एक रात : भाग 4

लेखक- मृणालिका दूबे

विक्रम और साहिल को काटो तो खून नहीं वाली हालत हो गई थी. वे कभी एकदूसरे को देखते तो कभी सामने खड़े पुलिस अफसर को.

तभी औफिसर ने दोनों को तीखी नजरों से घूरते हुए कहा, ‘‘अब एकएक शब्द गौर से सुनो, आज शाम को 5 बजे मिस्टर कबीर की होटल हौलीडे इन में कौन्फ्रैंस है. वहां वह पौने 5 बजे तक पहुंच ही जाएंगे. तुम दोनों को पार्किंग में पहले से ही छिप कर खड़े रहना है. और जैसे ही मिस्टर कबीर अपनी गाड़ी से बाहर निकलेंगे, तुम निशाना लगा कर उन पर साइलेंसर लगी पिस्टल से गोली चला देना. वहां अफरातफरी मच जाएगी. इसी का फायदा उठा कर तुम दोनों वहां से भाग कर गेट तक पहुंच जाना. गेट के पास मेरा एक आदमी गाड़ी ले कर खड़ा रहेगा. उस गाड़ी में बैठ कर सीधे अपने घर चले जाना. बस किस्सा खत्म.’’

‘‘पर हम निशाना लगाएंगे कैसे? हम ने तो कभी पिस्टल तक हाथ में नहीं पकड़ा पहले.’’ साहिल रुआंसे स्वर में बोल पड़ा.

औफिसर ने तिरछी मुसकान के साथ नरमी से कहा, ‘‘ये कोई बड़ी मुश्किल नहीं. बस कबीर की ओर गन तान कर फायर कर देना. निशाना खुदबखुद लग जाएगा.’’

विक्रम कुछ बोलने जा ही रहा था कि औफिसर ने अपने टेबल की ड्राअर से एक पिस्टल निकाल कर उस के हाथ में थमा दी.

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विक्रम गन हाथ में आते ही यूं चौंका मानो उस के हाथ में जहरीला सांप आ गया हो.

औफिसर ने खड़े होते हुए ठंडे लहजे में कहा, ‘‘ओके, नाउ यू कैन गो. और वक्त पर पहुंच जाना दोनों होटल हौलीडे इन में. आज रात टीवी न्यूज की हैडलाइन कबीर की सनसनीखेज हत्या से ही शुरू होनी चाहिए. नहीं तो कल सुबह की हैडलाइन में तुम दोनों के ही फोटो होंगे. ऐक्ट्रैस निया के हत्यारे गिरफ्तार.’’

विक्रम और साहिल हारे हुए जुआरी की तरह पिस्टल जेब में डाल कर पुलिस स्टेशन से बाहर चल दिए. बाहर जाते ही विक्रम ने साहिल की ओर देखा फिर धीमे स्वर में बोला, ‘‘चलो, तुम्हारे फ्लैट में चलते हैं. वहां शांति से बैठ कर सोचेंगे.’’

साहिल ने सिर हिला कर हामी भरी और दोनों एक आटो में सवार हो कर साहिल के फ्लैट की ओर चल दिए. फ्लैट के अंदर पहुंचते ही विक्रम हताशा से वहीं फर्श पर लेट गया. लग रहा था मानो उस में कोई जान ही न हो. साहिल फ्रिज से पानी ले कर आया और विक्रम को देते हुए निराश स्वर में बोला, ‘‘यार, अब यूं हताश होने से कोई फायदा नहीं. हम ऐसे फंस गए हैं कि निकलने का कोई रास्ता नहीं है अब.’’

यह सुनते ही विक्रम उठ कर बैठ गया. फिर साहिल को घूरते हुए जोर से बोला, ‘‘तो क्या तू ये कहना चाहता है कि हम दोनों अपने ही हाथों से अपने बौस की हत्या कर दें?’’

‘‘और कोई रास्ता बचा है क्या? बता तू ही.’’ साहिल ने झल्लाते हुए कहा.

विक्रम अपना सिर थामते हुए चीखा, ‘‘उफ्फ क्यों? कल क्यों हम ने निया की गाड़ी में लिफ्ट ली?’’

साहिल कुछ बोलने ही वाला था कि उस के मोबाइल की रिंग बजने लगी, ‘‘हैलो!’’

कहते ही उधर से रोहित की आवाज आई, ‘‘हैलो साहिल, कहां हो यार? पता है आज मिस्टर कबीर ने होटल हौलीडे इन में कौन्फ्रैंस रखी है. मतलब कि आज औफिस से छुट्टी.’’

साहिल का दिल धड़क उठा. वह पसीना पोंछते हुए बोला, ‘‘अभी मैं बाहर मार्केट में हूं, तुझ से थोड़ी देर बाद काल करता हूं.’’

और उस ने काल कट कर दी.

फिर विक्रम और साहिल दोनों ही खामोशी से विचार करते हुए बैठे रहे.

सोचविचार करने के बाद आखिर दोनों इसी नतीजे पर पहुंचे कि 3 बजे ही यहां से निकल कर होटल हौलीडे इन चलते हैं. वहां पहुंचने में एक घंटा तो लग ही जाएगा, फिर पार्किंग की ओर जा कर किसी गाड़ी के पीछे छिप जाएंगे. जैसे ही कबीर वाहं आएगा तो उसे गोली मार कर भाग निकलेंगे.

पूरा प्लान डिसकस करने के बाद विक्रम और साहिल निकल पड़े होटल की ओर.

4 बजे के करीब विक्रम और साहिल आटो से होटल के कुछ पहले ही उतर गए. फिर पैदल ही होटल की ओर चल दिए. गेट के पास खड़े सिक्योरिटी गार्ड्स के पास से धड़कते दिल से गुजर कर दोनों पार्किंग की ओर चल दिए.

वहां कई गाडि़यां खड़ी थीं और 2 गार्ड्स भी तैनात थे.

वे दोनों के गार्ड्स के पास से यूं गुजरे मानो किसी की तलाश कर रहे हों. फिर मौका पाते ही वे दोनों एक ब्लैक औडी के पीछे छिप कर पौने 5 बजने का इंतजार करने लगे.

एकएक पल किसी युग की तरह बीत रहा था. दोनों की ही निगाहें बेसब्री से कबीर की प्रतीक्षा कर रही थीं. तभी 5 बजने से कुछ ही मिनट पहले कबीर की मर्सिडीज होटल के पार्किंग की ओर आती हुई दिखी.

विक्रम की अंगुलियां जेब में पड़ी हुई पिस्टल के ट्रिगर पर कस गईं. उस के दिल की धड़कनें इस कदर बढ़ गई थीं मानो दिल अभी सीने से निकल कर बाहर आ जाएगा.

साहिल फुसफुसाते हुए बोला, ‘‘विक्रम, घबराना मत. बस कबीर को देखते ही ट्रिगर दबा देना.’’

विक्रम ने कोई जवाब नहीं दिया. वह तो बस टकटकी लगाए कबीर की गाड़ी की ओर देख रहा था जो अभी पार्किंग में आ कर रुकी थी.

और तभी ड्राइवर ने जल्दी से उतर कर पिछला दरवाजा खोला और शानदार सूट में सजेधजे कबीर ने बाहर कदम रखा.

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विक्रम ने पिस्टल निकाली और औडी के पीछे छिपेछिपे ही उस ने कबीर के सीने का निशाना ले कर पूरी ताकत से ट्रिगर दबा दिया.

अगले ही क्षण कबीर सीने पर हाथ रखे चीखता हुआ नीचे गिर पड़ा.

कबीर के पास खड़ा ड्राइवर जोर से चिल्लाते हुए उन्हें उठाने दौड़ा. पलभर में ही कबीर के इर्दगिर्द भीड़ जमा हो गई. विक्रम और साहिल इसी भीड़ का फायदा उठाते हुए होटल के बाहर वाले गेट की ओर दौड़ पड़े.

गेट के बाहर ही एक गाड़ी खड़ी थी. उस में बैठे ड्राइवर ने हाथ हिला कर इशारा किया और विक्रम और साहिल उस गाड़ी की ओर तेजी से लपके.

कुछ ही मिनटों में गाड़ी फर्राटे भरती हुई सड़क पर भागने लगी. पिछली सीट पर बदहवास बैठे विक्रम और साहिल इस कदर  सहमे हुए थे कि उन के मुंह से बोल तक नहीं फूट रहा था.

कोई एक घंटे बाद गाड़ी एक पुरानी सी इमारत के पास जा कर रुक गई.

गाड़ी रुकते ही ड्राइवर ने पीछे मुड़ कर कहा, ‘‘उतरिए, आप की मंजिल आ गई.’’

