छत्तीसगढ़ कोरोना महामारी के समयकाल मे नशीले पदार्थों के स्वर्ग के रूप में बदल गया है. प्रदेश के गली कूचे और शहरों, कस्बों में चारों तरफ नशे का व्यापार खुलेआम चल रहा है. यह भूपेश बघेल की प्रशासनिक दक्षता पर यह एक प्रश्न लगाता है और बताता है कि किस तरह प्रशासन की घोड़े पर भूपेश बघेल की लगाम कितनी कितनी ढीली है. छत्तीसगढ़ में चाहे प्रतिबंधित गुटखा, तंबाकू हो या अवैध शराब सब कुछ धड़ल्ले से बिक रहा है. और यह सब इन दिनों मानो किसी नदी में आई बाढ़ की भांति बौराई हुई स्थिति में है.
आपको आश्चर्य होगा कि नशीले पदार्थों की बिक्री और कालाबाजारी सारी सीमाएं तोड़ चुकी है. 5 रूपये का गुड़ाखू यहां 30 रुपए में बिकता है. 30 रूपये का गुड़ाखू छत्तीसगढ़ के गांव-गांव में 120 रूपये में बेचा जा रहा है. यही हाल विभिन्न कंपनियों के गुटखा आदि का भी हो चुका है. जिससे लोगों को एक तरह से लूटा जा रहा है.सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न तो यह है कि जब सरकार ने इस पर प्रतिबंध लगा दिया है तो यह गली गली में, दुकान दुकान में, अबाध गति से कैसे बेचा जा रहा है?
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दरअसल, जिस चीज पर सरकार की निगाहें इनायत अर्थात सरकार की गाज गिरती है, वह चीज ब्लैक में अवैध रूप से बिकने लगती है और भारी कीमत पर बिकती है और जिसे प्रशासन का पूरा संरक्षण रहता है.
ढीली घोड़े की लगाम
खाद्य पदार्थों के अवैध भंडारण, कालाबाजारी एवं बिक्री करने वालों पर प्रशासन सिर्फ दिखावे की कार्रवाई करता है. राजस्व, पुलिस, खाद्य और नगरीय निकायों के अधिकारी छत्तीसगढ़ के एक शहर मुंगेली के शिवाजी वार्ड में एक किराना स्टोर्स के गोदाम में दबिश देते हैं . दुकान से लगभग 30 लाख रूपये की अवैध रूप से भंडारित 48 बोरी (प्रति बोरी 200 पैकेट) राजश्री, गुटखा तंबाकू गुडाखू आदि जप्त होता है जो बताता है कि किस तरह शहरों में अवैध भंडारण जारी है और बिक्री की जा रही है. यह एक छोटा सा उदाहरण एक जिले की एक दुकान का है इससे आप अनुमान लगा सकते हैं कि छत्तीसगढ़ में हालात कितने गंभीर हो चुके हैं.
मुंगेली कलेक्टर डाॅ. सर्वेश्वर नरेंद्र भुरे ने निर्देश दिया की खाद्य पदार्थों के अवैध भंडारण, कालाबाजारी एवं बिक्री करने वालों के विरूद्ध राजस्व, पुलिस, खाद्य और नगरी निकायों के अधिकारियों द्वारा लगातार कार्रवाई की जाए . मगर अधिकारी भी तू डाल डाल मैं पात पात की तर्ज पर दिखावा कर रहे हैं . कृषि उपज मंडी में संचालित एक किराना स्टोर्स में छापा मारा गया. अधिकारियों ने शेखी बघारते हुए बताया कि यहां अधिक दर पर नमक बिक्री की शिकायत मिली थी. किराना स्टोर्स में अवैध रूप से भंडारित 81 बोरी नमक और मंडी गोदाम में भंडारित 47 बोरी नमक जब्त किया गया. दुकान सील कर दुकान संचालक के खिलाफ आवश्यक वस्तु अधिनियम के तहत सख्त कार्रवाई की गई. मगर लाखों करोड़ों की आबादी में चंद दुकानों तक पहुंचकर अधिकारी वर्ग सिर्फ औपचारिकता ही पूरी कर रहा है जमीनी सच्चाई यह है कि गांव गली मोहल्लों में यह सब अपने उफान पर है. ऐसा प्रतीत होता है कि भूपेश बघेल का अंकुश भोथरा हो चुका है.
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एक नजीर यह भी
अधिकारियों द्वारा एक नमकीन फैक्टरी मे छापेमारी की कार्रवाई की गई. छापेमारी के दौरान फैक्टरी में सिलौनी निर्माण के लिए उनके कर्मचारी द्वारा बिना मास्क लगाये पैर से मैदा को मिलाया जा रहा था और सिलौनी को तला जा रहा था. फैक्टरी में साफ-सफाई का भी अभाव था. सिलौनी के पैकिंग में न ही निर्माण कम्पनी का नाम और न तिथि, वैधता तिथि और न ही दर का उल्लेख किया गया था. इनके विरूद्ध प्रकरण पंजीबद्ध कर वैधानिक कार्रवाई की गयी .
इसी तरह एक अन्य किराना स्टोर्स द्वारा टाटा नमक की खुदरा मूल्य 18 रूपये प्रति पैकेट को 60 रूपये प्रति पैकेट की दर से बेचा जा रहा था. इनके विरूद्ध भी कार्रवाई करते हुए 25 हजार रूपये की जुर्माना लगाया गया . एक एजेसीं द्वारा सोशल डिस्टेसिंग का पालन नहीं करने पर एक हजार रूपये और छापामारी कार्रवाई के दौरान एक पान मसाला के दुकान में अवैध रूप से गुटखा और पान मसाला बिक्री करने पर 20 हजार रूपये की जुर्माना किया गया .
इसके अलावा नाप तौल विभाग द्वारा भी छापेमारी की कार्रवाई जारी है . छापेमारी के दौरान एक ट्रेडर्स द्वारा इलेक्ट्रानिक मशीन का सत्यापित नहीं करने पर उसके विरूद्ध दो हजार रूपये की जुर्माना किया गया. यह सब कार्रवाई बेहद अल्प रूप में हो रही है और अधिकांश जगह तो संबंधों व दबाव के कारण जुर्माना राशि वापिस भी की गई है. यही नहीं यह सत्य भी प्रकट हुआ है कि चंद दिनों में पांच लाख रुपए कमाने वाले पर अगर 20 हजार का जुर्माना लग गया तो वह खुश है. क्योंकि उसने लाखों रुपए तो कमा कर तिजोरी भर ही ली हैं.
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किंग खान (King Khan) यानी शाहरुख खान (Shahrukh Khan) की बेटी सुहाना खान (Suhana Khan) इन दिनों काफी सुर्खियों में रहती हैं. आए दिन सुहाना की फोटोज सोशल मीडिया पर वायरल होती दिखाई देती हैं. इसी बीच सुहाना एक बार फिर अपनी लेटेस्ट फोटोज के चलते चर्चा में आ गई हैं. हाल ही में सुहाना खान (Suhana Khan) ने अपने औफिशियल इंस्टाग्राम अकाउंट (Official Instagram Account) से अपनी कुछ फोटोज शेयर की है जिसमें वे बेहद ही खूबसूरत लग रही हैं.
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सुहाना की मां गौरी खान ने खींची ये फोटोज…
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दरअसल सुहाना खान (Suhana Khan) अपनी इन फोटोज में अपने बंगले ‘मन्नत’ (Mannat) की बालकनी में खड़ी दिखाई दे रही हैं. सुहाना अपनी हर फोटो में एक अलग ही पोज़ दे रही हैं और हर बार की तरह इस बार भी उनकी फोटोज में उनका कौन्फिडेंस (Confidence) साफ दिखाई दे रहा है. सुहाना की ऐसी बेहरतीन फोटोज खींचने का सारा क्रेडिट उनकी मां यानी कि गौरी खान (Gauri Khan) को जाता है.
