बच्चियों को शिकार होने से बचाइये

10 साल की सोनी रोज की तरह तैयार हो कर स्कूल पहुंची. उस की क्लास के मौनीटर ने उस से कहा कि उस के हाथ का नाखून काफी बढ़ा हुआ है, इसलिए डायरैक्टर साहब ने उसे अपने चैंबर में बुलाया है. सोनी के साथ उस की एक सहेली भी डायरैक्टर के चैंबर में पहुंची. डायरैक्टर ने सोनी की सहेली को क्लास में भेज दिया और उस के साथ जबरन अपना मुंह काला किया. स्कूल की छुट्टी होने पर सोनी को स्कूल की गाड़ी से उस के घर पहुंचा दिया गया. सोनी की मां को बताया गया कि वह स्कूल में बेहोश हो गई थी.

जब सोनी को होश आया, तो उस ने अपनी मां को सारी बातें बताईं. इस के बाद सोनी के परिवार वाले और आसपास के लोग स्कूल पहुंच गए और जम कर तोड़फोड़ की. डायरैक्टर को गिरफ्तार करने की मांग को ले कर सड़क जाम कर दी गई.

पटना के पुराने इलाके पटना सिटी के पटना सिटी सैंट्रल स्कूल, दर्शन विहार के डायरैक्टर पवन कुमार दर्शन की इस घिनौनी करतूत ने जहां एक ओर टीचर और स्टूडैंट के रिश्तों पर कालिख पोत दी है, वहीं दूसरी ओर मासूम बच्चियों की सुरक्षा पर भी कई सवाल खड़े कर दिए हैं.

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सच तो यह है कि मासूम बच्चियां स्कूल टीचर, प्रिंसिपल, ड्राइवर, खलासी, नौकर, चपरासी, पड़ोसी समेत करीबी रिश्तेदारों की घटिया सोच की शिकार हो रही हैं.

फिरौती के लिए मामा ने किया भांजी को अगवा, घरेलू विवाद में चाचा ने किया मासूम भतीजी का कत्ल, स्कूल टीचर ने किया 9 साल की लड़की के साथ बलात्कार, किराएदारों ने की 11 साल की लड़की के साथ छेड़छाड़, रुपयों के लालच में पड़ोसी ने किया 6 साल की बच्ची का अपहरण जैसी वारदातों की खबरें अकसर सुनने को मिलती रहती हैं. पिछले कुछ समय से इस तरह के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं.

पटना हाईकोर्ट के सीनियर वकील उपेंद्र प्रसाद कहते हैं कि पहले लोग करीबी रिश्तेदारों और पड़ोसियों के पास अपने बच्चों को छोड़ कर किसी काम से बाहर चले जाते थे, पर आज ऐसा नहीं के बराबर हो रहा है. अपनों द्वारा भरोसा तोड़ने के बढ़ते मामलों की वजह से लोग पासपड़ोस में बच्चियों को छोड़ने से कतराने लगे हैं.

पुलिस अफसर राकेश दुबे कहते हैं कि अपने आसपास खेलतीकूदती, स्कूल आतीजाती और छोटीमोटी चीज खरीदने महल्ले की दुकानों पर जाने वाली बच्चियों के साथ छेड़छाड़ करना काफी आसान होता है. परिवार और पड़ोस के लोगों की आपराधिक सोच और साजिश का पता लगा पाना किसी के लिए भी आसान नहीं है. पता नहीं, कब किस के अंदर का शैतान जाग उठे और वह किसी मासूम को अपनी खतरनाक साजिश का निशाना बना डाले.

ऐसे में हर मांबाप को अपने बच्चों पर खास ध्यान देने की जरूरत है. मासूम बच्चियों की हिफाजत को ले कर तो मांबाप को किसी भी तरह की कोताही नहीं बरतनी चाहिए.

समाजशास्त्री अजय मिश्र बताते हैं कि समाज की टूटती मर्यादाओं और घटिया सोच की वजह से ही बच्चियों की सुरक्षा खतरे में पड़ गई है. अब इनसान अपने भाई, चाचा, मामा, दोस्तों समेत अपनों से लगने वाले पड़ोसियों पर भरोसा न करें, तो फिर किस पर करें?

आज के हालात तो ये हैं कि लोगों की नीयत बदलते देर नहीं लगती है. अपने ही अपनों के भरोसे का खून कर रहे हैं. यह सब रिश्तों और समाज के लिए बहुत ही खतरनाक बन चुका है.

प्रोफैसर अरुण कुमार प्रसाद कहते हैं कि बच्चियों के कोचिंग जाने, खेलनेकूदने पर या बाजारस्कूल जाने पर हर समय हर जगह उन पर नजर रखना मांबाप के लिए मुमकिन नहीं है.

अकसर ऐसा होता है कि पति दफ्तर में और पत्नी बाजार में है. इस बीच बच्चा स्कूल से आ जाता है, तो वह पड़ोस के ही अंकल या आंटी के पास मजे में रहता है. लेकिन अब कुछ शैतानी सोच वाले लोगों की वजह से यह भरोसा ही कठघरे में खड़ा हो चुका है.

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करीबी रिश्तेदारों, पड़ोसियों, नौकरों और ड्राइवरों द्वारा बच्चियों से छेड़छाड़ करने और उन के साथ जबरन सैक्स संबंध बनाने की वारदातें तेजी से बढ़ रही हैं. ऐसी वारदातों के बढ़ने की सब से बड़ी वजह पारिवारिक और सामाजिक संस्कारों और मर्यादाओं का तेजी से टूटना है.

समाजसेवी किरण कुमारी कहती हैं कि पहले परिवार के करीबी रिश्तेदारों के बीच कुछ सीमाएं और लिहाज होता था, जो आज की भागदौड़ की जिंदगी में खत्म होता जा रहा है. यही वजह है कि करीबी रिश्तेदारों और पड़ोसियों की गंदी नजरों की शिकार मासूम बच्चियां बन रही हैं.

ऐसे मांबाप को अपनी बच्चियों को ऐसे अनजान खतरों से आगाह करते रहना चाहिए. साथ ही, वे खुद भी सतर्क रहें.

पति के साथ किस करते हुए इस एक्ट्रेस की फोटो हुई वायरल, पहले भी दिखा चुकी हैं बोल्ड अवतार

सब टीवी के पौपुलर सीरियल ‘लेफ्त राइट लेफ्ट’ (Left Right Left) में डा. रितु मिश्रा का किरदार निभाने वाली एक्ट्रेस श्वेता साल्वे (Shweta Salve) आए दिन सुर्खियों में बनी रहती हैं. श्वेता के सुर्खियों में बने रहने का ज्यादातर कारण होता है उनकी बोल्ड और हॉट फोटोज. श्वेता साल्वे सोशल मीडिया पर काफी एक्टिव रहती हैं और एक्टिव रहने के साथ साथ वे अपने फैंस के साथ अपनी हॉट फोटोज (Hot Photos) शेयर करते रहते है जिसे उनके फैंस काफी पसंद भी करते हैं.

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श्वेता साल्वे (Shweta Salve) दिखने में बेहद ही खूबसूरत हैं और खूबसूरत होने के साथ साथ वे एक बेहतरीन एक्ट्रेस और मॉडल भी हैं. श्वेता ने 8 साल पहने यानी कि 24 अप्रैल 2012 को अपने बौयफ्रेंड हरमित सेठी (Hermit Sethi) से शादी की थी और तो और साल 2016 में श्वेता ने एक बेटी को भी जन्म दिया. आपको बता दें, एक बार फिर श्वेता साल्वे अपनी फोटोज के चलते चुर्खियों में आ गई है.

जी हां, हाल ही में श्वेता साल्वे ने अपने औफिशियल इंस्टाग्राम अकाउंट (Official Instagram Account) से अपनी और अपने पति की एक फोटो शेयर की है जिसमें वे अपने पति के होठों पर किस (Kiss) कर रही हैं. यह फोटो देख श्वेता के फैंस काफी हैरान रह गए. इस फोटो में श्वेता और उनके पति ने जिस तरह से एक दूसरे को अपनी बाहों में पकड़ रखा है वे काफी पैशनेट (Passionate) दिखाई दे रहा है.

 

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Make Love Not War Kids !! . Lots of introspection in the last few days .. internal external .. What goes around can’t be controlled or maybe to a certain extent yes , but your internal turmoil is in your hands and your minds. . 𝑾𝒉𝒐 𝒂𝒎 𝑰 𝒊𝒏 𝒕𝒉𝒆 𝑾𝒐𝒓𝒍𝒅 ? 𝑨𝒉 , 𝒕𝒉𝒂𝒕’𝒔 𝒕𝒉𝒆 𝒈𝒓𝒆𝒂𝒕 𝒑𝒖𝒛𝒛𝒍𝒆 ! – Lewis Carroll, Alice in Wonderland. . Your visions will become clear only when you can look into your own heart. Who looks outside, dreams; who looks inside, awakes . But if these years have taught me anything it is this: you can never run away. Not ever. The only way out is IN ! You be the Change within . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . #bethechangeyouwanttosee #quarantinedbutsmiling #selfisolation #selfintrospection #makepeace #makelove #makelovenotwar #spreadkindness #bekind #besensitive #instagram #wisdom #growth #peace #instalove #aliceinwonderland #stillswithstories #bethechange #loveintimesofcorona #love #myboo #justus #LockdownLove #covidlovers #inthetimeofcorona

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श्वेता साल्वे (Shweta Salve) अपनी बॉडी के ऊपर काफी ध्यान देती हैं और फिट रहने के लिए काफी वर्कआउट (Workout) भी करती हैं. श्वेता अक्सर अपनी बोल्ड फोटोज से अपने फैंस के दिलों को धड़काती रहती हैं और साथ ही उनके फैंस श्वेता की ऐसी फोटोज देख काफी खुश भी हो जाते हैं. श्वेता की फोटो देखते ही उनके फैंस उस पर तारीफों के पुल बांधना शुरू कर देते हैं और जल्द से जल्द वायरल भी कर देते हैं.

आपको बता दें, श्वेता साल्वे ने ना सिर्फ सीरियल्स और रिएलीटी शो में काम किया है बल्कि वे कई फिल्मों में भी नजह आ चुकी हैं जैसे कि ‘दिल तो बच्चा है जी’ (Dil To Baccha Hai Ji), ‘ना घर के ना घाट के’ (Na Ghar Ke Na Ghat Ke), ‘लंका’ (Lanka), आदी.

