की इस एल्बम के गाने को सलमान खान (Salman Khan) नें खुद ही गाया है और इसका निर्देशन भी उन्होंने ही किया है. गाने की म्यूजिक कम्पोजिंग अजय भाटिया (Ajay Bhatia) नें की है. इसके गीत शब्बीर अहमद (Shabbir Ahmed) द्वारा लिखे गए हैं और संगीत दिया गया आदित्य देव (Aditya Dev) नें. इस गाने में लीड गिटार की जिम्मेदारी रिदमसॉ (Rhythmsaw) द्वारा निभाई गई है. वीडियो एल्बम में एसोसिएट डायरेक्टर की जिम्मेदारी अभिराज मिनावाला (Abhiraj Minawala) नें और संपादन रितेश सोनी (Ritesh Soni) की है. इसके कोरियोग्राफर और डीओपी साजन सिंह (Saajan Singh) और पोस्ट स्टूडियो मंत्र पिक्सेल (Mantra Pixels) हैं. औनलाइन  की जिम्मेदारी देवेंद्र प्रजापति आरके (Devendra Prajapati RK) नें निभाई है.

ये भी पढ़ें- Adah Sharma नें Hot अंदाज में किया वर्कआउट, लेकिन इसके पीछे था मां का हाथ

इस गाने को लेकर सलमान खान नें इंस्टाग्राम (Instagram) और ट्विटर (Twitter) पर पोस्ट कर उसके कैप्शन में लिखा, है “मैंने यह गाना बनाया, गाया, शूट किया और पोस्ट किया आपके लिए, अब आप भी यह गाना सुनो, गाओ और आप के स्वैग में शूट करो घर पे, पोस्ट करो, शेयर करो, टैग करो और इंजॉय करो.. ”

इस गाने को गाने, फिल्माने और रिलीज करनें का विचार सलमान खान को तब आया जब वह अपने परिवार के कुछ सदस्यों व इंडस्ट्री के कुछ करीबी मित्रों के साथ पिछले सात हफ्तों से अपने पनवेल के फार्महाउस में रह रहे थे.

गाने में इस छोटी बच्चे के किरदार को भी किया जा रहा है पसंद

 

View this post on Instagram

 

So proud of you baby Sienna ❤️ Link in bio..

A post shared by Waluscha De Sousa (@waluschaa) on

सलमान खान (Salman Khan) के इस गाने में एक छोटी बच्ची के निभाये रोल को लेकर भी खूब चर्चा हो रही है. लोग सलमान से कमेन्ट कर इस बच्ची के बारे में पूंछ रहें हैं की “यह बच्ची कौन है? और कई लोग इस क्यूट बच्ची की तारीफ भी कर रहे हैं. गाने के अंत में कुछ देर के सीन में बच्ची मुंह पर रंग लगाए दर्शकों को आकर्षित कर रही है. वैसे बच्ची का नाम Sienna है और यह Waluscha De Sousa की छोटी बेटी है जो इस गाने से इंटरनेट पर इस बच्ची की काफी चर्चा में हैं. Waluscha De Sousa नें गाने में अपने बच्ची के सीन का एक फोटो भी अपने इन्स्टाग्राम एकाउंट पर शेयर किया है. बता दें की Waluscha De Sousa भी अपने परिवार के साथ सलमान खान के पनवेल फार्म पर समय बिता रही है.

ये भी पढ़ें- Kartik Aaryan बजा रहे थे गिटार, तभी बज उठी फोन की घंटी और खुल गई पोल, देखें Video

Corona Virus : मैं जिंदा हूं

  • कोरोना और लॉक डाउन की वजह से जिंदा हुआ 3 साल पहले मरा हुआ सख्स..
  • तीन साल पहले मृत सामझ परिजनों ने किया था अंतिम संस्कार..
  • मृत समझकर नाबालिक के नरकंकाल को किया था अंतिम संस्कार..
  • 3 साल बाद आया वापस, उलझा अज्ञात नर कंकाल को जलाने का मामला..