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कैप्शन में सुहाना ने लिखा ये…
सुहाना ने अपनी इन फोटोज के कैप्शन में लिखा है कि,- “This is so pretty. Reposted from @suhanakhan2 – my mum took these, @gaurikhan – #regrann #suhanakhan”. सुहाना की ये फोटोज देख ये कहना बिल्कुल गलत नहीं होगा कि शाहरुख खान (Shahrukh Khan) और उनका परिवार इस लौकडाउन (Lockdown) में एक दूसरे के साथ काफी एंजौय कर रहा है.
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फोटोज से ही हासिल की इतनी फैन फौलोविंग…
इससे पहले भी सुहाना खान (Suhana Khan) ने अपनी कई बोल्ड फोटोज सोशल मीडिया पर अप्लोड की हुई हैं और अपनी फोटोज से ही सुहाना ने अपनी कमाल की फैन फौलोविंग (Fan Following) हासिल की हुई है. सुहाना के चाहने वालों को उनकी फोटोज काफी अच्छी लगती हैं और उनकी फोटोज पर उनके फैंस जमकर प्यार बरसाते हैं.
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भोजपुरी फिल्मों के चर्चित अभिनेता रितेश पांडे (Ritesh Pandey) पिछले कुछ वर्षों से गायकी में भी धूम मचा रहे हैं. इन दिनों रितेश पांडे और मधु का इंटरनेशनल गाना ‘लचके कमरिया’ ‘यशी फिल्म्स’ के ‘यूट्यूब’ चैनल पर रिलीज होते ही वायरल हो गया. महज 24 घंटे में इस गाने को दो लाख से अधिक लोगों ने देख लिया है. इस गाने की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इस गाने को रितेष पांडे (Ritesh Pandey) और मधु शर्मा (Madhu Sharma) पर दुबई में फिल्माया गया है. दर्शकों को इस गाने में रितेश पांडे और मधु शर्मा की केमेस्ट्री कहर ढाने वाली लग रही है.
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इस गाने की लोकप्रियता से रितेश पांडे काफी उत्साह से भरे हुए हैं.वह कहते हैं- ‘‘हमें इस बात का अंदाजा था कि भोजपुरी के दर्षकों को इस गाने का बेसब्री से इंतजार है, मगर मैने सपने में भी नही सोचा था कि ‘लचके कमरिया’ गाने को लोग इस कदर पसंद करेंगे. वैसे ‘लचके कमरिया’ एक बेहद खूबसूरत गाना है, जिसका फिल्मांकन भी भव्य स्तर पर किया गया है. मैंने जब इस गाने को गाया था, तब पहली बार अंदर से आवाज जरुर आयी थी कि यह गाना लोगों को पसंद आ सकता है. आज लोगों को मेरा यह गाना पसंद आ रहा है, इसके लिए मैं उनका शक्रगुजार हूं. मैं ‘यष फिल्मस’ के अभय सिन्हा का भी धन्यवाद अदा करता हूं कि उन्होंने मुझ पर भरोसा कर इतने बड़े गाने का हिस्सा बनाया.’’
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रितेश पांडे आगे कहते है- ‘‘यह गाना बवाल है. यह अपने आप में एक अनोखा गाना है. इसमें मधु शर्मा के साथ काम करने का अनुभव शानदार रहा. उम्मीद है कि हमारे फैंस, भोजपुरी के दर्षकों और भोजपुरी के फिल्माकारों को हमारी जोड़ी पसंद आ रही होगी.’’
पिछले अंक में आप ने पढ़ा था:
काजल दलित थी और सुंदर ब्राह्मणों का लड़का. दोनों गांव के एक ही स्कूल में पढ़ते थे. छोटे स्कूल की पढ़ाई पूरी होने के बाद सुंदर बड़ी क्लास में पढ़ने के लिए न चाहते हुए भी अपने मामा के यहां चला गया. काजल गांव में ही पढ़ने लगी. वहां मामा सुंदर को पढ़ाने के नाम पर घर के सारे काम कराता था. उस के साथ मारपीट भी करता था. इस बात से सुंदर बहुत दुखी था. उसे काजल और अपने परिवार की बहुत याद आती थी.
अब पढ़िए आगे…
मामा बबलू को आया देख आंसू पोंछ कर सुंदर ने चूल्हे पर पतीली चढ़ाई. देखते ही देखते एक साल बीत गया.
पंडिताइन ने सारे गहने बेच कर पैसा मामा बबलू को भेज दिया, क्योंकि सुंदर को हाकिम बनाने का झांसा जो दिया था. हर महीने फोन आता और डिमांड होती, कभी 2 हजार, कभी 5 हजार की.
एक दिन सुंदर को मौका मिल गया. यों तो मामा खुद जाता था सड़क पर पान खाने, पर पैर में बिवाई निकलने के चलते वह दर्द से चल नहीं पाता था, सो 10 का नोट दे कर सुंदर को ही भेजा. बस फिर क्या था, वह नोट रिकशे वाले को दे कर सुंदर वहां से पहुंच गया बेगुसराय स्टेशन.
एक ट्रेन खगडि़या के लिए चलने वाली थी, सो वह उस में चढ़ गया. पहुंच तो गया वह खगडि़या, लेकिन अब नंदीग्राम कैसे पहुंचे? पैसे नहीं थे, जो आटोरिकशा वाले को देता. चल पड़ा पैदल. रास्ते में एक गांव का तांगा मिला. चढ़ गया उस में. तांगे वाला गांव के चाचा लगते थे, जिन्होंने पैसे नहीं लिए.
सुंदर ज्यों ही घर पहुंचा कि मां की आवाज सुनाई दी, ‘‘कल कहीं से जुगाड़ कर 2 हजार रुपए भेज दो भाई को. बड़ा स्कूल है. एक दिन की देर में बहुत फाइन लग जाता है.’’
तभी सुंदर रो पड़ा और उस ने पुकारा, ‘‘मां.’’
मां दौड़ कर आवाज की ओर भागीं. किवाड़ की आड़ में छिपे सुंदर को सिसकता देख वे पिघल गईं.
‘‘सुंदर, क्या स्कूल में छुट्टी हो गई? तू वहां से अकेला कैसे आया?’’
‘‘अपने भरोसे. और स्कूल? वहां स्कूल ही नहीं है तो छुट्टी कैसी?’’ उस ने पीठ और हाथ दिखाए, जो मामा की मार से फफोले उठ कर चिपक गए थे.
‘‘देखो, देखो अपना सुंदर हाकिम बन कर आ गया,’’ मां इतना कह कर बेहोश हो कर गिर पड़ीं.
पंडितजी जो सोने वाले थे, एकदम उठे और पंडिताइन को पानी के छींटे मारे, तब कहीं वे होश में आईं और दहाड़ कर बोलीं, ‘‘भैया… नहीं छोड़ूंगी तुझे. तू भाई नहीं कसाई है. तू आ तो जरा,’’ और बेटे सुंदर को खिलानेपिलाने लगीं.
‘‘इस का नाम यहीं स्कूल में लिखा दूंगी. नहीं बनाना हाकिम,’’ मां बोलीं.
दूसरे दिन दोनों मांबेटे चले स्कूल, जिस में काजल भी पढ़ती थी. अब वह 10वीं जमात में थी.
‘‘मां, काजल मुझ से पढ़ने में आगे हो गई होगी?’’
‘‘क्यों नहीं? किसी मामा के फेर में पड़ी होगी क्या वह?’’
‘‘मां, मैं उस स्कूल में कभी नहीं जाऊंगा. वहां मुझे शर्म आएगी. काजल ताना कसेगी,’’ रुक कर सुंदर ठुनकने सा लगा.
