जिम्मेदारी बनती है कि नहीं: भाग 2

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‘‘भूल जाओ न उसे,’’ पापा बोले थे, ‘‘समझ लो उस का कोई भी अस्तित्व कहीं है ही नहीं. शरीर का जो हिस्सा सड़गल जाए उसे काट कर अलग करना ही पड़ता है वरना तो सारा शरीर गलने लगता है… तुम्हारा अपना बेटा शादी कर के अपने घर में खुश है न, तुम पतिपत्नी चैन से जीते क्यों नहीं? क्यों उठतेबैठते उसी का रोना ले कर बैठे रहते हो?’’

‘‘अपना बेटा खुश है और यह कौन सा पराया था. भैया, हम ने कभी इस की खुशी पर कोई रोक नहीं लगाई. अपने बेटे पर उतना खर्च नहीं किया जितना इस पर करते रहे. इस की पढ़ाई का कर्ज हम आज तक उतार रहे हैं. अपना बेटा तो वजीफे से ही पढ़ गया. जहां इस ने कहा, वहीं इस की शादी की. अब और क्या करते. कम से कम अपने घर में चैन से जीने तो देता हमें…हमारे पीछे हाथ धो कर पड़ना उस ने अपना अधिकार बना लिया है. हम खुश हुए नहीं कि जहर उगलना शुरू. चार लोगों में तमाशा बनाना जैसे शगल है उस का…अभी राहुल के घर बच्चा होगा…’’

‘‘तब मत बुलाना न उसे. जब तुम जानती हो कि वह तुम्हारा तमाशा बनाता है तब काट कर फेंक क्यों नहीं देतीं उसे.’’

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‘‘भैया, वह अपना है.’’

‘‘अपना समझ कर सब सहन करती हो उसी का तो वह फायदा उठाता है. शायद वह तुम पर वही अधिकार चाहता है, जो तब था जब तुम ब्याह कर उस घर में गई थीं. तुम ने अपनी संतान तब पैदा की थी जब तुम्हारा देवर 10 साल का था. इतने साल का उस का एकाधिकार छिन जाना उस से सहा नहीं गया. अपनी सीमा रेखा भूल गया.

‘‘ऐसी मानसिकता धीरेधीरे प्रबल होती गई. उस का अपमानित करना बढ़ता गया और तुम्हारी सहनशक्ति बढ़ती गई. मोहममता की मारी तुम उसे बालहठ समझती रहीं. दबी आवाज में मैं ने तुम से पहले भी कहा था, ‘अपने बेटे और देवर में उचित तालमेल रखो. जिस का जितना हक बनता है उसे न उस से ज्यादा दो और न ही कम.’ अब त्याग दो उसे. अपने जीवन से निकाल दो अभी.’’

स्तब्ध रह गया हूं मैं आज. मेरे पिता जो सदा निभाना सिखाते रहे, आज काट कर फेंक देना सिखाने लगे.

‘‘वो जमाना नहीं रहा अब जब हम आग का दरिया पचा जाया करते थे और समुंदर के समुंदर पी कर भी जाहिर नहीं होने देते थे. आज का इनसान इतना सहनशील नहीं रहा कि बुराई पर बुराई सहता रहे और खून के घूंट पी कर भी मुसकराता रहे.

‘‘आज हर तीसरा इनसान अवसाद में जी रहा है. आखिर क्यों? पढ़ाईलिखाई ने तहजीब में रहना सिखाया है न इसीलिए तहजीब ही निभातेनिभाते हम अवसाद का शिकार हो जाते हैं. जो लोग कुत्तेबिल्ली की तरह लड़ा करते हैं वे तो अपनी भड़ास निकाल चुकते हैं न, भला वे क्यों जाएंगे अवसाद में.

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‘‘संस्कारी और तहजीब वाला इनसान खुद पर ही जुल्म करे, क्या इस से यह अच्छा नहीं कि वह उस इनसान से ही किनारा कर ले. भूल जाओ उस 5 साल के बच्चे को जो कभी तुम्हारा हर पल का साथी था. अब बहुत बदल चुका है वह. समझ लो वह इस शहर में ही नहीं रहता. सोच लो अमेरिका चला गया है…दिल को खुश रखने को यह खयाल क्या बुरा है गायत्री?’’

कुछ कचोटने लगा है मुझे. मेरे आफिस में मेरा एक घनिष्ठ मित्र है जो आजकल बदलाबदला सा लगने लगा है. पिछले 10 साल से हम साथसाथ हैं. अच्छी दोस्ती थी हम में. जब से मेरा प्रोमोशन हुआ है, वह नाखुश सा है. जलन वाली तो कोई बात ही नहीं है क्योंकि उस का क्षेत्र मेरे क्षेत्र से सर्वदा अलग है. ऐसा तो है ही नहीं कि उस की कोई शह मेरी गोद में चली आई हो. कटाकटा सा भी रहता है और मौका मिलते ही चार लोगों के बीच अपमानित भी करता है. पिछले 6 महीने से मैं उस का यह व्यवहार देख रहा हूं, कोशिश भी की है कि बैठ कर पूछूं मगर पता नहीं क्यों वह अवसर भी नहीं देता. कभीकभी लगता है वह मुझ से दुश्मनी भी निकाल रहा है. अपना व्यवहार भी मैं पलपल परख रहा हूं कि कहीं मैं ही कोई भूल तो नहीं कर रहा.

हैरान हूं मैं. मैं तो आज भी वहीं खड़ा हूं जहां कल खड़ा था, ऐसा लगता है वही दूर जा कर खड़ा हो गया है और बातबेबात मेरा उपहास उड़ा रहा है. धीरेधीरे दुखी रहने लगा हूं मैं. आखिर मैं कहां भूल कर रहा हूं. काम में जी नहीं लगता. ऐसा लगता है कोई प्यारी चीज हाथ से निकली जा रही है. शायद मेरे स्नेह का निरादर कर उसे अच्छा लगता है.

‘‘अपनेआप के लिए भी तुम्हारी कोई जिम्मेदारी बनती है न गायत्री. अपने पति के प्रति, अपनी सेहत के प्रति… अपने लिए जीना सीखो, बच्ची.’’

पापा अकसर प्यार से बूआ को बच्ची कहते हैं. बूआ की अपने देवर के प्रति ममता तो मैं बचपन से देखता आ रहा हूं आज ऐसी नौबत चली आई कि उसी से बूआ को हाथ खींचना पड़ेगा… क्योंकि बूआ अवसाद में जा चुकी है. डिप्रेशन का मरीज जब तक डिप्रेशन की वजह से दूर न होगा, जिएगा कैसे.

‘‘कोई भी रिश्ता तभी तक निभ सकता है जब तक दोनों ही निभाने के इच्छुक हों. अमृत का भरा कलश केवल एक बूंद जहर से विषाक्त हो जाता है. हमारा मन तो मानवीय मन है जिस पर इन बूंदों का निरंतर गिरना हमें मार न दे तो क्या करे.

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‘‘अपना निरादर कराना भी तो प्रकृति का अपमान है न. सहना भी तभी तक उचित है जब तक आप सह पाएं. सहने की अति यदि आप को या हमें मारने लग जाए तो क्यों न हाथ खींच लिया जाए, क्योंकि रिश्तों के साथसाथ अपने प्रति भी हमारी कोई जिम्मेदारी है न. क्यों कोई आप के प्यार और अपनत्व का तिरस्कार करता रहे, क्यों आप के वात्सल्य और स्नेह को कोई अपनी जागीर ही समझ कर जब चाहे पैर के नीचे रौंद दे और जब चाहे जरा सा पुचकार दे.

‘‘अब छोटा बच्चा नहीं है वह कि तुम हाथ खींच लोगी तो मर जाएगा. 2 बच्चों का बाप है. अपने आलीशान घर में रहता है. तुम्हारे घर से कहीं बड़ा घर है उस का. क्या कभी बुलाता है वह तुम्हें? क्या तुम से कभी पूछता है वह कि तुम जिंदा हो या मर गईं?

‘‘उसे उतना ही महत्त्व दो जिस के वह लायक है. संकरे बर्तन में ज्यादा वस्तु डाली जाए तो वह छलक कर बाहर निकलती है. यह इनसानी फितरत है बच्ची, पास पड़ी शह की मनुष्य कद्र नहीं करता. जो मिल जाए वह मिट्टी और जो खो जाए वह सोना, तो सोना बनो न पगली…मिट्टी क्यों बनती हो?’’

चुप हो गए पापा. शायद बूआ पर नींद की गोली का असर हो चुका है. गहरी पीड़ा में हैं बूआ. क्षमता से ज्यादा जो सह चुकी हैं.

फूफाजी और पापा बाहर चले आए. हमारा पूरा परिवार बूआ की वजह से दुखी है. निर्णय हुआ कि कुछ दिन दोनों राहुल के पास बंगलौर चले जाएंगे इस माहौल से दूर. शायद जगह बदल कर बूआ को अच्छा लगे.