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क्वारंटाइन कुत्ता

अजब मध्य प्रदेश की गजब कहानी, कोरोना का इतना खौफ कि मालिक के साथ कुत्ता भी हुआ क्वारेंटाइन, कोरोना का डर लोगों के मन में इस कदर बैठ गया है कि वे कोई भी रिस्क नहीं लेना चाहते हैं, यही वजह है कि प्रशासन द्वारा मालिक के साथ उसके कुत्ते को भी क्वारेंटाइन किया गया है.

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जी हां हम बात कर रहे है टीकमगढ़ जिले की जहां 16 मई को टीकमगढ़ शहर में दो सगी बहनों के कोरोना पॉजिटिव पाए जाने पर जहां उन्हें जिला अस्पताल के आइसोलेशन वार्ड में भर्ती किया गया, वही प्रशासन द्वारा उनकी सहेलियों व परिजन के साथ ही नौकर और दूधवाले सहित उनके पालतू कुत्ते शेरू को भी क्वारेंटाइन कर उन्हें जिला मुख्यालय से करीब 6 किलोमीटर दूर बने एक क्वारंटाइन सेंटर में रखा गया है.

दरअसल एक छोटे से वायरस कोरोना ने पूरी दुनिया को इतना बेबस कर दिया है कि जिसके आगे बड़े-बड़े नतमस्तक और भयाक्रांत है, प्रदेश में तेजी से बढते कोरोना के संक्रमण को लेकर आमजन के अलावा प्रशासन भी कोई कमी नही छोडना चाहता, और यही कारण है कि टीकमगढ़ में स्वास्थ्य विभाग ने दो सगी बहिनों के कोरोना पॉजिटिव पाये जाने पर उनके परिजनों के साथ ही उनके कुत्ते को भी क्वारेंटाइन किया है, जो शायद अब तक का पहला मामला है. जब संक्रमण के खतरे को देखते हुए किसी जानवर को क्वारेंटाइन किया गया है.

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क्वारेंटाइन सेंटर प्रभारी लवली सिंह का कहना है कि ऐसा पहली बार देखा गया है जब किसी कुत्ते को क्वारेंटाइन किया गया है, यहां कुत्ते को दूध, बिस्किट सहित मूलभूत सुविधाएं प्रोवाइड कराई जा रही है इसके साथ शेरू सेंटर की बाउंड्री के अंदर ही मालिक के साथ सुबह-शाम सैर करता है और यहां अपने मालिक के साथ ठाट से रहकर शासकीय सुविधाओ का लाभ ले रहा है.

भेड़बकरियों से भी बदतर हालात में प्रवासी मजदूर

महानगरों से प्रवासी मजदूरों का बिहार में आने का सिलसिला लगातार जारी है. ये मजदूर दिल्ली, महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक समेत कई दूसरे राज्यों से अपने गांव पैदल, रिकशा, साइकिल, ठेला, ट्रक, बस, ट्रेन से आदमी की शक्ल में नहीं बल्कि किसी जानवर से भी बदतर हालात में अपने घर आ रहे हैं.

शहर तो गए थे अपना और परिवार का पेट पालने के लिए, लेकिन वहां तो रोजगार के साथसाथ रोटी के भी लाले पड़ने लगे. जो थोड़ेबहुत पैसे जमा थे सब खत्म हो गए. कंपनी के मालिक, मैनेजर, ठेकेदार ने हाथ खड़े कर दिए. मकान मालिक किराया लेने के लिए मजबूर करने लगा. किराना दुकानदार एक पैकेट बिसकुट भी उधार देने से इनकार करने लगा. ट्रेन, बस सब बंद. भूख से मरने के हालात पैदा होने लगे तो ये कर्मवीर मजदूर, कुछ ऐसे भी जो अपने बीवीबच्चे के साथ इन नगरों में रहते थे, पैदल, साइकिल और ठेला तक से चल दिए.

भूखप्यास से तड़पते, बिना चप्पलजूते के गरमी से तपती सड़कों पर लाखों की तादाद में लोग महानगरों से अपने घरों के लिए जान जोखिम में डाल कर निकल पड़े. ट्रकों ट्रॉलियों में भेड़बकरी की तरह लदे अपनी मंजिल की तरफ. जितने मजदूर उतनी तरह की अलगअलग परेशानियां.

बिहार लौटे कुछ मजदूरों की दिल दहला देने वाली दास्तां सुनिए. दरभंगा जिले के मोहन पासवान गुरुग्राम, हरियाणा में भाड़े का ईरिकशा चलाते थे. लौकडाउन के पहले वे एक हादसे का शिकार हो गए. खाने के लाले पड़ गए और रिकशा मालिक का दबाव बढ़ गया. अब उन्हें गुरुग्राम में रह कर मरने से अच्छा घर जाना उचित लगने लगा. कोई साधन नहीं था. थकहार कर उन की 15 साल की बेटी ज्योति ने साइकिल पर अपने पिता को बैठा कर 1,000 किलोमीटर की दूरी नाप दी और वे सहीसलामत घर पहुंच गए. लोग ताज्जुब करने लगे कि वाह बेटी हो तो ऐसी. लेकिन मरता क्या नहीं करता. इनसान हालात के हिसाब से कुछ ऐसा कर जाता है कि उस पर आसानी से यकीन भी नहीं होता. इस लड़की ने वह कर दिखाया जो बड़ेबड़े ताकतवर लोग भी नहीं कर सकते.

औरंगाबाद जिले के तहत बारुण ब्लॉक के हसनपुरा के रहने वाले जितेश कुमार अपने पत्नी और बेटी के साथ महाराष्ट्र के ठाणे जिले में रहते थे. वे लोहे की एक दुकान में मजदूरी का काम करता थे. लौकडाउन की वजह से काम बंद हो गया. खानेपीने की किल्लत होने लगी. कुछ दिन किसी तरह उधार पर काम चलाया. लेकिन अब उधार मिलना बंद हो गया तो उन के पास कोई रास्ता नहीं बचा. उन्होंने 850 रुपए में एक पुरानी साइकिल खरीदी, जरूरी सामान साथ में लिया और अपनी पत्नी सरिता देवी और 3 साल की बेटी को साइकिल पर बैठाया और अपने घर के लिए चल दिए.

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जितेश कुमार ने बताया कि सब से ज्यादा परेशानी नासिक में पहाड़ की घाटियों में हुई, क्योंकि पहाड़ की घाटियों में साइकिल पर  बोझ ले कर चलना बड़ा मुश्किल का काम है. रातभर और सुबह 10 बजे तक वे साइकिल चलाते, दोपहर में कहीं आराम करते और शाम 5 बजे से फिर चल देते. कई बार साइकिल खराब भी हो गई. कहींकहीं गांव वालों की मदद से साइकिल बनवाई और आगे बढ़ते रहे. रास्ते में चूड़ागुड़ खाया तो कहीं कुछ और खाने को मिला तो वह खा लिया.

अपने इस दर्दनाक सफर के बारे में सुनाते हुए जितेश कुमार रोने लगे. 12 दिनों तक बीवी और बेटी को साइकिल पर बैठा कर 1,700 किलोमीटर की दूरी तय कर वे अपने गांव हसनपुरा पहुंचे. वे अब किसी भी शर्त पर बाहर कमाने के लिए नहीं जाने की बात बोल रहे हैं.

दरभंगा जिले के आंध्र प्रदेश के गुंटूर जिले से 15 की तादाद में 1,600 किलोमीटर की दूरी पैदल तय कर रहे मजदूरों ने बताया कि वे मिर्च फैक्टरी में काम करते थे. लौकडाउन की वजह से कंपनी बंद हो गई. जब काम ही नहीं रहा और पैसे भी खत्म हो गए तो दानेदाने के लिए वे लोग मुहताज होने लगे. जब कोई उपाय नहीं निकला तो वे लोग पैदल ही चल पड़े. पैदल चलतेचलते इन के पैरों में छाले पड़ गए. पैर लहूलुहान और सूज गए. कई लोगों के चप्पलजूते टूट गए. वे लोग नंगे पैर ही तवे के समान जल रही सड़कों पर लगातार दिनरात चलते रहे.

मुजफ्फरपुर, बिहार का रहने वाला श्रवण कुमार गुरुग्राम, हरियाणा में सिलाईकढ़ाई का काम करता था. कामधंधा बंद हो गया. कुछ दिनों तक ट्रेन खुलने का इंतजार करते रहा, पर तबतक सारे पैसे खत्म हो गए. न इधर का रहा, न उधर का. मकान मालिक किराया मांगने लगा. घर से उस के मजदूर पिता ने कुछ पैसे भेजे. मकान मालिक को किराया दिया, बैग उठाया और चल दिया. अगर रास्ते में कोई गाड़ी मिली भी तो हाथ देता रहा, लेकिन रोका किसी ने नहीं. लगातार 10 दिनों से पैदल चलतेचलते उस का शरीर जवाब दे चुका है. पैरों में छाले पड़ गए हैं, फिर भी वह अपनी मंजिल के तरफ चलता जा रहा है.

बिहार के नवादा जिले के सूरज पासवान कोलकाता में कुली का काम करते थे. लौकडाउन की वजह से काम बंद हो गया. वे मजबूर हो कर कोलकाता से अपने गांव के लिए पैदल चल दिये. रास्ते में नवादा पहुंचाने के नाम पर 800 रुपए भी लोगों ने ठग लिए. बेगूसराय स्टेशन पहुंचते ही उन का शरीर जवाब दे गया और वे बेहोश हो कर गिर पड़े.

अभिषेक आनंद नामक एक शख्स, जो छात्र संगठन से जुड़े हुए हैं, उन्हें जब मालूम हुआ तो उन्होंने उन के खाने का इंतजाम किया और उन्हें घर तक भिजवाया.

इसी तरह हजारोंहजार लोग महानगरों से बिहार के अपने गांवों के लिए लगातार चल रहे हैं. इन मजदूरों का इन महानगरों से मन उचट गया. वे हर हाल में अपने गांवघर आना चाहते हैं. इन की चाहत है कि अब हम मर भी जाएं तो अपने लोगों के बीच. बहुत से लोग तो रास्ते में ही गाड़ियों से कुचल कर और भूखप्यास से दम तोड़ चुके हैं.