‘‘मजाल है जो एक शब्द भी निकाले. चल मेरे साथ…’’
‘‘अरे सुंदर,’’ सुंदर को स्कूल में आया देख काजल चहक कर नजदीक आ गई, ‘‘तू तो शहर गया था न?’’
सुंदर ने कोई जवाब नहीं दिया और मां की आड़ में छिप गया.
‘‘चाची, सुंदर अब यहीं पढ़ेगा न?’’ काजल ने पूछा.
‘‘हां… क्यों? स्कूल तेरे बाप का है क्या? जा, अपनी सीट पर बैठ,’’ सुंदर की मां बोलीं.
बेचारी काजल अपना सा मुंह लिए सीट पर जा बैठी. सुंदर का भी दाखिला हो गया, वह भी उसी की क्लास में.
दूसरे दिन सुंदर स्कूल आया तो काजल से दूरी बना कर बैठा. काजल हारी नजरों से कभीकभार उसे देख लेती और अपनी किताब खोल कर उस में सुंदर को भूलने की कोशिश करती. छमाही इम्तिहान हुए. सब को नंबर मिले. जहां काजल सब से अव्वल थी, वहीं सुंदर सब से फिसड्डी.
इस बार पंडितजी चढ़े आए, ‘‘आप पढ़ाते हैं या खेल करते हैं?’’
‘‘क्या हुआ?’’ हैडमास्टर ने पूछा.
‘‘आप जानते हैं न कि सुंदर मेरा
बेटा है?’’
‘‘जी हां, अच्छी तरह.’’
‘‘फिर भी सभी बच्चेबच्चियां इस से बाजी मार गए. कैसे?’’
‘‘क्यों? इम्तिहान क्या आप ने दिया था या सुंदर ने?’’
‘‘मतलब?’’ पंडितजी गरम दिखे.
‘‘यह तो होना ही था. पिछली क्लास के छात्र को आगे की क्लास के इम्तिहान में बिठा दिया जाए तो क्या होगा? यही होगा न?’’
‘‘नहीं, आप तो दलित टीचर हैं, इसलिए. क्या काजल से काबिल
कोई लड़का नहीं है बाबू लोगों के लड़कों में?’’
‘‘मैं तो कहूंगा कि नहीं.’’
‘‘समझ गया. चल सुंदर, नहीं पढ़ना दलितों के स्कूल में,’’ और वे सुंदर को अपने साथ ले गए.
पंडितजी ने सुंदर का दाखिला अपने गांव से 10 किलोमीटर दूर एक मिडिल स्कूल में करा दिया. वहां बाबू लोगों के बच्चे ही पढ़ा करते थे. गांव से एक आटोरिकशा जाता था.
एक दिन सुंदर के अंगरेजी के एक टीचर मिश्राजी की नजर उस पर पड़ी. वे पारखी नजर रखते थे. तुरंत अपनी बेटी मीनाक्षी की जोड़ी मन ही मन बिठा ली.
स्कूल में सुंदर की सीट मीनाक्षी के साथ ही थी. इस से मीनाक्षी को मिलने वाली सारी मदद सुंदर को भी मिलने लगी.
मिश्राजी ने पूछताछ कर के पता कर लिया था कि सुंदर एक ब्राह्मण का लड़का है. इसे पास रख कर बचपन से ही दोनों के बीच प्यार के बीज खिल सकते हैं. उन्होंने पंडित रमाकांत को बुलवाया और अपनी मंशा जाहिर की.
‘‘बाप रे बाप, घर में कुबेर आ जाए, और पूछे कि कितना पैसा चाहिए?’’ कह कर पंडितजी खुश हो कर उन के पैरों की ओर झुके, ‘‘मैं ने तो सिर्फ जन्म दिया है, बाकी सबकुछ तो आप ही देंगे सरकार.’’
‘‘आप ने हीरा पैदा किया है हीरा.’’
‘‘हीरा क्या खाक होगा? इस के सब साथी इस से 2 क्लास ऊपर हैं.’’
‘‘कोई बात नहीं. स्कूल में जो पढ़े सो पढ़े. घर पर मैं इस के साथ मेहनत करूंगा. यह सब के बराबर हो जाएगा. मीनाक्षी भी पढ़ने में तेज है. वह उस की अच्छी मदद करेगी. आप को आगे के लिए कुछ नहीं सोचना है.’’
‘‘ठीक है माईबाप. जब भी आऊंगा तो खाली हाथ नहीं आऊंगा सरकार,’’ कह कर पंडितजी चलते बने.
‘‘सुदर की मां, उसे सही जगह पर दे आया हूं. समझो, देवता मिल गए हैं,’’ घर आते ही पंडितजी ने सारी बात पंडिताइन को सुनाई.
पंडिताइन के चेहरे पर कोई भाव नहीं आया.
‘‘अरी भाग्यवान, तुम किस सपने में खोई हुई हो? कुछ सुना कि नहीं, जो मैं ने कहा?’’
‘‘सुन लिया. यहां काजल थी, वहां मीनाक्षी है. यही तो कह रहे थे तुम? बेटे को जानते हो न? छोटी सी उम्र में ही प्रेम रोग लगा बैठा है?’’
‘‘इसीलिए तो मैं ने वहां दे दिया. जगहंसाई की वजह तो न बनेगा. कम से कम मीनाक्षी तो ऊंची जाति की है.’’
‘‘तो यह कहो न कि सुंदर का सौदा कर दिया है. मैं तो कहती हूं, उस का मन जजमानी में लगाओ. ट्रेनिंग दो. आप के बाद क्या होगा, सोचा है कभी?’’
‘‘तुम दोनों कान की बहरी हो, कुछ नहीं सुनोगी,’’ कहते हुए पंडितजी कंधे पर गमछा डाल कर बाहर निकल गए. काजल ज्योंज्यों बड़ी होने लगी, त्योंत्यों उस के बदन का उभारनिखार भी बढ़ने लगा. इसी के चलते वह सभी लड़कों के ख्वाबों में बस गई थी. सभी उस का साथ पाने को बावले हो गए थे.
काजल ने पढ़ाई में ऐड़ीचोटी का जोर लगा दिया. कभीकभी सुंदर की याद आती तो वह सोचती कि पता नहीं, उस ने फार्म भरा भी है या नहीं. वैसे, एक क्लास तो वह चूक ही गया था.
इधर, सुंदर को टीचर मिश्राजी ने जीजान से पढ़ाना शुरू कर दिया. सुबहशाम उस पर इतना समय लगाया कि वह एक क्लास चूकने के बावजूद फार्म भरने के लायक हो गया.
मिश्राजी ने किसी दूसरे स्कूल से उसे भी मैट्रिक का छात्र बनवा दिया. सुंदर ने भी अपनी ओर से पढ़ाई करने में कोई कमी नहीं छोड़ी. कभीकभी वह मीनाक्षी से काजल की बातें करता तो मीनाक्षी कहती, ‘‘दिखाओ न एक दिन?’’
‘‘नहीं आएगी वह. ग्राम पंचायत का फैसला है कि कोई भी ऊंची जाति का शख्स उस से नहीं मिल सकता,’’ ऐसा कह कर सुंदर उदास हो गया.
‘‘क्यों?’’ मीनाक्षी ने पूछा.
‘‘क्यों, क्या? सारा गांव बाबुओं का है और वह दलित है.’’
‘‘काजल दलित है?’’
‘‘हां, लेकिन उस से क्या? यह कोई छूत की लाइलाज बीमारी तो है नहीं. दिल की बड़ी अच्छी है. देखने में भी सुंदर है,’’ कह कर सुंदर सिसक उठा.
मीनाक्षी ने प्यार से सुंदर की पीठ पर हाथ रखा, ‘‘अच्छा, मैं समझी. तुझे इसी बात का दुख है कि वह तुझ से आगे निकल जाएगी?’’ सुंदर बस हिचकियां भरता रहा.