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हफ्ता भर बीत चुका है. अब मैं अपने नाराज चल रहे मित्र की तरफ देखता ही नहीं हूं. जरूरी बात भी नहीं करता. पास से निकल जाता हूं जैसे उसे देखा ही नहीं. पहले उस के लिए रोज जूस मंगवाता था, अब सिर्फ अपने ही लिए मंगवाता हूं. नतीजा क्या होगा मैं नहीं जानता मगर मैं चैन से हूं. कुंठा तंग नहीं करती, ऐसा लगता है अपनेआप पर दया कर रहा हूं. क्या करूं मेरे लिए भी तो मेरी कोई जिम्मेदारी बनती है न. पापा सच ही तो कह रहे थे, किसी के लिए मिट्टी भी क्यों बना जाए. सहज उपलब्ध हो कर क्यों अपना मान घटाया जाए. आखिर हमारे आत्मसम्मान के प्रति भी हमारी कोई जिम्मेदारी बनती है कि नहीं.

एकटर किरण कुमार हुए Corona संक्रमित, दिया ऐसा बयान

मुंबई में कोरोना (Corona) संक्रमण बड़ी तेजी से फैल रहा है. इसके संक्रमण से आम इंसान, पुलिस बल, महाराष्ट्र राज्य के वरिष्ठ मंत्री के साथ ही अब फिल्म व टीवी अभिनेता किरण कुमार (Kiran Kumar) भी ग्रसित हो चुके हैं. अभिनेता किरण कुमार ने स्वयं इस बात को जगजाहिर किया. 74 वर्षीय अभिनेता किरण कुमार के अनुसार 14 मई को उनका कोरोना टेस्ट पॉजिटिव आया था. तब से वह अपने घर पर क्वारंटीन हैं.

किरण कुमार (Kiran Kumar) का कहना है कि उन्हें कोरोना के किसी भी प्रकार की कोई खांसी, बुखार, सांस लेने में कोई दिक्कत या फिर कोई दूसरे लक्षण नहीं थे. वास्तव में वह ‘एसिम्पटोमैटिक हैं, जिसकी जांच कराने के लिए जब वह अस्पताल पहुंचे, तो कोरोना पॉजिटिव निकला. उनका घर दो मंजिला है. उनकी पत्नी और बच्चे पहली मंजिल पर रह रहे हैं. जबकि किरण कुमार ने स्वयं को अपने घर की दूसरी मंजिल पर क्वारंटीन किया है. वह पत्नी व बच्चों से फोन पर बात करते रहते हैं.

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किरण कुमार ने आगे कहा- ‘‘कोरोना से डरने की जरूरत नहीं है. इससे बचाव कर हमें निरंतर आगे बढ़ना है. मैं एकदम फिट हूं. एक्सरसाइज करता हूं. हमें अपना एटीट्यूड पॉजिटिव रखना है. हमें घर पर रहना है, जिससे हमारी वजह से कोई अन्य इंसान कोरोना संक्रमित न हो सके. हमें पूरे भारत को इस वायरस से बचाना है.’’

 

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किरण कुमार (Kiran Kumar) अब तक ‘बागी सुल्तान’, ‘शतरंज’, ‘शोले और तूफान’, ‘ईना मीना डीका’, ‘दिलबर’, ‘हिम्मत’, इंतकाम’, ‘दोस्ती’, जिंदाबाद’, ‘धड़कन’ सहित डेढ़ सौ से अधिक फिल्में तथा तकरीबन पचास टीवी सीरियलों मेंं अभिनय कर चुके हैं.

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भूखे लोगों का बने सहारा

कोरोना के संक्रमण को रोकने के लिए लागू किए गए लौकडाउन में सब से ज्यादा दिक्कत फुटपाथ, रेलवे स्टेशन, बस अड्डे और गलीचौराहे पर घूमने वाले दिमागी या जिस्मानी तौर पर कमजोर और लोगों को हुई है. लोगों के घरों से बाहर न निकल पाने से इन बेघरबार लोगों को भूखे पेट ही रहना पड़ रहा है.

ऐसे लोगों के दर्द को महसूस किया है एक छोटे से कसबेनुमा छोटे शहर सालीचौका के एक नौजवान ने. पत्रकारिता से जुड़ा यह नौजवान उमेश पाली जब एक दिन लौकडाउन की खबरों की तलाश में निकला तो इस ने रेलवे स्टेशन के सूने पड़े प्लेटफार्म पर मैले और फटेहाल कपड़ों में 2 भूखेप्यासे लोगों को देखा. उन लोगों के खानेपीने का इंतजाम कर उमेश पाली ने ऐसे ही दूसरे जरूरतमंद लोगों की मदद करने की ठान ली.

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मदद करने के लिए पत्रकार उमेश पाली ने सोशल मीडिया में एक व्हाट्सएप ग्रुप ‘कोरोना आपदा सेवा ग्रुप’ बना कर शुरुआत में कुछ नौजवानों को अपने साथ जोड़ लिया और आपसी सहयोग से ये सब जरूरतमंदों तक खाना पहुंचाने लगे. धीरेधीरे कसबे के दूसरे लोगों ने भी इस काम में अपना सहयोग देना शुरू कर दिया और अब हालात ये हैं कि हर दिन तकरीबन 40 से 50 जरुरतमंद लोगों को खानेपीने का सामान पहुंचाने का काम इन जागरूक नौजवानों द्वारा किया जा रहा है.

सुबह के 11 बजते ही सालीचौका   के इस व्हाट्सएप ग्रुप पर  मोबाइल में मैसेज आने लगते हैं कि रोटीसब्जी तैयार है. फिर क्या, ग्रुप के सदस्य निकल पड़ते हैं और घरघर जा कर 5-5 रोटी जमा करने का सिलसिला शुरू हो जाता है और तकरीबन एक घंटे में 200 के आसपास रोटियां जमा हो जाती हैं.

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घर में बनी हुई रोटियों के साथ सब्जी, अचार या जो सामग्री घर में बनती है, वह ग्रुप के सदस्यों द्वारा जमा होती है. 30 से 40 परिवार से रोटियां जमा कर के एक जगह पर खाने के पैकेट तैयार किए जाते हैं. ठीक 12 बजे दालचावल या फिर सब्जीरोटी रख कर ग्रुप के सदस्य जरूरतमंद लोगो की तलाश में निकल पड़ते हैं. उन लोगों की सेवा देख कर कसबे के पुलिस थाने के पुलिस अफसर, मुलाजिम भी इस मुहिम से जुड़ गए हैं. पुलिस थाने के मुलाजिम भी अपनी गाड़ी में खानेपीने का सामान ले कर आते हैं और फिर शहर में भूखेप्यासे लोगों के पास जा जाकर भोजन बांट दिया जाता है. पुलिस प्रशासन की देखरेख में यह भोजन जरूरतमंद लोगों तक पहुंचाया जाता है.

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खुशियां मनाते इस तरह

लौकडाउन के चलते जहां किसी भी तरह के फंक्शन या पार्टी पर बंदिश लगी हुई है, ऐसे में शहर के लोग अपने परिवार वालों के जन्मदिन, शादी की सालगिरह गरीब और बेसहारा लोगों की मदद कर के मना रहे हैं. जरूरतमंद लोगों को खाना खिला कर इस ग्रुप के सदस्यों ने एक नई परंपरा शुरू कर दी है. जिस सदस्य का जन्मदिन या शादी की सालगिरह होती है, वह अपने घर से भोजन, नमकीन ,मिठाई पूरीसब्जी, पापड़ या घर में जो भी बनता है, वह लाता है और उसे जरूरतमंद लोगों में बांट दिया जाता है.

लौकडाउन के शुरुआती दिनों से ही ‘कोरोना आपदा सेवा ग्रुप’ की तरफ से काम रोज किया जा रहा है. जरूरत पड़ने पर ग्रुप के सदस्य आटा, गेहूं, चावल, तेल जैसी खाद्य सामग्री दान भी कर रहे हैं.

क्वारंटीन सैंटरों पर मिलता नाश्ता

लौकडाउन में जन सेवा का ढोंग करने वाले ज्यादातर नेता जनता से दूरी बनाए हुए हैं, वहीं नौजवानों का यह ग्रुप देश के दूसरे शहरों से आए गरीब और मजदूर तबके के लिए नाश्ते का इंतजाम भी कर रहा है. इसी ग्रुप द्वारा गोकुल पैलेस साली चौका में क्वारंटीन सैंटर’ बनाया गया है, जहां पर बाहर से आए हुए तकरीबन 50 लोग रह रहे हैं. उन के लिए सुबह पोहा का नाश्ता ग्रुप के सदस्यों की तरफ से दिया जा रहा है.