आफताब मुंबई में जरी का काम करता है. आफताब की पत्नी फातिमा ने बताया, “उन का काम बंद हो गया. जमा किए हुए पैसे भी खत्म हो गए. मेरे पास फोन किया. किसी तरह कुछ पैसों का इंतजाम कर अकाउंट पर भेजा. अपने कान की बाली गिरवी रख कर 2,000 रुपए भेजे हैं. किसी तरह वे मुंबई से अपने घर के लिए चल दिए हैं.”

हर मजदूर की एक अलग कहानी है. ट्रकों में कंटेनर को पूरी तरह तिरपाल से पैक कर मजदर 5,000 रुपए किराया दे कर भेड़बकरी की तरह आ रहे हैं. कभीकभी तो ऐसा लगता है मानो इन्होंने कहीं डकैती डाली है और अब लुकछिप कर अपनी मंजिल की तरफ जा रहे हैं.

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इतना ही नहीं, ये मजदूर जगहजगह पर पुलिसिया जुल्म के शिकार भी हुए हैं. थके पैर, शरीर जवाब दे रहा है. साथ में बीवी बच्चे भी हैं. बहुत से पुलिस वाले इन मजदूरों के साथ मारपीट, गालीगलौज और करते दिखे.हां, कहींकहीं मदद भी करते पाए गए.

मजदूर और छात्रों के साथ दोहरी नीति

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पहले तो बोले कि वे मजदूरों और छात्रों को दूसरे प्रदेशों से नहीं लाएंगे. लेकिन विपक्ष और दूसरे राजनीतिक दलों, समाजसेवियों, सोशल मीडिया से जब दबाव बढ़ने लगा तो आखिरकार वे तैयार हुए. कोटा से लाए गए छात्रों से भाड़ा नहीं लिया गया, जबकि इन छात्रों के मांबाप भाड़ा दे सकते थे. पर मजदूरों से भाड़ा लिया गया. ट्रेन में मजदूरों के लिए साधारण खाना और छात्रों के लिए बढ़िया क्वालिटी का खाना. पटनादानापुर स्टेशन पर भी 2 तरह का इंतजाम. मजदूर क्वारंटीन सैंटर में 14 दिन रहेंगे, जबकि छात्र अपनेअपने घरों में अलग कमरे में रहेंगे. इस से साफ हो गया कि बिहार की सरकार भी सिर्फ अमीरों के बारे में सोचती है, गरीबों के बारे में नहीं. लेकिन सरकार को यह मालूम होना चाहिए कि ये मजदूर अनदेखी के पात्र नहीं. ये इस देश की तरक्की में बुनियाद का काम करते हैं.

मजदूरों ने खींचा सरकार का ध्यान

महानगरों में फंसे मजदूर सरकार द्वारा जारी हैल्पलाइन पर फोन करते रहे, पर कोई उठाता ही नहीं था. अगर उठाया भी गया तो कोई नोटिस नहीं लिया गया. इन मजदूरों ने अपना दर्द वीडियो बना कर सोशल मीडिया पर डाला. एक मजदूर ने एक गीत का वीडियो डाला जो सोशल मीडिया पर काफी मशहूर हो रहा है. :

‘हम मजदूरों को गांव हमारे भेज दो सरकार,

सूना पड़ा घरद्वार.

मजबूरी में हम सब मजदूरी करते हैं,

घरबार छोड़ कर के शहरों में भटकते हैं…’

मजदूरों की बेबस हालत को चित्रकारों ने कागजों पर भी उतार कर लोगों को ध्यान खींचा.

बिहार में क्वारंटीन सैंटरों का हाल

बाहर से आ रहे मजदूरों के लिए 14 दिन तक रहनेखाने का पूरा इंतजाम प्रवासी लोगों के लिए करना है. पर इन सैंटरों पर लूट का बाजार गरम है. सैंटरों के इंचार्ज पदाधिकारी ज्यादा से ज्यादा पैसे बचाने और घटिया इंतजाम करने में जुटे हुए हैं. कई केंद्रों पर मजदूरों द्वारा सड़क जाम करने तक की घटनाएं आएदिन घट रही हैं. बिहार में कई लोगों की मौत भी इन सैंटरों पर हो गई. कुछ जिलों में इन सैंटरों पर पत्रकारों को जाने पर रोक लगा दी गई है, ताकि सच को उजागर नहीं किया जा सके और लूट की छूट लगातार चलती रहे.

अब तो आलम यह हो गया है कि इन सैंटरों पर प्रवासी मजदूरों के लिए जगह नहीं है. गांव वाले लोग इन का अपने घरों में रहने का विरोध कर रहे हैं. ये मजदूर जाएं तो जाएं कहां?

रोहतास जिले के कर्मकीला गांव में दिल्ली से लौटे 2 प्रवासी लोगों का परिवार को क्वारंटीन सैंटर में जगह नहीं मिली. मजबूर हो कर दोनों परिवार के सदस्य बाहर रहने के लिए मजबूर हुए.

आखिर क्यों होता है पलायन

बिहार में उद्योगधंधे नहीं के बराबर हैं. उत्तरी बिहार में जहां लोग हर साल बाढ़ से परेशान होते हैं, वहीं दक्षिण बिहार के लोग सुखाड़ और सिंचाई के उचित साधन नहीं होने की वजह से मार झेलते रहते हैं. कृषक मजदूरों को सालभर काम नहीं मिल पाता. जो पढ़ेलिखे गरीब युवा हैं, वे भूस्वामियों के खेतों में काम करना पसंद इसलिए भी नहीं करते कि उन्हें नीचा देखा जाता है. छोटेमझोले किसानों की खेतीबारी से मुश्किल से लागत कीमत ही निकल पाती है. खेती करना घाटे का सौदा है. खेतीकिसानी में भी मजदूरों को सालभर काम नहीं है. कुछ खास सीजन रोपाईकटाई के समय में मजदूरों की मांग होती है, बाकी दिनों में नहीं, जिस से मजदूर महानगरों की तरफ रुख करते हैं.

नफरत से देखे जा रहे मजदूर

अपने ही गांवघरों में आ रहे महानगरों से इन मजदूरों से कोई बातचीत भी नहीं करना चाहता, बल्कि गांवों में तो लोग इन्हें ‘करोना’ के नाम से बुलाने लगे हैं. इस महामारी ने इन मजदूरों का कचूमर ही निकाल दिया. सरकार, कंपनी, मकान मालिक और अब तो अपनों ने भी दूरी बनानी शुरू कर दी है.

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हसपुरा क्वारंटीन सैंटर में रह रहे मुन्ना कुमार ने बताया, “लोग हम लोगों से नफरत कर रहे हैं. क्या हम लोग उस के पात्र हैं? क्या हम लोग इस बीमारी को विदेशों से लाए हैं? इस में हम लोगों का क्या कुसूर है? बाहर से आए जिन मजदूरों को एक महीने से भी ज्यादा हो गया है और वे पूरी तरह ठीक भी हैं, तो लोग उन्हें काम पर इसलिए नहीं लगा रहे हैं कि उस से कोरोना फैल जाएगा.”

किस तबके के लोग करते हैं पलायन

बिहार से पलायन तो सभी तबके के लोग करते हैं, लेकिन महानगरों की कंपनियों में ज्यादातर मजदूर दलित और अन्य पिछड़ा वर्ग के होते हैं. ऊंची जाति के लोग इंजीनियरिंग समेत दूसरी तरह की टैक्निकल डिगरी की वजह से कंपनियों में अच्छे पदों पर होते हैं. उन का कंपनियों में भी दबदबा चलता है. निचले तबके के लोगों का हर जगह शोषण होता है.

जो लोग टैक्निकल डिगरीधारी हैं और बड़े महानगरों में बड़ीबड़ी कंपनियों में काम करते हैं, उन्हें कंपनी का मालिक आज भी तनख्वाह दे रहा है. उन के पास सारी सुखसुविधाएं हैं. इस लौकडाउन में वे आज भी महफूज हैं.

गुजरात में फोर्ड कंपनी में इंजीनियर के पद पर काम कर रहे बिहार के औरंगाबाद जिले के सुधीर कुमार और प्रैस्टिसाइज कंपनी अंकलेश्वर, गुजरात में अकाउंट्स मैनेजर अनिल कुमार रंजन ने बताया कि जब तक लौकडाउन चलेगा तब तक कंपनी बैठा कर पेमेंट देगी. जल्द ही कंपनी चालू होने वाली है.

सरकार क्या चाहती है

सरकार चाहती है कि किसी तरह मजदूर रुक जाएं. फैक्टरी चालू हो जाएं, ताकि सरकार और पूंजीपतियों का गठजोड़ जारी रहे. लेकिन इन कंपनी मालिकों, मैनेजरों और ठेकेदारों की गलत मंशा की वजह से इन मजदूरों का मन उचट गया है. हर हाल में मजदूर अपने गांवघर आना चाहते हैं. इन का अब रुकना मुश्किल हो गया है. बहुत सारी कंपनियां चालू कर दी गई हैं. मजदूर कम होने की वजह से जो मजदूर काम में लगे हैं उन्हें ज्यादा काम करना पड़ रहा है. इसी बीच कई राज्यों में श्रम संशोधन कानून लागू कर मजदूरों से 8 घंटे की जगह 12 घंटे काम लेने की कवायद तेज हो गई है.