‘‘फिर भी तू काजल से अच्छे नंबर लाएगा,’’ मीनाक्षी ने उस का हौसला बढ़ाया. सुंदर भी यह सोच कर खिल उठा कि अगर ऐसा हुआ तो काजल की हेकड़ी टूट जाएगी.
मैट्रिक का इम्तिहान हुआ. नतीजा आया तो काजल राज्य में 5वें नंबर पर आई. अखबार में उस के फोटो समेत छपा, ‘गुदड़ी की लाल, जिले में कमाल’.
मुख्यमंत्री ने टौप 10 छात्रा को 25-25 हजार रुपए व कलक्टर ने 10-10 हजार रुपए दे कर सम्मानित करने का ऐलान किया.
समारोह में जिले के डीईओ साहब बतौर मुख्य अतिथि पधारे थे. इन के ही हाथों काजल को कामयाबी की माला पहनानी थी और 10 हजार रुपए का चैक देना था. सो, दोनों मांबेटी को बुलाया गया.
आई तो बस काजल की मां और माइक थाम कर बोल गई, ‘‘अब काहे की काजल? काहे की माला? हुजूर, गांव में 2 ही घर दलितों के हैं. बाकी हैं बाबू लोग. इन लोगों ने अपने बच्चों को काजल से दूर रहने की हिदायद दे रखी है. सभी हिकारत की नजर से देखते हैं. आज उस के लिए ही माला? नहीं आएगी काजल, साहब,’’ उस ने डीईओ साहब को नमस्ते किया और मंच से उतर कर घर चली गई.
मंच पर ही कोलाहल मच गया. कानाफूसी होने लगी कि अब क्या होगा? डीईओ साहब खुद दलित थे. कहीं स्कूल की यूनिट खत्म कर दी तो बच्चे 10 किलोमीटर दूर जा कर पढ़ सकेंगे क्या?
डीईओ साहब खुद काजल के घर आए और पुचकार कर माला पहनाई और चैक दिया. फिर पूछा कि किस कालेज में दाखिला लोगी. जहां वह दाखिला लेना चाहेगी, वहां उस के लिए सीट रिजर्व रहेगी. यह सरकारी इंतजाम है.
‘‘नहीं साहब, मेरी मां अकेली रह जाएंगी. फिर ज्यादा पढ़लिख कर दलितों में शादीब्याह की भी समस्या आती है. पढ़ेलिखे लड़के मिलते ही नहीं. मिलते हैं तो दहेज में मोटी रकम चाहिए. मैं ठहरी गरीब लड़की.’’
‘‘नहीं, ऐसी कोई समस्या नहीं आएगी. तुम्हारे पीछे पूरी सरकार खड़ी है. शादीब्याह की जब बात आएगी तो लड़के भी मिलेंगे और वे भी बिना दहेज के. केवल तुम अपने पढ़ने की रफ्तार कम मत करो,’’ इतना समझा कर वे चले गए.
काजल को तो बस सुंदर की चिंता सता रही थी कि वह मैट्रिक में पास हुआ भी है या नहीं. उस ने तय किया कि अगर सुंदर फेल हो गया होगा तो वह भी आगे दाखिला नहीं लेगी.
काजल का फोटो अखबार में देख सुंदर चहक उठा, ‘‘यही है मेरी काजल. मीनाक्षी, यही है मेरी काजल…’’ और उस का गला भर्रा गया, ‘‘मीनाक्षी, काजल कितनी दूर चली गई? कटी पतंग की तरह बदलों के पार. मुझे मिल पाएगी या नहीं?’’ और गमछे से वह आंसू पोंछने लगा.
‘‘पागल… एक तो तुम कहते हो कि वह दलित है, दूसरे तुम से अव्वल. अब वह तुम्हें देखेगी भी क्या?’’
‘‘नहीं मीनाक्षी, वह मेरी बचपन की दोस्त है. हम ऊंची जाति वाले उसे भूल सकते हैं, पर वह नहीं भूलेगी.’’
तभी मिश्राजी गरजे, ‘‘चुप… जाति का ब्राह्मण हो कर दलित लड़की का नाम रटे बैठा है. तुझ पर मैं दिनरात मेहनत और खर्च कर रहा हूं. मैं अंधा
हूं क्या?
(क्रमश:)
क्या काजल व मीनाक्षी कभी मिल पाईं? सुंदर की जिंदगी में काजल आई या मीनाक्षी? पढ़िए अगले अंक में…
दिन भर काम करने के बाद अगर रात को बगल में लेटा व्यक्ति जोर-जोर से खर्राटे ले रहा हो, तो गुस्सा आना स्वाभाविक है. यों तो खर्राटे लेना किसी को भी पसंद नहीं होता, पर जिस व्यक्ति को खर्राटे आ रहे हैं वह खुद उनसे अनजान होता है. उसे इस बात का जरा भी एहसास नहीं होता कि उसके खर्राटे की वजह से उसके आसपास के लोग परेशान हो रहे हैं. खर्राटे आना कई बार एक बीमारी बन जाती है. इस बीमारी को स्लीप एपनिया भी कहा जाता है.
रात में सोते समय खर्राटे आने की कई वजहें हैं. आइये जानते हैं इसके बारे में-
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गले के पिछले हिस्से का संकरा होना
जब हमारे गले का पिछला हिस्सा संकरा होता जाता है तब खर्राटे की समस्या जन्म लेती है. दरअसल, जब गले का पिछला हिस्सा संकरा हो जाता है तब औक्सीजन उस रास्ते से होकर जाती है और तब आसपास के ऊतक कंपित होने लगते हैं और खर्राटे आने लगते हैं.
सांस के रास्ते में अवरोध
खर्राटे आने की मूल वजह सांस के रास्ते में अवरोध को माना जाता है. जब हमारे शरीर में कार्बनडाइ औक्साइड की मात्रा बढ़ जाती है और औक्सीजन कम हो जाता है तब औक्सीजन की पूर्ति के लिए हम सांस लेने की कोशिश करते हैं और सांस के रास्ते में अवरोध आने की वजह से खर्राटे आते हैं.
पीठ के बल सोना
जो लोग पीठ के बल सोते हैं उन्हें भी यह समस्या हो जाती है. जब पीठ के बल सोते हैं तो हमारी जीभ पीछे की ओर हो जाती है, जिससे वह तालू के पीछे मूर्धा पर जाकर लग जाती है और सांस लेने और छोड़ने में दिक्कत होती है. इस तरह हमारे ऊतक कंपन करने लगते हैं और खर्राटे आने लगते हैं.
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नाक में मांस बढ़ना
कुछ लोगों की नाक की हड्डी जब टेढ़ी हो जाती है या उसमें मांस बढ़ने लगता है तब उन्हें सांस लेने में दिक्कत होती है, जिससे खर्राटे आने लगते हैं.
गर्दन या नीचे वाले जबड़े का छोटा होना
अगर किसी व्यक्ति की गर्दन ज्यादा छोटी है तो यह भी खर्राटे आने की वजह बनता है. इसके अलावा अगर आपका नीचे वाला जबड़ा छोटा है तब भी खर्राटे की समस्या उतपन्न हो जाती है, क्योंकि जब जबड़ा छोटा होता है तो लेटते समय जीभ पीछे की ओर हो जाती है और सांस की नली बंद हो जाती है. जिससे सांस लेने और छोड़ने में दबाव पड़ता है, जिसके चलते कंपन होता और खर्राटे आते हैं.
वजन बढ़ना
खर्राटे आने का एक कारण वजन बढ़ना भी है. जब किसी व्यक्ति का वजन बढ़ता है तो गर्दन का मांस लटकने लगता है. मांस लटकने की वजह से सांस की नली पर दबाव बनता और सांस लेने में दिक्कत होती है.
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ऐसे करें बचाव
अगर आप भी खर्राटे से परेशान हैं तो इस समस्या से ऐसे पाएं छुटकारा
रात के समय कम खाना खाएं ताकि वजन न बढ़े और आप सांस ठीक से ले पाएं.
अगर आपका वजन ज्यादा है तो पहले वजन कम करिए, ताकि आपके खर्राटे बंद हो सकें. वजन कम करने के लिए आप जिम भी जा सकती हैं या अपने डाइटीशियन से सलाह भी ले सकती हैं.
खर्राटे लेने वाले व्यक्ति को अधिक पानी पीना चाहिए, क्योंकि जब हम कम पानी पीते हैं तब हमारी नाक की नली सूख जाती है. ऐसे में साइनस हवा की गति को श्वास तंत्र में पहुंचने के बीच में सहयोग नहीं कर पाता और सांस लेना कठिन हो जाता है. ऐसे में खर्राटे की समस्या बढ़ जाती है.
अगर आपको पीठ के बल सोने की आदत है तो उसे बदलें. इसके अलावा सोते समय सिर को थोड़ा ऊंचा करके सोएं. इससे आपकी जीभ और सांस की नली में रुकावट नहीं आएगी.
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जो लोग धूम्रपान करते हैं उन्हें भी खर्राटे की समस्या हो जाती है. तो अगर आपको भी खर्राटे की समस्या है तो धूम्रपान छोड़ दें.
अगर आपकी नाक का मांस बढ़ रहा है तो डाक्टर से संपर्क करें.
अगर आप गर्भवती हैं तो भी आपको सांस लेने में दिक्कत हो सकती है और खर्राटे आएंगे. इसलिए ऐसे में करवट लेकर ही सोएं.
अब पढ़िए आगे…
नूतन एटा आ गई. पुलिस लाइन परिसर में उस के नाम एक क्वार्टर अलाट हो गया. यह क्वार्टर महिला थाना और दमकल केंद्र से कुछ ही दूरी था. सरकारी क्वार्टर में आने के बाद भी धनपाल ने नूतन का पूरा ध्यान रखा. उस ने घर की जरूरत का सारा सामान उस के क्वार्टर पर पहुंचा दिया. वह भतीजी के साथ क्वार्टर में रह तो नहीं सकता था, लेकिन वहां उस का आनाजाना बना रहा.
नूतन अपनी जिंदगी व्यवस्थित करने के बाद अपने छोटे भाई राघवेंद्र की जिंदगी संवारना चाहती थी. लेकिन धनपाल को नूतन का यह निर्णय बिलकुल पसंद नहीं आया. लेकिन वह यह बात अच्छी तरह समझता था कि कच्चे कमजोर रिश्तों को संभालने में सतर्कता की जरूरत होती है.
कभीकभी धनपाल के सीने में एक अजीब सी कसक उठती थी कि क्या उस का और नूतन का रिश्ता सिरे चढ़ेगा. एक दिन उस ने अपनी यह शंका अपने दोस्त भारत सिंह से जाहिर की तो उस ने कहा कि ऐसा क्यों सोचते हो, जब तुम ने नूतन को इतना सहयोग किया है तो फिर वह क्यों तुम्हें छोड़ेगी?
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दरअसल, धनपाल को नूतन का बढ़ता हुआ कद परेशान कर रहा था. वह उस के सामने खुद को बौना महसूस करने लगा था. इसीलिए उस के मन में इस तरह के विचार आ रहे थे. आखिर उस ने अपनी आशिकी की हिचकोले खाती नाव तूफान के हवाले कर दी और सही समय का इंतजार करने लगा.
बेचैनी थी धनपाल के मन में
नूतन की दिनचर्या व्यवस्थित हो गई थी. वह स्कूटी पर सुबह ड्यूटी पर जाती और शाम को क्वार्टर पर लौटती. अपने पासपड़ोस में रहने वालों से न तो उस की बातचीत थी और न ही उठनाबैठना.
इस बीच नूतन ने धनपाल से कहा कि उसे घर में एक काम वाली बाई की जरूरत है, क्योंकि खाना बनाने में उस का काफी समय खराब होता है. धनपाल ने तुरंत 2700 रुपए प्रतिमाह की सैलरी पर संगीता नाम की महिला का इंतजाम कर दिया. वह नूतन के यहां जा कर रसोई का काम संभालने लगी.
नूतन के अड़ोसपड़ोस में अधिकतर पुलिसकर्मियों के ही क्वार्टर थे. उन पड़ोसियों को बस इतना पता था कि नूतन के साथ उस का छोटा भाई रहता है और जबतब गांव से उस के चाचा आ जाते हैं.
नूतन की नौकरी लग चुकी थी. यहां तक पहुंचतेपहुंचते वह 35 साल की हो गई थी. घर वाले उस की शादी के लिए उपयुक्त लड़का देख रहे थे. घर में अकसर उस की शादी का जिक्र होता था. घर वाले चाहते थे कि उस की शादी किसी अच्छे सरकारी अधिकारी से हो जाए.
शादी की चर्चा सुन कर नूतन को झटका सा लगा, क्योंकि धनपाल के रहते उस ने कभी अपने अलग अस्तित्व के बारे में सोचा ही नहीं था. इसी बीच किसी मध्यस्थ के जरिए नूतन के लिए अलीगढ़ में पोस्टेड वाणिज्य कर अधिकारी राम सिंह (बदला हुआ नाम) का रिश्ता आया. नूतन के परिवार वाले खुश भी थे और इस रिश्ते के पक्ष में भी. लेकिन नूतन की समझ में कुछ नहीं आ रहा था कि वह क्या करे.
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कुछ नहीं सूझा तो नूतन ने घर वालों से कहा कि वे लोग जिस लड़के से उस की शादी करना चाहते हैं, पहले वह उस के बारे में जानना चाहती है. तब घर वालों ने नूतन का फोन नंबर बिचौलिया के माध्यम से उस लड़के तक पहुंचवा दिया.
फिर एक दिन राम सिंह का फोन आया दोनों ने आपस में बात की, एकदूसरे के फोटो देखे. अचानक नूतन को लगा कि बरसों की कठिन मेहनत के बाद उस ने जो पद हासिल किया है, उस के चलते धनपाल के लिए उस की जिंदगी में अब कोई जगह होनी नहीं चाहिए. जीवनसाथी के रूप में बराबरी के दरजे वाले व्यक्ति का होना ही दांपत्य जीवन को सफल बना सकता है.
उस ने महसूस किया कि अब तक जो कुछ उस के जीवन में चल रहा था, वह केवल एक खेल था. लेकिन इस खेल के सहारे जीवन तो कट नहीं सकता. इस उम्र में उस के लिए यदि रिश्ता आया है तो उस का स्वागत करना चाहिए.
इस के बाद राम सिंह और नूतन के बीच फोन पर अकसर बातचीत होने लगी. वाणिज्य कर अधिकारी राम सिंह को भी नूतन जैसी जीवनसाथी की ही जरूरत थी, अत: नूतन ने एक दिन घर वालों के सामने भी इस रिश्ते के लिए हामी भर ली.
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एक दिन धनपाल जब नूतन के आवास पर उस से मिलने आया तो नूतन ने कहा, ‘‘बिना सोचेसमझे मुंह उठाए चले आते हो. जानते हो, अगर आसपास रहने वाले लोगों को शक हो गया तो मेरी कितनी बदनामी होगी?’’
धनपाल को नूतन की यह बात चुभ गई, वह बोला, ‘‘यह क्या कह रही हो, तुम मेरी हो और मैं तुम्हारा, फिर इस में दूसरों की फिक्र का क्या मतलब?’’
‘‘हूं, यह तो है,’’ नूतन ने टालने की गरज से कहा पर धनपाल को लगा कि नूतन के मन में कुछ है, जो वह जाहिर नहीं कर रही है.