और भी संस्थाएं कर रही हैं मदद

लौकडाउन में गरीब, मजबूर और बुजुर्गों की मदद करने के लिए भले ही समाज के पूंजीपति, उद्योगपति और धन्ना सेठों ने मुंह फेर लिया हो, लेकिन निम्नमध्यम वर्ग के लोगों ने मदद के लिए हाथ खोल दिए हैं. नरसिंहपुर जिले की तेंदूखेड़ा तहसील की योगदान सेवा समिति ने आसपास के छोटेछोटे गांवदेहात में पहुंच कर भोजन के पैकेट, जरूरत का सामान और दवाएं तक लोगों को पहुंचाई हैं. पर्यावरण संरक्षण की सोच लिए योगदान समिति के अविनाश जैन वृक्षारोपण के कामों को पिछले 13 साल से करते आ रहे हैं. कोरोना आपदा के समय उन्होंने देखा कि जब सरकारी तंत्र लोगों की मदद करने के बजाय सख्ती से पेश आ रहा है, तो वे अपने साथियों के साथ लोगों की मदद करने के लिए गांवगांव जाने लगे.

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प्रवासी मजदूरों की आवाजाही शुरू होते ही योगदान समिति ने नैशनल हाईवे नंबर 12 पर  मजदूरों को खानेपीने की चीजों के साथ हिफाजत के लिए मास्क और सैनेटाइजर भी बांटे. जब सरकार से पुलिस टीम को पीपीई किट नहीं मिली तो डाक्टर शचींद्र मोदी की मदद से पीपीई किट का इंतजाम किया गया. ‘पैड वुमन’ माया विश्वकर्मा की ‘सुकर्मा फाउंडेशन’ नाम की गैरसरकारी संस्था तो सड़क पर कैंप लगा कर प्रवासी मजदूरों को भोजन कराने के बाद जूते, चप्पल, मास्क देने के साथ मजदूर औरतों की माहवारी की समस्याओं पर जानकारी दे कर सैनेटरी पैड भी बांट रही है. इसी तरह अध्यापक संघ के नगेंद्र त्रिपाठी ने शिक्षकों की मदद से पैसे जमा कर क्वारंटीन सैंटर और जिले की सीमाओं पर बनी चैक पोस्ट पर तैनात मुलाजिमों को मास्क, सैनेटाइजर और ग्लव्स दे कर उन की हिफाजत का ध्यान रखा है.

लड़ाई जारी है : भाग 3

‘भाभी, अगर आपके ऐसे ही विचार हैं तो क्यों यहाँ इसे लेकर डाक्टरी की परीक्षा दिलवाने लाई, अरे, कोई भी लड़का देखकर बाँध देती उससे…वह इसे चाहे जैसे भी रखता….’ मन कड़ा करके मनीषा ने कहा था .

भाभी कुछ बोल नहीं पाई थीं पर उस दिन के बाद से सुकन्या उसके और करीब आ गई थी, कोई भी परेशानी होती, उससे सलाह लेती . बाद में उसने सुकन्या को समझाते हुए कहा था,‘ बेटा, औरत का चरित्र एक ऐसा शीशा है जिस पर लगी जरा सी किरच पूरी जिंदगी को बदरंग कर देती है और फिर तेरी माँ तो गाँव की भोली-भाली औरत है, दुनिया की चकाचौंध से दूर…अपने आँचल के साये में फूल की तरह सहेज कर तुझे पाला है, तभी तो जरा से झटके से वह विचलित हो उठी हैं…. तू उसे समझने की कोशिश कर .’

भाभी सुकन्या को लेकर चली गईं . दादी ने जब सुकन्या के विवाह का प्रस्ताव रखा तो वह मना नहीं कर पाईं . सुकन्या अपनी लड़ाई अपने आप लड़ रही थी . इसी बीच रिजल्ट निकल आया . सुकन्या का नाम मेडिकल के सफल प्रतियोगी की लिस्ट में पाकर दादाजी बेहद प्रसन्न हुये . दादी के विरोध के बावजूद उन्होंने उन्हें यह कर मना लिया,‘ जरा सोचो हमारी सुकन्या न केवल हमारे घर वरन् हमारे गाँव की पहली डाक्टर होगी . मेरा सीना तो गर्व से चौड़ा हो गया है .’

पिताजी के मन में द्वन्द था तो सिर्फ इतना कि सुकन्या शहर में अकेली कैसे रहेगी ? तब उसने कहा था,‘ सुकन्या गैर नहीं, मेरी भी बेटी है, अगर आप सबको आपत्ति है तो उसकी जिम्मेदारी मैं लेती हूँ  .’

संयोग से उसके शहर के मेडिकल कालेज में ही सुकन्या का एडमीशन हो गया . अनुराधा भी सुकन्या का हौसला बढ़ाने लगी पर माँ का वही हाल रहा .

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इसी बीच पिताजी चल बसे….सुकन्या टूट गई थी . एक वही तो थे जो उसका हौसला बढ़ाते थे वरना माँ के व्यंग्य बाण तो उसके कोमल मन को तार-तार करने में कोई कसर नहीं छोड़ते थे . पता नहीं किस जन्म का बैर वह उसके साथ निकाल रही थीं . उन्हें लगता था कि घर की सारी परेशानी की जड़ सुकन्या ही है, पढ़ लिख कर नाक ही कटवायेगी….. अनुराधा असमंजस में थी न वह सास को कुछ कह पाती थी और न ही बेटी का पक्ष ले पाती थी क्योंकि अगर वह ऐसा करती तो सुकन्या के साथ सास के व्यंग्यबाणों का शिकार उसे भी होना पड़ता था… . जल में रहकर मगर से बैर कैसे लेती…? धीरे-धीरे सुकन्या ने घर जाना बंद कर दिया जब भी छुट्टी मिलती वह उसके पास आ जाती थी .

‘ आपका गंतव्य आ गया .’  जी.पी.एस. ने सूचना दी .

मनीषा कार पार्क करके रिसेप्शनिस्ट से जानकारी लेकर, आई़.सी.यू. में पहुँची . उसे देखकर सुकन्या उसके पास आई तथा रूआँसे स्वर में बोली,‘ बुआ मेरी वजह से दादी की आज ये हालत है….’

‘ ऐसा नहीं सोचते बेटा, अगर तू नहीं होती तो हो सकता है, उनकी हालत और भी ज्यादा खराब हो जाती.’

विजिंटग आवर था अतः सुकन्या उसे लेकर आई.सी.यू में गई…

‘ पानी….’ दादी की आवाज सुनकर सुकन्या उन्हें चम्मच से पानी पिलाने लगी….

उसे देखकर माँ ने कुछ बोलना चाहा तो सुकन्या ने कहा,‘ दादी, आपकी तबियत ठीक नहीं है, आप कुछ मत बोलिये…. बुआ आप दादी के पास रहिये, मैं जरा डाक्टर से मिलकर आती हूँ .’

माँ की आँखों से बहते आँसू न चाहते हुये भी बहुत कुछ कह गये थे वरना जिस तरह का सीवियर अटैक आया था, अगर उन्हें तुरंत सहायता नहीं मिली होती तो न जाने क्या होता… जो माँ  कभी उसकी पढ़ाई की विरोधी थीं वही आज उसे दुआयें देती प्रतीत हो रही थीं .

विजिटिंग आवर समाप्त होते ही वह बाहर आई तथा अनुराधा भाभी के पास बैठ गई .

‘ दीदी, अगर सुकन्या न होती तो पता नहीं क्या हो जाता .’

‘ माँ दवा ले लो वरना तुम्हारी तबियत भी खराब हो जायेगी .’ सुकन्या पानी की बोतल के साथ माँ को दवाई देती हुई बोली . अनुराधा भाभी उसे ममत्व भरी निगाहों से देख रही थीं .

‘ लेकिन यह हुआ कैसे ?’ मनीषा ने पूछा .

‘ दीदी, माँ ने सुकन्या को बुलाया था . इस बार वह उनकी बात मानकर आ भी गई . उसके आते ही माँ ने उसके विवाह की बात छेड़ दी . जब उसने कहा कि अभी मैं तीन चार वर्ष विवाह के लिये सोच भी भी नहीं सकती क्योंकि मुझे पी.जी. करनी है . उसकी बात सुनकर वह बहुत नाराज हुईं . अचानक उनका शरीर पसीने से लथपथ हो गया तथा वह अपना सीना कसकर दबाने लगीं . सुकन्या उनकी दशा देखकर घबड़ा गई, उसने उन्हें चैक कराना चाहा तो माँ ने उसे झटक दिया…. तब सुकन्या ने रोते हुये कहा दादी प्लीज मुझे अपना इलाज करने दीजिये, अगर आपको कुछ हो गया तो मैं स्वयं को कभी माफ नहीं कर पाऊँगी .