हिंदू राष्ट्र बनाने वाले कहां हैं

कोरोना महामारी के चलते देश जल रहा है. देश की जनता पर संकट का पहाड़ टूट पड़ा है. इस जनता की मेहनत की कमाई से मंदिर रोशन होते थे. मंदिरों में भगवानों का तरहतरह का सिंगार किया जाता था. आज ऐसे भगवान संकट की घड़ी में अवतार ले कर उन की मदद करने क्यों नहीं आ रहे हैं? इन मेहनतकशों की अरबोंखरबों की मेहनत की कमाई को पाखंडरूपी भगवानों की दुकानदारी से लूटने वाले आज कौन से बिल में घुस गए हैं? वे उन की मदद के लिए आगे क्यों नही आ रहे हैं? हाईवे पर हर किलोमीटर पर मंदिर हैं, लेकिन इन प्रवासियों को उन मंदिरों पर पानी पीने का इंतजाम नहीं है. जो अपने आप को स्वयंसेवक कहते हैं, अपने आप को हिंदुओं के रक्षक कहते हैं, आज वे कौन से बिल में घुस गए हैं? आज देश की करोड़ों जनता सड़क पर संकट से जूझ रही है. लोगों पर संकट का ऐसा पहाड़ टूटा है कि वे हर तरह से मजबूर हो चुके हैं .लेकिन देश को लूटने वाले ऐसे लोग जो अपने आप को देशभक्त कहते हैं, वे कहां हैं? आज लोग भूखेप्यासे तड़पतड़प कर सड़क पर दम तोड़ रहे हैं, पर इन पाखंडियों का दिल जरा सा भी नही पसीज रहा है .इस से पुष्टि होती है कि ये लोग भारतीय लोगों को अपने मतलब के लिए इस्तेमाल करते हैं. अगर यह संकट मंदिर, पुजारियों पर या उन से जुड़े दूसरे लोगों पर आता तो पूरा देश हिल जाता, पूरी सरकार हिल जाती, लेकिन इन गरीबों की मदद के लिए कोई आगे नहीं आ रहा है. आगे वे लोग आ रहे हैं, जिन से उन का नाता कभी नही रहा है. जैन, बौद्ध और सिख लोग तनमनधन से इन गरीबों की मदद कर रहे हैं, लेकिन जो अपने आप को देशभक्त कहते थे, हिंदू राष्ट्र बनाने की बात करते थे, अपने आप को हिंदुओं के ठेकेदार कहते थे, वे राष्ट्रभक्त किस बिल में घुस गए हैं? इन मनुवादी लोगों में कोरोना का इतना डर घुस गया है कि ये लोग इन गरीबों को एक गिलास पानी तक देने के लिए तैयार नही हैं. रास्ते में ज्यादातर ढाबे और मंदिर इन्हीं के हैं, पर मजदूरों को मंदिर और ढाबों के पास तक नही फटकने दिया जा रहा है.

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हम कैसे कह सकते हैं कि ये ब्राह्मणी सोच के लोग और उन की सरकार भारत की जनता की शुभचिंतक है? इन के लोग जो विदेशों में पढ़ रहे थे और नौकरी या कारोबार कर रहे थे, उन को करोड़ों रुपए खर्च कर के सरकार ने विदेशों से तुरंत हवाईजहाज से लिवा लिया. इन्होंने मानव कल्याण हेतु काम कभी नहीं किए हैं, हमेशा जनता का शोषण किया है.

भगवान और अल्लाह भी नहीं आए काम

प्रबुद्ध भारत समाज के संस्थापक और भाकपा माले के विधायक रह चुके केडी यादव ने कहा कि कोरोना के कहर ने धार्मिक ढकोसलों को उजागर कर के रख दिया. काबा से ले कर काशी तक सभी धार्मिक स्थलों पर ताला जड़ दिया गया. जिन ईश्वर और अल्लाह को याद करने के लिए पूजापाठ, रोजानमाज सबकुछ करते थे, वे आज इन बुरे हालात में काम नहीं आए. अब तो इस देश के नेताओं की आंख की पट्टी खुलनी चाहिए. इस देश को धार्मिक स्थलों की नहीं, बल्कि बल्कि अस्पतालों और स्कूलों की जरूरत है.मंदिरोंमसजिदों को हमेशा के लिए बंद कर उन में स्कूल, लाइब्रेरी और अस्पताल खोल दिए जाएं. इन धार्मिक संस्थानों में बंद पड़े अकूत पैसे को गरीबों के बीच बांट दिया जाए. यह सभी लोग जानते हैं कि इस महामारी का इलाज भी विज्ञान के द्वारा ही मुमकिन है. जिस तरह से चेचक, प्लेग, हैजा जैसी महामारी पर हमारे वैज्ञनिकों ने कामयाबी हासिल की है, उसी तरह से कोविड 19 का भी निदान विज्ञान द्वारा ही मुमकिन है.

बिहार आए ज्यादातर मजदूर दोबारा लौट कर महानगरों में जाने के नाम पर इनकार करते हुए बोल रहे हैं कि किसी भी हाल में अब नहीं जाएंगे. लेकिन काफी तादाद में आए इन मजदूरों

को बिहार सरकार रोजगार दिलवा पाएगी? फिलहाल उम्मीद तो नहीं दिखती, लेकिन आने वाला समय ही बताएगा आगे क्या होगा?

जिन के खूनपसीने की कमाई से दुनिया की सारी बेशकीमती चीजें बनीं हैं. बड़ी इमारतें, लंबी सड़कें, पुल यानी आप जो भी विकास देख रहे हैं, उस में मजदूरों का बड़ा हाथ है. जिन हाथों ने दुनिया को खूबसूरत बनाया उन्हीं हाथों को तुम काटने पर उतारू हो गए. मजदूरों की अनदेखी का यह दंश इस देश को झेलना पड़ेगा.

इतिहास इस बात का गवाह रहा है कि जब भी कोई महामारी या आपदा आई है, सब से ज्यादा प्रभावित यही गरीब तबका होता है. इस तबके के लोगों को भी इन चीजों से सीख ले कर नयापन लाने की जरूरत है. अगर नहीं सुधरे तो हालात बद से बदतर हो जाएंगे.

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Lockdown में घर लौटती मजदूर औरतों की मुसीबत

लौकडाउन के चलते देश के बड़े शहरों से अपने गांव लौट रहे मजदूरों में सब से ज्यादा मुसीबतें  महिला मजदूरों को झेलना पड़ी हैं. दुधमुंहे बच्चों को अपनी छाती से चिपकाए चुभती धूप में महिलाएं यही आस लिए पैदल चल रही हैं कि जल्द अपने घर पहुंच सकें. सरकारों की बद‌इंतजामी और अनदेखी से इन महिला मजदूरों का दर्द तब और बढ़ जाता है जब उन्हें स्वास्थ्य सुविधाएं तक नहीं मिलती हैं.

14 म‌ई, 2020 को मध्य प्रदेश में गर्भवती मजदूर महिलाओं के प्रसव की घटनाओं ने तो सरकारी योजनाओं की पोल खोल कर रख दी. गुजरात से बस में आई बड़वानी जिले की सुस्तीखेड़ा गांव की महिला मजदूर को प्रसव पीड़ा होने पर एंबुलैंस और जननी सुरक्षा ऐक्सप्रैस वाहन का इंतजाम तक न हो सका. तहसील के एसडीएम की दरियादिली ने अपने वाहन से महिला को अस्पताल तो भेज दिया, पर दर्द से कराहती महिला को समय पर डाक्टर न मिलने से प्रसव वाहन में ही हो गया.

इसी तरह राजगढ़ जिले के ब्यावरा में मुंबई से उत्तर प्रदेश जा रही एक 30 साल की गर्भवती महिला कौशल्या ने ट्रक में ही बच्चे को जन्म दे दिया. उत्तर प्रदेश के संत कबीर नगर जिला बस्ती के मनोज कुमार मुंबई से पैदल तो निकल पड़े, लेकिन रास्ते में गर्भवती पत्नी की हालत देख कर ट्रक में किराया दे कर चले तो मध्य प्रदेश के ब्यावरा में दर्द बढ़ा तो ट्रक में ही महिला की डिलीवरी हो गई. जैसेतैसे मनोज पत्नी को बच्चे समेत अस्पताल  ले कर पहुंचे, लेकिन अस्पताल में कोई खास इंतजाम न होने से उन्हें  राजगढ़ के जिला अस्पताल रैफर किया गया.

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प्रदेश में स्वास्थ्य योजना का ढोल पीटने वाली सरकारों की जमीनी हकीकत यह है कि आजादी के 73 सालों के बाद भी वे गांवकसबों के अस्पतालों में महिला डाक्टर तक का इंतजाम नहीं कर पाई हैं.

महिला मजदूरों के लिए लौकडाउन ने जो मुश्किलें बढ़ाई हैं, वे भी किसी त्रासदी से कम नहीं हैं. ट्रक, लोडिंग वाहन,आटोरिकशा में भेड़बकरियों की तरह यात्रा के लिए मजबूर 2-4 महिला मजदूर अपने छोटे बच्चों के साथ 40-50 मर्दों के समूह में सफर करती हैं, तो उन की परेशानियाें को तवज्जूह ही नहीं मिलती. ड्राइवर अपनी तेज रफ्तार से गाडी भगाने की जल्दबाजी में रहता है, अगर महिला को पेशाब के लिए भी रुकना है तो संकोच के मारे नहीं कहेगी, क्योंकि उसे भी घर जल्दी पहुंचना है और एक अकेली महिला के लिए ड्राइवर गाड़ी रोकने की हिमाकत करता भी नहीं है.

जब कभी सड़क पर ट्रक रुकता भी है, तो जरूरी नहीं कि ऐसी जगह महिला शौचालय मिल ही जाए. कहीं भी किसी भी पेड़ के बगल में, खेत की मेंड़ पर सड़क के किनारे उन्हें बैठना पड़ता है. क‌ई बार ट्रक रुकते ही धड़ाधड़ सारे मर्द मजदूर उतरते हैं और शुरू हो जाते हैं, पर वे 2-4 महिलाएं सिकुड़ी सी उसी ट्रक या  बस के कोने में मन मसोस कर अपने वेग को रोके रखती हैं.

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ऐसे संकट के वक्त में अगर किसी महिला को माहवारी शुरू हो जाए तो परेशानी और भी बढ़ जाती है, क्योंकि उन के पास 2 जोड़ी कपड़े से ज्यादा कपड़े नहीं हैं. एक कपड़े की पोटली में ही सारी कमाई है.

महाराष्ट्र के गढ़चिरौली से मध्य प्रदेश के गांवों में लौट रही एक महिला मजदूर रामवती अपनी पीड़ा बताती है कि सफर में माहवारी के दौरान कितनी मुश्किल हुई थी, लेकिन नरसिंहपुर जिले के नांदनेर पहुंचते ही ‘पैडवुमन’ के नाम से मशहूर माया विश्वकर्मा ने सैनेटरी पैड दिए तो सारी परेशानी दूर हो गई. रामवती के मुताबिक माहवारी के चलते पति का सहयोग भी नहीं मिलता. पति उस की शारीरिक परेशानी को समझने के बजाय उसे रास्ते भर डांटडपट ही लगाता रहा. महिला मजदूरों की परेशानी यही है कि महीनेभर उस के शरीर को नोचने वाला खुद का पति भी माहवारी के 5 दिन उसे अछूत समझ कर झिड़कता रहता है.

प्रवासी भारतीय माया विश्वकर्मा बताती हैं कि पिछले 2 महीने से जबलपुरपिपरिया स्टेट हाईवे नंबर 22 पर उन की संस्था ‘सुकर्मा फाउंडेशन’ मजदूरों को भोजन पानी ,जूताचप्पल के साथ महिला मजदूर के लिए नो टैंशन सैनेटरी पैड का मुफ्त में इंतजाम कर रही है.