कहानी सौजन्य– मनोहर कहानियां
नंदीग्राम खगडि़या जिले का एक कसबा था, जो वहां से महज 10 किलोमीटर ही दूर था. कहलाता तो वह दलित बस्ती इलाका था, लेकिन वहां के सारे दलित ब्राह्मणों को ‘बाबू लोग’ पुकारते थे. इक्कादुक्का घर राजपूतों के भी थे.
आबादी में ज्यादा होने के बावजूद वहां के दलितों को ‘बाबू लोगों’ ने हड़प नीति का इस्तेमाल कर सब की जरजमीन छीन कर गांव छोड़ने पर मजबूर कर दिया था. वहां 2 घर बचे थे, जो भूमिहीन व गरीब थे. वे लोग किसी के सहारे पलते थे. इन्हीं 2 घरों में से एक घर में जैसे कीचड़ में कमल खिल गया था.
झुग्गीझोंपड़ी योजना के तहत वहां पुराना स्कूल था, जिस में ज्यादातर ‘बाबू लोगों’ के बच्चे ही पढ़ा करते थे. दलितों के लड़के रहे ही कहां, जो स्कूल में दिखते. बस, एकमात्र काजल थी, जो दलित तबके से आती थी.
हालांकि सभी लड़के काजल से अलग बैठते थे, लेकिन एक ब्राह्मण छात्र सुंदर था, जो उस के एकाकीपन का साथी बन गया था, इसलिए सुंदर से भी सब चिढ़ते थे. एक ब्राह्मण का लड़का दलित लड़की से नजदीकियां बनाए, यह किसी को गवारा न था.
काजल दलित जरूर थी, लेकिन खूबसूरती में बेजोड़ सुंदर. उस की इसी खूबसूरती का मुरीद था सुंदर.
स्कूल से विदाई का दिन आ गया. अब यहां से निकल कर छात्रों को मध्य विद्यालय में दाखिला लेना था. काजल अच्छे नंबरों से पास हुई थी. ‘‘काजल, आगे कहां पढ़ोगी? बाबा तो मुझे शहर भेजने पर तुले हैं… खगडि़या,’’ सुंदर ने कहा.
‘‘मैं…? मैं कैसे जा सकती हूं शहर? मेरी मां अकेली हैं. वैसे, गांव से बाहर एक किलोमीटर दूर है मध्य विद्यालय. मैं वहीं दाखिला लूंगी और रोज आनाजाना करूंगी.’’ ‘‘सोचा तो मैं ने भी यही था, लेकिन बाबा का सपना है मुझे हाकिम बनाने का.
‘‘चल न तू भी शहर? मैं मनाऊंगा चाची को…’’ सुंदर ने कहा, ‘‘मेरा वहां अकेले मन नहीं लगेगा.’’
‘‘तो मैं क्या करूं? हो सकता है कि मेरी पढ़ाई भी छूट जाए. मैं गरीब भी हूं और मां मुझे बेहद प्यार करती हैं. वे मुझे दूर नहीं जाने देंगी,’’ काजल ने भोलेपन से कहा.
‘‘तो मेरी भी पढ़ाई छूट जाएगी…’’ सुंदर बोला, ‘‘मैं मर जाऊं तभी तेरा साथ छूटेगा.’’
‘‘मरे तेरे दुश्मन. मैं तो लड़की हूं… चूल्हाचक्की के लिए पढ़ाई करना जरूरी नहीं है. लेकिन तुम्हें तो पढ़ाई करनी ही पड़ेगी. हाकिम न बन सके तो शादी न होगी. बच्चे होंगे तो उन को भूखा मारोगे क्या? कमाई तो करनी ही पड़ेगी…’’ काजल ने कहा, ‘‘कहीं बाबागीरी न करनी पड़ जाए…’’
‘‘अरी मेरी दादी…’’ कहते हुए सुंदर ने उस के कान उमेठ दिए, ‘‘तू मुझे मेरी जन्मपत्री बता रही है क्या? आखिर मेरे बाबा की पूजापाठ, कथावाचन और शादीश्राद्ध की रोजरोज की आमदनी कहां जाएगी?’’
‘‘उई बाबा…’’ कह कर काजल वहां से भाग गई.
सुंदर वहां ठगा सा खड़ा रह गया. स्कूल के और भी बच्चे थे. एक तगड़ा लड़का भी था, जो सरपंच का बेटा था. वह सुंदर से जलता था.
‘‘वह उड़नपरी है, उड़नपरी. वह किसी की नहीं होती. उस पर भी वह दलित है. कानून जानता है क्या? अंदर हो जाओगे और बाबाजी की जन्मपत्री, लगनपत्री, मरणपत्री सब की सब छिन जाएगी,’’ उस लड़के ने सुंदर की हंसी उड़ाई.
‘‘चल भाग यहां से. अपना चेहरा देख. काजल तो क्या, कोई काली भैंस भी तुझे घास नहीं डालेगी,’’ सुंदर ने जवाब दिया.
‘‘अच्छा, तो तुझे अपने चेहरे पर घमंड है?’’
शुरू हो गई दोनों में उठापटक. तगड़े लड़के ने सचमुच सुंदर का चेहरा भद्दा कर दिया. काजल को मालूम हुआ, तो दौड़ कर देखने आई और हिम्मत देने के बजाय हंसी उड़ा दी, ‘‘वाह, नाम सुंदर, मुंह छछूंदर?’’ सुंदर ने गुस्से में दौड़ कर उसे पकड़ा और कहा, ‘‘काजल, तुम भी.. ठीक है, अब मैं शहर जाऊंगा और तुझे एकदम भूल जाऊंगा.
‘‘देखना, मैं हाकिम बन कर ही आऊंगा,’’ दुखी हो कर सुंदर अपने घर की ओर चल दिया. यह सुन कर काजल भी रो पड़ी, ‘‘ऐसा मत करना सुंदर. एक तेरा ही तो सहारा है मुझे.’’
लेकिन, सुंदर ने उस का कहा नहीं सुना और अपने घर चला गया. पंडित रमाकांत को जब सब मालूम हो गया, तो उन्होंने भी सुंदर को खूब पीटा, ‘‘एक तो दलित लड़की है, दूसरे तुम ब्राह्मण. क्या होगा बिरादरी में मेरा? कम से कम मुझ पर तो रहम कर. आखिर उम्र ही क्या है तेरी? ठहर, तेरे मामा को फोन करता हूं. वह तुझे ले जाएगा और मारमार कर हाकिम बनाएगा.’’
सुंदर को भी उस मामा के बारे में मालूम था कि वे काफी बेरहम हैं. उन की अब तक 2 बीवियां भाग चुकी हैं.
‘‘नहीं बाबा, नहीं. मुझे कहीं और भेज दो, पर मैं वहां नहीं जाऊंगा,’’ कह कर सुंदर रो पड़ा.
‘‘अरे, चुप हो जा. मैं समझ गया सबकुछ. अच्छा है… जब 2-4 थप्पड़ रोज पड़ेंगे न, तो भाग जाएगा काजल के इश्क का भूत,’’ उन्होंने सचमुच ही उसी रात फोन कर के अगले दिन उस के मामा को बुलवा लिया.
‘‘तुम बेफिक्र रहो. इसे मैं अच्छे स्कूल में पढ़ाऊंगा और खुद निगरानी करूंगा,’’ मामा ने सुंदर की मां से कहा.
‘‘देखना भैया, बच्चा कोमल है. मारना मत. और हां, पंडितजी की इसे हाकिम बनाने की इच्छा है,’’ मां ने हाथ जोड़ कर कहा.
‘‘बनेगाबनेगा हाकिम, कैसे नहीं बनेगा. सुनी नहीं है वह कहावत कि मारमार कर हाकिम बनाना,’’ इतना कह कर मामा खुद रिकशा लेने चले गए और तुरंत ही रिकशा ले कर आ भी गए.