विक्रम और साहिल ने नीचे उतर कर देखा, उस पुरानी इमारत के सामने ही वह पुलिस औफिसर खड़ा था. उस ने आगे बढ़ कर विक्रम और साहिल का स्वागत करते हुए कहा, ‘‘वेलकम वेलकम. वैरी गुड. क्या निशाना लगाया है तुम ने. एक्सीलेंट. लाओ अब वह गन मुझे वापस कर दो. तुम्हारे लिए खतरा साबित हो सकती है.’’

विक्रम ने कांपते हाथों से गन अपने पौकेट से निकाली और औफिसर को देते हुए बोला, ‘‘अब तो हम लोग आजाद हैं न? हम अपने घर जा सकते हैं न?’’

‘‘ओह श्योर. बिलकुल जा सकते हो अब अपनेअपने घर. बट एक बात का ध्यान रखना कि कभी भूल से भी किसी के सामने आज और कल रात की घटना का जिक्र भी न करना, क्योंकि इस पिस्टल पर तुम्हारी अंगुलियों के ही निशान हैं, इसलिए भलाई इसी में है कि ये सब भूल कर अब नई जिंदगी की शुरुआत करो. ये ड्राइवर तुम्हें तुम्हारे स्टौप पर ड्रौप कर देगा. ओके.’’

जल्दी ही विक्रम और साहिल को उन के एड्रैस पर छोड़ कर वह ड्राइवर चला गया.

डरेसहमे विक्रम ने किसी तरह अपने को संभाला और नौर्मल दिखने की पूरी कोशिश करते हुए अपने फ्लैट की डोरबैल बजाई.

अंदर से जब कोई रिप्लाई नहीं मिला तो विक्रम ने अपने पास की चाबी से लौक खोला और फ्लैट में घुसा. अंदर एकदम अंधेरा छाया हुआ था. इस नीरव खामोशी से घबरा कर विक्रम ने लाइट औन करते हुए जोर से नीता को पुकारा, ‘‘नीता…कहां हो तुम?’’

पर नीता को फ्लैट में न पा कर विक्रम एकदम हैरान हो उठा. फिर उस की हैरानी तब और बढ़ गई जब उस ने देखा कि नीता का कपबर्ड खुला हुआ है और उस में रखी उस की पर्सनल चीजें और कई कपड़े गायब हैं.

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गहरी पैठ

देश में कोरोना की वजह से जहां 10 से 15 करोड़ लोग बेकार हो जाएंगे वहीं हजारों कारखाने और धंधे बरबादी के कगार पर पहुंच जाएंगे, क्योंकि मजदूर नहीं मिलेंगे. कोरोना से पहले शहरियों ने अपने ही देश के मजदूरों को बुरी तरह दुहा था और इसीलिए पहला ही बड़ा झटका लगते, ये मजदूर अपनी लगीबंधी नौकरी या छोटामोटा धंधा बंद कर के गांवों की ओर भाग लिए.

अगर 24 मार्च को अचानक 4 घंटे का नोटिस दे कर देश को बंद नहीं किया जाता और

10 दिन लोगों को घरों को लौटने की इजाजत दी जाती तो लौकडाउन में वे लोग शहरों में बने रहते, जिन के पास किराए की छत तो थी. इस अचानक लौकडाउन ने मजदूरों को यह भरोसा दिला दिया कि यह सरकार भरोसे के लायक है ही नहीं.

सरकार ने अगर थोड़ी सी अक्ल लगाई होती और इन मजदूरों को भरोसा दिलाया होता कि वे जातिप्रथा के गुलाम नहीं हैं, बराबर के नागरिक हैं तो बात दूसरी होती. ये मजदूर गांवों से भाग कर इसलिए नहीं आए थे कि वहां भूख सता रही थी. भूख से ज्यादा ये जाति के कहर से परेशान थे. इन का मालमत्ता तो छीन ही लिया जाता था और इन से बेगार तो कराई ही जाती थी, इन की लड़कियों और औरतों को भी जब मरजी उठा लिया जाता था. ये लोग शहरों में हिंदू धर्म की जाति की मार से बचने के लिए आए थे.

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शहरों में इन्हें सीधेसीधे चाहे अछूत न समझा गया हो, पर ऊंचे से ले कर नीचे तक सभी इन से रोजाना वही बरताव करते थे जो गांवों में होता था. इन्हें गांवों की तरह शहरों की गंद में रहने को मजबूर किया गया. ये लोग गंदे पानी के नाले के किनारे झुग्गियां बना कर रहे, खुले में खायाबनाया, सैक्स भी सब के सामने किया. हां, शहरों में इन की औरतेंलड़कियां बच जाती रहीं जो अपनेआप में कम नियामत नहीं थी.

पैसा तो शहरों में भी ज्यादा नहीं मिला. वे लोग कपड़ेलत्ते के अलावा गांव में बस अपने बूढ़े मांबाप के लायक कमा सके. फैक्टरियों ने लालच में मजदूरों के रहने की जगह बनानी बंद कर दीं. सरकारों ने मजदूरों की कालोनियों को जगह देना बंद कर दिया. सड़क पर दुकानें लगाने को भी मजबूर किया, रहने को भी. फिर भी जिस आजादी के सपने उन्होंने देखे थे, उन में से कुछ सही होते रहे और इसलिए लोग आते रहे. अब कोरोना और उस से पहले नोटबंदी ने साबित कर दिया कि यह सरकार तो सिर्फ तिलकधारियों का खयाल रखेगी, दबंगों का, पुलिस का.

मजदूरों की कोई जगह इन के पास नहीं है. वे गुलामों की तरह रहें. अब लौटने में भला है चाहे 1,000 किलोमीटर चलना क्यों न पड़े. ये गांवों में खुश रहेंगे इतना पक्का है. शहरों ने इन्हें हकों का इस्तेमाल करना सिखा दिया है, यही काफी है या कहिए कि बस यही कमाई ले कर ये गांव लौट रहे हैं.

यह माना जा सकता है कि सरकार का खजाना खाली है और उस के पास अपने वेतनभत्ते देने का पैसा भी टैक्सों से जमा नहीं हो पा रहा. हालात तो कोरोना से पहले ही खराब होने शुरू हो गए थे, क्योंकि एक साल से गाडि़यों की बिक्री कम हो रही थी, मकान बिक नहीं रहे थे. व्यापारी बैंकों और जमाकर्ताओं का पैसा ले कर भाग रहे थे. देश छातियां तो पीट रहा था और बड़ी 56 इंची बातें कर रहा था, पर सरकार की जेब में पैसा लगातार सिकुड़ रहा था.

अब जब 50 दिन पूरी तरह सब कामधंधे बंद हो जाने से जो झटका लगा है, वह तब तक ठीक न होगा जब तक सरकार कारखानों और मिलों को धंधा चलाने के लिए मोटा पैसा न देगी. यह पैसा सरकार को वेतन काट कर देना होगा. जैसे हर व्यापारी, कारखानेदार, हर मजदूर आधे पैसों में काम करेगा वैसे ही हर सरकारी अफसर, कर्मचारी, सिपाही, जज, ठेकेदार को आधे पैसों में काम करने को तैयार होना होगा.

देश की बचत का एक बड़ा हिस्सा सरकारी नौकरशाही बेकार में उड़ा देती है. बड़ेबड़े दफ्तर बचे हुए हैं जो करते कम हैं, करने से रोकते ज्यादा हैं. जनता को दुरुस्त करने के नाम पर वे अड़चनें डालते हैं. सारे किएधरे को रोकते रहते हैं. अगर कहीं भी कुछ भी अधूरा बना पड़ा दिखे तो समझ लें कि इस के पीछे सरकार है. कहीं भी कोई रुका हो, बंद हो तो समझ लें कि इस के पीछे सरकार है.

राजाओं ने हमेशा महल बनाए हैं, आम लोगों के घर नहीं. उन्होंने खेतों से लगान वसूला है, खेती नहीं की. कारखानों पर टैक्स लगाए हैं, कारखाने नहीं चलाए. अगर सरकारी नौकरशाही का वेतनभत्ता आधा हो जाए तो देश की जनता को पूरी बरकत होगी. अगर हमेशा के लिए नहीं तो 5-6 महीने की कुरबानी तो देनी ही चाहिए.

जब कोरोना के मरीजों को ठीक करने में डाक्टर अपनी जान पर खेल रहे हैं तो नौकरशाही का फर्ज है कि वह अपना हिस्सा वेतन कटौती से दे और 5-6 महीने केवल आधा वेतन ले. वैसे भी लौकडाउन और घरों में बंद रहने से बहुत से खर्च कट रहे हैं.

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यह तो पक्का है कि सरकार या उस की 30 लाख करोड़ की नौकरशाही अपने खर्च, वेतन, तामझाम कम नहीं करेगी, क्योंकि 1947 में भी आजादी का मकसद यही था कि राज मुट्ठीभर सरकारी लोगों का हो और उस के बाद की हर सरकार का चाहे वह गरीबी हटाओ की बात कर रही थी या हिंदू धर्म की दोबारा जड़ें जमाने की. यहां जनता से देने को कहा जाता है, लेने को नहीं. पुराणों को उठा कर देख लें, एक भी ऐसी कहानी नहीं मिलेगी जिस में किसी राजा ने आम लोगों के लिए कुछ किया हो. 2020 में कुछ अलग नहीं होने वाला.