माँ को हार्ट अटैक आया है . सुकन्या ने उन्हें वहीं दवा देकर स्थिति पर काबू पाया . उसने तुरंत हेल्पलाइन नम्बर मिलाकर अपनी परेशानी फोन उठाने वाले व्यक्ति को बताकर तुरंत एम्बुलेंस भिवानी की प्रार्थना की . उस भले मानस ने एम्बुलेंस भेज दी वरना कोरोना वायरस द्वारा हुये लॉक  डाउन के कारण आना ही मुश्किल हो जाता . जैसे ही हम चले , सुकन्या ने अस्पताल में किसी से बात की, उसकी पहचान के कारण तुरंत माँजी को एडमिट कर डाक्टरों ने उनकी चिकित्सा प्रारंभ कर दी . दीदी, सुकन्या ने तबसे पलक भी नहीं झपकाई है . समय पर दवा देना, लाना सब वही कर रही है . दीदी, उचित चिकित्सा के अभाव में पिताजी को तो बचा नहीं पाये पर माँ को नहीं खोना चाहती हूँ .’ भाभी के दिल का दर्द जुबान पर आ गया था .

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सुदेश की वजह से उसका रोज जाना तो नहीं हो पा रहा था पर फोन से हालचाल लेती रहती थी .  माँ ठीक हो रही हैं, सुनकर उसे संतोष मिलता . आखिर  सुदेश का क्वारेंन्टाइन भी पूरा हो गया था . सब ठीक रहा . माँ को भी अस्पताल से छुट्टी मिल गईं . माँ अभी काफी कमजोर थीं . सुकन्या को अपनी सेवा करता देख एक दिन वह उसका हाथ पकड़कर बोलीं,‘ बेटी मुझे क्षमा कर दे . मैंने तुझे सदा गलत समझा, बार-बार तुझे रोका टोका….’

‘ दादी प्लीज, आप दिल पर कोई बात न लें, अभी आप कमजोर हैं, आप आराम करें .’

‘ मुझे कुछ नहीं होगा बेटा, गलती मेरी ही है जो सदा अपने विचार तुझ पर थोपती रही…मैंने क्या-क्या नहीं कहा तुझे, पर तूने मेरी जान बचाई…मुझे नाज है तुझ पर….’ माँ ने कमजोर आवाज में उसे देखते हुये कहा .

‘ प्लीज दादी, अभी आपको आराम की विशेष आवश्यकता है….यह दवा ले लीजिए और सोने की कोशिश कीजिये .’ हाथ के सहारे माँ को उठाकर दवा खिलाते हुये सुकन्या ने कहा

माँ की तीमारदारी के साथ, इधर-उधर भागदौड़ करती, गाँव की भोली -भाली लड़की सुकन्या को अदम्य आत्मविश्वास से माँ की सेवा करते देख मनीषा सोच रही थी कि अगर मन में लगन हो तो औरत क्या नहीं कर सकती…!! उसे दया आती है उन दम्पत्तियों पर जो बेटों के लिये बेटियों का गर्भ में ही नाश कर देते हैं . वह क्यों भूल जाते हैं…बचपन से लेकर मृत्यु तक विभिन्न रूपों में समाज की सेवा में लगी नारी  हर रूप में अतुलनीय है . बदलते समय के साथ  सुकन्या जैसी नारियाँ अपने आत्मबल से आज समाज द्वारा निर्मित लक्ष्मण रेखा को तोड़ने में काफी हद तक कामयाब हो रही हैं…यह बात अलग है कि आज भी पुरूष तो पुरूष स्वयं स्त्रियाँ भी, ऐसी स्त्रियों के मार्ग में काँटे बिछा रही हैं….फिर भी लड़ाई जारी है की तर्ज पर ये लड़कियाँ आज अपना अस्तित्व कायम करने के लिये तत्पर हैं और करती रहेंगी…

लड़ाई जारी है : भाग 2

मेट्रिक में सुकन्या के 95 प्रतिशत अंक आये तो उसने भी डाक्टर बनने की अपनी इच्छा दादाजी के सामने प्रकट की . दादाजी जब तक कुछ कहते दादी कह उठीं,‘ लड़कियों को शिक्षा इसलिये दी जाती है जिससे उनका विवाह उचित जगह हो सके . कोई आवश्यकता नहीं डाक्टरी पढ़ने की…घर के काम में मन लगा, घर संभालने में तेरी पढ़ाई नहीं वरन् तेरी घर संभालने की योग्यता ही काम आयेगी .’

‘अरे भाग्यवान, अब समय बदल गया है, आजकल लड़कियाँ भी लड़कों की तरह पढ़ रही हैं और घर भी संभाल रही हैं . मनीषा तेरी वजह से ज्यादा नहीं पढ़ पाई किन्तु ससुराल में अपनी पढ़ाई पूरी कर कितने ही छात्रों को विद्यादान दे रही है . अपनी बहू की देख अगर यह पढ़ी होती तो क्या तेरे कटु वचन सुनती !! यह भी मनीषा की तरह ही नौकरी करते हुये अपने बच्चों का भविष्य संवार रही होती . मेट्रिक में हमारे घर में किसी के इतने अच्छे अंक नहीं आये जितने मेरी पोती के आये हैं…इसके बावजूद तुम ऐसा कह रही हो .’

‘ लड़की जात है ज्यादा सिर पर मत चढ़ाओ, बाद में पछताओगे .’ दादी बड़बड़ाती हुई अंदर चली गईं .

दादाजी बहुत दिनों से अम्माजी का सुकन्या के साथ रूखा व्यवहार देख रहे थे आज वह स्वयं पर संयम न रख पाये तथा दिल की बात जुबां पर आ ही गई . उन्होंने सुकन्या को उसकी इच्छानुसार मेडिकल में जाने के लिये अपनी स्वीकृति दे दी .

दादाजी से हरी झंडी मिलते ही सुकन्या ने बारहवीं की पढ़ाई करते हुये मेडिकल की तैयारी प्रारंभ कर दी . इसके लिये शहर से किताबें भी मँगवा लीं थीं . समय पर फार्म भी भर दिया . आखिर वह दिन भी आ गया जब उसे परीक्षा देने जाना था . वह अपने दादाजी के साथ परीक्षा देने जाने वाली थी कि अचानक दादी की तबियत खराब हो गई, आखिर दादाजी ने मनीषा को फोन कर अपने नौकर के साथ अनुराधा और सुकन्या को भेज दिया . साथ ही कहा बेटा, अगर तू न होती तो ऐसे अकेले इतने बड़े शहर में बहू को कभी अकेला न भेजता . उसने भी उन्हें चिंता न करने का आश्वासन दे दिया .

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परीक्षा वाले दिन मनीषा उसे परीक्षा सेंटर पर छोड़ने जाने लगी तो अनुराधा ने सुकन्या को दही चीनी खिलाते हुए  कहा,‘  बड़ा शहर है, अकेले इधर-उधर मत जाना…परीक्षा के बाद भी जब तक चंद्रेश, न पहुँच जाये तब तक इंतजार करना .’

मनीषा की एक मीटिंग थी जिसकी वजह से उसने चंद्रेश, अपने पुत्र को सुकन्या को एक्जामिनेशन सेंटर से लाने के लिये कह दिया था . शाम को परीक्षा समाप्त होने पर सुकन्या नियत स्थान पर खड़ी हो गई . लड़के-लड़कियाँ अपने-अपने घरों की ओर चल दिये . दस मिनट बीता, पंद्रह मिनट बीते…यहाँ तक कि आधा घंटा बीत गया . स्कूल का परिसर खाली होने लगा था…सूना परिसर उसे डराने लगा था . सुकन्या ने सोचा कि लगता हैं भइया किसी काम में फँस गये होंगे आखिर कब तक वह इसी तरह खडी रहेगी…!! शहर की भीड़-भाड़, चकाचौंध उसे आश्चर्यचकित कर रहे थे . गाँव से अलग एक नई दुनिया नजर आ रही थी . यहाँ लड़के -लड़कियाँ अपने स्कूटर से स्वयं आना जाना कर रहे थे जिनके पास स्वयं के वाहन नहीं थे ,वे आटो से जा रहे थे . अचानक उसे लगा अगर वह शहर की आत्मनिर्भर लड़कियों की तरह नहीं बन पाई तो पिछड़ जायेगी . कुछ हासिल करना है, तो हर परिस्थिति का मुकाबला करना होगा …  डर-डर कर नहीं वरन् हिम्मत से काम लेना होगा तभी वह जीवन में अपना लक्ष्य प्राप्त कर पायेगी .

बुआ का पता उसके पास ही था उसने आटो किया और चल दी . चंद्रेश वहाँ पहुँचा , सुकन्या को नियत स्थान पर न पाकर पूरे कालेज का चक्कर लगाकर घर पहुँचा .  उसे अकेले आया देखकर अनुराधा भाभी के तो होश ही उड़ गये . पहली बार सुकन्या घर से बाहर निकली है…इतना बड़ा शहर, पता नहीं कहाँ चली गई…? परीक्षा में मोबाइल ले जाना मना था अतः वह मोबाइल भी नहीं ले गई थी .