गुजरात के सूरत की कपड़ा मिल में काम करने वाली रुक्मिणी ने भी पति और बच्चों के साथ अपना आधा सफर पैदल ही तय किया है. 2 साल की बेटी और 6 महीने के बेटे की जिम्मेदारी के साथ रास्ते में लकड़ी बीन कर ईंटपत्थर का चूल्हा बना कर खाना पकाती है. मध्य प्रदेश के होशंगाबाद जिले से एक ट्रक ने मंडला तक के लिए 1,500 रुपए सवारी के हिसाब से किराया वसूल किया. ट्रक ड्राइवर और क्लीनर ने उसे बच्चों के साथ आगे केबिन में बिठा लिया. रास्ते में सफर के दौरान उन की गंदी बातों और घूरती निगाहों का सामना करती जैसेतैसे वह घर पहुंच सकी.

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रुक्मिणी जैसी और भी कई महिला मजदूर ऐसी भी होंगी, जिन्हें रात के सफर में मर्दों द्वारा छेड़खानी के अलावा अपनी इज्जत भी गंवानी पड़ी हो. क्या पता घर पहुंचने की जद्दोजेहद में चुपचाप यह दर्द भी सहन करना उन की मजबूरी बन गया हो.

बहरहाल, सरकारी कोशिशों के दावों का सच तो मजदूरों को भी समझ आ गया है. जिस तरह चुनावी रैलियों में झंडा, बैनर पकड़ कर नारे लगाने के लिए जुटाई गई भीड़ में महिलाओं को दिनभर का मेहनताना, खाना देने वाले ‌नेता सड़कों पर कहीं ‌दिखे? प्रजातंत्र की हकीकत यही है कि एक बार जनता से ‌वोट की भीख मांगने वाले नेता पूरे 5 साल सोशल डिस्टैंसिंग यानी सामाजिक दूरी बना कर रखते हैं. नेता जानते हैं कि कम पढ़ेलिखे इन मजदूरों को नोट, कंबल और‌ शराब की बोतलें दे कर बरगलाना आसान काम है.

हमारे समाज में महिला मजदूरों के साथ आज भी बुरा बरताव किया जाता है. अपने परिवार का पेट भरने के लिए ठेकेदारों, राजमिस्त्री और साथी मर्द मजदूरों की बदसुलूकी का शिकार महिलाओं को बनना पड़ता है. महिला आयोग और मजदूर यूनियन में बैठी महिला प्रतिनिधि भी महिला मजदूरों की समस्याओं को साल में एक दिन किसी मीटिंग या सैमिनार में उजागर कर अपने फर्ज को पूरा होना मान लेती हैं. मौजूदा समय में जरूरत इस बात की है कि मर्दों के दबदबे वाली सोच में बदलाव के साथ महिलाओं को उन के हकों के प्रति जागरूक किया जाए तो ही महिलाओं की हालत में सुधार मुमकिन है.

धरातल पर नदारद हैं सरकारी ऐलान

लेखक- धीरज कुमार

मुंबई में 25 साल के सरोज कुमार ठाकुर अपने 2 दोस्तों 20 साल के सोनू कुमार और 23 साल के विकास कुमार के साथ रहते थे. तीनों हास्पिटल में हास्पिटल ब्रदर का काम करते थे. लौकडाउन के बाद वे अपने पैसे से खातेपीते रहे, लेकिन जब पैसा खत्म हो गया तो जिंदगी बचाने के लिए सिर्फ एक ही उपाय था, किसी तरह घर पहुंचना. और फिर उन तीनों ने मिल कर घर जाने का फैसला किया. घर से खाते पर पैसे मंगवाए. किसी तरह वहां से पैदल निकले. कुछ दिन पैदल चलने के बाद उन्हें एक ट्रक वाला मिला जिस ने पहले तो उन्हें लिफ्ट दी लेकिन बाद में उन तीनों से 9,000 रुपए भाड़े के रूप में ले लिए.

ट्रक वाले ने उन्हें बनारस छोड दिया. बनारस से छोटी गाड़ी कर के वे रोहतास, बिहार पहुंचे. घर पहुंचने के बाद शांति महसूस हुई, लेकिन गांव वालों ने गांव के बाहर ही रोक कर क्वारंटीन सैंटर, जो अपने ही पंचायत के सरकारी स्कूल में बना है, वहां जाने का आदेश दिया .अभी वे तीनों कुछ दिन यही रहेंगे. खानेपीने का इंतजाम सरकार द्वारा किया गया है, लेकिन इंतजाम ठीक नहीं है. गांव वाले ऐसे बरताव कर रहे हैं जैसे वे सब अछुत हैं. जिन दोस्तों व परिवार के लिए इतनी मुश्किलें झेलने के बाद जिंदगी पर खेल कर गांव पहुंचे हैं, सभी मिलने से डर रहे हैं. चाहे फिर घरपरिवार के लोग हों या दोस्त.

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डेहरी ब्लौक के पहलेजा गांव के 42 साल के सत्येंद्र शर्मा और 37 साल के संजय शर्मा इंदौर, मध्य प्रदेश में रहते थे. वे वहां फर्नीचर बनाने का काम करते थे. उन का 17 साल का भतीजा इम्तिहान देने के बाद घूमने गया था. वहां काम बंद हो गया. खाने के लाले पड़ने लगे. तीनों ने अपनी मोटरसाइकिल से घर आने का फैसला किया. वे 3 दिनरात मोटरसाइकिल चला कर घर पहुंच गए. सिर्फ रात में कुछ घंटे के लिए पेट्रोल पंप पर सोए. रास्ते में किसी से भी खानापीना तक नहीं लिया, क्योंकि वे काफी डरे हुए थे. अब वे लोग गांव के स्कूल में क्वारंटीन सैंटर पर रह रहे हैं.

दिल्ली में 26 साल के अनुज कुमार, 24 साल के अनूप कुमार और 19 साल के मुकेश प्रसाद कंस्ट्रक्शन कंपनी में काम करते थे. तीनों एक ही गांव के थे. वे कंस्ट्रक्शन कंपनी में मिक्चर मशीन में ड्राइवर और हैल्पर का काम करते थे. तीनों का एक ही मकसद था, पैसा कमा कर घर के लोगों को बेहतर जिंदगी देना. लेकिन वे कभी सपने में भी नहीं सोचे थे कि इस महामारी में फंस जाएंगे और जिंदगी को बचाना भी बड़ा मुश्किल हो जाएगा.

वे तीनों कहते हैं कि अब कभी भी दिल्ली नहीं जाएंगे. जब से महामारी फैली है, वे दहशत में जी रहे थे. जिस तरह से दिल्ली में माहौल बन चुका था, ऐसा नहीं लगता था कि वे कभी घर पहुंच पाएंगे. घर की दहलीज पर आ कर भी वे घरपरिवार से दूर हैं, इस बात का अफसोस रहेगा, लेकिन सिर्फ कुछ दूरी पर घर होने के बाद भी वे लोग फोन से घर का हालचाल ले रहे हैं.

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जब उन से कहा गया कि सरकार तो ट्रेन चला रही है, वहां से मजदूरों को ला रही है तो उन का कहना था कि ट्रेन आप के मोबाइल में चल रही होगी. हम मजदूरों के लिए तो ट्रेन नहीं चल रही है. अगर ट्रेन चल रही होती तो हम पैदल या इस तरह से ट्रक में जानवरों की तरह बैठ कर घर नहीं आते. सुने तो हम लोग भी थे कि मोदीजी विदेश में रहने वाले लोगों को हवाईजहाज से अपने देश वापस ला रहें हैं, पर हम मजदूरों को मरने के लिए छोड़ दिए, क्योंकि हम सब गरीब थे. ऐसी जिल्लत भरी जिंदगी कभी नहीं देखी थी, लेकिन हम लोगों को कोरोना महामारी ने ऐसा दिखा दिया. अब घर पर ही छोटामोटा काम कर लेंगे, लेकिन दोबारा पलट कर वहां कभी नहीं जाएंगे

ये उदाहरण तो सिर्फ बानगी भर हैं. बहुत से लोगो के जिंदगी संकट में पड़ गई थी. बहुत से लोग काफी परेशान थे. परेशानी के इस आलम में जिंदगी बचाना मुश्किल लग रहा था. जो बच कर आए थे वे अपनेआप को खुशनसीब समझ रहे थे. ज्यादातर लोगों का यही कहना था कि जब हम लोग संकट में घिर गए थे, तो ऐसा लग ही नहीं रहा था कि हम लोग इस देश के नागरिक नहीं हैं. लोगों का  बरताव बदल गया था.

उन लोगों का कहना था कि राज्य सरकार के पास इतना इंतजाम नहीं है कि हम सब को रोजगार दे. वर्तमान मुख्यमंत्री हमारे राज्य में 15 साल से शासन कर रहे हैं, लेकिन अभी तक हम बेरोजगारों के लिए कोई इंतजाम नहीं कर पाए हैं. जब हम दूसरे राज्यों में रोजगार के लिए जाते हैं और पैसा कमा कर अपने राज्य में भेजते हैं, तो हमारे परिवार के लोग उसब्से सामान खरीदते हैं. सरकार उन सामानों पर टैक्स लेती है. क्या उस पैसे से राज्य का विकास नहीं हो रहा है?

बहुत से क्वारंटीन सैंटरों पर इंतजाम इतना खराब था कि कई जगह पर तो मजदूर बगावत भी कर रहे थे. लोग देखरेख करने वाले पर अपना गुस्सा उतार रहे थे. राज्य सरकार की बदइंतजामी का आलम यह था कि लोग कहीं भोजन के लिए परेशान थे, तो कहीं रहने का इंतजाम भी ठीक नहीं था. देखरेख करने वाले शिक्षकों को भी उचित किट नहीं दी गई थी.

डेहरी के पहलेजा पंचायत के सरकारी स्कूल को क्वारंटीन सैंटर बनाया गया है जिस में अलगअलग राज्यों से आए हुए मजदूरों की तादाद 60 है. इसी पंचायत के मुखिया प्रमोद कुमार सिंह ने बताया, “क्वारंटीन सैंटर पर 30 मजदूरों के लिए इंतजाम किया गया है. जिस तरह से राज्य सरकार ने ऐलान किया है, उस तरह सरकारी मुलाजिम इंतजाम करने में कतरा रहे हैं, क्योंकि यहां अफसरशाही ज्यादा है.