“कोरोना काल में जिंदा हुआ कंकाल, 3 साल पहले हुई थी मौत, बेटा समझकर कंकाल का किया अन्तिमसंस्कार और तेरहवीं, अब लॉक डाउन में लौट आया बेटा तो मचा हड़कंप सब पहुंचे थाने, ये ज़िंदा है तो मरा कौन था..”

छतरपुर: लॉकडाउन होने के चलते तीन साल पहले अपने पुत्र को मृत समझकर अंतिम संस्कार करने के बाद बीते रोज वह अपने परिजनों के घर पहुंचा. जिसेे देख किशोर के माता पिता की खुशी का ठिकाना नहीं रहा जहां इसकी जानकारी पुलिस को दी गई.

ये भी पढ़ें- कोरोना: मध्य प्रदेश मे “भारत- पाक” का बॉर्डर!

कोरोना काल में ‘जिंदा’ हुआ कंकाल..

कोरोना काल में एक तरफ जहां लोगों की मौत हो रही है वहीं दूसरी तरफ बिजावर में एक कंकाल जिंदा हो गया. जहां एक तरफ इस महामारी से लोगों की मौतें हो रहीं हैंतो वहीं दूसरी ओर इस बीमारी और लॉक डाउन की वजह से एक मरा हुआ शख्स जिंदा अपने घर वापस आ गया है. इस ख़बर से लोगों में कौतूहल है तो वहीं पुलिस प्रशासन हैरान परेशान है कि अब क्या करे.

क्या है पूरा मामला..

जिले के प्राकृतिक स्थान मोनासैया के जंगल में 3 साल पहले एक नर कंकाल मिला था कपड़ों की पहचान को लेकर पुलिस ने एक व्यक्ति को सौंप दिया था जिसका पुत्र गायब था और परिजनों ने जनसमूह की उपस्थिति में उस नर कंकाल को अपना पुत्र समझकर अंतिम संस्कार कर दिया था. लेकिन मामले में उस समय नया मोड़ आ गया जब वही नाबालिक जिसको मृत समझकर 3 वर्ष पूर्व अंतिम संस्कार किया गया था.

उक्त युवक दिल्ली से रविवार की रात अपने घर वापस आया. जानकारी के अनुसार शाहगढ थाना क्षेत्र के डिलारी गांव निवासी उदय कुमार आदिवासी पिता भगोला आदिवासी (13) वर्ष गायब हो गया था. जिसमें थाना पुलिस ने फरियादी भगोला की शिकायत पर पुलिस ने धारा 363 का मामला दर्ज किया था और तभी से पूरे मामले की जांच थाना पुलिस द्वारा की जा रही थी और संदेह के आधार पर कई लोगों से पूछताछ भी की गई थी.

ये भी पढ़ें- जब सड़क किनारे ही एक महिला ने दिया बच्चे को जन्म

वहीं इसी दौरान मोनासैया के जंगल में एक नरकंकाल मिलने पर पुलिस ने भगोला को सौंप दिया और उसने अपने पुत्र का नरकंकाल समझकर अंतिम संस्कार और दिन तेरहवीें कर दी थी. इसके बाद बीते दिनों से जारी लॉकडाउन होने से रविवार की रात वही नाबालिक उदय कुमार अपने घर वापस आ गया.

उदय कुमार आदिवासी ने बताया कि वह घर से परेशान होकर 3 वर्ष पूर्व दिल्ली चला गया था. उसके बाद गुडग़ांव में 3 वर्ष से काम करके अपनी गुजर बसर कर रहा था. लेकिन कोरोना वायरस के चलते पिछले 2 माह से काम बंद होने से वह परेशान हो गया था और सभी मजदूरों को प्रशासन की देख-रेख में अपने-अपने गांव वापस भेजने का प्रबंध किया जा रहा था. इसी दौरान उदय कुमार आदिवासी भी रविवार को किसी तरह अपने गांव डिलारी पहुंच गया और परिजनों से जा मिला.