इस भोजपुरी एक्ट्रेस का आया सलमान खान पर दिल, ऐसे किया खुलासा

भोजपुरी इंडस्ट्री (Bhojpuri Industry) की जानी मानी एक्ट्रेसेस में से एक काजल राघवानी (Kajal Raghwani) अपने फैंस के बीच काफी पौपुलर हैं. काजल राघवानी सोशल मीडिया पर काफी एक्टिव रहती हैं और इसी के साथ ही वे अपने फैंस के साथ जुड़ी रहती हैं. काजल अब तक कई भोजपुरी फिल्मों में नजर आ चुकी हैं और ना सिर्फ भोजपुरी फिल्में बल्कि काजल राघवानी (Kajal Raghwani) के म्यूजिक वीडियोज भी काफी वायरल होते रहते हैं.

 

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💕

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हाल ही में काजल राघवानी (Kajal Raghwani) एक बार फिर सुर्खियों में आ गई है और इस बार काजल के सुर्खियों में आने का कारण हैं बौलीवुड इंडस्ट्री के सबसे बड़े सुपर स्टार सलमान खान (Salman Khan). जी हां सलमान खान (Salman Khan) ने भोजपुरी एक्ट्रेस काजल राघवानी का दिल जीत लिया है और इस बात का खुलासा उन्होनें खुद किया है. काजल ने एक इंटरव्यू के दौरान कहा है कि ‘सलमान खान हमेशा से मेरे क्रश रहे हैं. 90 के दशक में उनकी कई फिल्में आई थीं, जिनमें वो प्रेम के रूप में दिखे थे. मुझे उनका वो क्यूट अंदाज काफी पसंद था. मुझे निजी तौर पर भी ऐसा ही पति चाहिए, जो सलमान खान की तरह क्यूट हो.’

इस दौरान उन्होनें ये तो साफ साफ बता दिया की उन्हें अपनी जिंदगी में सलमान खान (Salman Khan) जैसा पति चाहिए. वैसे देखा जाए तो सलमान खान की पर्सनैलिटी ही ऐसी है कि उन पर लाखों लड़कियां जान देती हैं लेकिन सलमान ने अब तक किसी भी लड़की को अपना हमसफर नहीं चुना है. ऐसे में सलमान के फैंस को इस बात का बेसब्री से इंतजार है कि वे कब और किस लड़की को अपना दिल देकर सात फेरे लेंगे.

 

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Hmmmm….

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बात की जाए भोजपुरी एक्ट्रेस काजल राघवानी (Kajal Raghwani) की तो जब उनसे पूछा गया कि सलमान खान का नाम सुनकर उनके मन में क्या ख्याल आता है तो इस बात का जवाब उन्होनें ये दिया कि, ‘सलमान खान बहुत अच्छे इंसान हैं, जो अपने परिवार को काफी प्यार करते हैं. वो लोगों की मदद करते हैं, जो उनकी खासियत है और उन्हें वैसा ही बने रहना चाहिए.’

कोरोना पॉजिटिव होने की खबरों पर भड़कीं ‘Bigg Boss’ की ये एक्स कंटेस्टेंट

टेलिवीजन इंडस्ट्री के सबसे बड़े रिएलीटी शो बिग बौस सीजन 9 (Bigg Boss 9) की 2nd रनर अप रह चुकी कंटेस्टेंट मंदना करीमी (Mandana Karimi) इन दिनों काफी सुर्खियों में हैं. जैसा कि हम सब जानते हैं कि पूरी दुनिया में कोरोना वायरस (Corona Virus) नामक बिमारी फैली हुई है जिसने लाखों लोगो को अपने वस में कर लिया है. ऐसे में कुछ समय पहले एक खबर फैली थी कि मंदना करीमी को कोरोना वायरस से संक्रमित हो गई हैं जिसके बाद से वे काफी सुर्खियों का कारण बन गई थीं.

 

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عید مبارک 🙌🏻❤️

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हाल ही में मंदना करीमी (Mandana Karimi) ने अपने कोरोना पॉजीटिव (Corona Virus) होने की खबरों का पर्दाफाश करते हुए एक इंटरव्यू में कहा है कि, ‘मैं पूरी तरह से ठीक हूं, घर की सफाई के दौरान मेरी आंखों में इंफेक्शन हो गया था, मेरे हाथ में कैमिकल लगा था और मैंने गलती से अपनी आंख को छू लिया जिसके बाद मुझे जलन होने लगी और मुझे काफी तकलीफ का सामना करना पड़ा’.

 

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The ugly Thruth ❤️ #quarantine #life

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इसी मुद्दे पर मंदना करीमी (Mandana Karimi) ने आगे अपने फैंस से बात करते हुए कहा है कि, ‘आपका बहुत बहुत धन्यवाद आपने मेरी चिंता की लेकिन मैं आपको बता दूं मैं ठीक हूं मुझे कोरोना नहीं हुआ है. मेरी आंख में सैनिटाइजर (Sanitizer) और कैमिकल्स (Chemicals) के कारण इंफेक्शन हुआ था और लोगों ने बिना सोचे समझे मुझे कोरोना संक्रमित बता दिया जोकि गलत है.’ अपना गुस्सा जाहिर करते हुए एक्ट्रेस ने आगे कहा, ‘दोस्तों मैं आपको कहना चाहती हूं कि अपने जीवन में आप पढ़ो-लिखो एक अच्छे इंसान बनो. न किसी के बारे में गलत सोचो और न अफवाह फैलाओ. मैं आपको पूछना चाहती हूं कि आपको कोरोना के लक्षण के बारे में कितनी जानकारी है? अगर आपको इसके लक्षण के बारे में कुछ पता नहीं है तो आप अफवाह क्यों उड़ा रहे हो? आप लोग डाक्टर नहीं है.’

 

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If we don’t tell our own stories,no one else will . Mira Nair 🤍 #quarantine #todaywasagoodday

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ना सिर्फ मंदना करीमी (Mandana Karimi) ने अपने फैंस को अपनी खैरियत बताई और अफवाह फैलाने वालों पर गुस्सा किया बल्कि मंदना ने अपने चाहने वालों को अपनी तरफ से कोरोना वायरस से बचने की सलाह भी दी और कहा कि, ‘मैं उम्मीद करती हूं आप सभी अपने घर पर सेफ हैं. इसके साथ ही मैं आपको बता दूं सैनिटाइजर्स का इस्तेमाल ध्यान से करें इससे आंखो में तकलीफ हो सकती है. सैनिटाइजर का इस्तेमाल करने के बाद अपनी आंखों को न छुएं. ये आपके लिए घातक हो सकता है. आप सभी को मेरा बहुत प्यार…’

Dr Pk Jain: मेरी शादीशुदा जिंदगी में ऐसे लौटा प्यार

जतिन और सुधा की कुछ महीने पहले ही लव मैरिज हुई थी. दोनों के परिवार वाले भी इस रिश्ते से काफी खुश थे. शुरू शुरू में तो सब ठीक रहा. दोनों साथ घूमते, बाहर जाते और घर में भी काफी क्वालिटी टाइम स्पेंड करते. लेकिन जैसे जैसे नई शादी का खुमार उतरने लगा जतिन अपने ऑफिस में और दोस्तों के साथ बिजी रहना लगा. अब सुधा के लिए उसके पास न के बराबर ही समय था.

सुधा खुद भी घर के कामों में काफी व्यस्त रहती लेकिन जब शाम को जतिन वापस आता तो सुधा उससे प्यार के कुछ पलों की उम्मीद करती. मगर घर पर भी जतिन टीवी में या मोबाइल में लगा रहता और बेडरूम में भी सिर्फ खानापूर्ति के लिए ही सुधा के साथ होता. नतीजा दोनों के बीच दूरिया बढ़ने लगी और आए दिन झगड़े होने लगे.

जब बात ज्यादा बढ़ गई तो सुधा नाराज होकर मायके चली गई. जतिन ने भी ज्यादा ध्यान नहीं दिया उसे लगा कुछ ही दिनों में सुधा वापस लौट आएगी. लेकिन जब एक महीने तक सुधा नहीं लौटी और उसका कोई फोन भी नहीं आता तो जतिन को चिंता हुई. उसने फोन पर सुधा से बात करने की कोशिश की लेकिन सुधा ने कोई जवाब नहीं दिया और न ही उससे मिलने के लिए तैयार हुई. जतिन अब काफी टूट चुका था और उसे समझ नहीं आ रहा था सुधा को कैसे मनाएं.