सुदेश चंद्रेश को डाँटने लगे कि वह समय पर क्यों नहीं पहुँचा . वह बेचारा भी सिर झुकाये बैठा था . वह करता भी तो क्या करता, ट्रेफिक जाम में ऐसा फँसा कि चाहकर भी समय पर नहीं पहुँच पाया . उसने तो सुकन्या से कहा भी था कि अगर देर भी हो जाये तो उसका इंतजार कर लेना पर उसके पहुँचने से पूर्व ही चली गई . इसी बीच मनीषा आ गई . मनीषा ने चंद्रेश को एक बार फिर सुकन्या को देखकर आने के लिये कहा . अनुराधा भाभी रोये जा रही थी…मनीषा भी डर गई थी पर भाभी को समझाने के अतिरिक्त कर भी क्या सकती थी . चंद्रेश जाने ही वाला था कि घंटी बजी . दरवाजा खोलते ही सुकन्या ने अंदर प्रवेश किया उसे देखकर भाभी तो मानो पागल हो उठी…

वह उसे मारती जा रही थीं तथा कह रही थीं,‘ अकेले क्यों आई ? कुछ और देर इंतजार नहीं कर सकती थी…कहीं कुछ हो जाता तो मैं क्या जबाब देती तेरे दादाजी को….बस हो गई पढ़ाई, नहीं बनाना तुझे डाक्टर, बस तेरा विवाह कर दूँ , मुझे मुक्ति मिल जाए .’

सुदेश अनुराधा के इस अप्रत्याशित रूप को देखकर अवाक् थे वहीं मनीषा ने भाभी की मनःस्थिति समझकर उन्हें शांत कराने का प्रयत्न करने लगी…इसके बावजूद भाभी स्वयं पर काबू नही रख पा रही थीं .

सुकन्या उससे लिपटकर रोती हुई कह रही थी,‘ बुआ, आखिर गलती क्या है मेरी, कब तक मैं किसी की बैसाखी के सहारे चलती रहूँगी…? आखिर ये बंदिशें सिर्फ लड़की के लिये ही क्यों हैं..? क्यों उसे ही सदा अग्निपरीक्षा देनी पड़ती है…? मैं लड़की हूँ इसलिये मुझे शहर पढ़ने के लिये नहीं भेजा गया…गाँव के ही स्कूल में मैंने जैसे तैसे पढ़ा जबकि मुझसे दो वर्ष छोटा भाई, उसे इंजीनियर बनना है इसलिये उसका शहर के अच्छे स्कूल दाखिला करवा दिया . वह हॉस्टल में रहता है, अकेले आता जाता है, उस पर तो कोई बंदिश नहीं है….फिर मुझ पर क्यों ?’

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‘ भाभी, सुकन्या छोटी नहीं है, उसे अच्छे, बुरे का ज्ञान है . कब तक उसे अपने आँचल से बाँधकर रखोगी ? मुक्त कर दो उसे इन बंधनों से…तभी वह जीवन में कुछ कर पायेगी . क्या तुम चाहती हो कि वह भी तुम्हारी तरह ही घुट-घुट कर जीये…जिसके पल्लू से तुम उसे बाँध दो, उसी पर अपनी पूरी जिंदगी अर्पित कर दे . अपना अच्छा बुरा भी न सोच पाये . भाभी तुमने तो अपनी जिंदगी काट ली पर भगवान न करे इसकी जिंदगी में कोई हादसा हो जाए तो….उसे आत्मनिर्भर बनने दो .’ कहकर मनीषा ने सुकन्या को अपनी बाहों में भर लिया था .

भाभी की परेशानी वह समझ सकती थी . वह उन्हें ठेस नहीं पहुँचना चाहती थी पर उस समय अगर भाभी का पक्ष लेती तो सुकन्या के आत्मविश्वास और भावना को ही चोट पहुँचती जिससे वह अपने लक्ष्य से भटक सकती थी . वह उसे टूटते हुये नहीं वरन् सफल होते देखना चाहती थी तथा यह भी जानती थी कि सुकन्या का पक्ष लेना भाभी को खटकेगा, हुआ भी यही…अनुराधा भाभी आश्चर्य से उसकी ओर देखती रह गई, फिर धीरे से बोली,‘ दीदी, आपके दोनों बेटे हैं, आप नहीं समझ पाओगी, लड़की की माँ का दिल…..’

जानें आगे क्या हुआ कहानी के अगले भाग में…

लड़ाई जारी है : भाग 1

‘बुआ, दादीं की तबियत ठीक नहीं है . वह तो एम्बुलेंस मिल गई वरना लॉक डाउन के कारण आना भी कठिन हो जाता . उन्हें मेडिकल कॉलेज में एडमिट करवा दिया है . पल्लव भी नहीं आ पा रहा है, माँ को तो आप जानती ही है, ऐसी स्थिति में नर्वस हो जाया करती हैं, यदि आप आ जायें तो….’ फोन पर परेशान सी सुकन्या ने कहा .

क्या, माँ बीमार है…पहले क्यों नहीं बताया ? शब्द निकलने को आतुर थे कि मनीषा ने अपनी शिकायत मन में दबाकर कहा …

‘ तू चिंता मत कर, मैं शीध्र से शीध्र पहुँचने का प्रयत्न करती हूँ….’

सुदेश जो आफिशियल कार्य से विदेश गये थे,  कल ही लौटे थे . उन्हें चौदह दिन का क्वारेंन्टाइन पूरा करना है . मनीषा ने उनके लिये खाना, पानी तथा फल इत्यादि कमरे के दरवाजे पर रखे स्टूल पर रख दिया तथा सुकन्या की बात उन्हें बताते हुये उनसे कहा कि वह जल्दी से जल्दी घर लौटने का प्रयत्न करेगी . आवश्यकता के समय लॉक डाउन में एक व्यक्ति तो जा ही सकता है…सोचकर उसने गाड़ी निकाली और चल पड़ी…. गाड़ी के चलने के साथ ही बिगड़ैल बच्चे की तरह मन अतीत की ओर चल पड़ा….

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सुकन्या, उसकी पुत्री न होकर भी उसके दिल के बहुत करीब है . वह उसके भाई शशांक और अनुराधा भाभी की पहली संतान है . घर में बीस वर्ष पश्चात् जब बेटी ने जन्म लिया तो सिवाय माँ के सबने उसका उत्साह से स्वागत किया था . भाई की तो वह आँखों का तारा थी….नटखट और चुलबुली….अनुप्रिया भाभी के लिये वह खिलौना थी . माँ की एक ही रट थी कि उन्हें घर का वारिस चाहिये . उनकी जिद का परिणाम था कि एक वर्ष पश्चात् वारिस आ भी गया . माँ तो पल्लव के आने से अत्यंत प्रसन्न हुई . भाभी पल्लव का सारा काम करके यदि सुकन्या की ओर ध्यान देती तो माँ खीज कर कहती, ‘न जाने कैसी माँ है, जो बेटे पर ध्यान ही नहीं देती है, अरे, बेटी तो पराया धन है, ज्यादा लाड़ जतायेगी तो बाद में पछतायेगी….’

‘ माँ इसीलिये तो इसे ज्यादा प्यार देना चाहती हूँ . बेटा तो सदा मेरे पास रहेगा…तब इसके हिस्से का प्यार भी तो वही पायेगा….’ कहकर वह मुस्करा देती और माँ खीजकर रह जाती .

कहते हैं कि खुशी की मियाद कम होती है, यही भाभी के साथ हुआ…तीस वर्ष की कमसिन उम्र में ही राजन भइया दो फूल उनकी झोली में डाल कर, एक एक्सीडेंट में चल बसे . भाभी की अच्छी भली जिंदगी बदरंग हो गई थी . कच्ची उम्र में विवाह हो जाने के कारण, भाभी की शिक्षा अधूरी रह गई थीं . मामूली नौकरी कर शहर में रहना पिताजी, उनके ससुरजी को नहीं भाया था . वैसे भी वे उन लोगों में थे जिन्हें औरतों का घर से निकलना पसंद नहीं था .

पिताजी भाभी और बच्चों को अपने साथ गाँव ले आये . यह सच है कि उन्होने भाभी को किसी तरह की कमी नहीं होने दी किन्तु माँ उन्हें सदा भाई की मृत्यु का दोषी मानतीं रहीं इसलिये उनके कोप का भाजन भाभी के साथ नन्हीं सुकन्या भी होती . यह सब पापा की अनुपस्थिति में होता…नतीजा यह हुआ कि भाभी तो चुप हो ही गई जबकि नन्हीं दस वर्षीया सुकन्या डरी-डरी अपने ही अंतःकवच में कैद होने लगी थी .