सामान रिकशे में रखा और मामाभांजे दोनों चल पड़े खगडि़या स्टेशन. रास्ते में ही काजल का घर था. ‘काजल माफ करना. तेरा दिल दुखा कर मैं ने अच्छा नहीं किया. तुझे कभी नहीं भूलूंगा काजल,’ इतना सोचते ही सुंदर रो पड़ा.
‘‘चुप हो जा… नई दुलहन की तरह रो रहा है… पड़ेगा एक थप्पड़,’’ मामा ने लताड़ा.
सुंदर एकदम चुप. मामा ऐसे मूंछें ऐंठ रहे थे, जैसे सीताहरण के दौरान रावण ने सीता के रोने पर तेज हंसी के साथ मूंछें ऐंठी थीं. गाड़ी मिली, चली और उतर गए बेगुसराय. फिर वहां से 10 किलोमीटर सवारी गाड़ी से और 5 किलोमीटर आगे मैदान बौराही, जहां न तो कोई स्कूल था, न ही कालेज.
काजल को जैसे ही पता चला कि सुंदर वाकई शहर चला गया है तो वह भी रो पड़ी और दौड़ कर मां का आंचल खींच कर ठुनकने लगी, ‘‘सुंदर शहर चला गया मां. मैं भी शहर में पढ़ूंगी.’’
‘‘अरी बावली, वे बाबू लोग हैं और तुम ठहरी दलित. फिर शहर जाने के लिए पैसे कहां हैं बेटी?’’ मां ने काजल को बड़े ही प्यार से समझाया.
‘‘मां, अब सुंदर पढ़लिख कर कब आएगा? मैं ने उस की हंसी उड़ाई थी. शायद वह मुझ से रूठ कर चला गया है,’’ काजल की आंखों से टपकते आंसू उस के कोमल गालों पर लकीर बनाने लगे.
‘‘बेटी, अगर तुम उस से लगाव रखती हो तो तुझे आंसू नहीं बहाने चाहिए. हंस कर दुआ करनी चाहिए कि वह पढ़लिख कर हाकिम बन कर ही तुझ से मिले,’’ मां ने आंचल से उस के आंसू पोंछते हुए कहा, ‘‘क्या मालूम, कल वह हाकिम बन कर अंगरेजी में बातें करेगा. समझोगी तुम?
‘‘अच्छा है कि तुम इस गांव में ही मन लगा कर पढ़ो. हाकिम तो गांव में भी पढ़ कर हुए हैं लोग. हमारे पहले राष्ट्रपति राजेंद्र बाबू, प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री और दूसरे कई शख्स हैं, जिन्होंने गांव में ही पढ़ाई की थी. कल चलना, हैडमास्टर सर से कह कर स्कूल में दाखिला करा दूंगी.’’
काजल समझ गई और चहकते हुएबोली, ‘‘हां मां, मैं उसे दिखा दूंगी कि बड़ा बनने के लिए शहर में ही नहीं, बल्कि गांव में भी पढ़ाई की जा सकती है. शहर या वहां के स्कूल नहीं पढ़ते, पढ़ते हैं छात्र, जो गांव में भी होते हैं.’’
‘‘मेरी अच्छी बेटी,’’ इतना कह कर मां ने उस का मुंह चूम लिया.
दूसरे दिन ही मां ने काजल का दाखिला गांव के ही मिडिल स्कूल में करा दिया. उसे यह सुन कर और भी खुशी हुई कि मुफ्त में ड्रैस, किताबें और कौपियां मिलेंगी.
‘‘साइकिल भी दूंगा… अगर मन से पढ़ेगी तो… साइकिल चलाना आता है न तुझे?’’ हैडमास्टर सर ने पूछा.
‘‘साइकिल भी चलाना सीख लूंगी,’’ काजल ने पूछा.
‘‘गुड गर्ल… कल से तुम स्कूल आना शुरू कर दो.’’
‘‘जी सर,’’ इतना कह कर काजल अपनी मां के साथ घर चली आई.
इधर सुंदर को मामा के घर गए महीनों बीत गए. सुंदर की मां ने फोन किया तो सुंदर के मामा बबलू ने कहा, ‘‘हांहां, खूब मन लगा कर पढ़ रहा है वह. बगैर हाकिम बनाए इसे छोड़ूंगा क्या? पटना से ले कर दिल्ली तक के नेताओं का झोला टांगा है, अटैची ढोई है. वह सब कब काम आएगा?’’
सुंदर चूल्हा फूंक रहा था. दौड़ादौड़ा वह वहां आया और बोला, ‘‘मामा, मां से मेरी भी बात करा दो. कई दिन पहले उन्हें मैं ने अपने सपने में देखा था.’’
‘‘जब देख ही लिया था तो बातें क्यों न कर लीं? चल भाग. ऐसा जोर का घूंसा दूंगा कि तेरी बत्तीसी बाहर निकल जाएगी,’’ मामा बबलू बिगड़ गए. सुंदर रो पड़ा और रोतेरोते ही फिर चूल्हा फूंकने लगा.
बाहर बंगले पर बबलू गए, तो सुंदर ने दौड़ कर फोन का चोगा उठा लिया. अब लगाए तो कौन नंबर? घर में तो फोन है नहीं. मां हाट आई होंगी और एसटीडी से बातें की होंगी. वह ठगा सा चोगा रख कर रो पड़ा, ‘मुझे कहां फंसा दिया बाबा? यहां जब कोई स्कूल ही नहीं है, तो पढ़ूंगा क्या खाक?
‘दिनरात मामा की तीमारदारी करनी पड़ती है. घर से लाई किताबें भी खोलने नहीं देते. यह मामा नहीं कंस है, कंस…
‘मैं ने काजल को भी धोखा दिया है. यह सब मुझे उसी की सजा मिल रही है. बाबा, अपने बच्चे की खुशी क्यों नहीं देखी गई आप से?’ सोच कर सुंदर और भी उदास हो गया.
(क्रमश:)
भाग- 3
दोनों के बीच बनने लगीं दूरियां
उस दिन के बाद नूतन ने धनपाल से दूरी बनानी शुरू कर दी. उस ने उस का फोन भी उठाना बंद कर दिया. वह क्वार्टर पर आ कर शिकायत करता तो नूतन कह देती कि फोन साइलेंट पर था. बड़ेबड़े सपने देखने वाली नूतन को अब तनख्वाह मिलने लगी तो उसे धनपाल से आर्थिक मदद की भी जरूरत नहीं रही. वह अपनी बचकानी गलती को भूल जाना चाहती थी पर धनपाल के साथ ऐसा नहीं था.
इधर नूतन के मांबाप जल्दी ही उस की सगाई करना चाहते थे. लेकिन आने वाले वक्त को कब कोई देख पाया है. नूतन यादव ने तो कभी सोचा भी नहीं था कि उस ने बरसों मेहनत कर के सफलता पाई है. उस का क्या अंजाम होने वाला है. वह मौत की उस दस्तक को नहीं सुन पाई जो उस की खुशियों पर विराम लगाने वाली थी. 5 अगस्त, 2019 का दिन उस के जीवन में तूफान लाने वाला था, जिस से वह बेखबर थी.
6 अगस्त, 2019 को सुबह जब नौकरानी संगीता काम करने आई तो कई बार दरवाजा खटखटाने के बाद भी नहीं खुला. तभी उस ने महसूस किया कि दरवाजा अंदर से बंद नहीं है. संगीता ने धक्का दिया तो दरवाजा खुल गया. अंदर जा कर उस ने जो कुछ देखा, सन्न रह गई. लोहे के पलंग पर नूतन औंधे मुंह पड़ी हुई थी और बिस्तर खून से लाल था.
यह देखते ही नौकरानी भागती हुई बाहर आई और सीधे एटा कोतवाली का रुख किया. वहां पहुंच कर उस ने सारी बात कोतवाल अशोक कुमार सिंह को बता दी. कत्ल की बात सुन कर कोतवाल मय फोर्स के मौके पर पहुंचे. उन्होंने अपने उच्चाधिकारियों को भी इस घटना की सूचना दे दी.