इसी दौरान जतिन का कजिन सुमित उससे मिलने आया. दोनों काफी अच्छे दोस्त भी हैं तो जतिन ने जब सुमित को अपनी परेशानी बताई तो पहले तो सुमित ने उसे खूब डांटा फिर उसकी समस्या का हल निकालने की कोशिश करने लगा. सुधा की भाभी भी यहीं चाहती थी इसलिए सुमित ने उनसे संपर्क किया. तब जाकर ये बात सामने आई कि जतिन सुधा को न सिर्फ मानसिक रूप से बल्कि शारीरिक रूप से भी परेशान कर रहा था.

सुधा के मुताबिक जतिन सिर्फ अपनी जरूरतों के लिए उसके पास आता और अपना काम हो जानें के बाद वो सुधा को देखता भी नहीं. जिससे सुधा दिन पर दिन ड्रिपेशन में जाने लगी. सुमित ने जतिन से इस बारे में बात की और उसे खूब लताड़ा. जतिन को अपनी गलती का एहसास था और वो सुधा से मांफी मांगना चाहता था. लेकिन सुधा दोबारा उस पर भरोसा करने को तैयार नहीं थी.

ऐसे में सुमित, जतिन और सुधा को डॉक्टर पीके जैन के पास लेकर गया जो 40 सालों से इन्हीं समस्याओं का इलाज कर रहे हैं. सुमित ने जतिन को डॉक्टर पी के जैन के कई सफल केसेस के बारे में बताया, जिसके बाद ही वो डॉक्टर पी के जैन से मिलने पहुंचा.

डॉक्टर पी के जैन ने की मदद

डॉक्टर पी के जैन ने यहां सुधा और जतिन की काउंसलिंग की और दोनों से काफी बाते की. डॉक्टर पी के जैन के लिए दोनों की प्रॉब्मल कोई बड़ी बात नहीं थी. पहले भी उनके पास ऐसे कई पेशेंट आ चुके हैं. डॉक्टर पी के जैन की सलाह मानकर दोनों ने फिर से एक-दूसरे को मौका दिया और कुछ ही वक्त में अपनी शादीशुदा जिंदगी में वापस लौट गए. जतिन तो सबसे यही कहता है- आपकी सेक्स लाइफ में भी अगर कोई समस्या है तो बिना यहां वहां भटकने के बजाय सीधे डॉक्टर पी के जैन से मिले और अपना इलाज करवाएं.

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यदि आप भी सेक्स को एन्जॉय करना चाहती हैं तो इन टिप्‍स को आजमाएं…

किस करें: आपको यदि अपने पुरुष पार्टनर को किस करने का मन है तो आप उसे खुलकर किस करें. पुरुषों को उत्तेजित करने की बेहतरीन चाबी है किस. इससे आपका पार्टनर आपकी भावनाओं को बेहतर तरीके से समझ पाएगा.

बातें करें: पुरुष आमतौर पर स्त्रियों की निजी भावनाओं के प्रति कन्फ्यूज रहते हैं. इसलिए बातें करना जरूरी है. यदि आप अपने पार्टनर से सामने खुलकर बात नहीं कर पाती हैं तो आपको चाहिए कि आप अपने पार्टनर से फोन पर बात करें. फोन पर एरोटिक बातचीत से आपकी झिझक काफी कम होगी.

सेक्स बुरा नहीं: कई बार महिलाओं के मन में सेक्स के प्रति गलत धारणाएं बैठ जाती हैं और वे इस प्रक्रिया को खुलकर एंज्वाय नहीं कर पातीं. इसलिए जरूरी है कि आप कभी सेक्स को गंदा या बुरा ना समझें बल्कि इसे भी लाइफ का महत्वपूर्ण हिस्सा मानें और खुलकर एन्जॉय करें.

सकारात्मक सोचः सेक्स के प्रति सकारात्मक सोच जरूरी है. यदि आपको पार्टनर सेक्स को अधिक प्राथमिकता देता है तो इसे गलत समझने की बजाय पॉजिटिव रूप में लीजिए. पार्टनर की सेक्स में दिलचस्पी अंत में आपके प्रति प्यार में ही बदलने वाली है. यदि आप सेक्स में पार्टनर का साथ देंगी तभी उससे अधिक खुल पाएंगी.

प्रयोग करें: आपको चाहिए कि आप सेक्‍स के लिए नए-नए प्रयोगों को आजमाएं. इससे आपमें आत्मविश्वास बढ़ेगा. ओरल सेक्स या साथ बैठकर कोई इरोटिक फिल्म देखने से परहेज न करें. यह आपकी सेक्स लाइफ में न सिर्फ नयापन लाता है बल्कि आपके बीच सेक्स संबंधी झिझक को खत्म करते हुए नजदीकियों को बढ़ाता है.

निडर बनें: सेक्स लाइफ को एन्जॉय करने के लिए महिलाओं के लिए जरूरी है कि वे मन में शंका ना पालें. ना ही ये सोचें कि उनका पार्टनर उनके बारे में क्या सोचेगा. बल्कि आपको अधिक उत्साह से पार्टनर को खुश करने के प्रयास करने चाहिए. आप अपने पार्टनर को खुलकर प्यार करें. यदि आपका पार्टनर करीब नहीं आता तो आप लगातार एफर्ट करें. निश्चय ही आपको सफलता मिलेगी.

लखनऊ के डॉक्टर पी. के. जैन, जो पिछले 40 सालों से इन सभी समस्याओं का इलाज कर रहे हैं. तो आप भी पाइए अपनी सभी  सेक्स समस्या का बेहतर इलाज अंतर्राष्ट्रीय ख्याति एवं मान्यता प्राप्त डॉ. पी. के. जैन द्वारा.

जीवन की चादर में छेद: भाग 1

उत्तर प्रदेश के बदायूं शहर के सिविल लाइंस इलाके में एक स्कूल है होली चाइल्ड. निशा इसी स्कूल में पढ़ाती थी. उस का पति राजकुमार पादरी था और उस की पोस्टिंग बदायूं जिला मुख्यालय से लगभग 23 किलोमीटर दूर वजीरगंज की एक चर्च में थी. चर्च में जब ज्यादा काम रहता था तो राजकुमार रात में वहीं रुक जाता था.

निशा को स्कूल की बिल्डिंग में ही रहने के लिए कमरा मिला हुआ था, जहां पर वह पति राजकुमार और 2 बेटियों रागिनी व तमन्ना के साथ रहती थी.

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राजकुमार और निशा की मुलाकात लखनऊ में पादरी के काम की ट्रेनिंग के दौरान हुई थी, जोकि वीसीसीआई संस्था द्वारा अपने धर्म प्रचारकों को दी जाती है. कुछ मुलाकातों के बाद दोनों एकदूसरे को पसंद करने लगे.

निशा मूलरूप से गोरखपुर जिले की रहने वाली थी. उस के पिता दयाशंकर पादरी थे. निशा की बड़ी बहन शारदा की शादी बरेली निवासी रघुवीर मसीह के बेटे दिलीप के साथ हुई थी. इसी के चलते बहन के देवर राजकुमार से निशा की नजदीकियां बढ़ने लगीं. दोनों जानते थे कि घर वालों को इस रिश्ते से कोई ऐतराज नहीं होगा, अत: दोनों ने अपनी पसंद की बात अपने परिवार वालों को बता दी थी.

राजकुमार ने लखनऊ में अपनी ट्रेनिंग पूरी कर ली लेकिन किन्हीं कारणों से निशा को ट्रेनिंग बीच में ही छोड़ देनी पड़ी. राजकुमार बरेली निवासी रघुवीर मसीह का बेटा था. रघुवीर मसीह पुलिस विभाग में वायरलैस मैसेंजर के पद पर बदायूं में तैनात था.

सन 2014 में पारिवारिक सहमति से राजकुमार और निशा का विवाह हो गया. रघुवीर मसीह के 4 बेटे और 2 बेटियां थीं. सब से बड़ा बेटा रवि था, जिस की शादी बाराबंकी निवासी अनुराधा से हुई थी. दूसरा दिलीप था, जिस की शादी निशा की बड़ी बहन शारदा से हुई थी. उस से छोटा राजकुमार था और सब से छोटा राहुल.

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राजकुमार की पहली पोस्टिंग कासगंज जिले के सोरों कस्बे में नवनिर्मित चर्च में हुई थी. इसी बीच राजकुमार की शादी हो गई और रघुवीर मसीह ने कोशिश कर के राजकुमार का तबादला कासगंज से वजीरगंज करवा दिया.

शादी के बाद कुछ समय तो अच्छा कटा. राजकुमार की मां आशा मसीह ने नवविवाहिता बहू निशा को हाथोंहाथ लिया, पर निशा को राजकुमार के घर का माहौल रास नहीं आया. इसलिए उस ने पति से कहा कि वह घर में बैठ कर वक्त बरबाद नहीं करना चाहती.

निशा इंटरमीडिएट पास थी और उस की अंगरेजी भाषा पर अच्छी पकड़ थी. वह सोचती थी कि किसी भी इंग्लिश स्कूल में उसे नौकरी मिल सकती है.

नौकरी करने वाली बात निशा ने पति और सासससुर से बताई तो उन्हें इस पर कोई ऐतराज नहीं हुआ. निशा को इजाजत मिल गई और थोड़ी कोशिश से निशा को होली चाइल्ड स्कूल में नौकरी मिल गई.

कालांतर में निशा 2 बेटियों की मां बनी, जिन के नाम रागिनी और तमन्ना रखे गए. अब उन का छोटा सा खुशहाल परिवार था. वे स्कूल परिसर में स्थित कमरे में रहते थे. राजकुमार और निशा का दांपत्य जीवन काफी सुखद था. किन्हीं खास मौकों पर वे लोग बरेली चले जाते थे.

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बदलने लगी निशा की सोच

सब कुछ ठीक चल रहा था, पर वक्त कब करवट ले लेगा, इस का आभास किसी को नहीं था. स्कूल की नौकरी करतेकरते निशा को लगने लगा था कि राजकुमार से शादी करना उस के जीवन की सब से बड़ी भूल थी. वह अच्छाखासा कमा लेती है. अगर उस ने शादी की जल्दबाजी न की होती तो उसे कोई पढ़ालिखा अच्छा पति मिलता और वह ऐश करती.

ऐसे विचार मन में आते ही उस का दिल बेचैन होने लगा. जितना उसे मिला था, उस से उसे संतोष नहीं था. उस की कुछ ज्यादा पाने की चाहत बढ़ रही थी.

कहते हैं, अकसर ज्यादा पाने की चाह में लोग बहुत कुछ गंवा देते हैं. निशा का भी यही हाल था. अब धीरेधीरे राजकुमार और निशा के जीवन में तल्खियां बढ़ने लगीं. निशा छोटीछोटी बातों को ले कर मीनमेख निकालती और उस से झगड़ा करने की कोशिश करती.

सीधेसादे राजकुमार को हैरानी होती थी कि निशा को आखिर हो क्या गया है. एक दिन निशा ने कहा, ‘‘तुम क्या थोड़ी और पढ़ाई नहीं कर सकते थे? कम से कम मेरी तरह इंटर तो पास कर लेते. पढ़ेलिखे होते तो तुम्हारा दिमाग भी खुला होता.’’

‘‘मैं ज्यादा पढ़ालिखा न सही, पर अपने काम में तो परफैक्ट हूं. लोगों को अपने धर्म का ज्ञान बेहतर तरीके से देता हूं. हालांकि मैं केवल हाईस्कूल पास हूं लेकिन मैं ने यह ठान लिया है कि अपनी बेटियों को खूब पढ़ाऊंगा.’’ राजकुमार बोला.

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‘‘बेटियों की फिक्र तुम छोड़ो. यह सब मुझे सोचना है कि उन के लिए क्या करना है.’’ निशा ने पति की बात काटते हुए कहा.

राजकुमार तर्क कर के बात बढ़ाना नहीं चाहता था. इसलिए वह पत्नी के पास से उठ गया. दोनों बेटियों को साथ ले कर वह यह सोच कर घर से बाहर निकल गया कि थोड़ी देर में निशा का गुस्सा शांत हो जाएगा.

थोड़ी देर बाद जब वह घर पहुंचा तो निशा नार्मल हो चुकी थी. राजकुमार ने राहत की सांस ली. निशा ने राजकुमार का खाना लगा दिया, तभी स्कूल का चपरासी 20 वर्षीय अर्जुन आया और वह निशा को चाबियां देते हुए बोला, ‘‘मैडम, मैं ने बाकी ताले बंद कर दिए हैं. आप केवल बाहरी गेट का ताला लगा लेना, मैं घर जा रहा हूं.’’

‘‘अर्जुन, बैठो, चाय पी कर जाना.’’ निशा ने कहा.

निशा के कई बार कहने पर अर्जुन कुरसी पर बैठ गया. अर्जुन बाबा कालोनी निवासी ओमेंद्र सिंह का बेटा था. वह स्कूल में चपरासी था और उस का छोटा भाई किरनेश स्कूल के प्रिंसिपल के घर का नौकर था.

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कुछ देर में निशा चाय बना कर ले आई. चाय पी कर अर्जुन चला गया. लेकिन राजकुमार के दिल में कुछ खटकने लगा. उस ने निशा से कहा, ‘‘मुझे इस अर्जुन की आदतें कुछ अच्छी नहीं लगतीं. वैसे भी ये स्कूल का चपरासी है और तुम टीचर, तुम्हें अपने स्टैंडर्ड का ध्यान रखना चाहिए.’’

निशा ने तुनक कर कहा, ‘‘मैं ने ऐसा क्या कर दिया जो तुम मेरे स्टैंडर्ड को कुरेद रहे हो.’’

राजकुमार ने कोई जवाब नहीं दिया. वह बात को बढ़ाना नहीं चाहता था. लेकिन उस दिन के बाद निशा का ध्यान अर्जुन पर टिक गया. जब वह अकेली होती तो अचानक अर्जुन उस के जेहन में आ बैठता.

निशा के दिल के दरवाजे पर दस्तक दी अर्जुन ने

कुछ दिनों बाद राजकुमार की तबीयत खराब हो गई. वह कभीकभी 2 दिन तक चर्च में ही रुक जाता और बदायूं नहीं आ पाता था. इस अकेलेपन ने निशा को गुमराह कर दिया. अर्जुन एक स्वस्थ और स्मार्ट युवक था. वैसे भी निशा के साथ वह घुलनेमिलने लगा था. अब राजकुमार की गैरमौजूदगी में वह निशा के कमरे में आ जाता और उस की बेटियों के लिए खानेपीने की चीजें ले आता था.

निशा के मन में अर्जुन अपनी जगह बनाने लगा था. निशा भी अर्जुन के बारे में सोचती रहती थी. वह उस की मजबूत बांहों में समाने के लिए बेताब रहने लगी थी. उधर अर्जुन निशा को चाहता तो था लेकिन निशा के पति की वजह से पहल करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था.

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कहा जाता है कि फिसलन की ओर बढ़ने वाले कदम आसानी से दलदल तक पहुंच जाते हैं. यही निशा के साथ हुआ. एक दिन शाम को निशा के पास राजकुमार का फोन आया. उस ने कहा कि वह आज रात को घर नहीं आ पाएगा. इस फोन काल ने निशा के दिल में हलचल मचा दी. उस के दिल की धड़कनें बढ़ गईं.

जानें आगे क्या हुआ अगले भाग में…

कहानी सौजन्य-मनोहर कहानियां

जिम्मेदारी बनती है कि नहीं: भाग 1

पापा और बूआ की बातें मैं सुन रहा था. अकसर ऐसा होता है न कभीकभी जब आप बिना कुछ पूछे ही अपने सवालों के जवाब पा जाते हैं. कहीं का सवाल कहीं का जवाब बन कर सामने चला आता है. नातेरिश्तेदारी की कटुता दोस्ती की कटुता से कहीं ज्यादा दुखदायी होती है क्योंकि रिश्तेदार को हम बदल नहीं सकते जबकि दोस्ती में ऐसी कोई मजबूरी नहीं होती. न पसंद आए तो दोस्त को बदल दो, छोड़ दो उसे, ऐसी क्या मजबूरी कि निभाना ही पड़े?

‘‘मनुष्य हैं हम और समाज में हर तरह के प्राणी से हमारा वास्ता पड़ता है,’’ पापा बूआ को समझाते हुए बोले, ‘‘जहां रिश्ता बन जाए वहां अगर कटुता आ जाए तो वास्तव में बहुत तकलीफ होती है. न तो छोड़ा जाता है और न ही निभाया जाता है. बस, एक बीच का रास्ता बच जाता है. फीकी बेजान मुसकान लिए स्वागत करो और दिल का दरवाजा सदा के लिए बंद. अरे भई, हमारा दिल तो प्यार के लिए है न, जहां नफरत नहीं रह सकती क्योंकि हमें भी तो जीना है न. नफरत पाल कर हम कैसे जिएं. किसी इनसान का स्वभाव यदि सामने वाले को नंगा करना ही है तो हम कब तक नंगा होना सह पाएंगे?’’

बूआ के घर कोई उत्सव है और उन का देवर जबतब उन के हर काम में बाधा डाल रहा है. बचपन से बूआ उस के साथ थीं, मां बन कर बूआ ने अपने देवर को पाला है. जब बूआ की शादी हुई तब उन का देवर मात्र 5 साल का था.

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मांबाप नहीं थे, इसलिए जब भी बूआ मायके आती थीं तो वह भी उंगली पकड़े साथ होता था. हम अकसर सोचते थे कि बूआ तो नई ब्याही लगती ही नहीं. शादी होते ही वह एकदम से सयानी सी लगने लगी हैं. मैं तब 7-8 साल का था जब बूआ की शादी हुई थी. अकसर मां का बूआ से वार्तालाप कानों में पड़ जाता था :

‘सजासंवरा तो कर गायत्री. तू तो नई ब्याही लगती ही नहीं.’

‘इतना बड़ा बच्चा साथ चले तो क्या नई ब्याही बन कर चलना अच्छा लगता है, भाभी. सभी राजू को मेरा बच्चा समझते हैं. क्या 5 साल के बच्चे की मां दुलहन की तरह सजती है?’

मात्र 20 साल की मेरी बूआ मंडप से उठते ही 5 साल के जिस बच्चे की मां बन चुकी थीं वही बच्चा आज बातबेबात बूआ का मन दुखा रहा है…जिस पर वह परेशान हैं. बूआ के बेटे की शादी थी. बूआ न्योता देने गई थीं जिस पर उस ने रुला दिया था.

‘‘आज याद आई मेरी.’’

‘‘कल ही तो कार्ड छप कर आए हैं. आज मैं आ भी गई.’’

‘‘कुछ सलाहमशविरा तक नहीं, मुझ से रिश्ता करने से पहले…कार्ड तक छप गए और मुझे पता तक नहीं कि बरात का इंतजाम कहां है और लड़की काम क्या करती है.’’

स्तब्ध बूआ हैरानपरेशान रह गई थीं. इस तरह के व्यवहार की नहीं न सोची थी. बूआ कुछ कार्ड साथ भी ले गई थीं देवर के मित्रों और रिश्तेदारों के लिए.

‘‘रहने दो, रहने दो, भाभी, बेइज्जती करती हो और न्योता भी देने चली आईं, न मैं आऊंगा और न ही मेरे ससुराल वाले. कोई नहीं आएगा तुम्हारे घर पर…तुम ने हमारे रिश्तेदारों की बेइज्जती की है… पहले जा कर उन से माफी मांगो.’’

‘‘बेइज्जती की है मैं ने? लेकिन कब, किस की बेइज्जती की है मैं ने?’’

‘‘भाभी, तुम ने अपने बेटे का रिश्ता करने से पहले हम से नहीं पूछा, मेरे ससुराल वालों से नहीं पूछा.’’

‘‘मेरे घर में क्या होगा उस का फैसला क्या तुम्हारे ससुराल वाले करेंगे या तुम करोगे? हम लड़की देखने गए, पसंद आई…हम ने उस के हाथ पर शगुन रख दिया. 15 दिन में ही शादी हो रही है. तुम्हारे भैया और मैं अकेले किसी तरह पूरा इंतजाम कर रहे हैं…राहुल को छुट्टी नहीं मिली. वह सिर्फ 2 दिन पहले आएगा, अब हम तुम्हारे ससुराल वालों से माफी मांगने कब जाएं? और क्यों जाएं?’’

‘‘भाभी, तुम लोग जरा भी दुनियादारी नहीं समझते. तुम ने अपने घर का मुहर्त किया, वहां भी मेरे ससुराल वालों को नहीं बुलाया.’’

‘‘वहां तो किसी को भी नहीं बुलाया था. तुम भी तो वहीं थे. सिर्फ घर के लोग थे और हम ने पूजा कर ली थी, फिर उस बात को तो आज 2 साल हो गए हैं. आज याद आया तुम्हें गिलाशिकवा करना जब मैं तुम्हें शादी का न्योता देने आई हूं.’’

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पुत्र समान देवर का कूदकूद कर लड़ना बूआ समझ नहीं पा रही थीं. न जाने कबकब की नाराजगी और नाराजगी भी वह अपने ससुराल वालों को ले कर जता रहा था जिन से बूआ का कोई वास्ता न था.

समधियाना तो फूलों की खुशबू की तरह होता है जहां हमें सिर्फ इज्जत देनी है और लेनी है. फूल की सुंदरता को दूर से महसूस करना चाहिए तभी उस की सुंदरता है, हाथ लगा कर पकड़ोगे तो उस का मुरझा जाना निश्चित है और हाथ भी कुछ नहीं आता.

कुछ रिश्ते सिर्फ फूलों की खुशबू की तरह होते हैं जिन के ज्यादा पास जाना उचित नहीं होता. पुत्र या पुत्री के ससुराल वाले, जिन से हमारा मात्र तीजत्योहार या किसी कार्यविशेष में मिलना ही शोभा देता है. ज्यादा आनाजाना या दखल देना अकसर किसी न किसी समस्या या मनमुटाव को जन्म देता है क्योंकि यह रिश्ता फूल की तरह नाजुक है जिसे बस दूर से ही नमस्कार किया जाए तो बेहतर है.

देवर बातबेबात अपने ससुराल वालों को घर पर बुलाना चाहता था जिस पर अकसर बूआ चिढ़ जाया करती थीं. हर पल उन का बूआ के घर पर पसरे रहना फूफाजी को अखरता था. हर घर की एक मर्यादा होती है जिस में बाहर वाले का हर पल का दखल सहन नहीं किया जा सकता. अति हो जाने पर फूफाजी ने भाई को अलग हो जाने का संदेशा दे दिया था जिस पर काफी बावेला मचा था. जिसे पुत्र बना कर पाला था वही देवर बराबर की हिस्सेदारी मांग रहा था.

‘‘कौन सा हिस्सा? हमारे मांबाप जब मरे तब हम किराए के घर में रहते थे और तुम 2 साल तक ननिहाल में पलते रहे. अपनी शादी के बाद मैं तुम्हें अपने घर लाया और पालपोस कर बड़ा किया. अपने बेटे के मुंह का निवाला छीन कर अकसर तुम्हारे मुंह में डाला…कौन सा हिस्सा दूं मैं तुम्हें? हमारे मातापिता कौन सी दौलत छोड़ कर मरे थे जिसे तुम्हारे साथ बांटूं. मैं ने यह सबकुछ अपने हाथ से कमाया है. तुम भी कमाओ. मेरी तुम्हारे लिए अब कोई जिम्मेदारी नहीं बनती.’’

‘‘आप ने कोई एहसान नहीं किया जो पालपोस कर बड़ा कर दिया.’’

‘‘मैं ने जो किया वह एहसान नहीं था और अब जो तुम करने को कह रहे हो उस की मैं जरूरत नहीं समझता. हमें माफ करो और जाओ यहां से…हमें चैन से जीने दो.’’

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फूफाजी ने जो उस दिन हाथ जोड़े, उन्हीं पर अड़े रहे. मन ही मर गया उन का. क्या करते वह अपने भाई का?

‘‘यह कल का बच्चा ऐसी बकवास कर गया. आखिर क्या कमी रखी मैं ने? न लाता ननिहाल से तो कोई मेरा क्या बिगाड़ लेता, पलता वहीं मामा के परिवार का नौकर बन कर. आज इज्जत से जीने लायक बन गया तो मेरे ही सिर पर सवार…हद होती है बेशर्मी की.’’

वह अलग घर में चला गया था लेकिन मौकेबेमौके उस ने जहर उगलना नहीं छोड़ा था. बूआ के बेटे की शादी का नेग उस ने उठा कर घर से बाहर फेंक दिया था. बीमार हो गई थीं बूआ.

‘‘क्या हो गया है इस लड़के की बुद्धि को. हमारा ही दुश्मन बना बैठा है. हम ने क्या नुकसान कर दिया है इस का. इज्जत के सिवा और क्या चाहते हैं इस से,’’ बूआ का स्वर पुन: कानों में पड़ा.

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जानें आगे क्या हुआ कहानी के अगले भाग में…

जीवन की चादर में छेद: भाग 3

दूसरा भाग पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें- जीवन की चादर में छेद: भाग 2

अर्जुन के चले जाने के बाद राजकुमार ने निशा को जम कर लताड़ा. निशा उस के पैरों में गिर कर अपनी गलती की माफी मांगने लगी, पर राजकुमार के तेवर सख्त थे. उस ने  कह दिया कि अब हम यहां नहीं रहेंगे. राजकुमार ने पिता को फोन पर सारी बातें बता दीं और कहा कि अब हम बरेली में नेकपुर स्थित अपने घर में रहेंगे.

पति का फैसला सुन कर निशा परेशान हो गई. वह किसी भी हालत में बदायूं को छोड़ना नहीं चाहती थी. अत: उस ने तय कर लिया कि वह पति नाम के इस कांटे को अपनी जिंदगी से उखाड़ फेंकेगी.

अगले दिन राजकुमार वजीरगंज चला गया. निशा ने मौका मिलते ही अर्जुन को एकांत में बुला कर कहा, ‘‘अगर मुझे चाहते हो तो तुम्हें राजकुमार को रास्ते से हटाना होगा.’’

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अर्जुन का दिल तेजी से धड़कने लगा क्योंकि ऐसा तो उस ने कभी सोचा ही नहीं था.

उसे चुप देख निशा बोली, ‘‘हां, मैं ठीक ही कह रही हूं. आज राजकुमार जब घर आएगा तो तुम घर आ कर उस से अपनी गलती की माफी मांगना और उस का विश्वास जीतना. इस के आगे क्या करना है, मैं बाद में बताऊंगी.’’

अर्जुन ने ऐसा ही किया. राजकुमार जब घर पहुंचा तो अर्जुन उस के घर चला गया. उसे देखते ही राजकुमार उस पर भड़का तो अर्जुन ने उस से अपनी गलती पर अफसोस जताते हुए माफी मांग ली. सीधेसादे राजकुमार ने उसे माफ कर दिया और कहा कि अब वैसे भी हमें यहां नहीं रहना है.

माफी मांग कर काट दी जीवन की डोर

पर अर्जुन के दिल में राजकुमार के प्रति क्या था, यह बात राजकुमार नहीं जानता था. राजकुमार मौत की दस्तक को सुन ही नहीं पाया था. 15 जून, 2019 को अपनी योजना के मुताबिक अर्जुन अपनी बाइक पर आया. उस ने राजकुमार से कहा, ‘‘चलिए, मछली लेने चलते हैं.’’

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राजकुमार भी माहौल का तनाव कम करना चाहता था. वह अर्जुन को माफ कर चुका था.

साजिश से अनजान राजकुमार अर्जुन के साथ बाइक पर बैठ गया. अर्जुन बाइक को इधरउधर घुमाता रहा. फिर बाइक मझिया गांव के सुनसान इलाके में ले गया और बोला, ‘‘अब बाइक आप चलाओ, मैं पीछे बैठता हूं.’’

राजकुमार ने ड्राइविंग सीट संभाली. दोनों शर्की रेलवे स्टेशन से कुछ ही दूरी पर पहुंचे थे कि बाइक पर पीछे बैठे अर्जुन ने जेब से तमंचा निकाला और राजकुमार के सिर पर गोली मार दी. राजकुमार का बैलेंस बिगड़ा और वह बाइक समेत जमीन पर गिर गया. राजकुमार खून से लथपथ था. अब योजना के मुताबिक राजकुमार को रेलवे ट्रैक पर डालना था ताकि उस की मौत ट्रेन एक्सीडेंट लगे.

अर्जुन चाहता था ट्रेन एक्सीडेंट समझा जाए

खून से लथपथ राजकुमार को अर्जुन ने रेलवे ट्रैक पर डाल दिया. उस के कपडे़ भी खून से लथपथ थे. रेलवे लाइन पर पड़ा राजकुमार तड़प रहा था. वह अभी जिंदा था पर अर्जुन ने जो सोचा था, हो नहीं सका. कासगंज से बरेली जाने वाली ट्रेन तब तक गुजर गई थी. अब सुबह 5 बजे से पहले वहां से कोई गाड़ी निकलने वाली नहीं थी.

अर्जुन ने बाइक स्टार्ट की और घर आ गया. उस ने खून सने कपड़े उतारे. कपड़ों पर लगा खून देख कर घर वाले सन्न रह गए. उन्होंने अर्जुन से जब सख्ती से पूछताछ की तो पता चला कि अर्जुन ने राजकुमार का कत्ल कर दिया है.

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अर्जुन ने अपने कपड़े धो डाले और घर वालों से सख्त लहजे में कहा कि कोई भी अपना मुंह नहीं खोलेगा. उस ने निशा को काम हो जाने की खबर फोन पर दे दी.

रात जैसेतैसे गुजर गई. सुबह मार्निंग वाक पर निकले लोगों ने रेलवे ट्रैक पर लाश देखी तो किसी ने इस की सूचना रेलवे पुलिस को दे दी. पुलिस वहां आ गई और लोगों से लाश की शिनाख्त कराने की कोशिश की. पर उस की शिनाख्त नहीं हो पाई. सिविल लाइंस थाने की पुलिस भी वहां पहुंच गई.

उधर राजकुमार को 15 जून को बरेली जाना था, यह बात उस ने फोन पर अपने पिता रघुवीर को बता दी थी, लेकिन वह रात में घर नहीं पहुंचा तो घर वाले परेशान हो गए.

इधर थाना सिविल लाइंस के थानाप्रभारी ओ.पी. गौतम, सीओ राघवेंद्र सिंह राठौर और एसपी (सिटी) जितेंद्र कुमार श्रीवास्तव भी मौके पर पहुंच गए थे. फोरैंसिक टीम भी जांच के लिए पहुंच गई थी. जांच में पुलिस को मृतक की जेब से 100 रुपए का एक नोट और एक परची मिली. पुलिस ने जरूरी काररवाई कर के लाश पोस्टमार्टम के लिए भेज दी.

17 जून को लाश का फोटो अखबारों में छपा तो रघुवीर के एक रिश्तेदार जे.पी. मसीह ने उन्हें फोन कर के पूछा कि राजकुमार कहां है? रघुवीर ने कहा कि राजकुमार को बरेली आना था, पर आया नहीं है.

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सब जगह फोन कर लिया, पर उस का कुछ पता नहीं है. तब जे.पी. मसीह अखबार ले कर रघुवीर के घर पहुंच गए और उन्हें अखबार दिखाया. अखबार में अपने बेटे की लाश का फोटो देख कर रघुवीर की आंखों से आंसू निकल आए. वह परेशान हो गए तभी उन के पास पुलिस कंट्रोल रूम से भी फोन आ गया.

रघुवीर अपने रिश्तेदारों के साथ पोस्टमार्टम हाउस पहुंच गए और लाश की शिनाख्त बेटे राजकुमार के रूप में कर दी. निशा भी किसी से खबर पा कर घडि़याली आंसू बहाती हुई पोस्टमार्टम हाउस पहुंची. वह वहां इस तरह से रो रही थी, जैसे उस का सब कुछ लुट गया हो.

पोस्टमार्टम के बाद लाश बरेली ला कर उस का अंतिम संस्कार कर दिया गया. निशा के हावभाव देख कर रघुवीर की समझ में कुछकुछ आ रहा था. उन्हें शक था कि उन के बेटे की हत्या निशा ने कराई होगी. क्योंकि उसे रंगेहाथ पकड़ने पर राजकुमार ने उस की शिकायत अपने पिता से कर दी थी.

रघुवीर ने जांच अधिकारी के सामने अपनी पुत्रवधू और अर्जुन के नाजायज संबंधों का खुलासा कर दिया था. पुलिस ने अर्जुन को हिरासत में ले लिया. अर्जुन ने अपने हाथ पर ब्लेड से निशा का नाम लिख रखा था.

पुलिस ने निशा और अर्जुन को आमनेसामने बैठा कर पूछताछ की तो दोनों एकदूसरे पर इलजाम लगाने लगे. उन की दीवानेपन आशिकी की हवा निकल चुकी थी. दोनों ने ही अपना जुर्म स्वीकार कर लिया. अब दोनों को जेल जाने का डर सता रहा था.

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पुलिस ने भादंवि की धारा 302, 201 के तहम मुकदमा दर्ज कर के उन से विस्तार से पूछताछ की और कोर्ट में पेश कर जेल भेज दिया.

रागिनी और तमन्ना ने मांबाप दोनों को खो दिया था. राजकुमार की मां आशा मसीह ने कहा कि उसे तो विश्वास ही नहीं हो रहा कि उन की बहू उन के सीधेसादे बेटे को मरवा सकती है. अब इस उम्र में उन्हें अपने बेटे की बच्चियों की परवरिश के लिए जीना होगा.

निशा के पिता दयाशंकर और मां गीता को बेटी के इस गुनाह पर अफसोस होता है. उन्होंने तो कभी कल्पना भी नहीं की थी कि निशा ऐसा भी कर सकती है. काश, राजकुमार मौत की दस्तक को सुन पाता तो उसे अपनी जान से हाथ न धोना पड़ता.

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कहानी सौजन्य-मनोहर कहानियां

जीवन की चादर में छेद: भाग 2

पहला भाग पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें- जीवन की चादर में छेद: भाग 1

निशा के दिमाग में अर्जुन घूम रहा था. उस ने कमरे से बाहर निकल कर देखा तो उस समय अर्जुन स्कूल के अपने काम निपटा कर घर जाने की तैयारी कर रहा था. तभी निशा ने उसे आवाज दे कर बुलाया, ‘‘अर्जुन, तुम कमरे में आओ, कुछ बात करनी है.’’

अर्जुन कमरे में आ गया. निशा उस के लिए चाय बना कर ले आई. निशा ने चाय का प्याला उस की ओर बढ़ाते हुए कहा, ‘‘अर्जुन, आज रात राजकुमार घर नहीं आएगा. अकेले में मुझे डर लगेगा, तुम आज रात यहीं रुक जाओ, जिस से मेरा भी मन लगा रहेगा.’’

अर्जुन ने गहरी नजर से निशा को देखा. उसे निशा का अंदाज कुछ अजीब सा लगा. उस की चुप्पी देख कर निशा ने पूछा, ‘‘कुछ परेशानी है क्या?’’