पिताजी के सामने खुश रहने का नाटक करते-करते भाभी थक गई थीं . रात के अँधेरे में मन चीत्कार कर उठता तो वह अवश बैठी चीत्कार को मन ही मन में दबाते हुए अपनी खुशी सुकन्या और पल्लव में ढूँढने का प्रयास करती . उसकी जिंदगी एक ऐसी कटी पतंग के समान बन गई थी जिसकी कोई मंजिल नहीं थी…बस दूसरों की सोच एवं सहारे जीना ही उनका आदि और अंत हो चला था . ससुराल के अलावा उनका कोई और था भी नहीं, माता पिता बचपन में चल बसे थे, जिन चाचा ने उन्हें पाला पोसा, विवाह किया, वे भी नहीं रहे थे . चाची अपने बेटों के सहारे जीवन बसर कर रही थीं . शशांक भाई की मृत्यु पर वह शोक जताने आई थीं…साथ में अपनी विवशता भी जता गईं . आज के युग में जब अपने भी पराये हो जाते हैं तो किसी अन्य से क्या आशा…!! भाभी ने स्वयं को वक्त के हाथों सौंप दिया था.

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जब भी मनीषा जाती तो भाभी दिल का दर्द उसके साथ बाँटकर हल्की हो लेती थी . भाभी के लाइलाज दर्द को वह भी कैसे कम कर पाती…? माँ से इस संदर्भ में बात करती तो वह कह देतीं कि तू अपना घर देख, मुझे अपना घर देखने दे . वह पापा को सारी बातें बताकर घर में दरार नहीं डालना चाहती थी अतः चुप ही रहती .

माँ सदा से ही डोमिनेंटिग थी . उन्हीं की इच्छा के कारण वह भी ज्यादा नहीं पढ़ पाई थी किन्तु उसका भाग्य अच्छा था जो पिता की मजबूत स्थिति के कारण उसके ससुर ने अपने आई.आई.टियन बेटे के लिए न केवल उसे चुना वरन उसकी इच्छानुसार पढ़ने की इजाजत भी दी थी . आज वह पी.एच.डी करके महिला विद्यालय में प्रोफेसर है .

पल्लव अपने पिता के समान तीक्ष्ण बुद्धि का था . वह इंजीनियर बनना चाहता था . जब वह पढ़ने बैठता तो दादी का प्यार उस पर उमड़ आता . वह स्वयं उसे अपने हाथ से खिलातीं जबकि सुकन्या को कुछ खिलाना तो दूर, जब भी वह पढ़ने बैठती, माँ कहतीं,‘ अरे, घर का काम सीख, किताबों में आँखें न फोड़, हमारे घर की लड़कियाँ नौकरी नहीं करतीं, हाँ, ससुराल वाले करवाना चाहें तो बात दूसरी है .’

एक बार मनीषा घर गई…सुकन्या सो गई थी तथा ननद भाभी अपने सुख-दुख बाँट रहीं थीं तभी सुकन्या बड़बड़ाने लगी…मुझे कोई प्यार क्यों नहीं करता…मुझे कोई प्यार नहीं करता … है भगवान मुझे पैदा ही क्यों किया…इसके साथ ही उसका पूरा शरीर पसीने से लथ-पथ हो गया था…. अस्फुट स्वर में कहे उसके शब्द मनीषा के मर्म को चोट पहुंचाने लगे . उसकी ऐसी हालत देखकर मनीषा ने अनुराधा से पूछा तो उसने कहा पिछले एक वर्ष से इसकी यही हालत है दीदी…शायद माँजी के व्यवहार ने इसे भयभीत कर दिया है . यह डरपोक और दब्बू बनती जा रही है…अब तो बात करने में हकलाने भी लगी है .

सुकन्या की हालत देखकर मनीषा ने माँ को समझाते हुये कहा, ‘ माँ तुम्हारा अपने प्रति ऐसा रवैया मैं आज तक नहीं भूली हूँ …. सुकन्या तुम्हारी पोती है तुम्हारे बेटे का अंश…. क्या तुम उसे दुख पहुँचकर अपने बेटे की स्मृतियों के साथ छल नहीं कर रही हो…? अगर भइया आज जीवित होते तो क्या वह अपनी बेटी के साथ तुम्हारा व्यवहार सह पाते ?  इस बच्ची से तुमने इसकी सारी मासूमियत छीन ली है…देखो कैसी डरी, सहमी रहती है . भाई की असामयिक मृत्यु तथा तुम्हारी प्रताड़ना से भाभी का जीवन तो बदरंग बन ही गया है, अब इस मासूम का जीवन बदरंग मत बनाओ .’

‘ तू अपनी सीख अपने पास ही रख, मुझे शिक्षा मत दे….’ तीखे स्वर में माँ ने कहा .

‘ माँ अब मैं पहले वाली मनीषा नहीं हूँ, मुझे पता है पापा को कुछ पता नहीं होगा…मैं तुम्हारी सारी बातें पापा को बता दूँगी .’

मनीषा की धमकी काम आई थी . माँ का सुकन्या के प्रति रवैया बदला था किन्तु अनु भाभी पर माँ बेटी में दरार डालने का आरोप भी लगा दिया .

मनीषा ने जाते हुए पल्लवी से कहा था, ‘बेटा, रो-रोकर जिंदगी नहीं जीई जाती…मेहनत कर…पढ़ाई में मन लगा, अच्छे नम्बर ला…. जब तू कुछ बन जायेगी तो तेरी यही दादी तुझे प्यार करेंगी . वह तुझे कमजोर करने के लिये नहीं वरन् मजबूत बनाने के लिये डाँटती हैं .’

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मनीषा ने उसके नन्हें दिल में विश्वास की नन्हीं लौ जगाई थी . वह जानती थी कि वह झूठ बोल रही है पर सुकन्या में आशा का संचार करने के लिये उसे यही उपाय समझ में आया था . सुकन्या ने उसकी बात कितनी समझी किन्तु अनुराधा कहती कि अब वह पढ़ाई में मन लगाने लगी है .

परिस्थतियों ने पल्लव को समय से पहले परिपक्व बना दिया था . पल्लव अपने पापा के समान इंजीनियर बनना चाहता था अतः दादाजी ने उसका दाखिला शहर के बोर्डिंग स्कूल में करवा दिया था . सुकन्या भी धीरे-धीरे अपने डर से निजात पाकर पढाई में मन लगाने की कोशिश करने लगी थी .

जानें आगे क्या हुआ कहानी के अगले भाग में…

समझदारी से करें दूसरी शादी : भाग 2

रणजीत के गोरखपुर शहर के रहने वाले महंत योगी आदित्यनाथ प्रदेश के मुख्यमंत्री बन गए. ऐसे में रणजीत ने भी अपना समाजवादी रूप छोड़ कर योगी आदित्यनाथ की तरह हिंदूवादी रूप बनाने का काम शुरू किया.

प्रदेश में हिंदुत्व की राजनीति को चमकाने के लिए रणजीत ने भी हिंदूवादी नेता की इमेज बनाने का काम शुरू किया. ऐसे में उस ने विश्व हिंदू महासभा के अंतर्राष्ट्रीय प्रमुख के रूप में खुद को पेश करना शुरू किया.

अखिलेश सरकार के समय में दिए गए ओसीआर के सरकारी आवास में वह रहता था. यहीं उस ने 1 फरवरी, 2020 को शनिवार के दिन अपने जन्मदिन की पार्टी भी मनाई थी. कई लोग उस को बधाई देने सरकारी फ्लैट पर पहुंचे थे. यहीं ओसीआर में बने मंदिर में उस ने सुंदरकांड का पाठ भी रखा था.

समाजवादी विचारधारा पर परदा डालने के लिए रणजीत सिंह ने पिछले कुछ दिनों से प्रखर हिंदुत्व का चेहरा चमकाना शुरू कर दिया था.

जन्मदिन के बाद हत्या

1 फरवरी को अपने जन्मदिन की पार्टी मनाने वाले रणजीत को यह नहीं पता था कि अगले दिन मौत उस का इंतजार कर रही है. 2 फरवरी की सुबह तकरीबन 5 बज कर, 30 मिनट पर रणजीत अपने ओसीआर के सरकारी घर से बाहर मौर्निंग वाक के लिए निकला. रणजीत के साथ पत्नी कालिंदी और रिश्तेदार आदित्य ही था.

कालिंदी विधानसभा मार्ग पर बने भारतीय जनता पार्टी प्रदेश कार्यालय से लालबाग ग्राउंड की तरफ मुड़ गई, जहां वह जौगिंग करती थी. रणजीत और आदित्य आगे बढ़ गए और हजरतगंज चौराहे से परिवर्तन चौक होते हुए ग्लोब पार्क के पास पहुंच गए.