सूचना मिलते ही मौके पर एसएसपी स्वप्निल ममगई, एएसपी संजय कुमार, एसपी (क्राइम) राहुल कुमार घटनास्थल पर पहुंच गए. फोरैंसिक टीम और डौग स्क्वायड टीम भी मौके पर पहुंच गई.
पुलिस ने लाश का निरीक्षण किया तो पता चला कि एपीओ नूतन यादव को बड़ी बेरहमी से मारा गया था. मौके पर पुलिस को 5 खोखे मिले. मृतका का चेहरा और शरीर क्षतविक्षत था. पुलिस को मृतका का मोबाइल भी वहीं पड़ा मिल गया.
आसपास पूछताछ करने पर लोगों ने बताया कि संभवत: गोली चलने की आवाज कूलरों की आवाज में दब गई होगी. इसलिए किसी को भी घटना का पता नहीं चल पाया.
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घटनास्थल का निरीक्षण करने के बाद पुलिस को लगा कि हत्यारा नूतन को मारने के इरादे से ही आया था. क्योंकि क्वार्टर का सारा सामान ज्यों का त्यों था. ऐसा लग रहा था कि कोई परिचित रहा होगा, जिस ने बिना किसी विरोध के घर में पहुंचने के बाद नूतन की हत्या की और वहां से चला गया.
घटना की सूचना मिलने पर देर रात मृतका के परिजन भी वहां पहुंच गए. उन्होंने वहां पहुंचते ही चीखचीख कर धनपाल पर अपना शक जताते हुए बताया कि धनपाल इस बात से नाराज था कि नूतन शादी करने वाली थी.
परिजनों की बातचीत से स्पष्ट हो रहा था कि मृतका और धनपाल के बीच नजदीकी संबंध थे. इसीलिए धनपाल शादी का विरोध कर रहा होगा और न मानने पर उस ने नूतन की हत्या कर दी होगी. घर वालों ने धनपाल के अलावा उस के दोस्त भारत सिंह पर भी अपना शक जताया.
पुलिस भारत सिंह और धनपाल की तलाश में लग गई. अगले दिन पोस्टमार्टम रिपोर्ट आई तो पता चला कि हत्यारे ने नूतन की हत्या बड़े ही नृशंस तरीके से की थी. उस ने मृतका के मुंह में रिवौल्वर की नाल घुसेड़ कर 3 गोलियां चलाईं और 2 शरीर के अन्य हिस्सों में मारीं.
पुलिस ने भारत सिंह और धनपाल के मोबाइल फोन सर्विलांस पर लगा दिए. नूतन के फोन की भी काल डिटेल्स खंगाली गई तो पता चला कि घटना वाली रात को भी एक फोन काल देर तक आती रही थी. जांच में पता चला कि नूतन उस नंबर पर घंटों बातें करती थी. जांच में वह नंबर अलीगढ़ के वाणिज्य कर अधिकारी राम सिंह का निकला.
अभियुक्तों की गिरफ्तारी के लिए पुलिस ने उन के घर दबिश डाली लेकिन वे नहीं मिले तो पुलिस ने पूछताछ के लिए धनपाल की पत्नी सरोज और श्यामवीर व उस के साले के बेटे को हिरासत में ले लिया. थाने ला कर उन से पूछताछ की गई तो उन से अभियुक्तों के बारे में जानकारी नहीं मिली. इस के बाद उन्हें छोड़ दिया गया.
पकड़ा गया धनपाल
10 अगस्त को पुलिस ने मुखबिर की सूचना पर माया पैलेस चौराहे से भारत सिंह को हिरासत में ले लिया. उस से पूछताछ में धनपाल और नूतन के संबंधों की बात खुल कर सामने आई. भारत सिंह ने बताया कि नूतन के कत्ल में उस का कोई हाथ नहीं है. धनपाल की गिरफ्तारी के लिए पुलिस ने उस के सभी ठिकानों पर छापे मारे. यहां तक कि दिल्ली तक में उस की तलाश की गई.
आखिर 12 अगस्त को पुलिस ने धनपाल को गांव बरौठा, थाना हरदुआगंज, अलीगढ़ में उस के रिश्तेदार के घर से दबोच लिया. थाने में उस से पूछताछ की गई.
धनपाल के चेहरे पर अपनी प्रेयसी की हत्या का जरा सा भी दुख नहीं था. पुलिस के सामने उस ने अपना गुनाह कबूल कर लिया और कहा कि नूतन की बेवफाई ही उस की मौत का कारण बनी. जिस नूतन के लिए उस ने अपना घर, बीवीबच्चे सब उस के कहने पर छोड़ दिए थे, उस की पढ़ाई पूरी करने के लिए उस ने अपनी दूध की डेयरी तक खपा दी. उस पर लाखों रुपए का कर्ज चढ़ गया, लेकिन नौकरी मिलते ही वह बदल गई.
धनपाल ने बताया कि जब वह बीए कर रही थी तभी एक दिन आगरा के एक होटल के कमरे में उस ने नूतन की मांग भर कर उसे अपना बना लिया था. नूतन के कहने पर उस ने पत्नी और बच्चों को छोड़ दिया. वह उसे बेइंतहा प्यार करता था. पर वह पिछले 4 महीने से अचानक बदलने लगी थी. उस का फोन तक रिसीव नहीं करती थी. जिसे दिलोजान से चाहा, उसी की उपेक्षा ने उसे हत्यारा बना दिया.
नूतन ने 15 साल की मोहब्बत को एक पल में अपने पैरों तले रौंद दिया था. वह तो उस के प्यार में अपनी दुनिया लुटा चुका था, पर अपनी आशिकी को भुलाना उस के लिए मुश्किल था.
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उस ने कबूला कि घटना वाले दिन उस ने भारत सिंह के जरिए पता लगा लिया था कि नूतन उस रोज छुट्टी पर है और उस के साथ रहने वाला उस का भाई राघवेंद्र भी अपने गांव गया हुआ है. बस फिर क्या था, अपनी लाइसैंसी रिवौल्वर में गोलियां भर कर वह नूतन के क्वार्टर पर पहुंच गया. उस ने तय कर लिया था कि वह आरपार की बात करेगा. या तो नूतन उस की होगी या फिर वह किसी की भी नहीं.
धनपाल ने बताया, ‘‘नूतन ने मेरे साथ हमेशा रहने का वादा किया था. लेकिन नौकरी मिलने पर उसे समझ आया कि मैं उस के स्तर का नहीं हूं. मेरे प्यार की उपेक्षा कर के वह जीने का अधिकार खो बैठी थी. मैं ने नूतन को मार डाला.
‘‘नूतन ने उस रात मुझ से कहा था कि उस से दूर ही रहूं तो अच्छा, वरना वह पुलिस से मुझे पिटवाएगी. उस ने मेरे इश्क का इतना अपमान किया, जिसे मैं बरदाश्त नहीं कर सका, इसलिए मैं ने उस की जबान ही बंद कर दी. उस के मर जाने का मुझे कोई अफसोस नहीं है.’’
धनपाल ने हत्या में इस्तेमाल की गई रिवौल्वर पुलिस को वहीं परिसर में खड़ी एक पुरानी गाड़ी में से बरामद करा दी. पुलिस ने भारत सिंह और धनपाल से पूछताछ की. उन्हें भादंवि की धारा 302, 120बी के तहत गिरफ्तार कर कोर्ट में पेश कर जेल भेज दिया गया.
इस तरह कई साल तक चली एक प्रेम कहानी का दुखद अंत हुआ. कथा लिखने तक दोनों अभियुक्त जेल में थे. मामले की जांच कोतवाल अशोक कुमार सिंह कर रहे थे.
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