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‘नहीं मैडम, ऐसी कोई बात नहीं है. मैं सोच रहा हूं कि अगर साहब को पता चला तो पता नहीं वो मेरे बारे में क्या सोचेंगे, वह तो वैसे भी मुझे पसंद नहीं करते.’’

‘‘तुम उन की चिंता मत करो. तुम्हें मैं तो पसंद करती हूं न.’’ निशा ने मुसकराते हुए कहा तो अर्जुन की भावनाओं में जैसे तूफान उठने लगा. उस ने उसी समय जेब से मोबाइल निकाला और अपने घर फोन कर के बता दिया कि स्कूल में कुछ काम होने की वजह से वह आज घर नहीं आ पाएगा.

इस के बाद अर्जुन उस के कमरे में बैठ गया. निशा ने खाना बनाने की तैयारी शुरू कर दी. तब तक अर्जुन उस के दोनों बच्चों के साथ खेलने लगा. खाना बनने के बाद निशा ने बच्चों को पहले खाना खिलाया और उन्हें सुला दिया.

फिर निशा ने अपना और अर्जुन का खाना लगाया. खाना खातेखाते अर्जुन उस के खाने की तारीफ करते हुए बोला, ‘‘मैडम, आप खाना बहुत अच्छा बनाती हैं.’’

‘‘खाना बनाना ही नहीं, मैं बहुत से काम बहुत अच्छे से करती हूं.’’ कह कर निशा हंसने लगी. फिर उस ने एक प्रश्न किया, ‘‘अर्जुन, तुम ने अभी तक शादी क्यों नहीं की?’’

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अर्जुन निशा को गौर से देखते हुए बोला, ‘‘रिश्ते तो कई आए थे मैडम, लेकिन जब से आप को देखा है मेरा इरादा बदल गया है.’’

‘‘क्या मतलब?’’ निशा ने चौंकते हुए पूछा.

‘‘मतलब यह कि मुझे आप जैसी स्मार्ट जीवनसाथी की जरूरत है.’’

निशा की चाहत बन गया अर्जुन

अर्जुन की बात सुन कर निशा मन ही मन खुश हुई कि इस का मतलब वह उसे पहले से ही चाहता है. निशा कुछ नहीं बोली बल्कि मुसकराने लगी. खाना खाते हुए दोनों इसी तरह की बातें करते रहे.

खाना खाने के बाद निशा ने अर्जुन का बिस्तर जमीन पर लगाते हुए कहा कि वह यहां आराम कर सकता है. इस के बाद रसोई का काम खत्म कर के वह भी आ गई.

उस ने चटाई बिछा कर अपना बिस्तर भी जमीन पर लगा लिया. धीरेधीरे रात गहराती जा रही थी और वहां भी कुछ ऐसा होने वाला था, जो किसी के लिए बरबादी ला सकता था.

निशा की आंखों में नींद नहीं थी. उस ने अर्जुन की तरफ देखा तो वह भी करवटें बदल रहा था. उस ने पूछा, ‘‘अर्जुन, नींद नहीं आ रही क्या?’’

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‘‘हां, नींद नहीं आ रही. पर सोच रहा हूं कि आप के पति तो अकसर वजीरगंज में ही रुक जाते हैं, फिर आप ने आज मुझे यहां क्यों रोका है?’’

निशा ने हंसते हुए कहा, ‘‘तुम क्या सचमुच अनाड़ी हो या अनजान बनने का नाटक कर रहे हो. मैं ने तुम्हारी आंखों में कुछ खास देखा था, वही पिछले कई दिनों से मुझे परेशान कर रहा है. अर्जुन भूख अकसर 2 लोगों को एकदूसरे के करीब ले आती है.’’

‘‘यह क्या कह रही हैं आप?’’ अर्जुन बोला.

‘‘ठीक ही कह रही हूं. मैं तुम से प्यार करने लगी हूं अर्जुन.’’

अर्जुन को जैसे करंट सा लगा, पर उसे विश्वास नहीं हो रहा था. निशा ने आगे बढ़ कर अर्जुन का हाथ पकड़ा और कहा, ‘‘डरो मत अर्जुन, मैं सचमुच तुम्हें चाहती हूं और यह कोई गुनाह नहीं है. मैं अपने पति से तंग आ चुकी हूं.’’

अर्जुन फिसलन की कगार पर खड़ा था. निशा के स्पर्श से वह दलदल में जा गिरा. शादीशुदा और 2 बच्चों की मां ने उसे एक ऐसे दलदल में खींच लिया, जिस के अंदर जाना तो आसान था पर बाहर आने का कोई रास्ता नहीं था.

उस दिन के बाद रिश्तों की दिशा और दशा ही बदल गई. अपनी तबाही से बेखबर राजकुमार अगले दिन घर आ गया. राजकुमार की बरबादी की नींव रखी जा चुकी थी. बीवी ने बेवफाई करने के लिए कमर कस ली थी. अब आए दिन वह पति से झगड़ने लगी. राजकुमार भी महसूस कर रहा था कि स्कूल का चपरासी अर्जुन अब पहले की तरह उस की इज्जत नहीं करता.

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एक दिन वह जब वजीरगंज से लौटा तो उस ने अर्जुन को कमरे में चारपाई पर पसरा हुआ देखा. यह देख कर राजकुमार का माथा गरम हो गया. वह बोला, ‘‘अर्जुन, तुम यहां क्या कर रहे हो? लगता है, तुम अपनी औकात भूल रहे हो. मेरी गैरमौजूदगी में तुम्हें यहां आने की जरूरत नहीं है.’’

उस समय तो अर्जुन वहां से चला गया. उस ने खुद को अपमानित महसूस किया और तय किया कि राजकुमार को सबक सिखाएगा.

राजकुमार के तेवर देख कर निशा भी डर गई थी. राजकुमार ने कहा, ‘‘निशा, यह अर्जुन मुझे बिलकुल भी पसंद नहीं है. तुम इस से दूर ही रहो. देखो, मैं सोच रहा हूं कि अपना तबादला बरेली में ही करा लूं. पापा भी रिटायर हो गए हैं, अपना मकान भी उन्होंने बना लिया है. फिर तुम्हें भी बरेली में कहीं नौकरी मिल ही जाएगी.’’

‘‘देखो, अर्जुन इसी स्कूल में काम करता है. तुम्हारे जाने के बाद वह मार्केट से घर की जरूरत का सामान भी ला देता है. तुम खामख्वाह उस पर गरम हो रहे थे. देखो, हमें यहां कमरा मिला हुआ है. यहां कोई परेशानी भी नहीं है. और फिर यह बात तुम जानते हो कि मैं जौइंट फैमिली में नहीं रह सकती.’’ निशा ने पति को समझाया.

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‘‘इस मामले में मैं घर वालों से बात करूंगा.’’ कह कर राजकुमार बाथरूम चला गया.

राजकुमार अनभिज्ञ था पत्नी के संबंधों से

राजकुमार को अभी तक यह पता नहीं था कि अर्जुन और उस की पत्नी निशा के बीच किस तरह के संबंध हैं. पिछले 6 महीने से वह महसूस कर रहा था कि निशा बदल रही है.

कहते हैं कि इश्क और मुश्क छिपाए नहीं छिपता. निशा और अर्जुन के संबंधों की असलियत भी सामने आ ही गई. उस दिन अर्जुन घर जाने ही वाला था कि राजकुमार का पत्नी के पास फोन आ गया कि वह आज रात को घर नहीं आएगा.

यह खबर सुन कर निशा खुश हुई. उस ने अर्जुन को बुला कर कहा, ‘‘आज रात फिर अपनी ही है क्योंकि राजकुमार आज भी नहीं आएगा. ऐसा करो कि तुम नहाधो कर फ्रैश हो जाओ. तब तक मैं तुम्हारे लिए चाय बनाती हूं.’’

निशा ने गैस पर चाय चढ़ा दी. अर्जुन भी फ्रैश होने के लिए बाथरूम में घुस गया. फ्रैश होने के बाद वह निशा के साथसाथ चाय पीने लगा. चाय की चुस्कियां लेते हुए वह बोला, ‘‘ऐसा आखिर कब तक चलेगा, हमें कुछ करना ही होगा.’’

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‘‘हां करेंगे.’’ कहते हुए निशा ने कहा, ‘‘अभी तो इन पलों को जिओ, जो हमें मिल रहे हैं.’’

इस के बाद दोनों मौजमस्ती में लीन हो गए. अर्जुन इस बात से बेखबर था कि उस ने बाहरी गेट बंद नहीं किया था. तभी अचानक दबेपांव राजकुमार वहां आ गया. बीवी को अर्जुन की बाहों में देख कर वह आगबबूला हो गया. उस ने अर्जुन की टांग पकड़ कर खींची और उसे कई तमाचे जड़ दिए.

जानें आगे क्या हुआ अगले भाग में…

कहानी सौजन्य-मनोहर कहानियां

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