“लेकिन गांव का मुखिया होने के नाते मैं अपने खर्च पर लोगों के लिए सब्जी बनवाने और दूसरी तरह के इंतजाम कर रहा हूं, क्योंकि वे लोग हमारे हैं. राज्य सरकार सारी घोषणाएं अखबार में तो कर दी है, लेकिन सुविधाएं धरातल पर नदारद हैं.”

लौकडाउन की घोषणा होने से पहले केंद्र सरकार को मजदूरों के बारे में भी सोचना चाहिए था. जो समस्याएं आज आई हैं, उन के बारे में अगर पहले सरकार सजग होती तो आज जिस तरह से उन के साथ समस्याएं हो रही हैं, वे नहीं होतीं.

सरकार चाहती तो उन मजदूरों को तबाह होने से बचा सकती थी, क्योंकि पहला मामला 22 जनवरी को केरल में मिला था. सरकार को अंतर्राष्ट्रीय सेवाएं बंद कर देनी चाहिए थीं. देश के विभिन्न राज्यों में जो मजदूर असंगठित क्षेत्र में काम कर रहे थे, उन्हें सुरक्षित अपने राज्य में जाने की सूचना दी जा सकती थी. केंद्र सरकार ने भी इन मजदूरों के बारे में कुछ नहीं सोचा, क्योंकि ये गरीब परिवार से आते थे. सरकार ने सिर्फ नेताओं ,पूंजीपतियों और उद्योगपतियों के बारे में सोचा.

अब देखना यह होगा कि इस महामारी के बाद राज्य सरकार आए हुए मजदूरों के लिए क्या इंतज करती है. सरकार ने तो यह घोषणा कर दी है कि सभी मजदूरों को हर महीने 1,000 रुपये खाते में दिए जाएंगे, साथ ही मजदूरों के लिए राशन भी दिया जाएगा, लेकिन ऐसा नहीं लगता है. सरकार की घोषणाएं अखबार में तो खूब दिख जाएंगी, पर धरातल पर नदारद रहती हैं.

बाप के कुकर्म की वजह से कातिल बनीं बेटियां

लेखक- रविंद्र शिवाजी दुपारगुडे 

महाराष्ट्र के सतारा जिले की रहने वाली योगिता की शादी करीब 5 साल पहले संजय देवरे से हुई थी. पतिपत्नी दोनो पढ़ेलिखे थे और कमाते भी थे. संजय एक अच्छी कंपनी में काम करता था, तो बीकौम की पढ़ाई कर चुकी योगिता एक एकाउंटेंट के यहां नौकरी करती थी.

जब दोनों कमा रहे थे तो उन की गृहस्थी हंसीखुशी से चलनी चाहिए थी, लेकिन ऐसा नहीं था. भले ही दोनों पढ़ेलिखे थे लेकिन उन के विचारों में काफी अंतर था. दोनों छोटी-छोटी बात पर बहस करने लगते थे, जिस से उन के बीच विवाद हो जाता था.

जिस से संजय योगिता की पिटाई कर देता था. यह बात योगिता को बहुत बुरी लगती थी. योगिता ने पति के साथ गृहस्थी को चलाने के तमाम सपने देखे थे. लेकिन शादी के कुछ ही दिनों बाद उसे पति से प्यार के बजाए पिटाई मिल रही थी. जिस से उस के सारे सपने बिखरते दिख रहे थे. लिहाजा उस ने तय कर लिया कि वह ऐेसे पति के साथ नहीं रहेगी.

इसी दौरान योगिता ने एकाउंटेंट के यहां से नौकरी छोड़ कर एक बिल्डर के यहां नौकरी करनी शुरू कर दी. वहीं पर उस की मुलाकात सुशील मिश्रा नाम के युवक से हुई. सुशील मूल रूप से उत्तर प्रदेश का रहने वाला था. वह काम की तलाश में मुंबई आया था और अपनी बीवी बच्चों के साथ पालघर जिले के नालासोपारा में रहता था.

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जिस बिल्डर के यहां योगिता नौकरी करती थी, सुशील उस के यहां बिल्डिंग बनाने का ठेका लेता था. इस वजह से सुशील का योगिता से अकसर मिलनाजुलना होता रहता था. बातूनी स्वभाव के सुशील ने जल्दी ही योगिता से दोस्ती कर ली. इस के बाद योगिता उस से अपने सुखदुख की बातें शेयर करने लगी.

सुशील अय्याश प्रवृत्ति का था. पार्वती नाम की एक महिला के साथ भी उस के अवैध संबंध थे. पार्वती बिल्डरों के यहां बेगार करती थी.

खिलाड़ी था सुशील

शादीशुदा पार्वती शराबी पति से त्रस्त हो कर पति और बच्ची को गांव में छोड़ कर अकेली ही नालासोपारा में रहने लगी थी. पार्वती अकेली ही रहती थी. सुशील ने उस के अकेलेपन का फायदा उठाया. पार्वती से नजदीकियां बन जाने पर जब उस का मन होता वह पार्वती के कमरे पर मौजमस्ती करने चला जाता था. कभीकभी वह उसे खर्चे आदि के पैसे भी दे देता था.

सुशील का मन पार्वती से भर चुका था, इसलिए अब वह योगिता से नजदीकियां बढ़ाने की कोशिश में जुट गया. वह योगिता से इस तरह बात करता कि योगिता को भी उस में अपनापन झलकने लगा.

एक दिन योगिता ने उसे पति से दूर रहने की वजह बता दी. सुशील ने उस से सहानुभूति जताते हुए कह दिया कि वह खुद को अकेला महसूस न करे. कभी भी किसी भी चीज की जरूरत हो तो उसे बता दे. जब भी वह उसे याद करेगी, हाजिर हो जाएगा.

योगिता को सुशील पसंद आ गया. जिस तरह के सुख व सहानुभूति वह पति से चाहती थी, वह सारे सुशील दे सकता था. लिहाजा एक दिन योगिता ने सुशील के सामने अपने प्यार का इजहार कर दिया. सुशील की खुशी का ठिकाना नहीं रहा.

मौका देख सुशील ने उस से कहा, ‘‘योगिता मैं भी तुम्हें दिलोजान से चाहता हूं, लेकिन मेरे साथ समस्या यह है कि मैं शादीशुदा और 2 बेटियों का पिता हूं और उन्हें छोड़ नहीं सकता.’’

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यह सुन कर योगिता कुछ पल चुप रहने के बाद बोली, ‘‘कोई बात नहीं, मुझे मंजूर है. यदि आप मेरे साथ शादी नहीं करोगे तब भी मैं बिना शादी के आप के साथ रह लूंगी. आप अपनी पत्नी को गांव छोड़ देना, यहां पर मैं दोनों बेटियों को अच्छे से संभाल लूंगी.’’

योगिता के इस प्रस्ताव से सुशील मन ही मन बहुत खुश हुआ. वह योगिता के प्यार में इतना डूब चुका था कि उस ने पार्वती के पास जाना बंद कर दिया.

पार्वती इस बात को समझ गई थी कि योगिता ने उस के प्रेमी सुशील को उस से छीन लिया है, इसलिए वह योगिता से नफरत करने लगी.

दूसरी ओर सुशील पत्नी को गांव भेजने का उपाय खोजने लगा. एक दिन उस ने पत्नी को विश्वास में लेते हुए कहा, ‘‘गांव में मातापिता की तबीयत खराब है. ऐसा करो, तुम उन की देखभाल के लिए गांव चली जाओ. यहां बच्चों को मैं संभाल लूंगा, वैसे भी हमारी दोनों बेटियां अब बड़ी हो चुकी हैं.’’

पत्नी ने सुशील की बात मान ली तो वह उसे गांव छोड़ आया. इस के बाद योगिता अपने पति को कुछ बोल कर अपने कपड़े आदि ले कर सुशील के घर चली आई. उसे आया देख सुशील की लड़कियां समझ गईं कि इसी महिला के लिए उन के पिता ने मां को गांव का रास्ता दिखा दिया.

उस दिन सुशील को योगिता के साथ अपनी हसरत पूरी करनी थी, इसलिए शाम का खाना खाने के बाद वह योगिता को ले कर बेडरूम में घुस गया. रात में दोनों ने अपनी हसरतें पूरी कीं. इस से दोनों ही खुश थे.

अब योगिता सुशील के घर पत्नी की तरह रहने लगी. उसे वहां रहते हुए लगभग एक साल हो चुका था. योगिता का व्यवहार भी बदल चुका था जो सुशील की बेटियों को पसंद नहीं था. जब सुशील घर पर नहीं होता तब दोनों लड़कियां योगिता से झगड़ा मोल लेती थीं. शाम को जब सुशील घर लौटता तब योगिता उस से उन दोनों की शिकायत करती थी.

योगिता की बात पर वह बच्चों को ही डांट देता था. पिता के इस रवैये से दोनों लड़कियां काफी दुखी थीं. दोनों यही सोचती रहती थीं कि इस औरत से कैसे छुटकारा पाया जाए. क्योंकि उसी की वजह से उन की मां उन से दूर चली गई थी.

उसी की वजह से उन्हें रोजाना पिता की डांट भी सुननी पड़ती थी. सुशील की बड़ी बेटी सुधा और छोटी बेटी सुजाता (काल्पनिक नाम) की एक दिन पार्वती माने से जानपहचान हो गई थी.

फिर दोनों बहनों ने पार्वती को अपना दुखड़ा सुनाया और उस से योगिता को घर से बाहर करने का उपाय पूछा.

योगिता का बुरा वक्त

पार्वती भी योगिता से चिढ़ी हुई थी. क्योंकि उस ने उस के प्रेमी सुशील को उस से छीन लिया था. इसलिए वह दोनों बहनों की मदद करने को तैयार हो गई. पार्वती ने कहा कि इस का एक ही उपाय है कि योगिता का पता ही साफ कर दिया जाए. एक दिन सुशील को शादी के किसी कार्यक्रम में शामिल होने के लिए गुजरात जाना पड़ा. अच्छा मौका देख पार्वती, सुजाता और सुधा के प्रेमी शैलेश काले ने मिल कर योगिता की हत्या की साजिश रच डाली.

वारदात के दिन पार्वती और शैलेश काले सुजाता के घर के नजदीक पहुंचे. इमारत के गेट पर मौजूद सुरक्षा गार्ड को शराब का लालच दे कर वे दोनों इमारत में प्रवेश कर गए. उस वक्त योगिता कमरे में बेड पर गहरी नींद में सोई थी. उसी का फायदा उठा कर उन्होंने नींद में ही योगिता का गला चुनरी से घोंट दिया.