ग्लोब पार्क के पास एक नौजवान रणजीत के पास पहुंचा और दोनों पर पिस्टल तान दी. इस के बाद रणजीत और आदित्य के मोबाइल फोन छीन लिए गए और रणजीत के सिर पर पिस्टल सटा कर गोली मार दी.

हमलावर ने आदित्य पर भी गोली चलाई, जो उस के हाथ में लगी. इस के बाद हमलावर वहां से भाग निकले.

राहगीरों ने आदित्य के शोर मचाने पर पुलिस को खबर की. पुलिस हत्या की जानकारी देने रणजीत के घर पहुंची, तो गोरखपुर से रणजीत के साथ आई अभिषेक की पत्नी ज्योति उसे घर पर मिली और ज्योति ने फोन कर के रणजीत की पत्नी कालिंदी को हत्या की सूचना दी.

पति की हत्या का पता चलते ही कालिंदी सिविल अस्पताल पहुंच गई. वहां से पुलिस ने कालिंदी को अपने साथ ले लिया, जिसे बाद में पूछताछ के बाद चिनहट निवासी चचेरे भाई के साथ भेज दिया गया.

हिंदूवादी नेता की हत्या से पूरी राजधानी सकते में आ गई. कुछ महीने पहले कमलेश तिवारी नामक एक और हिंदूवादी नेता की हत्या हो चुकी थी.

भरम में फंसी पुलिस

राजधानी में अपराध को रोकने के लिए पुलिस व्यवस्था में योगी सरकार ने बदलाव किया था, जिस के तहत लखनऊ में पुलिस कमिश्नर सिस्टम लागू किया गया है.

लखनऊ पुलिस ने मौर्निंग वाक करने वालों की सुरक्षा के लिए विशेष इंतजाम की बात कही थी. इस के बाद मौर्निंग वाक के समय रणजीत की हत्या ने लखनऊ पुलिस और नए कमिश्नरी सिस्टम को कठघरे में खड़ा कर दिया.

रणजीत की हत्या के बाद आननफानन जौइंट कमिश्नर औफ पुलिस नवीन अरोड़ा, एसीपी हजरतगंज अभय कुमार मिश्रा, एसीपी कैसरबाग संजीवकांत सिन्हा समेत कई अफसर मामले की छानबीन में लग गए.

पुलिस पर सब से बड़ा सवाल इसलिए भी है कि हुसैनगंज के ओसीआर से ले कर ग्लोब पार्क के बीच 6 पुलिस चौकियां पड़ती हैं. इस में पहली चौकी ओसीआर के बाहर, दूसरी दारूलशफा, तीसरी मल्टीलैवल पार्किंग, इस के बाद हलवासिया और फिर केडी सिंह बाबू स्टेडियम के पास की पुलिस चौकी पड़ती है. इस के बाद भी हत्यारों को पकड़ा नहीं जा सका.

पुलिस कमिश्नर सुजीत पांडेय ने इस मामले में 4 पुलिस वालों केडी सिंह चौकी प्रभारी संदीप तिवारी, पीआवी पर तैनात अनिल गुप्ता, अरविंद और आशीष को सस्पैंड कर दिया.

रणजीत की हत्या को ले कर उस की पत्नी कालिंदी का कहना था कि रणजीत कुछ दिनों से प्रखर हिंदुत्व को ले कर बहस कर रहा था. नागरिकता कानून का भी समर्थन कर रहा था. ऐसे में हिंदू विरोधी लोग उस के दुश्मन बने हुए थे.

कालिंदी ने 50 लाख रुपए का मुआवजा, मकान और सरकारी नौकरी की मांग सरकार के सामने रखी है. लखनऊ के डीसीपी मध्य दिनेश सिंह के जरीए यह मांगपत्र मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को भेजा गया था.

पुलिस हत्या की पड़ताल में पारिवारिक बातों को ले कर छानबीन कर रही थी. घर वालों के बयानों में कई भरम पैदा हो रहे थे. रणजीत के संगठन और घर के लोगों ने पुलिस को भरमाने की पूरी कोशिश की.

80 घंटे में किया खुलासा

जिस समय रणजीत की हत्या हुई, लखनऊ में डिफैंस ऐक्सपो होने वाला था. 5 फरवरी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लखनऊ में थे. डिफैंस ऐक्सपो में पूरी दुनिया से लोग आए थे.

लखनऊ पुलिस पूरी तरह से वीवीआईपी इंतजाम में लगी थी. इस के बाद भी रणजीत हत्याकांड का खुलासा करने का भी पूरी तरह से दबाव था.

पुलिस कमिश्नर सुजीत पांडेय ने इस मामले की जांच के लिए 8 टीमें बनाई थीं. पुलिस ने 87 लोगों के मोबाइल डिटेल लिए. कुछ होटलों के 72 सीसीटीवी फुटेज भी खंगाले.

पुलिस के लिए सब से पहले यह जानना जरूरी था कि हत्या की वजहें क्या हो सकती थीं. इस में नौकरी दिलाने के नाम पर रुपए का लेनदेन, पारिवारिक झगड़ा, जमीन से जुड़ा झगड़ा, पतिपत्नी के बीच संबंधों का झगड़ा, रणजीत के रिश्ते का झगड़ा और आतंकी हमले जैसे मामले खास थे.

पुलिस को सब से चौंकाने वाले तथ्य दोनों पत्नियों की जानकारी होने पर मिले. रणजीत की दूसरी पत्नी स्मृति के साथ संबंधों को ले कर पुलिस ने जब अपनी जांच का दायरा उस के आसपास घेरा तो वहां पर अहम जानकारी मिली. पुलिस ने स्मृति को कुछ फोटो दिखाए, जिन में से एक फोटो को उस ने पहचान लिया.

पुलिस ने जब इस से पूछताछ की तो उसे दीपेंद्र के बारे में पता चला. दीपेंद्र रणजीत की दूसरी पत्नी स्मृति का करीबी था. उन की मुलाकात साल 2019 में हुई थी. इस के बाद दोनों करीब आ गए और दोनों आपस में शादी कर के घर बसाना चाहते थे.

दीपेंद्र स्मृति से मिलने विकास नगर आता था. यहां दोनों एक होटल में रुकते भी थे. इस बात की जानकारी जब रणजीत को हुई तो उस ने स्मृति से झगड़ा किया. सिकंदर बाग चौराहे पर रणजीत ने स्मृति को थप्पड़ मार दिया था.

यह बात दीपेंद्र को पता चली, तो उस ने रणजीत को रास्ते से हटाने का प्लान तैयार करना शुरू कर दिया. दीपेंद्र ने अपने प्लान को कामयाब बनाने के लिए 11 दिनों तक रणजीत की रेकी की.

इन लोगों को यह जानकारी मिली कि रणजीत ओसीआर में बने अपने फ्लैट नंबर 604 से सुबह मौर्निंग वाक के लिए निकलता है. उस के साथ पत्नी कालिंदी और 1-2 लोग भी रहते हैं.

दीपेंद्र ने 1-2 दिन रणजीत के साथ पूरा मौर्निंग वाक का रूट चैक किया.

1 फरवरी को जब रणजीत मौर्निंग वाक पर निकला तो दीपेंद्र ने योजना के मुताबिक ग्लोब पार्क के पास गोली मार दी. उस के मोबाइल को भैंसाकुंड के पास फेंक कर हैदरगढ़ होते हुए रायबरेली चला गया. वहां से दीपेंद्र मुंबई चला गया.

पुलिस ने दीपेंद्र के साथ संजीत और जितेंद्र को पकड़ लिया. तब हत्या की पूरी गुत्थी सुलझ गई.

पुलिस कमिश्नर सुजीत पांडेय के मुताबिक दीपेंद्र और स्मृति ने हत्याकांड की साजिश रची. वारदात में संजीत ने पूरा सहयोग दिया. जितेंद्र ने गोली मारी थी. दीपेंद्र, जितेंद्र और संजीत पर हत्या व हत्या की कोशिश में धाराओं पर मुकदमा चलेगा. स्मृति के खिलाफ साजिश रचने का मुकदमा चलेगा.

समझदारी से करें दूसरी शादी : भाग 1

आज के दौर में दूसरी शादी करना कोई नई बात नहीं रह गई है. इस में अगर समझदारी से काम नहीं लिया जाता है तो हालात बहुत खराब हो जाते हैं. ऐसे में शादी की सुख से भरी जिंदगी की जगह अपराध की दुनिया में जिंदगी कटने लगती है.

लखनऊ की रहने वाली स्मृति ने खुद से बड़ी उम्र के रणजीत श्रीवास्तव ‘बच्चन’ से पहले प्यार किया, फिर शादी कर ली. शादी के बाद पता चला कि रणजीत पहले से शादीशुदा है.

इस के बाद शुरू हुए झगड़े से जिंदगी अपराध के दलदल में फंस गई. स्मृति न रणजीत से दूसरी शादी कर के खुश रह पाई और न दीपेंद्र स्मृति के साथ रिश्तों को सुखमय बना पाया.