किशोर के पिता भगोला ने बताया कि इसकी सूचना उसने थाना पुलिस को दी और सोमवार को पूरे परिजन और खुद उदय कुमार एस.डी.ओ.पी. कार्यालय बिजावर पहुंचे. जहां जांच पड़ताल के बाद पुलिस ने उदयभान को परिजनों के सुपुर्द कर दिया.

किसके कंकाल का किया गया था अंतिम संस्कार..

3 साल पहले अज्ञात नर कंकाल को उदय कुमार का कंकाल समझ कर परिजनों द्वारा अंतिम संस्कार किया गया था. लेकिन वह किसका था, पुलिस द्वारा इस मामले में जांच करने की बात कह रही है.

थाना प्रभारी छत्रपाल सिंह ने बताया कि जब उदय कुमार वापस लौट आया है तो निश्चित ही वह नर कंकाल किसी अन्य का होगा. इसयकी जांच कराई जाएगी.

इनका कहना है..

SDOP बिजवार सीताराम की मानें तो तीन साल पहले गायब व्यक्ति वापस आया है, जिससे परिजनों में खुशी की लहर है. वहीं जो नर कंकाल वहां पर मिला था इसकी जांच कराई जाएंगी. जांच के बाद भी मामले में स्पष्ट जानकारी हो सकेगी.

ये भी पढ़ें- Lockdown में घटा सिजेरियन डिलीवरी का आंकड़ा

मामला चाहे जो भी हो पर हैरानी इस बात की है कि जो मर चुका था वो जिंदा वापिस आ गया पर जो मरा था आखिर वो कौन था.

अब पुलिस भी हैरान है कि जिस युवक को मरा हुआ समझकर 3 साल पहले कंकाल का अन्तिमसंस्कार कर फाइल बंद कर दी थी. अब वो फिर से खोलनी पड़ेगी. कि आखिर मरा कौन था.

हालांकि ऐसे में पुलिस की कार्यप्रणाली पर बड़े सवाल भी खड़े हो रहे हैं. और अब पुलिस कंकाल मिलने वाले केस की फाईल दोबारा खोलने की तैयारी कर रही है.

कोरोना: छत्तीसगढ़-मध्य प्रदेश मे “भारत-पाक” का बॉर्डर!

कोरोना विषाणु महामारी से दुनिया के 112 देश  त्राहिमाम कर रहे हैं. कोरोना के दंश से आम जनता कितनी पीड़ित है यह  बार-बार  उजागर हो रहा है. इस दरमियान जहां संवेदनशीलता की कई खबरें आ आ रही है वहीं कुछ  घटनाएं झकझोर देने वाली भी हो रही है.  इस दरमियान छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश के बॉर्डर पर एक ऐसी घटना घटी है जो शायद दो देशों के बीच ही घटित हो सकती है.छत्तीसगढ़ मध्य प्रदेश राज्य  कोरोना महामारी के कारण ऐसा व्यवहार कर रहे हैं मानो यह अपने आप में अलग अलग हों. और दूसरे प्रदेश के नागरिकों से उसका कोई सरोकार ना हो. छत्तीसगढ़ सरकार की हठधर्मिता के कारण कहें या अधिकारियों की नासमझी कि एक बुजुर्ग की मौत बॉर्डर पर  इसलिए हो गई क्योंकि अधिकारियों ने उन्हें रोक इलाज के लिए हॉस्पिटल नहीं जाने दिया दिया. जबकि परिजन मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ दोनों ही राज्यों में निवास करते हैं उनके पास विधिवत ई- पास भी था. बुजुर्ग इलाज के अभाव में बॉर्डर पर ही मौत का ग्रास बन गया.

कोरोना का भय!

मध्य प्रदेश में कोरोना  महामारी के कारण हाहाकार मचा हुआ है. मगर छत्तीसगढ़ इससे एक तरह से बहुत कुछ  सुरक्षित  है. आंकड़ों के मुताबिक अभी तक छत्तीसगढ़ में एक भी कोरोना पॉजिटिव की मृत्यु नहीं हुई है.