उस की हत्या करने के बाद शैलेश काले ने सुजाता के प्रेमी नीरज मिश्रा को फोन कर के आटो रिक्शा लाने को कहा. उस ने नीरज को बताया कि योगिता की तबीयत खराब है, उसे डाक्टर के पास ले जाना है. फिर पार्वती ने योगिता की लाश एक कंबल में लपेट कर आटो रिक्शा में रख दी. उन्होंने जंगल में ले जा कर लाश फेंक दी.

पहली अप्रैल, 2019 को किसी शख्स की नजर लाश पर गई तो उस ने फोन पर यह जानकारी पुलिस को दे दी. सूचना पा कर थाना तुलिंज के सीनियर पीआई डानियल बेन, पीआई राकेश, हवलदार दीपक पाटिल, नायक नवनाथ वारडे को ले कर मौके पर पहुंच गए. लाश किसी महिला की थी और छिन्नभिन्न अवस्था में थी.

मौके की काररवाई के बाद पुलिस ने लाश की शिनाख्त करानी चाही लेकिन मृतका को कोई नहीं पहचान पाया. तब पुलिस ने लाश मोर्चरी में रखवा दी. हत्यारों तक पहुंचने से पहले महिला की लाश की शिनाख्त जरूरी थी, इसलिए पुलिस ने जिस जगह पर लाश मिली, उस जगह के सारे रास्तों के सीसीटीवी फुटेज की जांच की. इस में पुलिस को सफलता मिल गई.

फुटेज में एक आटोरिक्शा दिखाई दिया, जिस पर जाह्नवी लिखा था. पता लगाने पर जानकारी मिली कि आटोरिक्शा नीरज नाम के युवक का था. पुलिस ने नीरज को हिरासत में ले कर पूछताछ की तो उस ने सारी कहानी बता दी. इस के बाद पुलिस ने पार्वती माने को भी हिरासत में ले लिया.

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पार्वती ने पुलिस के सामने अपना अपराध स्वीकार कर लिया. उस ने पुलिस को योगिता की हत्या की सारी कहानी सुना दी. जिस के बाद पुलिस ने 3 अप्रैल, 2019 को शैलेश काले, सुधा और सुजाता को भी हिरासत में ले लिया. पुलिस ने सभी को कोर्ट में पेश कर न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया.

कथा लिखे जाने तक दोनों बहनों की जमानत हो चुकी थी. मामले की तफ्तीश पीआई राकेश के. जाधव कर रहे थे.

राजनीति का डीएनए : भाग 3

पिछले अंकों में आप ने पढ़ा:

शादीशुदा रूपमती का सूरजभान के साथ चक्कर चल रहा था. सूरजभान भी शादीशुदा था और उस ने रूपमती के पति अवध को शराब की लत लगा दी थी. जब सूरजभान की पत्नी अनुपमा को इस नाजायज संबंध का पता चला, तो उस ने अपने नौकर दारा से रूपमती को सबक सिखाने के लिए कहा.

अब पढ़िए आगे…

एक रात रूपमती ने सूरजभान से कहा, ‘‘मेरा मरद तो अब किसी काम का है नहीं. अब तो वह हमें साथ देख लेने के बाद भी चुप रहता है. वह तो शराब का गुलाम हो चुका है. उस ने शराब पीने में खेतीबारी बेच दी. तुम ने उसे जुए की लत में ऐसा उलझाया कि यह घर तक गिरवी रखवा दिया. कम से कम अब तो मुझे औलाद का सुख मिलना चाहिए. आज की रात मुझे तुम से औलाद का बीज चाहिए.’’

सूरजभान ने रूपमती की बंजर जमीन में अपने बीज डाल दिए.

सुबह सूरजभान के निकलते ही दारा शराब की बोतल ले कर वहां पहुंचा और उस ने अवध को जगाया.

‘‘तुम्हारा मालिक तो चला गया,’’ अवध ने दरवाजा खोल कर कहा.

‘‘हां, लेकिन उन्होंने तुम्हारे लिए शराब भेजी है,’’ दारा ने शराब की बोतल थमाते हुए कहा.

‘‘अरे वाह, क्या बात है तुम्हारे मालिक की,’’ कह कर अवध ने बोतल मुंह से लगा ली.

थोड़ी ही देर में शराब में मिला जहर असर दिखाने लगा. अवध को जलन से भयंकर पीड़ा होने लगी. वह कसमसाने लगा, लेकिन ज्यादा नशे के चलते उस के मुंह से आवाज तक नहीं निकल पा रही थी. वह उसी हालत में तड़पता रहा और हमेशा के लिए सो गया.

दारा ने सोचा तो यह था कि रूपमती के पति की हत्या के आरोप में सूरजभान जेल चले जाएंगे और वह मालकिन के शरीर का मालिक बनेगा, लेकिन ऐसा हुआ नहीं.

दरअसल, रूपमती ने दारा को शराब की बोतल देते हुए देख लिया था. वह समझ चुकी थी कि सूरजभान का खानदान उस के पीछे लग चुका है और उस की जान को भी खतरा हो सकता है.

रूपमती ने सूरजभान को बताया, तो उस ने कहा, ‘‘तुम यहां से कहीं दूर चली जाओ और अपनी नई जिंदगी शुरू करो. मैं तुम्हें हर महीने रुपए भेजता रहूंगा. अगर तुम्हारी कोई औलाद हुई, तो उस की जिम्मेदारी भी मेरी. लेकिन ध्यान रखना कि भूल कर भी मेरा नाम नहीं आना चाहिए.’’

अपनी जान के डर से रूपमती को दूर शहर में जाना पड़ा. जाने से पहले वह अपने पति के कातिल दारा को जेल भिजवा चुकी थी. सूरजभान या उस की पत्नी अनुपमा ने उसे बचाने की कोई कोशिश नहीं की थी.

वजह, चुनाव होने वाले थे. वे दारा से मिलने या उसे बचाने की कोशिश में जनता के साथसाथ विपक्ष को भी कोई होहल्ला मचाने का मौका नहीं देना चाहते थे.

इस के बाद सूरजभान की जिंदगी में न जाने कितनी रूपमती आई होंगी. अब वह राजनीति का उभरता सितारा था. अपने पिता की विरासत को गांव की सरपंची से निकाल कर वह लोकसभा तक में कामयाबी के झंडे गाड़ चुका था. उस के काम से खुश हो कर पार्टी ने उसे मंत्री पद भी दे दिया था.

इतना लंबा सफर तय करने में कितने लोग मारे गए, कितनी बेईमानियां, कितने घोटाले, कितने दंगेफसाद, कितने झूठ, कितने पाप करने पड़े, खुद सूरजभान को भी याद नहीं.

आज सूरजभान 70 साल का बूढ़ा हो चुका था. उसे याद रहा तो सिर्फ इतना कि एक रूपमती थी. एक अवध था. वह पत्नी अनुपमा को एक बार मुख्यमंत्री के बिस्तर पर भी भेज चुका था.

राजनीति का ताज पहनने के लिए सूरजभान ने अपनी पत्नी को सीढ़ी की तरह इस्तेमाल किया था. उस का बेटा विदेश में बस चुका था.

सूरजभान को यह भी याद था कि विधानपरिषद में मंत्री चुने जाने के बाद दूसरी बार जब वह मंत्री चुना गया था, तब वह अनुपमा के पास गया था. तब उस ने वहां दारा को देखा था. दारा ने उस के पैर छुए थे.

सूरजभान ने अनुपमा से पूछा था कि दारा यहां कैसे? तो उस ने जवाब दिया था, ‘‘मेरे कहने पर ही इस ने अवध की हत्या की थी, तो मेरा फर्ज बनता है कि मैं इसे पनाह दूं.

सूरजभान कुछ नहीं बोला. वह फिर कभी अनुपमा से मिलने नहीं गया. रही सीढ़ी की बात, तो वह जानता था कि राजनीति में ऊपर उठने के लिए चाहे हजारों को सीढ़ी बना कर इस्तेमाल करो, लेकिन उतरने की जरूरत नहीं पड़ती.

सूरजभान का सब से मुश्किल भरा समय था मुमताज कांड. तब उस की काफी बदनामी हुई थी. हाईकमान ने यह कह कर फटकारा था कि या तो इस मामले को निबटाइए या इस्तीफा दे दीजिए. पार्टी की बदनामी हो रही है.

मुमताज की उम्र महज 23 साल थी. खूबसूरत, नाजुक अदाएं, लटकेझटकों से भरपूर. कालेज अध्यक्ष का चुनाव जीत कर वह खुश थी.

वह सूरजभान से मिलने आई. सूरजभान ने आशीर्वाद दिया, बधाई दी और अकेले में भोजन पर बुलाया.

भोजन के समय सूरजभान ने पूछा, ‘‘यह तो हुई तुम्हारी मेहनत की जीत. आगे बढ़ना है या बस यहीं तक?’’

‘‘नहीं सर, आगे बढ़ना है,’’

‘‘गौडफादर के बिना आगे बढ़ना मुश्किल है.’’

‘‘सर, अगर आप का आशीर्वाद रहा तो…’’

‘‘नगरनिगम के चुनाव के बाद महापौर, फिर विधायक और मंत्री पद भी.’’

‘‘क्या सर, मैं ये सब भी बन सकती हूं?’’ उस ने हैरानी से पूछा.

‘‘यह तो तुम पर है कि तुम कितना समझौता करती हो.’’

‘‘सर, मैं कुछ भी कर सकती हूं.’’

‘‘कुछ भी नहीं, सबकुछ.’’

‘‘हां सर, सबकुछ.’’

‘‘तो कुछ कर के दिखाओ.’’

मुमताज समझ गई कि उसे क्या करना है. उसी रात भोजन के बाद वह सूरजभान के बिस्तर पर थी.

लेकिन, जब मुमताज को लगा कि उसे झूठे सपने दिखाए जा रहे हैं, तो उस ने शिकायत की, ‘‘मुझे विधायक का टिकट चाहिए.’’

सूरजभान ने समझाया, ‘‘देखो, तुम पहले नगरनिगम का चुनाव लड़ो. पार्टी में कई सीनियर नेता हैं. उन्हें टिकट न देने पर पार्टी में असंतोष फैलेगा. मुझे सब का ध्यान रखना पड़ता है. फिर हमें भी हाईकमान का फैसला मानना पड़ता है. सबकुछ मेरे हाथ में नहीं है.’’

वह चीख पड़ी, ‘‘सबकुछ आप के हाथ में ही है. आप चाहते ही नहीं कि मैं आगे बढूं. मैं ने अपना जिस्म आप को सौंप दिया. आप को अपना सबकुछ माना. आप पर भरोसा किया और आप मुझे धोखा दे रहे हैं.’’

‘‘इस में धोखे की क्या बात है? चाहो तो मैं तुम्हारे अकाउंट में 5-10 करोड़ रुपए जमा करवा दूं.’’

लेकिन, मुमताज को सत्ता की हवस थी. जब उस ने बारबार अपना शरीर देने की बात कही, तो सूरजभान को गुस्सा आ गया. वह चीख पड़ा, ‘‘क्या कीमत है तुम्हारे जिस्म की? मैं तुम्हें करोड़ों रुपए दे रहा हूं. बाजार में हजार भी नहीं मिलते. शादी कर के घर बसाती, तो 5-10 लाख रुपए दहेज देती, तब कहीं जा कर कोई मिडिल क्लास लड़का मिलता.’’

मुमताज ने सूरजभान की नाराजगी देख कर कहा, ‘‘मैं ने आप की रासलीला को कैमरे में कैद कर लिया है. मैं आप का राजनीतिक कैरियर तो तबाह करूंगी ही, दूसरी पार्टी से पैसे और चुनाव का टिकट भी लूंगी.’’

बस, फिर क्या था. दूसरे दिन ही मुमताज की लाश मिली. खूब हल्ला हुआ. सूरजभान पर सीबीआई का शिकंजा कसा. खूब थूथू हुई. उस के खिलाफ कोई सुबूत था नहीं, इसलिए वह बाइज्जत बरी हो गया.

एक और बात सूरजभान की यादों में बनी रही. जब वह पार्टी की एक महिला मंत्री, जिस की उम्र तकरीबन 40 साल रही होगी, के साथ अकेले डिनर पर था. उस ने पूछा था. ‘‘आप यहां तक कैसे पहुंचीं?’’

महिला मंत्री ने बड़ी बेबाकी से जवाब दिया था, ‘‘औरत के लिए तो एक ही रास्ता रहता है. मैं जवान थी. खूबसूरत थी. पार्टी हाईकमान के बैडरूम से सफर शुरू किया और धीरेधीरे उन की जरूरत बन गई. उन की सारी कमजोरियां समझ लीं. वे मुझ पर निर्भर हो गए. लेकिन हां, कभी उन पर हावी होने की कोशिश नहीं की.

‘‘धीरेधीरे उन की नजरों में मैं चढ़ गई. एक चुनाव जीतने में उन की मदद ली, बाकी अपनी मेहनत.

‘‘हां, अब मैं जब चाहे अपनी पसंद के मर्द को बिस्तर तक लाती हूं. सब ताकत का, सत्ता का खेल है.’’

अब सूरजभान राजनीति का चाणक्य कहलाता था. वह राज्य सरकार से ले कर केंद्र सरकार में मंत्री पदों पर रह चुका था. जब उस की पार्टी की सरकार नहीं बनी, तब भी वह हजारों वोटों से चुनाव जीत कर विपक्ष का ताकतवर नेता होता था, लेकिन अब उस की उम्र ढल रही थी. नए नेता उभर कर आ रहे थे.

ऐसे में सूरजभान के पास संन्यास लेने के अलावा कोई चारा नहीं था. फिर भी पार्टी का वरिष्ठ नेता होने के चलते पार्टी उसे राष्ट्रपति का पद देने के लिए विचार कर रही थी.

तभी रूपमती ने नया धमाका किया. यह धमाका सूरजभान के लिए बड़ा सिरदर्द था. वह जानता था कि रूपमती एक चालाक औरत है. उस ने अपनी जवानी में अच्छेअच्छों को घायल किया था और बुढ़ापे में उस ने अपनी औलाद को ढाल बना कर इस्तेमाल किया.

वैसे, रूपमती के पास कहने को बहुतकुछ था. उस के पति की हत्या, सूरजभान के साथ उस के नाजायज संबंध वगैरह.

जब सूरजभान पहली बार मंत्री बना था, तो रूपमती उस से मिलने आई थी. उस ने तब डरते हुए कहा था, ‘‘अब आप के पास पैसा और ताकत दोनों हैं. आप मुझे कभी भी मरवा सकते हैं. मैं आज के बाद आप से कभी नहीं मिलूंगी. आप मुझे 5 करोड़ रुपए दे दीजिए, हर महीने का झंझट खत्म. आप का बेटा बड़ा हो रहा है. मैं शादी कर के कहीं ओर बस जाऊंगी.’’

सूरजभान ने भी सोचा कि चलो, पीछा छूट जाएगा. इस के बाद वह कभी नहीं आई.

आज जबकि पार्टी सूरजभान का नाम राष्ट्रपति पद के लिए तय कर चुकी थी, ऐसे में रूपमती का आरोप था कि उस के बेटे सुरेश का पिता सूरजभान है और वह उसे अपना बेटा स्वीकार करे.

इस में रूपमती का क्या फायदा हो सकता था? विरोधी पार्टी द्वारा मोटी रकम? क्या कोई राजनीतिक पद पाने की इच्छा? जब मीडिया में बातें होने लगीं, तो सूरजभान ने कहा, ‘‘मैं इस औरत को जानता तक नहीं. यह औरत झूठ बोल रही है.’’

रूपमती ने भी मीडिया को बताया,  ‘‘इस से मेरे पुराने संबंध थे. गांव की राजनीति शुरू करने से पहले.’’

सूरजभान ने बयान दिया, ‘‘यह उस के पति का बच्चा होगा. मेरा कैसे हो सकता है?’’

‘‘नहीं, यह बच्चा सूरजभान का ही है,’’ रूपमती ने जवाब दिया.

‘‘इतने दिनों बाद सुध कैसे आई?’’

‘‘बेटे को उस का हक दिलाने के लिए.’’

मामला कोर्ट में चला गया. अनुपमा ने भी पति सूरजभान का पक्ष लिया. उन का बेटा विदेश में था. उसे इन सब बातों की खबर थी, लेकिन वह क्या कहता?

अनुपमा से पूछने पर उस ने कहा,  ‘‘मेरे पति देवता हैं. उन्हें बदनाम करने की साजिश की जा रही है, ताकि वे राष्ट्रपति पद के दावेदार न रहें.’’

जब कोर्ट ने डीएनए टैस्ट कराने का आदेश दिया, तो सूरजभान समझ गया कि पुराने पाप सामने आ रहे हैं.

इतनी ऊंचाई पर पहुंचने के लिए पाप की जो सीढि़यां लगाई गई थीं, आज वही सीढि़यां ऊंचाई से उतार फेंकने के लिए कोई दूसरा लगा रहा है.

सूरजभान ने सोचा, ‘जितना पाना था, पा चुका. अब तो जिंदगी की कुरबानी भी देनी पड़ी, तो दूंगा. डीएनए टैस्ट हो गया, तो सब साफ हो जाएगा. इस से बचना मुश्किल है, क्योंकि अदालत, मीडिया तक बात जा चुकी है. विपक्ष हंगामा कर रहा है.’

सूरजभान ने बहुत सोचा, फिर एक चिट्ठी लिखी :

‘रूपमती नाम की औरत को मैं निजी तौर पर नहीं जानता. इस के बुरे दिनों में मैं ने इस के पति की कई बार पैसे से मदद की थी. एक दिन यह मुझ से मिलने आई और कहने लगी कि राष्ट्रपति के चुनाव से हट जाओ या सौ करोड़ रुपए दो. अगर मैं राष्ट्रपति पद से हटता हूं, तो यह मेरी पार्टी की बेइज्जती होगी.

‘मैं ने जिंदगीभर देश की सेवा की है. सेवक के पास सौ करोड़ रुपए कहां से आएंगे? पार्टी और जनसेवा मेरी जिंदगी का मकसद रहे हैं. मैं तो पूरे देश की जनता को अपनी औलाद मानता हूं.

‘देश के डेढ़ सौ करोड़ लोग मेरे भाई, मेरे बेटे ही तो हैं, तो इस का बेटा भी मेरा हुआ. पर मैं ब्लैकमेल होने के लिए राजी नहीं हूं. मुझे डीएनए टैस्ट कराने से भी एतराज नहीं है, लेकिन विपक्ष इस समय कई राज्यों में है. उस के लिए डीएनए रिपोर्ट बदलवाना कोई मुश्किल काम नहीं है. मेरे चलते पार्र्टी की इमेज मिट्टी में मिले, यह मैं बरदाश्त नहीं कर सकता.

‘रूपमती नाम की औरत झूठी है. यह विपक्ष की चाल है. मैं इस बुढ़ापे में तमाशा नहीं बनना चाहता. सो, जनहित, पार्टी हित और इस औरत द्वारा बारबार ब्लैकमेल किए जाने से दुखी हो कर अपनी जिंदगी को खत्म कर रहा हूं. जनता और पार्टी इस औरत को माफ कर दे. प्रशासन इस के खिलाफ कोई कदम न उठाए.’

दूसरे दिन सूरजभान जहर खा चुका था और रूपमती को पुलिस ने खुदकुशी के लिए मजबूर करने के आरोप में हिरासत में ले लिया.

पार्टी में शोक की लहर थी. जनता को अपने नेता के मरने का गहरा दुख हुआ. दाह संस्कार के बाद सूरजभान के बेटे को पार्टी प्रमुख ने महत्त्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी. बेटा अपने पिता की विरासत को संभालने के लिए तैयार था. जनता के सामने साफ था कि नेता के बेटे को हर हाल में चुनाव में भारी वोटों से जिताना है. यही उस की अपने महान नेता के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी.

सहानुभूति की इस लहर में सूरजभान का बेटा भारी वोटों से चुनाव जीता. सूरजभान के नाम पर शहर में मूर्तियां लगाई गईं.

राजनीति इसी को कहते हैं कि आदमी ठीक समय पर मरे, तो महान हो जाता है.

इस बार रूपमती नाकाम हो गई. उस की चालाकी इस दफा हार गई. क्यों न हो, राजनीतिबाजों से जीतना किसी के बस की बात नहीं. उन्हें तो केवल इस्तेमाल करना आता है. सूरजभान ने तो अपनी मौत तक को इस्तेमाल कर लिया था.

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