रणजीत श्रीवास्तव की हत्या में पुलिस ने स्मृति को हत्या की साजिश रचने के आरोप में और दीपेंद्र को हत्या करने के आरोप में जेल भेज दिया.

दीपेंद्र का साथ देने वाले जिंतेंद्र और संजीत दोस्ती निभाने के चक्कर में हत्याकांड के आरोपी बन गए.

अगर रणजीत से शादी करने के पहले स्मृति ने समझदारी दिखाई होती तो इतने सारे लोग हत्या की एक कड़ी में फंस कर जेल की सजा नहीं काट रहे होते.

रणजीत श्रीवास्तव गोरखपुर शहर के अहरौली गांव का रहने वाले था.

20 साल पहले रणजीत के पिता तारा लाल अपने परिवार के साथ गोरखपुर के भेडि़याघाट में रहने आए थे, इस के बाद तारा लाल ने पतरका गांव में जमीन खरीदी थी.

रणजीत खुद गोरखपुर में रहता था. उस का पढ़नेलिखने में मन नहीं लगता था. ऐसे में वह बहुत ज्यादा पढ़ाई नहीं कर सका. उसे ऐक्टिंग का शौक था. अपने इसी शौक के चलते उस ने अपना नाम रणजीत श्रीवास्तव से बदल कर रणजीत ‘बच्चन’ कर लिया था, क्योंकि वह फिल्म हीरो अमिताभ बच्चन से बहुत प्रभावित था. उस ने अमिताभ बच्चन की तरह से कपड़े पहनने शुरू कर दिए थे और उन के जैसा ही हेयर स्टाइल रख लिया था.

अमिताभ बच्चन की नकल करने या कपड़े पहनने से कोई उन के जैसा नहीं बन जाता है. जब यह बात रणजीत को समझ में आई तो उसे ऐक्टिंग में कामयाबी नहीं मिली. फिर उस ने नए लोगों को ऐक्टिंग की ट्रेनिंग देने का काम किया.

रणजीत के पास इस के लिए कोई जगह नहीं थी. ऐसे में उस ने गांव की अपनी जमीन पर टीनशैड के नीचे रंगमंच से जुड़े कलाकारों को ट्रेनिंग देने का काम शुरू किया.

रंगमंच से जुड़े होने के बाद भी जब वह कामयाब नहीं हो पाया, तो उस ने राजनीति और समाजसेवा करने को अपना नया रास्ता बनाया.

रणजीत को सुर्खियों में रहने का शौक था. इस के लिए उस ने कई सामाजिक संस्थाओं को बना कर काम करना शुरू किया. सुर्खियों में रहने के लिए वह पत्रकार संगठन और जातीय संगठन भी बना कर काम करने लगा.

गोरखपुर में रणजीत ने जापानी इंसेफेलाइटिस, पल्स पोलियो, महापुरुषों की प्रतिमाओं की साफसफाई करने की मुहिम चलाई. इस बहाने वह राजनीति में भी खुद को जमाना चाहता था.

ऐसे में उस ने गोरखपुर से दूर उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में अपना काम शुरू करने का फैसला किया. इस के बाद भी वह गोरखपुर आताजाता रहा, रणजीत के तमाम लड़कियों से संबंध थे. उन को ले कर भी वह चर्चा में रहता था.

पारिवारिक विवादों से नाता

रणजीत की मुलाकात कालिंदी के साथ हुई थी. कालिंदी साल 2002 में रणजीत से मिली थी. वह गोरखपुर के पड़ोसी कुशीनगर जिले के नेअुबा नौगरियां क्षेत्र के बरई पट्टी गांव की रहने वाली थी. उस के पिता गोरखपुर नगरनिगम की वर्कशौप में नौकरी करते थे.

कालिंदी अच्छी एथलीट थी. रणजीत के साथ मिल कर उस ने साइकिल यात्रा शुरू की थी. बाद में वे दोनों पतिपत्नी की तरह साथसाथ रहने लगे थे.

रणजीत ने कालिंदी से साल 2014 में गोरखपुर के कुसंही जंगल में बने बुढि़या माई के मंदिर में शादी की थी. इस के बाद दोनों साथसाथ रहने लगे थे.

रणजीत का राजनीतिक रसूख बढ़ चुका था, जिस के आधार पर साल 2009 में रणजीत को लखनऊ की ओसीआर बिल्डिंग में सरकारी घर मिल गया था.

औरतों को ले कर रणजीत का बरताव बहुत अच्छा नहीं था. साल 2017 में रणजीत की साली ने शाहपुर थाने में रणजीत के खिलाफ ही छेड़खानी, मारपीट और बलात्कार का मामला दर्ज कराया था. पुलिस की मिलीभगत से रणजीत कागजों पर फरार चल रहा था.

पुलिस ने खानापूरी के लिए रणजीत के पतरका गांव में टीनशैड वाले घर पर कुर्की का आदेश चस्पां कर के अदालत में कागजों पर फरार दिखा दिया था.

साली द्वारा बलात्कार का मुकदमा लिखाने के बाद रणजीत ने ससुराल से अपने संबंध खत्म कर लिए थे. रणजीत की पत्नी कालिंदी भी अपनी बहन पर मुकदमा वापस लेने का दबाव बना रही थी. इस वजह से अब ससुराल से रणजीत के संबंध खत्म हो गए थे. रणजीत का दूसरी औरतों से संबंध बनाना जारी था.

ओएलएक्स पर मिली स्मृति

साल 2014 की बात है. रणजीत ने ओएलएक्स पर एसयूवी गाड़ी बेचने से संबंधित मैसेज पढ़ा, जिस में लिखा था कि स्मृति नामक औरत अपने पिता की एसयूवी बेचना चाहती थी. उस के पिता की मौत हो चुकी थी. स्मृति अपने पिता की ही जगह पर नौकरी कर रही थी.

स्मृति लखनऊ के विकास नगर में रहती थी. एसयूवी खरीदने को ले कर स्मृति और रणजीत की मुलाकात हुई. स्मृति से बातचीत के सिलसिले में रणजीत को पता चला कि पिता की पैंशन को ले कर भी स्मृति परेशान है.

ऐसे में रणजीत ने उस को मदद का भरोसा दिलाया. अपने राजनीतिक रसूख के चलते उस ने स्मृति को मदद पहुंचाई. यहां से दोनों की दोस्ती मजबूत हो गई. यही दोस्ती आगे चल कर प्यार में बदल गई.

18 जनवरी, 2015 को रणजीत और स्मृति की शादी हो गई. जब स्मृति पेट से हुई तो उसे पहली बार पता चला कि रणजीत पहले से शादीशुदा है. यहां से दोनों के बीच झगड़ा होने लगा.

रणजीत की पहली पत्नी कालिंदी को भी उस से शिकायत थी. उसे रणजीत और स्मृति के रिश्ते की जानकारी हो गई थी. विरोध करने पर कालिंदी और रणजीत की लड़ाई होती रहती थी. कालिंदी ने पति रणजीत के खिलाफ महिला थाने में शिकायत भी दर्ज कराई थी.

कालिंदी के विरोध के बाद भी रणजीत ने अपनी गलती नहीं सुधारी. काफी समय तक रणजीत पत्नी और प्रेमिका दोनों को एक ही घर में रखा हुआ था. दोनों के साथ ही झगड़ा करने लगा था.

रणजीत ने बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी से अपना रिश्ता बनाया, जिस से उस को राजनीतिक सरपरस्ती मिल सके. बसपा से उस को बहुत फायदा नहीं हुआ, पर समाजवादी पार्टी के समय उस का राजनीति रसूख बढ़ गया, जिस की वजह से पुलिस उस को बचाने में लगी थी.

साइकिल यात्रा का सफर

समाजवादी पार्टी की अखिलेश सरकार के समय रणजीत ने साइकिल से पूरे भारत भ्रमण का कार्यक्रम बनाया. जब ‘भारतभूटान साइकिल यात्रा’ निकली, तो दल के नायक के रूप में रणजीत ने ही दल की अगुआई की थी. इस के बाद रणजीत का नाम लिम्का बुक औफ रिकौर्ड में जुड़ गया.

अखिलेश सरकार के दौर में अपने राजनीतिक रसूख का फायदा लेने के लिए रणजीत ने अपनी मां कौशल्या देवी के नाम पर गांव वाली जमीन में ही वृद्धाश्रम और अनाथ आश्रम खोलने की योजना बनाई और इस का भूमि पूजन

भी किया, जिस में जिले के तमाम प्रशासनिक अफसर शामिल हुए थे, पर जब से अखिलेश यादव की सरकार सत्ता से हटी, तो उसे नए आसरे की तलाश करनी पड़ी.

जानें आगे क्या हुआ अगले भाग में…

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