ये भी पढ़ें- जब सड़क किनारे ही एक महिला ने दिया बच्चे को जन्म

ऐसे में छत्तीसगढ़ का सत्ता प्रतिष्ठान कुछ ज्यादा ही कड़ाई करने पर उतारू हो गया है. छत्तीसगढ़ की सीमाओं को सील कर दिया गया है. परिणाम स्वरूप दूसरे  पड़ोसी प्रदेश के लोग यहां नहीं आ पा रहे उनमें ऐसे लोग भी हैं जो छत्तीसगढ़ के ही रहवासी हैं. मगर नियम कायदों का हवाला देकर रोका जा रहा है परिणाम स्वरूप एक बुजुर्ग केशव मिश्रा  की बॉर्डर पर इलाज के अभाव में मृत्यु हो गई. दरअसल यह घटना

corona-mp

मनेन्द्रगढ़ के समीप घुटरीटोला बैरियर में घटित हुई जहां बुजुर्ग के परिजनों द्वारा  बीमार को इलाज के लिए ड्यूटी पर तैनात अफसरों से छत्तीसगढ़ से मनेंद्रगढ़ स्थित सेंटर हॉस्पिटल जाने की अनुमति मांगी जा रही थी. मगर संवेदनशील कहे जाने वाली भूपेश सरकार के अधिकारी और कारिंदों ने उन्हें घंटों रोक रखा, वे रोते और गिडागिड़ाते रहे जिसकी वीडियो भी वायरल हो चुका हैं.  नतीजा यह हुआ कि 70 वर्षीय बुजुर्ग की बेरियर के निकट एक कार में अचानक  मौत हो गई.

कई प्रदेशों की सीमाएं हैं छत्तीसगढ़ से लगी

वस्तुतः राकेश और उसके भाई निलेश मिश्रा एसईसीएल  कोल इंडिया के कोरबा खदान में कार्यरत हैं. मंगलवार को अपने बीमार पिता केशव मिश्रा 70 वर्ष का उपचार कराने कार के द्वारा दोनों भाई उमरिया, मध्य प्रदेश से बिलासपुर जा रहे थे. इसी बीच रास्ते में बुजुर्ग केशव की तबियत अचानक बिगड़ने लगी.दोनों भाइयों ने सोचा कि पास मनेंद्रगढ़, छत्तीसगढ़  में एसईसीएल का सेंट्रल हॉस्पिटल है जहां उनका उपचार कराया जा सकता है. घुटरी टोला बैरियर में पहुंचने के बाद राकेश और नीलेश ने बैरियर में तैनात पुलिसकर्मियों और अधिकारियों से विनती की उन्हें पिता के उपचार के लिए सेंट्रल हॉस्पिटल तक जाने की परमिशन दे दी जाए. लेकिन लाकडाउन के चलते ड्यूटी में तैनात  अफसरों ने छत्तीसगढ़ का परमिशन न होने का हवाला देकर उन्हें मना कर दिया. दोनों भाई और उनकी बुजुर्ग  माता के रोने-गिड़गिड़ाने का भी इन कर्तव्यनिष्ठ अधिकारियों पर कोई फर्क नहीं पड़ा.

ये भी पढ़ें- Lockdown में घटा सिजेरियन डिलीवरी का आंकड़ा

नतीजा यह हुआ कि बुजुर्ग की हार्टअटैक से कार में ही मौत हो गई.जिसके बाद दोनों भाइयों का रोना बिलखना आरम्भ हो गया.  घटना की जानकारी मिलते ही मदद की और रिश्तेदार भी वहां आ पहुंचे और उन्होंने जमकर हंगामा मचाया. मामले की जानकारी फैलते ही कई अधिकारी भी घुटरी टोला बेरियर पर पहुंच गए मगर मानो उनके भी हाथ बंधे हुए थे . यहां यह बताना लाजमी होगा कि छत्तीसगढ़ एक ऐसा प्रदेश है जिसके साथ मध्य प्रदेश, झारखंड, उड़ीसा ,आंध्र प्रदेश, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र जैसे देशों की सीमाएं सीधे-सीधे लगी हुई है.

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें